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धर्मयुद्ध (विजय विकास अंलफासे सीरीज)

स्कीन पर एक क्षण के सौवें हिस्से के लिए एक रिवाॅल्बर युक्त हाथ चमका…रिवॉल्बर की नाल गन की नाल के अदर घस्री और किसी के कुछ समझने से पहले ही…"धाय" ।

फायर की आवाज I

मशीनगन की नाल में सरककर रिवॉल्वर की दहकती हुई बुलेट गन के चैंबर में चलने के लिए तैयार गोली से आ टकराई-चैंबर में फंसी गोली अकेली नहीं थी बल्कि उससे पूरी मैगजीन सबद्ध थी l नतीजा यह कि एक साथ पूरी मैजीन में आग लग गई ।

भडाक I

209

एक जबरदस्त धमाके कै साथ मशीनगन कै पिछले हिस्से के

परखच्चे उड़ गए ।।

साथ ही वेन का पिछला केबिन. एक इसानी चीख से झनझना उठा-यह चीख रहीम की थी-गन के पिछले हिस्से के सबसे समीप. वह बैठा था-वह पूरी कुर्सी ही उड गई जिस पर वह था ।

विस्फोट होते ही रहीम का जिस्म कुर्सी से उछलकर वेन का छत से टकराया....अगले ही पल फर्शं पर गिरा-यह सब कुछ इतना तेजी' से हुआ था कि कोई कुछ देख नहीं सका…उन्होने सिफ फ़र्श पर पडे तडप रहे रहीम को देखा था…बुरी तरह जला हुआ चेहरा-एकदम काला ।

वह सिर्फ एक पल तडपा फिर ठंडा पड गया ।।

सारे केबिन में सनसनी सी दौड गई…हलक सूख गए-टागें काप-सी उठी…क्षणभर में उनकी आखों के सामने उसका अत हो गया था…बडा ही भयानक और वीभत्स अंत…अभी वे उबर भी नहीं पाए थे कि ड्राइविंग कक्ष से आवाज उभरी-"ये क्या हुआ हाशमी अंकल इतना जबरदस्त धमाका ।।

"रहीम मर गया है बेटे ।" हाशमी ने लाश के बीभत्स चेहरे को घूरा ।

"क क्या?" अविश्वास और दर्द में डूबी आबाज--"कैसे ?"

हाशमी ने वह बता दियां जो उसने देखा था सुनकर विकास कह उठा--"ओह अब मै बिश्वास के साथ कह सकता हू कि छत पर विजय गुरु ही हैं-वे पहले से ही अच्छी तरह समझ-बूझकर यह सब कुछ कर रहे हैं…इतनी दूर तक उनके अलावा क्रोई नही सोच सकत्ता कि--गन की नाल कें अंदर फायर करके वे वेन के अदर ऐसी जबरदस्त दुर्घटना कर सकंते हैं !"

"अब क्या करे विकास ?" मुमताज ने पूछा..।।

"कुर्सी का बटन दबाकर छत से बाहर निकली गन को वापस खींच लो ।"

करीम चाचा ने कहा----" म...मगर बटन कहा रहा…पूरी कुर्सी ही उड गई है I"

" ओह। यह बात मेरे दिमाग में पहले क्यों नहीं आई कि गुरु उस नाल के कारण ही अब तक छत पर टिके हुए हैँ-गन का पिछला हिस्सा उड गया होगा?"

"हा-अब तो केवल नाल छत मे बने छेद में फ़सी रह गई है ।"

सुनकर बेन को ड्राइव करते हुए विकास कें जबडे कुछ और सख्ती के साथ मिच गए…-चेहरा भभक उठा-आखें' अगारे वनं गई-अनजाने मे ही उसके पैरों का दबाव एक्सीलेटर पर ब्रढ़ता चला गया ।

वैन की गति तीव्रतम हो गई।

इसी अंदाज मे उसने अगला आदेश दिया-" बटन दवाकर बैन की बॉंडी से निकली सभी गने अदर खींच लो---विजय गुरु किसी और गन का यही हश्र कर सकते हैँ !"

सभी ने ओदश का पालन किया ॥

अनजाने में ही बैन की रफ्तार बढाता हुआ बिकास दिमाग पर जोर डालकर कोई ऐसी तरकीब सोचने की कोशिश कर रहा था, जिससे छत पर जमे विजय से छुटकारा पाया जा सकै I

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एक हाथ से बिजय अभी गन की नाल पकडे हुए था…दूसर्रे हाथ मैं दबे रिवाॅल्बर की नाल से निक्लते धुए र्में उसने उस्री अवस्था मे लेटे-लेटे फूंक मारी और रिवॉल्बर जेब डाल लिया ।

वैन के अदर हुए जबरदस्त विस्फोट कीं आवाज सुनने के बाद ही उसने अनुमान लगा लिया था कि वह हो गया है जो वह चाहता था---- वैन के इजन की आवाज और कानो के समीप साय-साय करती हया कें कारण उसे विकास और पिछले केबिन बालों के बीच हुई बातचीत सुनाई नही दी थी।

बैन की रफ्तार वढती ही चली गई ।

इतनी ज्यादा कि विजय समझ गया कि बिकास उस वक्त उत्तेजित है…उसने दोनों हाथों से कसकर नाल पकड़ ली । उसने काफी देर वाद यह देखा था कि बैन कहा से गुजर रही है ।

सामने ही…सिर्फ एक फर्लाग दूर वह वहुत वडा चौराहा था ।

बैन तेजी कै साथ उस चौराहे की तरफ बढ रही थी--- विजय की आंखों मे चमक उभरी-जबडे कस गए ।

मशीनगनो पर हाथों की पकड वहुत ही सख्त हो गई ।

ऐसा लग रहा था जैसे कि विजय स्वयं को किसी दुर्घटना का झटका सहने कै लिए तैयार कर रहा हो----

वैन आधी की तरह चौराहे पर पहुची ।

मोड पर मुडी ।।

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बैन कै मुडते. ही जिसे चीज पर विक्रास की नजर पड्री उसे देखकर वंह बुरी तरह हडबडा गया । बौखलाकर उसने पूरी ताकत से ब्रेक लगाए, सडक पर घिसटते हुए टायर बुरी तरह चीख पडे । वैन इतनी तेज गति पर थी कि इतने तेज ब्रेक लगने पर भी दुर तक फिसलती चली गई ।

मोड पर मुडते. ही नजर सडक में बने हुए कोई दो फीट गहरे बहुत ही विशाल गड्डे पर पडी थी…गड्डा इतना बडा था कि कोई पैदल यात्री भी उसमें से गुजरे बिना पार नही जा सकता था…मुडते. ही गड्डा बिल्कुल अप्रत्याशित ढग से सामने आ गया था ,, वह मोड कै इतने करीब था कि इतनी फुर्ती और ताकत से ब्रेक लगाए जाने पर भी वेन उस गडे में जा धंसी ।

एक धमाका ।।

बैन कौ जबरदस्त झटका लगा ।

इस झटके के कारण सीट पर बंधा पडा ड्राइवर उछलकर विडस्कीन' कै स्थान पंर लगी जाली से जा टकराया…एक चीख के साथ फर्श पर गिरा…स्वय विकास का सिर छत से जा टकराया था ।

पिछले कैबिन वाले तो उछलकर दौनों केबिनों के बीच बनी दीवार से जा टकराए थे ।

सभी कै कठ से जबरदस्त चीखे निकली --एक-दुसरें से गुड़-मुड होकर वे फ़र्श पर गिरे ।

सभी कै जिस्म के उन हिस्सों से खून बहने लगा था जो हिस्से स्टील की दीवार से टकराए थे ।।

झटका इतना तीव्र था किं छत पर लेटे गन की नाल को , पकड़े विजय की कलाइयों में इतना तेज झकटा लगा कि अपने कधो कै जोड उसे उतरते से महसूस हुए ।।

इजन स्टार्ट था-लेकिन वेन चल नहीं रही थी ।।

सभलकर हाशमी ने पूछा-"र्क्या हुआ विकास?"

