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Adultery ' गाँव का टेलर '

कामिनी का सांस लेना भारी हो गया। उसे डर लग रहा था कि कहीं प्रताप नीचे न देख ले, या मेजपोश हिल जाए। उसने घबराहट में पानी का गिलास उठाया और पीने लगी।

"क्या हुआ बहू? मिर्च लगी?" राज ने पूछा, उनकी आंखों में एक शैतानी चमक थी।

"ज... जी... थोड़ा तीखा है," कामिनी ने झूठ बोला।

"मीठा खा लो," राज ने अपनी प्लेट से एक गुलाब जामुन उठाया और अपनी ही चम्मच से कामिनी की प्लेट में रख दिया। "मुंह मीठा करो।"

टेबल के नीचे, उनका पैर और ऊपर सरक गया। अब वे कामिनी की जांघ के अंदरूनी हिस्से को अपने अंगूठे से दबा रहे थे। वह हिस्सा बहुत संवेदनशील था।

कामिनी की योनि गीली होने लगी। यह जोखिम... यह डर... यह सब उसे पागल कर रहा था। राज का पैर अब खतरनाक हद तक ऊपर आ चुका था।

अचानक, राज ने अपना पैर उसकी दोनों जांघों के बीच फंसा दिया और दबाव बनाया। उनका पैर सीधे उसकी योनि के ऊपर (साड़ी के अंदर, लेकिन जांघों के बीच) था।

कामिनी की सिसकी निकलने ही वाली थी कि उसने अपने होंठ काट लिए। उसने मेज के नीचे अपना हाथ ले जाकर राज के पैर को रोकने की कोशिश की, लेकिन राज ने उसके हाथ को अपने पैर से दबा दिया।

"मुनीम जी," राज ने कहा। "जरा वो फाइल लाना जो मैंने कल दी थी। लाइब्रेरी में है।"

मुनीम जी उठकर दूसरे कमरे में गए। अब वहां सिर्फ तीन लोग थे। प्रताप अपने खाने में व्यस्त था।

राज ने अपना हाथ टेबल के नीचे डाला। उन्होंने कामिनी का हाथ (जो उनके पैर को रोकने गया था) पकड़ा और उसे खींचकर अपनी जांघ पर रख दिया।

"प्रताप," राज ने कहा। "तुम अपनी पत्नी का खयाल नहीं रखते। देखो, इसके हाथ कितने ठंडे हैं। बेचारी कमजोर हो गई है।"

प्रताप खाना खाने में व्यस्त था। उसने ऊपर देखा भी नहीं। "अरे, उसे एसी की आदत नहीं है भाईसाहब। गांव की है ना।"

राज ने कामिनी का हाथ अपनी जांघ पर और ऊपर खींचा। कामिनी की हथेली अब राज के कुर्ते के ऊपर थी, जांघों के बीच, ठीक उनके लिंग के ऊपर।

कामिनी को महसूस हुआ कि राज का लिंग कुर्ते और धोती के नीचे पूरी तरह खड़ा है। सख्त, गर्म और धड़कता हुआ।

"दबाओ इसे," राज ने बिना होठ हिलाए, सिर्फ आंखों से इशारा किया।

कामिनी कांप गई। पति सामने बैठा था। अगर उसने देख लिया तो?

"क्या सोच रही हो?" राज ने अपनी आवाज़ थोड़ी ऊंची की, जिससे प्रताप ने भी देखा। "मैं कह रहा हूँ कि तुम्हें अपने लिए कुछ नए जेवर खरीदने चाहिए। प्रताप, तुम इसे कल बाज़ार ले जाओ।"

"जी भाईसाहब, ले जाऊंगा," प्रताप ने कहा।

बातों की आड़ में, राज ने कामिनी के हाथ पर अपना हाथ रखकर दबाव डाला। कामिनी मजबूर हो गई। उसने अपनी उंगलियां मोड़ीं और राज के लिंग को कुर्ते के ऊपर से ही मुट्ठी में भर लिया।

राज की आंखें थोड़ी बंद हो गईं। उन्होंने एक गहरी सांस ली। "आह... खाना वाकई बहुत लज़ीज़ है। बहुत सुकून दे रहा है।"

कामिनी उनके लिंग को सहला रही थी, उसे दबा रही थी, और राज उसके सामने बैठकर खाना खा रहे थे। यह दृश्य कामिनी के लिए इतना कामुक था कि उसे लगा वह कुर्सी पर ही पिघल जाएगी। वह एक ही वक्त में डरी हुई थी और बेहद उत्तेजित भी।

तभी मुनीम जी वापस आ गए। कामिनी ने झटके से अपना हाथ खींचना चाहा, लेकिन राज ने उसे पकड़ रखा था। उन्होंने अपनी जांघों को सिकोड़कर उसके हाथ को वहां फंसा लिया।

कामिनी फंसी हुई थी। उसे इसी हालत में, एक हाथ से खाना खाना पड़ा, जबकि उसका दूसरा हाथ मेज के नीचे राज के गर्म और सख्त पौरुष की गर्मी ले रहा था।

खाना खत्म हुआ। राज उठे।

"मैं अपने कमरे में जा रहा हूँ," उन्होंने अंगड़ाई लेते हुए कहा। "थोड़ा आराम करूँगा। बहू, जरा मेरी दवा और पानी भिजवा देना। और सर दबाने भी आ जाना।"

यह कोड था। सीधा बुलावा।

कामिनी ने सिर हिलाया। वह जल्दी से उठी और रसोई में गई। उसका पूरा शरीर कांप रहा था। टेबल के नीचे का वह खेल उसे इतना उत्तेजित कर गया था कि उसकी पैंटी गीली हो चुकी थी।

उसने ट्रे में पानी और दवा ली। और राज के कमरे की तरफ बढ़ी।

गलियारे में उसे मुनीम जी मिले।

"बहू रानी," मुनीम जी ने उसे रोका। उनकी बूढ़ी आंखों में एक अजीब सा शक था। वे विला के पुराने वफादार थे, हवा का रुख पहचानते थे। "बड़े ठाकुर आज बहुत खुश लग रहे थे। और तुम भी... कुछ बदली-बदली लग रही हो।"

"जी... फसल अच्छी हुई है ना," कामिनी ने नज़रें झुका लीं। उसका दिल जोर से धड़क रहा था।

"फसल तो है ही," मुनीम जी ने धीरे से कहा। "लेकिन विला की हवा भी बदल गई है। संभलकर रहना बेटी। बड़े ठाकुर शेर हैं। और शेर जब शिकार करता है, तो निशान छोड़ देता है। और प्रताप बाबू... वो तो नासमझ हैं।"
 
कामिनी का दिल धक से रह गया। क्या मुनीम जी को पता चल गया? वह कुछ बोले बिना तेज़ कदमों से आगे बढ़ गई।

राज के कमरे का दरवाजा बंद था। उसने नॉक किया।

"आ जाओ," अंदर से आवाज़ आई।

कामिनी अंदर गई और दरवाजा बंद किया। राज बिस्तर पर बैठे थे। उन्होंने कुर्ता उतार दिया था। नंगे बदन।

जैसे ही कामिनी ने ट्रे मेज पर रखी, राज ने उसे पीछे से पकड़ लिया। उन्होंने उसे अपनी गोद में खींच लिया।

"कितनी देर लगा दी," राज ने उसकी गर्दन पर किस करते हुए कहा।

"मुनीम जी मिल गए थे," कामिनी ने घबराते हुए कहा। "उन्हें शक हो रहा है। वो कह रहे थे कि विला की हवा बदल गई है।"

"होने दो," राज ने लापरवाही से कहा।

उन्होंने कामिनी के ब्लाउज के हुक खोलने शुरू कर दिए। "इस विला में मेरा राज चलता है। मुनीम हो या कोई और... मेरी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। कोई चूं भी नहीं करेगा।"

राज ने कामिनी की साड़ी का पल्लू खींचा और उसके ब्लाउज के अंदर हाथ डाल दिया। उन्होंने उसके स्तन को मुट्ठी में भर लिया।

"तुमने टेबल के नीचे मुझे बहुत तड़पाया," राज ने कहा। "मेरा अभी तक बैठा नहीं है।"

उन्होंने कामिनी का हाथ पकड़कर अपनी धोती के अंदर डाल दिया। कामिनी ने उनके नंगे लिंग को पकड़ लिया। वह अभी भी पत्थर जैसा था।

"इसे शांत करो," राज ने आदेश दिया।

"अभी? दिन में? प्रताप जग जाएगा..."

