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करीब सवा आठ बजे वृन्दा वहाँ पहुँची। इस समय वह ऑफिस कम लाइब्रेरी में बैठी थी। राज अपनी चेयर पर बैठा था। उसकी विशाल टेबल पर ढेर सारी फाइलें रखी थीं। उनमें से अधिकांश पुराने–उसके पिता के समय के–मुकदमों की थी, जो सिर्फ क्लाइंट पर प्रभाव डालने के लिए टेबल पर रखी रहती थीं। टेबल के सामने विजिटर चेयर पर वृन्दा बैठी थी और वृन्दा के बराबर में डॉली जमी बैठी थी।
“बताइये वृन्दा जी क्या बताना चाहती थीं आप ?”
वृन्दा ने डॉली की तरफ देखा, और फिर राज की तरफ़ देखा।
“निःसंकोच कहिये, जो भी कहना हो। हम दोनों मिलकर ही काम करते हैं। बेहतर है ये भी अभी जान ले। यूँ मैं बाद में इसे बताने की जहमत से बच जाऊँगा, और वैसे भी दो दिमाग दो ही होते हैं।”–राज आश्वासन भरे स्वर में बोला।
वृन्दा ने कठिनाई से सहमति में सिर हिलाया।
“राज जी मेरी जान को अभी भी खतरा है।”–वह तनिक भयभीत स्वर में बोली।
“किससे ?”–राज ने पूछा।
“राज जी मुझे गिरीश से तलाक़ चाहिए।”
“पहले तो आप शांत हो जाइए। फिर आराम से बताइए, जो भी बताना चाहती हैं।”
“वह...वह लोग बहुत ख़तरनाक हैं। गिरीश बहुत ग़लत झमेलों में फँस गया है।”
“वृन्दा जी ऐसे कुछ समझ नहीं आएगा। आप जब भी कुछ बोलती हैं, नई ही बात बोलती हैं। आराम से बताइए कि आपको तलाक़ चाहिए या प्रोटेक्शन चाहिए या गिरीश को झमेलों से निकालना है।”
“मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।”
“चलिए छोड़िए...अब आप केवल मेरे सवालों के जवाब दीजिए।”–राज शांत स्वर में बोला।
वृन्दा ने सवालिया निगाहों से उसकी तरफ देखा।
“गिरीश ने क्या बताया है ? क्या हुआ था उसके साथ ?” “उसने पुलिस को तो ये बयान दिया है कि वह कार से जा रहा था कि एक बाइक वाले ने उसकी कार के पहिए की तरफ़ इशारा करके कुछ कहा। उसे लगा कि शायद पंचर हो गया होगा और बाइक सवार यही इशारा कर रहा होगा। उसने कार सड़क के किनारे रोक दी और उतर कर देखने लगा। लेकिन सभी टायर सही थे। तभी दो आदमी आकर उससे पूछने लगे कि क्या हुआ ? वह अभी उस व्यक्ति से बात कर ही रहा था कि पीछे से दूसरे व्यक्ति ने उसके सिर पर कुछ मारा और वह बेहोश हो गया। उसके बाद उसे कुछ मालूम नहीं कि क्या हुआ। आज सुबह जब उसे होश आया तो वह गाँधी बाग में एक बेंच पर पड़ा था। वह उठा और घर आ गया। बस इसके अलावा उसे कुछ याद नहीं है।”
“पुलिस ने यक़ीन कर लिया इस कहानी पर ?”–राज अविश्वासपूर्ण स्वर में बोला।
“पता नहीं ?”
“उन दो आदमियों के बारे में क्या बताया गिरीश ने ? उन्हें तो ठीक से देखा ही होगा ?”
“गिरीश का कहना है कि वह बाइक पर आए थे। दोनों ने हेलमेट पहन रखा था। उनमें से किसी की भी शक्ल नहीं देखी उसने।”
“और बाइक ? बाइक तो देखी ही होगी ? शायद उसका नम्बर भी देखा हो ?”
