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हिन्दी नॉवल -ट्रिक ( By Ved Parkash Sharma) complete

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इस आवाज़ को सुनकर चारों ने भागने की कोशिश की , परन्तु हॅरी ऐसा पूत कहाँ था जो किसी को भाग निकलने देता !

वो रह रह कर चारों में से किसी एक को उठाता ओर बाकी तीनो पर फैंक देता ! इस खेल के चलते पोलीस वहाँ पहुँच गयी ! चारों को गिरफ्तार कर लिया गया ! हॅरी पर नज़र पड़ते ही पोलीस इनस्पेक्टर के मूँह से निकाला -- " हॅरी तुम ?"

" यस क्रश अंकल !" हॅरी ने कहा -- " यह लोग एक बूढ़े आदमी को गोली मार देना चाहते थे ! मैं सहन नही कर सका !"

क्रश ने पूछा --" लेकिन यह बूढ़े को मारना क्यूँ चाहते थे ? क्या इस बारे में तुम्हे कुछ मालूम है ?"

हॅरी ने क्रश को टालते हुए कहा -- " मैं इस बारे में क्या कह सकता हू अंकल ऑर

........ मेरे कुछ कहने की ज़रूरत भी कहाँ है ! यह चारों तो आपके क़ब्ज़े में है !"

"मगर हॅरी .....!" क्रिस्टी शायद रुमाल का जिकर करना चाहती थी !

हॅरी ने डाँट दिया --"तुम चुप रहो !"

हॅरी का अनोखा रूप देखकर क्रिस्टी सहम गयी !

क्रिस्टी को ध्यान से देखते वक़्त क्रश के होंठों पर हल्की सी मुस्कान आगयि ऑर हॅरी से पूछा --"यह कॉन है ?"

"क्रिस्टी !"

"यह तो नाम हुआ इसका ! तुम्हारी कॉन लगती है ?"

"फ्रेंड है !"

"जॅकी गुरु को मालूम है ?"

अब हॅरी भी होली से मुस्कुराया ! बोला -- " मामला वहाँ तक नही पहुँचा है !"

"ओके !" उसने हॅरी के कान पर झुक कर कहा --" सुंदर है !"

हॅरी चुप रहा !

"खैर !" क्रश बोला -- " फिलहाल चलता हूँ ! बूढ़ा हाथ आगया तो शिनाख्त के लिए बुला लूँगा !" कहने साथ वो पलटा ऑर मेन गेट की तरफ बढ़ गया !

सिपाही उन चारों को जकड़े उसके पीछे थे !

हॅरी अब ध्यान से उस रुमाल को देखना चाहता था ! सो तेज़ी से बाथरूम की ओर बढ़ा !

क्रिस्टी उसकी ओर लपकती हुई बोली --"हॅरी , कहाँ जा रहे हो ?"

हॅरी रुक्का ! बहुत ही रूखे स्वर में कहा उसने -- " अब तुम घर जाओ, कल मिलेंगे !"

कुछ कहने के लिए क्रिस्टी का मूँह खुला मगर... खुला ही रह गया ! कुछ कह ना सकी वो !

कहती भी किस से ? जिस से कहना था वो बाथरूम के दरवाज़े के पीछे गुम होचुका था !

दरवाज़ा बंद करने के साथ हॅरी ने जेब से रुमाल निकाला !

ध्यान से देखा ! कुछ भी नज़र ना आया उससे ! वो एक सिंपल सा रुमाल था !

तभी बूढ़े के शब्द याद आए जो भागते हुए बोला था -- " आग देखते ही रुमाल का राज़ खुल जाएगा !

हॅरी ने जेब से लाइटर निकाला !

ऑर लाइटर की रोशनी में रुमाल पर ब्राउन कलर के अक्षर नज़र आने लगे !

 


इधर इंडिया मे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

एक मंथ बाद !

राजनगर में हर्षरण शास्त्री का अभिनंदन समारोह था !

था क्या , हर्षरण शास्त्री ने अपने चम्चो से कहकर खुद रखवाया था ! प्रोटोकॉल के मुताबिक समारोह में डी.एम ऑर एस.एस.पी भी थे !

प्रोग्राम के बाद सर्क्यूट हाउस में हर्षरण ने अजीत से पूछा --" कैसे हो मिस्टर. अजीत ?"

"ठीक हूँ !"

"कैसी चल रही डी.एम गिरी ?"

." ठीक ही है "

"उखड़े - उखड़े क्यूँ हो?" हर्षरण मुस्कुराया - -- " आराम से बैठो !" अब मुझसे बातें करने में भी परहेज है क्या ?"

"ऐसी कोई बात नही है ?"

" देखो मिस्टर अजीत !" हर्षरण ने उसे समझाने वाले लहजे में कहना शुरू किया -- " हमने उस दिन भी कहा था आज फिर कहते है -- जो हुआ , ग़लतफहमी के तहत हुआ ऑर तुमने खुद कबूला हमारे दिल में वो ग़लत फहमी तुम्हारी ही छोटी सी भूल की वजह क्रियेट हुई थी ! वो ग़लतफहमी दूर हुए आज एक महीना गुजर गया ! हमने किसी मध्यम से तुमसे संपर्क तक नही किया ! किया ..... क्या?"

"अजीत चुप रहा !"

"जवाब दो भाई !"

"जी नही किया !"

" सीधी सी बात है , जो हमने उस दिन भी कही थी ! शोकीन आदमी तो हम है मगर ज़बरदस्ती करने का सिद्धांत कभी नही रहा ! दुनिया में ऑर बहुत हैं , इसीलिए मुड़कर तुम्हारी तरफ नही देखा ऑर एक बात तुमने भी कही थी उस दिन ! यह कि जो हुआ उसे हम तीनो को वहीं का वहीं भूल जाना चाहिए !

"मैं उसे भूल चुका हूँ !"

"झूठ बोल रहे हो !"

"यह सच है !"

"सच होता तो यूँ मूँह ना फुलाए होते ?"

"आप भूल गये होते तो टॉपिक नही छेड़ते !" अजीत भी चिड़ते हुआ बोला !

