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लाल हवेली

"किधर कू चलने का है?" जय ने एस्टीम को स्टार्ट करके आगे बढ़ाते हुए पूछा।

"दायीं तरफ मोड़ ले।"

"पन जाना किसके पास है?"

"तू सिर्फ गाड़ी चला...।" कहने के साथ ही राज ने सिगरेट सुलगा ली।

जय अनमने भाव से कार ड्राइव करने में व्यस्त हो गया। कभी उसे दाएं चलना पड़ता तो कभी बाएं। वह राज के प्रत्येक आदेश का पालन कर रहा था।

राज की नजर रिस्टवॉच पर थी। उसने जोगलेकर को दस मिनट का टाइम दिया था लेकिन दस मिनट गुजर जाने के बाद भी उसने फोन नहीं किया था। ठीक पन्द्रह मिनट बाद वह मोबाइल को बैल्ट के हुक से निकालकर नम्बर मिलाने लगा।

"जोगलेकर..?" सम्पर्क स्थापित होते ही वह बोला।

"हां...बोल रहा।" दूसरी ओर से जोगलेकर की आवाज उभरी।

"तैयार है?"

"तैयार तो हूं लेकिन मेरे पास कोई रकम नहीं है...।"

"बाहर निकलकर गाड़ी में बैठ...एक बार फिर वार्निंग...कोई होशियारी मत दिखाना वरना...!"

____ "नहीं...मैं कोई होशियारी नहीं दिखा रहा हूं।

"फिर तेरी कार वरली की तरफ मुड़ जानी चाहिए।"

"ठीक है।"

"सीधा चलते रहना।"

"जो हुक्म।"

वरली पहुंचने के बाद राज ने उसे और आगे चलने को कहा फिर दूसरी सड़क पर। उसके बाद इधर-उधर चक्कर लगवाकर अंत में उसने बरसोवा बीच के वीरान सागर तट पर पहुंचा दिया जहां का वह पहले ही निरीक्षण कर चुका था। आगे-पीछे दूर-दूर तक जब उसने देख लिया कि जोगलेकर के साथ कोई नहीं है तब जाकर वह उसके सामने पहुंचा। उसने अपना तमाम मेकअप हटा दिया ना। उस घड़ी वह अपने असली रूप में था। अपने असली रूप में वह बहुत कम रहता था और वह जानता था कि उसे असली रूप में हर कोई पहचान नहीं सकता।

जोगलेकर के सम्मुख पहुंचकर उसने अपनी पैनी निगाहें उसके चेहरे पर टिका दीं। वह समझ रहा था, जोगलेकर उसे पहचानने की कोशिश में लगा हुआ है।

"रिवाल्वर है तेरी जेब में..?" राज गुर्राकर बोला।

उसके मुंह से आवाज न निकली।

"खामोशी का मतलब है...चल...दोनों हाथ ऊपर उठाकर आगे बढ़।"

उसने आदेश का पालन किया और दोनों हाथ उठाए हुए राज के सम्मुख आ खड़ा हुआ।

"घूम जा।"

वह घूम गया।

राज ने उसकी तलाशी लेकर अन्दरली जेब से रिवाल्वर और एक लम्बा-सा चाकू बरामद कर लिया। दोनों हथियार अपने कब्जे में करने के बाद वह एक बड़े से पत्थर पर जा बैठा। नीचे समुद्र की लहरें आ-आकर टकरा रही थी। जय को उसने कार समेत थोड़ी दूरी पर छिपाया हुआ था। वह ऐसी जगह पर था जहां से उसे सड़क की दिशा से आने वाला खतरा दूर से ही नजर आ सकता था और वक्त रहते वह राज को सिग्नल देकर खबरदार कर सकता था।

राज ने सिगरेट का पैकेट निकालकर उसे जोगलेकर की ओर बढ़ाया-"सिगरेट...?"

जोगलेकर ने अनमने भाव से एक सिगरेट निकाल ली।

लाइटर से राज ने पहले उसकी फिर अपनी सिगरेट सुलगा ली।

वह एक ऊंचे पूरे कद का खतरनाक आखों वाला चालीस के पेटे में पहुंचा तजुर्बेकार मुजरिम था। करूरता की कहानी उसके चेहरे पर दो लम्बे घावों की शक्ल में दर्ज थी लेकिन वक्तीं तौर पर उसका कुरता से कोई वास्ता नजर नहीं आ रहा था।

"जोगलेकर...तू सोच रहा होगा कि अभी तक मैंने तुझसे फरौती की रकम क्यों नहीं मांगी...है न?" राज सिगरेट का धुआं नाक के रास्ते बाहर निकालता हुआ बोला।

__ "मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है...यकीन मानो।" जोगलेकर ने कम्पित स्वर में कहा।

"मान लिया यकीन...मुझे मालूम है कि तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है लेकिन तुम्हें तुम्हारा बेटा एक दूसरी शर्त पर ही मिल सकेगा।"

"कौन-सी शर्त।"
 
"इंस्पेक्टर सतीश मेहरा से वाकिफ हो...."

जोगलेकर चौंका। उसने गौर से राज का निरीक्षण किया।

"इस तरह देखने से कोई हल निकलने वाला नहीं। मुझे सवाल का जवाब दे....इंस्पेक्टर सतीश मेहरा से वाकिफ है या नहीं...।"

.

.

.

"तुम्हारा इंस्पेक्टर सतीश से क्या लेना-देना।"

"ऐई...।" राज के स्वर में कठोरता का समावेश हो गया-"मैंने तेरा लड़का किडनेप किया है या तूने मेरा...।"

"तुमने...।" "मैंने...न..."

"हां।"

"फिर सवाल करने या कुछ पूछने का हक मेरा बनता है या तेरा...बोल-बोल...।"

"तुम्हारा...।" कहने के साथ ही जोगलेकर ने अपनी गर्दन नीचे झुका ली।

"तो फिर बीच में ऐसी वैसी कोई भी बात मत बोल जिससे कि ऐसा लगे कि किडनेपर मैं नहीं तू है...समझ।"

"समझ गया।"

"अब बोल।"

"क्या बोलू...।"

"इंस्पेक्टर सतीश मेहरा को जानता है न...।" राज ने एक-एक शब्द चबाते हुए उससे सवाल किया।

"हां...।" मुश्किल से थूक गटकते हुए उसने सक्षिप्त-सा जवाब दिया।

"रंजीत सावन्त ने उसे उठा लिया है...राहट...आई मीन उठवा लिया है।"

वह खामोश रहा।

"ऐ...।" राज गुर्राया-"मुंह पर ताला मत डाल...तेरे देबू के वास्ते अच्छा नहीं होगा। एकदम अच्छा नहीं होगा। मुश्किल में पड़ जाएगा! समझा..."

