• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Horror मौत की चाल

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
''आयुर्वेद। बीमारियों के इलाज के विज्ञान का आध्यात्मिक पहलू आयुर्वेद है। कोरोना के इलाज में आयुर्वेदिक तौर-तरीकों का उपयोग किए जाने के बारे में तो आपने सुना ही होगा। और सुना है इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। वैसे भी अध्यात्म से कोरोना के इलाज के बारे में पूछना तो वैसा ही है

, जैसे किसी आदमी को दो रास्तों में से एक चुनना हो और एक रास्ते पर बहुत दूर चलने के बाद वो ये चाहने लगे कि काश

, वो उस दूसरे रास्ते में उसी जगह पर होता

, जहां इस रास्ते पर इतना चलने के बाद पहुंचा था। क्या ऐसा सम्भव है

? जिस चीज में आपने कभी इंट्रेस्ट नहीं लिया

, उसका हमेशा मजाक उड़ाया

, उसे समझने की कोशिश भी नहीं की

, अब आप चाहते हैं वो एकदम से आपके लिए जीवन रक्षक बन जाए

? वैसे मेरा मानना तो ये है कि अगर अध्यात्म का सहारा लिया गया होता तो दुनिया के पास न सिर्फ ऐसी बीमारियों के इलाज होते बल्कि शायद ऐसी बीमारियां फैलने की नौबत ही नहीं आती।

"

''बात में दम है।

"-अनुराग बोला।

''कोरोना से बचाव के लिए जिस सैनिटाइजेशन की बात की जाती है

, क्या वो पुराने समय से हमारे जीवन पद्धति में शामिल नहीं था

? क्या हम हाथ-मुंह अच्छी तरह धोकर खाना नहीं खाते थे

? क्या सूर्य नमस्कार कर समय पर भोजन कर

, रात में समय पर सो कर और सुबह समय पर जागकर अपनी इम्यूनिटी को मजबूत नहीं करते थे

? आज जिस सोशल डिस्टेंसिंग की बात की जा रही है

, क्या वो पहले हमारी जीवन पद्धति में नहीं थी

? क्या हम दूर से ही लोगों को नमस्कार नहीं करते थे

? या पहले से ही अंग्रेजों की तरह शेक हैण्ड करते आ रहे थे

? आज इतनी सावधानी से जीने

, तमाम तरह के प्रोटीन-विटामिन की गोलियां

, पाउडर वगैरह खिलाने के बाद भी थोड़ी-सी बारिश में भीगने पर बच्चे को जुकाम हो जाता है और मां-बाप उसे लेकर हॉस्पिटल दौड़ पड़ते हैं। लेकिन बनारस

, लखनऊ जैसी जगहों में मैं आज भी ऐसे लोगों को जानता हूं

, जो कड़ाके की ठण्ड में भी सुबह मुंह अंधेरे उठकर नदी में स्नान कर लिया करते हैं और मजाल है

, जो जरा-सा ठिठुर कर दिखा दें

, सर्दी-जुकाम उन्हें छू भी जाए।

"

कमरे में शांति छा गई।

''रात काफी हो गई है।

"-डोंगरा हाथ में बंधी घड़ी पर नजर मारते हुए बोला-

''किसी और को कुछ कहना है इस टॉपिक पर। या खत्म करें

?"

कोई कुछ नहीं बोला।

''खत्म करते हैं फिर!

"-डोंगरा बोला।

''मेरे कुछ सवाल हैं।

"-अचानक डॉली बोली।

सबकी नजरें डॉली की ओर उठ गईं।

''मैं चाहती हूं आप लोग इसका जवाब हाथ उठाकर दें। जिससे किसी तरह की बहसबाजी की नौबत न आए। और इसमें ज्यादा टाइम भी न लगे। मंजूर

?"

''ठीक है।

"-प्रीति बोली-

''सवाल पूछो।

"

''जिस-जिस को यकीन है कि भूत-प्रेतों का भी अस्तित्त्व होता है

, वो हाथ उठाए।

"

राज ने हाथ ऊपर किया।

''सिर्फ एक

?"-डॉली बोली-

''चलो

, ठीक है। अगला सवाल

, आज सुबह कब्रिस्तान में जब हमने उस बच्चे की हंसी की आवाज सुनी थी तो कौन-कौन डरा था?

"

सभी ने हाथ खड़े कर दिए।

''ओके।

"-डॉली ने सिर हिलाया-

''अब तीसरा और आखिरी सवाल-आप में से कितने लोग मानते हैं कि कब्रिस्तान में हमने जिस बच्चे की खिलखिलाहट की आवाज सुनी थी

, वो डेविड था।

"

''डेविड

?"-अनुराग हैरानी से बोला।

''डेविड कीन। जिसकी कब्र हमने वहीं ढूंढ निकाली थी।

"

कमरे में सन्नाटा छा गया। सब एक-दूसरे का मुंह देखने लगे।

तभी अचानक कमरे में गर्म हवा के झोंके ने सबको चौंका दिया।

हवा का वो झोंका इतना गर्म था कि एक सेकेंड के लिए उन सबको ऐसा अहसास हुआ

, जैसे वो किसी भट्ठी में बैठे हों।

सब स्तब्ध रह गए।

कुछ देर कमरे में सन्नाटा छाया रहा।
 
उस जोरदार ठण्ड में कमरे को गर्म रखने के लिए उन्हें आतिशदान में आग जलानी पड़ रही थी। वो लोग घर के सारे खिड़की-दरवाजे अच्छी तरह बंद करने के बाद ही वहां बैठे थे। फिर एकदम से वो गर्म हवा का झोंका कहां से आया ?

''ये गर्म हवा तुम्हारे उस कब्रिस्तान का जिक्र करने के साथ ही आई।

"-प्रीति डॉली से बोली।

डॉली ने कमरे में इधर-उधर नजरें दौड़ाईं

, जैसे वहां मौजूद लोगों के अलावा भी किसी को ढूंढ रहा हो।

''अब मुझे क्या पता था

"-फिर वो बोली-

''कि ऐसा कुछ होगा। वैसे ये था क्या

?"

''जो भी था

"-मोहिनी ने झुरझुरी ली-

''डरावना था।

"

''मेरा सवाल।

"-डॉली ने अपना सवाल दोहराया लेकिन इस बार उसकी आंखें उनके चेहरों पर नहीं थीं बल्कि कमरे में इधर-उधर भटक रहीं थीं-

''आप में से कितनों को लगता है कि कब्रिस्तान में हमने जिस बच्चे के हंसने की आवाज सुनी थी

, वो वही था

, जिसकी कब्र हमने बाद में ढूंढ निकाली थी

?"

कोई कुछ नहीं बोला।

''तो मैं इसे आप सबकी न समझूं

? या ये समझूं कि आप अपने मन की बात को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं।

"

इस बार भी कोई कुछ नहीं बोला। टेबल पर रखे उनके हाथों में कसमसाहट हो रही थी

, जिससे पता चल रहा था कि उनमें से कुछ के हाथ उठना चाह रहे थे लेकिन वे अपने डर को सबके सामने नहीं आने देना चाहते थे।
 
वो सेशन खत्म होने के बाद डोंगरा ने टेप रिकॉर्डर और भूत लिखी हुई वो पर्ची वापस उसी सन्दूक में रखकर उसे पहले की तरह ही बंद कर दिया। रात भी ज्यादा हो गई थी इसलिए उसके बाद सब सीधे अपने कमरों में सोने चले गये।

रात में अचानक कुछ आहट सुनकर राज की नींद खुल गई। आंख खुलते ही उसकी नजर एक तरफ दीवार पर लटकी घड़ी पर पड़ी।

रात के

3.15 बज रहे थे।

राज को हैरानी हुई।

दो बजे से उसकी और डोंगरा की निगरानी की ड्यूटी शुरू होने वाली थी।

किसी ने उसे जगाया क्यों नहीं

?