"टॉपिक तुम्हारा मूँह फूले होने के कारण छेड़ना पड़ा !" हर्षरण की मुस्कान गहरी होती जा रही थी -- " पोलिटिकल लोग जानते है कि तुम्हारा ट्रान्स्फर हमने कराया है ऑर राजनगर में तुम हमारे आदमी हो ! ऐसी अवस्था मे. हम रूखे रूखे मिले क्या यह बात लोगों में चर्चा पैदा नही कर देगी ?"

अजीत को जवाब देना ज़रूरी नही लगा !

"हमें एक-दूसरे से दोस्त जैसे मैल जोल रखना चाहिए !"

"इतना ही कह सकता हूँ कि मुझे आपसे कोई शिकायत नही है !"

"हमें है !" हर्षरण ने फटाक से जवाब दिया !

" ज......जी !"

"डिन्नर अभी तक अधूरा है !"

अजीत ने झटके से उसकी तरफ देखा ! आँखों में कठोरता उभर आई !

" देखो ! देखो ! फिर नाराज़ होने लगे तुम !" हर्षरण ने कहा -- " अर्रे भाई ! हमने डिन्नर की बात कही है ! सिर्फ़ डिन्नर की ! पीने पिलाने का कोई दौर नही चलेगा ! यकीन मानो , कोई बदनीयती नही है हमारे दिल में ! बल्कि सचाई तो यह है कि निशा बेहन से हम अपने किए की माफी माँगना चाहते है !"

अजीत ने चेहरे पर सारे जहाँ की हैरानी लाते हुए हर्षरण की तरफ देखा !

"अगर अब भी डिन्नर देने से इनकार हो तो .....!"

"न.... नही ! नही सर !"

" यानी आज रात का पक्का !"

"यस सर !"

डिन्नर के वक़्त !

अपनी सिल्वर कलर की एस्टीम में हर्षरण शास्त्री डी.एम हाउस पहुँचा !

निशा ऑर अजीत दोनो ने हाथ जोड़ कर मुस्कुरा कर स्वागत किया !

निशा के ब्यबहार से जाहिर था अजीत उसे सर्क्यूट हाउस में हुई सब बातें बता चुका है !

उस वक़्त बनारसी साड़ी मे थी !

मोटे कपड़े के ब्लाउस ऑर साड़ी के पल्लू से अपने आप को पूरा छुपाने की कोशिश की थी !

हर्षरण ने उसकी तरफ आँख नही उठाई ! बल्कि भावुक स्वर में बोला -- "अपराधी हूँ आपका ! माफी माँगने आया हूँ ! मगर डिन्नर के बाद !"

हर्षरण ने कहा ही इस तरह की दोनो हंस पड़े !

महॉल सामान्य ही नही, बल्कि हल्का फूलका होगया !

 


करीब 30 मिनट बाद हर्षरण ने काम की बात की --" दोस्त ! सब जानते है एक आइ.ए.एस ऑफीसर डी.एम क्यूँ बन-ना चाहता है ! डी.एम भी राजनगर जैसे सोना उगलने वाले जिले का !

मगर ....... कमाई इस तरीके से करनी चाहिए कि आदमी कम से कम क़ानून की गिरफ़्त में ना फँसे ! यह क़ानून साला आदमी को कहीं का नही छोड़ता !"

"क्या कहना चाहते हैं सर ?" मैं कुछ समझा नही !"

"ना डरने की ज़रूरत है ना बोखलाने की ! मामला मेरे काबू में है ! बस एक बात कह रहा हूँ --- आज के जमाने में कॉन है जो रिश्वत नही लेता ? सब लेते है मगर सबूत नही छोड़ना चाहिए ! सबूत आदमी के गले में फंदा बनकर पड़ जाते है !"

" क्या आप कहना चाहते है कि मैने........ मैने किसी से रिश्वत ली ?"

"मैं फिर कहूँगा, यह कोई गुनाह नही है !" हर्षरण बोला !

लगभग चीख पड़ा अजीत --" किस से ,किस से ली है मैने?"

"दस दिन पहले तुमसे चंदर प्रकाश नाम का आदमी मिला था, गॅस एजेन्सी के रिगार्डिंग ?"

हर्षरण रुका नही फिर शुरू होगया !

"वो गॅस एजेन्सी स्वतंत्रता संग्राम सैनिक के कोट्टे की थी ! शासन ने तुमसे क्ल्रनेस्स माँगी कि चंदर प्रकाश सैनिक है या नही ? तुमने उस अप्लिकेशन पर साइन कर दिए जिसके मुताबिक वो अब स्वतंत्रता सेनानी है , जबकि हक़ीक़त में वो पैदा ही साल 1955 में था !"

"ऐसा नही हो सकता ! उसकी फाइल में सभी ज़रूरी कागजात मोजूद थे !"

"वो नकली थे !" हर्षरण ने मुस्कुरा कर कहा!

"मैं जैल भिजवा दूँगा उसको ! अपनी मंज़ूरी कॅन्सल कर दूँगा ! बल्कि केस कर दूँगा कि उसने नकली कागज़ातों से धोखा देकर साइन लिए हैं !" अजीत गुस्से में बोला!

"वो कुछ ऑर ही कहता है ?" हर्षरण बोला !

"क्या बकता है वो ?"

"कि तुम्हें कागजात नकली होने की जानकारी थी ऑर सब कुछ जानते बुझते इस फ्रॉड मे तुमने उसका साथ दिया !"

"बकता है वो , क्या सबूत है वो सच बोल रहा !"

हर्षरण शास्त्री ने वो सूटकेस खोला जिसे अपने साथ लेकर आया था !

उस में से बॉन्ड पेपर की एक फोटो कॉपी निकाली ओर बोला -" सिटी के बहुत महनगे इलाक़े में चंदर प्रकाश का एक फ्लॅट था !

बाजार भाव के मुताबिक उसकी कीमत 20लाख ! यह पेपर्स उस फ्लॅट के बैनामे के है ! इनके मुताबिक चंदर प्रकाश ने अपना फ्लॅट केवल दो लाख में तुमें बेच दिया !"

