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लाल हवेली

"बाहर चलने की कोई जरूरत नहीं है। बंदा-परवर...मैं यहीं इंतजाम किए देती हूं।"

"फिर ठीक है।"

"आइए मेरे साथ।" सुन्दरी उसे मार्ग दिखाती हुई आगे-आगे चल पड़ी।

विनोद्र सावधानी के साथ उसके साथ चलता रहा। वह उसे एक ऐसे कमरे में ले आई जहां पूरी तरह एकांत था। यहां वहां कितनी ही अलमारियां थीं जिनमें तमाम सामान रखा हुआ था।

"ये किसका कमरा है।" राज ने उससे पूछा।"

"नसों की ड्यूटी चेंज के समय इसका प्रयोग किया जाता है।"

"फिर तो यहां कभी-भी कोई भी आ सकता

"नहीं...यहां कोई नहीं आएंगा।"

"क्यों?"

"इसलिए कि फिलहाल किसी को न तो ड्यूटी लगनी है और ना ही बदली जानी है।"

"आर यू श्योर...।"

"यस।"

"फिर ठीक है।"

"आप चाहें तो कमरे का दरवाजा भी बंद किया जा सकता है।"

सुन्दरी ने अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कराते हुए कहा।

"नहीं...सामने से नजर आ रहा है। अगर को ई इधर आता दिखाई देगा तो हम उसके आने से पूर्व ही अपनी बात बंद कर देंगे।"

"ओ. के.!"

"तुम बाहर एक बार देख लो।'

सुन्दरी ने तुरन्त आज्ञा का पालन किया। वह बाहर निकलकर शीघ्र ही वापस लौट आयी।

"सब ठीक है।"

"ठीक है...तो फिर सुनो, मुझे यहां के एक पेशेंट की कहानी मालूम करनी है।"

"कैसी कहानी ?"

"मतलब, उसके बारे में, उसके एडमीशन से लेकर उसके रिलीव होने तक के बारे में सब-कुछ जानना।"

“पेशेंट का नाम।"

"सतीश मेहरा...."

"किस वार्ड में था?"

"राज ने बताया।

"पुलिस वाला था...।" सुन्दरी ने शकित स्वर में उससे पूछा।

"हां...।"

"घायल था।"

"बिल्कुल ठीक।"

"कल सत आया था।"

"हां।" सुन्दरी रहस्यपूर्ण ढंग से मुस्करायी।

"जानती हो उसके बारे में।"

"जानती हूं...।"

उसकी स्वीकृति और उसकी मुस्कराहट देखते ही राज समझ गया कि उसने गलत जगह से अपनी तहकीकात का सिलसिला शुरू नहीं किया
 
__ "मैं उसी पुलिस इंस्पेक्टर सतीश मेहरा के बारे में जानना चाहता हूं।"

"क्या जानना चाहते हो...? ये कि उसे घटिया किस्म का ट्रीटमेंट देने को किसने कहा था?"

"नहीं।"

"तो फिर?"

"मैं ये जानना चाहता हूं कि इतनी सुबह उसे अस्पताल से क्यों और कैसे रिलीव कर दिया गया?"

"आई सी...।" सुन्दरी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा-"तो तुम इस बात से भी वाकिफ हो?"

"पूरी तरह नहीं...पूरी तरह वाकिफ कराओगी तुम..."

"एक टेलीफोन आया था कि फौरन इंस्पेक्टर सतीश मेहरा को रिलीव कर दिया जाए। डाक्टर ने कहा भी कि वक्ती तौर पर उसे रिलीव करना उचित नहीं है। उसे दोपहर बाद या शाम तक रिलीव कर दिया जाएगा...।"

"फिर?"

"डाक्टर को कठोर आदेश दिए गए और फिर सतीश मेहरा को जबरन यहां से रिलीव कर दिया गया। तब ठीक से सुबह नहीं हुई थी।"

"आदेश कहां से आया था?"

"इस बारे में जानकारी करने की मैंने कोशिश तो की थी मगर कामयाबी हासिल नहीं हो सकी थी। कोई रहस्यमय शक्तिशाली आदमी था जिसने ऐसा किया था।"

__ "वह कौन था? इस बात की कोई फिक्र नहीं ...तुम सिर्फ रिलीव होने के बाद की कोई बात हो तो बताओ?"

__ "बाहर निकलते ही जैसे ढेर सारे जंगली कुत्ते किसी एक छोटे-से जानकार को घेर लेते हैं, ठीक वैसे ही उसे घेर लिया गया। अस्पताल के बाहर एकाएक ही शोर उभरने लगा। उसके बाद भाग-दौड़ मच गई।"

"फिर?"

"फिर नहीं मालूम। सिर्फ इतना मालूम हो सका था कि वो पुलिसिया लालबत्ती क्रासिंगकी तरफ निकल भागा था और उसके दुश्मन उसके पीछे थ।"

"और कुछ...?"

"उड़ती-उड़ती बातें सुनने को मिली हैं।"

"कौन-कौन सी?"

"कोई कहता है कि वो भाग निकला और किसी का कहना है कि लालबत्ती से आगे उसे मार डाला गया। लम्बे-लम्बे छुरों से उसे चीर डाला गया।"

"तुम्हें किसकी बात में दम लगी?"

"शायद वो मारा ही गया है। क्योंकि बताने वाले का कहना था कि अगर उसका विश्वास न हो तो जाकर देख आओ...फुटपाथ पर जहां पोस्ट बॉक्स लगा है उसके ठीक सामने खून ही खून पड़ा है

"खून...

" "हां।"

"क्या वो खुन अभी-भी पड़ा है?"

