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चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल compleet



“यानि आप मुझे बेगुनाह मानती हैं ?"'

"पूरी तरह ।"

शेखर मल्होत्रा ने अपने सामने वाले सोफे पर बैठी किरन को इस तरह देखा ---- जैसै किरन को नहीं बल्कि

साक्षात् कुतुबमीनार को अपने कमरे में , अपने सामने वाले सोफे पर बैठी देख रहा हो।

जुबान से बोल तक न फूटा, होंठ फ़ड़फड़ाकर रह गये ।

हां आंखें जरूर भर जाई थीं ।

और उन भरी हुई आंखों को देखकर किरन ने कहा-----"त-तुम रो रहे हो ?"

"न-नहीं.......नहीं तो ?" बोखलकर शेखर ने अपनी दोनों आंखे हथेलियों से ढक लीं ।

फिर स्वयं को संयत करने के लिए एक सिगरे सुलगाई ।

किरन समझ सकती थी कि पल-मर के लिए झिलमिलाने वाले वे आँसू अचानक मिली असीमित खुशी के आंसू थे, विषय चेंज करने की गरज से वह बोली----"मगर जैसा कि तुम जानते हो, मात्र मेरे बेगुनाह समझ लेने से स्थिति में कुछ चेंज आंने वाला नहीं है----चेंज तब आयेगा जव मैं कोर्ट में बेगुनाह साबित करने में कामयाब होऊंगी !"

"म-मेरे ख्याल में ऐसा नहीं हो सकेगा किरन जी ।"

“क्यों नहीं हो सकेगा ?"

"जो चक्रव्यूह मेरे चारों तरफ़ रची गया है वह इतना चक्करदार है कि जिसे अपके पापा, अक्षय श्रीवास्तव, शहजाद राय और स्वयं जज साहब तक नहीं समझ सके, उसे भला हम--------जो कि बौद्धिक स्तर पर उनके सामने बहुत 'बोने' हैं, क्या समझ सकेंगे----चक्रव्यूह के अन्दर घुसकर इसे तोडने की तो बात ही दूर, लाख प्रयत्न करने बावजूद मैं इतना तक नहीं जान पाया हूं कि यह चक्रव्यूह रचा किसने है ?"

"तुम्हें फंसाने की इतनी जबरदस्त योजना वही बना सकता हैं, जिसे तुम्हारे फंसने पर जबरदस्त लाभ हो ।"

"जाहिर-सी बात है ।"

"तो सोचो, तुम्हारे फंसने से किसे लाम है सकता है ।"

"लाख दिमाग घुमाने के बावजूद मैं किसी ऐसे व्यक्ति का नाम नहीं सोच पाया हू।"

“सीधा-सीघा लाभ तो संगीता के चाचा को पहुंचा है ।"

"क्या नाम है उनका !"

"अतर जैन ।"

" पत्नी, बेटी और दोनों बेटों के नाम भी बताओ ।"

"पत्नी का नाम सुमित्रा है, वेटी का नाम संगम, छोटे लड़के का राकेश और बड़े लड़के का कमल मगर------

"मगर !"

“ये लोग भला संगीता की हत्या कैसे कर सकते हैं ?"

"क्यों नहीं कर सकते ?"

"संगीता की मौत से पहले ये अमीनाबाद में रहते थे--- यहाँ अाते-जाते तक नहीं थे , अतर जैन को या तो मैंने तब देखा था जव बाबूजी की मृत्यु हुई थी या संगीता के बाद देखा है ।"

" शेखर की आखों में आँखें डालकर सवाल किया किरन ने-----"गुलाब चन्द की मौत कैसे हुई थी ?"

"उनकी मृत्यु हिल एरिया में कार ड्राइव करते हुई थी--- ब्रेक फेल हो जाने की वजह से उनकी फियेट एक खाई में जा गिरी थी---लाश गद्दी और स्टेयरिंग के बीच फंसी मिली थी,आग भी लग गई थी कार मे----बुरी तरह जल गए थे वे----इतने ज्यादा कि लाश पहचान तक में नहीं अा रही थी---अंगुठी के वेस पर ही मैं और संगीता ने उनकी शिनाख्त कर सके थे ।"

शेखर को बडी गहरी नजरों से देखती हुई किरन ने एक सवाल और किया-----"'क्या गुलाब चन्द जी संगीता को बहुत चाहते थे ?"

“यह भी कोई पूछने वाली बात है, संगीता उनकी बेटी थी ।"

"तब तो तुम्हें भी उतना ही चाहते होंगें आखिर तुम उनकी इकलोती और प्यारी बेटी के पति थे ?"

"अ-अ...आं ।" हिचका शेखर !

किरन ने तुरन्त पूछा----"हिचक क्यों रहे हो ?"

"बाबू जी मुझसे कुछ चिड़े-चिड़े से रहते थे ।"

" क्यों ?"

"दरअसल संगीता और मैंने लव-मैंरिज की थी------लव-मैरिज भी ऐसी कि बाबूजी जिसके सख्त खिलाफ थे, जाने क्यों मैं उनकी नजर में कभी अच्छी छबि न वना पाया---वे हमेशा मुझे गुन्डा-लफंगा और पैसे का लालची समझते रहे----खैर अब उन बातों को दोराने से क्या लाभ ?"

"तो अतर जैन एन्ड फैमिली को तुमने सबसे पहले तब देखा जब गुलाब चन्द के अन्तयेष्टि हुई थी ?

"फेमिली को नहीं, सिर्फ 'अंकल' को---वे अकेले आये थे, अन्त्येष्टि उन्होंने ही की थी ।"'

"बीबी-बच्चे नहीं आए थे ?"

"नहीं ?"

" क्यों ?"

"दरअसल इन तीनों भाइयों के सम्बन्थ आपस में ठीक नहीं थे ।"

"तीन भाई ?"

"हां...........हालांकि तीसरे को मैंने कभी देखा नहीं और बकौल संगीता के उसने भी बचपन में ही देखा था ----उसका नाम सुब्रत जैन था---तीनों भाइयों में सबसे बड़ा था वह उस वक्त संगीता केवल चार वर्ष की थी जब वह घर से रूठकर बल्कि लड़-झगड़कर चला गया था ।"

"लड़-झगड़कर ?"

"संगीता वताया करती थी कि मूल रूप से ये लोग हस्तिनापुर के निवासी हैं-----तीनों भाइयों के पिता हस्तिनापुर के सबसे सम्भ्रांत व्यक्ति थे । बड़ा लडका यानि सुब्रत गंदी सोसायटी में उठने-बैठने लगा था । गुन्डो-लरफगों के साथ रहकर वह भी गुन्डागर्दीं करने लगा था-------सबसे छोटा यानि अतर भी फुछ-कुछ उसी के रंग जैसा था जबकि बाबूजी दोनों से बिल्कुल अलग अपने पिता के रंग में रंगे हुए थे---धीरे - धीरे सुब्रत और अतर की 'आवारगियां और बदतमीजियां इतनी बढ़ गई कि उनके पिता ने दोनों को चेतावनी दे दी कि अगर नहीं सुधरेंगे तो वे उन्हें अपनी सम्पूर्ण जायदाद से बेदखल कर देगे-इस चेतावनी का थोड़ा सा असर अतर पर पड़ा किन्तु सुब्रत की बदतमीजियां कुछ और बढ़ गई बार-बार की चेतावनी के बावजूद उसने एक न सुनी और एक दिन ऐसा आ गया कि उनके पिता ने अखवार में इस आशय, की विज्ञप्ति निकाल थी कि सुब्रत से उनका कोई सम्बन्थ नहीं है और. उनकी सम्पत्ति में भी उसका कोई हिस्सा नहीं है वकौल संगीता के उस दिन परिवार में मानो तूफान आ गया था ----घर में कदम रखते ही सुब्रत सब पर बरस पड़ा----सबसे ज्यादा अपने पिता और बाबूजी पर भड़का था।"

" गुलाब चन्द पर क्यों ?"

सुब्रत का कहना था कि सव कुछ उसी का करा-धरा है-बाबूजी पर यह आरोप लगाया कि पिता पर उसने जादु कर दिया है----वह उसी दिन अपनी पत्नी और दस वर्षीय बेटे को लेकर हस्तिनापुर से निकल गया-जाता-जाता बाबूजी को धमकी दे गया, कह गया कि अगर उसका मौका लगा तो बाबूजी से और उनके पूरे परिवार से बदला लेगा ।

"फिर ?"'

“वह अन्तिम दिन था जव इन लोगों ने सुब्रत की शक्ल देखी यी-बाबूजी और संगीता का कहना यह था कि पता नहीं सुब्रत को धरती निगल गई या आसमान खा गया ---पता नहीं कहाँ जाकर बस गया था वह ?"

"और अतर ?"'

"सुब्रत का अंजाम देखकर अतर सम्भल तो गया किन्तु खुद को इतना कभी न सुधार सका कि अपने पिता

की नजरों में चढ जाए-उनका चहेता बेटा हमेशा बाबूजी ही रहे इसी का परिणाम था कि उनकी मौत के बाद जब वसीयत खोती गई तो पता लगा कि सम्पत्ति का नब्बे प्रतिशत भाग उन्होंने बाबूजी को दिया था और कुल दस प्रतिशत अतर को----झगड़ा होना था सो हुआ---- मगर झगड़े से अब हो क्या सकता था, अतर ने भी बाबूजी पर वहीँ आरोप लगाये जो घर छोड़ते वक्त सुब्रत ने लगाए थे, मगर वैसी कोई धमकी नहीं दी जैसी सुव्रत ने थी --- जो सम्पत्ति बाबूजी के हिस्से में आयी उसके बूते पर उन्होंने इस शहर में असली घी की फैकट्री लगा ली और अतर ने अमीनाबाद में रेडीमेड कपडों की दुकान खोल ली-----अब ये लोग उसे वेच-वाचकर यहां आ गए है मगर------

" मगर ?"

"आपने मुझसे इस परिवार की हिस्ट्री क्यों पूछी ?"

"हत्या के अधिकांश मामलों में कई पीढियों पहले हुए पारिवारिक कलह महत्वपूर्ण होते हैं ।" किरन ने कहा…"खेर, मतलब यह हुआ कि गुलाब चन्द और अतर के बीच न रंजिश जैसी बात थी न मुहब्बत जैसी, एक खिंचाव-सा था और उसी खिंचाव के कारण अपने आई की मृत्यु पर अतर अकेला आया , फैमली नहीं आई थी ?"

"हां !"

"खैर हत्यारा जो भी है, सामने तो अब उसे आना ही पड़ेगा ! आखें शून्य में केन्दित किए किरन अजीब-भी दृढ़ता के साथ कहती चली गई…"मैं उसके रचाए गए चक्रव्यूह के अन्दर घुस चुकी हूं ---इस चक्रव्यूह को तोडकर रख दूंगी मैं---चक्रव्यूह एक - एक 'जाले' की धज्जियां उड़ाकर रख दूंगी !"

"अ---अाप-आप-सेन्टीमेन्टल हो रही हैं किरन जी ।"

"ओह !" किरन चौंकी----" शायद हां-----शायद मैं सेन्टीमेन्टल ही हो उठी थी--खैर अतर एन्ड फैमिली के बीच मैं एक "शगूफा छोड़ अाई थी-अगर उनके दिल में जरा भी 'मैल' है तो उस "शगूफे’ के परिणाम सामने आने चाहिये ।"

“कैसे ?"

" मैंने उसे बता दिया कि शीघ्र ही तुम्हें बेगुनाह साबित कर दूगी।" किरंन ने कहा----"अगर वे अपराधी हैं तो ये खबर उनके लिए "शगूफा होगी और यह शगूफा ऐसा है जो उनके बीच जबरदस्त खलबली मचा देगा ।"

और !!!

खलबली मच गयी थी ।

 


उस खलबली का ही परिणाम था कि--

बंद दरवाजे पर दस्तक हुई ।

किरन और शेखर मल्होत्रा चौक पड़े, दोनों की नजरें एक साथ दरवाजे की तरफ उठ गयीं, शेखर ने ऊंचे स्वर में 'पूछा-"कौन है ?"