ड्राइविंग कक्ष की तरफ़ से कोई आवाज नहीं सुनाई नहीं दी---सुनती भी कैसे--स्वय विकास ने ही मानो हाशमी की आवाज नहीं सुनी…उसका सारा ध्यान उन परिस्थितियों की तरफ था जिनमें वैन फस गई थी ।

सडक पर ताजा बने गड्डे में फ़सी थी वैनं।

उस गड्डे का मलबा गड्डे के पार सडक कै ठीक बीच मैं एक छोटो सी चट्टान का रूप धारण किए खडा था और उस मलबे के पीछे से झाँक थी-कम-से-कम दस मशीन गने । सारी स्थिति विकास के मस्तिष्क मैं स्पष्ट होती चली गई-यह समझने मैं उसे देर नहीं लगी थी की वेन अब इससे आगे नहीं जा सकेगी-पहियों कै कबंर पहियों से पहले ही गड्डे कै सिरे से टकरा जाते थे

अत बैन कै लिए गड्रढे से निकलना ही असभब था ।

~ यदि किसी तरह निकल भी जाए तो सामने वो-मलवे की चट्टान बिकास नै वेन को पीछे की तरफ सरकाना चाहा-एक या दो गज सस्काई भी-सिर्फ तभी तक जब तक खाई का सिरा नहीं आ गया…सिंरा आते ही पिछले पहियों से पहले स्टील का कबर किनारे पर' अड गया…जितनी पीछे सरकी थि…एक स्लो झटके कै साथ उतनी ही आगे सरक गई । बिकास ने कोशिश की परंतु वह बैन को टर्न भी नहीं कर सका । अव--विकास यह अच्छी तरह समझ गया कि वैन किसी भी तरकीब से इस गड्डे से बाहर नहीं निकल सकेंगी-इंजन वद कर दिया उसने…तभी पिछले केविन से हाशमी ने पुन पूछा-- "यह झटका कैसा था और वेन का इजन बंद क्यों हो गया?"

"मैंने किया हे ।"

" क्यों?"

"वैन एक बहुत बड़े गड्डे मैं फस गई है I"

"गड्डे मैं…मगर यहा सडक… पर गडडा कहा से आ गया?"

"’मेने पहले. ही कहा था कि बिजय अंकल पहुँची हुई चीज है-यह गड्डा उस' वक्त तैयार किया गया, जब हम जगी हवाई अड्डा ध्वस्त करने मे लगे थे !"

"ओह-अब क्या होगा?"

" फिलहाल हम कुछ नहीँ कर सकते-वैन इस गड्डे मे कैद होकर रह गई है--मैं नहीं जानता कि बैन के दाए-बाए, पीछे और ऊपर की क्या स्थिति है-मैं जाली के पार ठीक अपने सामने देख सकता हूं-सामने इस गड्डे का मलबा एक छोटीं-सी चट्टान कै रूप में पडा है…गड्डे कै पीछे से गने झाक रही है-जाहिर है कि उसके पीछे सैनिक है ।"

"क्या हम लगने बाहर निकालकर बाहर की स्थिति का जायजा ले ?"

एक पल कुछ सोचने के बाद विकास ने कहा---"आप लोग सिर्फ बाहर की स्थिति का जायजा लेने के लिए गने बाहर निकाल सकते हैं मगर वैन से-गनें जितनी देर भी बाहर रहे उतनी देर वे आग उगलती रहें…यदि कोई भी गन बिना आग उगले हुई तो उसका हश्र भी वही हो सकता है जो छत्त बाली का हुआ।"

" ओ के !"

हाशमी की इस आवाज के दो मिनट बाद ही वैन के चारों तरफ का वातवरण मशीनगनों की तडत्तडाहट.से गूज उठा-यह तडतडाडट निरंतर एक मिनट तक जारी रही-फिर एकदम बद हो गई ।

सभी नाले गोलिया बरका कर एक साथ अदर गुम हो गई थी । ~

"क्या स्थिति है ?" विकास ने पूछा।

… हाशमी की आवाज--- "वेन का किसी भी तरफ कोई आदमी नहीं है…हा, आसपास की इमारतो की खिडकियों से गने जरूर बाहर झाक रही हैँ…ऐसा लगता है जैसे आसपास की सभी इमारतों पर पहले ही सेना ने कब्जा कर लिया हो।"

"इसस्थान पर हमारे लिए पूरी मोर्चाबंदी की गई है !"

. . हाशमी का थोडा घबराया-सा स्वर---"अब क्या करें "

"कर तो हम तभी… कुछ सकते हें` जबकि कुछ करने की स्थिति में हो।"

" क्या मतलब? ?"

"फिलहाल गुरु ने हमेँ पगु बनाकर रख छोडा हे--उनके अगले कदम का इंतजार करने के अलावा कोई चारा नही है…मुमकिन है कि अपनी योजना मे वे कहीं चूकें और हम कुछ कर सके !"

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सचमुच वेन की स्थिति वही थी जो हाशमी ने बयान की थी-यानी गड्डे में फ़सी वेन के किसी भी तरफ़ ऐसी स्थिति में एक भी व्यक्ति नही था जिसे शूट किया जा सके… -आसपास की इमारतों पर वाकई पहले ही कब्जा किया जा चुक्रा था-इन इमारतो की खिडकियो से झाककर गने वेन की तरफ देख रही थीं ।

उन्ही में से एक इमारत में इबलीस-तोम्बो और गार्जियन खडे थे-इमारत की चौथी मजिल की एक खिडकी के समीप खडे थे ---वहां से सडक पर वने गड्डे में फसी वेन साफ चमक रही थी । साथ ही चमक रहा था---- वैध की साफ एवं चिकनी छत पर पेट के बल लेटा विजय ॥॥

तीनों के चेहरों पर जीत की अजीब-सी खुशी चमक रही थी ।

कर्नल तोम्बो विजय को देख़ता कह उठा--- " इस आदमी ने तो सचमुच कमाल कर दिया गार्जियन !"

गार्जियन मुस्कराया-कुछ इस तरह जेसे प्रशसा बिजय की नहीं खुद उसी की की गई हो ।

इबलीस कह उठा- " निसदेंह वह डबल एक्स फाइव का गुरु है !"

"मैंने कहा था न--मैऱी नजरे धोखा नहीं खा सकती !" गार्जियन अकड गया ।

"सचमुच-तुम्हें इंसान को परखने में महारत हासिल है गाजियन ।" कर्नल तोम्बो खुले दिन से उसकी प्रशंसा कर उठा-" बातचीत और अपनी हरकतों से कितना मूर्ख नजर आता था वह-जाने तुम कैसे ताड, गए--उस वक्त तौ यह सोचा भी नहीं जा सकता था ~ उसमे इतना दिमाग होगा---इतनी जल्दी और कितनी ज़बरदस्त तरकीब के साथ उसने बैन को अपने कावू मे कर लिया है।"

_"उसका नाम विजय है-कोई मजाक बात है!"

" लेकिन... . I" इबलीस, बोला-…-""अब वह क्या करेगा?"

गर्वीली मुस्कान के साथ गार्जियन ने कहा-"देखते रहो ।"

वे सचमुच विजय को देखते रह गए थे…आखों' में उसके लिए असीम प्रशंसा कै भाव लिए-जबकि वह जो बातो से एकदम. मूर्ख नजर आता था, इस वक्त वेन की छत पर पडा, एक छोटे…सै ट्रासमीटर पर कह रहा था --" हैलीकांप्टर की क्या स्थिति है?"

" तैयार है ।" दुसरी तरफ से आवाज आई I

"चौराहे पर फूस के ढेर की क्या स्थिति है?"

"जी-लग चुका है-हम बिल्कुल तेयार हैं…सिर्फ आपके आदेश का इंतजार है I"

" तुम काम शुरु कर दो-- इस बात की कोई फिक्र न करना कि वेन पर स्थिति क्या है?"

