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A Horror Novel - स्वाहा complete

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अब यह मामला ज्यादा सगीन हो गया लगने लगा था। लेकिन स्थिति की इस गम्भीरता को वह रेखा के सामने जाहिर नहीं करना चाहता था l

अमर ने माया को हुक्म दिया माया! सारे काम छोडकर यह खून साफ कर दो... ।"

"साहब जी! अगर आप पिंजरे' से उल्लू को निकालकर बाहर फैक दे तो में यह पिन्जरा' भी धो दूं। " माया बोली।

"ठीक है... । ' ' अमर समझ गया कि माया उस मरे हुए उल्लू सै डर रही है।

वह फोरन आगे बढा-पिजरे' को पैर से जरा आगे खिसकाया। फिर सूखै-साफ फर्श पर बैठकर उसने पिंजरे' का दरवाजा खोला और हाथ डालकर उल्लू का फैला हुआ पख पकडा उसने उल्लू क्रो बाहर खींच लिया। उसने सोचा था कि वो इस मरे हुए उल्लू को बराबर वाले खाली प्लाट की तरफ उछाल देगा... ।

लेकिन...वह अभी उल्लू का पख पकडकर ख़ड़ा ही हो रहा था कि एकाएक जबदस्त फडफडाहट, की आबाज आई। उल्लू का पंख अमर के हाथ से निकल गया ।

यह देख सब सन्नाटे में आ गए ।

वह उल्लू अमर के हाथ में बुरी तरह फडफडाया.. था। और फिर जेसे ही अमर की गिरफ्त ढीली हुई, उल्लू उसके हाथ से निक्लक उडता हुआ छत्त की तरफ उड गया था ।

रेखा चीख माराकर पीछे हटी।

माया भी बुरी तरह चिल्लाई। अमर ने अपने हवास पर कावू रखा और एकदम कहकहा लगाकर हसा। ~

"कमबख्त जिंदा' था।"

' 'यह...यह क्या हुआ?" ' रेखा चकरा गई थी।

"कुछ नहीं हुआ... । " अमर मुस्कराते हुए वोला… ' 'हाथो के तोते उडने की बजाये आज हाथो के उल्लू उड़ गये I”

"आपको मजाक सूझ रहा है मेरी जान पर वनी हुयी है। "

माया खून पौछने में लग गई थी । अमर ने रेखा की बात पर कोई तवजो न दी और कुछ कहै बिना अपने कमरे की तरफ चल दिया ।

और यह भयावह स्वप्न-सा घटना क्रम यहीं खत्म न हुआ था।

यह दूसरे दिन शाम कीं बात है। रेखा सामने बगले में अपनी सखी रजनी से मिलने गई हुई थी ।

अमर अपने आँफिस में था I घर पर गगा मौसी और माया के अलावा कोई न था।

और यह वही वक्त था कि घर की कॉलबेल बजी ।

_ माया ने दरवाजा खोलकर बाहर झाका तो उसकी ऊपर की सास ऊपर और नीचे कीं सास नीचे रह गयी। सामने, बरामदे में, वही रहस्यमय व्यक्ति खड़ा था। और इस वक्त वो जैसै गुस्से में था। माया क्रो देखते ही वह सर्द लहजे में बोला।

' 'हमारा परिन्दा बापस कर दो... I "

"परिन्दा...अच्छा वह उल्लू.. ॥ वह तो जो मर गया... I” माया ने जल्दी सै बात पलटी--' 'नहीं जी...वो तो...बो तो जी उड गया... ।"

”शीना को एक अमानत दी गई थीं बडे अफसोस की बात है कि वह उसकी हिफाजत न कर सकीं I "

'है जी... । " माया मुह खौलकर रह गई।

' '....वह आजाद हो गया है और यह कोई अच्छी बात नहीं... t” उस रहस्यमय व्यक्ति ने बदस्तुर तीखे लहजे में कहा---' 'अपनी शीना बीबी को बुलाओ।"

' 'हैं जी...! मेरी तो कुछ समझ में नहीं' आरहा हैं। आप क्या कह रहे हैं?" माया बौखला गई थी।

"तुम्हारी रेखा बीबी कहा' हैं?"

