• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Horror मौत की चाल

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
रिंकी को ढूंढने के दौरान उन्हें उस मकान में बहुत सारा सामान इधर-उधर बिखरा मिला था। उसी में एक कमरे से राज ने एक बड़ा सा रैन्च लिया, फिर सभी लोग मकान के पिछले हिस्से में पहुंचे।

वे स्टोर रूम के लकड़ी के पुराने लेकिन मजबूत लगने वाले दरवाजे के सामने खड़े थे।

दरवाजे की जंग लगी कुण्डी पर बड़ा सा ताला लटका हुआ था।

''ठीक है!"-राज नेे एक बार अपने साथियों की ओर देख कर सिर हिलाया, फिर रैंच को जोर से ताले पर मारा।

जंगल के सन्नाटे में रैंच के ताले से टकराने की जोरदार आवाज दूर-दूर तक गूंज उठी।

ताले को कुछ नहीं हुआ।

राज ने फिर वार किया।

उस बार रैंच के ताले से टकराने की जोरदार आवाज के बीच ही किसी बच्चे के खिलखिलाने की आवाज भी गूंज उठी।

सब सन्न रह गये।

उन्होंने चारों ओर देखा लेकिन कहीं कोई और नजर नहीं आया।

''य...ये...आवाज कैसी थी ?"-प्रीति भयभीत स्वर में बोली।

''वैसी ही"-मोहिनी बोली-''जैसी कल उस कब्रिस्तान में हमने सुनी थी।"

सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे, फिर सबकी नजरें राजके चेहरे पर टिक गईं।

''क्या हुआ?"-उन्हें इस तरह अपनी ओर घूरते पाकर राज के मुंह से बरबस ही निकल गया।

''तुम बताओ?"-डोंगरा बोला।

''मैं क्या बताऊं?"-राज उखड़े स्वर में बोला।

''तुम्हीं तो पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हो। तुम नहीं तो और कौन बताएगा ?"

राज ने गहरी सांस ली।

वहां तो पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर होना भी गुनाह था।

''मैं तुम लोगों को डराना तो नहीं चाहता था"-फिर वो बोला- ''लेकिन अब तुम लोग पूछ ही रहे हो तो मुझे लगता है, ये उसी बच्चे की आत्मा है, जिसकी कब्र कल हमने उस कब्रिस्तान में देखी थी।"

डोंगरा का चेहरा फक्क पड़ गया। बाकी के चेहरों पर भी गम्भीरता की परत चढ़ गई।

''लेकिन

"-फिर राज ने जल्दी से जोड़ा-''जरूरी नहीं कि ऐसा ही हो। फिलहाल हमें अपना ध्यान रिंकी को ढूंढने पर केन्द्रित रखना चाहिए।"

''हां।

"-डोंगरा ने सिर हिलाया- ''हमें जल्दबाजी नहीं करनी है। हमें सही वक्त का इंतजार करना चाहिए...।"

''इंतजार?"-मोहिनी लगभग चीखती-सी बोली- ''किस चीज का इंतजार ? जब तक उस बच्चे का भूत निकलकर हमारे सामने नहीं आ जाता? जब तक रिंकी की तरह हममें से तीन-चार लोग और गायब नहीं हो जाते? जब तक हममें से एकाध मर नहीं जाता...?"

''मोहिनी...।"-अनुराग ने उसे रोकने की कोशिश की।

''नहीं।"-मोहिनी तेज स्वर में बोली-''मुझे बोलने दो। कोई बता सकता है रिंकी इस वक्त कहां है? किस हालत में है? तुम लोगों की बातों में आकर यहां आकर मैंने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती की है। उस कब्रिस्तान में वो आठ कब्रें किसके लिये खोदी गईं हैं? अब...अब मुझे नहीं लगता कि हममें से कोई भी यहां से जिंदा वापस जा पायेगा। "-कहकर मोहिनी ने अपना चेहरा अपने दोनों हाथों में छिपा लिया।

किसी के मुंह से बोल न फूटा।

जो अनकहा था, वो मोहिनी ने कह दिया था।

सब कुछ देर अपनी जगह पर पत्थर की मूरत से बने खड़े रहे।

फिर राज ने रैंच उठाया और ताले पर दोबारा वार किया।

ताला टूट कर जमीन पर जा गिरा।

ताले के उस तरह अचानक टूट जाने से भी राज हैरान हुए बिना नहीं रह सका। उसने पिछले दो वार काफी जोर से किए थे, जिनसे ताले को टस से मस नहीं होते देख कर उसे लग रहा था कि उसे आठ-दस वार करने होंगें, जिसके चलते इस बार उसने ताले पर जोर से वार भी नहीं किया था।

लेकिन पिछले दो शक्तिशाली वारों को आराम से झेल गया बेहद मजबूत सा दिखने वाला वो ताला तीसरे वार में अचानक ही टूट गया।

राज ने धक्का देकर स्टोर रूम का दरवाजा खोला। दरवाजे के निचले हिस्से वहां जमी धूल में धंस गए थे

, जिससे दरवाजे को धक्का देकर खोलना पड़ा।

अंदर बड़े से हॉल जैसा विशालकाय स्टोर रूम उनके सामने था।
 
स्टोर रूम में बहुत सारा सामान रखा था। बड़ी पेटियां, बोरे, कई तरह के औजार, जिनमें खेती के औजारों से लेकर और भी कई तरह के पुराने औजार शामिल थे। हर चीज पर चढ़ी धूल की मोटी परत दूर से ही दिखाई दे रही थी, जो इस बात की गवाही दे रही थी कि बरसों से उस सामान को हिलाया तक नहीं गया है।

लेकिन सबकी नजरें एक जगह पर टिक कर रह गईं।

उस स्टोर रूम के बीचों-बीच वाले हिस्से पर।

जहां जमीन पर...

...जहाँ रिंकी बेहोश पड़ी थी।

''रिंकी!"-मोहिनी चीख मारकर रिंकी की ओर लपकी। राज ने उसे रोकने की कोशिश करनी चाही लेकिन तब तक वो रिंकी के पास पहुंच चुकी थी।

''रिंकी!"-मोहिनी धूल भरी जमीन पर बेहोश पड़ी रिंकी को लगभग झंझोड़ते हुए-सी बोली-''रिंकी...।"

''ये बेहोश है।"-अनुराग बोला, वो भी उनके नजदीक पहुंच चुका था-''इसे कमरे में ले चलते हैं।"

''हां।"-मोहिनी ने सहमति में सिर हिलाया। रिंकी के वापस मिलने के बाद उसके शरीर में तो जैसे जान ही लौट आई थी। उसका मुरझाया चेहरा एक बार फिर खिल उठा था।

डोंगरा रिंकी को उठाने के लिए आगे बढ़ा लेकिन उसकी परवाह न करते हुए अनुराग ने रिंकी को किसी गुडिय़ा की तरह बांहों में उठा लिया और उसे लेकर दरवाजे की ओर बढ़ा।

राज दरवाजे पर खड़ा गम्भीर निगाहों से उन्हें देख रहा था। डॉली भी उसके साथ थी।

अनुराग ने एक नजर राज और डॉली पर डाली, फिर स्टोर रूम से बाहर निकल गया।

सब उसके पीछे-पीछे मीटिंग रूम में पहुंचे। वहां रिंकी को लिटाने के लिये कुछ नहीं था इसलिये अनुराग उसे बांहों में लिये हुए सीढिय़ां चढऩे लगा, जहां ऊपर बैडरूम थे।

बाकी लोग उसके पीछे थे।

सीढिय़ों पर चढ़ते समय अचानक अनुराग को कुछ अजीब-सा अहसास हुआ। उसका ध्यान अपने-आप ही अपनी गोद में रिंकी के चेहरे की ओर चला गया।

अनुराग के पैर डगमगा उठे।

रिंकी की आंखें खुली हुईं थीं और वो एकटक उसी की ओर देख रही थी।

उसके कदम सचमुच भटक गए। पीछे से दो हाथों ने उसे मजबूती से सहारा दिया वरना वो शायद डगमगा कर नीचे ही गिर जाता।

रिंकी तब भी एकटक उसी की ओर देख रही थी। उसकी आंखें भी सामान्य तरह से खुली नहीं लग रहीं थीं बल्कि काफी फैली हुई लग रहीं थीं, जैसे कटोरियों से बाहर निकल आएंगीं।

और वो जिस विचित्र ढंग से उसे देख रही थी, उससे अनुराग को अपनी रीढ़ की हड्डी में सिहरन सी दौड़ती महसूस हुई।

''क्या हुआ?"-पीछे से राज की आवाज सुनाई दी-''अभी तुम सीढिय़ों से गिरने ही वाले थे।"

''हां?"-अनुराग जैसे ट्रांस की अवस्था से बाहर निकला-उसने गर्दन घुमाकर पीछे की ओर देखा। पीछे राज और उसके पीछे बाकी लोग भी उसी की ओर देख रहे थे।

अनुराग का चेहरा पीला पड़ गया था।

उसकी वो हालत देख कर राज का चेहरा और भी गम्भीर हो गया।

फिर अनुराग ने किसी तरह अपने अंदर की सारी हिम्मत को समेटा और बिना रिंकी के चेहरे की ओर देखे दृढ़ता से सामने की ओर देखते हुए सीढिय़ां चढऩे लगा।

पता नहीं क्यों, अचानक उसे रिंकी से डर-सा लगने लगा था।

अंदर एक कमरे में जाकर उसने रिंकी को पलंग पर लिटा दिया और फिर तेजी से पीछे हट गया।

रिंकी को बिस्तर पर लिटाने के बाद न जाने क्यों उसे ऐसा लग रहा था, जैसे बहुत बड़ी मुसीबत से उसका पीछा छूट गया हो।

''रिंकी।"-सीढिय़ां चढ़ते समय पीछे हो गई मोहिनी लपककर रिंकी के पास पहुंची, फिर वो बाकी लोगों की ओर घूम कर खुशी भरे स्वर में बोली-''इसे...इसे...होश आ गया है।"

अनुराग के लिए वो नई बात नहीं थी। उसे तो सीढिय़ों पर ही पता चल गया था।

सभी ने रिंकी के पलंग को घेर लिया।

राज की नजरें अनुराग के चेहरे पर थीं। अनुराग ने भी राज की ओर देखा। राज ने उसकी आंखों में दिख रहे खौफ को पढ़ लिया था।

''रिंकी!"-डोंगरा कुछ ज्यादा ही भावुक हो गया था-''तुम कहां चली गईं थीं? हम सब...हम सब कितने डर गए थे...।"

''तुम चीखी क्यों थीं ?"-डॉली गम्भीर स्वर में बोली।

रिंकी ने डोंगरा की बात की ओर जैसे ध्यान ही नहीं दिया। वो डॉली से बोली-''मैंं चीखी थी?"

''हां। तुम्हारी चीख की आवाज हम सबने सुनी थी।"

''मुझे याद नहीं।"-रिंकी बोली।

''तुम स्टोर रूम के अंदर कैसे पहुंचीं ?"-अतुल बोला।

''मैं स्टोर रूम में थी?"-रिंकी आश्चर्य व्यक्त करते हुए बोली।

''हां। हम तुम्हें वहीं से तो लेकर आये हैं।"-मोहिनी, जो उसके बगल में बैठ कर उसके सिर पर प्यार से हाथ फेर रही थी, बोली।

''मुझे तो याद नहीं।"-रिंकी अनजान बनती हुई बोली-''मैं तो बेहोश थी। तुम्हीं लोग बताओ मेरे साथ क्या हुआ था।"

''तुम बेहोश कैसे हुईं?"-राज बोला। हालांकि उसे अपने सवाल का सही-सही जवाब मिलने की उम्मीद कम ही थी।

''मैं डॉली के साथ किचन में नाश्ता बना रही थी। फिर मैं वॉशरूम जाने के लिए गई थी। रास्ते में ही मुझे चक्कर आया और मैं बेहोश हो गई।"

सबने सवालिया निगाहों से एक-दूसरे की ओर देखा।

रिंकी क्या कह रही थी ?