"वो सो गया है," राज ने उसे धक्का देकर घुटनों पर बैठा दिया। "मुंह से। जल्दी। मुझे खेत पर जाना है। मुझे 5 मिनट में खाली होना है।"

कामिनी ने कोई बहस नहीं की। उसे अब इसकी आदत होने लगी थी। उसने अपना मुंह खोला और राज के विशाल लिंग को अपने अंदर ले लिया।

यह एक 'क्विकर' था। राज ने उसकी गर्दन पकड़कर उसे तेज़ रफ़्तार से पेला (मुंह में)। कामिनी का सिर आगे-पीछे हो रहा था। उसे राज का पसीना और गंध मिल रही थी।

पांच मिनट के अंदर, राज ने एक आवाज़ के साथ उसके मुंह में अपना पानी छोड़ दिया। कामिनी ने उसे पी लिया।

"जाओ," राज ने उसे खड़ा किया और अपना पसीना पोंछा। "शाम को मिलेंगे। तैयार रहना।"

कामिनी बाहर निकली। उसका मुंह गीला था, बाल थोड़े बिखरे थे। उसे लगा जैसे वह कोई रखैल है जो अपने मालिक को खुश करके लौटी है। और उसे यह अहसास... गंदा नहीं, बल्कि रोमांचक लग रहा था।

रात के 10 बजे। प्रताप सो चुका था। कामिनी तैयार थी।

वह राज के कमरे में गई। आज राज ने कुछ अलग तैयारी की थी।

कमरे में एक बड़ा आदमकद आईना रखा गया था, ठीक बिस्तर के सामने। कमरे में सिर्फ मोमबत्तियों की रोशनी थी।

"यह क्या है बाबूजी?" कामिनी ने पूछा।

"यह आईना है," राज ने कहा, जो बिस्तर पर नंगे लेटे थे। "आज मैं देखना चाहता हूँ कि हम कैसे लगते हैं। और मैं चाहता हूँ कि तुम भी देखो कि तुम किसकी हो।"

"मैं... मैं नहीं देख सकती," कामिनी शर्मा गई। "मुझे शर्म आती है।"

"देखना पड़ेगा," राज ने उसे अपने पास खींचा। "कपड़े उतारो। सारे। और आईने के सामने खड़ी हो जाओ।"

कामिनी ने धीरे-धीरे, कांपते हुए अपने कपड़े उतारे। साड़ी, ब्लाउज, पेटीकोट... जब वह पूरी तरह नंगी हो गई, तो राज ने उसे आईने के सामने खड़ा कर दिया।

राज उसके पीछे आए। वे भी नंगे थे।
 
आईने में एक अजीब और कामुक नज़ारा था। एक तरफ 21 साल की गोरी, नाजुक, सुडौल और कोमल कामिनी। दूसरी तरफ 45 साल का सांवला, गठीला, बालों से भरा और विशालकाय राज। राज का शरीर कामिनी से दोगुना चौड़ा था। वे उसके पीछे एक पहाड़ की तरह खड़े थे। उनका विशाल लिंग कामिनी के नितंबों के बीच से झांक रहा था।

"देखो," राज ने कामिनी के कंधों को अपने बड़े हाथों से पकड़ा। "देखो हम कितने अलग हैं। और फिर भी... हम एक हैं।"

राज ने अपना हाथ कामिनी के पेट पर रखा और धीरे-धीरे नीचे ले गए। आईने में कामिनी देख रही थी कि कैसे राज का बड़ा, काला हाथ उसकी गोरी त्वचा पर रेंग रहा है। यह दृश्य उसे सम्मोहित कर रहा था।

"टांगें चौड़ी करो," राज ने आदेश दिया।

कामिनी ने टांगें फैला दीं। आईने में उसकी योनि का त्रिकोण और उसके गुलाबी होंठ साफ दिख रहे थे।

राज ने पीछे से, खड़े-खड़े ही, अपने लिंग को कामिनी की योनि के मुहाने पर सेट किया।

"देख रही हो?" राज ने उसके कान में कहा। "देखो कैसे यह अंदर जाता है। देखो कैसे तेरा जिस्म इसे निगलता है।"

राज ने एक धक्का मारा।

"स्लप!"

कामिनी ने आईने में देखा कि कैसे राज का मोटा लिंग उसके अंदर गायब हो गया। उसकी आंखें फैल गईं। यह दृश्य... यह दृश्य उसे जीवन भर याद रहने वाला था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि इतना बड़ा कुछ उसके अंदर समा गया है।

"आह्ह्ह! बाबूजी!" कामिनी ने सिर पीछे कर लिया। उसका सिर राज के कंधे पर टिक गया।

राज ने उसे खड़े-खड़े पेलना शुरू किया। वे उसे आईने की तरफ धक्का दे रहे थे। कामिनी के स्तन हिल रहे थे। उसके हाथ आईने पर जम गए थे, और उसकी उंगलियों के निशान कांच पर पड़ रहे थे।

"बोल, तू किसकी औरत है?" राज ने आईने में अपनी ही आंखों में देखते हुए पूछा। उनकी आंखों में जूनून था।

"आपकी... मैं आपकी हूँ..." कामिनी सिसक रही थी।

"प्रताप देख ले तो क्या कहेगा?" राज हंसे। "कि उसकी बीवी उसके बड़े भाई के लंड पर झूल रही है? कि वो कितनी बेशर्म है?"

"मत कहिए ऐसा... मुझे शर्म आती है..."

"यही सच है," राज ने रफ़्तार बढ़ा दी।

"थप-थप-थप!" राज के जांघ कामिनी के नितंबों से टकरा रहे थे। "शर्म छोड़ दो। तुम एक नामर्द की बीवी नहीं, एक शेर की रखैल हो।"

कामिनी की सांसों से आईना धुंधला हो रहा था। उसे अपनी योनि में राज का पूरा आकार महसूस हो रहा था। हर धक्के के साथ उसे लग रहा था कि वह राज का हिस्सा बनती जा रही है।

राज ने उसे उठाया और बिस्तर पर फेंक दिया।

"अब ऊपर आओ," राज लेट गए।

"सवारी करो। मैं देखना चाहता हूँ कि तुम मेरे लिए कितनी मेहनत कर सकती हो।"

कामिनी उनके ऊपर चढ़ गई। उसने राज के लिंग को अपने अंदर लिया और ऊपर-नीचे होने लगी।

यह अब एक रूटीन बन गया था। एक नशा। कामिनी को अब राज के बिना नींद नहीं आती थी। उसे उनके पसीने की गंध, उनकी गालियों और उनके वीर्य की आदत पड़ गई थी।

राज ने उसके स्तनों को पकड़ लिया और जोर से मसला। "तू अब मेरी है कामिनी। पूरी तरह। तेरा जिस्म, तेरी आत्मा, तेरा कोख... सब मेरा है। इस विला का वारिस मैं ही दूंगा।"

कामिनी ने अपनी रफ़्तार तेज़ कर दी।

"हाँ... हाँ... सब आपका है... भर दीजिए मुझे..."

उस रात, विला की दीवारों ने फिर से वो आवाज़ें सुनीं जो मर्यादा के खिलाफ थीं, लेकिन कुदरत के उसूलों के हिसाब से एकदम सही थीं—एक मर्द और औरत का वहशी मिलन। कामिनी अब सिर्फ एक बहू नहीं थी, वह विला की गुप्त रानी बन चुकी थी, जिसका रिमोट कंट्रोल बड़े ठाकुर के हाथ में था।
 
अज़ानगढ़ की विला में आज सुबह से ही एक अजीब सी हलचल मची हुई थी।

सुबह के 10 बज रहे थे, लेकिन सूरज ने अभी से अपना कड़ा रुख अपना लिया था। विला के बड़े आंगन में एक काले रंग की भारी-भरकम स्कॉर्पियो खड़ी थी, जिसका इंजन चालू था और उसकी गड़गड़ाहट विला की दीवारों से टकरा रही थी।

राज सिंह को किसी ज़रूरी ज़मीन के विवाद को सुलझाने के लिए अचानक शहर जाना पड़ रहा था। यह दौरा दो-तीन दिनों का हो सकता था। मुनीम जी फाइलें लेकर कार की डिक्की में रख रहे थे।

कामिनी ऊपर पहली मंजिल की गैलरी में खड़ी, छिपकर नीचे देख रही थी। उसका दिल डूब रहा था। पिछले एक हफ्ते में उसे राज की ऐसी लत लग गई थी कि उनके बिना एक रात बिताना भी उसे मुश्किल लग रहा था।

