• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Horror ख़ौफ़

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
द्विज एक विद्वान शिक्षक के साथ-साथ प्रवीण चित्रकार भी था, ये रहस्योद्घाटन माया के लिए सुखद था, किन्तु इससे भी सुखद थी वह अनुभूति, जो द्विज के बनाए हुए चित्र को देखकर माया के मन में जागी थी। चित्र में स्वयं वह थी, जो दाहिने गाल पर हाथ रखे हुए सरोवर में अपना प्रतिबिम्ब निहार रही थी। द्विज ने अश्लीलता के दायरे में कदम रखे बिना ही उसके शरीर के वक्रों को इस कदर चित्रित किया था कि उसके कपोलों पर लज्जा की सुर्खी दौड़ गयी।

द्विज की सांसें तीव्र हो उठीं। इस क्षण वह उतने ही व्यग्र भाव से माया के प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहा था, जितने व्यग्र भाव से माया ये जानने की प्रतीक्षा किया करती थी कि उसके हल किये हुए प्रश्न सही हैं या नहीं।

माया, द्विज से निगाहें नहीं मिला सकी। उसने चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया।

“तुमने दृष्टि क्यों फेर ली माया?”

“जिस भाव से आपने ये चित्र बनाया है, वे भाव किसी भी स्त्री को असहज कर सकते हैं।”

“मुझ जैसे अनुभवहीन चित्रकार का कृतित्व सार्थक हो गया माया, क्योंकि जिस भाव के वशीभूत होकर मैंने रंगों को पत्रक पर बिखेरा, उस भाव को तुमने सहज ही महसूस कर लिया।”

माया के होंठ थरथराये, किन्तु ये थरथराहट शब्दों का रूप न ले सकी। उसने द्विज की ओर मुड़ने की कोशिश की, किन्तु इस कोशिश में भी सफल न हो सकी।

“मेरे पास अधिक समय नहीं है माया। मैं तुमसे कोई प्रत्युत्तर मांगने नहीं आया हूं और न ही ये जानने की अभिलाषा है कि तुम्हारे हृदय में मेरे प्रति क्या भाव हैं। मैं केवल तुम्हें अपनी प्रथम और अंतिम कृति भेंट करने के साथ-साथ एक विशेष प्रयोजन से अवगत कराने आया था।”

माया अब भी खामोश रही। व्दिज गहरी सांस लेकर वर्तमान विचारों से निजात पाते हुए उस विषय पर आ गया, जो शंकरगढ़ के हित के लिए उसके प्रेम से अधिक महत्वपूर्ण था।

“महान तंत्र साधक अघोरनाथ ने अभयानन्द के अंत के लिए एक युक्ति बतायी है, किन्तु वह युक्ति इतनी सहज नहीं है कि साधारण मनुष्य उसे सफल बना सकें।”

माया व्दिज की ओर पलटी।

“तो अब क्या होगा?”

माया के प्रश्न के उत्तर में व्दिज का चेहरा दृढ़ हो गया।

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐
 
रात की स्याह चादर ने दक्षिण के जंगल को खुद में समेट लिया था। अभयानन्द एक पेड़ की ओट से बाहर निकला। उसकी चाल मंथर थी। चेहरे पर भय था। ये शंकरगढ़ में अघोरनाथ की मौजूदगी का असर था, जो उसे अपने ही गढ़ में भयभीत और सतर्क होकर पग बढ़ाने पड़ रहे थे। कुछ फासले तय करने के उपरांत वह चारों ओर निगाहें घुमाकर यह सुनिश्चित कर लेता था कि किसी की दृष्टि उस पर तो नहीं। अंतत: वह एक टीले के पास पहुंचकर ठिठका। टीले की ऊंचाई एक वयस्क मनुष्य के घुटने तक थी।

अभयानन्द का भयावह रूप और भी भयावह हो उठा। क्रोधातिरेक के कारण उसके जबड़े भींच गए। आँखें भेड़िये की आँखों में परिवर्तित हो गयीं। वह टीले के पास घुटने के बल बैठ गया।

“अक्षम्य अपराध।” उसने टीले पर हथेली फिराई और फिर खून से लाल हो उठी हथेली पर दृष्टिपात करते हुए एक-एक हर्फ़ को चबाते हुए बोला- “ये..ये अक्षम्य अपराध है। हमारे भक्तों के शव का टीला खड़ा करवाया है आपने द्विज! आपने अपनी भयावह मृत्यु को और भी भयावह बना डाला। अघोरनाथ भी आपकी रक्षा नहीं कर सकते। इस राज्य का विनाश अवश्यम्भावी है।”

कापालिकों के शव के टीले पर ठहरी अभयानन्द की आँखों से आंसू बह चले। ऐसा लगा मानो उसकी भयावहता क्रोधाग्नि की आंच से पिघलकर आंसुओं के रूप में बह निकली थी।

“हमारा प्रतिशोध भयानक होगा। अत्यंत भयानक...।”

अकस्मात् ही वह थम गया। आगे कुछ बोलने से पूर्व वह रात की खामोशी के बीच उभरी आहट का जायजा लेने लगा। ये सुनिश्चित होते ही कि उसे कोई भ्रम नहीं हुआ था, आहट वास्तव में उभरी थी; वह बिजली की तेजी से पीछे पलटा। हालांकि पीछे गहन अंधकार के अलावा कुछ नहीं था, किन्तु अभयानन्द को आहट का कारण ज्ञात हो चुका था। उसके होठों पर वही पैशाचिक मुस्कान नृत्य कर उठी, जो अब तक उसके व्यक्तित्व की परिचायक बन चुकी थी।

“अभयानन्द के साम्राज्य में आपका स्वागत है द्विज! हमारा आतिथ्य सत्कार

स्वीकार करने के लिए वृक्ष की ओट से बाहर निकलिए।”

‘आतिथ्य-सत्कार’ शब्द का प्रयोग करते क्षण अभयानन्द का चेहरा खौफनाक हो उठा था। थोड़े ही फासले पर नजर आ रहे एक वृक्ष की ओट से द्विज बाहर निकला।

“दुस्साहस!” अभयानन्द की भेड़िये जैसी भयावह आँखें चमक उठीं- “असीम दुस्साहस किया आपने द्विज! क्या हमारे भय ने आपका विवेक हर लिया?”

“भइया!” द्विज ने अस्फुट स्वर में पुकारा।

‘भइया’ संबोधन सुनते ही अभयानन्द के भावों में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुआ। सर्वप्रथम उसने गगनभेदी अट्ठहास किया और फिर अट्ठहास के थमते ही उसने आश्चर्यजनक ढंग से गंभीर मुद्रा अख्तियार कर ली।

“ओह! तो अग्रज के अंतिम दर्शन की लालसा आपको यहाँ खींच लाई। हम आपकी लालसा को पूर्ण कर देते हैं।”

अभयानन्द ने आकाश की ओर मुंह करके भीषण गर्जना की और इसी के साथ द्विज ने अपने जीवन की सर्वाधिक आश्चर्य पैदा करने वाली घटना देखी।

अभयानन्द के मुंह से काले धुएं का एक गुब्बार निकला और भेड़िया-मानव की आकृति में तब्दील होकर वायुमंडल में चक्कर काटने लगा। धुएं के गुब्बार से हटकर जब द्विज की दृष्टि अभयानन्द के स्थूल शरीर पर पड़ी, तो एक और आश्चर्य को अपनी राह देखते हुए पाया।

क्षण भर पहले ही उसने ही अभयानन्द के जिस शरीर को चलायमान देखा था, वही शरीर अब निर्जीव अवस्था में भूमि पर पड़ा हुआ था, बिल्कुल उसी दशा में, जिस दशा में उसने उसे पीपल के तने से उतारा था। अंतर केवल इतना था कि वह शरीर अब कराह नहीं रहा था और वातावरण में शव की दुर्गन्ध तजी से फ़ैलने लगी थी।

“भइया!”

