• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

A Horror Novel - स्वाहा complete

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
S

StoryPublisher

Guest
A Horror Novel - स्वाहा

हवाएं चींख रही थीं।

मूसलाधार बारिश जारी थी । आकाश से धरती तक मानो पानी की चादर सी तन गई थी। रात के दौ बजे थे ।

भयानक अन्धेरी रात. ..गरजतै बादल… कडकडाती बिजली... .बारिश के शोर और दरवाजे खिड़कियां बजाती हवा ने वातावरण को जैसे प्रेत--ग्रस्त बना रखा था।

ऐसै में उसने वह ख्वाब फिर देख लिया था ।

बडा ही अजीब ख्वाब था । भयावह, खौफजदा और सहमा देने वाला और इस ख्वाब को वह अब निरन्तर देखने लगी थी। हर दूसरी तीसरी रात वही ख्वाब देखती भी वह । आज भी जव उसकी आंख खुली तो उसके शरोर में कम्पन था। वह होले होले कांप रही थी ।

दिल बैठा जा रहा था । कंठ में कांटे से पड़ रहे थे । दिमाग जैसे ठस्स होकर रह गया था ।

पहले तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि उसकी आंख खुल गई हैं या यह अभी तक ख्वाब देख रही है।

वह अभी एक घंटा पहले ही तो सोई थी । आज शाम से उसकी तबियत ठीक न थी । दिल पर कुछ बोझ सा था ।

आज उससे ठीक तरह से खाना भी नहीं खाया गया था। खाना खाने के बाद वह चहलकदमी के लिए जरुर निकलती थी । आज़ वह टहलने भी नहीं निकली थी I वस आधा अधूरा खाना खाकर ही अपने कमरे में आ गई थी ।

फिर कुछ देर वह टी वी के विभिन्न चैनल घुमाती रही ।

एक चेनल पर इंगलिश फित्म आ रही था l वह देखने बैठ गई। फिल्म लगभग बारह बजे खत्म हुई । उसने टी वी आँफ कर दिया ।

फिल्म सस्पैन्स बाली थी ।

उसके कई सीन बार बार उसकी निगाहों में घूम रहे थे । वह यूं ही कमरे से निकलकर गैलरी में आ गई और बाहर का नजारा करने लगी।

तभी निकट के एक पेड से एक परिन्दा उडा व तेजी से उसके सिर के पास से गुजर गया ।

वह एकदम सहम गई । वह काफी बड़ा पक्षी था-चील जितना वडा होगा ।

उसकी समझ में न आया कि रात के बारह बजे आखिर उसको उडने की जरूरत क्यों पेश आई।

यही लगा था उसे जैसे वह परिन्दा उसे ही गैलरी मै देखकर उसकी तरफ लपका था ।

इस ख्याल ने उसे सहमा दिया। वह फौरन कमरे में आ गई।

दरबाजा अच्छी तरह से वन्द किया और बिस्तर पर लेट गई ।

नींद आंखों से कोसों दूर थी ।

एक तो रहस्यपूर्ण, सस्पैन्स फिल्म का असर, फिर उस पक्षी का बहुत ही पास से चेहरे को हवा देते हुए गुजर जाना।

उसने सोचा कि वह नीचे जाकर सो जाए या फिर नीचे से किसी को अपने पास वुला ले। लेकिन ये दोंनो ही ख्याल खुद उसे उचित्त न लगे।
 
कैसेटों के रैक से उसने एक केसेट चुना और म्यूजिक सुनने लगी ।।

ध्यान बटानै' को उसे यहीँ सूझा था।

धीमे सगीत्त' के उसके इस अपनी पंसन्द के केसेट ने धीरे-धीरे उस पर असर करना शुरू किया... उसे नींद आने लगी । उसने लेटे-लेटे ही रिमोट-कंट्रोल से कैसेट प्लेयर ऑफ किया और करवट लेकर आखें बन्द कर ली l

फिर अचानक ही उसे ”परों" की फड़फड़ाहट सुनाई दी । उसे ऐसा महसूस हुआ जेसे कोई परिन्दा उसके सिर पर से गुजर गया हो ।

वह तत्काल उठकर बैठ गई । कमरे की लाईट जल रही थी।

जब से रहस्यपूर्ण-भयावह रब्वाबों का यह सिलसिला शुरू हुआ था-वह कमरे मे लाईट जलाकर सोती थ्री I

दरवाजा भी बन्द था। किसी परिंन्दे का उसके सिर पर से गुजर जाने का सवाल ही नहीं पैदा होता था। यह महज उसका भ्रम था ।

अपने इस ख्याल पर उसे शर्मिन्दगी महसूस हुई कि वह दिन प्रतिदिन ऐसी डरपोक क्यों होती जा रही थी ।

रिमोट-कंट्रोल उठाकर उसने केसेट-प्लेयर फिर ओन कर दिया । लोरी देता हुआ संगीत फिर से कमरे में सुनाई देने लगा। सगीत' सुनते-सुनते अन्नत: वह नींद के आगोश में चली गई ।

और फिर… !!

वह अभी लगभग एक घटा ही सोई होगी, उस डरावने ख्वाब ने उसकी र्नीद उडा दी।

जब वह सोईं थी तो दूर तक बारिश के आसार न थे । आख' खुली तो वातावरण का रग ही कुछ और था।

कुछ देर तक तो वह समझ ही नहीं पाई कि वह अभी ख्वाब ही देख रही है या जाग गई है।

कही दूर बादलों की गर्जना सुनाई दी ..अचानक ही बिजली बड़े वेग से चमकी। और बाहर घमाके से होने लगे । वह घबराकर उठ बैठी I

केसेट लेयर अभी तक चालू था। उसके हाथ-पाव' काप रहे थे। दिल किसी पत्ते की तरह लर्ज रहा था। उसमें इतनी हिम्मत भी न थी कि वह रिमोट उठाकर केसेट-प्लेयर आँफ कर दे ।

फिर कुछ देर बाद उसके हवास सयंत हुए. ...उसने खुद को सम्भाल लिया... ,विवेक काम करने लगा तो उसने साइड टेबिल मे रखै जग से पानी निकाला और गटागट करके पी गई। कुछ इस तरह जैसे सदियों से प्यासी हो । सूखा गला तर हुआ । सज्ञा'-शून्य जहन खुला तो उसे वह ख्वाब याद आया-जिसकी वजह से उसकी आख खुली थी।

यह विचित्र अनूठा सपना वह कई माह से देख रही थी। शुरु में यह ख्वाब महीने दो महीने के वाद नजर आता था। फिर धीरे धीरे यह अन्तराल का होने लगा । सप्ताह...दस दिन के बाद...अब तो यह ख्वाब लगभग हर रोज ही नजर आने लगा था।

हां, पिछले पाच दिनो से वह इस ख्वाब को निरन्तर देख रही थी ।

यह देखती कि अंधेरी रात है, कही दूर सै भेडियों की गुर्राहट की आवाजें आ रही है। फिर सहसा ही भयावह-अंधेरी रात.. .एक प्रकाशमान दुबल दिन में बदल जाती । अब उसे दूर क्षितिज तक फैला एक रेगिस्तान दिखाई देता है। दुर दूर तक रेत ही रेत उडती, दिखाई देती । इस रेगिस्तान मे वह स्वय को भटकता महसूस करती है । नंगे पाव गर्म रेत पर चलते-चलते... अचानक ही एक झोपडी उसके सामने आ जाती। इस झोपडी क्री छत पर उसे एक उल्लू बैठा दिखाई देता और झोपडी के दरवाजे पर कुण्डली मारे एक सांप--काले रग का फन उठाए अपनी जिव्हा लपलपाता नजर आता है।

इस भयावह दृश्य को देखकर वह भागने लगती है तो पीछे सै आवाज आती

" डरा मत वहन...आओं, झोंपडी के भीतर आ जाओ. .. !!”

यह किसी मर्द की आवाज होती । पुकारने वाले की आवाज से एक पीडा, एक व्यथा का-सा आभास होता-जेसे बुलाने वाता किसी कष्ट का शिकार हो और अपनी मदद के लिए किसी को अंदर बुलाना चाहता हो ।

. इस आबाज पर वह पलटकर देखती तो पुकारने वाला तो दिखाई न देत्ता-अलवत्ता वह खौफनाक काला साप उसक्री तरफ झपटता है और वड चीख मारकर रोने लगतीं है I

और तभी घबराकर उसकी आख खुल जाती।

इस वक्त भी उसने यही ख्वबाब देखा था ।

तपता रेगिस्तान.. ,गोल झोपडी… की छत पर बैठा उल्लू...साप और अंदर से आती वह दर्दभरी आबाज--- “डरों मत वहन...आओ, झोपडी, के भीतर आ जाओ।"

उसने अपने दिमाग पर बहुत जोर डाला था कि वह इस आवाज को पहचान जाए, लेकिन वह पहचान न सकी थी, यह आवाज उसके लिए निदात अजनबी थी । उसके किसी प्रियजन. किसी सगे-सम्बन्धी या जानने वाले की आवाज नहीं थी।

वह एक निडर लडकी थी । लेकिन इस ख्वाब के खौफ ने उसकी निर्भयता व दुस्साहस में दरारें डालना शुरू कर दी थी । अब वह सोचने लगी थी कि कल से वह नीचे सोयेगी या फिर अपने साथ कमरे में किसी को बुलाकर सुंलाएगी।

लेकिन सुलाएगी किसको?

ले देकर माया ही तो थी जो उसके साथ सो सकती थी या फिर गंगा मोसी थी । मगर मौसी ऊपर नहीं आ सकती थी। वह गठिया की मरीज थी...सीढिया चढना, उसके बस की बात न थी। बस यही हो सकता था कि वह खुद ही उनके कमरे में जा सोया करे ।

उसने अभी तक अपना यह ख्वाब किसी क्रो नहीं बताया था...गगा मौसी की भी नहीं।

लेकिन अब उसमे हिम्मत न रही थी। उसने तय कर लिया था वह सुबह होते ही गगा मोसी को अपने इस सपने के बारे में जरूर बताएगी।

यूं तौ अभी उसकी उम्र खैर से ख्वाब ही देखने बाली थी ।
 
सुहाने और मीठे ख्वाब

इस उम्र में लड़की ऐसे रहस्यमय व भयभीत करने वाले ख्वाब कहा देखती हैं? उन्हें तो हर तरफ घोडे पर सवार एक सुदर्शन राजकुमार ही नजर आता है।

वे अपनी पसन्द के अनुसार अपने-अपने 'आईडियल के सपने देखती हैं। वड कौन होगा? कहा से आयेगा? कब आएगा?

