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धर्मयुद्ध (विजय विकास अंलफासे सीरीज)

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-उसका मन चाहा था कि विकास यू ही बोलता रहे और वह सुनती रहे-हमेशा । उसे वे बातें याद आईं जो उसने जोश में विकास क्रो कही थीं ।

जाने क्यों मुमताज क्रो ग्लानि-स्री हुर्द-जब उसे ये याद आया कि ~ उसने बिकास के मुह पर थूक दिया-था तो मन अपने ही प्रति असीम घृणा से भर गया ।

इस वक्त वह उसी हॉल मेँ थी जहा वेन खडी थी…उसे बिकास का वेन कै अन्दर खैद रहना अच्छा नहीं लग रहा था-वह विकास की सूरत देखना चाहती थी…तरस-सी रही थी वह-इसी हॉल में मेजर हाशमी…रहीम-करीम चाचा और सुलतान भी मौजूद थे…इस वक्त

वंहा सरदार नहीं था…हाल मे सन्नाटा छाया हुआ था ।

चालक, कक्ष में अपनी सीट पर विकास आखे बन्द किए पड़ा था ।

अचानक ही हॉल का एक ढका हुआ दरवाजा खुला और उसके माध्यम से सरदार हाल में दाखिल हुआ-मुमताज सहित सभी सावधान की मुद्रा मे ख़डे हो गए सरदार सीधा वैन की विण्ड स्कीन के स्थान पर लगी जाली कै सामने जाका रुका और बोला… राष्ट्रपति भवन से हमारे एक सदस्य ने जरूरी सुचना भेजी है विकास !"

" क्या ?" विकास ने पूछा ।

"तीन घटे बाद तुम जो कुछ करने जा रहे हो उससे तुम्हें रोकने के लिए तुम्हारे मुल्क ने तुम्हारे गुरु विजय को मजलिस्तान रवाना किया है ।"

" ओह ।" विकास के चेहरे पर गम्भीरता उभऱ आई-“हा ये तो होना ही था ।"

" क्या मतलब?"

विकास ने हल्की-सी मुस्कान कै साथ कहा…"जब मैँ अपने मुत्क के मित्र देश के खिलाफ़ जग का ऐलान करूगा तो मेरा मुल्क और मेरे गुरु तो मेरे दुश्मन बनेगे ही ।"

"तो क्या आप उन हालात में भी अपनी जग जारी रखेंगे?"

"क्यों नहीं?"

" माफ करना-मैंने सुना है कि आप सबसे पहले देशभक्त हैं उसके बाद कुछ और ।"

आपने गलत सुना है…बिकास सबसे पहले नेकी का साथी है I"

“तो क्या तुम अपने गुरु से टकराने के लिए तैयार हो?”

"हालाकि इसकी ज़रूरत नहीं .पडेगी…मेरा अनुमान हे कि मेरी आवाज पर सुनने के बाद उन्होंने यहा आने का निश्चय किया होगा-वे रात से पहले, यहां नहीं पहुचेगे-तीन में से एक घटा बीत चुका है ।दो घटे बाद मै शुरू हो जाऊगा और उम्मीद है कि गुरु के यहां पहुचने से पहले ही इतना कूछ कर गुजरूगा कि यहा आने के बाद उन्हें कुछ करने के लिए होगा ही नहीँ I”

" तुम गलत सोच रहे हो।"

" क्या मतलब?”

“वे एन…सिक्स नामक द्रुतगामी विमाना से रवाना हो चुके हैं और एक-डढ घटे' बाद यहा पहुंच जाएगे।”

“ओह ।" लडके के मस्तक पर चिन्ता की ढेर सारी लकीरे उभर ५ आई । उसने बडबडकर मानो स्वय ही से कहा…" इसका मतलब गुरु टकराने का पूरा निश्चय कर चुके हैं और तीन घण्टे बाद शुरू होने वाली जग उतनी आसान नहीं होगी जितनी. मैंने सोची थी ।"

" क्या सोचने लगे मिस्टर विकास?"

“क कछ नहीं…आंप फिक्र न करो…मै जानता हू कि जो रास्ता मैंने चुना है वही ठीक है…भले ही गुरु सामने आ जाए लेकिन. मैँ अपने पथ ये. विचलित होने वाला नहीं हू ।"

" क्या आप अपने गुरु अपने देश के खिलाफ जग करेगे?”

"बेशक ।"

" हमारे लिए ??"

"आपकै लिए नहीं वल्कि मुल्क के पिसते हुए अवाम के लिए---गुलामी की उन जजारों की तोड डालने. के लिए जिन्होंने इस देश को जकड रखा है ।"

"क्या आप जानते हैं कि आपके कृत्यों' से अन्तर्राष्ट्रिय मच पर भारत की क्या स्थिति हो गई है?"

"मैं पहले से ही जानता था यह सब कुछ. होगा-इसीलिए रेडियो पर बोलकर. मैंने अपने मुल्क की स्थिति स्पष्ट करनी चाही थी…कुछ भी सही, मेरे बिचार से मजलिस्तान में मोजूद सेमिनार की सेनाओं का बिरोध न करके मेरा मुल्क इडलीस सरकार को मौन समर्थन दे रहा है------
 
यहं गलत है…सीघी-सी बात यह हुई कि मेरा अपना मुल्क भी जालिमों के साथ है…जालिम का साथ देने वाला भी जालिम होता है सरदार और विजय गुरु उसी जालिम मुल्क के नुमाइन्दे बनकर आ रहे हे-उन्हे मुझसे टकराना होगा ।"

“विकास ।"

लडका, कहता ही चला गया-“अगऱ हालात नहीं बदले…मेरे देश ने अपनी नीति नहीं बदली त्तो दुनिया यह देखेगी कि हमेशा अपने मुल्क के लिए युद्ध करने वाला विकास भारत कै खिलल्फ भी युद्ध करेगा…यदि बिजय गुरु अपने सिद्धान्तो पर अडे रहे तो युद्ध उनसे भी होगा सरदार-मुझे हार-जीत की परवाह नहीं है-एक्र तरफ मेरा मुल्क है-दूसरी तरफ गुलामी की जंजीरो में जकडी इस मुल्क की जनता…मेरा देश जालिम के साथ हे…विजय गुरु अत्याचारी के साथ हैं तो मैं मजलिस्तान के अवाम का तरफदार हू…मैं पीछे नही हटूगा l युद्ध होगा-नही, युद्ध नही…मैं इसे धर्मयूद्ध कहूंगा धर्मयुद्ध I"

सरदार और उसके साथियों के सीने फ़ख्र से चौडे हो गए ।

खुशी के…कारण कापते स्वर में सरदार-सिर्फ इतना ही कह सका-----"अ आप धन्य हैं मिस्टर बिकास…सच आप धन्य हैं-ठीक वेसे ही जैसा सुना था-" नेकी के तरफ़दार-निर्बलो के दोस्त !"

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रनवे के नजदीक पहुचते-पहुचते एन-सिक्स के गर्भ से दो पहिए निकल पडे-फिर एक जबरदस्त आवाज के साथ पहिए. रनवे से टकराए तथा छोटा-सा लडाकू. विमान साफ और चिकने रनवे पर दोढता ही चला गया…अपने निचिंत स्थान पर जाकर वह रुका ।

एयरपोर्ट के अंदर और बाहर मी दूर-दूर तक सिर्फ और सिर्फ

सेमिनेरियन सैनिक हीँ नजर आ रहे थे…-बहुत ही कडा पहरा था । होता भी क्यों नहीं?

उन्हे मुसीबत से छुटकारा दिलाने वाली एकमात्र महान हस्ती जो आ रही थी ।

बिजय के स्वागतार्थ स्वय कर्नल तोम्बो और गार्जियन जो वहा आए हुए थे ।

एपरपोर्ट के चारों तरफ़ सुरक्षा के उतने ही कडे प्रबन्ध थे जितने इबलीस सरकार ज्यादा-से-ज्यादा कर सकती थी…

सेनिक जो इच्छा न होते हुए भी अपने अधिकारियों के आदेश पर पहरा दे रहे थे सोच रहे थे कि यदि अभी यहा बख्तावन्द गाडी आ जाए तो इतने सब इन्तजाम भला क्या कर सकेंगे'?

एन सिक्स का दरवाजा खुला ।

फिसलती हुई सीढी का सिरा जमीन पर आ टिका I

तब दरवाजे पर विजय नज़र आया । शानदार नीले रग का गर्म सूट पहन रखा था तथा-द्धाए हाथ मैं सूटकेस था-जिस वक्त उसने सीढिया उतरनी शुरू कीं तब तक सैनिक पहरे में कर्नल र्तोम्बो और गार्जियन सीढी के समीप पहुच चुके थे I

जमीन पर कदम रखते ही एक सैनिक अधिकारी ने विजय का सूटकेस सभाल लिया I

कर्नल तोम्बो ने लपक्कर हाथ आगे बढाया बोला-" हैलो मिस्टऱ विजय!"