अभयानन्द के घिनौने शव को द्विज ने अंक में भींच लिया, किन्तु उसकी करुण संवेदनाओं का शव पर कोई असर नहीं हुआ। काला धुआं वायुमंडल में चक्कर काटता रहा।

द्विज बड़े भाई के शव को अंक में भींचकर लम्बे समय तक आंसू बहाता रहता, यदि उसने अचानक उस शव में हुए परिवर्तन को न देख लिया होता।

शव अब सामान्य हो चुका था। उसकी आंखें खुल गयी थी। व्दिव की बाहों में अब अभयानन्द का वीभत्स शव न होकर जीता-जागता अभयानन्द था। पूर्णतया स्वस्थ्य शरीर वाला अभयानन्द। वायुमण्डल में भी अब धुंए का काला

गुब्बार नहीं था। श्मशानेश्वर पुनः अभयानन्द की काया में प्रविष्ट हो चुका था।

व्दिज उसे छोड़कर दूर हट गया।

अभयानन्द चेहरे पर हिंसक भाव लिए हुए उठा।

“देखा आपने व्दिज कि हम पिशाचों के स्वामी होकर भी आप जैसे तुच्छ मनुष्य की भावनाओं का कितना सम्मान करते हैं। हमने आपको आपके अग्रज के अंतिम दर्शन करा दिए।”

सच को प्रत्यक्ष अपनी आंखों से देख लेने के पश्चात व्दिज के पास बोलने को कुछ नहीं बचा था।

“अभयानन्द तो उसी क्षण मृत्यु को प्राप्त हो गया था व्दिज, जिस क्षण उसने हमारी साधना पूर्ण करके हमें अपनी काया में आमंत्रित किया था। वह तो उसी क्षण मृत्यु को प्राप्त हो गया था, जिस क्षण उसने हमारे साथ अपनी आत्मा का व्यापार करके, ब्रह्मपिशाच योनि में जाने से बचने हेतु हमारे तामसी साम्राज्य का नागरिकता स्वीकार कर ली थी। क्या आपको ये लगता है कि जिस अभयानन्द से आपने उसकी झोपड़ी में वार्तालाप किया था, जिसे आपने अपने वाकजाल में भरमाकर सैनिकों को सौंप दिया था अथवा जिसे पीपल से बांध कर जीवित जला दिया गया था, वह अभयानन्द आपका अग्रज था?”

व्दिज निरुत्तर था।

“नहीं व्दिज!” पिशाच ने स्वतः ही उत्तर दे दिया- “वह अभयानन्द नहीं था, वो हम थे। वो हम थे, जिसने तुमसे वार्तालाप किया। वो हम थे, जिसे कारागार में डाला गया। वो हम थे, जिसे पीपले के तने से बांधकर जलाया गया। भातृ-प्रेम के आवेग में आकर आपने भाई की रक्षा का नहीं अपितु हमारे अर्थात श्मशानेश्वर के अवतरण का मार्ग प्रशस्त किया था। हम अभयानन्द जैसे साधकों की काया और उनकी वासनाओं को माध्यम बनाकर हमारी भोग-विलास की कामना को तृप्त करते हैं। अन्यथा हम तो मरघट में वास करने वाले अशरीर आत्मा भर ही हैं।”

अभयानन्द सधी हुई चाल से व्दिज की ओर बढ़ने लगा, और उसी अनुपात में व्दिज पीछे खिसकने लगा।

“उस रात जब मुझे अकेला छोड़कर भइया जंगल में गये थे तो उनके साथ क्या हुआ था?”
 
“उस रात आपने और अभयानन्द ने जिस औरत की चीख सुनी थी, उस औरत की नरबली देकर हमारे पूर्ववर्ती धारक अघोरा ने हमें अपनी काया में आमंत्रित किया था। ये प्रारब्ध का रचा हुआ खेल ही था कि अभयानन्द औरत की चीख का उद्गम तलाशते हुए अघोरा के मठ में पहुंच गया था। कापालिक-समुदाय अनुष्ठान पूर्ण होने का हर्ष मना रहा था, इसलिए कापालिकों ने अभयानन्द को बालक समझकर उसे बिना कोई क्षति पहुंचाए भगा देना चाहा था किन्तु अचानक ही कापालिकों जैसी अलौकिक शक्तियां प्राप्त करके अपने शत्रुओं का नाश करने का दृढ़ संकल्प ले चुका अभयानन्द भयभीत होकर भागने के बजाय निर्भयतापूर्वक वहां डटा रहा था। उसके भीतर शत्रुओं से प्रतिशोध साधने की कामना इतनी प्रबल थी कि उसने आपका भी मोह त्याग कर अघोरा के सम्मुख कापालिक-दीक्षा लेने का प्रस्ताव रखा था। अघोरा को अवश्य ही उस बालक में कुछ विशेष नजर आया था, जो उसने उसे कापालिक-दीक्षा देनी स्वीकार कर ली थी। इसके पश्चात अभयानन्द ने अनेकों तामसिक सिध्दियां प्राप्त करके अपने शत्रुओं को प्रताड़ित किया था।”

“ओह!” व्दिज ठिठक गया- “मां हमेशा सत्य कहती थी कि मन में प्रतिशोध की भावना पालने वालों का हश्र बहुत बुरा होता है। प्रतिशोध साधने की अदम्य चाह ने ही भइया को नरपिशाच बनाया। उन्होंने स्वयं अपने ही हाथों से अपनी मुक्ति के समस्त मार्ग अवरुध्द कर दिये।”

द्विज की व्यथा पर अभयानन्द(श्मशानेश्वर) ने कहकहा लगाया।

“अब आपके जीवन में उस चेतावनी को स्मरण करने का क्षण आ चुका है द्विज, जो हमने आपको तब दी थी, जब राज्य के सैनिक हमें बंधक बना रहे थे।”

अभयानन्द के विकृत रूप ने द्विज को खौफजदा कर दिया। उसकी रगों में भय की सर्द लहर सरगोशी कर उठी। उसे अनायास ही अभयानन्द की चेतावनी याद आ गयी।

‘हमारी आपसे कोई शत्रुता नहीं थी, किन्तु आज आपने हमारे जैसे एक

नरपिशाच से अनायास ही शत्रुता मोल ले ली। आपकी मृत्यु बहुत दारुण होगी द्विज। हमें दिखाई दे रहा है कि श्मशानेश्वर स्वयं अपनी कटार से आपको मुंडविहीन करेंगे। वे अपने भयानक दांत से तुम्हारी गर्दन का मांस काट खायेंगे।’

द्विज को और अधिक भयभीत करने के ध्येय से अभयानन्द ने कापालिकों के खून से सनी अपनी हथेली उसकी ओर फैलाई। न केवल हथेली बल्कि उसके नुकीले नाखून भी रक्तरंजित थे।

“हमारे भक्तों के रक्त से रंजित ये हथेली हम आपके रक्त से धोकर स्वच्छ करेंगे द्विज।।”

इससे पूर्व कि द्विज का साहस अभयानन्द के खौफ से पराजित हो जाता, उसे अघोरनाथ का कथन याद आया।

‘पिशाच का भयावह रूप देखकर तुम्हारा आत्मविश्वास डगमगाने लगे तो तुम आत्मज्ञान का मार्ग पकड़ लेना। गीता के सांख्ययोग का कोई भी श्लोक इसमें तुम्हारी सहायता कर सकता है, क्योंकि इस सम्पूर्ण अध्याय में वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन की कायरता का हनन करने के लिए आत्मा के अविनाशी प्रकृति का ही वर्णन किया है। अभयानन्द के पुतले के दाह-संस्कार की क्रिया मैं अवश्य संपन्न कराऊंगा किन्तु उसे एक निश्चित समय तक रोकने का दायित्व तुम्हें ही स्वीकारना होगा द्विज।’

द्विज ने आँखें बंद करके सांख्ययोग के अधोलिखित श्लोक का स्मरण किया।

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चौनं मन्यते हतम्‌।

उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥

(अर्थ: जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते कि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी के द्वारा मारा जाता है।)

“कोई लाभ नहीं है द्विज! न तो आप श्रीकृष्ण हैं, न तो हम अर्जुन हैं और न ही ये कुरुक्षेत्र की रणभूमि है। गीता का कोई भी श्लोक आज आपके प्राणों की रक्षा नहीं कर पायेगा।”

अभयानन्द पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वह अपने पैशाचिक कहकहों से वातावरण को गुंजाता हुआ द्विज की ओर बढ़ा और जब द्विज ने आँखें खोली तो अभयानन्द उसके इतने समीप आ चुका था कि वह उसका भेड़िया जैसा भयानक जबड़ा स्पष्ट देख सकता था।

अभयानन्द ने अपनी हथेली का खून द्विज के चेहरे पर पोतते हुए रहस्यमयी लहजे में कहा- “हम आपको मृत्यु नाम की रहस्यमयी यात्रा हेतु आमंत्रित करते हैं।”

अगले ही क्षण वातावरण में भेड़िये की गर्जना गूंजी और अभयानन्द ने अपने दांत द्विज के धड़ के उस हिस्से में धंसा दिये, जहाँ गरदन और कंधे का जोड़ होता है।

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐
 
‘ॐ ॐ ॐ ॐ रं रं रं रं अग्नि संधुक्षणं करोमि स्वाहा।’

अघोरनाथ द्वारा मुखाग्नि मंत्र का उच्चारण पूर्ण होते ही कुश पुंज की लौ लपलापयी, हवाओं का वेग तीव्र हुआ किन्तु इससे पूर्व कि लौ बुझ जाती, दिव्यपाणी ने कुश की अग्नि को अभयानन्द के प्रतीक, आटे के पुतले के मुख पर रख दिया। उचित स्थान पाते ही ज्वाला ने अपना विस्तार किया और कुछ ही क्षणों में सम्पूर्ण चिता को अपने आगोश में ले लिया।

सब-कुछ शान्तिपूर्वक संपन्न हो जाने केकारण जहाँ दिव्यपाणी और महाराज के चेहरे राहत के भाव थे, वहीं अघोरनाथ व्याकुलता के शिकार नजर आने लगे थे।

“हमने कल्पना भी नहीं की थी.....।”

“नहीं!” अघोरनाथ ने सतर्क निगाहों से इस कदर परिवेश का निरिक्षण किया मानो वातावरण में अभयानन्द के आगमन के संकेत छिपे हों- “ये शांति उस शान्ति जैसी प्रतीत हो रही है, जो ज्वार के आने से पहले सागर की छाती पर व्याप्त होती है।”

महाराज और कुलगुरु की निगाहें आपस में मिलीं।

“किन्तु आपकी इस अनुभूति का कारण?”

