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"किधर कू चलने का है?" जय ने एस्टीम को स्टार्ट करके आगे बढ़ाते हुए पूछा।
"दायीं तरफ मोड़ ले।"
"पन जाना किसके पास है?"
"तू सिर्फ गाड़ी चला...।" कहने के साथ ही राज ने सिगरेट सुलगा ली।
जय अनमने भाव से कार ड्राइव करने में व्यस्त हो गया। कभी उसे दाएं चलना पड़ता तो कभी बाएं। वह राज के प्रत्येक आदेश का पालन कर रहा था।
राज की नजर रिस्टवॉच पर थी। उसने जोगलेकर को दस मिनट का टाइम दिया था लेकिन दस मिनट गुजर जाने के बाद भी उसने फोन नहीं किया था। ठीक पन्द्रह मिनट बाद वह मोबाइल को बैल्ट के हुक से निकालकर नम्बर मिलाने लगा।
"जोगलेकर..?" सम्पर्क स्थापित होते ही वह बोला।
"हां...बोल रहा।" दूसरी ओर से जोगलेकर की आवाज उभरी।
"तैयार है?"
"तैयार तो हूं लेकिन मेरे पास कोई रकम नहीं है...।"
"बाहर निकलकर गाड़ी में बैठ...एक बार फिर वार्निंग...कोई होशियारी मत दिखाना वरना...!"
____ "नहीं...मैं कोई होशियारी नहीं दिखा रहा हूं।
"फिर तेरी कार वरली की तरफ मुड़ जानी चाहिए।"
"ठीक है।"
"सीधा चलते रहना।"
"जो हुक्म।"
वरली पहुंचने के बाद राज ने उसे और आगे चलने को कहा फिर दूसरी सड़क पर। उसके बाद इधर-उधर चक्कर लगवाकर अंत में उसने बरसोवा बीच के वीरान सागर तट पर पहुंचा दिया जहां का वह पहले ही निरीक्षण कर चुका था। आगे-पीछे दूर-दूर तक जब उसने देख लिया कि जोगलेकर के साथ कोई नहीं है तब जाकर वह उसके सामने पहुंचा। उसने अपना तमाम मेकअप हटा दिया ना। उस घड़ी वह अपने असली रूप में था। अपने असली रूप में वह बहुत कम रहता था और वह जानता था कि उसे असली रूप में हर कोई पहचान नहीं सकता।
जोगलेकर के सम्मुख पहुंचकर उसने अपनी पैनी निगाहें उसके चेहरे पर टिका दीं। वह समझ रहा था, जोगलेकर उसे पहचानने की कोशिश में लगा हुआ है।
"रिवाल्वर है तेरी जेब में..?" राज गुर्राकर बोला।
उसके मुंह से आवाज न निकली।
"खामोशी का मतलब है...चल...दोनों हाथ ऊपर उठाकर आगे बढ़।"
उसने आदेश का पालन किया और दोनों हाथ उठाए हुए राज के सम्मुख आ खड़ा हुआ।
"घूम जा।"
वह घूम गया।
राज ने उसकी तलाशी लेकर अन्दरली जेब से रिवाल्वर और एक लम्बा-सा चाकू बरामद कर लिया। दोनों हथियार अपने कब्जे में करने के बाद वह एक बड़े से पत्थर पर जा बैठा। नीचे समुद्र की लहरें आ-आकर टकरा रही थी। जय को उसने कार समेत थोड़ी दूरी पर छिपाया हुआ था। वह ऐसी जगह पर था जहां से उसे सड़क की दिशा से आने वाला खतरा दूर से ही नजर आ सकता था और वक्त रहते वह राज को सिग्नल देकर खबरदार कर सकता था।
राज ने सिगरेट का पैकेट निकालकर उसे जोगलेकर की ओर बढ़ाया-"सिगरेट...?"
जोगलेकर ने अनमने भाव से एक सिगरेट निकाल ली।
लाइटर से राज ने पहले उसकी फिर अपनी सिगरेट सुलगा ली।
वह एक ऊंचे पूरे कद का खतरनाक आखों वाला चालीस के पेटे में पहुंचा तजुर्बेकार मुजरिम था। करूरता की कहानी उसके चेहरे पर दो लम्बे घावों की शक्ल में दर्ज थी लेकिन वक्तीं तौर पर उसका कुरता से कोई वास्ता नजर नहीं आ रहा था।
"जोगलेकर...तू सोच रहा होगा कि अभी तक मैंने तुझसे फरौती की रकम क्यों नहीं मांगी...है न?" राज सिगरेट का धुआं नाक के रास्ते बाहर निकालता हुआ बोला।
__ "मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है...यकीन मानो।" जोगलेकर ने कम्पित स्वर में कहा।
"मान लिया यकीन...मुझे मालूम है कि तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है लेकिन तुम्हें तुम्हारा बेटा एक दूसरी शर्त पर ही मिल सकेगा।"
"कौन-सी शर्त।"
"दायीं तरफ मोड़ ले।"
"पन जाना किसके पास है?"