"ओके सर ॥" इस आबाज कै उभरते ही विजय ने संबंध-विच्छेद का दिया- ट्रांसमीटर चुस्त पतलून की दूसरी जेब मे डाला और फिर रेगता हुआ छत के, और. किनारे तक पहुँचा । कोई ढाई फुट नीचे बोनट था--- बोनट और छत के बीच विंडसक्रीन के स्थान पर जाली लगी थी ।

सामने बाली गने बोनट के नीचे मडगार्ड कै पास थीं ।

जाने क्या सोचकर विजय ने बोनट पर उतरने के लिए पैर बढा दिया ।

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टांग देखते ही बिकास समझ गया था कि विजय गुरु छत से उतरकर बोऩट पा आ रहे हैं-बीच में जाली थी, जाने क्यों बिकास का दिल अजीब-से ढग से धडक, उठा.…रेशम की डोरिर्यों में जकड़े फर्श पर पडे कराह रहे ड्राइवर की तरफ़ उसका कोई ध्यान नहीँ था । …

बोनट पर बैठकरविजय ने जाली की तरफ देखा-विकास साफ देख रहा था कि विजय गुरु बोनट पर बेठे बडी ही विजयी मुस्कान के साथ फटाफट उसे आख मार रहे थे ।

बिकास तिलमिला-सा उठा ।

विजय बोला---"भले ही हम तुम्हारी मोहनी सूरत नहीं देख पा ऱहे हैं दिलजले लेकिन जानते हैं कि तुम हमारी इन फडकती हुई आखों' को खूब अच्छी तरह देख रहे हो I"

"बैन को इस गड्डे से निकालो गुरु!" गुर्राहटदार स्वर में विकास ने आदेश-सा दिया ।।

बडे ही प्यार से पूछा विजय ने-…"'वह किस खुशी मे प्यारे?? "

"क्या आप यह समझ रहे हैं कि वेन को इस गड्डे में फंसाकर आप जीत गए हैं तो यह आपकी भूल है-आप हम तक नहीं पहुच . सकते-वैन के दरवाजे सिर्फ अदर से खुलते हैँ ।"

"हम जानते हैं मेरी जान ।"

"हम आपका कोई भी आदेश मानने कै लिए बाध्य नही हैं I"

“बाध्य तो किया जा सकता है प्यारे...॥"

"यह आप कैसे का सकेगे ?"

" जैसे इतना सव कुछ किया हे।"

एक पल के लिए चुप रह गया विकास-इस बीच वह जाली के पार चमक रहे विजय कै चेहरे को देखता रहा था बोला…"कौछ भी होने वाला नहीं है गुरु-माना कि आपने वेन को यहा कैद कर लिया है लेकिन हम भी दरवाजा खोलने वाले नहीं हैं…बैठे रहिए-हम भी बैठे है ।"

"हम तुम्हें केवल यही आदेश देने बोनट पर आए है प्यारे ।"

"क्यां ?"

"दरवाजा खोलकर बाहर निकल आओ और रक्त तिलक के मुर्गों क्रो भी वही सलाह दो वरना I”

" वर्ना आप क्या कर लेंगे?" हसते हुए बिकास ने पूछा ।

विजय ने ऊपर देखा…आकाश की तरफ ।।

ड्राविंग कक्ष मे' बैठे बिकास ने आकाश में गूजने वाली हल्की सी ,गडगडाहट की आबाज सुनी…वह तुरंतु समझ गया कि यह आबाज हेलीकाप्टर की है और सचमुच आकाश में एक हेलीकॉप्टर गडगडा रहा था-हैलीकाप्टर के नीचे दो बडे-बडे मैग्नेट लटक रहे थे लबी-लबी दो रस्सियों के सिरों पर-'शक्तिशाली' मेग्नेट किसी थाल के-से आकार के थे ।
 
बिजय पुन जाली की तरफ़ देखता हुआ बोला…"अफसोस प्यारे दिलजले-तुम हेलीकॉप्टर को देख नहीं सकते उसकी आबाज सुन सकते हो …"यदि देख सकते होते जरूर समझ जाते कि अगले क्षणों में क्या होंने वाला हे-हां स्कीन पर पिछले केबिन वाले जरूर देख सकते हें… लेकिन बेचारे कुछ कर 'नहीं सकते क्योंकि आकाश की तरफ फायर करने वाली गन पहले ही वेकार हो चुकी है I" विकास तिलमिला-सा उठा बोला…'आप कुछ भी कर ले गुरु लेकिन हम वेन से बाहर नहीँ निकलेगे ।।"

"तुम्हें निकलना होगा मेरी जान ।'"चाटकारा-सा लेकर जिस क्षण

विजय ऐसा कह रहा था उस क्षण तक हैलीकाॅप्टर वेन के ठीक ऊपर

पहुच चुका था ।

हैलिकाॅप्टर हवा मे स्थिर हुआ ।

लबी रस्मिर्यों पर लटके दोनों मैग्नेट वैन की छत पंर चिपक गए…फिर हैलीकॉप्टर ऊचा उठा…वेन को एक झटका लगा…इस झटके के साथ वैन ऊपर उठती चली गई-पहिए गड्डे से ऊपर उठे- क्रमश जनीन से ऊपर उठते ही चले गए ।।

"'ओह !" बिकास बडबडाया-"तो चुम्कीयशक्ति से वेन को ऊपर उठाया जा रहा हैं ।"

"तेल देखो थोडी ही देर मे तेल की धार भी देखने को मिलेगी ।।" विजय ने हैलीकॉंप्टर की तरफ देखते हुए कहा-वैन के वजन के कारण हेलीकॉप्टर की गति में कमी अवश्य थी । कितु वह सुरक्षित ढंग से ऊपर उठता जा रहा था--दोनो रस्सियों में सख्त तनाव था ।

.......

.........

...........

मेग्नेट जोंक की तरह चेन की छत पर चिपके थे । उन्हीं के कारण हैलीकॉप्टर के ही अनुपात में वैन भी उठती उठती जा रही -- सड़क नीचे छूटने लगी ।

विजय छत का किनारा पकडे अभी तक बोनट पर बैठा था।

"इस किस्म की हरकतों से आखिर आपको लाभ क्या होगा गुरु?"

" वैन के दरवाजे खोलकर तुम्हें बाहर निकलना होगा l”

"हम भूखे मर जाएगे , लेकिन आपका यह स्वप्न कभी पूरा नहीं होगा।"

"भूखे मरने की नौबंत तक तुम्हें पहुचने ही कौन देगा मेरी जान ।"

विजय ने कहा…"अब भी समय है --दरवाजा खोलकर वेन से बाहर

निकलो वरना इसी के अंदर भून दिए जांओगे l"

"क्या मतलब ।"

वह विकास के सामने से हट गया-बोनट के एक किनारे पर पहुचकर बोला…"जरा नीचे देखो प्यारे चोराहे पर-----वहा तुम्हें इस वैन के अदर हीँ भून देने की पूऱी तैयारिया हो चुकी हैं I"

बिकास ने देखा-वेन अब इमारतो की छत्तों से भी ऊपर पहुच चुकी थी…दूर नीचे उसे चोराहा साफ चमक रहा था और चमक रही थी चोराहे पर जलती हुई होली ।

वह ढेर सारा फूस था…कम से कम तीन ट्रक! !

. . सूखे फूस के उस बहुत बडे ढेर से आग की विकराल एव भयकर लपटे लपलपा रही धीं-धुआ उठ रहा था ।

उसे देखकर बिकास के जिस्म का रोया…रोयां खडा हो गया ।।

सारा जिस्म तन गया l

जबकि विजय ने कहा--"बोलो प्यारे --दरवाजे खुलेंगे या नहीं?"

"हागिजं नहीं गुरु ।" जिद भरा चट्टानी स्वर---

"अब अगले ही कुछ पलो बाद हमारे आदेश के मुताबिक हैलीकाप्टर इस वेन को उस जलती हुई होली के बीच में रख देगा-आग की वे भयानक लपटें इस वैन उसी तरह भभका देगी जैसे चुल्हे पर रखा तवा भभका करता है और तुम उसी तरह सिक जाओगे , तवे पर रोटियां सिंकती हैं!"

"फ... फिर भी गुंरु आप जीत नही सकेगे।"

बिजय मुस्कराया-" वह क्यों प्यारे?"

"क्योंकि आप जालियों के साथ हैं…उनकै साथ, जिन्होने _ भोली भाली-बेगुनाह और निहत्थी जनता. पर जुल्म ढाए हैं…आप सेमिनार कै साथ है, जिसने इस छोटे से मुल्क को गुलाम बना दिया है…नेकी के साथ मैं हू गुरु और वदी के साथ आप. है-आखिर जीत मेरी होगी।"

" तुम्हारे बिचार बहुत सड.. चुके हैं प्यारे !"

"व.... ,वह क्यों?"

"सवाल नेकी और बदी का तो है ही नहीं…सवाल है देश का, देश की इज्जत-प्रतिष्ठा और अतर्राष्टिय जगत का उसकी ख्याति का---हमें इस बात से मतलब नहीं कि जालिम इबलीस है या रक्त तिलक वाले I हमे सिर्फ अपने देश की बेहतरी के लिए काम करना है ।"

“द.... देश I" दांत भीचकर गुर्रा उठा…"कौन-से देश की बात कर रहे हैं आप…क्या भारत की…उस भारत को जो मजलिस्तान में सेमिनार. की सैनाओं कै दखल का विरोध नहीं करता-- सिर्फ इसलिए, क्योंकि. सेमिनाऱ उसका मित्र देश है…क्या आप खुद को गुट निरपेक्ष और शांति दूत कहलाने वाले उस भारत की बात कर रहे गुरु जो स्वार्थवश जालिम इबलीस की सरकार… कासमर्थन कर रहा है?"

