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Thriller तरकीब

करीब सवा आठ बजे वृन्दा वहाँ पहुँची। इस समय वह ऑफिस कम लाइब्रेरी में बैठी थी। राज अपनी चेयर पर बैठा था। उसकी विशाल टेबल पर ढेर सारी फाइलें रखी थीं। उनमें से अधिकांश पुराने–उसके पिता के समय के–मुकदमों की थी, जो सिर्फ क्लाइंट पर प्रभाव डालने के लिए टेबल पर रखी रहती थीं। टेबल के सामने विजिटर चेयर पर वृन्दा बैठी थी और वृन्दा के बराबर में डॉली जमी बैठी थी।

“बताइये वृन्दा जी क्या बताना चाहती थीं आप ?”

वृन्दा ने डॉली की तरफ देखा, और फिर राज की तरफ़ देखा।

“निःसंकोच कहिये, जो भी कहना हो। हम दोनों मिलकर ही काम करते हैं। बेहतर है ये भी अभी जान ले। यूँ मैं बाद में इसे बताने की जहमत से बच जाऊँगा, और वैसे भी दो दिमाग दो ही होते हैं।”–राज आश्वासन भरे स्वर में बोला।

वृन्दा ने कठिनाई से सहमति में सिर हिलाया।

“राज जी मेरी जान को अभी भी खतरा है।”–वह तनिक भयभीत स्वर में बोली।

“किससे ?”–राज ने पूछा।

“राज जी मुझे गिरीश से तलाक़ चाहिए।”

“पहले तो आप शांत हो जाइए। फिर आराम से बताइए, जो भी बताना चाहती हैं।”

“वह...वह लोग बहुत ख़तरनाक हैं। गिरीश बहुत ग़लत झमेलों में फँस गया है।”

“वृन्दा जी ऐसे कुछ समझ नहीं आएगा। आप जब भी कुछ बोलती हैं, नई ही बात बोलती हैं। आराम से बताइए कि आपको तलाक़ चाहिए या प्रोटेक्शन चाहिए या गिरीश को झमेलों से निकालना है।”

“मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।”

“चलिए छोड़िए...अब आप केवल मेरे सवालों के जवाब दीजिए।”–राज शांत स्वर में बोला।

वृन्दा ने सवालिया निगाहों से उसकी तरफ देखा।

“गिरीश ने क्या बताया है ? क्या हुआ था उसके साथ ?” “उसने पुलिस को तो ये बयान दिया है कि वह कार से जा रहा था कि एक बाइक वाले ने उसकी कार के पहिए की तरफ़ इशारा करके कुछ कहा। उसे लगा कि शायद पंचर हो गया होगा और बाइक सवार यही इशारा कर रहा होगा। उसने कार सड़क के किनारे रोक दी और उतर कर देखने लगा। लेकिन सभी टायर सही थे। तभी दो आदमी आकर उससे पूछने लगे कि क्या हुआ ? वह अभी उस व्यक्ति से बात कर ही रहा था कि पीछे से दूसरे व्यक्ति ने उसके सिर पर कुछ मारा और वह बेहोश हो गया। उसके बाद उसे कुछ मालूम नहीं कि क्या हुआ। आज सुबह जब उसे होश आया तो वह गाँधी बाग में एक बेंच पर पड़ा था। वह उठा और घर आ गया। बस इसके अलावा उसे कुछ याद नहीं है।”

“पुलिस ने यक़ीन कर लिया इस कहानी पर ?”–राज अविश्वासपूर्ण स्वर में बोला।

“पता नहीं ?”

“उन दो आदमियों के बारे में क्या बताया गिरीश ने ? उन्हें तो ठीक से देखा ही होगा ?”

“गिरीश का कहना है कि वह बाइक पर आए थे। दोनों ने हेलमेट पहन रखा था। उनमें से किसी की भी शक्ल नहीं देखी उसने।”

“और बाइक ? बाइक तो देखी ही होगी ? शायद उसका नम्बर भी देखा हो ?”

“गिरीश का कहना है कि उसने बाइक पर ध्यान ही नहीं दिया था।”

“इस कहानी पर तो कोई बच्चा भी यक़ीन नहीं करेगा। अपहरण का कोई उद्देश्य ही नहीं दिख रहा।”

“अब बच्चा यक़ीन करे या ना करे पर पुलिस को तो यक़ीन करना पड़ेगा।”–वृन्दा बोली।

“क्यों ?”–राज के माथे पर बल पड़ गए।

“क्योंकि इसके पीछे इतने बड़े लोगों का हाथ है कि पुलिस को चुप रहना ही पड़ेगा।”

“आपको कैसे पता ?”

“क्योंकि मुझे गिरीश ने बताया। आज ही बताया।”

“क्या बताया ?”–राज उत्सुक स्वर में बोला।

“गिरीश की दवा फैक्ट्री में ड्रग्स का काम होता है।”–उसने जैसे बम सा फोड़ा।

“क्याऽऽ ?”–राज चौंका।

“मैं आपको शुरू से बताती हूँ।”

“जी यही बेहतर रहेगा।”

“गिरीश को पिछले कुछ समय से बिजनेस में घाटा चल रहा था। बाजार में भ्रम बना हुआ था लेकिन हक़ीक़त यह थी कि वह दिवालिया होने की कगार पर था।” राज और डॉली चेहरे पर दिलचस्पी के भाव लिए सुन रहे थे।

“फिर पिछले साल उसे एक आदमी मिला, जिसने उसे लालच देकर इस काम में शामिल कर लिया। गिरीश इस कदर क़र्ज़े में डूब चुका था कि उसके पास कोई विकल्प था ही नहीं। लिहाज़ा फैक्ट्री का गोदाम अफीम के डोडे का स्टाक रखने और फैक्ट्री की लैब इसे रिफाइंड करके टेबलेट, पाउडर और वाइल (Vial) और एमप्यूल (Ampule) की सूरत में तैयार करके बाक़ायदा लेबल लगाकर सप्लाई करने में इस्तेमाल होने लगी। माल खुलेआम ट्रेन से, ट्रांसपोर्ट से बुक करके सप्लाई होता था। साथ में कम्पनी का चालान और बिल भी होता था। नतीजा एक साल के अंदर ही ना सिर्फ गिरीश का सारा क़र्ज़ उतर गया, बल्कि बहुत ढेर सारा पैसा भी जमा हो गया।”

डॉली और राज तन्मयता से उसकी बात सुन रहे थे।

“फिर अब गिरीश ने इस सब से हाथ खींचना चाहा, क्योंकि उसकी मजबूरी खत्म हो चुकी थी। और अब उसका ये खतरा उठाना ना तो ज़रूरी रह गया था और ना ही वह अब इसे आगे जारी रखना चाहता था। मगर जैसे ही उसने अब ये काम करने से मना किया, उसे पता चला, कि उसने जिनसे ये गठबंधन किया हुआ था वह चीज़ क्या थे !”

“कौन लोग थे ?”–राज बोला।

“बहुत ख़तरनाक लोग हैं वे। नेतागण, अफसर सब उनकी मुट्ठी में हैं। पूरे देश में इनका नेटवर्क फैला हुआ है। जाने कितने गिरीश इनके जाल में फँसे हुए हैं।”

“आपको कैसे पता है ये सब ?”

“गिरीश ने ही बताया। मेरे तो होश ही उड़ गए ये सब सुनकर।”

“आपको पुलिस को बताना चाहिए था ये सब।”–“राज गंभीर स्वर में बोला।

“जिस दिन गिरीश का अपहरण हुआ था वह पुलिस के पास ही गया हुआ था।”–वृन्दा फीकी मुस्कुराहट से बोली।

“फिर ?” “गिरीश ने जब ये काम जारी रखने से मना कर दिया था, तो उन लोगों ने उसे धमकियाँ देनी शुरू कर दीं। लेकिन गिरीश पक्का मन बना चुका था कि वह अब ये काम अपनी फैक्ट्री में किसी भी कीमत पर नहीं होने देगा। जब उन लोगों की धमकियाँ ज्यादा आने लगीं, तो गिरीश पुलिस के पास पहुँच गया और सारी बात साफ साफ बता दी।”

“फिर क्या हुआ ?”

“थाने में जिस दरोग़ा से गिरीश की बात हुई, वह खुद गिरीश को ले जाकर उन लोगों के हवाले कर आया।”

“क्याऽऽऽ ?”–राज बुरी तरह चौंका–“यानी गिरीश का कोई अपहरण हुआ ही नहीं था। जो भी कुछ हुआ, सब पुलिस की जानकारी में हुआ था?”

“पुलिस का तो पता नहीं, पर उस दरोग़ा की जानकारी में

“आपको कैसे पता है ये सब ?”

“गिरीश ने ही बताया। मेरे तो होश ही उड़ गए ये सब सुनकर।”

“आपको पुलिस को बताना चाहिए था ये सब।”–“राज गंभीर स्वर में बोला।

“जिस दिन गिरीश का अपहरण हुआ था वह पुलिस के पास ही गया हुआ था।”–वृन्दा फीकी मुस्कुराहट से बोली।

“फिर ?” “गिरीश ने जब ये काम जारी रखने से मना कर दिया था, तो उन लोगों ने उसे धमकियाँ देनी शुरू कर दीं। लेकिन गिरीश पक्का मन बना चुका था कि वह अब ये काम अपनी फैक्ट्री में किसी भी कीमत पर नहीं होने देगा। जब उन लोगों की धमकियाँ ज्यादा आने लगीं, तो गिरीश पुलिस के पास पहुँच गया और सारी बात साफ साफ बता दी।”

“फिर क्या हुआ ?”

“थाने में जिस दरोग़ा से गिरीश की बात हुई, वह खुद गिरीश को ले जाकर उन लोगों के हवाले कर आया।”

“क्याऽऽऽ ?”–राज बुरी तरह चौंका–“यानी गिरीश का कोई अपहरण हुआ ही नहीं था। जो भी कुछ हुआ, सब पुलिस की जानकारी में हुआ था?”

“पुलिस का तो पता नहीं, पर उस दरोग़ा की जानकारी में तो बराबर हुआ था।”

“और जो आप पर हमला हुआ था वह ?”

“वह भी चेतावनी थी गिरीश को।”

“तो अब आप क्या चाहती हैं।”

“मुझे इन सब झंझटों में नहीं पड़ना। आप मेरा तलाक़ करवा दो गिरीश से बस।”–वृन्दा बोली।

“गिरीश जी क्या चाहते हैं आपसे ?”
 
“गिरीश क्या चाहता है मुझसे ?”–उसने निरर्थक सा दोहराया।

“उसने आपको ये सारी कहानी क्यों बताई ? ये सब बता कर वह आपसे क्या चाहता है ?”

“मैं इसमें उसकी क्या मदद कर पाऊँगी ?”–वृन्दा कुछ सोचती हुई बोली।

“फिर आपको ये सब क्यों बताया ?”

“शायद मन का बोझ हल्का करना चाहता हो।”

“हाँ ये हो सकता है।”–राज को मानना पड़ा।

“गिरीशजी को...”–डॉली बातचीत में दाखिल हुई–“पता है कि आप यहाँ हमारे पास आई हैं ?”

“नहीं।”

“शायद ये पता हो कि आप उनसे तलाक लेने का इरादा कर रही हैं।”

“नहीं, अभी ये भी नहीं पता।”–वृन्दा कठिन स्वर में बोली।

“अब गिरीश जी का क्या इरादा है ?”–राज बोला।

“उसका क्या इरादा होगा ? वह तो उनके साथ काम करेगा। और चारा भी क्या है ?”

“ऐसा क्यों ? क्या डर गए गिरीश जी ?”

“दाहिने पैर का अँगूठा ग़ायब है उनका। पैर की किसी भी उँगली में नाखून नहीं है। भयंकर तकलीफ़ में है, लेकिन पुलिस के सामने ज़ाहिर नहीं होने दिया कि कोई तकलीफ़ है।”

“और सब तो मैं समझ गया। बस दो बातें समझ नहीं आईं।”–राज कुछ विचार करता हुआ बोला।

“वो क्या ?”–वृन्दा बोली। डॉली ने भी उत्सुकता से उसकी तरफ देखा।

“छोड़िए जाने दीजिए। अब आप तलाक चाहती हैं, तो सबसे पहले अपनी ससुराल जाइए। वहाँ से अपना सामान लीजिए और कहीं और शिफ्ट हो जाइए।”–राज बोला।

“कहाँ…कहाँ शिफ्ट हो जाऊँ ?”–वह असमंजस भरे स्वर में बोली।

“अपने पापा के घर जाइए और कहाँ जाएँगी।”–डॉली जल्दी से राज के बोलने से पहले बोल पड़ी। वृन्दा ने सहमति में सिर हिलाया।

“कल हो जाऊँ शिफ़्ट ?”

“कल हो जाइए। कोई दिक्कत नहीं। कल शिफ्ट होने के बाद मिलिए, तब तैयार करते हैं तलाक़ का केस।”

“ठीक है, तो अब मैं चलूँ ?”–वृन्दा उठते हुए बोली।

“जी ठीक है।”–राज हाथ जोड़ कर नमस्कार करता हुआ बोला।

“वैसे गिरीश जी ने कुछ बताया कि उन्हें इस धंधे में लाने वाला कौन था ? कौन मिला था उनसे ?”

“जी कोई बिज़नेस मैन था, जो दिल्ली में एक फंक्शन में मिला था। वह नेता भी है। क्या नाम बताया था गिरीश ने ?…हाँ कोई रणविजय सिंह था।”–कहकर डॉली और राज को सन्नाटे में छोड़कर वृन्दा विदा हो गई।

“कहीं ये वही रणविजय तो नहीं ?”–थोड़ी देर बाद राज सन्नाटे को भंग करता हुआ बोला।

डॉली ख़ामोश बैठी रही। उसके चेहरे पर तनाव साफ दिख रहा था।

“ख़ैर जो भी है सामने आ ही जाएगा।”–राज उसके चेहरे को ग़ौर से देखता हुआ बोला।

डॉली ने जैसे सुना ही नहीं।

“डॉली !”–राज ने पुकारा।

“हाँऽऽऽ”–डॉली जैसे ख़्यालों की दुनिया से बाहर आई।

“क्या सोच रही हो ? चलो खाना खाते हैं।”

“चलिए सर।”–वह उठ खड़ी हुई। राज डाइनिंग टेबल पर बैठ गया। डॉली उसकी और अपनी प्लेट लगा लाई। राज के सामने उसकी प्लेट रख कर वह अपनी प्लेट लेकर उसके सामने बैठ गई।

“ये क्या है ?”–राज हकबकाया सा प्लेट में देखता हुआ बोला।

“मैगी।”–डॉली सिर झुकाए खाते हुए बोली।

“ये है डिनर ?”