राज बिस्तर पर उठ बैठा

, तभी उसे बिस्तर के दूसरी ओर किसी के बैठे होने का अहसास हुआ।

लेकिन न जाने क्यों उसकी गर्दन घुमाकर उस ओर देखने की हिम्मत नहीं हुई।

उल्टे उसके दिमाग में कई तरह के विचार घुमडऩे लगे।

इतनी रात को उसकी बगल में कौन बैठा हो सकता है

?

वहां तो कुर्सी भी नहीं रखी थी।

फिर

?

न जाने क्यों राज ने अपने अंदर एक अनजाने भय को सिर उठाते हुए महसूस किया।

उसने धीरे से गर्दन घुमाकर देखा।

कोई बैठा तो था।

वो एक युवक शख्स था

, जिसकी उम्र

2530 वर्ष के आसपास होगी। वो एकटक राज की ओर ही देख रहा था।

उसका चेहरा खून से रंगा हुआ था।

राज ने उस युवक को अपनी सारी जिंदगी में कभी नहीं देखा था।

राज की नजरें उसके चेहरे पर दिख रहे दो छेदों से चिपक कर रह गईं। एक छेद दांयीं आंख के नीचे था और दूसरा चेहरे के बांयीं ओर। वो छेद काफी बड़े-बड़े थे और उनके आर-पार दिखाई दे रहा था।

राज को ऐसा लगा

, जैसे उसका पूरा शरीर ठण्डा पड़ गया हो। उसनेे मजबूती से पलंग पर बिछी चादर को पकड़ लिया

, जैसे वही उसका एकमात्र सहारा हो। लेकिन चादर पकडऩे में चादर जैसी नहीं लग रही थी। वो तो कुछ और चीज थी। लम्बी और बेलनाकार।

वो युवक अपनी जगह पर स्थिर बैठा एकटक राज को देखे जा रहा था। उसकी आंखें इतनी फैली हुईं थीं कि लग रहा था जैसे कटोरियों से बाहर निकल आएंगीं। जैसी

'कॉफिन मैन

' की आंखें थीं। राज चाहकर भी उसके चेहरे से नजरें नहीं हटा पा रहा था। उसका थोड़ा-बहुत ध्यान हट पाता था तो उसके चेहरे पर बने उन भयानक छेदों पर से होने के बाद फिर युवक की आंखों पर ही चला जाता था।

कौन था वो

?

अचानक राज को अपनी सांसें उखड़ती हुई महसूस होने लगीं। उसका शरीर कांपने लगा। उसने अपने को कंट्रोल करने की काफी कोशिश की लेकिन वो कामयाब नहीं हो पाया। उसका शरीर जोरों से कांपने लगा। वो इतनी जोर-जोर से कांप रहा था कि उसे लगने लगा कि अब उसका कांपना कभी बंद नहीं होगा।

तभी अचानक हर ओर अंधेरा छा गया। पलंग

, बगल में बैठा वो भयानक युवक

, वो कमरा

, सब कुछ गायब हो गया। राज को बस ऐसा लग रहा था

, जैसे उसके कांपते शरीर के अलावा दुनिया में और कुछ भी नहीं था।

उसने अपना ध्यान केन्द्रित करने की कोशिश की।

उसके हाथ में कुछ था

, जिसे उसने चादर समझकर पकड़ा हुआ था।

राज ने झट से आंखें खोल दीं।

हालांकि शरीर की उस सामान्य सी क्रिया के लिये उसे ऐसा लगा

, जैसे उसे अपने पूरी शरीर की ताकत लगानी पड़ी हो।

वो अब भी बुरी तरह कांप रहा था।

उसके इधर-उधर सब लोग इकट्ठे थे।

अनुराग

, जय

, डोंगरा

, डॉली

, प्रीति

, मोहिनी

, रिंकी।

सबके होश उड़े हुए लग रहे थे।

''ट...टाइम...

"-अपने होश और बुरी तरह कांपते शरीर को काबू करने की कोशिश करते हुए राज बोला

, उसे अपना गला बिल्कुल सूखा हुआ लग रहा था।

''क्या

?"-अनुराग बोला। उसकी आवाज कहीं दूर से आती हुई लग रही थी।

''टाइम...टाइम क्या...हुआ है

?"-राज बड़ी मुश्किल से बोल पाया।

''12.30"-जय बोला-

''12.30 हो रहा है। लेकिन तुम्हें क्या हो रहा है

?"

राज चाह कर भी अपने शरीर के बुरी तरह कांपने पर नियंत्रण नहीं कर पा रहा था। फिर उसने किसी चीज पर ध्यान केन्द्रित करने की सोची। शायद ध्यान एकाग्र करने से उसका कांपना रूक जाए।

वो चीज

, जिसे उसने चादर समझकर पकड़ा हुआ था

, लेकिन कहीं से भी चादर नहीं लग रही थी।

राज ने गर्दन घुमाकर देखा। वो जय की कलाई थी।

उसका हाथ मजबूती से जय की कलाई पर कसा हुआ था।

शायद नींद में ही उसने जय की कलाई पकड़ ली होगी

, जिसे वो सपने में चादर समझ रहा था।

फिर उसके शरीर का कांपना धीरे-धीरे कम होने लगा। उसके हवास वापस आने में कुछ समय लगा।

''क्या हो गया था तुम्हें

?"-डॉली बोली। राज ने डॉली की ओर देखा। डॉली का चेहरा गम्भीर था और वो एकटक उसे ही देख रही थी।

राज ने अपने अगल-बगल कमरे में नजर डाली।

सब कुछ वैसा ही था।

बस उसके बगल में वो भयानक आदमी नहीं था।

टाइम कन्फर्म करने के लिए उसने घड़ी पर नजर डालने की सोची लेकिन फिर वो उस ख्याल से ही सहम गया।

घड़ी में टाइम देखने से ही तो उस सबकी शुरूआत हुई थी।

''क्या हुआ था तुम्हें

?"-अनुराग उसके कंधे पर हाथ रखकर गम्भीर स्वर में बोला।

''कुछ नहीं।

"-राज थके-से स्वर में बोला

, उसने महसूस किया कि कपड़ों के अंदर उसका पूरा शरीर पसीने से नहाया हुआ था-

''एक डरावना सपना था।

"-हालांकि उसे सिर्फ

'एक डरावना सपना

' कह कर दिमाग से भुला सकने की हिम्मत राज को अपने अंदर महसूस नहीं हो रही थी।

वो कहीं से भी सपने जैसा नहीं था।

उतना जीवंत सपना राज ने कभी नहीं देखा था।

वो निश्चित रूप से...।

राज ने उस ख्याल को दिमाग से झटक देना चाहा।

''क्या सपना था

?"-जय बोला-

''क्या देखा तुमने सपने में

?"

''ऐसा क्या देख लिया

"-डॉली बोली-

''जिससे तुम इतना डर गए थे

?"