.

___ "नहीं...।" जोगलेकर देबू के नाम पर एकाएक ही तड़पकर बोला-"उसे कुछ न करना...प्लीज मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूं...उसे कुछ न करना। उसकी तमाम पीड़ा सहने को मैं तैयार हूं। वह अभी किसी पीड़ा को सहन करने योग्य नहीं है। बहुत कमजोर है।"

"बस उसी का ध्यान रखकर अपना मुंह बंद न रखने की कोशिश में लगे रहना। जो भी जवाब हो ,जैसा भी जवाब हो तुम्हारे पास उसे फौरन बता देना। तुम्हारी खामोशी तुम पर नहीं...उसके ऊपर भारी पडेगी।"

"नहीं, अब में खामोश नहीं रहूंगा।"

__"तो बता सतीश मेहरा को रंजीत सावन्त ने ही उठवाया है न।"

"हां।"

"कहां रखा है उसे?"

"इंस्पेक्टर सतीश मेहरा को उठाया तो मैने ही था लेकिन मुझे ये नहीं मालूम कि उसे रखा कहां गया है।"

"आई सी...तो तुझे नहीं मालूम कि उसे रखा कहां गया है।"

___ "मैं सच कह रहा हूं। देबू की खातिर मैं झूठ नहीं बोलूंगा। मुझे मालूम है कि सारी विपदा मेरे बेटे पर आएगी इसीलिए झूठ का तो सवाल ही नहीं उठता।"

राज ने अपनी निगाहों से उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश की मगर वह उसमें झूठ का हिस्सा तलाश न कर सका।

"तो तुझे सचमुच नहीं मालूम कि सतीश को कहां रखा गया है...।"
 
"हां...सचमुच नहीं मालूम।"

"उसके खिलाफ कार्यवाही रंजीत सावन्त कर रहा है न...।"

"हां...रंजीत सावन्त भी और उसका भाई धरम सावन्त भी..."

"सतीश को गायब कर देने के पीछे उन दोनों की मंशा क्या है?"

__ "हकीकत ये है कि रंजीत साहब इंस्पेवटर सतीश मेहरा से नाराज हो गए थे। उनके कहने पर इंस्पेक्टर मेहरा ने उनके एक आदमी को छोडा नहीं था। उसके बाद जग्गू जगलरी वाला केस बन गया और इंस्पेक्टर मेहरा पर सावन्त बन्धुओं का क्रोध एकाएक ही भड़क उठा। बस...उसके फौरन बाद सतीश मेहरा के खिलाफ उन लोगों ने जेहाद छेद दिया और अब स्थिति ये है कि प्रशासन भी सतीश मेहरा के खिलाफ है। तमाम कार्यवाही अमल में लाई जा चुकी है। सिर्फ एफ. आई. आर. दर्ज ही जाने से थोड़ा सा मामला सतीश मेहरा के पक्ष में चला गया है।"

"उसे कहां रखा गया है...इसका कोई अनुमान भी तुम्हें नहीं है।"

"नहीं...।"

.

"सच कह रहे हो न।"

"ऐसी सिचुएशन में हूं ही नहीं कि तुम्हारे सामने झूठ बोल सकू..।"

"अपना अनुमान मैं बताऊं तुम्हें...।" राज ने उसकी ओर देखते हुए तीखे स्वर में पूछा।

"बताओ...।"

"लाल हवेली।" कहने के साथ ही उसने अपनी नजर जोगलेकर के चेहरे पर गड़ा दी। वह करीब से उसके चेहरे को देखने की कोशिश करने लगा ताकि उसे समझ सके।

जोगलेकर न चौंका और ना ही उसने अपने चेहरे पर किसी प्रकार के भाव आने दिए। वह निरन्तर राज की आखों में झांकता रहा।

जोगलेकर बोला-"लाल हवेली का मैंने नाम जरूर सुना है लेकिन मैं लाल हवेली के बारे में कुछ जानता नहीं हूं।"

“रंजीत सावन्त का खास आदमी कहा जाता है तुझे?

"हा।"

"फिर भी तू लाल हवेली से नावाकिफ है ?"

"लाल हवेली से रंजीत सावन्त का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। मैं फिर बता रहा हूं...लाल हवेली न सावन्त बन्धुओं की मिल्कियत में है और ना ही उससे उनका कोई सरोकार है। यूं जो काम्मीडे शियल मैटर होते हैं वे उन दोनों भाइयों के बीच में ही रह जाते हैं। मैं खास आदमी जरूर हूं लेकिन जो जरूरी काम का जरूरी हिस्सा मुझसे करवाया जाना होता है उसे करवाने के बाद मुझे पीछे हटा दिया जाता है। सस्पैंस से म वाकिफ नहीं हो पाता...और सच कहा जाए सो मुझे उस सस्पैंस को जानने की कोई जरूरत नहीं भी नहीं।"

"गुरुनानी से रंजीत सावन्त का क्या सम्बन्ध है?"

"तुम गुरुनानी को भी जानते हो?"

"गुरुनानी मेरा पुराना दुश्मन है।"

"मुम्बई अण्डरवर्ल्ड का डॉन...तुम्हारा दुश्मन...?" जोगलेकर ने आश्चर्य से उसकी ओर देखते हुए कहा। हैरत से राज की ओर निहारते हुए उसके माथे पर बल पड़ गए थे।

"हां...मुम्बई अगडरवर्ल्ड किंग मेरा दुश्मन।"

"तुम हो कौन?"