वो घर के अंदर बेहोश हुई थी तो स्टोर रूम में कैसे पहुंची?

उनमें से किसी के पास इस बात का जवाब नहीं था।

वो सब लोग घर के बाहर बैठे हुए थे। रिंकी के मिलने के बाद डोंगरा और मोहिनी उल्लासित थे। वहीं, अनुराग काफी परेशान लग रहा था।

राज और डॉली गम्भीर थे। जिन हालातों में रिंकी मिली थी और उसके बाद वो जैसा बर्ताव कर रही थी, उसे वो लोग इतनी आसानी से नजरअंदाज नहीं कर सकते थे।

रिंकी एक कुर्सी पर बैठी खोई-खोई सी सामने की ओर देख रही थी। वो पहले भी कम ही बोलती थी लेकिन स्टोर रूम से मिलने के बाद तो वो और भी ज्यादा गुमसुम लगने लगी थी।

''रिंकी।"-अचानक डॉली बोली।

''हां!"-रिंकी ने चौंक कर उसकी ओर देखा , जैसे नींद से जागी हो।

''कोई परेशानी है क्या ? बहुत गुमसुम लग रही हो?"-डॉली ने पैनी निगाहों से उसके चेहरे को देखते हुए कहा।

''नहीं।"-वो वैसे ही खोई-खोई सी बोली-''ऐसा लग रहा है, जैसे कई सालों की नींद से जागी हूं।"

इससे पहले वो लोग उसकी उस विचित्र बात पर कुछ कह पाते, अचानक मोहिनी की आवाज ने सबका ध्यान खींच लिया।

''वो लोग आ गए।"

सबकी नजरें उस घर की ओर आने वाले रास्ते पर टिक गईं। उस पर जय और प्रीति आते दिख रहे थे लेकिन...।

पैदल।वे बिना कार के आ रहे थे।

रिंकी को छोड़कर सब उठ खड़े हुए

, जैसे उन दोनों का स्वागत करने वाले हों।
 
जय और प्रीति उनके पास पहुंचे। दोनों चेहरे से काफी थके लग रहे थे। लेकिन रिंकी पर नजर पड़ते ही उनके चेहरे खिल उठे।

''थैंक गॉड!"-प्रीति बोली-''रिंकी तुम ठीक तो हो? क्या हुआ था तुम्हें? कहां चली गई थीं तुम?"

रिंकी ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया

, उल्टे डोंगरा ने जय से पूछा-''क्या हुआ? तुम लोग तो पुलिस को लेकर आने वाले थे न? और तुम्हारी कार कहां है?"

''अंदर चल कर बताता हूं।"-जय थके स्वर में बोला-''या सब कुछ यहीं पूछ लोगे?"वे लोग उनके रास्ते से हट गए।

कुछ ही देर में वे सब 'मीटिंग रूम' में बैठे थे।

''क्या हुआ?"-डोंगरा जैसे बेसब्रा हो रहा था-''अब तो बताओ तुम लोग पुलिस लेकर क्यों नहीं आए? कार कहां छोड़ दी?"

''कार यहां से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर है।"-जय बोला।

''वहां क्या कर रही है?"

''अपने ठीक होने का इंतजार।"

''क्या?"

''उसमें कुछ खराबी आ गई थी। हम उसे ठीक नहीं कर पाए तो मजबूरन उसे वहीं छोडऩा पड़ा।"

''मतलब तुम लोग सड़क तक भी नहीं जा पाए?"

''पैदल जाना पड़ा। सड़क पर कोई गाड़ी नहीं दिखी।"

''कार खराब थी तो तुम लोग उतरकर पैदल जा सकते थे।"-मोहिनी बोली-''हो सकता है आगे सड़क पर कोई गाड़ी दिख जाती, जिससे लिफ्ट लेकर तुम लोग...।"

''तुम्हें क्या हुआ है?-अचानक अनुराग प्रीति से बोला। प्रीति का चेहरा भी उड़ा-उड़ा लग रहा था। जाने क्यों अनुराग को ऐसा लगा, जैसे प्रीति ने भी कुछ ऐसा देखा था, जो उसने भी देखा था।

''हम कार से जा रहे थे"-प्रीति बोली, उसका स्वर ऐसा था, जैसे वो जो बोल रही थी, उस पर उसे खुद भी यकीन नहीं हो पा रहा था-''तो अचानक एक बड़ा सा पेड़ टूटकर हमारे रास्ते में गिर गया।"

''अचानक?"-मोहिनी हैरानी से बोली।

''हां।"-प्रीति ने वैसे ही अजीब से स्वर में कहा-''न तो कोई तेज हवा चल रही थी। और न ही कुछ और था वहां, जिससे लगता कि वो पेड़ गिरा हो। वो पेड़ अचानक ही टूटकर हमारे रास्ते में आ गिरा। अगर...अगर जय ने एकदम से ब्रेक नहीं लगाए होते तो हमारी कार निश्चित रूप से उस पेड़ से टकरा ही जाती। जय हमेशा से ही बहुत सावधानी से कार चलाता है। जय की जगह अगर कोई और होता तो शायद कार उस पेड़ से टकरा ही जाती।"

''एकदम से पेड़ कैसे टूट गया?"-राज के मुंह से निकला।

''यही तो मुझे भी समझ नहीं आ रहा है।"-जय बोला-''ऊपर से वो काफी बड़ा पेड़ था। रास्ते में गिर गया तो उसके दूसरी ओर रास्ता तक दिखाई नहीं दे रहा था। और उसी के बाद कार भी अचानक खराब हो गई। मैंने काफी चैक किया लेकिन कार में क्या खराबी हुई थी, समझ नहीं पाया। और तुम लोगों को क्या लगता है, मैंने और प्रीति ने सड़क पर जाकर लिफ्ट लेने की कोशिश नहीं की? हम उस बड़े पेड़ के बगल से किसी तरह निकलकर पैदल ही एक-डेढ़ किलोमीटर पैदल चलकर सड़क तक पहुंचे और वहां करीब एक-दो घंटे तक इंतजार करते रहे लेकिन कोई गाड़ी वहां से नहीं गुजरी। आखिरकार हमको वापस ही लौटना पड़ा।"

उनके साथ जो गुजरी, उसे सुनकर सबके मुंह पर जैसे ताले लग गए।

सब एक-दूसरे का चेहरा देख रहे थे।

ये उनके साथ हो क्या रहा था?

एक के बाद एक अजीब घटनाएं।

पहले रिंकी का इस तरह रहस्यमयी ढंग से गायब हो जाना। कब्रिस्तान में खुदी वो आठ ताजा कब्रें। रिंकी का रहस्यमयी ढंग से स्टोर रूम के अंदर मिलना। जय और प्रीति के रास्ते में पेड़ का गिर जाना। कार का अपनेआप खराब हो जाना। फिर सड़क पर उन्हें एक भी गाड़ी नहीं मिलना।

वहां आखिर हो क्या रहा था ?''रिंकी कहां मिली ?"-जय ने पूछा।

मोहिनी ने उन्हें पूरा किस्सा बताया।

''तुम स्टोर रूम के अंदर कैसे पहुंचीं?"-जय हैरानी से रिंकी से बोला।

''स्टोर रूम!"-अचानक रिंकी जोर से चीख उठी।

सब चौंक उठे।

रिंकी के चेहरे पर अजीब सा जुनून दिखाई देने लगा था

, उसकी आंखें भी चढ़ी हुईं सी लग रहीं थीं।

''स्टोर रूम....स्टोर रूम...स्टोर रूम...!"-रिंकी फिर चीखी-''स्टोर रूम का नाम ले-लेकर तुम लोगों ने मेरा दिमाग खराब करके रख दिया है। मैं जब घर के अंदर बेहोश हुई थी तो स्टोर रूम में कैसे जा सकती हूं? तुम लोग इस तरह की बातें करके मुझे पागल कर दोगे। मैं ऊपर जा रही हूं।"-फिर वो अचानक उठ खड़ी हुई और अंदर की ओर बढ़ गई।

सब हक्के-बक्के से उसे जाते देखते रहे।

उसका ये नया रूप उनकी समझ से परे थे।

अनुराग को अपने अंदर का अनकहा डर साकार रूप लेता नजर आ रहा था।

और राज और डॉली को भी इस बात का अहसास हो रहा था कि हालात कौन-सा रूख अपना रहे थे।

वो वक्त नजदीक आ रहा था, जब उन्हें डर से भागने की जगह डर को स्वीकार कर लेना चाहिए था।

रात को सब सोने की तैयारी कर रहे थे।

दिन की घटनाओं ने सबको बुरी तरह परेशान कर दिया था। डॉली और प्रीति ने डिनर तैयार किया

, जिसे सबने आधे-अधूरे मन से खाया।
 
रिंकी ऊपर अपने कमरे में जाने के बाद एक बार भी नीचे नहीं आई थी। न ही उसने खाना खाया। मोहिनी ने बताया कि उसे हल्का बुखार था और जगाए जाने पर वो काफी नाराज हो रही थी

, जिसके चलते उन्होंने उससे रात में खाने के लिए भी ज्यादा जिद नहीं की। वो बिना खाना खाए ही सो गई।

रिंकी की तबीयत खराब होने से अब वो लोग और भी ज्यादा परेशान हो गए थे।

खाना खाने के बाद उन्होंने आपस में भी ज्यादा बातचीत नहीं की।

रात की पहली शिफ्ट में डोंगरा और अनुराग ने निगरानी ड्यूटी संभाली और बाकी सब अपने कमरों में सोने चले गए।

रात में अचानक कुछ अजीब सी आवाज सुनकर राज की नींद खुल गई।

उसने इस तरह अचानक नींद खुलने का कारण जानने के लिये इधर-उधर देखा। थोड़ी ही दूर पर दूसरे पलंग पर जय सोया हुआ था।

लेकिन वो सोया हुआ नहीं लग रहा था।

ऐसा लग रहा था

, जैसे वो धीरे-धीरे कांप रहा था।

''जय!

"-राज ने उसे आवाज दी।

कोई प्रतिक्रिया नहीं।

''जय!

"-इस बार राज ने उसे जोर से आवाज दी और पलंग से उतरकर उसके पास पहुंच गया।

जय का कांपना अब तेज हो गया था और वो बेचैनी से सिर इधर से उधर कर रहा था।

''जय!

"-उसे जगाने के इरादे से राज ने उसे पकड़कर हिलाना चाहा लेकिन जैसे ही उसने जय को छुआ

, उसके हाथ उठे और राज की गर्दन पर कस गये।

राज ने चौंक कर अपनी गर्दन को उसकी पकड़ से आजाद कराने की कोशिश की लेकिन जय के हाथ उसकी गर्दन पर कसते ही जा रहे थे।

आधे मिनट से भी कम समय में राज को समझ आ गया कि उसे किसी भी हालत में जय की पकड़ से अपनी गर्दन छुड़ानी ही थी। उसने दोनों हाथों से जय के चंगुल से अपने गले को आजाद करने की कोशिश करते हुए खुद को पूरी ताकत से पीछे धकेला। इस कोशिश में उसे कामयाबी भी मिली और उसकी गर्दन एक झटके से जय के हाथों की कैद से आजाद हो गई लेकिन राज भी अपना संतुलन बनाये नहीं रख सका और लडख़ड़ाकर पीछे जा गिरा।

तब तक उस कमरे से आ रही आवाजें सुनकर बाकी लोग भी अंदर आ गए।

राज को इस तरह जमीन पर पड़े देखकर सभी हैरान थे।

''क्या हुआ

, राज

?"-सबसे पहले डॉली उसके पास पहुंची-

''तुम जय का नाम लेकर क्यों चिल्ला रहे थे

?"