राज ने डॉली को देखा।

वो डरने की बात कर रही थी। जबकि राज को ऐसा लग रहा था

, जैसे उसने अभी-अभी मौत को करीब से महसूस किया हो।

उसने उन सबको बताया कि किस तरह उसकी नींद खुली और नींद खुलने पर उसने

'क्या

' देखा था।

सुनकर सबकी जबान पर जैसे ताले लग गए।

कमरे में बिल्कुल सन्नाटा छा गया।
 
''मुझे अब तक यकीन नहीं आ रहा है

"-राज धीमे स्वर में बोला-

''कि वो सपना था। इतना जीवंत सपना मैंने आज तक नहीं देखा। बिल्कुल यही कमरा

, ऐसा ही सब कुछ

, मैंने घड़ी में टाइम भी देखा था

, उसमें

3.15 बज रहे थे। और वो आदमी...वो तो ऐसा लग रहा था

, जैसे...जैसे मैं उसे हाथ बढ़ाकर छू सकता हूं।

"

''लेकिन था तो सपना ही।

"-जय बोला।

''वही तो।

"-राज बोला-

''वही तो मैं समझ नहीं पा रहा हूं। आखिर...आखिर कोई सपना इतना असली कैसे लग सकता है कि...कि जागने के बाद भी उसके सपना होने पर यकीन न आये। अगर वो सपना था तो फिर...इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि ये हकीकत है।

"

कोई कुछ नहीं बोला।

''उस सपने के बारे में कोई और खास बात

?"-डॉली ने चुप्पी तोड़ी।

''हां।

"-राज ने सिर हिलाया-

''उस आदमी...का चेहरा मैंने अपनी सारी जिंदगी में कभी नहीं देखा।

"

''तो

?"-प्रीति बोली।

''तो

?"-राज ने प्रीति की ओर देखा-

''जिस आदमी को मैंने कभी देखा ही नहीं

, वो मेरे सपने में कैसे आ सकता है

?"

''तुमने उसे कभी देखा होगा।

"-प्रीति बोली-

''फिर तुम उसे भूल गए होगे।

"

''नहीं। मैंने उसे कभी नहीं देखा।

"

''हो सकता है टीवी पर देखा हो। किसी फिल्म में देखा हो। कहीं भीड़ में देखा हो। हम कई लोगों को देखते हैं और भूल जाते हैं। सबकी सूरतें हमेशा याद नहीं रख सकते। कई बार हम फिल्म स्टार्स को भी सपने में देख लेते हैं। वैसे भी ऐसा कोई रूल थोड़े ही है कि जिसे कभी नहीं देखा हो

, वो सपने में नहीं दिखाई दे सकता। आखिर सपने एक तरह की कल्पना ही तो होते हैं। हो सकता है कि तुम्हारे दिमाग ने बस उस आदमी की कल्पना कर ली हो...।

"

राज ने प्रीति की ओर ऐसे देखा

, जैसे उसे उसकी बात का जरा भी यकीन न हो।

''अगर मैंने उस आदमी की कल्पना कर भी ली थी

"-राज बोला-

''तो वैसी कल्पना क्यों की

? वो खून से रंगा चेहरा

, उसके चेहरे में वो दो भयानक सुराख

, जिनके आर-पार तक दिखाई दे रहा था

? इसकी भी कोई वजह बता सकती हो

?"

प्रीति खामोश हो गई।

''भूल जाओ ये सब!

"-जय उसका कंधा थपथपाते हुए बोला-

''वो बस एक सपना था। डरावना था लेकिन सपना ही था। अब तुम जाग गये हो और सपने से डरने की कोई जरूरत नहीं।

"

''तुम्हारे दिमाग पर यहां के माहौल का असर हो गया है

"-डोंगरा बोला-

''और कोई बात नहीं है। चिंता मत करो। आराम से सो जाओ। आज मैं अकेले निगरानी ड्यूटी कर लूंगा।

"

''राज की जगह आपके साथ मैं रहूंगा।

"-जय डोंगरा से बोला।

''नहीं।

"-राज बोला-

''निगरानी ड्यूटी पर तो मैं ही रहूंगा। तुम डबल शिफ्ट करोगे तो नींद पूरी नहीं कर पाओगे। वैसे भी फिलहाल सोने की हिम्मत मुझमें नहीं है। इस वक्त तो अगर कोई असली भूत भी सामने आ जाए तो उसका सामना कर सकता हूं। लेकिन नींद में इस तरह का भयानक सपना और नहीं देखना चाहता।

"

''ठीक है।

"-डोंगरा बोला।

कुछ देर राज के पास ही रूकने के बाद सब अपने-अपने कमरों में लौट गए।

बाहर जंगल से आ रही किसी कीड़े और कभी-कभी किसी जानवर के बोलने की आवाज रात के माहौल को और भी रहस्यमयी और डरावना बना रही थी।

नींद तो उन सबकी आंखों से कबकी उड़ चुकी थी।
 
दूसरा दिन

सुबह डॉली और रिंकी ने किचन की ड्यूटी संभाली।

रिंकी ज्यादा बात नहीं करती थी। उन सबमें सबसे कम बोलने वाली वो ही थी। वो लोग जब साथ बैठते थे

, तब भी रिंकी की जुबान पर ज्यादातर ताला ही लगा रहता था। और डॉली भी अनावश्यक रूप से ज्यादा बात करने वालों में से नहीं थी। दोनों शांतिपूर्वक ही किचन में सबके लिए नाश्ता बनाने में जुटी थीं। वैसे भी डॉली रात में राज ने जो सपना देखा था और उसे देखने के बाद उसकी जो हालत हो गई थी

, उसी के बारे में सोच रही थी।

''औरतजात का नाम बदनाम कर दिया।

"-तभी किचन के दरवाजे से आवाज सुनकर वे दोनों ही चौंके।

दरवाजे पर अनुराग खड़ा था।

''क्या हो गया

?"-डॉली बोली।

''क्या क्या हो गया

? तुम दो-दो लड़कियां हो यहां और किचन से बर्तनों की खट-पट के अलावा एक आवाज तक नहीं आ रही। इसीलिए प्रीति ने मुझे देखने के लिये भेजा है कि किचन में सब कुछ ठीक तो है।

"

''सब कुछ ठीक है।

"-डॉली बोली-

''और रात में मुझे कोई डरावना सपना भी नहीं आया

, जिसे देखकर मैं नींद में ही गला फाड़कर चीखने लगूं और सूखे पत्ते की तरह थर-थर कांपने लगूं।

"

अनुराग हंसा। फिर तत्काल संजीदा भी हो गया।

''सचमुच मैं राज की हालत देखकर थोड़ा डर सा गया था।

"-वो गम्भीर स्वर में बोला।

''हम सभी डर गए थे।

"

''वैसे क्या सचमुच सपने में हम किसी ऐसे आदमी को देख सकते हैं

, जिसे हमने असल जिंदगी में कभी नहीं देखा हो

? मुझे तो विश्वास नहीं है।

"

''हो सकता है। वैसे यहां से लौटने के बाद मैं इस बारे में डॉ. भारद्वाज से चर्चा जरूर करूंगी।

"

''नाश्ते में क्या है

?"

