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द्विज एक विद्वान शिक्षक के साथ-साथ प्रवीण चित्रकार भी था, ये रहस्योद्घाटन माया के लिए सुखद था, किन्तु इससे भी सुखद थी वह अनुभूति, जो द्विज के बनाए हुए चित्र को देखकर माया के मन में जागी थी। चित्र में स्वयं वह थी, जो दाहिने गाल पर हाथ रखे हुए सरोवर में अपना प्रतिबिम्ब निहार रही थी। द्विज ने अश्लीलता के दायरे में कदम रखे बिना ही उसके शरीर के वक्रों को इस कदर चित्रित किया था कि उसके कपोलों पर लज्जा की सुर्खी दौड़ गयी।
द्विज की सांसें तीव्र हो उठीं। इस क्षण वह उतने ही व्यग्र भाव से माया के प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहा था, जितने व्यग्र भाव से माया ये जानने की प्रतीक्षा किया करती थी कि उसके हल किये हुए प्रश्न सही हैं या नहीं।
माया, द्विज से निगाहें नहीं मिला सकी। उसने चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया।
“तुमने दृष्टि क्यों फेर ली माया?”
“जिस भाव से आपने ये चित्र बनाया है, वे भाव किसी भी स्त्री को असहज कर सकते हैं।”
“मुझ जैसे अनुभवहीन चित्रकार का कृतित्व सार्थक हो गया माया, क्योंकि जिस भाव के वशीभूत होकर मैंने रंगों को पत्रक पर बिखेरा, उस भाव को तुमने सहज ही महसूस कर लिया।”
माया के होंठ थरथराये, किन्तु ये थरथराहट शब्दों का रूप न ले सकी। उसने द्विज की ओर मुड़ने की कोशिश की, किन्तु इस कोशिश में भी सफल न हो सकी।
“मेरे पास अधिक समय नहीं है माया। मैं तुमसे कोई प्रत्युत्तर मांगने नहीं आया हूं और न ही ये जानने की अभिलाषा है कि तुम्हारे हृदय में मेरे प्रति क्या भाव हैं। मैं केवल तुम्हें अपनी प्रथम और अंतिम कृति भेंट करने के साथ-साथ एक विशेष प्रयोजन से अवगत कराने आया था।”
माया अब भी खामोश रही। व्दिज गहरी सांस लेकर वर्तमान विचारों से निजात पाते हुए उस विषय पर आ गया, जो शंकरगढ़ के हित के लिए उसके प्रेम से अधिक महत्वपूर्ण था।
“महान तंत्र साधक अघोरनाथ ने अभयानन्द के अंत के लिए एक युक्ति बतायी है, किन्तु वह युक्ति इतनी सहज नहीं है कि साधारण मनुष्य उसे सफल बना सकें।”
माया व्दिज की ओर पलटी।
“तो अब क्या होगा?”
माया के प्रश्न के उत्तर में व्दिज का चेहरा दृढ़ हो गया।
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द्विज की सांसें तीव्र हो उठीं। इस क्षण वह उतने ही व्यग्र भाव से माया के प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहा था, जितने व्यग्र भाव से माया ये जानने की प्रतीक्षा किया करती थी कि उसके हल किये हुए प्रश्न सही हैं या नहीं।
माया, द्विज से निगाहें नहीं मिला सकी। उसने चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया।
“तुमने दृष्टि क्यों फेर ली माया?”
“जिस भाव से आपने ये चित्र बनाया है, वे भाव किसी भी स्त्री को असहज कर सकते हैं।”
“मुझ जैसे अनुभवहीन चित्रकार का कृतित्व सार्थक हो गया माया, क्योंकि जिस भाव के वशीभूत होकर मैंने रंगों को पत्रक पर बिखेरा, उस भाव को तुमने सहज ही महसूस कर लिया।”
माया के होंठ थरथराये, किन्तु ये थरथराहट शब्दों का रूप न ले सकी। उसने द्विज की ओर मुड़ने की कोशिश की, किन्तु इस कोशिश में भी सफल न हो सकी।
“मेरे पास अधिक समय नहीं है माया। मैं तुमसे कोई प्रत्युत्तर मांगने नहीं आया हूं और न ही ये जानने की अभिलाषा है कि तुम्हारे हृदय में मेरे प्रति क्या भाव हैं। मैं केवल तुम्हें अपनी प्रथम और अंतिम कृति भेंट करने के साथ-साथ एक विशेष प्रयोजन से अवगत कराने आया था।”
माया अब भी खामोश रही। व्दिज गहरी सांस लेकर वर्तमान विचारों से निजात पाते हुए उस विषय पर आ गया, जो शंकरगढ़ के हित के लिए उसके प्रेम से अधिक महत्वपूर्ण था।
“महान तंत्र साधक अघोरनाथ ने अभयानन्द के अंत के लिए एक युक्ति बतायी है, किन्तु वह युक्ति इतनी सहज नहीं है कि साधारण मनुष्य उसे सफल बना सकें।”
माया व्दिज की ओर पलटी।
“तो अब क्या होगा?”
माया के प्रश्न के उत्तर में व्दिज का चेहरा दृढ़ हो गया।
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