उससे हाथ मिलाता हुआ विजय वुरी तरह कापने लगा-यू जैसे जूडी के तेज बुखार से पीडित हो…र्क्नल तोम्बी ने एकदम चौंककर पूछा…"क क्या हुआ मिस्टर विजय !"

"क.... कुछ नहीं ।" कांपते हुए विजय ने कहा I

"त तो फिर आप इस तरह काप क्यों रहे हैं?"

"क काप नहीं रहा हू-हिल रहा हूं I”

" ज....,जी?”

" आप ही ने तो कहा था…" हिलो मिस्टर विजय-मैं हिल रहा हू I"

कर्नल तोम्बो की खोपडी घूम गईं-तबीयत एकदम से झक्क I

गार्जियन विजय को इस तरह देख रहा था जैसे वह क्रिसी चिडियाघर से भागा हुआ सबसे अजीवो-गरीब जानबर हो और सच था भी यही ।

सचमुच बिजय पर्ले दर्जे का बवेकूफ ही नजर आ रहा था…सारे जमाने की मूर्खता उसके चेहरे पर सिमट आई थी I I

" म मिस्टर बिजय !" गार्जियन ने पुकारा ।

"ज जी I" विजय एकदम रुक गया…स्रावधान की मुद्रा में I वह सीधा गार्जियन की आखों में झाक रहा था-गार्जियन हडबडा-सा गया ओंर जब उसे कछ ओर न सूझा तो जल्दी से हाथ आगे बढाकर ब्रोला-"मुझे गार्जियन कहते हैं I”

"गार्डन-वाह…क्या खूबसूरत नाम है-तबीयत गार्डन-गार्डन हो गई !"

" ज......जी !"

गार्जियन का मुह खुला रह गया…आखें हैरत से फटी पडी थीं और बिजय किसी मूर्ख सग्राट के समान ही उसके मुह में झाक रहा था…फिर दाए हाथ की तर्जनी उसके मुह में डालकर वकायदा गिनती शुरू कर दी-" एक दो…तीन…चार।"

तोम्बो ने पूछा…"ये आप क्या कर रहे हैं मिस्टर विजय?"

“बीच में मत बोलो…हम दात गिन रहे हे-हा तो मिस्टर गार्डन न-न-न मुह बन्द मत करो…हमने कितने दात गिन लिए थे ! हां चार-हा--पाच-छ …सात I"

गार्जियन ने मुह बद कर लिया ।

विजय जल्दी से अपनी उगली बाहर खींचता हुआ बोला …"'अरेरे क्या करते हो?"

न सिर्फ दोनों ही बल्कि आसपास खडे सैनिक अफ़सर भी हक्के बक्के रह गए जिन्होंने निक्ट से विजय की हरकत देखी और बकवास सुनी थी-बिज़य उनकी मानसिक स्थिति से बेपरवाह कहता चला गया…“ये तो तुमने वही बात की मिस्टर गार्डन-एक दिन हम अपनी कुतिया के बाल गिन रहे थे…व्रह साली बडी चालू हे…बार बार हाथों से फिसलकर भाग जाती-हमें गिनतिया फिर शुरू से ही करनी पडती-पता ये लगा कि हमारे पडोस में एक कुत्ता रहता है ।"

"म ....... मिस्टर ।"

" यस सिस्टर ।" विजय फिरकनी की तरह तोम्बो की तरफ घूमा ।

तोम्बो बोखला गया ।

सभलकर बोला---" आप मिस्टर विजय ही हैं न? "

"बेशक ॥॥” ऐसा कहने के साथ ही विजय अकडता चला गया ।

" भारतीय जासूस ही न?”

“जी हा I विजय ने गरदन किसी शुतुरमुर्ग की तरह लम्बी कर ली

गार्जियन ने पूछा---"आप बिकास के गुरु ही है न?”

"जी हा I" इस बार कहने के साथ ही विजय ने अपना सारा जिस्म एकदम ढीला छोड दिया-जैसै अचानक ही गुब्बारे की सारी हबा निकल गई हो--चेह्ररे पर रोने के भाव उभरे हिचकिया ले-लेकंर रोता हुआ वह कह उठा----" आपने ये. किस बागडबिल्ले का नाम ले लिया ~ याद आते ही हमारे दिल में रखे गिटार और ताशे बजने लगते है---- आखो की गया जमना मे बाढ आ जाती है-कसम से हमारी आखों मे देखो बोम्बे भाई।"

सभी बौखला गए ।।
 
बिजय सचमुच फूट-फूटकर रो रहा, था-कर्नल तोम्बो की हालत तो उसके मुह से अपना नाम सुनने के बाद बडी ही बिचित्र-सी हो गई थी-अचानकं ही रोते हए बिजय ने उसके क्रधे पर हाथ रख दिया--कर्नल का दिल चाहा कि वह अपना. मुंह ही नोंच ले…रोते हए विजय ने उसके कोट. की ऊपरी' जेब से रूमाल निकाला---रोते हुए ही नाक पर रखा…नाक जोर से सिनकी और जब लबालव रूमाल उसने वापस उसकी जेब में रख दिया तो कर्नल तोम्बो को लगा कि कुछ ही देर बाद वह पागल हो जाएगा-जोर से कहकहे लगाने लगेगा ॥

जाने कैसे गर्जियन नै कहा---"यदि आपकी इजाजत हो तो चलें मिस्टर विजय ..,!॥"

" कहा?" विजय ने रोते हुए .ही पूछा।।

" एयरपोर्ट के बाहर…फियेट आपका इतजार कर रही है ।”

" हमारा इंतजार ?"

" जी हा !"

"तो यहा खडे क्यों है-जल्दी चलो ।" कहने कै तुरन्त बाद वह इतनी तेजी से और इतने ज्यादा लम्बे कदमों के साथ आगे बढा कि एचख पल तक तो वे कछ समझें ही नहीं…हक्के-बक्के से खडे रह गए-अगले पल यानी जब तक उन्हे होश आया तब तक विजय काफी दुर निकल चुका था--वे एकदम विजय` की तरफ लपके-यह कहना ज्यादा उचित होगा कि विजय के पीछे भाग रहे थे वे । बडा ही अजीब दृश्य बन गया था ।

अचानक विजय रुका…जूते की एडी पर ठीक किसी फिरकनी के समान घूमा…वापस लपका-कुछ भी न समझते हुए तोम्बो और गार्जियन जाम हो गए-सांस फूली हुई थी-चेहरों पर अजीब भाव । उनके बिल्कुल सिर पर पहुचकर विजय ने पूछा--" एक बात तो आपने बताई नहीं’ ।"

" क.... क्या?” एक साथ दोनों ने पूछा I

" अपनी प्यारी फियेट किस रग की है…काली या गारी?"

" ज जी-ग्रे क्लर की है।"

"ग्रे कलर की…अरे जाओं भी मिया-अब तुम्हारी ये उमर क्या मजाक करने की हे…हमने एक करोड से कुछ ज्यादा ही लडकिया देखी हैं काली…गोरी-गेहुए रग की-पीली-लाल-लेकिन ग्रे कलर की लडकी कभी नहीं देखी…देखते भी कैसे लडकी ग्रे कलर की हो ही नहीँ सकती।"

" ज..... जी…वह लडकी नही है!"

"चलो मान लिया कि ग्रे कलर की ही होगी…क्या नाम बताया था उसका…फियेट-हा इतना तो बता दो जालिम कि अपनी फियेट डार्लिंग की उम्र क्या है?"

" उन्हें लगा कि वे सचमुच पागल होने वाले हैं l

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" नहीँ-मैँ दावे के साथ कह सकता हूं कि यह आदमी विकास का ~ ~ गुरु हो ही नहीं सकता ।"

एक बन्द कमरे में कर्नल तोम्बो कह रहा था---" कहां विकास और कहा यह-हरगिंज. नही-बिल्कुल नामुमकिन । उसने तो आते ही काम शुरू कल दिया था लेकिन ये तो...॥"

"वे आदमी तो बिल्कुञल बेवकूफ़ है ।" इबलीस कह. उठा ॥

तोम्बो बोला--"बेवकूफ नहीं…पागल है पागल...भारतीय सरकार ने इसे किसी पागलखाने से निकालकर यहां भेज दिया है…ये कुछ नहीं ~ कर सकेगा-जो फियेट को किसी लडकी का नाम समझे…तुम चुप क्यों हो गार्जियन~बोलो~उसके बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है?”

“मेरा ख्याल तुम दोनों से जरा अलग है ।" गार्जियन का गम्भीर स्वर! !

“क्या मतलब? "

"मेरे ख्याल से असल में विजय वह नहीं है जो खुद को पोज़ कर रहा है-मुझे लगता है कि वह सचमुच डबल एक्स फाइव से कहीँ ज्यादा खतरनाक…कहीँ ज्यादा चालाक हैं!"

