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Thriller तरकीब

बारिश रुक चुकी थी, लेकिन चार पाँच घंटे हुई मूसलाधार बारिश से जगह जगह सड़क ने बरसाती नालों का रूप ले लिया था। जगह जगह जल भराव हो चुका था। तेज चलती हवाओं ने ठंड को खासा बढ़ा दिया था। सफ़ारी किशोर चला रहा था। अमित उसके बराबर में बैठा था। सफारी की गति खासी तेज थी। सड़क पर भरे पानी में जब तेजी से गुजरती थी, तो ऐसा नजारा होता था कि जैसे कोई मोटरबोट सागर का सीना चीर कर दौड़ रही हो। अमित के निर्देश पर किशोर ने गाड़ी राजामंडी रेलवे स्टेशन की पार्किंग में ला खड़ी की। अमित ने तुरंत अपनी लोकेशन आरिफ को भेज दी। बीस मिनट बाद ही आरिफ की स्कॉर्पियो उनकी सफारी के बराबर में आ खड़ी हुई। उसमें से आरिफ और आहना निकले और सफारी में सवार हो गए।

“किशोर ये मेरा मोबाइल पकड़ो, और स्कॉर्पियो लेकर दिल्ली निकल जाओ। मोबाइल ऑफिस में जाकर दिवाकर को दे देना। कह देना कि अबसे इस मोबाइल की लोकेशन दिन में ऑफिस, और रात को मेरे फ्लैट की आनी चाहिए। और इससे दो चार कॉल भी कर लिया करे, बस इनकमिंग कॉल रिसीव ना करे। वह मैंने अपने दूसरे मोबाइल पर डाइवर्ट कर ली है, मैं खुद बात कर लिया करूँगा। और ये टाइम टेबल ले मेरे मोबाइल का।”–आरिफ एक काग़ज़ उसे थमाता हुआ बोला।

“मोबाइल का टाइम टेबल ?”–किशोर असमंजस भरे स्वर में बोला।

“भाई कॉल डाइवर्ट करके सुन तो मैं लिया करूँगा, पर उस समय दिल्ली में कहाँ हूँ, ये तो टाइम टेबल से ही पता चलेगा न।”–आरिफ बोला।

“बात क्या है सर ?”–अमित बोला।

“ये नम्बर नेता जी के पास पहुँच ही गया है समझो। आज इस पर सेंगर ने क्लिप भेजी थी। तो मेरा नंबर उसके पास पहुँचा, या नेता जी के पास पहुँचा, एक ही बात है। मैंने रणविजय से कह दिया है कि हम वापस दिल्ली जा रहे हैं। तो मुर्गा अगर सेंगर के या किसी अन्य माध्यम से चेक भी कराए, तो लोकेशन दिल्ली की ही आनी चाहिए। और अगर मुझसे बात करे, तो बात भी मुझसे ही होनी चाहिए।”

“ओह।”–अमित बोला।

“किशोर तुम निकल लो। सुबह दस बजे मोबाइल देकर वापस फार्म हाउस आ जाना।”

“यस सर।”–किशोर तुरंत सफारी से बाहर निकला और स्कॉर्पियो में सवार होकर रवाना हो गया।

“आरिफ भाई अगर मुर्गे ने कॉल डिटेल निकलवा ली तो ?”–राज बोला।

“निकलवा ले। इस नम्बर से उसे कुछ नहीं मिलने वाला। और वैसे इस नम्बर की कॉल डीटेल किसी को मिलेंगी भी नहीं बिना गृह मंत्रालय की मंजूरी के।”–आरिफ बोला।

“सर वहाँ हुआ क्या था ?”–अमित ने उत्सुक भाव से पूछा। आरिफ ने बताया। सुनकर अमित और राज दोनों के चेहरे पर क्रोध के भाव आ गए।

“शांत रहो। क्रोध हमें भी आया था। पर क्रोध से कोई हल नहीं निकलेगा। हल निकलेगा तरकीब से।”–आरिफ शांत स्वर में बोला।

“कैसी तरकीब आरिफ भाई ?”–राज बोला।

“वही तरकीब, जो अभी सोचनी बाकी है।”

“ओह्ह।”–राज के मुँह से निकला।

“चिंता ना करो वकील साहब, वी विल हैव द लास्ट लाफ़।”

“जी आरिफ भाई।”–राज बोला।

“सर वह क्लिप कहाँ है ?”–अमित बोला।

“हमने गूगल ड्राइव में डाल ली थी। लिंक शेयर करते हैं तुम सब को। आराम से देखो।”–आरिफ ने मोबाइल निकाल कर लिंक शेयर कर दिया। राज और अमित अपने अपने मोबाइल पर क्लिप देखने में मसरूफ हो गए।

“सर ये तो अपनी छठी अँगुली का प्रदर्शन सा करता प्रतीत हो रहा है। इसके साथी ने ग्लव्स पहन रखे हैं, जबकि इसने इसीलिए नहीं पहने, जिससे छठी अँगुली दिखाई दे जाए।”–अमित बोला।

“और वीडियो बनाने वाले ने भी इस बात का ध्यान रखा है कि छठी अँगुली ज़रूर आए रिकॉर्डिंग में।”–राज बोला।

“वह तो हुआ। पर ये जो भी है, मास्क लगा कर मोटे तौर पर बिलकुल मुर्गे की तरह ही दिख रहा है। हाव भाव, क़द काठी और चाल सब उसी के जैसी है।”–आरिफ बोला।

“हाँ सर। बिलकुल मिलता जुलता है।”–अमित को मानना पड़ा।

“आहना पता तो करो संजय तिवारी से कि इसका ऐसा कौन सा गुर्गा है, जो देखने में रणविजय जैसा दिखता हो।”–आरिफ बोला।

आहना ने सहमति में सिर हिलाया और संजय तिवारी को कॉल लगाई। उसके फोन उठाने की प्रतीक्षा करने लगी। दूसरी ओर से फोन नहीं उठाया गया। उसने फिर कॉल लगाई। तीसरी कोशिश में कॉल कनेक्ट हुई। जाहिर था कि तिवारी सोया पड़ा था। कॉल कनेक्ट होने पर करीब दो तीन मिनट बात करने के बाद उसने मोबाइल कान से हटाया, तो उसके चेहरे पर सफलता की चमक थी।

“रोहित अरोड़ा है। लोहा मंडी में रहता है। फेमिली नहीं है। अकेला ही रहता है।”–वह बोली।

“चलो भाई, इसे ही ले चलते हैं फार्महाउस। इससे तो कोई हमारा लिंक भी नहीं जोड़ पाएगा। कुछ तो जानकारी मिलेगी ही। ना मिला मुर्गा, ना सही, मुर्गे का हमशक्ल गुर्गा ही सही। उसके ही पर नोंचकर जी हल्का कर लेंगे।”–अमित बोला।

“वह मिलेगा घर पर ?”–राज संदेहास्पद स्वर में बोला।

“अरे भाई, उसके सिर पर नेता जी का हाथ है। जाँच करने वाला पुलिस अधिकारी मुर्गे का तोता है। उसे किस बात का डर ? देख लेना घर पर ही सोता मिलेगा।”–आरिफ बोला।

“चल कर देखते हैं।”–अमित बोला और ड्राइविंग सीट सँभालकर सफ़ारी लोहामंडी की तरफ़ दौड़ा दी। लोहामंडी घनी आबादी वाला शहर का पुराना इलाक़ा था। रोहित का मकान गली के बीचों-बीच था। गली मुश्किल से दस फुट चौड़ी थी। गली के सभी घर बहुत कम क्षेत्रफल में बने हुए थे और सभी घरों का दरवाज़ा सीधा गली में ही खुलता था। कोई खुली जगह, या लॉन आदि नहीं था।

गली संकीर्ण ज़रूर थी, पर सुबह होने में अभी देरी होने के कारण इस समय बिलकुल खाली पड़ी थी। अमित ने पहले एक चक्कर पूरी गली का लगाया और फिर गाड़ी रोक दी। सभी लोग गाड़ी से उतर गए।

‘जाओ आहना ।”–आरिफ बोला।

“जी सर।”–आहना बोली और ड्राइविंग सीट पर बैठकर सफ़ारी रोहित के मकान की तरफ़ बढ़ा दी। बाकी तीनों वहीं खड़े सफारी की टेल लाइट को देखते रहे। आहना ने सफारी बिलकुल रोहित के घर के सामने रोक दी, और उतर कर बोनट खोल दिया। फिर घूमकर सफारी के पीछे पहुँची और एक कपड़ा साइलेंसर में ठूँसा और ड्राइविंग सीट पर बैठकर सेल्फ मारा। इंजन तुरंत स्टार्ट हुआ, लेकिन फिर तुरंत ही बंद भी हो गया। आहना ने संतुष्ट भाव से सिर हिलाया और फिर सेल्फ मारा। इंजन ने राउंड लिए लेकिन सिर्फ शोर भर किया, स्टार्ट होकर नहीं दिया। आहना परेशान भाव से सेल्फ मारती रही, बीच-बीच में उतर कर बोनट में झाँक कर कुछ करने का अभिनय करती थी और फिर आकर सेल्फ मारने लगती थी। गली में बिजली के खम्भे पर लगी ट्यूबलाइट की रोशनी में परेशानहाल आहना गाड़ी से अंदर बाहर की परेड करती रही। काफी देर बाद रोहित के मकान की खिड़की खुली और किसी ने बाहर झाँका। आहना ने चोर निगाहों से देख लिया, पर अपना अभिनय जारी रखा। काफी देर तक खिड़की पर मौजूद शख़्स ये सब देखता रहा, और वस्तुस्थिति समझने का प्रयास करता रहा।

“क्या हुआ मैडम ?”–अंततः वह हुआ, जिसकी आहना पिछले आधा घंटे से प्रतीक्षा कर रही थी।

प्रत्यक्ष में उसने चिहुँक कर आवाज़ की दिशा में देखा। फिर खुली खिड़की देख कर झिझकती हुई सी उधर गई।

“पता नहीं। अचानक से बंद हो गई। अब स्टार्ट ही नहीं हो रही।”–आहना परेशान से स्वर में बोली।

“पानी चला गया होगा। आपने भरे पानी में से निकाल ली होगी।”–खिड़की के अंदर वाला शख़्स आहना का नख शिख परीक्षण करता हुआ बोला।

“हाँ पानी तो बहुत जगह भरा हुआ था।”

“पानी ही चला गया होगा इंजिन में।”

“अब मैं क्या करूँ ?”–आहना अपने स्वर को अधिक से अधिक करुण बनाने का प्रयास करती हुई बोली।

“डिस्ट्रिब्युटर कैप खोलकर उसे सुखाकर, साफ करके लगाओ।”–अंदर से आवाज़ आई।

“डिस्ट्रिब्युटर कैप ? वह क्या होती है ?”–आहना असमंजस भरे स्वर में बोली।

“वहीं इंजन के ऊपर ही लगी होगी।”–खिड़की के अंदर वाले का आहना का नख शिख परीक्षण जारी था।

“सर कोई मेकैनिक मिल सकता है आस पास ?”–आहना ने पूछा। “हाँ मिल जाएगा। पर मिलेगा सुबह नौ बजे के बाद।”

“सर प्लीज़ आप कोई मदद करो ना।”

“यानी जो बोले वह कुंडा खोले।”–अंदर वाला हँसा।

“सर प्लीज़।”

“मुझे भी कहाँ कुछ मालूम है इंजन के बारे में।”

“सर प्लीज़।”

“मैं एक मैकेनिक को जानता हूँ। फोन करता हूँ उसे। अगर आ जाए तो...”–अंदर वाला बोला। प्रत्यक्ष था कि अंदर वाले का बाहर आने का कोई इरादा नहीं था। आहना के चेहरे पर सोचने वाले भाव आ गए।

“सर एक फेवर और चाहिए।”–आहना बोली।

“क्या ?”