"म-मैं हूं शाब, बुन्दू----जल्दी से दरवाजा खोलिए ।" आवाज बुन्दू की ही थी और ऐसी थी जैसे चाहता हो कि आवाज इस कमरे में मौजूद लोगों के अलावा कोई और न सुन सके ।

"बुन्दू ? "' शेखर चकित स्वर में बड़बड़ाया----"बुन्दू आज यहाँ कैसे अा गया?"

किरन ने पूछा-“क्यों, क्या बुन्दू तुम्हारे कमरे ने नहीं आता ?"

जवाब देने के लिए शेखर ने मुंह खोला ही था कि की दरवाजे के पार से बुन्दू की फुसफुसाहट पुन: उभरी-----" जल्दी से दरवाजा खोल दीजिए शाब,, अगर उन्होंने मुझे देख लिया तो मार डालेंगे ।”

किरन लपककर उठी । शेखर कुछ समझ नहीं पाया था कि उसने चटकनी गिरा कर दरवाजा खोल दिया ।

सामने बुन्दू खडा था ।

चेहरे पर हवाइयां लिए । "

किरन उसके पीले जर्द पड़े चेहरे का सबब समझने की चेष्टा कर ही रही थी कि बुन्दू ने कमरे के अन्दर झांकने का प्रयत्न करते हुए पूछा----" श शेखर शाब कहां है ?"'

दरवाजे पर पहुचते हुए शेखर ने कहा--" यहीं है बुन्दू क्या बात है ?"

"श-शाब .......शाब !" अजीब-सी हड़बड़ाहट हावी थी उस पर------“म-पुझे आपसे कुछ कहना है ।"

"कहो ।"

"म-मगर ......मगर, शाब, अकेले में ! उसने किरन के तरफ देखा है !

शेखर ने एक-नजर किरन पर डाली और फिर बुन्दू की तरफ आकर्षित होकर बोला ----" ये बिल्कुल अपनी हैं बुन्दू , इनके सामने बिना डरे कोई भी बात कह सकते हो !"

वुन्दू चुप रह गया । किरन ने बेहद नर्म स्वर में कहा---आओ बनन्दू जो कुछ कहना है अन्दर जाकर आराम से कहो ।"

बुन्दू अन्दर आगया !

किरन के इशारे पर शेखर ने दरवाजा बंद करके चटकनी चढा ली ।

तब, जबकि वुन्दू कुछ. बताने की स्थिति मैं आया, बोला---"शाब कमल बाबू अपकी हत्या कर सकते है ।"

"क्या !"

वह बोला-“मैं सच कह रहा है शाब अपने कानों से सुना है मगर…

" मगर ?"

"उनसे मत कहना शाब कि यह सब-कुछ आपसे मैंने कहा है वर्ना---वर्ना वे मेरी जान के दुश्मन बन जायेगे ।"

. “नहीं कहेगे ।" किरन ने तपाक से उसका हौंसला बढाने के लिए कहा------"बिना डरे सब-कुछ बताओ बुन्दू वादा रहा कि तुम्हारा नाम नहीं आने देगे !"

"व वैसे तो आप जानते ही है शाब कि मैं उस दिन से आपसे नफरत करता दूं कि जिस दिन आपने संगीता मेमशाब की हत्या की थी ।"बुन्दू सीधी शेखर की तरफ देखता हुआ कहता रहा…"इसीलिए मैं तबशे आज तक कभी आपके कमरे में नहीं आया-"एंकभी अच्छी बात नहीं क्रि-आप ही ने कुछ पूछा तो जवाब दे दिया मगर आजआज इसलिए आना पड़ा शाब क्योंकि मैंने अपने कानों से कमल बाबू को यह कहते हुए शुना है कि ये मेमशाव आपको बेगुनाह शाबित करने हाली हैं तो है आपका काम तमाम कर देंगे ।"

"ये बात कमल ने किससे कही ?

"वहां शभी थे---- उसके मामी-पापा छोटा भाई और बहन !"

और क्या-क्या सुना तुमने ?” किरन ने पूछा ।

"ज्यादा तो न सुन सका, मेमशाब, क्योंकि वे लोग बात ही इतने -धीरे-धीरे कर रहेकि दरबाजे तक ठीक से अबाज नहीं आ रही थी---हां कमल बावू कभी जरूर जोर शे बोल पड़ते थे-उनकी, और दूसरे लोगों की फुश-फुशाहटों से हो ऐशा लगा कि वे आप ही दोनों के बारे में बात कर थे ।"

किरन के होठो पर बेहद जीवंत मुस्कान उभरी, बोली----"देखो......खैर मेरे शगूफे ने कितनी जल्दी कमाल दिखाया और कमाल भी वैसा जैसे कि मैंने उम्मीद की थी ।"

हैरत में डूबे शेखर ने कहा----क्या इस बात से यह , ध्वनित होता है, संगीता के मर्डर में उनका हाथ है. ?"

"इतनी जल्दी किसी निश्चय पर नहीं पहुच जाना चाहिए हमे ।"

"फिर ।"

"आओ ’ उनसे बात करते हैं ।"

"क-क्या ?" शेखर चौंक पड़ा----“उनसे बात करेंगी आप ?"

गजेब की फुर्ती के साथ दरवाजे की तरफ बढ़ती किरन ने कहा-"मेरे साथ आओ ।"

शेखर हक्का--वक्का रह गया था, बुन्दू को काटो तो खून नहीं ।

ड्राइंग हॉल में पाचों एक दुसरे से काफी दूर दूर पड़े पांच सोफों पर बैठे थे !

चुपचाप !

अपने-अपने विचारों में गुम।

हॉल में सन्नाटा व्याप्त था।

चेहरे इस कदर निचुड़े नजर आ रहे थे मानो कोल्हू के भारी पाटों के बीच से कई-कई बार गुजारा गया हो और फिर अचानक वहां एक आवाज गुजीं------ " क्या बात है, शेखर का मर्डर करने की अभी तक स्कीम नहीं बनी क्या ?"

पांचों चौंके ।

एक झटके के साथ सोफों से उछलकर इस तरह खडे हो गये जैसे एक ही स्विच से "कनेक्टिड' हौं।

नजर हॉल में दाखिल होती किरन पर पड़ी ।

उस-किरन पर जिसके कमल की पंखुडियों जैसे पतले सुर्ख और रस को होंठो पर मुर्दे में भी जान डाल देने वाली मुस्कुराहट नृत्य कर रही थी !

बुन्दू नजर नहीं आ रहा था ।

उसे देखते ही पांचों के चेहरे मानो एक---एक बार और कोल्हू के पाटों के बीच गुजार गये अभी वे हक्कै-ववकै ही थे कि किरन सोफों के बीच मैं, ठीक वहां पहुची जहाँ शीशे की एक विशाल और बेशकीमती सेन्टर टेबल रखी थी, सीधी कमल से मुखातिब होकर बोली वह----"मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया तुमने ?"

"कं-कौन सा सवाल ?" वह हकला ग्या !!!!

"मैँने पूछा था कि शेखर का मर्डर करने की कोई स्कीम नहीं बनी?"

"क्या-क्या बक रही हो तुम ?" वह हिम्मत करके गुर्राया-"हम भला इस कमीने का मर्डर क्यों करेगे ?"

बेहद जानदार लहजे में कहा किरन ने----“क्योंक्रि मे शीघ्र ही इसे बेगुनाह साबित करने जा रही हूं ।”

 


"इ-बसे बेगुनाह साबित करने वाली तुम होती कौन हो ?"

“इस केस की जांच पड़ताल करने के लिए मुझे कोर्ट ने नियुक्त किया है !"

“क----क्या कोर्ट ने ?" कमल के हलक से चीख निकल गई ।

"हां कोर्ट ने----अदालत नहीं चाहती कि उससे कोई गलत फैसला हो-----हालांकि "डेट" वही है यानि फैसला आज़ से ठीक चौथे दिन सुनाया जाना है-मगर सुनाया मेरी रिपोर्ट के आधार पर जायेगा----मुझे अाज से ठीक तीसरे दिन जज साहब के सामने अपनी रिपोर्ट पेश करनी है स्पष्ट रूप से यह बताना है कि शेखर संगीता का हत्यारा है या नहीं ?"

"फैसले से पहले कोर्ट द्वारा किसी को इस तरह नियुक्त करने की बात तो मैंने पहली ही बार सुनी है ।"

किरन ने मजेदार स्वर में कहा---" तो ऐसी बहुत सी बातें हैं जिन्हें अपने जीवन में पहली बार सुनोगे ।"

“तुम शेखर बेगुनाह साबित करने निकली हो या जज साहब को अपनी निष्पक्ष रिपोर्ट देने?" अतर ने पूछा।

"निष्पक्ष रिपोर्ट देने ।"

"कुछ देर पहले तुमने कहा था कि......... !"

"वह इसलिए कहा था ताकि देख सकुं कि उन शब्दों की आप लोगों पर क्या 'प्रतिक्रिया' होती है !

“प्रतिक्रियास्वरूप अाप सब अन्दर वाले कमरे में इकटृठे हुए और लगे इस बारे में बाते करने कि अगर मैंने शेखर को बेगुनाह साबित कर दिया तो क्या होगा ?"

ये शब्द सुनते ही पांचों के छक्कै छूट गये ।

दिल धक्क से रह गये ।

चेहरों पर बज गये पौने बारह !

किसी के मुह से बोल न फूट सका-अभी वे डरी-डरी आंखों से एक-दूसरे की तरफ देख ही रहे थे कि किरन ने

घूम-धूमकर पांचों के चेहरों का निरीक्षण करते हुए कहा-----" और कमल नाम के इस बहादुर ने तो यह घोषणा तक कर दी कि अगर इसे लगा कि मैं शेखर को बेगुनाह साबित करने बाली हूं तो ये शेखर का काम तमाम कर देगा !"

पांचों को एक साथ ऐसा लगा जैसे कोई बड़ा पर्वत अचानक गड़गड़ाकर उनके उपर गिर पड़ा हो और वे लोग उसके मलवे के नीचे दब चुके हों---------मौत की सिहरन विद्युतीय तरंगों की तरह अभी उनके जिस्मों में दोड़ रही थी कि किरन ने सीधे कमल से कहा----"बोलो तुमने ऐसा कहा था या नहीं है ??"

कमल कुछ बकने ही वाला था कि अतर जैन ने कहा----“कमल बेवकूफ है बेटी मैं तुम्हें बताता हु, कि असलियत क्या थी?”

यह सोचकर किरन मन-ही-मन मुस्करा उठी कि अब वह 'बेटी' बन गई है-अ्तर जैन की तरफ पलटती हुई बोली वह----"आप ही कहिए ?"

"यह सच है कि अन्दर वाले कमरे में हम सब बाते कर रहे थे और यह भी सच है कि कमल ने शेखर की हत्या कर देने वाली बात कही थी मगर तुम्हें यह भी सोचना चाहिए कि यह बात किन हालात में, क्यों, कैसे और किन भावनाओं के साथ कही गई ?"

"आप बता दीजिये ।"

कमल अपने पापा की तरफ इस तरह देख रहा था जैसे वे पागल हो गए हों जबकि अतर जैन अपनी बात को ज्यादा से ज्यादा प्रभावशाली ढंग से कहता चला गया… “हम सबको पुरा यकीन है कि संगीता बिटिया की हत्या शेखर ने ही की है----जव सुना कि इसे तुम बेगुनाह साबित करना चाहती हो तो हम यह सोचकर चिन्तित हो उठे कि संगीता बिटिया का हत्यारा खुला घूमता रहेगा बस, इसी बजय से गुस्से मे भरा कमल ये शव्द कह गया ---- किसी भाई को यह लगे कि उसकी बहन के हत्यारे को सजा नहीं होगी तो उसका क्रोधित हो उठना स्वाभाविक है --- कमल पर हुई उस स्वाभाविक प्रतिक्रिया को जरा भी गम्भीरता से नहीं लिया जाना चाहिये ----- यह बके चाहे जितना मगर शेखर की तो बात दूर , चीटीं तक को नहीं मार सकता !!"

किरन कह उठी---अपने बेटे की अच्छी पैरवी की है आपने !"

