• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

लाल हवेली (एक खतरनाक साजिश)

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
मेरे सामने ऊपर को जातीं सीढ़ियां थी, मैं उधर ही बढ़ गया। तभी ऊपर के किसी कमरे से जोर-जोर से हँसने की आवाज सुनाई दी।

सीढ़ियाँ चढ़कर मैं अंदाजन उस कमरे के आगे पहुँचा। पैरों की ठोकर मारकर मैंने दरवाजा खोल दिया। अंदर एक पुरुष और दूसरी तकरीबन बीस-इक्कीस साल की सांवली किंतु सुंदर युवती मौजूद थी, युवती को पुरुष अपनी गोद में बैठाये हुए था और उसके अंगों से खेल रहा था।

मुझे देखकर युवती उठ खड़ी हुई।

‘‘कौन है बे तू और भीतर कैसे धुस आया?‘‘ पुरुष बोला।

”मुझे दिलावर से मिलना है।“

”मैं ही हूँ, अब बता तू कौन है और बिना इजाजत अंदर कैसे आ गया, और ये राम सिंह कहाँ मर गया। उसने तुझे अंदर कैसे आने दिया?

”वो अब किसी को रोक पाने की हालत में नहीं है। बेचारा बहुत कमजोर था, मेरा एक घूंसा भी बर्दाश्त न कर सका और बेहोश हो गया।“

”क्या बकता है?“

”मैं सच कह रहा हूँ यकीन नही ंतो पहले खुद देखकर तसल्ली कर लो।“

”जरूरत नहीं अब तू फौरन अपना नाम बता।“

”पहले लड़की को बाहर भेजो।“

”क्यों?“

”क्योंकि मैं नहीं चाहता कि जब मैं तुम्हारा कत्ल करूँ तो ये मुझे ऐसा करते देखे, वरना खामख्वाह में मुझे इसका भी कत्ल करना पड़ेगा।“

मेरी बात सुनकर वह केवल एक क्षण को सकपकाया फिर उसने लड़की को इशारा किया, वह चुपचाप कमरे से बाहर निकल गई, ”अब बता कौन है तू?“

”राज।“ मैं बोला - ”याद आया कुछ।“

”नाम कुछ सुना हुआ लगता है।“

”जरूर लगता होगा, आखिर कल लाल हवेली में मैंने तेरे एक आदमी का कत्ल जो कर दिया।“

”ओह! तो तू है वो राज, चल अच्छा हुआ तू खुद यहाँ पहुँच गया। मैं तुझे पकड़ मंगवाने की जहमत से बच गया।“

”फिर तो वाकई अच्छा हुआ।“

कहकर मैं उसके सामने एक स्टूल पर बैठ गया।

वह फिर कसमसाया। वस्तुतः उसे मुझसे इतनी दिलेरी की उम्मीद नहीं थी। इसलिए वो समझ नहीं पा रहा था कि उसे मेरे साथ कैसा सलूक करना चाहिए। मैं दिलेर था भी नहीं, मुझे मालूम था मैं शेर की मांद में बैठा था। मगर मेरी बनावटी दिलेरी का हमेशा अच्छा प्रभाव पड़ता था - अभी भी पड़ रहा था। तभी तो शहर का बादशाह कंफ्यूज हो रहा था।

साहबान डर सभी को लगता है, इसलिए डरना बुरी बात नहीं है। मगर मुकाबला जब अपने से ताकतवर व्यक्ति से हो तो कभी भी अपने भीतर के डर को उसपर जाहिर ना होने दें।

‘‘क्या चाहता है तू।‘‘ वह कसमसाता हुआ बोला।

”उस व्यक्ति का नाम और पता जिसके कहने पर तुम लाल हवेली के अंदर अजीबो-गरीब, हास्यपद नौटंकियां करा रहे हो, जिससे हमारे शहर में तो कोई बच्चा भी नहीं डरता।“

‘‘तू सोचता है तू पूछेगा और मैं तुझे बता दूंगा।‘‘

‘‘हां मैं यही सोचता हूं।‘‘

”फिर तो तू बुरा फंसा बेटा क्योंकि उसका नाम तो मैं भी नहीं जानता।‘‘

मुझे लगा वो झूठ बोल रहा है। मैंने फौरन अपनी अड़तीस कैलीवर की रिवाल्वर निकाल कर उस पर तान दिया। मगर उसकी सूरत से तनिक भी ऐसा जाहिर नहीं हुआ कि वह रिवाल्वर से खौफजदा हुआ हो, उल्टा वह मुस्कराता हुआ बोला - ”लगता है तूने आत्महत्या का निश्चय कर ही लिया है।“

”बकोमत“ - मैं गुर्राता हुआ बोला - ”मेरा निशाना कभी नहीं चूकता, मैं दावा करता हूँ कि मेरे रिवाल्वर से निकली पहली गोली ही तुम्हें जहन्नुम पहुंचा देगी।“

”तो फिर चलाओ गोली, देर किस बात की है।“

ठीक तभी मुझे अपनी पीठ पर किसी गन की नाल का दबाव महसूस हुआ।

”खबरदार“ - कोई कर्कश स्वर में बोला - ”हिले तो गोली।“

मैं अपनी जगह पर फ्रीज हो गया।

”रिवाल्वर नीचे गिरा दो।“-हुक्म मिला।

मैंने वैसा ही किया।

”शाबाश कुलदीप“ - दिलावर बोला - ”अब इसकी तलाशी ले इसके पास दूसरी गन हो सकती है।“

मेरी तलाशी ली गई, तलाशी लेने वाला रामसिंह था जिसे मैं नीचे धूल चटा आया था। उसे मेरी दूसरी रिवाल्वर की खबर नहीं लगी।

मेरी रिवाल्वर से गोलियाँ निकालकर उसने रिवाल्वर मेरी कोट की जेब में ठूँस दी।

”अब क्या कहता है?“ - दिलावर सिंह बोला।

”वही जो कि पहले कहता था, मुझे उस व्यक्ति का नाम और पता चाहिए जिसके कहने पर तुमने हवेली में ड्रामा फैला रखा है।“

”भई मान गये तेरी दिलेरी को, मौत सामने देखकर भी, अपनी बकवास से बाज नहीं आ रहा।“

जवाब में मैंने जोर से अट््टहास किया।

‘‘लगता है मौत सामने देखकर पागल हो गया ये।‘‘ कहकर दिलावर ने ठहाका लगाया तो उसके दोनों आदमी भी जोर से हंस पड़े।

‘‘मैं तुम्हारी कमअक्ली पर हंस रहा हूं खलीफा। तुम्हें क्या लगता है यूं दिन-दहाड़े बिना किसी तैयारी के मैं यहां घुस आया। तरस आता है मुझे तुम्हारी अक्ल पर।‘‘

तत्तकाल उसकी हंसी को ब्रेक लगा, ”क्या कहना चाहता है?“

”यही कि यहाँ आने से पहले मैं इंस्पेक्टर जसवंत सिंह को बताकर आया हूँ कि मैं तुमसे मिलने जा रहा हूँ। ऐसे में अगर तुमने मेरा कत्ल किया तो किसी भी हालत में खुद को बचा नहीं पाओगे। भले ही तुम कितनी भी बड़ी तोप क्यों न हो! अब हंस सकते हो तो हंस के दिखाओ....हा-हा-हा।“

दिलावर सोच में पड़ गया।

”मुझे तो लगता है“ - कुलदीप बोला - ”ये सिर्फ अपनी जान बचाने की खातिर बहाने बना रहा है।‘‘

‘‘मुंह बंद रख अपना“ - दिलावर उसे डपटकर बोला, ‘‘इसे ले जाकर बाहर छोड़ कर आ और अगर ये दोबारा इधर का रुख करे तो बेशक इसे गोली मार देना। वैसे भी आज नहीं तो कल इसने मरना ही है।“

”यस बॉस आप फिक्र मत कीजिए“ - कुलदीप शिष्ट स्वर में बोला। फिर मुझसे मुखातिब हुआ - ”उठ रहा है या मैं उठाऊँ?“

”तुम मुझे नहीं उठा सकते, इसलिए उठना ही पड़ेगा।“

मैं खड़ा होता हुआ बोला - ”तुमसे फिर मिलूंगा दिलावर सिंह।“

दिलावर खामोश बना रहा।

मैं कमरे से निकला। कुलदीप की बगल से गुजर कर प्रवेश द्वार पर पहुँचा।

कुलदीप रास्ते में ही रुक गया।

”ज्यादा जोश में मत आओ कुलदीप, यह भीड़-भाड़ वाला इलाका है।“

”तो“

”अगर किसी ने मुझे तुम्हारी जान लेते देख लिया, तो परेशान हो जायेगा।“

”गेट आउट।“

जवाब में मैं जोर से हंसा।

”मैं जल्दी ही तुम्हें जहन्नुम का रास्ता दिखाऊँगा।“

”अभी कोशिश कर लो।“

वह केवल कसमसा कर रह गया।

मैं पलट का अपनी कार की तरफ बढ़ गया। जब तक मैं अपनी कार में नहीं बैठ गया, मुझपर यह खौफ हावी रहा कि अभी एक सनसनाती हुई गोली आकर मेरा काम तमाम कर जाएगी। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। बहरहाल मैं पलीते को चिंगारी दिखा चुका था। कोई ना कोई नतीजा तो सामने आना ही था।

मैंने कार आगे बढ़ा दी।

फौरन एक फिएट मेरे पीछे लग गई।

मैं बजाय लाल हवेली जाने के शहर के बाहर निकलकर शाहजहाँपुर जाने वाले हाइवे पर मुड़ गया। फिएट पूर्ववत्् पीछे लगी रही। इस वक्त सड़क पर यातायात बहुत ही कम था, अंततः ऐसा समय आया कि सड़क पर काफी दूर तक आगे-पीछे मेरी इम्पाला और फिएट के अलावा अन्य कोई वाहन नजर नहीं आ रहा था।

रियर व्यू मिर््र पर निगाह जमाये मैंने देखा फिएट में दो व्यक्ति सवार थे। मगर दूरी अधिक होने की वजह से मैं उनकी शक्ल नहीं देख पाया।

मुझे उनके इरादे नेक नहीं लग रहे थे। क्या वो दिलावर के आदमी थे? मेरा मन नहीं माना। मैंने होलस्टर में से पच्चीस कैलीवर की रिवाल्वर निकालकर उसे अपनी गोद में रख लिया। और कार की रफ्तार कम कर दी।

फिएट मेरे बगल में पहुँची, उसमें दो अपरिचित चेहरे सवार थे। मैं पलभर को उनके झांसे में आ गया, मुझे लगा वो लोग सिर्फ मुझे ओवरटेक करना चाहते हैं। मगर ठीक तभी मुझे पैसेंजर सीट पर बैठे व्यक्ति के हाथ में रिवाल्वर की झलक मिली, उसका रिवाल्वर वाला हाथ धीरे-धीरे ऊपर उठता दिखाई दिया। दूसरा कार चलाने में मशरूफ था।

मैंने तत्काल बायें हाथ से स्टेयरिंग थामते हुए दायें हाथ से रिवाल्वर उठाकर उनकी कार के अंदर दो फायर झोंक दिये और पूरी ताकत से ब्रेक का पायडल दबा दिया।

फियेट आगे बढ़ी और कुछ दूर जाकर खड़ी हो गयी, उसका ड्राइविंग सीट का दरवाजा खुला, और फियेट का ड्राईवर बाहर निकल आया।

मैंने कार तेज गति से आगे बढ़ाई और उसे समीप पहुँचकर एकदम से रोक दी। हड़बड़ा कर वह पुनः कार के अंदर घुस गया। मैंने कार को बैक गियर में डालकर रिवर्स किया और यू टर्न देकर वापस सीतापुर की ओर ड्राइव करने लगा। बैक व्यू मिरर पर निगाह गई तो पाया कि कार के आस-पास भीड़ इकट्ठी होना शुरू हो गई थी।
 