लडकिया ही क्या ख्वाब तो सभी देखते हैँ I क्या बूढे? क्या बच्चे? क्या जवान? अपनी-अपनी अतृप्त ख्वाहिशों को पूरा होते देखने के लिए अपनी उम्र का आधा हिस्सा इंसान आखें बंद करके गुजार देता है । यह वन्द आखें कितनी पुरसुकून हैं कार..आमद है-- यह वात कोई उन लोगों से पूछे जो करबटें बदलते खुली आखों से गुजार देते है ।

साथ ही में नींद और खवाब ऊपर वाले का बरदान है। अगर इन्सान से उसकी नींद उसके ख्वाब छीन लिए जाए तौ यह जीवन नर्क बन जाए। कैसा यात्तनामय हो जाये ।

ये ख्वाब, गरीब को अमीर बनाते हैँ और कुवारो को विवाहिता यह तो प्रभु कृपा है किं सपनों पर कोई अकुश नहीं हैँ-इनक्री कोई सीमा नहीं है I इसान कैसे-सै ख्वाब देखता है....अगर यही ख्वाब यातनामय हौ जाए तो कैसे कैसे मासूम कैसी कैसी सजा पाये?

उसे दिखाई देने बाला यह ख्वाब उसके लिए किसी सजा से कम नहीं था।

वह सोच-सोच कर हलकान हुईं जा रही थी किं आखिह उसे यह सजा क्यो मिल रही है । यह ख्वाब उसपर, उसकी नींद पर, क्यो हावी कर दिया गया है। इस दिल दहला देने वाले ख्वाब में सोचते सोचते अतत: उसे नीद आ गई ।

और फिर... ।

प्रात: अगर नौकरानी माया उसे न उठाती तो वह न जाने कब तक सोती रहती ।

" बीबी ! क्या इरादा है, आज उठना नहीं क्या...?" नौकरानी माया ने उसका बाजू हिलाया ।

"ओह माया! क्या बजा है?" उसने आखें' मलते हुए पूछा I

" बहुत कुछ बज गया, बीबी जी और बहुत कुछ हो गया । अब उठ जाओ... ।"

" क्या हो गया है?" वह एकदम चौंक गई । रात का ख्वाब बडी तेजी के साथ उसकी आखों के सामने धूम रहा था। उसका दिल बेअख्तयार ही तेजी से धडकने लगा था । उसने शकित भाव से पूछा---!खैरियत तो है माया...?"

" हा बीबी.. .खैर है? परेशानी वाली कोई बात नहीं । बौ आपके एक दादा थे ना-अरे बही दादा हरी औम.. .बो जी चल बसे I. घर के सब लोग जाने की तैयारी कर रहे हैँ... ।"

" अरे । माया फिर मुझें उठाया क्यो नहीं... ।" वह तेजी से उठकर खडी, हो गई,--- "तुम भी हद करती हो ।"

" ओह बीबी ! अभी तो आया है फोन । बडी बीबी ने जेसे ही मुझसे कहा-मैं फोरन आपका उठाने आगई हूँ। "

"क्या मोसी भी जा रही है, वहां...?"

"जारही हैं? बह तो दरवाजे पर खडी हैँ। तैयार हो जाने के लिए...।"

" अच्छा, माया तुम मोसी से जाकर कहो । मैं मुह हाथ धोकर अभी नीचे आ रही हूँ।" यह कहते हुए वह बाथरूम क्री तरफ बडी ---"मेरा इन्तजार करें, मैं उन्ही के साथ जाऊगी... I"

'" ठीक है, बीबी। आप जरा जल्दी से नीचे आ जाएं। ' '

बह जल्दी-जल्दी तेयार होकर नीचे पहुची' I उल्टा-सीधा नाश्ता किया और फिर वह गंगा मौसी के साथ गाडी में आ बैठी ।

अमर जो ड्राईविंग सीट पर बैठा था उसने जरा सा तिरछा होकर उसे देखा और पूछा---"आज आप कुछ ज्यादा देर से नहीं उठी ?"

"हां-आज कुछ ज्यादा ही देर हो गई।" बडे सहज भाव मे व सक्षिप्त-सा जवाब दिया था उसने।

इसके साथ ही उसे फिर बीती हुईं भयानक रात याद आ गई। वह भयावह ख्वाब उसकी नजरों में धूम गया था। उसने ध्यान बंटाने के लिए बस यू ही गंगा मौसी से पूछा

' 'मोसी ! दादा की डेथ कब हुई? ' '

’सुबह, मुह अंधेरे-। ' ' गंगा मौसी ने बताया--' 'बडे ही खुशनसीब थे बौ-भगवान ऐसी मोत सबको दे। '

"वह कैसे मौसी !" उसने जिज्ञासा वश पूछा। I

' 'नहा-धोकर ध्यान लगाते लगाते ही प्रभु सै जा मिले बेटी! घर के लोग जब जागे तो वह समाधि लगाए बैठे थे और प्राण पखेरु उड़ चुके थे । काफी समय से ध्यान लगाए बैठे थे । उन्हें पहले आवाज दी...जवाब न मिलने पर हाथ लगाया गया...हाथ लगाते ही वह एक तरफ को लुढक गए... । ' ' गंगा मोसी ने गहरा ठण्डा सांस लिया।

"मौसी... ! उम्र क्या होगी दादा की...?"

"बस-एक साल की कमी रह गई। अगर एक साल और जी जाते तो पूरे सौ साल के हो जाते । ' '

' 'वाकई मोसी! इतनी उम्र थी उनकी...?"

और मौसी बडे चाव से बोली “अब तो वह दोबारा से जबान होने लगे थे। बाल काले हो रहे थे और दात दोबारा निकल रहे थे।"

' 'रहने दे मोसी! " इस बार अमर बोला। उसे मीसी की बात पर जैसै यकीन न आया था।

' 'अच्छा अच्छा! गाडी सामने देख कर चलाओं I ' ' गंगा मौसी बोली व फिर बात का रूख दुसरी तरफ मोडते हुए बोली- ' 'एक बात ओर मशहूर है उनके बारे में वो सपनों का स्वप्न फल बहुत सटीक व अच्छी तरह बताते थे।
 
सपना.. .ख्वाब. . . I

' 'सच मौसी I. ' वह एकदम चोंक गई और इसके साथ ही यह भी सोचे विना न रह सकीं---"हाय, दादा जी! आपने जाने मे इतनी जल्दी क्यों की?"

काश ॥ वह अपना स्वप्न उन्हें सुना सकती और उनसे मार्ग-दृर्शन पा सकती I शायद वो ही उसे इस मानसिक यातना सै मुक्ति दिला देते I

' 'हां. यह सच है। ' ' गंगा मौसी गम्भीरता के साथ बोली ॥

" मौसी, एक बात बताए-उल्लू के बारे में आपका क्या ख्याल है?"

"अऱी यह अचानक तुम्हें उल्लू का ख्याल केसे आ गया?" ' गगा मोसी ने गर्दन धुमाकर उसकी तरफ देखा। मोसी हकीकत में बडी हैरान थी ।

" बडा ही रहस्यमय व मिस्टीरियस परिन्दा है। ' ' मौसी के जवाब देने सै पहले ही अमर बोल उठा---" 'वेस्ट' वाले उसे दार्शनिक समझते हैँ। अक्ल व ज्ञान का लक्षण मानते है। ' '

"यूरोप के एक बडे पब्लिशर ने उल्लू कीं तस्वीर को अपना मोनोग्राम बनाया हुआ है और ईस्ट वाले उल्लू, क्रो बेवकूफ समझते है । हमें किसी को मूर्ख बेवकूफ कहना हो तो उल्लू कह देते है।

' 'अक्लमद या बेवकूफ का तो मुझे मालूम नहीं हा, अपने बडॉ, सै इसकी मनहूसियत के बारे में जरूर सुना है। उल्लू जहा बैठते हि वहां वीरानी फैलने लगती है। शायद इसी कारण यह उल्लू बोलने का मुहावरा बना है I " गंगा' मोसी का जबाब था।

बस इसी तरह क्री बातें करते हुए वे दादा हरी ओम के घर पहुँच गये I काफी लोग इकट्ठे हो चुके थे और जेसे-जैसे लोगों को उनकी मौत्त की खबर मिलती जा रही थी सख्या वढती जा रही थी।

इन्सान की वास्तविक लोकप्रियता का पता उसकी मोत के बाद होता है । जिन्दगी में तो बहुत से स्वार्थ आदमी को एक दूसरे के द्धार पर ले जाते है । लेकिन आदमी मरने के बाद तमाम स्वार्थों व जरूरतो से मुक्त हो जाता है कुछ भी तो नहीं रह जाता न दौलत रहती है न कुर्सी रहती है और ना ही हैसियत रहती है। बस मिट्टी का पुतला जो राख बनने को रह जाता है। तब मालूम होता है वह किसके कितने काम आया।

औपचारिकताओ के बाद जब दादा जी की अर्थी उठी तो मालूम हुआ कि दादा जी क्या चीज़ थे। बहुत से लोग थे उनकी इस शवयात्रा में और हर आख आसुओं सै भरी थी । अपनी जिन्दगी में दादा हरी ओम ने जाने कितने लोगों का-टर्द बाटा होगा, कितने लोगों का बोझ उठाया होगा। आज वहीँ लोग दादा को अपने कंधों पर उठाए हुए थै।

सातों भाईयों में बडा अपनापन था। लेकिन इन भाईयो की सन्तानों में प्यार-मुहब्बत न थी। उनमें सै कई लडके… घर छोडकर. जा चुके थे और अलग-अलग मकानों में रहते थे।

इन सात, भाईयों की पत्निया' भी वहुत अच्छी थीं । उन्होने इस घर में जाकर घर को जोडने की तो कोशिश की थी तोडने… की कोशिश न की थी ।

गंगा मौसी हरि ओम के बड़े बेटे घनश्याम से बातें का रही थीं । घनश्याम अपने बाप की खूबियां ब्यान कर रहा था । दादा की जिन्दगी की घटनाएं, उनसे जुडी यादें और उनके गुणों की ही चर्चा हो रही थी और गगा' मौसी यह सव बडे शोक से बडी. दिलचस्पी के साथ सुन रही थीं।

तभी धनश्याम की पत्नी मीरा हाथ में ट्रे लिये अन्दर आई। ट्रे में चाय के चार कप रखे थे। मीरा ने उन तीनों को एक-एक कप दिया च चौथा खुद' लेकर सोफे पर बैठ गई। पर तभी न जाने क्या ख्याल आया-कप मेज पर रखा और अपने पति घनश्याम के पास जाकर उसके कान में कुछ कहा ।

घनश्याम ने अपनी बीवी की बात सुनकर उसकी तरफ देखा, फिर बोला--- " ठीक है जाओ, ले आओ॥"

" गंगा मोसी, मैं अभी आई। " यह कहती हुईं मीरा कमरे सै निकल गई।

"घनश्याम भाई! 'खैरियत्त तो है । " गंगा मोसी बेचैन हौकर बोली।

"इस लडकी की एक अमानत है मेरे पास । " धनश्याम ने उसकी तरफ देखते हुए कहा---"बाबा ने मरने से एक दिन पहले ही मेरे हवाले की थी। उन्होंने कहा था कि जब यह यहा' आये तो इसे दे देना । ' '

"ऐसी क्या चीज है जी टादा हरिओम इसके लिए दे गए हैं।"

" 'यह तो मैं भी नहीं जानता । वह एक लिफाफा है । " धनश्याम ने चाय का घूंट लेते हुए कहा।

गगा मोसी कीं हैरत बढी ही थी ।

' 'क्या आपको यकीन है कि यह लिफाफा इस्री के लिए है? यह तो दादा सै शायद सिर्फ एक हीं बार मिली है ।' ' गंगा मौसी ने बेचैनी से कहा ।

"गंगा-क्या यह तुम्हारी भांजी' नहीं है?"

