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‘ 'इन्द्रजीत्त बहुत ही बुद्धिमान लडका था। दस बारह साल की उम्र तक पहुचते पहुचते उसने वहुत कुछ सीख लिया । तैराकी घुडसवारी ड्राईविंग कुश्ती निशानेबाजी उसकी उठान भी बहुत अच्छी थी। वह बारह सार की उम्र मे भी चौदह साल साल का लगता था l और तुम्हारे पिता कृष्णकांत की पसन्द के विपरीत उसे दिहात की जिन्दगी से बहुत लगाव था । उसका बस नहीं चलता था कि वह सावनपुर में ही स्थाई रूप सै आकर रहे I इन्द्रजीत ने यह भी बहुत जल्द जान लिया था कि उसके चाचा ने अपने बडे भाई के सीधेपन से खून फायदा उठाया था । इन्द्रजीत जान गया था कि उसके बाप की ज़मीन-जायदाद कितनी है।"
'' औय जव रमाकांत ने इन्द्रजीत्त क्रो सिर उठाते देखा तो वह चिन्तित्त हो उठा और लगा विभित्र तरकीबें सोचने। उसके साजिशी दिमाग में साजिशें पकने लगी। अपने भाई से उसे कोई ख़तरा न था क्योंकि वह चौव्वन साल का हो चुका था और अपनी जिन्दगी के अन्तिम चरण में पहुच रहा था । मगर किशोर इंद्रजीत तो उसकी निगाह में वह डाकू था जो घर की दीवारो' पा चढने की कोशिश कर रहा III--अगर उसे फोरन ही न रोका गया तो उसका घर में घुस आना यकीनी था।"
"ख़लनायिकी फितरत वाले वाले रमाकांत का शातिर दिमाग वडी तेजी से काम कर रहा था। वह तुम्हारे भाई इन्द्रजीत क्रो लेकर विभित्र मसूबों पर सोच बिचार कर रहा था। उधर तुम्हारा चाचा अपना जाल बुनने में व्यस्त था तो इधर तकदीर अपना खेल खेल रही थी । रमाकांत किसी भी तरह कृष्णकात के इकलौते वारिस से छुटकारा चाहता था कि एक और बारिस दुनिया में आ गया।"
"और वह तुम थीं। बारह बर्ष बाद, भगवान ने कृष्णकात' के घर में एक बार फिर खुशियों के दीप रोशन कर दिए I कृष्ण कात को बेटी की बहुत ख्वाहिश थी । उसकी यह ख्वाहिश आखिर तुम्हारी मोहिनी सूरत में पूरी हो गई ।' '
' 'तुम्हारे भाई इन्द्रजीत ने जब से सावनपुर के चक्कर लगाने शुरू किये थे, तब से ही रमाकात के तेबर बदलने लगे थे । और इन तेवरों क्रो कृष्णकांत भलीभाति समझ रहे थे । इन्द्रजीत्त जब भी सावनपुर जाता कृष्ण कांत का दिल अज्ञात भय से घडकने लगता I वह अपने बेटे को जाने से नहीं रोकते थे-लेकिध दिल से चाहते थे कि वह सावनपुर न जाए। उनके दिल में अदेशे से उठते थे। और अपने अज्ञात खौफ से पेशेनजर उन्होंने इन्द्रजीत के साथ दो ट्रेण्ड बॉडीगार्ड भेजने शुरू कर दिए थे। यू जब इन्द्रजीत्त अपने बाडीगाडों के साथ हवेली के सामने जीप से उतरता तो रमाकात की आखों में किसी काटे क्री तरह चुभ जाता। ' '