"वो भी पता चल जाएगा। फिलहाल तुम वापस लौट जाओ...जो मोबाइल तुम्हारे पास है उसे अपने साथ रखना और अब से तुम्हारा काम होगा सतीश मेहरा के बारे में अधिक से अधिक जानकारी हासिल करना। क्या सतीश मेहरा लाल हवेली में है...अगर है तो उसके वहां से निकलने का उपाय।"

"ऐ भाई...! जोगलेकर ने अपने हाथ के पर्स की चेन खोलते हुए दयनीय स्वर में कहा-"ये तीस हजार मैं अपनी तरफ से जोड़-तोड़कर करके ले आया हूं। हालांकि तुमने फिरौती की रकम मांगी नहीं...और ये फिरौती की रकम है भी नहीं लेकिन इसे इस गरीब की हैंकीर-सी भेंट समझकर स्वीकार कर लो।" उसने सौ-सौ की तीन गडिडयां पर्स से निकालकर राज की ओर बढ़ा दीं।

"इन्हें वापस रख ले...।" राज सिगरेट फूंकता हुआ बोला-"मैंने जिस काम के लिए तेरे बेटे को किडनेप किया है...मुझे सिर्फ वही काम करवाना है। अगर फिरौती की रकम हासिल करने को उसे उठाया होता तो तुझसे फिरौती की न सिर्फ डिमांड करता बल्कि उसे वसूल भी कर लेता लेकिन उसूल के हिसाब से काम करने की आदत है मेरी और उसूल के हिसाब से तुझसे सिर्फ वही काम लेना है जिससे इंस्पेक्टर सतीश मेहरा की बाबत जानकारी हासिल हो सके।"

"भाई...मैं और इंतजाम भी कर दूंगा...तुम्हारे लिए जासूसी का काम भी अंजाम दे दूंगा लेकिन मेरे बेटे को छोड़ दो। मुक्त कर दो उसे। वह मासूम उन तकलीफों को सहन नहीं कर पाएगा।"

"उसे तब तक कोई तकलीफ नहीं दी जाएगी जब तक तू मेरी बात मानता रहेगा...जैसे ही मेरे खिलाफ गया वैसे ही तेरा बेटा मुसीबत में फंसा।"

"नहीं...मैं तुम्हारे खिलाफ कभी नहीं जाऊंगा। विश्वास करो मेरा...बस...मेरे देबू को छोड़ दो। वह बहुत छोटा है।"

"उसे छोड़ा नहीं जा सकता।"

"प्लीज...मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूं।"
 
"तू बेकार ही वक्त बरबाद कर रहा है...कुछ भी होने वाला नहीं...तू सिर्फ एक ही काम करके अपने बेटे को हासिल कर सकता है।"

"कौन-सा काम?"

"इंस्पेक्टर सतीश मेहरा की आजादी...उसके ठिकाने का पता कर बताने का काम। मैं चाहता हूं कि इस कामन को तू जल्द से जल्द अंजाम दे दे और मैं तुझे तेरा बेटा वापस लौटा दूं।"

"मैं वही करूंगा। वही सब करूंगा, सिर्फ अपने देबू को अपने पास देखना चाहता हूं...मेरे दिल को तसल्ली मिल जाएगी। मैं ज्यादा आत्मविश्वास के साथ काम कर सकूँगा।"

"नहीं जोगलेकर, तू ज्यादा आत्मविश्वास की जगह कम आत्मविश्वास के साथ काम कर...मैं ये रिस्क उठाने को कतई तैयार नहीं है...समझा।"

"भाई मैं विनती कर रहा हूं।" जोगलेकर गिड़गिड़ाकर बोला।

"मैं तेरी विनती को सुन चुका। अब तू सावधानी के साथ वापस जा और जाकर सतीश मेहरा का पता लगा...फालतू बकवास बंद कर। खबरदार... किसी को शक नहीं होना चाहिए कि तू कहां गया था...किससे मिला था...क्यों मिला था।"

"न देबू को छोड़ रहे हो...न अपने बारे में कुछ बता रहे हो...।" जोगलेकर ने खीझ भरे स्वर में कहा।

"देबू को तू भूल जा।"

"तुम्हें याद रखू ?"

" हां।"

"तो अपने बारे में कुछ बताओ तो सही?"

हंसा राज। बोला-"इतनी आसानी से मेरे बारे में मालूम कर लेगा क्या...थोड़ी मेहनत कर...मालूम हो जाएगा। अब फूट जा इधर से और मोबाइल को सीने से लगाकर रख क्योंकि मैं तेरे से सतीश मेहरा के बारे में इंफोर्मेशन हासिल करूंगा।"

निराश भाव से उठ खड़ा हुआ जोगलेकर।

एक बार फिर उसने राज के समने हाथ जोड़े-"देबू को कोई तकलीफ न पहुंचाना...मैं तुम्हारा काम पूरी ईमानदारी से करूंगा। वह फलत की तरह कोमल है...सख्ती बरदाश्त नहीं कर पाएगा। उस पर रहम करना।"

"तू उसकी फिक्र मत कर...मैं जो कह रहा हूं उसे कर और खबरदार जो तूने गलती से भी कभी मेरा पीछा करने की कोशिश की...।"

___ "नहीं...सवाल ही नहीं उठता। ऐसा कभी नहीं करूंगा।"

"जा..."

हाथ जोड़ता हुआ जब वह जाने लगा तो राज ने उसका चाकू और रिवाल्यर उसे मापस लौटा दिए।

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जय के लिए ये निदेश थे कि किसी भी तरह देबू को खुश रखना है। हर तरह से उसे बहलाना है। हर तरह से उसे बहलाना है। जिस खिलौने को वह पसन्द करे वह खिलौना कई संख्याओं में उसके पास मौजूद होना चाहिए।

जय ने देबू को खुश करने के लिए हर तरह के इंतजाम शुरू कर दिए।

राज पहुंचा चेम्बूर। सिंधी कालोनी वाले अपने फ्लैट में।

डॉली फ्लैट में मौजूद नहीं थी। फ्लैट लॉवड था। वह अचम्भित हो उठा।

डॉली की गैरहाजिरी न उसके मन में अनगिनत शंकाओं को उत्पन्न कर दिया था। थोडी देर तक वह फ्लैट के दरवाजे पर खड़ा इंतजार करता रहा तत्पश्चात् उसने डॉली के बारे में पूछताछ आरंभ करनी चाही। सबसे पहले वह अपने फ्लैट वाली बिल्डिंग से बाहर निकला। करीब की एक कोने में सिगरेट आदि की दुकान थी जो देर रात तक खुली रहती थी।

उसने उसी दुकान से अपनी तफ्तीश शुरू करने का फैसला किया। अभी वह उस दुकान की तरफ बढ़ ही रहा था कि तभी एक स्कूटर रिक्शा वहां आकर रुकी और डॉली उससे बाहर निकली।

डॉली ने स्कूटर वाले का भाड़ा दिया फिर स्कूटर रिक्शा से ढेर सारा सामान उतार लिया। कई पैकेट और कई पॉलीथिन बैग थे। सबको एक साथ उठाकर चल पाना उसके बस की बात नहीं थी। फिर भी वह कोशिश कर रही थी। कभी इस पैकेट को उठाती तो कभी उस बैग को रखती। दूर खड़ा राज उसके उस तमाशे को देखता मुस्कराता रहा। फिर जब डॉली बहुत अधिक परेशान हो गई तब वह सामने आया।

"ये...ये सामान ले चलो।" उसे देखते ही डॉली कमजोर-सी आवाज में बोली।

"तुम खरीददारी करने गई थीं?" सामान उठाते राज ने हैरानी भरे स्वर में पूछा।

"हां...मुझे लगा, वहां जरूरत का ढेर सारा सामान चाहिए था।"

"सब खरीद लायीं?"