"लो ।" तोम्बो ने इबलीस से कहा…“इनकी सुनो !"

हसते हुए इबलीस ने गार्जियन से पूछा… "ऐसा तुम्हें क्यों लगा?”

" बस-लगा है ।"

"तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है !"

तोम्बो ने बुरा-सा मुह बनाया ।।

"उसमे कोई विशेषता नहीं है…विशेषता की तो बात ही दूर~वह सामान्य इन्सान भी नहीं है-परले दर्जें का मूर्ख है वह जो किसी के

रूमाल में नाक सिनककर वापस उसकी जेब म रख दे उसे तुम क्या कहोगे?"

"इन्हीं सब बातों से तो लगता है कि वह खुद को पोज़ करु रहा है ।"

"उसने तुम्हें गार्डन-मुझें बाम्बे कहा…वह क्या था?"

"सिर्फ मूर्खता का प्रदर्शन ।”

इबलीस कह उठा--"बात करने तक की तमीज़ तो है नही उसे-- राष्ट्रपति भवन में आते ही मुझसे बोला…"आप काणे कैसे हो गए-क्या आपकी एक आख छिपकली सटक गई है । ”

गार्जियन ने हल्की-सी मुस्कान के साथ. पूछा--"जवाब में तुमने क्या कहा?”

"मैं क्या कहता-जी में तो ये आया कि साले कै मुह पर एक घूसा रसीद कर दू…बस इसी शर्म में रह गया कि भारतीय सरकार ने उसे यहां हमारी मदद के लिए भेजा है…-गुस्से में भुनभुनाता हुआ मैं उसे-देखता ही रह गया…पता है उस वक्त वह क्या कर रहा था?"

“क्या कर रहा था?”

"जीभ निकालकर मुझे चिढाने लगा ।"

सुनकर गार्जियन बरबस ही ठहाका लगा उठा-

तोम्बो बोला…

"यदि इस आदमी के साथ मे दो-चार दिन रहना पडा तो निश्चित रूप से हम पागल हो जाएगे-उसे एयरपोर्ट से यहां तक लाना ही मुश्किल हो गया…काम की एक बात नहीं की उसने-कार में बैठा, सारे रास्ते जाने कहां-कहा की हाकता रहा….विकास ने मजलिस्तान क्री धस्ती पर कदम रखते ही अपना काम शुरू कर दिया था, जबकि इसने अभी काम का जिक्र तक नहीं किया हे, जिसके लिए आया हे…यहां आते ही बोला कि सफर की थकान के कारण नींद आ रही है-सबसे पहले चादर तानकर सोएगा-विकास के तीन घटे खत्म होने में अब सिर्फ तीन मिनट है !"

उसके बाद वह जरूर कोंई बखेडा खडा करेगा ओर हमारी मदद के लिए आए जासूस महोदय बन्द कमरे मे चादर ताने सो रहे हैं ।"

“हमे इसी समय सेमिनार से सम्बन्थ स्थापित करना चाहिए ।" ’

"उससे क्या होगा?"

इबलीस ने कहा-"हमे यहां की पूरी रिपोर्ट उन्हें देनी चाहिए । भारतीय सरकार क्रो ऐसा जासूस भेजने से लगता है कि भारतीय …सरकार असल मेँ यही चाहती है जो बिकास कर रहा है…बल्कि अब तो मुझे ऐसा लगने लगा है कि विकास जो भी कुछ कर रहा है भारतीय सरकार ही करा रही है ।"

" भारत भला ऐसा क्यों कराएगा?"

"क्या विकास के मुकाबले पर ऐसा जासूस भेजने से ऐसा नहीँ लगता? ”

"समझ मेँ नहीं आता…समय गुजर रहा हे…यह जासूस साला हमें मरवा देगा…इसके भरोसे रहे तो हममे से एक भी जिंदा न रहेगा ।"

" तुम ठीक ही कहते हो-सारी रिपोर्ट समेरियन को देकर हमे कहना चाहिए कि यदि कर सकते हैं तो वे ही हमारी कुछ मदद करें,. यहा आया भारतीय जासूस कुछ नहीँ कर सकता ।"

"ऐसा करना पडेगा ।"

गार्जियन कह उठा…“मेरे विचार से आप इस वक्त भी गलत ही सोच रहे हैI"

" तुम ही कछ सही सोच लो ।" व्यग्यात्मक स्वर ।

" यदि अभी तक उसने विकास के बारे मे बात नहीं की है तो हमें बात करनी चाहिए ।"

"वह तो सो रहा है I”

"जगाया जा सकता है ।"

"तुम्ही जगाओ और तुम्ही उससे बात करो…हममें उसके सामने जाने की ताकत नहीं है -उसकी एक-एक बात से ऐसा लगता है जैसे कि दिमाग फटने वाला है ।"

"मेरा ख्याल है कि हम तीनों को ही बात करनी चाहिए !"

"मेरी समझ में नहीं आता कि आखिर हम उस मूर्ख से बात क्या

करे ?”

गार्जियन ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा…"बात करके देखते हैं…यदि इस बार भी उसने वैसी ही ब्राते की तो फिर सोचेगे I"

कर्नल तोम्बो जरा-सा मुह बनाकर रह गया I

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“ये हम बोल रहे हैं प्यारे । विजय ने लांकिट रूपी ट्रासमीटर पर कहा------विजय दी ग्रेट-तुम्हारे गुरु यानी अब जल्दी से हो जाओ शुरू I"
 
दूसरी तरफ़ से विकास की आवाज…"ओह-मैं जानता हू गुरु कि आप राष्ट्रपति भवन पहुच चुके है किसी भी क्षण रक्त तिलक के सदंस्यों की दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं I”

"तब तो प्यारे तुम्हें यह. भी पता होगा कि हम यहा क्यों आए हैं?"

“जानता हू ।” सपाट स्वर-“लेकिन साथ ही प्रार्थना है गुरु कि जिस तरह आए हैं उसी तरह लोट' भी जाए । मैंने इस मुल्क को आजाद

कराने की कसम खाई है।"

" तो हमने यह कब कहा मेरी जान कि तुम अपनी कसम पूरी न करो !"

"क्या मतलब !"

" मतलब गया तेल लेने-ये बताओ कि कब कहा ओर कैसे मिल ~ रहे हो?"

चौंका हुआ स्वर…"क्या मतलब-आप मुझें रोकने और यहा से गिरफ्तार करके भारत ले जाने के लिए ही तो आए हैं न?"

" आए तो तुम भी सिर्फ डॉक्टर के लिए ही थे?”

"मैं समझा नही ।"

" बात बिल्कुल सीधी है प्यारे दिलजले-हमारे मुल्क की सरकार

भी इसी के पक्ष मेँ है जो तुम कर रह हो…इसमेँ शक नहीं कि भारत किसी भी बडे मुल्क का किसी भी छोटे मुल्क में इस किस्म कै हस्तक्षेप का समर्थन नहीं कर सकता किन्तु मामला क्योंकि सेमिनार का है,इसलिए खुलकर राष्ट्रिय स्तर पर विरोध भी नहीं किया जा सकता l उससे अन्तर्राष्ट्रिय जगत में हमारी स्थिति बडी हास्यास्पद हो जाएगी । मुझे इस बहाने कै साथ यहा भेजा गया है कि तुम्हें रोकू मगर असल में मेरा काम तुम्हें रोकना नहीं बल्कि जो तुम क रहे हो उसमे तुम्हारी मदद करके प्रकिया तेज करना है I"

"क्या आप सच बोलं रहे हैं क्या?" हैरत भरा स्वर॥

" सत्यवादी हरिशचंद्र कै बाद उस गुणों से सम्मान सिर्फ हम ही पैदा हुए हैं प्यारे I”

दुसरी तरफ खामोशी छा गई-विजय किसी जवाब की प्रतीक्षा में था ।

इस चुप्पी से वह अन्दाजा लगा सकता था कि उसकी बात ने विकास के दिमाग पा हमला किया है…गर्मं लोहे पर चोट करने के दृष्टि क्रोण से उसने पूछा-"क्या बात है प्यारे-मौन व्रत रख लिया है क्या?"

" अंकल ?"

"बोलो मेरे लाल ?"

"मुझे यकीन नहीं कि आप जो कह रहे है ....॥ "

"बुरी बात ।" विजय ने उसकी बात बीच में ही काटकर कहा…"अच्छे बच्चों क्रो बुजुर्गो' की बात पर यकीन करना चाहिए-बैसे भी हम तुम्हारे अकल ही नहीँ गुरु भी हैं।"

" मैं आपके इन लटको-झटकों में फंसने वाला नहीँ हूं अकल ।" . .

