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स्कीन पर एक क्षण के सौवें हिस्से के लिए एक रिवाॅल्बर युक्त हाथ चमका…रिवॉल्बर की नाल गन की नाल के अदर घस्री और किसी के कुछ समझने से पहले ही…"धाय" ।
फायर की आवाज I
मशीनगन की नाल में सरककर रिवॉल्वर की दहकती हुई बुलेट गन के चैंबर में चलने के लिए तैयार गोली से आ टकराई-चैंबर में फंसी गोली अकेली नहीं थी बल्कि उससे पूरी मैगजीन सबद्ध थी l नतीजा यह कि एक साथ पूरी मैजीन में आग लग गई ।
भडाक I
209
एक जबरदस्त धमाके कै साथ मशीनगन कै पिछले हिस्से के
परखच्चे उड़ गए ।।
साथ ही वेन का पिछला केबिन. एक इसानी चीख से झनझना उठा-यह चीख रहीम की थी-गन के पिछले हिस्से के सबसे समीप. वह बैठा था-वह पूरी कुर्सी ही उड गई जिस पर वह था ।
विस्फोट होते ही रहीम का जिस्म कुर्सी से उछलकर वेन का छत से टकराया....अगले ही पल फर्शं पर गिरा-यह सब कुछ इतना तेजी' से हुआ था कि कोई कुछ देख नहीं सका…उन्होने सिफ फ़र्श पर पडे तडप रहे रहीम को देखा था…बुरी तरह जला हुआ चेहरा-एकदम काला ।
वह सिर्फ एक पल तडपा फिर ठंडा पड गया ।।
सारे केबिन में सनसनी सी दौड गई…हलक सूख गए-टागें काप-सी उठी…क्षणभर में उनकी आखों के सामने उसका अत हो गया था…बडा ही भयानक और वीभत्स अंत…अभी वे उबर भी नहीं पाए थे कि ड्राइविंग कक्ष से आवाज उभरी-"ये क्या हुआ हाशमी अंकल इतना जबरदस्त धमाका ।।
"रहीम मर गया है बेटे ।" हाशमी ने लाश के बीभत्स चेहरे को घूरा ।
"क क्या?" अविश्वास और दर्द में डूबी आबाज--"कैसे ?"
हाशमी ने वह बता दियां जो उसने देखा था सुनकर विकास कह उठा--"ओह अब मै बिश्वास के साथ कह सकता हू कि छत पर विजय गुरु ही हैं-वे पहले से ही अच्छी तरह समझ-बूझकर यह सब कुछ कर रहे हैं…इतनी दूर तक उनके अलावा क्रोई नही सोच सकत्ता कि--गन की नाल कें अंदर फायर करके वे वेन के अदर ऐसी जबरदस्त दुर्घटना कर सकंते हैं !"
"अब क्या करे विकास ?" मुमताज ने पूछा..।।
"कुर्सी का बटन दबाकर छत से बाहर निकली गन को वापस खींच लो ।"
करीम चाचा ने कहा----" म...मगर बटन कहा रहा…पूरी कुर्सी ही उड गई है I"
" ओह। यह बात मेरे दिमाग में पहले क्यों नहीं आई कि गुरु उस नाल के कारण ही अब तक छत पर टिके हुए हैँ-गन का पिछला हिस्सा उड गया होगा?"
"हा-अब तो केवल नाल छत मे बने छेद में फ़सी रह गई है ।"
सुनकर बेन को ड्राइव करते हुए विकास कें जबडे कुछ और सख्ती के साथ मिच गए…-चेहरा भभक उठा-आखें' अगारे वनं गई-अनजाने मे ही उसके पैरों का दबाव एक्सीलेटर पर ब्रढ़ता चला गया ।
वैन की गति तीव्रतम हो गई।
इसी अंदाज मे उसने अगला आदेश दिया-" बटन दवाकर बैन की बॉंडी से निकली सभी गने अदर खींच लो---विजय गुरु किसी और गन का यही हश्र कर सकते हैँ !"