"नहीं।"

"तो फिर?"

"आधे से भी कम। अभी तो ढेर सारा सामान बाकी है।"

___"मगर तूफाने-हमदम, अकेले जाने की गलती तुम्हें नहीं करनी चाहिए थी।" भारी सामान उठाकर उसके साथ चलता हुआ राज बोला।

"क्यों ?"

"क्योंकि दुश्मनी बढ़ चुकी है। यूं भी सतीश मेहत की बहन को सावन्त के आदमी दूर से ही पहचान सकते हैं। अगर कोई तुम्हें देख लेता तो तुम्हारे अपहरण में देर नहीं लगती।"

"ओह...सॉरी...इस बारे में तो मैं सचमुच भूल ही गई थी।"



..
 
"जानती हो, तुम्हें फ्लैट में न देखकर मेरी क्या हालत हुई थी?"

"क्या?" डॉली फ्लैट का दरवाजा खोलती हुई मुस्कराई।

"मुझे लगा मैंने तुम्हें खो दिया है। तुम दुश्मन के हाथ लग गइ हो।"

वह बेसाख्ता हंस पड़ी।

राज ने दरवाजा अंदर सेर बंद करने के बाद तब पहली बार पलटकर उसकी अमेर देखा। हल्के पीले रंग के सलवार-सूट में वह बेहद खूबसूरत नजर आ रही थी। बड़ी अदा से उसने अपने सिर के बालों को पीछे की ओर झटका और फिर वह सामान लगाने में व्यस्त हो गई। बेहद स्वादिष्ट भोजन बनाया उसने। एक बार फिर थम्सअप में व्हिस्की मिलाकर राज ने उसे नशा करा दिया। नशे में उसकी आखों का रंग ही बदल जाता था। उसे नशा होता था तो उसके अन्तर में एक आग सी सुलग उठती थी। कल की अपेक्षा आज मंशा क छ ज्यादा ही था। क्योंकि जब राज बाथरूम से वापस लौटा और उसने बैड की ओर नजर दौड़ाई तो वह डॉली को एकदम निर्वसन स्थिति में बैड पर देख हैरत में पड़ गया।

जैसे ही नजरें मिलीं, डॉली ने अपनी मांसल गुदाज बांहें उसकी ओर बढ़ा दीं। वह सीधा उन बांहों में जा गिरा। ऐसा खुला निमंत्रण तो उसे पहली बार मिला था। उस निमंत्रण के लिए वह चूकना नहीं चाहता था।

गर्म सांसें घुलने लगीं। तपते हुए अधर समीप आकर थरथसए और फिर एकाकार हो गये। आलिंगनबद्ध होकर वे प्रगाढ़ चुम्बन में डूब गए। सांसों की रफ्तार तेज होने लगी। राज उसके ऊपर छाता चला गया। वह बदनतोड़ ढंग से राज को सहयोग करने लगी। उसके कामुक सीत्कार कमरे में उभरने लगे।

उस घड़ी राज के हाथों की उंगलियां उसके अंगों को उभारों पर रेंग रही थीं और अधरों से अधर चिपके हुए थे। वह राज में समा जाने का अनथक प्रयास कर रही थी।

इसी बीच...! मोबाइल पर सिग्नल मिला। राज ने टेबल पर रखा फोन उठा लिया।

"कौन?" अपनी कार्यवाही को रोकते हुए उसने पूछा।

__ "मैं खबरी लाल..

.पाल।" दूसरी ओर से पाल का स्वर उभरा-"आप जय सेठ के दोस्त हैं न?"

"हां...कहो पाल क्या खबर है?"

"खबर बेहद खतरनाक और इनाम इकराम वाली है।"

"बताओ पाल...जल्दी।"

"नीले रंग की एस्टीम है आपके पास जिसका नम्बर बत्तीस सैंतीस है?"

"हां...।"

'फिर सम्भलों और जहां हो उस जगह को फौरन छोड़ दो। निकल लो वहां से और खबरदार! बत्तीस सैंतीस में बैठने की गलती कतई मत करना। उसमें दुश्मन बम फिट कर चुका है। तुम्हें घेरकर भगाया जाएगा और जैसे ही तुम एस्टीम ड्राइव करोगे...आर डी. एक्स का विध्वंसक विस्फोट तुम्हें शिनाख्त के लायक भी नहीं रहने देगा। फुर्ती से निकलो...एक-एक पल कीमती हूं...भागो।"

दूसरी ओर से सम्पर्क कट गया।

"क्या हुआ?" डॉली ने उससे पूछा।

"जल्दी से कपड़े पहनो...हमें फौरन ये जगह छोड़ देनी है।" कहने के साथ ही राज फुर्ती से अपने सामान पर झपटा। अपनी तैयारी उसने खिड़की के पास खड़े होकर आरंभ की। वह खिड़की के पर्दे के पीछे से बाहर झांकता जा रही था।

चैम्बूर के उस इलाके में उसे कुछ स्याहपोश साए रहस्यपूर्ण ढंग से घूमते नजर आए। बिल्डिंग के आसपास बड़ी खामोशी से कार्यक्रम चल रहा था।

"जल्दी डॉली...जल्दी!" उसने आगे बढ़ते दो आदमी देखते ही डॉली से दबे हुए स्वर में कहा।

डॉली बहुत तेजी से कपड़े पहन रही थी।

"म...मैं तैयार हूं।" वह जल्दी से अपनी सडलों की ओर बढ़ती हुई बोली।

राज ने फुर्ती से पीठ पर अपनी किट लगाई और फ्लैट के पिछले भाग में खुलने वाली खिड़की की और बढ़ गया।