राज सिर्फ उसके जेठ नहीं, उसके जिस्म के मालिक बन चुके थे। उनकी मालिश, उनका पसीना और उनका वो सख्त लिंग... कामिनी की रातें अब उन्हीं के दम पर रोशन थीं। प्रताप तो वैसे भी घर पर कम ही रहता था, और जब रहता भी था तो किसी काम का नहीं था।

राज ने अपना चमड़े का ब्रीफकेस मुनीम जी को दिया और फिर ड्राइवर की सीट की तरफ देखा।

वहां रमन खड़ा था।

रमन। 25 साल का एक गठीला, सांवला और बेहद वफादार नौकर। वह विला का ड्राइवर भी था और ज़रूरत पड़ने पर राज का बॉडीगार्ड भी। उसका शरीर जिम का नहीं, बल्कि खेत की मेहनत और अखाड़े की मिट्टी का बना हुआ था। वह खेतों में हल चलाता था, भारी बोरे उठाता था।

उसके कंधे चौड़े थे, बांहें मोटी और सख्त थीं, और गर्दन बैल जैसी मज़बूत थी। वह हमेशा एक खाकी रंग की वर्दी (या कुर्ता-पायजामा) पहनता था, जिसके बटन अक्सर उसकी चौड़ी, बालों वाली छाती पर तन जाते थे।

रमन की आंखों में हमेशा एक झुकाव रहता था—मालिक के सामने वफादारी का। लेकिन उस झुकाव में, उस सांवलेपन में एक दबी हुई आग भी थी। वह जानता था कि विला में क्या चल रहा है। वह राज का साया था। उसने राज की आंखों में कामिनी के लिए भूख देखी थी, और कहीं न कहीं... वह भूख रमन के अंदर भी सुलग रही थी।

"रमन," राज ने उसे पास बुलाया। उनकी आवाज़ में हुक्म था।

रमन दौड़कर आया। "जी मालिक।"

राज ने रमन के मज़बूत कंधे पर अपना भारी हाथ रखा। उन्होंने ऊपर गैलरी की तरफ देखा, जहाँ कामिनी खड़ी थी। कामिनी की धड़कन रुक गई। उसे लगा राज उसे ही देख रहे हैं।

"मैं दो दिन के लिए बाहर जा रहा हूँ,"

राज ने कहा, उनकी आवाज़ धीमी थी लेकिन उसमें एक गहरा अर्थ छिपा था। "पीछे विला की, और खासकर 'छोटी बहू' की सुरक्षा तुम्हारी ज़िम्मेदारी है। प्रताप तो नाकारा है।"

"जी मालिक, जान दे दूंगा," रमन ने सिर झुकाया।

"जान देने की ज़रूरत नहीं है," राज ने रमन के कान के पास झुककर कहा, ताकि मुनीम जी या कोई और न सुन सके।

"बस ज़रूरत का खयाल रखना। अगर 'बहू रानी' को किसी चीज़ की प्यास लगे... चाहे वो पानी हो, बाज़ार जाना हो, या... 'कुछ और'... तो उसे प्यासा मत रहने देना। समझ गए?"

रमन ने धीरे से सिर उठाया। उसकी काली आंखें सीधे राज की आंखों में गड़ गईं। वह समझ गया। यह एक कोड था। उसे 'परमिशन' मिल गई थी। उसे अपनी मालकिन को संभालने का, उसे खुश रखने का परोक्ष आदेश मिल गया था। क्योंकि राज जानते थे कि कामिनी की आग अब बुझने वाली नहीं है, और अगर राज नहीं हैं, तो उसे कोई तो चाहिए जो उसे ठंडा रख सके। और रमन से ज्यादा वफादार और ताकतवर 'जानवर' कौन हो सकता था?

"समझ गया मालिक," रमन ने एक बारीक, धूर्त मुस्कान के साथ कहा। "विला की इज़्ज़त और ज़रूरत... दोनों का ध्यान रखूँगा। कोई कमी नहीं आने दूंगा।"

राज ने उसकी पीठ थपथपाई, गाड़ी में बैठे और चले गए। धूल का गुबार उड़ता रह गया।

कामिनी वहीं खड़ी रही। उसे राज के जाने का गम था, लेकिन रमन की वो आखिरी नज़र... जब उसने ऊपर गैलरी की तरफ देखा था... उसमें एक अजीब सी भूख थी। एक नौकर की भूख, जो अपनी मालकिन को खाने के लिए तैयार था। उस नज़र ने कामिनी के पेट में एक सिहरन पैदा कर दी।

दोपहर के 12 बजे। गर्मी अपने शबाब पर थी। कामिनी अपने कमरे में बैठी थी। उसे बेचैनी हो रही थी। राज नहीं थे, तो उसे खालीपन महसूस हो रहा था।

तभी दरवाजे पर नॉक हुआ।

"कौन?"

"बहू रानी, मैं रमन," बाहर से भारी, मर्दाना आवाज़ आई।

कामिनी ने अपना दुपट्टा ठीक किया, सीने को ढका और दरवाजा खोला।

रमन बाहर खड़ा था। वह पसीने में तर था। शायद बगीचे में काम कर रहा था। उसकी खाकी शर्ट पसीने से चिपकी थी, जिससे उसके शरीर के मसल्स, उसकी छाती के बाल और उसके एब्स की लकीरें साफ दिख रही थीं। उसे राज की तरह महंगे इत्र की नहीं, बल्कि बीड़ी, पसीने और धूप की कच्ची गंध आ रही थी।

कामिनी ने अपनी नाक सिकोड़ी, लेकिन अंदर ही अंदर उसे वह गंध खींच रही थी। यह एक 'असली मर्द' की गंध थी।

"क्या है?" कामिनी ने थोड़ा अकड़कर पूछा। आखिर वह मालकिन थी।

"मालकिन, शहर से राशन और आपका कुछ सामान लाना है," रमन ने नज़रें झुकाए हुए कहा, लेकिन उसकी आंखें चोरी से कामिनी के भीगे हुए होठों और उसकी कमर के कर्व को देख रही थीं।

"बड़े ठाकुर कह गए थे कि आपको बाज़ार ले जाऊं। आपका मन भी बहल जाएगा और हवा-पानी बदल जाएगा।"

कामिनी का मन हुआ मना कर दे। नौकर के साथ अकेले जाना ठीक नहीं था। लेकिन विला का सन्नाटा उसे काट रहा था। और रमन... रमन के खड़े होने के अंदाज़ में, उसके पसीने से भीगे गले में कुछ ऐसा था जो उसे अपनी ओर खींच रहा था। उसे देखना था कि राज ने उसे क्या कहकर छोड़ा है।

"ठीक है," कामिनी ने कहा। "गाड़ी निकालो। मैं आती हूँ।"

रमन ने विला की पुरानी सफेद एम्बेसडर कार निकाली। यह कार राज की पसंदीदा थी—मज़बूत, भारी और पीछे से बहुत चौड़ी, जैसे कोई छोटा कमरा हो। इसके शीशे काले थे और पर्दे लगे थे।

कामिनी पिछली सीट पर बैठी। रमन ड्राइविंग सीट पर।

गाड़ी गांव के कच्चे रास्तों से होकर शहर की तरफ बढ़ी। रास्ता सुनसान था। दोनों तरफ सिर्फ खेत, बबूल के पेड़ और राजस्थान की सूखी ज़मीन थी। कार के एसी की ठंडक और बाहर की लू का मुकाबला चल रहा था।

रमन बार-बार रियर-व्यू मिरर में देख रहा था। उसकी नज़रें सड़क पर कम और पिछली सीट पर बैठी कामिनी पर ज्यादा थीं। वह कामिनी के चेहरे को, उसकी गर्दन को और साड़ी के पल्लू के नीचे छिपे उभारों को घूर रहा था।

कामिनी ने देखा कि रमन उसे घूर रहा है। एक मालकिन के तौर पर उसे उसे डांटना चाहिए था, अपनी मर्यादा दिखानी चाहिए थी। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। राज के साथ बिताई रातों ने उसे बदल दिया था। उसे अब मर्दों की भूखी नज़रों में मज़ा आता था। उसे अच्छा लग रहा था कि एक गठीला नौजवान उसे पाने के लिए ललचा रहा है।

उसने जानबूझकर अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा गिरा दिया, जैसे गर्मी लग रही हो।

रमन की आंखों में चमक आ गई। उसने मिरर को थोड़ा एडजस्ट किया ताकि उसे कामिनी की छाती का पूरा नज़ारा मिल सके।

"गर्मी बहुत है आज," रमन ने कहा। उसकी आवाज़ में एक कशिश थी, एक न्यौता था।

"हाँ," कामिनी ने अपनी गर्दन से पसीना पोंछा। उसकी साड़ी थोड़ी पारदर्शी हो रही थी। "एसी तेज़ करो।"

"यह पुरानी गाड़ी है मालकिन," रमन ने मिरर में उसकी आंखों में सीधे देखते हुए कहा। "इसमें एसी ज्यादा काम नहीं करता। इसमें तो... खिड़की खोलकर ही हवा खानी पड़ती है। या फिर..."