सभी ने ओदश का पालन किया ॥
अनजाने में ही बैन की रफ्तार बढाता हुआ बिकास दिमाग पर जोर डालकर कोई ऐसी तरकीब सोचने की कोशिश कर रहा था, जिससे छत पर जमे विजय से छुटकारा पाया जा सकै I
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फायर की आवाज I
मशीनगन की नाल में सरककर रिवॉल्वर की दहकती हुई बुलेट गन के चैंबर में चलने के लिए तैयार गोली से आ टकराई-चैंबर में फंसी गोली अकेली नहीं थी बल्कि उससे पूरी मैगजीन सबद्ध थी l नतीजा यह कि एक साथ पूरी मैजीन में आग लग गई ।
भडाक I
209
एक जबरदस्त धमाके कै साथ मशीनगन कै पिछले हिस्से के
परखच्चे उड़ गए ।।
साथ ही वेन का पिछला केबिन. एक इसानी चीख से झनझना उठा-यह चीख रहीम की थी-गन के पिछले हिस्से के सबसे समीप. वह बैठा था-वह पूरी कुर्सी ही उड गई जिस पर वह था ।
विस्फोट होते ही रहीम का जिस्म कुर्सी से उछलकर वेन का छत से टकराया....अगले ही पल फर्शं पर गिरा-यह सब कुछ इतना तेजी' से हुआ था कि कोई कुछ देख नहीं सका…उन्होने सिफ फ़र्श पर पडे तडप रहे रहीम को देखा था…बुरी तरह जला हुआ चेहरा-एकदम काला ।
वह सिर्फ एक पल तडपा फिर ठंडा पड गया ।।
सारे केबिन में सनसनी सी दौड गई…हलक सूख गए-टागें काप-सी उठी…क्षणभर में उनकी आखों के सामने उसका अत हो गया था…बडा ही भयानक और वीभत्स अंत…अभी वे उबर भी नहीं पाए थे कि ड्राइविंग कक्ष से आवाज उभरी-"ये क्या हुआ हाशमी अंकल इतना जबरदस्त धमाका ।।
"रहीम मर गया है बेटे ।" हाशमी ने लाश के बीभत्स चेहरे को घूरा ।
"क क्या?" अविश्वास और दर्द में डूबी आबाज--"कैसे ?"
हाशमी ने वह बता दियां जो उसने देखा था सुनकर विकास कह उठा--"ओह अब मै बिश्वास के साथ कह सकता हू कि छत पर विजय गुरु ही हैं-वे पहले से ही अच्छी तरह समझ-बूझकर यह सब कुछ कर रहे हैं…इतनी दूर तक उनके अलावा क्रोई नही सोच सकत्ता कि--गन की नाल कें अंदर फायर करके वे वेन के अदर ऐसी जबरदस्त दुर्घटना कर सकंते हैं !"
"अब क्या करे विकास ?" मुमताज ने पूछा..।।
"कुर्सी का बटन दबाकर छत से बाहर निकली गन को वापस खींच लो ।"
करीम चाचा ने कहा----" म...मगर बटन कहा रहा…पूरी कुर्सी ही उड गई है I"
" ओह। यह बात मेरे दिमाग में पहले क्यों नहीं आई कि गुरु उस नाल के कारण ही अब तक छत पर टिके हुए हैँ-गन का पिछला हिस्सा उड गया होगा?"
"हा-अब तो केवल नाल छत मे बने छेद में फ़सी रह गई है ।"
सुनकर बेन को ड्राइव करते हुए विकास कें जबडे कुछ और सख्ती के साथ मिच गए…-चेहरा भभक उठा-आखें' अगारे वनं गई-अनजाने मे ही उसके पैरों का दबाव एक्सीलेटर पर ब्रढ़ता चला गया ।
वैन की गति तीव्रतम हो गई।
इसी अंदाज मे उसने अगला आदेश दिया-" बटन दवाकर बैन की बॉंडी से निकली सभी गने अदर खींच लो---विजय गुरु किसी और गन का यही हश्र कर सकते हैँ !"
सभी ने ओदश का पालन किया ॥
अनजाने में ही बैन की रफ्तार बढाता हुआ बिकास दिमाग पर जोर डालकर कोई ऐसी तरकीब सोचने की कोशिश कर रहा था, जिससे छत पर जमे विजय से छुटकारा पाया जा सकै I
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