“सर आपने ही कहा था कि कुछ भी बना लो।”

“हाँ कहा तो था, पर मैगी ?”–वह असंतोष भरे स्वर में बोला।

“खा लो सर प्लीज।” राज कुछ कहने को था, पर उसके चेहरे पर छाई गंभीरता को देखकर चुप लगा गया और मरे मन से मैगी खाने लगा।

“सर।”–काफी देर बाद डॉली बोली।

राज ने उसकी तरफ देखा।

“सर हम वृन्दा का तलाक का केस फाइल कर देंगे। उसके बाकी के झमेलों से हमें कोई मतलब नहीं।”

“मतलब ?”–राज चौंका।

“मतलब हम वकील हैं, कोई जासूस या पुलिस नहीं। उसके मामले में हम कर ही क्या सकते हैं ?”–डॉली के चेहरे पर गंभीरता के गहन भाव थे।

“और रणविजय ?”–राज उसकी आँखों में झाँकता हुआ बोला।

“मुझे कुछ नहीं करना। वह एक बुरा सपना था, जो अब खत्म हो गया।”

“एकाएक विचारों में इस क्रान्तिकारी परिवर्तन का कारण ?”

“सर, वह माफिया है। वह आपको…मुझे नुकसान पहुँचा सकता है। हम उनके सामने हैं ही क्या ?”

राज मुस्कुराया। वह समझ गया था कि डॉली को किस खतरे की आशंका ने घेर लिया है।

“कुछ नहीं होगा मुझे।”–वह हँसा।

“मुझे अपनी फिक्र है।”–वह बोली। राज हँसा।

“और वैसे भी हम कर ही क्या सकते हैं ? सर, अच्छी ख़ासी ज़िंदगी सेट होती जा रही है। हमें इन चक्करों में पड़ना ही नहीं है।”

“ठीक है ठीक है, हम सोचेंगे। अगर कोई तरकीब मिलती है, तो कोशिश करेंगे। वरना कहना तेरा–हम कर भी क्या सकते हैं।”

“नहीं सर, हमें कुछ नहीं सोचना। हमें कुछ नहीं करना।”

“डॉली मुझ पर यक़ीन रख। मैं पागल नहीं हूँ, जो ऐसे ही जाकर भिड़ जाऊँगा।”

“पर सर आप मेरे लिए ये सब क्यों करोगे ?”

“क्योंकि...क्योंकि....”–राज ने वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

“क्योंकि ?”–वह मैगी खाना भूल गई। उसका मुँह खुला हुआ था और चम्मच उसके मुँह के करीब ही हवा में फ्रीज़ हो गई थी।

“छोड़ो। बस करना है, तो करना है।”–राज बोला।

डॉली खामोशी से बैठी रही। उसका दिल तेजी से धड़क रहा था। उसने खामोशी से चम्मच वापस प्लेट में रखी और उठकर किचन में चली गई। उसे इस समय एकांत की बेहद जरूरत थी। राज भी उठाकर बाथरूम में हाथ धोने चला गया। *********************
 
सुबह के नौ बजे थे। राज डाइनिंग टेबल पर बैठा ब्रेकफास्ट का इंतज़ार कर रहा था। डॉली किचन में ब्रेकफास्ट तैयार कर रही थी। थोड़ी ही देर में डॉली आई और दो मग भाप उड़ाती काफी रख गई। राज ने संतोष से सिर हिलाते हुए मग उठाकर एक घूँट भरा। उसका दिल ख़ुश हो गया। कॉफी अच्छी बनी थी। डॉली फिर आई और राज के आगे एक नाश्ते की प्लेट रखकर दूसरी खुद सँभालकर सामने बैठ गई।

“ये क्या फिर मैगी !”–राज अवाक सा प्लेट में देखता हुआ बोला।

“सर, रात मेरी गलती थी। डिनर में मैगी कोई नहीं खाता। लेकिन अब तो ये ब्रेकफास्ट है। इसमें तो मैगी सब खाते हैं।”–डॉली इत्मीनान से कॉफी में घूँट भरती हुई बोली।

“तुम्हें कुछ और बनाना आता भी है ?”–राज किलस कर बोला।

“वह मेरी पाककला का नमूना आप आज रात को देखेंगे।”

“पता नहीं क्या देखेंगे ?”–राज असंतुष्ट स्वर में बोला।

“छोड़ो सर। आप तो ये बताओ कि आप कल वृन्दा से क्या कह रहे थे कि दो बातें आपकी समझ में नहीं आईं। कौन सी बातें है वह ?”–डॉली उत्सुक भाव से बोली।

“सोचो, सारे घटनाक्रम पर विचार करो। समझ जाओगी।”

“यार सर आप ही बता दो ना, जब आप सोच चुके हो।”– डॉली झुँझलाते हुए बोली।

“अंदाज़ा तो लगाओ।”–राज हँसा।

“अंदाज़ा तो कल वाली बात का भी लगा लिया था। पर अंदाज़े से मज़ा तो नहीं आता।”

“कल वाली कौन सी बात ?”–राज के माथे पर बल पड़ गए।

“वह कोई नहीं। आप अपनी बात बताओ। कौन सी दो बातें आपकी समझ में नहीं आईं।”

“नहीं पहले तुम बताओ कौन सी बात का ज़िक्र कर रही हो ?”

“सर जी मैं साफ साफ बता भी दूँगी, क्योंकि मुझे ये घुमा फिरा के बात कहना नहीं आता।”–डॉली उसकी आँखों में झाँकती हुई बोली।”

राज सकपकाया, फिर जल्दी से बोला–“दरअसल मुझे समझ नहीं आया था कि क्यों गिरीश ने वृन्दा जी को ये सब बातें बताईं और फिर क्यों वृन्दा जी ने सब बातें हमें बताईं ?”

डॉली ने उसकी बात पर दो पल विचार किया, फिर बोली–“क्यों बताई होगी सर ?”

“यही तो जानना है। क्योंकि कोई भी काम बेवजह तो नहीं होता। कोई तो वज़ह ज़रूर होगी।”

“कैसे पता चलेगा ?”

“आगे घटने वाली घटनाओं से।”–राज आराम से बोला।

“मतलब ?”

“मतलब ये, कि कुछ ऐसा है, जो हमें दिख नहीं रहा। अब सोच जिस गिरीश ने अपनी पत्नी को कुछ नहीं बताया। यहाँ तक कि पुलिस को सब कुछ बता देने का निर्णय लेने पर भी पत्नी को कुछ नहीं बताया, उसने अब–जब कि डर कर ये काम जारी रखने का फैसला कर लिया–अपनी पत्नी को क्यों बताया ?”

“क्यों बताया ?”

“मिलना पड़ेगा इस गिरीश से।”

“नहीं सर, बिलकुल नहीं। अगर हम गिरीश से मिलते हैं, तो उसे–और उसके मार्फत आगे उस ड्रग रैकेट को–पता चल जाएगा कि हम सब कुछ जानते हैं। और ऐसी हालत में उस ड्रग रैकेट के निशाने पर हम आ जाएँगे।”–डॉली प्रतिवाद करती हुई बोली।

“ये भी सही है। अगर हमें उस रणविजय को फाँसना है, तो निगाह में तो नहीं आना चाहिए उसकी।”

“नहीं सर, हमें नहीं फाँसना किसी को। सर आप समझ क्यों नहीं रहे वह बिजनेसमैन रणविजय नहीं है, वह माफिया गिरोह का बॉस है। हम कुछ नहीं हैं उसके सामने। वह चींटी की तरह मसल देगा हमें।”

“डॉली तू कुछ ज्यादा नहीं डर रही उससे ?”

“मैं आपको इस झंझट में नहीं डाल सकती। आपने जो कुछ मेरे लिए किया है, उस सब के बाद मैं आपको किसी खतरे में नहीं डाल सकती। किसी बिजनेसमैन से लड़ाई में मैं आपको साथ ले सकती थी, जहाँ सिर्फ सफलता या असफलता होती, लेकिन यहाँ तो जान का खतरा है; बल्कि खतरा क्या जान जाना तय है।”

“डॉली हम उससे सीधा टकराने नहीं जा रहे हैं। पहले हम सारी चीजों को समझ लेते हैं, फिर उस पर विचार करेंगे। अगर कोई रास्ता सूझता है, तो देखेंगे। अब तो ठीक है ?”

डॉली ने अनमने भाव से सिर हिलाया, पर उसके चेहरे से चिंता के भाव नहीं गए।

*********************
 
राज और डॉली डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में अपने चेंबर में बैठे थे। मुंशी जी आज के मुक़दमे की तारीख पता करने गए हुए थे। यही चल रहा था आजकल कोर्ट में। सभी पुराने मुक़दमों में सुनवाई ना होकर, तारीख लग रही थी। केवल बेल वर्क हो रहा था। इसलिए कचहरी में भीड़ भी नाममात्र की ही थी। करीब दो बजे थे, जब राज का मोबाइल वाइब्रेट हुआ। उसने मोबाइल उठाकर स्क्रीन पर निगाह मारी, तो अनिल की कॉल पाई।

“हेल्लो।”–उसने कॉल रिसीव करके मोबाइल कान से लगाया।

“कब ?”–उधर की बात सुनकर राज बुरी तरह चौंका।

“कैसे ? हुआ कैसे ?”–उसने जवाब सुनकर फिर सवाल किया।

“ठीक है, आज शाम को घर पर आना। तुझसे और भी बात करनी है कुछ।” राज ने कॉल डिस्कनेक्ट की और मोबाइल सामने टेबल पर रख दिया।

“क्या हुआ ?”–डॉली स्वाभाविक उत्सुकता से बोली।

“मुझे पहले ही समझ जाना चाहिए था।”–राज बड़बड़ाया।

“सर एटीट्यूड मत दिखाओ, बात बताओ।”–डॉली बोली।

“गिरीश की मौत हो गई है।”

“अरे कैसे ?”

“सोच कैसे हुई होगी ?”–राज उसे रहस्यपूर्ण अंदाज़ में देखता हुआ बोला।

“मुझे क्या पता ? आप बताओ।”

“फैक्ट्री गया था। प्रेस–मशीन के पास खड़ा था। पता नहीं कैसे मशीन में फँस गया! मौके पर ही खत्म हो गया।”–कहकर राज ने निगाहें डॉली के चेहरे पर टिका दीं।

डॉली का चेहरा गंभीर हो गया।

“कुछ समझीं ?” डॉली ने प्रश्नवाचक निगाहों से उसकी तरफ़ देखा।

“बिलकुल वैसे ही, जैसे तुम्हारे मम्मी, पापा की हुई थी।”

“यानी इसी ने मारा था उन्हें। कोई दुर्घटना नहीं हुई थी।”–वह शून्य में देखती हुई बोली।

“मुमकिन है। और अगर ये संयोग है, तो कमाल का संयोग है।”

“अब नहीं छोड़ूँगी इसे किसी भी कीमत पर।”–वह दाँत पीसती हुई बोली।

“बिल्कुल नहीं छोड़ेंगे।”–राज आश्वासन भरे स्वर में बोला।

“लेकिन वह कल ही लौटा था। तबीयत भी खराब थी। फिर फैक्ट्री गया ही क्यों ?”–डॉली बोली।

“ये तब सोचने वाली बात है, जब हम ये मानें कि उसकी मौत दुर्घटना है।”

“अब क्या करें ?” “डॉली अब सब कुछ साफ है। ये समझो कि गिरीश ने मर कर हमारी राह आसान कर दी है।”

“मतलब ?”

“मतलब ये कि अब हमारा ‘ऑपरेशन रणविजय’ आज शाम से शुरू।”

“मतलब हम आज आगरा चल रहे हैं।”

“नहीं आगरा नहीं। अगर मैं सही सोच रहा हूँ, तो हमें हमारा जमूरा यहीं मिल गया है। वह ये समझ रहा है, कि उसकी चाल बिलकुल सही बैठ रही है और हमें भी उसे इसी भुलावे में

रखना है।”

“कौन है ?”

“बहुत आसान है। दो में दो जोड़ने जितना आसान है। देख, जो है, और उसमें से जो नहीं है, वह घटा दे, जो बचेगा वही हमारा जमूरा।”–राज मुस्कुराया। डॉली के चेहरे पर सोचने जैसे भाव आ गए।

“ओह्ह्ह।”–फिर जैसे उसके ज्ञानचक्षु खुले। उसने राज की तरफ देखा। राज विजयी भाव से मुस्कुराया।

“लेकिन वह..वह…।” “चल घर चल, आराम से बैठ कर प्लानिंग करते हैं।”

“चलो।”–वह तत्काल उठ खड़ी हुई।

*********************

“ये देख।”–राज अपना लैपटॉप बराबर में बैठी डॉली की तरफ़ घुमाता हुआ बोला। इस समय दोनों घर पर ड्रॉइंगरूम में बैठे थे। राज बहुत देर से अपने लैपटॉप में जाने क्या क्या सर्च कर रहा था।

“क्या है ये ?”–डॉली लैपटॉप पर नज़र आ रही बहुमंज़िला इमारत को देखती हुई बोली।

“ये एक हाउसिंग़ कॉम्प्लेक्स है, जो शहर के बीचों-बीच है, और इसमें बिक्री के लिए फ्लैट भी उपलब्ध हैं।”

“तो ?”

“तो ये कि हम एक ख़रीद रहे हैं। अब आगरा कोई एक दिन का तो काम है नहीं, और पता नहीं आगे क्या हालात बनें। ये जगह हमारी शरणस्थली भी होगी और हमारा अड्डा भी।”

“लेकिन ये तो बहुत ज़्यादा खर्चा हो जाएगा। हम होटल में भी तो रह सकते हैं।”

“इस खर्चे की क्या चिंता ? और वैसे भी ये खर्चा नहीं है। ये तो इन्वेस्टमेंट है। कोविड-19 की वजह से अच्छा डिस्काउंट भी मिल रहा है।”

“पता नहीं सर, पर मुझे अजीब सा लग रहा है।”

“क्यों अजीब लग रहा है ? अरे मेरे पास पैसे हैं। मैं प्रॉपर्टी ख़रीद रहा हूँ। क्या अजीब है इसमें ?”

“आप बात को किसी भी अंदाज़ में कहो सर, पर सच तो यही है ना, कि मेरी वज़ह से हो रहा है ये।”

“मैं इसलिए कर रहा हूँ, कि जब तुम्हें तुम्हारा हक़ मिल जाएगा–जो कुछ भी नहीं तो, बारह पंद्रह सौ करोड़ तो होगा ही–तो दस पाँच करोड़ तो इस गरीब की झोली में डाल ही दोगी।”–राज हँसते हुए बोला।

“पैसा तो कहीं भी इस खेल में है ही नहीं। ना तो मेरे उस राक्षस को मारने की चाह में, और ना ही आपके मेरा साथ देने में।”–डॉली गहरे स्वर में बोली।

“वह सब छोड़ो। ये फ्लैट देखो। टू बी०एच०के० है। फुली फर्निश्ड भी है, और सत्तर लाख में है।”

“क्या देखूँ ? बस बिल्डिंग ही तो दिख रही है।”

“ओपन करके देखो ना। सब दिखेगा।”

“अब किस नज़रिये से देखना है, ये भी तो पता नहीं, वरना मैं तो कपड़े कहाँ सूखेंगे से लेकर वॉशिंग मशीन कहाँ रखी जाएगी, ये तक सब देखती।”–डॉली लैपटॉप अपनी तरफ़ सरकाती हुई बुदबुदाई।

“क्या बोला ?”