“सर मुझे…मुझे…सर क्या मैं आपका वाशरूम यूज़ कर सकती हूँ प्लीज़?”–आहना सकुचाते हुए बोली।

“यानी आप मुझे रज़ाई से निकालकर ही मानेंगी।”–अंदर वाला हँसा।

आहना ने संकोचपूर्ण भाव से सिर झुका लिया।

“रुकिए अभी करवाता हूँ आपकी ‘शंका’ का निवारण।” आहना सिर झुकाए खिड़की के पास खड़ी रही। एक मिनट बाद कमरे की लाइट जली और दरवाज़ा खुला।

“आ जाइए।”–दरवाज़े पर करीब तीस साल का एक शख़्स नमूदार हुआ। आहना अंदर दाखिल हुई। आहना के अंदर दाखिल होते ही थोड़ी दूरी पर अंधेरे में छुपे अमित, आरिफ और राज सफ़ारी की तरफ़ झपटे। राज ने साइलेंसर में से कपड़ा निकाला, और ड्राइविंग सीट पर बैठ कर गाड़ी स्टार्ट कर दी। जबकि आरिफ और अमित मकान के दरवाज़े की तरफ़ झपटे। अभी अमित और आरिफ दरवाजे पर पहुँचे ही थे कि दरवाज़े से आहना बाहर निकली और गाड़ी में सवार हो गई। जबकि अमित लपक कर घर में दाखिल हुआ और अंदर पड़े बेहोश शख़्स को कंधे पर डाले बाहर आया और उसे गाड़ी में डाल कर खुद भी सवार हो गया। अमित के बाहर आते ही आरिफ ने जेब से ताला निकाला और दरवाजे पर ताला लगा कर गाड़ी की ओर झपटा। आरिफ के बैठते ही राज ने गाड़ी दौड़ा दी।

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सुबह नौ बजे। रणविजय अपने कोठी स्थित ऑफिस में बैठा था। एक दो लोग अपनी समस्याएँ लेकर आए थे। रणविजय ने उनका यथासंभव समाधान कर दिया था। एक गरीब विधवा भी आई थी, जिसकी तीन जवान बेटियाँ थीं। रणविजय ने तीनों बेटियों की शादी के लिए पचास पचास हज़ार रुपए देने का वादा तो कर ही दिया था, साथ ही अगर कोई लड़की आगे पढ़ना चाहे, तो उसकी पढ़ाई का पूरा खर्चा भी करने का वादा कर दिया था। ये रणविजय ने आज कोई पहली बार नहीं किया था। ऐसा वह अक्सर करता रहता था। और यही कारण था कि समाज के निर्धन वर्ग में उसकी तूती बोलती थी। केवल यही काम वह बिना कोई नफ़ा नुक़सान सोचे करता था। इससे एक तो उसकी इमेज बनी हुई थी। दूसरे, गरीब कभी बड़ी-बड़ी बातों को–जैसे देशहित, आपराधिक छवि, भ्रष्टाचार आदि–सोचकर मतदान नहीं करता है। नेता का कोई अहसान उतारने या उसके लिए कुछ कर पाने का एकमात्र उपाय बस उसके पक्ष में वोट देना ही होता है। और समाज का यही वर्ग चुनाव में उसकी ताक़त बना हुआ था। “सर।”–संजय तिवारी ने हौले से पुकारा। रणविजय ने निगाह उठाई।

“सर राजेश्वरी देवी आपसे मिलना चाहती हैं। उन्होंने मिलने का समय माँगा है।” रणविजय के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई।

“दे दो टाइम।”–वह मुस्कुराता हुआ बोला।

“सर क्या टाइम दूँ ?”

“अभी का दो।”–वह बोला।

“ठीक है सर। मैं दस बजे का दे देता हूँ।”

“दे दो दस बजे का दे दो। और आए तो यहीं ऑफिस में बैठा कर रखना। मिलेंगे हम दो बजे के आसपास ही। थोड़ा इंतज़ार कराओ मैडम से।”

“ठीक है सर।” “और ज़रा आफताब को भेजो। देखो बाहर ही कहीं होगा।”

“जी सर अभी भेजता हूँ।”–संजय तिवारी सिर झुकाकर बोला और ऑफिस से बाहर निकल गया। पाँच मिनट बाद ही आफताब ऑफिस में दाखिल हुआ और अभिवादन करके करीब आकर खड़ा हो गया।

“बैठ जाओ मियाँ।” आफताब टेबल के सामने पड़ी विज़िटर चेयर पर बैठ गया। “मियाँ मामला उससे भी टेढ़ा है, जितना हमने सोचा था।”–रणविजय गंभीर स्वर में बोला।

“क्या हुआ सर ?”

“सरकार हमारे ड्रग के धंधे से ज़्यादा, हमारी विदेश यात्राओं की फिक्र कर रही है।”

“ऐसा क्या ?”–आफताब भी गंभीर हुआ।

“अब एक काम करो मियाँ। हमारे सभी मित्रों को खबर कर दो कि हाल फ़िलहाल हमसे कोई संपर्क ना करे। ना फोन पर, और ना ही किसी और माध्यम से।”

“ठीक है साहब।”

“बस फ़िलहाल तो इतना ही करो। मुझे नहीं लगता कि अभी सरकार के पास मेरे ख़िलाफ़ ज़्यादा कुछ है। वरना रात मुझे छोड़ते नहीं।”

“अगर अब तक नहीं है, तो आगे तो होने का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि अब तो हमें खबर है।”

“बात तो तेरी सही है। पर पता नहीं क्यों मेरे दिमाग़ में एक घंटी सी बज रही है।”–रणविजय चिंतित स्वर में बोला।

“क्या करना चाहिए साहब ?”

“हम तक आने वालों की स्क्रीनिंग और तगड़ी कर दो। जैसे वह आहना हमारे करीब तक आ गई, आगे से कोई और अपरिचित आदमी नहीं आना चाहिए।”

“जी आप फिक्र ना कीजिये। मैं सुरक्षा घेरा और टाइट कर देता हूँ।”

“ठीक है, अब जाओ, हम भी फ्रेश हो लें। रात तो इन लोगों ने खोटी कर ही दी थी।”

“जी साहब।”–आफताब उठा और अभिवादन कर के ऑफिस से निकल गया। रणविजय ने पैर सामने टेबल पर फैलाए और पीछे को टिक कर आँखें मूँद लीं। उसके ज़ेहन में राजेश्वरी देवी द्वारा हँस कर कहा गया वाक्य रह रह कर गूँजने लगा–‘थोड़ा झुकना सीख लीजिए सांसद महोदय।’ “अब हम बताएँगे राजेश्वरी देवी कि असली झुकना कहते किसे हैं।”–रणविजय बड़बड़ाया।
 
रोहित अरोड़ा को होश आया, तो उसने खुद को एक कमरे में तख़्त पर पड़े पाया। उसकी समझ में नहीं आया कि वह कहाँ था। फिर उसने दिमाग़ पर ज़ोर डाला तो उसे रात की मुसीबतज़दा लड़की की याद आई। उसे याद आया कि लड़की उसके घर में दाखिल हुई थी और चीते की तरह उस पर झपटी थी। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसकी चेतना लुप्त हो गई थी।

उसने तख़्त पर बैठ कर कमरे का मुआयना किया। उजाड़ से उस कमरे में एक तख़्त, एक लोहे की बड़ी सी अलमारी और पाँच सात प्लास्टिक की कुर्सियों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। वह उठा और कमरे का दरवाज़ा खोलने का प्रयास किया तो उसे दरवाजे पर ताला लगा दिखाई दिया। दरवाज़ा सिंगल डोर था और बेहद मज़बूत लग रहा था।

वह कमरे की एकमात्र खिड़की पर पहुँचा और बाहर झाँक कर देखा, तो दूर दूर तक खेत ही खेत दिखाई दिए, जिनमें गन्ने की फसल खड़ी थी। हाँ उसे ये ज़रूर पता चल गया कि वह पहली मंज़िल पर था। खिड़की पर मज़बूत लोहे की ग्रिल लगी हुई थी। वह वापस दरवाज़े पर पहुँचा और ज़ोर ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाने लगा।

“कोई है ? दरवाज़ा खोलो।”–उसने ज़ोर से पुकारा। फिर उसे ध्यान आया कि दरवाज़े पर ताला तो अंदर की तरफ़ लगा हुआ है। इसका मतलब दरवाज़ा अंदर से बंद किया गया था। मगर कमरे में तो उसके अलावा और कोई नहीं था। फिर ताला किसने बंद किया था ? उसने पुनः कमरे में निगाह दौड़ाई। कमरे में चारों तरफ़ फिरती उसकी निगाह लोहे की अलमारी पर आकर ठहर गई। अगर कोई हो सकता था तो सिर्फ और सिर्फ अलमारी में ही हो सकता था। कमरे में छुपने की और कोई जगह नहीं थी।

वह कुछ देर सोचता रहा, फिर अलमारी की तरफ़ बढ़ा और झटके से अलमारी खोल दी। अलमारी खाली पड़ी थी। बस कुछेक इस्तेमाल की चीजें भरी थीं।

“तुम मुझे वहाँ ढूँढ़ रहे हो पीटर, और मैं यहाँ तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ।”–अचानक कमरे में आवाज़ गूँजी। रोहित बिजली की तरह आवाज़ की दिशा में पलटा। एक पच्चीस छब्बीस साल का लड़का ज़मीन पर कोहनी पर सर टिकाए उसी को देख रहा था। लड़के का आधा शरीर तख़्त के नीचे और आधा तख़्त के बाहर था।

“कौन हो तुम ?”–वह लड़के को घूरता हुआ बोला।

“ये चाबी जेब में रख ले पीटर। अब मैं ये दरवाज़ा तेरी जेब से चाबी निकाल कर ही खोलूँगा।”–लड़के ने खड़े होकर एक चाबी उसकी तरफ़ उछाल दी। रोहित ने चाबी लपक ली।

“कौन हो तुम ? और मुझे यहाँ क्यों लाए हो ? तुम जानते नहीं कि मैं कौन हूँ।”–रोहित गुर्राया।

“मैं एक साथ तीन सवालों के जवाब नहीं देता। उत्तर चाहिए तो एक एक करके सवाल पूछो। और याद रखो–एक प्रश्न का एक ही उत्तर मिलेगा। और तुम अधिकतम पाँच प्रश्न पूछ सकते हो।”–लड़के ने अपने दोनों हाथ अपनी कमर पर रख लिए।

“अबे तू पागल है क्या ?”–रोहित चिल्लाया।

“नहीं, मैं कुशाग्र मस्तिष्क का व्यक्ति हूँ…दूसरा प्रश्न पूछो।”

“अबे तू है कौन ?”