''सैंडविच और कॉफी।

"

''ओके। जल्दी जल्दी हाथ चलाओ। बाहर भूखे भेडिय़े इंतजार कर रहे हैं।

"

''ठीक है। मैं जल्दी-जल्दी हाथ चलाती हूं। तुम जल्दी-जल्दी पैर चलाओ और यहां से रूख्सत हो।

"

अनुराग ने आदेश का पालन किया।

राज

, जय

, डोंगरा

, प्रीति और मोहिनी बाहर आंगन में कुर्सियां डाले बैठे थेे।

वहां तीन खाली कुर्सियां और पड़ी थीं।

''ये अनुराग क्या किचन में जाकर ही बस गया

?"-प्रीति बोली।

''ब्रेकफास्ट लाने में मदद कर रहा होगा उनकी।

"-मोहिनी बोली।

''मैं अभी थोड़ी देर में आता हूं।

"-अचानक राज उठ खड़ा हुआ।

''किधर

?"-प्रीति ने प्रश्रवाचक भाव से उसकी ओर देखा।

''वो कब्रिस्तान

, जिसे कल हमने ढूंढा था।

"

कब्रिस्तान का जिक्र सुनते ही सब अलर्ट हो गए।

''क्यों

?"-मोहिनी बोली-

''उस कब्रिस्तान में क्या है

?"

''कुछ नहीं है। लेकिन फिर भी मेरा मन वहां का एक चक्कर लगाने का हो रहा है।

"

''कब्रिस्तान में एक चक्कर लगाने का

'मन

' हो रहा है!

"-प्रीति बोली-

''ये हुई न

101 परसेंट असली पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर वाली बात।

"

''तो तुम क्या अकेले ही जाओगे

?"-मोहिनी बोली-

''थोड़ा रूक जाओ। ब्रेकफास्ट करके सभी साथ ही चलते हैं।

"

''ब्रेकफास्ट में अभी टाइम है

"-राज बोला-

''और मैं वहां अकेले ही जाना चाहता हूं। थोड़ी ही देर में वापस आ जाऊंगा।

"

''इस तरह अकेले जाने की कोई खास वजह

?"-प्रीति की भंवें उठीं।

''ऐसी कोई खास वजह नहीं है। अगर कुछ खास होगा तो मैं आकर बताऊंगा ही।

"

फिर अतुल मकान के बगल के रास्ते से होते हुए पीछे की ओर चला गया

, जहां थोड़ी ही दूर जंगल में वो पुराना कब्रिस्तान था

, जहां कल उन लोगों ने किसी बच्चे के हंसने की आवाज सुनी थी।

''मुझे इसका इस तरह अकेले वहां जाना ठीक नहीं लग रहा।

"-डोंगरा चिंतित स्वर में बोला-

''खास तौर पर राज के साथ रात में जो हुआ

, उसके बाद तो मैं ऐसी किसी हरकत को लेकर बिल्कुल भी सहमत नहीं हूं।

"

''हैलो!

"-जय हाथ लहराते हुए बोला-

''रात में राज के साथ कुछ नहीं हुआ। उसने केवल एक सपना देखा था। यहां के माहौल का असर हो गया था उसके दिमाग पर। और उन बातों का भी

, जो हम भूत-प्रेत

, आत्माओं के अस्तित्त्व के बारे में करते रहे थे। इसके अलावा कोई बात नहीं है।

"

''लेकिन वो कह रहा था कि उसने सपने में जिस आदमी को देखा था

, उसे उसने जिंदगी में कभी नहीं देखा था।

"

''तो

? इससे क्या हुआ

? दिमाग कभी-कभी खुद भी कल्पनाएं कर लेता है। इस बात को जबर्दस्ती बढ़ाने की जरूरत नहीं है।

"

डोंगरा चुप हो गया लेकिन उसके चेहरे पर से अनिश्चय के भाव नहीं गए।

''और उसकी वो हालत

?"-प्रीति बोली-

''मैं राज को अच्छी तरह जानती हूं। वो इस तरह आसानी से डरने वालों में से नहीं है। लेकिन कल रात...वो जिस तरह कांप रहा था...मेरे लिये तो यकीन करना भी मुश्किल है। मैं उसे केवल एक सपने का असर नहीं मान सकती।

"

''तो तुम ही बता दो वो क्या था

?"-जय बोला।

''कहीं ऐसा तो नहीं कि वो...वो सचमुच उसके साथ हुआ हो।

"

''अच्छा

?"-मोहिनी बोली-

''लेकिन हमने तो उसे किसी भूत-प्रेत से जूझते हुए नहीं बचाया था। हमने तो उसे केवल नींद से जगाया था। तुम लोग बेकार एक मामूली से सपने को इतना तूल देने पर तुले हुए हो।

"

''अगर तुम मेरे जितनी अच्छी तरीके से राज को जानती होतीं तो तुम भी कभी ये विश्वास नहीं करतीं कि जिस चीज ने उसे इतना डरा दिया

, वो केवल एक मामूली सपना था।

"

''ओके। राज ने सपना नहीं देखा था। उसने साक्षात भूत देखा था। अब ठीक

?"

प्रीति ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला

, फिर होंठ भींच लिए।

''बहादुर तो वो है।

"-डोंगरा ने स्वीकार किया-

''अभी ही देखो। अकेला उस कब्रिस्तान में गया है। पता नहीं क्या करने

?"

''किसी कब्र पर धार मारकर न आ जाए।

"-जय बड़बड़ाया-

''ऐसा किया तब तो भूत पक्का पीछे पड़ जाएगा हमारे।

"

''जय!

"-प्रीति उसके कंधे पर हल्के से हाथ मारते हुए नाराजगी भरे स्वर में बोली।

तभी अनुराग किचन से वापस आ गया।

''राज कहां गया

?"-उसने आते ही पूछा।

''कल यहां हमने जो उसकी ससुराल ढूंढी थी

"-जय बोला-

''वहीं गया है।

"

''ससुराल

?...ओह।

"-अनुराग को बात देर से समझ में आई। फिर उसने पलटकर मकान की ओर देखा

, जिसके उस पार पिछले हिस्से में आगे जंगल में वो पुराना कब्रिस्तान था।

''लेकिन तुम सब लोग तो यहीं जमे हुए हो।

"-फिर अनुराग चिंतित स्वर में बोला।

''तो हम सब लोग कहां चले जाएं

?"-जय मुंह बना कर बोला।

''हमने साथ चलने को कहा था

"-मोहिनी जल्दी सेे बोली-

''लेकिन उसने कहा वो अकेले ही जाना चाहता है।

"

''ए रियल पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर!

"-प्रीति ने कहा।

''मैं उसके पास जाता हूं।

"-अनुराग जाने लगा।

''अरे

, बैठो।

"-मोहिनी ने उसका हाथ पकड़कर उसे बैठने का इशारा करते हुए कहा-

''पीछे ही तो गया है। अभी पांच मिनट में आ जायेगा। दिन में भी इतना डरने लगे तब तो हो गया।

"

मोहिनी के आग्रह करने पर अनुराग बैठ गया लेकिन उसके चेहरे से चिंता के भाव नहीं गये।
 
मकान के पिछले हिस्से से उस पुराने कब्रिस्तान तक जाने के लिए कोई रास्ता नहीं था। कल की तरह ही राज को पेड़ों के बीच से होकर ही कब्रिस्तान तक जाना पड़ा। वो कब्रिस्तान की चहारीदीवारी के बगल से चलते हुए दीवार खत्म होने पर मुड़कर गेट वाले हिस्से की ओर बढ़ता गया।

वहां उसे कब्रिस्तान का गेट बंद मिला।

गेट बंद देख कर राज को हैरानी हुई। उसे अच्छी तरह याद था कि कल उस कब्रिस्तान से वापस लौटते समय वे गेट खुला छोड़ गए थे।

फिर गेट बंद किसने किया

?