मैंने घड़ी देखी साढ़े तीन बजे थे। मैंने तहसील की ओर ड्राईव करना शुरू कर दिया। जहां उस शहर कोतवाल ने मुझे चार बजे पहुंचने को कहा था। ठीक चार बजे ना एक मिनट पहले ना एक मिनट बाद में। लेकिन मेरे लिए वक्त से पहले वहां पहुंचना जरूरी था क्योंकि मैं बलि का बकरा नहीं बनना चाहता था। अगर वहां मेरे लिए कोई जाल बिछाया गया था, तो वक्त रहते मुझे उसकी जानकारी होनी चाहिए थी।

तीन पैंतालिस पर मैं तहसील के सामने से गुजरा। कार की स्पीड बिल्कुल स्लो थी, सावधानी से चारों तरफ निगाह दौड़ाता मैं आगे बढ़ गया मगर कोई संदिग्ध बात या व्यक्ति मुझे दिखाई नहीं दिया। क्या माजरा था, कुछ तो होना चाहिए था।

अगले चौराहे से यू टर्न लेकर मैं दोबारा तहसील के सामने से गुजरा लेकिन इस बार भी कुछ नया दिखाई नहीं दिया सिवाय एक जीप के जो उसी वक्त वहां आ खड़ी हुई थी। थोड़ा आगे जाकर मैंने कार रोक दी और इंतजार करने लगा। मगर नया कुछ घटित नहीं हुआ। तीन बजकर पचपन मिनट हो चुके थे, मैंने कार आगे बढ़ाई और आगे से यू टर्न लेकर धीमी रफ्तार से चलता हुआ तहसील की ओर बढ़ा। अब जो होना था उसको फेस करने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं था।

अभी मैं तहसील के गेट से लगभग सौ मीटर दूर था जब अचानक मेरे पीछे एक पुलिस की जीप प्रगट हुई। जीप में ड्राईवर के साथ आगे बैठा कोतवाल दिखाई दिया।

ठीक चार बजे मैंने तहसील के गेट पर अपनी कार रोक दी और दरवाजा खोलकर बाहर निकला, तब वो मुझे दिखाई दिया। कल रात वाले दो कंकालों में से एक नरेश जिसे मैंने पुलिस के हवाले किया था, जो बाद में पुलिस की मेहरबानी से आजाद हो गया था। वहां खड़ी जीप में वही सवार था। अब बहुत देर हो चुकी थी, उसके हाथ में थमी पिस्तौल का निशाना मैं था। आस-पास बचाव की कोई जगह नहीं थी। मैं एकदम खुले में था और वह जीप में बैठा हुआ था। हमारी निगाहें मिलीं, उसके होंठो पर एक क्रूर मुस्कराहट उभर आई।

तो ये था पुलिस का गेम। मुझे उसके हाथों मरवाना और फिर उसका एनकाउंटर। अब तक कोतवाल अपनी जीप से उतर चुका था।

अचानक कुछ ऐसा हुआ जो मेरी तमाम उम्मीदों के परे था। कोतवाल की रिवाल्वर का घोड़ा दबा, गोली चली, निशाना एकदम परफेक्ट था। गोली सीधा मुझपर हमला करने को तैयार नरेश के माथे में तीसरी आंख बना गई।

मैंने हकबकाकर कोतवाल की तरफ देखा तो उसने हौले से एक आंख दबा दी। मैं हड़बड़ा सा गया। क्या कमाल का पुलिसवाला था। जो इंसाफ वह थाने में नहीं कर सका था यहां खुलेआम कर दिखाया था और मैं नाहक उसपर शक कर रहा था। मुझे तो उसी वक्त समझ जाना चाहिए था, जब उसने कोतवाली में बड़े ही जोर शोर से यह दावा किया था कि - इंसाफ तो होकर रहता है। हमेशा होता है, बस करने का अंदाज बदल जाता है - तो ये था उस इंस्पेक्टर का इंसाफ करने का तरीका, ना गिरफ्तारी, ना चार्जशीट, और ना ही कोर्ट का चक्कर।

यकीनन कमाल का आदमी था वो।

अगला एक घंटा, पुलिसिया कार्रवाई चली, जिसमें मुझे टांग नहीं अड़ाने दिया गया। इस दौरान मैंने कई बार कोतवाल से बात करने की कोशिश की किंतु हर बार उसने मुझे डांट कर चुप करा दिया। इसके बाद मुझे थाने ले जाया गया जहां उसका सर्किल ऑफिसर मौजूद था। उसने जमकर मेरी क्लास ली, फिर आखिरकार कुछ हांसिल होता ना पाकर मुझे बयान दर्ज करवाने के लिए बगल के कमरे में भेज दिया।

बीस मिनट बाद मैं वहां से फ्री हुआ तो जसवंत सिंह से मिलने की खातिर उसके कमरे की ओर बढ़ा। अभी मैं दरवाजा नॉक करने ही लगा था कि भीतर से आती उसके सर्किल ऑफीसर महानायक सिंह राजपूत की आवाज मुझे सुनाई दी।

मैं दरवाजे पर ही ठिठक गया।

‘‘क्या फायदा हुआ उसे छुड़ाकर ले जाने का। हवालात में होता तो जिन्दा होता। अब मुझे आगे जवाब देना कितना कठिन होगा तुम्हें इसका अंदाजा भी है?‘‘

मेरे कान खड़े हो गये।

‘‘जनाब मैं माफी चाहूंगा‘‘ - कोतवाल जसवंत सिंह की आवाज सुनाई दी - ‘‘मगर मुझे क्या पता था वह कौन है, जीप के भीतर बैठे होने की वजह से उसकी सूरत मैं देख नहीं पाया। मुझे तो बस इतना दिखाई दिया कि वह किसी पर फायर करने को एकदम तैयार था। एक सेकेंड की भी देर होती तो वह गोली चला चुका होता। मैंने उसके हाथ का निशाना लेकर गोली चलायी मगर उसने ऐन वक्त पर सिर खिड़की से बाहर निकाल लिया। नतीजा ये हुआ कि जो गोली उसके हाथ में लगनी थी सीधा माथे में जा घुसी। मैंने एक पल की भी देरी की होती तो वह उस छोकरे का सरेराह कत्ल कर चुका होता।‘‘

‘‘तो मर जाने देते साले को, वह क्या तुम्हारा सगेवाला था। वैसे भी साला जब से सीतापुर आया है नाक में दम करके रख दिया है।‘‘

‘‘सर मैं ऐसा ही करता अगर मुझे पता होता कि जीप में दिलावर साहब का आदमी है। यकीन जानिए सर उसकी किस्मत ही खराब थी वरना ऐन मौके पर मैं वहां ना पहुंच गया होता। अगर आप कहें तो उस छोकरे को क्या नाम है उसका.....हां राज! ठिकाने लगा दूं! प्राइवेट डिटेक्टिव ही तो है साला कोई तोप थोड़े ही है।‘‘

‘‘जसवंत होश में आओ, गलती से भी ऐसा मत कर बैठना। मैंने उसके बारे में दिल्ली से पता करवाया है। बहुत पहुंचा हुआ खलीफा है वह, दर्जनों ऐसे केस सॉल्ब कर चुका है जिसमें पुलिस हारकर एफआर लगा चुकी थी। वहां के सरकारी अमले और उच्च वर्ग में उसकी अच्छी पहुंच है। वह अगर पुलिस की गोली का शिकार हुआ तो पूरी कोतवाली लाइन हाजिर हो जाएगी। फिर ना तुम इंस्पेक्टर रहोगे ना मैं सीओ, फिर दिलावर सिंह भी पहचानने से इंकार कर देगा।‘‘

‘‘और उससे भी बड़ी बात कि तुम लाल हवेली वालों की पहुंच को भूल रहे हो। पता नहीं वह लड़की क्यों खामोश बैठी है अब तक। एक बार अगर उसने पुलिसिया कार्रवाई पर सवालिया निशान लगाया नहीं कि प्रलय आ जायेगी, सारे गड़े मुर्दे उखाड़ने पड़ेंगे। जांच के लिए अगर कोई बाहर से कमेटी बैठा दी गयी तो समझो सब खत्म! नतीजा ये होगा कि जिस बात पर हम पर्दा पड़े रहने देना चाहते हैं वह उजागर हो जायेगी और अब तक की सारी मेहनत पर पानी फिर जायेगा।‘‘

‘‘कौन सी बात सर!‘‘

‘‘आं....कुछ नहीं यूंही मैं जरा लाउड थिंकिंग करने लगा था। दरअसल कहीं ना कहीं मुझे भी लगता है कि मानसिंह की मौत महज हादसा नहीं थी। मगर क्या करें अफसरों की सुननी पड़ती है, शहर में अमन चैन जो कायम रखना है। अच्छा अब चलता हूं, कोई अहम बात हो तो रिपोर्ट करना।‘‘

‘‘यस सर!‘‘

मैं वापस उसी कमरे में जा घुसा जहां मेरा बयान दर्ज किया गया था।
 
‘‘अरे तुम गये नहीं अभी तक?‘‘ राइटर बोला।

‘‘जाकर आया हूं, मैं शायद यहां अपना सिगरेट का पैकेट और लाइटर भूल गया था।‘‘

‘‘यहां तो नहीं है।‘‘

‘‘ओह फिर शायद इंस्पेक्टर साहब के कमरे में होगा, मैं जाकर देखता हूं।‘‘

मैं बाहर निकल आया और आगे बढ़कर कोतवाल के कमरे का दरवाजा नॉक कर दिया।

‘‘आ जाओ भाई।‘‘

मैं भीतर दाखिल हुआ, ‘‘आपको पता था मैं ही हूं।‘‘

‘‘हां भई आजकल पूरे शहर को एक ही आदमी तो परेशान किए हुए है। लिहाजा तुम्हारे अलावा कौन हो सकता है। फिर दरवाजा नॉक करने की कर्टसी कौन दिखाता है यहां। मेरे साहबान या शहर के जाने माने लोग तो यूंही धड़धड़ाते हुए भीतर आ घुसते हैं, और रही बात यहां के स्टॉफ की तो वह दरवाजे से ही अपना नाम बता देते हैं।‘‘

‘‘ओह बढ़ियां लॉजिक है।‘‘

‘‘बयान हो गया।‘‘

‘‘जी हो गया‘‘

‘‘चाय पियोगे?‘‘

‘‘अगर आप को कोई असुविधा ना हो, तो बंदा यह इज्जत-अफजाई बहुत पसंद करेगा।‘‘

‘‘बिना लाग लपेट के कोई बात कहना नहीं सीखा मालूम होता है।‘‘ कहकर उसने घंटी बजाकर अर्दली को बुलाया और दो चाय लाने को कहा।

‘‘इजाजत हो तो एक सिगरेट सुलगा लूं।‘‘ - मैं उसे डनहिल का पैकेट दिखाता हुआ बोला।

‘‘इजाजत है भई, प्लीज गो अहैड, बल्कि एक मुझे भी दो। मैंने इतना मंहगे सिगरेट का कश नहीं लगाया कभी।‘‘

‘‘घिस रहे हो जनाब।‘‘

‘‘अरे नहीं भाई सच कह रहा हूं।‘‘

मैंने दो सिगरेट निकालकर एक उसे दिया और बारी-बारी से पहले उसका फिर अपना सिगरेट सुलगा लिया।

‘‘कमाई अच्छी होगी।‘‘

मैंने हड़बड़ाकर अपने पीछे देखा।

‘‘मैं तुमसे पूछ रहा हूं।‘‘

‘‘क्या?‘‘

‘‘इस धंधे में कमाई अच्छी होगी।‘‘

‘‘जी बस दाल रोटी चल जाती है।‘‘

‘‘दिल्ली में अच्छी पूछ है तुम्हारी।‘‘

‘‘बता रहे हो या पूछ रहो हो भगवन?‘‘

‘‘बता रहा हूं, सीओ साहब कह रहे थे कि उन्होंने दरयाफ्त कराया था तुम्हारी बाबत वहां से, जो जवाब हांसिल हुआ उसे लेकर वो बहुत फिक्रमंद हैं। वैसे हो बड़े किस्मत वाले बाल-बाल बचे आज तुम! वरना राज से मरहूम राज बन गये होते।‘‘