" मुझे...?"/अजीत उच्छल ही पड़ा ---" मुझे बेच दिया ?"

" बैनामा उस तारीख के ठीक एक दिन पहले की तारीख का है जिस दिन तुमने उसके स्वतंत्रता सेनानी होने की पुष्टि की थी ! "

"आई.....ऐसे कैसे हो सकता है?" बुरी तरह बौखलाए अजीत ने बैनामे की फोटो कॉपी उठाई ओर जैसे जैसे पढ़ता गया वैसे वैसे मारे हैरानी के आँखें फैलती चली गयी उसकी !

निशा ने कहा --" ऐसा नही होसकता भाई साहब , होता तो यह मुझसे जिकर ज़रूर करते !"

" इसका मतलब अजीत ने यह बात आपसे भी छुपाई !"

" यह ग़लत है ! झूठ है !" अजीत हलक फाड़ कर चीख पड़ा --" मैने चंदर प्रकाश से कोई ज़मीन नही खरीदी !"

" क्यूँ झूठ बोल रहे हो यार ? रेजिस्ट्री मोजूद है !" हर्षरण बोला !

निशा ने हैरत से अजीत की तरफ देखा !

" यकीन मानिए सर ! " मुझे इस बैनामे के बारे में कुछ नही पत्ता !"

"देखो अजीत !" हर्षरण ने कहा -- " निशा पत्नी होने के कारण ऑर मैं दोस्त होने के कारण शायद मैं भी तुम्हारी बात पर यकीन कर लूँ मगर क़ानून के सामने क्या कहोगे ? ये बैनामा सारी कहानी सॉफ सॉफ सुना रहा है !

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एक दिन पहले तुमने तुमने चंदर प्रकाश की 20लाख की ज़मीन दो लाख में अपने नाम लिखवाई ऑर अगले दिन उसके स्वतंत्रता सेनानी होने की पुष्टि कर दी ! यह क़ानूनी कागज है ! रिजिस्टर्ड ! दुनिया की कोई कोर्ट इसे झूठा नही मान सकती ! सवाल सिर्फ़ डी.एम की पोस्ट छिन जाने का नही है बल्कि इस पोस्ट पर रहकर इतनी मोटी रिश्वत लेने का है ! इस आरोप में तुम्हारी सारी ज़िंदगी जैल में चक्की पीसते पीसते निकल जाएगी !"

 


" मगर इस पर तो मेरे साइन नही है !" अजीत होश संभाल कर बोला !

" डी.एम को अगर यह बताना पड़े कि बैनामे पर खरीददार के बल्कि गवाहों ऑर बेचने वाले के साइन होते है तो बड़ी शरम की बात है !"

"वोही तो कह रहा हूँ मैं !चंदर प्रकाश ने मेरे नाम झूठ बैनामा किया है !" अजीत बोला !

" निशा ! तुम समझाओ इसे ! क्या बच्चों जैसी बातें कर रहा है ? भला दुनिया में कोई ऐसा होगा जो अपनी 20लाख की ज़मीन फ्री में मेरे नाम लिख दे ऑर मुझे पता भी ना हो ? चंदर प्रकाश के सिर पर क्या फोड़ा निकला था ?"

अजीत हकबकाया -सा हर्षरण की तरफ देख रहा था !

हर्षरण ने कहा -- " बात वो करो दोस्त जो हलक से नीचे उतरे !"

"यह सब चंदर प्रकाश ने मुझे फसाने के लिए किया है !" अजीत बोला !

"फिर वो ही बात ! तुम्हें फसा कर उसे क्या मिलेगा ? उल्टा नुकसान ही होगा उसे ! वो गॅस एजेन्सी तो जाएगी ही जो मिली है ! तुम्हारे साथ साथ वो भी चला जाएगा जैल !" हर्षरण समझाते हुए बोला !

अजीत पर कुछ कहते ना बन पड़ा !

निशा गिडगिडा उठी ---" कुछ कीजिए भाई साहब ! इन्हें इस मुसीबत से बचाईए !"

" वोही तो कर रहा हू !" हर्षरण बोला -- " डरने की कोई बात नही है ! मामला अभी मेरे काबू में है ! " मैं इसे कोर्ट तक नही पहुँचने दूँगा ! चंदर प्रकाश अपनी ही पार्टी का छोटा कार्य कर्ता है ! चेला है अपना मेरे हुकम के बाद चू -- चा तक नही कर सकता !"

" अब मैं समझा ! मैं समझ गया हरामजादे !" अज़ीत हलक फाड़ के चीख पड़ा -- " यह सारी साज़िश तेरी है ! तूने ही जाल में फँसाया है मुझे !"

" ऑर सुनो भाभी !" हर्षरण ने निशा से कहा -- " पट्ठा मेरे ही माथे मंधने लगा अपनी करतूत ! अरे भाई , जब कह रहा हूँ कि इतना बौखलाने की ज़रूरत नही है ! मैं संभाल लूँगा तो ........ !"

" समझने की कोशिश करो निशा !" अजीत दहाड़ा -- " बड़ा हरामजादा है यह ! अब सारी कहानी ठीक से मेरी साँझ आ रही है ! चंदर पार्कश इसी का आदमी है ! एक दिन उसने मेरी जानकारी में लाए बगैर यह रेजिस्ट्री करवाई ! अगले दिन पेपर्स पर मेरे साइन ले लिए ! उफफफफफफफफफ्फ़ इतनी गहरी चाल ! इतनी ख़तरनाक साज़िश !"

निशा उलझकर रह गयी !

अजीत की बौखलाहट का पूरा आनंद लूट रहा था वो ! बोला --- " चाहू तो अपनी आक्टिंग ज़ारी रख सकता हूँ दोस्त क्यूंकी तेरे फरिश्ते तक चंदर प्रकाश को मेरा आदमी साबित नही कर पायेंगे मगर ............ मगर सोचता हूँ किसी को ज़रूरत से ज़्यादा सताना ठीक नही होता ! वैसे तुम जल्दी समझ गये कि गहरे फँस गये हो ! शतरंज के खेल में जब मेरे जैसा खिलाड़ी शह ऑर मात देता है तो सामने वाले के पास अपने बाल नोच लेने के अलावा कोई रास्ता नही बचता !"