“गिरीश का कहना है कि उसने बाइक पर ध्यान ही नहीं दिया था।”
“इस कहानी पर तो कोई बच्चा भी यक़ीन नहीं करेगा। अपहरण का कोई उद्देश्य ही नहीं दिख रहा।”
“अब बच्चा यक़ीन करे या ना करे पर पुलिस को तो यक़ीन करना पड़ेगा।”–वृन्दा बोली।
“क्यों ?”–राज के माथे पर बल पड़ गए।
“क्योंकि इसके पीछे इतने बड़े लोगों का हाथ है कि पुलिस को चुप रहना ही पड़ेगा।”
“आपको कैसे पता ?”
“क्योंकि मुझे गिरीश ने बताया। आज ही बताया।”
“क्या बताया ?”–राज उत्सुक स्वर में बोला।
“गिरीश की दवा फैक्ट्री में ड्रग्स का काम होता है।”–उसने जैसे बम सा फोड़ा।
“क्याऽऽ ?”–राज चौंका।
“मैं आपको शुरू से बताती हूँ।”
“जी यही बेहतर रहेगा।”
“गिरीश को पिछले कुछ समय से बिजनेस में घाटा चल रहा था। बाजार में भ्रम बना हुआ था लेकिन हक़ीक़त यह थी कि वह दिवालिया होने की कगार पर था।” राज और डॉली चेहरे पर दिलचस्पी के भाव लिए सुन रहे थे।
“फिर पिछले साल उसे एक आदमी मिला, जिसने उसे लालच देकर इस काम में शामिल कर लिया। गिरीश इस कदर क़र्ज़े में डूब चुका था कि उसके पास कोई विकल्प था ही नहीं। लिहाज़ा फैक्ट्री का गोदाम अफीम के डोडे का स्टाक रखने और फैक्ट्री की लैब इसे रिफाइंड करके टेबलेट, पाउडर और वाइल (Vial) और एमप्यूल (Ampule) की सूरत में तैयार करके बाक़ायदा लेबल लगाकर सप्लाई करने में इस्तेमाल होने लगी। माल खुलेआम ट्रेन से, ट्रांसपोर्ट से बुक करके सप्लाई होता था। साथ में कम्पनी का चालान और बिल भी होता था। नतीजा एक साल के अंदर ही ना सिर्फ गिरीश का सारा क़र्ज़ उतर गया, बल्कि बहुत ढेर सारा पैसा भी जमा हो गया।”
डॉली और राज तन्मयता से उसकी बात सुन रहे थे।
“फिर अब गिरीश ने इस सब से हाथ खींचना चाहा, क्योंकि उसकी मजबूरी खत्म हो चुकी थी। और अब उसका ये खतरा उठाना ना तो ज़रूरी रह गया था और ना ही वह अब इसे आगे जारी रखना चाहता था। मगर जैसे ही उसने अब ये काम करने से मना किया, उसे पता चला, कि उसने जिनसे ये गठबंधन किया हुआ था वह चीज़ क्या थे !”
“कौन लोग थे ?”–राज बोला।
“बहुत ख़तरनाक लोग हैं वे। नेतागण, अफसर सब उनकी मुट्ठी में हैं। पूरे देश में इनका नेटवर्क फैला हुआ है। जाने कितने गिरीश इनके जाल में फँसे हुए हैं।”
“आपको कैसे पता है ये सब ?”
“गिरीश ने ही बताया। मेरे तो होश ही उड़ गए ये सब सुनकर।”
“आपको पुलिस को बताना चाहिए था ये सब।”–“राज गंभीर स्वर में बोला।
“जिस दिन गिरीश का अपहरण हुआ था वह पुलिस के पास ही गया हुआ था।”–वृन्दा फीकी मुस्कुराहट से बोली।
“फिर ?” “गिरीश ने जब ये काम जारी रखने से मना कर दिया था, तो उन लोगों ने उसे धमकियाँ देनी शुरू कर दीं। लेकिन गिरीश पक्का मन बना चुका था कि वह अब ये काम अपनी फैक्ट्री में किसी भी कीमत पर नहीं होने देगा। जब उन लोगों की धमकियाँ ज्यादा आने लगीं, तो गिरीश पुलिस के पास पहुँच गया और सारी बात साफ साफ बता दी।”
“फिर क्या हुआ ?”