"ये तुमसे किसने कहा किं भारत ने मजलिस्तान मे सेमिनार के दखल का समर्थन किया हैं?"

कठोर स्वर…"बिरोघ भी तो नहीं किया है !"

"भूल हैं तुम्हारी-भारत ने हमेशा यह कहा है कि किसी भी मुल्क में किसी दूसरे मुत्क की सेनाओं के दखल को कभी भारत का समर्थन नही मिलेगा---- रेजनीतिक स्तर पर भारत ने हमेशा विरोध किया है !"

" बिरोध--हुंह।'" दाँत भीचर लड़का भभकते स्वर मे कह उठा----“आप उसे विरोध कहते हैं-जरा दिल पर हाथ रखिए गुरु ओर फिर कहिए कि क्या भारत सचमुच विरोध कर रहा है---वह कितना कमजोर---कितना खोखला है-सिर्फ यह कहलवाने के लिए बिरोध किया जा रहा हे किं भारत विरौध कर रहा है-खुद ही को भ्रमित करने की कोशिश कर रहे है हम---- यदि हममे ताकत है---यदि हम दिल से विरोध चाह रहे है--- …तो हमे ऊँची आबाज मे कहना चाहिए अंकल कि यदि तुरत मजलिस्तान से सेमिनेरियन सेनाएं नहीं हटी तो हमारे और सेमिनार कै बीच हुई पच्चीस साल की संधी खत्म I"

"हम ऐसा नहीं कर स्रकते ।"
 
"क्यों नहीं कर सकते-क्या हमारे सिंधात हमें सही बात कहने से रोकते है ?"

" तुम या हम अंतर्राष्ट्रिय पॉलिटिक्स क्या समझें-हम विश्व के अन्य देशों से अलग-थलग पडकर, नहीं रह सकते, मज़लिस्तान की धरती पर सारी दुनिया पॉलिटिक्स कर रही है---उस पॉलिटिक्स मे हमें जिस स्तर पर विरोध करने चाहिए, उस स्तर पर किया जा रहा है !"

"सीधे क्यों नहीं कहते गुरू कि हम सेमिनार के दबाब में हैँ-उसकी दोस्ती के मोहताज हैं?"

"विदेश नीतियां निर्धारित करना हमारा या तुम्हारा काम नहीं है ।" विजय नै कहा---" भीतरी तौर पर ऐसी बहुत सी बाते हो सकती है जो हमें नहीं मालूम, भारत सरकार जो कर रही है--हमे यह बिश्वास रखना चाहिए कि वह देश के हित में ही होगा ।"

"यहा मजलिस्तान कै पिसते हुए आवाम कै हक में कौन है?"

"हम नहीं जानते और न ही यह सोचना हमारा बिषय है…हम भारतीय जासूस हैं---हमारा फर्ज सिर्फ और सिर्फ भारतीय सरकार के आदेशों का पालन करना है !"

"जासूस से पहले हम इंसान है गुरु ।"

"तुम पागल हो गए हो विकास !"

"क्योकि मेने मज़लिस्तान मे कराहती हुई इंसानियत देखी है I"

" उफ् ।" बिकास की उस बचकानी और अनोखी जिद पर विजय जैसा धैर्यवान व्यक्ति भी झुझला उठा---“तुम समझते क्यों नहीं विकास तुम्हारे विचार वचकाने हैं-जिद्र उस बच्चे जेसी है, जो चन्द्रमा की माँग करता है-ये हमारा बिषय नहीं है कि मजलिस्तान में क्या हो रहा है और क्या होना चाहिए---हमः हर हाल मे सिर्फ अपने मुल्क की शान के लिए काम करना है !"

"उस मुल्क से मेरा कोई नाता नही !"

"मूर्खता भरी बातें मत करो विकास---यहाँ से लोट चलो-मै बादा करता हूं कि सरकार से कहकर सेमिनार का विरोध करने की दरख्वास्त करूगा--- राजतीतिक स्तर पर हमारा मुल्क जोरदार शब्दों मे मजलिस्तान मे सेमिनार की सेनाओं का विरोध करेगा !"

" मुझे यहा से लेने आने के स्थान पर यदि आपने ऐसा ही किया होता गुरु तो मुझे खुशी होती और फिर भला मैं इस आग में कूदा ही क्यों होता?"

"तुम लौट चलो--ऐसा ही होगा!"

"'तब तक नहीं जब तक कि मजलिस्तान का अवाम गुलाम हे ।"

विजय क्रो लगा कि वह बिकास क्रो नहीं समझा सकेगा-जो जिद पकड ले और कोई भी बात सुनने-समझने के लिए तैयार ही न हो उसे कौन समझा सकता हैँ? ‘

विजय झुझलाकर रह गया…जोर से जाली में घूंसा मारा था उसने I

इस सारी वार्ता के बीच वैन चौराहे कै बीचो बीच आग उगलती हुई होली के ठीक ऊपर पहुच चुकी थी॥॥

हैलीकॉंप्टर घीरे-धीरे नीचे की तरफ सरक रहा था-उसी अनुपात में वेन जलती हुई विशाल होली के नजदीक होती जां रही थी।

लपलपाती लपटें वैन के निचले हिस्से को उछल उछलकर छूने लगीं।

पहियो का रबर जलने लगा।

वेन होली के नजदीक होती चली गई…यहा तक कि जलते हुए फूस के ढेर पर टिक गईं…आग की लपलपाती भयक्रर और विकराल लपटों ने वेन को चारों तरफ सै घेर लिया।

पहिए जलकर बिल्कुल राख हो चुके थे।

लोहे की बॉडी वाली वैन गरम होने लगी…ठीक चूल्हे पर रखें कूकर की तरह ।

बिजय अब भी बोनट पर ही बैठा था । चेहरे पऱ जेब से निकला एक नकाब और डाल लिया था उसने-आग की लपटें उसे भी छू रही थीं किंतु कपडों पर एस्बेस्टस का लेप होने के कारण न तो आग उसे जला पा रही थी और न ही वह आग की गर्मी महसूस कर रहा था ।

ऊपर-हवा मैं स्थिर हैलीकांप्टर गडगडा रहा था ।

बिजय बार बार बिकास को आत्मसमर्पण कर देने की सलाह और चेतावनी दे रहा था--जाली के माध्यम से ढेर सारा घुआ चालक कक्ष मे घुस गया था I

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गुजरते समय के कारण… वैन और ज्यादा गरम होती चली गई ॥

तभी एक माइक पर सारे चौराहे पर गार्जियन की आवाज गूज गई-"हम वेन के अदर बद लोगों को आत्म…समर्पण करने का एक मौका देते हे-यंदि वे बचना चाहते-हैं तो वेन के दरबाजे खोल दें-वर्ना समझ सक्रत्ते हैं कि उनका क्या हाल होगा-कुछं ही देर में वेन की बाडी लाल होकर भभकने लगेगी और वेन के अदर मौजूद प्रत्येक इंसान की हैसियत भाड में पडे चने से ज्यादा कुछ भी नहीं होगीं…यदि जिदा रहना चाहते हो तो वेन के दरवाजें खोल दो I”

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वेन को दो केबिनों मे ब्राटने वाली दीवार मे अनगिनत नन्हे-नन्हे

छिद्र है यह बात पिछले कैबिन में मोजूद व्यक्तियों को तभी पता लगी जब उन छिद्रों मेँ से होता हुआ धुआ इस कैबिन मेँ भी आने लगा…वे छेद इसानी जिस्म के मसामों की तरह ही नन्हे थे और कदाचित स्टील की चमक के कारण नगी आखों से नजर नहीं आते थे ।

हाशमी आदि इस वात पर आश्चर्य व्यक्त किया करते थे कि चारों तरफ़ से पूरी तरह बद' होने के बावजूद भी कैबिन में सास लेने मे किसी प्रकार की दिवकत क्यों नहीं होतीं ।

और-एक केबिन की आबाज दूसरे केबिन में इतनी आसानी से क्यों सुनी जाती है?