" देखा ! देखा निशा ! कितना कमीना है यह ?"

____

" मैं तो खैर हूँ ही कमीना ! अब तुझे फ़ैसला करना है कि तू क्या है ?"

"म....मतलब ?" चौंका अजीत !

" बात अब भी वो ही है ! ज़ोर ज़बरदस्ती करना मेरा सिद्धांत नही है ! फ़ैसला तुझे करना है ! जल्दी बोल ! सारी जिंदगी जैल में रहना मंजूर है या फिर...... बेडरूम में ले जाउ इस इमरती को !"

" तू कामयाब नही हो सकता कुत्ते ! मुझे जैल जाना मंजूर है !"

"ऐसे फ़ैसले जल्दबाजी में नही लेने चाहिए ! दिल से लिए गये फ़ैसले ठीक नही होते !" हर्षरण बोला !

दाँत भींच कर बोला अजीत --"मतलब ?"

" दिमाग़ है तो सोच -- जब इसकी रक्षा के लिए तू बाहर रहेगा ही नही तो मुझसे कब तक बचेगी यह ! उस वक़्त तक नहा - धो कर इसके पीछे पड़ा रहूँगा , जब तक मिल नही जाएगी ! बेचारी अकेली ! लाचार अबला कब तक खुद को मुझ जैसे राक्षस से बचा सकेगी ? होगा यह कि उधर तू जैल के पत्थरों से सिर टकरा - टकरा कर अपनी जिंदगी गँवा रहा होगा , इधेर यह मेरे चंगुल में फँस-कर अपनी इज़्ज़त ! बिस्तर तो इसी मेरा गरम करना ही होगा ! यह तेरी मर्ज़ी है कि अपनी खुशाल जिंदगी को बचाए रखने की समझदारी दिखाता है या जैल में सड़ने की बेवकूफी !"

सीटियाँ सी बज रही थी अजीत के कानो में !

 


वो समझ सकता था -- सचमुच उसके बाद निशा खुद को हर्षरण से बचा नही सकेगी !

तो क्या करे वो ?

क्या करे ? अजीत फ़ैसला नही कर पा रहा था !

हर्षरण ने उसकी मानसिक अवस्था रीड की ! कहा --" जल्दी फ़ैसला कर दोस्त क्यूंकी मेरे जाते ही यहाँ तुझे गिरफ्तार करने वाले आ धमकेंगे !"

अजीत की ज़ुबान तालू से जा चिपकी !

" क्या कहता है ?" हर्षरण ने ज़हरीली मुस्कान के साथ कहा --" जाउ ?"

अजीत ने जवाब नही दिया , उसकी मुत्ठियाँ ऑर दाँत भिंचे हुए थे !

हर्षरण ने फिर से कहा --" जवाब दे वरना मैं समझूंगा तुझे जैल जाना मंजूर नही है !"

अजीत ने गर्दन झुका ली !

"गुड !" हर्षरण झूम उठा !

निशा चिल्लाई --" अजीत !"

" स........सॉरी ! सोरररयययययी निशा !" दाँत भींच कर कहने के बाद अजीत तेज कदमो के साथ ड्रॉयिंग रूम से बाहर चला गया ! बुरी तरह घबराई रोती हुई निशा 'अजीत ..... अजीत ' कहती उसके पीछे लपकी मगर अपने नज़दीक से गुज़रते वक़्त हर्षरण ने उसका बाजू पकड़ लिया !

झटका दिया ऑर वो हर्षरण के उपेर जा गिरी !

हर्षरण ने उसे बाहों में भरते हुए कहा -- " बात उसकी समझ में आ गई मगर्र्ररर तेरी समझ में शायद अब तक नही आई है ! समझदारी से भरपूर फ़ैसला वोही है जो उसने किया !"

" कामीने ! कुत्ते ! जॅलील ! " निशा उसके बँदनो में छटपटाती चीखी -- " कैसा आदमी है सर्क्यूट हाउस में तूने मुझे बेहन तक कहा था !"

" ना कहता तो वो डिन्नर पर बुलाता ? "

" तो क्या तू अपनी बेहन साथ सोएगा ?"

" मेरे हज़ार बार कहने से जब कोई औरत मेरी बीवी नही बन सकती तो एक बार कहने से बेहन कैसे बन सकती है !"

" छोड़ ! छोड़ मुझे ! "

" यह ले !" हर्षरण ने उसे छोड़ते हुए कहा -" हज़ार बार कह चुका हूँ ज़बरदस्ती मेरा सिद्धांत नही है !"

निशा ने दरवाज़े की तरफ लपकना चाहा !

हर्षरण ने उसका बाज़ू पकड़ कर रोकते हुए कहा -- " बस एक बात सुनती जा !"

आँखों से उस पर बिजलियाँ गिराती निशा ने दाँत पीसे !

" अपने पति का भला चाहती है कि बुरा ?"

निशा उसे उसी तरह घूरती रही !

" तूने कहा था तू एक पतिव्रता भारतीय नारी है ! पतिव्रता नारी वो ..... जो हर हॉल में अपने पति का भला चाहे ! उसकी भलाई के अपना सब कुछ कुर्बान कर दे ओर तेरे पति की भलाई किस मे है ..... तुझे बता चुका हूँ !"

निशा के मूँह से बोल ना फुट सका !

हर्षरण ने लोहा गरम देख कर एक ऑर चोट की --- " बात अगर इस चारदीवारी से बाहर निकली तो सोच क्या होगा ? क्या कहेंगे लोग ? क्या इज़्ज़त रह जाएगी तेरे पति की ? शोर मचा कर , हाथ पैर पटक कर क्या तू अपने पति की इज़्ज़त का कचरा नही कर देगी ?"

बात निशा के समझ आने लगी !