डॉली उसके पीछे थी। अचानक ही कॉलबैल बज उठी।।

राज ने खिड़की की सिटकनी सावधानी के साथ खोली।

बाहर गली के अंधेरे में झांका।

फिर डॉली को हाथ पकड़कर बाहर उतार दिया। कॉलबैल बार-बार बजने के साथ तेज दस्तक बाहर से दी जाने लगी थी।

राज ने उस ओर ध्यान दिए बिना खिड़की पार कर ली। उसके बाद वह डॉली का हाथ पकड़कर जैसे ही अंधेरी गली के दूसरे छोर की और बढ़ा, दूसरी तरफ से टार्च की रोशनी झपटी।।

उसने तुरन्त डॉली को एक साइड में दीवार के सहारे खींच लिया।

स्वचालित गन से गोलियों की बौछार छोड़ी गई थी। अगर राज ने फुर्ती न दिखाई होती या टार्च पहले न जली होती तो अंधेरे में ही गोलियों ने उन दोनों का काम तमाम कर डाला होता।

दीवार से चिपके राज ने माउजर निकालकर एक ही बार में पूरी मैगजीन गली के मुहाने की तरफ झोंक दी।

पलक झपकते नई मैगजीन फिट करके माउजर को पुन: लोड किया और दुश्मन को अवसर दिए बिना एक के बाद एक दो दस्ती बम कम शक्ति वाले उसी दिशा में उछालकर वह परिणाम देखने के लिए नहीं रुका बल्कि उसने डॉली का हाथ पकड़कर सामने की ओर दौड़ लगा दी।
 
धूल धुएं के गुब्बार के बीच हल्की फायरिंग करता हुआ बाएं हाथ से डॉली को और दाहिने हाथ से माउजर ताने वह निरंतर दौड़ता चला गया। वहां उसकी फुर्ती काम कर गई। वह डॉली के साथ गली से बाहर निकल गया। उसने तेजी से दौड ना जारी रखा। उसे मालूम था कि डॉली बुरी तरह हांफ रही है। उससे दौड़ा नहीं जा रहा है लेकिन फिर भी वह उसे दौड़ाए जा रहा था। गली पीछे वाली सड़क पर जाकर निकली।

तभी!

अचानक बीचों बीच सड़क पर दौड़ते हुए सामने से दो कारें प्रकट हुई। दोनों कारों की शक्तिशाली हैडलाइट्स का प्रकाश उन दोनों को सराबोर करने लगा। कारें साथ-साथ चलती हुई आगे बढ़ रही थीं, इस तरह पूरी सड़क घिर गई थी।

राज समझ गया कि दुश्मन बड़े पैमाने पर उसकी नाकाबंदी कर चुका है। वे उसके पहले ही रुक गए थे। उसके रुक जाने से डॉली को भी सुकून मिला था। वह जल्दी-जल्दी अपनी सांसों को संयत करने लगी।

राज ने अपनी किट की चेन खोली और अंदर से छोटे आकार का राकेट लांचर निकाल लिया।

उसने राकेट लांचर कंधे पर रखकर जैसे ही बटन दबाया, राकेट के प्रहार से दायीं ओर वाली कार हवा में उड़ गई और विस्फोट के साथ कई टुकड़ों में विभक्त होकर आग की लपटों में घिरी हुई नीचे आकर ढेर हो गई। जब तक दूसरी कार संभलती तब तक राज उसे लक्ष्य करके राकेट लांचर का बटन दबा चुका था। दूसरी कार भी हवा में उछली और विस्फोट के साथ ही टुकड़ों में विभक्त हो गई।

रास्ता साफा

दोनों पुन: वहां से भाग निकले।

आगे एक ब्रिज था। ब्रिज से नीचे उतरने पर रेलवे लाइन और रेलवे लाइन के सहारे-सहारे चलते हुए वे दोनों रेलवे स्टेशन पर जा पहुंचे।

लोकल ट्रेन का उन्हें ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा। इस बीच राज ने फोन पर जय से सम्पर्क स्थापित किया।

"किधर से बोलेला बाप...?" दूसरी ओर से जय का उनींदा सा स्वर उभरा, शायद वह नींद में था।

"रेलवे स्टेशन से।"

"चैम्बूर से?"

"हां।"

"पन इतनी रात को रेलवे स्टेशन...?"

"दुश्मन ने एस्टीम में बम लगा दिया-मेरा पूरा बंदोबस्त कर रखा था। पूरा जाल काटके निकला हूं...फिलहाल सिर पर छत नहीं है।"

"तुम ठीक तो है न?"

"एकदम ठीक हूं।"

"फिर उधरिच ठहर..अपुन अब्बी आएला है.

"नहीं...मैं यहां ठहर नहीं सकता। सावन्त के आदमी कभी भी यहां आ सकते हैं। मैं लोकल से कुर्ला की तरफ निकलता हूं और कुर्ला से घाटकोपर आ जाऊंगा। तू घाटकोपर में अपने बिल्डर्स वाले आँफिस में मिल।"

"बरोबर...।"

राज ने फोन बंद करके एक कोने में छिपने जैसी जगह बना दी। वह हर आदमी को शंकित दृष्टि से देख रहा था। तभी वहां ट्रेन आ पहुंची। वह जल्दी से डॉली के साथ ट्रेन में सवार हो गया। कुर्ला पहुंचते ही उसने ट्रेन छोड़ दी।

वह बोरीबन्दर से मानखुर्द वाली लाइन थी। उसने जाना था बोरीबन्दर से कल्याण वाली लाइन से। दूसरी ट्रेन पकड़ने में ज्यादा टाइम नहीं लगा।

__ पहले आया विद्या विहार और उसके बाद अगला स्टॉप घाटकोपर का था।

टैक्सी से दोनों शीघ्र ही एस. पी. बिल्डर्स के विशाल कैम्पस में जा पहुंचे। जय पहले से ही उनके स्वागत के लिए तैयार था।

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सावन्त बन्धु !