“कुछ नहीं बोला।” डॉली फ्लैट देखने में व्यस्त हो गई।

“ठीक है।”–पाँच मिनट बाद वह लैपटॉप वापस राज की तरफ़ खिसकाती हुई बोली।

“अच्छी तरह देख लेना। कपड़े वगैरह सुखाने की जगह है या नहीं, कभी फिर बाद में शिकायत करो।”

डॉली ने ग़ौर से राज की तरफ़ देखा।

राज निर्लिप्त भाव से लैपटॉप में उलझा रहा।

“मेरी सुनते भी नहीं, अपनी सुनाते भी नहीं। साफ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं।”–डॉली बुदबुदाई।

“क्या कहा ?”–राज ने उसकी तरफ़ देखा।

“कुछ नहीं कहा सर जी। बस ऐसे ही कुछ गुनगुना रही थी।

“डॉली अब मज़ाक़ बंद भी कर दे। और अगर बिल्कुल बंद नहीं कर सकती, तो कम से कम उनकी मिकदार ही कम कर दे।”

“सर मैं कभी मजाक नहीं करती।”–डॉली गंभीर स्वर में बोली।

“ले कहते ही कर दिया।”

“नहीं सर, मैं सच कह रही हूँ। बल्कि सच पूछो तो आप ही करते हो।”–डॉली माथे पर बल डालकर बोली।

“ठीक है। मुझे बहस नहीं करनी। अब हमें गंभीरता से एक एक बात पर विचार करना है। डॉली हमारे पास गलती करने की गुंजाइश बिलकुल नहीं है।”

“आप बताओ क्या करना है सबसे पहले।”

“सबसे पहले रिवाइज करते हैं सारा कुछ।”–राज कुछ सोचता हुआ बोला।

“आप करिए सर, मैं सुन रही हूँ। कुछ याद आएगा तो बोलूँगी।”

“देखो हमारा शुरू से आकलन था, कि गिरीश का अपहरण सामान्य नहीं है। ये या तो पत्नी ने पति को, या पति ने पत्नी को रास्ते से हटाने के लिए रचा था।”

“बिलकुल सही।”

“तो गिरीश के मरते ही साफ हो गया, कि अगर हमारा सोचना सही था, तो ये खेल वृन्दा का हुआ। अब आया इसमें ड्रग का एंगल तो सोचने वाली बात ये है, कि जब कारोबार पहले की तरह चालू ही रखना था, तो गिरीश ने वृन्दा से इस बारे में बताया क्यों ?”

“क्यों बताया ?”–डॉली उत्सुक भाव से बोली।

“नहीं बताया। गिरीश ने वृन्दा से कुछ नहीं बताया।”–राज ने आराम से कहा।

“लेकिन वृन्दा ने तो कहा था, कि गिरीश ने बताया, और अगर गिरीश ने नहीं बताया, तो वृन्दा को कैसे पता चला इस बारे में ?”

“वृन्दा ने क्यों गिरीश का नाम लिया और वृन्दा को कैसे पता चला, ये अभी साफ हो जाएगा। तुम ये बताओ, कि जब इस मैटर में हमें कुछ करना ही नहीं था, और उसे सीधे सीधे गिरीश से तलाक़ लेना था, तो वृन्दा ने ये सब हमें क्यों बताया ?”

“क्या पता क्यों बताया ?”–डॉली उलझन भरे स्वर में बोली।

“और इससे भी बड़ा सवाल, वृन्दा कानूनी सहायता लेने पूरा शहर पार करके हम जैसे नामालूम वकीलों के पास ही क्यों आई ? और क्यों उसने हमें वह भारी भरकम रक़म देकर उस काम के लिए हायर किया, जो काम हमें करना आता ही नहीं, या कहो जिस काम में हम निपट अनाड़ी हैं।”

“क्यों ?”

“क्योंकि किसी ने उसे कहा होगा हमारे पास आने के लिए।”

“किसने कहा होगा ? और क्यों कहा होगा ?”

“किसने कहा होगा, ये अंदाज़ा लगाना अब कोई मुश्किल तो नहीं।”

“रणविजय।”–डॉली के मुँह से निकला।

“हाँ, रणविजय। और कोई हो ही नहीं सकता। कल जैसे ही वृन्दा ने उसका नाम लिया, मुझे मेरे सारे सवालों के जवाब मिल गए थे।”

“यानी उसे पता चल गया है, कि मैं यहाँ हूँ, और वह मेरे पीछे है।”–डॉली ने झुरझुरी सी ली।

“और ये भी साफ है, कि वह तुम्हें मारना नहीं चाहता। वरना ये सब ना करता, सीधे हमला ही करवाता।”

“मुझे पता है, कि वह मुझे नहीं मारेगा।”–डॉली जैसे अपने आप से ही बोली।

“ये तुम कैसे श्योर हो कि वह तुम्हें नहीं मारेगा ?”

“सर, मैं तीन दिन उसके चंगुल में रही थी। वह पूरा पागल है सर। मैं आपको बता भी नहीं सकती, कि उसने मेरे साथ क्या क्या किया। बस ये जान लो, कि उसका मक़सद मुझे मारना नहीं, बल्कि अपना खेल वहीं से शुरू करना है, जहाँ उसका खेल मेरे भाग जाने से अधूरा रह गया था।”

“ठीक है। मान लिया नहीं मारेगा, तो तुम परेशान भी मत होओ।”

“सर, मेरी तो ये सोचकर ही हालत ख़राब हो रही है, कि हम उसके पीछे नहीं, बल्कि वह हमारे पीछे है।”

“हाँ, पर उसे ये तो नहीं मालूम ना, कि हम ये बात जान चुके हैं। और हमें ये बात उसे पता लगने भी नहीं देनी है।”

“सर, वैसे आपने कुछ सोचा, कि हमें उसका करना क्या है ? मतलब उसे एक्सपोज़ करके कानून के हवाले करना है, या फिर कुछ और करना है?”–डॉली ने थोड़ी उत्सुकता से पूछा।

“ठोस सबूतों के साथ कानून के हवाले कर पाए, तो कहना ही क्या। पर उसकी ताक़त और पहुँच को देखते हुए, ये मुश्किल ही लगता है, इसलिए और कुछ ही करेंगे।”

“यानी ?”

“यानी उसका समय पूरा हो चुका है। देश की युवा पीढ़ी को नशे के अंधे कुँए में धकेलने वाला, अब सिर्फ तेरा ही गुनाहगार नहीं है। ये क़ौम का दुश्मन है। देश का दुश्मन है। इंसानियत का दुश्मन है।”

“कैसे करेंगे हम ये ?”

“सबसे पहले जमूरे को थामता हूँ। उसी से मिलेगी आगे की राह। पता तो पड़े आख़िर वह चाहते क्या हैं।”

“और थामोगे कैसे उसे ?”–डॉली उसे घूरती हुई बोली।

“अरे कुछ नहीं, बस थोड़ी सी ढील दूँगा उसे। सब कुछ खुद ही उगल देगी।”

“जाने क्यों मुझे लग रहा है कि आप आपदा को अवसर में बदलने के चक्कर में हो। माननीय प्रधानमंत्री जी ने कहीं ये बात इसी परिप्रेक्ष्य में तो नहीं कही है।”–डॉली संजीदगी से बोली।

“तू पागल है क्या ?”

“मैं पागल सही, पर ये नहीं, कुछ और सोचो।”

“क्यों, क्या फर्क पड़ता है ?”

“फर्क पड़ता है क्योंकि...।”

“क्योंकि... ?”–राज ने आँखें सिकोड़कर उसकी तरफ़ देखा।

“क्योंकि मुझे आपसे प्यार हो गया है सर।”–डॉली साफ बोली।

राज को उम्मीद नहीं थी, कि डॉली ऐसे स्पष्ट शब्दों में बोल देगी। वह हबड़बड़ा गया।

“सोच रही थी, कहूँ ना कहूँ, पर मुझसे कोई बात हज़म ही नहीं होती। क्या करूँ ?”

“डॉली तुम्हें पता है कि मुझे शादी नहीं करनी है।”

“तो मुझे ही कौन सी करनी है।”

“तो फिर ?”

“तो फिर ये, कि ये तो पक्का हुआ, कि आपकी बीवी, या मेरा पति बीच में आकर हमारे काम या ज़िंदगी में डिस्टर्ब तो नहीं करेगा। क्योंकि अगर भविष्य में हमारा विचार बदला, तो आपस में ही कर लेंगे ना।”

“हर बात का जवाब है तुम्हारे पास।”

“हर बात का तो नहीं है। हर बात का होता तो क्या बात होती।”

“किस बात का नहीं है ?”

“इसी बात का नहीं है, कि अपना सामान नीचे ले आऊँ, या अभी ऊपर ही रहने दूँ।”–वह मायूस सा चेहरा बना कर बोली।

राज की हँसी निकल गई।

“सर एक बात कहूँ ?”

“हाँ।”

“आज खाना बाहर से मँगा लेंगे। अब आज मूड नहीं रहा कुछ बनाने का।”

“बाहर से ही मँगवायेंगे, क्योंकि आज तो मैं भी मैगी किसी भी क़ीमत पर नहीं खाऊँगा।”–राज हँसा।

“और सर आज दो दो पैग भी लेंगे।”–वह खुशामद सी करती हुई बोली।

“वह किस ख़ुशी में ?”

“मेरे इज़हार और आपके इकरार की ख़ुशी में।”

“मैंने कब इकरार किया ?”

“पर मेरे इज़हार पर मुझे झिड़का भी नहीं। कोई गाली भी नहीं दी। और तो और मना भी नहीं किया। और इकरार क्या होता है ? मैं तो इसी को इकरार मानती हूँ।”

“डॉली मैंने कहा था ना, कि मज़ाक़ नहीं करना है, गंभीरता से इस मसले पर विचार करना है।”

जवाब में डॉली कुछ नहीं बोली। बस अपलक उसे घूरती रही।

“क्या ?”

“सर अगर मैं मज़ाक़ करती हूँ, तो इसका मतलब ये तो नहीं, कि मेरे अंदर फ़ीलिंग्स ही नहीं हैं।”

“अरे ये मैंने कब कहा ?”–राज सकपकाया

“चलो छोड़ो। मेरी सिर्फ एक बात का सीधा जवाब दो, उसके बाद मेरा कोई सवाल नहीं होगा।”

“पूछो ?”

“आप मुझसे प्यार करते हो, या नहीं ?”–डॉली उसके चेहरे पर नजरें गड़ाती हुई बोली।

“पता नहीं।”–राज उससे नजरें चुराता हुआ बोला।

“इसीलिये तो कहा, कि जब तक पता ना चल जाए, लिव इन में रहते हैं।

“नहीं, लिव इन नहीं, ऐसे ही रहते हैं।”–राज जल्दी से बोला।

डॉली ज़ोर से हँसी। राज ने हैरानी से उसकी तरफ़ देखा।

“यार सर तुम्हें तो लड़की होना था।”
 
“अब देख तेरी बातों में, जो इम्पोर्टेंट टॉपिक चल रहा था, उस पर से ध्यान हट गया। इसीलिए कहता हूँ मैं कि...।”

“मेरे पास उस रणविजय को ठिकाने लगाने की सीधी तरकीब है।”

“वो क्या ?”

“मैं सीधी उसके पास चली जाती हूँ, और वहीं रहने लगती हूँ। अब घर के अंदर बेडरूम में तो बॉडीगार्ड नहीं होंगे। और वह सोएगा भी, और दो चार दिन में वह असावधान भी हो जाएगा। फिर पहला मौक़ा मिलते ही काम तमाम कर दूँगी उसका।”

“नहीं।”–राज सख़्ती से बोला।

“क्यों सर ?”

“क्योंकि तुम्हारे उसके पास जाने, और उसका काम तमाम होने के बीच और भी बहुत कुछ होगा।”

“आपको फर्क पड़ेगा ?”

“तुम्हें पता है।”

“क्यों पड़ेगा सर ?”

“ये भी पता है तुम्हें।”

“मुझे तो पता है, पर मसला तो आपको पता चलने का है।”–वह बुदबुदाई।

“क्या कहा ?”

“कुछ नहीं।”

“ये होंठो ही होंठो में मत बुदबुदाया करो तुम।

“जो आज्ञा।”

“देख डॉली , जो होना है, वह तो होगा ही। अब अपना सारा ध्यान, अपनी सारी ऊर्जा, उस रणविजय के ख़ात्मे पर लगा दे।”

“ठीक।”

“याद रख, ज़िंदा रहना है, तो मारना पड़ेगा।”

“ठीक है सर।”

“और एक काम कर।” डॉली ने प्रश्नवाचक निगाहों से उसकी तरफ़ देखा।

“अपना सामान नीचे ले आ और सर सर कहकर सरसराना भी बंद कर।”

“जियो सर।”–डॉली उत्साह से बोली।

“लेकिन दूसरे बेडरूम में रखना।”–राज जल्दी से बोला।

डॉली के उत्साह को ब्रेक सी लगी।

“कब तक छुपेगी कैरी पत्तों की आड़ में, आएगी किसी रोज़ तो बिकने बाज़ार में।”–वह बुदबुदाई।

“क्या कहा ?”

“कुछ नहीं।”–उसने मुँह बिचकाया।

*********************
 
रणविजय कोई पचपन साल का औसत क़दकाठी का आदमी था। सिर पर घने काले बाल थे, जो वक़्त के साथ सफेद हो चले थे। गोरा रंग, सुंदर नैननक़्श, आँखों पर सुनहरी फ्रेम का नज़र का चश्मा लगाए, वह बहुत ही संभ्रांत और पढ़ा लिखा नज़र आता था, जबकि पढ़ाई-लिखाई के नाम पर वह दसवीं फेल था, और सभ्रांत दिखने का, उसके इस ऊँचाई तक पहुँचने में बहुत बड़ा रोल था। उसके चेहरे पर हमेशा एक निश्छल सी मुस्कुराहट रहती थी, जिससे लोग सहज ही उसका विश्वास कर लेते थे। इस पूरी दुनिया में उसे अगर किसी से प्यार था, तो वह खुद से ही था। बाकी सभी उसके लिए उसकी महत्त्वाकांक्षा और आनंद प्राप्ति के ज़रिया मात्र थे। बेहद ही स्वार्थी और निर्मम इंसान था रणविजय। लेकिन जो कुछ भी वह था, उसका अंदाज़ा उसके चेहरे और बोल चाल से लगा पाना असंभव था। यही उसकी सफलता का राज भी था। वह कभी भी वह नहीं कहता था, जो वह कहना चाहता था, बल्कि वह हमेशा वह कहता था, जो सामने वाला सुनना