“मैं आदमी हूँ। तीसरा प्रश्न पूछो।”

“मुझे यहाँ ऐसे क्यो लाए हो ?”

“अब मैं लाइफ़ लाइन यूज़ करूँगा। फ्लिप द क्वेश्चन। अब ये सवाल हटाओ और इसकी जगह कोई और प्रश्न पूछो। मेरा प्रिय विषय है खेल। अब तुम खेल से संबंधित सवाल पूछो।”

“भाड़ में जा, मैं जा रहा हूँ।”–रोहित चाबी सँभाले दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। “जा के दिखा।”–कहकर लड़का बिना किसी चेतावनी के उस पर झपटा और उसे लात घूँसो पर धर दिया।

रोहित ने लाख कोशिश की मुक़ाबले की, पर कोई मुक़ाबला था ही नहीं। लड़का ट्रेंड लड़ाका लग रहा था। पाँच मिनट में ही उसने रोहित को अधमरा कर दिया । रोहित फर्श पर पड़ा लम्बी लम्बी साँसें ले रहा था और लड़का उसकी छाती पर पैर रखे खड़ा था।

“माफ कर दे भाई, तू जो भी है।”–रोहित मिमियाया।

“माफ़ी के लिए तुझे मुझे लूडो में हराना पड़ेगा।”–लड़का बोला और उसे उठा कर तख़्त पर डाल दिया। लड़के ने अलमारी से सच में ही लूडो निकाली और तख़्त पर उसके सामने रख कर गोटियाँ सजा दीं।

“लाल तेरी और पीली मेरी।”–लड़का पासा फेंकता हुआ बोला।

रोहित ने भी डरते डरते चाल चली। अगले पौना घंटे में दो बाज़ी हुई और दोनों ही एक एक जीत गए।

“अरे तेरी...आधा घंटा बीत गया। आपकी तो दवाई का टाइम निकल गया।”–लड़का ऐसे बोला जैसे कि अचानक कुछ याद आ गया हो।

“मेरी कौन सी दवाई ?”–रोहित हकबकाया।

“ये वाली।”–लड़का बोला और बोलते ही उसे उठाकर फर्श पर फेंका और लात घूँसे बजाने शुरू कर दिए। कुटाई पाँच मिनट चली। इस बार की कुटाई में ठोकरों का ही आधिक्य था। लड़के ने हाय हाय चिल्लाते रोहित को उठा कर फिर से तख़्त पर डाल दिया।

“चल भई अपनी चाल चल।”–लड़का अपनी चाल चलकर पासे उसकी तरफ़ बढ़ाता हुआ बोला।

“क्या चाहिए भाई बता तो ?”–रोहित कराहते हुए बोला।

“प्रश्नोत्तर का दौर अगले राउंड के बाद।”–लड़का बोला।

“पर अगला राउंड क्यों ?”

“क्यों का क्या मतलब। बस मुझे मज़ा आता है।”–लड़के ने उसकी तरफ़ आँख तरेरी।

“भाई तू चाहता क्या है ?”–रोहित दयनीय स्वर में बोला।

“कल तेरे साथ और कौन था ?”–लड़के ने सामान्य स्वर में पूछा।

“कब कौन था ? कहाँ ?”–रोहित असमंजस भरे स्वर में बोला।

लड़के ने बिना कोई चेतावनी दिए उसे उठा कर दोबारा फर्श पर फेंका और ठोकरों पर रख दिया। अगले पाँच मिनट तक कमरे में रोहित की चीखें गूँजती रहीं। पाँच मिनट बाद लड़के ने पुनः उसे उठा कर तख़्त पर डाल दिया।

“इस बार लाल गोटी मैं लूँगा।”–लड़का ऐसे सामान्य स्वर में बोला जैसे कुछ हुआ ही ना हो।

“आफताब भाई।”–रोहित कराहा।

“क्या ?”

“कल आफताब भाई थे मेरे साथ।”

“मारा क्यों यादव को ?”–लड़का गोटी सजाता हुआ बिना उसकी तरफ़ देखे बोला।

“आफताब भाई ने बोला था मारने को।”–रोहित तुरंत बोला।

“शाबास...चल भाई तेरा टाइम हो गया है अब बिग बॉस से मिलने का। मैं तो खाली वॉर्म अप करा रहा था तुझे। असली मैच तो तेरा अब होगा।”–लड़का उठा और चाबी लेकर ताला खोलकर बाहर निकल गया। पीछे निहायत फिक्रमंद रोहित बिग बॉस की खबर से ही थर्राया जा रहा था। सामने दरवाज़ा खुला पड़ा था, लेकिन ना तो उसमें हिम्मत थी, और ना शरीर की ऐसी हालत थी कि भागने की तो क्या हिलने तक की भी सोच सके।
 
राजेश्वरी करीब अड़तीस साल की पढ़ी लिखी महिला थी। मोटर पार्ट बनाने की फैक्ट्री थी। अच्छा खासा पैसा भी था। पति का देहांत हो चुका था। एक बेटा था जो लंदन में पढ़ रहा था। शहर के प्रमुख ‘सुकन्या क्लब’ की अध्यक्ष थी। निर्धन कन्याओं के हित में उनका क्लब काम करता था। लेकिन ज़ाती तौर पर ग़रीबों से उन्हें नफ़रत थी। उनके लिए आदमी की क्लास बहुत अहमियत रखती थी। बुद्धिजीवी वर्ग से जुड़ना उन्हें बेहद पसंद था, लेकिन वह भी खुद को बुद्धिजीवी दिखाने का प्रयास भर ही था। अलबत्ता अहंकार उनमें कूट कूट कर भरा था। ग़ुस्सा सदैव उनकी नाक पर रखा रहता था।

अब दिन के ग्यारह बजे थे। वह रणविजय के ऑफिस में बैठी हुई थी। आम हालात में वह पंद्रह मिनट किसी का इंतज़ार नहीं कर सकती थीं, लेकिन आज हालात आम नहीं थे। और अब उन्हें पता भी चल चुका था कि हालात को खास बनाने में पूरा हाथ सिर्फ और सिर्फ रणविजय सिंह का ही था। उनके दिमाग़ में दो वर्ष पहले रणविजय से हुई पहली मुलाक़ात घूम गई। उनके सुकन्या क्लब का वार्षिकोत्सव था। इस मौक़े पर मुख्य अतिथि के तौर पर शहर के सांसद और मशहूर उद्योगपति रणविजय सिंह को आमंत्रित किया गया था।

मंच पर उपस्थित मुख्य अतिथि सांसद महोदय को हार पहना कर सम्मानित करने के लिए राजेश्वरी देवी उनके समक्ष पहुँची और अपने साथ आई लड़की के हाथ में थमी थाली से हार उठाकर सांसद महोदय को पहनाना चाहा। उसी समय रणविजय का मोबाइल बज उठा। रणविजय ने बाएँ हाथ को राजेश्वरी देवी की तरफ़ रोकने के अंदाज़ में उठा दिया और दाएँ हाथ में थमे मोबाइल की स्क्रीन पर नज़र डाली और कॉल डिस्कनेक्ट कर के राजेश्वरी देवी की तरफ़ मुख़ातिब हो गया। इन सब में मुश्किल से दस सेकंड लगे होंगे, लेकिन राजेश्वरी देवी के चेहरे पर नागवारी के से भाव आ चुके थे। और दूसरी बात साड़ी और स्किन फिट ब्लाउज़ में राजेश्वरी देवी के हाथ एक सीमा तक ही ऊपर उठ पा रहे थे।

रणविजय से ज़रा सा सिर झुकाना अपेक्षित था, किंतु उसका ध्यान सामने मौजूद जनता पर था। उसने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। राजेश्वरी देवी ने जैसे तैसे हार तो पहना दिया, किंतु रिमार्क पास करने से वह खुद को ना रोक पायीं। उन्होंने हँस कर कह दिया–‘ज़रा सा झुकना सीख लीजिए सर’।

हालाँकि रणविजय की मुस्कुराहट पर तो उस रिमार्क का कोई असर नही हुआ, पर उसकी आँखों में एक सर्द भाव ज़रूर आ गया था। उसके बाद भी कई अवसरों पर राजेश्वरी देवी का रणविजय से आमना सामना हुआ। लेकिन राजेश्वरी देवी के अहंकारी स्वभाव ने उन्हें रणविजय के सामने अधिक विनम्र नहीं होने दिया। रणविजय के चेहरे पर खेलती सदाबहार निश्छल सी मुस्कुराहट ने उन्हें रत्ती भर भी अहसास नहीं होने दिया था कि रणविजय को उनकी कोई बात बुरी लग रही है। फिर अभी छह महीने पहले रणविजय की फैक्ट्री से उन्हें एक पार्ट बनाने का ऑर्डर सेम्पल और रेट सहित मिला।

हालाँकि उन्हें पता नहीं चल सका कि उपरोक्त पार्ट किस काम में आता है, फिर भी उन्होंने हिसाब लगा कर देखा। डाई आदि बनवा कर और उस पार्ट में लगने वाली पैकिंग, ऑर्डर पर बनवा कर भी, जिस रेट का उन्हें प्रस्ताव मिला था उसमें फिफ्टी पर्सेंट का प्रॉफिट था। ऑर्डर इतना बल्क में था कि उन्होंने बिना सोचे समझे हाँ कर दी थी। इस संबंध में उनकी बात रणविजय से कभी नहीं हुई। सारी डीलिंग आफताब से ही हुई थी। उनके हाँ करते ही आफताब ने ड्राइंग्स के साथ पचास करोड़ रुपए एडवांस भी भिजवा दिया था। शर्त केवल ये थी कि पूरा माल एक बार में ही देना था। एडवांस के बाद राजेश्वरी देवी बिलकुल निश्चिंत हो गईं थीं। आठ सौ करोड़ का ऑर्डर था। उन्होंने बैंक से, मार्केट से, जहाँ से भी पैसा मिला उठा लिया। आख़िर चार सौ करोड़ लगा कर चार सौ करोड़ मिल रहे थे। एक ही बार में बल्ले बल्ले हो गई थी।

पिछले हफ़्ते जब उन्होंने माल तैयार हो जाने की सूचना देकर डिलीवरी की बात की, तो आफताब ने ऑर्डर कैन्सल हो जाने की बात की। उनके पैरों के नीचे से ज़मीन निकल गई। उन्होंने सारे मार्केट में पता कर लिया। कोई फैक्ट्री उस पार्ट जैसा कोई पार्ट नहीं बना रही थी। बल्कि हक़ीक़त तो ये थी कि पूरे मार्केट में कोई ना तो उस पार्ट का नाम जानता था, और ना ये जानता था कि वह प्रयोग किस चीज़ में होता था। मतलब साफ था कि अगर रणविजय की फैक्ट्री नहीं लेती है, तो उस पार्ट की बाज़ार में कोई क़ीमत नही है। उन्होंने आफताब को कई बार फोन किया, किंतु कोई जवाब नही मिला।