"बो तो जी घर में नहीँ हो ।।"

' 'जानता हूँ। उनसे कहना क्रि अब मेरी मुलाकात उनसे रेगिस्तान में होगी। लाओ, वह खाली पिन्जरा मेरे हवाले कर दो . . l ‘ '

"अच्छा जी, आप ठहरें...मै लाती हूँ।! माया बडी तेजी सै पिजरा उठा लाई। वह करीव ही दीवार के साथ रखा था--' 'यह लो, जी… ।”

उस रहस्यमय व्यक्ति ने पिंजरा अपने हाथ में ले लिया । फिर हाथ ऊपर करके पिंजरे' क्रो बडी… हसरत भरी नजरो से देखा और जाने के लिए पलटा ।

' 'वो जी...आपका नाम क्या है? बीबी से में क्या कहूंगी कि कौन आया था... ।"

' 'काला चिराग...।' ' उस रहस्यमय व्यक्ति ने जाते-जाते मुडकर कहा-- '’मेरा सदेशा देना मत जाना।"

' 'नहीं जी... ।' ' माया ने यकीन दिलाया।

' 'हां, उनसे कहना कि कोई रेगिस्तान में उनका इन्तजार कर रहा हैं.. .यहां वक्त बर्बाद न करें. .. I "

"अच्छा जी, कह दूगी I " माया थूक निगलते बोली।

वह रहस्यमय व्यक्ति, खाली पिंजरा घुमाता हुआ तेजी सै आगे बढ गया। माथा ने फोरन दरवाजा बन्द कर लिया I दरवाजा बन्द करके वह कुछ देर खामोशी-सै खडी, रही। फिर उसने दरवाजा खोलकर बाहर झांका । वह जा चुका था ।

माया तत्काल बाहर निकली और सडक_पार करके सामने वाले वगले के दरवाजे पर पहुची' कॉल बैल दबाई दरवाजा रजनी के नौकर ने खोला।

'‘ हा..क्या है? '

"बीबी कहा है ।। रेखा बीबी...!"

' 'अन्दर है... । ' ' नौकर ने कहा और एक तरफ हटते माया को अन्दर आने को रास्ता दे दिया । "रेखा ने माया को भीतर आते देखा तो उसका माथा ठनका। उसने तेजी से पूछा ।

“क्या हुआ, माया?? खैर तो है?“

''हा जी, बिल्कुल खैर है, वो जी बडी बीबी बुला रही हे ।"

"रेखा उठ खडी हुई। मै चलती हूं रजनी.. .तुम आना... ।' '

रजनी उसे गेट तक छोडने आई।

रेखा और माया सडक. पार कर अपने बगले' के गेट के करीब आ गई तो, माया ने उसके निकट हौते बडी राजदारी से कहा --

'' बीबी, वो आया था? "

' 'वो काले कपडों वाला?" रेखा ने ठिठकते हुए पूछा ।

' 'हां जी, पर आपको केसे फ्ता चल गया... । ' '

“तुम्हारी शक्ल देखकर। हवाईया जो उड रही हैँ I ' '

' 'बो जी खाली पिन्जरा ले गया है और आपके लिए एक सन्देशा दे गया है।"

और माया ने उस रहस्यमय व्यक्ति के साथ हुई बातें सविस्तार कह सुनाई।

यह सब सुन रेखा का रग उड गया । एक अज्ञात-सा भय उसके दिमाग पर छा गया था। वे बातें करते हुए ही अन्दर आए थे। अपने कमरे में आकर रेखा एक कुर्सी पर बैठ गई तो माया बैड के कौने पर आ बैठी।

रेखा की समझ में नहीं आ रहा था यह रहस्यमय व्यक्ति है कौन जो अचानक ही कहीँ से प्रक्ट हो जाता था । नाम भी बड़ा अजीब था । काला चिरागा भला यह भी कोई नाम हुआ। चिराग से तो रोशनी फूटती है और रोशनी काली कब होती है ।

वड सन्देशा दे गया था कि अब रेगिस्तान मे मुलाकात होगी। पर रेखा क्रो किसी रेगिस्तान में जाने कीं क्या जरूरत थी । अगर कोई उसकी इन्तजार किसी रेगिस्तान में कर है तो फिर जिन्दगी भर इंतजार ही करता रहेगा। वह यहां आराम सै रह रही थी-उसे रेगिस्तान में भटकने की भला क्या जरूरत है ।

वह यह सोच रही थी और नहीं जानती थी कि बौ जो सोच रही है गलत सोच रही है। आने बाता वक्त उसके लिए जो जाल बुन रहा था उस जाल में फंसकर' उसे न जाने कहा कहा भटकना था ।