राज अपनी गर्दन सहलाते हुए जमीन से उठा। उसने देखा कि जय भी उठ बैठा था और इस तरह फटी-फटी आंखों से उसकी ओर देख रहा था

, जैसे अभी-अभी उसने राज क ी नहीं बल्कि राज ने ही उसकी गला दबाने की कोशिश की हो।

''यहां आखिर हो क्या रहा है

?"-डोंगरा झुंझलाए स्वर में बोला-

''तुम लोग कभी चैन से नहीं रह सकते क्या

? कल तुम्हें दौरा पड़ा था। आज तुम दोनों फिर कोई नया तमाशा कर रहे हो।

"

डॉली ने सख्त निगाहों से डोंगरा की ओर देखा

, फिर जय से बोली-

''तुम्हीं कुछ बताओ। क्या हो रहा था यहां पर

?"

जय ने डॉली की ओर देखा। उसकी आंखों में भय और उलझन दोनों के मिले-जुले भाव थे।

''ये नींद में कांप रहा था।

"-राज बोला-

''मैंने इसे जगाने की कोशिश की तो ये मेरा ही गला दबाने लगा।

"

''मैंं...

"-जय अटकते से स्वर में बोला-

''तुम्हारा गला दबा रहा था

?"

''हां। और वो भी पूरी लगन और मेहनत के साथ।

"

जय ने एक बार अपने चारों ओर देखा

, फिर उसने गहरी सांस ली।

''थैंक गॉड!

"-वो बोला-

''वो सब सपना ही था।

"

''कैसा सपना

?"-राज बोला।

''कल तुमने सपना देखा था।

"-पीछे से अनुराग बोला-

''आज इसने देख लिया। लगता है इस मकान का सबसे ज्यादा असर तुम लोगों पर ही पड़ा है।

"

''क्या देखा तुमने

?"-अनुराग की बात को नजरअंदाज करते हुए

राज

जय से बोला।

''वो काफी अजीब सपना था

"-जय ऐसे बोला

, जैसे अभी भी नींद से पूरी तरह जगा न हो।

''कैसा अजीब सपना

?"-इस बार अनुराग ने उससे सवाल किया।

''मैंने देखा

"-जय जैसे शून्य में ताकते हुए बोला-

''कि मैं नींद से उठकर नीचे गया। नीचे हॉल पूरा खाली था। फिर मैं रात में ही दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। सब कुछ इतना असली जैसा लग रहा था कि...कि मुझे अब भी लग रहा है

, जैसे वो सब सच में हुआ हो। मैं दरवाजा खोलकर बाहर तो निकल रहा था लेकिन मेरा मन...मन मुझे चीख-चीखकर बाहर जाने से मना कर रहा था। लेकिन मैं अपने ही दिमाग की बात न मानकर दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। और बाहर...।

"-कहते-कहते जय खामोश हो गया।

''बाहर क्या

?"-अनुराग सस्पेंस भरे स्वर में बोला।

''बाहर पूरा मैदान खाली था। कुछ देर मैं वहीं खड़ा रहा। फिर अचानक...अचानक बाहर बहुत सारे कटे हुए हाथ

, पैर

, सिर वगैरह दिखाई देने लगे।

"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

''फिर

?"-राज की गम्भीर आवाज ने सन्नाटे को भंग किया।

''वो...वो जमीन से निकल रहे थे...मैं उन्हें देखकर चीखना चाहता था। लेकिन मैं चीख नहीं पा रहा था। लग रहा था

, जैसे...जैसे किसी ने मेरा गला पकड़ लिया हो...। फिर मुझे अपने गले पर दो हाथ महसूस हुआ...मैंने देखने की कोशिश की कि वो हाथ किसके थे...अंधेरे में मेरे सामने एक आदमी ऐसे प्रगट हुआ...जैसे...जैसे धुएं से बन रहा हो...। वो मेरा गला दबाने की कोशिश कर रहा था। वो बहुत भयानक था।

"-जय ने जोर से झुरझुरी ली और आंखें मूंद लीं।

''फिर?"-डॉली बोली।

''फिर मैंने उसके चंगुल से आजाद होने के लिए दोनों हाथों से उसका गला पकड़ लिया। मैं उसे जान से मार देना चाहता था। इतना गुस्सा...इतना आवेश...मैंने कभी महसूस नहीं किया। मैं पूरी ताकत से उसका गला दबा रहा था। फिर अचानक मेरी नींद खुल गई।

"

राज ने डॉली की ओर देखा। डॉली का चेहरा भी बेहद गम्भीर हो गया था।
 
कमरे में रिंकी और मोहिनी को छोड़कर सब लोग उपस्थित थे। मोहिनी को रिंकी पर बेहद प्यार आ रहा था। स्टोर रूम में रिंकी के मिलने के बाद से वो उसका ऐसे ख्याल रख रही थी

, जैसे रिंकी सचमुच ही उसकी छोटी बहन हो।

''भूल जाओ इसे।

"-राज बोला-

''वो एक डरावना सपना था

, बस।

"

राज जय को आश्वासन तो दे रहा था लेकिन उसे खुद अपनी आवाज खोखली महसूस हो रही थी।

जय ने राज की ओर देखा और बोला-

''हां। बस डरावना सपना ही तो था। जैसे तुमने देखा था।

"

राज उसकी बात के जवाब में कुछ नहीं कह सका।

उस रात फिर उनमें से कोई भी सो नहीं पाया।

तीसरा दिन

प्रीति अपने कमरे से बाहर आई।

बाकियों की तरह वो भी रात भर सो नहीं पाई थी। वहां हो रही अजीब घटनाओं ने सबका जीना हराम कर रखा था।

बाहर उसे गलियारे में पड़ी कुर्सी में अनुराग बैठा दिखाई दिया।

अनुराग के साथ जय को निगरानी ड्यूटी पर होना चाहिए था।

"जय कहां है

?"-प्रीति उसके सामने खड़े होकर अपने बालों को हाथ से कुरेदते हुए बोली।

"जय और डॉली नीचे गए हैं।"-अनुराग बोला-"डॉली सबके लिए चाय बना रही है। जय भी उसी के साथ गया है।"

प्रीति सीढिय़ों से नीचे उतरी। गलियारे के अंत में किचन का दरवाजा खुला दिखाई दे रहा था और डॉली की पीठ दिख रही थी

, जो कि चाय बनाने में व्यस्त थी।

प्रीति

'मीटिंग रूम

' में पहुंची। उसकी आंखें जय को तलाश रहीं थीं।

उसे ये देखकर हैरानी हुई कि बाहर का दरवाजा खुला हुआ था। सूर्योदय में अभी समय बाकी था। बाहर अब भी अंधेरा छाया हुआ था।

प्रीति बाहर आई तो उसने पाया कि जय दरवाजे के आगे सीढिय़ों पर बैठा हुआ सामने देख रहा था।

प्रीति भी उसके बगल में ही बैठ गई।

जय ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की।

प्रीति कुछ देर उसी की तरह सामने देखती रही

, जिधर वो देख रहा था। सामने वही छोटे से मैदाननुमा आंगन के पार वही कच्चा रास्ता दिख रहा था

, जिससे वो लोग करीब दो दिन पहले वहां आए थे।

अंधेरे के कारण उस रास्ते को देखने पर डरावना-सा अहसास हो रहा था।

सुबह तड़के का समय होने के कारण वातावरण में ठण्ड भी अधिक थी। प्रीति को चिंता हुई। जय जाने कब से वहां बैठा था।

''क्या हुआ

?"-वो जय की बांह पकड़ते हुए प्यार भरे स्वर में बोली।

''कुछ नहीं।

"-जय ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया।

जय के स्वर में गम्भीरता को महसूस कर प्रीति चौंकी। आम तौर पर जय कम ही गम्भीर रहता था। हर बात को मजाक में उड़ा देना तो उसकी आदत में शुमार था।

''कुछ तो बात है।

"-प्रीति का स्वर भी गम्भीर हो गया-

''जो तुम मुझे बता नहीं रहे।

"

जय ने गम्भीर निगाहों से प्रीति की ओर देखा

, फिर सामने देखता हुआ बोला-

''मुझे लगता है मैंने तुम सबको यहां लाकर बहुत गलत किया है।

"

''क्या

?"

''हां।

"

''क्यों

?"

''यहां जो कुछ भी हो रहा है...सब काफी अजीब है। और भयानक भी। अब तो मुझे भी डर लगने लगा है।

"

प्रीति को बरबस ही हंसी आ गई।

''क्या हुआ

?"-जय ने चौंक कर उसकी ओर देखा।

''कुछ नहीं।

"-प्रीति हंसी रोकने की कोशिश करती हुई बोली।

''नहीं

, बताओ न

, मैंने हंसने वाली कौन सी बात कह दी

?"

''तो और क्या कहा

? डर-सा लग रहा है। अरे

, ये तो मुझे कहना चाहिए था। तुम मर्द होकर इस तरह डरने की बात करोगे तो हंसी तो आएगी ही।

"

जय की नजरें फिर सामने की ओर चली गईं।

''मर्द-औरत वाली बात नहीं है।

"-वो खोए-खोए से स्वर में बोला-

''मुझे लग रहा है जैसे...जैसे ये ऐसी जगह है जहां किसी को नहीं होना चाहिए। हम लोगों ने यहां आकर गलती कर दी है। और इस गलती का सबसे ज्यादा बोझ मुझी पर है क्योंकि मैं ही तुम सबको यहां लेकर आया हूं।

"

''कम ऑन!

"-प्रीति उसकी बांह पकड़कर उससे और भी ज्यादा सटते हुए बोली-

''दो दिन तो बिता चुके हैं हम यहां। आज तो आखिरी दिन है। कल रिंकी के गायब होने पर मैं सचमुच बहुत डर गई थी लेकिन अब तो वो भी मिल गई है। बस

24 घंटों की बात और है। फिर हमें इस जगह से छुटकारा भी मिल जायेगा और हम अमीर भी हो जायेंगें। हमारे पास पैसा ही पैसा होगा। मैं

, तुम

, अनुराग और मोहिनी

, जहां चाहेंगें

, वहां घूमने जाएंगें। जो चाहेंगें

, वो करेंगें। और क्या पता

, हमें अपने इस सफर में दो और नए साथी मिल जाएं। अनुज और डॉली भी हमारे साथ चलने के लिए राजी हो जाएं।

"

''वो राजी नहीं होंगें। और फिलहाल सबसे बड़ा बात तो यही होगी कि हम यहां से किसी तरह सुरिक्षत निकल जाएं।

"

''तुम भी पता नहीं क्या-क्या सोच रहे हो। अरे

, एक-दो डरावने सपने देखकर कोई मर थोड़े ही जाता है।

"-कहते हुए प्रीति ने सिर उसके कंधे पर टिका दिया।

जय कुछ नहीं बोला। वो सामने अंधेरे में डूबे उस रास्ते को देखता रहा

, जिससे वो उस मनहूस जगह पर आये थे।

प्रीति का कहना भी सही था।

एक-दो डरावने सपने देखकर कोई मर थोड़े ही जाता है।

सुबह हो चुकी थी।

वो सब मीटिंग रूम में बैठे नाश्ता कर रहे थे। सिवाय रिंकी और मोहिनी के।

रिंकी आज भी अभी तक नीचे नहीं आई थी। मोहिनी भी शायद उसी के पास डटी हुई थी।

''मोहिनी कहां हैं

?"-अनुराग नाश्ता करते हुए बोला-उसे नाश्ता नहीं करना क्या

?"

''रिंकी और अपने लिए नाश्ता लेकर ऊपर गई थी।

"-प्रीति बोली-

''कह रही थी रिंकी कुछ भी खाने से मना कर रही है। उसे बुखार भी है।

"

अनुराग खाते खाते रुक गया। उसने राज की ओर देखा।

''अभी तक उसका बुखार नहीं उतरा

?"-राज डॉली से बोला।

''मोहिनी तो यही कह रही थी। कह रही थी उसके साथ ही नाश्ता करेगी और जिद करके उसे भी अपने साथ ही कुछ खिला देगी।

"

''कल से बुखार है।

"-प्रीति चिंतित स्वर में बोली-

''मेरे ख्याल से...हमें उसका टेस्ट करवा लेना चाहिए।

"

''टेस्ट

?"

