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Guest
मेरे सामने ऊपर को जातीं सीढ़ियां थी, मैं उधर ही बढ़ गया। तभी ऊपर के किसी कमरे से जोर-जोर से हँसने की आवाज सुनाई दी।
सीढ़ियाँ चढ़कर मैं अंदाजन उस कमरे के आगे पहुँचा। पैरों की ठोकर मारकर मैंने दरवाजा खोल दिया। अंदर एक पुरुष और दूसरी तकरीबन बीस-इक्कीस साल की सांवली किंतु सुंदर युवती मौजूद थी, युवती को पुरुष अपनी गोद में बैठाये हुए था और उसके अंगों से खेल रहा था।
मुझे देखकर युवती उठ खड़ी हुई।
‘‘कौन है बे तू और भीतर कैसे धुस आया?‘‘ पुरुष बोला।
”मुझे दिलावर से मिलना है।“
”मैं ही हूँ, अब बता तू कौन है और बिना इजाजत अंदर कैसे आ गया, और ये राम सिंह कहाँ मर गया। उसने तुझे अंदर कैसे आने दिया?
”वो अब किसी को रोक पाने की हालत में नहीं है। बेचारा बहुत कमजोर था, मेरा एक घूंसा भी बर्दाश्त न कर सका और बेहोश हो गया।“
”क्या बकता है?“
”मैं सच कह रहा हूँ यकीन नही ंतो पहले खुद देखकर तसल्ली कर लो।“
”जरूरत नहीं अब तू फौरन अपना नाम बता।“
”पहले लड़की को बाहर भेजो।“
”क्यों?“
”क्योंकि मैं नहीं चाहता कि जब मैं तुम्हारा कत्ल करूँ तो ये मुझे ऐसा करते देखे, वरना खामख्वाह में मुझे इसका भी कत्ल करना पड़ेगा।“
मेरी बात सुनकर वह केवल एक क्षण को सकपकाया फिर उसने लड़की को इशारा किया, वह चुपचाप कमरे से बाहर निकल गई, ”अब बता कौन है तू?“
”राज।“ मैं बोला - ”याद आया कुछ।“
”नाम कुछ सुना हुआ लगता है।“
”जरूर लगता होगा, आखिर कल लाल हवेली में मैंने तेरे एक आदमी का कत्ल जो कर दिया।“
”ओह! तो तू है वो राज, चल अच्छा हुआ तू खुद यहाँ पहुँच गया। मैं तुझे पकड़ मंगवाने की जहमत से बच गया।“
”फिर तो वाकई अच्छा हुआ।“
कहकर मैं उसके सामने एक स्टूल पर बैठ गया।
वह फिर कसमसाया। वस्तुतः उसे मुझसे इतनी दिलेरी की उम्मीद नहीं थी। इसलिए वो समझ नहीं पा रहा था कि उसे मेरे साथ कैसा सलूक करना चाहिए। मैं दिलेर था भी नहीं, मुझे मालूम था मैं शेर की मांद में बैठा था। मगर मेरी बनावटी दिलेरी का हमेशा अच्छा प्रभाव पड़ता था - अभी भी पड़ रहा था। तभी तो शहर का बादशाह कंफ्यूज हो रहा था।
साहबान डर सभी को लगता है, इसलिए डरना बुरी बात नहीं है। मगर मुकाबला जब अपने से ताकतवर व्यक्ति से हो तो कभी भी अपने भीतर के डर को उसपर जाहिर ना होने दें।
‘‘क्या चाहता है तू।‘‘ वह कसमसाता हुआ बोला।
”उस व्यक्ति का नाम और पता जिसके कहने पर तुम लाल हवेली के अंदर अजीबो-गरीब, हास्यपद नौटंकियां करा रहे हो, जिससे हमारे शहर में तो कोई बच्चा भी नहीं डरता।“
‘‘तू सोचता है तू पूछेगा और मैं तुझे बता दूंगा।‘‘
‘‘हां मैं यही सोचता हूं।‘‘
”फिर तो तू बुरा फंसा बेटा क्योंकि उसका नाम तो मैं भी नहीं जानता।‘‘