राज ने गेट की कुण्डी खोलकर कब्रिस्तान में प्रवेश किया।

कब्रिस्तान में एकदम सन्नाटा छाया हुआ था।

वहां कोई दो दर्जन के आसपास कब्रें थीं। सभी बेहद पुरानी। बुरी तरह टूट-फूट चुकीं।

कल सुबह जब वे लोग वहां आए थे

, उससे पहले शायद वर्षों से उस वीराने में किसी के कदम नहीं पड़े होंगें।

क्या मुर्दों को उनका वहां आकर शांति भंग करना अच्छा नहीं लगा था

?

शायद इसीलिए रात में राज ने उस रहस्यमयी व्यक्ति को देखा था।

राज शांति से कब्रिस्तान में टहलता रहा। उसकी नजरें उन कब्रों का मुआयना कर रहीं थीं।

तभी राज को कब्रिस्तान के दूसरे कोने में कुछ अजीब दिखाई दिया। उसकी आंखें फैल गईं। वो तेजी से लपककर वहां पहुंचा।

वहां पर आठ ताजा खुदी हुईं कब्रें थीं।

डॉली एक बड़ी सी ट्रे में नाश्ता लेकर बाहर आई।

''तुम अकेली ही ब्रेकफास्ट लेकर आ रही हो

?"-जय ट्रे उनके बीच रखी टेबल पर रखवाने में उसकी मदद करते हुए बोला-

''रिंकी कहां रह गई

?"

''वो बीच में अचानक किचन से गायब हो गई।

"-डॉली बोली।

''क्या

?"-प्रीति की आंखें फैल गईं।

''अरे...गायब हो गई से मेरा मतलब किचन से चली गई।

"-डॉली बोली-

''मुझे लगा वॉशरूम वगैरह गई होगी। फिर उसे आने में देर लग रही थी तो मैंने सोचा तब तक ये ट्रे यहां पहुंचा दूं।

"

''तुमने ठीक सोचा

"-प्रीति जल्दी से एक सैंडविच उठाकर मुंह में ठूंसते हुए बोली-

''मैं तो भूख से मरी जा रही हूं।

"

''अरे

, रूको यार!

"-जय बोला-

''सबके आने का इंतजार तो कर लो।

"

''सबके

?"-डॉली चौंकी

, फिर उसने वहां उपस्थित लोगों पर नजर डाली-

''राज कहां है

?"

''देख लीजिये

, डोंगरा साहब।

"-जय डोंगरा से बोला-

''इधर राज गायब है। उधर रिंकी गायब है। कहीं दोनों मिलकर कोई खिचड़ी न पका रहे हों।

"

''व्हाट नॉनसेंस।

"-डोंगरा ने घूरकर जय को देखा।

प्रीति ने जय को कोहनी मारी।

''अरे

, सच तो कहा रहा हूं।

"-जय बोला-

''मैंने नोटिस भी किया था कि रिंकी बार-बार सबकी नजरें बचा कर

राज की ओर देख रही थी।

"

''इनफ विद दैट।

"-अब डोंगरा सचमुच गुस्से में नजर आने लगा।

''ओके। ओके डूड।

"-जय हाथ उठाकर बोला-

''मैं तो आपके ही भले के लिये कह रहा था।

"

''मैं अपना भला-बुरा अच्छी तरह जानता हूं।

"-डोंगरा नाराजगी भरे स्वर में बोला-

''और आपको बता दूं कि मुझे इस तरह की वाहियात बातें बिल्कुल पसंद नहीं।

"

जय ने फिर कुछ कहने के लिए मुंह खोला लेकिन उसके शब्द बीच में ही अटककर रह गए।

घर के पिछली ओर से किसी औरत की दिल दहला देने वाली चीख सुनाई दी।

ब्रेकफास्ट लगभग तैयार हो चुका था। डॉली सैंडविच बनाने में व्यस्त थी। रिंकी को इस बात की खुशी थी कि डॉली उससे जबर्दस्ती बात करने की कोशिश नहीं कर रही थी।

उसे चुप रहना ही अच्छा लगता था।

रिंकी एक बेहद गरीब परिवार से थी। उसने अपने जीवन में इतने दुख देखे थे कि वो खुशियों के प्रति उदासीन-सी हो गई थी। कभी-कभी तो वो खुद को बेजान लाश की तरह महसूस करती थी। यही कारण था कि वो डोंगरा के साथ थी।

डोंगरा भी उसके प्रति उतना ही उदासीन था

, जितनी वो खुद के प्रति थी। वो उसमें भावनात्मक इंटरेस्ट नहीं दिखाता था। डोंगरा के सम्पर्क में आने के बाद से उसे गरीबी के दलदल से छुटकारा जरूर मिल गया था। कुछ लोग इस रिश्ते के बारे में ये जरूर सोच सकते थे कि उसने पैसों के लिए डोंगरा को चुना था लेकिन हकीकत ये थी कि उसे इस चीज से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वो किसके साथ थी

?

उसका साथी जवान था या अधेड़!

हंसमुख था या गम्भीर!

उसे बस जीने के लिए एक सहारा चाहिए था।

और डोंगरा उसके लिए उन मायनों में एक अच्छा साथी ही साबित हुआ था।

वो बात नहीं करना चाहती थी तो वो बात नहीं करता था। और आमतौर पर वो कम ही बात करना चाहती थी।

कभी-कभी मन के किसी कोने में उसके दिमाग में ये ख्याल भी आया था कि शायद डोंगरा के साथ भी कुछ उतना ही बुरा हुआ होगा

, तभी वो वैसा था। कभी उसका मन डोंगरा से इस बारे में पूछने का भी किया था। लेकिन वो हमेशा इस सवाल को कल पर टाल देती थी।

क्योंकि वो भावनात्मक रूप से डोंगरा के नजदीक नहीं आना चाहती थी।

वो भावनात्मक रूप से किसी के नजदीक नहीं आना चाहती थी।

वो किसी भावना को महसूस ही नहीं करना चाहती थी।

उसने भूख देखी थी।

गरीबी देखी थी।

जब वो छोटी बच्ची ही थी

, तब उसने अभावों से भरी जिंदगी में घर के लोगों को लड़ते-झगड़ते

, एक-दूसरे को ही गालियां देते

, कोसते देखा था। जिन्हें एक-दूसरे के लिए जान देने के लिये तैयार रहना चाहिए था

, उन्हें एक-दूसरे को बद्दुआएं देते देखा था।

घर में माता-पिता के बीच घंटों चलने वाली लड़ाइयां जब बंद होती थीं तो उसका दिमाग सांय-सांय कर रहा होता था। उसे लगता था जैसे वो पागल हो जायेगी।

उसका घर से भाग जाने का मन करता था।

लेकिन घर से भाग कर वो जाती कहां

?

उसी माहौल में वो बड़ी हुई और उसने देखा

, समझा कि भावनाओं की बातें करने वाले उसके माता-पिता असल में भावनात्मक रूप से कितने खोखले थे।

तभी से शायद उसे भावुक होने से नफरत हो गई थी।

या शायद उसे अपने इंसान होने से ही नफरत थी हो गई थी।

जब से वो लोग इस घर में आए थे

, तब से उसे लग रहा था कि वो जगह सही नहीं थी।

वहां कुछ तो गलत था!

