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उसी रात सम्पूर्ण शंकरगढ़ में यह राजाज्ञा प्रसारित कर दी गयी कि अभयानन्द को प्राचीन पीपल से बांधकर ज़िंदा जलाया जाएगा। मजबूत कलेजे वाले नागरिकों से यह आग्रह किया गया था कि वे बड़ी तादात में उपस्थित होकर इस लोमहर्षक घटना के साक्षी बने, ताकि वे आने वाली पीढ़ी को बता सकें कि किस प्रकार एक वहशी अपराधी को भयानक और ऐतिहासिक मृत्युदंड दिया गया था।
शंकरगढ़ के इतिहास में अभयानन्द पहला ऐसा अपराधी था, जिसे दंडस्वरूप अग्नि को जीवित सौंपा जाने वाला था। राज्य में दहशत का वातावरण न बनने पाये इसलिए यह प्रसारित नहीं किया गया था कि अभयानन्द के शरीर में महापिशाच अपना घर बना रहा है, किन्तु ये हिदायत अवश्य दी गयी थी कि जब उसे पीपल की ओर ले जाया जा रहा हो तो उस क्षण कमजोर दिल वाले पुरुष, गर्भवती महिलाएं और बच्चे उसके सम्मुख न आयें।
उस रात शंकरगढ़ के आबोहवा में दहशत घुल गया था।
‘अभयानन्द का जीवित दाह-संस्कार किया जाने वाला है।’
जिस किसी ने भी सुना, उसके रोंगटे खड़े हो गये। उसमें इतना भी साहस नहीं शेष रहा कि वह बुराई के विनाश की इस ऐतिहासिक घटना का साक्षी बनने के लिए पीपल के पेड़ तक जा सके।
कुल जमा पचास-साठ नागरिक ही ऐसे थे, जो इस लोमहर्षक घटना को आंखों से देखने का साहस जुटा पाए थे। वे बन्दीगृह की इमारत के बाहर मशाल लिये हुए खड़े थे। उनकी संख्या की दोगुनी संख्या में वहां सैनिक उपस्थित थे। कुलगुरु आचार्य दिव्यपाणी, महाराज उदयभान सिंह और राज्य के समस्त पदाधिकारी भी वहां मौजूद थे।
अभयानन्द को बाहर लाया जा चुका था। उसका शरीर अब भी पहले की तरह ही जड़ अवस्था में था। शारीरिक परिवर्तन बस इतना ही हुआ था कि उसके जबड़े के दोनों किनारों के दांत नुकीले होकर बाहर निकल आये थे, हाथ-पैर के नख बढ़ने लगे थे और शरीर पर भेड़िये के खाल की पतली परत चढ़नी प्रारंभ हो गयी थी।
‘महाराज ने सर्वथा उचित निर्णय लिया है।’
‘जगद्जननी ने हमारी विनती सुन ली।’
‘इस पिशाच को जला देना ही राज्य के हित में है।’
कुलगुरु के आदेश पर अभयानन्द का शरीर एक काले कपडे में ठीक उसी प्रकार लपेट दिया गया जिस प्रकार किसी शव को कफ़न में लपेटा जाता है।
अभयानन्द ने कोई प्रतिकार नहीं किया।
धूपबत्ती का एक मोटा बण्डल जलाकर वातावरण को सुगन्धित किया गया। कुलगुरु ने कमण्डल का जल अंजुली में लेकर गीता के श्लोक का उच्चारण किया-
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।
(अर्थ- जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होती है।)
तत्पश्चात उन्होंने जल को काले कपड़े में लिपटे अभयानन्द पर छिड़क दिया।
इस बार अभयानन्द की ओर से प्रतिक्रिया हुई। वह यूं फड़फड़ाया मानो उसका दम घुट रहा हो।
“श्मशानेश्वर क्रोधित हो रहा है। इसे धातु की जंजीरों में जकड़ो। शीघ्रता करो।”
पहले से तैयार सैनिक आदेश का पालन करने में जुट गये।
“अभयानन्द की काल-कोठरी का शुद्धिकरण कर दो।” कुलगुरु शिष्यों की ओर मुड़े- “वहां उपस्थित उसके दूषित औरा को नष्ट करने के लिए ये आवश्यक है।”
उपरोक्त कार्य हेतु नियुक्त किये गये शिष्य वहां से प्रस्थान कर गये।
“इसे प्राचीन पीपल तक घसीटते हुए लाया जाय। इसे जीवित नहीं, मृत समझो। अभयानन्द तो उसी क्षण मृत्यु को प्राप्त हो गया था, जिस क्षण उसने अघोरा के शरीर में निवास करने वाले श्मशानेश्वर का आह्वान किया था और उसे अपने शरीर में आमंत्रित किया था। इससे पूर्व कि श्मशानेश्वर, अभयानन्द के शरीर में पूर्णतया प्रतिस्थापित हो जाए, हमें उसके शरीर को नष्ट करना होगा। जला देना होगा। बोलो हर हर....”