हर्षरण ने उसे बाहों में भरते हुए कहा -- " बड़ी बावली है तू ! अररी बिगड़ेगा ही क्या इस से ? आज की दुनिया में कई जोड़े इस राह पर चलकर शान की जिंदगी बसर कर रहे हैं !"

" अर्रे रूको भी !" नशीली आँखों में नशा भरते हुए बोली निशा -- " कुछ पीने का इंतज़ाम करती हूँ !" कहते हुए रसोई में घुस गयी !

हर्षरण खुशी से झूम उठा !

कि तभी ............ निशा की दर्द भरी चीख गूँजी !

हर्षरण के तो देख कर छक्के छूट गये ! रसोई के फर्श पर खून ही खून फैला हुआ था!

अजीत भी दौड़ कर रसोई में पहुँचा पर हर्षरण तो निशा के हाथ में खून से साना चाकू देख कर कुत्ते की तरह दुम दबा कर भाग चुका था! 'आख़िर जो कुछ किया सिर्फ़ निशा को पाने के लिए ही तो किया था !

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हॅरी ने रुमाल पर उभरे ब्राउन कलर के अक्षरों को पढ़ने की कोशिश की, परन्तु कामयाब नही होसका !

इतना तक नही जान सका वो अक्षर कॉन - सी भाषा के है !

धीरे धीरे करके सारे रुमाल को लौ ( लाइटर की आग) के उपेर घमा दिया ! रुमाल पर किसी अंजानी भाषा के अक्षरों के बीच एक नक्शा बना नज़र आया !

नक्शे में एक जोकर भी बना हुआ था !

हॅरी समझ गया यक़ीनन रुमाल पर गुप्त संदेश अंकित है , मगर क्या ? यह वो लाख दिमाग़ घूमने के बावजूद ना समझ सका ! लाइटर को ऑफ कर के पहले ही जेब के हवाले कर चुका था ! रुमाल को भी जेब में डाला!

उसके दिमाग़ में कुछ सवाल घूम रहे थे ! जैसे -- कॉन था वो बूढ़ा ? कहाँ चला गया ? क्या लिखा था रुमाल में ? बूढ़े ने कहा था --" यह देश की आमानत है ! क्या उसने सच कहा था !

उसे लगा -- हर सवाल का जवाब वहाँ मिल सकता है जहाँ बूढ़े ने रुमाल को पहुँचाने के लिए कहा था ! क्या पता बताया था उसने ?

हॅरी ने अपने दिमाग़ को खंगाला ! पता याद आया -- बांग्ला नंबर 64 आर , मोंगा स्ट्रीट !

करेक्ट ! यही अड्रेस था !

वो फ़ौरन बाथरूम का दरवाज़ा खोल बाहर निकल आया !

नज़र क्रिस्टी पर पड़ी !

वो जहाँ की तन्हा खड़ी थी !

हॅरी के हलक से गुर्राहट सी निकली --" तुम अभी तक यहीं हो ?"

क्रिस्टी चुप चाप खड़ी रही !

" मैने तुमसे कहा था ना, जाओ यहाँ से ! कल मिलेंगे ! " हॅरी ने रूखे स्वर में कहा !

क्रिस्टी चीख ही पड़ी --" कान खोल कर सुनो , अब मैं तुमसे कभी मिलने वाली नही हूँ ! "

" ओके ! मत मिलना ! अब जाओ !" वो लापरवाही से कहकर आगे बढ़ गया !

हॅरी के जवाब ने क्रिस्टी को पूरी तरह तोड़ दिया ! वो साधारण सी लड़की भला कैसे जान सकती थी कि लड़के के दिमाग़ में अब केवल ऑर केवल रुमाल का राज़ जानने का भूत सवार है !

हॅरी बाहर निकला ! पार्किंग में पहुँचा ! वहाँ खड़ी अपनी मोटर साइकल निकाली ! किक मारी ऑर अगले कुछ ही मिनटों बाद मोटर साइकल मोंगा स्ट्रीट की तरफ उड़ी चली जा रही थी ! बागला नंबर आर 64 ढूँढने मे कोई ख़ास दिक्कत पेश नही आई !

हॅरी ने बाइक गार्ड के पास रोकी ऑर पूछा -- " इस बंगले के मालिक का नाम क्या है ?"

" आप हॅरी है क्या ?" गार्ड ने उल्टा सवाल किया !

ऑर ! यह सवाल ही ऐसा था जिसने हॅरी की खोपड़ी घुमा कर रख दी !

मतलब सॉफ था -- उसके यहाँ आगमन की आपेक्षा पहले ही से की जा रही थी !

हॅरी ने पूछा -- " तुम मेरा नाम कैसे जानते हो ?"

" ओह यानी आप हॅरी साहब हे हैं ! आइए ! आइए ! हिंगले साहब आपका ही इंतज़ार कर रहे हैं !" गेट खोलते हुए गार्ड बोला !

"तुम्हे कैसे मालूम था मैं यहाँ आने वाला हूँ ?" हॅरी ने पूछा !

" हिंगले साहब ने कहा था -- एक खूबसूरत से साहब मोटेर साइकल पर आने वाले है ! अगर वो अपना नाम हॅरी बताए तो उन्हें सीधा उन के पास ले आऊ !"

" यह बात उन्होने कितनी देर पहले बताई थी ?" हॅरी ने पूछा!

" बस आपके आने से 5मिंट पहले !"

अज़ीब उलझन का शिकार होगया हॅरी ! हिंगले कॉन है ऑर उसे कैसे मेरे आने की जानकारी ! इन सब सवालों के जवाब हिंगले से मिल के ही पता चलने थे !

 


गार्ड मेन गेट का दरवाज़ा खोलते हुए बोला -- " साहब अब आप अंदर जा कर मिल सकते हैं !"

दरवाज़े पार कर हॅरी एक लंबे चौड़े हाल में पहुँचा ! चारों तरफ नज़रें घुमाई ! खूबसूरत फर्निचर से सजे हॉल में अज़ीब सा सन्नाटा था ! जब समझ ना सका किस तरफ बढ़ना चाहिए तो आवाज़ लगाई -- " मिस्टर हिंगले !"

