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लाल हवेली

गहरे नीले रंग की एस्टीम जय के माध्यम से राज ने हासिल कर ली थी। उसी में एक मोबाइल भी मौजूद था। राज सामान्य गति से एस्टीम को चला रहा था। सिगरेट उसके होंठों में दबी हुई थी।

डॉली उसकें बराबर में बैठी थी।

वह बार-बार राज से बात करने की कोशिश करती और बार-बार राज अपना ध्यान सामने ड्राइविंग में लगा देता क्योंकि ट्रैफिक की भीड़-भाड़ ज्यादा थी। अन्तत: एस्टीम उस भीड़ से बाहर निकली।

"हम कहां जा रहे हैं?" डॉली ने अवसर मिलते ही राज से सवाल किया।

"पुलिस स्टेशन...।" राज ने उसे संक्षिप्त सा जवाब दिया।

"पुलिस स्टेशन किसलिए...?"

"कुछ सवाल करने हैं।'

"किससे।"

"वहां पहुंचकर बताऊंगा।"

"सस्पैंस पैदा कर रहे हो।"

"यही समझ लो।"

"तपन, तुम्हें हो क्या गया है।"

"सिर्फ थोड़ी सी परेशानी।"

"कैसी परेशानी?"

"माशरे की...समाज की बिगड़ती हुई तस्वीर की परेशानी। हम डेमोक्रेसी में...जनतंत्र में जीने वाले भारतीय कहलाते हैं। भारत को सबसे बड़ा डेमोक्रेटिक कंट्री माना जाता है जबकि डेमकैसी के नाम पर यहां महज गुण्डातंत्र है...लाठी तंत्र है। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत हर पग पर चरितार्थ हो चुकी है। तुम अबला थी...कमजोर थीं, इस वजह से पुलिस स्टेशन में तुम्हारी न तो कोई फरियाद सुनी गई और ना ही रिपोर्ट लिखी गई...जबकि कहा ये जाता है कि हमारे यहां जलता को हर तरह की आजादी है। प्रत्येक व्यक्ति के अपने मौलिक अधिकार होते हैं जिनका किसी भी प्रकार से हनन नहीं होता...और दूसरी तरफ तुम हो जिसे हर कदम पर मौलिक अधिकारों से दूर रख जा रहा है। तुम अपने अधिकारों के लिए किसी भी प्रकार का विरोध प्रदर्शित नहीं कर सकती...या कर सकती हो...? बोलो..बोलो डॉली।"

___"नहीं कर सकती...तुम ठीक कह रहे हो।" डॉली उदासी भरे स्वर में बोली।

"पुलिस स्टेशन में तुम्हारी जगह कोई खद दरदारी टोपी संभालता हुआ गया होता तो वही पुलिसिए जिन्होंने तुम्हें तुम्हारी रिपोर्ट लिखने से इंकार कर दिया, इच्छा सामने बिछ-बिछ जाते। तुम रिपोर्ट न लिखवाती तब भी तुम्हारी रिपोर्ट न सिर्फ लिख दी जाती बल्कि तुम्हारे भाई की तलाश में कितने ही पुलिसियों को दौड़ा भी दिया जाता और बहुत मुमकिन था कि आनन-फानन में तुम्हारे भाई को ढूंढकर तुम्हारे सामने पेश भी कर दिया जात...मगर...अफसोस! तुम न तो खद्दरधारी हो और ना-ही तुम्हारे पास लाठी है तुम शक्तिहीन हो और हमारी पुलिस हमेशा कमजोरों को ही सताने क का काम करती रही है।"

"तो अपनः इन विचारों के साथ पुलिस स्टेश न में दाखिल होकर तुम करना क्या चाहते हो?"

"वहीं चलकर बताऊंगा।" कहने के साथ ही राज ने अपने बैग को डॉली की ओर बढ़ा दिया "इसे खोलो।"
 
डॉली ने असमजसपूर्ण भावों से उसकी ओर देखते हुए बैग खोल दिया।

राज एक हाथ से कार का स्टेयरिंग व्हील संभाले हुए था। दूसरे हाथ से उसने खुले हुए बैग के अंदर से छोटे-छोटे स्प्रिग निकाले। उन्हें नाक में फंसाकर थोड़ी सैटिंग करने पर उसके चेहरे पर परिवर्तन आ गया। आखों पर काला चश्मा और बैग के अंदर से तीसरी चीज धुंघराले बालों वाली व्हिग निकालकर जब सिर पर एडजस्ट की तो राज पूरी तरह बदल गया।

डॉली आश्चर्यचकित दृष्टि से उसकी ओर निहार रही थी। हैरत से उसके नेत्र फैलते चले गए।

"मैया री...तुम तो कोई जादूगर लगते हो।"

वह मुस्कराया। "अब तो तुम्हें कोई पहचान नहीं सकेगा।"

उसने नई सिगरेट सुलगा ली। बो एकदम खामोश था। उस घड़ी उसका दिमाग किसी और विषय के बारे में विचार कर रहा था।

उसने स्वीकृति मात्र में गर्दन हिला दी।

"लेकिन ये चेहरा बदलकर तुम्हात क्या करने का इरादा हैं...?"

"अभी पता चल जाएगा।"

"मुझे बताओगे नहीं..

"बताऊंगा...सिर्फ थोड़ा-सा इंतजार कर लो।

डॉली खामोश हो गई।

राज ने कार की रफ्तार थोड़ी सी बढ़ा दी। शीघ्र ही उसने पुलिस स्टेशन के निकट एक कोने में अपनी कार पार्क कर दी।

"तुम पुलिस स्टेशन के अंदर जाओ...।" वह कार से बाहर निकलता हुआ बोला।

"और तुम...?" अपनी साइड का दरवाजा खोलकर बाहर आती डॉली ने उससे पूछा।

"मैं अभी आता हूं।" "वहां जाकर मैंने क्या करना होगा?"