' ' और फिर अन्तत: तुम्हारे चाचा रमाकात ने एक मसूबा बना ही लिया कि उसे क्या करना है । रमा कात का छोटा वेटा विजय हालाकि इन्द्रजीत से उम्र में बडा था लेकिन उसकी इन्द्रजीत से घनिष्ठता थी । साबनपुर में वे जहा भी जात्ते इकट्ठे जाते । इन्द्रजीत को अपने बाप की तरह शिकार का शोक था। एक बार जब वह सावनपुर पहुचा तो हमेशा क्री तरह तीतर के शिकार का प्रोग्राम बन गया। ' '
' 'रमाकात ने इस बार सारी योजना बना रखी थी । इन्दजीत के दोनों बाडीगार्डों' क्रो दूध में अफीम मिलाकर दे दी गई और सुबह सवेरे जब इन्द्रजीत अपने चैचरे भाई विजय और दूसरे नौकरों के साथ शिकार पर जाने क्रे लिए निकला तो हवेली के फाटक पर उसे सूचना दी गई कि उसके दोनों बाडीगार्ड गहरी नींद सो रहे है । बार-बार उठाये जाने पर भी नहीं उठे हैं । इन्द्रजीत ने सोचा शायद दोनों रात भर ताश खेलते रहे होंगे । पर इंद्रजीत को शिकार पर अपने इन बाॅडीग़ार्डो की जरूरत भी नहीं थी। वह उन दोनों को सोता छोडकर शिकार पर निकल गया । "
“और फिर...अस्पताल में तुम्हारे पिता को दो खबरें मिलीं । तुम अदाजा' लगा सकती हो कि वे दो खबरें क्या रही होंगी I भईं, पहली खबर तो तुम्हारे बारे में थी I यह खुशखबरी कृष्ण कांत को पूरे बारह साल बाद मिली थी। जव नर्स ने एक फुल-सी बच्ची पैदा होने की सूचना तुम्हारे बाप को दी तो यह खबर सुनकर वह मारे खुशी के नाचने ही तो लगे थै । इतनी खुशी तो उन्हें तुम्हारे भाई इन्द्रजीत के जन्म पर भी नहीँ हुई भी। तुम्हारे पिता को लडकिया बहुत पसन्द थीं I वह तुम्हारे जन्म को बडी धूमधाम से मनाना चाहते थे लेक्लि वक्त ने कुछ और ही गुल खिला दिया ।"
' 'एक अच्छी ख्वय के बाद फोरन ही एक दूसरी बुरी ख्वर मिली और यह बुरी खबर थी तुम्हारे भाई इन्द्रजीत के बारे में और यह ख़बर लेकर आया था रमाकांत का बडा बेटा सूरज ।!
’ 'उस वक्त जब तुम्हारा बाप तुम्हारे जन्म की खुशखबरी किसी को सुनाने को बेताब था ऐन उस वक्त सूरज अचानक ही तुम्हारे बाप के सामने आकर खड़ा हो गया था । उसका सिर झुका हुआ था और चेहरे पर वहशत बरस रही थी। कृष्णकांत उसकी सूरत देख़कर अपनी खुशी भूल गए । उन पर थर्राहट व्याप्त हो गई I तत्काल ही उनके दिमाग में जो पहला ख्याल आया था कि उनके भाई रमाकात का देहान्त हो गया है। लेकिन रमाकांत भला आसानी से मरने वाली चीज कहा था। यह खबर तुम्हारे चाचा के बजाय तुम्हारे भाई के बारे मै थी।"
सूरज...ने बडे नाटकीय अवाज मे अपना सिर उठाया...बाहे फैलाई और तुम्हारे पिता से लिपट कर बेतहाशा रो पढा। और रोते-रोते बोला--
”ताया जी, हमारे भाई को डाकू उठा ले गये । ' ' यह ख्वर सुनकर कृष्णकात की जहन में सन्नाटा उतर गया। घबराकर ही पूछा-"किस भाई को...?"