“थाने में जिस दरोग़ा से गिरीश की बात हुई, वह खुद गिरीश को ले जाकर उन लोगों के हवाले कर आया।”
“क्याऽऽऽ ?”–राज बुरी तरह चौंका–“यानी गिरीश का कोई अपहरण हुआ ही नहीं था। जो भी कुछ हुआ, सब पुलिस की जानकारी में हुआ था?”
“पुलिस का तो पता नहीं, पर उस दरोग़ा की जानकारी में
“आपको कैसे पता है ये सब ?”
“गिरीश ने ही बताया। मेरे तो होश ही उड़ गए ये सब सुनकर।”
“आपको पुलिस को बताना चाहिए था ये सब।”–“राज गंभीर स्वर में बोला।
“जिस दिन गिरीश का अपहरण हुआ था वह पुलिस के पास ही गया हुआ था।”–वृन्दा फीकी मुस्कुराहट से बोली।
“फिर ?” “गिरीश ने जब ये काम जारी रखने से मना कर दिया था, तो उन लोगों ने उसे धमकियाँ देनी शुरू कर दीं। लेकिन गिरीश पक्का मन बना चुका था कि वह अब ये काम अपनी फैक्ट्री में किसी भी कीमत पर नहीं होने देगा। जब उन लोगों की धमकियाँ ज्यादा आने लगीं, तो गिरीश पुलिस के पास पहुँच गया और सारी बात साफ साफ बता दी।”
“फिर क्या हुआ ?”
“थाने में जिस दरोग़ा से गिरीश की बात हुई, वह खुद गिरीश को ले जाकर उन लोगों के हवाले कर आया।”
“क्याऽऽऽ ?”–राज बुरी तरह चौंका–“यानी गिरीश का कोई अपहरण हुआ ही नहीं था। जो भी कुछ हुआ, सब पुलिस की जानकारी में हुआ था?”
“पुलिस का तो पता नहीं, पर उस दरोग़ा की जानकारी में तो बराबर हुआ था।”
“और जो आप पर हमला हुआ था वह ?”
“वह भी चेतावनी थी गिरीश को।”
“तो अब आप क्या चाहती हैं।”
“मुझे इन सब झंझटों में नहीं पड़ना। आप मेरा तलाक़ करवा दो गिरीश से बस।”–वृन्दा बोली।
“गिरीश जी क्या चाहते हैं आपसे ?”
“बताइये वृन्दा जी क्या बताना चाहती थीं आप ?”
वृन्दा ने डॉली की तरफ देखा, और फिर राज की तरफ़ देखा।
“निःसंकोच कहिये, जो भी कहना हो। हम दोनों मिलकर ही काम करते हैं। बेहतर है ये भी अभी जान ले। यूँ मैं बाद में इसे बताने की जहमत से बच जाऊँगा, और वैसे भी दो दिमाग दो ही होते हैं।”–राज आश्वासन भरे स्वर में बोला।
वृन्दा ने कठिनाई से सहमति में सिर हिलाया।
“राज जी मेरी जान को अभी भी खतरा है।”–वह तनिक भयभीत स्वर में बोली।
“किससे ?”–राज ने पूछा।
“राज जी मुझे गिरीश से तलाक़ चाहिए।”
“पहले तो आप शांत हो जाइए। फिर आराम से बताइए, जो भी बताना चाहती हैं।”
“वह...वह लोग बहुत ख़तरनाक हैं। गिरीश बहुत ग़लत झमेलों में फँस गया है।”
“वृन्दा जी ऐसे कुछ समझ नहीं आएगा। आप जब भी कुछ बोलती हैं, नई ही बात बोलती हैं। आराम से बताइए कि आपको तलाक़ चाहिए या प्रोटेक्शन चाहिए या गिरीश को झमेलों से निकालना है।”
“मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।”
“चलिए छोड़िए...अब आप केवल मेरे सवालों के जवाब दीजिए।”–राज शांत स्वर में बोला।
वृन्दा ने सवालिया निगाहों से उसकी तरफ देखा।
“गिरीश ने क्या बताया है ? क्या हुआ था उसके साथ ?” “उसने पुलिस को तो ये बयान दिया है कि वह कार से जा रहा था कि एक बाइक वाले ने उसकी कार के पहिए की तरफ़ इशारा करके कुछ कहा। उसे लगा कि शायद पंचर हो गया होगा और बाइक सवार यही इशारा कर रहा होगा। उसने कार सड़क के किनारे रोक दी और उतर कर देखने लगा। लेकिन सभी टायर सही थे। तभी दो आदमी आकर उससे पूछने लगे कि क्या हुआ ? वह अभी उस व्यक्ति से बात कर ही रहा था कि पीछे से दूसरे व्यक्ति ने उसके सिर पर कुछ मारा और वह बेहोश हो गया। उसके बाद उसे कुछ मालूम नहीं कि क्या हुआ। आज सुबह जब उसे होश आया तो वह गाँधी बाग में एक बेंच पर पड़ा था। वह उठा और घर आ गया। बस इसके अलावा उसे कुछ याद नहीं है।”
“पुलिस ने यक़ीन कर लिया इस कहानी पर ?”–राज अविश्वासपूर्ण स्वर में बोला।
“पता नहीं ?”