"रिपोर्ट लिखाने की कोशिश।" इतना कहकर राज ने मोबाइल हिप पॉकेट में लगाया और फिर डॉली की ओर देखे बिना एक ओर को आगे बढ़ गया।

डॉली उसकी मंशा समझ नहीं पा रही थी।

वह तब तक अपनी जगह खड़ी उसे जाता देखती रही जब तक कि वह मोड़ पर पहुंचकर लुप्त न हो गया।

फिर डॉली ने अपने कदम पुलिस स्टेशन की ओर बढ़ा दिए।

___ वह वहां से पहले ही निराश वापस लौट चुकी थी, इस वजह से उसके अंदर किसी भी तरह का जोश नहीं था। वह थके-थके कदमों से पुलिस स्टेशन के अंदर दाखिल हुई। हालांकि वहां जाने को उक्का मन नहीं कर रहा था लेकिन राज की बात मानना उसके लिए जरूरी हो गया था। वह एक बार फिर वहीं पहुंची जहां उसे अपनी रिपोर्ट दर्ज करवानी थी।

रिपोर्ट दर्ज करने वाले पुलिसिए ने उसे शकित दृष्टि से सिर से पांव तक निहारा। उसने कुछ कहा नहीं।

वह धीरे-धीरे चलती हुई उस सिपाही के पास तक पहुंच गई जो उसके भाई सतीश मेहरा के मुंह लगा हुआ था। उसका नाम मोहन था। मोहन प्रजापति।

डॉली को अपनी ओर बढ़ती देख वह नजरें चुराकर साइड वाले कॉरीडोर में इस तरह से निकल गया मानो उसकी डॉली से कोई वाकफियत ही न हो।

डॉली उसके पीछे-पीछे कॉरीडोर में निकल आयी।

"मोहन भैया...मोहन भैया..!" उसने लम्बे-लम्बे डग भरते हुए मोहन प्रजापति को आवाज लगाई।

मजबूरन मोहन को उसके लिए रुकना पड़ा
 
वह हथेली में तम्बाकू रगड़ रहा था। चेहरे पर जबरदस्ती वाली मुस्कान लाता हुआ उसकी और मुड़ा-"ह-हें-हे...तुम कब आई डॉली?"

"अभी-अभी मोहन मैया...।" प्रत्यक्षत: वह बोली जबकि मन ही मन कह रही थी-'बड़े ही कुत्ते किस्म के आदमी हो...देखकर भी अनदेखा करके इसलिए भाग रहे थे ताकि शर्मिन्दगी न उठानी पड़ जाए।'

"ओह...अच्छा डॉली, तुम यहीं ठहरो मैं अभी आता हूं।"

"नहीं-नहीं...मैं तुम्हारा ज्यादा वक्त नहीं लूंगी, सिर्फ एक सवाल पूछना चाहती हूं...बहुत छोटा-सा सवाल...।"

"जल्दी पूछो।"

"मुझे पहचानते तो हो न?"

"हां...पहचानता हूं।" एकाएक ही मोहन प्रजापति का चेहरा सख्त हो उठा, आखों के भाव विषाक्त हो उठे।"

"धन्यवाद...अब तुम अपने जरूरी काम से जा सकते हो।" डॉली ने भी एकाएक ही तेवर बदलते हुए कहा।

मोहन प्रजापति ने उसे घूरकर देखा।

"आदमी की जात बदलते देर नहीं लगती...ये तुम ही हो, कल तक जिसकी जुबान मेरे भैया को साहब-साहब कहते थकती नहीं थी...मेरे भैया के पीछे तुम दुम हिलाते फिरते थे और आज तोते की तरह आंखें फेर ली। मुझसे नजरें छिपाकर इसलिए भाग रहे हो क्योंकि कहीं मैं तुमसे किसी ऐसे काम के लिए न कह दूं जिसे करने को तुम तैयार न हो।"

वह अपलक डॉली को निहारता रहा।

"जाओ-जाओ...मैं तुम्हारे जैसे कमजर्फ इंसान से किसी तरह की मदद मागूंगी भी नहीं लेकिन इतना जरूर कहूंगी...हालात कभी एक जैसे नहीं रहते। कभी भी मेरे भाई की वापसी हो सकती है...कभी-भी...और जिसका कोई नहीं होता उसका खुदा होता है।"

इसके बाद डॉली उसे हिकारत भरी नजरों से देखती हुई वापस घूम पड़ी। क्रोधपूर्ण उत्तेजना में उसके कदम तेजी से उठ रहे थे। एकबारगी तो उसने उस काउंटर से भी गुजर जाना चाहा जहां रिपोर्ट दर्ज की जाती थी किन्तु राज की बात याद आते ही वह ठिठककर रुक गई

उस वक्त वहां एक नेताजी अपने तीन-चार चमचों के साथ कोई रिपोर्ट दर्ज करवा रहे थे। रुकने पर उसे मालूम हुआ कि नेताजी के कुत्ते की टांग किसी ने लाठी मारकर तोड़ दी थी। नतीजतन कुत्ते पर हमला करने वाले कि विरुद्ध नामजद रिपोर्ट लिखाई जा रही थी। साथ ही हल्का इंस्पेक्टर को तुरन्त कार्यवाही किए जाने के लिए निर्देश दिए जा रहे थे।