चाहता था। शाम के सात बजे थे। रणविजय अभी तक फैक्ट्री स्थित अपने ऑफिस में बैठा था। अलबत्ता उसने कोट उतार कर अपनी राज सिंहासन जैसी कुर्सी की बैक पर टांग दिया था और टाई ढीली कर के कमीज की आस्तीन ऊपर चढ़ा ली थी। उसके सामने व्हिस्की का आधा पिया पैग रखा था और हाथ में ताज़ा सुलगाया सिगरेट था। उसने गिलास उठा कर एक घूँट पिया और सिगरेट का कश लगाया और गिलास वापस टेबल पर रखकर कुर्सी पर आगे पीछे झूलने लगा। तभी दरवाज़े पर नॉक हुई। उसने सामने दीवार पर लगी स्क्रीन पर निगाह मारी, जिसमें अलग-अलग डिविज़न होकर पूरी फैक्ट्री का दृश्य दिखाई दे रहा था। उसने दरवाज़े पर खड़े आफताब को देखा। उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। आफताब उसका पर्सनल सिक्योरिटी इंचार्ज कम ट्रबल शूटर था। ट्रबल शूटर क्या उसका दाहिना हाथ था। उसका राज़दार था। उसने सामने पड़ा रिमोट उठा कर दरवाज़ा अनलॉक कर दिया। “शुरू हो गए सर।”–वह अंदर आकर सामने पड़े जाम को देखता हुआ बोला। “क्या करूँ पूरे दिन की मगज़मारी के बाद।” “सर एक बहुत मजबूर लड़की है। कई दिन से चक्कर लगा रही है नौकरी के चक्कर में।” “अरे तो इसमें मैं क्या करूँ ? जिसका ये काम है वह देखे।”–रणविजय नाराज़गी भरे स्वर में बोला। “जिनका काम है, उन्होंने तो मना कर दिया, क्योंकि लड़की के पास कोई एक्सपीरियंस ही नहीं है।”

“सही मना किया।” “सर लड़की का एक ही भाई है। जो उससे बहुत छोटा है। उसके भाई को कैंसर है। अभी फर्स्ट स्टेज है, इलाज हो तो बच सकता है सर।” “मर जाए साला पिल्ला हमें क्या बे।”–रणविजय नई सिगरेट सुलगाता हुआ झुँझला कर बोला। “सर, मैंने कहा कि कोई एक्स्पेरियेन्स नहीं है लड़की को, समझिये सर।”–आफताब अर्थपूर्ण स्वर में बोला। “ऐसा क्या!”–रणविजय की आँखें सिकुड़ गयीं। “हाँ सर। और है भी बिलकुल आपके मतलब की। घरेलू सी, सीधी-सादी।” “साले तुझे कैसे पता उसके बारे में इतना ?”–रणविजय उसे घूरता हुआ बोला। “सर जब मैं आ रहा था, तो बाहर बड़ी खड़ी रो रही थी। नौकरी कि तलाश में आई थी। मना कर दिया गया था। उसे देखते ही मुझे सबसे पहले आपका ख्याल आया। मैंने उससे पूछा, तो उसने सारा कुछ सुना डाला। मुझे तो तरस आ गया सर। बहुत ही मासूम है। मैंने बाहर बैठा दिया है। अब हुज़ूर भोग लगा लें, तो फिर बाद में हम भी मुँह झूठा कर लेंगे।”–आफताब धूर्तता पूर्वक बोला। “साले सारा हिसाब लगाए बैठा है।”–रणविजय ज़ोर से हँसा। आफताब ने भी उसका हँसी में साथ दिया। “तो आज पहले ही दिन कर दें कांड, या आज नौकरी पर रख कर एक दो दिन बाद करें ?” “शुभस्य शीघ्रम सर।” “अच्छा तो चल भेज उसे, देखता हूँ।” “भेजता हूँ सर। आप पहले उसे नोटों की झलक दिखा

देना।” “अपने बाप को मत सिखा…क्या ना सिखा ?” “समझ गया सर। मेरी ऐसी मजाल कहाँ।”–आफताब उठा और बाहर को चला गया। पंद्रह मिनट बाद दरवाज़े पर दोबारा नॉक हुई। रणविजय ने रिमोट उठाकर दरवाज़ा अनलॉक कर दिया। “कम इन।”–वह धीरे से बोला, लेकिन दरवाज़े के बाहर लगे स्पीकर पर आवाज स्पष्ट गूँजी। डरी सहमी, सकुचाई सी लड़की ने अंदर कदम रखा। ऑफिस की भव्यता देखकर वह और सहम, सिकुड़ गई। अभिवादन करके वह वहीं खड़ी हो गई। “आ जाओ बैठो।”–रणविजय उसकी तरफ़ देखता हुआ बोला। लड़की धीरे से एक कुर्सी पर बैठ गई। उसकी निगाहें रणविजय की तरफ़ उठ ही नहीं पा रही थीं। उसने एक सस्ता सा सूती सलवार सूट पहन रखा था। दुबली-पतली वह लड़की मुश्किल से चौबीस-पच्चीस साल की रही होगी। साँवली रंगत वाली वह लड़की बेहद खूबसूरत थी। बस ग़रीबी की धूल ने उस हीरे को ढँक रखा था। वह धूल हटने की देर थी, वह लड़की क़यामत थी। उसके व्यक्तित्व में सबसे आकर्षक थी उसकी बड़ी बड़ी आँखें, जिनमें इस समय व्याकुलता भरी हुई थी। “क्या नाम है तुम्हारा ?”–रणविजय फिर अपने संभ्रांत चेहरे के पीछे छुप गया। “जी आहना।”–लड़की बिलकुल भी सहज नहीं थी। वह अपने दुपट्टे के कोने को अपने एक हाथ की उँगली में लपेटे और खोले जा रही थी।

“अब तक कहाँ काम करती थी ?”–रणविजय ने कोमल स्वर में पूछा। “जी कहीं नहीं।”–लड़की इस सवाल से रुआँसी सी हो गई। “क्वालिफिकेशन क्या है ?” “जी बी०ए० किया है इसी साल।”–लड़की को पता था कि ये सारे सवाल उसके ख़िलाफ़ जा रहे हैं। “अब क्या काम दिया जाए तुम्हें ?”–रणविजय विचार सा करता हुआ बोला–“कम्प्यूटर चलाना आता है ?” लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी झुकी आँखों से एक आँसू निकल कर उसकी गोद में गिर गया। “आहना परेशान ना हो। देखते हैं तुम्हारे लिए कोई ना कोई काम।”– रणविजय मीठे स्वर में बोला। “सर मेरे माँ-बाप नहीं हैं। बस एक छोटा भाई है। उसे भी कैंसर हो गया है।”–लड़की का सब्र टूट गया और वह बाक़ायदा रोने लगी। “कुछ नहीं होगा तुम्हारे भाई को।”–रणविजय इतने दृढ़ स्वर में बोला कि लड़की रोना भूल गई। “अगर माँ-बाप नहीं हैं और तुम भी कोई काम नहीं करतीं, तो घर का खर्चा कैसे चलता है ?” “सर माँ का अभी दो महीने पहले ही देहांत हुआ है। वह घर पर ही ठेके पर बैग सिल कर तैयार करती थी। मैं भी उसी के साथ यही काम करती थी और साथ ही साथ पढ़ाई भी करती थी।” “रहती कहाँ हो ?” “गोपालपुरा।” “भाई की बीमारी का पता कब चला ?” “अभी दस दिन पहले। उसे लगातार पेट में दर्द रहता

था। डॉक्टर को दिखाया, तो उसने टेस्ट करवाए। उसमें ट्यूमर आया है सर।”–लड़की के रूक चुके आँसू फिर बह निकले। “तुम्हें पता है कि इसके इलाज़ में कितना खर्च आएगा ? और तुम्हारे पास टाइम कितना है ?” “सर मेरे पास केवल दस हज़ार रुपये थे। वो भी सारे सब टेस्ट कराने में ही खर्च हो गए। मुझे पता है सर कि इलाज़ में बहुत खर्चा आएगा।” “तो अगर तुम्हें नौकरी मिल भी गई, तो कितने की मिलेगी ? और कितने दिन में वह रक़म जोड़ पाओगी जिससे भाई का इलाज कर सको ? जोड़ भी पाओ तो क्या उतना टाइम है तुम्हारे पास ?” “पता नहीं सर। पर बैठी भी तो नहीं रह सकती। कुछ तो करना ही पड़ेगा।” “तैयार हो ‘कुछ’ करने के लिए ?” लड़की ने सर झुका लिया। लड़की गरीब थी, नातजुर्बेकार थी, पर नादान तो नहीं ही थी। “जवाब दो।” लड़की पूर्ववत निश्छल बैठी रही। “चलो फिर ठीक है। कल से काम पर आ जाना।”–रणविजय शांत स्वर में बोला। लड़की ने हैरानी से उसकी तरफ़ देखा। “तनख़्वाह पंद्रह हज़ार रूपये महीना…ठीक है ?” “थैंक यू सर।” “कोई बात नहीं। दिल लगाकर काम करना। कुछ ही दिन में काम सीख जाओगी, तो और पैसे बढ़ा देंगे। “बहुत बहुत शुक्रिया सर।”–लड़की के चेहरे पर कुछ रौनक़ सी आई। “सारे पैसे जोड़ कर चलोगी, तो चार पाँच साल में पैसे

जोड़कर भाई का इलाज भी कर लोगी। बस लगन से काम करना।”–रणविजय आश्वासन भरे लहजे में बोला। “चार पाँच साल ?”–लड़की की आँखें फैल गईं। “हाँ, इतने तो लगेंगे ही। क्योंकि कैंसर के इलाज में कीमोथेरेपी करेंगे, तो भी कुल मिलाकर आठ दस लाख तो लग ही जाएँगे।”–रणविजय आराम से बोला। “आठ दस लाख ?”–लड़की दहशतनाक लहजे में बोली। “तुम्हारे डॉक्टर ने क्या बताया था ?” “उसने कहा था कि बहुत पैसे लगेंगे, पर ये नहीं बताया था कि कितने।” “क्या नाम था डॉक्टर का, जिसे दिखाया था ?”–रणविजय ने पूछा। “डॉक्टर वेदांत आहूजा। वह संजय पैलेस में बैठते हैं।” “पता है मुझे कि कहाँ बैठता है।”–रणविजय ने मोबाइल निकालकर पहले डॉक्टर का नम्बर सर्च किया, फिर नम्बर मिला दिया और मोबाइल स्पीकर पर कर दिया। “हेल्लो।”–उधर से आवाज़ आई। “हेल्लो हम सांसद रणविजय सिंह बोल रहे हैं। डॉक्टर वेदांत बोल रहे हैं ?”–रणविजय बोला। “नमस्कार सर, मैं डॉक्टर वेदांत ही बोल रहा हूँ। आदेश करिए सर।” “आपके पास एक मिस आहना आईं थीं अपने भाई को दिखाने। उसे कैंसर बताया गया है।” “सर पेशेंट का नाम पता चल सकता है ?” रणविजय ने लड़की की तरफ़ देखा। “विशाल।”–आहना जल्दी से बोली। “विशाल।”–रणविजय ने दोहराया।

“विशाल…हाँ सर याद आया। उसे कैंसर है। अभी फ़र्स्ट स्टेज ही है। टाइम से इलाज हो जाए, तो बिलकुल सही हो जाएगा।”–डॉक्टर विनम्रतापूर्वक बोला। “टोटल खर्चा तो बताइए कितना आएगा ?” “सर वैसे तो आठ से दस लाख तक आता है, पर आपने फोन किया है, तो पाँच में ही हो जाएगा। और भी आप जो आदेश करें सर।” “ठीक है। हम बात करके बताते हैं।”–रणविजय ने कहा और मोबाइल डिस्कनेक्ट करके सामने टेबल पर रख दिया। “सर मैं क्या करूँ ? इतने पैसे तो नहीं हो पाएँगे मेरे पास।” “हौसला रखो। भगवान पर भरोसा रखो सब ठीक हो जाएगा।”– रणविजय आश्वासनपूर्ण स्वर में बोला। “कैसे ठीक होगा सर ? डॉक्टर ने अभी कहा कि टाइम से इलाज होना है।” “भगवान पर भरोसा रखो। निकलेगा कोई ना कोई हल।” “सर आप दे दो छह लाख एडवांस। मैं आपकी एक-एक पाई दूध में धोकर लौटाऊँगी। आपका अहसान ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगी। आपके पैर धो धो कर पियूँगी।” “ठीक है दे दूँगा।”–रणविजय आराम से बोला। “जी !”–लड़की को अपने कानों पर यक़ीन नहीं हुआ। रणविजय ने टेबल की ड्रॉअर में से दो-दो हज़ार की पाँच गड्डी निकाली और सामने टेबल पर रख दीं। लड़की की आँखें गड्डियों पर चिपक कर रह गईं। उसने थूक सटका और सूख चुके होठों पर जीभ फिराई। “ये पैसे नहीं, तुम्हारे भाई की ज़िंदगी है। अब ये तुम्हारे ऊपर है कि तुम क्या फैसला करती हो।”

“मैं अपने राजा को कुछ नहीं होने दूँगी।”–वह जैसे खुद से ही बोली। “शाबास।” “मुझे क्या करना होगा सर ?”–लड़की के चेहरे पर दृढ़ निश्चय के भाव थे। “वही करना होगा, जो तुमने अभी कहा।”–रणविजय मधुर स्वर में बोला। लड़की ने सवालिया निगाहों से उसकी तरफ़ देखा। “पैर धो-धो कर पीने होंगे ज़िंदगी भर।”–रणविजय कुटिल स्वर में बोला। “वह तो मैंने कहा ही सर। मैं आपका अहसान ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगी।” “वह कोई बात नहीं। वह तो हम ही नहीं भूलने देंगे। फिलहाल सिर्फ एक बात याद रखो कि ये पैसे तुम्हें उठाने हैं या नहीं ? उठाना, न उठाना तुम्हारी मर्ज़ी, लेकिन अगर उठाती हो, तो आजीवन मेरी किसी बात को ना मत कहना। वरना बचाता मैं उतना बढ़िया नहीं, जितना बढ़िया मारता हूँ।”–रणविजय का स्वर हिंसक हो गया। “आप जो भी कहेंगे मैं मानूँगी।”–लड़की सिर झुकाए-झुकाए ही बोली। उसे अंदाज़ा हो चला था कि उसे क्या काम बताया जाएगा। इसलिए वह खुद को मानसिक रूप से तैयार कर रही थी। “ठीक है। तो ये पैसे तेरे। और सुन तेरे भाई का इलाज भी हम सांसद कोटे से करा देंगे। कोई पैसे खर्च करने की ज़रूरत नहीं है। ये पैसे तेरे भाई की पढ़ाई में काम आ जायेंगे। कितना बड़ा है तेरा भाई ?” “जी अभी दस साल का है।”–लड़की ने चोर निगाहों से उसकी तरफ़ देखते हुए बताया।

“बढ़िया...अभी छोटा है, तो किसी अच्छे बोर्डिंग में डलवा देंगे। जल्दी ही कवर कर जाएगा।” “वह पढ़ने में बहुत तेज है सर।”–लड़की अब सहज होती जा रही थी। “बढ़िया, अब तुम अपना पता बताओ। मैं अभी डॉक्टर को बोलता हूँ, वह एम्बुलेंस भेज कर तुम्हारे भाई…क्या नाम बताया था ?...हाँ विशाल…विशाल को एडमिट करवा लेगा।” “आज ही ?” “आज ही नहीं अभी। पहले ही दस दिन लेट हो।” “मुझे जाना पड़ेगा सर। मेरे बिना वह कैसे जाएगा ?” “उसके पास फोन कर लो।” “सर उसके पास फोन नहीं है।”–लड़की संकोच भरे स्वर में बोली। “कोई बात नहीं। जब तक एंबुलेंस वहाँ पहुँचेगी, उसके पास फोन पहुँच जाएगा। आराम से वीडियो कॉल करके समझा देना। फिर कभी भी किसी भी टाइम उससे बात करना।” “थैंक यू सर। सर आप बहुत अच्छे हो। आपने मुझे जिला दिया।” रणविजय मुस्कुराया और टेबल पर रखी बेल बजाई, साथ ही रिमोट से दरवाज़ा अनलॉक कर दिया। आफताब आज्ञा लेकर अंदर आया। रणविजय ने उसे अपना मंतव्य बताया। उसने सहमति में सर हिला दिया। लड़की ने वहीं रखे लेटर पैड पर अपने घर का पता लिख कर आफताब को दे दिया।” आफताब ने सलाम किया और ऑफिस से निकल गया। “अब ख़ुश ?”–रणविजय लड़की की तरफ़ देखकर मुस्कुराया।