"अब मैंने तो देखा नहीं लेकिन अगर तुम चाहो तो वहां जाकर तस्वीक कर सकते हो।"

"थैक्यू...थेंक्यू वैरीमच सुन्दरी...मैं तुम्हें बाद में मिलूंगा-अगर इस मामले में तुम्हारे पास कोई महत्वपूर्ण जानकारी आ जाए तो मैं तुम्हें उसकी भी कीमत अदा कर दूंगा।"

"मैं कोशिश करूंगी।" राज वहां से बाहर निकल आया। उसने लालबत्तीक्रासिंगकी राह पकड़ी।

लालबत्तीक्रासिंगसे आगे निकलने के बाद उसने फुटपाथ पर लगा पोस्ट बॉक्स तलाश किया। पोस्ट बॉक्स तलाश करने में उसे किसी प्रकार की कठिनाई नहीं उठानी पड़ी। पोस्ट बॉक्स दूर से नजर आ गया। पोस्ट बॉक्स के करीब पहुंचकर उसने निरीक्षण किया।

फुटपाथ पर लोगों का आवागमन जारी था। दिन काफी चढ़ आया था। हर आदमीअपने काम से आ-जा रहा था। उसने गौर से फुटपाथ का निरीक्षण आरंभ कर दिया। एक स्थान पर उसे सूखा हुआ खून पड़ा दिखाई दे गया।

उस खून के दाएं-बाएं दो ईंटें रखकर घेरा बना दिया गया था।

___ वह उस सूखे हुए खून को दूर से देखने के बाद ये नोट करने की कोशिश करने लगा कि कोई उसकी ओर देख तो नहीं रहा है।

निरीक्षण के उपरान्त उसने पाया कि कोई भी उसे देख नहीं रहा था। प्रत्येक आदमी बिजी था और उसे जैस उसे खून से कुछ भी लेना-देना नहीं था।

खून को देखने के बाद उसका हलक सूखने लगा। उसे लगा कि सुन्दरी की बात अपनी जगह बिल्कुल सही थी और अगर सुन्दरी सही थी, उसकी इंफार्मेशन सही थी तो फिर यकीकन सतीश की हत्या हो चुकी थी।

लेकिन...।

अगर सतीश की हत्या हो चुकी थी तो फिर लाश। इस सवाल ने उसके दिमाग के तारों को हिला डाला। उसकी जिज्ञासा वहां घटित होने वाली घटना की जानकारी के लिए बढ़ने लगी।

सिगरेट सुलगाने के उपरांत वह आसपास के क्षेत्र में चक्कर लगाने लगा। उसे अब एक ऐसे आदमी की तलाश थी जो कि उसे वहां घटने वाली घटना का विवरण दे सके।

फुटपाथ पर उसने एक चाय के होटल को पाया जो अति व्यस्त था। एक पेड़ के नीचे उसने थोड़ी सी जगह में बैंच डालकर चाय बनाने का काम शुरू कर रखा था। तेरह-चौदह साल का उसके पास एक छोकरा था जो चाय ग्राहक तक पहुंचाने का काम कर रहा था।

__छोकरे को हीरो बनने का शौक साफ दिखाई दे रहा था।

उसने सस्ती सी जींस और लाल रंग की चमकदार बनियान पहनी हई थी। उसके बाल हर दस मिनट के बाद दोनों हाथों की उंगलियों के जरिए दांए-बाएं से संवार दिए जाते थे।
 
राज ने उसकी रीडिंग करने के बाद उसे तब पकड़ा जब वह एक दुकानदार को चाय देकर लौट रहा था। होटल के पीछे का हिस्सा था।

"क्यों हीरो...सिगरेट पियेगा।" उसने छोकरे की ओर सिगरेट का पैकेट बढ़ाते हुए पूछा।

छोकरे ने अचम्भे से पहले अजनबी को देखा फिर सिगरेट के पैकेट से एक सिगरेट निकाल ली।

उसे अजनबी के चेहरे पर दोस्ताना भाव नजर आए।

"तेरा होटल सुबह कितने बजे खुल जाता है...।" राज ने उसकी सिगरेट अपने लाइटर से जलाते हुए पूछा।

"क्यों...।" उसके सवाल के जवाब में राज ने तुरन्त एक पचास का नोट उसकी ओर बढ़ा दिया।

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.

"बहुत सुबह खुल जाता है...इसलिए क्योंकि कोयले तोड़ने पड़ते है...भट्टी सुलगानी पड़ती है। इस काम में बहुत टाइम लग जाता है। लेकिन बाबू साहब! तुम हो कौन...?" जानकारी देते-देते एकाएक हो उसने चौंकते हुए सवाल किया।

"सवाल नहीं बच्चे सिर्फ उतना बता जितना तुझसे पूछा जाए।" कहने के साथ ही राज ने । उसकी ओर एक और पचास का नोट बढ़ाया। देने को वह उसे ढेर सारे रुपये दे सकता था लेकिन ज्यादा मोटी रकम देखकर छोकरा भड़क सकता था, डर सकता था कि कहीं कोई लम्बा चक्कर है, इसलिए जानकारी को छिपा भी सकता था।

"पूछा बाबू साहब...।"

"तो तू बहुत सुबह आ जाता है।"

"हो।"

"आज सुबह तूने यहां कुछ होते हुए देखा था क्या...।"

छोकरे ने उसे घूरकर देखा।

"इस तरह घूरकर क्या देख रहा है...मेरे सवाल का जवाब द...।"

"सुबह-सुबह बहुत कुछ होते हुए देखा। गाड़ियों का निकलना देखा...आदमियों का चलना देखा...अखबार वालों का चिल्लाना देखा।"

__ "अब मतलब का बात बोल...कोई लफड़ा होते दखा...कोई मारपीट...कोई छुरी चाकू...कोई मवाली...बोल-बोल-देखा किसी को।"

छोकरा खामोश रह गया। बोला कुछ भी नहीं।

राज उसके चेहरे को पड़ने की चेष्टा करने लगा। फिर जब छोकरा सिगरेट के कश लगाने में व्यस्त हो गया तब उसकी समझ में आया कि कुछ और चाहता है वह।

उसने तुरन्त जेब से एक सौ का एक पत्ता खींचकर उसके हाथ पर रखा-"अब तो बोल मेरे बाप...।"

___ "एक आदमी था...जो बचकर भागने की कोशिश कर रहा था और कुछ लोग उसे मारने के लिए छुरी चाकू लेकर उसके पीछे भाग रहे थे।"

"कौन था वह...?"