मुझे लगा वो झूठ बोल रहा है। मैंने फौरन अपनी अड़तीस कैलीवर की रिवाल्वर निकाल कर उस पर तान दिया। मगर उसकी सूरत से तनिक भी ऐसा जाहिर नहीं हुआ कि वह रिवाल्वर से खौफजदा हुआ हो, उल्टा वह मुस्कराता हुआ बोला - ”लगता है तूने आत्महत्या का निश्चय कर ही लिया है।“
”बकोमत“ - मैं गुर्राता हुआ बोला - ”मेरा निशाना कभी नहीं चूकता, मैं दावा करता हूँ कि मेरे रिवाल्वर से निकली पहली गोली ही तुम्हें जहन्नुम पहुंचा देगी।“
”तो फिर चलाओ गोली, देर किस बात की है।“
ठीक तभी मुझे अपनी पीठ पर किसी गन की नाल का दबाव महसूस हुआ।
”खबरदार“ - कोई कर्कश स्वर में बोला - ”हिले तो गोली।“
मैं अपनी जगह पर फ्रीज हो गया।
”रिवाल्वर नीचे गिरा दो।“-हुक्म मिला।
मैंने वैसा ही किया।
”शाबाश कुलदीप“ - दिलावर बोला - ”अब इसकी तलाशी ले इसके पास दूसरी गन हो सकती है।“
मेरी तलाशी ली गई, तलाशी लेने वाला रामसिंह था जिसे मैं नीचे धूल चटा आया था। उसे मेरी दूसरी रिवाल्वर की खबर नहीं लगी।
मेरी रिवाल्वर से गोलियाँ निकालकर उसने रिवाल्वर मेरी कोट की जेब में ठूँस दी।
”अब क्या कहता है?“ - दिलावर सिंह बोला।
”वही जो कि पहले कहता था, मुझे उस व्यक्ति का नाम और पता चाहिए जिसके कहने पर तुमने हवेली में ड्रामा फैला रखा है।“
”भई मान गये तेरी दिलेरी को, मौत सामने देखकर भी, अपनी बकवास से बाज नहीं आ रहा।“
जवाब में मैंने जोर से अट््टहास किया।
‘‘लगता है मौत सामने देखकर पागल हो गया ये।‘‘ कहकर दिलावर ने ठहाका लगाया तो उसके दोनों आदमी भी जोर से हंस पड़े।
‘‘मैं तुम्हारी कमअक्ली पर हंस रहा हूं खलीफा। तुम्हें क्या लगता है यूं दिन-दहाड़े बिना किसी तैयारी के मैं यहां घुस आया। तरस आता है मुझे तुम्हारी अक्ल पर।‘‘
तत्तकाल उसकी हंसी को ब्रेक लगा, ”क्या कहना चाहता है?“
”यही कि यहाँ आने से पहले मैं इंस्पेक्टर जसवंत सिंह को बताकर आया हूँ कि मैं तुमसे मिलने जा रहा हूँ। ऐसे में अगर तुमने मेरा कत्ल किया तो किसी भी हालत में खुद को बचा नहीं पाओगे। भले ही तुम कितनी भी बड़ी तोप क्यों न हो! अब हंस सकते हो तो हंस के दिखाओ....हा-हा-हा।“
दिलावर सोच में पड़ गया।
”मुझे तो लगता है“ - कुलदीप बोला - ”ये सिर्फ अपनी जान बचाने की खातिर बहाने बना रहा है।‘‘
‘‘मुंह बंद रख अपना“ - दिलावर उसे डपटकर बोला, ‘‘इसे ले जाकर बाहर छोड़ कर आ और अगर ये दोबारा इधर का रुख करे तो बेशक इसे गोली मार देना। वैसे भी आज नहीं तो कल इसने मरना ही है।“
”यस बॉस आप फिक्र मत कीजिए“ - कुलदीप शिष्ट स्वर में बोला। फिर मुझसे मुखातिब हुआ - ”उठ रहा है या मैं उठाऊँ?“
”तुम मुझे नहीं उठा सकते, इसलिए उठना ही पड़ेगा।“
मैं खड़ा होता हुआ बोला - ”तुमसे फिर मिलूंगा दिलावर सिंह।“
दिलावर खामोश बना रहा।
मैं कमरे से निकला। कुलदीप की बगल से गुजर कर प्रवेश द्वार पर पहुँचा।
कुलदीप रास्ते में ही रुक गया।
”ज्यादा जोश में मत आओ कुलदीप, यह भीड़-भाड़ वाला इलाका है।“
”तो“
”अगर किसी ने मुझे तुम्हारी जान लेते देख लिया, तो परेशान हो जायेगा।“