तब आज वह सांसद महोदय के आगे अपनी गुहार लगाने आई थीं। अगर यहाँ सुनवाई ना हुई तो घर, कार, फैक्ट्री सब बेच कर भी उनका कर्ज नहीं उतरने वाला था। अब उनकी बर्बादी या आबादी सिर्फ उस आदमी के हाथ में थी, जिसे उन्होंने कभी झुकना सीख लेने का सुझाव दिया था। हालाँकि अब उन्हें आभास हो चला था कि उन्हें बाक़ायदा योजनाबद्ध तरीके से फँसाया गया था। लेकिन उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्यों ? इसमें किसका क्या फ़ायदा था ? आख़िर पचास करोड़ तो सांसद महोदय के भी डूब रहे थे।

दीवार पर लगी घड़ी में से एक चिड़िया ने चूँ चूँ की, तो उनकी तंद्रा टूटी। उन्होंने घड़ी की तरफ़ निगाह उठाई तो बारह बज चुके थे। उन्हें यहाँ बैठे दो घंटे हो चुके थे। उन्होंने एक कोने में अपनी टेबल पर बैठे, डायरी में सांसद महोदय के प्रोग्राम तय करते संजय तिवारी पर निगाह डाली।

“अभी और टाइम लगेगा क्या ? आपने खबर तो कर दी थी ना सांसद महोदय को ?”–उन्होंने आठ बार दोहराया जा चुका अपना सवाल फिर दोहराया।

“जी मैडम, सर को खबर है। कोई काम लग गया होगा। बस वह आते ही होंगे।”–जवाब भी वही मिला, जो पहले भी हर बार मिला था। मारे उत्कंठा के राजेश्वरी देवी का गला सूख गया था। उन्हें अपने हृदय में शूल से उठते प्रतीत हो रहे थे। वह बार बार उठती थी। ऑफिस में इधर उधर चहलकदमी कर के पुनः बैठ जाती थी। उनका मनोबल बिलकुल टूट चुका था। उन्हें अपने आगे अंधकार ही अंधकार नज़र आ रहा था।

उनकी आँखें डबडबा आईं। उन्होंने रूमाल से आँखें पोंछीं और उनका इंतज़ार फिर शुरू हो गया। और इंतज़ार भी किसका ? अपनी मुकम्मल बर्बादी का। अपनी सेल्फ रेस्पेक्ट, अपनी रूह के बलात्कार का इंतज़ार।

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आरिफ, अमित, जुगल, राज और आहना ने कमरे में प्रवेश किया। काँखते कराहते रोहित ने उन्हें देख कर बमुश्किल सीधा हो कर बैठने का प्रयत्न किया।

“लेटे रहो, बैठने में दिक्कत हो तो बेशक लेटे रहो।”–आरिफ मीठे स्वर में बोला।

“नही सर ठीक है।”–रोहित भयभीत स्वर में जुगल की तरफ़ देखते हुए बोला।

“चलो तो ठीक है। अब हमें तुमसे केवल एक सवाल पूछना है…केवल एक सवाल...उम्मीद है कि तुम सीधा जवाब दोगे।”–आरिफ प्यार से बोला।

“जी सर पूछिए। मुझे जो पता होगा सब बताऊँगा।”

“तुम्हारे नेता जी को कैसे फँसाया जा सकता है ?”–आरिफ पूर्ववत मधुर स्वर में बोला।

“सर मैं नेता जी के बारे में कुछ नहीं जानता। मेरा उनसे ज़्यादा वास्ता ही नहीं पड़ता। मुझे तो आफताब भाई ही बताते हैं, जो भी करना होता है।”–रोहित डरते-डरते बोला।

“इस आफताब का घर परिवार कहाँ है ?”

“सर इसकी फेमिली तो पाकिस्तान में है। यहाँ तो ये अकेले ही रहते हैं।”

“ये पाकिस्तानी है ?”–आरिफ चौंका।

“नही सर, ये तो हिंदुस्तानी ही हैं, लेकिन इनकी बीवी पाकिस्तानी है। तो ये उनसे वहीं मिलने जाते हैं। उन्हें यहाँ कभी नहीं लाते।”

“पाकिस्तान में कहाँ ?”

“इस्लामाबाद के पास कोई गाँव है।”

“ये पाकिस्तान क्यों पहुँच गया शादी करने ?”

“इनके मामा वहीं के हैं। उन्हीं की लड़की से इनका निकाह हुआ है।”

“तुझे बहुत पता है इसके बारे में।”–आरिफ बोला।

“ये तो जी सबको ही पता है। आफताब भाई खुद ही बताते रहते हैं।”

“वह बता जो सबको नहीं, सिर्फ तुझको ही पता हो।”–आरिफ बोला।

“जी ऐसी कोई बात मुझे कैसे पता होगी ? मैं उनका इतना करीबी भी नहीं हूँ।”

“अबे उनके एक बार कहने पर एक आदमी मार गिराया और कहता है कि करीबी आदमी नहीं हूँ।”

“वह तो उन्होंने कहा, तो करना ही था।”

“भाई ये तो बेकार आदमी है। बेकार ही मेहनत की इसे लाने में।”–आरिफ निराश स्वर में बोला।

“क्या करें ? फिर मार कर गाड़ दें खेत में ?”–अमित बोला।

“नहीं प्लीज़।”–रोहित घबरा कर बोला।

“डरता है मरने से ?...और अभी पंद्रह घंटे पहले किसी को मार कर आया है। अबे जिसे मार कर आया, उससे पूछा कि उसे मरना है या नहीं?”–अमित हिकारत से उसे देखता हुआ बोला।

“वह तो मुझे आफताब भाई ने कहा था। वरना मेरी कोई दुश्मनी नहीं थी उन भाई साहब से। मैं तो उन्हें जानता भी नहीं था।”

“लो सुन लो इनके तर्क…किस कदर अख़लाक़ गिर गया है लोगों का। इन्हें पता ही नहीं कि क्या ग़लत कर रहे हैं ये।”–अमित बोला।

“सुन बे, आखिरी बात सुन, ज़िंदा रहने का आखिरी मौक़ा दे रहे हैं तुझे। एक कॉपी पेन लेकर बैठ जा। जितना जानता है सब लिख। जितने आदमियों के नाम जानता है–जो तेरी तरह इनका हर सही ग़लत हुक्म बजाते हैं–सब लिख। कौन मिलने आता है, वह लिख। इनके काम के बारे में लिख। दोस्त दुश्मन सब लिख। अब तेरे लिखे पर ही निर्भर करता है कि तू जिएगा या तेरी गाड़ी पलटेगी।”–अमित बोला। उसने जल्दी जल्दी स्वीकृति में सिर हिलाया।

“दो भई, इसे कॉपी पेन दो।”–आरिफ बोला और पलट कर कमरे से निकल गया। जुगल ने अलमारी से निकालकर एक रजिस्टर और पेन उसे थमा दिया। जुगल सहित सभी लोग कमरे से बाहर आ गए और कमरे को बाहर से बंद कर दिया। आरिफ वहीं कमरे के बाहर दीवार से टेक लगाए खड़ा था। “बेकार आदमी है। इसे नहीं पता कुछ भी। बंद रहने दो यहीं। मुर्गा हलाल हो जाए, फिर देखेंगे इसे।”–आरिफ बोला। अमित ने संजीदगी से सिर हिलाया।

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राजेश्वरी देवी को इंतज़ार करते चार घंटे से अधिक हो चुके थे। उनका मनोबल इस हद तक गिर चुका था कि वह संजय तिवारी से ये तक नहीं कह पाई कि वह टाइम लेकर मिलने आई थी। जब मुलाक़ात पहले से तय हो चुकी थी, तो फिर ये इंतज़ार क्यों ? लेकिन ख़ैर, सुख हो, दुःख हो, स्थिति कोई भी हो, बीत तो जाती ही है।

राजेश्वरी देवी का इंतज़ार भी ख़त्म हुआ और ऑफिस में रणविजय सिंह के कदम पड़े। संजय तिवारी और त्रिलोकी दोनों ही ऑफिस में मौजूद थे। दोनों रणविजय के आते ही स्प्रिंग लगे खिलौने की भाँति उछल कर खड़े हो गए और उसका अभिवादन किया। राजेश्वरी देवी भी खड़ी हो गई और रणविजय से निगाह मिलते ही दोनों हाथ जोड़ कर नमस्कार किया। ये और बात थी कि चाह कर भी मुस्कुरा नहीं पाई।

“अरे नमस्कार राजेश्वरी देवी जी, क्षमा चाहते हैं कि आपको इंतज़ार करना पड़ा।”–रणविजय उनके अभिवादन के उत्तर में हाथ जोड़ता हुआ बोला।

“नहीं सर, कोई बात नहीं।”–राजेश्वरी देवी फीकी मुस्कान के साथ बोली।

“बताइए, क्या ख़िदमत कर सकता हूँ मैं आपकी ?”–रणविजय उन्हें बैठने का इशारा करता हुआ अपनी कुर्सी पर जा बैठा। राजेश्वरी देवी भी उसके सामने एक विज़िटर चेयर पर बैठ गई।

“अगर आपको ऐतराज ना हो, तो मैं सिगरेट पी लूँ ?”–रणविजय मेज पर पड़े पैकेट में से एक सिगरेट निकालता हुआ बोला।

“जी हमें अस्थमा की शिकायत है। धुएँ से दिक्कत होती है।”–राजेश्वरी देवी संकोच पूर्ण स्वर में बोली।

“अरे ये तो बहुत बुरी बीमारी है। किसी अच्छे डॉक्टर से इलाज कराइए।”–रणविजय सिगरेट सुलगा कर उनकी तरफ़ धुएँ की दुनाली सी छोड़ता हुआ बोला।

“जी हम नियमित दवाई लेते हैं।”–राजेश्वरी देवी साड़ी के पल्लू से नाक और मुँह ढकती हुई बोली।

“बताइए कैसे आना हुआ ? मैं क्या कर सकता हूँ आपके लिए ?” जवाब में राजेश्वरी देवी ने सारी कहानी सुनानी शुरू की।

रणविजय बड़े सब्र से सुनता रहा। राजेश्वरी देवी पूरी कहानी सुना कर बड़े उद्विग्न भाव से उसकी तरफ़ देखने लगी।

“हम्म...देखिए, हम तो जनसेवा में इतने व्यस्त रहते हैं कि इन सब व्यावसायिक बातों के लिए टाइम दे ही नहीं पाते। आप इस सिलसिले में आफताब जी से मिलिए। ये सब वही देखते हैं।”–रणविजय गंभीर स्वर में बोला।

“सारी बात उन्हीं से हुई थी। पर अब तो वह डील ऑफ़ करके फोन भी नहीं उठा रहे हमारा।”–राजेश्वरी देवी रूआँसे स्वर में बोली।

रणविजय ने मोबाइल उठाया और आफताब को कॉल लगाई। तक़रीबन पाँच मिनट बात करने के बाद उसने मोबाइल सामने रखा और गंभीर मुद्रा में मेज ठकठकाने लगा। राजेश्वरी देवी व्यग्र भाव से उसकी तरफ़ देखती रही।

“देखिए राजेश्वरी देवी जी, दरअसल सारी गड़बड़ कनाडा वाली फर्म ने की है। उन्होंने ही ऑर्डर कैन्सल कर दिया, तो फिर अब वह माल हमारे भी किसी काम का नहीं रहा।”–रणविजय खेदपूर्ण स्वर में बोला।

“सर हम बर्बाद हो जाएँगे। हमने कर्ज लेकर इस ऑर्डर में पैसा लगाया है। हम सड़क पर आ जाएँगे।”–राजेश्वरी देवी हाथ जोड़ कर बोली।

“पर इसमें किया ही क्या जा सकता है ? कनाडा वाली फर्म ने ऑर्डर कैन्सल कर दिया, तो इसमें हम क्या कर सकते हैं ? बात दस बीस करोड़ की होती, तो हम अपने पास से कर देते।”

“सर आप ही हमारी मदद कर सकते हैं। वरना हमारे पास आत्महत्या के अतिरिक्त कोई रास्ता नही बचेगा।”–उसकी आँखों से गंगा जमना बह निकली।

“आत्महत्या करने से आपके बेटे की लंदन की फीस जाती रहेगी ? अपनी आगे की ज़िंदगी वह आराम से काट लेगा ? आप आत्महत्या नही करेंगी, बल्कि अपनी समस्याएँ उसे ट्रांसफर करेंगी।”

“तो हम क्या करें ?”

