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बारिश रुक चुकी थी, लेकिन चार पाँच घंटे हुई मूसलाधार बारिश से जगह जगह सड़क ने बरसाती नालों का रूप ले लिया था। जगह जगह जल भराव हो चुका था। तेज चलती हवाओं ने ठंड को खासा बढ़ा दिया था। सफ़ारी किशोर चला रहा था। अमित उसके बराबर में बैठा था। सफारी की गति खासी तेज थी। सड़क पर भरे पानी में जब तेजी से गुजरती थी, तो ऐसा नजारा होता था कि जैसे कोई मोटरबोट सागर का सीना चीर कर दौड़ रही हो। अमित के निर्देश पर किशोर ने गाड़ी राजामंडी रेलवे स्टेशन की पार्किंग में ला खड़ी की। अमित ने तुरंत अपनी लोकेशन आरिफ को भेज दी। बीस मिनट बाद ही आरिफ की स्कॉर्पियो उनकी सफारी के बराबर में आ खड़ी हुई। उसमें से आरिफ और आहना निकले और सफारी में सवार हो गए।
“किशोर ये मेरा मोबाइल पकड़ो, और स्कॉर्पियो लेकर दिल्ली निकल जाओ। मोबाइल ऑफिस में जाकर दिवाकर को दे देना। कह देना कि अबसे इस मोबाइल की लोकेशन दिन में ऑफिस, और रात को मेरे फ्लैट की आनी चाहिए। और इससे दो चार कॉल भी कर लिया करे, बस इनकमिंग कॉल रिसीव ना करे। वह मैंने अपने दूसरे मोबाइल पर डाइवर्ट कर ली है, मैं खुद बात कर लिया करूँगा। और ये टाइम टेबल ले मेरे मोबाइल का।”–आरिफ एक काग़ज़ उसे थमाता हुआ बोला।
“मोबाइल का टाइम टेबल ?”–किशोर असमंजस भरे स्वर में बोला।
“भाई कॉल डाइवर्ट करके सुन तो मैं लिया करूँगा, पर उस समय दिल्ली में कहाँ हूँ, ये तो टाइम टेबल से ही पता चलेगा न।”–आरिफ बोला।
“बात क्या है सर ?”–अमित बोला।
“ये नम्बर नेता जी के पास पहुँच ही गया है समझो। आज इस पर सेंगर ने क्लिप भेजी थी। तो मेरा नंबर उसके पास पहुँचा, या नेता जी के पास पहुँचा, एक ही बात है। मैंने रणविजय से कह दिया है कि हम वापस दिल्ली जा रहे हैं। तो मुर्गा अगर सेंगर के या किसी अन्य माध्यम से चेक भी कराए, तो लोकेशन दिल्ली की ही आनी चाहिए। और अगर मुझसे बात करे, तो बात भी मुझसे ही होनी चाहिए।”
“ओह।”–अमित बोला।
“किशोर तुम निकल लो। सुबह दस बजे मोबाइल देकर वापस फार्म हाउस आ जाना।”
“यस सर।”–किशोर तुरंत सफारी से बाहर निकला और स्कॉर्पियो में सवार होकर रवाना हो गया।
“आरिफ भाई अगर मुर्गे ने कॉल डिटेल निकलवा ली तो ?”–राज बोला।
“निकलवा ले। इस नम्बर से उसे कुछ नहीं मिलने वाला। और वैसे इस नम्बर की कॉल डीटेल किसी को मिलेंगी भी नहीं बिना गृह मंत्रालय की मंजूरी के।”–आरिफ बोला।
“सर वहाँ हुआ क्या था ?”–अमित ने उत्सुक भाव से पूछा। आरिफ ने बताया। सुनकर अमित और राज दोनों के चेहरे पर क्रोध के भाव आ गए।
“शांत रहो। क्रोध हमें भी आया था। पर क्रोध से कोई हल नहीं निकलेगा। हल निकलेगा तरकीब से।”–आरिफ शांत स्वर में बोला।