‘ 'हमारे भाई, इन्द्रजीत्त को… l ' ' सूरज ने अपनी भीगी पलके पोंछते हुए कहा ।
"इस तरह अस्पताल में तुम्हारे पिता को दो अच्छी बुरी खबरें एक साथ मिली I और उनका हाल हुआ सो हुआ। लेकिन जब तुम्हारे चाचा रमाकात को यह खबर मिली कि बड़े भाई के यहां बारह साल के बाद बच्ची ने जन्म लिया है तो वह खुशी जो इन्द्रजीत क्रो डाकुओं द्धारा उठाए जाने की वजह से हुईं थी-दिल में तीर बनकर चुभ गई।
"उसने अपने तौर पर जायदाद के बारिस को मिटाने की कोशिश की थी । लेकिन ऊपर वाले ने उसकी कोशिश को नाकाम बना दिया था । वह बडे शेतानी मिजाज का आदमी था उसके दिमाग में जो शैतानी आ जाती थी उसे निकालना फिर आसान न होता I जायदाद के लालच ने उसको अंधा कर दिया था I उसके दिमाग में यह बात बैठ चुकीं थी कि जायदाद के मालिक यानी तुम्हारे पिता कृष्णकात को कुछ नहीं कसना है I क्योकि वह तो खुद ही मौत के करीब होता जा रहा था । कितने बरस और जीता । और जायदाद के वारिसों को छोडना नहीं है। ताकि लाठी भी न टुटे और जितने भी साप राह में आए मर जाएं । और उस पर कोई उंगली भी नहीं उठा सके।"
"तुम्हार भाई इन्द्रजीत्त के साथ क्या हुआ? जगल में उसका अपहरण किसनै किया और किसने करवाया. ..वो कहा पहुचा और उस पर क्या बीती? अगर मौका मिला तो यह सब बाद में बताऊगा, फिलहाल तुम अपने बारे में जान ली। एक बेनाम सी खटक जो तुम्हारे पिता के दिल में होती रहली थी...ओर कई अनजाने अन्देशे से जो उनके दिमाग में सिर उठाते रहते थे...इन्द्रजीत्त के अपहरण ने उन्हे… सच साबित कर दिखाया था। वह नहीं चाहते थे कि इन्द्रजीत सावनपुर जाए लेकिन वह लडका मानता ही नहीं था। अखिर नतीजा सामने आ गया । अब वह अपने भाई कीं तरफ से शंकित हो गया l उन्हें अन्दाजा हो गया कि रमाकांत क्या चाहता है । लेकिन समस्या यह थी कि वह उनका माई था-विना सबूत के वह उससे कुछ नहीं कह सकते थे I ' '
"तुम्हारे पिता बिना प्रमाण के उसकी तरफ उगली उठाने को तैयार न थें-और रमाकात ऐसा शातिर था कि सबूत छोडता, न था। तुम्हारे भाई को ख़त्म करवा के वह बहुत खुश था कि अपनी राह का सबसे बड़ा काटा' निकाल फेंका है I लेकिन तुम्हारे जन्म ने उसके सपनो को खाक में मिला दिया था और यह उसे बर्दाश्त न था I ' '
' 'सो उसने अपने दिमाग की कमान में साजिश का एक तीर और चढाया, और अब तुम उसके निशाने पर थीं। लेकिन वो जानता था-जिस लडकी… को निशाना बनाने जा रहा है उसका नाम शीना है जो अपने आप में चीते कीं खसलत रखती है ।' '
"जिस नाम को सुनकर तुम बार बार चौकती ही। यह अर्थपूर्ण लेकिन प्यारा सा नाम वास्तव में तुम्हारे दादा सर निहाल चंथ क्रो बहुत पसन्द था। वह प्राय: कहा करते थे कि अगर मेरी कोई लडकी. होती तौ मॅ उसका नाम शीना रखता। भगवान ने उन्हें कोई बेटी न दी। जब तुमने जन्म लिया तो तुम्हारे पिता क्रो अपने पिता क्री तृष्णा याद आई और उन्होंने तुम्हारा नाम शीना रख दिया ।।
लेकिन.. .यह प्यार भरा नाम चल न सका ।
हालात ने ऐसा पलटा खाया की तुम्हारा नाम बदलकर रेखा रख दिया गया ।
इस तरह तुम अपने असली नाम के बारे में कुछ न जान सकीं। यह नाम बस कुछेक जहनों में ही सुंक्षित रह गया।”
' ‘तुम्हारे पिता कृष्णकांत अपने भाई की तरफ सै शकित तो हो ही चुके थे, लेकिन उनकी फितरी शराफत ने कोई सीधा व सख्त कदम न उठाने दिया । वह जालिम की बजाय मजलूम बनना पसन्द कर लेते थे । वह मुह' पर जवाबी थप्पड मारने की बजाये अपना दूसरा गाल पेश करनै के आदी थे। ' '
"हर कोई उसे समझा रहा था कि तुम्हारा भाई हस्ती मिटाकर, जमीन जायदाद पर कब्जा कर लेना चाहता है। इन्द्रजीत्त को भी उसने गायब करवा दिया है और अब उसके बाद शीना का नम्बर है। होशियार हो जाओ । लेकिन जवाब में बह हसकर कहते-- "'अरे नहीं ऐसा कैसे हो सकता है?"