" हम तुम्हारी आवाज़ सुन रहे हैं हॅरी !" यह आवाज़ सारे हॉल मे गूँजी !

" आप कहाँ है ?"

" तुम्हारे राइट साइड एक दरवाज़ा है !" आवाज़ ने कहा -- " उसे पार कर के अंदर आ जाओ !"

हॅरी ने राइट साइड मोजूद दरवाज़े को देखने से पहले एक रोशनदान पर मोजूद उस माइक को भी देख लिया था जिस-से आवाज़ निकल रही थी ऑर एक छोटे से कमरे पर भी नज़र पड़ गयी थी !

वो समझ गया -- उससे क्लोज़-सर्क्यूट टी.वी पर देखा जा रहा है !

वो दरवाज़े की तरफ बढ़ा ! दरवाज़ा पार किया ऑर........ वो पहला पल था जब उसके दिमाग़ में बड़ी तेज़ी से ख्याल कोंधा --" शायद मैं किसी जाल में फँस गया हूँ !"

कारण था -- उस दरवाज़े का बंद हो जाना जिस-से अंदर आया था !

उसने बड़ी तेज़ी से घूम कर दरवाज़े की तरफ देखा --- वो किसी तिलिस्मी दरवाज़े की तरफ दीवार में फिक्स हो चुका था !

अब उसने तेज़ी से अपने चारों तरफ निगाह मारी !

स्टील की दीवारों का बना वो एक गोल कमरा था ! कहीं किसी खिड़की या दरवाज़े की बात ही दूर , चूहे के बिल जितना सुराख तक नज़र नही आया ! हॅरी ने खुद को एक गोल स्टील के कमरे में क़ैद पाया !

" यह सब क्या है मिसटर हिंगले ?" उसने कई बार उँची आवाज़ में कहा --" क्या मुझे यहाँ क़ैद किया गया है ?"

जवाब में कोई आवाज़ ना उभरी ! एक बार नही कई बार वो ये सब दोहराता रहा , मगर उसकी ही आवाज़ गूँज के रह जाती !

अब हॅरी पक्के तौर पर समझ गया था उसे किसी जाल में उलझाया गया है ! वो लड़का चीज़ ही ऐसी था कि किसी भी जाल में उलझ कर घबराता नही था !

हां कुछ सवाल ज़रूर तैर रहे थे उसके दिमाग़ में ! 'कॉन है फँसाने वाला ? उसका मक़सद क्या है ? आज कल तो वो किसी मिशन पर काम नही कर रहा फिर यह सब क्या हो रहा है !

हार कर हॅरी दीवार के साथ पीठ लगा कर फर्श पर बैठ गया !

कुछ देर बाद हल्की सी घाड़ग्ढाहट की आवाज़ गूँजी !

हॅरी उच्छल कर खड़ा होगया !

ओर.......... फिर उस स्टील के फर्श के सेंटर वाले स्थान को उसने इस तरह फटते देखा जैसे धरती फट रही हो !

हॅरी दिलचस्प निगाहों से जादू के उस खेल को देखता रहा ! एक टेबल प्रकट हुआ पहले फिर दो रिवॉल्विंग चेर्स ऑर...............

" तुम.....तुम ?" हॅरी के हलक से चीख सी निकल गयी !

मारे हैरत के बुरा हाल होगया उसका !

आँखों में ही नही , चेहरे के जर्रे-जर्रे पर हैरानी के भाव नज़र आ रहे थे !

उसकी यह हालत उन दो शातिर हस्तियों को देख कर हुई थी जो चेयर्स पर बैठे थे !

"तुम !" हॅरी के मूँह से एक बार फिर हैरत में डूबा स्वर निकला --" तुम यहाँ ?"

" जी !" उनमें से एक ने कहा --" हम यहाँ !"

"यहाँ क्या कर रहे हो तुम ?" हॅरी ने गुर्र्रा कर पूछा !

एक ने दूसरे से कहा --" तुगलक भाई !"

" हां नुसरत बेहन !" दूसरा बोला !

खुदा ने छ्टॉंकी नंबर2 (हॅरी) के थोबडे पर आँखों की जगह बॉटन फिट कर दिए है !" तुगलक बोला!

" तूने कैसे जाना ?"

" जनाब पूछ रहे हैं हम यहाँ क्या कर रहे हैं ! अब तुम्ही सोचो --- इनके थोबडे पर आँखें होती तो क्या यह ही पूछते ? क्या नज़र नही आ रहा होता इन्हें कि हम कुर्सियो पर आराम फरमा रहे है ?" तुगलक अपनी टोन में बोला!

 


" यह मतलब नही था छ्टॅंकी नॅंबर2 का !"

"ऑर क्या मतलब था ?"

"इनका मतलब था -- हम यानी पाकिस्तान के महान जासूस इनके देश यानी अमेरिका में क्या कर रहे हैं ?"

"क्यूँ मियाँ छ्टॉंकी नंबर2 ?". नुसरत ने हॅरी से पूछा -- " क्या इस जामुन की औलाद का आइडिया दरुस्त है ? क्या यह ही मतलब था तुम्हारा ?"

"करेक्ट ! यह ही जानना चाहता हूँ मैं !"

नुसरत ने कहा -- " यह जानने से पहले यह बताओ -- तिगड़म कैसी लगी हमारी ?"

"तिगड़म ?"

" जिसके तहत तुमें यहाँ हाज़िर नाज़िर किया गया है !"

" यानी वो बूढ़ा , वो रुमाल ! सब तुम्हारी चालें थी ?"

"समझने के लिए शुक्रिया , मगर हमारी आइस क्रीम को पूरी तरह नही समझ पाए ! वो गुंडे भी हमारे ही गुर्गे थे जिनकी तुमने ठुकाई की ऑर जो इस वक़्त हवालात में हैं !"

"रुमाल पर जो लिखा था ?"

" जो लिखा , हमने लिखा ऑर जब हमें ही नही मालूम वो कॉन सी भाषा है , उसमें क्या लिखा है तो भला तुम जैसे घोन्चु को क्या समझ आता ! हां , उस पर बने एक जोकर का मतलब ज़रूर पता है हमें ! असल में तुम्हारी पिक्चर बनाने की कोशिश की थी !"