“क्योंकि श्मशानेश्वर जैसी पैशाचिक शक्ति इतनी सहजता से समर्पण नहीं कर सकती। अवश्य ही कुछ अप्रत्याशित घटित हुआ है। हमने जिस क्षण पुतले को श्मशानेश्वर के साथ युग्मित किया था, उसी क्षण श्मशानेश्वर को बोध हो गया रहा होगा कि काया-संयुग्मन के माध्यम से उससे उसका शरीर छिना जा रहा है। इसके पश्चात भी उसने स्वयं के अस्तित्व की रक्षा के लिए हमसे संघर्ष क्यों नहीं किया?”

अघोरनाथ के तर्क ने उन्हें निरुत्तर कर दिया। इससे पूर्व कि उनमें से किसी की ओर से कोई प्रतिक्रिया होती, जंगल से आयी गर्जना ने उनका ध्यान आकृष्ट कर लिया।

“ये..ये तो उसी की गर्जना है।”

“कोई सुरक्षा घेरे से बाहर नहीं निकलेगा।” अघोरनाथ ने चिता पर दृष्टिपात करते हुए चेतावनी दी। चिता की अग्नि उग्र हो चुकी थी और पुतले का कोई भी भाग ऐसा नहीं था, जो ज्वाला की चपेट में न रहा हो।

कुछ क्षण खामोशी में गुजर गए और फिर अचानक जंगल की दिशा में आकाश प्रकाशित होता नजर आया और इसी के साथ कुछ ऐसे आर्तनाद गूंजे, जैसे कोई जलता हुआ प्राणी चीख रहा हो। थोड़ी देर तक वह सिलसिला चला तत्पश्चात चिता की किसी लकड़ी के चटकने के स्वर के साथ ही वे आर्तनाद थम गए। धीरे-धीरे दक्षिण के आकाश पर फ़ैली रोशनी भी क्षीण पड़ती चली गयी।

महाराज और कुलगुरु ने अघोरनाथ की ओर देखा। अघोरनाथ का शरीर ढीला पड़ चुका था। दक्षिण के घटना से पहले चेहरे पर छाई अस्थिरता अब छंट चुकी थी और अब उसका स्थान उलझनों ने ले लिया था।

“ये हमें दिखाई दिया प्रभु!”

“हम विजयी हो गए दिव्यपाणी! दक्षिण में दिखाई पड़ी ज्वाला और वहां से गूंजने वाले आर्तनाद श्मशानेश्वर के थे।” अघोरनाथ ने भावहीन स्वर में उत्तर दिया।

“अर्थात..अर्थात ये हमारे लिए हर्ष के क्षण हैं प्रभु।”

अघोरनाथ ने गहरी सांस ली।

“किसी भी उल्लास में डूबने से पूर्व हमें ये ज्ञात करना होगा कि विजयश्री ने किस मूल्य पर हमारा वरण किया है। श्मशानेश्वर ने इतनी सहजता से पराजय कैसे स्वीकार कर ली?”

अघोरनाथ की पहेलीनुमा बातें न तो महाराज के समझ के दायरे में थीं और न ही कुलगुरु के। उनके चेहरे पर व्याप्त घोर अविश्वास के भावों ने दोनों को असमंजस में डाला हुआ था। अंतत: अघोरनाथ, महाराज से मुखातिब हुए- “माया कहाँ है?”

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐
 
माया की दाहिनी कलाई अघोरनाथ के हाथ में थी। वे कलाई पर अंकित स्वास्तिक चिह्न को निरख रहे थे। जलन की पीड़ा से निजात पाने के लिए माया ने उस पर किसी औषधि का लेप लगाया हुआ था।

“ये चिह्न तुम तक कैसे पहुंचा माया?”

अघोरनाथ व्दारा सख्त लहजे में पूछे गये सवाल से असहज होकर माया ने महाराज की ओर देखा।

“क्या ये चिह्न आपको व्दिज ने दिया है?” महाराज ने पूछा।

माया ने ‘हां’ में गर्दन हिलाया।

“ओह!” अभयानन्द ने माया की कलाई छोड़ दी। उनके चेहरे पर नजर आये लक्षणों ने इंगित किया कि वे किसी निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे- “क्या इस पवित्र स्वास्तिक की शक्तियां जागृत करने का अनुष्ठान उसने तुम्हारे साथ ही पूर्ण किया था?”

“नहीं।” किसी अनिष्ट का संकेत प्राप्त कर चुकी माया ने कहा- “अनुष्ठान के अंतिम चरण में उन्होंने मुझे अनुष्ठान-स्थल पर बुलाया था, जहां उन्होंने मुझे ये चिह्न दिया।”

“उसके अंतिम वक्तव्य क्या थे?”

“अंतिम वक्तव्य?” माया का हृदय कांप गया- “अंतिम वक्तव्य से आपका क्या तात्पर्य है सिध्द पुरुष?”

“उसके अंतिम वक्तव्य क्या थे?” अघोरनाथ ने कड़े स्वर में अपना सवाल दोहराया।

“वे विचलित दिखाई पड़ रहे थे। वे अपनी भावुकता छिपाने का असफल प्रयत्न कर रहे थे।”

“उसके अंतिम वक्तव्य क्या थे?” अघोरनाथ इस बार क्रोधित स्वर में दहाड़ उठे।

माया पहले सहमी तत्पश्चात उसने कहा-

“ ‘मैं श्मशानेश्वर से युध्द करने जा रहा हूं माया, जिसमें मेरे पराजय की संभावना अधिक है। मैं वापस आने अथवा न आने, दोनों ही परिस्थितियों में तुम्हें धैर्य धारण करना होगा क्योंकि मेरे पराजित होने की अवस्था में भी वह पिशाच पवित्र स्वास्तिक चिह्न की अलौकिक शक्तियों के कारण तुम्हें स्पर्श तक नहीं कर पाएगा।’ यही कहा था व्दिज ने।”

“ओह! तो व्दिज की ये योजना थी, श्मशानेश्वर को रोकने की। वह उससे युध्द करने नहीं गया था, अपितु उसे उसी वाकजाल में फांसने गया था, जिसमें उसे पूर्व में भी फांस चुका था। किन्तु वह भयभीत था, अपनी युक्ति की सफलता के प्रति आशंकित था। वह जानता था कि सुरक्षा-चिह्न के कारण पिशाच उसे भले ही स्पर्श नहीं कर पाएगा किन्तु पुतले की दाह की प्रक्रिया में व्यवधान डाल कर, अनुष्ठान को भंग करके अपनी रक्षा अवश्य करेगा। इसीलिए उसने सुरक्षा चिह्न का प्रयोग स्वयं न करके, उसे माया को सौंप दिया। ताकि उपरोक्त दशा में कम से कम माया को पिशाच अपनी वासना-पूर्ति का पर्याय न बना सके। व्दिज एक कुशल तर्कशास्त्री था, इस तथ्य को उसने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भी सिध्द किया। अपना प्राण गंवाकर भी उसने अपनी भूल का प्रायश्चित किया।”

“प्राण गंवाकर?” माया बुरी तरह चौंकी- “तो क्या....तो क्या व्दिज को उस पिशाच ने मार डाला?”

अघोरनाथ ने खामोश रहकर माया के प्रश्न का उत्तर ‘हां’ में दिया।

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐

दृश्य हृदयविदारक था।

द्विज का सिर धड़ से अलग होकर दूर गिरा हुआ था। उसके कंधे से मांस का एक बड़ा हिस्सा गायब था, जो इस बात का स्पष्ट संकेत था कि कटार के जरिये गरदन को धड़ से अलग करने से पूर्व पिशाच ने वहां अपने दांत धंसाये थे। उसके धड़ पर नजर आ रहे अनगिनत जख्म भी ये सिद्ध कर रहे थे कि पिशाच के साथ उसका संघर्ष बेहद दर्दनाक हुआ था। धरती उसके खून से लाल थी। समीप ही राख का ढेर पड़ा हुआ था।

कुपित अघोरनाथ ने त्रिशूल को कुछ ऐसे अंदाज में भूमि में धंसाया, जैसे वह भूमि न होकर अभयानन्द की छाती हो। महाराज, कुलगुरु और वहां उपस्थित सैनिक भी अत्यंत आहत थे। एक विद्वान पुरुष की ऐसी वीभत्स मृत्यु की किसी ने कल्पना नहीं की थी। अघोरनाथ ने द्विज की दाहिनी कलाई का निरिक्षण करके ये सुनिश्चित किया कि वहां कोई सुरक्षा चिह्न नहीं था।

“ये हमारी पराजय है।” अघोरनाथ का लहजा क्रोध में कंपकपाया- “तंत्र-समुदाय की पराजय है। देवी छिन्नमस्ता की पराजय है।”

इस बोझिल वातावरण में कोई भी किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त कर सका। थोड़ी देर के बाद महाराज ने मुंह खोला- “अब अभयानन्द के राख का क्या होगा प्रभु?”