' 'लेकिन ऐसा हो रहा था । तुम्हारी मां, तुम्हें जन्म देने के बाद, मुश्किले से तीन माह ही जिन्दा रह सकी । उन्हें अपने बेटे इन्द्र से बहुत मुहब्बत थी। उसके गुम होने की खवर ने ही उन्हें दुनिया से बेगाना कर दिया था I कृष्णकांत' जब भी घर लौटते-चह बस एक ही सबाल पूछती "मेरा इन्द्र कहा है? ''
' 'तुम्हारे पिता कृष्णकांत' कोई छोटे मोटे आदमी न थे । असीमित रसूख था उनका , फिर रुपये पैसे की कोई भी कोई कमी न थीं । पुलिस ने सावनपुर के जगलों का और उस इलाके का चप्पा-चप्पा छान मारा-लेकिन इन्द्रजीत्त का कोई सुराग न मिला । उसका कुछ पता लगता भी कैसे उसे डाकुओं ने उठाया ही कहां था । बहरहाल इन्द्रजीत न मिला, न उसके बारे में कोई ख़बर मिली और न ही उसकी लाश मिली । तुम्हारी मा' अपने बेटे क्री याद में होश गबा बैठी और फिर अन्तत: तीन माह की अवधि में तडप तडप कर मर गई। आखिरी सास लेते बक्त एक फ्रेम की हुई तस्वीर उनके सीने पर रखी हुई थी यह तुम्हारे भाई इन्द्रजीत्त क्री तस्वीर थी। बेटे इन्द्र की गुमशुदगी और सारिका की मौत ने तुम्हारे बाप क्रो हिलाकर रख दिया । वह बहुत कुछ सोचने पर मजबूर हो गए थे । अब उन्हें तुम्हारी चिन्ता दिन रात्त खाए जाती थी । कुछ इसके इशारे मिले थे जिससे यह जाहिर होता था कि रमाकात्त अब तुम्हारी जान का दुश्मन बन चुका है।"
' 'सौ अब सबसे बडी समस्या यही सामने थी कि तुम्हारी जिन्दगी केसे सुरक्षित रखी जाए । तुम्हारे पिता नहीं चाहते थे कि तुम्हारी जान भी, जायदाद की बलिवेदी पर चढा दी जाए I बह तुम्हें तुम्हारे चाचा की पहुच से और हाथों सै हमेशा के लिए महफूज कय लेना चाहते थे। सो उन्होंने एक प्लानिंग की और खूब थी उनक्री प्लानिंग ।"
”तुम्हारे पिता के एक बहुत अच्छे दोस्त थे रामदास । रामदास अम्बाला में रहते थे। उ…होंने रामदास को फोन करके दिल्ली बुलवा लिया। उन्हें सारे हालात बताए और उनसे बिनती की कि वह तुम्हें अपने साथ ले जाएं और अपनी वेटी बनाकर तुम्हारी परवरिश करें । उनकी समस्या जमीन जायदाद की न थी...तुम्हारी जिन्दगी कीं थी। कृष्णकांत की चिन्ता यही थी कि उन्हें अपनी बेटी की जिन्दगी बचानी है अगर यह बच गई तो बडी होकर अपना हक खुद हासिल कर लेगी और अगर यह मर गई तो फिर जायदाद किस काम की । बेटा पहले ही गायब कर दिया गया था और वह खुद बुढापे के आगन में था।"