"यह पैरवी नहीं, हकीकत है बेटी।"

किरन के कुछ कहने से पहले ही वातावरण में एक जोरदार चीख की आवाज गूंजी ।

सभी चौंक पडे़ ।

अभी उनमें से कोई कुछ समझ भी नहीं पाया था कि "बचाओ........बचाओ........बचाओ !" किसी के चिल्लाने से सारी कोठी दहल उठी ।

शेखर चीखा----" ये तो बुन्दू की आवाज है किरन जी ।"

मगर !

किरन को उक्त शब्द सुनने का होश कहाँ था ?

अनुमान से उस तरफ़ भागी जिस तरफ से वुन्दू के चिल्लाने की आवाज आ रही थी--- लम्बी --चौड़ी बारादरी में भागती हुई वह कोठी के भीतर की तरफ़ दाखिल हो गयी ।

शेखर, अतर, कमल, राकेश, सुमित्रा और संगम उसके पीछे लपके ।

वुन्दू की "बचाओ .......बचाओ' की पुकार अभी भी सारी कोठी में गुंज रही थी -----आंधी--तूफान की तरह भागती किरन बारादरी एक मोड़ पर मुडी और मुड़ते ही नज़र सामने से चिल्ला-चिल्लाकर इसी तरफ आते बुन्दू पर पड़ी ।

किरन कुछ और तेजी से उसकी तरफ लपकी !!

बुन्दू की हालत ऐसी थी जैसे सैकडों भूत उसके पीछे दौड रहे हों-उस वक्त वह किरन से करीब दस मीटर दुर था जब भागता भागता अचानक यूं लड़खड़ाया जैसे किसी ने अड़ंगी मार दी हो फिर झोंक में एक दर्दनाक चीख के साथ फर्श पर गिरा !!!

 


और चिकने फर्श पर फिसलता हुआ जिस्म ठीक किरन के पैरों के नजदीक जाकर स्थिर हुआ । कोई हरकत नहीं थी उसमें ।

एकदम शान्त, निश्वेष्ट ।

किरन ने बारादरी के सामने वाले मोड़ पर निगाह मारी ---- मोड़ करीब तीस मीटर दुर था परन्तु कहीं कोई हलचल नजर नहीं आइ---अभी वह अपनी उखड़ी सांसों को नियंत्रित करने का प्रयत्न कर ही रही थी कि भागते कदमों की आवाज के साथ सभी लोग वहां पहुंच गये ।

फूली सांसों के साथ लगभग सभी ने पूछा----“क-क्या हुआ ?? "

किसी के सवाल का जवाब देने के स्थान पर किरन जहां खडी थी , घुटनों के बल वहीं बैठ गई फिर उसने औंधे पड़े बुन्दू के जिस्म को सीधा किया ।

नब्ज टटोली !

यह अहसास करके किरन के चेहरे पर छाया तनाव .. कुछ कम हुआ कि वुन्दू केवल बेहोश था…फर्श पर गिरने के कारण उसके मस्तक के अग्रभाग से खून बह रहा था ! चेहरा पसीने से तर -- बतर ।

पीला जर्द ।

मुर्दे के चेहरे की मानिन्द निस्तेज !

आतंक की परछाई उसके चेहरे पर ऐसे विकराल रूप में नजर आ रही यी जैसे आपको अपनी परछाईं तब नजर अाती है जव अाप किसी आन बल्ब के नजदीक खडे हों ।"

क्या हुआ बुन्दू साथ ?

बो गिराया गया पर किरन को दूर दूर कोई नजर नहीं आया !

इन्सान नही तो क्या भूत था ?

अगले अपडेट में साफ होगा भूत था तो किसका हीहीही

 


सभी लोग बुन्दू के चारों तरफ ख़ड़े थे----उनमें "निक्कू‘ भी आ मिला था, वह निक्कू जो वुन्दू के बेहोश होने के बाद सब्जी लेकर अाया था-----ज़ब उसे वारदात के बारे में बताया गया तो उसकी हालत भी उन जैसी हो गई और वह भी यह जानने के लिए उत्सुक हो उठा कि आखिर हुआ क्या है ?

जख्म पर पट्टी बांध दी गई थी ।

एक बार होश में आने के बाद बुन्दू बड़े ही खौफ़नाक अन्दाज से चीखा और पुन: बेहोश हो गया ।

कुछ देर बाद ।

फिर होश में लाया गया ।

वड़ी मुशिकल से सम्भाला गया उसे ।

किरन ने समझाया कि "अब डरने की कोई जरूरत नहीं है, वह अपने शुभचिंतकों के बीच है ।"

" व वह मुझे मार डालेगी ।" आतंकित बुन्दू पागलों की तरह आंखें फाड़-फाड़कर कहता चला गया-उसने मेरी

गर्दन पकड़ ली थी…में-मैं बडी मुश्किल से छूट सका-भागा उसने मेरा" पीछा किया मेम शाब मुझें बचा लीजिए-मेरे पीछे भागी थी वह ।"

"किसकी बात कर रहे हो ?"

"व----वह..........वह ।”बुन्दू हकलाकर रह गया आतंक की छाया ने चेहरे के साथ-साथ आंखों तक को ढक लिया था जबकि किरन ने कहा--- "हां' 'हां बोलो बुन्दू डरो नहीं---बताओ, कौन थी वह?"

"लाश !"

सम्भलकर सबसे पहले किरन ही ने पूछा…“किसकी लाश थी ?"

"ब--वडे शाब की, बडे मालिक की !"

"गुलाव चन्द की!" आर्श्वय मिश्रित चीखें निकल पड़ी ।

प्रत्येक व्यक्ति के जिस्म में मीत की झुरझुरी-सी दौड गई जबकि ब्रुन्दू कुछ ऐसे अन्दाज में कहता चला गया जैसै अभी भी गुलाब चन्द की लाश को अपने सामने देख रहा हो-----------हां, बडे शाब की लाश थी वह-----बहुत ही डरावनी, बुरी तरह जली हुई…-शारा जिस्म जला हुआ था उशके जिस्म पर वही कपडे थे, वही अधजले कपडे और चेहरा------चेहरा तो इतना भयानक था-कि देखते ही मेरे हलक से चीख निकल गई !"

"जब चेहरा जला हुअा था तो तुमने कैसे पहचाना कि लाश गुलाब चन्द की है ?"

"म-मैंने मालिक की लाश देखी नहीं थी क्या ?"

. "कब देखी थी ?"

"तभी जब वे मरे थे-अंत्येष्टि से पहले मैंने ही तो नहलाया था उन्हे ।"

"और अंत्येष्टि भी तुम्हारे सामने हुई थी ?"

" हां !"

" तुमने उनकी जलती चिता देखी थी ?"

" देखी थी !!"

"उसकी लाश को पंचतत्वों में मिलते भी देखा था?"

“बिल्कुल देखा था !"

"तो फिर लाश कोठी में कैसे आ सकती है ?"

"म----मुझे नहीं मालूम कि कैसे अाई म-मगर अगर वह थी शाब की लाश-मैँने उनकी फुली हुई अगुलियों के बीचं फंसी अगुंठिया देखी थी---शाब' जो अगुठियों की मैं लाखों में पहचान सकता हू बड़ी कीमती अंगुठिया थीं वे! "

"इसका मतलब ये है बुन्दू कि किसी बहरुपिए ने गुलाब चन्द की लाश का रूप धारण करके तुम्हें डराया है ।"

'ऐ-ऐसा कैसे हो सकता है ?"

"और ऐसा भी कैसे हो सकता है कि जिस लाश को तुमने अपनी आंखों से पंचतत्वों में विलीन होते देखा वह उसी रूप में तुम्हें फिर मिल जाये ?"

बून्दु चुप रह गया।

आंखों में सोचने बाले भाव उभर आये ।

उसे सामान्य अवस्था में लाने की गरज से किरन कहती चली गई----"यकीन मानो वह लाश नहीं हो सकती कोई बहरूपिया था जिसका उदूदेश्य तुम्हें डराना था और तुम डर गये ,बेवजह डर गये ! तुम्हें डटकर उसका मुकाबला करना चाहिए था ।"

॰ "म-मैं.....?" बुन्दू सकपका गया-""मैं भला उसका मुकाबला कैसे कर सकता था ?"

"खेर, अब यह बताओ कि बहरूपिया तुम्हें मिला कहां था है"'

"वह मुझे शेखर शाब के पुराने बेडरूम के नजदीक मिली थी-जव आपने मेरे सामने शेखर शाब से कहा कि चलो इन लोगों से बात करते हैं तो मैं यह सोचकर डर गया कि आप अपना वादा भूलकर इन पर मेरा भेद खोल दोगी---बारादरी के मोड़ पर मुड़ा ही था कि अचानक लाश मेरे सामने आ गयी ।"

"फिर ?"

. "मैं भाग रहा था कि दरवाजा बंद होने की जोरदार आवाज सुनी-भागते ही भागते पीछे मुड़कर देखा-देखा कि वह, आवाज स्टडी की दरवाजा बंद होने की थी ।"

"और लाश ?"

"बारादरी नजर नहीं अा रही थी ।"

"यानि स्टडी के अन्दर चली गयी ।"

अपनी आंखों शे मैंने उसे श्टडी के अन्दर जाते नहीँ देखा और बारादरी में उसे न प्राकर भागने या चीखने की रफ्तार में भी कोई कमी नहीं लाया मगर हां, जिस तरह से श्टडी का दरवाजा बन्द होते ही आवाज के शाथ वह बारादरी से गायब हो गई उशसे लगता तो यही है कि श्टडी में ही चली गयी होगी ।"

इससे पूर्व कि किरन उससे अगला सवाल करती, शेखर बोला----" एक मिनट किरन जी ।"

"क्या चाहते हो ?" किरन ने उसकी तरफ पलटकर पूछा ।

"मैँ यह बताना चाहता हू कि स्टडी के नीचे एक तहखाना है ।"

"तहखाना ? "

"तहखाना भी ऐसा जिसकी जानकारी मेरी 'नॉलिज' के मुताबिक मुझे, संगीता और केवल बाबूजी को थी---मेरे ख्याल से इसकी जानकारी अंकल या इनके किसी फेमिली मैम्बर्सं को भी अभी तक नहीं होगी ।"

"जब' हमें किसी ने बताया ही नहीं तो जानकारी कैसे होगी?" अतर जैन गुर्रा-सा उठा ।

किरन ने एक पल चुप रहकर कुछ सोचा और पुन: पलटकर बुन्दू से बोली----“तुम्हें हम सबको बहाँ ले चलना होगा बुन्दू जहां लाश मिली थी ।"

एक बार पुन: बुन्दू की आंखों में आतंक के साये नाच उठे ।

" य य य---यहा" ।" बारादरी के एक मेड़ पर पहुंचकर बुन्दू ने बताया---'' यहां मिली थी ।"

"गर्दन दबाने की कोशिश भी उसने यहीं की थी ?"'

"हां ।"

तुम उससे छूटकर किधर भागे ?"'

"उधर ।" उसने दूर तक खाली पड़ी बारादरी की तरफ अंगुली उठाई ।

"स्टडी कहां है ?"'

"वो रही ।" बुन्दू ने करीब बीस मीटर दुर तक एक बंद दरवाजे की तरफ अंगुली उठाई ।

सभी लोगों को साथ लिए स्टडी की तरफ़ बढ़ती किरन ने शेखर से सवाल किया-----"तुमने गुलाब चन्द की अंगुठियों का क्या किया था शेखर ? "

"मेरा या संगीता का तो अंगुठियों की तरफ़ ध्यान तक नहीं था---ध्यान दिलाया अंत्येष्टि आये लोगों ने----सभी ने कहा कि अंगूठियां वहुत कीमती हैं अत: उसे निकाल लिया जाये----ऐसा कहने वालों में अंकल भी थे-मैंने और संगिता ने न विरोध किया, न स्वीकृति दी बल्कि जाने किस-किसने सारी अंगूठियां मुझे पकड़ा दी थीं ।"

 


“आपने ऐसा कहा था ?" किरन ने अतर जैन से पूछा।

"जी हां ।"

किरन ने पुन: शेखर से सवाल किया---"तुमने उनका क्या किया ?"

"संगीता को सौंप दी थीं-मगर....।"

"वे चोरी चली गई ?"