“सर आप बहुत अच्छे हो।”–लड़की के चेहरे पर पहली बार सुकून सा नज़र आया। “सामने अलमारी में बोतल है। निकाल कर दो पैग बना कर लाओ।”–रणविजय सामान्य स्वर में बोला। “जी ?”–आगे के घटनाक्रम का अंदाज़ा होने, और खुद को उसके लिए मानसिक रूप से तैयार कर लेने के बावजूद लड़की को झटका सा लगा। “कौन सी बात समझ नहीं आई ?”–रणविजय ने उसे घूरा। “सॉरी सर अभी बनाती हूँ।”–लड़की उठी और अलमारी की ओर बढ़ गई। निपट अनाड़ीपन से उसने दो पैग बनाए और रणविजय के सामने रख दिए।” रणविजय ने एक पैग उठाया और एक साँस में खाली कर दिया। “एक सिगरेट जला कर दे।”–रणविजय सामने पड़े सिगरेट के पैकेट की तरफ़ इशारा करते हुए बोला। आहना ने चुपचाप पैकेट उठाया और एक सिगरेट निकाल कर होंठों में दबा कर जलाने की कोशिश करने लगी। दो तीन प्रयासों के बाद भी सुलगाने में इसलिए कामयाब हो पाई, क्योंकि लाइटर था, माचिस नहीं। उसने सिगरेट होंठो से निकालकर रणविजय की तरफ़ बढ़ाई। रणविजय ने सिगरेट लेकर ज़ोरदार कश लगाया और धुएँ की दोनाली सी छोड़ी। “क्या उमर है तेरी ?” “जी पच्चीस साल।” “बॉय फ्रेंड है कोई ?”

उसने जल्दी-जल्दी इनकार में सिर हिलाया। “ऐसा झूठ क्या बोलना, जो अभी थोड़ी देर में पकड़ा जाए ?” उसने दोबारा मज़बूती से इनकार में सिर हिलाया। “कोई दूर का मामा, मौसा, फूफा बचपन में ही हाथ साफ कर गया हो?” वह हिचकिचाई। रणविजय ने ज़ोरदार कहकहा लगाया। आहना के कान लाल हो गए। रणविजय ने दूसरा पैग उठाया और एक ही साँस में फिर खाली कर दिया। “चल और ला बना कर।” लड़की गई और दो पैग फिर बना लाई। “बोरियत हो रही है। चल डांस करके दिखा।” लड़की ने अचरज से उसकी तरफ़ देखा। रणविजय ने मोबाइल पर म्यूज़िक लगाया और उसे इशारा किया। “मुझे नहीं आता सर।” “मैंने एक बार भी कहा कि मेरे पास पैसे नहीं हैं, या कम हैं ? साली जितने तूने माँगे, उससे तिगुने दिए।” “सर सच में मुझे डांस नहीं आता।”–लड़की रुआंसी सी हो उठी। “नहीं आता तो ना सही। चल कपड़े उतार।” लड़की को ये तो अंदाज़ा था, कि ऐसा ही कुछ होगा, पर ऐसे होगा इसकी कल्पना तक नहीं की थी। “सुना नहीं।”–रणविजय ने घुड़का। “सर, अभी राजा से बात हो जाए, फिर जैसे आप कहिये...उससे विडीयो कॉलिंग होगी ना सर ?”–लड़की

विनती सी करती हुई बोली। “साली कुतिया हर बात में नख़रे। तुम सारी लड़कियाँ एक ही जैसी होती हो, बेवफ़ा, धोखेबाज़, मतलबपरस्त।”–अब रणविजय को सुरूर हो चला था। आहना की समझ में नहीं आया कि वह सारी नारी जाति को ही क्यों लपेटने लग गया था। “तुम्हें ठोकरों में ही रखना चाहिए। तुम साली उसी की होती हो, जिसकी टांग के नीचे होती हो।”–उसका प्रलाप जारी था। आहना की समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक उसे हुआ क्या था।” तभी रणविजय का मोबाइल बाईब्रेट हुआ। उसने मोबाइल उठाकर निगाह मारी, तो आफ़ताब की वीडियो कॉल थी। तत्काल उसके चेहरे के भाव जैसे जादू के ज़ोर से बदले। उसने कॉल रिसीव की।” “हेल्लो विशाल।”–वह इतने मीठे स्वर में बोला कि आहना ने हैरानी से उसकी तरफ़ देखा। “हेल्लो अंकल, मुझे दीदी से बात करनी है।” रणविजय ने मोबाइल आहना की तरफ़ बढ़ा दिया। “राजा, कैसा है बेटा ? अच्छा सुन ये जो अंकल आए हैं ना, ये तुझे हॉस्पिटल ले जाएँगे, तू चला जा, मैं तुझसे सुबह मिलने आऊँगी।” “नहीं अभी आओ।” “राजा बेटा ज़िद नहीं करते। अभी दीदी को बहुत काम है। अंकल तुझे मोबाइल भी दिला देंगे। उससे तू खूब गेम खेलना, और जब चाहे मुझसे बात भी कर लेना। ठीक है ?” “कौन सा मोबाइल दिलाएँगे ?”–बच्चे ने उत्सुक भाव से

पूछा। “आइ फ़ोन इलेवन।”–रणविजय ज़ोर से बोला। “ये...।”–बच्चा ख़ुशी से चिल्लाया। “तू ख़ुश है ना राजा ?”–आहना की आँखों में आँसू भर आए। “बहुत, लव यू दीदी।”–विशाल ने कॉल डिस्कनेक्ट कर दी। रणविजय ने दोबारा कॉल मिलाई और आफ़ताब से बच्चे को मोबाइल दिलाने को बोल दिया। आहना आँखों में आँसू लिए कृतज्ञ भाव से उसे देखे जा रही थी। “कित्ता ख़ुश है मेरा राजा।”–वह जैसे अपने आप से बोली। “तू ख़ुश है ना ?”–रणविजय फिर मीठे स्वर में बोला। “मेरा राजा मेरी जान है सर। मेरी ज़िंदगी उस पर क़ुर्बान है। आज आपने मुझे ख़रीद लिया। इलाज से भी ज़्यादा मोबाइल दिला कर। कितना...कितना ख़ुश था मेरा राजा।” “चल तो दो पैग और ला बना कर।” आहना बना लाई। “पिएगी ?” “जो आप बोलो सर।”–वह दृढ़ लहजे में बोली। “इधर आ।” आहना उठी और टेबल का घेरा काटकर उसके सामने खड़ी हो गई। रणविजय ने ड्रॉअर से एक पट्टा सा निकाला, जिसके साथ एक ज़ंजीर बंधी थी। उसने खड़े होकर पट्टा आहना के गले में बाँध दिया। आहना ख़ामोश खड़ी रही।

“मुझे इंसान अच्छे नहीं लगते। मुझे कुत्ते अच्छे लगते हैं। कुत्ते कभी अपने मालिक, अपने साथी को धोखा नहीं देते।”–वह ज़ंजीर का सिरा अपने हाथ में लेकर कुर्सी पर बैठता हुआ बोला। आहना बुत की तरह ख़ामोश खड़ी थी। “सिट सिट...सिट।”–वह ज़ंजीर को ज़मीन की तरफ़ झटके देता हुआ बोला। आहना खामोशी से ज़मीन पर बैठ गई। रणविजय ने एक गिलास उठाया और धार बना कर सारी व्हिस्की ज़मीन पर गिरा दी। “कम ऑन...हैव इट।”–उसने आहना की गरदन पर अपना जूता रख कर बलपूर्वक उसका मुँह ज़मीन पर लगा दिया। किंकर्तव्यविमूढ़ सी आहना को जैसे लकवा मार गया। “साले ग़रीबों, खाने का ठिकाना नहीं, नाम रखते हो आहना। तुम्हारी औक़ात है ये नाम रखने की।” आहना की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। अभी तक रणविजय ने उसे कहीं से भी छूने की कोशिश नहीं की थी। उसका तो जैसे ध्यान ही नहीं था उसकी तरफ या उसके अंगों की तरफ़। जाने कौन सी भड़ास थी, जो वह निकाल रहा था और उसे सहने के अतिरिक्त आहना के पास दूसरा कोई उपाय भी नहीं था। यकायक रणविजय ने उसके गले से पट्टा निकाल दिया और उसे खड़ा हो जाने दिया। आहना सर झुकाए उसके सामने खड़ी हो गई। “जा.. दो पैग और बनाकर ला।” यंत्रचालित सी आहना गई, और दो पैग बना लाई। “लो पियो।”–रणविजय ने शराफ़त से एक गिलास उसे

थमाया। आहना ने चुपचाप गिलास थाम लिया। रणविजय ने हाथ पकड़ कर उसे अपनी गोदी में बैठा लिया। वह चुपचाप बैठ गई। “पी।”–रणविजय ने उसका गिलास थामा हुआ हाथ उसके मुँह की तरफ़ धकेला। उसने एक घूँट भर ली। कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। ना कड़वी लगी, ना कोई अहसास हुआ। रणविजय ने उसका गिलास अपने आगे किया और उसमें थूक दिया। “अब पी।” वह उसे भी यंत्रचालित सी पी गई। “साली कोई विरोध क्यों नहीं करती ?”–रणविजय गरजा। “आप मालिक हो। आपका कैसा विरोध ?”–वह भावशून्य आवाज में बोली। रणविजय कुछ देर सोचता रहा। फिर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। “आफताब ने अब तक तो दिला दिया होगा फोन राजा को।” मुर्दा जिस्म में हरकत सी हुई। “वीडियो कॉल करके देखते हैं। कितना अच्छा लगेगा राजा के चेहरे की ख़ुशी देख कर।” उसने मुड़कर रणविजय की तरफ़ देखा। रणविजय ने प्यार से उसके चेहरे पर आए बाल संवार दिए। “कल उसके लिए ढेर सारी चाकलेट लेकर चलेंगे। क्योंकि फिर उसके बाद बहुत दिन तक उसे ये सब नहीं खाने देंगे।”

“कॉल मिलाइए न सर, प्लीज़।” “लीजिए, आप खुद ही मिलाइए।”–उसने अपना मोबाइल उसे थमा दिया। “नम्बर ?” “लास्ट कॉल बुद्धू।”–उसने उसके सर पर हलके से चपत मारी। संभ्रांत रणविजय लौट आया था। आहना के चेहरे पर फीकी सी मुस्कान आ गई। वह रणविजय की गोद से उठी और बराबर में खड़ी होकर कॉल मिलाई। “दीदी ये देखो।”–विशाल ख़ुशी से झूमता हुआ सा मोबाइल दिखाता हुआ बोला। “अरे रे ये तो बहुत अच्छा है।”–आहना की आवाज ख़ुशी से रुंध सी गई। “ये मेरा है, और ये मैं अब तुम्हें भी नहीं दूँगा।”–विशाल अपनी ख़ुशी सँभाल नहीं पा रहा था। “हाँ बेटा, ये सिर्फ तुम्हारा है, सिर्फ तुम्हारा।” “दीदी तुम्हें नहीं पता कि इसमें कित्ते फंक्शन हैं ?” “सुबह देखूँगी ना बच्चे।” “हाँ, पर अपने हाथ से दिखाऊँगा। तुम्हारे हाथ में नहीं दूँगा।” “अच्छा अपनी दीदी को नहीं देगा ?” “दे दूँगा, पर गिराना मत।”–विशाल थोड़ा सोचकर बोला। “नहीं गिराऊँगी मेरे बच्चे।” “और दीदी ये देखो कित्ता बड़ा कमरा है। इसमें टी०वी०, ए०सी० सब है।” “सुबह आऊँगी ना मेरे भाई।”

“ओके अब काटो फोन। मुझे सब सेटिंग करनी है ना फोन में।”–विशाल ने फोन काट दिया। आहना की आँखों में आँसू भरे हुए थे। वह नीचे बैठ गई और ज़मीन पर पड़ा पट्टा अपने गले में डाल कर ज़ंजीर रणविजय के हाथ में थमा दी। और उसकी तरफ़ दोनों हाथ जोड़ दिए। रणविजय ने पट्टा उसके गले से निकाला और उसे उठा कर खड़ा कर दिया। “जितनी ख़ुशी दी है, उसके बराबर ग़म कभी नहीं दे पाओगे।”–वह भारी आवाज़ में बोली। “जाओ, वाश रूम में जाकर हुलिया सुधार लो। हम अभी चल रहे हैं राजा से मिलने।” रणविजय की बात सुनते ही उसके चेहरे पर जैसे हज़ार वाट का बल्ब सा जल गया। “जाओ फटाफट अपना हुलिया सुधारो।”–रणविजय उसे वाशरूम की तरफ़ धकेलता सा हुआ बोला। रणविजय कभी मुर्दा शिकार नहीं करता। अब पहले इसे उम्मीदों की बुलंदी पर ले जाऊँगा, फिर दूँगा धक्का। तब, जब इसे सपने में भी गुमान नहीं होगा। साली कुतिया, है तो औरत ही ना। रंग दिखाए बिना, बाज़ थोड़े ही आएगी।” उसके वाशरूम जाते ही रणविजय बड़बड़ाया। *********************
 
अनिल और राज दोनों यार अपनी छोटी सी बार पर जमे बैठे थे। आज दोनों ही बीयर पी रहे थे। राज अनिल को रणविजय वाला सारा किस्सा सुना चुका था, सिवाय डॉली के साथ हुए वाकये को छोड़कर। “भाई ये तो साला बड़ा हरामी निकला। शक्ल से तो ऐसा लगता है, जैसे इससे बड़ा कोई शरीफ़ ना हो।

“देखेंगे यार इसकी भी शराफ़त।”

“कैसे ?”

“सोचेंगे, अब खुद ही कुछ करना पड़ेगा। क्योंकि पुलिस तो पता नहीं कुछ कर भी पाएगी या नहीं।”

“हमारे लेवल का पुलिसिया तो पास भी नहीं फटकेगा इसके।”

“वही तो।”

“भाई मुझे कप्तान ने एस०टी०एफ० में ले लिया है। अब ना वर्दी का झंझट, ना कोई थाने का चक्कर। जहाँ जिस थाना क्षेत्र में चाहो घुस जाओ।”

“बधाई हो।”

“वह तो हुई। पर ये डॉली कहाँ है आज ?”