”गेट आउट।“
जवाब में मैं जोर से हंसा।
”मैं जल्दी ही तुम्हें जहन्नुम का रास्ता दिखाऊँगा।“
”अभी कोशिश कर लो।“
वह केवल कसमसा कर रह गया।
मैं पलट का अपनी कार की तरफ बढ़ गया। जब तक मैं अपनी कार में नहीं बैठ गया, मुझपर यह खौफ हावी रहा कि अभी एक सनसनाती हुई गोली आकर मेरा काम तमाम कर जाएगी। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। बहरहाल मैं पलीते को चिंगारी दिखा चुका था। कोई ना कोई नतीजा तो सामने आना ही था।
मैंने कार आगे बढ़ा दी।
फौरन एक फिएट मेरे पीछे लग गई।
मैं बजाय लाल हवेली जाने के शहर के बाहर निकलकर शाहजहाँपुर जाने वाले हाइवे पर मुड़ गया। फिएट पूर्ववत्् पीछे लगी रही। इस वक्त सड़क पर यातायात बहुत ही कम था, अंततः ऐसा समय आया कि सड़क पर काफी दूर तक आगे-पीछे मेरी इम्पाला और फिएट के अलावा अन्य कोई वाहन नजर नहीं आ रहा था।
रियर व्यू मिर््र पर निगाह जमाये मैंने देखा फिएट में दो व्यक्ति सवार थे। मगर दूरी अधिक होने की वजह से मैं उनकी शक्ल नहीं देख पाया।
मुझे उनके इरादे नेक नहीं लग रहे थे। क्या वो दिलावर के आदमी थे? मेरा मन नहीं माना। मैंने होलस्टर में से पच्चीस कैलीवर की रिवाल्वर निकालकर उसे अपनी गोद में रख लिया। और कार की रफ्तार कम कर दी।
फिएट मेरे बगल में पहुँची, उसमें दो अपरिचित चेहरे सवार थे। मैं पलभर को उनके झांसे में आ गया, मुझे लगा वो लोग सिर्फ मुझे ओवरटेक करना चाहते हैं। मगर ठीक तभी मुझे पैसेंजर सीट पर बैठे व्यक्ति के हाथ में रिवाल्वर की झलक मिली, उसका रिवाल्वर वाला हाथ धीरे-धीरे ऊपर उठता दिखाई दिया। दूसरा कार चलाने में मशरूफ था।
मैंने तत्काल बायें हाथ से स्टेयरिंग थामते हुए दायें हाथ से रिवाल्वर उठाकर उनकी कार के अंदर दो फायर झोंक दिये और पूरी ताकत से ब्रेक का पायडल दबा दिया।
फियेट आगे बढ़ी और कुछ दूर जाकर खड़ी हो गयी, उसका ड्राइविंग सीट का दरवाजा खुला, और फियेट का ड्राईवर बाहर निकल आया।
मैंने कार तेज गति से आगे बढ़ाई और उसे समीप पहुँचकर एकदम से रोक दी। हड़बड़ा कर वह पुनः कार के अंदर घुस गया। मैंने कार को बैक गियर में डालकर रिवर्स किया और यू टर्न देकर वापस सीतापुर की ओर ड्राइव करने लगा। बैक व्यू मिरर पर निगाह गई तो पाया कि कार के आस-पास भीड़ इकट्ठी होना शुरू हो गई थी।
सीढ़ियाँ चढ़कर मैं अंदाजन उस कमरे के आगे पहुँचा। पैरों की ठोकर मारकर मैंने दरवाजा खोल दिया। अंदर एक पुरुष और दूसरी तकरीबन बीस-इक्कीस साल की सांवली किंतु सुंदर युवती मौजूद थी, युवती को पुरुष अपनी गोद में बैठाये हुए था और उसके अंगों से खेल रहा था।
मुझे देखकर युवती उठ खड़ी हुई।
‘‘कौन है बे तू और भीतर कैसे धुस आया?‘‘ पुरुष बोला।
”मुझे दिलावर से मिलना है।“
”मैं ही हूँ, अब बता तू कौन है और बिना इजाजत अंदर कैसे आ गया, और ये राम सिंह कहाँ मर गया। उसने तुझे अंदर कैसे आने दिया?