' 'क्या लिफाफे पर इसका नाम लिखा है? " गंगा मौसी कुछ सोचकर बोली ' '-में नहीं समझती कि दादा ने सिर्फ एक मुलाकात में ही इसे याद रखा होगा, तुम्हें शायद कोई गलतफहमी हुई है घनश्याम ।। वह लिफाफा किसी और के लिए होगा । ' '

ये बातें हो ही रही थी कि मीरा सफाद रग' का एक लम्बा-सा लिफाफा लिए अन्दऱ आई और उसने वह लिफाफा घनश्याम के हाथ में दे दिया ।

वह भी चाय पी रही थी । गंगा मोसी घनश्याम की बातों ने उसे भी चोंकाया था । और यह सचमुच ही बडी… हेरत की बात थी कि स्वर्गीय हरि ओम ने ना सिर्फ उसे याद रखा था बल्कि उसके लिए एक लिफाफा भी छोडा. था । दादा से वह सच ही में सिर्फ एक ही बार मिली थी और उनसे ऐसी कोई घनिष्ठता भी न थी कि वह कोई पत्र उसके लिए छोड़ते।

गगा' मोसी का यह ख्याल भी सही था कि दादा को तो उसका नाम भी याद न रहा होगा।

धनश्याम ने उस लिफाफे को उलट पुलट का देखा बोला-- ' 'गंगा I लिफाफे पर कोई नाम नहीँ लिखा है। लेकिन तुम मुझे मेंरे सबाल का जबाब दो कि क्या यह तुम्हारी भाजी नहीं हैI"

' 'भाजी है लेकिन सगी नहीँ-ओंर यह बात सब जानते है ।"

' 'बात सगे या सौतेले की नहीं है गंगा I यह तुम्हारी भाजी है ना, चाहे रिश्ते की सही और इसका नाम... ।" घनश्याम बोलते-बोलते सोचने लगा ।

' 'इसका नाम रेखा है । " गंगा मोसी ने उसका नाम बताया और उसकी तरफ देखा ।

घनंयाम बोला "मुझे बाबा ने यह लिफाफा देते हुए कहा था किं 'वह' लड़की गगा' मौसी के साथ आएगी-उसे यह लिफाफा दे देना और उसे हिदायत कर देना कि वह यह लिफाफा सबके सामने न खोले । अपने घर जाकर एंकात में खोले । इस लिफाफे में इसका ख्वाब वद है।

''ख्वाब .. !'' वह चौकी ।

उसका नाम रेखा ही था । ख्वाब के जिक्र पर ख्सका र्चोंकना सभाविक था I वह वोल उठी--' 'मेरा ख्वाब...॥ लेकिन दादा जी को कैसे पता चला । मेने तो अपने ख्वाब का जिक्र ही अभी तक किसी से नहीं किया है, गंगा मोसी से भी नहीं किया...?"

गगा' मोसी उसकी सूरत देखने लगी. ।

"बह में नहीं जनता!" घनश्याम लापरवाही सें बोला--" और अब तुम्हारे इस इकरार के बाद यह पक्का हो जाता है कि यह लिफाफा तुम्हारे लिए है। याद आया-एक बात और भी कही थी बाबा ने... । ' '

' 'वह क्या...?' ' रेखा ने अपने होठों पर जिव्हा फिराई।

' 'उन्होंने कहा था कि उस लडकी… का नाम रेखा है... -लेकिन यह उसका असली नाम नहीं है । उसका असली नाम शीना है... । "

"शीना.... I. ' ' रेखा परेशान होकर बोली--- "लेकिन...लेकिन... नाम तो रेखा है और यह सब जानते है। ' '

' 'इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता... । बाबा ने मुझसे जो कहा था, वह मैंने तुम्हें बता दिया । यह लो अपनी अमानत. .. ।' ' घनश्याम ने वह ससफेद लिफाफा रेखा की तरफ बढा दिया ।

रेखा ने कापते' हाथों से वह लिफाफा थाम लिया । उसे उलट-पुलट कर देखा और फिर अपने हैण्ड बैग में रख लिया। .

'’रेखा वेटी I ' ' घनश्याम उसे परेशान देखकर बोला--"शायद तुम्हें यह बात मालूम न हो कि बावा एक ज्योतिषी भी थे । किसी का भी भूत वर्तमान, भविष्य उनसे छिपा न रहता था। और ख्वाब ख्वाबों की पहेली का हल बताने में तो माहिर थे । लोग बहुत दूर दूर से उनसे अपने सपनो' का स्वप्न फल मालूम करने आते थे ।"

' 'मुझें मालूम है। " रेखा धीमे से बोली---"मोसी ने आज ही रास्ते मे मुझें बताया था। ' '

"और आज ही मुझे भी अपने बाबा के बारे मॅ एक बात और मालूम हुई है कि स्वप्न फल के साथ-साथ ख्वाब देखने वाले के भूत व भविष्य सै भी अच्छी तरह वाकिफ हो जाते थे। सब कुछ जान लेते थे। तुम यह कह सकती हो बेटी कि वो बहुत पहुचे हुए बुजुर्ग है। लेकिन उन्होंने खुद को हमेशा छिपाकर रखा I ' '

' 'अरे आपको नहीं मालूम होगा। मुझें तो बाबा के बारे में अच्छी तरह अन्दाजा था कि वह कितने पहुचे हुए बुजुर्ग है। आखिर लोग उनके पास यू ही नहीं आते थे। " मीरा खुद को बोलने से न रोक सकी थी।

बडे चकरा देने वाले हालात थे। पहले वे भयावह स्वप्न और अब यह रहस्यमय लिफाफा रेखा बडी मुशिकल से ही खुद को सयत्त रख पा रही थी ।

कुछ देर बाद ही गगा मौसी और रेखा ने घनश्याम से इजाजत ली। गगा', मीरा से गले लगकर मिली ।
 
घनश्याम ने अपने बडे वेट क्रो बुलाकर उससे कहा कि वह उन दौनों को अपनी गाडी में उनके घर तक छोडकर आए।

गगा' मौसी ने मना भी किया कि इस कष्ट की जरूरत नही-कि वे किसी रिक्शा या आँटो में घर पहुच जायेगी, लेकिन घनश्याम ने उनकी एक न सुनी। वे धर के गेट तक गंगा मौसी व रेखा को विदा करने आए और जब तक वह गाडी में बैठकर चली न गयीं, वो गेट पर ही खडे रहे।

बापसी का सफर बडी खामोशी से कटा ।

गंगा मौसी ने बात करनी भी चाही, लेकिन रेखा ने जवाब मे उन्हे खाली खाली निगाहों से देखा तो वह समझ गई कि रेखा अन्दर से परेशान है।

रेखा वास्तव मे. ही परेशान थी।

उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि दादा जी को उसके ख्वाब के बारे में किस तरह पता चल गया था और इस लिफाफे मे उसके भयानक सपने का केसा स्वप्न-फल बंद है।

रेखा शीघ्र अतिशीघ्र इस स्वप्न-फल के बारे में जान लेना चाहती थी।

घर पहुचते' ही. रेखा ने सीधे ही अपने कमरे का रूख किया । वह अपने बेडरूम में दाखिल हुई। दरवाजा बद किया हैण्ड बैग बैड पर' उछाल दिया और बाथरूम में जा घुसी ।

वह नहा-घोकर बाहर निकली। ठण्डे पानी से राहत-सी पहुची' थी। वह स्वयं को तरोताजा महसूस करने लगी थी ।

वह दादा का पत्र पढने की बेकरार थी । और फिर अभी उसने बैग से लिफाफा निकाला ही था और खोलना ही चाहती थी कि सहसा दरवाजे पर दस्तक हुई।

दरवाजा बडे जोर से फडफडाया जा रहा था और साथ ही माया र्चीख भी रही थी----

"जल्दी दरवाजा खोलें, बीबी... ।

रेखा ने लिफाफा फौरन वापिस बैग में रखा और बैग को बैड पर छोड़ दरवाजे की तरफ बढी।

माया क्री हडबडाहट… ने उसे बदहवास कर डाला था। उसका दिल. बडे जोर-जोर से धडकने लगा था ।

"है प्रभु. ..कृपा... । " रेखा ने जेसे ही दरवाजा खोला तो उसे देखकर वह बरबस ही र्चीख माराकर पीछे हट गई ।

माया के हाथ में एक पिन्जरा था-ओर उस पिजरे' में एक उल्लू बन्द था। रेखा ने उल्लू को देखकर ही चीख मारी थी।

माया ने वह पिन्जरा दहलीज पर रख दिया व तसल्ली देते हुए बोली----"डरते नहीं बीबी! यह पिन्जरे में बद' है। "

"यह पिन्जरा कहा से आया-कौन लाया है इस उल्लू को...? रेखा सहमकर पिन्जरे में बन्द उल्लू कौ देख दूर से ही बोली ।

"बीबी अभी एक आदमी आया था वही दे गया है। ” माया ने पिन्जरे के कुन्डे पर हाथ रखते बताया । फिर पूछा-"अन्दर ले आऊं, बीबी ।"

"नहीं-नहीं... । तुम पागल हो गई हो क्या, माया… !" रेखा ने उसे डाटते हुए कहा-"तुम अंदर आ जाओ-इसै बहीं रहने दो. . . । "

माया पिन्जरा वहीं छोडकर. अन्दर आगई। रेखा कापती टागों से अपने ब्रैड पर आ बैठी | ब्रैड पर उसका बैग और वह बन्द लिफाफा पड़ा था जो दादा हरि औम ने उसके लिए छोडा था और हिदायत दी थी कि उसे सबके सामने न खोला जाऐ ।

रेखा ने फोरन बह लिफाफा उठाकर बैग में डाल दिया और उसकी जिप बद' करते हुए दरवाजे पर रखै पिन्जरे को देखने लगी ।

वह उल्लू अपनी वडी-बड्री जर्द आखों से उसे ही घूर रहा था।

"माया तुमने इस पिन्जरे को क्यों ले लिया? कौन था वह शख्स?" रेखा क्री परशानी बडती ही जा रही थी ।

”बीबी उस आदमी ने ज्यादा बात ही नहीं की । मैंने जैसे ही गेट खोला उसने यह पिन्जरा मेरी तरफ बढा दिया और बोला कि शीना को दे दें । " मैने कहा कि कौन शीना-यहां इस नाम का कोई नहीँ है, तौ वह बोला कि अपनी रेखा बीबी को जाकर दे दें, --अच्छा में चलता हूँ- और यह कहकर उसने पिन्जरा मेरे हाथों में थमा दिया और मेरे कुछ कहने से पहले ही चला गया।" माया ने बताया।

"शीना...ऽऽऽऽ!" रेखा को चक्कर-सा आगया। उसने खुद कौ सम्भाला, कैसा शख्स था वह! ! तुमने वडी गलती की माया । मुझे फौरन बुला लेना था।"

"उसने मेरी बात सुनी ही नहीं।" माया मुह बनाते बोली…"ओर वह बड़ा ही आजीब सा आदमी था, बीबी । काले कपडे पहने हुए था, बडे लम्बे-लम्बे बाल थे, जो उसके कंधों पर पडे हुए थे। साबले रग का था । लम्बा चेहरा, कानों में बालियां, एक हाथ में ताबे का मोटा सा कडा और उगली मै चादी' की पत्थर लंगी अगूठी । काली चमकती हुई आखँ', बस मै और क्या बताऊं बीबी, कि तो कैसा आदमी था। मैने तो इस तरह का आदमी पहले कभी नहीं देखा I फिल्मों में वो भूत-प्रेत उतारने वाले खौफनाक शख्य दिखते हैँ ना बीबी । वह बस वैसा ही था। "

रेखा फोरन खिडकी की तरफ गई I इस खिडकी से घर का गेट साफ नजर आता था। खिडकी. खौलकर उसने इधर-उधर देखा। मगर उसे कोई आदमी दिखाई नहीं दिया। उसने खिडकी बन्द की व पलटर माया से सम्बोधित हुई-- 'तुम्हें विश्वास है कि उस शख्स ने मेरा ही नाम लिया था?