उत्तर देने से पूर्व अघोरनाथ राख के ढेर के पास पहुंचे। राख को मुट्ठी में लिया और आँखें बंद करके थोड़ी देर तक चिंतन किया, तत्पश्चात कहा- “इस राख में अभी भी चेतना है अर्थात श्मशानेश्वर इस राख के कणों में अभी भी व्याप्त है। उसके साँसों की ध्वनि मुझे सुनाई पड़ रही है।”

“किन्तु ये कैसे संभव है?”

“हमने काया-संयुग्मन का आश्रय लेकर अभयानन्द के जिस शरीर को नष्ट किया, उसमें श्मशानेश्वर आविष्ट हो चुका था, इसलिए इस राख में भी उसकी चेतना व्याप्त है। जब किसी अतृप्त आत्मा की चेतना किसी भौतिक पदार्थ से जुड़ी रहती है, तो वह भौतिक पदार्थ मानव-जाति के लिए अनिष्ट का द्योतक बन जाता है। वह अपने प्रभावों की परिधि में आने वाले समस्त जीवों के लिए दुर्भाग्य लेकर आता है। उदहारण के तौर पर यदि इस राख को नदी में प्रवाहित कर दिया जायेगा तो उस नदी के जल से सिंचित भूमि सदैव के लिए बंजर हो जायेगी। यदि इस राख को खुले में छोड़ दिया जायेगा, तो इससे वायु दूषित होकर राज्य में असाध्य रोगों के फ़ैलने का पर्याय बन जायेगी।”

“किन्तु ऐसा हुआ कैसे? अभयानन्द का शरीर तो नष्ट हो गया था, फिर उसके राख में श्मशानेश्वर की चेतना क्यों जीवित है?”

उतर देने से पूर्व अघोरनाथ ने राख को ध्यान से देखा।

“कारण आश्चर्यचकित करने वाला है। जिस प्रकार द्विज ने अंतिम क्षणों तक इस राज्य के प्रति अपनी निष्ठा का परिचय दिया, उसी प्रकार पिशाच ने भी अंतिम क्षणों तक अपनी कुटिलता का परिचय दिया। अब मुझे बोध हो रहा है कि उसने इतनी सहजता से अभयानन्द के पुतले का अंतिम संस्कार क्यों होने दिया? द्विज के वाकजाल में एक बार फंस चुका होने के उपरान्त भी दूसरी बार सरलतापूर्वक क्यों फंस गया? पुतले के दाह-संस्कार में उसने कोई विघ्न खड़ा करने की कोशिश क्यों नहीं की?”

अघोरनाथ के रहस्यमयी कथन किसी की समझ में नहीं आये।

“अब क्या होगा प्रभु? इस राख का निस्तारण किस प्रकार किया जाएगा?”

“इस राख का निस्तारण नहीं किया जा सकता, क्योंकि अगर ऐसा किया गया तो पिशाच पुन: जीवित हो उठेगा। वह पुन: जीवित न हो सके अथवा उसके मरणोपरांत होने वाले दुष्प्रभाव राज्य पर न पड़ने पाए, इसके लिए इस राख के शापित प्रभावों का दमन करना होगा, इसका निस्तारण नहीं।”

“किन्तु कैसे?”

अघोरनाथ ने मुट्ठी में लिये हुए राख पर दृष्टिपात करते हुए कहा- “इस राख को गीता के श्लोकों और स्वास्तिक चिह्नों की सुरक्षा में, किसी ऐसे भूमिगत कक्ष में छिपाना होगा, जिसमें आवागमन का कोई भी विकल्प उपलब्ध न हो। और न ही भविष्य में उपलब्ध हो सके। पवित्र वाक्यों और चिह्नों के कारण इस राख के दूषित प्रभाव कक्ष से बाहर नहीं आने पायेंगे। किन्तु तुम लोगों को ये सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में राजमहल की किसी भी पीढ़ी को उस भूमिगत कक्ष के अस्तित्व का भान न होने पाए।”

“ऐसा ही होगा प्रभु!”

अघोरनाथ ने एक बार फिर राख की ओर देखा और कुछ देर तक मनन करने के पश्चात कहा- “माया को हमारे सम्मुख उपस्थित किया जाये। हमें उससे एक महत्वपूर्ण वार्तालाप करनी है।”

 
14

“इंसान को अल्लाह ताला ने ‘अशरफ-उल-मखलुकात’ [1] बनाया है, लेकिन जब वह गुनाहपरस्त होकर अल्लाह की मुखालफत पर उतर आता है तो जानवर के दर्जे से भी नीचे गिर जाता है। हम मुसलमानो की अर्ज़मंद किताब में दर्ज ये इबारत अभयानन्द पर मुकम्मल तौर पर लागू होती है। इंतकाम के नापाक आतिश में वह इस कदर फना हो गया था कि एक बदरुल रूह की खुशामद में घुटने टेक बैठा।”

फ़कीर खामोश हो गये जबकि साहिल की निगाहें अब भी कटोरे में भरे हुए उस पानी पर ठहरी हुई थीं, जिसमें उसने अभी-अभी अभयानन्द की खौफनाक दास्तान को चल-चित्र की भांति देखा था। पानी में अब कुछ नहीं नजर आ रहा था, सिवाय छोटे-छोटे आयाम वाली तरंगों के। जब उसे यकीन हो गया कि कटोरे के पानी में अब कुछ नहीं नजर आयेगा तो उसने फ़कीर की ओर देखा- “आगे क्या हुआ था बाबा? ये चमत्कारिक पानी आगे कुछ क्यों नहीं दिखा रहा है?”

“पीर सुलेमान का फूँका हुआ ये पानी गुजरे वक्त की केवल वही तस्वीरें दिखाता है, जिन्हें दिखाने के लिए अल्लाह का हुक्म होता है। जो तस्वीरें तुझे इस पानी में नजर नहीं आयीं, उनके मुआमले में तू ये ऐतबार कर ले कि अल्लाह तुझे उन्हें देखते की इजाजत नहीं बख्शता।”

“लेकिन क्यों?” साहिल ने व्यग्र लहजे में पूछा- “मुझे मेरे सबसे अहम सवाल का जवाब अभी भी नहीं मिला है। मुझे अभी भी ये नहीं मालूम हुआ है कि इस सदी में उस भयानक शैतान का अंत कैसे होगा? अघोरनाथ ने माया से मुलाक़ात की इच्छा क्यों जाहिर की थी? मैं इस बात की तस्दीक पहले ही कर चुका हूँ कि पिछले जन्म में संस्कृति की मौत जल कर हुई थी, लेकिन इस कटोरे के पानी में मैंने जो घटनाएं देखीं, उनमें संस्कृति के जलने की घटना नहीं शामिल थी।”

“मैं तुझे पिशाच के खात्मे की राह दिखा सकता हूँ, क्योंकि केवल यही मेरे अख्तियार में हैं। तेरे बाकी सवालों के जवाब देना मेरे अख्तियार में नहीं हैं। उनके जवाब तुझे वक्त देगा।”

“क्या है वह रास्ता?” साहिल का अधीर लहजा।

“याद कर कि शैतान ने जब अपने आका को बिरजू की कुर्बानी दी थी तो अघोरा के जिस्म के लिए क्या कहा था?”

साहिल ने दिमाग पर जोर डाला। थोड़ी देर पहले देखे हुए दृश्यों को याद करने

लगा।

‘महान अघोरा के शव को उचित क्रिया-कर्म के साथ भूमि में गाड़ दो। सुरक्षा का विशेष ध्यान देना है। जंगली पशुओं तक को भनक न लगने पाए कि महान अघोरा का पार्थिव कहां पर गड़ा है।’

“उसने...उसने अघोरा की लाश को किसी सेफ जगह पर दफनाने का आदेश दिया था।”

फ़कीर के होंठों पर रहस्यमयी मुस्कान थिरक उठी। उन्होंने आकाश की ओर देखा, जहाँ पूर्णिमा का उज्ज्वल चाँद पूरे आकार के साथ मुस्कुरा रहा था।

“क्या तुझे इस बात का इल्म है कि अभयानन्द ने अपने गुलामों को अघोरा की लाश को महफूज दफनाने का हुक्म क्यों दिया था? क्या तुझे इस बात का इल्म है कि फना होते वक्त भी पिशाच ने ऐसी कौन सी साजिश की थी, जो अभयानन्द के ख़ाक को नष्ट कर देने की हालत में अघोरनाथ ने उसके ज़िंदा हो उठने की चेतावनी दी थी?