डॉली वहीं, ठीक काउंटर के सामने जा खड़ी हुई। नेताजी की रवानगी के बाद उसने बाकायदा ताली बजाकर रिपोर्ट दर्ज करने वाले पुलिसकर्मी को घूरकर देखा।

वह घबरा गया।

"खूब...बहुत खूब...। इसे कहते हैं अंधेर नगरी चौपट राजा...! वाकई...अंधेर नगरी है ये...एक पुलिस इंस्पेक्टर लापता है उसकी रिपोर्ट लिखने में एतराज है और एक नेताजी के कुत्ते की टांग टूट गई...उसकी न सिर्फ रिपोर्ट लिख ली गई बल्कि उस पर पलिस फोर्स फौरन से पेश्तर एक्शन में आ चुका है...।" डॉली ने चुभने वाले स्वर में कहा।

"ज...ज...जाओ-जाओ बकवास मत करो।" पुलिसिए ने उसे कमजोर-सी आवाज में डांटते हुए कहा।

"बकवास करने नहीं आयी यहां।"

"तो...?"

"रिपोर्ट लिखाने आयी हूं और आज मैं यहां से रिपोर्ट लिखवाकर ही जाऊंगी...।"

.

.

.

"ऐ...दंगा करने आयी है क्या?"

"दंगा करना पड़ा तो उससे भी पीछे नही हटूंगी। जब एक कुत्ते की रिपोर्ट तुम लिख सकते हो तो फिर मेरी रिपोर्ट भी तुमको लिखनी पड़ेगी।"

"अच्छा...तुमने नेताजी को कुत्ता कहा...?"

"गलत इल्जाम मत लगाओ...मैंने कुत्ते को कुत्ता कहा है जिसकी कि टांग लाठी से टूट गई है। उसे तुम शब्दों में फेर से बदल कर कैसा भी कुछ कहते रहो, मेरे ऊपर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं। मैं फिर कहूंगी कि अगर एक कुत्ते की रिपोर्ट लिखकर उसे लाठी मारने वाले के खिलाफ पुलिस अपनी कार्यवाही कर सकती है तो फिर मेरे भाई को तलाश क्यों नहीं कर सकती।"
 
मिस डॉली मेहरा! तुम यहां से चली जाओ...इसी में तुम्हारी भलाई है।"

"नहीं जाऊंगी..."

"नहीं जाओगी तो तुम्हें उठाकर बाहर फिकवा दिया जाएगा।"

“कानून की मुहाफिज पुलिस खुद ही कानून तोड़ेगी...?" इस बार एक नया स्वर उभरा।

रिपोर्ट लिखने वाले ने चौंककर अपने दायीं ओर देखा।

राज अपना चश्मा ठीक करता हुआ आगे बढ़ रहा था।

उसी समय पुलिस स्टेशन इंचार्ज चार-पांच पुलिसियों के साथ वहां आ पहुंचा-"ऐ लड़की...।" वह पुलिसिया हेकड़ के साथ बोला-"इधर शोर मचाने का काम बंद कर...जब तुझे एक बार बोल दिया कि यहां फर्जी रिपोर्ट दर्ज नहीं की जाती तो समझो कि नहीं की जाती। दफा हो ओ यहां से वरना तेरा बहुत कुछ बिगाड़ दिया जाएगा।"

___ "ये तो कोई उचित ढंग न हुआ किसी लड़की से बात करने का।" राज ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा। जिस लाइटर से उसने सिगरेट सुलगाया था वो कदरन ज्यादा बड़ा था और उसमें रिमोट जैसे बटन भी नजर आ रहे थे।

इंचार्ज ने घूरकर उसे देखा। ___ "अबे...ओ...!" वह निहायत ही बदतमीजी के साथ मुंह बिगाड़कर बोला-"तू कौन होता है बीच में बोलने वाला...इस लड़की का सगेवाला...?"

"सभ्य शहरी के पास उसके मौलिक अधिकार तो होते ही हैं न...इंसाफ की बात वो बोल तो सकता ही है न।"

"सभ्य शहरी...।" इंचार्ज तेजी से राज की ओर झपटता हुआ बोला-"अभी बताता हूं तेरी सभ्यता को और तेरे मौलिक अधिकारों को...।"

राज झुकाई देकर उसके आक्रमण से साफ बच गया।

"पकड़ लो...।" इंचार्ज अपनी ही झोंक में टेबल से टकरने के बाद चिल्लाकर बोला।

साथ वाले सिपाही राज को घेरते हुए आगे की ओर बढ़ने लगे। इंचार्ज की हालत देखने के उपरांत उन्होंने समझ लिया था कि विपक्षी कोई टेढ़ी खीर है।

"पकड़ लो...।" इस बार इंचार्ज भद्दी-सी गाली देता हुआ क्रूरतापूर्ण स्वर में चिल्लाया।

'खबरदार...।" राज ने एकाएक ही हिप पॉकेट से माउजर निकालकर सिपाहियों की ओर तानते हुए कहा-"अगर जिन्दा रहना चाहते हो तो मेरी तरफ बढ़ने की कोशिश मत करना क्योंकि ऐसा करना तुम्हारी सेहत के लिए अच्छा न होगा।"

"हथियार हमारे हवाले कर दे वरना तेरा पोस्टमार्टम कर देंगे और लाश लावारिसी में जलाकर फूंके डालेंगे।"

राज ने कहकहा लगाया-"तुम मेरा क्या करोगे वो तो बाद की रात हैं-फिलहाल तो सभ्य शहरी और मौलिक अधिकारी वाला मसला है। इस लड़की की रिपोर्ट लिखी जानी है...लिखते हो या चलाऊं गोली...।"