माया रेखा को खामोश बैठा देखकर खडी हो गई, बीबी, मैं नीचे जा रही हूँ-जरा किचन देखूं।

माया के नीचे चले जाने के बाद रेखा कुर्सी सै उठी और टेर्लोफान उठाकर बैड पर ले आईं और आलती-पालती मारकर बैठ गई। उसने अमर का नम्बर लगाया और रिसीवर कान से लगा लिया । दो घटिया बजने के बाद किसी ने रिसीवर उठाया।

उथर से

' 'हेलो ।' ' कहने वाला व्यक्ति अमर नहीं था-उसका असिस्टेन्ट आनन्द था।

' 'भाई कहा हैं? ' ' रेखा ने उसकी आबाज पहचानकर पूछा था ।

आनन्द भी रेखा की आवाज को पहचानता था, सो फौरन समझ गया कि किस भाई कौ पूछा जा रहा है। उसने जबाव दिया--' 'जी वह तो चले गए।"

'' कहा . .? "

' 'किसी साहब से मिलने गए हैँ-वहां से घर चले जायेगे । ' '

' 'अच्छा, ठीक है । ‘ ' कहकर रेख ने रिसीवर रख दिया । बाहर अब बारिश होने लगी थी ।

रिसीवर रखने के बाद वह यू ही दरवाजे को देखती रही । दरवाजे को देखते देखले उसे यू महसूस हुआ जैसै कोई अन्दर आया है। यह उसकी अजीब आदत थी । उसे बैठे बैठाये ही अपने गिर्द किसी दुसरे की मौजूदगी का अहसास हो रहा था I किसी अमानवीय प्राणी की मौजूदगी का अहसास ।
 
इस गैर इन्सानी प्राणी के बारे में सोचते-सोचते उसका ध्यान उस बन्द कमरे की तरफ चला गया।

फिर बेअख्तयार ही ललक उठी कि बो उठे, उस कमरे का ताला खोले और उस कमरे के अंदर चली जाए। देखे तो सही कि उसमें क्या है?

उल्लू का खूंन, कदमों के निशान, घायल उल्लू का फडफडाकर उड जाना, बडे दादा का लिफाफा, बद कमरा, उसके हैण्डल पर लगा हुआ ताबीज । इन सब बार्तों ने उसे सख्त उलझन मॅ डाल दिया था। उसकी जिज्ञासु प्रवृत्ति उसे इस के लिए उक्सा रही थी कि वह किसी तरह उस काली दिवारों वाले कमरो में दाखिल हो जाए।

उसे तो यह भी मालूम नहीं था कि उस कमरे के ताले की चाबी किसके पास है । उसने इस सिलसिले में गंगा मौसी सै बात करने की सोची । वही चाबी के बारे में बता सकती थीं।

वह गगा मोसी के कमरे में पहुची ।

उसने देखा कि अमर भी मौसी के साथ बैठा उनसे बात कर रहा है। उन दौनों ने ही मुस्करा कर जैसे रेखा का स्वागत किया था l

गंगा' मौसी बोली--”आओ, रेखा...!"

"वारिश का मजा ले रही हैं, आप...?“ अमर बोला था ।

' 'हां, भाई! आप जानते ही है मुझे बारिश कितनी अच्छी लगती-है । जी चाहता है, ऐसी बारिश में नहाऊं.... ।"

' 'तो नहाओ, किसने रोका है... । "

"अरे, अमर कैसी बात कर रहे हो ।" मोसी ने विरोध किया " हर्गिज नहीं वेटी! बीमार हो जाओगी।”

' ’सुन लिया भाई। ' ' रेखा ने हसकर कहा।

मोसी विषय बदलते हुए बोली थी---"अच्छा हुआ, बेटी तुम आगई। मैं तुम्हें बुलाने बाली थी।" मौसी एकाएक ही सजीदा नज़र आने लगी थीं, हमें अभी अमर से तुम्हारी ही बात कर रही थी।

"क्या मोसी? ' '

' 'वह माया बता रही थी कि वो मरोजाना काले कपडों. वाला फिर आया था-अपना उल्लू बापस लेने।"

अमर भी हालात से आगाह था, उसने हसते' हुए ही टिप्पणी क्री थ्री… ' 'उल्लू तो उसे मिला नहीं, खाली पिन्जरा' ले गया और आईदा प्रकार का वक्त दे गया I"

“ 'जी भाई' वो कह गया है कि रेगिस्तान में मिलेगा ।" रेखा ने सहज भाव में जवाब दिया---"जाने कौन शख्त है मैने तो आज तक उसे देखा नहीं. . . I”

' ' अब तो उससे मिलने के लिए रेगिस्तान का ही रूख करना पडेगा।” अमर बदस्तूर शोखी सै बोला था।

"भगवान न करे। अमर तुम बेकार की बेहूदा बातें बहुत करते हो... । " मोसी ने, अमर को प्यार से डाटा । "

" भाई, एक बात तो बताओ। " रेखा अमर को निहारते हुए बोली ।

‘ "जरूर...क्या बात है?"