रंजीत और धरम।

दोनों में जमीन आसमान का अंतर।

एक पाश्चात्य रंगीनियों में डूबा हुआ और दूसरा खद्दरधारी। खद्दर की कुर्ता...खद्दर का पायजामा और सिर पर गांधी टोपी।

रंजीत सावन...धरम सावन्त।

दोनों के हाथों में पैग थे और दोनों गहरे विचारों में डूबे हुए थे।

उन दोनों के अलावा वहां दो आदमी गनर वाली यूनिफार्म थे जो कि धरम सावन्त की सुरक्षा के लिए थे और दो लोगों में एक था जग्गू जलगर एवं दूसरा जोगलेकर।

गनर हॉल के दरवाजे के समीप थे। जबकि जग्गू जगलकर और जोगलेकर उस काउंटर के करीब ही थे जहां बार काउंटर के समीप ऊंचे स्कूलों पर रंजीत और धरम सावन्त बैठे हुए थे।

"हमने उक्का ठिकाना मालूम कर लिया था...उसकी कार में खतरनाक बम लगा दिया...पूरा इंतजाम कर डाला मगर कोई फायदा नहीं निकला। उल्टा नुकसान ही हो गया। हमारे कई आदमी मारे गए...उन महत्वपूर्ण आदमियों से हमें तमाम काम अभी निकालने थे...।"

रंजीत हल्के नशे में बड़बड़ाकर बोला। फिर उसने व्हिस्की का एक बूंट भरा और सामने रखे रोस्टेड मुर्गे की टांग से एक बोटी नोंचकर उसे चबाने लगा।

धरम सावन्त कदरन शांत और सहज था।

उसने पैग रख दिया। सिगरेट सुलगा ली। चिन्ता उसके चेहरे से झलक रही थी।

"आखिर वह कौन शख्स है जो इस तरह से सतीश मेहरा की बहन डॉली मेहरा की मदद किए था रहा है। उसी ने प्रभात के सम्पादक करीम को बचा लिया। जो कुछ भी हमारे खिलाफ हो रहा है उसका जिम्मेदार आखिर में वही श्ख्स निकलता है...कुछ मालूम किया उसके बारे में या नहीं?"

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"मकान मालिक ने उसका नाम तपन सिन्हा बताया था बड़े भैया...।"

"तपन सिन्हा...?"

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"हां।"

"कहां से आया...क्या करता है...क्या नहीं करता?"

"सो मकान मालिक भी नहीं जानता।"

"कमाल है।"

"बड़े भैया...जिस ढंग से उसने हमारी दो कारें उड़ा डालीं, उस हिसाब से उसे मामूली नहीं। समझा जा सकता। उसके पास खतरनाक किस्म के हथियारों का भण्डार है।"

"कहीं वो कोई आतंकवादी तो नहीं...?"

"हो सकता है।"

"या कोई बहुत बड़ा गैंगस्टर?"

"वो भी हो सकता है।"

"खैर...जो भी हैं...हमारे लिए खतरे की अलामत है।"

"अपुन उसे मच्छर की तरह मसल डालेगा...मसल डालेगा उसे!" जग्गू जगलर जोश में भरकर उत्तेजनापूर्ण स्वर में बोला।

"रहने दे-रहने ...जब वो पेशेवर हत्यारों को खत्म कर सकता है तो फिर तुझे तो आड़े हाथों ले लेगा।"

"एक चांस सेठ...सिर्फ एक चांस उसका पीछू फिर कोई चांस नेई मांगेगा अपुन...।"

"चांस तो तब दूंगा जब ये पता चले कि वो है कहां...कौन सा उसका ठिकाना है।"

"मालूम कर लेंगा।"

"इतना आसान नहीं मालूम सतीश...जब इतना परफैक्ट प्लान फेल करके वह हमारे तमाम आदमियों को मौत के घाट उतार कर अपने ठिकाने से निकले भागने में कामयाब हो गया तो तू किधर जाकर उसका पता लगाएगा और अगर पता लगा भी लिया तो वो कोई साधारण आदमी नहीं जिसके ऊपर तू अपनी गुण्डा शक्ति का सिक्का जमा लेगा। वो एक खतरनाक लड़का है...तुझे जड़ समेत उखाड़कर फेंक देगा और तू उसका बाल भी बांका नहीं कर सकेगा।"

"इतना कमजोर भी नेई है...क्या!"

"अगर तू समझता है तो जा...जा दिया तुझे एक मौका। दिखा डाल अपनी बहादुरी।"

"जग्गू जगलर का बहादुरी से अक्खी दुनिया वाकिफ है...क्या!"

'सो तो है।"

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"अबी अपुन उस हलकट का तलाश में जाएला है...सलाम साब...!" कहते हुए जग्गू जगलर ने बड़ी स्टाइल से सलाम किया और वहां से बाहर निकल गया।

"बड़े भैया...!" रंजीत सावन्त गंभीर मुद्रा में सिगरेट फूंकते धरम सावन की ओर देखकर बोला "उस इंस्पेक्टर को खलास कर डालने का संदेशा भेज दूं क्या?"

"मेहरा को?" धरम सावन्त ने कदरन धीमी आवाज में पूछा।

"हां।"

"अभी नहीं छोटे...अभी मामला फंसा हुआ है।

"क्यों?"
 
"इसलिए कि कामरेड करीम अभी जिन्दा है। वह कहीं भी दूसरी जगह अपना अखबार छाप सकता है। सतीश मेहरा के फेवर में पूरी रिपोर्ट छपकर अगर जनता के बीच पहुंच गई तो हम सतीश मेहरा को मारकर खुद ही अपने जाल में फंस जाएंगे । सतीश की लाश हमारे खलाफ गवाही दे डालेगी और उस हालत में मेरी कुर्सी हिल जाने का खतरा भी पैदा हो जाएगा।"

"यानी अभी उसे जिन्दा रखना पड़ेगा?"

"हां...।"

"कोई और वजह तो नहीं है?"

"है।"

"कौन-सी बड़े भैया?"