”वो अब किसी को रोक पाने की हालत में नहीं है। बेचारा बहुत कमजोर था, मेरा एक घूंसा भी बर्दाश्त न कर सका और बेहोश हो गया।“
”क्या बकता है?“
”मैं सच कह रहा हूँ यकीन नही ंतो पहले खुद देखकर तसल्ली कर लो।“
”जरूरत नहीं अब तू फौरन अपना नाम बता।“
”पहले लड़की को बाहर भेजो।“
”क्यों?“
”क्योंकि मैं नहीं चाहता कि जब मैं तुम्हारा कत्ल करूँ तो ये मुझे ऐसा करते देखे, वरना खामख्वाह में मुझे इसका भी कत्ल करना पड़ेगा।“
मेरी बात सुनकर वह केवल एक क्षण को सकपकाया फिर उसने लड़की को इशारा किया, वह चुपचाप कमरे से बाहर निकल गई, ”अब बता कौन है तू?“
”राज।“ मैं बोला - ”याद आया कुछ।“
”नाम कुछ सुना हुआ लगता है।“
”जरूर लगता होगा, आखिर कल लाल हवेली में मैंने तेरे एक आदमी का कत्ल जो कर दिया।“
”ओह! तो तू है वो राज, चल अच्छा हुआ तू खुद यहाँ पहुँच गया। मैं तुझे पकड़ मंगवाने की जहमत से बच गया।“
”फिर तो वाकई अच्छा हुआ।“
कहकर मैं उसके सामने एक स्टूल पर बैठ गया।
वह फिर कसमसाया। वस्तुतः उसे मुझसे इतनी दिलेरी की उम्मीद नहीं थी। इसलिए वो समझ नहीं पा रहा था कि उसे मेरे साथ कैसा सलूक करना चाहिए। मैं दिलेर था भी नहीं, मुझे मालूम था मैं शेर की मांद में बैठा था। मगर मेरी बनावटी दिलेरी का हमेशा अच्छा प्रभाव पड़ता था - अभी भी पड़ रहा था। तभी तो शहर का बादशाह कंफ्यूज हो रहा था।
साहबान डर सभी को लगता है, इसलिए डरना बुरी बात नहीं है। मगर मुकाबला जब अपने से ताकतवर व्यक्ति से हो तो कभी भी अपने भीतर के डर को उसपर जाहिर ना होने दें।
‘‘क्या चाहता है तू।‘‘ वह कसमसाता हुआ बोला।
”उस व्यक्ति का नाम और पता जिसके कहने पर तुम लाल हवेली के अंदर अजीबो-गरीब, हास्यपद नौटंकियां करा रहे हो, जिससे हमारे शहर में तो कोई बच्चा भी नहीं डरता।“
‘‘तू सोचता है तू पूछेगा और मैं तुझे बता दूंगा।‘‘
‘‘हां मैं यही सोचता हूं।‘‘
”फिर तो तू बुरा फंसा बेटा क्योंकि उसका नाम तो मैं भी नहीं जानता।‘‘
मुझे लगा वो झूठ बोल रहा है। मैंने फौरन अपनी अड़तीस कैलीवर की रिवाल्वर निकाल कर उस पर तान दिया। मगर उसकी सूरत से तनिक भी ऐसा जाहिर नहीं हुआ कि वह रिवाल्वर से खौफजदा हुआ हो, उल्टा वह मुस्कराता हुआ बोला - ”लगता है तूने आत्महत्या का निश्चय कर ही लिया है।“
”बकोमत“ - मैं गुर्राता हुआ बोला - ”मेरा निशाना कभी नहीं चूकता, मैं दावा करता हूँ कि मेरे रिवाल्वर से निकली पहली गोली ही तुम्हें जहन्नुम पहुंचा देगी।“