" च--चोरी चली गई है"' किरन बुरी तरह चौकीं --- “कब ?"

"संगीता की मौत से करीब एक हफ्ता पहले ।"

"कुछ और भी चोरी गया था या सिर्फ गुलाब चन्द की अंगुठियां ?"

“काफी कुछ चला गया था, बल्कि अगर यह कहा जाये तो गलत न होगा कि संगीता का जो जेवर लॉकर में न होकर धर की सेफ में था बह सभी चला गया था ।"

"क्या तुम लोगों ने इस चोरी की रपट लिखवाई थी ?"

"हाँ.....लिखवाई थी!!!!

मगर आज तक तो इंस्पेक्टर अक्षय चोर पकड नहीं सका है…ज़ब चोर का मामला ताजा-ताजा था तब संगीता करीब-करीब रोज ही फोन पर अक्षय से बात करके पूछा करती थी कि चोर पकडा गया या नहीं, परन्तु सकारात्मक जवाब कभी नहीं मिला---दिन गुजरते गए और बात आई-गई हो गई…संगीता ने भी निराश होकर फोन-वोन करने छोड़ दिये ।"

शेखर की बात खाम होते-होते वे स्टडी के दरवाजे के नजदीक पहुच गए और जब किरन ने धक्का देकर दरवाजे को खोलना चाहा तो पाया कि वह अन्दर से बंद था ।

किरन चिहुंक उठी ।

चकरा सभी गये थे ।

सन्ताटे से धिरे धड़कते दिलों के साथ वे सभी आंखों में सवालिया निशान लिए एक-दुसरे की तरफ़ देखते रह गये--- जो सवालिया निशान सबकी आंखों में 'कैबरे' कर रहा था उसका जवाब किसी के पास नहीं था ।

करीब-करीब एक मिनट उनके बीच सन्नाटा कायम रहा ।

खौफनाक सन्माटा ।

ऐसा, जिससे एक विशेष प्रकार की सांय-सांय की आवाज की होती है ।

सन्नाटे युक्त उस एक मिनट के अन्दर-अन्दर किरन सहित सभी के दिल 'घाड़-धाड़', करके बजने लगे थे ---- सस्पेंस की ज्यादती सभी के चेहरों पर स्पष्ट परिलक्षित हो रही थी----खुद पर नियंत्रण पाकर मुंह से सबसे पहला शब्द निकालने की हिम्मत किरन ने ही की, उसने शेखर से पूछता-"क्या स्टडी का कोई दूसरा दरवाजा भी है ?" '

"नहीं !"

"खिडकी अादि ?"

"पूरी कोटी में स्टडी ही ऐसी जगह है जिसके तीन तरफ कमरे हैं: चौथी तरफ बारादरी यानि जहाँ हम खडे़ हैं किसी भी कमरे में न स्टडी का दरवाजा है, न खिड़की----बाबूजी कहा करते थे "कि स्टडी ऐसी होनी चाहीए जहां लान में चहक रही चिड़ीयों की चहचहाट तक सुनाई न दे ।"

"यानि स्टडी के अन्दर सिर्फ एक तहखाना है?"

“हां !"

" तहखाने का कोई अन्य रास्ता?"

" नहीं है ।”

"इसका मतलब खुद. को गुलाब चन्द की लाश बनाने बाता शख्स स्टडी या तहखाने में ही होना चाहिए ?"

" तहखाने की जानकारी भला किसी को कैसे हो सकती है, उसके बारे में केवल तीन शख्स जानते थे जिनमें से दो आज इस दुनिया में नहीं हैं और तीसरा मैं खुद खड़ा हू।”

"तो वह स्टडी में होगा ?"

"होना तो चाहिए क्योंकि बाहर निकलने का इस दरवाजे के अलावा कोई रास्ता नहीं है ।"

"और वह अन्दर बंद है ।" किरन बड़बड़ाई ।

जवाब किसी ने नहीं दिया ।

सव उसी की तरफ देख रहे थे मानो अनजाने में ही सबने उसका नेतृत्व कुबूल कर लिया हो-सबके चेहरों पर साफ-साफ लिखा था कि वे किरन का फैसला जानना चाहते हैं----यह आशंका सबको थरथराये दे रही थी कि गुलाब चन्द की लाश वना शख्स स्टडी के अन्दर हो सकता है, सबसे खस्ता हालत बुन्दू की थी ।

"तो अब स्टडी के अन्दर जाने के लिए दरवाजे को " तोडने के अलावा कोई चारा नहीं है ?”

. "क-क्या आप स्टडी के अन्दर जाने की सोच रही हैं?"

किरन ने 'कहा----"भेद जानने का इसके अलावा और चारा भी क्या है?"

"म-मैं इस तरह से आपको स्टडी में जाने की इजाजत नहीं दूगा ।”

" क्यों ?"

"कमाल की बात कर रही हैं आप ।" शेखर चकित स्वर में कहता चला गया…“अन्दर जो भी है, अकेला भले ही सही मगर उसके पास कोई हथियार हो सकता है----हम लोगों पर आक्रमण कर सकता है वह ।"

मोहक मुस्कान के साथ किरन ने कुछ कहना चाहा ही था कि किसी ने उसे बोलने नहीं दिया----सबने शेखर के सुर से सर मिला दिया था और अपने ऊपर हुए हमले की याद आते ही किरन ने फैसला किया कि ज्यादा बहादुरी दिखाने का कोई लाभ नहीं, अत: बोली---“तो फोन करके पुलिस को बुला लेते हैं !"



"यह ठीक रहेगा ।" सबने एक स्वर में कहा ।

"आप लीग यहीं ठहरिये ।" किरन बाहर की तरफ वाली सांकल लगाती हुई 'बोलीं----"मैं पुलिस को फोन करके अाती हू ।"

वुन्दू तपाक से बोल उठा-----"आपके साथ चलुंगा मेमशाब .।"

किरन मुस्कराकर रह गई---ये क्षण इतने तनावपूर्ण थे कि अन्य किसी के होंठों पर मुस्कान तक न उभरी !

" न-नहीं, डॉक्टर साहब !". अक्षय श्रीवास्तव फोन पर लगभग चीख पड़ा और अगले ही पल जाने क्या हुआ कि अपने पहले लहजे के ठीक विपरीत गिड़मिड़ा उठा-----प-प्लीज"......इस बारे में आप किसीसे जिक्र न कीजिएगा ।"

दूसरी तरफ से कुछ कहा गया ।

जवाब में अक्षय बोला----"न न -नहीं............'उससे तो भूलकर भी मत कहिएगा ---- उसे पता न लग पाये , खास तौर से इसीलिए तो किसी से जिक्र न करने की रिक्वेस्ट कर रहा हूं !!

पुन: कुछ कहा गया ।

"हाँ-हां पता तो लगना ही है ।" जवाब में उसने कहा---यह तो मैं भी जानता हू कि पता तो उसे लगेगा ही और जब पता लगेगा तो 'शॉक' भी लगेगा उसे, मगर यदि समय से पहले पता लग गया, अभी पता लग गया तो तो रो-रोकर वह अपनी जान दे देगी ---- प्लीज मुझे उसका हँसता-खिलखिलाता चेहरा देखने दो डॉक्टर ।"

दूसरी तरफ से बोलने वाले ने शायद शिकस्त कुबूल कर ली ।

. “थैंक्यू' ....."थेंक्यू वेरी मच डॉक्टर ।" कहने के बाद उसने रिसीवर क्रेडिल पर पटका और मुंह से ऐसी सांस निकलीे जो यह बता रही थी कि वह वहुत थक गया है ।

अपना सिर कुर्सी की पुश्त पर टिकाकर उसने आँफिस के लैंटर की तरफ देखा और फिर जाने किस रहस्यमय सोचों के कारण आंखें आँसुओं से डबाडब भर गयीं !

जाने कितनी देर तक वह वही सव सोचता रहा जो उसे असीमित पीड़ा पहुचा रहा था कि फोन की घन्टी घनघना उठी ।

बह सीधा हुआ ।

 


दोनों हथेलियों से आंसू पोंछे, रिसीवर उठाया और पुलिसिया स्टाइल में बोला-+--"सिविल लाइन थाने सै इंस्पेक्टर अक्षय श्रीवास्तव बोल रहा हूं !

"मैं किरन हूं इंस्पेक्टर ।"

"ओह !" इंस्पेक्टर के काले होंठों पर अजीब-भी मुस्कान उभरी----" आपकी रपट दर्ज करके मैं छानबीन कर चुका हुं ---क्षतिग्रस्त गाड़ी वर्कशाप भिजवा दी है मगर काफी प्रयासों के बावजूद अभी तक विना नम्बर प्लेट वाली काली एम्बेसेडर नहीं पकडी जा सकी-वेसे क्या आपने हमलावरों में से किसी को देखा था ?"

उसके सवाल पर ध्यान न देकर किरन ने कहा---" इस वक्त मैं शेखर मल्होत्रा की कोठी से बोल रही हूं -- इंस्पेक्टर और आपको यह बताने के लिए फोन किया है कि फौरन से पेश्तर यहां आपकी जरूरत है !"

"क्यों क्या हुआ. ?"

"ब्रुन्दू ने अपनी आंखों से गुलाब चन्द की लाश देखी है और उस लाश ने इस वक्त खुद को स्टडी में बन्द कर रखा है ।” कहने के बाद किरन रिसीवर वापस क्रेडिल पर रख दिया, जानती थी कि जितना कह चुकी है उतना सुनने के बाद इंस्पेक्टर लाख जरूरी काम छोड़कर तत्काल यहाँ के लिए रवाना हो जाएगा ।

"क-क्या. ?" अक्षय श्रीवास्तव उछल पड़ा--'' क-क्या कहा आपने, आप संगीता मर्डर केस की "रि-इन्वेस्टीगेशन करने निकली हैं ?"

"हां ।" किरन हौले से मुस्कराई !

"बात कुछ समझ में नहीं आई ।" अक्षय अपने आश्चर्य पर काबू नहीं कर पा रहा था----"संगीता मर्डर केस में रिं-इन्वेस्टीगेशन के लिए आखिर है ही क्या. ?"

किरन और अक्षय . के बीच ये बातें शेखर मल्होत्रा की कोठी के एक तन्हा कमरे में हो रही थी ।

"मैं ये जानना चाहती हूं कि अाप इस केस में कैसे इत्वॉल्व हुए?”

बेडौल शरीर वाले करीब पच्चीस वर्षीय काले-कलूटे इंस्पेक्टर ने गहरी सांस ती---किरन की तरफ ऐसे अन्दाज में देखा जैसे किसी 'क्रैक' की तरफ देख रहा हो, बोला उस रात मैं नाइट डूयूटी पर था-अपने ओंफिस में बैठा खाली वक्त गुजारने के लिए वेद प्रकाश शमी का "सुहाग से बडा' पढ रहा था कि फोन की घन्टी घनघना उठी ।"

"किसका फोन था है"'

"रधिया यानि इस कोठी की नौकरानी का ।"

“क्या कहा उसने ? "

"उसकी आबाज से जाहिर था कि वह बुरी तरह डरी और घबराई हुई है !" अक्षय कहता चला गया…“हकला-हकलाकर बडी मुश्किल से बता पाई कि उसके 'साब' ने मेम-साहब को मार डाला है, मैं उछल पडा, चीखकर उसका नाम-पता पूछा----पता बताया जाते ही पूछा कि "तुम्हरे साहब कहां हैं-उसने बताया कि निक्कू और बुंदू 'उन्हें पकडे खड़े हैं---मेरे यह पूछने पर कि निक्कू और बुन्दू कौन हैं उसने वताया कि वे मेरी तरह नौकर हैं …मैंने यह निदेश देकर फोन क्रेडिल पर पटक दिया कि वे लोग किसी चीज को छेड़े नहीं और एक कांस्टेबल तथा दो सिपाहियों को साथ लेकर जीप द्वारा यहाँ पहुचा ।"

"यहां आपने क्या पाया ?"