“ये रही डॉली , बताओ क्या करना है डॉली का ? डॉली करनी है क्या डॉली की ?”–डॉली अंदर दाखिल होती हुई बोली।

“क्या बात है आज तो मिज़ाज ही नहीं मिल रहे डॉली के ?”–अनिल ग़ौर से उसे देखता हुआ बोला।

“क्यों मिलेंगे मिज़ाज डॉली के। अब डॉली नहीं, डॉली भाभी हो गई है।”–डॉली काउंटर पर अनिल के बराबर में बैठती हुई बोली।

“हेहेहे...ओ भाई ये क्या बोल रही है।”–अनिल का नशा हिरन हो गया।

“डॉली ।”–राज चेतावनी सी देता हुआ बोला।

“क्या डॉली ? यार सर ये तो अपने आदमी हैं। अब इससे क्या छुपाना।”

राज ने असहाय भाव से कंधे झटके।

“भाई तू तो सुपर फ़ास्ट निकला।”–अनिल आँख फैलाता हुआ बोला।

“कोई सुपरफास्ट नहीं है। लुल्ल है आपका दोस्त। सुपरफास्ट है आपकी भाभी। आपकी डॉली भाभी।”

“डॉली प्लीज़।”–राज तीव्र स्वर में बोला।

“ओके सर, अब और किसी से नहीं बताएँगे।”–डॉली नकली खेद प्रकट करती हुई बोली।

“अब हम तो एक काम लेकर आए थे डॉली के पास। अब डॉली भाभी से कैसे कहें ?” “कहते रहना, जो भी कहना हो। पहले भाभी को एक मग बीयर दो।”

“अरे भाभी ये तुमने भली कही। ये लो।”–अनिल ने तुरंत एक मग में बीयर डाली और राज के मना करते-करते भी डॉली को थमा दिया।

“दैट्स लाइक ए गुड भैया।”–डॉली मग से एक लम्बा सा घूँट भरते हुए बोली।

“इसे हज़म नहीं होती।”–राज असंतोष भरे स्वर में बोला।

“ओहो...यानी पिला भी चुका है। भाई मैं तो तुझे बड़ा शरीफ़ आदमी समझता था।”

“क्या काम बता रहे थे आप भैया ?”–डॉली होंठ चटकारते हुए अनिल से बोली।

“ये दो नम्बर हैं। इनसे ऐसे ही मिस्ड कॉल मार कर दोस्ती कर लो।”–अनिल एक काग़ज़ उसे थमाता हुआ बोला।

“मामूली काम है। चलो कर ली दोस्ती...फिर ?”

“फिर कुछ दिन बाद मिलने बुला लो कहीं भी बाजार में।”

“चलो बुला लिया। फिर मिल कर क्या करूँ ?”

“फिर तुम कुछ मत करना। फिर जो भी करना है हम करेंगे।”

“समझ गई। इनामी बदमाश पकड़ोगे मेरे सहारे और मुझे इनाम की रक़म दोगे।”

“दे देंगे, वह भी दे देंगे, पर अब तो भाभी हो, फ्री में कर देती तो बढ़िया रहता।”

“लाओ सिम और फोन दो। मैं अपने फोन से थोड़े ही करूँगी। अपने फोन से तो वैसे ही फँसी पड़ी हूँ ?

“क्यों क्या हुआ ?”

“अरे वह संजय सिंह है ना दरोग़ा इंचोली थाने का। उस दिन उसके पास गए थे। उसके बाद उसकी फ्रेंड रिक्वेस्ट आ गई फेसबुक पर। चलो मैंने एक्सेप्ट कर ली। फिर व्हाट्सएप पर मैसेज आने लगे दनादन। चलो वो भी कोई नहीं। फिर अभी दो दिन पहले मैं अपने सर को आई लव यू का मैसेज भेज रही थी, वह गलती से उसके नंबर पर चला गया। मैंने भी ध्यान नहीं दिया।”

“फिर ?”–अनिल ज़ोर से हँसा।

“फिर सुबह देखा, तो उसके तो मैसेजों की बाढ़ सी आई हुई थी। घर कहाँ लेंगे ? कब करेंगे शादी ? और तो और बच्चों के नाम क्या रखेंगे।”

“ओ तेरी, अरे तो फोन करके बता देती हक़ीक़त।”–अनिल हँसते हुए बोला।

“बताया, कई बार बताया। पर वह कह रहा है नहीं अब तो मैंने मन बना लिया है।”

“मन बना लिया है।”–अबकी राज भी हँसा। अनिल ने हँसी में उसका साथ दिया। डॉली परेशान मुद्रा में बैठी रही।

“अब क्या करोगी ?”

“दो शादी की इजाज़त तो तुम दोगे नहीं, तो फिर मजबूरी है, कैसे भी करके टालूँगी उसे।”

“अरे तुम उसकी चिंता छोड़ो भाभी। देखी जाएगी।”

“क्या देखी जाएगी ? ऐसे-ऐसे दिलफटे शे’र भेज रहा है कि सच्ची मेरा तो दिल पिघलने लगा है।”–डॉली बड़ी मासूमियत से बोली।

दोनों यार ठहाका मार कर हँसे। “लो भाभी, तुम बीयर पियो, गोली मारो सबको।”–अनिल उसके मग में बीयर भरते हुए बोला।

“भरे जा रहा है, तुझे पता नहीं है। ये टुन्न हो गई, तो बवाल काट देगी।”–राज अनिल को घूरता हुआ बोला।

“यार सर, कभी तो आशावादी बनो। हमेशा नेगेटिव थिंकिंग।”–डॉली बोली।

“वैसे भाभी तुम तो बहुत मालदार निकलीं।”–अनिल बोला।

“भैया जब मिल जाए तब है।”–डॉली दीर्घ श्वांस लेती हुई बोली।

“और अभी क्या कह रही थीं ? यार सर आशावादी बनो।”–राज ने कटाक्ष किया

“ये भी सही है। पर छोड़ो सब। लाओ और बीयर दो।”

“नहीं बिल्कुल नहीं। अब बिल्कुल नहीं।”–राज सख़्ती से बोला।

“यार सर, आप जिस टाइप की बीवी से डरकर ब्रह्मचारी रहना चाहते थे, खुद वैसे ही होते जा रहे हो।”

“अरे, पर कोई लिमिट भी तो हो।”

“कोई लिमिट नहीं। आज सब हदें तोड़ दो।”–डॉली राज को देखते हुए अर्थपूर्ण अंदाज़ में बोली।

“दे भाई दे इसे बीयर। आज इसे ही भुगतता हूँ।”–राज बोला।

“सर सॉरी टू से, बट ये आपके बस की बात नहीं है।”–

डॉली राज की आँखों में झाँकती हुई बोली।

“भाई बीच में बोल रहा हूँ, पर मुझे लगता है कि तू फँस गया। ये कन्या मुझे तुझ पर हावी दिखाई दे रही है।”–अनिल को भी सुरूर हो चुका था।

“यार कुछ हावी वावी नहीं है। ज़रा देर में किरर्र कर जाएगी।”

“ये निकला अंदर से छुपा हुआ टीपिकल मर्द।”–डॉली उसे घूरती हुई बोली।

“अरे नहीं, मेरा वह मतलब नहीं था।”–राज हड़बड़ाया।

“कौन सा वाला मतलब नहीं था ?”–डॉली ने मग उठाया और एक साँस में खाली करके वापस काउंटर पर रखती हुई बोली।

“कोई सा वाला नहीं।”–राज बला सी टालता हुआ बोला।

“ऐसे कैसे कोई सा वाला नहीं ? मिस्टर सर अब तो तुम मुझे ‘किरर्र’ करवा के दिखाओ।”

“अरे मेरी माँ मुझसे गलती हो गई, बस।”–राज सच में झुँझला गया।

“बताओ मैंने तो इतने प्यार से डिनर बनाया और ये हज़रत ‘किरर्र’ करने का प्लान बनाए बैठे हैं।”

“अरे, मगर आज तो बाहर से खाना मँगवाना था। तूने क्यों बनाया ? और बनाया क्या है ?”–राज माथे पर बल डालता हुआ बोला। डॉली मुस्कुराई।

“हे भगवान नहीं, किसी क़ीमत पर नहीं। आज तो बिलकुल भी नहीं। चलो हम बाहर ही खा कर आते हैं।”–राज जल्दी से बोला।

“और जो मैंने इतने प्यार से बनाया है वह ?”–डॉली राज की तरफ़ देखती हुई बोली।

“वह अनिल खाएगा।”

“भाई जैसे रीऐक्शन तू दे रहा है, उससे तो बाहर खाना ही सही लग रहा है।”–अनिल सकपकाया सा बोला।

“कश्मीरी पुलाव बनाया है। मटर, पनीर, काजू डाल कर।”–डॉली राज को देखते हुए बोली।

“भाई पुलाव में फिर क्या दिक़्क़त है ?”–अनिल बोला।

“हाँ पुलाव तो सही है।”–राज अनिश्चित से स्वर में बोला।

“पाइन ऐपल रायता भी है।”–डॉली धीरे से बोली।

“लो बताओ और अब क्या चाहिए।”–अनिल बोला।

“चलो तो इसी बात पर करो फुल सबके गिलास।”–डॉली बोली।

“अभी लो भाभी।”–अनिल ने नई बोतल खोली और तीनों के मदिरा पात्र में उड़ेल दी।

“और हाँ सर जी, आप अपनी कार वापस ले लो। मुझे नहीं चाहिए।”

“क्यों क्या हुआ ?”–राज हैरानी से बोला।

“क्या हुआ ? पूछ रहे हो क्या हुआ ? अरे सुबह शाम कार पे फटका मैं मारती हूँ, पेट्रोल मैं भराती हूँ, पैसे दो लाख मैंने दिए, और ड्राइविंग भी मैं करती हूँ। क्यों ? क्योंकि मैं कार मालिक हूँ, और आप आराम से बैठ के चलते हो।”

राज ज़ोर से हँसा।

“सर जी मुझे नहीं ख़रीदनी कार वार। मैं बिना कार के ही ठीक हूँ।”

“बड़ी जल्दी समझ में आ गई ?”–राज बोला।

“मैं उसी दिन से सोच रही हूँ कि डॉली आख़िर तुझे फ़ायदा क्या हुआ कार लेने का।”

“ठीक है। पर मैं अब डेढ़ लाख में वापस लूँगा।”

“सरमायादार हो, गरीब का शोषण नहीं करोगे, तो रोटी हज़म कैसे होगी।”

“तू और गरीब।”–राज हँसा।

“भाई खाना खा ले ? तुम्हारी चुहलबाज़ी तो चलती ही रहेगी।”–अनिल बोला।

“चलो खा लेते हैं। फिर मुझे ‘किरर्र’ भी तो होना है।”–डॉली को सुरूर हो चला था।

“तू भूल नहीं सकती उस बात को ?”–राज उसे घूरता हुआ बोला।

“भूल जाऊँगी, पर पहले बताओ तो ये ‘किरर्र’ होती क्या है ?”

“भाई बता दे न, बताना तो है ही एक दिन, आज ही बता दे।”–अनिल राज के कंधे पर हाथ मारता हुआ बोला।

“चलो उठो खाना खाते हैं।”–राज व्यस्तता दिखाता हुआ उठ खड़ा हुआ। तीनों डाइनिंग टेबल पर आ बैठे। राज ने हॉटकेस का ढक्कन उठाया। अंदर वास्तव में मटर पुलाव था। खाया तो बेहद लज़ीज़ पाया।

“डॉली वास्तव में बहुत लज़ीज़ पुलाव बनाया है तूने तो।”–वह तारीफ़ करता हुआ बोला।

“कल कोफ़्ते बनाऊँगी।”–वह चहकती हुई बोली।

“भई वाह, पर जल्दी बनाना। खा कर ही ड्यूटी जाऊँगा।”–अनिल बोला।

“बिलकुल भैया, सुबह दस बजे रेडी कर दूँगी।”

“वास्तव में डॉली बहुत अच्छा बनाया है पुलाव भी और रायता भी।”–अनिल बोला।

“थैंक यू भैया।”

राज रह रह कर चोर निगाहों से डॉली को देख लेता था। उसकी बातों से वह अपने आप को उधर खिंचता सा महसूस कर रहा था। पर पता नहीं क्यों निर्णय लेने में हिचकिचा रहा था। ऐसा नहीं था कि वह उसे पाना नहीं चाहता था, लेकिन कमिटमेंट से डर रहा था।

“चलो भाई अपना तो हो गया। अपन तो चले सोने।”–अनिल तृप्ति पूर्ण ढंग से पेट पर हाथ फिराता हुआ बोला।

“भाई कल पूरा दिन हाइवे पर फील्डिंग लगा कर रखनी है। नफ़ीस टेढ़ा के बारे में पक्की इन्फ़र्मेशन है। इंशाल्लाह कल टेढ़े को हमेशा के लिए टेढ़ा कर ही देंगे।”

“टेढ़ा...ये क्या नाम हुआ?”–डॉली हँसी।

“अब जो हुआ सो हुआ, अपन तो चले, बेस्ट ऑफ़ लक। गुडनाइट।”–अनिल अपने बेडरूम की तरफ़ बढ़ गया। पीछे दोनों चुपचाप बैठे खाते रहे।

“ओके डॉली , अपना भी हो गया, चलता हूँ, गुड नाइट।”–राज बोला और उठकर बिना जवाब की प्रतीक्षा किए, बिना उस पर निगाह डाले, चल दिया।

बेडरूम के दरवाज़े पर पहुँचकर उसने पलटकर देखा। डॉली पूर्ववत बैठी प्लेट में चम्मच चला रही थी। वह दो पल देखता रहा फिर वापिस डॉली के पास आया।

“मैं तुम्हारे गले पड़ती हूँ ना।”–वह उसकी आहट पाकर बिना सर उठाये बोली।

“नहीं तो, तुम्हें क्यों ऐसा लगा ?”–राज मीठे स्वर में बोला।

“तुम्हें लगता होगा कि कैसी लड़की है, पीछे ही पड़ गई ?”

“तू पागल है ?”

“वह तो हूँ ही, तुम्हें अब पता पड़ा ?”

“डॉली तुम्हें नहीं मालूम कि तुम किस क़दर मेरी जिंदगी में शामिल हो चुकी हो।”–राज प्यार से उसके कंधे पर हाथ रखता हुआ बोला।

“पता है तभी तो आज तक आइ लव यू भी नहीं कहा।”

“हर बात कह कर नहीं बताई जाती डॉली , कुछ खुद भी समझी जाती है।”

“समझ कर मन तो नहीं भरता न।”

“आई लव यू डॉली । मुझसे शादी करोगी ?”–राज उसके चेहरे को दोनों हाथों में थामता हुआ बोला।

“मुझे सोचने के लिए थोड़ा सा टाइम दो।”–वह उसकी आँखों में झाँकती हुई बोली।

“क...क्या ?”–राज हकबकाया।

“अब ये ज़िंदगी का इतना बड़ा फ़ैसला है, एकदम से ऐसे कैसे ले लूँ?”