"गोली मत चला देना वरना...।" इंचार्ज दांत पीसता हुआ कठोर स्वर में गुर्राकर बोला।

"वरना...।"

"वरना तेरे पास पछताने के लिए भी वक्त नहीं रह जाएगा।"

"और अगर गोली चला दी तो...।" राज ने इस बार जिस कठोरता से इंचार्ज को निहारा उससे इंचार्ज अनायास ही सहम गया।

___"ये पुलिस स्टेशन है और तू पुलिस स्टेशन में गोली चलाने का दुस्साहस नहीं कर सकता। बड़े-बड़े मुजरिमों की रूह कांपती है यहां आकर...फिर तू तो चीज ही क्या है।"

राज ने माउजर की बैरल इंचार्ज की टांगों की ओर घुमाते हुए ट्रेगर दबा दिया। गोली के धमाके के साथ ही इंचार्ज कमरे के फर्श पर ढेर हो गया। उसकी चीखें, कराहें वहां गूंजने लगीं।
 
जब तक सिपाही कुछ करने का सोचते तब तक राज माउजर उनकी तरफ घुमा चुका था "खबर-दार...कोई चालाकी दिखाने की कोशिश मत करना...मैं...तुम्हारे इंचार्ज को अपने दुस्साहस का परिचय देना नहीं चाहता था लेकिन तुम्हारे इंचार्ज ने मुझे मजबूर कर दिया और सुनो...अब रिपोर्ट लिखे जाने में किसी प्रकार की देरी नहीं होनी चाहिए...वरना..."

"कुछ और भी कर सकते हो...।" एक सिपाही ने हिम्मत जुटाते हुए पूछा।

राज ने रिमोट का बटन दबाया। बाहर कानों के पर्दे हिला देने वाला विस्फोट हुआ। यूं लगा जैसे समूची बिल्डिंग उनके सिरों पर आ गिरेगी। हाहाकर मच गया।

"खबरदार...।"

राज पुन: सिपाहियों को वार्निग देता हुआ चिल्लाकर बोला-"अगर तुम लोगों ने किसी प्रकार कोई गलत हरकत की तो नामो-निशान मिटा डालूंगा उस पड़ी राज की आखें कहर बरपा रही थीं। उसके सामने बोलने का दुस्साहस कोई न कर सका।

"इंचार्ज...।" वह तीखे स्वर में बोला-"फौरन से पेश्तर इस लड़की की रिपोर्ट लिख ले वरना तुझे और तेरे इस पुलिस स्टेशन को नेस्तनाबूद कर डालूंगा..."

इंचार्ज उससे खौफ खाया दिखाई दे रहा था। वह घायल टांग को घसीटता हुआ आगे बढ़ा। उसने जल्दी से एफ. आई. आर. रजिस्टर अपनी ओर घसीटा और उसने डॉली द्वारा लिखाई जाने वाली एफ. आई. आर. दर्ज करनी शुरू कर दी।

"मौलिक अधिकार को समझ इंचार्ज और इसे याद रख...कभी-कभी कोई सभ्य शहरी इस किस्म की हरकत भी करने से गुरेज नहीं करता।"

इंचार्ज बोला कुछ नहीं। उसके हाथ-पांव कांप रहे थे। वह चुपचाप अपना काम करता रहा।

एफ.आई.आर.की जब एक कापी डॉली को मिल गई तब राज ने उसे बाहर निकल जाने का संकेत किया।

वह फुर्ती से बाहर निकल गई।

राज माउजर संभाले, सबको कवर करता हुआ उसके पीछे बाहर निकल आया-"बाहर आते ही उसने एक बार फिर रिमोट का बटन दबाया।

एक और भयानक विस्फोट हुआ।

उस विस्फोट के साथ ही समूचा पुलिस स्टेशन धूल-धुएं के बवण्डर में खो गया।

वह तेजी से बाहर आया।

जहां उसने अपनी कार छोड़ी हुई थी, कार वहीं मौजूद थी और डॉली उसके अंदर मौजूद थी। उसने जल्दी से एस्टीम स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी। एस्टीम तोप से छूटे गोले की तरह निकल भागी। शीघ्र ही उसकी कार घटना क्षेत्र से बाहर आ चुकी थी। थोड़ी देर सन्नाटा रहा। राज ने कनखियों से अपने बराबर में बैठी डॉली की ओर देखा। उसके हाथों में एफ. आई. आर. की कापी थी और दोनों हाथ धीरे-धीरे कांप रहे थे।

"मैंने कहा था न कि रिपोर्ट दर्ज हो जाएगी...।" वह सामान्य स्वर में बोला।

डॉली खामोश रही।

"डॉली...।" उसने डॉली मेहरा की ओर देखा।

तब डॉली ने पहली बार उसकी ओर देखा। उसकी दृष्टि कांप रही थीं।

"डर रही हो...।" राज ने पूछा।

"नहीं।"

"तुम्हारा चेहरा बता रहा है।"

"नहीं...तुम गलत समझ रहे हो।"

"सही समझ रहा हूं...लेकिन तुम्हें इस बात की जानकारी करा दूं कि वो पुलिसिए इसके अलावा दूसरी कोई भाषा नहीं समझते।"

__ "तुम्हारी भाषा...इतनी खतरनाक होगी, ये मैं नहीं जानती थी।"

"ये खतरनाक है तो वो क्या है जिसके तहत सतीश मेहरा लापता है और उसकी कोई खोज खबर नहीं है।"