''कोरोना टेस्ट।

"

कमरे में सन्नाटा-सा छा गया।

''रिंकी को

"-डोंगरा बोला-

''कोरोना कैसे हो सकता है

?"

''वो अभी पिछले दिनों

"-जय डोंगरा से बोला-

''किसी ऐसे संक्रमित व्यक्ति के सम्पर्क में आई थी क्या

? या आप...

?"

''नहीं।

"-डोंगरा परेशान-सा दिखने लगा-

''कुछ लोग शहर में पॉजीटिव मिले हैंं लेकिन मेरे तो ऑफिस की छुट्टी चल रही थी। घर पर ही रहकर ऑनलाइन काम देख रहा था। बहुत कम लोगों से मिलना-जुलना हुआ है और ऐसे किसी भी व्यक्ति के पॉजीटिव मिलने की खबर नहीं है

, जिससे मेरी मुलाकात हुई हो।

"

''और रिंकी

?"

''वो तो वैसे भी ज्यादातर समय घर पर ही रहती है। हां

, दूधवाले वगैरह आते हैं तो उनसे सामान जरूर लेती है लेकिन उनके भी किसी के पॉजीटिव होने जैसी जानकारी अब तक मुझे नहीं है।

"

''फिर उसे अचानक ये बुखार कैसे आ गया

?"-अनुराग बोला।

''और आ भी गया

"-डोंगरा परेशान सा बोला-

''तो हम उसका कोरोना टेस्ट कैसे करवा सकते हैं

? यहां तो हमारे पास कोई साधन भी नहीं हैं।

"

''आज आखिरी दिन है।

"-जय धीमे से बोला-

''ये दिन गुजार कर हम इस मुसीबत से छुट्टी पा सकते हैं। फिर हम आराम से शहर वापस लौटकर रिंकी की जांच करा सकते हैं।

"

अनुराग ने जय को ऐसे देखा

, जैसे उसे अपनी आंखों पर यकीन न आ रहा हो।

''क्या हुआ

?"-उसे ऐसे अपनी ओर देखते पाकर जय बोला।

''आखिरी दिन

? आखिरी दिन

? आखिर कब तक हम यहां हाथ पर हाथ धर कर बैठे आखिरी दिन का इंतजार करते रहेंगें

? कब तक

? जब तक सचमुच में हमारा आखिरी दिन नहीं आ जाता

?"-कहते हुए उसने मेज पर इतनी जोर से हाथ मारा कि मेज पर रखी प्लेटें तक उछल गईं। गुस्से में उसकी आवाज भी तेज हो गई थी।

''आखिर तुम इतने नाराज क्यों हो रहे हो

?"-जय बोला-

''अगर तुम लोग अभी चलना चाहते हो तो अभी चलो यहां से। मैंने कब मना किया है

? मैं तो कल भी गया था। लेकिन रास्ता बंद होने के कारण वापस लौट कर आना पड़ा...।

"

''मुझे तुम्हारी उस बात का भी भरोसा नहीं है।

"-अनुराग चीख कर बोला-

''हो सकता है तुमने और प्रीति ने ये प्लान बनाया हो

, जिससे हम यहां तीन दिन तक रूक सकें और वापस लौटकर हमें मनगढ़ंत कहानी सुना दी।

"

''क्या बकवास कर रहे हो

?"-इस बार जय भी उछलकर खड़ा हो गया-

''तुम्हें लगता है हम तुम्हारे साथ धोखा कर रहे हैं

? तो जाओ जाकर देख लो। रास्ते में वो पेड़ अब भी गिरा होगा। वहां हमारी कार भी खड़ी होगी। फिर तुम उस पेड़ के ऊपर से चढ़कर सड़क तक चले जाना। हो सकता है तुम्हारी किस्मत हमसे अच्छी हो और तुम्हें कोई गाड़ी मिल जाए। गाड़ी न भी मिले तो तुम पैदल ही चले जाना। क्योंकि मैं और प्रीति तो झूठ बोलकर तुम्हें यहां फंसाने की कोशिश कर रहे हैं न...

?"

''देखो

"-राज उन दोनों के बीच में आते हुए बोला-

''ये समय गुस्से से नहीं बल्कि शांति से काम लेने का है। हम सभी यहां फंसे हुए हैं। जो भी कदम उठाना है

, सोच समझकर उठाना है।

"

''मोहिनी कहां है

?"-अनुराग बोला-

''उसे बुलाकर लाओ।

"

''तुम्हें एकदम से मोहिनी की इतनी ज्यादा फिक्र कैसे होने लगी

?"-प्रीति बोली

, जो कि अनुराग द्वारा उस पर और जय पर लगाए गए आरोप से साफ नाराज दिख रही थी-

''तुम तो हमेशा उस पर चिल्लाते ही रहते हो।

"

''अगर उस रिंकी को कोरोना है तो उसके पास किसी को नहीं रहना चाहिए।

"-अनुराग अब भी गुस्से में लग रहा था लेकिन ऐसा लग रहा था कि वो अपनी आवाज को संयमित रखने की कोशिश कर रहा था-

''मोहिनी को उसके पास छोडऩा खतरनाक है।

"

''लेकिन वो तो कल से ही उसके साथ है।

"-डॉली बोली-

''उस समय हमें ऐसा कोई ख्याल ही नहीं आया।

"

''वो सब मैं नहीं जानता।

"-अनुराग सख्त स्वर में बोला-

''मोहिनी को रिंकी के पास से लेकर आओ। दोनों को आइसोलेट कर दो। लेकिन अलग-अलग। मैं मोहिनी को अब उस रिंकी के साथ एक पल भी नहीं रहने देना चाहता।

"

''ठीक है।

"-डॉली सीढिय़ों की ओर बढ़ते हुए बोली-

''मैं मोहिनी से बात करती हूं।

"
 
कुछ देर बाद जब डॉली वापस लौटी

, तब भी सब मीटिंग रूम में वैसे ही बैठे थे

, जैसे वो उन्हें बैठे छोड़ गई थी। सबके चेहरे पर बारह बजे हुए थे।

अनुराग ने गर्दन घुमाकर डॉली पर नजर डाली। फिर उसे अकेली देखकर बोला-

''मोहिनी कहां है

?"

''मोहिनी

"-डॉली का स्वर अज्ञात आशंका से कांप रहा था-

''ऊपर नहीं है।

"

'

'क्या

?"-अनुराग का मुंह खुला-का-खुला रह गया। वो हैरत से डॉली को देखता रह गया।

''मोहिनी ऊपर नहीं है।

"-डॉली ने अपनी बात दोहराई-

''मैंने रिंकी से बात की। उसने कहा कि उसने भी काफी देर से मोहिनी को नहीं देखा। फिर मैंने ऊपर हर जगह देख लिया। सिवाय उस ताले वाले कमरे के। लेकिन मोहिनी कहीं भी नहीं दिखी। जबकि सुबह जब वो रिंकी को नाश्ता कराने की बात कह कर उसके लिए नाश्ता लेकर ऊपर गई थी

, उसके बाद से मैंने उसे नीचे आते नहीं देखा है।

"

''हममें से किसी ने नहीं देखा है।

"-प्रीति भी चिंतित स्वर में बोली-

''उसे ऊपर ही होना चाहिए।

"

''लेकिन वो ऊपर नहीं है।

"

अनुराग उठा और जमीन रौंदते हुए सीढिय़ों की ओर बढ़ा। डॉली उसके रास्ते से हट गई। वो ऊपर पहुंचा। उसने भी वहां का कोना-कोना छान मारा लेकिन मोहिनी का कहीं पता नहीं चला।

उस दौरान बाकी लोगों ने भी घर के निचले हिस्से में यहां तक कि आसपास और स्टोर रूम में भी झांक कर देख लिया लेकिन मोहिनी कहीं नजर नहीं आई।

कल रिंकी और आज मोहिनी के इस तरह गायब हो जाने से सभी के होश उड़े हुए थे।

करीब डेढ़-दो घंटे तक आसपास मोहिनी को तलाश करने के बाद थक-हारकर वे सब फिर मीटिंग रूम में इकट्ठे हुए।

''ये सब क्या हो रहा है

?"-अनुराग बोला लेकिन अब उसके स्वर में गुस्सा नहीं हताशा और भय झलक रहा था।

''कल रिंकी

"-प्रीति बोली-

''और आज मोहिनी इस तरह गायब हो गई। रिंकी तो फिर भी मिल गई लेकिन मोहिनी तो कहीं मिल ही नहीं रही।

"

अनुराग कहना चाहता था कि काश

, रिंकी मिली ही न होती लेकिन उसने अपने होंठ भींच लिए।

''अब हम क्या करें

?"-जय असहाय भाव से सिर हिलाते हुए बोला-

''कहां ढूंढें मोहिनी को

?"

''स्टोर रूम।

"-डॉली बोली।

''स्टोर रूम में तो देख चुके हैं। वो वहां नहीं है।

"

''हमें दोबारा स्टोर रूम की तलाशी लेनी चाहिए। शायद हमें कोई काम की चीज मिल जाए।

"

''पागल हुई हो

?"-डोंगरा बोला-

''उस कॉफिन मैन ने हमें उस स्टोर रूम में जाने से मना किया था।

"

''लेकिन रिंकी हमें वहीं मिली।

"-प्रीति बोली।

''वो अलग बात है। रिंकी नहीं मिल रही थी तो हम सब काफी डर गए थे। वही एक जगह रह गई थी

, जहां हमने उसे नहीं ढूंढा था। और शुक्र है वो हमें कम से कम वहां मिली तो। लेकिन अब बिना किसी वजह के उस स्टोर रूम में जाने का कोई मतलब नहीं है।

"

''हम बिना वजह नहीं जा रहे।

"-डॉली सख्त स्वर में बोली-

''अब हम दो बार स्टोर रूम में जा ही चुके हैं तो तीसरी बार जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता। क्या पता हमें वहां कोई काम की चीज मिल ही जाए। कोई ऐसा सुराग

, जो हमें मोहिनी के इस तरह गायब होने के बारे में कुछ बता सके। आखिर रिंकी भी तो हमें इतने रहस्यमयी ढंग से वहीं मिली थी।

''डॉली सही कह रही है।

"-अनुराग ने डॉली की बात पर सहमति व्यक्त की।

डोंगरा ने फिर कुछ कहने के लिए मुंह खोला लेकिन फिर उसने हथियार डालने वाले अंदाज में होंठ भींच लिए।

''किसी को यहां रिंकी का ध्यान रखने के लिए रूकना होगा।

"-जय उठते हुए बोला

, फिर उसने प्रीति से कहा-

''तुम रिंकी के पास रूक जाओ।

"

प्रीति ने सहमति में सिर हिलाया।

''नहीं।

"-अनुराग बोला-

''तुम अकेली यहां मत रूको। तुम्हारे साथ कोई रहना चाहिए। तुम!

"-वो जय से बोला-

''तुम यहीं प्रीति के साथ रूको। हम सब स्टोर रूम में देख कर आते हैं।

"

''और रिंकी के करीब मत जाना।

"-डॉली बोली-

''अगर जाना पड़े तो किसी चीज का मास्क बनाकर चेहरे को ढंक लेना और उससे थोड़ा दूर ही रहना। उसे भी बता देना कि हमें शक है कि वो पॉजीटिव हो सकती है।

"

''ठीक है।

"-जय बोला।

फिर बाकी सभी लोग वहां से निकलकर स्टोर रूम की ओर बढ़ गए।

स्टोर रूम बहुत बढ़ा था और उसमें बहुत सारा सामान भरा हुआ था। कुछ डिब्बे वगैरह तो इतने भारी थे कि दो लोग मिलकर भी नहीं उठा पा रहे थे। और धूल इतनी ज्यादा थी कि एक चीज हिलाओ तो धूल का गुबार उठ खड़ होता था

, जिससे बचने के लिए सबको बाहर वहां से बाहर निकलना पड़ता था।

''तौबा!