विजय ने तुरन्त कहा--"तो फिर वो भी बता दो प्यारे जिनमें फ़सने वाले हो ।"

"मैं जितना अपने मुल्क क्रो जानता हूं उतना ही आपको भी जानता हू गुरु-मैं आपकी नस-नस से वाकिफ़ हू-आप मुझे धोखा नहीं दे सकते. ।"

" अब तुम ज्यादा होशियारी दिखा रहे हो प्यारे और इसीलिए धोखा खा रहे हो ।”

"ऐसा ही सही गुरु I” अचानक ही विकास का स्वर निर्णायक हो गया था--!यदि आप सच बोल रहे हैं तो मैं यह क्रहूगा कि मुझे आपकी किसी मदद की जरूरत नहीं है…जो मैं कर रहा हूं उसे तेज प्रक्रिया से अकेला ही कय सकता हू…आप भारत लौट जाए और यदि झूठ बोल रहे हो तब भी मैं आपको भारत लौट जाने की ही सलाह दूगा क्योंकि मैं नहीं चाहता कि आने वाले समय में मजलिस्तान की सडकों पर गुरु और चेले का टकराव हो ।"

"अब प्यारे जब हम आ ही गए हैं तो बिना कुछ किए लोटने वाले नहीं ।”

"तब तो मै यही समझूगा कि आप मुझें गिरफ्तार करने आए है ।"

"तुम्हारे कुछ भी सोचने से हमारी सेहत पर फ़र्क पडने वाला नहीँ है बेटे ।" अपनी पहली चाल बेअसर होते देख विजय सीधी भाषा मैं बात करने लगा--!यह सब कुछ तुम जिस तरीके से कर रहे हो उससे भारत की साख. गिरेगी और हम किसी भी हालत पे ऐसा नहीं होने देंगे फौरन, या नो खुद को हमारे हवाले कर दो या भारत लोट जाओ!"

“अब आप खुलकर आ रहे हैँ अंकल I" ब्यायात्मक स्वर ।

" आना पडा प्यारे…तुम दिमाग से बिल्कुल पैदल हो-भारत की प्रतिष्ठा का बिल्कुल ख्याल नहीं हे तुम्हें…यदि तुम बेवकूफिया करने लगो तो वे तुम्हें करने नहीं दी जाएगी-याद रहे अगर तुमने इबलीस सरकार या सेमिनार की सेनाओ के विरुद्ध कुछ भी किया तो हमसे वुरा कोई न होगा ।"

ज़हर में भरा कटु स्वर…"अपने गुरु क्रो जालिमो की तरफदारी करते पहली बार देख रहा हू अकल ।"

"हम जासूस हैं प्यारे…हमे यह सोचने का कोई हक नहीं है कि हम बदी का साथ दे रहे हैं या नेकी का-हमें सिर्फ वही ,करना होता है जिसका आदेश हमारा मुल्क दे-हमारे अधिकारी दें I”

" हम इसान भी तो हैं अंकल ।"

“जासूस इसान को नहीँ-एक मशीन को कहते हैं प्यारे दिलजले I"

"जासूस से पहले हम इंसान हैँ गुरू।"

" तुम्हारे जैसे विचारों का कोई व्यक्ति कभी अच्छा जासूस नहीं हो

सकता ।"

आवेश में बिकास कहता ही चला गया…" यदि यह सच है तो न मै कभी. जासूस था और' न ही आगे जासूस बनना चाहता हूं-मैं हसान हू अंकल…-विकास आपकी तरह पत्थरदिल नहीं हो सकता…कराहती हुई इन्सानियत्त को-नज़र अन्दाज नहीं कर सकता बिकास…"मैं हमेशा कमजोरों की तरफ़ से लड़ा हूं…आज भी लडूगा--यह युद्ध शुरू करने से पहले ही मैं जानता था कि मेरा टकराव अपने मुल्क से हो सकता है--आपसे हो सकता हे-मैं नेकी के लिए लड रहा हू अंकल-इसकै लिए यदि मुझे अपने मुल्क और गुरु से भी टकराना पडे तो मैँ पीछे नहीं

हटूगा-यह युद्ध नहीं धर्मयुद्ध है गुरु…जानता हू कि टकराव आपसे हे-यानी इस धर्मयुद्ध में मैं अपनी जीत हार का दावा पेश नहीं कर सकता-हार-जीत की परवाह भी नहीं है मुझे-हा', यह तय है कि यदि आप सामने से नहीं हटे तो यह धर्मयुद्ध होकर रहैगा-इस मुल्क के बेगुनाह बेजुबान अवाम की कसम गुरु-विकास इनके लिए जान की वाजी लगा देगा-बिकास इनके लिए मर भी सकता है और अपने गुरु क्रो मार भी सकता हे !"

“तुम पागल हो गए हो विकास ।" विजय चीख पडा I

“हा-हा-मैं पागल हो गया हू अकल।” बिकास आपे से बाहर होकर चीख पडा…"हैरत इस बात की है कि मजलिस्तान की. हालत . देखकर आप पागल क्यो नही हो गए?"

"ऐसा क्या हो रहा है यहा…हमे तो कुछ नहीं दिखता ।"

“ओह-तो अंधे हो गए हैं आप…आपको कुछ दिखता ही नही हे…दिखेगा भी क्यों-अपनी आखों पर आपने स्वार्थ की पट्टी जो वाध ली है-उसे उतारिए अकल और यदि न उत्तार पाए तो अपने बेटे की आखो में देखिए---मजलिस्तान में सेमिनार का जगी हवाई अड्डा वन रहा है-उससे क्या होगा यही न कि युद्ध के बादल भारत के आसपास मडराने लगेगे I”

"वह अड्डा हमारी सुरक्षा करेगा बिकास I”

"थू गुर थू है आप पर…मैने कभी यह सोचा भी नही था कि आप इतने स्वार्थी हो सकत्ते हैं ।" कहने कें तुरन्त बाद दूसरी तरफ से विकास ने सम्बन्ध विच्छेद कर दिया-क्नेक्शन. झटर्के. के साथ काटा गया था…विजय यह अनुमान लगा सकता, था कि ट्रांसमीटर' आफ

करते समय विकास की मानसिक स्थिति क्या रही होगी…सूं-सूं करते

हुए लॉकिट रूपी नन्हे ट्रांसमीटर को घूरता हुआ विजय हल्के से गुद्दी खुजाता हुआ बडबडाया.-"तुमने कुछ सोचा हो या न सोचा हो प्यारे दिलजले लेकिन जो कुछ सोचकर हमने ट्रासमीटर पर तुमसे इतनी लफ्फाजिया क्री थी वह पूरा हो गया है…अब हम दावे के साथ वह सकते हैं कि तुम अपने दिए हुए समय के खत्म होते ही सबसे पहले क्या करोगे।"

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कर्नल तोम्बो और गार्जियन के आदेश पर दस्तक इवलीस ने दी I

वड़े ही सलीके से शिष्टाचारपूर्वक विजय के कमरे का बन्द दरवाजा खटखटाया था उसने-किन्तु अन्दर की तरफ से उन्हें किसी प्रकार की हलचल की आवाज सुनाई नहीं दी-इबलीस ने प्रश्नवाचक दृष्टि से तोम्बो और गार्जियन की तरफ देखा ।

उन्होने पुन: दस्तक देने का सकैत किया ।

दस्तक पुन: दी गई-कोई असर नहीं और जब ऐसा कई बार हो चुका तो.......फिर सारे सलीके और शिष्टाचार ताक पर रखकर दरवाजा जोर-जोर से खटखटाया जाने लगा-इस पर भी जब दरवाजा न खुला तो न सिर्फ. इबलीस का ही, बल्कि उन दोनों. के दिल भी धक-धक करने लगे…उन्हे लगा कि कमरे के अन्दर बिजय है ही नहीँ-अब वे भी दरवाजे कौ तोड डालने के…से अन्दाज में पीटं रहे थे।

फिर अचानक ही एक झटके के साथ दरवाजा खुला ।

" हैंडस अप I एक रोबीली आवाज ।

हडबडाकर एक साथ तीनों ने हाथ ऊपर उठा दिए…ठीक सामने हाथ . में रिवॉल्वर लिए विजय खडा था-

उसे देखते ही वे तीनों पसीने-पसीने हो गए,. जबकि उन्हें देखते ही विजय ने चौंकने की खूबसूरत एक्टिग करते हुए कहा-'"अरे-ये तो आप लोग हैं । अगले ही पल वह रिवाॅल्बर अपनी जेब में रख रहा था ।

उलझे से गार्जियन ने पूछा…“इस हरकत का क्या मतलब मिस्टर विजय?"

" हमारी किसी हरकत का कोई मतलब नहीं होता प्यारे गार्डन ।"

“ज..... जी?”