साहिल के सांसें थम गयीं। आकंठ उत्कंठा के कारण उसके मुंह से बोल नहीं फूट सके।

“क्योंकि शैतान के खात्मे का असली राज़ अघोरा की लाश के साथ दफन है।”

“अघोरा की लाश?” साहिल चौंका- “तो क्या...तो क्या अघोरा की लाश अभी तक महफूज है?”

“खून के प्यासे भेड़िये उसकी हिफाजत कर रहे हैं।” फ़कीर की आँखें इस कदर डरावनी हो उठीं कि साहिल को गफलत हो गयी कि वे उसे भयभीत कर रहे हैं, या पिशाच के खात्मे की राह दिखा रहे हैं- “परिंदा भी अघोरा के मकबरे पर पर नहीं मार सकता।”

“मैं समझ नहीं पा रहा कि आप कहना क्या चाहते हैं। पिशाच ने अपने आख़िरी समय में जो चाल चली थी, उसके बारे में मुझे विस्तार से बताइये।”

“जिस वक्त द्विज, अघोरनाथ को लेकर रियासत में आया था, उस वक्त शैतान की रूह अभयानन्द के जिस्म में मुकम्मल रूप से दाखिल हो चुकी थी। जब शैतान को ये मालूम हुआ कि उसके कहर को रोकने के लिए जलाली ताकतों के मालिक अघोरनाथ आये हुए हैं तो वह खौफजदा हो उठा क्योंकि ये हकीकत था कि वह अघोरनाथ के सामने बेहद कमजोर था। तू उसकी कमजोरी की तस्दीक इस वाकये से कर सकता है कि अघोरनाथ की मौजूदगी में ही राजा के सैनिकों ने जंगल में जाकर कापालिकों का क़त्ल किया था और शैतान उनके सामने आने का हौसला तक न कर सका था। काया-संयुग्मन को जरिया बनाकर अभयानन्द के जिस्म को खाक में तब्दील किये जाने के बाद भी पिशाच उस ख़ाक में ज़िंदा था। जानता है क्यों?”

साहिल कुछ नहीं बोला।

“क्योंकि यही शैतान की साजिश थी। उसने इसीलिए अपने नुमाइंदों को अघोरा के जिस्म के हिफाजत का आदेश दिया था ताकि अभयानन्द के ख़ाक के मिट जाने के बाद वह अघोरा के जिस्म में दाखिल होकर फिर से ज़िंदा हो उठे।”

“ओह!” साहिल के होंठ सोचने के अंदाज में सिकुड़कर गोल हो गए- “लेकिन राख के मिट जाने के बाद ही क्यों? उससे पहले भी तो अघोरा के काया में प्रविष्ट हो सकता था?”

“नहीं! यदि श्मशानेश्वर नाम के उस शैतान के पुराने धारक का जिस्म हिफाजत से रखा हुआ हो तो शैतान केवल दो हालातों में ही उस जिस्म में दोबारा दाखिल हो सकता है। पहला ये कि उसका मौजूदा जिस्म मुकम्मल तौर पर ख़त्म हो जाए और किसी भी जिस्म का मुकम्मल वजूद तभी ख़त्म माना जाता है, जब उस जिस्म की ख़ाक तक मौजूद न रहे। दूसरा ये कि मौजूदा जिस्म उस वक्त मारा जाए, जब श्मशानेश्वर उसमें मौजूद न हो।”

“ओह माय गॉड!” साहिल का कलेजा काँप गया- “इसका मतलब ये हुआ कि अगर अघोरनाथ, अभयानन्द के राख को नष्ट करवा देते तो श्मशानेश्वर, अपने पूर्ववर्ती धारक अघोरा के जिस्म को माध्यम बनाकर फिर से लौट आता। यही वजह थी, जो उन्होंने ये कहा था कि उस राख का निस्तारण नहीं किया जा सकता, क्योंकि अगर ऐसा किया गया तो पिशाच पुन: जीवित हो उठेगा।”

“यही तो उस शैतान की साजिश थी कि मात्र अभयानन्द के जिस्म को ख़त्म हुआ दिखाकर लोगों को इस फितने में डाल दे कि उसका खात्मा हो चुका है और फिर शंकरगढ़ से अघोरनाथ के जाते ही अपने इंतकाम के खूनी दावानल के साथ एक बार फिर अघोरा के रूप में लौट आये।”

“और...और इसीलिए उसने काया-संयुग्मन की प्रक्रिया में कोई विघ्न न डालते हुए अभयानन्द के शरीर को आसानी से खाक में तब्दील हो जाने दिया। वह अघोरनाथ से भयभीत था, इसलिए अभयानन्द के शरीर की कीमत पर उन्हें अपने रास्ते से हटाना चाहता था।” साहिल ने सिर थाम लिया- “उफ़! कितनी भयानक साजिश थी उसकी। अगर अघोरनाथ जैसे महान साधक ने उसके चाल को भांप नहीं लिया होता, तो द्विज का बलिदान व्यर्थ चला जाता।”

“हैरान होने की बजाय अब इस सदी में उस शैतान का खात्मा कैसे होगा, ये सुन!” फ़कीर ने कहा- “तुझे अघोरा के जिस्म को ख़ाक में तब्दील करना होगा। उस जिस्म को आदमखोर भेड़ियों के चंगुल से निकालकर जलाना होगा तुझे।”
 
“उससे क्या होगा बाबा?” साहिल के चेहरे पर नासमझी के भाव उभरे- “श्मशानेश्वर तो स्वयं शरीर धारण कर चुका है। उसके पूर्ववर्ती धारक अघोरा के शरीर को नष्ट करने से क्या फ़ायदा होगा?”

फ़कीर एक बार फिर रहस्यमयी अंदाज में मुस्कुरा उठे। उन्होंने काबा की दिशा में मुंह करके श्रद्धा से परिपूर्ण लहजे में कहा- “पाक परवर दिगार के खेल निराले हैं। इस पूरी कायनात को चलाने वाले अल्लाह ने ही उस पिशाच का भी नसीब लिखा है। और उस लिखे हुए में ये दर्ज है कि माया या इस सदी की संस्कृति ही उस शैतान के खात्मे की अहम् वजह बनेगी।”

“मैं समझा नहीं बाबा।”

“अभयानन्द के जिस राख को अघोरनाथ ने राजमहल के तहखाने में गीता के पाक कलामों और स्वास्तिक के निगहबानी में रखवाया था, उसी राख से अरुणा ने अपने शैतानी इल्म का इस्तेमाल करके अभयानन्द का जिस्म बनाया है। राख में पहले से ही श्मशानेश्वर की चेतना थी, इसलिए जिस्म का रूप लेते ही वह राख शैतान के रूप में ज़िंदा हो उठा है, जो संस्कृत के हुस्न-ओ-शबाब का तमन्नाई है। लेकिन..!” फ़कीर मुस्कुराए- “लेकिन संस्कृति की कलाई पर जन्मजात मौजूद स्वास्तिक उस शैतान को उसे छूने भी नहीं देगा। स्वास्तिक नाम के आफत से निजात पाने के लिए जानता है कि वह शैतान क्या करेगा?”

साहिल फिर चुप रह गया। फ़कीर के कौतुहल पैदा करने के इस ढंग से अब उसे झुंझलाहट होने लगी थी।

“वह अभयानन्द के जिस्म से काले धुएं के रूप में निकल जाएगा और फिर अभयानन्द केवल एक आम इंसान रह जाएगा, जिसे स्वास्तिक से कोई खौफ नहीं रहेगा। फिर वह संस्कृति के साथ जिस्मानी ताल्लुकात बनाएगा, जिसके लिए वह उसे पहले ही मजबूर कर चुका है। क्योंकि इस काम में संस्कृति की मर्जी शामिल होगी, इसलिए ये घटना इस बात की तस्दीक होगी कि वह अभयानन्द जैसे अप्राकृतिक ढंग से जिस्म हासिल किये हुए इंसान को कुबूल कर चुकी है और इस हालत में उसका जलाली स्वास्तिक अपनी मुकम्मल तासीर गँवा चुका होगा। इसके बाद शैतान फिर से अभयानन्द के जिस्म में दाखिल होकर माया को हासिल करने के अपने मकसद में कामयाब हो जाएगा।”

“ओह! तो ये चाल है उस महापिशाच की?” साहिल का चेहरे पर अभयानन्द

के लिए बेशुमार घृणा के भाव उभर आये।

“हाँ! लेकिन उसकी साजिश नाकाम होगी। जिस पल शैतान की रूह अभयानन्द के जिस्म से बाहर निकलेगी और वह संस्कृति के साथ हमबिस्तर होने को आगे बढ़ेगा, उसी पल..ठीक उसी पल संस्कृति उसी अंदाज में अभयानन्द के जिस्म पर स्वास्तिक का निशान दर्ज कर देगी, जिस प्रकार द्विज ने पिछले जन्म में उसकी कलाई पर दर्ज की थी। इसके बाद शैतान की रूह चाहकर भी अभयानन्द के जिस्म में फिर से दाखिल नहीं हो पायेगी। शैतान की रूह का साथ छूट जाने के बाद शैतानी इल्म और राख से ज़िंदा हुआ अभयानन्द कुछ ही घंटों में अपनी मौत आप ही मर जाएगा।”

साहिल के पैरों तले जमीन खिसक गयी। उसे अपना दिमाग हिलता हुआ महसूस हुआ।

“लेकिन बाबा...संस्कृति को ये सब बताएगा कौन? वह तो अभयानन्द के पास जा चुकी है। न जाने मरघट में इस वक्त क्या हो रहा होगा?”