"वुन्दू कोठी के लोहे वाले गेट पर मिल गया था…वह हमें सीधा उस कमरे में ले गया जहाँ संगीता की लाश पड्री थी---वह शेखर और संगीता का बेडरूम था…ताजे गाढे और गर्म खून से सराबोर संगीता की लाश डबलबेड के नजदीक फर्श पर पड़ी थी लाश की खुली आंखें बेडरूम के लेटर को को घूर रही थीं-----मैं समझ गया कि मरते समय उन आंखों ने अपने हत्यारे को देखा है मगर कम-से-कम संगीता अब अपने हत्यारे के बारे में कुछ नहीं बता सकती थी-उसके जिस्म पर चाकू के तीन ज़ख्म थे-----पहला छाती में, दुसरा पेट में और तीसरा चेहरे पर, यह कहना गलत न होगा कि लाश की अवस्था वेहद बीभत्स थी ।" "शेखर मल्होत्रा कंहा" था उस वक्त ?"

बेडरूम ही में लॉन की तरफ़ खुलने वाली खिडकी के नजदीक बेहोश पड़ा था ?"

"बेहोश कैसे हो गया था ?"

"वुन्दू और निवकू ने किया था ।"

“क्यों ?"

" मैनें दोनों नौकरों और नौकरानी के बयान अलग-अलग लिए मगर तीनों के बयान अक्षरश: एक ही थे---रत्ती भर भी विरोधाभास नहीं था-उनके बयान से जो कहानी प्रकाश में अाई वह यह थी कि उस वक्त वे निक्कू के कमरे में बैठे 'तीन-शे-पांच खेल रहे थे जब सन्नटे के चीरती चीख की आवाज सुनी----तीनों चोंक पडे ।

निवकू चीखा--"ये तो मेमशाब हैं”------आवाज को पहचान बुन्दू और रधिया भी गए थे----किसी अनिष्ट की आशंका से ग्रस्त वे आंधी-तूफान की तरह चीख की दिशा में भागे-बेडरूम में पहुंचे और उस वक्त एक नकाबपोश खून से रंगे चाकू सहित खुली खिड़की के माध्यम से लान में कुदने वाला था जब बलिष्ठ वुन्दू ने उसे दबोच लिया ने उसके बंधनों से निकलने की चेष्टा की परन्तु तब तक निवकू और रधिया भी उसे जकड चुके थे------लाख कोशिशों के बावजूद वह खुद को न छुडा सका-उसी हाथापाई के दरम्यान नाकाबपोश का चाकू कमरे के फर्श पर जा गिरा----उसे पूरी तरह अपने कब्जे में करने के बाद निक्कू ने चेहरे से नकाब नोंच लिया ।

चेहरे पर नजर पड़ते ही तीनों के हलक से चीखें निकल गई ।

वह चेहरा उनके अपने मालिक का था !

शेखर मल्होत्रा का ।

" श-शाब .......शाब अाप है"' रधिया के हलक से घुटी धुटी सी चीख निकल गई थी ।

"म मुझे छोड़ दो, संगीता की हत्या मैंने नहीं की… हत्यारा भाग रहा है, मुझे छोड़कर उसे पकडो ।" शेखर गुर्राया ।

परन्तु !

“निक्कू-बुन्दू समझ गए कि शेखर उन्हें धोखा देने की कोशिश कर रहा है, अत: उसे नहीं छोड़ा बल्कि रधिया ने पुलिस स्टेशन फोन कर दिया…निक्कू---बुन्दू उस वक्त शेखर को जकड़े खड़े थे…झ्धर रधिया ने रिसीवर वापिस क्रेडिल पर रखा । उधर शेखर ने पुन: खुद क्रो आजाद कराने की केशिश शुरू कर दी और इस बार की हाथापाई का परिणाम यह निकल कि शेखर बेहोश हो गया ।”

"ओह !"

" मैंने पोस्टमार्टम और फिंगर प्रिंटस विभाग वालों को फोन किया----जिस वक्त वे अपना काम निपटा रहे थे उस वक्त बुन्दू और रधिया के मुकम्मल बयान लिए अन्य बातों के साथ-साथ उन्होंने यह भी बताया कि उनकी जानकारी के मुताविक शेखर मल्होत्रा दस वाली ट्रेन से बम्बई चला गया था-ड्राइवर खुद उसे स्टेशन छोड़कर आया था ।"

"क्या शेखर की जेब से ट्रेन का टिकट निकला था ?"

" ट्रेन का भी और प्लेन का भी ।"

"क्या मतलब" ?

"प्लेन का टिकट रात के एक बजे वाली फ्लाइट का था और ये दोनों टिकट अपनी कहानी अाप कह रहे थे----स्पष्ट था कि मर्डर करने के बाद एक वाले प्लेन से बम्बई के लिए रवाना हो जाता----प्लेन यहां से एक घन्टा दस मिनट, में बम्बई पहुच जाता है जबकि दस बजे चली ट्रेन ग्यारह बजे पहुंचती है-कहने का मतलब ये कि शेखर दिखाना चाहता था कि जिस वक्त संगीता की हत्या हुई उस वक्त बह ट्रेन में था !"

ड्राइवर स्वयं यह बयान देता कि अपने मालिक को ट्रेन में सवार कराके आया था ।"

" बम्बई के इन दो टिकटों के बारे में शेखर मल्होत्रा का क्या कहना है ? "

" प्लेन के टिकट के बारे में बड़ी हास्यास्पद बात कहता है वह ।"

"क्या ? "

"यह कि प्लेन का टिकट उसने नहीं खरीदा---यह भी नहीं जानता कि उसके नाम का प्लेन का टिकट उसकी जेब में कहां से आ गया ?"

"यानि प्लेन 'का टिकट उसके नाम से किसी और ने खरीदकर उसकी जेब में डाल दिया ।"

अक्षय हँसा, हँसकर बोला------“कहना तो वह यही चाहता था और साथ में यह भी चाहता था कि उसकी इस बकवास पर पुलिस ही नहीं बल्कि अदालत भी यकीन कर ले ।"

"ट्रेन के टिकट के बारे में क्या कहता है वह ?"

"कहता है कि सचमुच ट्रेन से बम्बई के लिए यात्रा" कर रहा था परन्तु अभी ट्रेन इस शहर के मुख्य स्टेशन से चलकर कैट स्टेशन पर पहुंची ही थी कि एक अजनबी उसकी बर्थ के निकट अाया और उसे वहां देखते ही चीख पड़ा, बोला ---“आप यहाँ ट्रेन में यात्रा कर रहे हैं मिस्टर मल्होत्रा और वहां--आपकी फैक्ट्री में अाग लग गई'है, शेखर के बयान के मुताबिक अजनबी से पूछा कि "तुम मुझें कैसे जानते हो?--जवाब में अजनबी ने कहा कि "आपको शहर में भला कौन नहीं जानता, अाप इस शहर में एकमात्र ऐसे शख्स हैं जिसकी फैक्ट्री में वने देसी घी के डिब्बे सारे देश में सप्लाई होते हैँ'----बस इतनी बात सुनते ही शेखर मल्होत्रा समझ गया कि यह व्यक्ति मुझसे परिचित है

और अभी वह उससे उसका परिचय पूछने ही वाला था . कि ट्रेन पटरियों पर, सरकने लगी, शेखर मल्होत्रा ट्रेन से कूद पड़ा !"

" "वहां से -फेक्ट्री पहुंचा ?"

"हां !'

" फैट्री को सहीँ सलामत देखकर उस पर क्या प्रतिक्रिया हुई ?"

" कहता है कि मैं दंग रह गया ।"

"उसके बाद ?"

“बकौल अपने यह काफी देर तक यह सोच-सोचकर हैरान होता रहा कि अजनबी ने झूठ क्यों बोला -----" जब कोई कारण समझ में न अाया तो यह सोचकर खुद को संतुष्ट कर लिया कि अजनबी ने उसके साथ "शरारतपूर्ण मजाक किया होगा---जिस टेक्सी से स्टेशन से दिल्ली पहुचा था उसी से कोठी पर पहुचा, कोठी तक पहुचते-पहुंचते उसके दिमाग में यह बात अाई कि संगीता यह सोचकर बेसुध सोई पडी होगी कि वह शहर में नहीं है और जब "अचानक उसे अपने सामने देखेगी तो उस पर-क्या प्रतिक्रिया होगी-चह सोच-सोचकर वह रोमांचित हो उठा और यही सब सोचते-सोचते उसके दिमाग में संगीता को "सरप्राइज" देने की बात अाई-सो, वह सीधे रास्ते से कोठी में दाखिल होने की जगह चारदीवारी फांदकर लान में पहुंचा और अपने बेडरूम की खिड़की की तरफ़ बढा ।"

"क्या उसे मालूम था कि खिड़की खुली हुई होगी ?"

"कहता है कि उसे मालूम था -इसलिए मालूम था क्योंकि जानता था कि खिड़की बद करके संगीता को नींद नहीं जाती ।"

"फिर ?"

"अभी खिड़की के नजदीक पहुचा ही था कि सन्नाटे के कलेजे को चीरकर रख देने वाली संगीता की चीख सुनी वह बुरी तरह हड़बड़ा गया, ठीक से कुछ समझ भी नहीं पाया था कि पुन: संगीता की चीख दूर-दूर तक गूंज गई----झपटकर वह खिडकी पर चढ़ गया और यही क्षण था जब संगीता तीसरी बार चीखी-इस चीख के साथ उसने संगीता को बैड के नजदीक फर्श पर गिरते देखा और साथ ही देखा खून से सराबोर चाकू हाथ में लिए एक नकाबपोश को-----उसे, जिसका सम्पूर्ण जिस्म काले लबादे में छुपा हुआ था---इधर संगीता फर्श पर गिरी । उधर नकाबपोश ने अपने दूसरे हाथ से उसके गले में मौजूद एक लाख की कीमत का वह डायमंड नेकलेस नोंच लिया जो अपनी "मैरिज एनीवर्सरी' के मौके पर उसने संगीता को 'प्रेजेन्ट' किया था-विना सोचे-समझे शेखर हलक फाड़कर चीख पड़ा---“कौन है?” सुनते ही नकाबपोश पलटा और शेखर को खिड़की के रास्ते से कमरे के फर्श पर कूदता देखकर बौखला गया----बोखलाकर वह अन्दर की तरफ की दरवाजे की तरफ भागा और अभी दरवाजे की चटकनी गिरा ही पाया था कि शेखर ने उसे दबोच लिया-दोनों के बीच हाथापाई होने लगी--शेखर ने उसके हाथ से चाकू छीनकर कब्जाया ही था कि बेडरूम का दरवाजा "भड़ाक' से खुला---बुन्दू और रधिया अन्दर दाखिल हुयेे--बेडरूम का दृश्य देखकर वे भौंचक्के रह गये---नाकाबपोश से हाथापाई करते शेखर ने चीखकर रधिया और वुन्दू से कहा कि -----" संगीता का खून कर दिया है, इसे पकडने में मेरी मदद करो' और फिर तीनों ने नकाबपोश क्रो जकड़ लिया-चेहरे से नकाब नोचते ही वे उछल पडे, हत्यारा कोठी का तीसरा नौकर यानि निवकू था----शेखर का कहना है कि 'उस क्षण मैं समझ गया कि निक्कू ने एक लाख के नैकलेस के लालच में संगीता की हत्या कर दी है---उस वक्त तक बुन्दू और रधिया 'मेरा' (शेखर) का ही साथ दे रहे थे !

 


मगर.......... अचानक निक्कू ने गुर्राकर बुन्दू और रधिया से कहा कि अगर तुमने मेरे खिलाफ कुछ भी करने की कोशिश की तो मैं वह भेद तुम दोनों के घरवालों पर खोल दूगा जिसे तुम अब तक छुपाये हुए हो------शेखर मल्होत्रा का कहना ये है कि निक्कू के शब्द सुनते ही बुन्दू और रधिया के चेहरे पीले पड गये-----ऐसी हालत हो गई उनकी कि काटो तो न नही…हक्के-बक्के से अभी वे एक-दूसरे की तरफ देख रहे थे कि निक्कू ने गुर्राकर एक और चोट की--"वह भेद जानते ही तेरा पति परखच्चे उड़ा देगा रधिया और तेरी घरवाली तुझे कच्चा चबा जायेगी वुन्दू-----बोलो, क्या तुम दोनों अपने-अपने पति व पली से बच सकोगे ?"