”तो फिर चलाओ गोली, देर किस बात की है।“
ठीक तभी मुझे अपनी पीठ पर किसी गन की नाल का दबाव महसूस हुआ।
”खबरदार“ - कोई कर्कश स्वर में बोला - ”हिले तो गोली।“
मैं अपनी जगह पर फ्रीज हो गया।
”रिवाल्वर नीचे गिरा दो।“-हुक्म मिला।
मैंने वैसा ही किया।
”शाबाश कुलदीप“ - दिलावर बोला - ”अब इसकी तलाशी ले इसके पास दूसरी गन हो सकती है।“
मेरी तलाशी ली गई, तलाशी लेने वाला रामसिंह था जिसे मैं नीचे धूल चटा आया था। उसे मेरी दूसरी रिवाल्वर की खबर नहीं लगी।
मेरी रिवाल्वर से गोलियाँ निकालकर उसने रिवाल्वर मेरी कोट की जेब में ठूँस दी।
”अब क्या कहता है?“ - दिलावर सिंह बोला।
”वही जो कि पहले कहता था, मुझे उस व्यक्ति का नाम और पता चाहिए जिसके कहने पर तुमने हवेली में ड्रामा फैला रखा है।“
”भई मान गये तेरी दिलेरी को, मौत सामने देखकर भी, अपनी बकवास से बाज नहीं आ रहा।“
जवाब में मैंने जोर से अट््टहास किया।
‘‘लगता है मौत सामने देखकर पागल हो गया ये।‘‘ कहकर दिलावर ने ठहाका लगाया तो उसके दोनों आदमी भी जोर से हंस पड़े।
‘‘मैं तुम्हारी कमअक्ली पर हंस रहा हूं खलीफा। तुम्हें क्या लगता है यूं दिन-दहाड़े बिना किसी तैयारी के मैं यहां घुस आया। तरस आता है मुझे तुम्हारी अक्ल पर।‘‘
तत्तकाल उसकी हंसी को ब्रेक लगा, ”क्या कहना चाहता है?“
”यही कि यहाँ आने से पहले मैं इंस्पेक्टर जसवंत सिंह को बताकर आया हूँ कि मैं तुमसे मिलने जा रहा हूँ। ऐसे में अगर तुमने मेरा कत्ल किया तो किसी भी हालत में खुद को बचा नहीं पाओगे। भले ही तुम कितनी भी बड़ी तोप क्यों न हो! अब हंस सकते हो तो हंस के दिखाओ....हा-हा-हा।“
दिलावर सोच में पड़ गया।
”मुझे तो लगता है“ - कुलदीप बोला - ”ये सिर्फ अपनी जान बचाने की खातिर बहाने बना रहा है।‘‘
‘‘मुंह बंद रख अपना“ - दिलावर उसे डपटकर बोला, ‘‘इसे ले जाकर बाहर छोड़ कर आ और अगर ये दोबारा इधर का रुख करे तो बेशक इसे गोली मार देना। वैसे भी आज नहीं तो कल इसने मरना ही है।“
”यस बॉस आप फिक्र मत कीजिए“ - कुलदीप शिष्ट स्वर में बोला। फिर मुझसे मुखातिब हुआ - ”उठ रहा है या मैं उठाऊँ?“
”तुम मुझे नहीं उठा सकते, इसलिए उठना ही पड़ेगा।“
मैं खड़ा होता हुआ बोला - ”तुमसे फिर मिलूंगा दिलावर सिंह।“
दिलावर खामोश बना रहा।
मैं कमरे से निकला। कुलदीप की बगल से गुजर कर प्रवेश द्वार पर पहुँचा।
कुलदीप रास्ते में ही रुक गया।