उनकी इन दोनों ही उलझनों का जबाब ड्राइविग कक्ष से इस दीवार को पार करके आता हुआ धुआ दे रहा था-ड्राइविंग कक्ष मेँ जाली थी ।

जाली के माध्यमसे ड्राइविंग कक्ष में और इस दीवार के मसामो के माध्यम से धुआ इस कक्ष में प्रविष्ट हो रहा था--वे सभी बुरी तरह खासते फिर रहे थे ।

दम घुटा जा रहा था ।

बैन की बाॅडी गरम होने लगी-फर्श तो इतना ज्यादा गरम हो गया कि जूतों के तले मे सोल जलने लगे…सभी पसीने पसीने हो गए थे ।

प्रत्येक का सारा जिस्म जैसे आग उगल रहा था ।

ड्राइविंग कक्ष में तो हालत इससे भी बदतर थी-धुआ बुरी तरह भरा हुआ था…प्रत्येक सास में फेफडों में धुआ पहुचता और बिकास तथा ड्राइवर बुरी तरह खास रहे थे ।

जिस्म आग तो उगल हीँ रहा था---आँखों मे जलन थी । पिछले केबिन मे खासता हुआ सुल्तान फर्श पर गिरते ही बुरी तरह चीखा वह-अन्य लोग उसे संभालने के लिए बढे भी किंतु पीछे हट, गए, क्योंकि जो कपडे सुल्तान ने पहन रखे थे, उनसे धुआं निक्लने लगा…कपड़े जलने शुरू हो गए थे ।। स्वयं सुल्तान तो इस तरह चीखा ही था जेसे अचानक ही गरम तवे पर गिर गया हो ओर सचमुच वेन का फ़र्श इस वक्त गरम तवा ही वना हुआ था-फर्श की अपेक्षा अभी दीवारें कम गरम थीं---क्रितु' वे जानते थे कि समय कै साथ वे भी पूरी तरह दहक उठेगी ।

सुल्तान कै मुह से निकलने बाली चीखे अव अचानक हीँ बन्द हो गई l

अब…केविन में जलते हुए गोश्त की दुर्गंध फैली--- हाशमी चीख पड़ा---‘"जल्दी बोलो विकास बेटे----क्या करें--सुल्तान मर चुका हे---हममे से एक भी नही बचेगा।"

दूसरी तरफ से कोई आवाज़ नहीं… उभरी l

तभी मुमताज ने गिरते हुए करीम चाचा कौ संभाला-जल्दी से बोली-"करीम चाचा भी मरने वाले' हैं अंकल…यदि ये मर गए तो' हम सव इसी केबिन मैं मर जाएगे…जल्दी से आदेश दो कि हम क्या करे--मरने या आत्म समर्पण के अलावा क्रोई चारा नहीं है I”

" दरवाजा खोल दो…हम समर्पण कर रहे है ।" विकास का आदेश होते ही हाशमी मुमताज की बाहों में झूल रहै करीम चाचा को बुरी तरह झझोडता हुआ चीखा---'"क..करीम चाचा-करीम चाचा--प्लीज, दरवाजा खोलो r"

उधर ड्राइविंग सीट पर बैठे विकास ने ऊंची आवाज में कहा--- "हम सरेडर करते हैं गुरू !"

सुनते ही बोनट पर खडे बिजय ने जेब से रिवाॅल्बर निकालकर एक फायर किया…इस फायर के बाद ही स्थिर हैलीकॉप्टर ने ऊपर उठना शुरू का दिया-साथ ही भभकती हुई होली से बैन ऊपर उठने लगी ।

विकास ने ड्राइवर कौ झझोडा-- वह बेहोश हो चुका था I पिछले केबिन में करीम चाचा ने हाशमी कै झझोडने पर आंखे खौली--मुमताज उन्हें सहारा देकर लाॅक की तरफ ले गई…वे महसूस कर रहे थे कि अब वैन ऊपर उठने लगी है I

रक्त तिलक कै तीन सदस्य बुरी तरह खांस रहे थे।

तभी ड्राइविंग कक्ष से चीखकर विकास ने कहा-"सरेडर करने से पहले इस बैन कें अदर की सभी गने तोड डालो…कुर्सिंयां उखाड दो-स्क्रीन तोड दो-वेन को जितना नुकसान पहुचा सकते हो पहुचा दो ताकि भविष्य मे कभी इसै किसी इस्तेमाल न किंया जा सकै I"

आदेश होते‘ ही रक्त तिलक के तीनों सदस्य इस कामं में लग गये I लॉक के समीप पहुचकर करीम चाचा ने उसे खोलने कै लिए हाथ बढाया ही था कि हाशमी चीख पड़ा--- "रूको चाचा-हैँडिल गरम होगा I”

हाशमी ने अपनी कमीज उतारकर उन्हें दीं।

कमीज दस्तानों की तरह ककरीम चाचा कै दोनों हाथों पर लपेटी गई…तव करीम चाचा ने नंबर एडजेस्ट किए…हल्की-सी गडागहट के साथ शटरनुमा दरवाजां खोला गया I

वेन होली से काफी दूर सडक से सिर्फ पाच फीट ऊपर लटक रही थीं…हैली कॉंप्टर स्थिर था इसलिए वैन भी वहीँ स्थिर हो गई I

बैन के अंदर से अब धुआ छटने लगा-- विकास ने निर्जीव-से पंडे ड्राइवर को देखा-उसकी नव्ज टटोली…उसे चलता हुआ महसूस करके सतोष की सास ली और फिर उसके बधन खोलने के लिए रेशम की डोरी पर हाथ रखा ही था किं डोरी कई टुकडो मे विभक्त होकर के हाथ में आ गई।

तपन के कारण डोरी जगह-जगह से झुलस गई थी ।

बिकास जल्दी-जल्दी डोरी कै टुकडे उसके जिस्म से अलग करने लगा I

माइक पर गार्जियन की आवाज गूज रही थी-"तुमं लोगों की वेन सडक से सिर्फ पाच फीट ऊपर हे-वहा से तुम आसानी से सडक पर कूद सकते हो यदि अब भी किसी किस्म की चलाकी दिखाने की कोशिश की तो आसपास की इमारतों मैं से झाक रही गने ढेर कर देगी और शेष कौ वेन समेत चौराहे पर जल रही होली मे डाल दिया जाएगा ।”

स्थिति यही थी । वेन के पिछले केबिन का खुला हुआ दरबांजा साफ चमक रहा था--सबसे पहले उस दरवाजे के बीच में हाशमी नजर आया--एक ही जप मे वह सडक पर था ।

उसकै बाद मुमताज ।

जब करीम चाचा कूदे तो वे सडक पा खडे न रह सके-गिर गए और उस वक्त हाशमी और मुमताज की आखें भरती चली गइ, जब उन्होंने यह महसूस किया कि करीम चाचा अपनी जिस्मानी क्षमता से बहुत ज्यादा काम लेने के बाद अब कभी न उठने के लिए सडक पर गिर गए हैं ।

बहुत…सी गने उन पर तनी हुई थी इसलिए हाथ उठाए शात खडे थे I

एक के बाद एक…रक्त तिलक कै तीर्ना अन्य सदस्य भी कूद गए I
 
बोनट पर बेठे विजय ने जाली की तरफ देखकर कहा…"क्या _ बात है दिलजले अभी तक ड्राइविग कक्ष का दरवाजा नहीं खुला है…कोई करिश्मा दिखाने के अरमान है क्या ?"

"करिश्मे तो बहुत दिखाने हे गुरु लेकिन फिलहाल समस्या ये है « कि मैं लॉक नही खोल सकता।" …

"वह क्यो ?"