हॅरी का गुस्से से बुरा हाल था -- " मतलब सब मुझे जहाँ लाने के लिए किया गया !"

"हमें मालूम है तुम समझदार हो !"

"खैर वो हो गया जो तुम चाहते थे अब बताओ मुझसे क्या चाहते हो -- क्यूँ किया गया यह सब ?" हॅरी बोला !

"तुम्हारी मोहिनी सूरत को नज़दीक से देखने के लिए ! असल मे. यह सूरत है ही इतनी खूबसूरत कि........ !"

"अगर उल्टी सीधी बातें करने की जगह तुम सीधे सीधे बताओ मुझसे क्या चाहते हो तो तुम्हारी सेहत के लिए शायद बेहतर होगा !......... वरना ........ !"

"वरना .....?"

"मेरे हाथ - पावं हिलते ही पता लग जाएगा मुझे यहाँ बुला कर तुमने अपने जीवन की सबसे बढ़ी भूल की है !" हॅरी ताव में आता हुआ बोला !

___________ कंटिन्यू ......

इंट्रो अबाउट पाकिस्तानी जासूस सो स्टोरी को ईज़िली एंजाय कर सकें

1नुसरत

2तुगलक

यह दोनो पाकिस्तान के बहुत ही ख़तरनाक जासूस जो बड़े बड़े जासूसों को उल जलूल बातों में लगा कर ऐसी पटकनी देते हैं बड़े से बड़ा जासूस इनकी उत्पाटांग बातों में फँस कर मात खा जाता है. दोनो हमेशा एक साथ होते हैं. एक दूसरे को भाई बेहन बोलना इनका तकिया कलाम है.. इनकी बातों का अर्थ कम निकलता है बस दुश्मन को उलझाने से ही इनको मतलब...

"मेरे हाथ - पावं हिलते ही पता लग जाएगा मुझे यहाँ बुला कर तुमने अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल की है !" हॅरी ताव में आता हुआ बोला !

"यही -- बिल्कुल यह ही बात कही थी मैने इस चिमटे की औलाद से !" नुसरत ने कहा -- " अच्छी तरह समझा दिया था कि छ्टॉंकी नंबर2 छ्टॉंकी नंबर1 यानी विकास से भी कहीं ख़तरनाक है हस्ती को कहते है ! एक बार हॅरी यहाँ आगये तो मारते मारते भूसा भर देंगे हमारी खाल में , मगर यह (तुगलक) नही माना ! 'आख़िर बुला ही लिया तुम्हे यहाँ ...... अब तू ही भुगत बेटे !" अंतिम शब्दों के साथ ही नुसरत ने चेयर तुगलक की तरफ घूमा ली !

 
"यह तो गद्दारी है जामुन के !" तुगलक बोला --" इन्हें यहाँ बुलाने की आइस क्रीम में तू भी तो शामिल था ऑर अब .... पल्ला झाड़ एक तरफ होना चाहता है ! यह नही चलेगा !

" मैं जानता हूँ !" नुसरत से पहले हॅरी ने कहा --" सामने वाले सक्श के बारे में आपस में बातें करके तुम उसे परेशान करते हो, कम से कम मैं तुम्हारी इस घिसी पिटी पुरानी चाल में नही आने वाला !

"अब बोल बेटा..... कैसे निपटेगा इस छ्टॉंकी नंबर2 से ?" नुसरत तुगलक से बोला --" यह तेरी उस चाल को भी समझता है जिसे तू तरूप का इक्का समझ रहा था !"

" सीधी तरह जवाब दो !" हॅरी के हलक से गुर्राहट निकली ---" मेरे देश में तुम क्या कर रहे हो , क्यूँ रुमाल के चक्कर में उलझा कर यहाँ बुलाया गया !"

" अज्जि ठैन्गा !" तुगलक ने उसे अंगूठा दिखाया ---" यही बता दिया तो हमारे पास बचेगा ही क्या छुपाने को ? "

" मैं बता सकता हूँ सर !" कहने के साथ नुसरत ने इस तरह हाथ हवा में उठा दिया जिस तरह क्लास में बैठा कोई स्टूडेंट टीचर के स्वाल पर जवाब देने के लिए हाथ उठाता है !

" आए !" तुगलक नुसरत पर गुर्राया -- " खबर दार जो मूँह से एक लफ़्ज भी निकाला !"

" क्यूँ ?" एकाएक नुसरत ने आँखें निकाली --" तू क्या कर लेगा मेरा ?"

" तो यह ले ! देख मैं क्या कर सकता हूँ !" कहने के साथ बहुत ही फुर्ती से उच्छल कर नुसरत ने तुगलक के गाल पर इतना जोरदार चाँटा मारा कि तुगलक चेयर सहित स्टील के फर्श पर जा गिरा !

नुसरत हॅरी से बोला --" देखा हॅरी साहब , साला होगया ना ढेर , बड़ा तीस मार ख़ान बन रहा था !"

हॅरी जानता था यह सारी टेक्नीक्स वो सामने वाले को दवास्त करने के लिए इस्तेमाल करते है !

नुसरत की बात पर ज़रा भी ध्यान दिए बगैर उसने नुसरत पर जंप लगा दी !

नुसरत को अपने साथ लिए स्टील के फर्श पर जा गिरा हॅरी !

पीछे खड़ा तुगलक कह रहा था " ऑर कर बेटा ऑर कर छ्टॉंकी नंबर2 (हॅरी) की चमचागिरी ! मुझसे पहले यह तेरा भुर्ता बनाएगा !

" यह तो फौल है हॅरी साहब !" हॅरी के पंजे मे फँसे नुसरत ने कहा ---" मैं तो आपकी तरफ हूँ ! सब कुछ बताने को तैयार हूँ ! यह भी कि हमने आपको यहाँ क्यूँ बुलाया है !

" तो बक !" हॅरी के हाथ उसकी गर्दन पर थे !