‘‘आपने ही बचा लिया जनाब शुक्रिया, बस एक सवाल का जवाब और मिल जाय तो दिल को चैन आ जाय।‘‘

‘‘पूछो?‘‘

‘‘नरेश को खबर कैसे लगी कि मैं चार बजे तहसील पहुंचने वाला हूं।‘‘

‘‘दिलावर सिंह के हाथ बिके यहां के एक पुलिसिये ने पहुंचायी‘‘ - कहकर वह तनिक रूका फिर बोला - ‘‘मेरे कहने पर।‘‘

मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा, ‘‘इसका मतलब वही है ना जनाब जो मैं सोच रहा हूं।‘‘

तभी चाय आ गई।

‘‘क्या सोच रहे हो?‘‘ अर्दली के जाने के बाद चाय की चुस्की लेता हुआ वह बोला।

‘‘यही कि नरेश के डैथ वारेंट पर आपने उसी वक्त साइन कर दिया था, जब मुझे ठीक चार बजे आपने तहसील के सामने पहुंचने को कहा था।‘‘

जवाब में उसकी होंठों पर बहुत ही शैतानी मुस्कान उभरी और फौरन लुप्त हो गयी।

‘‘अब मुझे जरूरी काम से बाहर जाना है अगर तुम रूकना चाहो तो हवालात में बिस्तर लगवा दूं।‘‘

‘‘नाहक तकलीफ करेंगे‘‘ - मैं उठता हुआ बोला - ‘‘मैं चलता हूं, चाय के लिये शुक्रिया! बाकी सब के लिए भी शुक्रिया।‘‘

मैं बाहर निकल गया।

बीस मिनट बाद मैं लाल हवेली पहुँचा। कार बाहर खड़ी कर मैं सीधा जूही के कमरे में गया। डॉली वहाँ पहले से ही मौजूद थी। वो दोनों आपस में गप्पे हांक रही थी, मुझे आया देखकर खामोश हो गईं।

”क्यों भई मेरी बुराई चल रही थी क्या जो दोनों एकदम से खामोश हो गईं।“

‘‘अरे नहीं हम बस गप्पे हांक रहे थे।“

”ओके, अब जरा इस पर गौर करो।“

कहते हुए मैंने कोतवाली से हांसिल जूही के बर्थ डे में शामिल लोगों के नाम और पते की लिस्ट जूही के सामने बैड पर रख दिया।

”ये क्या है?“

वह कागज उठाती हुई बोली।

”गौर करो खुद समझ जाओगी।“

जूही ने कागज पर निगाह दौड़ाई फिर सहमती में सिर हिलाती हुई बोली -‘‘ये उन लोगों के नाम और पते हैं जो कि पापा की हत्या वाली रात मेरी बर्थ डे पार्टी में शामिल थे।“

”ठीक समझी, ये वही लिस्ट है जो कि तफ्तीश के लिए यहाँ आये इंस्पेक्टर जसवंत सिंह ने खुद अपने हाथों से तैयार की थी।“

”मगर ये तुम मुझे क्यों दिखा रहे हो?“

”क्योंकि मैं तुम्हारी इस बात पर यकीन करके चल रहा हूं कि तुम्हारे डैडी की मौत कोई हादसा नहीं थी। किसी ने पूरी प्लानिंग के साथ उनका कत्ल किया था। आगे मुझे यकीन है कि हत्यारा इस लिस्ट में ही कहीं छिपा हुआ है। इसलिए इन तमाम नामों पर गौर करो, पार्टी वाले दिन को अपने जहन में ताजा करो। कहीं कुछ खटकता हुया महसूस हो तो मुझे बताओ।“

”फिर तो तुम्हें निराशा ही होगी। मैं कोई अंदाजा नहीं लगा सकती। मैंने पहले भी कई बार ऐसी कोशिशें की थीं मगर किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सकी।“

”एक बार और कोशिश करो शायद कुछ याद आ जाय कोई पुरानी रंजिश, कोई छोटी-मोटी तकरार, या फिर पार्टी में इनमें से किसी का कोई असामान्य व्यवहार, इनमें से कोई ऐसा व्यक्ति जो पार्टी के दौरान कुछ देर के लिए दिखाई देना बंद हो गया हो?“

उसने सहमती में सिर हिलाया और अपने काम में लग गई।

दस मिनट पश्चात्!

”देखो इनमें से जितने भी लोगों को मैं जानती हूं, मुझे नहीं लगता कि उनमें से कोई पापा का कत्ल कर सकता है।“ - वो लिस्ट मुझे वापस करती हुई बोली - ”अलबत्ता कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें मैं नहीं जानती अतः उनके बारे में कोई अंदाजा लगा पाना सम्भव नहीं है।‘‘

”गुड! ये अच्छा साइन है, मुझे बताओ वे कौन लोग हैं?‘‘ - मैं लिस्ट उसे दोबारा थमाता हुआ बोला - ” या ऐसा करो तुम उनके नामों को अंडरलाइन कर दो।“

उसने वैसा ही किया।

वो कुल जमा सात लोगों के नाम थे, जिनमें चार लेडिज और बाकी जेंस थे।

”तुम्हें अच्छी तरह याद है कि तुम इन सातों में से किसी एक को भी नहीं जानती।“

”हाँ, शक्ल देखकर पहचान जाऊं तो अलग बात है वरना नाम से तो नहीं जानती।“

‘‘ठीक है, गुड जॉब।‘‘

मैं अपनी पॉकेट डायरी निकाल कर केस से संबधित जरूरी बातें नोट करने लगा।

‘‘तुम लोग बैठो मैं कॉफी लेकर आती हूं।‘‘ कहकर जूही बाहर निकल गयी।

अपना काम खत्म कर मैंने डायरी जेब के हवाले की और डॉली से मुखातिब हुआ।

”अब तक बहुत ऐश कर लिया तूने, नहीं।“

”तुम क्यों जल रहे हो।“

”तू बैठे-बैठे ऐश जो कर रही है।“

”मैं काम कर रही हूँ।“

”अच्छा है“ - मैं बोला - मगर अब बैठने से काम नहीं चलेगा। सहेली तेरी है, उसके लिए कुछ करके दिखा।‘‘

‘‘उसका पैडीक्योर-मैनीक्योर कर दूं?‘‘

‘‘कमीनी।‘‘ मैंने उसे कसकर घूरा।

‘‘यूं प्यार से मेरी तरफ ना देखो प्यार हो जाएगा..‘‘ वो तरन्नुम में गाने लगी।
 
‘‘बकवास बंद कर, खड़ी होकर कुछ हाथ-पाँव चला और कुछ करके दिखा।“

मेरा इतना कहना था कि वो बैड से उठ खड़ी हुई, हवा में करीब तीन फुट उछली और अपनी फ्लाइंग किक से उसने कमरे में आठ फिट ऊपर लगे बल्ब को फोड़ डाला।

‘‘अरे बावली हो गई है क्या?‘‘ मैं हड़बड़ाया सा बोला।

वो पुनः बेड पर जा बैठी।

”ये तूने क्या किया।“

”तुमने ही तो कहा था“ - वह बड़े ही मासूम अंदाज में बोली - ‘‘कि खड़ी होकर हाथ-पाँव चलाऊँ और कुछ करके दिखाऊँ।“

”मैंने तुझे बल्ब फोड़ने के लिए कहा था।“

”नहीं कहा था, मगर क्या करूँ तुम्हारा सिर फोड़ते हुए मेरा दिल लरजता है।“

”यानी कि अगर बल्ब नहीं फोड़ती तो मेरा सिर फोड़ती।“

”जाहिर है, फोड़ने लायक और कोई चीज तो यहां मुझे दिखाई नहीं देती।“

”तू नहीं सुधरने वाली, खैर तुझसे तो मैं बाद में निपटूंगा। पहले जरा अपना काम निपटा लूँ।‘‘

”काम! तुम काम भी करते हो।“

”नहीं मैं तो यहाँ झक मारने आया हूँ।“

”वो क्या होता है?“

”नजदीक आ फिर बताता हूँ।“

”नहीं आऊँगी।“

”क्यों?“

”तुम कोई गन्दी हरकत करोगे।“

”मसलन।“

”तुम मुझे किस करना चाहते हो।“

”किस करना गंदी हरकत है।“

”और नहीं तो क्या?“

”मुझे तेरे चेहरे को चाटने का कोई शौक नहीं।“

”तलवे चाटना तुम्हे शोभा नहीं देता यार, कुछ तो मर्द बनो।“

”डॉली की बच्ची“ - मैं गुर्राता हुआ बोला - ”किसी दिन मैं तेरा कत्ल कर दूँगा वरना कहता बाज आ जा।“

वो उठकर मेरे पास आ गई।

मैंने लिस्ट उसे पकड़ा दी।

”तूने इन सबको बारीकी से चेक करना है। मरने वाले से इनके संबंध कैसे थे। उनका समाजिक दायरा कैसा है। उनकी पसंद-नापसंद। क्या इनमें से कोई मकतूल के रिश्तेदारों से कोई वास्ता रखता है। पिछले दो महीनों में क्या इनमें से कोई शहर से बाहर गया था, हां तो कहां गया था। अगर बाहर से कोई इनसे मिलने आया था तो कहां से आया था, कौन आया था? वगैरह-वगैरह, कहने का मतलब ये है कि तूने इनकी जन्मकुंडली खोद निकालनी है और ये काम तूने हर हाल में कर के दिखाना है, समझ गई।“

”वो तो खैर मैं समझ गई मगर लाख रुपये का सवाल ये है बॉस की इस बात की क्या गारंटी कि ये सभी औरत और मर्द ही हैं। हकीकतन इनमें से कोई दस-बारह साल की बच्ची या बच्चा भी तो हो सकता है।“

‘‘इसके चांसेज कम है मुझे नहीं लगता कि पुलिस ने इस लिस्ट में बच्चों का नाम दर्ज किया हो। क्योंकि बच्चे अपने पेरेंट्स के साथ आये होंगे इसलिए पुलिस ने उनका नाम लिखना जरूरी नहीं समझा होगा। इसके बावजूद मैं गलत हो सकता हूं। मगर फिर भी तुझे इन सबको चेक करना है। समझ गई, और मत भूल की हमारे पास आगे बढ़ने के लिए कोई लीड नहीं है, अभी तक हम अंधेरे में ही हाथ पांव मार रहे हैं।‘‘

”ओके अब एक बात मेरी सुनो! सुनो और समझने की कोशिश करो। देखो अगर मानसिंह का कत्ल हुआ है तो समझ लो वह सिर्फ और सिर्फ किसी मर्द का काम हो सकता है, यह औरतों वाली किस्म का अपराध नहीं है इसलिए हम इन लेडीज नामों को अलग करके अपनी जांच का दायरा सीमित कर सकते हैं।‘‘
 
वो ठीक कह रही थी। मैंने सहमति में सिर हिला दिया, ‘‘ठीक है मर्दों को चैक कर और कुछ काम की जानकारी हासिल करके दिखा।‘‘

‘‘दिलावर सिंह।‘‘

‘‘क्या!‘‘ मैंने हकबका कर चारों ओर देखा।

‘‘तुम दिलावर सिंह को क्यों नजरअंदाज कर रहे हो जिसकी टांग हर जगह फंसी पड़ी है। कितनी सारी बातें हैं जो उसके खिलाफ जाती हैं, और कितने सारे सवाल हैं जिसका जवाब उसके पास हो सकता है।‘‘

‘‘अब तू बच्चे मत पढ़ा किसी को नजरअंदाज नहीं कर रहा मैं। दिलावर सिंह की जो सख्शियत अब तक मेरे सामने आई है उसकी रू में उससे सीधा टकराना मतलब इस अजनबी शहर में अपनी जान से हाथ धो बैठना है। बावजूद इसके मैं एक बार रू-ब-रू हो चुका हूं उसके और दोबारा उससे सवाल जवाब के मुनासिब मौके की तलाश में हूं, इसलिये जो कह रहा हूं वो करके दिखा।‘‘