" क्योंकि मुझे नबर नहीँ मालूम है।"

"क्या मतलब?" विजय चौंक पडा ।।

"ये साला सेमिनेरियन ड्राइवर बडा सख्त निकला-जितना मैं कर सकता था उतने टॉर्चर किए पर इसने जुबान नही खोंली--अतः इसी केबिन मे बाधकर डाल लिया था।"

"इस वक्त किस हाल मे है ।"

-"बेहोश ।"

“ओह ।" विजय ने ठहाका लगाया--"इसका मतलब कि नबाबजादे एक तरह से इस केबिन में कैद हैं…ड्राइवर के रहमोकरम पर खूब…लेकिन फिक्र मत करो-होश मे आने पर अंब वह इसलिए लॉक खाल देगा क्योंकि लाक खोलने का हुक्म उसकै अफसर देगे-उसके होश मे आने तक लटके रहो ।"

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मडगार्ड पर लगी गनों के बीच उस छेद के माध्यम से विजय ने एक छोटी-सी शीशी चालक कक्ष तक पहुँचाई--विजय के आदेशानुसार जव ड्राइवर की नाक के समीप उस शीशी में भरा तरल पदार्थ डाला गया

तो पाच. मिनट बाद ही वह भला-चगा नजर आने लगा ।

माइक पर बोलते हुए गार्जियन ने उसे स्थिति समझाई ।

अच्छी तरह यह समझने कै बाद ही वह लॉक की तरफ़ बढा कि अब स्थिति उसके अफसरों के काबू में है औरै बिकास की हैसियत एक कैदी से बढकर कुछ भी नहीं है । लॉक के नबर एडजेस्ट करता हुआ वह विकास को खा जाने वाली नजरों से घूर रहा था-जैसे विकास द्वारा किए गए टार्चर का बदला लेने का अरमान रखता हो ।

विकास मुस्कराता रहा । वेन की बॉडी अब उतनी गरम नहीं रही थी अतः नगे हाथों से ही उसने आसानी से दरवाजा खोल दिया…किं वह सडक पर कूद गया । विकास ने गन उठाई तथा छोटे-से केबिन कै स्विच सिस्टम को तोड डाला-गनें उखाड दी…यहा तक कि स्टेयरिंग भी उखाड़कर एक तरफ़ डाल दिया ।

माइक पर उसे लगातार सडक… पर कूद जाने के लिए कहा जा रहा था I

वह कूदा…कितु तब जबकि अपनी नजर में वैन को भीतरी तौर पर पूरी तरह बेकार कर चुका-उसके कूदते ही हैलीकॉंप्टर ऊपर उठा और फिर गडगडाता हुआ वेन को लेकर अज्ञात दिशा में गुम हो गया ।

अब…या तो चौराहे पर अभी तक सुलग रही फूस की विशाल होली थी-या ढेर सारे सैनिको से धिरे विकास…हाशमी-मुमताज़ और रक्त तिलक के तीन सदस्य थे ।

एक तरफ़ से दो ट्रक और एक जीप वहा आकर रुकी ।

विजय के आदेश पर पहले उन सबकी तलाशी ली गई…जेबे बिल्कुल खाली कर दी गईं…हाथ उठाए चुपचाप खडे रहने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था ।

विजय विकास के पास पहुचा बोला---"अव कहो प्यारे दिलजले?"

"क्या कहू?" विकास भी मुस्कराया।

“कैसो रही-यानी तुम्हारी वह साली वेन बेकार कर दी या नही I"

"निःसदेह-यह जग आपने जीत ली हैं अकल-लैकिन यकीन कीजिए, यह आखिरी जग नहीं थी…हालाकि आपसे जीतने मे विकास की जीत नहीं बल्कि हारने में जीत हे लेकिन यकीन है कि आखिरी, जग में फ़तह मेरी होगी क्यों मैं नेकी के रथ पर सवार हू ।"

"अब तुम्हें किसी भी जग का मोका ही नहीं दिया जाएगा मेरी जान…उस जीप में बैठकर हम सीधे एयरपोर्ट जाएगे-वहा एन…सिक्स हमारे इतजार मे खडा हे-उस पर सवार होते ही तुम्हें एक झपकी आएगी ओर आख खुलने मे भारत में होंगे ।"

उसी मुस्कान के साथ विकास ने कहा…"भारत से फिर यहा आ सकता हू।"

"वह बाद की बात है…फिलहाल अपनी तशरीफ का टोकरा जीप में रख दीजिए ।"

विकास बढ़ गया-साथ ही हाशमी आदि भी जीप मेँ बैठ गए-विज़य जीप कै पिछले हिस्से में रिवॉल्वर संभालकर बैठ गया-सेनिकों से भरा एक ट्रक जीप के आगे था दूसरा पीछे ।

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तीनों वाहन एक ही जैसी गति से दोडे चले जा रहे थे-गति सामान्य ही थी ।

तीनों के बीच की दूरी भी मुश्किल से पद्रह-पद्रह गज हो रही होगी यानी जीप के आगे पद्रह गज के अतराल पर सैनिकों से भरा एक ट्रक था--- पंद्रह गज पीछे वेसा ही दूसरा ट्रक ।

फिर भी…जीप ने सबसे पीछे विजय हाथ में रिवाल्वर लिए बैठा था ।

अचानक ही सडक के दाहिनी तरफ से एक पेड आगे वाले ट्रक पर गिरा-ठीक उसी क्षण ब्राई तरफ से एक अन्य पेड पीछे वाले ट्रक पर और यह समय भी वही था जबकि जीप मुख्य सडक छोडकर एकदम खेतों के बीच छोटीं-सी कच्ची सडक मर मुड गई ।

अभी कोई कुछ समझ भी नहीँ पाया था कि---" धांय !"

किसी तरफ से एक गोली चली ॥

गोली सीधी विजय के हाथ में दवे रिवॉल्बर पर लगी थ्री--रिवाॅल्बर उसके हाथ से निक्लकर जीप से बाहर जा गिरा फिर एक आबाज गुजी---"विजय को जीप मे धक्का दे दो विकास ।"

विजय के बिल्कुल सामने बैठे विकास ने ऐसा ही किया ।

सभलने का लाख चेष्टाओं के बावजूद भी विजय चलती जीप से चकरोड पर गिरा ।

यही वह क्षण था जबकि आसपास का सारा वातावरण गोलियों की आवाज से गूंज गया…चकरोड पर धूल उडाती हुई जीप विजय से दुर होती चली गई ।

सारा काम इतनी तेजी से हुआ था कि` कई क्षण तक तो विजय जैसा व्यक्ति भी हक्का-बक्का रह गया-समझ नही सका कि अचानक _ ही यह क्या हो गया है…कितु फिर वह सभलकर चकरोड पर खडा हुआ…-तेजी से अपने रिवाॅल्बर के लिए चारों तरफ दृष्टि घुमाई ।

सयोग से चकरौड पर पडे अपने रिवॉल्बर पर उसकी नजर पड्री---विजय बाज की तरह रिबॉंल्बर पर झपटा.. और अगले ही पल उसने दूर होती जीप के टायरों पर फायर किए ।

~ जीप तब तक रिवाॅल्बर की रेज में थी…निशानेबाज था बिज्य ।

अत: जीप को लडखडाने.. के साथ कुछ दूर तक घिसटते देखा और फिर रूकते…हाथ में रिवॉल्वर लिए विजय उसकी तरफ भागा-अभी मुश्किल से पाच या सात कदम ही भागा था कि-जीप की तरफ़ से उस पर एक गोली झपटी ।

इसे विजय का भाग्य ही कहा जाएगा कि गोली उसके कान के समीप से गुजर गई ।

अगले ही पल-बिज़य ने खुद को चकरोड पर गिरा दिया…ज़मीन से चिपक गया था वह…उसके बाद जीप की तरफ़ से चलने वाली कई गोलिया उसके ऊपर से गुजर गई ।

जीप और विजय के बीच अभी तक धूल उड रही थी । विजय अपने पीछे यानी सडक की तरफ़ से लगातार गोलियां चलने की आवाज सुन रहा था ।

बिल्कुल ऐसी आवाजें' थीं, जेसे दो सेनाएं भिड गई हों…अब विजय को यह समझने में देर नहीं लगी कि सारा काम योजनाबद्ध तरीके से हुआ है ।

रक्त तिलक वालों को मालूम था कि यह काफिला इस सडक, से गुजरना है…पेड पहले ही काटे जा चुके थे-ठीक समय पर उन्हें ट्रकों पर गिरा दिया गया…इस स्थान पर रक्त तिलक वालों ने पहले से ही मोर्चा लगा रखा था…सडकौं पर पेडों के गिरते ही ड्राइवर ने जीप इस चकरोड पर डाल दी-इससे जाहिर था कि ड्राइवर रक्त तिलक से सबंधित था वह जानता था कि यहा चकरोड है और एकदम जीप को इस चकरोड पर डाल देना आदि सभी कुछ पहले से तैयार की गई एक योजना का परिणाम था ।

जीप के आसपास धूल साफ हो रही थी ।

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जिस आवाज ने विकास से यह कहा था कि वह विजय को जीप से धक्का दे दे उस आवाज को हाशमी-मुमताज़ और बिकास भी लाखों में पहचान सकतें थे । "

वह आबाज जीप ड्राइव करते व्यक्ति के मुह से निकली थी ।

टायरों के शहीद होते, ही जीप बुरी तरह लडखडा.. गई-सरदार ने उसे बडी मुश्किल से संभाला-तभी उसने जीप से बाहर कूदकर विजय पर फायर किया I

साथ ही चीखा… "गद्दी के नीचे हथियार हैं…जल्दी से संभाल लो!"