“डॉली हर वक्त मज़ाक़ अच्छा नहीं लगता।”–राज थोड़ा नाराज़गी से बोला।

“सर मैं मज़ाक़ नहीं कर रही।”

“तुम्हें नशा है।”

“बुरा लगता है ना, जब कोई टालता है ?”–वह धीमे से बोली।

“अब चलो सोते हैं। तुम्हें ‘किर्रर’ का मतलब भी तो बताना है।”

“ओहो...तो इस जुगाड़ में ये आई लव यू बोला जा रहा है।”–डॉली उसके हाथ अपने चेहरे से हटाती हुई बोली।

“लेकिन तुमने ही तो कहा था कि…कि आज से मेरे साथ ही…वह …लिव इन में...”–राज हकबका गया।

“हलवा है ? पंजीरी बँट रही है, जो कटोरी ले कर खड़े हो गए।”–डॉली उसे घूरती हुई बोली।

“मगर तुम ही तो कह रही थी कि लिव इन में रहेंगे।”–राज की हड़बड़ाहट जारी थी।

डॉली की हँसी निकल गई। राज की जान में जान आई। वह आगे बढ़ा और उसे गोद में उठा कर बैडरूम की तरफ़ चला।

“बचाओ बचाओ, सर मेरा शोषण कर रहे हैं।”–डॉली अच्छी तेज आवाज में बोली।

“अब चिल्ला ले कितना भी अब तो तेरा शोषण होकर ही रहेगा।”–राज ने उसे लाकर बैड पर डाल दिया।

“मैं पुलिस से कह दूँगी। पुलिस बराबर के कमरे में ही है।”

“वह पुलिस मैंने ख़रीद रखी है। आज तो मैं पता करके ही रहूँगा कि कोई तो टाइम होता होगा जब तू मजाक ना करती हो।”–राज ने कहकर कमरे की लाइट बंद कर दी।

“बचाओ बचाओ।”–डॉली चिल्लाए भी जा रही थी और खिलखिलाए भी जा रही थी। *********************
 
बारह बजे के करीब रणविजय की बी०एम०डब्लू० उसकी आलीशान कोठी के आगे रुकी। गार्ड ने दौड़कर गेट खोल दिया। ड्राइवर ने कार अंदर ले जा कर रोकी और जल्दी से उतर कर पीछे के दरवाज़ा खोला, जहाँ रणविजय आहना के साथ बैठा था। रणविजय नीचे उतरा और आहना को आने का इशारा करता हुआ अंदर को बढ़ चला। आहना उसके पीछे पीछे चल पड़ी। अंदर से कोठी किसी राजमहल से कम नहीं थी। आहना आँखें फाड़े चारों ओर फैले वैभव को देख रही थी और अपने में ही सिमटी जा रही थी। कोठी में सामान्य नौकर हो या ड्राइवर, गार्ड हो या माली सब के सब उसके विश्वासपात्र तो थे ही, उसके काले साम्राज्य के अंग और उसके बॉडीगार्ड भी थे, साथ ही सब के सब हर समय हथियारबंद रहते थे। बतौर सांसद ऑफिस कोठी के बाहर ही एक विशाल हॉल बना हुआ था, जिसके सामने खूब बड़ा लॉन था। जनता दरबार या तो हॉल में, या बाहर लॉन में लगा करता था। पर आजकल कोरोना काल में कोई इक्का दुक्का फ़रियादी ही आता था। आहना विशाल से मिलकर बहुत संतुष्ट थी। हालाँकि अब उसका दिल लरज रहा था। थोड़ी सी देर जो रूप उसने रणविजय का देखा था, उसने उसे हिलाकर रख दिया था। उसे बिजली के स्विच की तरह ऑन ऑफ होने वाले रणविजय के व्यवहार के बारे में कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। पर फिर भी उसे सुकून था कि उसका कुछ भी हो, उसका विशाल तो बच जाएगा। रणविजय डाइनिंग हॉल में पड़ी विशाल डाइनिंग टेबल पर बैठ गया। तुरंत ही उसका वफ़ादार नौकर भागता हुआ आया और उसकी कुर्सी के पास ही ज़मीन पर एक बोरी बिछा गया। आहना अनिश्चित सी खड़ी थी। “सिट।”–रणविजय बोरी की तरफ़ इशारा करता हुआ आहना से सामान्य लहजे में बोला।

----“जी !”–आहना समझी नहीं।

“सिट।”–इस बार रणविजय इतने ठोस लहजे में बोला, कि आहना चुपचाप बोरी पर बैठ गई।

रणविजय उसके सर और माथे को इस अंदाज़ में सहलाने लगा जैसे पालतू कुत्ते को पुचकारते हैं। नौकर इत्यादि इतनी सहजता से देख रहे थे, जैसे ये रोज़मर्रा का काम हो। डिनर सर्व हो चुका था। रणविजय खाना खाना शुरू कर चुका था। बीच-बीच में रोटी का टुकड़ा आहना के आगे डाल देता था।

आहना सकते की सी हालात में बैठी थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था, कि ये हो क्या रहा है, और इसका अंत क्या होना है। बीच में रणविजय ने उसे घूर कर देखा, तो उसकी समझ में आ गया कि वह क्या चाह रहा है। उसने फेंके गए टुकड़े उठा कर मुँह में डाल लिए और चबाने लगी।

रणविजय के होंठो पर मुस्कान आ गई। “कम।”–थोड़ी ही देर में रणविजय उठते हुए बोला और बेडरूम की तरफ़ चल दिया।

आहना भी उठकर उसके पीछे चल दी। बेडरूम क्या था, किसी राजा का शयनकक्ष सा था। विशाल बेड, आलीशान सोफ़े, दीवारों पर अर्धनग्न, किंतु कलात्मक तैलचित्र लगे हुए थे। पूरे कक्ष में कीमती कालीन बिछा था। रणविजय रूम में पहुँचकर सोफे पर पसर गया। सामने सेंटर टेबल पर एक रेडवाइन की आधी भरी बोतल और गिलास रखा था। उसने गिलास में वाइन डाली और गिलास लेकर एक घूँट भरा और गिलास वापस टेबल पर रख दिया। फिर कुछ सोचकर उठा और अलमारी से नाइटगाउन निकाला और एक एक करके अपने सारे कपड़े उतारे और नाइट गाउन पहन कर वापस बैठ गया।

“सिट।”–वह आहना की तरफ़ देखता हुआ बोला।

आहना तुरंत नीचे बैठ गई। रणविजय ने गिलास उठाया और अपने पैर के पंजे से आहना की ठुड्डी को ऊपर उठाया। आहना ने उसकी तरफ़ देखा।

उसकी बड़ी-बड़ी आँखें भीगी हुई थीं।

“साला कोई तुम जैसियों को इस हाल में देखे, तो समझे कि कितनी भोली, कितनी मासूम हो तुम।”

आहना ख़ामोश रही।

“चल कपड़े उतार।”–रणविजय वाइन का घूँट भरता हुआ बोला।

आहना को जैसे साँप सूँघ गया।

“पहली और आख़री बार बोल रहा हूँ। मैं कभी भी कोई बात दोहराऊँगा नहीं।”–रणविजय फुफकारता हुआ सा बोला।

आहना के शरीर में सिहरन सी दौड़ गई। उसके हाथ यंत्रचालित से उठे और रणविजय के आदेश का पालन करने लगे। थोड़ी ही देर में उसके कपड़े फ़र्श पर पड़े थे। अपनी बाँहें उसने कैंची की शक्ल में मोड़ लिए थे। किसी स्त्री के लिए इससे लज्जाजनक और क्या होगा ! और जिसने उसे इस हाल में पहुँचाया, वह आराम से बैठा वाइन पी रहा था। उसने कोई दिलचस्पी उसके शरीर को देखने में नहीं दिखाई थी।

“पिएगी ?” आहना ने नज़र उठाई, तो रणविजय उसी से मुख़ातिब था। उसने कातर दृष्टि से रणविजय की तरफ़ देखा।

“चल छोड़, तुझे पता है, तू यहाँ इस तरह क्यों बैठी है ?” उसने प्रश्नवाचक निगाहों से उसकी तरफ़ देखा।

“क्योंकि तेरा मतलब है। तेरा स्वार्थ है मुझसे….बोल हाँ।”

“हाँ।” “मतलब ना होता, तो साली तुझे पलकों पे भी बिठाता, तो भी तू निकल लेती…बोल हाँ।”

आहना खामोशी से उसकी तरफ़ देखती रही।

“बोल हाँ।”

“हाँ।”–आहना बोली।

“चल मुझे थोड़ा चल कर दिखा।” आहना के चेहरे पर बेहद करुण भाव आए। ये करुण भाव रणविजय के अंतर्मन को प्रसन्न कर गए।

“और थोड़ा ठुमक-ठुमक कर चलना।”

“क्यों कर रहे हो सर आप ऐसा ? इससे क्या मिलेगा आपको ?”

“मेरे मिलने की तू चिंता मत कर। तू वह कर जिसके लिए कहा जाए।”

आहना लाचार सी उसे ताकती रही।

“विशाल की सोच। अपने राजा भैया की सोच।”–रणविजय चेतावनीपूर्ण लहजे में बोला।

आहना उठ खड़ी हुई और कमरे में दूसरे किनारे की तरफ़ चल पड़ी। दूसरे किनारे पर पहुँचकर जब पलटी, तो रणविजय को अपने जाम में व्यस्त पाया। उसका उसकी तरफ़ ध्यान तक नहीं था। वह वापिस रणविजय की तरफ़ आई।

“अब घुटनों के बल चलो।”–रणविजय ने नई फ़रमाइश की। रणविजय के चेहरे पर फिर वही जानी पहचानी मुस्कान खेलने लगी।

आहना उसे अवाक् देखती रह गई। इस आदमी का व्यवहार उसकी समझ से बाहर था।

“आदेश करिए।”–विनम्रता की मूर्ति बने रणविजय के मुँह से निकला। आहना ने अपना मंतव्य दोहराया।

“बस इतनी सी बात। मेरी आहना ने माँगा भी, तो क्या माँगा। चलिए हम देखते हैं कि वो कौन है जिसने हमारी आहना की शान में गुस्ताखी करने की जुर्रत की है।”–वह नाटकीय स्वर में बोला।-

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“प्लीज़ सर तमीज़ से।”–आहना नागवारी के अंदाज़ में बोली।

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“क्षमा चाहते हैं। चलिए।”–वह उठ खड़ा हुआ। आहना उसके आगे आगे बाहर को चल दी। ----

रणविजय उसके पीछे-पीछे चला। निगाह उसकी आहना के थिरकते नितंबों पर जमी थी। दरवाज़े के समीप पहुँचते ही उसकी एक उँगली ने आहना के साथ एक बेहूदा हरकत की और इससे पहले कि आहना कोई प्रतिक्रिया करती, उसे एक तरफ़ धकेल कर कमरे से बाहर निकल गया।

आहना हतप्रभ सी कमरे में खड़ी रह गई। बाहर भीड़ ने अपने नेता को देखते ही नारेबाज़ी तेज कर दी। रणविजय ने हाथ उठाकर उन्हें ख़ामोश होने का इशारा किया। रणविजय गेट से बाहर आया और वहाँ खड़ी एन०सी०बी० की सफारी के बोनट पर चढ़ गया। “भाइयों शांत हो जाइए। देखिए ये जो भी हो रहा है, ये मेरी आप लोगों के हक़ के लिए आवाज़ उठाने का नतीजा है।

आज इस फासीवादी सरकार ने मेरे घर की एक-एक ईंट तक देख ली। जितना ये कर सकते थे, किया, लेकिन भाइयों साँच को आँच नहीं होती, और मेरा तो एक ही मानना है कि कर नहीं तो डर नहीं। अरे जब कुछ ग़लत किया ही नहीं तो डर कैसा ? सरकार को जो करना है कर ले। दमन की, जुल्म की इंतिहा करके देख ले। मुझे जीवन भर के लिए जेल के अंधेरे में दफ़ना दे और चाहे तो फाँसी चढ़ा दे, लेकिन आवाम के हक में उठती मेरी आवाज़ नहीं दबा सकते। मेरे प्यारे साथियों आज मेरा आपसे ये वादा है कि मैं आपके हक़ की आवाज़ उठाना अपनी आखिरी साँस तक जारी रखूँगा।”

भीड़ ने करतल ध्वनि से उसकी बात का समर्थन किया। “भाइयों ये जो मेरे घर की तलाशी लेने आए हैं, ये तो सरकारी कर्मचारी हैं। इनकी अपनी कोई मर्ज़ी नहीं होती। ये वही करने के लिए मजबूर होते हैं, जो सरकार इनसे करने के लिए कहती है। और मैं आपको बता दूँ कि ये जो इनकी अफ़सर है, बेहद ईमानदार लड़की है। मेरी बेटी के समान है। मैंने जब इसे देखा, तो इसमें मुझे अपनी बेटी ही नज़र आई। इसलिए आपसे मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूँ कि इन लोगों के साथ कोई अभद्रता ना हो। इन्हें सम्मान के साथ जाने दिया जाए। और मैं आज इस फासीवादी सरकार के ख़िलाफ़ खुली जंग का ऐलान करता हूँ। आज आप सब के सामने मैं ललकारता हूँ इस अहंकारी सरकार को कि जो बिगाड़ सकती हो, मेरा बिगाड़ ले, पर मैं इस सरकार की ग़लत नीति का, ग़लत फ़ैसलों का विरोध करता रहा हूँ, और आखिरी साँस तक करता रहूँगा।” भीड़ ने नेताजी के समर्थन में ज़ोरदार नारे लगाए। रणविजय ने हाथ उठाकर उन्हें शांत होने को कहा।

“भाइयों मुझे पता है कि मेरी अगली मंज़िल या तो जेल होगी, या ये सरकार मुझे मरवा देगी, लेकिन मैं आज आपसे एक वादा लेना चाहता हूँ कि मैं रहूँ ना रहूँ, वादा करो कि ये क्रांति की मशाल जलती रहेगी।”

“हमारा नेता कैसा हो ?”