"मुझे क्या मालूम..."

"वहां पोस्ट बॉक्स के करीब ढेर सारा खून पड़ा हुआ है...।"

"उसी आदमी का है...।"

"तो क्या उन लोगों ने उसे मार डाला..?"

"कह नहीं सकता।"

"क्या लाश को अपने साथ ले गए।"

"नहीं।"

"फिर।"

"उस आदमी को किसी तरह मौका मिल गया था। बड़ा बहादुर आदमी था। इतने सारे लोगों से अकेला लड़ रहा था। फिर मौका मिलते ही उसने पुल से नीचे छलांग लगा दी।"

"पुल तो काफी ऊंचा है।"

"उसकी किस्मत अच्छी थी...नीचे से एक ट्रक गुजर रहा था। वह उसी ट्रक के ऊपर गिरा था ।"

"तुझे अच्छी तरह मालूम है कि वह ट्रक के ऊपर गिरा था।"

"अच्छी तरह।"

"यानी वह मरा नहीं बच गया।"

"कुछ कहा नहीं या सकता।"

"क्यों...।"

"इसलिए कि उसके दुश्मन तुरन्त हो एक कार में सवार होकर वहां से उस ट्रक के पीछे चल पड़े थे।

"तूने बराबर देखा था न।"

"एकदम बराबर...।"

"उसके बाद।"

"उसके बाद क्या बाप...फिर अपुन कुछ नेई देखा..."

"यानी आगे का कुछ नहीं मालूम।"

"नहीं।" राज गहरे सोच में डूब गया।"

"अपुन चलता बाप..."

"हां तू जा...।"

छोकरा चला गया। राज ने सिगरेट सुलगाई और फिर वह वहां से वापस चल पड़ा।

उसका दिमाग सतीश मेहरा के बारे में सोच-सोचकर परेशान हो रहा था। वहां आकर पहला झटका उसे ये लगा था कि सतीश की हत्या हो गई है लेकिन छोकरे से मिलने के बाद जो जानकारी उसे मिली, उससे कम से कम इतना तो साबित हो ही गया था कि सतीश अपने दुश्मनों का जाल तोड़कर निकल भागने में कामयाब हो गया था।
 
उसका दिमाग सतीश मेहरा के बारे में सोच-सोचकर परेशान हो रहा था। वहां आकर पहला झटका उसे ये लगा था कि सतीश की हत्या हो गई है लेकिन छोकरे से मिलने के बाद जो जानकारी उसे मिली, उससे कम से कम इतना तो साबित हो ही गया था कि सतीश अपने दुश्मनों का जाल तोड़कर निकल भागने में कामयाब हो गया था।

अब सवाल ये था कि सतीश था कहां...कहीं उसे उसके दुश्मनों में दोबारा तो अपनी गिरफ्त में नहीं ले लिया था।

एक के बाद एक विचार उसके दिमाग में आ-आकर उसे परेशान करते जा रहे थे।

अब उसके सामने कोई रास्ता भी बाकी नहीं रह गया था।

नई सिगरेट सुलगाकर वह वापस लौट चला।

सतीश मेहरा के फ्लैट पर वापस लौटने पर उसे वहां डॉली गमगीन मुद्रा में बैठी मिली। एक पीले रंग का लिफाफा उसके हाथ में था। \

"भैया मिले...?" राज को देखते ही वह जिज्ञासा भरे स्वर में बोली।

___ "नहीं..।" राज ने थके हुए स्वर में कहा "लेकिन ऐसा भी नहीं है कि तुम्हारा भैया मिलेगा ही नहीं...वह मिलेगा..जरूर मिलेगा। वक्त खराब है इसलिए कोई भी काम ठीक तरह से हो नहीं पा रहा है, वक्त बदलते देर नहीं लगती। सही वक्त आने पर सब-कुछ अपने आप ही ठीक हो जाएगा।"

"शायद तुम ठीक ही कह रहे हो...वक्त खराब है...।"

उसकी उदासी को देखकर अंदर ही अंदर राज चौंका। फिर उसकी नजर उसके हाथ के लिफाफे पर पड़ी।

"पुलिस स्टेशन गई थीं तुम...?" उसने दबे हुए स्वर में पूछा।

"हां गई थी।"

"वहां कुछ पता चला...?"

"वहां भी यही बताया जा रहा है कि सतीश मेहरा वहां नहीं आए। उनके खिलाफ तो जैसे पूरा पुलिस स्टेशन था। वहां बताया गया कि सतीश मेहरा से स्पष्टीकरण मांगा गया है। नोटिस सर्व नहीं हो पा रहा था। भैया का नोटिस उन्होंने मुझे दे दिया। मुझसे हस्ताक्षर भी करवा लिए...।"

_ "हूं...।" राज ने लम्बी विचारपूर्ण हुंकार

"इसका मतलब कार्यवाही अमल में लाई जाने लगी है।"

"कैसी कार्यवाही?"

"सतीश के दुश्मन सतीश के खिलाफ जाल बिछा रहे हैं...।"

"वही लोग जो मुझे किडनैप करने की कोशिश कर रहे थे...?"