लेकिन वो किसी से कुछ कह नहीं सकती थी।

वो एक जरखरीद गुलाम की तरह ही डोंगरा के आदेशों का पालन करती थी।

रिंकी के पिता की मृत्यु पहले ही हो गई थी।

फिर मां ने भी जहर खा कर आत्महत्या करने की कोशिश की।

उसे हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया।

मां का इलाज कराने के लिए रिंकी के पास पैसे नहीं थे।

तब सुरेश डोंगरा हॉस्पिटल आया।

उसने रिंकी की मां के इलाज के लिए पैसे दिए।

रिंकी की मां डोंगरा के यहां ही काम करती थी

, जिससे वो उन्हें जानता था।

रिंकी सुखद आश्चर्य से भर उठी।

उसे लगा डोंगरा इंसान नहीं

, कोई फरिश्ता था।

उसके माता-पिता ने उसे जो तकलीफ

, तनाव

, बुराइयों से भरी दुनिया दिखाई थी

, उस दुनिया से अलग

, किसी और ही दुनिया का शख्स था।

लेकिन डॉक्टर रिंकी की मां को बचा नहीं पाए।

रिंकी के लिए तो जैसे दुनिया ही खत्म हो गई थी।

फिर डोंगरा उसे अपने घर ले गया।

और उसने रिंकी के सामने शादी की पेशकश रखी।

रिंकी के दिलोदिमाग को जोरदार झटका लगा।

जिस आदमी को वो फरिश्ता मान रही थी

, उसकी नजरें असल में उस पर थीं।

वो उसकी मां के इलाज के लिए पैसे देकर उसकी मदद नहीं कर रहा था

, इंसानियत की मिसाल कायम नहीं कर रहा था बल्कि रिंकी को कोई खरीदने की वस्तु समझकर उसकी रकम एडवांस में चुका रहा था।

उस ख्याल से उसने खुद को दूसरी बार मरते हुए महसूस किया।
 
पहली बार तो वो तभी मर गई थी

, जब उसकी मां इस दुनिया से चली गई थी।

लेकिन रिंकी ने डोंगरा को निराश नहीं किया।

उसने उसका प्रपोजल स्वीकार कर लिया।

उनकी अब तक शादी नहीं हुई थी लेकिन वे पति-पत्नी की तरह ही एक ही घर में रहते थे।

डोंगरा हमेशा लोगों को उसे अपनी मंगेतर ही बताता था।

आगे क्या होगा

, इस बारे में वो नहीं सोचा करती थी।

इसीलिए वो यहां थी।

उसने डॉली की ओर देखा। वो आखिरी सैंडविच सेंक रही थी। सैंडविच की खुशबू जोरदार थी।

तभी रिंकी को वॉशरूम जाने की जरूरत महसूस हुई। पहले उसने सोचा कि डॉली को कुछ बोल कर जाए लेकिन डॉली का पूरा ध्यान सैंडविच पर देख कर वो बिना उससे कुछ कहे ही किचन से बाहर निकल गई।

किचन से एक छोटा-सा गलियारा एक चौराहे जैसी जगह पर खत्म होता था

, जिसमें सामने दूसरी मंजिल पर जाने वाली सीढिय़ां थीं और अगल-बगल में सामने वाला कमरा यानि

'मीटिंग रूम

' और दूसरा कमरा थे।

वो अभी गलियारे में कुछ ही कदम आगे बढ़ी थी कि अचानक उसे कुछ बेहद अजीब महसूस हुआ।

वो अपनी जगह पर थमककर खड़ी हो गई।

क्या था वो

?

अचानक उसे डर-सा लगने लगा।

उसने वापस किचन में जाने की सोची। वो किचन में जाने के इरादे से पलटी तो पीछे का दृश्य देखकर अपनी जगह पर जड़ होकर रह गई।

पीछे किचन के दरवाजे की जगह दीवार थी।

चिकनी सफाचट् दीवार!

वो हक्की-बक्की सी कुछ देर तक उस दीवार को देखती रही

, फिर वापस पलटी।

पलटकर सामनेे देखते ही उसे फिर आश्चर्य और भय का जोरदार झटका लगा।

सामने गलियारे के अंत में अब वो सीढिय़ां ही दिखाई दे रहीं थीं।

सीढिय़ों के अगल-बगल जो दोनों कमरों में जाने के दरवाजे थे...

...वो अब नहीं थे।

दोनों ओर एकदम सीधी दीवारें थीं।

तभी रिंकी को सब कुछ घूमता-सा महसूस हुआ।

क्या उसे चक्कर आ रहा था

?

नहीं।

वो गलियारा घूम रहा था।

उसने खौफजदा होकर दीवार से टिक कर खुद को संभालने की कोशिश की।

वो जोर से चिल्लाना चाहती थी लेकिन उसकी आवाज जैसे गले में ही घुटकर रह गई थी।

उसे अपनी सारी जिंदगी में इतना डर नहीं लगा था।

गलियारा पूरा घूम कर पलट चुका था। अब गलियारे की छत नीचे थी और जमीन ऊपर। रिंकी गलियारे की जमीन-जो कि थोड़ी देर पहले तक गलियारे की छत थी-पर पड़ी गहरी-गहरी सांसें ले रही थीं।

फिर वो दीवार का सहारा लेते हुए खड़ी हुई।

उसने सामने देखा। गलियारे के अंत में सीढिय़ां अब भी वैसी ही नजर आ रहीं थीं। यानि सिर्फ गलियारा घूमा था। सीढिय़ां नहीं।

'खट...खट...।

'

उस आवाज ने रिंकी को चौंकाया।

वो आवाज कहां से आ रही थी

?

उसने इधर-उधर देखा। वहां दीवारों के सिवा कुछ भी नहीं था। फिर उसकी नजरें बरबस ही सामने की ओर गलियारे के अंत में दिख रही सीढिय़ों की ओर चली गईं।

आवाज उधर से ही आ रही थी।

कोई ऊपर से नीचे आ रहा था।

कौन था वो

?

रिंकी जानती थी कि सब लोग बाहर थे। अनुराग भी किचन में उन दोनों से बातें करने के बाद बाहर की ओर ही गया था।

फिर छत से नीचे कौन आ रहा था

?

रिंकी आतंक से जड़ हो गई। इतना डर उसे सारी जिंदगी में कभी नहीं लगा था।

उसने एक बार फिर पीछे की ओर देखा। इस उम्मीद में कि शायद पीछे किचन का दरवाजा दिख जाये। उसे इस मुसीबत से निकलने का रास्ता दिख जाये।

लेकिन नहीं।

पीछे अब भी पहले की तरह वो दीवार ही नजर आ रही थी।

सीढिय़ों पर ऊपर से नीचे की ओर आ रही किसी के आने की आहट अब तेज हो गई थी। उस आवाज मेंं कुछ जाना-पहचाना-सा अहसास था।

रिंकी को लगा उसने वो आवाज पहले कहीं सुन रखी थी।

बल्कि उसने वो आवाज सैंकड़ों बार सुनी थी। हजारों बार सुनी थी।

आहट से लग रहा था

, ऊपर से नीचे आ रहा शख्स सीढिय़ों से नीचे उतरने ही वाला था।

रिंकी की पलटकर सीढिय़ों की ओर देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी।

वो पलटने से पहले

, सीढिय़ों की ओर देखने से पहले ये पहेली सुलझा लेना चाहती थी कि वो कदमों की आहट उसे इतनी सुनी-सुनी क्यों लग रही थी

?