"या फिर?" कामिनी ने पूछा।

"या फिर कपड़े कम करने पड़ते हैं," रमन ने बहुत धीरे से कहा, जैसे खुद से बात कर रहा हो, लेकिन इतना तेज़ कि कामिनी सुन सके।

कामिनी का दिल तेज़ हो गया। एक नौकर उससे ऐसी बात कर रहा था? इतनी हिम्मत?

"जुबान संभालो रमन," कामिनी ने कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में सख्ती नहीं, बल्कि एक कमज़ोर विरोध था। "तुम भूल रहे हो कि तुम किससे बात कर रहे हो।"

"माफ़ करना मालकिन," रमन ने गाड़ी की रफ़्तार धीमी कर दी। "वो क्या है ना... बड़े ठाकुर ने कहा था कि आपका खयाल रखूं। आपको गर्मी न लगने दूं। आपकी हर तकलीफ दूर करूँ। मैं तो बस हुक्म का गुलाम हूँ।"

रमन ने गाड़ी को मुख्य सड़क से उतारकर एक कच्चे, ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर डाल दिया।

कामिनी सतर्क हो गई। "यह कहाँ ले जा रहे हो? बाज़ार तो सीधा है।"

"शॉर्टकट है मालकिन," रमन ने इत्मीनान से कहा। "मुख्य सड़क पर जाम लगा है। यहाँ से जल्दी पहुँच जाएंगे। यह जंगल का रास्ता है।"

गाड़ी अब घने जंगल के बीच से गुज़र रही थी। पेड़ इतने घने थे कि दोपहर में भी शाम जैसा अंधेरा लग रहा था। रास्ता पथरीला था, जिससे गाड़ी हिचकोले खा रही थी। सन्नाटा इतना था कि सिर्फ टायरों की आवाज़ और सूखी पत्तियों की सरसराहट आ रही थी।

अचानक, रमन ने गाड़ी रोक दी। एक बिल्कुल सुनसान जगह पर। चारों तरफ सिर्फ झाड़ियां और पुराने पेड़ थे। दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं।

"क्या हुआ?" कामिनी ने घबराकर पूछा।

"गाड़ी क्यों रोकी?"

"गाड़ी गर्म हो गई है," रमन ने डैशबोर्ड पर लगे मीटर को देखे बिना कहा। "इंजन ठंडा करना पड़ेगा। पानी डालना पड़ेगा।"

रमन उतरा। उसने अपनी आस्तीनें ऊपर चढ़ाईं और बोनट खोला। भाप निकली (या शायद उसने निकाली)।

कामिनी कार के अंदर बैठी थी। एसी बंद हो चुका था। गर्मी बढ़ने लगी थी। उसे डर लग रहा था, लेकिन साथ ही एक अजीब सा रोमांच भी हो रहा था। जंगल... एकांत... और एक गठीला नौजवान जो अब बोनट के पास खड़ा होकर उसे ही देख रहा था।

रमन वापस आया। लेकिन उसने ड्राइविंग सीट का दरवाजा नहीं खोला। वह पीछे आया और उसने पिछली सीट का दरवाजा खोला—कामिनी की तरफ वाला।

वह अंदर आ गया।
 
कामिनी सीट के कोने में सिकुड़ गई। "रमन! तुम पीछे क्यों आ रहे हो? बाहर जाओ! अपनी हद में रहो!"

रमन ने दरवाजा जोर से बंद कर दिया और अंदर से लॉक लगा दिया। कार के अंदर अब वे दोनों अकेले थे। रमन की भारी, पसीने से महकती मौजूदगी ने कार की हवा को कम कर दिया था। एम्बेसडर की पिछली सीट काफी चौड़ी थी, लेकिन रमन के आने से वह भी तंग लगने लगी।

"बाहर बहुत धूप है मालकिन," रमन ने अपनी खाकी शर्ट के ऊपर के दो बटन खोलते हुए कहा। "सोचा अंदर ही आराम कर लूं जब तक इंजन ठंडा होता है।"

रमन ने अपनी खाकी शर्ट उतार दी।

कामिनी की सांसें थम गईं। रमन का नंगा, काला और पसीने से भीगा शरीर उसके सामने था। उसकी छाती पर राज से भी ज्यादा बाल थे। उसका शरीर राज जितना विशाल नहीं था, लेकिन ज्यादा गठीला और सख्त था, जैसे सूखी लकड़ी हो जिसमें आग जल्दी लगती है। उसके पेट पर सिक्स-पैक एब्स थे जो मेहनत की देन थे।

कामिनी की नज़रें उसके पसीने से भीगे एब्स पर टिक गईं। पसीने की एक बूंद उसकी छाती से लुढ़क कर उसकी नाभि में जा रही थी।

"तुम... तुम बदतमीजी कर रहे हो," कामिनी ने पीछे खिसकते हुए कहा। उसकी पीठ दरवाजे से लग गई। "मैं ठाकुर साहब से कह दूंगी। वो तुम्हें जान से मार देंगे।"

रमन हंसा। एक बहुत ही देसी, बेफिक्र और निडर हंसी। वह आगे बढ़ा और घुटनों के बल सीट पर चढ़ गया। अब वह कामिनी के बिल्कुल करीब था। उसका पसीना कामिनी को महक रहा था—कच्ची मिट्टी, बीड़ी और मर्द की तेज़ गंध।

"ठाकुर साहब ने ही तो भेजा है," रमन ने कहा। उसकी आवाज़ अब नौकर वाली नहीं, एक मर्द वाली थी। उसने अपना खुरदरा, गट्टा पड़ा हाथ बढ़ाया और कामिनी के गोरे गाल को छू लिया। "उन्होंने कहा था—'रमन, मेरी गैरमौजूदगी में बहू रानी को ठंडा रखना। उसे प्यासा मत रहने देना'। अब आप ही बताइए मालकिन, आपको ठंडा कैसे करूँ? पानी से... या अपने पानी से?"

कामिनी कांप गई। राज ने उसे रमन को सौंप दिया था? एक पल के लिए उसे गुस्सा आया, अपमान महसूस हुआ। लेकिन अगले ही पल उसे अपनी स्थिति का नशा होने लगा। वह एक वस्तु थी जिसे दो मर्द—मालिक और नौकर—साझा कर रहे थे। यह विचार ही उसे गीला करने के लिए काफी था।

रमन ने कामिनी का पल्लू खींच लिया।

"नहीं... रमन..." कामिनी ने कमजोर विरोध किया।

"शर्माइए मत," रमन ने उसके ब्लाउज के ऊपर, उसके स्तन पर अपना भारी हाथ रखा। "मैंने सब देखा है। उस रात, अस्तबल की कोठरी के बाहर मैं ही पहरा दे रहा था। मैंने आपकी चीखें सुनी थीं। मैंने देखा था कि आप कैसे ठाकुर साहब के नीचे तड़प रही थीं। और मेरा लंड उसी वक्त खड़ा हो गया था।"

रमन की भाषा बहुत गंदी, सीधी और अश्लील थी। राज जहाँ सलीके और अधिकार से बात करते थे, रमन एकदम जानवर था। और यह जानवरपन कामिनी की दबी हुई हवस को जगा रहा था। उसे लगा जैसे वह किसी सड़क छाप गुंडे की गिरफ्त में है।

रमन ने कामिनी के ब्लाउज के हुक नहीं खोले, उसने बस ब्लाउज के गले को पकड़कर नीचे खींच दिया। "चर्र..." की आवाज़ के साथ कपड़ा खिंच गया।

कामिनी के गोरे, रसीले स्तन और उसकी महंगी ब्रा रमन के सामने आ गए।

"हाय राम..." रमन ने अपनी आंखें फाड़ लीं। उसने अपनी जीभ बाहर निकाली।

"मालकिन... आप तो दूध की मलाई हो। ठाकुर साहब मजे लूट रहे हैं।"