“सामना करिए हालात का।”

“आप मदद करिए हमारी।”–वह आशापूर्ण स्वर में बोली।

“आप क्या चाहती हैं मुझसे ?”–जानते बूझते भी रणविजय बोला।

“सर ये डील फाइनल करा दीजिए कैसे भी। हम इसमें फिफ्टी परसेंट डिस्काउंट कर देंगे। थोड़ा बहुत और, जो भी आप और कहेंगे, हम वह भी कर देंगे, पर सर प्लीज़ ये डील फाइनल करवा दीजिए।”–राजेश्वरी देवी बोली। बोली क्या गिड़गिड़ाई।

“यानी हम आपको तीन सौ पचास करोड़ देकर माल उठा लें ?”–रणविजय उसकी आँखों में आँखें डाल कर बोला।

“जी हम आपका ये अहसान कभी नही भूलेंगे। हमें इस मुसीबत से उबार लीजिए। हम आपका ये अहसान मरते दम तक नही भूलेंगे।”–वह आँख चुराती हुई बोली।

“हम आपका सारा माल ख़रीद सकते हैं। वह भी जो रेट तय हुए थे उन पर ही।”–रणविजय बोला।

“सर आप हमारे लिए भगवान का रूप ले कर आए हैं।”–मुर्दे में जैसे जान सी पड़ी।

“अरे राजेश्वरी जी क्या कह रही हैं ? ये ना कहिए।”–रणविजय हँसा।

“नहीं सर, हमारे लिए तो आप ही भगवान हैं।”–वह भावविह्वल स्वर में बोली।

“सिर्फ़ ज़ुबान से बोल रहीं हैं, या मान भी रहीं हैं ऐसा ? भगवान मानेंगी तो जो कहेंगे, वह मानना भी पड़ेगा।”–रणविजय उसकी आँखों में झाँकता हुआ अर्थपूर्ण स्वर में बोला।

राजेश्वरी देवी की आँखें पल भर को सिकुड़ी, फिर सामान्य हो गई। आख़िर स्त्री थी, पुरुषों की जात औक़ात अच्छी तरह जानती थी। मौजूदा समस्या के सामने वह बहुत छोटी बाधा थी। और फिर कोई विकल्प भी तो नहीं था उनके सामने। उन्होंने खुद को इसके लिए भी तैयार कर लिया।

“सर, आप हमारे लिए भगवान हो। आपने आज नया जीवन दिया है। आप जो भी आदेश करोगे, हमें स्वीकार होगा। बल्कि हमारी ख़ुशकिस्मती होगी।”–वह निश्चयात्मक स्वर में बोली।

“शाबाश, हमारी शरण में आ गईं, तो समझो तुम्हारी सारी समस्याएँ ख़त्म।”–रणविजय बोला।

“थैंक्स सर।”–वह हाथ जोड़कर बोली।

“बस एक बात जान लो। कभी भी हमारी बात मानने से इनकार मत करना। इनकार करना है, तो अभी कर दो। वरना तुम्हारी प्रजाति की यही आदत बुरी है, आज हाँ और कल ना।”

राजेश्वरी देवी की समझ में उसकी बात तो नहीं आई, पर उन्होंने स्वीकृति में सिर ज़रूर हिला दिया। उनके हिसाब से ज़्यादा से ज़्यादा क्या कहेगा ? अंतरंग क्षणों में कोई विचित्र या अटपटी माँग करेगा, और क्या करेगा ? सभी पुरुषों का यही हाल है। उन्होंने खुद को इसके लिए भी मानसिक रूप से तैयार कर लिया था।

“सिर मत हिलाइए। मुँह से बोलिए।”–रणविजय मीठे स्वर में बोला।

“जी आप जो कहोगे, हम वही करेंगे। आज से आप ही हमारे भगवान हो।”–वह अदा से बोली। शिकार इन परिस्थितियों में भी शिकारी बनने की संभावनाएं तलाशने लगा था। बहुत बड़े भुलावे में था शिकार।

“कबिरा कुत्ता राम का, मोतिया मेरा नाउँ, गले राम की जेवरी, जित खैंचे तित जाऊँ।”–रणविजय सहज स्वर में बोला।

“जी ?”–राजेश्वरी देवी सकपकाई।

“भाई कबीरदास जी ने कहा है। हम नहीं कह रहे। आप इससे सहमत हो या नहीं ?”

“जी।”

“तो इस हिसाब से हम आपके राम, तो आप हमारी क्या हुईं ?”–रणविजय हँसा।

“आप हमारे राम हो, अब आप हमें जो भी समझो।”–वह इठलाई।

“उस हिसाब से तो आप हमारी कुतिया हुईं।” राजेश्वरी देवी को झटका सा लगा। कुतिया शब्द उनकी चेतना से कोड़े की तरह टकराया। उन्होंने शिकायती अंदाज़ से रणविजय की तरफ़ देखा।

रणविजय निश्छल भाव से मुस्कुराया।

“ओह...तो ये बात है। बहुत से मर्द होते हैं, जो अंतरंग क्षणों में गाली गलौच पसंद करते हैं। अभद्र और अश्लील शब्द उन्हें उत्तेजित करते हैं। लगता है ये भी ऐसा ही बीमार है। पर अभी अंतरंग क्षण कहाँ हैं ? पता नहीं ये क्या चाहता है ? ख़ैर जो भी चाहे, करना तो पड़ेगा। फ़िलहाल जब तक डील फाइनल ना हो जाए, तब तक तो करना ही पड़ेगा।”–राजेश्वरी देवी ने सोचा।

“ठीक है। हम वही हैं आपके, जो आप कह रहे हो।”–प्रत्यक्ष में वह मुस्कुराती हुई बोली।

“उठ कर हमारे करीब आओ।”–रणविजय बोला। राजेश्वरी देवी ने मुड़कर संजय तिवारी और त्रिलोकी की तरफ़ देखा और फिर अर्थपूर्ण अंदाज़ में रणविजय की तरफ़ देखा।

“दोनों अंधे हैं। उन्हें छोड़, तू इधर आ।”–रणविजय अप्रसन्न स्वर में बोला।

राजेश्वरी देवी को एक और झटका लगा। रणविजय सीधी तू तड़ाक पर आ गया था। राजेश्वरी देवी ने अपने पूरे जीवन में अपने लिए तू का सम्बोधन नहीं सुना था। उनके तन बदन में आग सी लग गई। लेकिन इस समय मजबूरी आत्मसम्मान से बहुत बड़ी थी। वह उठी और बोझिल कदमों से रणविजय के पास जाकर खड़ी हो गई।

रणविजय ने ड्रॉअर से एक चेन और पट्टा निकाला। पट्टे में चेन लगाई और राजेश्वरी देवी की तरफ़ देखा। रणविजय के बैठे होने की वजह से उनकी गर्दन पहुँच से बाहर थी।

“थोड़ा झुकना सीख लो अध्यक्ष महोदया।”–रणविजय बोला।

राजेश्वरी देवी के मस्तिष्क में झनाका सा हुआ। अब काफी कुछ उनके आगे स्पष्ट हो चुका था। वह मेज पर हथेली टेक कर झुक गई। रणविजय ने पट्टा उनके गले में पहना दिया और चेन अपने हाथ में थाम ली।

“शाबाश, अब तू सही जगह है। यही जगह है तुम लोगों की।”–रणविजय उसके सिर को ऐसे सहला रहा था, जैसे कुत्ते का सिर सहलाया जाता है।

“साली कुतिया एक घंटे से हम हम बोल कर दिमाग़ खा गई। मादरजात ‘मैं’ बोलते कुछ शान घट जाती है तेरी। हम हम करके ऐसे बोलती है, जैसे पूरे मोहल्ले का ज़िक्र कर रही हो।”–रणविजय उसके गले में बँधी चेन खींच कर बलपूर्वक उसे अपने पैरों के पास ज़मीन पर बैठाता हुआ बोला।

अड़तीस हज़ार की साड़ी पहने राजेश्वरी देवी उसके पैरों के पास उकड़ूँ बैठी थी। राजेश्वरी देवी का दिमाग़ सुन्न हो गया था। उन्हें सारी धरती घूमती नज़र आ रही थी।

“सुन मादरजात, आज हमें बहुत काम है। अब तू जा। कल खेलेंगे तेरे साथ। कल देखेंगे फ़ुरसत से तेरी चाल भी और तुझे भी...और सुन अब तू हमारी कुतिया है, कोई फिक्र मत करना। हम उठवा लेंगे सारा माल और दो दिन में सारा पेमेंट भी हो जाएगा। अब जा और मज़े कर।”–रणविजय उसकी ठुड्डी को अपने जूते की नोक से ऊपर उठाता हुआ बोला।

राजेश्वरी संज्ञाशून्य सी बैठी रही। दो दिन में पेमेंट मिलने की बात से भी उनके ऊपर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। रणविजय ने उनके गले से पट्टा निकाल लिया, और संजय तिवारी और त्रिलोकी की तरफ़ देखा। दोनों उठे और ऑफिस से बाहर निकल गए।

रणविजय ने हौले से राजेश्वरीदेवी को उठाया और कुर्सी पर बैठा दिया।

“जो हुआ उसका मुझे बहुत अफ़सोस है। अब ऐसा दोबारा नही होगा। हक़ीक़त में मैं ये देख रहा था कि आपने जो कहा वह सच था या सिर्फ वैसे ही कहा था। लेकिन अब मुझे पता है कि आपने मुझे भगवान का दर्जा दिया था तो सच में दिल से दिया था।”–रणविजय प्यार से उसका सिर सहलाता हुआ बोला।

राजेश्वरी देवी संज्ञाशून्य सी बैठी रही। “हमने जिस दिन आपको पहली बार देखा था, उसी दिन से आपके दीवाने हो गए थे। समझ लो कि ये आपकी परीक्षा थी। अब हमें कोई संदेह नहीं है। अब हमारा सब कुछ आपका है। हमसे शादी करोगी राजेश्वरी जी?”–रणविजय भावुक स्वर में बोला।

“आप हमसे शादी करना चाहते हो ?”–राजेश्वरी देवी कुछ सामान्य हुईं।

“चाहते हैं और करेंगे भी, अगर आप चाहो तो। और हाँ आप चाहो, तो हाँ करो चाहे ना करो, इससे आपकी फैक्ट्री डील का कोई लेना देना नहीं। वह पेमेंट तो आपको परसों तक मिल ही जाएगा। चाहो तो अपना जवाब पेमेंट मिलने के बाद दे देना।”–रणविजय निश्छल मुस्कुराहट के साथ बोला।

“आप सच कह रहे हो ? आप हमसे शादी करोगे ?”