विकास सहित अभी तक ठीक से किसी की भी समझ में कुछ नहीं

आया था…क्रितु यह समय किसी किस्म की बातों' में खोने का नहीँ था अत सभी ने गद्दियो के नीचे से हथियार निकाल लिए…विकास

के हाथ में एक मशीनगन आई जिसे सभालकर वह जीप से कूद पडा ।

"थोडे दाई' तरफ और थोडे बाईं तरफ़ पोजीशन ले लें ।" सरदार ने कहा l

रक्त_ तिलक के एक सदस्य के साथ हाशमी ने दाईं तरफ़ और मुमताज ने दूसरे दो सदस्यों के साथ बाईं तरफ जप लगा दी । तभी बिजय की तरफ़ से एक गोली चली. । .

मुमताज चीखी और त्योराकर चकरोड पर गिर पडी, क्योंकि गोली उसके दाएं पैर की पिंडली मेँ लगी थी…यह वह क्षण था, जबकि विकास ने खुद को जीप की बैक में किया ही था…मुमताज को गिरते देखकर, वह अभी उस पर झपटने ही वाला था कि....

"नहीं मिस्टर बिकास ।"

विकास ने घूमकर उधर देखा बोला-"सरदार ।"

"हा I!"

बिकास उसके चेहरे कौ ध्यान से देखने लगा ।

"यह मेरा असली चेहरा नहीँ हे ।"

"वह तो मैं देख रहा हू ।" विकास ने कहा…"खैर--पहले मुमताज ।"

कहने के साथ ही जब उसने उस तरफ देखा जहां गोली लगने के वाद मुमताज गिरी थी तो वहा से मुमताज को गायब देखकर चकित रह गया---…उसके मुंह से बरबस ही निक्ला "अरे ।"

" बहुत हिम्मत वाली वह-जख्मी होने के बावजुद उस पेड के पीछे जा छुपी हे ।"

विकास ने उस पेड की तरफ देखा…सचमुच पेड का जड के समीप उसे मुमताज के लवे बाल लहराते नज़र आए…वह उस पेड के पीछे पोजीशन लिए खडी थी ।

" अजीब जीवट और जिद्दी लडकी है ।" सरदार बुदवुदाया--" पहले से ही जख्मी थी…हमने कितना समझाया लेकिन नहीं मानी-इस आपरेशन में शामिल होकर ही रही और अब फिर-बेचारी को एक गोली और लग गई है-पता नहीं कब तक जिंदा रहेगा ।"

उसकी तरफ देखते हुए विकास ने अजीब स्वर में पूछा…" आप उसकी तरफ से विशेष चिंतित हैं ।"

विकास का अभिप्राय समझते हुए सरदार मोहक ढग से मुस्कराया I

फिर एकाएक ही विषय बदलकर बोला-"यह समय बातों में गवाने का नहीं है-हग्लाकि हमारा प्लान बहुत सुदृढ था किन्तु बिजय ने इस जीप के टायर नष्ट करके गडबड कर दीl"

‘"क्या मतलब?"
 
"यह सब कुछ तुम्हारे , हाशमी और मुमताज के लिए किया गया हे…जिस वक्त विजय ने वेन को गड्डे मे फसा दिया था, हम उसी वक्त समझ गए थे कि क्या होगा…हमने तुम सबको उनके पजे से निकालने कै लिए यहां जाल फैला दिया था…-सडक पर रक्त तिलक के सदस्यों और सैनिकों के बीच जग चल रही है…इस चकरोड के उस दाहने पर रक्त तिलक के बहुत से नौजवान तैनात हैं वे किसी सैनिक क्रो इधर नही आने देगे…सिर्फ. बिजय ही उनसे इधर है…उसे हम सभाल लेगे-आप निकल जाइए।"

"क्या मतलब? "

"आप पैदल ही उस तरफ दौड जाइऐ जिस तरफ हम जीप ले जा रहे थे…यह चकरोड सिर्फ` तीन किलोमीटर लबी है-इसके बाद चकरोड पर एक अन्य सडक मे जा मिलेगी-वहीं, जीप लिए आपको रक्त तिलक के तीन सदस्य मिलेगे-वे आपको सुरक्षित अड्डे पर पहुचा देंगे ।"

"मैं अकेला ही क्यों?"

"आप सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं ।"

'मैँ समझा नहीं ।"

"मिस्टर विजय सिर्फ आपके लिए सघर्ष कर रहे हे, अत: दाव लगते ही वे आपको जान से भी मार सकते हे और आप हमारे लिए महत्वपूर्ण… हैं…आपकी वजह से हमारे काम करने की रफ्तार बहुत बढ गई हे…प्लीज. मिस्टर विकास आप निकल जाइए…अरे.... ।"

"क्या हुआ?"

"चकरोड पर मिस्टर विजय कहीं भी नजर नहीं आ रहे हैं ।"

बिकास ने भी चकरोड पर दूर-दूर_तक नजर धुमाई-धूल साफ हो चुकी थी, किंतु विजय कही भी नजर नहीं आ रहा था-बिकास ने चकरोड के दोनो तरफ़ मोजूद खेतों क्रो देखा-उनमे ईख खडी थी-कह उठा----"लगता हे बिजय गुरु इन दोनों ईखों में से किसी एक में घुस गए ।"

"ओर-ईखों के अदर-ही-अदर तो वे काफी आगे तक आ सकत्ते हैं बल्कि हमसे आगे भी निकल सकत्ते हैं …आप तो जानते हे मिस्टर विकास-आपके गुरु बहुत चालाक हे-यदि वे चलाकी से आप तक पहुच गए तो हमारी सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा-प्लीज आप निकल लीजिए ।"

जाने क्यो इस वक्त विकास ने सरदार की राय पर अमल करने का ही निश्चय किया-अभी उसने पहला कदम बढाया. ही था कि बाईं तरफ़, से किसी के गिरने की आवाज आई-विकास के साथ सरदार की दृष्टि भी, उधर घूम गई, फिर एक साथ दोनों के मुह से निक्ला…"'अरे!" . .

पेढ़ के पीछे खडी. मुमताज गिर गई थी और इस वक्त वह पुन: उठने का प्रयास कर रही थी ।

विकास ने प्रश्नसूचक दृष्टि से सरदार की तरफ़ देखा ।

"यदि आप ले जा सकें तो …मुमताज को भी यहा से निकालकर ले जाए ।"

कोई जबाव देने के स्थान पर विकास मुमताज की तरफ़ बढ गया ।

सरदार ने उस तरफ से ध्यान हटाकर ऊची आवाज मे कहा…" 'दाई तरफ़ की ईख को घेर लो हाशमी-मिस्टर विजय उसी में कहीं हैं-वे हमसे आगे न निकल पाएं ।"

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विकास अपनी पूरी गति से चकरोड पर दौडा चला जा रहा था-उसके एक हाथ में गन थी, दूसरे हाथ मे कंधे पर पडी मुमताज को पकड रखा था उसने-विकास के भागने के कारण उसके जख्मो मे असहनीय पीडा हो रही थी जिसे दातों से होठ दबाकर वह पीने की चेष्टा कर रही थी ।

फिर भी रह ऱहकर उसके कंठ से चीख निक्ल ही जाती I

अभी विकास ने आधा रास्ता ही तय किया था कि मुमताज कह उठी-"व विकास भागते हुए ही विकास ने पूछा---"क्या बात है?"

"र....रुक जाओ !"

"व.... बिकास-रुक. जाओं…प्लीज़-अब दर्द नहीँ सहा जा रहा ।"

विकास रूक गया किन्तु उसे सात्वना देने के ढग से बोला----- "घबराओ नहीं मुमताज-अब ज्यादा रास्ता नहीं रह गया हे-कुछं चलने ' के बाद हमें अपने साथियों की जीप मिल जाएगी ।" ~

"प्लीज विकास-बात मानो…मुझे लिटा दो ।"

'" तुम्हारा सरदार ठीक ही कहता था I” चकरोड से थोडा हटकर विकास दोनों घुटने घास पर टेकते हुए कहा…"तुम बहुत जिद्दी हो-पहले से ही इतनी जख्मी होने के बावजूद I”

मुमताज के होंठों पर फीकी सी मुस्कान उभरी बोली---" सुना है कि इस दुनिया के सबसे बडे जिद्दी तुम हो ।"

"इस वक्त तो तुम्हारी ही जिद रही ।" विकास ने उसे आहिस्ता से घास पर लिटाते हुए कहा-"यदि मैं सबसे बडा जिद्दी हूं तो इस वक्त तुम मुझसे जीतकर.....॥"

"जीते तो तुम हो विक्की-मै तो तुमसे अपना सब कुछ हार गई ।"

"मुमताज ।" लडके की आवाज काप गई ।

"आह..॥ " वह दर्द वश कराहीँ-तडपी किंतु फिर होठो को भीचकर वोली-"हा विकास-सचमुच मुझसे हर कदम पर जीते हो-उफ्-म... मुझे माफ नहीं करोगे?"