“कैसी तरकीब आरिफ भाई ?”–राज बोला।
“वही तरकीब, जो अभी सोचनी बाकी है।”
“ओह्ह।”–राज के मुँह से निकला।
“चिंता ना करो वकील साहब, वी विल हैव द लास्ट लाफ़।”
“जी आरिफ भाई।”–राज बोला।
“सर वह क्लिप कहाँ है ?”–अमित बोला।
“हमने गूगल ड्राइव में डाल ली थी। लिंक शेयर करते हैं तुम सब को। आराम से देखो।”–आरिफ ने मोबाइल निकाल कर लिंक शेयर कर दिया। राज और अमित अपने अपने मोबाइल पर क्लिप देखने में मसरूफ हो गए।
“सर ये तो अपनी छठी अँगुली का प्रदर्शन सा करता प्रतीत हो रहा है। इसके साथी ने ग्लव्स पहन रखे हैं, जबकि इसने इसीलिए नहीं पहने, जिससे छठी अँगुली दिखाई दे जाए।”–अमित बोला।
“और वीडियो बनाने वाले ने भी इस बात का ध्यान रखा है कि छठी अँगुली ज़रूर आए रिकॉर्डिंग में।”–राज बोला।
“वह तो हुआ। पर ये जो भी है, मास्क लगा कर मोटे तौर पर बिलकुल मुर्गे की तरह ही दिख रहा है। हाव भाव, क़द काठी और चाल सब उसी के जैसी है।”–आरिफ बोला।
“हाँ सर। बिलकुल मिलता जुलता है।”–अमित को मानना पड़ा।
“आहना पता तो करो संजय तिवारी से कि इसका ऐसा कौन सा गुर्गा है, जो देखने में रणविजय जैसा दिखता हो।”–आरिफ बोला।
आहना ने सहमति में सिर हिलाया और संजय तिवारी को कॉल लगाई। उसके फोन उठाने की प्रतीक्षा करने लगी। दूसरी ओर से फोन नहीं उठाया गया। उसने फिर कॉल लगाई। तीसरी कोशिश में कॉल कनेक्ट हुई। जाहिर था कि तिवारी सोया पड़ा था। कॉल कनेक्ट होने पर करीब दो तीन मिनट बात करने के बाद उसने मोबाइल कान से हटाया, तो उसके चेहरे पर सफलता की चमक थी।
“रोहित अरोड़ा है। लोहा मंडी में रहता है। फेमिली नहीं है। अकेला ही रहता है।”–वह बोली।
“चलो भाई, इसे ही ले चलते हैं फार्महाउस। इससे तो कोई हमारा लिंक भी नहीं जोड़ पाएगा। कुछ तो जानकारी मिलेगी ही। ना मिला मुर्गा, ना सही, मुर्गे का हमशक्ल गुर्गा ही सही। उसके ही पर नोंचकर जी हल्का कर लेंगे।”–अमित बोला।
“वह मिलेगा घर पर ?”–राज संदेहास्पद स्वर में बोला।
“अरे भाई, उसके सिर पर नेता जी का हाथ है। जाँच करने वाला पुलिस अधिकारी मुर्गे का तोता है। उसे किस बात का डर ? देख लेना घर पर ही सोता मिलेगा।”–आरिफ बोला।
“चल कर देखते हैं।”–अमित बोला और ड्राइविंग सीट सँभालकर सफ़ारी लोहामंडी की तरफ़ दौड़ा दी। लोहामंडी घनी आबादी वाला शहर का पुराना इलाक़ा था। रोहित का मकान गली के बीचों-बीच था। गली मुश्किल से दस फुट चौड़ी थी। गली के सभी घर बहुत कम क्षेत्रफल में बने हुए थे और सभी घरों का दरवाज़ा सीधा गली में ही खुलता था। कोई खुली जगह, या लॉन आदि नहीं था।
गली संकीर्ण ज़रूर थी, पर सुबह होने में अभी देरी होने के कारण इस समय बिलकुल खाली पड़ी थी। अमित ने पहले एक चक्कर पूरी गली का लगाया और फिर गाड़ी रोक दी। सभी लोग गाड़ी से उतर गए।