"हां वही...।"

"अब क्या होगा...भैया हैं नहीं और उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही अमल में लाई जा रहीं है। इसके जवाब में अगर कुछ न किया गया तो उनकी नौकरी खतरे में पड़ सकती है।"

"ठीक कह रही हो।"

"कुछ करो न...मेरा तो दिमाग काम ही नहीं कर रहा है...।"

"पहला काम तो यह है कि तुम पुलिस में अपने भैया के गायब हो जाने की रिपोर्ट दर्ज करवा दो ताकि स्पष्टीकरण के विरोध में विभाग और आगे किसी प्रकार की कार्यवाही न कर सके...।"

"ठीक..."

"और दूसरा काम ये कि किसी प्रेस रिपोर्टर से मिलकर इस प्रकरण को प्रेस मीडिया तक पहुंचा दिया जाए। क्योंकि जब बात प्रेस में पहुंचेगी तब ही दुश्मन दबेगा वरना वह बखौफ होकर जुल्म करता चला जाएगा।"

"रिपोर्ट तो मैं कर दूंगी लेकिन प्रेस रिपोर्टर की तलाश कहां करूंगी...?"

__ "तुम पहले रिपोर्ट कर आओ-तब तक मैं प्रेस रिपोर्टर का इंतजाम करता हूं।" कहने के साथ ही राज ने डॉली के हाथ से लिफाफा लेकर अंदर से स्पष्टीकरण वाला कागज निकाल लिया।

स्पष्टीकरण में मंत्री जी के अपमान वाला चार्ज ही लगाया गया था और सतीश से तीन दिन के अंदर उसका जवाब मांगा गया था, साथ ही उसमें ये भी लिखा था कि निश्चित अवधि के अंदर यदि जवाब न दिया गया तो ये मान लिया जाएगा कि तुम्हें अपना अपराध कबूल है।

___"रिपोर्टदर्ज कराने मैं अकेली ही जाऊं...?" डॉली ने उसकी ओर देखते हुए पूछा।

"डॉली...दरअसल पुलिस से मेरी पुरानी रिश्तेदारी है। मैं नहीं चाहता कि बार-बार पुलिस के सम्पर्क में आकर मेरा कोई रिश्तेदार मुझे परेशानी में डाल दे।"

"पुलिस में रिश्तेदारी...?" डॉली ने हैरानी से उसकी ओर देखा।

"हां।" राज मुस्कराया।

"तब तो तुम्हें अपने रिश्तेदारों को तलाश कर लेना चाहिए उससे फायदा तो हमें ही मिलेगा।"

"मेरे रिश्तेदार हमेशा मेरा बोरिया-बिस्तर गोल करने के चक्कर में लगे रहते हैं।"

"ये कैसे रिश्तेदार हुए...?"

"ये ऐसे ही रिश्तेदार है।"

"कमाल है...तुम्हारे रिश्तेदार तुम्हारे ही दुश्मन...।"

"तुम मेरे रिश्तेदारों से अभी वाकिफ नहीं हो।" वह मुस्कराता हुआ बोला।

"कहीं कुछ गड़बड़ है...तुम मुस्करा भी रहे हो और पुलिस वालों को अपना रिश्तेदार भी बता रहे हो।"

"तुम नहीं समझोगी...दरअसल अभी मैं इस स्थिति में हूं नहीं कि तुम्हें पूरी बात बता सकू।"

"ठीक है...मैं रिपोर्ट दर्ज कराने जाती हूं।"
 
डॉली रिपोर्ट दर्ज कराने चली गई।

राज सिगरेट सुलगाकर बाहर आ गया।

अब वह सोच रहा था कि प्रेस रिपोर्टर की बाबत क्या किया जाए। कहने को उसने डॉली से कहे तो दियार कि वह प्रेस रिपोर्टर का इंतजाम करता है, मगर प्रेस रिपोर्टर का इंतजाम करेगा कैसे? उसकी तो किसी से पहचान है भी नहीं। सोचते-विचारते उसने पूरी सिगरेट फूंक डाली।

अंत में वह इसी नतीजे पर पहुंचा कि उसे अपने मुम्बई वाले दोस्त जय और परेरा की मदद लेनी ही होगी।

उस नतीजे पर पहुंचते ही वह वापस फ्लैट में लौटा और उसने फोन पर जय और परेरा के घाटकोपर वाले आफिस का नम्बर डायल कर दिया।

.

'एस. पी. बिल्डर्स...।" दूसरी ओर से खनकदार नारी स्वर उभरा।

"तुम कौन हो?" राज ने अचम्भित स्वर में पूछा।

"जी...मैं रिसेप्शनिस्ट हूं...आपको किससे बात करनी?"

___ "एस और पी में से जो भी वहां मौजूद हो उसी से...।"

"जय साहब हैं।"

"उन्हें बुलाओ।"

"पण जय साहब बिजी हैं, आप बाद में फोन करना।"

"उसे बोल, राज का फोन है...।"

"कौन राज?"

"राज शर्मा...।"

"लेकिन साहब की मीटिंग...।"

"तू खबर कर...उसके बाद मीटिंग के बारे में बोलना।" इस बार राज सख्त लहजे में बोला।

दूसरी ओर लाइन पर खामोशी छा गई। एक मिनट बाद...।

"हां-हैलो बाप...अपनाजय...।" दूसरी ओर से जय का हांफता हुआ स्वर उभरा। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो बहुत दूर से दौड़ता हुआ टेलीफोन तक पहुंचा हो।

"कैसा है तू...बढ़िया...?" राज ने उसकी आवाज पहचानते हुए कहा।

"एकदमिच बढ़िया...।"

"और परेरा।" राज ने उससे पूछा-"वो कहां है...?"