“उन दो आदमियों के बारे में क्या बताया गिरीश ने ? उन्हें तो ठीक से देखा ही होगा ?”
“गिरीश का कहना है कि वह बाइक पर आए थे। दोनों ने हेलमेट पहन रखा था। उनमें से किसी की भी शक्ल नहीं देखी उसने।”
“और बाइक ? बाइक तो देखी ही होगी ? शायद उसका नम्बर भी देखा हो ?”
“गिरीश का कहना है कि उसने बाइक पर ध्यान ही नहीं दिया था।”
“इस कहानी पर तो कोई बच्चा भी यक़ीन नहीं करेगा। अपहरण का कोई उद्देश्य ही नहीं दिख रहा।”
“अब बच्चा यक़ीन करे या ना करे पर पुलिस को तो यक़ीन करना पड़ेगा।”–वृन्दा बोली।
“क्यों ?”–राज के माथे पर बल पड़ गए।
“क्योंकि इसके पीछे इतने बड़े लोगों का हाथ है कि पुलिस को चुप रहना ही पड़ेगा।”
“आपको कैसे पता ?”
“क्योंकि मुझे गिरीश ने बताया। आज ही बताया।”
“क्या बताया ?”–राज उत्सुक स्वर में बोला।
“गिरीश की दवा फैक्ट्री में ड्रग्स का काम होता है।”–उसने जैसे बम सा फोड़ा।
“क्याऽऽ ?”–राज चौंका।
“मैं आपको शुरू से बताती हूँ।”
“जी यही बेहतर रहेगा।”
“गिरीश को पिछले कुछ समय से बिजनेस में घाटा चल रहा था। बाजार में भ्रम बना हुआ था लेकिन हक़ीक़त यह थी कि वह दिवालिया होने की कगार पर था।” राज और डॉली चेहरे पर दिलचस्पी के भाव लिए सुन रहे थे।
“फिर पिछले साल उसे एक आदमी मिला, जिसने उसे लालच देकर इस काम में शामिल कर लिया। गिरीश इस कदर क़र्ज़े में डूब चुका था कि उसके पास कोई विकल्प था ही नहीं। लिहाज़ा फैक्ट्री का गोदाम अफीम के डोडे का स्टाक रखने और फैक्ट्री की लैब इसे रिफाइंड करके टेबलेट, पाउडर और वाइल (Vial) और एमप्यूल (Ampule) की सूरत में तैयार करके बाक़ायदा लेबल लगाकर सप्लाई करने में इस्तेमाल होने लगी। माल खुलेआम ट्रेन से, ट्रांसपोर्ट से बुक करके सप्लाई होता था। साथ में कम्पनी का चालान और बिल भी होता था। नतीजा एक साल के अंदर ही ना सिर्फ गिरीश का सारा क़र्ज़ उतर गया, बल्कि बहुत ढेर सारा पैसा भी जमा हो गया।”
डॉली और राज तन्मयता से उसकी बात सुन रहे थे।
“फिर अब गिरीश ने इस सब से हाथ खींचना चाहा, क्योंकि उसकी मजबूरी खत्म हो चुकी थी। और अब उसका ये खतरा उठाना ना तो ज़रूरी रह गया था और ना ही वह अब इसे आगे जारी रखना चाहता था। मगर जैसे ही उसने अब ये काम करने से मना किया, उसे पता चला, कि उसने जिनसे ये गठबंधन किया हुआ था वह चीज़ क्या थे !”