”जी बिल्कुल, बीबी । पहले तो उसने शीना कहा, फिर जब मैने इन्कार किया तो बोला कि जाकर अपनी रेखा बीबी को दे दो। उसने साफ साफ आपका नाम लिया था बीबी। क्या आप उसे नहीं जानती?" माया ने हैरान हौकर पूछा ।

"नहीं माया! जाने कौन था वह शख्स। और वह देकर भी क्या गया है... I. " रेखा की निगाहे फिर पिन्जरे की तरफ उठ गई ।

"हां , देखौ भला। यह भी कोई देने की चीज है....।"

' 'भाई है क्या घर में?" रेखा ने अमर के बारे में पूछा ।

' 'नहीँ बीबी! वह एक धन्टा पहले कहीं गया है।"

"और मौसी?"

"वह अपने कमरे में है। पाठ पढ़ रही हैं । "

' 'अच्छा तुम इस पिन्जरे को लेकर नीचे चलो-मैं आती हूँ । "

"ठीक है, बीबी ।"

और माया नै जेसे ही पिन्जरे का कुण्डा पकडने के लिये हाथ बढ़ाया उल्लू ने बैचेन होकर फौरन अपने पंख फडफडाए __ और एक भयानक चीख मारी l माया ने घबराकर अपना हाथ पीछे खींच लिया।

"माया इसे फोरन नीचे ले जाओ... ।" रेखा बदहवास सी बोली।

और माया ने जैसे ही फिर पिंजरा उठाना चाहा-उल्लू फोरन ही उसकी तरफ झपटा और जोर-जोर से अपने पख फडफडाए ।

पिन्जरा छोटा था ।

उसके पर पूरी तरह खुल नहीं रहे थे। लेकिन बन्दे को खौफन्जदा करने के लिए बहुत थे ।

माया ने डरकर एक बार फिर अपना हाथ खींच लिया था।

' ’अरे, माया क्या कर रही हो, पिंजरा उठा लो । ' ' रेखा ने सख्ती सै कहा।

माया ने फिर उसे उठाना चाहा तो उल्लू ने इस बार फिर भयानक चीख मारी और अपने पख फडफडाने लगा । माया हाफती कापती सी बोली--मै इस पिन्जरे को नहीं उठा सकती । मुझें डर लग रहा है... । "

"अच्छा ठहरो-मै उठाकर देखती हूँ।" कहते हुए रेखा आगे बढी।

उसके आगे बडते ही वह उल्लू अपनी जगह स्थिर हो गया । रेखा ने हिम्मत करके पिन्जरे की तरफ हाथ बढाया । वह तैयार थी कि जेसे ही उल्लू चीखेगा, वह फोरन अपना हाथ खींच लेगी । लेकिन ऐसा कुछ न हुआ। उल्लू अपनी जगह सिकुडा सिमटा व शांत बैठा रहा।

रेखा ने दिल कड़ा करके पिजरा उठा लिया। उल्लू न फडफडाया न झपटा और न ही उसने खौफनाक आवाज निकालीं l

' 'लौ माया, अब तुम नीचे ले जाओ इसे । ' ' कहते हुए रेखा ने पिन्जरा माया के हाथ में दे दिया ।

पिन्जरे का माया के हाथ में आना था कि उल्लू फोरन फडफडा उठा। साथ ही उसने एक भयानक चीख मारी-कुछ इस तरह कि माया ने पिन्जरा फौरन फर्श पर रख दिया और तेजी से सीढिया उतरती चली गई।

वह शायद बुरी तरह डर गई थी I

माया के जाने के बाद रेखा ने पिन्जरे पर एक नजर डाली । खौफनाक उल्लू खामोशी से बुत बना-रेखा को अपनी बडी-बडी और जर्द आखों' से देख रहा था। उसकी आखों' में न जाने क्या बात थी कि खौफ की एक लहर रेखा के बदन में उतरती चली गई। रेखा ने पिन्जरे को वहीँ छोडा व अपने कमरे में घुसकर दरवाजा बन्द कर लिया।
 
वह बैड पर आ बैठी और बैग से वह लिफाफा निकाला। लिफाफा हाथ में आते ही उसके दिल की धडकने सहसा ही तेज हो गई । हाथ में कम्पन आ गया । यहीँ सोच रही थी वह कि इस लिफाफे में जाने क्या बद' है?

यह नो इच लंबा और चार इच चौडा… एक सफेद रग का लिफाफा था? रेखा ने उसे रोशनी कीं तरफ करके देखा तो उसमें एक पत्र के रखै होने का आभास हुआ । उसने हिम्मत करके लिफाफा फाड़ा व खत बाहर निकाल लिया ।

लेकिन यह एक ख़त्त तो क्दापि नहीं था । कागज पर कुछ लिखा हुआ नहीं था । इस पर पेन्सिल से एक स्केच बना हुआ था और यह वही रेखा चित्र था जिसे वह कई रातों से निरन्तर देख रही थी ।

एक गोल झोपडी । झोपडी पर बैठा हुआ उल्लू। दरवाजे पर कुण्डली मारे बैठा साप । झोंपडी के अन्दर अंधेरा । यहीँ तो वह दृश्य था जो उसे रव्वाब में नजर आता था।

बस एक आवाज की कमी थी । फिर एकाएक ही उसके दिमाग में वह' आवाज भी गूजने लगी---डरो मत । अंदर आ जाओ ।"

यह कागज सफेद था और इस ख्वाब वाले नजारे के अलावा उस पर कुछ नहीं लिखा था। रेखा ने कागज पलटा देखा तो उस पर एक और रेखा चित्र दिखाई दिया । यह एक दरवाजा था-बन्द दरवाजा और दरवाजे के हैण्डल पर एक तवीज लटका हुआ था।

इस दरवाजे व इसके हेण्डल पर लटके हुए ताबीज को देखते ही रेखा के दिमाग में एक धमाका-सा हुआ और उसके मुह सै वेअख्तयार निकला---

"अरे यह तो नीचे वाले कमरे का दरवाजा है। "

उसने जल्दी से उस कागज को वापस लिफाफे में डाला और दरवाजा खौलकर हवा के तेज झोंके की तरह बाहर निकली ।

दरवाजे पर उल्लू बैसै ही रखा था। उल्लू बड़े शात भाव सै बैठा हुआ था। रेखा को देखकर उस उल्लू ने अपनी गर्दन जरा सी टेढी, की और एक अजीब-सी आवाज निकाली। रेखा को यही लगा था जेसे उल्लू ने उसे देखकर ही चीख मारी हो ।

रेखा ने कुछ सोचा और फिर कुण्डा पकड़कर पिंन्जरे की उठा लिया। उल्लू ने कोई उछल-कूद न मचाई थी I रेखा पिनजरा उठाए नीचे उतर आई। उसने इधर-उधर देखा I उसे गंगा मौसी की तलाश थी ।

इस जीने का एक रास्ता घर के अंदर जाता था और दूसरा रास्ता थोड़ा-सा घूमकर बाहर के लाॅन की तरफ ।

उसने पिंजरे' को बाहर वाले दरवाजे की तरफ छोडा, और खुद गंगा मोसी के कमरे की तरफ भागी।

गंगा मौसी अभी पूजा करके हटी ही थी कि रेखा को इस तरह बदहवास कमरे में घुसते हुए देखा तो क्षण भर के लिए घबरा गई ।

"क्या हुआ रेखा! खैर तो है...?”

"खैर कहां है, मोसी! " वह नीचे कालीन पर ही उनके निकट बैठ गई।

"बीबी आपकी चाय यहीँ ले आऊ या बाहर पीएगी । " माया ने कमरे में आते हुए पूछा।

"माया देखो वह पिन्जरा सीढियों के करीव रखा है तुम उसे उठाकर बाहर दीवार के साथ रख आओ । कहते हैं उल्लू वडा मनहूस होता है।। जहां बैठता है वीरानी फैल जाती है I "

"उल्लू...! " गगा मोसी एकदम चौंकी "कहा है उल्लू..?"

" हाय, बीबी ! मुझें डर लगता है I वह' मेरे पिन्जरा उठाते ही मुझ पर झपटता है l " माया सहम-सी गई।

“अच्छा तुम इसे रहने दो और मेरी चाय इधर ही ले आओं I " रेखा तेजी सै बोली।

"जी, ठीक है बीबी! ' ' माया आदरपूर्ण स्वर मैं बोली और तेजी से कमरे से निकल गई। यही डर था दिल मे कि कहीं उसे पिन्जरा उठाने क्रो न कह दें।

गंगा मौसी का मुह मारे हैरत के अभी तक खुला हुआ था। यही नहीं समझ पा रही थी कि था अचानक उल्लू कहा से आ गया और वह भी पिन्जरे में। गगा मोसी ने फिर सबाल करना चाहा कि रेखा ने हाथ के इशारे से उन्हें सब्र करने को कहा और बोली "मै बताती हूं, मौसी। आप परेशान न ही । ' '

और फिर रेखा ने मोसी को उल्लू की कहानी सुना दी कि वह कहा से आया है और कैसे आया है । इस बीच माया चाय दे गई थी ।

"अरे वह कौन मनहूस शख्स था जो अपने लगे-सगे को हमारे हवाले करके चला गया।” मौसी की परेशानी, झल्लाहट बन चली थी ---" 'रेखा तुम जल्दी से इस मनहूस को अपने घर से निकालो । "

“मौसी परेशान होने की जरूरत नहीं है मैं अभी उसका ही बन्दोवस्त करती हू I"

रेखा ने उन्हें तसल्ली देते हुए कहा हालाकि खुद उसकी अपनी जान निकली जा रही थी।

"मोसी सुनिये! मैंने वह लिफाफा खौल लिया है !" रेखा ने लिफाफा उनके सामने लहराया।

"अरे, हां? क्या निक्ला इसमें ..?” मौसी क्षण भरके लिए उस उल्लू कौ भूल गई ।

"एक कागज है इसमें मौसी-उस पर हाथ से दो तस्वीरे वनी हुई हैं।" रेखा ने बताया ।

"लेकिन वह तो तुम्हारे किसी सपने और उसके फल--हल की बात कर रहे थे I रेखा तुमने मुझे बताया नहीं कि कैसा खवाब देखा था । "

" 'बस मौसी । मै आज आपको बताती I मैं पिछले पांच दिनों से निरंतर वह सपना देख रही थी ।

”ओ, रेखा । क्या कोई डरावना ख्वाब था क्या ?"