"-डोंगरा हांफता सा बोला-

''यहां तो पता नहीं कौन-कौन सी बीमारी हो जाए आदमी को। और रिंकी उतनी देर यहां पड़ी रही थी।

"

''उससे ज्यादा बड़ा सवाल ये है कि वो बेहोशी की हालत में बंद स्टोर रूम के अंदर कैसे पहुंच गई

? वो भी तब

, तब स्टोर रूम के दरवाजे पर ताला लगा था।

"-डॉली बोली।

कोई कुछ न बोला।

बोलता भी क्या

? उनमें से किसी के पास उस सवाल का जवाब नहीं था।

वे लोग फिर हिम्मत करके स्टोर रूम में घुसे। इस बार सामान के पीछे एक बड़ी सी पेटी में अनुराग को एक बेहद पुरानी लेकिन बड़े आकार की किताब मिल गई।

''देखो

, मुझे क्या मिला।

"-अनुराग बोला।

सबकी नजरें उसकी ओर घूम गईं। उसके हाथ में वो अजीब सी किताब देख कर सभी को आश्चर्य हुआ।

''ये किताब कैसी है

?"-डोंगरा बोला।

''ये तो इसे पढ़कर ही पता चलेगा।

"-अनुराग गहरी सांस लेकर बोला।

''चलो फिर

"-काफी देर से वहां जुते होने के बाद भी अब तक कुछ और कारआमद नहीं ढूंढ पाने के कारण हार मानते हुए राज ने कहा-

''इसे ही देखते हैं। क्या बला है ये

?"

वो सचमुच बला ही थी।

वे सब उस किताब को लेकर

'मीटिंग रूम

' में सिर से सिर जोड़े बैठे थे। किताब का धेला अक्षर उनके पल्ले नहीं पड़ा था। वो किताब पता नहीं किस भाषा में थी लेकिन इतना तो तय था कि वो बहुत बहुत पुरानी थी और भूत-प्रेतों से सम्बन्धित थी क्योंकि उसमें कई जगह पर डरावने चित्र बने हुए थे

, जिनमें से ज्यादातर चित्र लोगों को भयानक ढंग से मारने

, भूत-प्रेत

, शैतानों के और अजीबोगरीब

, रहस्यमयी व डरावनी तंत्र क्रियाओं के चित्र थे।

लेकिन उस किताब में ऐसा भी कुछ था

, जो वे समझ सकते थे।

उसमें अलग से कई तस्वीरें

, अखबारों की कटिंग और हस्तलिखित नोट्स थे

, जिनका वे लोग अध्ययन कर रहे थे।

जैसे-जैसे वे लोग उन नोट्स

, अखबारों की कटिंग वगैरह को पढ़ते जा रहे थे

, उनकी आंखें फैलती जा रहंी थीं।

''तुमने कहा था

"-प्रीति एक अखबार की कटिंग को गौर से देखते हुए डॉली और राज से बोली-

''कि यहां आते समय रास्ते में तुम्हें एक पेट्रोल पम्प मिला था

, जिसके अटेंडेंट ने तुम लोगों से काफी अजीब व्यवहार किया था

?"

''हां

, हमने उससे एक कैन में पेट्रोल भी लिया था, जो अब भी कार में रखा है"-डॉली बोली-

''क्यों

? क्या हुआ

?"

प्रीति कुछ देर तक हाथ में थमी उस कटिंग को देखती रही

, फिर उसने वो कटिंग डॉली की ओर बढ़ा दी।

उसके चेहरे की ओर देखते हुए डॉली ने कटिंग उसके हाथ से ली

, फिर उसे पढऩा शुरू करने ही वाली थी कि उस पर छपी तस्वीरों को देख कर उसकी आंखें फैल गईं।

खबर की हैडिंग थी-

दुर्घटना में पेट्रोल पम्प जलकर स्वाहा

पेट्रोल पम्प अटेंडेंट की भयावह मृत्यु

खबर के साथ तीन तस्वीरें छपीं थीं। एक जले हुए पेट्रोल पम्प की थी

, जो कि वही पेट्रोल पम्प लग रहा था

, जहां से उन लोगों ने आते टाइम रास्ते में पेट्रोल भरवाया था। दूसरी तस्वीर एक बुरी तरह जली हुई लाश की थी और तीसरी...।
 
तीसरी तस्वीर उसी पेट्रोल पम्प अटेंडेंट की थी

, जिससे उन्होंने कार में पेट्रोल भरवाया था।

डॉली ने फटाफट पूरी खबर पढ़ डाली।

20

अगस्त

1982

। शहर की सीमा के निकट के स्थित एक पेट्रोल पम्प में कल रात लगी भीषण आग में एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई। मृतक की पहचान पेट्रोल पम्प पर ही अटेंडेंट के रूप में कार्य करने वाले जगवीर सिंह के रूप में हुई है। आग किन परिस्थितियों में लगी

,

ये पता नहीं चल पाया है हालांकि मृतक के साथियों ने पुलिस को दिए गए बयान में बताया है कि जगवीर सिंह ने खुद ही पेट्रोल पम्प को आग लगा कर आत्महत्या की हो सकती है। पुलिस को घटनास्थल से ऐसे कुछ प्रमाण भी मिले हैं। मृतक के साथ काम करने वाले अन्य कर्मचारियों का कहना है कि जगवीर सिंह पिछले कई दिनों से पागलों जैसा बर्ताव कर रहा था। वो अक्सर भूत-प्रेतों की बातें करने लगा था। वो कुछ दिनों पूर्व वहां से थोड़ी दूर स्थित 'मौत का घर' के नाम से जाने जाने वाले एक मकान में गया था

,

जिसे इलाके में अभिशप्त माना जाता है। उसके बाद से ही उसका मानसिक संतुलन बिगड़-सा गया था। वो आए दिन अपने ही साथियों से झगडऩे लगा था और एक साथी पर तो उसने जानलेवा हमला भी किया था। साथियों से लड़ते समय वो पेट्रोल पम्प को जलाने की धमकी भी देता था। हाल की घटना को देखते हुए कहा जा सकता है कि उसने अपनी धमकी को पूरा कर दिखाया। लेकिन उसने स्वयं को भी क्यों जला लिया

,

ये स्पष्ट नहीं हो पाया है। पुलिस को घटनास्थल से कोई सुसाइड नोट वगैरह बरामद नहीं हुआ है

,

जिससे आत्महत्या की पुष्टि हो सके। पुलिस घटना की जांच कर रही है।

''क्या है

?"-राज ने कटिंग लेने के लिए डॉली की ओर हाथ बढ़ाया।

उसे विस्फारित नेत्रों से देखते हुए डॉली ने कटिंग राज की ओर बढ़ा दी। कटिंग पर छपी तस्वीरों पर नजर पड़ते ही डॉली की तरह राज को भी झटका लगा। उसने एक बार डॉली की ओर देखा

, फिर जल्दी-जल्दी पूरी खबर पढ़ डाली।

उसे पढऩे के बाद राज को अपने दिमाग में सन्नाटा छाता-सा महसूस हुआ था।

क्या मतलब था उस खबर का

?

पेट्रोल पम्प पर उस आदमी को उसने और डॉली नेे अपनी आंखों से देखा था। उसने उनकी कार में पेट्रोल भी भरा था।

लेकिन उस खबर के अनुसार तो वो शख्स करीब

38 साल पहले ही मर चुका था।

''क्या ये वही है

?"-प्रीति बोली।

''हां

?"-राज ऐसे चौंका

, जैसे भूल ही गया हो कि उसके अलावा भी वहां कोई और शख्स मौजूद था।

''ये पेट्रोल पम्प अटेंडेंट

, जिसके बारे में छपा है

, क्या ये वही है

, जिससे तुम लोगों ने पेट्रोल भरवाया था

?"

राज उस सवाल का जवाब हां में बिल्कुल नहीं देना चाहता था लेकिन उसका सिर अपने-आप में स्वीकृति के अंदाज में ऊपर-नीचे हुआ।

प्रीति ने डॉली की ओर देखा। उसका गम्भीर चेहरा देखकर वो साफ था कि वो भी राज की बात से सहमत थी।

''दिखाओ मुझे!

"-अनुराग ने छीनने के अंदाज से राज के हाथ से अखबार की कटिंग ले ली और फिर फटाफट पढ़कर उस पुरानी रहस्यमयी किताब की ओर उछालते हुए बोला-

''ये बकवास है।

"

''बकवास है

?"-प्रीति बोली-

''क्या मतलब बकवास है

?"

''और नहीं तो क्या

?"-अनुराग उससे भी ज्यादा तीखे स्वर में बोला-

''तुम लोग कहना क्या चाहते हो

? और साबित क्या करना चाहते हो

?"

''हम लोग कुछ कहना या साबित करना नहीं चाहते।

"-राज शांत स्वर में बोला-

''ये पेट्रोल पम्प अटेंडेंट वही है

, जो हमें रास्ते में मिला था। जिससे हमने अपनी कार में पेट्रोल भरवाया था।

"

''ये तुम इतने दावे से कैसे कह सकते हो

?"-अनुराग उखड़े स्वर में बोला-

''ये बहुत पुराना ब्लैक एंड व्हाइट अखबार है। तस्वीर भी इतनी फीकी है। हो सकता है

, बल्कि हो क्या सकता है यही बात है

, कि तुम लोग जिस आदमी से मिले

, वो इत्तफाक से इस शख्स जैसा दिखता था

, जिसकी सालों पहले उस पम्प पर दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी।

"

वो कटिंग अब जय ने उठा ली थी और उसे पढ़ रहा था। उसके पीछे से डोंगरा भी झांकते हुए पढ़ रहा था।

''और इत्तफाक से वो शख्स पेट्रोल पम्प पर भी काम करता है। और इत्तेफाक से वो शख्स अजीब पागलपन भरी बातें भी करता है।

"-राज बोला।

''ये तो शकल से ही भूत दिख रहा है।

"-जय कटिंग को पढऩे के बाद बोला।

''तुम कहना क्या चाहते हो

?"-अनुराग का स्वर तीखा हो गया-

''कि तुम लोगों ने एक भूत से पेट्रोल भरवाया

?"