‘जाओ आहना ।”–आरिफ बोला।
“जी सर।”–आहना बोली और ड्राइविंग सीट पर बैठकर सफ़ारी रोहित के मकान की तरफ़ बढ़ा दी। बाकी तीनों वहीं खड़े सफारी की टेल लाइट को देखते रहे। आहना ने सफारी बिलकुल रोहित के घर के सामने रोक दी, और उतर कर बोनट खोल दिया। फिर घूमकर सफारी के पीछे पहुँची और एक कपड़ा साइलेंसर में ठूँसा और ड्राइविंग सीट पर बैठकर सेल्फ मारा। इंजन तुरंत स्टार्ट हुआ, लेकिन फिर तुरंत ही बंद भी हो गया। आहना ने संतुष्ट भाव से सिर हिलाया और फिर सेल्फ मारा। इंजन ने राउंड लिए लेकिन सिर्फ शोर भर किया, स्टार्ट होकर नहीं दिया। आहना परेशान भाव से सेल्फ मारती रही, बीच-बीच में उतर कर बोनट में झाँक कर कुछ करने का अभिनय करती थी और फिर आकर सेल्फ मारने लगती थी। गली में बिजली के खम्भे पर लगी ट्यूबलाइट की रोशनी में परेशानहाल आहना गाड़ी से अंदर बाहर की परेड करती रही। काफी देर बाद रोहित के मकान की खिड़की खुली और किसी ने बाहर झाँका। आहना ने चोर निगाहों से देख लिया, पर अपना अभिनय जारी रखा। काफी देर तक खिड़की पर मौजूद शख़्स ये सब देखता रहा, और वस्तुस्थिति समझने का प्रयास करता रहा।
“क्या हुआ मैडम ?”–अंततः वह हुआ, जिसकी आहना पिछले आधा घंटे से प्रतीक्षा कर रही थी।
प्रत्यक्ष में उसने चिहुँक कर आवाज़ की दिशा में देखा। फिर खुली खिड़की देख कर झिझकती हुई सी उधर गई।
“पता नहीं। अचानक से बंद हो गई। अब स्टार्ट ही नहीं हो रही।”–आहना परेशान से स्वर में बोली।
“पानी चला गया होगा। आपने भरे पानी में से निकाल ली होगी।”–खिड़की के अंदर वाला शख़्स आहना का नख शिख परीक्षण करता हुआ बोला।
“हाँ पानी तो बहुत जगह भरा हुआ था।”
“पानी ही चला गया होगा इंजिन में।”
“अब मैं क्या करूँ ?”–आहना अपने स्वर को अधिक से अधिक करुण बनाने का प्रयास करती हुई बोली।
“डिस्ट्रिब्युटर कैप खोलकर उसे सुखाकर, साफ करके लगाओ।”–अंदर से आवाज़ आई।
“डिस्ट्रिब्युटर कैप ? वह क्या होती है ?”–आहना असमंजस भरे स्वर में बोली।
“वहीं इंजन के ऊपर ही लगी होगी।”–खिड़की के अंदर वाले का आहना का नख शिख परीक्षण जारी था।
“सर कोई मेकैनिक मिल सकता है आस पास ?”–आहना ने पूछा। “हाँ मिल जाएगा। पर मिलेगा सुबह नौ बजे के बाद।”
“सर प्लीज़ आप कोई मदद करो ना।”
“यानी जो बोले वह कुंडा खोले।”–अंदर वाला हँसा।
“सर प्लीज़।”
“मुझे भी कहाँ कुछ मालूम है इंजन के बारे में।”
“सर प्लीज़।”
“मैं एक मैकेनिक को जानता हूँ। फोन करता हूँ उसे। अगर आ जाए तो...”–अंदर वाला बोला। प्रत्यक्ष था कि अंदर वाले का बाहर आने का कोई इरादा नहीं था। आहना के चेहरे पर सोचने वाले भाव आ गए।
“सर एक फेवर और चाहिए।”–आहना बोली।
“क्या ?”