उसने बिना किसी चेतावनी के अपना मुंह कामिनी के स्तन (ब्रा के ऊपर से ही) पर मार दिया। वह उसे चाट नहीं रहा था, वह उसे खा रहा था। चूस रहा था, काट रहा था। उसकी दाढ़ी के बाल कामिनी की कोमल त्वचा को छील रहे थे, लाल कर रहे थे।

"आह! रमन! धीरे! जानवर!" कामिनी ने उसके बालों को पकड़ लिया। वह उसे हटाना चाहती थी, या शायद उसे और करीब खींच रही थी।

"हाँ मालकिन, मैं आपका कुत्ता हूँ," रमन ने उसके दूसरे स्तन को अपनी मुट्ठी में भरकर इतनी जोर से मसला कि कामिनी चीख पड़ी। "और आज यह कुत्ता अपनी हड्डी चबाएगा। आज मैं विला का खाना खाऊंगा।"

रमन ने कामिनी को सीट पर धक्का दे दिया। पुरानी एम्बेसडर की सीट स्प्रिंग वाली और गद्देदार थी। कामिनी लेट गई, उसकी टांगें सीट से लटक रही थीं।

रमन ने उसकी साड़ी को पकड़कर एक ही झटके में कमर तक ऊपर कर दिया।

उसने देखा। कामिनी ने आज पैंटी नहीं पहनी थी (शायद उसे उम्मीद थी कि राज वापस आ सकते हैं, या शायद उसे अपनी नई आज़ादी पसंद थी)।

रमन पागल हो गया।

"ओह तेरी..." रमन ने अपनी काली, खुरदरी उंगलियां उसकी गीली, गुलाबी योनि पर फेरीं। "ठाकुर साहब ने आपको तैयार करके रखा है। पूरा गीला कर दिया है। यह तो बह रही है।"

रमन ने अपनी बेल्ट खोली। बकल की आवाज़ सन्नाटे में गूंजी। उसने अपनी खाकी पैंट और देसी अंडरवियर एक साथ नीचे खींच दिए।

कामिनी ने देखा। रमन का लिंग राज जितना मोटा नहीं था, लेकिन वह बहुत लंबा था। वह काला था, और उस पर नसें ऐसे उभरी थीं जैसे रस्सियां हों। वह एकदम सीधा और ऊपर की तरफ मुड़ा हुआ था। वह एक क्रूर हथियार लग रहा था।

"देख लीजिए मालकिन," रमन ने उसे हाथ में लेकर हिलाया। उसमें से एक बूंद टपकी। "नौकर का माल है। मज़बूत, टिकाऊ और लंबा। यह थकता नहीं है।"

रमन कामिनी के ऊपर चढ़ गया। कार की छत नीची थी, इसलिए उसे झुककर रहना पड़ रहा था। वह कामिनी के ऊपर एक जानवर की तरह मंडरा रहा था।

"टांगें उठाओ," रमन ने आदेश दिया। "मेरे कंधों पर रखो।"

कामिनी ने मंत्रमुग्ध होकर अपनी टांगें उठाईं और रमन के पसीने से भीगे कंधों पर रख दीं। अब वह पूरी तरह खुली थी, असुरक्षित थी।

रमन ने अपने लिंग पर थोड़ा थूक लगाया और उसे कामिनी की योनि के मुहाने पर रगड़ा।

"मालिक की चीज़ इस्तेमाल करने का मज़ा ही कुछ और है," रमन बड़बड़ाया और उसने कामिनी की कमर पकड़कर एक ज़ोरदार धक्का मारा।

"धप्प!"

वह अंदर घुस गया। रमन का तरीका बहुत रफ था। वह राज की तरह धीरे-धीरे नहीं गया, उसने हमला किया।

"आह्ह्ह्ह! रमन! मर गई!" कामिनी चिल्लाई। उसने कार की सीट का कवर नोच लिया।

रमन ने उसे पेलना शुरू किया। कार बुरी तरह हिल रही थी। सस्पेंशन की 'चूं-चूं' आवाज़ जंगल में गूंज रही थी, मानो कार भी इस पाप में शामिल हो।

रमन हर धक्के के साथ गंदी बातें कर रहा था।

"बोल... कैसा लग रहा है नौकर का लंड?" रमन पूछ रहा था, कामिनी के स्तनों को थप्पड़ मारते हुए। उसके थप्पड़ तेज़ थे। "बोल मालकिन! मज़ा आ रहा है? बता अपने मालिक को!"

"हाँ... हाँ... मज़ा आ रहा है..." कामिनी सिसक रही थी, अपनी कमर को ऊपर उठाते हुए। "बहुत बड़ा है... बहुत गहरा..."

"ठाकुर साहब से अच्छा है?" रमन ने अपनी ईगो को संतुष्ट करना चाहा। वह और जोर से धक्के मारने लगा।

"थप-थप-थप!"

"तुम... तुम बहुत तेज़ हो... जानवर हो..."

रमन ने अपनी रफ़्तार और बढ़ा दी। वह पसीने से नहाया हुआ था। उसका पसीना कामिनी के चेहरे, गर्दन और स्तनों पर गिर रहा था। कामिनी को लगा जैसे वह किसी जंगली जानवर के नीचे दबी है।

उसे राज के साथ एक 'सुरक्षा' और 'सम्मान' (विकृत ही सही) महसूस होता था, लेकिन रमन के साथ उसे एक 'खतरा', 'गंदगी' और 'अपमान' महसूस हो रहा था जो उसे और ज्यादा उत्तेजित कर रहा था। वह खुद को गंदा महसूस करना चाहती थी।

रमन ने कामिनी के दोनों हाथों को पकड़कर उसके सिर के ऊपर कर दिया और एक हाथ से उन्हें जकड़ लिया।

"आज तुम मेरी हो," रमन ने उसके चेहरे पर थूकते हुए कहा (थोड़ा सा, उत्तेजना में)। "आज कोई ठाकुर नहीं, कोई बहू नहीं। सिर्फ मर्द और औरत। सिर्फ लंड और चूत।"

उसने कामिनी की जांघों को इतनी जोर से दबाया कि वहां उंगलियों के नीले निशान पड़ने तय थे। वह उसे गहराई तक खोद रहा था। कार का लेदर, पसीने की गंध और रमन का काला शरीर... कामिनी स्वर्ग और नरक के बीच झूल रही थी।

करीब पंद्रह मिनट की उस वहशी तोड़-फोड़ के बाद, रमन की सांसें टूटने लगीं। उसकी रफ़्तार उन्मादी हो गई।

"मालकिन... मैं छोड़ रहा हूँ! मैं भर रहा हूँ तुझे!" रमन चिल्लाया।

"छोड़ दो रमन! मेरे अंदर! मुझे गंदा कर दो!" कामिनी ने अपनी कमर ऊपर उठाई और उसे जकड़ लिया।

रमन ने एक जानवर जैसी आवाज़ निकाली और अपना सारा वीर्य कामिनी के अंदर उड़ेल दिया। उसके झटके बहुत तेज़ थे, जैसे वह अपनी आत्मा भी निकाल कर दे रहा हो।

वह कामिनी के ऊपर गिर गया। कार का हिलना बंद हो गया। जंगल में फिर से सन्नाटा छा गया।
 
दस मिनट बाद।

रमन ने अपने कपड़े पहन लिए थे। उसने कार का दरवाजा खोला और बाहर थूक दिया। फिर उसने अपनी जेब से एक बीड़ी निकाली और सुलगाई। वह बाहर खड़ा होकर बीड़ी पी रहा था, धुएं के छल्ले बना रहा था, जबकि कामिनी अंदर अपने कपड़े ठीक कर रही थी।

कामिनी की साड़ी बुरी तरह मुड़ गई थी। ब्लाउज ढीला हो गया था। उसके बाल बिखरे थे। उसे अपनी जांघों के बीच चिपचिपापन महसूस हो रहा था—रमन का निशान, जो अब राज के निशान के साथ मिल गया था।

रमन ने बीड़ी फेंकी और वापस ड्राइविंग सीट पर बैठा। उसने मिरर में कामिनी को देखा। अब उसकी नज़रों में नौकर वाला डर या झिझक नहीं थी, बल्कि एक मर्द वाली ढिठाई और अधिकार था। उसने कामिनी को जीत लिया था।

"पानी पियोगी?" रमन ने अपनी बोतल पीछे बढ़ाई।

कामिनी ने बोतल ली और पानी पिया। उसने रमन की आंखों में देखा।

"राज को बताओगे?" कामिनी ने पूछा, अपनी आवाज़ को स्थिर रखने की कोशिश करते हुए।

"मालिक सब जानते हैं," रमन ने गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा। "उन्हें बताने की ज़रूरत नहीं पड़ती। वो सूंघ लेते हैं। और वैसे भी... यह उनकी ही तो मर्जी थी।"