राज कुछ नहीं बोला। उसने एक बार डॉली की ओर देखा

, फिर वापस उस किताब से निकली अखबारों की कटिंग्स

, तस्वीरों और अन्य कागजों का पोस्टमार्टम करने में जुट गया।

उन सब चीजों की पड़ताल करते हुए कब सूर्यास्त होने को आया

, उन्हें पता ही नहीं चला।

उन कटिंग्स

, नोट्स वगैरह में उन्होंने जो कुछ भी पढ़ा

, उसने उनकी समस्या को कम करने की जगह बढ़ाने का ही काम किया था।

उन्हें कटिंग्स व नोट्स के अनुसार वो घर उस इलाके में

'मौत का घर

' के नाम से मशहूर था।

वहां के निवासी उस घर की छाया से भी डरते थे। उसका नाम भी जुबान पर लानेे से घबराते थे।

उस मनहूस घर से जुड़े कई भयावह किस्से

, आपबीतियां और पुरानी घटनाएं उन अखबारों की कटिंग्स व नोट्स में दर्ज थीं। और साथ में कई तस्वीरें भी थीं

, जो उनमें से कई बातों की पुष्टि भी करती थीं।

कुछ कटिंग्स व नोट्स में

188090 के दशक में-जब भारत पर अंग्रेजों का शासन था-वहां एक बेहद क्रूर ब्रिटिश अधिकारी के रहने का जिक्र था

, जिसने वहां के लोगों पर अत्याचारों की सीमाएं पार कर दी थीं। एक कटिंग के अनुसार उस अंग्रेज अधिकारी ने एक बार किसी मामूली बात पर भड़क कर गांव के कई लोगों को मरवा डाला था और उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके उसी मकान के सामने वाले हिस्से में जमीन में दफन करवा दिए थे।

एक हस्तलिखित नोट्स में तो उस नृशंसतापूर्ण घटना का इतना वीभत्स विवरण था कि उसे पढ़कर दिल दहल जाता था।

पूरे आंगन में कटे हुए अंग बिखरे हुए थे। ब्रिटिश अफसर उनके बीच खड़ा हाथ में कुल्हाड़ी लेकर बचे हुए शरीर के टुकड़े काटते हुए किसी पिशाच से कम नहीं लग रहा था। सुबह से उसने इन बेचारे गांव वालों पर अत्याचारों की सीमा पार कर दी थी लेकिन उन्हें तड़पा-तड़पाकर मारने के बाद भी उसके अंदर की हैवानियत को अब तक तृप्ति नहीं मिली थी। वो दरिंदा अब उनकी लाशों के साथ बर्बरता करके शैतान को खुश करने की कोशिश कर रहा था।

इतना ही नहीं

, उसमें कुछ बहुत पुरानी श्वेत-श्याम तस्वीरें भी थीं

, जिसमें उसी घर के आंगन में कुछ अंग्रेज खड़े नजर आ रहे थे और आंगन में लाशें व कटे हुए अंग बिखरे हुए थे। तस्वीर में वो घर नये जैसा तो दिख रहा था लेकिन पहचान में आ रहा था। लेकिन उस घर के सामने के मैदान का जो नजारा था

, वो दिल दहला देने वाला था। कुछ तस्वीरों में तो वो अंग्रेज अधिकारी हाथ की दो उंगलियां से विक्टरी का निशान बनाते हुए कैमरे की ओर मुंह करके मुस्कुरा भी रहा था।

उस खबर में उस अधिकारी का नाम भी था।

रॉबर्ट कीन।
 
हेयर लाइज रॉबर्ट कीन

हू लिव्ड अपॉन ह्यूमन ब्लड

कब्रिस्तान में मिली उस कब्र पर अंकित वो शब्द जैसे किसी हथौड़े की तरह उनके मस्तिष्क से टकराए।

सबने बारी-बारी से उन तस्वीरों को देखा

, उन नोट्स को पढ़ा।

सबकी जबान पर जैसे ताले लग गए थे।

''इसे देख कर तो लग रहा है

"-जय उस तस्वीर को देखते हुए बोला

, जिसमें वो अंग्रेज अफसर कैमरे की ओर देखते हुए मुस्कुरा रहा था-

''कि सेल्फी का आविष्कार इसी बंदे ने किया होगा।

"

किसी को हंसी नहीं आई।

''ये...ये कैसे हो सकता है

?"-प्रीति बोली-

''कोई इतना क्रूर

, इतना बेरहम कैसे हो सकता है

?"

''इससे भी ज्यादा क्रूर और बेरहम हुए हैं दुनिया मेें।

"-राज

गम्भीर स्वर में बोला।

''ओ माई गॉड!

"-एक कटिंग को देखते हुए जय के मुंह से निकला।

''क्या हुआ

?"-अनुराग ने चौंक कर वो कटिंग उसके हाथ से ले ली।

वो कटिंग भी उसी खबर की लेकिन शायद दूसरे अखबार की थी। उस खबर के अनुसार उस अंग्रेज अधिकारी ने वहां उस रक्तपात भरी भयावह घटना को अंजाम देने के बाद एक बड़े ताबूत में वो उन लोगों के टुकड़े भरवा दिए थे लेकिन टुकड़े इतने सारे थे कि आधे से भी कम में पूरा ताबूत भर गया था।

फिर उस अंग्रेज अधिकारी ने बाकी टुकड़ों को तो वहीं घर के सामने की जमीन में दफना दिया था लेकिन कटे हुए अंगों से भरे उस ताबूत का क्या हुआ

, ये आज तक किसी को पता नहीं चल पाया था।

उस तस्वीर में वो ताबूत भी दिख रहा था।

वो बिल्कुल वैसा ही ताबूत था

, जैसा वहां पहले दिन उन्होंने उसी कमरे में देखा था।

जिससे खुद को

'कॉफिन मैन

' बताने वाला वो रहस्यमयी शख्स निकला था। उसी ने उनसे वो ताबूत उठवाकर बाहर उस केबिन में रखवाया था।

तभी प्रीति की चीख सुनकर सब चौंक उठे।

प्रीति खुले दरवाजे से बाहर मैदान में कुछ देखकर चीखी थी।

''क्या हुआ

?"-जय बोला

, फिर तुरंत ही उसकी नजर सामने मैदान पर पड़ी तो उसे अपने सवाल का जवाब भी मिल गया।

दरवाजे से थोड़ी ही दूरी पर आंगन में बीचों-बीच ताबूत रखा हुआ था।

वही ताबूत

, जो उन्होंने वहां आने के पहले दिन देखा था।

जिसे वे लोग बड़ी मुश्किल से उठाकर उस केबिन में रख पाए थे।

वो ताबूत इस वक्त दरवाजे की सीध में थोड़ी दूरी पर जमीन पर रखा था।

वे सब लोग कमरे से बाहर निकल आए। हर कोई उस ताबूत को देखकर हैरान था।

''ये यहां कैसे आया

?"-अनुराग हैरानी से बोला।

''क्या पता

?"-राज का स्वर गम्भीर था।

''ऐसा कैसे हो सकता है

?"-जय बुदबुदाया।

''कैसा कैसे हो सकता है

?"-अनुराग तीखे स्वर में बोला।

''ये ताबूत तो बहुत भारी था। हम तीनों इसे उठा भी नहीं पा रहे थे। फिर...फिर ऐसा कैसे हो गया कि कोई चुपचाप इसे यहां लाकर चलता बना और हमें भनक तक नहीं लग सकी।

"

उस सवाल का जवाब उनमें से किसी के पास नहीं था।

''इन साले कंपनी वालों का ड्रामा अब कुछ ज्यादा ही हो रहा है।

"-कहते हुए अनुराग सीढिय़ों से उतरकर ताबूत की ओर बढ़ा।

''अनुराग!

"-जय ने उसे रोकने की कोशिश की लेकिन अनुराग ने उसका हाथ झटक दिया।

''आओ मेरे साथ।

"-अनुराग बोला-

''अब हम इन सालों को अपना ड्रामा दिखाते हैं।

"

अनुराग जाकर ताबूत के बगल में खड़ा हो गया। उसने एक बार चारों ओर सावधान नजरों से देखा

, फिर गौर से ताबूत का निरीक्षण किया।

जय और राज भी सीढिय़ां उतरकर उसके पास आकर खड़े हो गए।

सबकी नजरें ताबूत के ढक्कन पर चिपकी हुईं थीं।

जिस पर खून की कुछ ताजा बूंदें चमक रहीं थीं।

''ये खून कैसा है

?"-जय बोला।

कोई कुछ नहीं बोला। राज ने आसपास की जमीन पर नजरें दौड़ाईं

, फिर परेशान से स्वर में बोला-

''किसी तरह के कदमों के निशान भी नहीं दिख रहे हैं।

"

''मतलब

?"-अनुराग की भंवें उठीं।

''मतलब...अगर पैरों के निशान नहीं हैं तो इसे यहां लाया कौन

?"

अनुराग और जय ने एक-दूसरे की ओर देखा। दोनों में से कोई कुछ नहीं कह सका।

फिर अचानक अनुराग ताबूत के ऊपर झुका।

''ये क्या कर रहे हो

?"-जय ने उसे टोका।

''इसे खोल कर देख रहा हूं।

"-अनुराग बोला।

''खोलकर

?"-प्रीति भयभीत स्वर में बोली-

''लेकिन क्यों

? इसे खोलने की क्या जरूरत है

?"

''कोई इसे इस तरह यहां लाकर छोड़ गया है और तुम लोग चाहते हो कि मैं झांक कर देखूं भी न कि इसके अंदर साला है क्या

?"-अनुराग का स्वर तीखा हो गया।

कोई कुछ नहीं बोला। अनुराग ने ताबूत के ढक्कन को साइड से पकड़ा और एक झटके से खोल दिया।

ढक्कन खुलते ही वहां उपस्थित हर शख्स का चेहरा सफेद पड़ गया।

सब मीटिंग रूम में सिर पकड़कर बैठे हुए थे।

बाहर वो ताबूत अब भी पड़ा था।

अनुराग ने ताबूत का ढक्कन वापस बंद कर दिया था क्योंकि उसमें जो था

, उसे दोबारा देखने की ताब उनमें से किसी में भी नहीं थी।

उस ताबूत में इंसानों के कटे हुए अंग भरे हुए थे।

हाथ

, पैर

, सिर

, धड़...।

उनमें से किसी ने भी अपनी सारी जिंदगी में भी इतना भयानक दृश्य नहीं देखा था।

''अब क्या करें

?"-प्रीति के मुंह से निकला।

''क्या

?"-अनुराग ने सिर उठाकर उसकी ओर देखा।

''अब हमें क्या करना चाहिए

?"

''सही सवाल।

"-अनुराग अचानक उठ खड़ा हुआ और जमीन रौंदता हुआ अंदर की ओर बढ़ गया।

राज और जय उठे और उसके पीछे-पीछे अंदर की ओर बढ़ गए।

अनुराग किचन में पहुंचा और कुछ ढूंढने लगा।

''क्या ढूंढ रहे हो

?"-जय बोला लेकिन अनुराग ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया। किचन में कुछ देर ढूंढने के बाद वो पलटा और वापस गलियारे से निकलकर दूसरे कमरे में पहुंचा और वहां भी तलाश करता रहा। वो जो ढूंढ रहा था

, वो उसे वहां भी नहीं मिला। फिर वो सीढिय़ों से ऊपर चढ़ गया।

''बताओगे

?"-उसके पीछे-पीछे सीढिय़ां चढ़ते हुए जय तेज स्वर में बोला-

''आखिर तुम ढूंढ क्या रहे हो

?"

अनुराग सीढिय़ों पर ही थमककर खड़ा हो गया।

उसके एकदम से रूक जाने के कारण उसके पीछे आ रहे राज और जय को भी सीढिय़ों पर ही रूक जाना पड़ा।

''पेट्रोल।

"-अनुराग ने घूमकर उनकी ओर देखा और तीव्र स्वर में बोला-

''जिससे मैं इस मनहूस ताबूत को आग के हवाले कर सकूं।

"

कहकर अनुराग फिर पलटा और धड़धड़ाते हुए ऊपर पहुंच गया।

जय और राज ने एक-दूसरे की ओर देखा

, फिर वे दोनों भी लपकते हुए उसके पीछे-पीछे ही ऊपर पहुंचे।

ऊपर अनुराग उस कमरे में पहुंचा

, जिसमें वो और डोंगरा ठहरे हुए थे। उसने वहां रखी पेट्रोल की कैन उठाई और बाहर निकला।

तभी नीचे से चीख की आवाज सुनाई दी।

वे तीनों बिजली की तेजी से सीढिय़ों की ओर लपके।

जिस वक्त अनुराग ताबूत को जलााने के लिए पेट्रोल वगैरह की तलाश में अंदर गया था

, उस वक्त डॉली घर के बाहर निकल आई। जय और

राज

अनुराग के पीछे गए थे जबकि डॉली के पीछे प्रीति थी।

डॉली ताबूत के पास पहुंची।

''ये तुम क्या कर रही हो

?"-प्रीति भयभीत स्वर में बोली-

''उसके...उसके पास क्यों जा रही हो

?"

डॉली ने प्रीति की बात का जवाब नहीं दिया। वो ताबूत के पास पहुंची और उसने उसका ढक्कन खोला।

ताबूत खाली था।

प्रीति हक्की-बक्की सी कभी खाली ताबूत को तो कभी डॉली को देख रही थी।

''ये...ये कैसे हो सकता है

?"-प्रीति बोली-

''अभी तो इसमें...इसमें...कटे हुए अंग भरे हुए थे। ये एकदम से खाली कैसे हो गया

?"