" ऐसा ख्वाब मोसी कि ख्वाब देखने के बाद जब मेरी नींद टूटती तो मेरी जान निकली हुई होती ।" रेखा सहमत गई ।

' 'तो पगली मुझे बताया क्यों नहीं। अकेली ऊपर सोती है । अब मत सोना ऊपर... ।"

' 'अरे नहीं मौसी. .. I " रेखा बे बात मुस्कराई---"ऐसा भी क्या डरना बस थोडी देर डर लगता है-फिर मैं सो जाती हुँ, ,, मै आपको ख्वाब बताती हूँ फिर आपको ये तस्वीरें दिखाऊगी । दादा जी ने लिफाफा अकेले में खोलने की हिदाग्यत. की थी और ख्वाब बताने या यह तस्वीरे किसी को दिखाने की तो कोई हिदायत है नहीं उनकी।” l l

फिर रेखा में पूर्व विवरण के साथ अपना वह सपना मोसी के सामने दोहराया।

' 'अरे यह वही मनहूस उल्लू तो नहीं है, जो तुम्हें झोपडी की छत पर बैठा दिखाई देता है I“ गंगे' मोसी को ख्वाब सुनकर वह उल्लू फिर याद आ गया---"' रेखा, तुम भी अजीब लडकी. हो, तुम ख्वाब में कोई ढग की चीज नहीं देख सकती. . . । ' '

" मौसी, खवाब अपनी मर्जी से कहा दिखाई देते हैँ। " रेखा असहाय-सी बोली।

' ' अच्छा लिफाफे में क्या है ? “

' 'यह देखिए मेरे ख्वाब की तस्वीरें । ' ' रेखा ने कागज निकालकर उनके सामने किया। उसने पहले वह तस्वीर दिखाई जिसमें झोपडी, उल्लू और साप बना था।

' ' अरे यह तो बिल्कुल तुम्हारा ख्वाब ही है I"

' 'अब जरा पलटकर देखिये-तब आपको इस खवाब का हल नजर आएगा । इस पहेली का हल... । ' '

गंगा मौसी ने कागज पलटा और इस तरफ बनी तस्वीर देख वह एकाएक ही काप सी गई ।

उनके मुह सै बेअख्तयार निक्ला--''नहीं । " और चेहरा पीला पडता चला गया।
 
“क्या हुआ मौसी?" रेखा ने पूछा---"आपने इस दरवाजे क्रो पहचाना?"

' 'पहचान ही तो लिया है। इसलिए ही तो ऐसी खौफजदा हो रही हूँ। "

"यह उसी कमरे का दरवाजा है ना-जिसे आप हमेशा लाक रखती. हैं?" रेखा ने तस्वीक चाही।

"हां, बही है । ' ' मोसी की जुबान में आमी भी कम्पन था।

रेखा ने कुछ सोचते हुए पूछा--------" एक बात बताएं-क्या दादा हरि औम जी कभी इस घर में आए है? ' '

' 'आज तक नहीं । " मौसी ने ठण्डी सास' भरकर कहा ।

' 'फिर यह कितनी हैरानी की बात है मोसी, कि उन्होंने न सिर्फ मेरे ख्वाब को जान लिया बल्कि इस कमरे की ठीक-ठीक निशानदेहीँ भी कर दी । वह अगर दरवाजे के हैण्डल पर ताबीज लटका हुआ न दिखाते तो शायद इस दरवाजे को पहचानना मुश्किल होता… ।' '

' 'सबाल यह है रेखा, कि तुम्हारे सपने से इस दरवाजे का क्या जरूरत थो ?" मौसी ने सवाल किया। I

' 'कोई सम्बन्ध तो जरूर है, मौसी, वर्ना दादा जी को उसकी तस्वीर बनाने की क्या जरूरत थी । "

" 'तुम उस बद' कमरे के बारे में कुछ जानती हो…?"

' 'मैं जब से इस घर में आई हू मैने उसे हमेशा बन्द ही देखा है और दरवाजे पर काले कपडे में लिपटा हुआ ताबीज I जो हैण्डल में लकटा हुआ है । आपने उस कमरे के बारे में यही बताया है कि उस कमरे में काठ कबाड पडा है और वह एक तरह का स्टोर है ।"

‘नहीं रेखा I. मैँने गलत कहा था । दरअसल मैं नहीं चाहती थी-किं तुम उस हकीकत जानकर डर जाओ। लेकिन अब तुमसे कुछ छिपाना बेकार है । अब यह मामला खतरनाक हो गया नजर आ रहा है।"

"'अगर वह स्टोर नहीं हैँ-उसमें कोई सामान नहीं है तो फिर उसमें क्या है?" रेखा ने पूछा।

~ ' 'कुछ नहीं है. बिल्कुल खाली है ओर बिल्कुल सादा ! "

रेखा अपनी जिज्ञासा दबा नहीं पाई, एकदम बोली---“मोसी, उसका ताला खोलें-मैं उसे अंदर से देखना चाहती हूँ। ”

' 'हाय नहीं, रेखा । ऐसी बात सोचना भी नहीं…।"

' 'क्या मतलब मोसी! क्या हो जाएगा. .. ? "

' 'यह तो मै नहीं जानती कि क्या हो जाएगा। लेकिन इतना विश्वास जरुर है कि कुछ-न-कुछ जरूर हो जाएगा। हमे इस कमरे को खोलने से मना किया गया है । ' ' मोसी की आबाज में फिर कम्पन भर आया था।

' 'किसने -मना किया है मोसी? ' रेखा ने पूंछा।

"उस शख्स ने जिससे हमने यह मकान खरीदा था।“ गंगा मौसी ने बताया--' 'बासुदेव नाम के उस शख्स ने इस मकान क्रो बडे शोक से बनवाया था, लेकिन उसे इसमें रहना नसीब नहीं हुआ । बडी. अजीब है इस मकान की कहानी ।"

"कैसी कहानी? मुझे सुनाओ ना मोसी । " रेखा बेचैन हो उठी ।

और गगा मोसी ने कहानी सुनाई।

इस मकान की कहानी सच ही र्में बडी अजीब थी ।

एक हजार गज में बना हुआ यह एक दो मजिला मक्रान था। इस मकान के दाए बाए कोई दुसरा मकान नहीं था। दाई तरफ केवल महज चारदीवारी थी और बाए तरफ वाले प्लाट की सिर्फ नींव भरकर छोड दी गई थी । हा पिछले वाले प्लाट पर मकान बना हुआ था और वह आबाद नहीं था । इस मकान के सामने साठ फुट चौडी. सडक, थी और इस सडक के उस तरफ तमाम मकान बने हुए थे।

बंगलों ब मकानों के निर्माण सै पहले यहां झौपडिया_ पडी हुई थीं-जहा भवन निर्माण में लगे वे मजदूर परिवार आबाद थे जिनकी औरतें व मर्द दोनों मिलकर रोजी कमाते थे । तब कही जाकर शाम को उनके घरों में चुल्हे जलते थे। ये बराबर के तीनों प्लाट तीन भाईयों ने खरीदे थै । दो भाई बाहर थे और तीसरा जिसका घर-परिवार यहीँ था वह एक फर्नीचर की बडी… दुकान का मालिक था । सबसे पहले उसने अपने प्लाट पर निर्माण शुरू कराया I उसने तीनों प्लाटों की वाऊड्री वाल बनवाई और एक चौकीदार रख दिया जो चौबीस घन्टे इन खाली प्लाटों पर रहता । चौकीदार का नाम अली खान था ।

एक रात जब अलीखान की अचानक आंखों खुली तो उसने रात के सन्नाटे में घुघरुओ की आबाज सुनी । कोई एक बजे का टाईम होगा ।

तेहरवीं का चाद निकला हुआ था। हर तरह चादनी छिटकी हुई थी । अलीखान अपनी चारपाइ से उठकर अपनी' झोपडी के दरवाजे पर आया तो उसने सामने एक विचित्र अनूठा नजारा देखा।

वह कोई मलग किस्म का बन्दा था जो अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए एक टाग' से छ: फुट ऊँची दीवार पर नाच रहा था । घुधरुओ की आवाज गूज' रही थी। वह मलग' सा शख्स दीवार पर पूरी दक्षता व बहुत ही खूबसूरत नाच रहा था। जेसे वह दीवार न होकर जमीन या फर्श पर हो।

हग्लाकि' यह नजारा एक अच्छे-भले आदमी के होश उडा देने के लिए काफी था-लेकिन अलीखान पर इसका कोई खास असर नहीं हुआ।

बो फोरन पलटकर अपनी झोपडी में आया। लालटेन की लौ को जरा तेज किया। चारपाई के सिरहाने रखी अपनी मोटी लाठी उठाई और बाहर आ गया।

बाहर आकर उसने टीन के क्नस्तर में जोर जोर से लाठी मारी। कनस्तर की आवाज सै पूरा इलाका गूज उठा। नाच करता बह मलग देखते ही देखते दीवार पर से गायब हो गया।

उस मलग को इस तरह नाच करते हुए अलीखान ने ही नहीं झोपडियों में रहने वाले दूसरे मजदूरों ने भी देखा I उस मलग का यू नाचने का क्रम जारी रहा । ये लोग भी इस नाच के आदी हो गए कि अगर कोई शख्स दीवार पर नाचता है तो नाचा करे । उनका क्या बिगडता है। अलीखान ने शुरू शुरू में इस शख्श कीं पस्वाह नही की । लाठी सै क्नस्तर बजाया , लेकिन जब उस मलग ने रोज ही नाच दिखाना शुरु कर दिया तो अलीखान ने उस पर सो बार लानत भेजी और पेर पसार कर आराम से सोने लगा।

जल्दी ही बीच वाले प्लाट पर निर्माण कार्य आरम्भ हो गया l लोगों ने देखा कि रात्तों-रात खाली जमीन पर एक शानदार मकान ने खडा होना शुरू कर दिया। दीवारे उठी किं जल्दी ही मकान पर छत्त पड गई। छत पडते. ही एक हादसा हुआ।
 
एक रात अलीखान अपनी चारपाई पर मुर्दा पाया गया ।

और यह मालूम न हो सका कि यह केसे मरा ।

उसके शरीर पर किसी प्रकार के चिन्ह न थे, न ही उसकी हत्या की गई थी । जिन लोगों ने उसकी लाश देखी थी, वे बताते हैँ कि अलीखान अपनी चारपाई पर इस तरह लेटा हुआ था जेसे सो रहा हो । यह सम्भावना भी थी कि सोते में उसका हार्ट फेल हो गया हो।