"म मगर तुमने किया ही क्या है?"

"गालिया दी बुरा-भला कहा है-नेकी का दुश्मन और बदी का मददगार भी कहा है तुम्हें ।"

"ऐसा मत कहो मुमताज. ।" विकास के रोएं खड़े हो गए ।

"मैं तो तब भी नहीं थी जब तुम्हें गालियां दे रही थी-अब तो खुद को ही दे रही हूं-तुम मुझे भला क्या रोक सकोगे बिकास-लेकिन अपने उस व्यवहार के लिए हाथ जोडकर माफी माग रही हू-मुझे माफ कर दो विकास-दिल से-मैने तुम्हें नरभक्षी कहा था न?" बडी ही मासूमियत के साथ कहती हुई मुमताज ने अपने खून से लथपथ हाथ सचमुच जोड दिए ।

विकास ने उन हाथों को पकड़ा, बोला…"ऐसा नहीं कहते मुमताज-वह उत्तेजना की बात थी…वह सब कुछ तुमने नही-तुम्हारे दिल में भभक रहे जज्जार्तो के ज्वालामुखी ने कहा था ।"

"सिर्फ एक बार. कह दो विकास, कि तुमने मुझे माफ़ कर दिया ।”

" मुमताज ।"

" प्लीज विक्की !"

"म . . .माफ़ किया जिद्दी लडकी-माफ किया ।" विकास ने ज़बड़े कसकर भीच लिए ।

"मुमताज ने आखें' बद' कर लीं…मुखड़े पर ऐसे भाव उभरे थे मानों उसके दिलो-दिमाग से कोई बहुत बडा, बोझ हट गया हो-गहरी-गहरी सासे लेने लगी थी वह-जब काफी देर तक इसी स्थिति मे रही तो घबराकर उसे झझोंडता हुआ विकास चीखा…"मुमताज-मुमताज।"

सीप-से नेत्र खूले I

"क्या हो रहा तुम्हें …हिम्मत रखो ।"

"मेरे डैडी को शादी का बहुत अरमान था-वे कहा कहते थे कि अपनी लाडली की _शादी वे इस दुनिया के सबसे बहादुर और नेक युवक से करेंगे ।"

लडके की आवाज थर्रा गई -'"म. . मुमताज ।"

"जानते हो क्यों?" मुमताज कह उठी…“पूछोगे नही विक्की-प्लीज पूछो ।"

"क्यों?"

"उनका विश्वास था कि जिसके लिए उनकी बेटी अपनी माग में सिंदूर भरेगी-वह अमर हो जाएगा विक्की-उसे कभी दुनिया की कोई ताकत नहीँ मार सकेगी-बे एक बहादुर और नेक इंसान को अमर करना चाहते थे ।"

"चुप हो जाओ मुमताज-प . प्लीज ।"

"देखो विवकी-देखो, सादात की बेटी माग भर रही है ।" कहने के साथ ही मुमताज ने अपनी माग में खून भर लिया, बोली-" तुम समझो या न समझो, लेकिन मैं जानती हू क्रि यह माग किसके लिए भरी हे-मेरा खुदा जानता हे औरा वही किसी को अमर भी कर सकता है ।"

हाथ झूल गया-गर्दन ढुलक गई-

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"उस जंग में हम बुरी तरह हारे हैं ।"

हाल… में चहलकदमी करते हुए सरदार ने बताया-"हालाकि पूरा मोर्चा योजनाबद्ध तरीके से किया गया था और हमें जीत की पूरी उम्मीद थी, किंतु उस मोर्चे पर हमारी हार हुई…बस हमारे हमले के पहले क्षण साथ रहे-वे भी शायद इसलिए क्योकि हमला हमने अचानक किया था वर्ना बाद में तो हालत यह हो गई कि बडी मुश्किल से हम और हाशमी वहा से जान बचाकर भाग सकै।।”

"ऐसा क्या होगया था ?"

" मिस्टर विजय सचमुच ईख में ही घुसे थे और उनकी कोशिश ईख के अदर-ही-अदर' हमें पार करके तुम्हारे और मुमताज के पीछे जाने की थी…लेकिन हमने उन्हें देख लिया-जमकर गोलियां चलीं…हम उन पर कावू पाने ही वाले थे कि सडक की तरफ़ से मिस्टर विजय की मदद के लिए वहुत-से सेनिक वहां पहुच गए-हम समझे कि चकरोड के दहाने पर हमने जो रक्त तिलक के युवकों का मोर्चा जमाया था, वह टूट चुका है और उसके टूटने का सीधा अर्थ यह था कि सडक. पर हमारी हार हुई है-चकरोड पर इतने ज्यादा सैनिक आ गए, थे कि उनसे टकराना एकदम बेवकूफी थी-रक्त तिलक के उन तीन बहादुरों ने जीप के पास खुद मोर्चा संभालकर हमे और हाशमी को निकाल दिया-सगठन' की जरूस्त के लिए हमें निकलना पड़ा I"

"उधर मुमताज भी बीच ही मे हिम्मत हार गई थी I" बिकास ने बताया-"एक बार को तो मुझे ऐसा लगने लगा था कि वह जीवित नहीं बचेगी, किंतु किस्मत से वह सिर्फ बेहोश होकर रह गई-बडी मुश्किल से मैं वहा से लेकर जीप तक और जीप द्धारा यहां तक पदुचा हूं ।"

"ओह-अब मुमताज कहां है?"

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"अपने कमरे मे…बिस्तर पर पडी अभी तक बेहोश है-रक्त तिलक का डॉक्टर उसके पास है ।"

सरदार के जिस्म पर इस वक्त उसका पंरपरागत लिबास यानी स्याह चुस्त कपडे और चेहरे पर नकाब था…उसकी तरफ देखते हुए हाशमी ने पूछा-"मुमताज की जगह. . .?"

"हम यही सोच रहे थे हाशमी-हमारे पास फिलहाल मुमताज का स्थान लेने के लिए तुमसे बेहतर शख्स नहीं है-मुमताज के ठीक होने तक रक्त तिलक के प्रत्यक्ष सरदार तुम ही, हो-तुम्हें बहुत जल्दी देश के युवको की एक मीटिग काल करनी है।”

" जो हुक्म सरदार !" हाशमी ने सम्मानित स्वर र्में कहा ॥

"तुम जा सकते हो ॥"

हाशमी फौजी अवाज' में टक…टक करता हुआ चला गया-उसके जाने के कुछ देर बाद तक हाँल में खामोशी छाई रही, फिर सरदार बोला…"तुम उसी समय से बहुत ज्यादा व्यस्त हो मिस्टर विकास जिस क्षण मजलिस्तान की घरती पर कदम रखा…थक गए होगे-मेरी सलाह है कि आप आराम करे ।"

" क्या फिलहाल करने के लिए कोई काम नहीँ है?"

"'काम .तो हे,लेकिन... ।"

"मैँ कभी नही थकता... ।"

" फिर भी-आप पर हमारा कोई दब्राव_ नहीं जा हम आपसे कोई काम करने के लिए कहें-आपकी मर्जी है…हां, हमारी यह इच्छा. जरूर है कि इस मुल्क के पिसते हुए अवाम के लिए हमारी मदद करें ।"

बिकास ने सपाट स्वर में कहा…"काम बोलिए ।"

"जिस तरह मजलिस्तान की घरती पर सेमिनार का जगी हवाई अड्डा, तैयार हो रहा था, उसी तरह मजलिस्तान के समुद्र की गहराइयों 'में एक गुप्त सेमिनेरियन नौसेनिक अड्डे का निर्माण चल रहा है-यदि

हम उसे ध्वस्त कर दें तो मजलिस्तान में सेमिनेरियन सेना की कमर टूट जाएगी !"

"वह अड्डा कैसे तबाह हो सकता है?"

"स्पर्श सुरर्गों' द्वारा ।"

"स्पर्श सुरंगे?"

"हां-क्या आप जानते है कि स्पर्श सूरंगे क्या होती हे?"

"जानता भी हूं और समुद्र की गहराई में स्पर्श सुरर्गों' का जाल बिछा मी सकता हूं लेकिन. .॥"
 
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