“सर मुझे…मुझे…सर क्या मैं आपका वाशरूम यूज़ कर सकती हूँ प्लीज़?”–आहना सकुचाते हुए बोली।
“यानी आप मुझे रज़ाई से निकालकर ही मानेंगी।”–अंदर वाला हँसा।
आहना ने संकोचपूर्ण भाव से सिर झुका लिया।
“रुकिए अभी करवाता हूँ आपकी ‘शंका’ का निवारण।” आहना सिर झुकाए खिड़की के पास खड़ी रही। एक मिनट बाद कमरे की लाइट जली और दरवाज़ा खुला।
“आ जाइए।”–दरवाज़े पर करीब तीस साल का एक शख़्स नमूदार हुआ। आहना अंदर दाखिल हुई। आहना के अंदर दाखिल होते ही थोड़ी दूरी पर अंधेरे में छुपे अमित, आरिफ और राज सफ़ारी की तरफ़ झपटे। राज ने साइलेंसर में से कपड़ा निकाला, और ड्राइविंग सीट पर बैठ कर गाड़ी स्टार्ट कर दी। जबकि आरिफ और अमित मकान के दरवाज़े की तरफ़ झपटे। अभी अमित और आरिफ दरवाजे पर पहुँचे ही थे कि दरवाज़े से आहना बाहर निकली और गाड़ी में सवार हो गई। जबकि अमित लपक कर घर में दाखिल हुआ और अंदर पड़े बेहोश शख़्स को कंधे पर डाले बाहर आया और उसे गाड़ी में डाल कर खुद भी सवार हो गया। अमित के बाहर आते ही आरिफ ने जेब से ताला निकाला और दरवाजे पर ताला लगा कर गाड़ी की ओर झपटा। आरिफ के बैठते ही राज ने गाड़ी दौड़ा दी।
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“किशोर ये मेरा मोबाइल पकड़ो, और स्कॉर्पियो लेकर दिल्ली निकल जाओ। मोबाइल ऑफिस में जाकर दिवाकर को दे देना। कह देना कि अबसे इस मोबाइल की लोकेशन दिन में ऑफिस, और रात को मेरे फ्लैट की आनी चाहिए। और इससे दो चार कॉल भी कर लिया करे, बस इनकमिंग कॉल रिसीव ना करे। वह मैंने अपने दूसरे मोबाइल पर डाइवर्ट कर ली है, मैं खुद बात कर लिया करूँगा। और ये टाइम टेबल ले मेरे मोबाइल का।”–आरिफ एक काग़ज़ उसे थमाता हुआ बोला।
“मोबाइल का टाइम टेबल ?”–किशोर असमंजस भरे स्वर में बोला।
“भाई कॉल डाइवर्ट करके सुन तो मैं लिया करूँगा, पर उस समय दिल्ली में कहाँ हूँ, ये तो टाइम टेबल से ही पता चलेगा न।”–आरिफ बोला।
“बात क्या है सर ?”–अमित बोला।
“ये नम्बर नेता जी के पास पहुँच ही गया है समझो। आज इस पर सेंगर ने क्लिप भेजी थी। तो मेरा नंबर उसके पास पहुँचा, या नेता जी के पास पहुँचा, एक ही बात है। मैंने रणविजय से कह दिया है कि हम वापस दिल्ली जा रहे हैं। तो मुर्गा अगर सेंगर के या किसी अन्य माध्यम से चेक भी कराए, तो लोकेशन दिल्ली की ही आनी चाहिए। और अगर मुझसे बात करे, तो बात भी मुझसे ही होनी चाहिए।”
“ओह।”–अमित बोला।
“किशोर तुम निकल लो। सुबह दस बजे मोबाइल देकर वापस फार्म हाउस आ जाना।”
“यस सर।”–किशोर तुरंत सफारी से बाहर निकला और स्कॉर्पियो में सवार होकर रवाना हो गया।
“आरिफ भाई अगर मुर्गे ने कॉल डिटेल निकलवा ली तो ?”–राज बोला।
“निकलवा ले। इस नम्बर से उसे कुछ नहीं मिलने वाला। और वैसे इस नम्बर की कॉल डीटेल किसी को मिलेंगी भी नहीं बिना गृह मंत्रालय की मंजूरी के।”–आरिफ बोला।
“सर वहाँ हुआ क्या था ?”–अमित ने उत्सुक भाव से पूछा। आरिफ ने बताया। सुनकर अमित और राज दोनों के चेहरे पर क्रोध के भाव आ गए।
“शांत रहो। क्रोध हमें भी आया था। पर क्रोध से कोई हल नहीं निकलेगा। हल निकलेगा तरकीब से।”–आरिफ शांत स्वर में बोला।
“कैसी तरकीब आरिफ भाई ?”–राज बोला।
“वही तरकीब, जो अभी सोचनी बाकी है।”
“ओह्ह।”–राज के मुँह से निकला।