“तू केवल अपने हिस्से का काम पूरा कर बाकी सब कुछ अल्लाह पर छोड़ दे।”

“तो क्या मेरे हिस्से का काम केवल यही है कि मैं अघोरा की लाश को ढूंढकर जला दूं?”

“तुझे लाश ढूँढने की जरूरत नहीं है। मैं खुद तुझे उसका पता दूंगा। तुझे केवल उन आदमखोर भेड़ियों से अपनी हिफाजत करनी होगी, जो अघोरा के लाश की हिफाजत करते हैं।”

“मेरे मन में एक सवाल है बाबा।”

“जल्दी पूछ।”

“जब श्मशानेश्वर अभयानन्द के जिस्म से निकल जाएगा और संस्कृति उस जिस्म पर स्वास्तिक का निशान अंकित करके उसमें उसके पुन: प्रवेश पर रोक लगा देगी तो क्या श्मशानेश्वर की आत्मा अपने पूर्ववर्ती धारक अघोरा के लाश की ओर नहीं आकर्षित होगी?”

“नहीं!”

“क्यों?”

“मैंने अभी थोड़ी देर पहले ही कहा था कि यदि शैतान के पुराने धारक का जिस्म हिफाजत से रखा हुआ हो तो शैतान केवल दो हालातों में ही उस जिस्म में दोबारा दाखिल हो सकता है। पहला ये कि उसका मौजूदा जिस्म मुकम्मल तौर पर ख़त्म हो जाए और दूसरा ये कि मौजूदा जिस्म उस वक्त मारा जाए जब शैतान उसमें मौजूद न हो।”

“ओ गॉड!” साहिल के पसीने छूट गए- “इसका मतलब ये हुआ कि श्मशानेश्वर की रूह के जिस्म से निकलने के बाद अगर किसी प्रकार अभयानन्द मारा गया तो फिर...तो फिर श्मशानेश्वर अघोरा की लाश में दाखिल होने आयेगा?”

“यूं तो अभयानन्द को मरना ही है, लेकिन अगर ये काम कोई दूसरा न करे और उसे अपनी मौत खुद मरने के लिए छोड़ दिया जाए तो यह काम कुछ घंटों में होगा और इतना वक्त अघोरा की लाश को जलाने के लिए वाजिब होगा। लेकिन अल्लाह न करे, अगर ऐसा हो गया कि अघोरा की लाश को जलाने से पहले ही किसी तरह अभयानन्द मारा गया, तो क़यामत आ जायेगी। शैतान की रूह अघोरा की लाश में दाखिल होने के लिए दौड़ पड़ेगी। अगर तू उसकी लाश को जला नहीं पाया और शैतान उसमें दाखिल हो गया तो उसका इंतकाम बहुत ही खौफनाक होगा। फिर वह किसी को नहीं छोड़ेगा। किसी को भी नहीं। तेरे जाने के बाद मैं अल्लाह ताला से ये दुआ करता रहूँगा कि ऐसा न होने पाए।”

उन भयानक क्षणों की कल्पना करके साहिल के जिस्म में झुरझुरी दौड़ गयी।”

“अघोरा के मकबरे का ठिकाना बताइये।”

“शंकरगढ़ के ही जंगल में है। इलाहाबाद को जाने वाले रास्ते से उतरकर कर एक किलोमीटर जंगल के भीतर जाने पर एक जगह ऐसा आयेगा, जहाँ महताब की रोशनी दरख्तों के पत्तों को पार करके धरती तक नहीं पहुँच पा रही होगी। स्याह अँधेरे में सब-कुछ जर्फ़ हो चुका होगा। मकबरे की पहचान यही होगी कि उसे घेर कर सात भेड़िये बैठे होंगे। और उस पर एक चिराग जल रहा होगा। वे आम भेड़िये नहीं हैं। वे आदमखोर और शैतानी तासीर वाले हैं। अगर उनके मुंह तुम्हारा लहु लग गया तो जहर तुम्हारी रगों में दाखिल होगा, उससे तुम्हें दुनिया का कोई भी डॉक्टर निजात नहीं दिला पायेगा। और तुम्हें तड़पते हुए मौत की आगोश में सो जाओगे।”

“ऐसा नहीं होगा।”

साहिल जाने को उद्यत हुआ ही था कि- “ठहर जा।”

साहिल ठिठका। फ़कीर टीन शेड वाली कोठरी में गए। वे जब दोबारा बाहर आये तो उनके हाथ में एक ताबीज और छोटी सी शीशी थी। उन्होंने दोनों चीजें साहिल की ओर बढ़ाते हुए कहा- “ये ताबीज गले में डाल ले। इसमें हजरत मोहम्मद के कदमों के नीचे से उठायी हुई ख़ाक भरी हुई है। जब तक इस ताबीज का ताल्लुक तुझसे रहेगा, तब तक शैतानी भेड़िये तुझ पर हमला नहीं कर पायेंगे।”

साहिल ने ताबीज थाम लिया।

“इस शीशी में ‘आब-ए-जमजम’ [2] भरी हुई है। हिन्दुओं में जो दर्जा गंगाजल

का है, मुसलमानो में वही दर्जा ‘आब-ए-जमजम’ का है। जब तू जमजम के इस पाक पानी को अघोरा की लाश पर छिड़केगा लाश खुद-ब-खुद जल उठेगी।”

“शुक्रिया मोहतरम बुजुर्ग! मैं अब अपने मकसद के लिए रवाना होता हूँ।”

“परवर दिगार तेरे मकसद को कामयाब बनाएं।”

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐
 
सभी की सांसें थम गयी थीं। भेड़िया-मानव की आकृति अख्तियार करने वाला काला-धुंआ भीषण गर्जना करते हुए वायुमण्डल में चक्कर काट रहा था।

“अभिनन्दन! हमारे अंकपाश में तुम्हारा अभिनन्दन है माया।”

अभयानन्द ने दोनों बाहें फैलाकर संस्कृति को आगे बढ़ने के लिए आमंत्रित किया।

संस्कृति ने कदम बढ़ाया, इस बात से अनभिज्ञ कि अरुणा की संदेहास्पद निगाहें उसी पर ठहरी हुई थीं। इससे पहले कि वह अभयानन्द के इतने निकट पहुँच जाती कि अभयानन्द उसे स्पर्श कर पाता, अरुणा चीख कर उन दोनों के बीच आ खड़ी हुई।

“माया का मार्ग क्यों अवरुद्ध कर रही हो अरुणा?” अभयानन्द गुर्राया।

“क्षमाप्रार्थी हूँ प्रभु! मुझे इस घटना में षड़यंत्र का आभास हो रहा है। आपकी प्रेयसी आपके साथ छल कर रही है।”

“माया हमसे कोई छल कर पाने की दशा में नहीं है अरुणा।” अभयानन्द झुंझलाया- “तुम व्यर्थ ही हमारी व्यग्रता बढ़ा रही हो। हम तीन सदियों तक जिस तृष्णा में तड़पे हैं, उस तृष्णा को हमें तृप्त करने दो।”

अरुणा ने अभयानन्द के कथन पर ध्यान नहीं दिया और संस्कृति से मुखातिब हुई- “अपने वस्त्रों में क्या छुपाया है तुमने?”