“बाबू रणविजय जैसा हो।”–भीड़ गरजी।

“भाइयों आप लोगों का यही प्यार, यही आशीर्वाद मेरे लिए प्रसाद है। मेरी शक्ति का, मेरी ऊर्जा का राज है। मैं आज शाम को पार्टी मीटिंग में एक देशव्यापी आंदोलन शुरू करने का प्रस्ताव रखूँगा। और मेरा वादा है कि इस निकम्मी सरकार की नींव तक हिला दूँगा। वह शोर उठेगा आगरा से कि इस अंधी बहरी सरकार के कान के पर्दे फट जाएँगे।”

भीड़ ने ज़ोरदार ताली बजाई। नारेबाज़ी तेज हो गई।

-------- “बस भाइयों अब आप लोग जाओ और इन लोगों को भी अपना काम करने दो। जाओ और तैयारी करो। अभी बहुत लम्बी लड़ाई लड़नी है।”–बोलने के साथ ही रणविजय ने पब्लिक को हाथ जोड़कर नमस्कार किया और सफ़ारी से नीचे कूद गया। आहना और उसकी टीम बाहर निकले। पब्लिक ने उन्हें रास्ता दे दिया। न्यूज़ वालों ने उन्हें घेरना चाहा, पर वह उन्हें अनदेखा करते हुए सफ़ारी में सवार होकर निकल गए। पुलिस की जीप भी उनके पीछे-पीछे रवाना हो गई। पीछे रणविजय को न्यूज़ चैनल वालों ने घेर लिया। रणविजय ने उन्हें अंदर बुलाया और सबके सवालों के जवाब देने में व्यस्त हो गया। आख़िर इनके सदके ही कल शहर में हंगामा होना था। *********************
 
अमित और आरिफ अली फार्महाउस पर बैठे टी०वी० पर न्यूज़ देख रहे थे। हर चैनल पर रणविजय ही छाया हुआ था। फिर जब सब चैनलों पर वही बातें रिपीट होने लगीं, तो अमित ने रिमोट उठाया और टी०वी० बंद कर दिया।

“अब ?”–अमित ने आरिफ की तरफ़ देखा।

“अब क्या ? अब फोन आता ही होगा दिल्ली से। झाड़ पड़ेगी।”–आरिफ हताश सा बोला।

“क्या आदमी है ? सारा खेल ही पलट दिया। अब तो इसे गिरफ़्तार करना बेहद ख़तरनाक हो गया है।”–अमित बोला।

“क्या करें ?”–आरिफ ने अमित की तरफ़ देखा।

“कर्नल साहब भी बढ़िया आदमी हैं। अनुभवी हैं, तो बात जब भी कहते हैं, पते की कहते हैं।”–अमित अर्थपूर्ण लहजे में बोला।

“वही कह रहे हो ना, जो मैं समझ रहा हूँ ?”–आरिफ ने उसकी तरफ़ देखा।

“अव्वल तो गिरफ़्तार होगा नहीं। हो भी गया, तो सजा नहीं होगी। और अगर सजा हो भी गई, तो राजा की तरह रहेगा जेल में। आख़िर केंद्रीय मंत्री रह चुका है।”–अमित भावहीन स्वर में बोला।

“ठोका, तो भी तो बवाल होगा।”–आरिफ कुछ सोचता हुआ बोला।

“ठोक तो, इसे मैं आज आऊँ। इसकी तमाम सुरक्षा के बावजूद इसकी कोठी में ही ठोक आऊँ। पर बात तो यही है कि बवाल हो जाएगा। कम से कम इस समय तो हो ही जाएगा।”–अमित बोला।

“फिर क्या करें ?”

“सोचना पड़ेगा सर। दिमाग़ की सारी ताक़त लगा कर सोचना पड़ेगा। कोई तो ऐसी तरकीब होगी, जिससे इसे इसके अंजाम तक भी पहुँचा दें और किसी के कान पर जूँ तक ना रेंगे।”

“ऐसी क्या तरकीब हो सकती है ?”

“निकलेगी सर। कोई न कोई तरकीब तो ज़रूर ही निकलेगी।”

“कोई दुर्घटना ?”

“नहीं सर, आज की तारीख में नहीं। अभी कानपुर में गाड़ी पलटी है, तमाम बखेड़ा खड़ा हो गया है।”

“फिर क्या करें ? ये तो इसने ऐसा ड्रामा रच दिया है कि मारना तो दूर पकड़ना भी मुश्किल है। मेरे ख्याल से तो फ़िलहाल इसे ठंडे बस्ते में डाल देने में ही भलाई है।”–आरिफ निराश स्वर में बोला।

“निराश ना हो सर। इस मुर्गे के अंत की तरकीब निकालना मेरी ज़िम्मेदारी है। मुझे थोड़ा सा समय दीजिए। तरकीब तो मैं निकाल लूँगा।”–अमित विश्वास पूर्वक बोला।

“सोचो अमित सोचो। और मैं भी सोचता हूँ कुछ।”

“वह तो सोचेंगे ही। पर उससे पहले ये सोचो कि मुर्गे के बंगले पर किसे और कैसे स्थापित किया जाए ?”–अमित बोला।

“ला रहे हैं जुगल और किशोर मुर्गे की एक्स को। उसे ही स्थापित करेंगे। बल्कि मुर्गा खुद ही ले कर जाएगा। ख़ुशी ख़ुशी लेकर जाएगा।”

“ये भी सही है। तो फिर चलो। जब तक वह लोग आयें, केस की एक और अहम कड़ी से मिल कर आते हैं।”–अमित बोला।

“चलो।”–आरिफ भी उठ खड़ा हुआ।

“सर पूछेंगे नहीं किससे ?”–अमित बोला।

“नहीं पूछेंगे।”–आरिफ हँसा।

“वैसे सर एक बात कहूँ ? अगर बुरा ना मानें तो ?”–अमित बोला।

“कहो।”

“बहुत गहरे हो सर। सब पता होता है, फिर भी मुझसे पूछते हो।” आरिफ़ हँसा।

“नहीं, तो कह दो कि मुर्गे को ठोकना है, ये पहले से नहीं सोचे बैठे हो।” आरिफ हँसा।

अमित ने भी हँसी में साथ दिया। फिर दोनों थार जीप में बैठ कर रवाना हो गए।

आधा घंटे बाद बालूगंज में एक हाउसिंग सोसाइटी के सामने उनकी थार जीप खड़ी थी। फिफ्थ फ्लोर पर फ्लैट नंबर 572 के सामने पहुँचकर अमित ने घंटी बजाई।

“जी कहिए।”–दरवाजे पर एक सुदर्शन युवक नमूदार हुआ।

“मिस्टर राज शर्मा ?”–अमित ने पूछा।

“जी, आप कौन ?”

“मैं इन्स्पेक्टर अमित। आपसे दो मिनट बात करनी है।”

“कमाल है! हमें तो यहाँ आए अभी दो ही दिन हुए हैं। हम तो किसी को जानते भी नहीं यहाँ! फिर आपको मुझसे क्या बात करनी है ?”–युवक–जो राज ही था–बोला।

“लम्बी बात है। तसल्ली से बैठकर बताते हैं।”

“आइए।”–राज अनिच्छा सी दिखाते हुए बोला।

आरिफ और अमित अंदर आकर बैठ गए।

“आप लोग कुछ लेंगे, पानी-वानी ?”

“चाय लेंगे, पर चीनी कम हो।”–अमित सहज भाव से बोला।

“कौन आया है सर ?”–अंदर बेडरूम से एक नारी स्वर आया।

“कोई नहीं।”

“बुला लीजिए, डॉली जी को भी बुला लीजिए।”–अमित आराम से बोला।

“आप डॉली को जानते हैं ?”

“जी, उनके बाप रणविजय सिंह को भी जानते हैं।”

“कैसे जानते हैं ?”–राज के माथे पर बल गए।

“ये भी जानते हैं कि आप लोग रणविजय को ठोकने के लिए यहाँ तशरीफ़ लाए हैं।

“क...क्या ?–अब राज बुरी तरह चौंका।
 
“ठोकिए। हमें कोई ऐतराज नहीं है। बस ये डर था कि आपके अनाड़ीपन से ठोकने के चक्कर में कहीं कुछ गड़बड़ ना हो जाए। इसलिए हमे यहाँ आना पड़ा।”

तब तक डॉली भी वहाँ आ चुकी थी और उसने भी अमित की बात सुनी थी। उसका भी हैरत से बुरा हाल था।

“आपको ये सब कैसे पता ?”

“क्योंकि पता करना मेरा काम है। मैं आई०बी० से हूँ, और रणविजय हमारे टार्गेट पर है। इसलिए आप के बारे में पता चला।”

“लेकिन जो बात केवल हम दोनों के बीच हुई, वह आपको कैसे पता?”

“देखिए रणविजय की वजह से हम वृन्दा दुबे के पीछे थे। फिर वृन्दा की वजह से आप रडार पर आए। वृन्दा की कॉल सर्विलांस पर थी, तो आपका रणविजय से कनेक्शन पता चला। फिर आपके घर पर माइक्रोफोन लगवाए, तो पूरी कहानी पता चली।”–अमित बोला।

“आपने मेरे घर पर माइक्रोफोन लगवाए ?”–राज तनिक ग़ुस्से से बोला।”

“जी ये हमारी प्रोफेशनल मजबूरी थी। लगवाना पड़ा।”–अमित तनिक खेदपूर्ण स्वर में बोला।

“फिर तो आपने हमारी सारी बातें सुनी होंगी ?”–डॉली कुछ सोचती हुई बोली।

“जी सुनी तो हैं, लेकिन हमने आपके कितने फेरे हुए, कितने रह गए, ये सब नहीं सुना।”

डॉली के गाल कानों तक लाल हो गए। वह झटके से उठी और किचन में घुस गई। राज भी शर्मिंदा सा नज़र आ रहा था।

“पर आपने हमारे घर पर ये माइक्रोफोन लगवाए कब ? और घर में घुसे कैसे ?”–राज अमित को घूरता हुआ बोला।

“लगवाए तो तब थे, जब वृन्दा तमाम गाजियवाद लाँघ कर पहली बार तुम्हारे घर पहुँची थी। और लगवाए कैसे, तो ये तो हम पुलिस वालों के लिए मामूली काम है।”–अमित आराम से बोला।

“पर घर में घुसे कैसे ? मेरे घर के बाहर की तरफ सी०सी०टी०वी० कैमरे लगे हैं, जो मेरे मोबाइल से कनेक्ट हैं। कोई घुसता, तो मुझे जरूर पता लग जाता।”–राज बोला।

“यक़ीन मानो। पुलिस तुम्हारे घर में घुसी थी और सब फिट करके आई थी।”–अमित मुस्कुराते हुए बोला।

“तो सी०सी०टी०वी० कैमरे में क्यों नही आए ?”

“कौन कहता है कि कैमरे में नहीं आए ?”–अमित उसकी उलझन का मज़ा सा लेता हुआ बोला।

“लेकिन मैंने तो नहीं देखे।”

“तुमने देखा तो था, पर गौर नही किया।”

“ऐसा कैसे हो सकता है ?”–राज असमंजस भरे स्वर में बोला।

“भाई तुम ख़ुद लेकर गए थे पुलिस को घर के अंदर। उसे दारू भी पिलाई, खाना भी खिलाया, और सुलाया भी।”–अमित हँस कर बोला।

“अनिल ?”–राज अविश्वास भरे स्वर में बोला।

“सब इंस्पेक्टर अनिल शर्मा हमारे विभाग का होनहार और कर्तव्यनिष्ठ ऑफिसर है।”–अमित बोला।

“वह मेरा दोस्त है। वह ऐसा कैसे कर सकता है ?”–राज को अब भी विश्वास नही हो रहा था।

“तो भाई हम कौन सा तुम्हें फाँसी लगाने जा रहे थे ? जो हो रहा था उसमें तुम्हारा ही हित था, और वह तुम्हारा दोस्त बाद में है, एक पुलिस अफ़सर पहले है।”–अमित गंभीर हुआ।

“हाँ मगर फिर भी…।”

“और वो जुगल के मामा जी को भी हमने ही उठवाया। समय रहते न उठाये गए होते तो अब तक अपनी रिपोर्ट यमराज को दे रहे होते।”

“मामा जी! कौन ?”

“तुम्हारे दरोगा जी। देशराज।”

“अरे! अब कहाँ हैं ? सुरक्षित तो हैं न ?”

“उनकी चिंता छोड़ो, और हमारी बात सुनो। हम आई०बी० वाले जब कोई ऑपरेशन करते हैं, तो सबसे पहले अधिकतम जानकारी जुटाते हैं। इस केस में भी हम पिछले छह महीने से जानकारी जुटा रहे हैं। तो एक और सबसे अहम जानकारी, जो हमें पता चली है वह मैंने सर आपको भी नहीं बताई है अभी तक।”–अंतिम बात उसने आरिफ से कही थी।

“वो क्या ?”–आरिफ़ चौंका।

“दिल थाम कर बैठिए सर, बहुत अहम बात है।”

“क्या है ? बात तो बताओ।”–आरिफ आतुरता से बोला।

“जब हम डॉली जी की माताजी की कुंडली बाँच रहे थे,

तो हमें पता चला कि अरमान मलिक से शादी के समय वह कुँवारी नहीं थीं। उनकी एक शादी पहले भी हो चुकी थी और उस शादी से उन्हें एक बच्चा भी था। शादी के कुछ समय बाद ही उनके शौहर का इंतकाल हो गया था और उनका बच्चा, जो कि बेटा था, उनके सास-ससुर के पास था, जबकि वह मायके आ गई थी। और तभी उनकी मुलाकात डॉली जी के पिता अरमान मालिक से हुई, जो मोहब्बत में बदल गई। दरअसल वह उनके नाम से धोखा खा गई। उन्हें लगा कि शायद ये मुस्लिम ही है, फिर जब पता लगा तो देर हो चुकी थी। तब तक उनकी मोहब्बत परवान चढ़ चुकी थी।”–अमित इतना बोलकर रुका, और श्रोताओं पर पड़े प्रभाव को देखा।

डॉली भी किचन के दरवाज़े पर खड़ी साँस रोके सुन रही थी, जबकि आरिफ का चेहरा गंभीर हो चुका था।

“फिर ?”–डॉली से रहा नहीं गया वह पूछ बैठी।

“चाय बन गई होगी। ले आइए, फिर आगे की कथा सुनाता हूँ।”

चाय सच में ही बन चुकी थी। डॉली ट्रे में चाय लाई और सबको देकर वहीं बैठ गई।

“चाय बढ़िया बनी है।”–अमित घूँट भरता हुआ बोला।

“आप आगे बताओ।”–डॉली व्यग्र स्वर में बोली।

“तो जैसा कि मैंने बताया कि अरमान मलिक ‘श्री अरमान मलिक’ है, ना कि ‘जनाब अरमान मलिक’ जब तक ये बात सायरा अंसारी को समझ आती, मोहब्बत परवान चढ़ चुकी थी। अब ये लव जिहाद था, या जो भी कुछ था, दोनों घर से भाग गए और शादी करके आगरा आ गए, जहाँ कुमारी डॉली शर्मा का जन्म हुआ।”

“मेरे नाना-नानी कहाँ हैं अब ?”–डॉली व्यग्र भाव से बोली।

“वह तो अल्लाह को प्यारे हो गए।”

“ओह्ह।”–डॉली ग़मगीन स्वर में बोली।

“हाँ, पर आपकी माताजी का पहली शादी से हुआ बेटा यानी आपका माँ जाया भाई अभी भी है।”

“कहाँ...कहाँ पर है वह ?”–डॉली अधीर स्वर में बोली।

“ये रहे आपके भाई, आरिफ अली आई०पी०एस०।”–अमित ने आरिफ की तरफ़ अँगुली उठा दी।

डॉली ने तड़प कर आरिफ की तरफ़ देखा। आरिफ की आँखों में आँसू थे।

“भाई।”–डॉली बुदबुदाई और उठकर आरिफ के पास जाकर खड़ी हो गई। अब आरिफ से जब्त नहीं हुआ। वह उठा और डॉली को अपने से लिपटा लिया। काफी देर तक ये मिलाप चला। फिर सब वापस बैठ गए। वातावरण में एक बोझिल सा सन्नाटा छाया हुआ था।

“क्या सर, इतना बढ़िया मिलाप कराया। ना मिठाई, ना शाबाशी।”–अमित बोला।

“अभी रुक जाओ। अभी हलवा बनाती हूँ।”–डॉली बोली।

“अब तो रिश्तेदारों का घर है। डेरा यहीं जमाएँगे।”

“भाई हमारी माँ को इसी रणविजय ने मारा था।”–डॉली आरिफ की तरफ़ देखती हुई बोली।

“सब हिसाब इसी दुनिया में चुकाना पड़ता है। तू चिंता मत कर।”–आरिफ़ एक-एक शब्द चबाता हुआ बोला।

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