" हमने समझा था प्यारे कि साले रक्त तिलक वाले यहा पहुच गए हैँ…वे ही इस बुरी तरह हमारा दरवाजा पीट रहे हैं-सोचा कि देखें सालों को…इसीलिए झट से दरवाजा खोलकर रिवॉल्वर तान दिया था…आप लोग निकले-यदि वे होते तो इस वक्त यहा उनकी लाशें पडी होतीं ।"

"म…मगर वे यहा कैसे पहुच सकत्ते हैँ मिस्टर विजय ।"

" भले ही न पहुच सकते हों लेक्रिन हम जासूस हैं !" अचानक ही , . विजय अकड. गया…सारे जिस्म में ,तनाव था…सीना चौडा…गर्दन अकडी. हुई…पलकें झपकाता हुआ वह ऐसे मुर्खं जासूस क्री तरह बोला जो खुद क्रो बहुत तेज एव खतरनाक समझता हे…"जासूस क्रो हर क्षण सावधान रहना पडता हे…आखें खुली रखनी पडती हैं…यदि हम ऐसा न करें तो जाने कब के टाय-टाय-फिस हो जाते…क्यों गार्डन भाई हमने सोलह आने ठीक कहा है न?"

" जीहा ।"

कर्नल तोम्बो ने व्यग्य भरी मुस्कान गार्जियन की तरफ उछाली और फिर उसी मुस्कान के साथ विजय से ब्रोला…"'तो यह सब कूछ आपने सतर्कता के नाते किया था?”

"जी हां।'"

सन्नाटा छा गया ।

बिजय ने ही पूछा-“मगर हमने कहा थी कि फिलहाल मा बर्दोलत महाराजाधिराज सफर की थकान मिटाने के लिए आराम फ़र्मा रहे हैं । फिर आपने दखलअन्दाजी करने की जेहमत क्यों उठाई?”

" आपसे कुछ जरूरी बातें करनी थीं मिस्टर विजय ।" गार्जियन ने कहा ।

विजय तुरन्त बोला-" तो जरूर करो गार्डन प्यारे ।"

"क्या सारी बातें यही खडे-खडे होंगी-आप हमें अन्दर आने के लिए नही कहेंगे?"

बडे ही मूर्खतापूर्ण अन्दाज में कहता हुआ विजय पीछे. हटा…"यदि आप आना ही चाहते हैँ त्तो जरूर आइए मैं आपको रोक भी कैन्से सकता हू!"

वे अन्दर दाखिल हो गए-इबलीस और तोम्बो के चेहरों मर झुझलाहट के भाव थे जबकि गार्जियन के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान । विजय के साथ ही वे तीनों भी कमरे में पडे सोफा सेट पर बैठ गए I

विजय ने पूछा--"कहिए क्या बात करना चाहते थे?”

"उसी विषय पर जिसके लिए आप यहा' आए हैँ!"

" ओह यानि अपने दिलजले के बारे में?"

"दिलजला ??"

"हां प्यारे…तुम्हारे बिकास या डबल एक्स फाइव को हम दिलजला ही कहते हैँ-खेर हा तो शायद आप लोग हमारे पास उसकी कोई शिकायत लेकर आए हे…बोलिए, क्या किया उस बदतमीज ने…हम उसके कान उखाडकर नाक की जगह और नाक उखाडकर कान की जगह लगा देंगे ।"

"उसके द्वारा दिए गए समय को खत्म होने में सिर्फ बीस मिनट रह गए हैं ।"

विजय ने बुरा-सा मुह बनाकर लापरवाही के साथ कहा-"रहने दो…अपने बाप का क्या जाता है?"

तोंम्बो और इबलीस की धारणा तों यह बन ही गई थी कि विजय प्रथम दर्जे का मूर्ख है,,

कम-सें-कम अपने सबाल के जवाब में उपरोक्त वाक्य की आशा गार्जियन ने भी नहीं की थी…-उसे लगा कि कहीँ विजय कै बारे में सचमुच इबलीस और तोम्बो की धारणा ही तो ठीक नहीं है…फिर भी उसने शीघ्र ही स्वयं को संभालकर कहा…"समय खत्म होने पर वह क्या कुछ करेगा I" »

"क्या करेगा?"

"कोई बखेडा ।"

“कैसा बखेडा ?"

" वही तो हम सबको आपस में बैठकर सोचना है-आखिर वह क्या कर सकता हे-आप उसे रोकने के लिए आए हैँ-हम यह जानना चाहते हैं कि आप उसे कुछ भी करने से रोकने के लिए क्या कर रहे ?”

" पहले उसे कुछ करने तो दो प्यारे-रोकेंगे तो तभी?”

" उसे रोकने के लिए सबसे पहले हमें यह सोचना चाहिए कि वह

क्या कर सकता है?"

जाने क्यों विजय ने स्वय ही लाइन पा आते हुए कहा-"सबसे पहले वह मजलिस्तान में बन रहे सेमिनार के जगी हवाई अड्डे को ध्वस्त करेगा।"

"ज जी ।" एक साथ तीनों उछल पडे ।

विजय ने उसी स्वर में कहा-"जी...हा ।"

"ऐसा _आप कैसे कह सकत्ते हैं? "

" बस-कह सकते हैँ ।" विजय ने हाथ नचाया--" हमारी मर्जी । हम पहुचे हुए भविष्यवक्ता हैँ-देख लेना-अपना दित्तजला सबसे पहले उस हवाई अड्डे का ही तीया-पाचा करेगा !"

"यदि यह सच हे तो आप उसे रोकने के लिए क्या कर रहे हैं I”

सपाट उत्तर--"क कुछ भी नहीं ।"

" जी-क. क्यों नहीं?” गार्जियन हडबडा गया-“मेरा मतलब जव हमे उसके अगले कदम के बारे में जानकारी है तो उसे रोकने के लिए हमे कुछ-न-कछ तो करना ही चाहिए ।"

"बिल्कुल करना चाहिए-आप लोग जो कर सकते है कर ले हम कुछ नहीं करेंगे I"

" क्यों ?"

"ज...जी-हम समझे नही ।"

"तुम तो अभी बच्चे हो मियां-हमारी बाते बड़े-बडे बुजुर्गों की समझ नही आती !"

"तुम तो अभी बच्चे हो मियां-हमारी बाते बड़े-बडे बुजुर्गों की समझ में नहीं आती…सीघी-सी बात है कि तुम लोगों के पास जितनी भी ताकत है उस अड्डे पर लगा दें और यह आदेश भी दे दे कि दिलजले को देखते ही उसे गोलियों से भून दिया जाए l "

"म मगर-ऐसा नहीं हो सकता मिस्टर विजय । "

"क्यों नहीँ हो सकता?”

"क्योंकि विकास के पास बैन है…वंह और उसके साथी हमेशा उस वैन मे बन्द रहते हैं…जब तक वह वेन' उनके कब्जे में है, तब तक उनकी सूरत तक नहीं देखी जा सकती, हमारी कोई भी ताकत उन्हें . रोक नहीं सकती-वैन लेकर वे पूरी-की-पूरी फौजों मेँ घुस सकते हैं…अपना काम करके निकल सकते हैं-दुनिया की कोई, भी ताकत उस वेन का कुछ नहीँ बिगाड सकत्ती l "

" बैन !" विजय की आखें सोचने के अन्दाज में सिंकुड गई बोला…“कैसी वैन? ??"

ज़वाब… में वे तीनों उसे वेन के बारे में सब कुछ बताने लगे, उनकी` . विशेषताएं आदि…यह भी कि वह वेन बिकास के हाथ कैसे लगी । सुनते-सुनते सचमुच बिजय की पेशानी पर भी चिन्ता की लकीरें खिच गई, मगर अगले ही पल, उसने खुद को संभाल लिया…अब वह चेहरे से पुन: पूरी तरह लापरवाह और बेवकूफ नजर आ रहा था, जबकि…हकीकत. यंह थी कि वेन के बारे में सुनकर वह प्रेरशान हो उठा था ।

_ ट्रांसमीटर पर अपने ढग से उसने विकास को उत्तेजित करके यह पता लगा लिया था कि वह कहा हमला करने वाला है-बस वही पहुचकर उसने विकास से टकरा जाने का निश्चय कर लिया.… था ।

उसे यकीन था कि विकास को काबू कर सकेगा ।
 
किन्तु वेन के बारे मे सब कुछ सुनने के बाद उसे सचमुच चिन्ता हुई…समझ नहीं सका कि ऐसे हालात में वह विकास को केसे रोक सकेगा?

अचानक ही वह उन तीनों से बडे ऊटपटांग सबाल करने लगा…वे सबाल उनकी नजर में उटपटाग ही थे किंतु विजय के लिए महत्वपूर्ण-जवाव उन्हें हर सवाल का देना पड रहा था ।

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जब विजय कै पास कहने के लिए सवाल भी खत्म हो गए तो वह चुप रह-गया-उसके हर सवाल का ज़वाब देते रहने वाले गार्जियन ने पूछा---- "आप क्या सोचने लगे मिस्टर विजय?"