अलीखान के इस दुनिया से उठ जाने के बाद कोई चौकीदार ज्यादा समय तक इस मकान की निगरानी न कर सका। चौकीदार कुछ बताए बिना ही गायब हो जाता और सोचा यहीँ जाता कि शायद कीसी वजह से वे कुछ कहे सुने विना ही वहा से रफू चक्कर हो जाते हैँ।

फिर इस मकान का निर्माण कार्य रूक गया । मालिक मकान बाहर चला गया ।

रात के वक्त यह अधूरा मकान बडा भयानक नजारा पेश करता ।

एक भयावह दृश्य ।।

उस लगडे मलग का नाच जारी था । अब यह नाच उस निर्माणाधीन अधूरे मकान की छत पर होता ।

सडक_ के उस पार झौपडिंर्यों. में रहने वाले राजस्थानी मजदूर प्राय: मलग के इस नाच को देखा करते ।

सात सात बाद फिर इस मकान का निर्माण शुरू हुआ । दौ तीन माह काम हुआ। उसके बाद फिर बद हो गया I काम वद होने की वजह भी बडी. माकुल थी । एक दिन मालिक मकान अपने बीबीसी बच्चों को बंगले' का निर्माण दिखाने लाया । बीवी और उसके बच्चों ने अच्छी तरह मकान को देखा। ये लोग छत पर भी गए ।

कोई आधे घंटे के बाद बीबी बच्चे घर जाने के लिए गाड़ी में बैठने लगे तो पता लगा कि चार वर्षीय लडका, अमित गायब है I मां-बाप ने पहले तो उसे आवाजे दीं-लेकिन कोई जबाब न मिला, घबराये-से मा'-वाप निर्माणाश्चि बगले' के अंदर भागे ।

मकान के हर हिस्से, हर कोने मॅ उसे तलाश किया-मगर अमित कहीं नहीं मिला ।

अचानक ख्याल आया कि वाटर टेक में भी देख लिया जाए I बस देखना ही गजब हो गया। मां टैंक में झांकते ही चीख मारकर बेहोश हो गई ।

चार वर्षयि अमित टैंक में तैर रहा था। उसे जल्दी से निकालकर बेहोश मां सहित फोरन अस्पताल में पहुचाया गया । लेकिन वह तो कभी का मर चुका था।

बगले का निर्माण फिर रूक गया । निर्माण सामग्री पडी थीं-लेकिन बहा कोई चौकीदार दो तीन दिनों से ज्यादा टिकता ही नहीं था । अब यह वात साबित हो गई थी कि इस भवन पर कोई ऊपरी साया है । स्यानों ब 'टोने-टोटके करने वालों

की तलाश आरम्भ हो गई ।। कितने ही स्यानो को मौका-ए-वारदात पर लाया गया लेकिन कोई भी ऐसा पक्का अमल न कर सका जिससे मकान पर से बुरा प्रभाव दूर हो जाए।

तांत्रिक' व आमल की तलाश जारी रही । फिर किसी ने एक 'आमिल' का पता बताया I लेकिन वो पेशेवर आमल न थे सरकार थे--रूहानी अलमों में माहिर थे I जरूरतमंदो की मदद करते थे। ताबीज गण्डे देते थे लेकिन वो यह सब काम जनहित के लिये करते थे। बदले में दुआओं के इच्छुक रहते थे-रुपये-पैसै के नहीं।

मकान प्रतिक की परेशानी देखकर उन्होंने इस मकान का 'साया' दूर करने की हामी भर ली । दोपहर को जब बेहद तेज सख्त धूप थी तो आमिल जिसका नाम रोशन अली था । मकान मालिक के साथ इस निर्माणाधीन बगले' पर आए-पूरे बगले का एक चक्कर लगाया । उसके बाद एक कमरे में आकर खडे हो गए । मकान मालिक को इशारा किया कि बो बाहर गाडी में जाकर बैठे I

और फिर लगभग आधे घन्टे बाद रोशन अली बगले से बाहर आए। पसीने से नहाये हुए | उन्होंने इशारे सै मकान मालिक को अपने साथ आने को कहा । और फिर रोशन अली फिर उसी कमरे में जा खडे हुए, जहा पहले रुके थे। इम कमरे में अभी चौखट दरवाजे नहीं लगे थे ।

" इस कमरे को गौर से देख लें । " रोशन अली ने मकान मालिक से कहा I

' 'मैं समझा नहीं। ' ' मकान मलिक ने परेशान होकर पूंछा।

' 'आप चाहते हैँ कि इस बगलें कीं तमीर (निर्माण) मुकम्मल हो जाए?"

रोशन अली ने पूंछा।

" जी , इसीलिए तो मैं आपको यहाँ ले कर आया हूँ. I"

"फिर एक काम करना होगा। ' '

"हुक्य दीजिए! मैं हर काम करने के लिए तैयार हू. I"

''इस कमरे में कोई खिडकी नहीँ होगी. . . I' ' पहली हिदायत मिली I

' 'ठीक । मै यह खिडकिया बन्द करवा दुगा ।" ' मकान मालिक ने हामी भरी।

"इस कमरे में में जो रग बताऊंगा वबी होगा !" दूसरी हिदायत हुई।

"जी जरूर होगा I "

"जब यह कमरा और पूरा बंगला तैयार हो जाएगा तो एक रात मैं इस कमरे से गुजारूगा । सुबह दिन निक्लते ही मैं बाहर आऊँगा और इस कमरे को लाक कर दूंगा । इसके हैण्डल में एक ताबीज लटका दूगा और यू यह कमरा हमेशा के लिए बद हो जाएगा । ' ' रोशन अली ने स्थिति स्पष्ट कीं थी।

"हमेशा के लिए बद हो जाएगा।" मकान मालिक हैरान रह गया।

"जी हा--हमेशा के लिए' बद हो जाएगा। ' ' दृढ… निर्णायक स्वर में कहा गया।

' 'अजीब वात है !" मकान मालिक ने टिप्पणी की, फिर दबे स्वर में पूछा। " फिर फिर उसके बाद तो यहां कुछ नहीं होगा ? ' '

' 'कुछ नहीं होगा! हमेशा के लिए शान्ति हो जाएगी।" रोशन अली ने यकीन दिलाया।

"रोशन अली साहब । यह सव है क्या? ' '

"जो कुछ भी है आपके सामने हैँ-इतने अर्से से भुगत रहे हैँ फिर भी पूछ रहे है?"

' 'मेरी तो अक्ल दंग है l "

"मियां साह्रबजादे...रोशन अली अपनत्त्वपूर्ण लहजे में और समझाने वाले अंदाज में बोले।

” यह दुनिया एक अजायबघर है। जो मैं देखता हू---अगर वह तुम देख लो तो-पगलाये-पगलाये फिरो । आओं, अब यहां से चलें ।"

यू रोशन अली ने कुछ न कहा और कह भी गए l वह कुछ कहते कहते रूक गये थे ।

बहरहाल, मकान मालिक वासूदेव-ने हौसला किया और निर्माण कार्यं फिर शुरु हो गया । दुगनी लेबर लगाई गई और बहुत ही तेजी से निर्माण कार्यं पूरा बुआ । फिर रग रोगन शुरू कर दिया । वासूदेव ने उस प्रेत ग्रस्त कमरे में कोई खिडकी नहीं रखी थी । अब रोशन अली से पूछकर उनकी हिदायत के मुताबिक ही इस कमरे में रग करवाना था। बासुदेव ने रोशन अली से बात क्री तो रोशन अली ने उसे शाम को अपने घर बुलाया।

वासूदेव उनके घर पहुचा तो उन्होंने एक छोटी-सी शीशी में काले रग का कोई घोल दिया और हिदायत दी---

"उस पूरे कमरे में काला रग करवाना है यहां तक कि छत पर भी काला रग' होगा ,, इस शीशी का पानी रग में मिलवा देना ।। यह मत्र पढ़ा हुआ पानी है I एक बात का और ख्याल रखना-पेस्ट का काम एक दिन में और सूरज डूबने से पहले हर सूरत में खत्म हौ जाना चाहिये। रग होने के बाद दरवाजा बन्द करके लॉक कर देना । उसके बाद कोई भी प्राणी इस कमरे में नहीं जाएगा तुम भी नहीं। जब मकान हर तरह से पूरा हो जाये तो मुझे इतला देना। मैं रात को बहीं रहूगा । समझ गए मेरी बात! !!"

"जी बिल्कुल... ।" वासूदेव ने कहा और फिर शकित भाव से ही शीशी के पानी क्रो देखते हुए पूछा---”इसमें क्या है ? "

"जी बिल्कुल... ।" वासूदेव ने कहा और फिर शकित भाव से ही शीशी के पानी क्रो देखते हुए पूछा---”इसमें क्या है ? "

यह उल्लू के क्लेजे का पानी है। रोशन अली ने लापरवाही सै कहा "इसके अलावा इसमें एक चीज और भी मिलाई गई है । "

" वह क्या. . . ? "

"वह नहीं बताया जा सकता... ।" रोशन अली ने कोरा जबाब दिया। ''

''जेसी आपकी मर्जी। "

बहरहाल, फिर वासूदेव ने रोशन अली के निर्देशानुसार अपनी निगरानी में सारे काम' करवा दिए। फिर वह वक्त भी आया, जब मकान पूर्णत: तैयार था। बासुदेव ने उस आमिल रोशन अली को बगले पर आने का निमन्त्रण दिया ।

रोशन अली पहुचे और रात ठीक बारह बजे उस कमरे में दाखिल हुए। रात भर भीतर ही रहे और सुबह पो फूटते ही कमरे से बाहर आ गए। अन्दर कमरे में उन्होनै- क्या किया-वह रात उन्होने किस तरह गुजारी, इस बारे में उन्होंने नहीं बताया ।

उन्होंने दरवाजा बद किंया-उसै ताला लगाया और अपनी जेब सै एक काले रग' का ताबीज निकालकर दरवाजे के हैण्डल पर लटका दिया और मकान मालिक वासूदेव को अपने साथ आने का इशारा किया ।
 
गाडी में बैठकर रवाना हुए और फिर रास्ते में उन्होंने वासूदेव को वताया--' 'भाई वासूदेव जी एक बात कहना चाहता हूँ मगर समझ में नहीं आता कि किस तरह कहूँ।"

"रोशन अली साहब, सब कुशल तो है?" बासुदेव ने फडकते दिल के साथ पूछा।

"वासूदेव जी, हमने. तो बहुत समझाया-मगर वो मान कर ही नहीं दिया । " रोशन अली मायूस-से बोले।

"कौन मानकर नहीं दिया?" वासूदेव समझ नहीं पाया।

' 'वही काले कमरे बाला।" रौशन अली सजीदा दिखने लगे थे, कुछ चिंतित भी ।।

वासूदेव समझ गया । धीमे से पूछा…"आपने क्या-और उसने क्या नहीं माना?"