‘‘ओके‘‘

”कर लेगी यह काम।“

उसने सिर हिलाकर हामी भरी।

”शाबाश, अब फौरन काम पर लग जा।“

कहकर मैंने उसे अपनी कार की चाभी पकड़ा दी।

”यानी कि तुम आज दिन भर यहीं रहोगे।“

”नहीं, अगर मुझे कहीं जाना होगा, तो मैं जूही या प्रकाश की कार उधार ले लूँगा।“

”यानी अभी यहीं जमने के मूड में हो।“

”हाँ।“

”तुम मेरे साथ क्यों नहीं चलते?“

”तुझे डर लग रहा है।“

”नहीं बल्कि शक हो रहा है, तुम्हारी नीयत पर।“

”मैं समझा नहीं।“

”पूरी हवेली में इस वक्त नौकर चाकरों के अलावा केवल मैं तुम और जूही हैं।“

”तो।“

”मेरे चले जाने के बाद सिर्फ तुम और जूही।“

”प्रकाश भी तो है।“

”वो अपने कमरे में घोड़े बेच कर सोया पड़ा है।‘‘

”तो क्या हुआ?“

”क्या बात है बॉस इरादे तो नेक हैं।“ - वह संदिग्ध स्वर में बोली।

”मेरे इरादे हमेशा नेक होते हैं।“

”ठीक है फिर मैं जूही को अपने साथ ले जाती हूँ।“

”अरे नहीं, यहाँ सब गड़बड़ हो जायेगा।“

”यानी कि मेरा सोचना गलत नहीं है।“

”तौबा तू लड़की है या आफत।“ मैं झुंझला उठा।

वह मुँह दबाकर हँसी।

”साली“ - मैं भुनभुनाया - ”बेवजह दांत दिखाती है।“

”क्या कहा?“

तभी जूही कॉफी की ट्रे के साथ कमरे में दाखिल हुई।

”कुछ नहीं। ‘‘

”मैं जाऊँ।“

‘‘काफी पीकर जा।‘‘

अगले पांच मिनट कॉफी पीते हुए गुजरे।

इसके बाद डॉली कमरे से बाहर निकल गई।

‘‘अब तुम्हारा क्या इरादा है जवान।‘‘

‘‘कल का अधूरा काम पूरा करना चाहता हूं मैडम।‘‘

‘‘धत्त्!‘‘ वो शरमा गई। शरमा कर सिकुड़ गई।

‘‘असल में क्या चाहते हो जवान?‘‘ वो सिर झुकाये हुए हौले से बोली।

”मैं वो जगह देखना चाहता हूँ जहाँ तुम्हारे पिता जी के साथ वो हादसा हुआ था।“

”उसके लिए छत पर चलना होगा।“

”क्या हर्ज है।“

”कोई हर्ज नहीं चलो।“

मैं जूही के साथ सीढ़ियाँ चढ़कर छत पर पहुँचा, वो मुझे लेकर ऐसे स्थान पर पहुँची जहाँ से हवेली के कोने-कोने का पूरा नजारा होता था, फिर छत के बायें हिस्से में पहुँचकर वो ठिठक गई।

उसने छत के नीचे झाँककर देखा फिर संतुष्टि पूर्ण ढंग से सिर हिलाती हुई बोली - ”यहीं ठीक नीचे जमीन पर उनकी लाश पड़ी पाई गई थी।“

मैंने गौर से उस जगह को देखा, दूसरी मंजिल की बॉलकनी की रेलिंग कुछ बाहर निकली हुई थी। यही हाल पहली मंजिल का भी था। मुझे लगा यहां से गिरने वाला व्यक्ति नीचे बॉलकनी में भले ही न पहुँचे मगर उसका रेलिंग से टकराये बिना नीचे पहुँच जाना असम्भव था।

मैंने अपनी जेब से लाश की तस्वीर निकाल ली, फिर उस जगह का मिलान करने लगा, तस्वीर उसी जगह की थी, संतुष्ट होकर मैंने तस्वीर दोबारा अपनी जेब में रख ली।

”क्या पुलिस की तफ्तीश में इस बात का जिक्र आया था, कि तुम्हारे डैडी जब यहां से नीचे गिरे थे तो उनका शरीर पहले बॉलकनी से टकराया था फिर नीचे गिरा था।“

”शायद नहीं और अगर आया था तो मुझे खबर नहीं। लेकिन तुम्हारी बात में दम है, यहाँ से गिरते वक्त रेलिंग से टकराये बिना नीचे पहुंच जाना सम्भव नहीं है।“
 
मैंने आस-पास निगाह दौड़ाई। सामने बाउंड्री-वॉल एक जगह से टूटी पड़ी थी। जिसके पत्थर वहीं बिखरे हुए थे। पत्थरों का ढेर कुछ यूं लगा हुआ था कि उनपर चढ़कर कोई भी लम्बे कद का आदमी पहली मंजिल की बॉलकनी तक आसानी से पहुंच सकता था, और आगे सीढ़ियों के रास्ते छत पर पहुंच जाना क्या बड़ी बात थी। मेरी सारी थ्यौरी ही फेल हो गयी। मेरा यह विश्वास रेत के महल की तरह ढेर हो गया कि मानसिंह का कत्ल पार्टी में मौजूद किसी सख्श ने ही किया था।

सामने का नजारा खुद बयान कर रहा था कि कातिल उसी रास्ते से वहां पहुंचा था और स्केप के लिए भी उसने वही रास्ता इस्तेमाल किया था। टूटी हुई बाउंड्री के परली तरफ कच्चा रास्ता था जो आगे से बायें मुड़कर हवेली के मुख्य द्वार तक पहुंचता था।

‘‘एक ट्रक टकरा गया था बाउंड्री वॉल से“ - जूही मुझे उधर देखता पाकर बोली, ‘‘दीवार काफी पुरानी और कमजोर हो चुकी थी, वो ट्रक का मजबूत झटका नहीं झेल सकी और टूट कर बिखर गई।“

‘‘इधर ट्रक का क्या काम?‘‘

‘‘कोई काम नहीं, वो ट्रक ड्रायवर पापा से मिलने हवेली ही आ रहा था।‘‘

‘‘कब की बात है ये?‘‘

‘‘डैडी की मौत से महज एक दिन पहले की।‘‘

”इसे दोबारा बंद कराने की कोशिश नहीं की गई।“

”नहीं।“

”क्यों?“

”भई अगले ही दिन डैडी के साथ वो हादसा हो गया और उसके बाद हमने इस तरफ ध्यान नही नहीं दिया।“

‘‘ड्राइवर का क्या हुआ?‘‘

‘‘कौन ड्राइवर!‘‘

‘‘जिसके ट्रक ने बाउंड्री वॉल तोड़ी थी।‘‘

‘‘अच्छा वो, डैडी ने तो उसे माफ कर दिया, मगर अच्छा होता जो हमने उसे पुलिस में दे दिया होता।‘‘

‘‘क्यों?‘‘

‘‘अगले रोज हाइवे पर उसकी लाश बरामद हुई थी। किसी ने सरेराह उसे शूट कर दिया था। बेचारा हवालात में होता तो यूं मरने से बच जाता। उसकी मौत के बाद उसके घरवालों की इल्जाम लगाती उंगली डैडी की तरफ उठी, उन सबने बहुत हो हल्ला मचाया मगर कोई यह मानकर राजी नहीं हुआ कि मेरे डैडी ने सिर्फ इसलिए उसको मार डाला क्योंकि उसने उनकी दीवार तोड़ दी थी।‘‘

‘‘फिर क्या हुआ?‘‘

‘‘कुछ नहीं होना क्या था, पुलिस के अनसॉल्ब केसों में उसके कत्ल का भी एक केस जुड़ गया।‘‘

”ओह, क्या यहाँ छत पर पहुँचने का कोई दूसरा रास्ता भी है, ऐसा रास्ता जिसे इस्तेमाल करने के लिए नीचे हॉल से गुजरना जरूरी न हो।“

”है तो सही“ - जूही बोली - ”मगर वो इस्तेमाल में नहीं लाया जाता, हमेशा लॉक्ड रहता है।“

”अगर तकलीफ न हो तो मैं वो रास्ता देखना चाहूँगा।“

”अरे तकलीफ कैसी? आओ।“

कहकर वो सीढ़ियों की तरफ बढ़ी मैंने उसका अनुसरण किया, हवेली से बाहर निकलकर वो एक लम्बा घेरा काटकर हवेली के दूसरे छोर पर पहुंची।

वो एक छोटे लकड़ी के दरवाजे के सामने पहुंचकर ठिठक गई, उसने पलट कर मुझे देखा।

उसके चेहरे पर सख्त हैरानगी के भाव थे।

”क्या हुआ?

उसने चुपचाप दरवाजे की तरफ इशारा कर दिया।

दरवाजे का बड़ा सा ताला अपने कुंडे से निकलकर जमीन पर गिरा हुआ था, कुंडा भी अपनी जगह से उखड़कर दरवाजे से लटका हुआ था। मैंने झुककर ताले का मुआयना किया, ताला काफी पुराना, जंग लगा किंतु मजबूत था। वह जहां पड़ा था वहां की जमीन में नमी थी मगर ताले का ऊपरी हिस्सा एकदम साफ था, मैंने ताले पर रूमाल डालकर उठाया और उसके नीचे की जमीन का मुआयना किया। ताले का बहुत हल्का इम्प्रेशन वहां बना पाया। ताले के निचले कोने पर एक जगह थोड़ी मिट्टी लगी थी, जो ताला तोड़ेने के बाद वहां जमीन पर फेंकने से बना हो सकता था।

‘‘बारिश कब हुई थी?‘‘

‘‘बारिश!‘‘ - वो तनिक अचकचाई फिर बोली, ‘‘तुम्हारे यहां आने से दो रोज पहले। अरे हां याद आया जिस रोज डॉली यहां आई थी उसी रोज दिन में बारिश होकर हटी थी।‘‘

‘‘ओह!‘‘

”क्या मतलब हुआ इसका?“ जूही बोली।

”समझो‘‘ - मैं बेवजह उसे घूरता हुआ बोला - ”साफ जाहिर हो रहा है कि अभी हाल ही में किसी ने हवेली में इसी रास्ते से घुसपैठ की थी, लेकिन ऐसा उसने आखिरी बारिश होने के बाद किया था।“

”पहले क्यों नहीं?“

”क्योंकि अगर ताला यहां बारिश से पहले फेंका गया होता तो ताले के ऊपर काफी मिट्टी लगी होती जो की नहीं लगी है।“

‘‘तो क्या उसी ने मेरे पापा को....‘‘

‘‘जवाब अभी तुम खुद देकर हटी हो कि आखिरी बारिश उस दिन हुई जिस दिन डॉली यहां पहुंची थी, लिहाजा ताला उसके बाद तोड़ा गया।‘‘

‘‘ये दो जुदा लोगों के काम भी तो हो सकते हैं, मेरा मतलब है पहले कातिल ताला तोड़कर इधर से भीतर घुसा हो मगर उसने ताला फेंका ना हो, बाद में बारिश के बाद फिर इधर से कोई गुजरा हो और उसने ताला कुंडे से निकाल कर फेंक दिया हो।‘‘

‘‘हो सकता है मगर हम कातिल से इतनी नफासत की उम्मीद नहीं कर सकते कि उसने वापस जाते समय दोबारा ताले को कुंडे में फंसाने की जहमत उठाई हो।‘‘

मैंने आगे बढ़कर दरवाजा खोल दिया।

अंदर घुप्प अंधेरा था, अंधेरे में मुझे ऊपर को जाती सीढ़ियाँ दिखाई दीं। मैं सीढ़ियों की तरफ बढ़ा, जूही मेरे साथ थी।

हम सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।

सीढ़ियों की हालत खस्ता थी, वो कई जगह से टूटी हुई थी, हाथ को हाथ सुझाई नहीं दे रहा था, कभी किसी उखड़े हुए पत्थर पर पैर पड़ जाता तो यूं लगता था हम नीचे जा गिरेंगे।

”हमें टार्च साथ लाना चाहिए था।“ जूही फुसफुसाई, तब कहीं जाकर इस अक्ल के अंधे को अपनी जेब में रखे लाइटर का ख्याल आया।

मैंने लाइटर बाहर निकालकर जला लिया।

अब हम लाइटर की नीम रोशनी में आगे बढ़ने लगे।

कुछ और ऊपर की तरफ जाने के पश्चात् मैं ठिठका, मुझे अपने पैरों के पास एक कागज का टुकड़ा पड़ा हुआ दिखाई दिया।

मैंने झुककर वो कागज उठा लिया, उस पर किसी का टेलीफोन नम्बर दर्ज था, मैंने कागज अपनी जेब में रख लिया।

”सावधानी पूर्वक सीढ़ियाँ चढ़कर हम दोनों एक बार फिर छत पर पहुंचे।

मैं अपना अगला कदम निर्धारित करने की कोशिश कर ही रहा था कि तभी........।

एक तीखी चमक मेरी आंखों पर पड़ी।

खतरा!