. "न ....नही-कुछ नहीं हो सकता । बुरा सा-मुह बनाकर विजय ने निराशजनक ढग से सिर हिलाया ।

"क कुछ तो कीजिए मिस्टर विजय-आप इसीलिए तो यहा आए हैं ।"

" हो ही क्या सकता है ?"

अभी गार्जियन ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था कि बदहवास-सा भागता हुआ एक मेजर कमरे में प्रविष्ट हुआ बोला… "ग... गजब हो गया सर-वेन फिर राजधानी की सडकों पर आ गई है…पता नही इस बार क्या होगा-वे अन्धाघुन्ध गोलिया चला रहे हैं।"

" उफ्फ I" गार्जियन झुंझला उठा…"कुछ करो मिस्टर विजय ।"

विजय अपने उसी मूर्खतापूर्ण अंदाज में कह उठा~"मुझे फोरन कम-से-कम पचास मजदूरों की जरूरत है~ह्रष्ट पुष्ट फावडों ओर कुदालो के साथ ।"

" उससे क्या होगा?”

"बताने का समय नहीं है प्यारे-यदि इन्तजाम कर सकते हो तो तुरन्त करो ।"

"ओफ्फो-इस समय मजदूर क्या करेगे?"

अन्त में झुझलाकल कर्नल तोम्बा चीख ही पडा-"ये आआदमी तो सचमुच पागल है गार्जियन, यदि हम इसके भरोसे रहे तो सब कछ खत्म हो जाएगा ।"

उसकी बात पर कोई ध्यान न देकर विजय ने गार्जियन से कहा--"मुझ मजदू चाहिए-फौरन ।"

"मिल जाएगे' ।"

"दो शक्तिशाली मैग्नेट ।"

"वे भी मिल जाएगे' I"

"इसके अलावा मुझें फूस चाहिए-ढेर सारा सूखा फूस I"

"फ फूस?" गार्जियन की खोपडी धूम गई ।

"हा-वही फूस जो झोंपडिया आदि बनाने कै काम आता है 1 बिल्कुल सूखा-कम-से-कम तीन ट्रक-बोलो---" क्या तुम केवल तीस मिनट कै अन्दर इन्तजाम कर सकते हो?"

"हो जाऐगा…लेकिन. . . ।"

"लेकिन को छोडो प्यारे…यह शब्द हर बात को कतुबमीनार की तरह लम्बी कर देता है…इस सबके अलावा हमे एक हैलीकॉप्टर की जरूरत पडेगी ।"

"ओफ्फो-हैलीकॉंप्टर से क्या हो सकता है-एक मशीनगन की नाल हमेशा वेन की छत से बाहर झाकती रहती हे-वेन के ऊपर चकराने,.बाले किसी भी बिमान या हैलीकाप्टर` क्रो वे एक पल में.....!"

"उस बात को छोडो प्यारे कि किस चीज से क्या हो सकता है और क्या नहीं…सिर्फ यह बताओ कि केवल तीस मिन्स्ट. के अन्दर इतना सब इन्तजाम हो सक्ला है या नहीं?" . . .

“इन्तजाम तो हो जाएगा ।"

"तो फौरन करो प्यारे गवाने के लिए समय नहीं हे…-ओर सूनो अपनी सेना को हुक्म दो कि वे हवाई अड्डे पर वेन का पूरा विरोध करें…भले ही कोई नतीजा न निक्ले लेकिन पोजीशन लिए हुए ही उन्हें देन पर निरंतर गोलीबारी करते रहना हे ।"

"ठीक है ।"

"राजधानी में तुरन्त कर्फ्यूं लगा दो-रेडियो के अलावा चार-पांच जीपों द्धारा सारी राजधानी मैं ऐलान करा दो-अनिश्चित काल के लिए कर्फ्यूं लग गया है-क्रोई अपने घर से बाहर न निकले ।"

"म मगर ।"

उनकी एक भी सुने बिना विजय अपने आदेश जारी करता रहा ।

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जगी हवाई अड्डे का निर्माण अभी अधूरा ही था…कस्ट्रक्शन चल रहा था-पूर्ण होने में काफी समय लगना था । इमारत भी अभी अधूरी थी-एक रनवे पूरा बन चुका था ।

उस पर विमान लेण्ड किया जा सकता था ।

शेष रनवे अभी निर्माधीन थे ।

दो हेगर भी बन चुके थे-उनमें दो लडाकू विमान खडे थे… उनकें अतिरिक्त तीन विमान और थे जो कि आकाश के नीचे खुले मेदान मे खडे थे ।

स्वाभाविक-सी बात है कि इस अधूरे जगी हवाई अड्डे के चारों तरफ कडा पहरा था…चपे-चपे पर किसी भी खतरे का मुकाबला करने के लिए सेमिनेरियन सेना रहती थी।

जेसे ही बहा खबर पहुची कि वेनधारी विकास और रक्त तिलक के द्वारा इस अड्डे क्रो ध्वस्त करने की सम्भावना हे-वेसे ही वहा सनसनी-सी दौड गई l

सच्चाई यह है कि प्रत्येक सैनिक काप उठा ।

वहा तैनात अफसर. क्राप उठे ।

किन्तु-ज्वानों के लिए चुकि अपने अधिकारियों का आदेश ही सव कुछ होता है इसलिए वेन से टकराने कै लिए तैयारिया की जाने लगीं जो वे कर सकते थै । तेंयारिया बडी तेजी कै साथ शुरू हो गई थीं-परंतु सैनिक से लेकर' बड से बडे अफसर तक में भी मनोबल नहीं था…सब यही सोच रहे थे कि उनकी इन तैयारियों से होगा क्या ?” वेन रूकने .वाली तो है नही। फिर उन्हें कर्नल तोम्बो की तरफ़ से यह आदेश मिला कि भले ही वेन को कोई क्षति न पहुचे परन्तु उस पर गोलीबारी निरंतर की जाती रहे ।

यह आदेश सुनने के बाद तो वहा तैनात सैनिकों को ऐसा लगा कि उनके अफसरो का दिमाग खराब हो गया है…मानसिक स्थिति ठीक

नहीं है उनकी।

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बिकास के रेडियो पर बोलने के बाद से सारी राजधानी मे आतंक-सा छा गया था…सेमिनेरियनों और इबलीस सरकार के समर्थकों के चेहरे तो पीले पड ही गए थे-आम रियाया यानी इबलीस सस्कार के विरोधियों के चेहरों पर इस आशा के कारण चमक जरूर थी ,कि शायद विकास उन्हें सास लेने के लिए आजादी की हवा प्रदान करेगा-क्रिन्तु ऐसा होना उन्हे आसान नहीं लग रहा था ।

उनका अनुमान था कि राजधानी की सडको पर जमकर जग होगी ।

उसी भावी जग के कारण सारी राजधानी में आतक-सा व्याप्त होता चला गया था-सभी जान गए थे कि जो होगा-तोन घण्टे बाद होगा I

सभी ने अपने-अपने घरों की तरफ दौड लगा दी थी ।

जितने मुंह उतने ही अनुमान--अफबाहे ।

फिर…यह समाचार भी फैला कि 'विकास को रोकने के लिए इबलीस सरकार ने भारत से एक और जासूस को बुलाया है और वह जासूस विकास का गुरु है । तीन घटे यानी दिया हुआ समय समाप्त होते होतें राजधानी की सडकों पर से आम आदमी लगभग गायब हो गए…सभी अपने घरों में जा छपे थे।।

सडकों पर सिर्फ सेमिनेरियन और इबलीस के वफादार सैनिक ही नजर आ रहे थे l स्वय ही एक अजीब-सी दहशत फैलती चली गई--

मकानों के मुख्य द्धार बद हो गये ।

कोई इक्का-दुक्का ही ऐस्रा साहसी था जो अन्तिम क्षणों में भी सडक पर नजर आ रहा था ।।

हा…गली-र्मोहल्लो में नुक्कड सभाए, जरूर ही रही थीं ।

मुख्य सडकों पर रहने बाले-लोग अपनी बालक्रनिर्यो या छतों से . सडकों को इस तरह जरूर धूर रहे थे जैसे कि वहा कोई तमाशा होने जा रहा हो ।

सभी अपनी-अपनी अटक्ले लगा रहे थे ।

लोगों का ख्याल था कि विकास~ इबलीस सरकार और उसके आकाओं को हिलाकर रख देगा--

कुछ थोडा समझदार . समझने वाले लोग कह रहे थे क्रि-बिकास कुछ भी कर ले किंन्तु सेमिनेरियन सेनाओं के पजे इस मुल्क से नहीं उखड़ सकेंगे ।

अखिर मामला पूरे एक देश का है,, विकास क्या कर सकेगा।

मगर यह सवाल सभी के दिमागों में था कि तीन घण्टे खत्म होने के बाद विकास आखिर करेगा क्या-फिर बिकास द्वारा दिए गए तीन घण्टे भी खत्म ।

हवा उडी कि वेन सडक्रो पर पहुच चुकी हे l दहशत फैल गई ।

फिर पहले रेडियो पर और उसके बाद राजधानी की सडकों पर दनदनाती हुई, सेनिक जीपो के माध्यम से कर्फ्यू का ऐलान किया गया ।

आतंक और ज्यादा फैला । नुक्कड़ सभाए' खत्म' I लोग बाल्कनी और छत्तों से भी गायब ।।

हरेक को यह जानने की जिज्ञासा थी कि राजधानी' की सडकों पर आखिर हो क्या रहा है?