आहट अब साफ सुनाई दे रही थी। ऐसा लग रहा था

, वो शख्स अब सीढिय़ों से नीचे उतर चुका था।

कहां सुनी थी उसने वो आवाज

?

रिंकी का मन कर रहा था कि पलटकर सीढिय़ों की ओर देख ले लेकिन उसके दिमाग का एक हिस्सा चीख-चीख कर कह रहा था कि जो दिखेगा

, वो

'अच्छा

' नहीं होगा।

शायद इसीलिए वो सीढिय़ों की ओर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी।

आहट अब काफी करीब आ चुकी थी।

अचानक रिंकी के दिमाग में छनाका-सा हुआ।

वो उस आहट को पहचानती थी।

वो उसके ही पैरों की आहट थी।

इसीलिए वो इतनी पहचानी हुई लग रही थी।

वो आहट उसने सैंकड़ों नहीं

, हजारों नहीं बल्कि अनगिनत बार सुनी थी।

रिंकी का सिर अपने-आप ही सीढिय़ों की ओर घूम गया।

'वो

' उसके ठीक पीछे खड़ी थी।

अपने एकदम पास खुद

'अपने-आप

' को ही खड़ा देख कर रिंकी भय से जड़ हो गई।

उसने कपड़े भी वही थे

, जो रिंकी ने पहने हुए थे।

'वो

' बिल्कुल रिंकी की ही प्रतिमूर्ति थी।

सिवाय एक चीज के।

आंखें!

उसकी आंखों की पुतलियों को चमकते सुनहरे रंग के छल्ले घेरे हुए थे

, जिससे ऐसा लग रहा था कि उसकी आंखों की पुतलियों की जगह दहकते हुए अंगारे रखे हों।

'वो

' अपने होंठों पर भयानक सी लगने वाली मुस्कान लिए एकटक रिंकी की ओर देख रही थी।

'उस

' के सामने रिंकी ज्यादा देर तक अपने होश कायम नहीं रख पाई।

बेहोश होने से पहले रिंकी के गले से एक चीख निकली

, फिर उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया।
 
राज आश्चर्य से उन कब्रों को देख रहा था।

कल सुबह ही वे लोग जब यहां आए थे

, उन कब्रों का नामोनिशान तक वहां नहीं था।

फिर ऐसे उजाड़ बियाबान में कौन आकर कब्रें खोदकर चला गया

?

और कब्रें खोदीं भी तो उन्हें इस तरह खुले छोड़कर जाने का क्या मतलब

?

रात में वो विचित्र सपना और अब ये रहस्यमयी कब्रें...

?

राज को अपना सिर घूमता सा महसूस हुआ।

तभी मकान की ओर से दिल दहला देने वाली चीख सुनाई दी।

राज मकान के पिछले हिस्से वाले मैदान में पहुंचा

, तब तक बाकी लोग भी भागते हुए वहां पहुंच चुके थे।

''क्या हुआ

?"-जय के होश उड़े हुए थे-

''ये चीख किसकी थी

?"

''वही तो मैं पूछ रहा हूं।

"-राज बोला-

''चीख किसकी थी

?"

''रिंकी की।

"-प्रीति खौफ भरे स्वर में बोली।

''क्या

?"-सब स्तब्ध रह गए।

''तुम...तुम कैसे कह सकती हो कि वो...वो रिंकी की चीख थी

?"-डोंगरा परेशान सा बोला।

''वही तो हम लोगों के बीच नहीं है।

"-प्रीति बोली।

''रिंकी।

"-डोंगरा पागलों की तरह चीख उठा-

''रिंकी!

"

कोई जवाब नहीं।

सब हैरान और घबराए से एक-दूसरे का मुंह ताक रहे थे।

''चलो।

"-जय बोला-

''उसे तलाश करते हैं।

"

''लेकिन कहां

?"-डॉली बोली-

''कहां तलाश करें उसे

? आवाज तो यहां से आई थी। यहां तो उसका नामोनिशान तक नहीं है।

"

सबकी नजरें स्टोर रूम के बड़े से लकड़ी के पुराने दरवाजे की ओर घूम गईं।

लेकिन वो तो बाहर से मजबूती से बंद था।

रिंकी उसमें कैसे हो सकती थी

?

''हो सकता है

"-मोहिनी बोली-

''आवाज घर के अंदर से ही आई हो। वैसे भी डॉली ने बताया कि वो किचन में उसे छोड़कर गई थी। हमने उसे बाहर वाले दरवाजे से निकलते नहीं देखा। हम सब वहीं थे। पिछला दरवाजा भी बंद है। यानि उसे घर के अंदर ही होना चाहिए।

"

''मोहिनी ठीक कह रही है।

"-जय बोला-

''चलो सब चलकर उसे घर के अंदर ही ढूंढते हैं। लेकिन दो लोग यहां भी रूको। और आसपास नजर रखो। कुछ दिखाई दे तो आवाज देकर सबको बुलाना।

"

प्रीति और अनुराग को वहीं छोड़कर सब मकान के अंदर चले गये।

अगले करीब आधे घंटे में उन्होंने मकान का कोना-कोना छान मारा। मकान बड़ा था लेकिन वे लोग भी छ: थे। उन्हें पूरे मकान को खंगालने में ज्यादा समय नहीं लगा।

रिंकी का कोई पता नहीं चला।

आखिरकार थक-हारकर वे सब वापस मकान के पिछले हिस्से में पहुंचे

, जहां अनुराग और प्रीति उनका इंतजार कर रहे थे।

''रिंकी का कुछ पता चला

?"-प्रीति ने पूछा।

जय का सिर इनकार में हिला।

''वहां कब्रिस्तान में

"-राज बोला-

''कुछ ताजी कब्रें खुदी हुईं हैं।

"

''क्या

?"-सबने चौंक कर राज की ओर देखा।

''जिस वक्त चीख की आवाज सुनाई दी

, उस वक्त मैं कब्रिस्तान मेंं ही था।

"-राज का स्वर गम्भीर था-

''कल सुबह हमारे उस कब्रिस्तान से जाने के बाद से लेकर सुबह मेरे दोबारा वहां आने के बीच किसी ने वहां आठ नई कब्रें खोदी हैं।

"

''कितनी

?"-डोंगरा के चेहरे पर हवाईयां उड़ रहीं थीं।

''आठ।

"

वहां सन्नाटा छा गया।

हर कोई दहशत में था।

ये सब क्या हो रहा था

?