"तुम्हारी बात अपनी जगह सही है लेकिन ये बहुत बड़ा कांड हो सकता है। पुलिस के साथ इस किस्म की तकरार उचित नहीं।"

"तुम व्यर्थ ही परेशान हो।-पुलिस तुम्हें क्यों परेशान करेगी।"

"इस कांड को वो मेरे साथ जोड़ देगी।"

"सवाल ही नहीं उठता।"

"तुम पुलिस को नहीं जानते...वो बाल की खाल निकालती है।"

"निकालने दो।"

"वह मुझसे तुम्हारे बारे में पूछेगी।"
 
राज मुस्कराया। बोला-"पूछे तो कह देना कि तुम उस सभ्य शहरी से वाकिफ नहीं हो। पुलिस स्टेशन में वह कहां से आ गया और कैसे पुलिस के साथ मुंहजोरी कर बैठा...तुम्हें नहीं मालूम।"

"मैं कह दूंगी और पुलिस मेरी बात मान लेगी ...है न?"

"क्यों नहीं मानेगी?"

"लगता है तुम्हें पुलिस की खबर नहीं। पुलिस के सामने बड़े-बड़े मुजरिम मुंह खोल देते हैं।"

"तुम्हारा मतलब पुलिस तुम्हें टार्चर करने की कोशिश करेगी?"

"बिल्कुल करेगी।"

"तो फिर डरी नहीं...टार्चर होने से पहले ही तुम मेरे बारे में पुलिस को बता देना।"

"क्या बता दूं ?"

\

"वही...जो तुम जानती हो।"

"लेकिन मैं तो तुम्हारे नाम के अलावा कुछ नहीं जानती।"

"तो फिर परेशान होने की क्या जरूरत है। जो भी जानती हो बेहिचक बता देना। ये मत सोचना कि मैं कुल सोचूंगा।"

___"ये भी बता दूं कि तुम मेरे साथ ही रहते हो?"

"हां...बता देना।"

"और पुलिस ने तुम्हें पकड़ लिया तो...?"

"वो बाद की कहानी है। बाद में ही देखी जाएगी।"

"अभी हम कहां जा रहे है?"

"किसी नए ठिकाने की तलाश में।"

"यानी अब हम अपने फ्लैट नहीं जाएंगे?"

"ऐसा तो नहीं कहा मैने...तुम्हारे फ्लैट में तुम्हें पहुंचाना बहुत जरूरी है।"

"क्यों?"

"क्योंकि मुझे अभी-भी उम्मीद है अगर सतीश का कोई मैसेज आएगा तो वहां ही आ सकता है।"

"यानी तुम मुझे मानखुर्द ड्राप करने वाले हो?"

"नहीं...उससे भी बहुत पहले...वो सामने वाले टैक्सी स्टैंड पर और ये रहा इस मोबाइल का नम्बर जो कि मेरे पास है।" राज ने छोटा-सा कार्ड डॉली के हाथ में रखते हुए कहा-"इसे संभालकर रखना...जब भी जरूरत हो मुझे फोन कर सकती हो।"

शीघ्र ही टैक्सी स्टैंड आ गया। राज ने एस्टीम रोक दी। डॉली अपनी साइड का दरवाजा खोलकर नीचे उतर गई।

राज पहुंचा अपने चैम्बूर वाले ठिकाने पर।

मोबाइल उसकी बैल्ट के हुक में फंसा हुआ था। अंदर कदम रखते ही सिग्नल मिला। उसने फौरन मोबाइल का बटन दबाकर वार्ता आरंभ कर दी।

"कौन...?" वह सावधानी के साथ बोला।

"पुलिस का मुखबिर मिलेला है बाप...लाऊं क्या?" दूसरी ओर से जय की आवाज सुनाई पड़ी।

"बात हुई तेरी?"

"बरोबर।"

"कहना मानेगा तेरा या फिर हमें ही डबलक्रास करके हमारी खबर उल्टी पुलिस को पहुंचाकर हमारा ही बड़ा गर्क कर डालेगा?"

"मानेगा...अपुन का बात मानेगा। नेई मानेगा तो अपुन कम हठेला नेई है, खोपड़ी खोल डालेगा साले की।"

"फिर ठीक है।"

"तो ले जाऊं उसे?"

"कहां?"

.

.

"जिधर तू बोलता बाप उधरिच....।"
 
"तो सुन...तू लोखनवाला रोड वरली सी फेस पहुंच...होटल हिल टॉप...."

"बरोबर।"

"मैं उधर ही पहुंचता हूं।" राज ने सम्पर्क विच्छेद किया और फिर वह उल्टे पांव वापस लौट चला।

एक बार फिर उसकी एस्टीम सड़कों को रौंदती हुई तेजी से आगे बढ़ रही थी। चैम्बूर से वरली तक का लम्बा रास्ता पार करना था उसे। उसने किसी तरह जितनी जल्दी हो सकता था वो रास्ता तय किया और लोखनवाला रोड होटल हिल टॉप जा पहुंचा।

जय वहां पहले से मौजूद था।

राज को मेकअप में होने के बावजूद उसने उसे पहचान लिया। उसकी वजह ये थी कि वह राज के उस मेकअप से पूर्व परिचित था।

"इधर से आएला बाप...।" राज उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।