“महादेव।”
वातावरण असंख्य जयघोष से कम्पित हो उठा।
शिकंजों में जकड़ा अभयानन्द बुरी तरह छटपटा रहा था। सैनिक उसे घसीटते हुए गंतव्य की ओर ले जाने लगे।
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शंकरगढ़ के इतिहास में अभयानन्द पहला ऐसा अपराधी था, जिसे दंडस्वरूप अग्नि को जीवित सौंपा जाने वाला था। राज्य में दहशत का वातावरण न बनने पाये इसलिए यह प्रसारित नहीं किया गया था कि अभयानन्द के शरीर में महापिशाच अपना घर बना रहा है, किन्तु ये हिदायत अवश्य दी गयी थी कि जब उसे पीपल की ओर ले जाया जा रहा हो तो उस क्षण कमजोर दिल वाले पुरुष, गर्भवती महिलाएं और बच्चे उसके सम्मुख न आयें।
उस रात शंकरगढ़ के आबोहवा में दहशत घुल गया था।
‘अभयानन्द का जीवित दाह-संस्कार किया जाने वाला है।’
जिस किसी ने भी सुना, उसके रोंगटे खड़े हो गये। उसमें इतना भी साहस नहीं शेष रहा कि वह बुराई के विनाश की इस ऐतिहासिक घटना का साक्षी बनने के लिए पीपल के पेड़ तक जा सके।
कुल जमा पचास-साठ नागरिक ही ऐसे थे, जो इस लोमहर्षक घटना को आंखों से देखने का साहस जुटा पाए थे। वे बन्दीगृह की इमारत के बाहर मशाल लिये हुए खड़े थे। उनकी संख्या की दोगुनी संख्या में वहां सैनिक उपस्थित थे। कुलगुरु आचार्य दिव्यपाणी, महाराज उदयभान सिंह और राज्य के समस्त पदाधिकारी भी वहां मौजूद थे।
अभयानन्द को बाहर लाया जा चुका था। उसका शरीर अब भी पहले की तरह ही जड़ अवस्था में था। शारीरिक परिवर्तन बस इतना ही हुआ था कि उसके जबड़े के दोनों किनारों के दांत नुकीले होकर बाहर निकल आये थे, हाथ-पैर के नख बढ़ने लगे थे और शरीर पर भेड़िये के खाल की पतली परत चढ़नी प्रारंभ हो गयी थी।
‘महाराज ने सर्वथा उचित निर्णय लिया है।’
‘जगद्जननी ने हमारी विनती सुन ली।’
‘इस पिशाच को जला देना ही राज्य के हित में है।’
कुलगुरु के आदेश पर अभयानन्द का शरीर एक काले कपडे में ठीक उसी प्रकार लपेट दिया गया जिस प्रकार किसी शव को कफ़न में लपेटा जाता है।
अभयानन्द ने कोई प्रतिकार नहीं किया।
धूपबत्ती का एक मोटा बण्डल जलाकर वातावरण को सुगन्धित किया गया। कुलगुरु ने कमण्डल का जल अंजुली में लेकर गीता के श्लोक का उच्चारण किया-
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।
(अर्थ- जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होती है।)
तत्पश्चात उन्होंने जल को काले कपड़े में लिपटे अभयानन्द पर छिड़क दिया।
इस बार अभयानन्द की ओर से प्रतिक्रिया हुई। वह यूं फड़फड़ाया मानो उसका दम घुट रहा हो।
“श्मशानेश्वर क्रोधित हो रहा है। इसे धातु की जंजीरों में जकड़ो। शीघ्रता करो।”
पहले से तैयार सैनिक आदेश का पालन करने में जुट गये।
“अभयानन्द की काल-कोठरी का शुद्धिकरण कर दो।” कुलगुरु शिष्यों की ओर मुड़े- “वहां उपस्थित उसके दूषित औरा को नष्ट करने के लिए ये आवश्यक है।”
उपरोक्त कार्य हेतु नियुक्त किये गये शिष्य वहां से प्रस्थान कर गये।
“इसे प्राचीन पीपल तक घसीटते हुए लाया जाय। इसे जीवित नहीं, मृत समझो। अभयानन्द तो उसी क्षण मृत्यु को प्राप्त हो गया था, जिस क्षण उसने अघोरा के शरीर में निवास करने वाले श्मशानेश्वर का आह्वान किया था और उसे अपने शरीर में आमंत्रित किया था। इससे पूर्व कि श्मशानेश्वर, अभयानन्द के शरीर में पूर्णतया प्रतिस्थापित हो जाए, हमें उसके शरीर को नष्ट करना होगा। जला देना होगा। बोलो हर हर....”
“महादेव।”
वातावरण असंख्य जयघोष से कम्पित हो उठा।
शिकंजों में जकड़ा अभयानन्द बुरी तरह छटपटा रहा था। सैनिक उसे घसीटते हुए गंतव्य की ओर ले जाने लगे।
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