संस्कृति के चेहरे पर खतरनाक भाव उभरे, जिन्होंने अरुणा के इस संदेह को और भी पुष्ट कर दिया कि उसके जेहन में कोई खतरनाक योजना चल रही थी। संस्कृति के तेवर देख अभयानन्द को भी संदेह हुआ। उसने परिवेश में काले धुएं के रूप में मंडरा रहे अपने इष्ट की ओर देखा। अरुणा की पुरानी निष्ठा के आगे उसकी तृष्णा भी पराजित हो गयी और इस बार उसने अरुणा के कृत्य में हस्तक्षेप नहीं किया।

“अपने वस्त्रों में क्या छुपाया है तुमने?” अरुणा का लहजा भयानक हो उठा।

संस्कृति भांप गयी कि वह अरुणा और अभयानन्द, दोनों के संदेह की परिधि में आ चुकी है। और परिस्थितियां ‘करो या मरो’ का रूप अख्तियार कर चुकी हैं।

“अपने पिछले जन्म के आशिक के लिए एक विशेष तोहफा है मेरे पास।” संस्कृति ने अर्थपूर्ण लहजे में कहा।

इससे पहले कि अरुणा कुछ समझ पाती, वह संस्कृति का तेज धक्का खाकर धरातल पर गिर चुकी थी। संस्कृति के अंग-प्रत्यंग में मानो बिजली की गति समाहित हो गयी। वह अभयानन्द की ओर दौड़ी। दोनों के बीच फासले पहले ही कम हो चुके थे, इसलिए अभयानन्द को संस्कृति का मंतव्य समझने का क्षणिक अवसर भी नहीं प्राप्त हो सका।

अज्ञश्र्चाद्यधानश्र्च संशयात्मा विनश्यति।

नायं लोकोस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।

(अर्थ: विवेकहीन, श्रद्धारहित और संशययुक्त मनुष्य भ्रष्ट हो जाता है। उस के लिए न यह लोक सुखप्रद है और न परलोक ही।)

संस्कृति का अभयानन्द की ओर दौड़ने के पीछे क्या ध्येय था, ये अभयानन्द भी तब तक नहीं समझ पाया, जब तक कि अपनी नग्न छाती पर जलन की एक तेज पीड़ा नहीं महसूस कर लिया।

“आह...!” वातावरण में अभयानन्द की कराह और किसी भेड़िये की दुर्दांत गर्जना एक साथ गूंजी। उसने अपनी छाती पर दृष्टिपात किया, जहाँ जले के निशान के रूप में स्वास्तिक की छाप पड़ चुकी थी।

“अब शैतान तुम्हारे जिस्म में कभी प्रवेश नहीं कर पायेगा।”

“नहीं!” अभयानन्द ने आँखों में अविश्वास लिए हुए पहले अरुणा की ओर देखा और फिर काले धुएं की ओर। धुएं के मंडराने का अंदाज ऐसा था, मानो आकस्मात घटी उस घटना से वह भी बेचैन हो उठा हो। धरातल पर पड़ी अरुणा भी उठने का प्रयत्न छोड़ कर उस अविश्वनीय दृश्य को देखने लगी थी।

“यही है तेरे गुनाहों की सीमा।” संस्कृति ने घृणा के आवेग में आकर अभयानन्द के ऊपर थूक दिया- “तेरे आराध्य शैतान ने भी ईश्वर से भयभीत होकर तेरा साथ छोड़ दिया।”

“तुम मूर्खों को तुम्हारे इस दुष्कृत्य का दंड मिलेगा।”

यथार्थ पर यकीन होते ही अभयानन्द बुरी तरह चीख कर श्मशानेश्वर के मंदिर की ओर दौड़ा। मंदिर के खम्भों से पागलों की तरह सिर टकराते हुए वह मूर्ति की ओर भागा।

“वह...वह क्या करने जा रहा है?” दिग्विजय ने बदहवास लहजे में कुलगुरु से पूछा। कुलगुरु के चेहरे पर दहशत थी। अभयानन्द की हरकत का आशय वे भी नहीं समझ पा रहे थे। वहीं दूसरी ओर अरुणा के होठों पर भयानक मुस्कान सज रही थी।

“विनाश, विनाश और सिर्फ विनाश होगा अब।”

अभयानन्द ने मूर्ति की कटार उठायी और अगले ही पल सभी को अपने

सवालों के जवाब मिल गए। अपने जीवन-काल के दौरान अनगिनत लोगों की गरदन को पैशाचिक अनुष्ठानों की भेंट चढ़ा चुके अभयानन्द ने स्वयं अपनी ही गर्दन धड़ से अलग कर दी।
 
संस्कृति मानो सम्मोहन की अवस्था से बाहर आई।

“साहिल की जान खतरे में है?” वह चीखी।

ठीक उसी क्षण!

काले धुएं का गुब्बार वायु में विलीन हो गया।

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐

वे संख्या में सात थे और सातों की सूर्ख आंखें अंधेरे में चमक रही थीं। उनके जबड़े सामान्य भेड़ियों के जबड़ों से अलग थे। बाहर लटकी हुई सातों की जीभ इस सीमा तक लाल थी कि प्रतीत होता था, वे हर क्षण रक्तपान के आदी थे। उन सभी की दृष्टि सामने खड़े उस नौजवान पर स्थिर थी, जिसके एक हाथ में केरोसिन से भरा छोटा सा गेलन और दूसरे हाथ में एक फावड़ा था।

साहिल को याद नहीं था कि उसने खुद को पिछली बार इतना नर्वस कब महसूस किया था। उसके हृदयास्पंदन की गति सामान्य से कई गुना तीव्र थी। उसका मन न चाहते हुए भी भयावह दृश्यों की कल्पना करके भयभीत हुआ जा रहा था।

अघोरा के कब्र को घेरकर बैठे हुए सात आदमखोर भेड़ियों के आग्नेय नेत्रों का केन्द्र बिन्दु बने साहिल के खौफजदा होने का एक कारण ये भी था कि मौसम का रुख बिना किसी पूर्व संकेत के तेजी से बदलने लगा था। क्षण भर पहले ही आसमान पर तैर रहे उजले बादलों के कतरे न जाने कहां गुम हो गये थे और अब उनका स्थान स्याह बादलों ने ले लिया था, जिनकी उद्दण्डता इस कदर बढ़ी हुई थी कि वे चन्द्रमा पर पूर्णतया आच्छादित होकर शुक्ल-पक्ष की उस रात को काजल से भी अधिक काला बना दिये थे। फिजा में पत्तियों की सरसराहट मृत्यु-संगीत बनकर घुली हुई थी।

“शैतान के साथ इस आखिरी जंग में जीत मेरी ही होगी।”

डगमगाते जा रहे आत्मविश्वास को साहिल ने संकल्प के स्तम्भ से संभाला और भगवती का ध्यान करते हुए ये सुनिश्चित किया कि गले में फकीर का दिया हुआ ताबीज और पतलून की जेब में ‘आब-ए-जमजम’ की शीशी सुरक्षित थी।

उसने केरोसिन का गेलन जमीन पर रखा और फावड़े को दोनों हाथों से पकड़कर हमले की मुद्रा अख्तियार कर ली। शत्रु की ये मुद्रा देख भेड़ियों के कान खड़े हो गये।

“सामने से हट जाओ।” साहिल ने जबड़े भींचते हुए इस कदर कहा, मानो वे

भेड़िए इंसानी भाषा समझने की कुव्वत रखते हों- “तुम लोग जिस कब्र की हिफाजत कर रहे हो, आज उसका आखिरी दिन है।”

साहिल फावड़े पर पकड़ सख्त रखते हुए आगे बढ़ा। उसका कृत्य देख उकड़ू बैठे भेड़िए चारों पैरों पर खड़े हो गये। प्रत्युत्तर देने से पूर्व उन्होंने एक-दूसरे की ओर देखा। शत्रु के दुस्साहस का जवाब देने की रणनीति बनाई, तत्पश्चात प्रथम प्रहार हेतु उपयुक्त चुने गये भेड़िए ने साहिल पर छलांग लगा दी।

उसके हाथ में फावड़ा था, साथ ही साथ उसे ताबीज के तासीर पर पूरा भरोसा था; यही वजह रही कि एक आदमखोर भेड़िये का हमला उसे विचलित न कर सका। उसने फावड़े का मजबूत प्रहार भेड़िए पर किया। फावड़े का आवेग तेज था। भेड़िया ‘कीं’ की आवाज निकालता हुआ उछलकर दूर जा गिरा।

साथी भेड़ियों की निगाहें उस पर जम गयीं, जबकि वह कभी साहिल की ओर तो कभी अपने साथियों की ओर देखने लगा। साहिल समझ नहीं पाया कि वह अपने साथियों को सम्मिलित प्रहार के लिए उकसा रहा था या फिर उन्हें प्रहार न करने की सलाह दे रहा था, लेकिन उसकी ये दुविधा अगले ही क्षण दूर हो गयी, जब उसने उन सातों को इस कदर एकजुट होते देखा, जैसे क्रिकेट के मैदान में क्षेत्ररक्षण की रणनीति बनाने के लिए खिलाड़ी एकजुट होते हैं।

‘इस बार एक साथ आएंगे ये हरामजादे।’

साहिल के जेहन में उपजी उपरोक्त संभावना अगले ही क्षण सही साबित हो गयी। इस बार उसकी ओर लहराए शत्रुओं की संख्या सात थी। प्रत्युत्तर में उसने फावड़े को उसी अंदाज में हवा में नचाया, जिस अंदाज में उसने गांव के मेले में करतब दिखाने वाले कलाकार को लाठी भांजते हुए देखा था। हालांकि साहिल की ये हरकत उसके बचाव के लिए पर्याप्त नहीं थी, क्योंकि दुश्मनों की संख्या अधिक थी और फावड़े का प्रहार एक या फिर अधिक से अधिक दो भेड़ियों को ही उससे दूर रख सकता था, फिर भी परिणाम चौंकाने वाला रहा।