"तुम उस वक्त तीन माह की थी जब तुम्हें रामदास के साथ अम्बाला रवाना कर दिया गया I यह काम बडी होशियारी और पूरी गोपनियता के साथ किया गया था। रामदास अपनी पत्नी के साथ आए थे। वे तुम्हें लेकय सकुशल अम्बाला पहुच गए तो उन्होंने तुम्हारे पिता को यह सूचना दे दी । तुम्हारी कुशलता को सूचना मिलते ही तुम्हारे बाप ने एक खबर तुम्हारे चाचा को भिजवा दी । और यह ख्वर थी तुम्हारी मौत कीं। यह ख्वर सुनकर तुम्हारा चाचा झुम उठा। वह तुम्हारे खून से अपने हाथ रगने से बच गया था। अब उसकी राह में कोई पत्थर न था...कोईं दीवार न थी । "
'' औय जव रमाकांत ने इन्द्रजीत्त क्रो सिर उठाते देखा तो वह चिन्तित्त हो उठा और लगा विभित्र तरकीबें सोचने। उसके साजिशी दिमाग में साजिशें पकने लगी। अपने भाई से उसे कोई ख़तरा न था क्योंकि वह चौव्वन साल का हो चुका था और अपनी जिन्दगी के अन्तिम चरण में पहुच रहा था । मगर किशोर इंद्रजीत तो उसकी निगाह में वह डाकू था जो घर की दीवारो' पा चढने की कोशिश कर रहा III--अगर उसे फोरन ही न रोका गया तो उसका घर में घुस आना यकीनी था।"
"ख़लनायिकी फितरत वाले वाले रमाकांत का शातिर दिमाग वडी तेजी से काम कर रहा था। वह तुम्हारे भाई इन्द्रजीत क्रो लेकर विभित्र मसूबों पर सोच बिचार कर रहा था। उधर तुम्हारा चाचा अपना जाल बुनने में व्यस्त था तो इधर तकदीर अपना खेल खेल रही थी । रमाकांत किसी भी तरह कृष्णकात के इकलौते वारिस से छुटकारा चाहता था कि एक और बारिस दुनिया में आ गया।"
"और वह तुम थीं। बारह बर्ष बाद, भगवान ने कृष्णकात' के घर में एक बार फिर खुशियों के दीप रोशन कर दिए I कृष्ण कात को बेटी की बहुत ख्वाहिश थी । उसकी यह ख्वाहिश आखिर तुम्हारी मोहिनी सूरत में पूरी हो गई ।' '
' 'तुम्हारे भाई इन्द्रजीत ने जब से सावनपुर के चक्कर लगाने शुरू किये थे, तब से ही रमाकात के तेबर बदलने लगे थे । और इन तेवरों क्रो कृष्णकांत भलीभाति समझ रहे थे । इन्द्रजीत्त जब भी सावनपुर जाता कृष्ण कांत का दिल अज्ञात भय से घडकने लगता I वह अपने बेटे को जाने से नहीं रोकते थे-लेकिध दिल से चाहते थे कि वह सावनपुर न जाए। उनके दिल में अदेशे से उठते थे। और अपने अज्ञात खौफ से पेशेनजर उन्होंने इन्द्रजीत के साथ दो ट्रेण्ड बॉडीगार्ड भेजने शुरू कर दिए थे। यू जब इन्द्रजीत्त अपने बाडीगाडों के साथ हवेली के सामने जीप से उतरता तो रमाकात की आखों में किसी काटे क्री तरह चुभ जाता। ' '
' ' और फिर अन्तत: तुम्हारे चाचा रमाकात ने एक मसूबा बना ही लिया कि उसे क्या करना है । रमा कात का छोटा वेटा विजय हालाकि इन्द्रजीत से उम्र में बडा था लेकिन उसकी इन्द्रजीत से घनिष्ठता थी । साबनपुर में वे जहा भी जात्ते इकट्ठे जाते । इन्द्रजीत को अपने बाप की तरह शिकार का शोक था। एक बार जब वह सावनपुर पहुचा तो हमेशा क्री तरह तीतर के शिकार का प्रोग्राम बन गया। ' '