होटल के तीसरे माले के एक कमरे में वह राज को लेकर पहुंचा।

कमरे के अंदर वो धूर्त चेहरे वाला व्यक्ति मौजूद था जिसकी आखें कंजी थीं और भौंहें लगभग ना के बराबर थीं। चालीस-ब्यालीस के पट में पहुंचे उस व्यक्ति के सिर पर बीच वाले भाग में एक भी बाल नहीं था, हां किनारे-किनारे बालों की थोड़ी सी खेती जरूर थी। उसने हल्के पीले रंग का कुर्ता-पायजामा पहना हुआ था और वह बड़ी तेजी से पान चबा रहा था।

"ये पाल है बाप...वहीच...काम का आदमी...अपुन का बिडूं।" जय उसका परिचय देता हुआ बोला।

परिचय के साथ ही पाल ने बटुए से एक पान और निकालकर मुंह में डाला और उंगलियां सिर के बालों से पोंछ लीं। उसका हर काम विशेष स्टाइल में हो रहा था।"

"मेरा एक बहुत जरूरी काम है...करोगे?" राज ने उसे सिगरेट ऑफर करते हुए सपाट स्वर में पूछा।

"करेगा...जय सेठ के वास्ते कुछ भी करेंगा...जान हाजिर है पाल की।" पाल सिगरेट पैके ट से निकालता हुआ व्यापारिक अंदाज में बोला।

"पुलिस के खबरी हो?"

पाल ने मुट्ठी बांधकर उंगलियों के बीच दबी सिगरेट का पुराने ढूंग से कश लगाते हुए अपलक दृष्टि से राज को घूरा। मानो उसे राज के उस सवाल पर सख्त एतराज था।

"जवाब दो!" इस बार राज का स्वर कठोर हो उठा।

"जय सेठ बोला होगा न।"

"मतलब अपने मुंह से नहीं बकोगे?"

"समझदार आदमी को आम खाने से मतलब होना चाहिए न।"

"यानी बताने में एतराज है?"

"अनगिनत सवाल ऐसे हो सकते हैं जिन पर मुझे एतराज हो सकता है। आप अपने काम की बात करो न। अगर मैं आपके काम के खिलाफ बात करूंगा तो आप बेशक मुझे सजा दे सकते हैं।"

"ठीक है...सुनो...काम पुलिस के खिलाफ है।"

"होने दो।"

"तुम पुलिस के खबरी हो...पुलिस के खिलाफ किस तरह याओगे?"

"जय सेठ के आगे पुलिस का कोई खेल नहीं।"

"बाप...।" जय राज के कान के पास आकर कदरन धीमे स्वर में बोला-"फिकर नेई...ये पाल अपुन का आदमी होएला है...सब फिट कर दगा...बिन्दास बोलने का। बिन्दास पूछने का। क्या!"

राज ने गौर से उसकी ओर ताका फिर पाल की ओर मुड़ गया।

पाल सहज भाव से पान चबाने का काम कर रहा था। उसकी निगाहें बराबर राज के चेहरे पर टिकी हुएई थीं।

"इंस्पेक्टर सतीश मेहरा से वाकिफ हो?" कुछ देर उसे निरंतर घूरते रहने के बाद राज ने उससे पूछा।

"हूं...इंस्पेक्टर मेहरा से क्या अक्खी मुम्बई की पुलिस से वाकिफ हूं।"

"तो फिर मुझे उस कांड के बारे में बताओ जो इंस्पेक्टर सतीश मेहरा के साथ घटित हुआ?"

पाल के चेहरे का रंग हल्का-सा फीका पड़ गया। वो नजर जो अभी तक निर्भीक भाव से तनी हुई थी, इस तरह नीचे झुक गई मानो उसे उसके किसी बहुत बड़े जुर्म के बारे में बता दिया गया हो।

.

.

"पाल...।" थोड़ा वक्त गुजर जाने पर राज ने उसे टोकते हुए कहा-"मुझे तुम्हारी खामोशी नहीं तुम्हारा जवाब चाहिए।"

"इसके अलवा कोई भी सवाल पूछ लो...इस सवाल के लिए मुझे बख्श दो।"

"क्या उल्टा सीधा बोलेला है बिडूं...काम की बात नको बोलेगा का तो अपुन का इनसल्ट हो जाएगा।" जय पाल के सामने आता हुआ बोला।

"लेकिन जय सेठ...ये बड़े लफड़े वाला मामला है।"

"मंत्री धरम सावन्त का मामला है इसलिए मुंह खोलने से डर रहे हो...है न?" राज ने बीच में पड़े रहस्य के पर्दे को हटाते हुए कहा।
 
नाम सुनते ही पाल झटके के साथ स्टेच्यू बना का बना रह गया। उसकी आखें आश्चर्य से फैली की फैली रह गई।

"आपको...आपको मालूम है...?" उसने विस्मित स्वर में राज से पूछा।

"हो...मालूम है।"

"तो फिर मुझसे किसलिए पूछ रहे थे?"

"मुझ सिर्फ आउट लाइन मालूम है जबकि मैं उस घटना का आखों देखा हाल सुनना चाहता हूं। एक-एक बात जानना चाहता हूं।"

"एक-एक बात तो मुझे भी नहीं मालूम।"

"जितना मालूम हो उतना बता दो।"

"बता दूं जय सेठ...।" पाल जय की ओर मुड़ता हुआ परेशानी भरे स्वर में बोला "लेकिन...मेरे लिए खतरा पैदा हो जाएगा। धरम सावन्त खुद और उसका भाई रंजीत सावन्त...दोनों कितने ज्यादा खतरनाक हैं। हकीकतन दोनों ही बिग गैंगस्टर हैं...इलैक्शन तो उन्होंने अपनी गुण्डा पावर से जीता था।"

"तेरे कू डरने का नेई...क्या। नेई डरने का!" जय ने उसे समझाते हुए कहा।

"क्यों?"