बुन्दू और रधिया के चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगी थीं ।

आंखों में खौफ़ लिए अभी वे निक्कू की तरफ देख ही रहे थे कि निक्कू ने खतरनाक स्वर में कहा---"मुझे छोड़ दो अगर मुझे कुछ हो गया तो याद रखना तुम को बरबाद करके रख दूंगा मैं ।"

और !

आश्चर्यजनक ढंग से उन दोनों ने निक्कू् को छोड़ दिया ।

उनके हटते ही निक्कू ने अपने जिस्म को जोरदार झटका दिया----वकौल शेखर के, उस वक्त चूंकि वह स्वयं हक्का बक्का था, अत: निक्कू को अपनी पकड से निकलने से न रोक सका और पलक झपकते ही पासा यूं पलता कि वह स्वयं निक्कू के बन्धनों में छटपटा रहा था, कि निक्कू चीखा-अगर तुम अपने भेद को हमेशा के लिए भेद ही बनाये रखना चाहते हो तो वहीं करों जो मैं कहता दूं। "

" क क क्या करें हम ?" बोखलाये हुए स्वर में बुन्दू ने पूछा ।

इसे फंसाने में मेरी मदद करो ।”

" क-केसी मदद करें ?"

और बस !

शेखर मल्होत्रा का कहना ये है कि मैं उनके बीच होने वाला वार्तालाप अागे न सुन सका क्योंकि निक्कू ने बुन्दू के सवाल का जवाब देने स्थान पर_ 'मेरी' कनपटी पर इतनी जोर से 'कराटे‘ मारी कि पल-भर के लिए मेरी आंखो के सामने रंग-बिरंगे तारे नाच उठे तथा 'मैं' बेहोश होता चला गया, जब होश अाया तो यहां, "खुद को हवालात में पाया ।"

“क्या शेखर मल्होत्रा ने यह बयान हवालात में दिया था ?"

" हाँ अपने वकील से बात करने के वाद ।"

"क्या मतलब ?"

"घटनास्थल से अपनी कार्यवाही निपटाने और संगीता की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद मैं बुन्दू , रधिया और निक्कू के साथ बेहोश शेखर मल्होत्रा को थाने ले गया था ।" अक्षय कहता चला गया----"होश आने पर जव मैंने उसका बयान लेना चाहा तो बोला कि वह जो कुछ कहेगा अपने वकील के सामने कहेगा और वकील से सलाह मशवरा किये विना एक लफ्ज नहीं कहेगा----मुझे भला क्या आपत्ति हो सकती थी----सो उसे अपना वकील वुलाने की इजाजत दे दी----तब उसने फोन करके शहजाद राय को थाने बुलाया----एकान्त में उसके और शहजाद राय के बीच जाने क्या बातें हुई-----मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि उस वार्ता के बाद शेखर मल्होत्रा ने उपरोक्त बयान दिया---शहजाद राय कोर्ट में इस कहानी को सच्ची साबित करना चाहते थे कि नौकरों ने शेखर को पुलिस के अाने तक लबादा और नकाब पहनाकर उसे फंसाया है…शहंजाद राय ने कोर्ट में ये भेद खोला कि रधिया, बुन्दू के बच्चे की मां बनने बाली है -------

जब दोनों ही शादीशुदा है और दोनों के पति-पत्नी अलग--अलग गावों में रहते हैं यह सच भी था यानि मेडिकल चैकअप द्वारा रधिया के गर्भ में पांच माह का भ्रूण पाया गया जबकि वह पिछले छ: महीने से अपने पति से नहीं मिली थी ।”

किरन ने उत्साहजनक स्वर में कहा----“यानि शेखर मल्होत्रा के बयान में थोडा वहुत 'तत्व' था ?"

"अदालत ने ऐसे नहीं माना !"

"क्यों ?"

"मैंने कोर्ट में उस कपडा और चाकू बिक्रेता को पेश कर दिया, जिससे शेखर ने लबादे का काला कपडा और चाकू खरीदा था उस टेलर को पेश कर दिया, जिससे उसने लबादा सिलवाया था -- चाकू की मूठ पर शेखर मल्होत्रा की अंगुलियों के निशान थे संगीता के खून से सराबोर था वह…कहने का मतलब ये कि मेरे द्वारा पेश किये गए अकाट्य सबूतों और गवाहों की रोशनी में, अदालत ने शहजाद राय की कहानी को पूरी तरह अविश्वसनीय और काल्पनिक करार दिया-अदालत ने कहा कि बेशक यह सच है कि वुन्दू और रधिया के बीच अवेध सम्बन्थ हैं मगर बचाव पक्ष अगर यह सोचता है कि वह इस एक सत्य के चारों तरफ़ चासनी में डूबी और अविश्वसनीय कहानी को भी सच साबित कर सकता है तो यह उसकी भूल है--एक छोटी सी सच्चाई की आड़ में इतने बड़े झूठ को भी सच साबित करने की कोशिश हास्यास्पद है----एक तरफ जहाँ बचाव पक्ष सिर्फ एक काल्पनिक कहानी सुना रहा है वहीं पुलिस ने ऐसे पुख्ता सबूत और गवाह पेश किए हैं जिन्हें बचाव पक्ष क्रास' नहीं कर पा रहा है ।"

"क्या असली घी का बिजनेस शेखर मल्होत्रा ने खुद सम्भाला हुआ था ?"

"हां ।"-----अक्षय ने कहा---“गुलाब चन्द की मृत्यु के बाद फैक्ट्री को वहीं देख रहा था ।”

"संगीता का उसमें कोई दखल नहीं था. ?"

“नहीं ।"

"तब तो ये थ्योंरी कुछ जमती नहीं कि शेखर ने संगीता की हत्या दौलत की खातिर की ।"'

"क्यों नहीं जमती हैं"

"जिस दौलत को इन्सान खुद पैदा कर रहा हो, उसे भोग रहा हो-जिस दौलत के किसी भी हिस्से को वह मनचाही इच्छा से खर्च करने के लिए स्वतन्त्र हो । उसके लिए वह किसी की हत्या क्यों करेगा ?"

"दौलत उसके अपनी तो नहीं थी न, था तो सब कुछ संगीता के ही नाम. ?"

"और संगीता उसकी पत्नी थी…-पत्नी भी ऐसी जो शेखर मल्होत्रा के साथ खुश थी-“मेरे ख्याल से संगीता की मौत के बाद कोर्ट में या बाहर भी, किसी ने यह नहीं कहा है कि शेखर और संगीता के बीच कोई मनमुटाव या झगडा-टंटा था ?"

"बेशक ऐसा किसी ने नहीं कहा…मगर इस प्योंइन्ट को उठाकर आप कहना क्या चाहती हैं ?"'

"आदमी दौलत क्यों हासिल करना चाहता है?"

"यह तो आदमी-आदमी की नेचर पर निर्भर है ।"

"बेशक है, मगर सभी लोगों के लिए एक 'कॉमन' बात कही जा सकती है और वह यह कि हर शख्स दौलत इसलिए हासिल करना चाहता है ताकि उसका मनचाहा उपयोग कर सके-इसके अलावा दौलत का कोई इस्तेमाल है ही नहीं, आप मानते हैं न?

"मानता हूं ।"

हल्ली-भी मुस्कान के साथ किरन कहती चली गई

“और यह आप पहले ही मान चुके हैं कि शेखर उस दौलत का मनचाहा इस्तेमाल कर रहा था----जिसके नाम ये दौलत थी यानि संगीता की तरफ़ से उस पर कोई बंदिश नहीं थी, जब उस पर बंदिश नहीं थी तो संगीता का मर्डर करने की उसे जरूरत क्या थी ?"

अक्षय पुन: सकपका गया, संभलकर बोला…“मुमकिन है कि संगीता की तरफ़ से कोई बंदिश हो ?”

"अब आप मुमकिन पर आ गये ।" कहते वक्त किरन के होंठों पर वेहद जीवन्त मुस्कान उभरी थी…“आपका मुमकिन पर आना साबित करता है कि मेरा तर्क आपके भेजे में घुस गया है-दरअसल जायदाद अगर पत्ना के नाम हो, और पत्नी की हत्या हो जाये तो लोग कूदकर इस नतीजे पर पहुंच जाते हैं कि हत्या पति ने ही की है-इस मामले में भी यही हुआ है----विना सोचे-समझे नतीजा निकाल लिया गया कि शेखर मल्होत्रा ने दौलत के खातिर अपनी बीबी की हत्या कर दी…इतने धुरंधर-पुरन्दर लोगों ने यह बात सोचने की चेष्टा नहीं की कि शेखर को दौलत की खातिर पत्नी का कत्ल करने की जरूरत ही नहीं थी ।”

अक्षय किरन का मुंह ताकता रह गया ।

अपने चेहरे पर विजेता के भाव लिए किरन उठकर खड़ी हो गयी, बोली------प्रमुख होता है हत्या का उद्देश्य और हमारी संक्षिप्त बहस का परिणाम यह निकला कि -हत्या का उद्देश्य ठोस नहीं है----अगर आप अभी यह दावा करते हैं इंस्पेक्टर कि संगीता की हत्या दौलत की खातिर हुई है तो मैं यह दावा करती हूं कि हत्यारा शेखर मल्होत्रा नहीं है तो अगर आप अभी भी उसे ही हत्यारा मानते हैं तो मैं ये कहूंगी कि अाप अपनी थ्योरी में सुधार कीजिए -कम-से-कम दौलत की खातिर उसे यह हत्या करने की जरूरत नहीं थी ।”

“मेरे ख्याल से फिलहाल हम इस सम्बन्ध में बहस न करके अगर उसकी खबर लें जिसने गुलाब चन्द की लाश के रूप में खुद को स्टडी में बन्द कर रखा है तो बेहतर होगा !""

“ओह संगीता मर्डर केस की कहानी में डूबकर उसे तो मैं भूल ही गयी थी ।" कहते वक्त किरन के जहन में यह सवाल रह-रहकर कौंध रहा था कि अगर यह बात सच है कि शेखर मल्होत्रा के नौकरों ने फंसाया है तो शेखर बार बार यह क्यों, कह रहा है कि उसे चक्रव्यूह के रचयिता के बारे में कोई जानकारी नहीं है ।

“हम तुम्हें अन्तिम चेतावनी देते है ।” हाथ में रिवॉल्वर लिए स्टडी के के दरवाजे के नजदीक खडे इंस्पेक्टर अक्षय ने अपनी ऊंची आवाज में कहा…"या तो एक मिनट के अन्दर-अन्दर बाहर निकल आओ अन्यथा दरवाजा तोड दिया जायेगा ।"

जवाब में पुन: पहले जैसा सन्नाटा व्याप्त रहा ।

अक्षय ने कम-से-कम पांचवी बार उक्त शब्द दोहराये ये… उसके पीछे स्टडी के दरवाजे के ठीक सामने हाथों में बन्दूक लिए चार पुतिसिये ऐसे मुस्तेद खड़े थे जैसे मोर्चे पर खडे हों । "

किरन आदि को इंस्पेक्टर ने दरवाजे के सामने से थोड़ा-सा हटाकर खडा किया था !"

 
धड़कते दिल से सभी एक मिनट के गुजरने का इन्तजार करते रहे, परन्तु वह मिनट गुजर जाने के वावजूद स्टडी के अन्दर से हल्की-सी हलचल तक का आभास न मिला । '

तब, दरवाजे के नजदीक से हटते हुए अक्षय ने ऊंची आवाज में सिपाहियों से कहा'-…"'दरवाजा तोड़ दो ।"

सिपाहियों क्रो हुक्म मिलने की देर थी कि वे अागे बड़े ।

और बन्दूको के 'बट्ट' से दरवाजे पर प्रहार करने लगे ।

दरवाजा मजबूत था मगर कोई चीज चाहे जितनी मजबूत हो, इनसानी इरादों से ज्यादा मजबूत नहीं हो सकती । कहने का मतलब ये कि सिपाही पसीने से तर हो गये परन्तु वह क्षण आ ही गया जव दरवाजा 'भड्राक' की आवाज के साथ चौखट से अलग होकर स्टडी के अन्दर जा गिरा । ' सबके दिल जोर-जोर से धड़क रहे थे ।

हाथ में रिवॉल्वर लिए रास्ते में पड़े दरवाजे पर से गुजरता अक्षय स्टडी के अन्दर प्रविष्ट हुआ---अपने अफ़सर को किसी भी 'बला' से बचाने हेतु सिपाही बन्दूकें ताने मुस्तेद खडे़ थे किन्तु कोई बला उस पर नहीं झपटी।

कहीं कोई हलचल नहीं ।

लम्बी-चौड़ी स्टडी का भरपूर निरीक्षण करने के बाद जव उसने घोषणा की कि वहाँ कोई नहीं है तो लोग स्टडी के अन्दर अा गये-फर्शं से शुरू होकर दीवारों के सहारे-सहारे छत तक चली गई "रेक्स' में लगी किताबों को वे सभी इस तरह घूर रहे थे जैसे वे रहस्यमय वस्तुएं हों ।

स्टडी में जब अक्षय को ऐसी कोई जगह नजर नहीं आई जहाँ कोई व्यक्ति खुद को छुपा सके, तो उसने शेखर से मुखातिब होकर सवाल किया-" तहखाने का रास्ता कहां है ?"