' 'रमाकात ने इस बार सारी योजना बना रखी थी । इन्दजीत के दोनों बाडीगार्डों' क्रो दूध में अफीम मिलाकर दे दी गई और सुबह सवेरे जब इन्द्रजीत अपने चैचरे भाई विजय और दूसरे नौकरों के साथ शिकार पर जाने क्रे लिए निकला तो हवेली के फाटक पर उसे सूचना दी गई कि उसके दोनों बाडीगार्ड गहरी नींद सो रहे है । बार-बार उठाये जाने पर भी नहीं उठे हैं । इन्द्रजीत ने सोचा शायद दोनों रात भर ताश खेलते रहे होंगे । पर इंद्रजीत को शिकार पर अपने इन बाॅडीग़ार्डो की जरूरत भी नहीं थी। वह उन दोनों को सोता छोडकर शिकार पर निकल गया । "
“और फिर...अस्पताल में तुम्हारे पिता को दो खबरें मिलीं । तुम अदाजा' लगा सकती हो कि वे दो खबरें क्या रही होंगी I भईं, पहली खबर तो तुम्हारे बारे में थी I यह खुशखबरी कृष्ण कांत को पूरे बारह साल बाद मिली थी। जव नर्स ने एक फुल-सी बच्ची पैदा होने की सूचना तुम्हारे बाप को दी तो यह खबर सुनकर वह मारे खुशी के नाचने ही तो लगे थै । इतनी खुशी तो उन्हें तुम्हारे भाई इन्द्रजीत के जन्म पर भी नहीँ हुई भी। तुम्हारे पिता को लडकिया बहुत पसन्द थीं I वह तुम्हारे जन्म को बडी धूमधाम से मनाना चाहते थे लेक्लि वक्त ने कुछ और ही गुल खिला दिया ।"
' 'एक अच्छी ख्वय के बाद फोरन ही एक दूसरी बुरी ख्वर मिली और यह बुरी खबर थी तुम्हारे भाई इन्द्रजीत के बारे में और यह ख़बर लेकर आया था रमाकांत का बडा बेटा सूरज ।!
’ 'उस वक्त जब तुम्हारा बाप तुम्हारे जन्म की खुशखबरी किसी को सुनाने को बेताब था ऐन उस वक्त सूरज अचानक ही तुम्हारे बाप के सामने आकर खड़ा हो गया था । उसका सिर झुका हुआ था और चेहरे पर वहशत बरस रही थी। कृष्णकांत उसकी सूरत देख़कर अपनी खुशी भूल गए । उन पर थर्राहट व्याप्त हो गई I तत्काल ही उनके दिमाग में जो पहला ख्याल आया था कि उनके भाई रमाकात का देहान्त हो गया है। लेकिन रमाकांत भला आसानी से मरने वाली चीज कहा था। यह खबर तुम्हारे चाचा के बजाय तुम्हारे भाई के बारे मै थी।"
सूरज...ने बडे नाटकीय अवाज मे अपना सिर उठाया...बाहे फैलाई और तुम्हारे पिता से लिपट कर बेतहाशा रो पढा। और रोते-रोते बोला--
”ताया जी, हमारे भाई को डाकू उठा ले गये । ' ' यह ख्वर सुनकर कृष्णकात की जहन में सन्नाटा उतर गया। घबराकर ही पूछा-"किस भाई को...?"