"परेरा को तो बाप बाहर का हवा लगेला है। उसका पांव का अन्दर में चक्कर होएला बाप...।"

"चक्कर उसे कहां ले गया है।"

"हांगकांग गएला है वो बिडूं...और इस बार तो अपुन कू बोल को भी नेई गया।"

"कोई चक्कर है क्या?"

"नेई चक्कर नेई...बिजनेस का वास्ते जाएला है।"

"फिर तो बराबर है न...तरक्की कर रहा है।"

-

..

___ "सब तुमेरा आशीर्वाद है बाप...तुमेरा दिया है...उसका ऊपर चार माले का बिल्डिग बनाने का

और क्या...पण बाप अबी तुम है किधर और किधर से बोलेला है?"

___ "ठहरा चैम्बूर हूं लेकिन अभी मानखुई से बोल रहा हूं..।"

"क्या बाप...कभी अपुन को रेलवे स्टेशन से एयरपोर्ट से...किधर से भी डायरेक्ट फोन करको बुलाने का...डायरेक्ट ट्यूनिंग बनाने का...जभी भी मिलाता कधिरठिकाना बनाने का बादइच मिलता...क्या बाप...क्या अपुन कू सगेवाला नेई समझता...अरे अपुन सगेवाला से बढ़ को है...कभी टेम पड़ा तो अपुन बताएंगा...तुमेरे कू दिखाएंगा।"

___ "बेकार की बातें मत कर और ये बता कि क्या कोई प्रेस रिपोर्टर ऐसा तेरी नजर में है जो ईमानदारी से कलम से पेट पालता हो...आज के माहौल में जिसे पागल कहा जाता हो...जो किसी भी बड़ी से बड़ी ताकत से टकरा जाने से डरता न हो।"

"ऐसा प्रेस रिपोर्टर से तुमेरे कू क्या काम पड़े ला है बाप...?"

"मैं तुझसे जो कुछ पूछ रहा हूं तूने सिर्फ उसका ही जवाब देना है...क्या।" राज जय की टोन में थोड़ा सख्ती लाता हुआ बोला।
 
"बरोबर बोलता बाप बरोबर...वो प्रेस रिपोर्टर का इंतजाम जाएंगा। फिकर नेई करने का,इंतजामहो जाएगा...।"

"कब तक?"

"एक क्लॉक का अंदर में।"

"देर नहीं होनी चाहिए...मानखुर्द का मेरा पता नोटकर और उड़कर मेरे ठिकाने तक उसे लेकर पहुंच...समझा क्या।"

"बरोबर समझा बाप।"

"मुझे दोबारा फोन तो नहीं करना पड़ेगा..."

"नेई माई बाप सवालिच पैदा नेई होता।"

"मैं इंतजार कर रहा हूं।"

"अपुन काम निपटा को फौरन पहुंचेला है बा प...फौरन...।"

राज ने मानखुर्द का पता बताकर फोन चंद कर दिया। फिर वो सिगरेट के कश लगाने में व्यस्त हो गय। अब उसे डॉली की वापसी का इंतजार था।

सिगरेट खत्म होने के बाद उसने करीब के रेस्ट्ररांसे डबल नाश्ता मंगवाया। भूख उसे थोड़ी थोडी सताने लगी थी। उसने पहले डॉली के आने का इंतजार किया। उसके बाद जब उसके पेट में चूहे कूदने लगे तो उसने अपना नाश्ता शुरू कर दिया।

नाश्ते के बाद भी डॉली वापस न लौटी।

यहां तक कि डॉली की जगह जय प्रेस रिपोर्टर के साथ वहां आ पहुंचा लेकिन डॉली फिर भी न आयी।

प्रेस रिपोर्टर का नाम करीमभाई था।

मुश्किल से पच्चीस के पेटे में पहुंचा करीमभाईनौजवान था। मजबूत जिस्म के करीम के गोरे चेहरे पर काले रंग की दाढ़ी थी। सिर पर क्रोशिए की बुनी हुई टोपी। कुर्ता-पायजामा और कंधे पर कपड़े का थैला।।

"तपन सिन्हा...।" उससे हाथ मिलाते हुए राज ने अपना परिचय दिया।

___ "लोग मुझे कामरेड करीम के नाम से जानते हैं...।" करीम ने उसका मजबूत हाथ अपने हाथ में दबाने का यत्न करते हुए कहा।

"कामरेड...अगर जुल्म हो रहा हो तो तुम किसका साथ दोगे...?"

"जुल्म को मैं अपनी आखों के सामने होता देख नहीं सकता। जान दे दूंगा मगर जालिम को जुल्म करने नहीं दूंगा। ये मेरा उसूल है।"

__ "गुड...मुझे तुम्हारे जैसे बहादुर कलम के सिपाही की ही जरूरत थी।"

"जुल्म किस पर हुआ या होने वाला है और जालिम कौन है...?"

___ "पहले तशरीफ तो रखें कामरेड फिर बताता हूं...।"

करीम कुर्सी पर बैठ गया।

राज ने आंखोंसे जय को संकेत किया | जय मतलब समझते ही बाहर चला गया। राज के मतलब को उसने सहज ही समझ लिया। उसने बाहर जाकर करीम के लिए कुछ नाश्ते पानी का इंतजाम करना था।

राज ने करीम को सिगरेट ऑफर की। करीम ने सिगरेट पैकेट से निकालकर होंठों में दबा ली और राज के जलाने पर उसे स्वयं ही आगे की ओर झुककर सुलगा लिया।

इसी बीच...।

डॉली अंदर दाखिल हुई। उसके चेहरे पर परेशानी के लक्षण स्पष्ट देखे जा सकते थे।

"उन्होंनेरिपोर्ट नहीं लिखी...।" उसने संदिग्ध निगाहों से करीम की ओर देखते हुए राज को बताया।

"रिपोर्ट नहीं लिखी...।"

"हां...।" \

"क्या कहा?"