मेरे दिमाग ने मुझे चेताया, सेकैंड के दसवें हिस्से में मैंने अपने से कुछ कदमों की दूरी पर खड़ी जूही के ऊपर छलांग लगा दी।

”धाँय।“ - एक फायर हुआ।

मैं जूही को लिए दिए छत पर ढेर हो गया। मगर तब तक देर हो चुकी थी, गोली जूही के कंधे को चीरती हुई निकल गई।

”उसके गले से एक दिल दहला देने वाली चीख निकली, और वह निश्चेष्ट हो गई।

हड़बड़ाकर मैंने उसकी नब्ज टटोली, नब्ज चल रही थी। तभी एक पल को मेरी निगाह उधर गई जिधर से गोली चलाई गई थी। बहुत दूर एक पेड़ पर राइफल का आभास मुझे मिला, अलबत्ता दूरी बहुत ज्यादा होने की वजह से हमलावर के कद-काठ का कोई अंदाजा मैं नहीं लगा सका। पेड़ के ठीक नीचे एक कार खड़ी थी जो ऑल्टो या बीट हो सकती थी, ठीक-ठीक कह पाना मुहाल था। मेरी तमाम आशाओं के विपरीत राइफल वाला अभी तक वहां से हिला नहीं था और दोबारा निशाना साध रहा था।

मैंने रिवाल्वर निकाल कर हमलावर की दिशा में लगातार दो फायर झोंक दिये, मगर जैसा की आपेक्षित था, दूरी अधिक होने के कारण गोलियाँ रास्ते में ही ठण्डी हो गईं।

मैं हड़बड़ाया, हम खुले में थे। वो बड़ी आसानी से हम दोनों को शूट कर सकता था। अपनी निश्चित मौत का आभास मुझे हो चुका था, चंद कदमों की दूरी पर सीढ़ियों का दहाना था, वहां पहुंचकर हम खुद को सुरक्षित कर सकते थे। मैंने जूही को होश में लाने की कोशिश की मगर वो टस से मस नहीं हुई। उसके बाजू से लगातार खून बह रहा था, जो कि इस वक्त उसकी नाजुक हालत के लिए बेहद खतरनाक था। मैंने रूमाल निकाल कर कसकर उसके कंधे पर बांध दिया मगर खून रूकना बंद नहीं हुआ। मजबूरन मुझे रिस्क लेना ही पड़ा।

मैंने लेटे ही लेटे जूही के जिस्म को अपनी बाहों और टांगों के बीच मजबूती से जकड़ लिया और पहिए की तरह गोल-गोल घूमता हुआ सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

फौरन एक फायर हुआ। गोली मेरे ऊपर से गुजर गई।

हड़बड़ाकर मैंने अपनी स्पीड बढ़ा दी।

”धाँय।“ तत्काल दूसरा फायर हुआ। गोली मेरे पीठ पीछे छत से कहीं टकराई। हमलावर के अगले फायर से पहले मैं जूही को लिए दिए सीढ़ियों के दहाने तक पहुंचने में कामयाब हो गया।

मैंने जूही को खुद से अलग किया और हमलावर को गोली चलाने का अगला मौका दिये बगैर जूही को मजबूत दीवारों की ओट में खींच लिया।

तत्पश्चात उसे अपने कंधे पर डालकर मैं सीढ़ियां उतरने लगा, अंधेरे में यह एक खतरनाक कदम था। मगर मजबूरी थी ”मरता क्या न करता“ वाली।

मैं निर्विघ्न जूही को लेकर नीचे पहुंचा और गैरेज की तरफ बढ़ गया, गैरेज में उस वक्त तीन कारें मौजूद थी, पहली जेन जिसे प्रकाश चलाता था और दूसरी स्टीम जो कि जूही के इस्तेमाल के लिए थी। और तीसरी कार जो कि बीएमडब्ल्यू थी, वो शायद मानसिंह के जीवनकाल में उनके इस्तेमाल में आती होगी।

गैरेज में पहुंचकर मुझे याद आया कि किसी एक कार की चाभी भी मेरे पास नहीं थी। मैंने वापस हवेली में जाकर प्रकाश से चाभी मांगने के बारे में सोचा, मगर जूही को वहां अकेले छोड़ना भी ठीक नहीं था।

मैंने पुनः उसके बाजू पर दृष्टिपात किया, खून का बहना अभी भी जारी था।

मैंने रूमाल खोलकर दोबारा उसके घाव पर कसकर बांध दिया।

अब खून बहना कुछ कम हुआ।

मैंने अपनी जेब से चाभियों का एक गुच्छा निकाला फिर उसमें से छांट कर एक चाभी ड्राइविंग डोर के लॉक में डालकर घुमाया। वाह! पहली ही चाभी से दरवाजा खुल गया।

तत्पश्चात काफी परिश्रम करके मैंने जूही को कार की पिछली सीट पर लिटा दिया फिर दरवाजा बंद करने के पश्चात् मैं ड्राइविंग सीट पर जा बैठा।

मुख्य द्वार पर पहुंचने से पहले ही मैंने जोर-जोर से हार्न बजाना शुरू कर दिया। तत्काल पास की क्यारियों में बागवानी कर रहे एक नौकर ने गेट खोल दिया। हवेली से बाहर निकलकर मैंने कार को दाईं तरफ मोड़ा और स्पीड बढ़ा दी।

रास्ते में मुझे जो पहला नर्सिंग होम नजर आया, मैंने उसके इमरजेंसी गेट के सामने कार रोक दी और जोर से चिल्लाया, ‘‘कमॉन हरिअप! यह मर रही है।‘‘

अस्पताल के कर्मचारियों पर मेरे आखिरी फिकरे का अच्छा प्रभाव पड़ा।

आनन-फानन में जूही को एक स्टै्रचर पर लिटा दिया गया, दो वार्ड ब्वाय स्ट्रेचर को धक्का देते हुए अंदर ले गये, कार वहीं खड़ी छोड़कर मैं उनके पीछे लपका।

तभी एक डॉक्टर मेरे पास पहुंचा, ‘‘फौजदारी का मामला है, पुलिस को खबर करनी होगी, एमएलसी करानी होगी।‘‘

‘‘उसकी हालत कैसी है?‘‘

‘‘अभी कुछ कह पाना मुश्किल है। खून बहुत बह गया है। गोली शायद अभी भी अंदर है, ऑपरेशन करना होगा, मगर उससे पहले पुलिस को फोन करना जरूरी है।‘‘

‘‘डॉक्टर! प्लीज आप गोली निकालिए, बाकी मुझपर छोड़ दीजिए, मैंने जसवंत को फोन कर दिया है, वो आता ही होगा।‘‘

‘‘जसवंत!...कौन जसवंत?‘‘

‘‘क्या बात है डॉक्टर साहब आपकी शहर कोतवाली का इंचार्ज कौन है, ये भी नहीं पता आपको। प्लीज अपना काम पूरा कीजिए वो आता है तो मैं सारी फार्मेलिटिज पूरी करा दूंगा।‘‘

‘‘ओके आप कहते हैं तो...‘‘

‘‘हां मैं कहता हूं प्लीज।‘‘

वह भीतर चला गया।

मैंने कैशियर के पास जाकर अपने क्रेडिट कार्ड से बीस हजार रूपयों की पेमेंट कर दी। फिर कोतवाली में फोन किया। पता चला कोतवाल साहब अभी-अभी सीओ साहब के साथ कहीं बाहर गये हैं। मैंने उसके मोबाइल पर कॉल लगाई, दो बार घंटी जाते ही कॉल अटैंड कर ली गई।

‘‘मैं बहुत बिजी हूं भई।‘‘

‘‘मैं समझ सकता हूं इंस्पेक्टर साहब! बहुत जरूरी नहीं होता मैं आपको डिस्टर्ब नहीं करता।‘‘

‘‘कम शब्दों में बताओ क्या चाहते हो?‘‘

‘‘जूही को गोली लगी है वह शिवम नर्सिंग होम में एडमिट है। डॉक्टर एमएलसी के बिना उसका ऑपरेशन करके राजी नहीं था। मैंने आपके नाम का हवाला देकर कह दिया कि मेरी आपसे बात हो गई है, आप यहां आ रहे हैं। और आपने कहा है कि वह ऑपरेशन कर सकता है, आप कागजी कार्रवाई बाद में पूरी कर देंगे।‘‘

‘‘ठीक है।‘‘

उसने कॉल डिस्कनैक्ट कर दिया।

फिर तकरीबन दो घण्टे बाद डाक्टर ने मुझे बताया कि गोली निकाल दी गई है, मगर उसकी हालत अभी भी नाजुक बनी हुई है।

‘‘डॉक्टर वो इंस्पेक्टर साहब...‘‘

‘‘हां उनका फोन आ गया था।‘‘ वो मेरी बात काटकर बोला और आगे बढ़ गया।

मैंने चैन की सांस ली।
 
अगले दो घंटे यूंही गुजरे। फिर नर्स ने बताया कि जूही को होश आ गया है और डॉक्टर ने उसे खतरे से बाहर बताया है।

मैंने उससे मिलने की इच्छा जाहिर की तो इजाजत दे दी गई।

मैं जूही के बैड के करीब पहुंचा। वह आंखे बंद किये लेटी हुई थी, आहट पाकर उसने आंखें खोलकर मेरी तरफ देखा, उसका चेहरा पीला पड़ चुका था। यूं महसूस हो रहा था जैसे उसके शरीर का सारा खून निचोड़ लिया गया हो।

मैं उसकी आंखों में देखता हुआ मुस्कराया।

जवाब में एक फीकी सी मुस्कुराहट उसके होठों पर उभरकर फौरन बाद गायब हो गई।

”अब कैसा महसूस कर रही हो?“

”पहले से बेहतर सिर्फ थोड़ी सी कमजोरी महसूस हो रही है और कोई परेशानी मुझे नहीं है।“

”तो फिर रोनी सूरत बनाये क्यों पड़ी हो?“

जवाब में वो खुल कर मुस्कराई।

”दैट्स लाइक ए गुड गर्ल।“

”दैट्स लाइक ए गुड ब्वाय।“

कहते हुए उसने हौले से मेरे गाल पर थपकी दी।

”जहेनसीब“ - मैं बोला- ”जीवन में पहली बार किसी ने मुझे गुड कहा है, साथ में ब्वाय तो जैसे सोने पे सुहागा हो गया।“

वह हंस पड़ी।

‘‘तुम्हे पता है।‘‘

‘‘क्या?‘‘

”यही कि तुम बहुत खूबसूरत हो।“

”धत्त्“ - वो शर्माती हुई बोली - ”झूठे कहीं के।“

”मैं सच कह रहा हूँ, कहीं तुमने ही तो विश्वामित्र की तपस्या भंग नहीं की थी।“

”बस-बस रहने दो।“

”कार-कार शुरू करूँ।“

”नानसेंस।“

”इडिएट भी।“

वह पुनः हंसी।

”ये रोजी कौन है?“

फौरन उसकी हंसी को ब्रेक लगा - ”क्यों जानना चाहते हो?“

”यूं ही, कल उसके जिक्र पर जिस तरह से प्रकाश ने तुम्हें डांटकर खामोश करा दिया, उससे लगता है कोई खास बात तो यकीनन है।“