स्टडी के बींचों-बीच रखी विशाल मेज के ठीक ऊपर लटके फानूस की तरफ इशारा करके शेखर ने कहा-"तहखाने का दरवाजा इस फानूस के सबसे नीचे वाले लटूटू को पकड़कर लटकने से खुल जाता है ।”

"खोलो ।"

शेखर मेज की तरफ बढा ।

एकाएक किरन ने उससे पूछा…"क्या तुम बता सकते हो के गुलाब चन्द ने तहखाना बनवाया किस मकसद से था ?"

इस बारे में न मैंने संगीता से कभी कुछ पूछा न उसने बताया ।" मेज के नजदीक पहुंचकर ठिठकत्ते हुए उसने कहा…""हां, बाबूजी की मौत के बाद संगीता एक बार मुझे तहखाने में ले गई थी मगर उस वक्त वहाँ कुछ पुराने और जर्जर दरवाजों और ड्रामों के अलावा कुछ नहीं था !"

" तहखाने में कोई चीज छुपाकर नहीं रखी गई थी ?"

"मुझे 'तो बहाँ ऐसी कोई जगह ही नजर नहीं अाई जहाँ कुछ छुपाकर रखा जा सकता और न ही संगीता ने किसी छुपी हुई चीज का जिक्र किया ।” कहने के साथ शेखर न केवल मेज के ऊपर खड़ा हो गया बल्कि दोनों हाथ ऊपर उठाकर फानुस के सबसे नीचे वाले लटृटू पर लटक भी गया ।

. . उसका लटकना था कि स्टडी में गड़गड़ाहट की हल्की-सी आवाज गुंजी ।

ठीक मेज के फ़र्श में एक गडढा नजर अाने लगा ।

किरन और अक्षय सहित सभी चकित नजरों से उसे देख रहे थे---गडढे में दो सीढियां नजर आ रही थी ॰॰॰॰॰॰ इधर शेखर मेज से कूदा उधर अक्षय ने कहा----"" मेज को तहखाने के रास्ते ऊपर से हटा दो !"

सिपाहियों ने हुक्म का पालन किया ।

हाथ में रिवॉल्वर लिए अक्षय गडढे के निकट पहुंचा, परन्तु स्थिति में केवल इतना ही परिवर्तन आया कि दो के स्थान पर तीन सीढियां नजर अाने लर्गी-उससे नीचे का हिस्सा अंधेरे में डूबा हुआ था ।

"सबसे ऊपर वाली सीढी के पृष्ठ भाग में एक स्विच है ।" शेखर ने कहा----"उसे आन करने पर तहखाने के अन्दर लगा बल्ब अान' हो जायेगा ।"

"आंन करों ।" अक्षय ने संक्षिप्त आदेश दिया ।

शेखर ने गडढे के नजदीक बैठकर सीढी के पृष्ट भाग में हाथ डाला और बोला----“ये तो आंन पड़ा है ।"

“तो बल्ब क्यों नहीं जल रहा?”

किरन ने कहा…“या तो बल्ब फ्यूज हो गया है या किसी ने होल्डर से निकाल लिया है ।"

"टॉर्च है यहां ?" अक्षय ने पूछा ।

और ।

कुछ देर मेँ टॉर्च आगई।

सबके दिमाग यह सोचने में तल्लीन थे कि क्या तहखाने में गुलाब चन्द की कथित लाश होगी या तहखाने " से भी वैसी निराशा हाथ लगेगी जैसी स्टडी से लगी थी --- लेकिन अगर यह लाश तहखाने में न हुई तो गई कहां ?

स्टडी का दरवाजा अन्दर से बन्द क्यों था ?

अक्षय के आदेश पर सबसे पहले तहखाने में उतरने के काम दो सिंपाहयों ने सम्भाला-अागे वाले के एक हाथ में टॉर्च थी दूसरे में बन्दूक-पीछे वाला दोनों हाथों से बन्दूक सम्भाले हुया था !

शेखर ने चेतावनी दी…“सबसे नीचे वाली सीड़ी पर पैर मत रखना, उस पर पैर रखते ही तहखाने का दरवाजा बंद हो जायेगा ।"

सिपाहियों ने उसकी बात सुनी, दिमाग में बैठाई और उतरना शुरू कर दिया-आगे वाला सिपाही अपने से नीचे बाली सीढ़ी पर प्रकाश का गोल दायरा स्थिर करता और यह निश्चय करने के बाद उस पर कदम रख देता कि वह अन्तिम सीढी नहीं हे…ऊपर यानि तहखाने के रास्ते और टॉर्च के गोल प्रकाश दायरे के अलावा दोनों सिपाहियों को अपने चारों तरफ अंधेरा-ही-अंधेरा नजर अा रहा था । "सैर्किंड-लास्ट' सीढी से वे सीधे तहखाने के फर्श पर कूदे !

अागे वाले सिपाही ने टॉर्च के प्रकाश के दायरे को तहखाने में घुमाना शुरु किया-वहीं भरे आड़-कबाड़ पर से फिसलता हुआ प्रकाश दायरा एक ऐसे स्थान पर पहुचा जहाँ पहुंचते ही दोनों के हलक से जोरदार चीखें उबल पड़ी।

"क-क्या हुआ ?" गडढे के नजदीक खडा अक्षय चिल्लाया----" क्या हुआ रामदीन ?"'

" ल लाश ------ यहां एक लाश है सर ।"

"किसकी लाश है ?"

"क-किसी औरत की लाश है सर, उफ्फ-बहुत डरावनी है ये।"

अक्षय के नजदीक पहुंचती किरन उत्तेजनायुक्त स्वर में वोली ----“लाश रधिया की होगी है"'

" रररर-रधिया की ?" अक्षय चौकां " आपको कैसे मालुम ?"

“मेरे दिमाग में शुरू से ही यह बात कौंध रही है कि रधिया कहाँ गई, वह गायब है ।"

लाश, सचमुच रधिया की थी ।

एक पुराने ड्रम के साथ पीठ टिकाये वह आंखें फाडे़ सीढियों की तरफ देख रही थी-मुंह खुला हुआ था, करीब ढाई इंच लम्बी जीभ बाहर लटकी हुई थी !!!

कोहनियों पर से मुड़े दोंनों हाथ बैसी दशा में थे जैसी दशा में तब होते है जब भयाक्रांत होकर चीखता है ।

हाथों की सारी अंगुलियां एक-दूसरे से दूर दूर थी ।

फैली हुई !

मुद्रा ऐसी थी जैसे अभी भी मारे खौफ़ के चीख पढ़ना चाहती हो अथवा हर उस शख्स को चिढा रही हो जो उसकी तरफ देख रहा था ------ गैस के हंडे के साथ सभी लोग वहां पहुंच चुके थे ।

वे सब, मारे दहशत के जिनका बुरा हाल था ।

रधिया की मौत और खासतौर से लाश की भयानकता ने उनके होश फाख्ता कर रखे थे----अक्षय पोस्टमार्टम और , फिंगर प्रिंटृस विभाग वालो को फोन कर चुका था, यह घोषणा कभी कर दी थी उसने कि कोई भी शख्स तहखाने में मौजूद किसी वस्तु को छेड़ने का प्रयत्न न करे !!

उलटे पड़े एक ड्रम के ऊपर रखे बल्ब के नजदीक पहुंचकर किरन ने कहा---- बल्ब, फ्यूज नहीं है, इसका मतलब, -ये हुआ इंस्पेक्टर कि हत्यारे ने जानबूझकर होल्डर , से निकालकर यहाँ रखा है और अगर उसने दस्ताने नहीं पहन रखे थे तो इस पर अंगुलियों के निशान काफी स्पष्ट होने चाहिएं ।"

"अंगुलियों के निशान तो लाश की गर्दन पर भी होंगे ।" लाश को विना छेड़े बहुत नजदीक से उसका निरीक्षण कर रहे अक्षय ने कहा---'" रधिया का गला घोंटकर मारा गया है ।"

. "म-मेरा भी उसने गला घोटने की कोशिश की थी शाब ।" बुन्दू कह उठा ।

अक्षय ने पूछा…“क्या यह काम तुम्हारी पत्नी या उसका भाईं-बन्द अथवा रधिया का पति कर सकता है ?”

"क-कया मतलब शाब ?"

"तुम्हारे और रधिया के सम्बन्धों के बारे में उन्हें पता लग गया होगा न ?"

"नहीं शाब, बिलकुल नहीं--- दोनों में से किसी के भी गांव तक यह रव्रबर नहीं पहुंची ।"

"सारे अखबारों में छपी है, फिर गांव तक भला कैसे नहीं पंहुची होगी?"

"पहली बात तो ये शाब कि अखबारों में सिर्फ नौकर और नौकरानी छपा है-हमारे नाम नहीं छपे । दूसरी ये कि मेरी घरवाली और रधिया का मरद पड़े लिखे नहीं हैं… तीसरी ये कि हम दोनों में से किसी के गांव में एक भी . अखवार-नहीं पहुंचता;--चौथी और सबसे बडी बात ये है हैं शाबजी कि तब अब तक मैं और रधिया कई वारं गांव हो आए हैं---न मेरी औरत को ही कुछ पता लगा न रधिया के मरद को ।"

" आपका दिमाग इनके सम्बन्धों और गांव तक इसीलिए पहुंचा है न इंस्पेक्टर, गुलाब चन्द की लाश के रूप में जो भी था उसने रधिया की हत्या की है या बुन्दू को मारने की चेष्टा. ?"

"जाहिर-सी बात है ।" अक्षय ने कहा-“मैं सोच रहा हूं कि कहीं इस वारदात के पीछे इनके अबैध सम्बन्ध ही तो नही थे !!!!

किरन ने कहा-----"और मैं दावे के साथ कह सकती हू्ं के यह हत्या किसी अनपढ़ ग्रामीन ने नहीं बल्कि पढे-लिखे और शहरी व्यक्ति ने की है !"

 
ऐसा दाबा अाप कैसे कर सकती हैं?"

" "दावा मैं नहीं बल्कि ये फाउन्टेन पैन कर रहा है ।" कहने के साथ ही ड्रम ही बगल में पड़े पैन को रूमाल की मदद से उठाकर किरन ने कहा'-----इस पैन पर 'मेड इन हांगकांग' लिखा है-रधिया का तो यह हो नहीं सकता, जाहिर है कि हत्यारे का होगा और अनपढ व्यक्ति जेब में 'मेड इन हांगकांग' वाला पेन लेकर क्यों घूमेगा ?"

"कह तो अाप ठीक रही हैं ।" अक्षय प्रभावित हुए विना न रह सका ।

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अभी वह इस बारे में ज्यादा डिंसकस न कर पाए थे कि फोटोग्राफर और फिगर प्रिंट विभाग वाले वहाँ पहुच गये तब अक्षय ने कहा----"'अागे की इन्वेस्टीगेशन हम इन लोगों का काम निपट जाने के बाद करेंगे ।"

"ओके !" किरन बोली ।

उधर फिगर प्रिंट विभाग के लोग अपना काम निपटा रहे थे इधर शेखर मल्होत्रा को खींचकर किरन एक तन्हा कमरे में ले गई और गुर्राईं-----"तुमने मुझसे झूठ क्यों बोला ?"