"दूसरी वजह वह एफ. आई. आर. है जो सतीश की बहन के पास है। जब तक हम वह एफ. आई. आर वापस हासिल करके कसिल नहीं करा देते तब तक भी हमें सतीश को जिन्दा रखना होगा।"

"आई सी।"

धरम सावन्त ने एक ही सांस में पूरा पैग खाली कर डाला।

रंजीत सावन्त उसे अपलक निहरता रहा।

थोड़ी देर खामोशी बनी रही। फिर रंजीत उस खामोशी को तोड़ता, उसके पहले ही मोबाइल पर सिग्नल प्राप्त होने लगा। उसने फ्रंट पॉकेट के साइड में बैल्ट के हुक में फंसा मोबाइल निकाल लिया।

"कौन है...?" वह धीमी आवाज में बोला।

"ओए रंजीत...अपणे बाप नूं नई पिच्हानता...असी त्वाडे बाप...।" दूसरी ओर से राज का स्वर उभर जिसे वह भली-भांति पहचान चुका था।

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"अच्छा तो ये तू है...!" रंजीत सावन्त का स्वर एकाएक ही कर्कश हो गया। चेहरे पर सख्ती का उन्माद आकर ठहर गया।

'बराबर पहचाना...और सुन तेरे इन छिटपुट हमलों का मेरे ऊपर कोई असर होने वाला नहीं...उलटा तू ही नुकसान उठाएगा। मेरे पीछे लगने वाली तेरी फौज की संख्या घटती जाएगी...घटती जाएगी और एक दिन तु अकेला रह जाएगा।"

"कौन है?" धरम सावन्त ने अपने भाई के बदले हुए तेवरों को देखते हुए उससे पूछा।

"वही आदमी...जो हमारा दुश्मन है।"

धरम सावन्त ने मोबाइल की ओर हाथ बढ़ाया तो रंजीत ने मोबाइल उसे सौंप दिया।

__"अपना परिचय दोगे मित्र...?" धरम सावन्त ने कूटनीतिक अंदाज में पैंतरा बदलते हुए फोन पर कहा।

"मित्र...?" दूसरी ओर से उभरने वाले राज के स्वर में आश्चर्य का पुट था।

"हां मित्र।"

"तुम हो कौन मीठी छुरी?"

"तुम्हारे मन में मैल है इसलिए तुम ऐसा समझ रहे हो...मैं जनता का चुना हुआ प्रतिनिधि हूं इसलिए रंजीत की तरह अनर्गल बोलना मुझे नहीं आता। हकीकतन मैं तो शांतिदूत हूं। मैं तुमसे भी शांति वार्ता करने को तत्पर हूँ...।"

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"अच्छा...अच्छा! शांतिदूत! हा...मैं समझा...समझ गया। तुझे वही मंत्री होना चाहिए जो कि इस फसाद की जड़ है...आइमीन...धरम सावन्त...। एम आई राइट। तू धरम सावन्त ही है न?"

"कुशाग्र बुद्धि पायी है तुमने। एकदम ठीक पहचाना। शांति वार्ता में ही सभी सुख हैं।"

"ताली बजाऊं...?"

__ "ताली बजाने की जरूरत नहीं है। मिल-बैठकर फैसला किए लेते है।"

"पाकिस्तान की तरह...दोगले अंदाज में। इधर शांति वार्ता और उधर सीमा पर चोला बदलकर पीठ में छुरे का वार...क्यों नेता?"

__ "नहीं...मैं वायदे का पक्का हूं। जो कहता हूं करता हूं।"

___ "आदमी परखने की मशीन है मेरे पास...वह मशीन मुझे बता देती है कि आदमी सच्चा है, ईमानदार है या दोगला है। और वो मशीन कह रही है कि इस वक्त मैं जिस आदमी से बात कर रहा हूं वह आदमी बेहद मक्कार...बेहद कमीना है। जब पीठ पर छुरा चलाकर जान न ले सका तो मीठा जहर देने के प्रयास में लगा हुआ है।"

"अच्छा मित्र! गुस्सा थूक दो...मैं अपने किए पर शर्मिन्दा हूं।"

"सिर्फ शर्मिन्दगी से काम चलने वाला नहीं...मैं किसी और चीज का भी तलबगार हूं।"

"कौन सी चीज के?"

"उस चीज का नाम इंस्पेक्टर सतीश मेहरा है। "

धरम सावन्त ने सिगरेट ऐश ट्रे में बुझाकर नया पैग बना लिया। इस बीच वह पूरी तरह खामोश बना रहा

"क्यों नेता...क्या हुआ? फूंक सरक गई क्या?"

"तुमने जिस चीज की मांग की है, वो चीज मेरे पास है नहीं।" धरम सावन त कुछ ठहरकर विचारपूर्ण स्वर में बोला।

"इसे ही कहते हैं पाकिस्तानी दोगली नीति...सुन धरम सावन्त...गौर से सुन। इंस्पेक्टर सतीश मेहरा मुझे जिन्दा वापस चाहिए। अगर नहीं मिला तो तू जिन्दगी भर पछताएगा। खून के आंसू रोएगा...हो हाल करके छोडूंगा कि सारी जिन्दगी तड़प-तड़पकर मुझे याद करता रहेगा।"

"तुम गलत समझ रहे हो मित्र...।"

"सही समझाने का जब वक्त आएगा तब सही भी समझा दूंगा। बस...इतना याद रखना कि किसी भी घड़ी जीत मेरी हो सकती है।"
 
"तुमसे मिलकर बात करने का वक्त तो तय किया नहीं मित्र।"

"उससे क्या होगा?"

"आमने सामने बात होने की बात ही दूसरी है। हम मिल बैठकर बात करेंगे तो प्रत्येक समस्या का समाधान हो सकता है।"

"अच्छा बोल कहां आऊं?"

"अन्टाप हिल पहुंच जा...ठीक चार बजे मैं तुझे कोठी नम्बर एक सौ उन्नीस में मिलूंगा।"

"ठीक हैं...पहुंच जाऊंगा।"

"सचमुच आओगे मित्र?"

"अब इतना बुला रहा है तो सोचता हूं एक बार आ ही जाऊं।"

"ओ. के. इंतजार करूंगा।"

दूसरी ओर से सम्पर्क कट गया।

"क्या हुआ बड़े भैया...?" फोन बंद होते ही रंजीत सावन्त ने उससे जिज्ञासापूर्ण स्वर में पूछा "बात बनी क्या?"

"हां...लगता है बात बन गई।"

"क्या वह आएगा?"

"कहता तो यही है कि आएगा।"

"तो अन्टाप हिल वाली कोठी पर अपने तमाम आदमियों को जमा कर दूं?"

"ऐसा इंतजाम करो कि वह कुत्ता वहां से बचकर जाने न पाए...।"

'एक बार बस वह आ जाए किसी तरह फिर तो उसके वापस जाने का सवाल ही नहीं उठता।"

"ठोस इंतजाम होना चाहिए।"

"एकदम ठोस बड़े भैया...।" कहता हुआ रंजीत सावन्त जोगलेकर की ओर मुड़ा-"

जोगलेकर...तू ये समझ कि अन्टाप हिल वाली कोठी के चप्पे-चप्पे में हमारे आदमी होने चाहिएं।"

"फिक्र न करें साहब...काम हो जाएगा।" जोगलेकर गंभीर स्वर में बोला।

"फौरन जा...।"

जोगलेकर वहां से चला गया।

"बड़े भैया...।" उसके जाने के बाद रंजीत ने धरम सावन्त से कहा।

"बोल?"