' 'उस काली दीवारों वाले कमरे की चाबी कहा है?" रेखा ने पूछा ।

"क्यों खैरियत तो है?'' मोसी एकदम सहम गई--"रेखा बेटी! यह अचानक तुम्हें चाबी का ख्याल केसे आया?“

' 'बस, वैसे ही पूछ रही हूँ? " रेखा सहज भाव में बोली… “कहा है चाबी भाई।"

"चाबी कहा' है, मुझें खुद याद नहीं ।" अमर बौला-!वासूदेव साहब ने जाने चाबी मुझें दी भी थी था नहीं। सात आठ साल हो गए हैँ यह मकान खरीदे। अब मुझे याद नहीँ है, वेसे भी जव वासूदेव साहब ने यह बात मुझे बता दी कि इस कमरे को किसी भी हालत में कभी नहीं खोलना है तो मैंने इस कमरे की चाबी का भी ज्यादा ख्याल नहीं किया होगा। मेरा ख्याल है वासूदेव साहब ने चाबी मुझे दी ही नहीं थी । ' '

' 'हा नहीं दी थी। " मौसी बोल उठी' 'मुझे याद है हमने मागी भी नहीं थी।' '

चाबी के बारे में इस रहस्योद्घाटन ने कि वह घर में नहीं है रेखा को बडा… निराश किया। वह कुछ देर मोसी और अमर से बातें करती रही तथा फिर अपने कमरे में आगई।

अपने कमरे में आकर रेखा, उस काले कमरे का ख्याल अपने जहन से नहीं निकाल पाई थी और न ही उस कमरे में जाकर अन्दर से देखने की अपनी ख्वाहिश क्रो ही दबा पाई थी । बल्कि जाने क्यों उसे यह महसूस हौ रहा था, जैसे कोई उसके कान में कह रहा हो--- "आओ रेखा, वह कमरा देख लो... । “

अपना ध्यान बाटने को ही रेखा ने कैसेट लगाई और सुनने लगी। ध्यान थोड़ा बटा और फिर कैसेट सुनते-सुनते ही जाने कब उसे नींद आ गई ।

रात को दो बज रहे थे। बारिश बद हो चुकी थी। रेखा की आख अचानक ही खुल गई। उसका गला खुशक हो रहा था।

उसने उठकर साईड टेबिल पर रखै जग से पानी निकालना चाहा-मगर जग तो खाली था। माया, शायद आज पानी रखना भूल गई थी । उसने जग उठाया, दरवाजा खोलकर बाहर आई और सीढिया उतरने लगी। इरादा नीचे रखे फ्रिज से पानी लेकर आने का ही था। लेकिन नीचे पहुची' तो उसकी सोच बदल गई ।

उसने जग डायनिंग टेबिल पर छोड़ा और जेसे मत्र'-मुग्ध-सी ही उस बद' कमरे की तरफ बढ गई ।

हैरत की बात यह थी कि अभी कुछ देर पहले-प्यास क्री वजह सै उसके गले में काटे से चुभ रहे थै। लेकिन अब वह अहसास जाता रहा था। प्यास बुझ गई थी जैसे । वह वडे इत्मीनान से उस रहस्यमय कमरे की तरफ बढती चली गई।

ओर फिर.......

वह जब उस कमरे क्रे निकट पहुची तो यह देखकर हैरान रह गई कि गंगा मोसी पहले से ही वहां मोजूद है।

"आओ रेखा आओ। मुझे मालूम था कि तुम यहां जरूर आओगी...।"

और फिर.....