”ठीक अंदाजा लगाया तुमने।“

”कौन थी रोजी?“

”वो एक नर्स थी।“

”ये तुम पहले ही बता चुकी हो। देखो मैं जानता हूं ये वक्त ऐसी बातें करने का नहीं है, मगर कातिल खुले में आ चुका है, और हम अभी तक अंधेरे में हैं, इसलिए मेरे लिए हर वो बात जानना जरूरी है जिसका तनिक भी रिश्ता तुमसे है, समझ रही हो तुम!‘‘

”हां समझ रही हूं। अच्छा सुनो ये तो मैं तुम्हे बता ही चुकी हूं कि वह हमारे यहां क्यों आई थी।‘‘

‘‘हां उससे आगे बढ़ो।‘‘

‘‘ओके, देखो उसे पापा के लिए अप्वाइंट किया गया था इसलिए उसे रहने के लिए पापा ने अपने बगल वाला कमरा दे दिया था। पापा के बेड के किनारे एक कॉल बेल लगा दी गयी जिसकी घंटी रोजी वाले कमरे में बजती थी। ताकि जरूरत पड़ने पर वे रोजी को बुला सकें। फिर एक रात जब मैं अपने कमरे में सोई हुई थी। मुझे बाहर किसी के जोर-जोर से बोलने की आवाज सुनाई पड़ी। उत्सुकता वश मैं कमरे से बाहर निकली और आवाज की दिशा में आगे बढ़ी, तभी मेरी नजर अपने कमरे से बाहर निकल रही रोजी पर पड़ी उसके हाथों में एक लम्बे फल वाला चाकू चमक रहा था। अजीब से सस्पेंस में फंसी मैं उसके पीछे चल पड़ी।“

”फिर क्या हुआ?“

”चाकू हाथ में लिए रोजी पापा के कमरे में जा घुसी। मुझे लगा वो पापा की हत्या कर देना चाहती है, मैं दौड़कर कमरे में पहुंची, तब तक रोजी पापा के सिराहने पहुंच चुकी थी। अब शक की कोई गुंजाइश नहीं थी, मैंने आस-पास निगाह दौड़ाई, फर्श पर मेरे पैरों के पास एक पिस्तौल पड़ी हुई थी, मैंने झुककर उसे उठा लिया। अब तक रोजी का चाकू वाला हाथ हवा में ऊपर उठ चुका था, घबराकर मैंने उसकी दिशा में फायर झांक दिया। वह जोर से चीखी और कटे पेड़ की तरह फर्श पर जा गिरी, तब जाकर मुझे इस बात का अहसास हुआ कि मैंने रोजी का कत्ल कर दिया था। मेरे हाथ पांव फूल गये, मारे दहशत के मेरा बुरा हाल हो गया। तब तक हवेली में जाग हो गई। पापा उठकर बैठ चुके थे, तभी प्रकाश वहाँ पहुंचा, मैंने उसे और पापा दोनों को बताया कि रोजी क्या करने वाली थी मगर किसी को यकीन नहीं आया। क्योंकि रोजी के पास से कोई छुरा बरामद नहीं हुआ। प्रकाश ने मेरी बात पर विश्वास कर रोजी की लाश इधर-उधर करके छुरे को ढूंढने की कोशिश की जो कि नहीं मिला। फिर आनन-फानन में रोजी की लाश वहां से हटा दी गई।“

”फिर क्या हुआ?“

”होना क्या था सभी ने उसकी बाबत खामोशी अख्तियार कर ली।“

लाश किसने ठिकाने लगाई?“

”प्रकाश ने?“

”कहाँ?“

”स्माईलपुर में इसाइयों का कब्रिस्तान है वहीं पर।“

”आई सी“ - मैं विचारपूर्ण भाव से बोला - ”अच्छा वो पिस्तौल किसकी थी जो कि तुम्हें कमरे के फर्श पर पड़ी मिली थी।“

”मालूम नहीं।“

”फिर वो यूं अचानक कमरे में कहाँ से नमूनदार हो गई?“

”मुझे नहीं मालूम।“

”अब वो पिस्तौल कहाँ हैं?“

”वह लाश के साथ ही दफन कर दी गई।“

”ऐसा तुमसे प्रकाश ने कहा।“

”हाँ।“

‘‘और रोजी की लाश ठिकाने लगाने भी वह अकेला ही गया था।‘‘

‘‘नहीं उसने अपने लंगोटिये यार राकेश को फोन करके बुला लिया था। दोनों ने मिलकर हमें उस मुसीबत से छुटकारा दिलाया था।‘‘

”ये रोजी के भूत वाला क्या चक्कर था?“

”कोई चक्कर नहीं था, मैंने सचमुच उसका भूत देखा था।“

”इस बात की क्या गारंटी कि वो रोजी का भूत ही था ना कि जीती जागती रोजी।“

”क्या मतलब?“ - वो चौंकती हुई उठ बैठी।

‘‘लेटी रहो और चौंको मत! कंकालों की असलियत जानकर भी तुम ऐसे ही चौंकी थी।‘‘

‘‘मगर मरी हुई रोजी...‘‘

‘‘तुमने उसकी नब्ज टटोली थी, चेक किया था कि वह सचमुच मर चुकी है?‘‘

‘‘नहीं मगर...।‘‘

”सोचो ऐसी कौन सी खास बात थी उसके अंदर जिससे कि तुमने उसे भूत समझ लिया।“

”मगर जब रोजी मर चुकी है..............।“

”फिर तुम ये कैसी कह सकती हो कि तुम्हारी गोली खाकर वह मर गई थी ना कि जिन्दा बच गई।“

”ओह गॉड, ओह माई गुड गॉड“ - वो आह भरती हुई बोली - तुम तो सचमुच मुझे पागल कर दोगे।“

”मैं तुम्हारा पागलपन दूर करने कि कोशिश कर रहा हूँ साफ जाहिर हो रहा है कि किसी ने जानबूझकर तुम्हारे सामने ऐसा स्टेज कायम किया कि तुम गोली चलाने पर मजबूर हो जाओ और ऐन वही हुआ। तुम्हारे पास रोजी का कत्ल करने के लिए कोई हथियार उपलब्ध नहीं था। लिहाजा षड़यंत्रकारी ने तुम्हारी मुश्किल आसान करने के लिए पहले ही फर्श पर एक पिस्तौल रख दिया बाद में जिसे उठाकर तुमने रोजी को शूट कर दिया, कोई बड़ी बात नहीं कि उस पिस्तौल में असली गोली रही ही ना हो, सिर्फ आवाज करने वाली गोली रही हो।“

‘‘ऐसी गोलियां भी होती हैं?‘‘ वो मासूमियत से मेरी ओर देखती हुई बोली।

‘‘ओह माई गॉड, अरे तुम अनपढ़-गंवार तो नहीं हो, जमाना कहां से कहां पहुंच गया और तुम हत्यारे की इतनी छोटी-छोटी चाल में फंसती चली आ रही हो।‘‘

‘‘देखो मेरे पास डिग्रियां बहुत हैं, किताबी ज्ञान भी बहुत है। मगर और कुछ नहीं आता मुझे, मैंने कभी इस शहर से बाहर कदम नहीं रखा। यहीं पली बढ़ी हूं, यहां के गंवार-देहाती लोगों में भी मुझसे ज्यादा दुनियादारी की समझ होगी। तुम नहीं जानते कि जब तुमने कंकालों की असलियत बताई तो मैं किस कदर भौचक्की रह गयी थी। मैं तो सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि ऐसा भी होता है इस दुनियां में। इसलिए तुम मुझे अनपढ़ गंवार ही मान लो।‘‘

‘‘देखा मैं तुमपर तंज नहीं कस रहा, बात को समझने की कोशिश करो।‘‘

”ओके करती हूं कोशिश‘‘ - इस दफा वह खुलकर मुस्कराई - ‘‘यानी कि जो हुआ वो सिर्फ एक ड्रामा था।“

”हालात तो यही जाहिर करते हैं।“

”अगर वो ड्रामा था तो सब किया धरा प्रकाश का हुआ।‘‘

”जाहिर है।“

”वो ऐसा क्यों करेगा?“

”इस बारे में तुम मुझसे बेहतर सोच सकती हो।“

”सो तो है“ - वह विचार पूर्ण भाव से बोली - ”मगर मुझे नहीं लगता कि प्रकाश ऐसी बेहुदा हरकत कर सकता है।“

”हाथ कंगन को आरसी क्या मेम साहब, अगर ऐसा कुछ हुआ था तो उसे अभी भी साबित किया जा सकता है।“

”कैसे?“ - वो उत्सुक स्वर में बोली।

”रोजी की कब्र खोदकर, उसमें दफ्न ताबूत को खोलकर देखा जा सकता है।“

”तौबा मुझे तो कब्र के नाम से ही दहशत महसूस होने लगी और तुम तो बाकायदा उसे खोलने की बात कर रहे हो। मानो वो ताबूत न होकर किसी बक्शे का ढक्कन हो।“

मैं हंसा।

”हँस क्यों रहे हो?“
 
”आज कल की लड़कियों के बारे में सोचकर जिनकी दिली ख्वाइश है कि वे हर मामले में पुरुष की बराबरी करें लेकिन अफसोस उनकी ख्वाइश अधूरी ही रह जाती है। जब बात हिम्मत और साहस की आती है तो मजबूरन उन्हें पीछे हटना पड़ता है। मर्द जाति की शरण में जाना ही पड़ता है।

”देखो मेरी जैसी की बात छोड़ दो तो आजकल की लड़कियां किसी भी क्षेत्र में लड़कों से पीछे नहीं हैं।“

”अगर ऐसा है तो लड़कियाँ क्यों अपनी इज्जत की दुहाई देती फिरती हैं कि फलाना लड़के ने उसकी इज्जत लूट ली। फलां लड़के ने उसे छेड़ दिया“ - मैं बोला - ”तुम मुझे एक भी ऐसा लड़का दिखा दो जिसने कभी इतना भी कहा हो कि फलाना लड़की ने उसे छेड़ दिया।“

वो खामोश नहीं।

”जवाब दो मेरी बात का।“

”तुमसे बातों में कोई नहीं जीत सकता।“

”ये तो कोई जवाब नहीं हुआ।“

”ओके मुझे तुम्हारी बात से इत्तेफाक है।“

”कौन सी बात से?“

”यही कि लड़कियां कभी भी लड़कों की बराबरी नहीं कर सकती।‘‘

”गुड सच्चाई को असेप्ट करना अच्छी बात होती है। वैसे मुझे नहीं लगता कि कब्रिस्तान जाने पर रोजी की कब्र मिलेगी। फिर भी मैं चेक करूंगा। अगर वाकई उसके नाम की कब्र वहां हुई तो...।‘‘

‘‘अरे भई वो वैसा वाला कब्रिस्तान नहीं है। वहां कब्र पर नाम नहीं लिखा होता, कोई चबूतरा भी नहीं बनाया जाता। बस जमीन खोद कर दफना दिया जाता है।‘‘

‘‘ओह! अच्छा अब मैं चलता हूं बहुत सारे काम निपटाने हैं।‘‘

”कहाँ जा रहे हो?“

मैनें बताया।

”मुझे पहले घर तो पहुँचा दो।“

”फिलहाल तुम यहीं रही, वो हवेली तुम्हारे लिए महफूज नहीं है।“

”मगर हॉस्पीटल में .............।“

”सिर्फ शाम होने तक, ओके.....।“

”ओके“ - वो बोली - ”मुझ पर गोली किसने चलाई थी?“

”मालूम नहीं।“

”क्या वैसी कोई हरकत यहाँ नहीं हो सकती?“

”उम्मीद तो नहीं है, फिर भी मैं डॉ. को बोलकर जाऊंगा कि वह तुम्हारी सुरक्षा का कोई इंतजाम कर दे।“