"वो आएगा न?"

"आ भी सकता है और नहीं भी।"

"अगर न आया तो....?"

"नहीं आया तो कोई मात नहीं और अगर आ गया तो हम अपने सबसे बड़े दुश्मन को मिटाने में कामयाब हो जाएंगे।"

रंजीत की बांछे खिल गई। वह इस प्रकार प्रसन्नचित्त नजर आने लगा मानो उसने बहुत बड़ा तीर मार लिया हो।

___"यहां खड़े होकर दांत दिखाने से काम चलने कला नहीं। जाकर उस जगलर के बच्चे को तलाश करके वापस बुला। वहां अकेला जोगलेकर ही काफी नहीं होगा।" धरम सावन्त ने तीखे स्वर में कहा।

"मतलब जग गु जगलर को भी...?"

___ "हां...मैं अपनी पूरी फोर्स अन्टाप हिल पर देखना चाहता हूं।"

"ठीक है बड़े भैया...मैं अभी जाए जग गू जगलर को अन्टाप हिल वाली कोठी की तरफ भेजता हूं।" इतना कहकर रंजीत भी बाहर निकल गया।

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"हैलो...मैं जोगलेकर...।" जोगलेकर ने सिग्नल मिल ही मोबाइल कान से लगाते हुए कहा।

"जोगलेकर...तू कैसा है?" दूसरी ओर से राज का स्वर उभरा।

"ठठीक हूं।"

"मुझे पहचाना?"

"हां...।"

"फिर बराबर है...जानता है फोन क्यों किया?"

"नहीं।"

"कोई खास खबर नहीं है तेरे पास?" राज के स्वर में अनायास ही कठोरता का समावेश हो गया।

"है...! है न खास खबर...।"

"अच्छा तो ये काम कर रहा है मेरे लिए कि जब मैं तुझे चार बार याद दिलाऊं तब तू मुझे उस खबर की बाबत बताएगा वरना नहीं...।"

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हवेली "न...न...नहीं, ऐसी बात नहीं। दरअसल मेरे पास तुम्हारे पास खबर भेजाने का सोर्स नहीं है। मैं अपनी तरफ से तुम्हें फोन नहीं कर सकता। अभी तुम्हारा फोन आया तो मैं एकदम से समझ नहीं सका। मेरे मन में तो इसी खास खबर के लिए हलचल मची हुई थी। मैं उसे तुम तक पहुंचाने का ख्वाहिशमंद था मगर साधन के अभाव में विचलित हो रहा था।"

"तो अब बता?"

"धरम सावन्त का प्लान तुम्हें अन्टाप हिल वाली कोठी में खत्म कर देने का है।"

राज की हंसने की आवाज फोन पर उभरी।

"कमाल है...तुम हंस रहे हो?"

"हां...हंसने की बात है इसलिए हंस रहा हूं। तू ये बता अन्टाप हिल में कौन लोग जा रहे हैं मुझे खत्म करने के लिए?"

"मैं और सावन्त बन्धुओं के आदमी।"

"तू भी होगा वहां?"

"हां।"

"तो फिर तुझे मेरा एक काम करना होगा।"

"क्या?"

"फिलहाल तू मुझे रेसकोर्स के पास मिल।"

"मैं अभी पहुंचता हूं।"

"ठीक बीस मिनट बाद।"

"ओ. के.।" फोन डिस्कनेक्ट हो गया।

जोगलेकर ने तेजी से रेसकोर्स की राह पकड़ी। वह मोटरबाइक पर था। शीघ्र ही रेसकोर्स आ गया। वहां उसे राज के स्थान पर एक दूसरा ही आदमी मिला।

"इस बैग के अंदर आठ बम हैं।" उस आदमी ने बैग जोगलेकर की ओर बढ़ाते हुए कहा-"फोन करने वाले का हुक्म तुम्हारे लिए ये है कि इन बमों को तुमने धरम सावन्त की अन्टाप हिल वाली कोठी मैं फिट करना है। इनके सभी कनेक्शन फिट हैं। तुमने महज इन्हें छिपाकर सैट कर देने की कार्यवाही करनी है बाकी काम कम्प्यूटर और रिमोट कंट्रोल से हो जाएगा।"

"मेरा बेटा ठीक तो है न?"

"वो सब मुझे नहीं मालूम...मुझे जो काम सौंपा गया था उसे पूरा कर रहा हूं। इसके अलावा तुम्हारे लिए एक वार्निग भी है।"

"वार्निग...।"

"हां।"

"क्या वार्निग है?"

"अगर तुमने बम लगाने के काम में किसी तरह की धोखाधड़ी की और बम फटने की जगह निष्क्रिय होकर रह गए तो जो बम तुम्हारे बेटे के शरीर में बंधा है, सक्रिय हो उठेगा।"

"नहीं...नहीं! मैं कोई धोखाधडी नहीं करूंगा... विश्वास रखो।”

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"अरे, मुझे विश्वास दिलाने से कोई फायदा नहीं। मैं तो किराये का आदमी हूं। बम सौंपने के बाद मेरा काम खत्म। मेहनताना मुझे पेशगी मिल चुका है।"

आगे जोगलेकर कुछ न बोल सका।

किराये का आदमी उसे बैग सौंपकर आगे बढ़ गया। उसने अन्टाप हिल पहुंचने में कम से कम समय लगाया। फिर भी वह वहां सबसे पहले न पहुंच सका। उसने अपने जिन आदमियों को वहां पहुंचने का आदेश दिया था, उनके अतिरिक्त जग्गू जलगर भी वहां पहुंचा हुआ था। वह कोठी के लॉन में खड़ा होकर डायरेक्शन दे रहा था।

जोगलेकर के लिए समस्या हो गई।

अब बमों को छिपाकर लगाना उसके लिए एक मुश्किल काम हो गया था। उसने सिगरेट सुलगाई और फिर वह यहां वहा सैट किए गए प्यादों को देखता हुआ पीछे की ओर बढ़ गया।

अभी कोठी के पीछे वाला क्षेत्र खाली था।
 
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