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वह दरगाह जंगल के न जाने किस हिस्से में था, जिसके आंगन में महताबी रोशनी बिखरी हुई थी। मजार पर चढ़ी चादर के फड़फड़ाने की ध्वनि हवाओं की सरसराहट के साथ मिल कर परिवेश को रहस्यमय बना रही थी। दूर कहीं से भेड़ियों के चीखने की आवाजें आ रही थीं। मजार से थोड़े ही फासले पर एक वृध्द फकीर काबा की दिशा में उन्मुख था, जिसके सिर पर जालीदार टोपी थी और दोनों हाथ दुआ मांगने के अंदाज में ऊपर उठे हुए थे।
‘ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मद रसूल अल्लाह!’
(अल्लाह के सिवा और कोई परमेश्वर नहीं है और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं।)
उसने हथेलियों को आँखों से लगाया। ठुड्डी को दोनों कन्धों से स्पर्श कराने के पश्चात उठने ही वाला था कि दरगाह की चारदीवारी में लगे कमजोर दरवाजे पर दस्तक पड़ी। फ़कीर जोरों से खांसा और निकट ही पड़ी लाठी को टटोलकर उठाया। उसके खांसने के अंदाज और जर्जर जिस्म के कम्पन को देखकर लग रहा था कि उसकी अवस्था अस्सी साल से ऊपर थी। कांपते जिस्म का आधे से अधिक बोझ लाठी पर और कुछ कमजोर पैरों डालते हुए वह फ़कीर आगे बढ़ा। उसके दरवाजे तक पहुँचने में अधिक समय लगने के कारण दस्तक की कई बार पुनरावृत्ति हुई। आगंतुक बेहद जल्दी में जान पड़ता था।
“अल्लाह की हुक्म के बगैर एक पत्ता तक नहीं हिल सकता। फिर न जाने क्यों इन इंसानों को इतनी घबराहट रहती है।” दरवाजे पर लगातार पड़ती थाप से भन्नाकर फ़कीर बड़बड़ाया और चाल में थोड़ी तेजी लाकर दरवाजे तक पहुंचा। सांकल गिराने के बाद वापस मुड़ते हुए बोला- “खुल गया। दाखिल हो जाओ।”
दरवाजा एक झटके से खुला और आगंतुक तेजी से चारदीवारी में प्रविष्ट हो गया।
“मुझे...मुझे आपके मदद की जरूरत है बाबा।” आने वाला शख्स इस प्रकार हांफ रहा था, मानो लम्बी दौड़ लगाकर आया हो- “अगर अपने मदद नहीं की तो इंसानों का भगवान पर से भरोसा उठ जाएगा।”
फ़कीर ने आगंतुक की ओर देखने तक का जहमत नहीं उठाया और लाठी टेकते हुए टीन की छत वाली एक छोटी सी कोठरी की ओर बढ़ गया। आगंतुक तड़प कर उसके पीछे भागा।
“दो जिंदगियां एक शैतान के चंगुल में तड़प रही हैं बाबा। आपको हमारी मदद करनी होगी।”
“शैतान के खात्मे में अभी वक्त है। ठहर जा और सांस ले ले।” फ़कीर ने सुराही से पानी का भरा गिलास निकाला और साहिल की ओर बढ़ा दिया। आगंतुक को पानी की जरूरत थी, फ़कीर ये बात ताड़ गया था। साहिल ने उसके हाथ से गिलास झपटा और एक ही सांस में खाली कर दिया।
☐
‘ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मद रसूल अल्लाह!’
(अल्लाह के सिवा और कोई परमेश्वर नहीं है और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं।)
उसने हथेलियों को आँखों से लगाया। ठुड्डी को दोनों कन्धों से स्पर्श कराने के पश्चात उठने ही वाला था कि दरगाह की चारदीवारी में लगे कमजोर दरवाजे पर दस्तक पड़ी। फ़कीर जोरों से खांसा और निकट ही पड़ी लाठी को टटोलकर उठाया। उसके खांसने के अंदाज और जर्जर जिस्म के कम्पन को देखकर लग रहा था कि उसकी अवस्था अस्सी साल से ऊपर थी। कांपते जिस्म का आधे से अधिक बोझ लाठी पर और कुछ कमजोर पैरों डालते हुए वह फ़कीर आगे बढ़ा। उसके दरवाजे तक पहुँचने में अधिक समय लगने के कारण दस्तक की कई बार पुनरावृत्ति हुई। आगंतुक बेहद जल्दी में जान पड़ता था।
“अल्लाह की हुक्म के बगैर एक पत्ता तक नहीं हिल सकता। फिर न जाने क्यों इन इंसानों को इतनी घबराहट रहती है।” दरवाजे पर लगातार पड़ती थाप से भन्नाकर फ़कीर बड़बड़ाया और चाल में थोड़ी तेजी लाकर दरवाजे तक पहुंचा। सांकल गिराने के बाद वापस मुड़ते हुए बोला- “खुल गया। दाखिल हो जाओ।”
दरवाजा एक झटके से खुला और आगंतुक तेजी से चारदीवारी में प्रविष्ट हो गया।
“मुझे...मुझे आपके मदद की जरूरत है बाबा।” आने वाला शख्स इस प्रकार हांफ रहा था, मानो लम्बी दौड़ लगाकर आया हो- “अगर अपने मदद नहीं की तो इंसानों का भगवान पर से भरोसा उठ जाएगा।”
फ़कीर ने आगंतुक की ओर देखने तक का जहमत नहीं उठाया और लाठी टेकते हुए टीन की छत वाली एक छोटी सी कोठरी की ओर बढ़ गया। आगंतुक तड़प कर उसके पीछे भागा।
“दो जिंदगियां एक शैतान के चंगुल में तड़प रही हैं बाबा। आपको हमारी मदद करनी होगी।”
“शैतान के खात्मे में अभी वक्त है। ठहर जा और सांस ले ले।” फ़कीर ने सुराही से पानी का भरा गिलास निकाला और साहिल की ओर बढ़ा दिया। आगंतुक को पानी की जरूरत थी, फ़कीर ये बात ताड़ गया था। साहिल ने उसके हाथ से गिलास झपटा और एक ही सांस में खाली कर दिया।
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