"तू सिर्फ गाड़ी चला...।" कहने के साथ ही राज ने सिगरेट सुलगा ली।
जय अनमने भाव से कार ड्राइव करने में व्यस्त हो गया। कभी उसे दाएं चलना पड़ता तो कभी बाएं। वह राज के प्रत्येक आदेश का पालन कर रहा था।
राज की नजर रिस्टवॉच पर थी। उसने जोगलेकर को दस मिनट का टाइम दिया था लेकिन दस मिनट गुजर जाने के बाद भी उसने फोन नहीं किया था। ठीक पन्द्रह मिनट बाद वह मोबाइल को बैल्ट के हुक से निकालकर नम्बर मिलाने लगा।
"जोगलेकर..?" सम्पर्क स्थापित होते ही वह बोला।
"हां...बोल रहा।" दूसरी ओर से जोगलेकर की आवाज उभरी।
"तैयार है?"
"तैयार तो हूं लेकिन मेरे पास कोई रकम नहीं है...।"
"बाहर निकलकर गाड़ी में बैठ...एक बार फिर वार्निंग...कोई होशियारी मत दिखाना वरना...!"
____ "नहीं...मैं कोई होशियारी नहीं दिखा रहा हूं।
"फिर तेरी कार वरली की तरफ मुड़ जानी चाहिए।"
"ठीक है।"
"सीधा चलते रहना।"
"जो हुक्म।"
वरली पहुंचने के बाद राज ने उसे और आगे चलने को कहा फिर दूसरी सड़क पर। उसके बाद इधर-उधर चक्कर लगवाकर अंत में उसने बरसोवा बीच के वीरान सागर तट पर पहुंचा दिया जहां का वह पहले ही निरीक्षण कर चुका था। आगे-पीछे दूर-दूर तक जब उसने देख लिया कि जोगलेकर के साथ कोई नहीं है तब जाकर वह उसके सामने पहुंचा। उसने अपना तमाम मेकअप हटा दिया ना। उस घड़ी वह अपने असली रूप में था। अपने असली रूप में वह बहुत कम रहता था और वह जानता था कि उसे असली रूप में हर कोई पहचान नहीं सकता।
जोगलेकर के सम्मुख पहुंचकर उसने अपनी पैनी निगाहें उसके चेहरे पर टिका दीं। वह समझ रहा था, जोगलेकर उसे पहचानने की कोशिश में लगा हुआ है।
"रिवाल्वर है तेरी जेब में..?" राज गुर्राकर बोला।
उसके मुंह से आवाज न निकली।
"खामोशी का मतलब है...चल...दोनों हाथ ऊपर उठाकर आगे बढ़।"
उसने आदेश का पालन किया और दोनों हाथ उठाए हुए राज के सम्मुख आ खड़ा हुआ।
"घूम जा।"
वह घूम गया।
राज ने उसकी तलाशी लेकर अन्दरली जेब से रिवाल्वर और एक लम्बा-सा चाकू बरामद कर लिया। दोनों हथियार अपने कब्जे में करने के बाद वह एक बड़े से पत्थर पर जा बैठा। नीचे समुद्र की लहरें आ-आकर टकरा रही थी। जय को उसने कार समेत थोड़ी दूरी पर छिपाया हुआ था। वह ऐसी जगह पर था जहां से उसे सड़क की दिशा से आने वाला खतरा दूर से ही नजर आ सकता था और वक्त रहते वह राज को सिग्नल देकर खबरदार कर सकता था।
राज ने सिगरेट का पैकेट निकालकर उसे जोगलेकर की ओर बढ़ाया-"सिगरेट...?"
जोगलेकर ने अनमने भाव से एक सिगरेट निकाल ली।
लाइटर से राज ने पहले उसकी फिर अपनी सिगरेट सुलगा ली।
वह एक ऊंचे पूरे कद का खतरनाक आखों वाला चालीस के पेटे में पहुंचा तजुर्बेकार मुजरिम था। करूरता की कहानी उसके चेहरे पर दो लम्बे घावों की शक्ल में दर्ज थी लेकिन वक्तीं तौर पर उसका कुरता से कोई वास्ता नजर नहीं आ रहा था।
"जोगलेकर...तू सोच रहा होगा कि अभी तक मैंने तुझसे फरौती की रकम क्यों नहीं मांगी...है न?" राज सिगरेट का धुआं नाक के रास्ते बाहर निकालता हुआ बोला।
__ "मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है...यकीन मानो।" जोगलेकर ने कम्पित स्वर में कहा।
"मान लिया यकीन...मुझे मालूम है कि तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है लेकिन तुम्हें तुम्हारा बेटा एक दूसरी शर्त पर ही मिल सकेगा।"
"कौन-सी शर्त।"