"कोई सीधे मुहं बात ही नहीं कर रहा था। यहां तक कि एक भवाली किस्म के शातिर अदमी ने एक कोने में ले जाकर मुझे धमकी भी दे दी कि अगर मैंने पुलिस थाने में और हड़कम्प मचाया तो वो मुझे थाने के ऐन बाहर कल्ल कर देगा।"

"कौन था वो बदमाश?" करीम बीच में दखल देता हुआ बोला-"चलो मेरे साथ...अभी...इसी वक्त...मैं भी तो देखू किस में है इतना दम जो पुलिस थाने के बाहर ऐसा दुस्साहस करने की हिम्मत कर रहा है।"

___"नहीं कामरेड...जल्दबाजी नहीं...पहले पूरी बात को समझ लो और उसे अपने समाचार पत्र की हैड लाइन बना दो। उसके बाद की कहानी को मैं संभाल लूंगा।"

"किस्सा क्या है...?"

.

.

.

"किस्सा ये है कि मिस डॉली...।" राज ने डॉली की ओर संकते करते हुए कहा-" मिस डॉली मेहत का भाई सतीश मेहरा एक पुलिस इंस्पेक्टर है और किसी तरह सतीश की दुश्मनी एक बड़े आदमी से हो गई। उस आदमी की पहुंच बहुत ऊपर तक है। पॉल्टीकल एप्रोच भी बहुत दूर तक है। गुण्डा पावर भी है। उस आदमी ने अपन गुण्डों की मदद से डॉली को किडनेप करने की कोशिश की। नाकामयाब होने पर वो शख्स अपने आदमियों को लेकर पुलिस स्टेशन में ही सतीश पर टूट पड़ा...।" ‘
 
डॉली ने आश्चर्य से राज की ओर देखा, क्योंकि जो बात वह कामरेड करीम को बता रहा था वो उसके लिए एक रहस्य थी। वह चुपचाप आंखें फाड़े सुनती रही।

"घायल सतीश को अस्पताल पहुंचाया गया। अस्पताल से जब सतीश ने अपने ए. सी. पी. को । फोन करके घटना के बारे में बताना चाहा तो ए. सी. पी. ने उसे डांटते हुए कहा कि उसके विरुद्ध अनुशासनहीनता की कार्यवाही अमल में लायी जा रही है।"

"आई सी...।"

"सुबह सबेरे सतीश को जबरन अस्पताल से रिलीव कर दिया गय। रिलीव सतीश को फिर गुण्डों ने घेरा। मैंनेजानकारी हासिल करने की कोशिश की तो थोड़ी दूर चलकर मेरी जानकारी का सिलसिला टूट गया।"

"यानी...।"

"यानी ये कि आज सुबह अस्पताल से रिलीव हो जाने वाले इंस्पेक्टर सतीश मेहरा का कहीं कोई पता नहीं है। उसे जान-बूझकर इसीलिए सुबह तड़के रिलीव किया गया था ताकि उसका काम तमाम कर दिया जाए। अंदर की खबर के अनुसार सतीश मेहरा को रिलीव करने के पीछे भी किसी बड़ी शक्ति का हाथ था। कोई फोन आया था उसके बाद करने मेहरा को आनन-फानन रिलीव कर दिया गया।"

"उस बड़ी शक्ति के बारे में कुछ बताओगे?"

"तुम्हें बताने के लिए ही तो बुलाया है कामरेड...अगर तुम्हें नहीं बताऊंगा तो किसे बताऊंगा। सुनो..पहले मंत्री धरम सावंत ने अपने भाई रंजीत सावन्त के आदमी जग्गू जगलर के माध्यम से डॉली का अगवा करवाने की कोशिश की थी। फिर जग्गू जगलर को हवालात से छोड़ देने की धमकी रंजीत ने दी। सतीश ने इंकार किया तो रंजीत सावन्त ने न सिर्फ पुलिस स्टेशन के अन्दर घुसकर सतीश मेहत की धुनाई की बल्कि वो अपने गुर्गे जग्गू जगलर को वहां से छुड़ाकर भी ले गया। उसके बाद जब सतीश अस्पताल पहुंच गया तो तब उसके पीछे उसके खिलाफ साजिश रची गई। आज सुबह सतीश से मांगा गया स्पष्टीकरण डॉली को रिसीव करा दिया गया। इस सबके पीछे धरम सावन्त और उसके भाई रंजीत सावन्त का हाथ है। सतीश के खिलाफ जुर्म साबित करने की गरज से धरम सावन्त ने उसके पीछे अपने आदमी लगा दिए। उसे किसी भी तरह की मदद हासिल नहीं है। समूची मशीनरी इस वक्त उसके खिलाफ है। वो अनजाने अंधेरों में खो चुका है। उसका कुछ भी पता नहीं चल रहा है।"

"उसने सचमुच मंत्री धरम सावन्त के साथ कोई गलत व्यवहार नहीं किया...?"

"अरे जब वो धरम सावन्त से मिला ही नहीं तों गलत, सही व्यवहार वाली बात कहां से आ गई?"

"इसका मतलब सतीश मेहरा की धरम सावन्त से कोई पुरानी डांट थी?"

"हां...।"

"अब तुम क्या चाहते हो?"