रमन ने गाड़ी वापस सड़क पर डाल दी।

"लेकिन एक बात है मालकिन," रमन ने मुस्कुराते हुए कहा, उसके दांत चमक रहे थे। "अब जब भी ठाकुर साहब बाहर जाएंगे... या जब भी आपको 'प्यास' लगेगी... या जब ठाकुर साहब थक जाएंगे... यह रमन हाज़िर रहेगा। अस्तबल में, गैराज में, या जंगल में। जहाँ आप कहेंगी। मैं आपकी 'एक्स्ट्रा सर्विस' हूँ।"

कामिनी ने खिड़की से बाहर देखा। जंगल पीछे छूट रहा था, लेकिन वह जंगल अब उसके अंदर बस गया था।

वह विला की बहू थी।

ठाकुर की रखैल थी।

और अब... नौकर की भी चहेती थी।

वह एक 'पब्लिक प्रॉपर्टी' बन चुकी थी उस विला के मर्दों के लिए। और सबसे शर्मनाक, और सबसे उत्तेजक बात यह थी कि उसे अपनी यह नई पहचान... अपनी सती-सावित्री वाली पवित्रता से कहीं ज्यादा रास आ रही थी।

उसने अपनी सीट पर पीछे टेक लगाई और अपनी टांगें थोड़ी फैला दीं, उस मीठे दर्द का मज़ा लेते हुए जो रमन ने उसे दिया था।

विला का हर कोना अब उसकी हवस का गवाह बन चुका था।

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दो दिन का लंबा इंतज़ार आखिरकार खत्म हुआ। शाम के 6 बज रहे थे। डूबते सूरज की लालिमा ने अज़ानगढ़ की पुरानी विला को एक रहस्यमयी रंग में रंग दिया था। आंगन में कबूतरों की गुटरगूं के बीच, एक भारी इंजन की गड़गड़ाहट सुनाई दी। धूल का एक बड़ा गुबार उड़ाते हुए राज सिंह की काली स्कॉर्पियो विला के मुख्य द्वार से अंदर दाखिल हुई।

कामिनी, जो तुलसी के पौधे के पास सांझ की बत्ती जला रही थी, गाड़ी की आवाज़ सुनकर ठिठक गई। उसके हाथ से माचिस की तीली गिर गई। उसका दिल पसलियों से टकराने लगा। पिछले दो दिनों में जो कुछ हुआ था—जंगल के रास्ते में कार का रुकना, रमन का वहशीपन, पिछली सीट पर उसका अपना गिरना और उस नौकर के नीचे दबकर मज़ा लेना—वह सब किसी फिल्म की रील की तरह उसकी आंखों के सामने घूम गया।

अब मालिक वापस आ गया था। क्या रमन ने उन्हें बता दिया होगा? क्या राज गुस्सा होंगे कि उनकी 'अमानत' को किसी और ने छुआ? या फिर... यह सब उन्हीं का प्लान था?

गाड़ी रुकी। रमन ड्राइविंग सीट से उतरा। उसने अपनी खाकी वर्दी पहन रखी थी, लेकिन उसकी चाल में अब एक अलग ही अकड़ थी। उसने पीछे का दरवाजा खोला।

राज सिंह बाहर निकले। उन्होंने सफेद रंग का कड़क पठानी सूट पहना था। दो दिन की यात्रा और ज़मीन-जायदाद के झगड़ों की थकान उनके चेहरे पर थी, लेकिन उनकी आंखों का तेज और भी बढ़ गया था, जैसे कोई शेर अपने इलाके में वापस आया हो।

रमन ने उनका भारी ब्रीफकेस लिया।

"सफर कैसा रहा मालिक?" रमन ने पूछा। उसकी आवाज़ में एक अलग ही आत्मविश्वास था। वह अब सिर्फ नौकर नहीं, बल्कि मालिक का 'साझेदार' बन चुका था, एक राज़दार।

"ठीक रहा," राज ने अपनी मूंछों पर ताव दिया। उन्होंने आंगन में झांका और तुलसी के पास खड़ी कामिनी को देखा।

कामिनी ने जल्दी से अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, अपना घूंघट थोड़ा नीचे खींचा और नज़रें झुका लीं। लेकिन वह कनखियों से राज को देख रही थी। उसे उनकी बहुत याद आई थी।

राज सीधे अपने कमरे की तरफ नहीं गए। उन्होंने रमन की आंखों में देखा। एक खामोश संवाद हुआ।

"सामान रख दे," राज ने कहा। "और फिर अस्तबल में आ। मुझे घोड़ों का हाल देखना है।"

यह कोड था।

राज अस्तबल की तरफ मुड़ गए, जहाँ उनके पसंदीदा घोड़े बंधे थे। वहां की हवा में गोबर, भूसे और जानवरों के पसीने की गंध थी। राज ने अपनी सिगरेट जलाई और धुएं का छल्ला बनाया।

कुछ ही पलों में रमन वहां पहुँच गया। उसने दरवाजा बंद कर दिया। अब वहां सिर्फ दो मर्द थे। मालिक और नौकर।

"बता," राज ने धुआं छोड़ते हुए पूछा, उनकी पीठ रमन की तरफ थी। "विला का क्या हाल है? और... 'छोटी बहू' का?"

रमन ने सिर झुकाया, लेकिन उसके चेहरे पर एक शैतानी और विजयी मुस्कान थी। उसे पता था कि मालिक क्या सुनना चाहते हैं।

"विला सुरक्षित है मालिक," रमन ने कहा। "और बहू रानी... उनकी प्यास बहुत गहरी थी। आपने सही पहचाना था। वो सूखी हुई लकड़ी की तरह थीं, बस एक चिंगारी की ज़रूरत थी।"

राज घूमे। उनकी आंखों में जिज्ञासा थी। "तूने क्या किया?"

"वही जो आपने इशारे में कहा था," रमन ने निडर होकर कहा। "बाज़ार जाते वक्त... जंगल के रास्ते में... गाड़ी खराब होने का नाटक किया। गर्मी बहुत थी। मैंने उनकी गर्मी शांत कर दी। एम्बेसडर की पिछली सीट पर।"

राज की आंखें चमक उठीं। गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरी उत्तेजना। उन्हें यह सुनकर मज़ा आया कि उनकी 'चीज़' का इस्तेमाल उनके वफादार ने किया है। यह उनकी सत्ता का ही विस्तार था। उन्हें दूसरों को अपनी चीज़ इस्तेमाल करते देखने का एक गुप्त शौक था।

"कैसी थी वो?" राज ने पूछा, जैसे किसी नए खरीदे गए घोड़े की नस्ल और चाल के बारे में पूछ रहे हों। "नखरे किए?"

"शुरू में थोड़ा ना-नुकुर किया," रमन ने अपनी खुरदरी जीभ होठों पर फेरी। "लेकिन जब मैंने अपना लंड बाहर निकाला, तो उनकी आंखें फटी रह गईं। और जब मैंने उसे पेला, मालिक... तो उन्होंने मुझे रोका नहीं, बल्कि और जोर से करने को कहा। वो भूखी हैं मालिक। बहुत भूखी। मेरी पीठ पर उनके नाखूनों के निशान हैं।"

राज हंसे। एक गहरी, भारी और मर्दाना हंसी जो अस्तबल की छत से टकराई। उन्होंने अपनी जेब से नोटों की एक गड्डी निकाली और रमन की शर्ट की जेब में डाल दी।

"शाबाश," राज ने कहा। "तूने मेरा मान रखा। तूने साबित कर दिया कि तू मेरा सबसे वफादार कुत्ता है। अब सुन..."