“हाँ राज हाँ...हम तुम्हें अपनी जान से भी ज़्यादा चाहते हैं। हम अगले हफ़्ते ही तुमसे शादी करेंगे।”

“अगले हफ़्ते ही !”–राजेश्वरी को यक़ीन नही हो रहा था ।

“हाँ अगले हफ़्ते ही। पर सुहागरात कल ही मनाएँगे।”–रणविजय शरारती स्वर में बोला।

“धत्त।”–उसने रणविजय के सीने में मुँह छुपा लिया। रणविजय ने भी उसे बाहों में भर लिया। उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी। अब शिकार फिर तैयार था, कल दोबारा शिकार होने के लिए। कल उसे फिर आकाश की बुलंदियों पर ले जाकर ज़मीन पर फेंकना था। *********************
 
करीब साढ़े तीन बजे जब राजेश्वरी देवी रणविजय के घर से निकली, तो काफी हद तक चिंतामुक्त थी। अब सब कुछ सही हो जाएगा। और सही क्या, रणविजय से शादी के बाद वह भी शहर की नामवर हस्ती हो जाएगी। रणविजय के बेहद अपमान जनक व्यवहार के घाव, उसके बाद में किए गए प्रणय निवेदन ने काफी हद तक भर दिए थे। हालाँकि उस अपमान जनक व्यवहार का कारण अभी भी उसकी समझ से बाहर था, किंतु आख़िरी परिणाम महत्वपूर्ण होता है। और वह परिणाम उनके हिसाब से उनकी जीत था। उन्हें क्या ख़बर थी कि ऐसी हार ऐसी जीत, अब उनकी नियति बन चुकी थी उनका घर जयपुर हाउस नामक कॉलोनी में था। वह अपनी आई-20 कार खुद ही ड्राइव करके आई थी। वापसी में जैसे ही वह खंदारी चौराहे पर पहुँची, उनके सामने चल रही काले रंग की सफारी ने अचानक ही ब्रेक मार दिए। उन्होंने तुरंत ब्रेक मारे, फिर भी उनकी कार सामने सफारी से टकराते टकराते बची।

“व्हाट द हेल।”–उन्होंने खिड़की का शीशा नीचे कर के बाहर झाँका। बाहर ट्रैफिक ना के बराबर था। कोई वहाँ सफारी के आगे भी नहीं था। फिर सफारी ने अचानक क्यों ब्रेक मारे ? उन्हें बहुत तेज ग़ुस्सा आया। तभी सफारी से दो आदमी उतरे और पीछे आकर मुआयना सा करने लगे।

“ये क्या मैडम, कैसे चलाती हो कार ? बेमतलब ठोक दी हमारी गाड़ी।”–उनमें से एक आदमी अप्रसन्न भाव से उसकी तरफ़ देखता हुआ बोला।

राजेश्वरी देवी का खून खौल गया। गलती भी सफ़ारी वाले की थी और उनकी कार तो टच तक नहीं हुई उसकी गाड़ी से, फिर भी वह उनकी गलती बता रहा था।

“ऐ मिस्टर, ये क्या बकवास कर रहे हो ? गाड़ी हटाओ सामने से।”–वह तेज स्वर में बोली।

“मैडम आप ऐसे बात नहीं कर सकतीं मुझ से।”–वह उसकी खिड़की पर आ गया। दो तीन मिनट दोनों में बकझक होती रही। फिर अचानक ही उस आदमी की दिलचस्पी बहस से ख़त्म हो गई। वह अपनी बात भी पूरी किए बिना मुड़ा और सफारी में बैठकर रवाना हो गया।

राजेश्वरी देवी अवाक सी उस तरफ़ देखती रह गयीं। फिर खिड़की के अंदर सिर करके कार आगे बढ़ाने का उपक्रम किया ही था कि बुरी तरह चौंक पड़ीं। उनके बराबर वाली पैसेंजर सीट पर पच्चीस छब्बीस साल का एक लड़का निर्विकार भाव से बैठा था।

“कौन हो आप और अंदर कैसे आए ?”–वह नागवारी के से अंदाज में बोली।

“जी मैं जुगल कुमार शर्मा हूँ और दरवाज़े से अंदर आया हूँ।”–वह आदरपूर्ण स्वर में बोला।

“अरे आप कोई भी हो, मगर हमारी कार के अंदर क्यों आए ?”–वह हैरत से बोली।

“आपने कहा हमारी कार, यानी आपकी कार पार्टनरशिप में है। देखिए मैडम वैसे ये आपकी ज़ाती बात है, पर मैं आपको पार्टनरशिप में कार रखने की सलाह नही दूँगा।”–जुगल गंभीर स्वर में बोला।

“क्या बकवास है ये ?”

“नही मैडम। ये बकवास नहीं है। आपने सुना ही होगा कि साझे की खेती सियार खाते हैं। कार और पत्नी पर्सनल ही सही रहती है।”

“तुम उतरो कार से, मुझे तुम्हारी बकवास सुननी ही नही है।”

“मैडम आप मेरी बात को बकवास कह रही हैं। चलो आप किसी तीसरे आदमी से पूछ लो कि मैं सही हूँ या आप।”–जुगल आहत भाव से बोला।

“तुम कार से उतरो पहले।”–राजेश्वरी देवी तेज स्वर में बोली।

“हर बार मुझे कह रही हो उतरो उतरो, उससे नहीं कह रहीं कुछ भी, जो पीछे है। मैं तो फिर भी बैठा हूँ, वह तो लेटा है।”–जुगल मुँह बिसूरते हुए बोला।

राजेश्वरी देवी ने तुरंत पलट कर देखा। पिछली सीट पर भी इसी का हमउम्र एक लड़का बाहों का तकिया सा बनाए लेटा था।

“अब तुम कौन हो ?”

“मैडम मुझे आगे मदिया कटरा पर उतार देना।”–पीछे वाला –जो किशोर ही था–बोला।

“हम पुलिस को बुलाते हैं।”–राजेश्वरी देवी ने अपना मोबाइल उठा लिया।

जुगल ने झपट कर उनका मोबाइल छीन लिया–“ये बच्चों के खेलने की चीज़ नहीं, इससे पबजी की लत लग जाती है।”

“क्या चाहिए तुम्हें ?”–अब राजेश्वरी देवी भयभीत हो गई।

“कार सीधे ले चलो। क्या चाहिए बता देंगे।”–जुगल कमर से पिस्टल निकाल कर गोद में रखता हुआ बोला।

“ले चलो आंटी जी। ये बहुत ख़तरनाक आदमी है।”–पीछे से किशोर की आवाज़ आई।

राजेश्वरी देवी और भी भयभीत हो गईं। उन्होंने गेयर डाला और कार आगे बढ़ा दी। बीच-बीच में वह चोर निगाहों से जुगल और उसकी गोद में रखी पिस्टल को देख रही थी। वह जुगल के निर्देश पर कार चलाती रही। चालीस मिनट बाद उनकी कार फार्म हाउस में दाखिल हो रही थी।

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अगले दिन सुबह ग्यारह बजे राजेश्वरी देवी रणविजय की कोठी पर पहुँची। रणविजय अपने बेडरूम में था। उसके निर्देश पर त्रिलोकी राजेश्वरी देवी को उसके बेडरूम में ले आया।

“आइए आइए, जहेनसीब, आपको हमारी याद रही।”–रणविजय हँसते हुए बोला।

“सारी रात नींद नहीं आई हमें और आप पूछ रहें हैं, याद रही।”–राजेश्वरी देवी आँखों में दिल रखकर उसकी तरफ़ देखती हुई बोली।

रणविजय हँसा।

“अच्छा आपके घर में कौन कौन है ?”–राजेश्वरी देवी बोलीं।

“बस मैं और आप।”

“और कोई नहीं है ?”–राजेश्वरी विस्मय से बोली।

रणविजय खेदपूर्ण ढंग से मुस्कुराया।

“हमें वाशरूम जाना है।”–वह रणविजय से बोली। रणविजय ने एक दरवाज़े की तरफ़ इशारा कर दिया। राजेश्वरी देवी ने अपने हाथ में पकड़ा हुआ मोबाइल वहीं बेड पर रखा और वाशरूम में चली गई। थोड़ी देर बाद ही उसके मोबाइल की लाइट जल गई।

शायद कोई व्हाटसएप्प मैसेज आया था। रणविजय ने उड़ती सी निगाह उस तरफ़ डाली। फिर उसके वॉलपेपर पर निगाह पड़ते ही उसकी आँख सिकुड़ी। उसने मोबाइल उठाकर देखा। तस्वीर पर निगाह पड़ते ही वह बुरी तरह चौंका। उसका मुँह खुला का खुला रह गया।

राजेश्वरी देवी वाशरूम से निकली, तो रणविजय को एकटक मोबाइल को देखते पाया।

“ये फोटो तुम्हारे मोबाइल में कैसे है ?”–राजेश्वरी देवी के करीब आते ही उसने व्यग्र भाव से उसे मोबाइल दिखाते हुए पूछा।

“क्यों ? नहीं आ सकती हमारे मोबाइल में ?”–राजेश्वरी देवी ने पलटकर प्रश्न किया।

“ये कौन है तुम्हारी ?”

“ये बड़ी बहन है हमारी, क्यों ?”

“सगी बहन ?”

“हाँ, पर क्यों ? क्या हो गया ?”

“तुम प्रीति अहलावत की बहन हो।”–वह विस्मय से उसकी तरफ़ देखता हुआ बोला।

“हाँ, आप जानते हो दीदी को ?”

“जानता हूँ, और इतना जानता हूँ कि फिर उसके बाद कुछ जान ही नहीं पाया।”–रणविजय बुदबुदाया।

“कैसे जानते हो ?”

“अब कहाँ है प्रीति ? अमेरिका में ?”