"अपुन बोला न...बस...इसी वास्ते।"

"फिर भी...मुझे डर लगता है।"

"किस वास्ते डरेला है तू...किस वास्ते?"

"अगर रंजीत सावन को ये मालूम हो गया कि मैंने उसकी कोई खबर बाहर की है तो वो फौरन अपना एक जल्लाद मेरे पीछे छोड़ देगा। उस जल्लाद के पास या तो लम्बा-सा छुरा होगा या चमकती हुई तलवार और या फिर नन्ही सी गन। उसके बाद वो तब ही रंजीत के पास वापस लौटेगा जब मेरा काम तमाम कर चुका होगा। मैं रंजीत सावन्त के काम करने के ढंग से वाकिफ हूं।"

"तू अपुन के काम करने के ढंग से वाकिफ नेई क्या?"

"हूं क्यों नहीं जय सेट...लोकिन जान तो सभी को प्यारी होती है न...अपनी उसी जान को बचाना चाहता हूं। कुछ दिन इस फानी दुनिया में और जिन्दा रहना चाहता हूं।"

____ "तेरी बात रंजीत सावन्त को बताने कौन जा रहा है...।"

"फिर भी डर तो लगता ही है।"

"डरने का नेई...अपुन का बाप को सामने रंजीत सावन्त कुछ नेई है...कुछ भी नेई।"

"मापा करना जय सेठ...अब तुम्हारा बाप लायन भी नहीं है जिसकी छत्र छाया में मैं सुरक्षित रह सकू।"

जय जोश में कुछ बोलना चाहता था लेकिन राज ने आंखें दिखाई तो वह एकदम से खामोश हो गया।

___"सुन पाल...।" कुछ पल रुककर उसने पाल से कहा-"तुझे यहां इस होटल में इसी वास्ते लाएला है ताकि कोई समझ नेई सके। जान न सके। अपुन का इस मीटिंग का खबर किसी को नेई होएंगी...कानो कान नेई होएंगी। भरोसा कर अपुन के ऊपर...ये बात इस कमरे का बाहर निकलेंगा नेई के तू इधर किसी को कुछ बताया।"

"पक्का वायदा...?" पाल ने कमजोर सी आवाज में पूछा।

"एकदम पक्का।" लोखण्ड माफिक...अब तू बोल..."

उसने शकित दृष्टि से जय की ओर देखा। फिर उसकी आखें राज की ओर घूम गईं। फिर मानो वह मन ही मन कोई फैसला करने लगा...कोई गणित लगाने लगा।

___ अंत में उसने समर्पण की मुद्रा में राज से कहा-"मै सब-कुछ बताने को तैयार हूं लेकिन मेरी बात कहीं लीक नहीं होनी चाहिए।"

"भरोसा रखो पाल...तुम्हारा नाम कहीं भी नहीं आएगा।" राज ने अपनत्व भरे अंदाज में उसका कंधा थपथपाकर कहा-"अगर तुम्हारा नाम आ जाए तो मुझे तुम्हारी हर सज़ा मंजूर होगी।"

"तो सुन...।"

"जग्गू जगलर सावन्त बन्धुओं का खास मोहरा है। कुछ दिन पहले जग्गू जगलर का एक आदमी बारह वर्ष की मासूम बच्ची के साथ बलात्कार करने के केस में पकड़ा गया। पकड़ने वाला इंस्पेक्टर सतीश मेहरा ही था।"

"फिर?"

"फिर सावन्त की खबर सतीश को मिली कि जग्गू के आदमी को छोड़ दिया जाए। सतीश ने उसकी बात सुनी अनसुनी कर दी। यहां से सतीश से टेंशन शुरू हो गई। दूसरे शब्दों में इस्पेक्टर सतीश मेहरा ने सावन्त बंधुओं से पंगा ले लिया।"

"फिर...।" राज ने जिज्ञासा भरी दृष्टि से उसकी ओर देखते हुए पूछा।

"फिर इंस्पेक्टर सतीश मेहरा की बहन को अगवा करने की कोशिश की गई। कोशिश नाकामयाब रही। उस कोशिश में खुद जग्गू जगलर सम्मिलित था मगर जग गू जगलर को भी सतीश ने हवालात की हवा खिला दी। सतीश ने हवालात में जग्गू जगलर को मारा पीटा भी...जबकि रंजीत ने सतीश को धमकी दी थी कि उसके आदमी को हाथ न लगाया जाए। जग्गु जनलर को रंजीत सावन्त पुलिस स्टेशन से छुड़ाकर ले गया। सतीश को पुलिस स्टेशन में ही मारा-पीटा।"
 
"मंत्री धरम सावन्त वहां आया था क्या...?"

"नहीं।"

"तो फिर कहन मेहत पर लगाया चार्ज गलत हुआ न...।"

___ "हां...गलत हुआ लेकिन यहां गवाही मैं नहीं दूंगा। मैं सिर्फ तुम्हें रिपोर्ट दे रहा हूं और रिपोर्ट के आगे कुछ भी नहीं करूगा...न अपने बयान की पुष्टि करूंगा न कुछ कहूंगा।"

"उसे छोड़ो...आगे बताओ।"

"आगे खबर ये है कि सतीश मेहरा को अस्पताल से जबरन रिलीव कराया गया। अस्पताल के बाहर रंजीत के आदमी लगे हुए थे। सतीश मेहरा को घेरकर खत्म कर देने का पूरा प्रोग्राम था...मगर सुना है, सतीश मेहरा सिर्फ घायल होकर रह गया।"

"इस घड़ी वह कहां है?"