“कौन लोग थे ?”–राज बोला।
“बहुत ख़तरनाक लोग हैं वे। नेतागण, अफसर सब उनकी मुट्ठी में हैं। पूरे देश में इनका नेटवर्क फैला हुआ है। जाने कितने गिरीश इनके जाल में फँसे हुए हैं।”
“आपको कैसे पता है ये सब ?”
“गिरीश ने ही बताया। मेरे तो होश ही उड़ गए ये सब सुनकर।”
“आपको पुलिस को बताना चाहिए था ये सब।”–“राज गंभीर स्वर में बोला।
“जिस दिन गिरीश का अपहरण हुआ था वह पुलिस के पास ही गया हुआ था।”–वृन्दा फीकी मुस्कुराहट से बोली।
“फिर ?” “गिरीश ने जब ये काम जारी रखने से मना कर दिया था, तो उन लोगों ने उसे धमकियाँ देनी शुरू कर दीं। लेकिन गिरीश पक्का मन बना चुका था कि वह अब ये काम अपनी फैक्ट्री में किसी भी कीमत पर नहीं होने देगा। जब उन लोगों की धमकियाँ ज्यादा आने लगीं, तो गिरीश पुलिस के पास पहुँच गया और सारी बात साफ साफ बता दी।”
“फिर क्या हुआ ?”
“थाने में जिस दरोग़ा से गिरीश की बात हुई, वह खुद गिरीश को ले जाकर उन लोगों के हवाले कर आया।”
“क्याऽऽऽ ?”–राज बुरी तरह चौंका–“यानी गिरीश का कोई अपहरण हुआ ही नहीं था। जो भी कुछ हुआ, सब पुलिस की जानकारी में हुआ था?”
“पुलिस का तो पता नहीं, पर उस दरोग़ा की जानकारी में
“आपको कैसे पता है ये सब ?”
“गिरीश ने ही बताया। मेरे तो होश ही उड़ गए ये सब सुनकर।”
“आपको पुलिस को बताना चाहिए था ये सब।”–“राज गंभीर स्वर में बोला।
“जिस दिन गिरीश का अपहरण हुआ था वह पुलिस के पास ही गया हुआ था।”–वृन्दा फीकी मुस्कुराहट से बोली।
“फिर ?” “गिरीश ने जब ये काम जारी रखने से मना कर दिया था, तो उन लोगों ने उसे धमकियाँ देनी शुरू कर दीं। लेकिन गिरीश पक्का मन बना चुका था कि वह अब ये काम अपनी फैक्ट्री में किसी भी कीमत पर नहीं होने देगा। जब उन लोगों की धमकियाँ ज्यादा आने लगीं, तो गिरीश पुलिस के पास पहुँच गया और सारी बात साफ साफ बता दी।”
“फिर क्या हुआ ?”
“थाने में जिस दरोग़ा से गिरीश की बात हुई, वह खुद गिरीश को ले जाकर उन लोगों के हवाले कर आया।”
“क्याऽऽऽ ?”–राज बुरी तरह चौंका–“यानी गिरीश का कोई अपहरण हुआ ही नहीं था। जो भी कुछ हुआ, सब पुलिस की जानकारी में हुआ था?”
“पुलिस का तो पता नहीं, पर उस दरोग़ा की जानकारी में तो बराबर हुआ था।”
“और जो आप पर हमला हुआ था वह ?”
“वह भी चेतावनी थी गिरीश को।”
“तो अब आप क्या चाहती हैं।”
“मुझे इन सब झंझटों में नहीं पड़ना। आप मेरा तलाक़ करवा दो गिरीश से बस।”–वृन्दा बोली।
“गिरीश जी क्या चाहते हैं आपसे ?”