“नहीं, अब तो इंडिया में ही है। उनका अपने हसबैंड से डाइवोर्स हो गया है ना, तो अब वापस यहीं आ गई है।”

“प्रीति इंडिया में है और डाइवोर्स भी हो चुका है! कमाल है! कोई कैसे दे सकता है प्रीति को डाइवोर्स ?”–रणविजय अचरज से बोला।

“आप क्या कह रहे हो हमारी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा है।”–राजेश्वरी देवी बोलीं।

“मत समझो। अब तुम्हारे समझने के लिए कुछ नहीं बचा। बस मुझे प्रीति का नम्बर दे दो। मुझे उससे मिलवा दो प्लीज़।”–पता नहीं कितने वर्षों बाद आज रणविजय के मुँह से प्लीज़ निकला था।

“आपको क्या करना है दीदी से ? हमें साफ साफ बताओ।”–राजेश्वरी देवी माथे पर बल डाल कर बोलीं।

“शादी करनी है तुम्हारी दीदी से। जो काम तब ना हो सका, वह अब करना है।”

“लेकिन आप तो हमसे शादी करने जा रहे हो ना ?”–राजेश्वरी देवी माथे पर बल डाल कर बोलीं।

“राजेश्वरी जी आप प्रीति की बहन हो। हम आपका कोई अहित करने की सोच भी नहीं सकते। आप की फैक्ट्री से जो डील हुई थी, वह अब फाइनल होगी। इसके अतिरिक्त भी आपकी कोई समस्या हो, तो वह भी हम दूर कर देंगे। लेकिन शादी नहीं कर सकते।”–रणविजय स्पष्ट लहजे में बोला।

“लेकिन दीदी तो अब शादी करेंगी नहीं किसी भी हालत में। उनका एक जवान बेटा है।”–राजेश्वरी देवी बोलीं।

“वह आप हम पर छोड़ दीजिए। हम मना लेंगे उन्हें। आप बस हमारी मदद करिए।”

“हम क्या मदद करें ?”

“संपर्क कराइए उनसे। उनका नम्बर दीजिए।”

“उनसे पूछे बिना नम्बर कैसे दे दें आपको ?” रणविजय का खून खौल गया। लेकिन उसने चेहरे से मुस्कुराहट नहीं हटने दी।

“फिर आप बताओ कि उनसे कैसे सम्पर्क हो सकता है ?”–वह जब्त करता हुआ बोला।

“आप फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दो। उन्हें ऐक्सेप्ट करनी होगी, तो कर लेंगी।”

“मैंने बहुत तलाश की है। वह है ही नहीं किसी भी प्लेटफार्म पर।”

“किस नाम से सर्च किया ?”

“प्रीति अहलावत के नाम से।”

“प्रीति तोमर के नाम से था उनका अकाउंट। फिर वह हसबैंड से अलग हुईं, तो बहुत टेंशन में थी। इस दौरान उन्होंने अपने सारे अकाउंट डिलीट कर दिए थे। दरअसल उनका बेटा भी ऐब्नॉर्मल है ना, तो वह बेहद परेशान रहतीं थीं।”

“फिर ?”–रणविजय व्यग्र स्वर में बोला।

“फिर अब इंडिया लौट आईं हैं, तो खुद को सँभाला। अब दोबारा से सोशल मीडिया पर एक्टिव हुई हैं।”

“अब किस नाम से है अकाउंट ?”–रणविजय अधीर सा हो कर बोला।

“डॉक्टर प्रीति के नाम से ही है अब तो।”

“चलो मैं सर्च करता हूँ।”

“हम आपको फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज रहे हैं। आप इक्सेप्ट कर लो। हमारी फ्रेंड लिस्ट में मिल जाएँगी दीदी।” रणविजय ने तुरंत मोबाइल निकाला और सर्च करके राजेश्वरी देवी को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी।

राजेश्वरी देवी ने ऐक्सेप्ट कर लिया। ज़रा सी देर में ही रणविजय के सामने प्रीति की प्रोफ़ायल थी। उसने डरते-डरते फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी।

“वैसे अब कहाँ रहती है प्रीति ?”–रणविजय ने पूछा।

“बेंगलूरू में ही रह रही है अभी तो। पर अभी पक्का नहीं है कि इंडिया में रहेंगी या अमेरिका जाएँगी।”

“अब इस समय बेंगलूरू में होगी ?”

“नहीं, अभी तो दिल्ली में हैं शायद। फिर आगरा भी आएँगी उसके बाद बेंगलूरू जाएँगी।”

“आगरा आएँगी, तो तुम्हारे घर ही तो आएँगी ?”

“हाँ मिलने तो आएँगी। पर रुकती नहीं हैं वह हमारे घर। हमारे क्या, किसी के भी घर नहीं रुकतीं। वह हमेशा होटल में ही रुकती हैं।”–राजेश्वरी देवी बोलीं।

“ऐसा क्यों ?”

“पता नहीं, मैंने बहुत कहा, पर वह नहीं मानती। पूरा दिन मेरे पास रह जाती है, पर रुकती होटल जाकर ही है। शायद वह ऐसा अपने बेटे की वजह से करती हो।”

“हाँ ये हो सकता है।”

“वैसे अगर दीदी नहीं मानी तो ?”–राजेश्वरी देवी बोलीं।

“तो ?”–रणविजय असमंजस पूर्ण भाव से बोला। “मतलब अगर वह नहीं मानी तो...तो फिर क्या आप हमसे फिर से शादी के लिए कहोगे ?”

“राजेश्वरी देवी जी, दुआ करिए कि ऐसा ना हो। क्योंकि आपकी फैक्ट्री से माल अब हम प्रीति से शादी के बाद ही उठाएँगे।”–रणविजय सख़्त लहजे में बोला।

“क्या ?”–राजेश्वरी देवी चौंकी–“लेकिन आपने तो बोला है कि डील फाइनल है।”

“क्या बोला, वह छोड़ो, और जो अब कह रहा हूँ वह सुनो…सुनो और समझो। बीच में कोई अड़ंगा डालने की सोचना भी मत, वरना भूल जाना कि हमसे कल तुम्हारी कोई मुलाक़ात हुई भी थी।”–रणविजय शुष्क स्वर में बोला।

“नही हम कोई अड़ंगा नही डालेंगे। लेकिन प्लीज़ डील कैन्सल मत कीजिएगा।”–राजेश्वरी देवी जल्दी से बोलीं।

“अच्छी तरह समझ ले कि तेरा फ़ायदा किस चीज़ में है और नुक़सान किस चीज़ में। तू प्रीति की बहन है, इसलिए तेरी ज़हन में गूँज रही थी। राजेश्वरी देवी उसे ग़ौर से देखे जा रही थीं।

रणविजय के चेहरे पर इस समय बच्चों जैसी मासूमियत और निश्छलता थी। और राजेश्वरी देवी उस निश्छलता के पीछे छुपे चेहरे को देख चुका होने के बावजूद भी भ्रमित सी हो रही थीं।

“धन्यवाद राजेश्वरी जी।”–थोड़ी देर बाद रणविजय आँख खोल कर मुस्कुराता हुआ बोला। राजेश्वरी देवी शिष्ट भाव से मुस्कुराईं।

“अगर संभव हो तो कुछ समय हमारे साथ गुज़ारिए। आप उनकी बहन हो, आप में से भी हमें वही महक आ रही है। आप मुझे उनके बारे में बताइए। गुजरे सालों में वह कैसे रहती थी ? सामान्य रहती थी, ख़ुश रहती थी या आपको कभी ऐसा लगा कि उनके ऊपर कोई बोझ था ? आप बताइए उनके बारे में छोटी से छोटी बात बताइए।” राजेश्वरी देवी ने उसकी तरफ़ देखा। सब कुछ वही हो रहा था जिसके बारे में उन्हें कल ही बता दिया गया था। राजेश्वरी देवी ने एक लम्बी साँस ली और कल बाक़ायदा रटाई गई कहानी सुनानी शुरू कर दी। रणविजय ऐसे सुनने लगा कि क्या कोई भक्त रामायण का पाठ सुनता होगा।

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में जासूस मंडली एक घेरा बनाए बैठी थी। उनके बीच में आरिफ का मोबाइल रखा था, जिसमें से राजेश्वरी देवी और रणविजय के बीच चल रहा वार्तालाप गूँज रहा था। एक छोटा सा मिनी लेकिन शक्तिशाली माइक्रोफोन राजेश्वरी देवी के मोबाइल में कल ही फिट कर दिया गया था। जिसके बारे में राजेश्वरी देवी को अच्छी तरह समझा दिया गया था कि मोबाइल ना तो अपने से अधिक दूरी पर रखना है, और ना ही उस को अधिक तवज्जो ही देनी है। और यथा सम्भव रणविजय के पास ही बैठना है। वार्तालाप जब राजेश्वरी देवी द्वारा प्रीति के बारे में रटाई गई कहानी और बातें सुनाने पर पहुँचा तो सभी सीधे होकर कुर्सियों पर बैठ गए।

“लो भाई निगल गई मछली चारा।”–अमित बोला।

“अब आगे ?”–डॉली बोली।

अमित ने आरिफ की तरफ़ देखा।

“आगे क्या ? अब करने दो मुर्गे को प्रीति का पीछा। थोड़ी मान मनव्वल, थोड़ी ना नुकुर के बाद प्रीति मान जाएगी और प्रीति और उसका पागल बेटा, जुगल कोठी के अंदर पहुँच जाएँगे।”–आरिफ बोला।

“चलो पहुँच गए। फिर उसके बाद ?”–डॉली बोली।

“उसके बाद ? यही तो वह लाख टके का सवाल है, जिसका हल हमें निकालना है। उसके बाद क्या करेंगे ?”–आरिफ बोला।

“निकलेगी सर। इसकी भी कोई तरकीब निकलेगी।”–अमित बोला।

“तरकीब...”–डॉली धीरे से बोली–“...है मेरे पास।”

“क्या ?”–सब समवेत स्वर में बोले।

“आप लोगों ने प्रधानमंत्री जी का भाषण ध्यान से नहीं सुना शायद ?”–डॉली रहस्यमय मुस्कान के साथ बोली।

“कौन सा वाला ?”

“देश पर ये जो कोरोना रूपी महामारी आई है उसके विषय में जो दिया था।”–डॉली लगातार मुस्कुरा रही थी।

“क्या कहा था हमें ध्यान नहीं। तुम ही बता दो। पहेलियाँ क्यों बुझा रही हो।”–आरिफ झुँझलाया।

“आपदा को अवसर में बदलने के लिए प्रेरित किया था या नहीं ?”

“हाँ कहा तो था।”–आरिफ कुछ सोचता हुआ बोला।

“तो भाई बदलो ना आपदा को अवसर में।”–डॉली आराम से बोली।

आरिफ का मुँह खुला का खुला रह गया। उसने अमित की तरफ़ देखा। अमित की आँखों में भी चमक थी।

“डॉली तूने तो कमाल ही कर दिया। क्या ग़ज़ब की तरकीब निकाली है। किसी को शक भी नहीं हो सकता। कोई बवाल भी नहीं होगा।”–आरिफ डॉली की तरफ प्यार से देखता हुआ बोला।

“बहन किसकी हूँ भाई ?”–डॉली हँसी “सर बवाल होना तो दूर, कोई जनाज़े में भी आ गया तो बड़ी बात होगी।”

“पर इसे कोरोना होगा कैसे ?”–आरिफ बोला।

“हो भले ही ना, पर रिपोर्ट पॉजिटिव आनी चाहिए। बस ज़रा सा गला खराब हो जाए, ज़रा सा बुखार आ जाए, रिपोर्ट तो हम पॉजिटिव ही बनवाएँगे।”

“फिर ये हॉस्पिटल में भर्ती होगा या होम कोरेनटाइन होकर इलाज कराएगा ?”