"मैं सच्चाई को प्रेस के माध्यम से उजागर करना चाहता हूं। मैं चाहता है कि तुम मेरे कथन पर विश्वास न करो बल्कि खुद तहकीकात करके जिस नतीजे पर पहुंचो, उसे अपने अखबार की हैड लाइन बना दो। अगर दोषी सतीश है तो लिखना कि पुलिस महकमे के बदजुबान इंस्पेक्टर ने मंत्री धरम सावन्त के साथ बदसलूकी की और अगर दोषी मंत्री है...मंत्री के दबाव में प्रशासनिक मशीनरी है...तो फिर बख्शा उन्हें भी नहीं जाना चाहिए। वैसे जो हकीकतन गुजर चुका है वो मैं बयान कर चुका हूं। मैंने तुमसे जर्रा बराबर भी झूठ नहीं बोला है।"

__ "मैं समझ रहा हूं...तुम झूठ नहीं बोले रहे हो । झूठ के चेहरे पर काली परछाईं अलग से नजर आ जाती है।"

"दसरे...सतीश जैसे ही मुझे मिलेगा, उसे लेकर मैं सबसे पहले तुम्हारे पास पहुंचूंगा।'

"अगर वो न मिला तो...।"

"तो फिर उसके बारे में धरम सावन्त को बताना होगा।" राज यकायक ही कठोर स्वर में बोला।

"धरम सावन्त से पूछेगा कौन?"

"मैं...।"

"वाहिद तुम?"

"हां...वाहिद मैं।"

कामरेड करीम उलझन में पड़ गया। उसने कुछेक क्षणों तक राज से आखें मिलाये रखीं, उसके बाद स्वयं ही उसकी पलकें झुकती चली गई।

"मैं यकीन करूंगा कि कलम का सिपाही पूरी ईमानदारी के साथ सच की तह में पहुंचने के बाद असली कहानी को शाया करेगा?"

"बिल्क ल करेगा...न करने का सवाल ही पैदा नहीं होता।"

इसी बीच।

जय वहां एके वेटर के साथ दाखिल हुआ। वेटर बड़ी-सी ट्रे उठाए हुए था।

नाश्ते-पानी के बाद कोल्ड्रिंक और उसके बाद करीम वहां से चला गया। जाने से पहले उसने एक बार राज से सतीश मेहरा के विषय में विस्तारपूर्वक तमाम जानकारी हासिल कर ली थी। कुछ सवाल उसने डॉली से भी पूछे जिनके जवाब वो अपनी डायरी में नोट करता चला गया था।

"तुमने मुझसे झूठ क्यों बोला था...?" कामरेड करीम के चले जाने के उपरान्त डॉली ने राज से शिकायत भरे स्वर में पूछा-"कि भैया का एक्सीडेंट हो गया है...?"

"मैं नहीं चाहता था कि तुम्हें किसी प्रकार की परेशानी हो। मामला इस तरह तूल पकड़ता चला जाएगा...ऐसा भी मैंने नहीं सोचा था।"



"इतनी बड़ी परेशानी को भी मुझसे छिपाने की कोशिश कर रहे थे?"

"वो..मैं....दरअसल डॉली वक्तीतौर पर जो कुछ दिमाग में आया कर दिया...अगर मैंने कोई भारी भूल की तो उसके लिए माफी मांगता हूं।"

"ऐसा क्यों कहते हो...क्या मुझे शिकायत करने का भी अधिकार नहीं है?"

"तुम्हारे पास तो सभी अधिक सुरक्षित हैं। तुम कुछ भी कर सकती हो...शिकायत भी कर सकती हो और सवाल भी पूछ सकती हो।"

"जो चला गया...बातों के हिसाब से वो प्रेस रिपोर्टर होता था...।"

"हो...होता था।"

"और ये...?" डॉली ने जय की ओर उंगली उठाते हुए पूछा।
 
"अपुन जय...।" जय ने मुस्कराते हुर कहा-"अपुन लायन बाप का चमचा...।"

लायन नाम पर राज ने जय की ओर आंखें तरेरकर देखा। जय सहम गया। बात उसकी समझ में आ गई कि उससे गलती हो गई है। राज ने हर जगह अपने प्रदर्शन को बचाना होता है, अगर वह ऐसा न करता तो कब का पुलिस के हाथों गिरफ्तार हो चुका होता।

___ "सॉरी...अपुन से गलती हुआ बाप...न कस्ट टाइम नेई होएंगी...शपथ।"

"क्या हुआ...?" डॉली उसकी बात को न समझती हुई अचरज से बोली

"कुछ नेई मेम साहब...वो अपुन-अपुन का परिचय कराएला था...साहब ने अपुन कू खोली से निकाल कू किधर महलों को बीच में ला खड़ा किया...ग्रेट आदमी...।"

"तपन ये क्या कह रहा है...।" डॉली ने उसकी बात समझते हुए हैरत से पूछा।

"पागल है। यूं ही बकवास किया करता है। बकवास करने की इसकी आदत है।" राज ने मुस्कराते हुए कहा।

"अहसान करना तुम्हारी पुरानी आदत है और तुम नहीं चाहते कि अहसान करके जताया जाए।"

"नहीं डॉली...अहसान जैसी कोई बात नहीं है। बस तुम समझ लो कि ये जय मेरा बहुत अच्छा दोस्त है। अगर कभी मैं तुम्हें न मिल सकू तो इसे याद रखना। ये तुम्हें कभी भूलेगा नहीं...हमेशा याद रखेगा और तुम्हारे एक इशारे पर अपनी जान तक दांव पर लगा देगा।"

"फिर तो ये सचमुच तुम्हारा सबसे अच्छा दोस्त हुआ।"

"वो तो मैं पहले ही कह रहा है।"

"अच्छा तपन, अब ये बताओ कि भैया को कहां तलाश करूं...कैसे तलाश करूं...?"

"सतीश को तलाश करने का काम मेरा है। तुम उसकी चिन्ता छोड़ दो। वो जहां कहीं भी होगा, मैं उसे ढूंढ निकालूंगा...निश्चित रही।"

"प्रेस रिपोर्टर सही काम करेगा।"

"जय मेरे लिए जिस आदमी को लेकर आएगा वो गलत नहीं हो सकता...किसी भी कीमत पर गलत नहीं हो सकता।"

"जय पर तुम कुछ ज्यादा ही विश्वास कर रहे हो...।"

"इसलिए कि वो विश्वास करने योग्य है।"

"क्यों जय...।" डॉली जय की ओर देखते हुए बोली-"क्या मिस्टर तपन सच कह रहे हैं...?"