" नही ! मैं इसे राज़ की बात नही बताने दूँगा !" कहने के साथ ही तुगलक ने हॅरी पर नही नुसरत पर जंप लगाई थी , मगर हॅरी जानता था --- उन दोनो का मक़सद सिर्फ़ एक ही है हॅरी पर काबू पाना !

हॅरी ने फुर्ती से एक घूँसा तुगलक के ज़बड़े पर रसीद कर दिया !

इस तरह !

हॅरी एक साथ दोनो से भिड़ गया !

मगर जल्द ही अहसास होगया कि ऐसा करके उसने भयंकर भूल कर दी है !!!

वो दोनो चिछड़ी की तरह उस-से चिपक गये थे !

फाइटिंग के दरम्यान भी उन दोनो की ज़ुबान रुकी नही ! बराबर कुछ ना कुछ बोलते रहे !

एक हॅरी की तारीफ़ कर रहा था दूसरा उसका विरोध कर रहा था !

परन्तु हमले दोनो बराबर कर रहे थे!

हॅरी ने उनके बारे में सुना बहुत कुछ था मगर उनके बीच घिरने का पहला मोका था !

जल्दी ही हॅरी को ईलम होगया -- वो दोनो महाशातिर है !

बिजली की गति से चल रहे नुसरत -- तुगलक के हाथ पैर तभी रुके जब हॅरी बेहोश होगया !

 


इधर राज नगर मे.........................

कपड़ों के नाम पर इस वक़्त विजय के जिस्म पर सिर्फ़ एक अंडरवेर था ऑर वो लाल सुर्ख ! लंगोट जैसा ! बाकी संपूर्ण जिस्म नग्न था ऑर इस वक़्त उसे कोई भी एक नज़र में देखकर कह सकता था कि वो सरसों के तेल से भरे ड्रम में डुबकी लगाकर आया है !

तेल के अलावा उसके बालिश्ट जिस्म पर यदि कोई दूसरी चीज़ नज़र आ रही थी तो वो था पसीना ! ढेर सारा पसीना !

कमरे की अज़ीब हालत बना रखी थी उसने -- सोफा ऑर सेंटर टेबल एक दीवार के सहारे अस्त व्यस्त पड़े थे !

यानी कमरा खाली !

एक दीवार के साथ लड़ी की तरह खड़ा वो आँख बंद किए बुदबुदा रहा था !

" या बजरंगवली ! तोड़ दुश्मन की नली ! खिला दे मटर की फली ! भटक रहा हूँ गली गली ! या बजरंगवाली !"

इस नारे के साथ ही वो बंदूक से छोटी गोली की तरह ठीक अपने सामने वाली दीवार की तरफ दौड़ा !

दीवार से तीन गज इधेर ही उसका जिस्म हवा में उछला ऑर दोनो पैरों की फ्लाइयिंग किक एक साथ दीवार पर पड़ी !

दीवार के जिस हिस्से पर उसके तलवे टकराए थे , वो फर्श से करीब 9फीट उपेर था ! फ्लाइयिंग किक के तुरंत बाद विजय का जिस्म ठीक किसी कबूतर की तरह हवा में कलाबाज़ियाँ खाया ऑर------

"धम्म्म" ! से फर्श पर आ खड़ा हुआ !

कमरे के बीचो बीच खड़ा वो जलते नेत्रों से उस दीवार को घूर रहा था जिस पर फ्लाइयिंग किक मारी थी , बड़बड़ाते हुए बोला --" नही हटती साली ?"

जवाब में कोई आवाज़ ना गूँजी !

पर विजय के चेहरे पर ऐसे भाव थे , जैसे वो दीवार दुबारा बोला गया वाकई सुन रहा था, जवाब में बोला --- " अच्छा यह बात है , अगर तू अड़ियल है तो हम भी पूरे सड़ियल हैं ! तुझे भी अगर हम तेरी जगह से ना हिला दे तो हमारा नाम विजय ठाकुर 420 नही ..... या बजरंगवाली ! तोड़ दुश्मन की नली !"

अपने ,पुराने नारे के साथ वो पहले की तरह दीवार से सट कर खड़ा होगया !

फिर दौड़ा , दीवार पर फ्लाइयिंग किक ........ !

वेद प्रकाश शर्मा के जो रीडर हैं वो ज़रूर जानते होंगे यह अज़ीबो ग़रीब कोशिश करने वाला यह अनोखा किरदार कॉन है, पर न्यू रीडर ज़रूर सोच में पड़ गये होंगे कि दीवार को सरकाने वाला 'आख़िर करना क्या चाहता है ऑर कॉन है !

सम्मरी अबाउट विजय आंड विकास!

राजनगर पुलिस के डी.आइ.जी ठाकुर निर्भय सिंग ! सब लोग उन्हें राजा साहब कहते है ऑर विजय इन्ही ठाकुर साहब का बेटा है !

ठाकुर साहब की नज़रों में विजय एक आवारा, बदचलन, बेशरम , ऑर अयाश लड़का है , इसीलिए उन्होने उसे घर से निकाल रखा है !

मगर.....

हक़ीक़त ठीक इसके उलट थी !

भारत की सरबोच्च जासूसी संस्था का नाम है ----

इंडियन सीक्रेट सर्विस !

अपने जिस लड़के को ठाकुर साहब बेकार समझते है वो दरअसल किसी ज़माने में

इंडियन सीक्रेट सर्विस का चीफ़ हुआ करता था ! उन दिनो फील्ड वर्क बढ़ गया ऑर विजय को ऑफीस में बंद रहने के स्थान पर देश के लिए खतरों से झूझना पसंद था , सो चीफ़ की डेसिग्नेशन से रिज़ाइन देकर वो सिंपल एजेंट बन गया ऑर चीफ़ खुद के कज़िन भाई ब्लॅक बॉय को बना दिया !

देश की सरबोच्च जासूसी संस्था की पहली ऑर कठोरतम शर्त यह है कि वो कभी किसी को, किसी हालत में यह पता नही लगने देगा कि वो सीक्रेट एजेंट है ! यदि ऐसा होता है तो अपना राज़ जान लेने वाले को शूट कर देगा!

 
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