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वैन पूरी रफ्तार से उडी चली जा रही थी I

लिखने की आवश्यकता नहीं कि ड्राइविंग सीटपर विकास था उसके बराबर मे ही बन्धनों में जकडा ड्राइवर पडा था…इस वक्त वह होश मे था किन्तु स्वेच्छा से हिल तक नहीं सकता था ।

पिछले भाग में पूरे आठ व्यक्ति थे ।

मेजर हाशमी-करीभ चाचा-सुल्तान-रहीम-मुमताज और तीन अन्य युवक ।

सभी ने एक-एक गन सभाल रखी थी-प्रत्येक अपनी गन से सम्बद्ध कुर्सी पर बैठा था-दृष्टियां उस स्क्रीन पर स्थिर थीं जिसपर वेन के हर तरफ़ का दृश्य मौजूद था ।

स्कीन पर कही भी कोई इसान नहीं था ।

फिर भी…अपने चारों तरफ गोलिया बरसाती. हुई वैन सडक पर दोड रही थ्री-ड्राइविंग सीट पर बैठे विकास के जबडे कसे हुए थे I

जाली के पार वह अपने सामने फैली सडक को दूर-दूर तक देख ,सकता था…वेन के अगले भाग से तीन गने बाहर निकली हुई थी ।

एक छेद था किन्तु गन नहीं ।

वेन अपने आगे गोलिया बरसाती चली जा रही थी-विक्रास को सडक पर दूर सैनिक नज़र आते किन्तु गनों की रेंज में आने से पहले ही इधर-उधर भाग जाते । ~

अत बिकास को रास्ता साफ ही मिलता था ।

वह उस तरफ बढ रहा था जिधर सरदार के मुताबिक सेमिनार के जगी हवाई अड्डे का निर्माण हो रहा था…वेन एक मोड पर घूमी काफी वडा चौराहा पार किया और फिर-दुर तक सीधी एक सडक पर दौडती चली गई-वैन कै मुडत्ते ही दाईं तरफ से आधी की तरह दो ट्रक उस मोड पर रुके जिसे वैन पार चुकी थी।

सबसे पहले उनमे से एक ट्रक से विजय सडक पर कुदा --फिर-झटपट हाथों में कुदाल और फावडे लिए मजदूर कूदने लगे…इन मजदूरों के बीच सेमिनेरियन सेना का एक कैप्टन भी था विजय ने उसी से कहा--- "यहीं I”

kiran

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203

"ओ के !" मेजर जल्दी से बोला I

"ध्यान रहे…मोड घूमने से पहले नजर नही आना चाहिए I "

" आप फिक्र न करें…ऐसा ही होगाl"

तभी व्रहा एक जीप आकार रूकी-विजय झपटकर जीप मेँ समा गया ।

जीप तेजी से उस तरफ दौड ली जिस तरफ़ वैन गई थी---सारा काम यू हो रहा था जैसे सबको अपना काम रटा हुआ हो l

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सारे रास्ते वेन पर कहीं भी फायरिंग नहीं हुई थी…रास्ता एकदम साफ ही मिला था-किन्तु निर्माणाधीन हवाई अड्डे के समीप पहुचते ही एक तरफ से गोलियों की बाढ़-सी वेन पर झपटी, कोई क्षति नहीं ।

वैन से बाहर झांक रही गनों ने भी उस तरफ आग बरसाई किंतु सभी गोलियां उस आधी बनी हुई दीवार से सिर पटककर रह गई ।

जिसके पीछे से फायरिग हुई थी।

हवाई अड्डे की इमारत का मुख्य द्वार बद था ।

विकास ने वेन रोकी-अपने सामने दुर-दूर तक वह पोजीशन लिए सेनिर्कों को देख सकता था…वह ऊची आवाज मेँ बोला-"मेरे दिए हुए तीन घटे खत्म हो चुके हैं…मैँने कहा था कि यदि तीन घटे के अदर सेमिनार के सैनिकों ने यहां से कूच करना शुरू नहीँ किया तो फिर हम जो कर का जाएं, वह कम ही होगा-हमारी चेतावनी पर … . आप लोगों ने ध्यान नहीं दिया-अत-अब हम जग का ऐलान करते हैं…यहां बन रहे इस जगी' हवाई अड्डे से हमारी जग शुरू होती है…किसी मुल्क की घरती पर 'किसी भी दूसरे मुल्क का जगी अड्डा एकदम नाजायज है और सबसे पहले हम इसी क्रो नष्ट करके जग' का ऐलान करते हैं । बिकास की आवाज काफी दुर-दुर तक गूंज गई । उसे उम्मीद थी कि जवाब में किसी तरफ से विजय की आवाज़ गृजेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ…चारों तरफ खामोशी छाई रही-जाली के पार विकास को जितना भी हिस्सा चमक रहा' था; उसके चप्पे-चपे को विकास ने घूरा किंतु विजय कहीँ नजर नहीं आया ।

अब-उसने वैन फाटक की तरफ बढाई । फाटक पर पहुचते पहुचत्ते वेन पर चारों तरफ से गोलिया बरसने लर्गी । वैन स्वयं भी अपने चारों तरफ गोलिया बरसा रही थी…

फाटक टूटा…दनदनाती वेन अदर ।

अब…मशीनगनो की तडतडाहट, से सारा वातावरण कापने लगा ।

लवे चौडे मैदान में जाकर वेन धूमी…जिस क्षण वह घूम रही था ठीक उसी क्षण पिछला शटरनूमा दरवाजा एक पल के लिए ऊपर उटा-फिर खट से बंद हो गया मगर इस एक पल के बीच ही कोई गेंद जैसी वस्तु वैन के अदर से निकलकर हवा मे चकराईं ।

एक दीवार से जा टकराई वह ।

जबर्दस्त घमाका-कर्णभेदी विस्फोट।

दीवार के परखच्चे उड गए…बारूद में झुलसती आग में मलबा तो था ही उन इसानों के जिस्म भी थे जिन्होंने खुद को उस दीवार की बेक में छुपा रखा था ।

वेन उस तरफ बढ गई जिधर रनवे…हेगर और विमान थे ।

आदेशानुसार वेन पर अब भी चारों तरफ़ स गोलिया बरस रही र्थी-मगर हो सिर्फ वही रहा था जो वेन चाहती थी-उसके अदर मोजूद रक्त तिलक के लोग चाहते थे ।

सेमिनेरियन सैनिक अपना गोला-बारूद जलाने से ज्यादा कुछ नहीं कर सके I जो काम वेन से निकलने वाली गोलिया नहीं कर सकती थीं वह रक्त तिलक के हेडग्रेनेड करते-पल भर के लिए शटरनुमा पिछला दरवाजा खुलता…एक्र बम अपने लक्ष्य पर झपटता और दरवाजा बद हो जाता ।

हेगर धू धू करके जल उठे ।

उनमे खडे विमान भी आग की लपटों में घिर गए ।

हवाई पट्टी जगह-जगह से टूटकर बिखर गई…मैदान में खडे बिमान भी सुलग रहे थे…सारी इमारत खंडहर में बदल गई…बनने से पहले ही । ,

चारों तरफ आग-ही-आग नजर-आ रही थी ।

अधूरा हवाई अड्डा मलबे के बहुत बड़े ढेर में बदल गया-हा यह सब कुछ होने में पैंतालीस मिनट जरूर लगे थे-इस सारे वृत्तात्त को विस्तारपूर्वक इसलिए नहीं लिखा जा रहा है, क्योंकि सारा खेल एकतरफा था…
 
वेन पर गोलियां बरसाने के अलावा अन्य किसी किस्म का विरोध नहीँ हुआ और गोलियों से वेन को किसी किस्म की क्षति पहुची ही नहीं थी । पैंतालीस मिनट तक सिर्फ वही होता रहा जेसा वैन मे मौजूद लोग चाहते थे I अपने लक्ष्य में कामयाब होकर जब वेन वापस चली तो पिछले हिस्से में रक्त तिलक के सदस्य इस पहली और जबरदस्त सफ़लता पर उछल-उछल पड रहे थे…कामयाबी की चमक ड्राइविंग सीट पर बेठे विकास के चेहरे पर भी देखी जा सकती थी ।

किंतु लडके के मस्तिष्क मे एक काटा-सा भी चुभ रहा था l

रह-रहकर उसके जेहन में एक ही सवाल गूज रहा था…विज़य गुरु कहा हैं?