‘ 'हमारे भाई, इन्द्रजीत्त को… l ' ' सूरज ने अपनी भीगी पलके पोंछते हुए कहा ।
"इस तरह अस्पताल में तुम्हारे पिता को दो अच्छी बुरी खबरें एक साथ मिली I और उनका हाल हुआ सो हुआ। लेकिन जब तुम्हारे चाचा रमाकात को यह खबर मिली कि बड़े भाई के यहां बारह साल के बाद बच्ची ने जन्म लिया है तो वह खुशी जो इन्द्रजीत क्रो डाकुओं द्धारा उठाए जाने की वजह से हुईं थी-दिल में तीर बनकर चुभ गई।
"उसने अपने तौर पर जायदाद के बारिस को मिटाने की कोशिश की थी । लेकिन ऊपर वाले ने उसकी कोशिश को नाकाम बना दिया था । वह बडे शेतानी मिजाज का आदमी था उसके दिमाग में जो शैतानी आ जाती थी उसे निकालना फिर आसान न होता I जायदाद के लालच ने उसको अंधा कर दिया था I उसके दिमाग में यह बात बैठ चुकीं थी कि जायदाद के मालिक यानी तुम्हारे पिता कृष्णकात को कुछ नहीं कसना है I क्योकि वह तो खुद ही मौत के करीब होता जा रहा था । कितने बरस और जीता । और जायदाद के वारिसों को छोडना नहीं है। ताकि लाठी भी न टुटे और जितने भी साप राह में आए मर जाएं । और उस पर कोई उंगली भी नहीं उठा सके।"
"तुम्हार भाई इन्द्रजीत्त के साथ क्या हुआ? जगल में उसका अपहरण किसनै किया और किसने करवाया. ..वो कहा पहुचा और उस पर क्या बीती? अगर मौका मिला तो यह सब बाद में बताऊगा, फिलहाल तुम अपने बारे में जान ली। एक बेनाम सी खटक जो तुम्हारे पिता के दिल में होती रहली थी...ओर कई अनजाने अन्देशे से जो उनके दिमाग में सिर उठाते रहते थे...इन्द्रजीत्त के अपहरण ने उन्हे… सच साबित कर दिखाया था। वह नहीं चाहते थे कि इन्द्रजीत सावनपुर जाए लेकिन वह लडका मानता ही नहीं था। अखिर नतीजा सामने आ गया । अब वह अपने भाई कीं तरफ से शंकित हो गया l उन्हें अन्दाजा हो गया कि रमाकांत क्या चाहता है । लेकिन समस्या यह थी कि वह उनका माई था-विना सबूत के वह उससे कुछ नहीं कह सकते थे I ' '
"तुम्हारे पिता बिना प्रमाण के उसकी तरफ उगली उठाने को तैयार न थें-और रमाकात ऐसा शातिर था कि सबूत छोडता, न था। तुम्हारे भाई को ख़त्म करवा के वह बहुत खुश था कि अपनी राह का सबसे बड़ा काटा' निकाल फेंका है I लेकिन तुम्हारे जन्म ने उसके सपनो को खाक में मिला दिया था और यह उसे बर्दाश्त न था I ' '
' 'सो उसने अपने दिमाग की कमान में साजिश का एक तीर और चढाया, और अब तुम उसके निशाने पर थीं। लेकिन वो जानता था-जिस लडकी… को निशाना बनाने जा रहा है उसका नाम शीना है जो अपने आप में चीते कीं खसलत रखती है ।' '
"जिस नाम को सुनकर तुम बार बार चौकती ही। यह अर्थपूर्ण लेकिन प्यारा सा नाम वास्तव में तुम्हारे दादा सर निहाल चंथ क्रो बहुत पसन्द था। वह प्राय: कहा करते थे कि अगर मेरी कोई लडकी. होती तौ मॅ उसका नाम शीना रखता। भगवान ने उन्हें कोई बेटी न दी। जब तुमने जन्म लिया तो तुम्हारे पिता क्रो अपने पिता क्री तृष्णा याद आई और उन्होंने तुम्हारा नाम शीना रख दिया ।।
लेकिन.. .यह प्यार भरा नाम चल न सका ।
हालात ने ऐसा पलटा खाया की तुम्हारा नाम बदलकर रेखा रख दिया गया ।
इस तरह तुम अपने असली नाम के बारे में कुछ न जान सकीं। यह नाम बस कुछेक जहनों में ही सुंक्षित रह गया।”
' ‘तुम्हारे पिता कृष्णकांत अपने भाई की तरफ सै शकित तो हो ही चुके थे, लेकिन उनकी फितरी शराफत ने कोई सीधा व सख्त कदम न उठाने दिया । वह जालिम की बजाय मजलूम बनना पसन्द कर लेते थे । वह मुह' पर जवाबी थप्पड मारने की बजाये अपना दूसरा गाल पेश करनै के आदी थे। ' '
"हर कोई उसे समझा रहा था कि तुम्हारा भाई हस्ती मिटाकर, जमीन जायदाद पर कब्जा कर लेना चाहता है। इन्द्रजीत्त को भी उसने गायब करवा दिया है और अब उसके बाद शीना का नम्बर है। होशियार हो जाओ । लेकिन जवाब में बह हसकर कहते-- "'अरे नहीं ऐसा कैसे हो सकता है?"