”ज्यादा जोश में मत आओ कुलदीप, यह भीड़-भाड़ वाला इलाका है।“
”तो“
”अगर किसी ने मुझे तुम्हारी जान लेते देख लिया, तो परेशान हो जायेगा।“
”गेट आउट।“
जवाब में मैं जोर से हंसा।
”मैं जल्दी ही तुम्हें जहन्नुम का रास्ता दिखाऊँगा।“
”अभी कोशिश कर लो।“
वह केवल कसमसा कर रह गया।
मैं पलट का अपनी कार की तरफ बढ़ गया। जब तक मैं अपनी कार में नहीं बैठ गया, मुझपर यह खौफ हावी रहा कि अभी एक सनसनाती हुई गोली आकर मेरा काम तमाम कर जाएगी। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। बहरहाल मैं पलीते को चिंगारी दिखा चुका था। कोई ना कोई नतीजा तो सामने आना ही था।
मैंने कार आगे बढ़ा दी।
फौरन एक फिएट मेरे पीछे लग गई।
मैं बजाय लाल हवेली जाने के शहर के बाहर निकलकर शाहजहाँपुर जाने वाले हाइवे पर मुड़ गया। फिएट पूर्ववत्् पीछे लगी रही। इस वक्त सड़क पर यातायात बहुत ही कम था, अंततः ऐसा समय आया कि सड़क पर काफी दूर तक आगे-पीछे मेरी इम्पाला और फिएट के अलावा अन्य कोई वाहन नजर नहीं आ रहा था।
रियर व्यू मिर््र पर निगाह जमाये मैंने देखा फिएट में दो व्यक्ति सवार थे। मगर दूरी अधिक होने की वजह से मैं उनकी शक्ल नहीं देख पाया।
मुझे उनके इरादे नेक नहीं लग रहे थे। क्या वो दिलावर के आदमी थे? मेरा मन नहीं माना। मैंने होलस्टर में से पच्चीस कैलीवर की रिवाल्वर निकालकर उसे अपनी गोद में रख लिया। और कार की रफ्तार कम कर दी।
फिएट मेरे बगल में पहुँची, उसमें दो अपरिचित चेहरे सवार थे। मैं पलभर को उनके झांसे में आ गया, मुझे लगा वो लोग सिर्फ मुझे ओवरटेक करना चाहते हैं। मगर ठीक तभी मुझे पैसेंजर सीट पर बैठे व्यक्ति के हाथ में रिवाल्वर की झलक मिली, उसका रिवाल्वर वाला हाथ धीरे-धीरे ऊपर उठता दिखाई दिया। दूसरा कार चलाने में मशरूफ था।
मैंने तत्काल बायें हाथ से स्टेयरिंग थामते हुए दायें हाथ से रिवाल्वर उठाकर उनकी कार के अंदर दो फायर झोंक दिये और पूरी ताकत से ब्रेक का पायडल दबा दिया।
फियेट आगे बढ़ी और कुछ दूर जाकर खड़ी हो गयी, उसका ड्राइविंग सीट का दरवाजा खुला, और फियेट का ड्राईवर बाहर निकल आया।
मैंने कार तेज गति से आगे बढ़ाई और उसे समीप पहुँचकर एकदम से रोक दी। हड़बड़ा कर वह पुनः कार के अंदर घुस गया। मैंने कार को बैक गियर में डालकर रिवर्स किया और यू टर्न देकर वापस सीतापुर की ओर ड्राइव करने लगा। बैक व्यू मिरर पर निगाह गई तो पाया कि कार के आस-पास भीड़ इकट्ठी होना शुरू हो गई थी।