"वासूदेव जी! मैं जानता हूँ कि आपने यह बंगला' बडे शौक से बनवाया है मगर इस मकान में रहना नसीब नहीं होगा। वह काले कमरे वाला कबूल करने को हरगिज तैयार नहीं। तुम्हें यह बगला हर कीमत पर वेच देना होगा । अगर तुमने इस मकान में रहने की जिद की तो तबाही फैलेगी । बस हम इतना ही बता सकते हैं और यह अटल है । फिर उसकी एक हिदायत और भी है कि यह मकान ऐसे लोगों कौ बेचा जाए । जिनका परिवार बहुत छोटा हो। बच्चे तो बिल्कुल न हों I "

"अजीब शर्त्त है। " वासूदेव ने अपना सिर पकडते हुए शिकायती लहजे में कहा---"फिर क्या फायदा हुआ इतना सब कुछ करने का. रोशन अली साहब, , जब में उस बगले में रह ही न सकूगा'... ।"

"फायदा यह हुआ कि तुम्हारा यह बगला बिक जाएगा । दूसरी सूरत में यह बगला बन ही नहीं सकता था हमेशा के लिए यू ही पडा रहता जैसे दाए बाए के प्लाट पडे है। उन प्लाटों पर कभी कोई मकान नहीं बन सकेगा। रोशन अली ने रहस्योंद्घाटन किया ।

वासूदेव घबरा गया ।।

" वह मेरे भाईयो के प्लाट है। कुछ कीजिए न...।"

' 'मैं जो का सकता था , वह कर दिया-जो बता सकता था बता दिया है। वासूदेव जी, अब तुम जानो ओर तुम्हारा काम । बस हमें हमारे धर तक छोड दें... । " इतना कह उन्होंने चुप्पी साथ ली।

जब घर आ आया तो गाडी से उतरकर अल्लाह हाफिज कहा और पीछे पलटकर भी न देखा।

टोने टोटकों मै माहिर इस रोशन अली के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद वासूदेव के दिल में अविश्वास पैदा हो गया ।।

उसने सोचा कि रोशन अली ने प्रेत को कमरे में बद कर ही दिया है-अब 'कमरे वाले' को इस बात से क्या लेना-देना कि बगले' मे' वासूदेव रह रहा है या कोई और ।।

वासूदेव के इस विचार का समर्थन उसके कुछ प्रियजनों ने भी किया।

और वासूदेव ने अपने इस शोक में बनाये इस खूबसूरत मकान में शिफ्ट होने का फैसला कर लिया ।

अपने इस बगले के लिए उसने नया फर्नीचर बनवाया था । सबसे पहले उसने वह फर्नीचर वहा पहुचा दिया। कमरों में कालीन पहले ही बिछाये जा चुके थे । फर्नीचर सैट करने के बाद घर एकदम जगमगा उठा ।

लेकिन अगले ही दिन जब वासूदेव और सामान लेकर आया और वगले में पहुचा तो उसक्ती अक्ल गुम हो गई। हर कमरे में बिछा कालीन और बेशकीमती फ़र्नीचर कोयले की तरह काला हो चुका था । आग लगी होने का कोई लक्षण-दीवारों पर या दरवाजो-खिडकिंर्यों. पर कही भी नजर नहीं आते थे, लेकिन कालीन और फर्नीचर जलकर कोयला हो चुके थे।

झटका लगा तो वासूदेव को रोशन अली याद आए। उन्होंने ने गलत न कहा था कि वासूदेव की जिद्द तबाहरी को दावत देगी । और वासूदेव यह तबाही अपनी आखों से देख रहा था।

वासूदेव ने फोरन कान पकड़े और मकान बेचने का विज्ञापन अखबारों मे दिया ।

यह सशर्त 'एड' अमर ने पडी तो उसकी दिलचस्पी जागी और उसने फोरन वासुदेव को कान्टेक्ट किया । शाम को बगत्ता' देखा। बंगला' वेहद खूवसूरत था । उसे बहुत पसन्द आया । वासूदेव ने उससे कोई बात नहीं छिपाई । यह बगला बनाने के सिलसिले से उस पर जो गुजरी थी वह सव बिना कम ज्यादा किये सुना डाली।

बगले के बारे में यह रोंगटे खडे कर देने वाला विवरण सुनकर अमर थोडा हिचकिचाया । उसे हिचकिचाते देख वासूदेव ने उसे फोरन रोशन अली का फोन नम्बर दे दिया कि अमर उससे मिलकर, चाहें तो अपनी तसल्ली कर लैं।

अमर, रोशन अली से मिला । रोशन अली के बारे में उसने पहले ही सुन रखा था। उसने रोशन अली क्रो बताया कि वह 'काले कमरे' बाला मकान खरीदना चाहता है । यह भी बताया कि घर में सिर्फ दो प्राणी हैँ---एक वह और एक उसकी गंगा मोसी और उसका शादी करने का भी कोई इरादा नहीं है। रोशन अली की निगाह में यह उस वगले' के लिए उपयुक्त पार्टी थी।

रोशन अली ने अमर को विश्वास दिला दिया कि अमर निसंकोच वह बगला ख़रीद सकता है कि उन्हें उस बंगले में कोई नुकसान नहीं पहुचेगा उधर' न ही 'कोई कष्ट ।

और यूं अमर ने वासुदेव से यह मकान खरीद लिया था।

इस मकान में रहते हुए उन्हें अब अर्सा हो गया था । कभी कोई बात सामने नहीं आई थी। हां, उन्होंने रोशन अली की हिदायतों व निर्देशो पर पूरा-पूरा अमल किया था । उस बंद काले कमरे के प्रति कभी कोई जिज्ञासा या दिलचस्पी भी नहीं दिखाई थी । न ही कभी किसी आने-जाने वाले को उस कमरे के बारे में कुछ बताया था । वेसे भी वह कमरा, एक तरफ हटकर ब सबसे अन्त मे था मकान के पिछवाडे जाने के लिए ही उसके सामने से गुजरना पडता था । बाहर का आदमी उधर जाता नहीं था और घर के लोगों को पिछले हिस्से में जाना होता तो बैडरूम का एक दरवाजा बाहर की ओर खुलता था।

नौकरानी माया को भी इस कमरे की हकीक्ल का पता नहीं था। उसे भी बस इतना ही पता था कि इसमें काठ-कबाड़ पड़ा है । हां-गगा मोसी से अमर ने कोई बात नहीँ छिपाई थी।

रेखा को इस धर में आए लगभग एक साल ही हुआ था।

गंगा मौसी ने उसे इस कमरे के बारे में कुछ न बताया था। और रेखा के मिजाज में जिज्ञासा न थी , सो उसने इस कमरे को, जैसा कि उसे बताया गया था, एक स्टोर रूम के रूप में कबूल कर लिया था।

लेकिन आज, मौजूदा सनसनीखेज अविश्वसनीय हालत में जब रेखा ने गंगा मोसी को दादा हरि ओम के दिये लिफाफे से निकले कागज को दिखाया और कागज पर बने रेख़ा चित्रों पर मौसी की नजर पडी तो कुछ क्षणों के लिए तो वह कापकर रह गई।

रेखा, गंगा' मौसी से इस बगले' व काले कमरे की कहानी सुन का दहल उठी ।।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

कुछ देर सगीन खामोशी रही ।

रेखा तो जेसे इस सिलसिले में कुछ कहते हुए भी डर रही थी । खामोशी हो बौझ बन गई तो रेखा ने अपने होठो पर जिव्हा फिराई व बोली-- ''यह...यह सव क्या हो रहा है, मोसी?"

' 'मेरी ती कुछ समझ में नहीं आ रहा है। ' ' मौसी परेशान लहजे में बोली--' 'तुम्हारा सपना देखना.. . तुम्हारे दादा हरि ओम का तुम्हें लिफाफा देना…लिफाफा में काले कमरे के दरवाजे क्री तस्वीर निकलना और फिर किसी शख्स का पिन्जरे में वद उल्लू दे जाना I प्रभु कृपा करें, रेखा... । जाने क्या होने वाला है। ‘ '

तभी माया कमरे में आई । वह बेहद घबराई हुई थी I वह बोली और उसके मुह से सिर्फ इतना ही निक्ला था---"बीबी. . .बो .. .उल्लू। ' '

"हा, क्या हुआ उल्लू क्रो? ' ' रेखा ने घबराकर पूछा, वह माया की हालत देखकर सहम गई थी।

'' वो...बो मर गया बीबी...उसे किसी ने मार दिया । बहा खून ही पड़ा है...खून...ही...खूनन... I‘ ' माया ने अटक अटक कर बताया ।।

' 'यह कैसे हो सकता हैँ, माया! यह तुम क्या कह रही हो? " रेखा का दिल कांप' रहा था ।

"जो देखा-वही कह रही हूँ बीबी I आप खुद चलकर देख ले । " माया भी खुद को कहा सम्भाल पा रही थी।

रेखा और गंगा मौसी माया के पीछे पीछे सीढियों तक पहुची । सीढियों के पास पहुच कुछ क्षणों तक वे गूगा ही खडी रह गई। माया ने गलत न कहा था। वहा पिन्जरे में चारों तरफ खून ही खुन पडा था।

इतना खूना एक इतने से पक्षी में बकरे जितना खुन कहा से आया भला?

उस उल्लू का एक पंख' खुला हुआ था। गर्दन अजीब तरह सै मुडी हुई थी और पेट में छेद था…एक खासा बडा, धाव । ऐसा लगता था जेसे किसी ने किसी तेज धार हथियार से उसका पेट फाड़ दिया हो। उसका पिन्जरा बिल्कुल सही अवस्था में था I दरवाजा बन्द था । यह सदेह भी नहीं किया जा सकता था कि दरवाजे खुल जाने कीं स्थिति में किसी बिल्ली ने उसे झझोड डाला हो।

वे तीनों अभी साकत- हतप्रद इस भयावह दृश्य का ही नजारा कर रही थी' कि अचानक रेखा की नजरें उन पद चिन्हो पर पडी जो उल्लू के खून से निक्लकर बरामदे की तरफ चले गए थे । ये नगे पैरों के निशान थे पैरों की पाचों उगलियों व ऐडी का निशान बहुत स्पष्ट था ।
 
"ये...ये...पैरों के निशान किसके है." रेखा ने सहमी निगाहों से गंगा मोसी क्री तरफ देखा।

गगा मौसी भी उन पद चिन्हों को ही देख रही थी उसने तेज आबाज में पूछा---"माया" क्या तू घुसी थी इस खून में ।"

“क्या कह रही हैं, बडी बीबी! मै...मै.,जाऊंगी खून में…मेरा तो देखकर ही दम बाहर आ रहा है... ।"

"मौसी! ' ' रेखा बौली-"कदमों के निशान तो बरामदे की तरफ मुड गए है। आईए-आगे चलकर देखते है... ।"

गंगा' मोसी और रेखा हिम्मत करके आगे बढी। घर की सारी लाईट्स आन थीं I रोशनी में खून से सने कदमों के निशान साफ स्पष्ट नजर आ रहे थे । राहदारी के घूमते ही वे निशान राहदारी में दूर तक दिखाई दिए । वे ज्यों ज्यो आगे बढते, गए ये यद चिन्ह मधयम पडते गए।