जिसे वो एक पिकनिक के रूप में ले रहे थे

, एक एडवेंचर समझ रहे थे

, वो इतना भयानक रूप धारण कर लेगा

, ये उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था।

''मैं देख कर आता हूं।

"-जय बोला।

''हम भी चलते हैं।

"-मोहिनी बोली।

सभी कब्रिस्तान में पहुंचे।

वहां आठ खुदी हुई कब्रें देख कर सभी के चेहरों पर जैसे हल्दी पुत गई।

''ये अब कुछ ज्यादा ही हो रहा है।

"-अनुराग गम्भीर स्वर में बोला।

सबकी नजरें उसकी ओर घूम गईं।

''हां।

"-मोहिनी भी अनुराग से सहमत नजर आई-

''ज्यादा नहीं बल्कि बहुत ज्यादा हो रहा है।

"

''क्या ये भी हमें चौंकाने या डराने का उन कंपनी वालों का कोई आइडिया है

?"- राज ने डोंगरा और जय से पूछा।

दोनों कुछ भी नहीं कह पाए। उनकी जबान पर तो जैसे ताले लग गए थे।

''यहां आते ही आते जिस तरह उस कॉफिन मैन ने हमारा स्वागत किया था

"-अनुराग बोला-

''वही बर्दाश्त करने लायक नहीं था। फिर भी हम ड्रामा समझकर बर्दाश्त कर गए। लेकिन अब तो बिल्कुल ही हद पार हो चुकी है।

"

''हां।

"-जय ने भी अनुराग की बात पर सहमति व्यक्त की-

''थोड़ा-बहुत ड्रामा सहन किया जा सकता है। लेकिन ये अब जरूरत से कुछ ज्यादा ही हो रहा है।

"

''डोंगरा साहब।

"-अनुराग डोंगरा की ओर घूमा-

''ये आपकी और रिंकी की कोई मिली-जुली चाल तो नहीं है

? मतलब हमें डराने के लिए 'कॉफिन मैन' जैसा ही कोई ड्रामा...

?"

''नहीं।

"-डोंगरा ने इनकार में सिर हिलाया-

''रिंकी का कंपनी से सीधे कोई कॉन्टैक्ट नहीं है। उसे तो मैं अपने साथ लेकर आया था। वो उनके किसी तरह प्रैंक में कैसे शामिल हो सकता है।

"

''फिर वो गई कहां

?"-मोहिनी बुरी तरह घबराई हुई लग रही थी-

''इतनी देर हो गई...उसका अब तक कोई पता नहीं है...कहीं उसके साथ कोई हादसा...।

"-उसने अपनी बात अधूरी ही छोड़कर अपने मुंह पर हाथ रख लिया।

उस बात ने सबके रहे-सहे होश भी उड़ा दिये।

''मेरे ख्याल से हमें शहर जाना चाहिये।

"-राज निर्णायक स्वर में बोला-

''और पूरे मामले की सूचना पुलिस को देनी चाहिए। और उससे पहले आप पुलिस को फोन लगाइये और मदद बुलवाइये।

"-उसने डोंगरा से कहा।

''ठीक है।

"-डोंगरा बोला-

''मैं अभी अपनी कार से मोबाइल निकालता हूं और पुलिस को इन्फॉर्म करता हूं।

"

''लेकिन हम रिंकी को यहां छोड़कर कैसे जा सकते हैं

?"-मोहिनी बोली।

''क्या मतलब

?"-जय बोला।

''हमने अभी थोड़ी देर पहले उसकी चीख सुनी थी। वो यहीं कहीं आसपास होनी चाहिए। अगर वो यहां आती है

, फिर यहां किसी को नहीं देखेगी

, इस वीरान

, भुतहा जगह पर खुद को अकेली पाएगी तो उस पर क्या गुजरेगी

?"

''तो मैंने कब कहा कि हम सभी शहर चले जाएं

?"-राज बोला-

''हममें से कोई दो लोग शहर जाएंगें। वहां से मदद लेकर आएं

, फिर रिंकी के मिलने के बाद सभी लोग इस मनहूस जगह को फौरन छोड़ देंगें।

"

''बिल्कुल सही।

"-डोंगरा ने जोर-जोर से सिर हिलाते हुए अपनी सहमति व्यक्त की-

''हम लोगों ने यहां आकर जो गलती कर दी है

, उसे सुधारने के लिये अब भी हमारे पास मौका है। और हमें ये मौका गंवाना नहीं चाहिये।

"

''चलो।

"-जय ने भी सहमति में सिर हिलाते हुए दृढ़ भाव से कहा-

''यही करते हैं।

"
 
डोंगरा ने अपने मोबाइल से पुलिस को कॉल करने की कोशिश की लेकिन वहां नेटवर्क ही नहीं मिल रहा था। किसी नम्बर पर कोई किसी तरह की

, यहां तक कि इमरजेंसी कॉल भी नहीं लग पा रही थी।

आखिरकार परेशान होकर डोंगरा ने अपनी कार की डिक्की खोल दी और सबके मोबाइल उन्हें वापस सौंप दिए। सबने अपने-अपने मोबाइलों से कॉल करने की कोशिश की लेकिन किसी की भी

, कहीं कॉल नहीं लग रही थी।

आखिरकार थक-हारकर उन्होंने दो लोगों को मदद लाने के लिए शहर भेजने का फैसला किया।

निश्चय हुआ कि जय और प्रीति कार से शहर जायेंगें

, वहां से पुलिस की मदद लेकर वापस लौटेंगें। तब तक बाकी लोग वहीं रूककर रिंकी की तलाश जारी रखेंगें।

जय और प्रीति डोंगरा की कार से शहर के लिये रवाना हुए। जिस वक्त वे लोग रवाना हुए

, उस समय सुबह के

10 बजे से ऊपर टाइम हो चुका था।

उनका नाश्ता ज्यों-का-त्यों टेबल पर पड़ा था। किसी को खाने का होश नहीं था।

अब हर कोई जल्दी से जल्दी रिंकी को ढूंढकर वहां से निकल जाना चाहता था।
 
सभी मीटिंग रूम में बैठे हुए थे। उनके बीच सन्नाटा छाया हुआ था।

''मेरे ख्याल से

"-फिर मोहिनी ने सन्नाटे को भंग किया-

''हमें एक बार स्टोर रूम को भी चैक कर लेना चाहिए।

"

''स्टोर रूम?"-अनुराग बोला-

''पागलों जैसी बात मत करो। रिंकी स्टोर रूम में कैसे हो सकती है? वो तो बाहर से बंद था।"

''लेकिन बाकी जगह तो हमने तलाश कर लिया न? अब वही एक जगह रह जाती है, जो हमने नहीं देखी। तो मेरी मानो तो हमें स्टोर रूम को भी एक बार चैक कर ही लेना चाहिए।"

''उस स्टोर रूम पर इतना बड़ा ताला लटका है। रिंकी क्या हवा बनकर दरवाजे पर पड़ी दरारों के बीच से अंदर चली जायेेगी?"

मोहिनी कुछ नहीं बोली।

''मोहिनी सही कह रही है।"-राज ने मोहिनी की बात का समर्थन किया-''हमें स्टोर रूम को भी चैक कर लेना चाहिये। बल्कि पहले ही चैक कर लेना चाहिए था। उस समय भी उस ताले के चक्कर में हमने स्टोर रूम की ओर ध्यान नहीं दिया। इस मकान में एक वही जगह है, जहां की हमने तलाशी नहीं ली।"

''लेकिन उस पर तो ताला लगा है न...।"-डोंगरा बोला।

''ऐसी-तैसी ताले की!"-डॉली बोली-''वैसे भी हमारे पास यहां करने के लिये कुछ नहीं है। और रिंकी कहां है, किस हाल में है, हमें कुछ पता नहीं चल पा रहा है। तो अब हमें उस स्टोर रूम की भी तलाशी ले लेनी चाहिए।"\

''लेकिन"-डोंगरा दबे स्वर में बोला-'' 'कॉफिन मैन' ने हमें स्टोर रूम में जाने से मना किया था...।"

''भाड़ में गया 'कॉफिन मैन!"-राज अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ-''हम स्टोर रूम में जा रहे हैं। "
 
Back
Top