“झ-झूठ-क्या झूठ बोला मैंने ?"

"यह कि तुम्हे उसका नाम तक पता नहीं जिसने तुम्हें संगीता की हित्या के 'जुर्म में फंसाया है ।"

पुरी मासूमियत के साथ कहा शेखर ने-“इसमें झूठ क्या है , अगर मुझे चक्रव्यूह के रचियता का नाम पता , होता तो फिर बात ही क्या थी ?"

"क्या तुम्हें फंसाने वाले निवकू रधिया और बुन्दू नहीं हैं ?"

"नहीं ।"

"नहीं ?” मारे हैरत के किरन का बूरा हाल हो गया । "

"ओह........ "अच्छा !" शेखर इस तरह बोला जैसे सारी बात समझ में आ गई हो…“आप शायद उस बयान को सच मान रही हैं जो इस केस की फाइल में दर्ज है-----जो मैंने हवालात में और फिर कोर्ट में दिया था ।"

बुरी तरह चकित किरन ने पूछा…"क्यों, यह बयान झूठा था ?"

"सरासर झूठा है"'

“झूठा बयान तुमने दिया क्यों है"'

" शहजाद राय के कहने पर !"

यह कि घटना बाली रात से तीन दिन पहले यानी 29 मार्च को हमारी मैरिज एनीवर्सरी थी ---- वह हमने एकान्त में हंसी खुशी मनाई --- मैनें संगीता को एक नेकलस दिया था और उसने मुझे यह डायमंड वाली रिस्टवॉच !" कहने के साथ शेखर ने अपनी घड़ी वाली कलाई आगे कर दी !!!

किरन ने चुपचाप देखा, बोली कुछ नहीं ।

शेखर मल्होत्रा कहता चला गया…“हमारी "मैरिज एनीवर्सरी' के केवल दो दिन बद 'फर्स्ट अप्रैल पड़ता हे…उन्तीस तारीख को जाने किस बात में से बात निकली कि फर्स्ट अप्रैल' पर बात चल निकली----मैं कह बैठा कि फर्स्ट अप्रैल वाले दिन लोग अच्छे से अच्छे समझदार व्यक्ति को बेवकूफ वना देते हैं ।-----संगीता मानने को तैयार नहीं थी कह रही थी कि सारे दिन आदमी सतर्क रहे तो लाख प्रयत्न करने के बावजूद उसे कोई बेवकूफ नहीं बना सकता---मैनें विरोध किया---अपने बचपन के वे किस्से सुनाए जिनके इस्तेमाल से दोस्तों को बेवकूफ़ बनाया करता था------बहस ही बहस में संगीता कह बैठी कि अगर फ़र्स्ट अप्रेल वाले दिन मुझे बेवकूफ वना दो तो जानूं, वह शायद कोई मनहूस घड़ी थी…हां, अब तो उस घड़ी को मनहूस ही कहा जायेगा, जब मैंने जोश में भरकर संगीता की चुनौती स्वीकार कर ली और दुकान से काला कपडा लिया तथा पहली तारीख के वायदे पर उसे टेलर के यहाँ सिलने दे दिया ।"

"ओह !" किरन के दिमाग की नसें खुलती चली गई ।

“चाकू मैंने उसी दिन यानि पहली अप्रैल की दोपहर को खरीदा था ।" शेखर मल्होत्रा बताता चला गया…“मेरा इरादा रात के वक्त खिड़की के माध्यम से अपने बेडरूम में जाकर संगीता को डराने का था'-पूरा विश्वास था कि इस तरीके से संगीता को डराने और बेवकूफ बनाने में कामयाब हो जाऊंगा मगर चाकू खरीदने के बाद फैकट्री पहुचा ही था कि हमारे बम्बई के सोल एजेन्ट का टेलीग्राम मिला…टेलीग्राम में लिखा था कि उसकी दुकान से हमारी कैवट्री के कुछ डिब्बे शुद्धता की जांच हेतु फूड विभाग वाले ले गए हैँ-जांच कल यानि दो अप्रैल को होगी, अत: मेरा वहां मौजूद रहना अावश्यक है-इस टेलीग्राम को पढ़कर एक बार तो लगा कि संगीता को बेवकूफ बनाने के सारे प्लान पर पानी फिर गया है, मगर थोडी देर सोचने के बाद समस्या हल कर ली--समस्या के हल के रूप में मैंने अपनी फेवट्री के मैनेजर से दस बजे वाली ट्रेन और एक वाली पलाइट के टिकट मंगाए--योजना यह थी संगीता को टेलीग्राम दिखाता हुआ उससे कहूगा कि दस वाली ट्रेन से बम्बई जा रहा हू---ड्राइवर को साथ ले जाकर ट्रेन में सवार भी हो जाऊंगा और उसके जाते ही स्टेशन से बाहर निकल आऊंगा----२बेडरूम में पहुंचकर संगीता को डराऊँगा और फिर एक वाली फ्लाइट से सचमुच बम्बई चला जाऊंगा फैक्ट्री की छुट्टी करके जब मैं यहाँ यानि कोठी पर आया और टेलीग्राम संगीता को दिखाते हुए कहा कि दस वाली ट्रेन से बम्बई जाना होगा तो उसने कहा कि कहीं तुम मेरा "अप्रैल फूल' तो नहीं बना रहे हो-यह सोचकर मैं सकपका गया कि वह पूरी तरह सतर्क है, परन्तु पुरा विश्वास था कि भले ही चाहे जितनी सतर्क हो मगर उसे बेवकूफ बनाने की मेरी जो योजना है उसमें वह हर हालत में फंस जाएगी। अत: बिना जरा भी "कन्फयूज‘ हुए मैंने अपनी योजना पर अमल किया !!!

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उस वक्त रात के पौने बारह बजे थे जब मैं चोरों की तरह चारदीवारी फ़लांग कर छाती के किचन लॉन में पहुचाअमरूद के पेड़ के नीचे जिस्म पर चौंगा डाला, चेहरे पर नकाब और हाथ में खुला चाकू लेकर खिडकी की तरफ बढा ।"

“तुमने यह सच्चाई कोर्ट में क्यों नहीं रखी ?"

"बताता हु-बात आपकी समझ में तभी आयेगी जब सब कुछ क्रमवार बताऊंगा ----चोंगे और नकाब में छुपा हाथ में चाकू लिए मैं लान की तरफ खुलने वाली अपने बेडरूम की रिव्रड़की तक पहुंचा ही था कि संन्नाटे की चीरती संगीता की चीख ने कलेजा हिला दिया-मैं बौखला गया और ठीक से कुछ' समझ भी न पाया था कि संगीता दूसरी बार चीखी ।

हड़बड़ाकर मैं खिड़की पर चढ गया-----ठीर यही क्षण था जब मैंने एक नकाबपोश को संगीता के चेहरे पर चाकू से वार करते देखा ।"

"क्या उसके जिस्म पर भी तुम्हारे जैसे रंग का यानि काला बैगा था ?"

"उसका चोंगा काला था और नकाब भी ।"

"चाकू?"

“चाकू भी ठीक मेरे ही जैसा था, उसी चाकू को बाद में मेरा कहा गया ।"

“क्या मतलब?"

"चेहरे पर चाकू लगते ही संगीता के हलक से एक और चीख निकली -उस वक्त वह लहराकर बेड के नजदीक गिर रही थी जब मारे गुस्से के मैं पागल हुआ हमलावर पर झपटा-----मुझे देखकर वह जरा भी नहीं चौंका-----क्षण मात्र में मेरा मुकाबला करने के लिए खुद को इस तरह तैयार कर लिया जैसे पहले ही से जानता हो कि संगीता का कत्ल करने के बाद मेरा मुकाबला करना है----

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"मै उसके नजदीक पहुचा, वार करने के लिए चाकू वाली कलाई हवा में उठाई ही थी, उसने झपटकर मेरी कलाई पकडी और मरोड थी--मेरे हाथ से चाकू निकल गया---उसनै तुरन्त मुझे छोड़कर अपना चाकू फर्श पर फैंका और मेरा उठा लिया------------इस बीच मैं उस पर जम्प लगा चुका था-----गुत्थमगुत्था हुए दोनों फ़र्श पर काफी दूर तक लुढ़कते चले गए और किर उसने अपने दोनों जूतों को मेरे पेट में फंसाकर ऐसा झटका दिया कि हवा में लहराकर मैं फर्श पर पडे़ उसके चाकू के नजदीक गिरा---अपनी तरफ़ से भरपूर फुर्ती के साथ मैं उछलकर खडा हो गया--मुझसे तीन कदम दूर खिड़की के नजदीक खड़ा वह अपने दस्तानेयुक्त हाथ में मेरा चाकू लिए मेरे किसी भी हमले का मुकाबला करने के लिए तैयार खडा था-जब चाकू को खतरनाक ढंग से उसने हवा में घुमाया तो मुझे लगा कि निहत्थे ही उस पर झपट पड़ना बेवकूफी होगी और विना सोचे समझे फर्श पर पडा उसका चाकू उठा लिया, खून से सना चाकू हाथ में लिए मैं उस पर झपटने ही वाला था कि गेलरी में भागते कदमों की आवाज सुनाई दी--क्षणभर के लिए मेरी तबज्जो उस तरफ चली गई और इसी क्षण मेरे चाकू सहित हमलावर ने खिडकी के पार जम्प लगा दी…मैं खिड़की की तरफ़ लपका-तभी "भड़ाक' की जोरदार आवाज के साथ दरवाजा खुला और उस ववत्त मैं खिडकी के चौखट पर चढकर लॉन में कूदने वाला था कि बून्दू ने पीछे से पकड़ लिया---जनावर का पीछा करने की गरज से खुद को बुन्दू से छुडाने का प्रयत्न कर ही रहा था कि निवकू और रधिया ने भी मुझे पकड़ लिया----मैं चीख-चीखकर कहता रहा कि “मैँने संगीता की हत्या नहीं की असली हत्यारा भाग रहा है, मगर उन्होंने मेरी एक न सुनी और लाख प्रयत्नों के बावजूद उनके चंगुल से खुद को निकाल न सका…चाकू बेडरूम के एक कोने में जा गिरा था ----------------

निवकू और बुन्दू ने मुझे जकढ़ लिया---उस वक्त तो होश ही उड़ गए जब रधिया ने मेरे सामने ही फोन पर पुलिस से यह कहा कि मैंने संगीता की हत्या कर दी है---बुरी तरह बौखला गया बल्कि कहना चाहिए कि यह सोचकर छक्के छूट गए कि मैं संगीता का हत्यारा साबित होने जा रहा हूं और उसी हड़बड़ाहट का नतीजा यह था कि एक वार फिर उनके चंगुल से निकलकर फरार हो जाने की अपनी इस कोशिश के परिणामस्वरूप इस बार मुझे बेहोश हो जाना पड़ा ।"

"इसका मतलब यह हुआ कि नौकरों के बयान बिल्कुल सच्चे हैं ?"

“तभी तो कह रहा है मुझे फंसाने में उनका कोई हाथ नहीं है-उन पर शक तब किया जा सकता था जबकि उनमें से कोई झूठ बोल रहा होता ।"

""खैर, फिर क्या हुआ ?"

"होश में अाने पर सब-कूछ विधुत गति से दिमाग में कौंध गया…यह बात समझ में आ गई मुझे संगीता का हत्यारा समझ लिया गया है…हत्यारे को मैंने देखा था और मेरी बात किसी को विश्वसनीय नहीं लगेगी, अत: विना किसी वकील की सलाह के पुलिस से एक लपज भी कहना मुझे अपने लिए घातक लगा-तब फोन करके शहजाद राय को थाने बुला लिया ।"

“उसके बाद ?” '

" "एकान्त मैं उम्हें सब-कुछ सच…सच बताया ।"

"वही जो तुमने मुझे बताया है ?"

"हां ।"

“फिर ?"

"मेरी बातें सुनने के बाद शहजाद राय ने बुरा-सा मुंह बनाया और बोले कि "फ़र्स्ट अप्रैल' की इस बात पर दुनिया का कोई भी आदमी विश्वास नहीं करेगा !!!!

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