"ध्यान में नहीं...।"

"जानकारी करने की कोशिश करो। पार्क मैं तुम्हें सतीश का पता बताने के लिए उसकी कीमत अदा कर सकता हूं।"

"जय सेठ के लिए कीमत अदा करने की कोई जरूरत नहीं है।"

"नहीं पाल...उसे तुम कीमत न समझकर अपना इनाम मान सकते हो। अगर तुम सतीश का पता बताने के लिए कोई इंशारा भी करोगे तो मुझे खुशी होगी...और ये भी याद रखना कि तुम्हारी इस बात को कहीं से भी लीक नहीं होने दूंगा।"

पाल गहरे सोच में डूब गया।

"किसी भी प्रकार की चिन्ता मत करो...तुम्हार अहित नहीं होने दूंगा।"

"बात को समझने की कोशिश करो।"

"बात को समझ रहा हूं। न समझने की कोई बात नहीं है।"

"तो फिर बेहिचक बता दो।"

"जगह का नाम गलत है। बड़े गैंगस्टर्स से जुड़ा हुआ है। ये भी मुमकिन है कि जिस जगह के मारे में मैं बताने जा रहा हूं उस जगह सतीश मेहरा मौजूद ही न हो।"

__ "तुम जगह का नाम बताओ...उसकी मौजूदगी या गैरमौजूदगी कोई मतलब नहीं रखती।"

"मेरा नाम नहीं आना चाहिए।"

"नहीं आएगा।"

"वो एक खतरनाक सिंडीकेट का बहुत बड़ा अडडा है और वहां तक आसानी से कोई पहुंच नहीं सकता।"

"उस सिंडीकेट के बॉस का नाम...?"

"गुरुनानी।"

"गुरुनानक!" राज चौंक पड़ा।

"जानते हो उसे?"

"न...नहीं।"
 
"गलत बोल रहे हो।" पाल ने उसे अपलक निहारते हुए कहा-"तुम उसे जानते हो...अगर जानते न होते तो उसका नाम तुम्हारी जुबान पर इतनी फुर्ती से न आता।"

"ठीक है।"

"क्या ठीक है?"

"कबूल करता हूं कि मैं उसे जानता हूं।"

"गुरुनानी को?"

"हां...।"

"तो फिर ये भी जानते होगे कि वो चीज क्या

"जानता हूं।"

"तब तो तुम भी कोई पहुंची हुई हस्ती हो।" पाल ने उसे सिर से पांव तक निहारा।

"जगह का नाम?"

"लाल हवेली।"

"ये लाल हवेली है कहां।"

"बताया न कि लाल हवेली गुरुनानी का ठिकाना है। ऐसी जगह है जहां जाकर आदमी वापस नहीं लौट पाता।"

"सतीश को लाल हवेली ले जाया गया है?"

"शायद।"

"यानी कनफर्म नहीं हो?"

"खबरी लाल हूं। खबर इधर-उधर जहां कहीं से भी इकट्ठी करता हूं वो महज खबर ही होती है। उस खबर का कच्चा-पक्का होना वक्ती होता है। खबर पक्की भी हो सकती है...कच्ची भी।"

"लेकिन ये लाल हवेली है कहां?"

"मलाड क्रीक से दस किलोमीटर अन्दर समुद्र में।"

"समुद्र में...हवेली ?" राज ने हैरानगी से पाल को निहारा।

"हां...समुद्र में हवेली। मशहूर जगह है। ताज्जुब है...गुरुनानी से वाकिफ हो मगर लाल हवेली से वाकिफ नहीं हो।"

"जरूरी नहीं कि एक आदमी के पास हर सवाल का जवाब हो ही। सवाल ये उठता है कि लाल हवेली समुद्र में कैसे? आइलैंड पर हवेली किसने जाकर बना डाली?"

"कहने को वह हवेली है...हकीकतन अभेद किला है। मौत का किला...जहां से कोई भी बचकर वापस नहीं आता।"

"तुम लाल हवेली गए हो?"

"नहीं..सिर्फ सुना है।"

"किससे?"

"गुरुनानी के एक आदमी से।"

"तो ये पक्का है कि सतीश मेहरा लाल हवेली पार्सल किया जा चुका है?"

"खबरी लाल की खबर है। मैं पहले ही कह चुका हूं कि इधर-उधर से जो खबरें हासिल हो जाया करती हैं उन्हें कलैक्ट कर लेता हूं। उनके कच्चा पक्का होने की खातिर पीछे भागने में वक्त जाया नहीं किया करता। जिसे जरूरत होगी वो खुद ही उस खबर को कच्चा-पक्का करने के लिए तफ्तीश करवाएगा...मैं व्यर्थ की सिरदर्दी मोल क्यों लूं।"

.

"ओ. के. पाल...मैं समझ गया तुम क्या कहना चाहते हो...अब आखिरी सवाल।"

"पूछो।"

"सतीश मेहरा जिन्दा तो है न?"

"इस बारे में रंजीत सावन्त क अलावा तुम्हें और कोई बता नहीं सकता।" ।

"कोई और जानकारी जो सतीश मेहरा के बारे में...तुम्हारी वाकफियत में हो?"

"नहीं...."

"भविष्य में हो तो...?"

"तो जय सेठ को खबर कर दूंगा।"

"जय...।" राज जय की ओर मुड़ता हुआ बोला-"मिस्टर पाल को इनाम देकर वापस भेज दो...।"

"जो हुकम बाप।"

जय पाल को साथ लेकर वहां से चल पड़ा।

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