जो भेड़िए फावड़े की हद में आए, वे उसका प्रहार झेल कर दूर जा गिरे, किन्तु उनके साथ ही वे भेड़िए भी धूल चाटने को विवश हो गये जो फावड़े के प्रहार से बच गये थे। उन्होंने साहिल को स्पर्श तक नहीं किया था, बावजूद इसके वे इस कदर विपरित दिशा में जा गिरे थे, जैसे साहिल के इर्द-गिर्द मौजूद किसी अदृश्य सुरक्षा घेरे ने उन्हें परावर्तित कर दिया हो।

“ताबीज की तासीर का नमूना।” भेड़ियों की दशा देख साहिल मुस्कुराया और एक नजर केरोसिन के गेलन पर डाली।

भेड़िए अब साहिल से निश्चित दूरी पर खड़े होकर केवल गुर्रा रहे थे। उन्हें अपने दुश्मन की शक्ति का अनुमान हो लग चुका था।

साहिल के पास वक्त नहीं था। भेड़ियों को रास्ते से हटाकर उसे कब्र की खुदाई करके अघोरा की लाश भी निकालनी थी। इसलिए उसने गेलन उठाया, उसका ढक्कन खोला और आगे बढ़ा।

भेड़ियों के चेहरे पर खौफ मंडराया। वे पीछे खिसकने लगे, किन्तु एक निश्चित दूरी तक खिसकने के बाद वे ठहर गये क्योंकि इससे पीछे जाने पर वे अघोरा के कब्र से भी पीछे चले जाते। साहिल उनकी स्वामिभक्ति पर मुस्कुराया। वे अब भी ढाल बनकर कब्र के आगे खड़े थे।

“बुराई की स्वामिभक्ति के कारण आज तुम लोग एक खौफनाक मौत मरने वाले हो।”

साहिल के चेहरे पर खौफनाक भाव उभरे। उसने गेलन में भरे केरोसिन से एक-एक भेड़ियों को नहला दिया। इस दौरान उन्होंने गुर्राकर, भयानक जबड़े दिखाकर उसे डराने की कोशिश की, किन्तु ताबीज के करामात से रू-ब-रू हो चुके साहिल को अब उन जैसों की पूरी फौज भी नहीं डरा सकती थी।

उसने लाइटर जला ली।

“तुम्हारी नर्क की यात्रा मंगलमय हो दरिन्दों।”
 
भेड़िये केवल इतना ही समझ पाए कि उनका दुश्मन उन पर किसी नए तरीके से हमला करने वाला है। वह नया तरीका उन्हें तब समझ में आया, जब साहिल का फेंका हुआ लाइटर उनमें से किसी एक के जिस्म पर आकर गिरा और फिर उस एक के जिस्म पर लगी आग बेहद तेजी से सभी के जिस्मों पर फैलती चली गयी। भयानक लपटों की रोशनी से न केवल वातावरण का अंधकार ख़त्म हुआ, बल्कि उन दरिंदों के करुण क्रंदन से निस्तब्धता भी अपना अस्तित्व खो बैठी। वे अपने जलते हुए जिस्म के साथ बेतहाशा इधर-उधर भागने लगे।

साहिल के पास इस पहली फतह पर जश्न मनाने का वक्त नहीं था। वह कब्र तक पहुंचा। उस पर रखा चिराग बुझ चुका था। चिराग को पैर की ठोकर से दूर उछालने के बाद उसने कब्र पर पहला फावड़ा चलाया ही था कि उत्तर दिशा में गूंजी भेड़िये की दुर्दांत गर्जना ने उसकी रूह तक को कंपा दिया।

कब्र पर दूसरा प्रहार करने से पहले उसके हाथ काँपे। न चाहते हुए भी उसने चीख की दिशा में देखा। उस दिशा में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं था, सिवाय इसके कि आसामान तेजी से काला होता जा रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे काली धुंध तेजी से आसामान पर फैलती हुई उसकी तरफ बढ़ रही थी।

“य...ये क्या बला है?”

छठी इन्द्रीय से किसी अनिष्ट की चेतावनी पाकर साहिल ने कब्र पर फावड़े के प्रहार की गति को बढ़ा दिया। उस वक्त मुश्किल से पांच मिनट भी नहीं गुजरे थे जब साहिल की यह आशंका यथार्थ में तब्दील हो गयी कि सचमुच कोई अनिष्ट हुआ था।

आग की लपटों की रोशनी के बावजूद वातावरण में घोर अंधकार व्याप्त हो गया। आकाश पर फ़ैली स्याही ये इंगित कर रही थी कि थोड़ी देर पहले उत्तर से बढ़ती चली आ रही काली धुंध अब वहां तक पहुँच चुकी थी।

साहिल ने चेहरा ऊपर उठाया। धुंध का एक कतरा भेड़िया-मानव की आकृति अख्तियार करके कब्र के आस-पास मंडरा रहा था।

“तो....तो क्या अभयानन्द ने अपना शरीर नष्ट कर दिया?”

साहिल के हौसले जवाब देने लगे। उसने नजरें घुमाकर भेड़ियों की ओर देखा। उनके जिस्मों की आग बुझ चुकी थी और अब एक बार वे साहिल के खून के प्यासे नजर आ रहे थे। जले हुए शरीर के कारण उनका स्वरूप कई गुना अधिक भयानक हो उठा था। साहिल ने पतलून की जेब टटोली। एक और दुर्भाग्य उसका इंतजार कर रहा था। शीशी जेब में नहीं थी।

“शीशी कहाँ गयी?”

बौखलाया साहिल पीछे पलटा। थोड़ी ही दूर पर ‘आब-ए-जमजम’ की शीशी टूटी हुई पड़ी थी। पानी की एक बूँद तक उसमें नजर नहीं आ रही थी।

“मैं हार गया।”

साहिल के हाथ से फावड़ा छूट गया। किसी हारे हुए जुआरी की मानिंद उसने कब्र पर घुटने टेक दिए। उसकी हताशा पर भेड़ियों ने समवेत स्वर में चीख कर अपने हर्ष की अभिव्यक्ति की।

श्मशानेश्वर की ओर से प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में कई क्षण गुजर जाने के बाद भी जब कुछ नहीं हुआ तो साहिल ने ऊपर देखा।

वातावरण में लगातार चक्कर काट रहा काला धुंआ कब्र के निकट आने से कतरा रहा था।

“ये अघोरा के जिस्म में दाखिल होने का प्रयास क्यों नहीं कर रहा है?”

साहिल के माथे पर बल पड़ गए। क्षण भर के चिंतन-मनन के बाद जब उसे वजह समझ में आयी तो उसके होठों पर अर्थपूर्ण मुस्कान थिरक उठी। उसके मन में ताबीज के प्रति अगाध श्रद्धा उमड़ पड़ी। उसने ताबीज को होठों से लगाया और एक बार फिर फावड़े के साथ उठ खड़ा हुआ। ताबीज के एक और चमत्कार ने उसके आत्मविश्वास को नया जीवन दे दिया था।

साहिल कब्र पर खड़ा था और इस अवस्था में साहिल के साथ-साथ कब्र भी ताबीज के सुरक्षा घेरे में था।

“भगवान भी यही चाहता है कि शैतान के ताबूत में आख़िरी कील मैं ही

ठोकूं।”

इस बार जब साहिल ने ताबूत पर फावड़ा चलाया तो उसके हाथ तभी रुके, जब फावड़ा ताबूत से टकराया। उसने धुएं के रूप में मंडरा रहे श्मशानेश्वर की ओर देखा और एक झटके में ताबूत का ढक्कन खोल दिया। एक नरकंकाल उसकी आँखों के सामने था। साहिल ने गले से ताबीज निकाला और काले धुएं को लक्ष्य को अभिमान भरे लहजे में कहा- “पिछले जन्म में द्विज का भाई उसकी मौत का कारण बना था, इस जन्म में उसका भाई ही उसकी जिन्दगी का कारण बनेगा। अभयानन्द के शरीर में दाखिल होकर, द्विज को मौत के घाट उतारकर, एक ही कोख से जन्में दो भाईयों के ख़ूबसूरत रिश्ते को नफ़रत की आग में जलाकर, तूने इस रिश्ते पर कलंक का जो टिका लगाया था, उसे मैं आज अपने बलिदान से धो दूंगा। एक बार फिर ये सिद्ध होगा कि हर पैशाचिक शक्ति ईश्वरीय शक्ति के आगे कमजोर है।”
 

Similar threads

S
Replies
69
Views
70
StoryPublisher
S
S
Replies
1
Views
7
StoryPublisher
S
S
Replies
4
Views
9
StoryPublisher
S
S
Replies
6
Views
37
StoryPublisher
S
Back
Top