''चलो।

"-डॉली पलटी और वापस घर की ओर बढ़ गई। प्रीति उसके पीछे थी। वो दोनों घर के दरवाजे के पास पहुंचे ही थे कि प्रीति ने अचानक पलटकर पीछे देखा।

ताबूत अपनी जगह पर नहीं था।

प्रीति के मुंह से चीख निकल गई।

''क्या हुआ

?"-डॉली चौंक कर दरवाजे के पास ही थमककर खड़ी हो गई। प्रीति को पीछे देखते पाकर उसने भी पलटकर देखा। ताबूत को अपनी जगह पर नहीं पाकर वो भी अपनी स्तम्भित सी हो गई।
 
तभी धड़धड़ाते कदमों की आवाज आई और अनुराग

, जय और राज वहां पहुंचे। डोंगरा भी उनके पीछे था।

''क्या हुआ

?"-अनुराग बोला-

''कौन चीखा था

?"

किसी ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया। सबकी नजरें घर के सामने उस जगह पर थीं

, जहां थोड़ी देर पहले ताबूत रखा था लेकिन अब वो जगह खाली थी।

''वो ताबूत कहां गया

?"-ताबूत को वहां न पाकर अनुराग भी हक्का-बक्का रह गया।

''वो...वो अभी यहां था।

"-प्रीति कांपते स्वर में बोली-

''और...और अचानक गायब हो गया।

"

डॉली ने अनुराग के हाथ में थमी पेट्रोल की कैन की ओर देखा।

अनुराग के हाथ कैन के हैण्डल पर कस गए। वो थोड़ी दूर बने उस केबिन की ओर बढ़ गया

, जहां उन लोगों ने उस ताबूत को रखा था।

''तुम क्या कर रहे हो

?"-जय उसके पीछे लपका।

''अब इस पेट्रोल को लेकर आया हूं

"-अनुराग बोला-

''तो इसका कुछ न कुछ इस्तेमाल तो करूंगा ही।

"

वो उस केबिन के पास पहुंचा। फिर उसने केबिन के दरवाजे पर जोर से लात मारी। दरवाजा भड़ाक से खुल गया। अनुराग ने धड़धड़ाते हुए अंदर प्रवेश किया। अंदर वही थोड़ा-बहुत पुराना कबाड़ सामान पड़ा था लेकिन ताबूत का नाम तक नहीं था।

ताबूत को वहां भी नहीं देख कर अनुराग को अपना दिमाग घूमता महसूस हुआ। उसे ये पता नहीं था कि प्रीति की नजरों के सामने चंद सेकेंडों में ही वो ताबूत गायब हो गया था। वो तो यही समझ रहा था कि उनके ऊपर जाने से लेकर नीचे आने तक के दौरान किसी ने ताबूत को वहां से हटाकर कहीं छिपा दिया था। और सबसे पास में उसे वो केबिन ही छिपाने की एक जगह दिख रही थी

, जिससे उसे ताबूत के वहां होने की पूरी उम्मीद थी।

उस ताबूत पर पेट्रोल छिड़ककर उसे भस्म करने की अनुराग की मनोकामना पूरी नहीं हो सकी।

फिर अनुराग ने कैन का ढक्कन खोला और केबिन में ही पेट्रोल छिड़कना शुरू कर दिया।

''ये तुम क्या कर रहे हो...

?"-जय ने विरोध जताने की कोशिश की।

अनुराग ने चेतावनीपूर्ण ढंग से जय की ओर देखा। उसकी आंखों के भाव देखकर जय ने चुप रहने में ही भलाई समझी। पूरा डिब्बा खाली करने के बाद अनुराग बाहर निकला

, जय भी उसके पीछे जल्दी से केबिन से बाहर निकल आया।

सब लोग केबिन के बाहर ही इकट्ठे

हो गए थे।

वातावरण में पेट्रोल की तीव्र महक फैली हुई थी।

अनुराग ने जेब से सिगरेट का पैकेट और माचिस निकाली। पैकेट में से एक सिगरेट निकालकर होंठों से लगाई

, माचिस की तीली सुलगाई

, उसे हवा से बुझने से बचाने की कोशिश करते हुए दोनों हथेलियों को गोल करके जलती हुई तीली की लपट को ढंककर पहले सिगरेट सुलगाई

, फिर तीली को केबिन के अंदर की ओर उछाल दिया।

अगले ही क्षण केबिन भक्क की तेज आवाज के साथ आग की लपटों में घिर गया।

रात हो चुकी थी।

रिंकी पूरे दिन में एक बार भी नीचे नहीं आई थी। उसे कल से बुखार था। मोहिनी गायब थी। ऐसे में वे लोग वहां से जाने की सोच भी नहीं सकते थे। वैसे भी वहां से जाने का एकमात्र रास्ता था

, जिससे वहां से निकलना भी आसान नहीं था।

वो सब लोग

'मीटिंग रूम

' में बैठे थे।

सिवाय डोंगरा और रिंकी के। डोंगरा ऊपर रिंकी को देखने गया था।

ताबूत वाली घटना ने सबको हिलाकर रख दिया था।

वे लोग जब से वहां आए थे

, उनके साथ लगातार अजीब घटनाएं हो रहीं थीं।

पहले रिंकी का गायब होना

, फिर रहस्यमयी ढंग से स्टोर में मिलना

, स्टोर रूम में मिली वो अजीबोगरीब किताब और उसमें मिली तस्वीरें

, कागज और अखबारों की कटिंग

, फिर सामने वाले केबिन से ताबूत का गायब होना

, फिर मोहिनी का गायब होना

, फिर ताबूत का अचानक वापस आ जाना

, उसमें कटे हुए अंगों का दिखना

, डॉली और प्रीति के अनुसार फिर उन अंगों का गायब हो जाना

, फिर ताबूत का ही गायब हो जाना...।

कुछ भी तो ऐसा नहीं था

, जिसे एक्सप्लेन किया जा सकता था।

तभी सीढिय़ों पर आहट सुनाई दी। डोंगरा ऊपर रिंकी को देखने गया था। वो वापस लौट आया था।

डोंगरा भी कमरे में आकर एक कुर्सी पर धप्प से बैठ गया।

''रिंकी कैसी है

?"-डॉली बोली।

''सो रही है।

"-डोंगरा गहरी सांस लेकर बोला-

''दीन-दुनिया से बेखबर।

"

''हमसे तो वही अच्छी है।

"-प्रीति बोली-

''कम से कम उसने वो ताबूत वाला काण्ड तो नहीं देखा।

"

''ताबूत से

"-अनुराग बोला-

''कटे हुए अंग कैसे गायब हो सकते हैं

?"

''वैसे ही

"-प्रीति बोली-जैसे वो पूरा-का-पूरा ताबूत गायब हो गया था। वो भी पलक झपकते ही। हमने मुश्किल से आधे मिनट के लिए उस ताबूत की ओर पीठ की थी

, फिर पलटकर देखा तो वहां कुछ नहीं था।

"

''मोहिनी का भी अब तक कोई पता नहीं चल पाया है।

"-डॉली चिंतित भाव से बोली।

''यहां हुई जिस घटना के बारे में हमने पढ़ा था

"-जय बोला-

''उसके मुताबिक भी उस...उस अंग्रेज ने गांव वालों के टुकड़े-टुकड़े करके उसी ताबूत में भर दिये थे...।

"

''तुम कहना क्या चाहते हो

?"-अनुराग सख्त स्वर में बोला।

''और उस समय हमें ताबूत में वैसे ही टुकड़े दिखाई दिए थे। फिर उन टुकड़ों का रहस्यमयी ढंग से गायब हो जाना

, फिर ताबूत का भी गायब हो जाना...।

"

''मैंने उस मनहूस केबिन को जला दिया है।

"-अनुराग धीमे से बड़बड़ाया

, जैसे अपने-आप से बोल रहा हो।

''क्या उसे जला भर देने से हमारी समस्याएं खत्म हो जाएंगीं

? क्या मोहिनी का पता चल जाएगा

? ये सब...ये जो कुछ भी हो रहा है

, रूक जाएगा

?"-प्रीति बोली।

''नहीं!

"-अचानक अनुराग चीख उठा-

''नहीं रूकेगा। लेकिन जो भी हमारे साथ ये खिलवाड़ कर रहा है

, मैं उसका यही हश्र करूंगा।

"-कहकर वो उठ खड़ा हुआ और आगे बढ़कर कमरे के बीचों-बीच आ गया-

''सुना तुमने!

"-अनुराग कमरे की छत की ओर मुंह करके चीखा-

''तुम जो भी हो

, भूत-प्रेत या कुछ भी

, मैं तुमसे नहीं डरता। मैं किसी से नहीं डरता। जैसे मैंने उस केबिन को जला दिया। ऐसे ही अब तुम्हें भी जलाकर खाक कर दूंगा। इस पूरे मनहूस मकान को जलाकर खाक कर दूंगा। मिट्टी में मिला दूंगा मैं इस मनहूस जगह को। तुममे हिम्मत है तो सामने आओ। रोक लो मुझे। कब तक इस तरह छिप-छिप कर हमारे साथ खेलते रहोगे

? बोलो

? है हिम्मत

?"

कमरे में उपस्थित प्रत्येक शख्स हैरानी से अनुराग को देखता रह गया। अनुराग ऐसे चिल्ला रहा था

, जैसे अपने होश खो बैठा हो।

''अगर मुझे पता होता तो मैं इस मकान को पहले ही जलाकर राख में बदल देता। लेकिन अब भी देर नहीं हुई है। मैं ये किस्सा हमेशा-हमेशा के लिये खत्म करके ही यहां से जाऊंगा। बस

, एक बार मोहिनी मिल जाये....।

"

अचानक अनुराग की आवाज को ब्रेक लग गए।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

सबकी नजरें अनुराग के चेहरे पर थीं।

अनुराग की आंखें फैली हुईं थीं।

''क्या हुआ

, अनु....

?"-प्रीति ने बोलने की कोशिश की लेकिन अनुराग ने होंठों पर उंगली रखकर उसे चुप रहने का इशारा किया-

''श्श्श।

"-वो फुसफुसाता सा बोला। ऐसा लग रहा था

, जैसे वो कुछ सुनने की कोशिश कर रहा हो।

उन लोगों ने भी ध्यान से सुनने की कोशिश की तो उन्हें अजीब-सी आवाज आती हुई सुनाई दी।

वो आवाज ऊपर कहीं से आ रही थी।

छत की ओर से!

सबकी नजरें छत की ओर उठ गईं।

लेकिन छत पर तो सिर्फ रिंकी थी।

और वो अपने कमरे में बेहोश जैसी सोई हुई थी। अभी थोड़ी ही देर पहले डोंगरा उसे देखकर आया था।

वो आवाज ऐसी थी

, जैसे ऊपर गलियारे में किसी को घसीटा जा रहा हो।

फिर सीढिय़ों से किसी के उतरने की आवाज सुनाई दी।

पैरों की आहट के साथ ही कुछ भारी चीज को सीढिय़ों पर घसीटे जाने की आवाज भी सुनाई दे रही थी।

और वो पैरों की आहट भी सामान्य नहीं थी।

जैसे कोई आदमी रूक-रूक कर एक-एक कदम रख रहा हो।

सबने एक-दूसरे की ओर देखा।

ऊपर तो सिर्फ रिंकी थी।

आहट सबसे निचली सीढिय़ों तक आ पहुंची थी। सबकी नजरें उस खुले दरवाजे पर जम गईं

, जिसके बगल से होकर सीढिय़ां ऊपर जाती थीं।

सीढिय़ों पर कुछ आहट सुनाई दी।

सबकी नजरें दरवाजे की ओर उठ गईं

, जिधर सीढिय़ां थीं।
 
दरवाजा

'चींईंईंईं....

' की चरमराती आवाज के साथ खुल गया।

दरवाजे के उस पार रिंकी खड़ी दिखाई दी। उसकी आंखें चढ़ी हुईं लग रहीं थीं

, जैसे उसने पता नहीं कितना तगड़ा नशा कर रखा हो।

''रिंकी!