उसने सिर हिलाकर हामी भरी।

मैं बाहर आकर कार में सवार हो गया। अब इस बखेड़े को जल्द से जल्द निपटाना बहुत जरूरी था, क्योंकि कातिल अब खुले में आ चुका था। जो कि इस अजनबी शहर में मेरे लिए खतरनाक बात थी। वो बौखलाया हुआ था, इसलिए कुछ भी कर सकता था। मैं वापस हवेली पहुँचा। प्रकाश की कार अब वहाँ नहीं थी। शायद वो हवेली से रूख्सत हो चुका था। मौका अच्छा था। मैं उसके कमरे तक गया, दरवाजा बंद था और कुंडे से एक मजबूत किंतु पुरानी बनावट का ताला लटक रहा था।

एक बार अपने आजू-बाजू देखकर मैंने ये इत्मिनान हॉसिल किया कि कोई नौकर-चाकर मुझे नहीं देख रहा था। तत्पश्चात अपनी जेब से चाभियों का गुच्छा निकालकर मैंने एक-एक करके सारी चाभियाँ ताले के छेद में डाल कर देख लिया। ताला नहीं खुला। मैंने जूही के कमरे का दरवाजा ट्राई किया। दरवाजा खुला हुआ था, मैं अंदर प्रवेश कर गया।

कमरे में अंदर से गुजर कर मैं बॉलकनी में पहुँचा, वहाँ से प्रकाश के कमरे की बालकनी में पहुँचना बहुत ही आसान काम साबित हुआ। राहत की बात ये थी कि उसकी बॉलकनी का दरवाजा खुला हुआ था।

बॉलकनी के रास्ते मैं प्रकाश के कमरे में दाखिल हुआ। अंदर दाखिल होते ही मैं थमक कर खड़ा हो गया।

सामने अस्त-व्यस्त पलंग पर प्रकाश की लाश पड़ी थी। उसकी दाईं कनपटी में बना गोली का सुराग दूर से ही नजर आ रहा था।

मैं उसके समीप पहुँचा।

पलंग के पायताने एक रिवाल्वर पड़ी हुई थी। मैंने झुककर उसे रूमाल से पकड़कर उठा लिया। नाल को नाक के पास ले जाकर सूंघा, ताजा जले बारूद की गंध स्पष्ट महसूस हुई। रिवाल्वर का सीरियल नम्बर रेती से घिसकर मिटा दिया गया था।

मैंने रिवाल्वर यथा-स्थान रखकर लाश का मुआयना किया। नब्ज बंद थीं। धड़कने बंद थीं। शरीर अभी गर्म था, और गोली के छेद से अभी भी खून रिस रहा था। उसे प्वाइंट ब्लैंक रेंज से गोली मारी गयी थी। लाश की हालत बताती थी कि उसे मरे अभी घंटा भी नहीं गुजरा था। यह उस आक्रमणकारी का काम हो सकता था, जिसने हमपर छत पर गोली चलाई थी।

मैंने हाथ में रूमाल लपेटकर वहाँ की तलाशी लेना आरम्भ किया। शुरूआत मैंने राइटिंग टेबल से ही किया। दराजों में कुछ कागजात भरे हुए थे मैंने एक-एक करके सभी कागजात देख डाले मगर कोई काबिलेजिक्र वस्तु मेरे हाथ नहीं लगी। अलबत्ता ऐसा कुछ जरूर महसूस हुआ जैसे किसी ने मेरे से पहले बेहद जल्दबाजी में वहाँ की तलाशी ली हो।

मैं वार्डरोब के करीब पहुँचा।

वहाँ भी पहले से ही अस्त-व्यस्तता का बोल-बाला था। जैसे-तैसे करके मैंने कमरे की तलाशी का काम मुक्कमल किया। इस दौरान काबिले जिक्र एक तस्वीर मेरे हाथ लगी। जिसमें तकरीबन पच्चीस वर्षीय एक युवती खड़ी मुस्करा रही थी। तस्वीर के पीछे रोजी डेनियल विद लव और मुम्बई का एक पता लिखा हुआ था, लिहाजा ज्यादातर उम्मीद इसी बात की थी कि तस्वीर वाली लड़की रोजी ही थी।

तस्वीर ये इशारा करती थी कि रोजी प्रकाश की गर्लफ्रेंड हो सकती थी जबकि बाजुबानी जूही मुझे पता लगा था कि रोजी एक नर्स थी जिसको कि जूही के डैडी ने अपनी तीमारदारी में रखा हुआ था। ‘शायद ये रोजी कोई और हो।‘ - मैं खुद से बोला - ”प्रकाश की गर्ल फ्रैंड रोजी और नर्स रोजी दो जुदा लड़कियाँ हो सकती थीं।“

मगर मेरा मन इसे मानने को तैयार नहीं हुआ, लिहाजा मैंने वो विचार अपने जेहन से झटक दिया और याद करने लगा कि कमरे में मैंने कहाँ-कहाँ अपनी उँगलियों के निशान छोड़े थे।

तभी दरवाजे पर आहट हुई शायद कोई ताला खोल रहा था। मैं चौकन्ना हो गया। यूं महसूस हुआ जैसे बाहर से कुंडा सरकाया गया हो। फिर दरवाजे में हरकत हुई, मैं फौरन वार्डरोब की ओट में सरक गया।
 
धीरे-धीरे दरवाजा खुला, खुले दरवाजे से एक निहायती खूबसूरत किंतु संजीदा युवती ने अंदर कदम रखा।

मैं तस्वीर वाली लड़की के रूप में उसे फौरन पहचान गया। यहां उसकी मौजूदगी ने मुझे हैरान करके रख दिया।

उसके पास प्रकाश के कमरे की चाभी का होना इस बात का पर्याप्त सबूत था कि वह कभी भी किसी भी वक्त प्रकाश के कमरे में आ जा सकती थी। क्यों थी प्रकाश के कमरे की चाभी रोजी के पास? और उसका पता तो हजारों मील दूर मुम्बई का था, फिर वह सीतापुर में क्या कर रही थी।

अगर नर्स रोजी और प्रकाश की गर्लफ्रेंड रोजी डेनियल एक ही लड़की थी तो इस सवाल का जवाब आसान था। निश्चय ही वो प्रकाश के हर स्याह-सफेद में कदम दर कदम उसके साथ थी।

रोजी पलंग के समीप पहुंची। मुझे लगा अभी वो चिल्ला पड़ेगी, शोर मचाकर हवेली के नौकर-चाकरों को वहाँ इकट्ठा कर लेगी। मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वो सामान्य बनी रही।

यूँ सामान्य बनी रही जैसे उसे पहले से ही मालूम था कि पलंग पर प्रकाश की लाश पड़ी थी।

”कैसे मालूम था?“ - मैंने अपने आप से सवाल किया फिर जवाब भी खुद दे डाला - ‘‘यकीनन यह उसका दूसरा फेरा था। अपने पहले फेरे में ही वो प्रकाश की लाश के रू-ब-रू हो चुकी थी या फिर प्रकाश का कत्ल उसने खुद किया था और अब अपने किये पर लीपा-पोती करना चाहती थी।“

अब वह प्रकाश की जेबें टटोल रही थी। एक-एक करके उसने जेब का सारा सामान निकालकर पलंग पर रख दिया, फिर उसमें कुछ खोजने लगी। मगर शायद उसकी तलाश कामयाब नहीं हुई। उसने फिर से प्रकाश की तलाशी ली। अबकी दफा ज्यादा इत्मिनान से ली। एक रोल किया हुआ कागज उसके हाथ लगा। उसने रोल खोलकर पढ़ा फौरन उसका चेहरा चमक उठा। उसने रोल को अब तहों की शक्ल देकर अपने गरेबां के अंदर कहीं खोंस लिया, फिर वो दरवाजे की तरफ बढ़ी।

मेरा इरादा उसे पकड़ लेने को हुआ, वो अकेली थी, लड़की थी। ऊपर से नाजुक थी। मैं उस पर आसानी से काबू पा सकता था। मगर फिर मैंने अपना ये विचार जहन से उखाड़ फेंका। मैंने उसके पीछे जाने का फैसला किया।

जाती बार उसने दरवाजे को ताला लगाना जरूरी नहीं समझा। मगर दरवाजे से बाहर निकलने की सूरत में देख लिए जाने का खतरा था। लिहाजा मैं फौरन बॉलकनी में जा पहुँचा, फिर जूही के कमरे से होता हुआ बाहर निकल आया। रोजी मुझे सीढ़ियाँ चढ़ती दिखाई दी, जी हां वो सीढ़ियां चढ़ रही थी ना कि उतर रही थी। इस वक्त वह बेहद चौकन्नी थी। उसकी भरपूर कोशिश थी कि वो किसी की निगाहों में ना आने पाए। मैं सावधानी बर्तता हुआ उसके पीछे लपका।

आखिरकार वो हवेली की छत पर पहुंची। वहां से वह उन सीढ़ियों की तरफ लपकी जिधर से मैं घायल जूही को लेकर गया था। आगे वह टूटी हुई बाउंड्री के रास्ते हवेली से बाहर निकल गयी। अब हम दोनों एकदम खुले में थे। वो एक बार भी पीछे मुड़कर देखती तो मुझपर उसकी नजर पड़ जाना अवश्यम्भावी था। मगर उसके पास शायद पीछे मुड़कर देखने की फुर्सत नहीं थी। वह जल्द से जल्द उस इलाके से निकल जाना चाहती थी।

मैं बदस्तूर उसका पीछा करता रहा।

रिहायशी इलाके में पहुंचकर वो एक साइकिल रिक्शे पर सवार हो गयी। अन्य कोई रिक्शा वहां नहीं था। मैंने अपनी चाल तेज कर दी, मगर इतना काफी नहीं था। रिक्शे और मेरे बीच का फासला निरंतर बढ़ता जा रहा था। मैं दौड़ लगाकर उसका मुकाबला कर सकता था। मगर यूं सड़क पर दौड़ना खामखाह लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने जैसा था। ऐसे में रोजी की निगाह मुझपर पड़कर ही रहनी थी।

मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं।

तभी एक बाइक सवार उधर आता दिखाई दिया। मैंने उसे रूकने का इशारा किया, तो थोड़ा आगे जाकर उसने बाइक रोक दी। मैं झपटकर उसके करीब पहुंचा।

‘‘लिफ्ट चाहिए?‘‘

मैंने सहमति में सिर हिला दिया और उसके पीछे सवार हो गया।

उसने बाइक आगे बढ़ा दी।

‘‘कहां जाना है।‘‘

‘‘वो दूर जाता रिक्शा देख रहे हो उसका पीछा करना है।‘‘

जवाब में उसने कसकर ब्रेक लगाया और बाइक रोक दी।

‘‘क्या हुआ?‘‘ मैं हड़बड़ाया।

‘‘तुम बताओ किस फिराक में हो?‘‘

‘‘अच्छा वो!... देखिए भाई साहब उस रिक्शे पर मेरी बीवी बैठी हुई है। कमीनी बहुत दिनों से धोखा दे रही है मुझे। आज मैं उसे रंगे हाथों उसके यार के साथ पकड़ना चाहता हूं।‘‘

‘‘सच बोल रहे हो।‘‘

‘‘सोलह आने सच कसम उठवा लीजिए।‘‘

‘‘मुझे तुम्हारी बात पर तनिक भी यकीन नहीं है, मगर कोई बात नहीं, चलो देखते हैं।‘‘

उसने बाइक आगे बढ़ा दी।

रिक्शा आलम नगर की एक बहुमंजिला इमारत के सामने पहुँचकर रूक गया। रोजी नीचे उतरी, एक बार उसने अपने दायें-बायें देखा मैं फौरन एक बिजली के खम्बे की ओट में हो गया। बाइक सवार इतना बड़ा चिपकू निकला था कि अभी तक वो वहां से चला नहीं गया था। रोजी इमारत के अंदर प्रवेश कर गई। तत्पश्चात सीढ़ियाँ चढ़कर वो पहली मंजिल पर बने एक फ्लैट के दरवाजे पर पहुंचकर ठिठक गई। मैं उससे चंद कदमों की दूरी पर खड़ा होकर उसके फ्लैट के अंदर दाखिल होने का इंतजार करने लगा।