' 'लेकिन ऐसा हो रहा था । तुम्हारी मां, तुम्हें जन्म देने के बाद, मुश्किले से तीन माह ही जिन्दा रह सकी । उन्हें अपने बेटे इन्द्र से बहुत मुहब्बत थी। उसके गुम होने की खवर ने ही उन्हें दुनिया से बेगाना कर दिया था I कृष्णकांत' जब भी घर लौटते-चह बस एक ही सबाल पूछती "मेरा इन्द्र कहा है? ''
' 'तुम्हारे पिता कृष्णकांत' कोई छोटे मोटे आदमी न थे । असीमित रसूख था उनका , फिर रुपये पैसे की कोई भी कोई कमी न थीं । पुलिस ने सावनपुर के जगलों का और उस इलाके का चप्पा-चप्पा छान मारा-लेकिन इन्द्रजीत्त का कोई सुराग न मिला । उसका कुछ पता लगता भी कैसे उसे डाकुओं ने उठाया ही कहां था । बहरहाल इन्द्रजीत न मिला, न उसके बारे में कोई ख़बर मिली और न ही उसकी लाश मिली । तुम्हारी मा' अपने बेटे क्री याद में होश गबा बैठी और फिर अन्तत: तीन माह की अवधि में तडप तडप कर मर गई। आखिरी सास लेते बक्त एक फ्रेम की हुई तस्वीर उनके सीने पर रखी हुई थी यह तुम्हारे भाई इन्द्रजीत्त क्री तस्वीर थी। बेटे इन्द्र की गुमशुदगी और सारिका की मौत ने तुम्हारे बाप क्रो हिलाकर रख दिया । वह बहुत कुछ सोचने पर मजबूर हो गए थे । अब उन्हें तुम्हारी चिन्ता दिन रात्त खाए जाती थी । कुछ इसके इशारे मिले थे जिससे यह जाहिर होता था कि रमाकात्त अब तुम्हारी जान का दुश्मन बन चुका है।"
' 'सौ अब सबसे बडी समस्या यही सामने थी कि तुम्हारी जिन्दगी केसे सुरक्षित रखी जाए । तुम्हारे पिता नहीं चाहते थे कि तुम्हारी जान भी, जायदाद की बलिवेदी पर चढा दी जाए I बह तुम्हें तुम्हारे चाचा की पहुच से और हाथों सै हमेशा के लिए महफूज कय लेना चाहते थे। सो उन्होंने एक प्लानिंग की और खूब थी उनक्री प्लानिंग ।"
”तुम्हारे पिता के एक बहुत अच्छे दोस्त थे रामदास । रामदास अम्बाला में रहते थे। उ…होंने रामदास को फोन करके दिल्ली बुलवा लिया। उन्हें सारे हालात बताए और उनसे बिनती की कि वह तुम्हें अपने साथ ले जाएं और अपनी वेटी बनाकर तुम्हारी परवरिश करें । उनकी समस्या जमीन जायदाद की न थी...तुम्हारी जिन्दगी कीं थी। कृष्णकांत की चिन्ता यही थी कि उन्हें अपनी बेटी की जिन्दगी बचानी है अगर यह बच गई तो बडी होकर अपना हक खुद हासिल कर लेगी और अगर यह मर गई तो फिर जायदाद किस काम की । बेटा पहले ही गायब कर दिया गया था और वह खुद बुढापे के आगन में था।"
"तुम उस वक्त तीन माह की थी जब तुम्हें रामदास के साथ अम्बाला रवाना कर दिया गया I यह काम बडी होशियारी और पूरी गोपनियता के साथ किया गया था। रामदास अपनी पत्नी के साथ आए थे। वे तुम्हें लेकय सकुशल अम्बाला पहुच गए तो उन्होंने तुम्हारे पिता को यह सूचना दे दी । तुम्हारी कुशलता को सूचना मिलते ही तुम्हारे बाप ने एक खबर तुम्हारे चाचा को भिजवा दी । और यह ख्वर थी तुम्हारी मौत कीं। यह ख्वर सुनकर तुम्हारा चाचा झुम उठा। वह तुम्हारे खून से अपने हाथ रगने से बच गया था। अब उसकी राह में कोई पत्थर न था...कोईं दीवार न थी । "