“जो हम डॉक्टर से कहलवाएँगे।”–डॉली फिर धीरे से बोली।

“डॉक्टर क्यों कहेगा ?”–आरिफ बोला।

“हमारा डॉक्टर कहेगा।”–डॉली विश्वासपूर्वक बोली।

“हमारा डॉक्टर ?”–आरिफ ने प्रश्नवाचक निगाहों से डॉली की तरफ देखा।

“यस हमारा डॉक्टर। जो पॉजिटिव रिपोर्ट बनवायेगा। जो ट्रीटमेंट करेगा। जिसकी हर बात हमारा मुर्गा आँख बंद करके मानेगा। हमारा डॉक्टर...डॉक्टर प्रीति अहलावत।”

“ग़ज़ब।”–आरिफ अपनी सीट से उछल पड़ा।

“डॉली तू आई०बी० ज्वाइन कर ले ”–अमित ताली बजाता हुआ बोला। डॉली खिलखिलाकर हँसी।

“तो फिर अब तो प्लान सिंपल है। डॉक्टर जाएगी और उसकी कोठी में सेट हो जाएगी। फिर उसे कोई दवा देगी, जिससे उसे हल्का बुखार और गला खराब हो जाए। फिर जाँच, फिर कोरोना पॉजिटिव, फिर कोरेनटाइन, फिर चार दिन बाद मुर्गे की कोरोना से मौत। देश एक युवा नेता खो देगा।”–आरिफ बोला।

“पर भाई उसके ड्रग के कारोबार का क्या ? उसके गैंग का क्या ? वह सब तो बच जाएँगे।”–डॉली बोली।

“पर अब इसमें हम और कर ही क्या सकते हैं ?”–आरिफ बोला।

“मुर्गे को गिरफ्तार कर सकते हैं। उसकी तबियत से कुटाई कर सकते हैं। उससे सारे गैंग के नाम उगलवा सकते हैं और उसके सारे गैंग को नेस्तनाबूद कर सकते हैं।”–डॉली आराम से बोली।

“कैसे ?”–सबके दिमाग की चकरघिन्नी बन गई। फिर डॉली ने बताया कि–‘कैसे’।”

आरिफ ने दौड़ कर डॉली को गोदी में उठा लिया और गोल गोल घुमाने लगा। अमित भी बेहद ख़ुश नज़र आ रहा था। जुगल और किशोर ने तो बाक़ायदा डान्स किया।

“और अब शुरू होता है ऑपरेशन मुर्गा।”–आरिफ बोला और डॉली को एक बार कस के अपने से लिपटा कर छोड़ दिया।

“बोल कोरोना मैया की।”–जुगल ने मुट्ठी बाँध हाथ हवा में लहराया।

“जय।”–सब ने सामूहिक उदघोष किया।

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रात के साढ़े आठ का वक्त था। राकेश कटियार अपने मथुरा स्थित घर में अपने ऑफिस में बैठे थे और उनके सामने बैठा था रणविजय सिंह। दोनों किसी गंभीर मंत्रणा में व्यस्त थे। रणविजय बार बार कुछ कहता था और राकेश कटियार हर बार मज़बूती से इनकार में सिर हिला देते थे। राकेश कटियार कोई पचास साल का, थुलथुल शरीर वाला, गोरा चिट्टा आदमी था। सिर के बाल तक़रीबन उड़ चुके थे। माथे पर लाल टीका बता रहा था कि नियम से संध्या वंदन करने वाला धर्मपरायण आदमी था।

“देखिए कटियार साहब विचारधारा अपनी जगह है, पर संबंध अपनी जगह। अब सत्ता का क्या है, कभी हमारी तो कभी आपकी।”

“बात आपकी सही है। इस बात से मैं कब इंकार कर रहा हूँ ?” “कटियार साहब अगर हमारी सरकार आ गई, तो क्या आपके काम होने बंद हो जाएँगे ?...नहीं ना।”

“रणविजय बाबू आप यक़ीन करो, हमारी भी कोई सुनवाई नहीं हो रही है इस सरकार में। पता नहीं क्या हो रहा है ? कुछ समझ ही नहीं आ रहा।”

“कटियार साहब आप की पार्टी इस एलाइंस की मुख्य पार्टी है। क्या आपकी नहीं सुनी जाएगी ?”

“यक़ीन करो रणविजय बाबू ऐसा ही है।”

“चलिए छोड़िए उस बात को। उससे तो मैं सुलट लूँगा कैसे ना कैसे भी, पर अब मेरा अपनी पार्टी से दानापानी उठ गया समझो। आप मुझे अपनी पार्टी में शामिल करवाओ...ये तो हो जाएगा ?”

“हाँ इसकी बात मैं अपने अध्यक्ष से करूँगा।”

“ज़रूर करिए और ये भी बता दीजियेगा कि मेरे साथ और भी लोग तो आएँगे ही, साथ ही मैं सौ करोड़ डोनेशन भी दूँगा पार्टी फंड में।”

“सौ करोड़ ?”–कटियार का मुँह खुला का खुला रह गया।

“और एक बी०एम०डबल्यू० कार आपको अलग से बतौर गिफ़्ट।”

“मैं कल ही दिल्ली जाकर बात करता हूँ।”–कटियार की आवाज़ में लरज थी।

“भाई कटियार साहब मेरा तो यही मानना है ज़िंदगी चार दिन की है, जियो तो खुल कर जियो, वरना जो है, सब एक दिन यहीं धरा रह जाना है।”

“सही बात है।”–कटियार बोला।

“एक हमारे जानने वाले बुजुर्गवार थे। बेचारों की पत्नी जवानी में ही गुज़र गई थी। बच्चों के प्यार में दूसरी शादी नहीं की। बच्चों को पढ़ाया लिखाया, किसी काबिल बनाया। इसी चक्कर में जवानी कब विदा हो गई पता भी ना चला। और बच्चे काबिल बनकर विदेश चले गए और शादी करके वहीं बस गए। कुछ डॉलर हर महीने भेज देते थे, बस समझ लेते थे कि उनके कर्तव्य का निर्वहन हो गया। अब बताओ चंद डॉलर क्या उनकी जवानी लौटा सकते थे ? उनका अकेलापन दूर कर सकते थे ?”

“नहीं कर सकते। कैसे कर सकते हैं ?”–कटियार साहब बड़े दुखी स्वर में बोले।

“लेकिन मुझसे उनका दुःख देखा नहीं गया, जबकि वह बुज़ुर्गवार मेरे कुछ लगते भी नहीं थे। बस सिर्फ मामूली जान पहचान भर थी। फिर जब मुझसे उनका दुःख देखा नहीं गया, तो मैंने उनकी जवानी भी लौटाई और अकेलापन भी दूर किया। आप यकीन करना कटियार साहब जो ख़ुशी, जो पूर्णता का अहसास मैंने उनके चेहरे पर देखा, एक अजीब सा सुकून महसूस किया मैंने। और तभी मैंने जान लिया कोई अपना नहीं होता, सिर्फ जो पा लिया, जो भोग लिया वही अपना है।”–रणविजय दार्शनिक अंदाज़ में बोला।

“कैसे लौटाई उनकी जवानी ? कैसे दूर किया उनका अकेलापन ?”–कटियार ने पूछा।

“अरे छोड़िए कटियार साहब। आप भी कहोगे कि कैसा आदमी है रणविजय।”

“अरे नहीं रणविजय बाबू आप बताओ।”–कटियार के स्वर में कुछ बेचैनी सी थी।

“दरअसल कटियार साहब मेरे उसूल कुछ अलग हैं। मैं किसी को ख़ुशी देने के लिए नियम कानून की परवाह नहीं करता।”

“किया क्या था आपने ?”

“हमारे बुजुर्गवार कल्पनालोक में जी रहे थे। एक दिन उनके साथ दो दो पैग हो गए, तो नशे की झोंक में वह बता गए कि रणविजय बाबू मेरे जीवन का एक ही सपना है। बस एक ही अभिलाषा है, लेकिन मुझे मालूम है कि वह कभी पूरी नहीं होगी। वह मेरी मौत के साथ अधूरी ही मेरे साथ जाएगी। कटियार साहब यक़ीन करना उनकी ये विवशता मुझसे देखी नहीं गई।”

“क्या सपना था उनका ?”–कटियार का गला सूख चला था।

“उनका सपना था कि दो हसीन, कमसिन लड़कियों के साथ वह एक साथ रात बितायें।”–रणविजय धीमे स्वर में बोला।

“थ्रीसम।”–कटियार फुसफुसाया।

“हाँ शायद वही। मुझे तो मालूम नहीं क्या कहते हैं इसे।”

“फिर क्या किया आपने ?”–कटियार फँसी फँसी आवाज़ में बोला।

“मैंने नैतिकता की परवाह ना करते हुए अगले ही दिन बुजुर्गवार को अपने फार्महाउस पर ले जाकर उनकी अभिलाषा पूरी करा दी।”

“कैसे ?” “कैसे क्या मतलब ? मैंने तो उन्हें साथ कर दिया बस। और मैं क्या करता ?”

“नहीं, मतलब लड़कियाँ कहाँ से आईं ?”

“मेरा मैनेजर इंटर कॉलेज से दो लड़कियाँ ले आया। वह कोई बड़ी बात नहीं।”

“इंटर कॉलेज की ?”–कटियार की आँख फैल गई।

“हाँ कटियार साहब। अब जब उनका सपना रंगीन हो ही रहा था तो रंग भी तो बढ़िया ही इस्तेमाल होने चाहिए थे न।” रणविजय ने देखा कटियार की साँसें तेज चल रही थीं। वह बार बार बेचैनी से पहलू बदल रहा था। रणविजय मन ही मन हँसा–मछली चारा निगल गई।

“अच्छा कटियार साहब चलता हूँ। फिर मुलाक़ात होगी।”–रणविजय खड़े होते हुए बोला।

“अजी ऐसे कैसे, डिनर करके जाना और डिनर से पहले दो दो पैग हमारे साथ भी हो जाएँ।”

“अरे नहीं नहीं आप व्यस्त होंगे। फिर कभी ये फ़ख़्र हासिल करेंगे। आज तो इजाज़त ही दीजिए।”

“अजी काहे का व्यस्त। और आपके साथ के लिए हज़ार काम छोड़ देंगे। बैठो, अभी तो ढेर सारी बातें करनी है आपसे।”–कटियार उसे हाथ पकड़ कर बैठाता हुआ बोला।

पता है क्या ढेर सारी बातें करेगा तू। मन ही मन सोचता रणविजय प्रत्यक्ष में मुस्कुराता हुआ बैठ गया। उस रात उनकी बैठक बारह बजे तक चली। वह भी तब ख़त्म हुई जब कम से कम दस बार रणविजय ने जाने की इजाज़त माँगी और अगले दिन शाम को अपने फार्म हाउस पर मिलने का पक्का वादा कर लिया।

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