राज उसके करीब आए। "सिर्फ सुनने से मेरा पेट नहीं भरेगा। आज रात... मैं देखना चाहता हूँ।"

"जी?" रमन चौंका।

"आज रात का इंतज़ाम कर," राज ने हुक्म दिया। "मेरे कमरे में। विदेशी शराब की बोतल, बर्फ, और... तू भी।"

"मैं? कमरे में?" रमन को यकीन नहीं हुआ।

"हाँ," राज ने उसकी चौड़ी छाती पर हाथ मारा। "आज मैं देखना चाहता हूँ कि मेरा नौकर मेरी बहू को कैसे बजाता है। मैं देखना चाहता हूँ कि वो तेरे नीचे कैसे तड़पती है। यह मेरा हुक्म है।"

रात के 10 बज चुके थे। विला शांत हो गई थी। प्रताप, हमेशा की तरह, खाने के बाद अपने कमरे में जाकर सो चुका था। उसकी नामर्दी उसे जल्दी सुला देती थी।

कामिनी अपने कमरे में थी, लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी। उसे पता था कि राज आ गए हैं, तो बुलावा ज़रूर आएगा। लेकिन उसे नहीं पता था कि आज रात क्या होने वाला है। उसे लग रहा था कि राज वापस आ गए हैं तो अब रमन का खेल खत्म हो जाएगा और वह सिर्फ राज की होगी। उसे राज की बांहों की ज़रूरत थी।

तभी, गलियारे में कदमों की आहट हुई।

दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई।
 
कामिनी ने दरवाजा खोला। बाहर राज का एक पुराना और भरोसेमंद सेवक (जो सिर्फ संदेशा लाता था) खड़ा था।

"बहू जी," उसने धीरे से कहा। "बड़े ठाकुर ने याद किया है। उनके पैरों में दर्द है। तेल लेकर बुला रहे हैं।"

कामिनी का दिल उछल पड़ा। वह तैयार थी। उसने अपनी सबसे अच्छी साड़ी पहनी थी और इत्र लगाया था। वह तेल की कटोरी लेकर चल पड़ी।

राज के कमरे का दरवाजा थोड़ा खुला था। पीली रोशनी बाहर आ रही थी।

कामिनी ने दरवाजा धक्का दिया और अंदर गई।

अंदर का नज़ारा देखकर वह सन्न रह गई। उसके हाथ से कटोरी गिरते-गिरते बची।

कमरे में रोशनी बहुत कम थी, सिर्फ एक कोने में लैंप जल रहा था। राज अपनी मखमली आराम कुर्सी पर बैठे थे, जैसे कोई राजा सिंहासन पर बैठा हो। उनके हाथ में व्हिस्की का गिलास था। उन्होंने सिर्फ एक रेशमी लुंगी पहनी थी। उनका विशाल, बालों वाला सीना नंगा था और तेल से चमक रहा था।

लेकिन वे अकेले नहीं थे।

कमरे के एक कोने में, छाया में, रमन खड़ा था।

वह नंगा था। पूरी तरह नंगा।

उसका काला, गठीला शरीर तेल में चमक रहा था। उसके मसल्स उभरे हुए थे। और उसका लंबा, काला और सख्त लिंग उसकी जांघों पर अकड़ा हुआ था, छत की तरफ इशारा कर रहा था।

कामिनी की सांस हलक में अटक गई। "बाबूजी... यह... रमन यहाँ क्या कर रहा है?"

वह पीछे मुड़ी, भागने के लिए। यह बहुत ज्यादा था।

"दरवाजा बंद करो," राज ने शांत, लेकिन बेहद सख्त आवाज़ में कहा। उनकी आवाज़ में वो लोहा था जिसे कोई काट नहीं सकता था। "और कुंडी लगाओ।"

कामिनी रुक गई। राज का हुक्म टालने की हिम्मत उसमें नहीं थी। उसने कांपते हाथों से दरवाजा बंद किया और सिटकनी चढ़ा दी।

"इधर आओ," राज ने अपने पास बुलाया।

कामिनी धीरे-धीरे, घिसटते हुए उनके पास गई। उसे रमन की नंगी मौजूदगी अपनी पीठ पर महसूस हो रही थी। उसे लग रहा था कि रमन की नज़रें उसके ब्लाउज को जला रही हैं।

राज ने कामिनी का हाथ पकड़ा और उसे अपनी तरफ खींचा। कामिनी उनके पैरों के पास, फर्श पर बैठ गई। उसने अपना सिर उनकी जांघ पर रख दिया।

"मुझे पता चला," राज ने उसके बालों को सहलाते हुए कहा, "कि परसों तूने जंगल की सैर की थी। रमन के साथ। और कार की पिछली सीट पर तूने अपनी प्यास बुझाई।"

कामिनी का चेहरा पीला पड़ गया। "वो... वो गलती हो गई... उसने ज़बरदस्ती..."

"झूठ मत बोल," राज ने उसका चेहरा ऊपर किया और उसकी आंखों में झांका। "रमन ने बताया कि तूने कितना मज़ा लिया। तूने उसे 'अंदर' छोड़ने को कहा। तूने उसकी पीठ नोच ली।"

कामिनी की आंखों से आंसू आ गए। वह पकड़ी गई थी। अब उसका क्या होगा?

"रो मत पगली," राज ने उसके आंसू पोंछे और मुस्कुराए। "मैं नाराज़ नहीं हूँ। मैं खुश हूँ। बहुत खुश।"

"खुश?" कामिनी ने हैरानी से देखा।

"हाँ," राज ने व्हिस्की का घूंट भरा। "क्योंकि तूने साबित कर दिया कि तू सिर्फ नाम की, घूंघट वाली बहू नहीं, बल्कि एक असली 'औरत' है जिसे सख्त मर्द चाहिए। जिसे भरा जाना पसंद है। चाहे वो ठाकुर हो या नौकर। तुझे बस लंड चाहिए, है ना?"

राज ने अपना गिलास रखा और कामिनी को बांहों से पकड़कर खड़ा किया।

"कपड़े उतारो," राज ने कहा।

कामिनी ने रमन की तरफ देखा जो अभी भी कोने में खड़ा मुस्कुरा रहा था। "उसके सामने?"

"हाँ," राज ने कहा। "उसने तो तुझे जंगल में, दिन के उजाले में नंगा किया था। ड्राइवर और मालकिन का खेल खेला था। अब क्या शर्म? यह मेरा कमरा है, यहाँ मेरे नियम चलते हैं। उतारो।"

कामिनी ने कांपते हाथों से अपनी साड़ी का पल्लू गिराया। ब्लाउज उतारा। पेटीकोट खोला। कपड़े फर्श पर गिर गए।

जब वह पूरी तरह नंगी हो गई, तो उसे लगा कि कमरे की हवा भी उसे छूने से डर रही है। लालटेन की रोशनी में उसका गोरा, सुडौल शरीर चमक रहा था।

राज ने उसे निहारा। फिर उन्होंने रमन की तरफ इशारा किया।

"रमन, इधर आ। रोशनी में।"

रमन आगे आया। उसका नंगा, उत्तेजित शरीर और उसका खड़ा हुआ लिंग अब कामिनी के बिल्कुल करीब था।

"आज तू मेरी सेवा नहीं करेगी," राज ने अपनी कुर्सी पर पीछे झुकते हुए कहा, पैर फैलाते हुए। "आज तू रमन को खुश करेगी। और मैं... मैं देखूंगा। मैं देखना चाहता हूँ कि मेरा नौकर मेरी चीज़ का इस्तेमाल कैसे करता है।"

कामिनी सन्न थी। उसके जेठ, उसके मालिक, उसे अपने सामने नौकर के साथ सोने का हुक्म दे रहे थे? यह अपमान था या कोई अजीब सा सम्मान?

"खड़ी क्या है?" राज ने डांटा। "शुरू हो जा। उसका लंड पकड़।"
 
कामिनी ने कांपते हुए हाथ बढ़ाया। उसने रमन के काले, सख्त लिंग को पकड़ लिया। वह बहुत गर्म था और नसों से धड़क रहा था। रमन ने एक गहरी सांस ली।

"मुंह में ले," राज ने आदेश दिया। "जैसे उस दिन कार में लेना चाहती थी, पर ले नहीं पाई। आज पूरा ले।"

कामिनी घुटनों के बल बैठ गई। रमन उसके सामने खड़ा था, तना हुआ। कामिनी ने अपना मुंह खोला और रमन के लिंग को अपने अंदर ले लिया।

"स्लप..."

राज अपनी कुर्सी पर बैठे व्हिस्की पी रहे थे और यह नज़ारा देख रहे थे। उनकी घर की बहू, विला की इज़्ज़त, उनके सामने, उनके नौकर का लिंग चूस रही थी। यह दृश्य उनके लिए किसी भी सेक्स से ज्यादा उत्तेजक था। यह सत्ता का चरम सुख था। वे देख रहे थे कि कैसे कामिनी के गोरे गाल पिचक रहे हैं।

"शाबाश," राज ने कमेंट्री की। "गहराई तक ले। उसे चूस। देख रमन, मालकिन की जुबान कितनी नरम है। मज़ा आ रहा है?"