जय मुस्कराया।

"तुम्हारी मुस्कराहट मेरे सवाल का जवाब तो नहीं...।"

___ "हां मेम साहब ! बरोबर बोलेली हो तुम...पण क्या। विश्वास अटु है तो उसका कोई वजह होएंगा।"

.

"हां...वजह तो जरूर ही होगी।"

"इस वास्ते तुम अपुन का बाप से पूछना कि ये विश्वास काय कू है...।" जय मुस्कराता हुआ बोला।

डॉली ने सवालिया नजर से विनाद की ओर देखा-"कुछ कहोगे अपने दोस्त के बारे मैं..।"

"लम्बी कहानी है...।" राज ने उसके सवाल का जवाब देते हुए कहा-"फुरसत मिलने पर बता दूंगा।"

___"ओ. के. अभी ये बताओ कि भैया के लिए क्या कर रहे हो...उन्हें कहां तलाश करोगे?"

"उसका रास्ता तलाश करना है अभी।"

"कहा...।"

"उसी मंत्री के असपास से जो वक्ती तौर पर सतीश का दुश्मन बना हुआ है।"

"प्लीज तपन...जो भी करना है जल्दी करो...रिपोर्ट लिखने की पुलिस कर्मचारी तैयार नहीं है। भैया के खिलाफ कागजी कार्यवाही तो हो ही जाएगी।"

"सारी कार्यवाही को बाद में देख लिया जाएगा।"

डॉली उदास हो उठी।

"डरो नहीं...सब ठीक हो जाएगा।"

"प्रेस रिपोर्टर न जाने कब तक इस न्यूज को छापे...उसका कोई ठीक नहीं है।"

"जल्दी ही छापेगा। वो ईमानदार आदमी है।"

"गुण्डा पावर से हर कोई डरता है।'
 
"वो आदमी नहीं डरता।"

"तुम्हें यकीन है।"

"हां...।"

"काम करेगा वो।"

"पूरा और एकदम सही।"

"तुम हर किसी के ऊपर आख बंद करके विश्वास कर लिया करते हो। तुम्हारी ये आदत तुम्हें कभी-भी चोट पहुंचा सकती है।"

"मुझे आदमी पहचानने का तजुर्बा है।" राज मुस्कराया।

"कभी तुम्हें तुम्हारा तजुर्बा चोट दे गया तो।"

"ऐसा कभी नहीं हो सकता।"

"अगर हो गया तो...।"

"जो बात हो ही नहीं सकती उसकी संभावना पर विचार करने से कोई फायदा नहीं। बल्कि उसके बारे में तो सोचना भी बेकार है।"

"तो फिर...कहां से शुरू करना चाहोगे।"

-

"अभी बताता हूं...।" इतना कहकर राज ने टेलीफोन डायरेक्टरी में धरम सावन्त का नम्बर तलाश करता शुरू कर दिया। धरम सावन्त का नम्बर तो मिला नहीं लेकिन...।

.

.

शीघ्र ही उसे रंजीत सावन्त का नम्बर मिल गया। उसने नम्बर मिलाया।

"कौन...?" दूसरी ओर से कठोर स्वर में पूछा गया।

"रंजीत सावन्त है क्या...?"

"तमीज से बात कर, रंजीत साहब को साहब कहकर संबोधित कर...साहब बोल...।"

"अपने बाप को बोल देना कि अगर सतीश को कुछ हो गया तो...।"

"क्या बोला तू...क्या बोला...जरा अपना नाम-पता तो बोल। अक्खी मुम्बई में तुझे बचाने वाला मिलेगा नेई...समझा क्या।"

"उसे बोल देना चमचे...सतीश मेहरा को कुछ हो न जाए वरना उसकी शिनाख्त करने में हर किसी को परेशानी हो जाएगी।"

"अरे तू अपनी बात बोल...अपना थोबड़ा बता किधर देखा जा सकता है...फिर शिनाख्त तो मैं करवा दूंगा तेरी...तू एक बार बस इशारा कर दे।"

"मैं रंजीत से बात करना चाहता हूं।"

"अभी रंजीत साहब हैं नहीं...।"

"बाद में फिर फोन करूंगा।" कहकर राज ने फोन डिस्कन क्ट कर दिया। वह रंजीत के चमचे से बात करके अपना वक्त जाया करना नहीं चाहता था।

"जय...।" रिसीवर क्रैडिल पर रखता हुआ वह जय की ओर मुड़ा।

"यस बाप?" जय तत्परता से बोला।

"मानखुर्द पुलिस स्टेशन में कोई अपना आदमी है क्या?"

"तलाश करना पड़ेगा...अभी एकदम से क्या बोले अपुन...।" जय विचारपूर्ण स्वर में बोला।

"तलाश कर...फौरन तलाश कर।"

.

.

"पण...उधर का आदमी से क्या बात करने का बाप...अपुन कुछ समझेला नेई।"

"तूने सब कुछ समझने का है?"

"नेई...।"

"फिर।"

"फिर कुछ नेई।"

"तो फिर सिर्फ वही कर जो तुझे करने को बोला जा रहा है।"

"बरोबर...।"

"अभी तू जा सकता है...जो काम बोला वो फुर्ती से होना चाहिए...।"

.

.

"सलाम बाप।" सैल्युट करने के अंदाज में जय ने हाथ उठाकर माथे पर पहुंचाया, फौजी की तरह ऐढ़ी के बल घूमा और तेज कदमों से बाहर निकलता चला गया।
 
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