"-उसे देखकर डोंगरा अपनी जगह से उठकर खड़ा हो गया।

रिंकी ने उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। वो आगे बढ़ी। एक हाथ से वो कोई चीज घसीट रही थी। जब वो कमरे के अंदर आ गई

, तब सबने देखा कि वो चीज क्या थी।

उनकी आंखें फैल गईं।

वो सफेद चादर की एक पोटली थी

, जिस पर खून के लाल-लाल बड़े-बड़े धब्बे लगे हुए थेे।

इतना ही नहीं

, पोटली के ऊपर बंधे वाले हिस्से में खुली जगह से एक जनाना हाथ भी बाहर निकला हुआ था।

वो भयानक दृश्य देखकर कमरे में उपस्थित हर शख्स के शरीर के रोंगटे खड़े हो गए।

और रिंकी का दूसरा हाथ...।

उसमें सब्जी काटने वाला चाकू था।

खून से तर-बतर।

सिर्फ चाकू ही नहीं

, रिंकी का वो पूरा हाथ ही खून से सराबोर था

, जिसमें उसने चाकू थाम रखा था और उससे खून की बूंदें टपकती आ रहीं थीं।

कमरे में उपस्थित हर शख्स जैसे अपनी जगह पर पत्थर की मूर्ति बन गया था।

फिर जय ने राज की ओर देखा

, दोनों में आंखों ही आंखों में कुछ बात हुई

, फिर दोनों सावधानी के साथ रिंकी की ओर बढ़े।

''जय!

"-प्रीति ने जय का हाथ पकड़कर उसे रोकने की कोशिश की लेकिन जय ने अपना हाथ छुड़ा लिया।

फिर अगले कुछ ही क्षणों में कई चीजें एक साथ हुईं।

राज और जय ने झपटकर रिंकी को पकड़ लिया। अनुज ने रिंकी के चाकू वाले हाथ को पकड़ लिया और उससे चाकू छीनने की कोशिश करने लगा। रिंकी के हाथ से चादर के सिरे छूट गए

, जिससे उसने चादर को मोड़ कर पोटली की तरह पकड़ा हुआ था

, जिससे चादर खुल गई और उसमें से किसी लड़की के शरीर के कटे हुए टुकड़े फर्श पर इधर-उधर बिखर गए। लड़की का सिर गेंद की तरह लुढ़कता हुआ प्रीति के पास आकर रूक गया। प्रीति ने फटी-फटी आंखों से उस सिर को देखा

, फिर गला फाड़कर चीख उठी।

वो मोहिनी का सिर था।

''डैम इट!

"-राज रिंकी के हाथ से चाकू छीनने की कोशिश कर रहा था लेकिन रिंकी की उंगलियां जैसे लोहे के शिकंजे की तरह चाकू पर कसी हुईं थीं-

''चाकू मुझे दो रिंकी...।

"

रिंकी की दूसरी बांह जय ने पकड़ रखी थी लेकिन उसके नजरें नीचे चादर की खुल चुकी पोटली पर थीं। वो भी फटी-फटी आंखों से उससे बिखरे मोहिनी के शरीर के कटे हुए टुकड़ों को देख रहा था।

तभी उसे कुछ अजीब-सा अहसास हुआ।

उसने गर्दन घुमाकर रिंकी की ओर देखा।

वो एकटक उसी की ओर देख रही थी। उसके चेहरे पर एक बेहद डरावनी मुस्कान थीं। और उसकी आंखें...।

जय को अपनी रीढ़ की हड्डी में ठण्डक की तीव्र लहर दौड़ती अनुभव हुई।

...उसकी आंखों की काली पुतलियों के गिर्द सुनहरे छल्ले चमक रहे थे और आंखों की पुतलियां सामान्य से काफी बड़े आकार की लग रहीं थीं। ऐसा लग रहा था

, जैसे वो उसकी आंखों से बाहर निकली जा रहीं हों।

जय की ओर देखते हुए रिंकी के गले से एक खून जमा देने वाली हंसी निकली और उसने एक हाथ से जय को धक्का दिया। धक्का इतना शक्तिशाली था कि जय के पैर जमीन से उखड़ गए और वो सीधे दीवार से जा टकराया।

जय का वो हश्र देख कर राज ने रिंकी के हाथ से चाकू छीनने की कोशिश तेज कर दी लेकिन तुरंत ही उसे इस बात का अहसा हो गया कि वो कोशिश फिजूल थी। उस वक्त तो अगर उसके पास क्रेन भी होती तो वो उससे भी उस चाकू को रिंकी की पकड़ से आजाद नहीं करवा सकता था।

रिंकी की गर्दन राज की ओर घूम गई।

उसकी सुनहरे छल्लों वाली आंखें देख कर राज को भी अपनी रगों में बह रहा खून जमता सा महसूस हुआ।

रिंकी ने दूसरे हाथ से राज की गर्दन पकड़ ली और उसे एक झटके से जमीन से ऊपर उठा दिया।

रिंकी का कद राज से कम था

, जिसके चलते वो एक अविश्वसनीय-सा दृश्य था। राज के पैर फर्श से ऊपर उठ गए थे। उसे अपना दम घुटता हुआ महसूस हो रहा था। उसे लग रहा था

, जैसे उसकी गर्दन किसी लोहे के शिकंजे में फंसी हो। वो रिंकी की पकड़ से खुद को आजाद कराने की भरसक कोशिश कर रहा था।

डॉली राज को बचाने के लिए लपकी लेकिन उससे पहले अनुराग उस तक पहुंच गया। अनुराग किसी सांड की तरह दौड़ते हुए रिंकी से जा टकराया

, जिससे रिंकी के कदम जमीन से उखड़ गए। वो फर्श पर जा गिरी। अनुराग उसके ऊपर था। राज रिंकी की पकड़ से आजाद होकर वहीं पर गिर गया।

''राज!

"-डॉली उसे सहारा देने की कोशिश करते हुए बोली-

''तुम...तुम ठीक तो हो न

?"

राज एक हाथ से अपना गला मसल रहा था लेकिन उसकी नजरें रिंकी पर थीं। उन सबमें सबसे हट्टे-कट्टे होने के बावजूद अनुराग रिंकी पर काबू पाने के लिए उससे जूझ रहा था और अभी-अभी रिंकी ने जय और राज की जो हालत की थी

, उसे देखते हुए

राज

को यकीन था कि वो अकेला उस पर काबू नहीं पा सकता था।

राज फुर्ती से उनके पास पहुंचा और रिंकी को पकडऩे में अनुराग की मदद करने लगा।

राज के भी आ जाने पर अनुराग को थोड़ी राहत मिली। उसने रिंकी का एक हाथ पकड़कर मजबूती से फर्श पर टिका दिया जबकि उसका दूसरा हाथ राज ने पकड़कर वैसे ही फर्श पर टिका दिया। इसके बावजूद रिंकी उनके नीचे पानी से निकालकर बाहर फेंक दी गई मछली की तरह फडफ़ड़ा रही थी और जोरों से पैर पटक रही थी

, जिससे लग रहा था कि वे लोग उसे ज्यादा देर तक नहीं रोक पाएंगें।

तभी जय भी वहां आ गया और वो भी रिंकी को काबू करने में उन तीनों की मदद करने लगा।

सेकेंडों में कमरे में नर्क का दृश्य साकार हो चुका था।

जमीन पर यहां-वहां मोहिनी के शरीर के कटे हुए टुकड़े बिखरे पड़े थे। जय

, अनुराग और राज तीनों रिंकी के ऊपर सवार जैसे थे लेकिन इसके बाद भी वो अपने शरीर को भयानक ढंग से झटके दे रही थी। और वो झटके भी इतने शक्तिशाली थे कि उन तीनों को उसे संभालना बेहद मुश्किल लग रहा था।

फिर रिंकी ने अपने शरीर को झटके देना बंद कर दिया। वो अपने सिर को बड़े अजीब ढंग से इधर-उधर मोडऩे लगी। उसकी आंखों से ऐसा लग ही नहीं रहा था कि वो उनमें से किसी की ओर देख रही हो। वो तो जैसे कहीं और ही देख रही थी।

''इसकी आंखें!

"-अनुराग दहशत भरे स्वर में बोला-

''इसकी आंखों को क्या हो गया है

?"

दोनों में से कोई भी उसके सवाल का जवाब नहीं दे सका।

''डॉली!

"-राज ने सहायता के लिए डॉली को आवाज लगानी चाही लेकिन डॉली कहीं दिखाई नहीं दी।

अब ये डॉली कहां चली गई

?

''डॉली!

"-राज गला फाड़ कर चिल्लाया।

तभी डॉली उसी दरवाजे पर प्रकट हुई

, जिससे अभी थोड़ी देर पहले रिंकी आई थी। डॉली के हाथ में एक लम्बी

, मोटी रस्सी थी। वो जल्दी से रस्सी लेकर उनके पास पहुंची। फिर उन चारों ने उस रस्सी से रिंकी के हाथ-पैरों को मजबूती से बांध दिया।

रिंकी अब उनकी पकड़ से आजाद होने की कोशिश नहीं कर रही थी। वो तो जैसे कहीं ओर ही देख रही थी। बीच-बीच में वो अजीब ढंग से हंसती जा रही थी।

''ये...ये इसे हो क्या हो गया है

?"-प्रीति खौफ भरे स्वर में बोली।

''मत पूछो।

"-राज के दांत भिंचे हुए थे।

''अब क्या करें

?"-उसे अच्छी तरह बांधने के बाद जय बोला।

''इसे ऊपर ले चलते हैं।

"-राज बोला-

''वहां किसी कमरे में बंद कर देंगें।

"

''और ये बाहर आ गई तो

?"-अनुराग बोला।

''तब की तब देखी जाएगी। अभी तो इसे कैद करना बहुत जरूरी है।

"

''तुम लोग रिंकी को कैद कर रहे हो।

"-डोंगरा घबराए हुए स्वर में बोला-

''लेकिन...लेकिन इसने किया क्या है

?"

सबकी नजरें डोंगरा की ओर घूम गईं। उन्हें इस तरह अपनी ओर आते देख डोंगरा सकपका गया।

''ये!

"-प्रीति ने फर्श पर पड़े मोहिनी के टुकड़ों की ओर इशारा किया और चीख उठी-

''ये किया है इसने। तेरी आंखें हैं या बटन

?"

डोंगरा के मुंह से बोल नहीं फूटा।

जय

, अनुराग और राज तीनों ने मिलकर बंधी हुई रिंकी को उठाया और सीढिय़ां चढ़कर ऊपर वाली मंजिल पर पहुंचे। वहां उन्होंने अंदर जाकर रिंकी को एक पलंग पर लिटा दिया। वो अब कोई विरोध नहीं कर रही थी। बस अपनी गर्दन अजीब ढंग से घुमा रही थी। उसकी आंखों से ऐसा लग रहा था

, जैसे वो वहां न होकर कहीं दूर देख रही हो।

''क्या लगता है

?"-जय बोला-

''ये यहां कैद रहेगी

?"

''क्या मतलब

?"-अनुराग ने उसकी ओर देखा।

''जिस तरह इसने मुझे दूर फेंक दिया था

, उससे तो मुझे लगता है कि ये रस्सी को भी तोड़ सकती है।

"

''तो

? तो क्या करें

?"

जय ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने थूक गटक कर अपना गला तर किया।

''चलो यहां से।

"-राज

की नजरें रिंकी के चेहरे पर जमी हुईं थीं-

''इसके पास ज्यादा देर रहना ठीक नहीं है।

"

''लेकिन इसे...इसे हुआ क्या है

?"-जय की आवाज में दहशत झलक रही थी।

''इस बारे में हम बाहर चलकर बात करेंगें।

"-राज का स्वर तीव्र हो उठा-

''मैंने कहा न यहां से चलो।

"
 
Back
Top