न तो ये निशान मकान के पिछबाडे की तरफ गए थे और न ही दाई तरफ सीढियों के नीचे उतरे थै कि सोचा जा सकता कि आने बाला फ्लांग कर साथ वाले खाली प्लाट के अहाते में चला गया। बल्कि ये निशान आगे जाकर आखिरी कमरे के दरवाजे पर जा खत्म हुए थे I

और राहदारी का यह आखिरी कमेरा वही ताला लगा कमरा था --जिस के हैण्डल पर काला ताबीज लटका हुआ था ।

इस बंगले का वही काला कमरा जो आरम्भ सै ही बन्द था।

पद-चिन्ह दरवाजे पर आकर रूक गये थे। यही लगता था कि वो शख्स इस कमरे में अन्दर चला गया है और उसने अंदर जाकर दरवाजा बन्द कर लिया है ।

लेकिन इस काले कमरे का दरवाजा बन्द था-ताला भी लगा था और उसके हैण्डल पर काला ताबीज पूर्ववत था जो रोशन अली ने लटकाया था । खून से सने, कदमों के निशान यहा खत्म हौते देखकर उन तीनों के ही दिल तेजी से धकडने लगे। वे तीनों गैरइरादी तोर पर एक्त-दूसरे के करीब आ गई।

"मोसी यह क्या है? '' रेखा ने उसकी तरफ डरी. डरी. निजरो से देखा ।

”प्रभु कृपा करें l " गंगा' मोसी भीतर से काप उठी ।

' 'बीबी यह तो स्टोर में घुस गया है। ' ' माया ने अपनी राय पेश की । वह इस वन्द कमरे कीं कहानी से अनजान थी, वरना वो तो शायद इस घर की नोकरी ही छोड़कर कभी क्री जा चुकी होती।

' 'आजा ,मेरी बच्ची, आ जा... । ' ' गंगा मोसी ने रेखा का हाथ पकडा और अपने घुटनों क्री तक्लीफ के बावजूद, जिस कदर तेज चल सकती थी, चली ।

उन्होंने अपने कमरे मे आकर ही दम लिया । इतनी सी ही देर में बुरी तरह हांफने लगी थी ।

उन्होंने इशारे से पानी मागा'।

रेखा ने फ्रिज में से पानी निक्रालकर उन्हें पिलाया। पानी पीकर उन्होंने गहरा सास' लिया फिर चिन्तित्त स्वर में बोली---

‘ 'यह इस घर मे क्या अशुभ हो गया है?"

' ‘में क्या कहुं मोसी? ' ' रेखा स्वयं सहमी हुई थी।

गंगा मौसी ने कुछ कहने को मुह खोला ही था कि कॉलबेल बजी ।

' 'अमर आ गया । ' ' मोसी की जैसे जान में जान आई थी--''जाओ, जाकर दरवाजा खोलो । ' '

”यह ऊहोने घन्टी क्यों बजाई है...हमेशा की तरह गाडी का हार्न क्यों नहीं दिया...?' ' रेखा उलझती हुई बोली ।

"ओह्र, हा' ।" मौसी चौकी--"तुम ठीक कहती हो, माया! जरा देख तो कौन आया है? ' '

दरवाजे पर अमर ही था। वह गाडी सर्विस के लिए गैराज में छोडकर आया था।

माया ने दरवाजा खोला तो अमर भीतर आ गया उसने कदम अन्दर रखते हुए पूछा-"मौसी और रेखा वापस आ गई?"

"जी, साहब जी । वे तो बहुत पहले ही आ गई थी। ' '

"मौसी कहा है? "

' 'अपने कमरे में। " माया ने बताया-"बडी गडबड… हो गई है, साहब जी । "

' 'क्या हुआ माया? कुशल तो है न?" अमर गगा मौसी के कमरे की तरफ वढता, हुआ बोला--' 'रेखा ऊपर है?" "नही जी-रेखा बीबी भी बडी बीबी के पास ही हैँ, उनके कमरे में। "

ऊपर जब सीढ़ियों के पास पहुचा तो. पिन्जरा और उसके गिंर्द फैला खून देख़कर बौखला गया--"यह क्या' है?“ फिर उसकी नजर पिन्जरे के अन्दर उल्लू पर पडी, "यह पिन्जरा कहा से आया? और...और इसके अंदर यह कौन-सा पक्षी है? इसे किसने मारा?"

"साहब जी! अंदर चलें बडी. बीबी के पास... ।' ' माया ने इतने सारे सवालों का एक ही जबाब दिया।

अमर जब गंगा मोसी के कमरे में पहुँचा तो उन दौनों के चेहरों पर ह्रबाईया उड़ रहीँ थीं। गंगा बैड पर टाग' लटकाए बैठी थीं और रेखा उनके कदमों में कालीन पर अमर रेखा के करीव आ बैठा।

"यह बाहर क्या हुआ' है?" उसने पूछा---"यह सब क्या चक्कर है? यह मरा हुआ पक्षी, खून...पिन्जरा...?"

-रेखा बोली-- "जी भाई! मै आपको सारी बात बताती हूँ।” रेखा ने कहा- फिर माया को किसी बहाने बाहर भेज दिया। और फिर उसने सारी कहानी संक्षेप में ही अमर को सुना डाली।

यह कहानी रेखा के ख्वाब से शुरू होती थी। पहले उसने अपना ख्वाब सुनाया-उसके बाद बडे दादा हरि ओम के बद' लिफाफे का जिक्र किया-फिर एक रहस्यमय व्यक्ति के उल्लू का पिंजरा' दे जाने की चर्चा की..फिर यह बताया कि उस लिफाफे से' क्या निकला । उसके बाद उल्लू के खून की कहानी सुनाई और यह बताया कि उल्लू के खून से सने कदमों के निशान कहा जाकर खत्म हुए है।

अमर के होश उड गए।

कुछ ही घंटों में बात कहा से कहा पहुच गई थी। उसे इन घटनाओं की ज्यादा चिन्ता न थी । लेकिन यह बात काले कमरे पर खत्म हो रही थी सबसे ज्यादा फिक्र व खौफ की बात यह थी । यह बगला खरीदे उन्हें सात-आठ साल हो चुके थे और अभी तक खौफजदा कर देने वाली कोई घटना नहीं घटी थी। हक्रीकत यह थी कि काले कमरे और उससे जुडी. कहानी क्रो वे लोग भुल ही चुके थे ।

बल्कि अमर तो कभी कभी सोचता' था कि पहले वाला मकान मालिक जरूर वहमी और अंधविश्वासी शख्स था कि ख्वामख्वा ही भयभीत होकर उसने सस्ते दामों बगला' बेच डाला कि यहां भूत-प्रेत नाम क्री कोई चीज नहीं है ।

लेकिन अब...? अब रेखा की इस अविश्वसनीय, होश उडा. देने वाली कहानी ने उसके होश सचमुच ही उड़ा दिए थे।

अमर गंगा मौसी के कमरे से निक्लकर काले कमरे के दरवाजे पर पहुचा' । उसने उन खून आलूदा क्दमों के निशानों कौ बड़े ध्यानं सै देखा I वे वाकई इस बन्द दरवाजे पर आकर खत्म हो गए थे I फिर वह उन निशानों को गोर से देखता हुआ पिंजरे' तक पहुचा' । उसने मरे हुए उल्लू पर एक नजर डाली और एक बार फिर उन रक्तिम पद चिन्हों का अनुसरण करते चला। रेखा उसके पीछे चल रही थी । गगा मौसी अपने कमरे से नहीं निकली थी।

"रेखा क्या आपने इन कदमों के निशानों को गोर से देखा है?” अमर ने सवाल किया।

"जी देखा है। निशान नगे 'पाव' के है। यही कहना चाहते हैँ न आप?"

“हा ,, यह बात तो ठीक है, यह शख्स नंगे' पाव था।” अमर पद चिन्हों को गौर से देखते हुए बोला--"इसके अलावा एक बात और है I "

"वह क्या भाई? " रेखा उसकी सूरत देखने लगी ।

"यह सिर्फ एक पैर के निशान हैँ?" अमर ने बताया ।

"एक पेर के निशान? ' ' रेखा कुछ उलझ-सी गई-- ' 'मै कुछ समझी नहीं, भाई... ! "

”यह शख्स एक टाग का है... । " अमर ने रह्रस्योद्घाटन किया।

और यह सुनकर रेखा के जिस्म में खौफ की एक लहर दौड गई।

' 'एक टांग' का... ।" वह सहमकर बोली-- यह आप केसे कह सकते है? ''

' 'यह बात बस इत्तफाक से मेरे जहन मे आ गई है । ' ' अमर निशानों कीं तरफ देखते हुए बोला---' 'यहां सै वहा तक जितने भी कदमों के निशान हे-ये सब एक ही पैर के निशान हैं और यह दाया पैर है। क्योंकि इन निशानों के अनूठे का निशान पैर के बाई तरफ है निशान पेर के बाई तरफ है । अगर ये दोनों पैरों के निशान हौते तो अगूठे' का निशान पेरों के दोनों तरफ होता। इस शख्स का बाया' पैर नहीं है । ' '

रेखा पदचिन्हों को घूरने लगी थी, वह बोली--' 'आपने ठीक पहचाना भाई! यह निशान बाकई एक ही पैर के है । लेकिन अब एक सबाल उठता है । ' '

' 'वह क्या. .. ? ' '

‘ 'क्या यह शख्स एक टाग का है बौ, फिर वह किसी बैसाखी या लाठी के सहारे चलता होगा... l "

' 'हां-साफ जाहिर है l ' ' अमर की मुण्डी सहमति में हिली । ' '

”तो फिर पैर के साथ वैसा कोई निशान क्यों नहीं है? "

' 'हां, वाकई! " अमर की मुण्डी फिर हिली ।

' 'यह बात भी ध्यान देने लायक है।"

' 'भाई! ऐसा भी मुमकिन है कि उसकी लाठी या बैसाखी खून से न सनी हो?" रेखा ने अपने सबाल का खुद ही जवाब दिया ।

' 'हां, यह भी हो सकता है। ' ' अमर सोचपूर्ण लहजे में बोला ।

इस मकान की कहानी सुनाते हुए पिछले मकान मालिक वासुदेव ने एक मलंग किस्म के शख्स का जिक्र किया

धा जो चाँदनी रातों में छ: फुट ऊँची चारदीवारी पर एक टाग' सै नाचा करता था । इस बगले' क्री यह अविश्वसनीय कहानी उसी रहस्यमय मलग से शुरू हुई थी । इस वक्त वही एक टाग वाला मलंग अमर को याद आ गया था । उसने चाहा कि बो रेखा का ध्यान उस मलग' की तरफ दिलाए-लेकिन वह कुछ सोचकर रह गया ।
 

Similar threads

S
Replies
69
Views
70
StoryPublisher
S
S
Replies
1
Views
11
StoryPublisher
S
S
Replies
30
Views
31
StoryPublisher
S
S
Replies
6
Views
47
StoryPublisher
S
Back
Top