"जी मालिक... बहुत..." रमन की सांसें तेज़ हो रही थीं। उसने अपना हाथ कामिनी के सिर पर रख दिया और अपनी कमर हिलाने लगा। वह कामिनी के मुंह को चोद रहा था।

"मालिक... यह तो स्वर्ग है..." रमन बड़बड़ाया।

"स्वर्ग तो अभी बाकी है," राज ने अपना गिलास खाली किया। "रमन, उसे बिस्तर पर ले जा। मुझे पूरा खेल देखना है।"

रमन ने कामिनी को उठाया। कामिनी ने कोई विरोध नहीं किया। वह अब एक गुड़िया थी। रमन ने उसे विशाल पलंग पर पटक दिया। कामिनी बिस्तर पर चित लेटी थी। रमन उसके ऊपर आ गया।

राज अपनी कुर्सी से उठे और बिस्तर के बिल्कुल पास आकर खड़े हो गए। वे इतने पास थे कि अगर वे हाथ बढ़ाते तो दोनों को छू सकते थे। उनकी लुंगी में भी हलचल हो रही थी।

"टांगें उठाओ," राज ने कामिनी को कहा।

कामिनी ने अपनी टांगें उठाईं और फैला दीं। उसकी गुलाबी योनि, जो गीली होकर चमक रही थी और रमन के लिए तैयार थी, राज के सामने थी।

"रमन, दिखा मुझे," राज ने कहा। "दिखा कि तू कैसे पेलता है। दिखा कि तूने कार में क्या किया था।"

रमन ने अपने लिंग को कामिनी के मुहाने पर रखा। राज झुक गए, ध्यान से देखने के लिए।

"डाल," राज ने कहा।

रमन ने एक धक्का मारा।

"स्लप!"

वह पूरा अंदर चला गया। कामिनी का शरीर धनुष की तरह मुड़ गया।

"आह्ह्ह!" कामिनी ने आंखें बंद कर लीं।

"आंखें खोल!" राज चिल्लाए। "मेरी तरफ देख! देख मैं तुझे देख रहा हूँ!"

कामिनी ने आंखें खोलीं। उसके ऊपर रमन था, उसे पेल रहा था, उसका नौकर। और बगल में राज खड़े थे, जो उसे घूर रहे थे और अपने खुद के लिंग (जो लुंगी के अंदर सख्त हो चुका था) को मुट्ठी में भरकर सहला रहे थे।

"कैसा लग रहा है?" राज ने पूछा। "तेरा नौकर तेरे अंदर है। उसका मोटा लंड तेरी बच्चेदानी को छू रहा है। बोल।"

"अच्छा लग रहा है... बाबूजी... बहुत अच्छा..." कामिनी ने सिसकते हुए, शर्म को त्यागकर कहा।

रमन ने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी। वह विला के गद्दे पर अपनी मालकिन को बजा रहा था, और मालिक उसका हौसला बढ़ा रहे थे। यह रमन के लिए भी किसी सपने जैसा था।

"और जोर से रमन," राज ने निर्देश दिया। "उसकी चीखें निकाल दे। रहम मत कर। यह रंडी है।"

रमन ने जानवरों की तरह धक्के मारने शुरू किए। "थप-थप-थप!" की आवाज़ कमरे में गूंजने लगी। कामिनी का शरीर बिस्तर पर ऊपर-नीचे हो रहा था। उसके स्तन बुरी तरह हिल रहे थे।

राज का संयम टूटने लगा। वे अब सिर्फ दर्शक नहीं रह सकते थे। उन्हें भी इस खेल में शामिल होना था।

"रुको," राज ने कहा।

रमन रुक गया, लेकिन बाहर नहीं निकला। वह कामिनी के अंदर ही रहा, सांसें भरते हुए। कामिनी भी हांफ रही थी।

राज ने अपनी लुंगी की गांठ खोली। रेशमी कपड़ा गिर गया। उनका विशाल लिंग बाहर आ गया। वह रमन से भी मोटा, काला और खतरनाक लग रहा था। वह पूरी ताकत से खड़ा था।

राज बिस्तर पर चढ़े। गद्दा उनके वजन से दब गया। वे कामिनी के चेहरे के पास आए।

"इसका नीचे का हिस्सा तो भर गया," राज ने कहा। "लेकिन मुंह खाली है। इसे भी भरना चाहिए। इसे सांस लेने की फुर्सत नहीं मिलनी चाहिए।"

राज ने अपने लिंग को कामिनी के होंठों पर रगड़ा। कामिनी को उनकी गंध आई—महंगी, कड़क और नशीली।

"खोलो," राज ने कहा।

कामिनी ने मुंह खोला। राज ने अपना लिंग उसके मुंह में डाल दिया।

अब स्थिति यह थी: रमन नीचे से कामिनी की योनि को पेल रहा था, और राज ऊपर से उसके मुंह को बजा रहे थे। कामिनी बीच में फंसी थी। दो मर्दों के बीच। एक मालिक, एक नौकर। और वह उनकी साझा संपत्ति।

यह 'डबल टीमिंग' थी।

कामिनी का दिमाग सुन्न हो गया था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह किस सुख पर ध्यान दे। नीचे की जलन या ऊपर का दबाव। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन दर्द के नहीं, बल्कि एक अजीब सी पूर्णता के। वह पूरी तरह भरी हुई थी। उसका शरीर दो मर्दों द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा था।

"हाँ... चूस इसे..." राज गुर्रा रहे थे। "मेरी रंडी... आज तू असली काम कर रही है..."

"मालकिन... आह... आपकी पकड़ बहुत टाइट है..." रमन नीचे से कराह रहा था।

कमरा मर्दाना आवाज़ों, गालियों और गीले शोर से भर गया था। बिस्तर की चूं-चूं और जिस्मों की टक्कर।

राज ने अपनी रफ़्तार तेज़ की। वे कामिनी के गले तक जा रहे थे। रमन भी अपनी चरम सीमा पर था।

"रमन... छोड़ दे!" राज ने आदेश दिया। "इसके अंदर भर दे!"

"मालिक... मैं आ रहा हूँ!"

"कामिनी... पी ले!" राज भी चिल्लाए।

एक ही पल में, दोनों मर्दों ने अपना-अपना काम तमाम किया।
 
रमन ने एक जानवर जैसी आवाज़ के साथ अपना सारा वीर्य कामिनी की योनि में, उसकी कोख की गहराई में छोड़ दिया। उसी वक्त, राज ने अपना गर्म लावा कामिनी के मुंह में, उसके गले के अंदर उड़ेल दिया।

कामिनी को लगा जैसे वह डूब रही है। ऊपर वीर्य, नीचे वीर्य। वह इन मर्दों के सार से भर गई थी। उसने राज का पानी पिया और रमन का पानी अपने अंदर लिया।

राज ने बाहर निकाला और कामिनी के चेहरे पर बाकी बचा हुआ गिरा दिया। रमन भी बाहर निकला और बगल में लुढ़क गया।

तीनों बिस्तर पर पड़े थे। भारी सांसें। पसीने की गंध। और एक अजीब सा, भारी सन्नाटा।

काफी देर बाद, राज उठे। उन्होंने अपना रोब पहना।

"रमन," राज ने कहा। "कपड़े पहन और जा। सुबह जल्दी उठना है। और सुन... यह बात हमारे बीच रहेगी।"

"जी मालिक," रमन ने उठकर अपने कपड़े पहने। उसने जाते-जाते कामिनी को एक बार देखा, जो अभी भी नंगी, अस्त-व्यस्त और वीर्य से लथपथ पड़ी थी। उसकी आंखों में जीत थी। उसने अपनी मालकिन को जीत लिया था।

रमन के जाने के बाद, राज ने एक गीला तौलिया लिया और कामिनी के पास आए। उन्होंने प्यार से उसका चेहरा पोंछा।

"अब तू साफ है," राज ने कहा। "मेरी और रमन की निशानी तेरे अंदर है। अब तू खाली नहीं है।"

कामिनी ने अपनी आंखें खोलीं। वह थकी हुई थी, लेकिन उसकी आंखों में एक नई चमक थी—एक औरत की चमक।

"बाबूजी..."

"शश्श," राज ने उसके होंठों पर उंगली रखी। "अब सो जा। कल से तेरी ज़िंदगी बदल जाएगी। अब तू इस विला की रानी है, क्योंकि तेरे पास दो-दो वफादार जानवर हैं।"

राज ने उसे बांहों में भरकर सुला लिया।

यह विला का सबसे बड़ा और सबसे गंदा रहस्य था, और कामिनी इस रहस्य की सबसे खुश रखवाली थी। उसे अब किसी चीज़ की कमी नहीं थी।

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