उनकी मौजूदगी से विकास को लगा था कि उसका काम बेहद कठिन हो गया है…निःसदेह वे कोई-न-क्रोई ऐसा ड्रामा जरूर करेगे जिससे वेन पगु होकर रह जाए, किंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ था I

बडी आसानी से वह हवाई अड्डे को ध्वस्त करने में कामयाब हो गया…हल्की-सी भी दिक्कत पेश नहीं आई…विजय गुरु की तो आवाज तक नहीं सुनी उसने ।

गुरू ने इतना महत्वपूर्ण सस्थान इतनी आसानी से नष्ट कैसे हो

जाने दिया?

क्या वे कुछ भी नहीं कर रहे है-हाथ पर हाथ रखे बेठे हैं?

विकास जानता था कि ऐसा असभव हे । वे कभी निष्क्रिय नहीं होते और मज़लिस्तान में तो वे बैसे भी सिर्फ उसी के लिए आए हैं…वे जरूर कुछ कर रहे होंगे…लेकिन '

क्या-सामने क्यों नहीँ आए?

क्या वे किसी लंवे दांव मैं लगे हुए हैं?

अपने गुरु की एक एक नस से वाकिफ था वह…जानता था कि जब वे दिमाग से चाल चलते हैं तो इतनी दूर की कौडी लाते हैं कि सामने वाला स्वन मे भी सोच तक नहीं सोच पाता-इतना सब कछ ~ होने के बावजूद भी उनका सामने न आना एक ही बात का द्योतक था…यह कि वे किसी लवे दाव की तैयारी में हैं ।

परतु-वह दाव क्या हो सकता है ?

यही सोचते हुए बिकास ने वेन वापस धुमा दी…वह प्रत्येक क्षण विजय की तरफ होने वाले किसी हमले का इत्तजार कर रहा था --

जितनी ज्यादा देर होती जा रही थी, उतना_ ही रास्ता भी तय होता जा रहा था और' उसी अनुपात में विकास यह स्रोच-सोचकर परेशान था कि आखिर विजय गुरु हैं कहां…किस चक्कर में हैं?

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सडक के दोनो तरफ पेड़ थे--उन्हीं में से दाईं तरफ एक पेड़ ऐसा भी था, जिसकी एक शाख सडक के ऊपर से होती हुई दूसरे किनारे तक चली गई थी…विजय उस वक्त उसी शाख पर चिपका हुआ था…जिस्म पर अजीब-सा लिबास था ।

एकदम चुस्त । एस्बेस्टस के लेप बाला-हाथों में एस्बेस्टसयुक्त कपडे के दस्ताने थे, यहां तक कि जूतों पर भी एस्बेस्टस की एक परत चढी थी । दूर से आती हुई वेन को देखते ही उसकी आखें चमकउठी-वह सभलकर शाख की बैक में हो गया-शायद इसलिए कि वेन के अदर लगी स्कीन पर उसे देखा न जा सकै । उसने ठीक उस क्षण शाख छोड दी जिस क्षण वेन शाख कै नीचे से गुज़री।

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"धम्म I"

~ इस आवाज को सुनते ही सबने चौंककर ऊपर देखाँ-छत की तरफ-तभी ड्राइविंग कक्ष से विकास की आवाज़ उभरी-"ये आवाज़ कैसी थी?"

. . "शायद बैन की छत पर कोई कूदा है ।" हाशमी ने कहा l

"ओह-स्क्रीन पर क्या नजर आ रहा है?"

स्क्रीन को घूरते हुए हाशमी ने जवाब दिया…"कुछ भी नहीं…बैनं के ऊपर खुला आकाश हे…माइक्रोफोन क्योंकि गन की नाल के अग्रिम सिरे पर है इसलिए वैन की छत नजर नहीं आती-वह जो भी कोई है, वैन की छत पर चिपका हुआ होगा…स्क्रीन पर नजर नहीं आ रहा होगा I"

"वे जरूर विजये गुरु होगे ।"

पिछले हिस्से मैं सन्नाटा-सा छा गया…जिस्म पसीने से भरभरा उठे-विकास पहले ही उनसे विजय की इतनी तारीफ कर चुका था कि विजय का नाम ही उनके लिए खौफ का कारण था…विकास ने कहा था कि दुनिया में एक भी काम ऐसा नहीँ हे…जिसे कम-से-कम उसके गुरु के लिए नामुमकिन कहा जा सके,--

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यह सोचकर कि वही बिजय वेन की छत पर पहुच चुका है, उनके दिल धक-धक ,करने लगे । वेन उसी गति से सडक. पर दोडी चली जा रही थी ।

. बिकास सहित सभी कै दिमागों मे तनाव-सा उत्पन्न हो गया था…इसी तनाव के कारण कोई एक शब्द भी नहीं बोल सका,जबकि. इस चुप्पी के कारण ही तनाव कुछ और बढ गया ।

प्रश्नवाचक दृष्टि से एक-दूसरे को देखने लगे वे । कैबिन से विकास ने पूछा…"छत्त वाली मशीनगन पर कौन है?"

" रहीम ।"

" रहीम-तुम स्कीन पर नज़र रखो…किसी के नजर आते ही तुम्हें फायर कर देना है ।"

"ओके ।" रहीम ने स्कीन पर नजर गडा दी I

करीम चाचा ने पूछा…"वह हमारा कुछ बिगाड तो सकता नहीं…-फिर तुम्हारे ख्याल से वह वेन की छत पर क्यों कूदा है विकास-क्या करना चाहता है वह?"

" कुछ भी हो सकता बै चाचा…मुरु कै दिमाग तक पहुचना जरा टेढी खीर है ।"

मुमताज बोली…"मेरे ख्याल से तुम्हारे गुरु छत पर मौजूद रहकर हमारे अड्डे पर पहुचना चाहते हैं I” ,

" सभव हे लेकिन I"

" लेकिन? ” हाशमी ने पूछा ।

"यदि वे सिर्फ इसीलिए छत पर कूदे हैं तो मैं कभी उन्हें कामयाब नहीं होने दूगा-वेन को मैं ऐसे ऐसे झटके दे सकता हू कि स्टील की चिकनी छत पर उनके लिए टिके रहना असभव हो जाएगा I"

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वेन की रफ्तार बढ गई…बिल्कुल हवा की… गति से सडक. .. पर दौडने लगी..... वह-दौड भी सीधी नहीं रही थी बल्कि सडक पर दाए-ब्राए-वेसे ही हवा मे लहरा रही थी जैसे बिल से बाहर दौडता . हुआ साप लहराता है ।

वेन की छत्त अत्यत चिकनी थी I

इतनी ज्यादा कि विजय का जिस्म सारी छत पर फिसला-फिसला

फिर रहा था…उसर्ने दोनों हाथी से कसकर छत में उभरी हुईं मशीनगन की नाल पकड रखी थी ।

एक फुट के करीब नाल बाहर थी ।

अग्रिम सिरा आसमान क्रो ताक रहा था-नीचे से यानी छत के समीप से उसने नाल पकड रखी थी…-उसी के कारण वह स्वयं को छत पर रोके हुए था. वर्ना बिकास ने तो ऐसे ऐसे झटके दिए थे कि वह कभी का बैन की छत से फिसलकर दूर जा गिरता ।

अचानक ही-विक्रास ने बैन के पूरी ताकत से ब्रेक लगाए । हवा की 'तरह भागती हुई टायरों की चीख-चिल्लाहट कै साथ एकदम ,जाम हो गई । छत पर लेटा विजय बडी तेजी से आगे की तरफ फिसला-यदि उसने गन की नाल न पकड रखी होती तो बिकास की यह हरकत उसे निश्चित रूप से फिसलाकर वेन कै आगे डाल देती क्रितु' वर्तमान स्थिति मेँ सिर्फ उसके जिस्म. को एक तेज झटका लगकर रह गया I

एक दूसरे झटके के साथ वेन पुन आगे बढ चुकी थी । बिजय समझ सकता था कि अब विकास भी यह समझ गया होगा कि वह गन के कारण छत से नही फिसल रहा है, अत: वह किसी भी क्षण बटन दबाकर गन को वेन के अदर खींच लेने का हुक्म दे सकता है…यही सोचकर उसने हाथों के जरिए समूचे जिस्म को नाल के समीप खीचा ।

चुस्त पतलून की जेब से रिवॉल्वर निकाला ।

फिर बडी सावधानी के साथ उसने रिवॉल्वर वाला हाथ ऊपर उठाया-बडी तेजी से उसने रिवॉल्वर की नाल मशीनगन की नाल के अदर के अंदर डाली ट्रेगर दबाकर रिवॉल्बर वहां से हटा लिया ।

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