“चिंता ना करो वकील साहब, वी विल हैव द लास्ट लाफ़।”
“जी आरिफ भाई।”–राज बोला।
“सर वह क्लिप कहाँ है ?”–अमित बोला।
“हमने गूगल ड्राइव में डाल ली थी। लिंक शेयर करते हैं तुम सब को। आराम से देखो।”–आरिफ ने मोबाइल निकाल कर लिंक शेयर कर दिया। राज और अमित अपने अपने मोबाइल पर क्लिप देखने में मसरूफ हो गए।
“सर ये तो अपनी छठी अँगुली का प्रदर्शन सा करता प्रतीत हो रहा है। इसके साथी ने ग्लव्स पहन रखे हैं, जबकि इसने इसीलिए नहीं पहने, जिससे छठी अँगुली दिखाई दे जाए।”–अमित बोला।
“और वीडियो बनाने वाले ने भी इस बात का ध्यान रखा है कि छठी अँगुली ज़रूर आए रिकॉर्डिंग में।”–राज बोला।
“वह तो हुआ। पर ये जो भी है, मास्क लगा कर मोटे तौर पर बिलकुल मुर्गे की तरह ही दिख रहा है। हाव भाव, क़द काठी और चाल सब उसी के जैसी है।”–आरिफ बोला।
“हाँ सर। बिलकुल मिलता जुलता है।”–अमित को मानना पड़ा।
“आहना पता तो करो संजय तिवारी से कि इसका ऐसा कौन सा गुर्गा है, जो देखने में रणविजय जैसा दिखता हो।”–आरिफ बोला।
आहना ने सहमति में सिर हिलाया और संजय तिवारी को कॉल लगाई। उसके फोन उठाने की प्रतीक्षा करने लगी। दूसरी ओर से फोन नहीं उठाया गया। उसने फिर कॉल लगाई। तीसरी कोशिश में कॉल कनेक्ट हुई। जाहिर था कि तिवारी सोया पड़ा था। कॉल कनेक्ट होने पर करीब दो तीन मिनट बात करने के बाद उसने मोबाइल कान से हटाया, तो उसके चेहरे पर सफलता की चमक थी।
“रोहित अरोड़ा है। लोहा मंडी में रहता है। फेमिली नहीं है। अकेला ही रहता है।”–वह बोली।
“चलो भाई, इसे ही ले चलते हैं फार्महाउस। इससे तो कोई हमारा लिंक भी नहीं जोड़ पाएगा। कुछ तो जानकारी मिलेगी ही। ना मिला मुर्गा, ना सही, मुर्गे का हमशक्ल गुर्गा ही सही। उसके ही पर नोंचकर जी हल्का कर लेंगे।”–अमित बोला।
“वह मिलेगा घर पर ?”–राज संदेहास्पद स्वर में बोला।
“अरे भाई, उसके सिर पर नेता जी का हाथ है। जाँच करने वाला पुलिस अधिकारी मुर्गे का तोता है। उसे किस बात का डर ? देख लेना घर पर ही सोता मिलेगा।”–आरिफ बोला।
“चल कर देखते हैं।”–अमित बोला और ड्राइविंग सीट सँभालकर सफ़ारी लोहामंडी की तरफ़ दौड़ा दी। लोहामंडी घनी आबादी वाला शहर का पुराना इलाक़ा था। रोहित का मकान गली के बीचों-बीच था। गली मुश्किल से दस फुट चौड़ी थी। गली के सभी घर बहुत कम क्षेत्रफल में बने हुए थे और सभी घरों का दरवाज़ा सीधा गली में ही खुलता था। कोई खुली जगह, या लॉन आदि नहीं था।
गली संकीर्ण ज़रूर थी, पर सुबह होने में अभी देरी होने के कारण इस समय बिलकुल खाली पड़ी थी। अमित ने पहले एक चक्कर पूरी गली का लगाया और फिर गाड़ी रोक दी। सभी लोग गाड़ी से उतर गए।
‘जाओ आहना ।”–आरिफ बोला।
“जी सर।”–आहना बोली और ड्राइविंग सीट पर बैठकर सफ़ारी रोहित के मकान की तरफ़ बढ़ा दी। बाकी तीनों वहीं खड़े सफारी की टेल लाइट को देखते रहे। आहना ने सफारी बिलकुल रोहित के घर के सामने रोक दी, और उतर कर बोनट खोल दिया। फिर घूमकर सफारी के पीछे पहुँची और एक कपड़ा साइलेंसर में ठूँसा और ड्राइविंग सीट पर बैठकर सेल्फ मारा। इंजन तुरंत स्टार्ट हुआ, लेकिन फिर तुरंत ही बंद भी हो गया। आहना ने संतुष्ट भाव से सिर हिलाया और फिर सेल्फ मारा। इंजन ने राउंड लिए लेकिन सिर्फ शोर भर किया, स्टार्ट होकर नहीं दिया। आहना परेशान