कुछ क्षण यूं ही गुजरे।

फिर उसने अपनी पोशाक को टटोलकर एक चाभी बरामद किया और दरवाजे के की होल में फँसाकर घुमा दिया, क्लिक की आवाज हुई। उसने चाभी बाहर निकाल लिया और खुद भीतर दाखिल होकर अंदर से दरवाजा बंद कर लिया।

‘‘इसने ताला खुद खोला है, लिहाजा वो यहां अकेली रहती होगी, तुमने मुझे बेवकूफ बनाया।‘‘ बाइक सवार मुझे घूरता हुआ बोला। मैंने उसकी बात पर कान नहीं दिया।

मैं लपककर दरवाजे के करीब पहुंचा। मैंने अपनी एक आंख की होल पर लगा दी मगर दरवाजे के दूसरी तरफ देख पाने में सफल न हो सका। शायद उस तरफ से चाभी की-होल में लगा दी गई थी। मगर अंदर से दो लोगों के बात करने की आवाज आ रही थी। बाइक सवार से पीछा छुड़ाने के लिए मैंने उसे करीब बुलाया और ध्यान से सुनने को कहा। वह कुछ देर दरवाजे पर कान लगाकर सुनता रहा फिर सहमति में सिर हिलाता अलग हो गया। मगर वहां से टला नहीं।

‘‘अब क्या है भई?‘‘ मैं कलपता हुआ बोला।

‘‘मैं देखना चाहता हूं अंदर तुम्हारी बीवी के साथ कौन है।‘‘

मैंने घूरकर उसे देखा जवाब में वह बड़ी बेशरमी से हंसा। अजीब चिपकू था, मेरी मति मारी गयी थी जो मैंने उससे लिफ्ट लिया था।

‘‘देखो भाई साहब मैं पहले ही बहुत कलपा हुआ हूं। ऐसी छिनाल बीवी भगवान दुश्मन को भी ना दे। अब मुझपर एक एहसान करो और फूट लो यहां से।‘‘

‘‘अरे तुम समझ नहीं रहे हो दोस्त, भीतर जो आदमी है वो तुमसे ज्यादा ताकतवर हो सकता है, ऐसे में मैं तुम्हारे साथ रहा तो कुछ तो मदद करूंगा तुम्हारी।‘‘

मैंने आहत भाव से उसकी तरफ देखा, वह बड़े ही कुटिल अंदाज में मुस्करा रहा था। भगवान बचाये ऐसे मददगारों से। उससे पीछा छुड़ाने का कोई रास्ता इस वक्त मुझे नहीं सूझ रहा था।
 
तभी जैसे ईश्वर को मुझपर रहम हो आया।

उसके मोबाइल की घंटी बज उठी, उसने कॉल अटैंड की और अभी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि नीचे की ओर यूं भागा जैसे उसके पीछे भूत लगे हों। मैं हकबकाया सा उसे सीढ़ियां फांदते देखता रहा। नीचे पहुंचकर उसने बाइक स्टार्ट की फिर यह जा वह जा हो गया।

मैंने चैन की मीलों लम्बी सांस ली। और आगे बढ़कर दरवाजे पर दस्तक दे दिया।

जवाब में अंदर से फुसफुसाहट उभरी।

”कौन है?“ शंकित स्वर में पूछा गया।

”दरवाजा खोलो।“ मैं अधिकार पूर्ण स्वर में बोला।

कमरे में अंदर से कुछ अजीब सी आहट हुई। फिर दरवाजे की तरफ आती पदचाप सुनाई दी।

मैं सावधान हो गया।

दरवाजा खुला। खोलने वाली रोजी ही थी।

”कौन हो तुम?“ - वो उखड़े स्वर में बोली।

”दोस्त।“

”दोस्त का कोई नाम भी तो होगा।“

”राज।“ मैं उसकी आंखों में देखता हुआ बोला- ‘‘आई एम डिटेक्टिव, रिमेम्बर?“

तत्काल उसके चेहरे के भावों में परिवर्तन आया, मुझे लगा के मेरे नाम से वाकिफ थी।

‘‘मुझे किसी डिटेक्टिव की जरूरत नहीं है?‘‘ प्रत्यक्षतः वो बोली - ”मैं किसी राज को नहीं जानती?“

”कहा न दोस्त हूँ।“

”मुझे किसी दोस्त की भी जरूरत नहीं।“

कहकर उसने दरवाजा बंद कर देना चाहा, मगर तक तक मैं दरवाजे में अपनी टांग अड़ा चुका था।

”मगर मुझे तुम्हारी सख्त जरूरत है मिस रोजी डेनियल।“

उसने हैरानी से मेरी तरफ देखा - ”तुम मेरा नाम कैसे जानते हैं?“

”बंदा और भी बहुत कुछ जानता है मिस डेनियल, मगर वो सब बातें इत्मिनान से होंगी। पहले मैं जरा कहीं बैठ तो जाऊँ।“

‘‘हरगिज नहीं, जो कहना है यहीं कहो।“

”ठीक है तुम्हारी मर्जी‘‘ - मैं तनिक उच्च स्वर में बोला - ‘‘मुझे मालूम है कि तुम लाल हवेली से आ रही हो। वहां तुम प्रकाश के कमरे में गई थी जहां प्रकाश की.....।“

”खामोश रहो“ - वो अपनी हथेली मेरे मुंह पर रखते हुए बोली -”प्लीज खामोश रहो।“

”लो हो गया खामोश।‘‘

”क्या चाहते हो?“

”तुम्हारे साथ हनीमून पर जाना।“

”नॉनसेंस“ - वो बोली - ‘‘असल में क्या चाहते हो?“

”तुमसे थोड़ी सी गुफ्तगूं करनी है।“

”ठीक है, अंदर आ जाओ।“ - वो एक तरफ हटती हुई बोली।

मैं कमरे में दाखिल हुआ, वो ड्राइंग रूम के अनुरूप ही सजा-धजा एक बड़ा कमरा था। अंदर पहुंचकर मैं एक सोफा चेयर पर पसर गया।

वो दरवाजा बंद करके मेरी तरफ घूमी।

”अब बोलो क्या बात करना चाहते हो?“

”बताता हूँ पहले जरा अपने रोमियो को भी बाहर बुला लो।“

”तुम किसकी बात कर रहे हो?“ - वह तनिक हड़बड़ाई- ‘‘यहाँ और कोई नहीं है।“

”देखते हैं“ - कहकर मैंने गुहार लगाई - ”भाई साहब बाहर निकल आइए क्योंकि छुपे रहने का कोई फायदा आपको नहीं पहुंचने वाला। मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि आप भीतर मौजूद हैं।“

जवाब में बाईं तरफ का दरवाजा खोलकर प्रकाश का लंगोटिया यार राकेश कमरे में दाखिल हुआ।

उसे उस घड़ी वहाँ मौजूद देखकर मैं हैरान रह गया। रोजी और उसका साथ मेरी समझ से परे था।

”हे-हे“ - वह बेवजह दांत दिखाता हुआ बोला - ”मैं समझा कोई और है?“

”और कौन?“

”कोई भी तुम्हारे अलावा कोई भी।“

”मैं क्यों नहीं?“

”तुम्हारे यहां आ टपकने के बारे में तो हम सोच भी नहीं सकते थे‘‘ - तुम्हारा आगमन हमारे लिए सर्वथा अनापेक्षित था।“

”फिर भी मैं आ गया।“

”हां मगर सवाल ये उठता है कि क्यों आये हो?“

”बताता हूँ मगर उससे पहले तुम मेरे एक सवाल का जवाब दो। रोजी अगर जिन्दा है तो फिर महीने भर पहले उसके कत्ल का ड्रामा क्यों खेला गया। क्यों कूट-कूटकर यह बात जूही के दिमाग में बिठाई गई कि उसने रोजी का कत्ल कर दिया है।“

दोनों एक दूसरे की शक्ल देखने लगे।

”आराम से फैसला कर लो मुझे कोई जल्दी नहीं है। वैसे भी परसों रात को मुझपर गोली चलाने के जुर्म में जेल तो जाना ही है तुम्हें‘‘ - मैंने अंधेरे में तीर चलाया - ‘‘थाने पहुंचकर जवाब दोगे तो भी चलेगा।‘‘

‘‘क्या बकते हो, मैंने कब तुमपर गोली चलाई?‘‘

‘‘बताया तो परसों रात को, जब मैं दिल्ली से सीतापुर पहुंचा था। खैर ये बताओ तुम्हारा जख्म कैसा है। शुक्र है मेरी गोली तुम्हारे टांग में लगी वरना तुम तो उसी रात खुदा को प्यारे हो गये होते।‘‘

‘‘ईडियट मेरी टांग में बीयर की बोतल का कांच घुस गया था ना कि तुम्हारी गोली।‘‘

‘‘बेवकूफ हो तुम! पुलिस का डॉक्टर दो मिनट में साबित कर देगा कि तुम्हारी टांग में गोली लगी थी ना कि वो जख्म कांच के टुकड़े से बना था।‘‘

इस बार उसने कुछ नहीं कहा। चेहरे से वो साफ-साफ फिक्रमंद दिखाई देने लगा। लिहाजा मेरा अंधेरे में चलाया गया तीर एकदम सही निशाने पर लगा था।

”ऐसे किसी जवाब के लिए तुम हमें मजबूर नहीं कर सकते।“ यह रोजी की आवाज थी।

”कर सकता हूँ करूंगा भी बस तुम इतना बता दो, क्या तुम चाहोगी कि तुम्हारा नाम पुलिस के रिकार्ड में कातिलों की लिस्ट में शामिल हो जाय।“

”क्या कहना चाहते हो तुम?“ वो तनिक हड़बड़ाई।

”पुलिस को पता लगने की देर है कि प्रकाश का कत्ल तुमने किया है। वे तुम्हे फौरन लॉकअप में ठूंस देंगे। फिर तुम्हारी आगे की जिन्दगी जेल की सलाखों के पीछे गुजरेगी। वहां से जब तुम वापस आओगी तो तुम्हारा ये संगमरमरी हुस्न, सुलगती जवानी ढल चुकी होगी। तुम्हारे चेहरे पर झुर्रियां होंगी। बाल सफेद होंगे? तुम बूढ़ी हो चुकी होगी। आज जो लोग तुम्हें देखकर ठण्डी आहें भरते हैं कल वे तुम्हारी तरफ देखना भी पसंद नहीं करेंगे।“

”चुप हो जाओ।“ वो जोर से बोली, ‘‘ऐसा नहीं होगा, ऐसा हरगिज भी नहीं होगा।“

”ऐसा ही होगा, च्च.....च्च........च्च मुझे तो तरस आता है तुम्हारे ऊपर।“

‘‘देखो मैं नहीं जानती कि तुम क्या कुछ जानते हो, मगर प्रकाश का कत्ल मैंने नहीं किया।‘‘

”फिर किसने किया?“

”मुझे नहीं मालूम मैं जब वहां पहुंची तो वह पहले से ही मरा पड़ा था।“

”वो तुम्हारा दूसरा फेरा था, प्रकाश का कत्ल तुमने अपने पहले फेरे में किया था।“

”हरगिज नहीं, मेरे पहुंचने से पहले ही वह मर चुका था।“

”तुम झूठ बोल रही हो।“

”मैं हकीकत बयान कर रही हूँ।“

”कौन करेगा तुम्हारी बात का यकीन?“

वो खामोश रही।

”प्रकाश के कमरे की केवल दो ही चाभी थी। जिसमें से एक तुम्हारे पास है और दूसरी अभी भी प्रकाश की जेब में पड़ी है“ - मैंने ब्लफ मारना शुरू कर दिया मेरा इरादा वक्ती तौर पर उसे हकलान कर देने का था - ”प्रकाश के कमरे में घुसते हुए तुम्हे मैंने अपनी आंखों से देखा था, दोबारा जब तुम बाहर निकली तो तुम्हारे चेहरे की हवाइयाँ उड़ी हुई थीं।‘‘
 
Back
Top