भाव से सेल्फ मारती रही, बीच-बीच में उतर कर बोनट में झाँक कर कुछ करने का अभिनय करती थी और फिर आकर सेल्फ मारने लगती थी। गली में बिजली के खम्भे पर लगी ट्यूबलाइट की रोशनी में परेशानहाल आहना गाड़ी से अंदर बाहर की परेड करती रही। काफी देर बाद रोहित के मकान की खिड़की खुली और किसी ने बाहर झाँका। आहना ने चोर निगाहों से देख लिया, पर अपना अभिनय जारी रखा। काफी देर तक खिड़की पर मौजूद शख़्स ये सब देखता रहा, और वस्तुस्थिति समझने का प्रयास करता रहा।
“क्या हुआ मैडम ?”–अंततः वह हुआ, जिसकी आहना पिछले आधा घंटे से प्रतीक्षा कर रही थी।
प्रत्यक्ष में उसने चिहुँक कर आवाज़ की दिशा में देखा। फिर खुली खिड़की देख कर झिझकती हुई सी उधर गई।
“पता नहीं। अचानक से बंद हो गई। अब स्टार्ट ही नहीं हो रही।”–आहना परेशान से स्वर में बोली।
“पानी चला गया होगा। आपने भरे पानी में से निकाल ली होगी।”–खिड़की के अंदर वाला शख़्स आहना का नख शिख परीक्षण करता हुआ बोला।
“हाँ पानी तो बहुत जगह भरा हुआ था।”
“पानी ही चला गया होगा इंजिन में।”
“अब मैं क्या करूँ ?”–आहना अपने स्वर को अधिक से अधिक करुण बनाने का प्रयास करती हुई बोली।
“डिस्ट्रिब्युटर कैप खोलकर उसे सुखाकर, साफ करके लगाओ।”–अंदर से आवाज़ आई।
“डिस्ट्रिब्युटर कैप ? वह क्या होती है ?”–आहना असमंजस भरे स्वर में बोली।
“वहीं इंजन के ऊपर ही लगी होगी।”–खिड़की के अंदर वाले का आहना का नख शिख परीक्षण जारी था।
“सर कोई मेकैनिक मिल सकता है आस पास ?”–आहना ने पूछा। “हाँ मिल जाएगा। पर मिलेगा सुबह नौ बजे के बाद।”
“सर प्लीज़ आप कोई मदद करो ना।”
“यानी जो बोले वह कुंडा खोले।”–अंदर वाला हँसा।
“सर प्लीज़।”
“मुझे भी कहाँ कुछ मालूम है इंजन के बारे में।”
“सर प्लीज़।”
“मैं एक मैकेनिक को जानता हूँ। फोन करता हूँ उसे। अगर आ जाए तो...”–अंदर वाला बोला। प्रत्यक्ष था कि अंदर वाले का बाहर आने का कोई इरादा नहीं था। आहना के चेहरे पर सोचने वाले भाव आ गए।
“सर एक फेवर और चाहिए।”–आहना बोली।
“क्या ?”
“सर मुझे…मुझे…सर क्या मैं आपका वाशरूम यूज़ कर सकती हूँ प्लीज़?”–आहना सकुचाते हुए बोली।
“यानी आप मुझे रज़ाई से निकालकर ही मानेंगी।”–अंदर वाला हँसा।
आहना ने संकोचपूर्ण भाव से सिर झुका लिया।
“रुकिए अभी करवाता हूँ आपकी ‘शंका’ का निवारण।” आहना सिर झुकाए खिड़की के पास खड़ी रही। एक मिनट बाद कमरे की लाइट जली और दरवाज़ा खुला।
“आ जाइए।”–दरवाज़े पर करीब तीस साल का एक शख़्स नमूदार हुआ। आहना अंदर दाखिल हुई। आहना के अंदर दाखिल होते ही थोड़ी दूरी पर अंधेरे में छुपे अमित, आरिफ और राज सफ़ारी की तरफ़ झपटे। राज ने साइलेंसर में से कपड़ा निकाला, और ड्राइविंग सीट पर बैठ कर गाड़ी स्टार्ट कर दी। जबकि आरिफ और अमित मकान के दरवाज़े की तरफ़ झपटे। अभी अमित और आरिफ दरवाजे पर पहुँचे ही थे कि दरवाज़े से आहना बाहर निकली और गाड़ी में सवार हो गई। जबकि अमित लपक कर घर में दाखिल हुआ और अंदर पड़े बेहोश शख़्स को कंधे पर डाले बाहर आया और उसे गाड़ी में डाल कर खुद भी सवार हो गया। अमित के बाहर आते ही आरिफ ने जेब से ताला निकाला और दरवाजे पर ताला लगा कर गाड़ी की ओर झपटा। आरिफ के बैठते ही राज ने गाड़ी दौड़ा दी।
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