इससे पहले कि रेखा कुछ कहती, गगा मौसी बडी तेजी से उसकी तरफ लपकी ।।

जेसे उसे मारना चाहती हो ।

"बेवकूफ _ लडकी, क्यों अपनी जिन्दगी के पीछे हाथ-धोकर पडी है, ठहर तो....मै बताती हूँ तुझे। "

गंगा' मौसी को यूं अपनी तरफ लपकते देखकर रेखा पलटी, मगर वह किसी चीज से उलझकर गिरी तो उसकी चीख निक्ल गई I
 
रेखा की आखें खुली। उसने खुद को अपने कमरे में अपने बैड पर पाया-यानि कि वह ख्वाब देख रही थी। उसने साईड टेबिल पर रखे जग पर नजर डाली। जग पानी सै भरा हुआ था । वह उठकर बाथरूम में गई। वहा' से निकली तो वह ख्याल जो शाम से उसके दिल में बार बार उठ रहा था ? उसी ख्याल ने अचानक फिर सिर उठाया ।

कोई था जो उसै इस बात पर उकसा रहा था कि वह उठकर नीचे जाए।

बाहर अब भी हल्की हल्की बारिश हो रही थी और उसके दिल में नीचे जाने की ख्वाहिश तीव्र होती जा रहीँ थी। वह जेसे वेआख्तयार ही बाहर निकली व किसी सम्मोहित मत्र मुग्ध प्राणी की तरह धीरे-धीरे सीढियां उतरने लंगी । रात के सन्नाटे मे झीगरों क्री आवाजें बहुत साफ सुनाई दे रही थीं ।

रेखा को अहसास ही न हो सका कि वह कब उस बन्द दरवाजे के सामने पहुच गई। जिसके हेण्डल पर काले धागे और काले कपडे में लिपटी ताबीज लटका हुआ था।

तबीज को साथ लगाए बिना ही उसके हैण्डल पर हाथ रखा और तभी उसके मुह' से बेल्ला निक्ला---"अरे... ! "

आश्चर्य की बात ही था। उसकी हैरत स्वाभाविक थी। इस कमरे को बरसों से बन्द ब लॉक्ड बताया जा रहा था। लेकिन वह बन्द न था । रेखा ने ताबीज क्रो हाथ लगाए विना ही हैण्डल को घुमाया ली वह फोरन व सहज में ही घूम गया । दरवाजा थोड़ा-सा खुल गया । दरवाजा खुलते ही अन्दर से सर्दी की तेज़ लहर आई । बेहद ठण्डी हवा थी। यही लगा था जेसे भीतर एक साथ कई एअर कंडीशनर चल रहे हों ।

सर्दी की लहर के साथ ही खौफ की लहर भी आई-जो सीधी रेखा की रीढ की हड्डी मे उतरती चली गई। उसका दिल काप उठा, हाथ-पांव ठण्डे पड गए।

रेखा की यह मनोवृत्ति इन भयावह क्षणों के सबब थी-इससे पहले तो रेखा पर खौफ की बजाय एक जिज्ञासा की कैफियत हाती थी । शाम ही सै उसे कोई इस दरवाजे की तरफ खींच रहा था । सोते में स्वप्न में भी उसकी यह ख्वाहिश जोर मारती रही थी। वह इसी ख्वाहिश के अधीन ही तो मत्र-मुग्ध ब सम्मोहित-सी इस दरवाजे तक पहुची' थी और उसने बेधडक. हैण्डल पर हाथ रख दिया था।

हैण्डल घुमाया था तो सर्दी की तीव्र लहर थोडे से खुले दरवाजे से निकल मानो चमगादड़ बनकर उसके बदन से लिपट गइ हो ।

बह थर्रा उठी। उसने फौरन दरवाजे का हेण्डल अपनी तरफ खींच लिया। दरवाजा हल्की सी खट के साथ बन्द हो गया।

रेखा के मसामों सै पसीना फूट निकला था। उसने अपने दाए बाए देखा । राहदारी में कोई नहीं था। इस वक्त वहा कौन होता भला सब अपने कमरों में थे।

वह लडख़डाते कदमों से चलती जीने की तरफ आईं और फिर जल्दी जल्दी सीढिया चढती ऊपर पहुची । अपने कमरे में पहुचकर दरवाजा अन्दर' से बद' कर लिया और दरवाजे से पीठ लगाकर हाफने लगी।

तभी बडे जोर सै बिजली चमकी, बादल गर्जें और एकाएक ही मूसलाधार बारिश होने लगी। वातावरण एकाएक ही बडा भयावय तथा हौलनाक हो गया । बह वीरे धीरे चलती अपने ब्रैड की तरफ आई और धम्म्म से कटे हुए शहतीर की तरह उस पर गिरी l कुछ देर तो यूं ही साकत निश्चल पडी रही फिर हाथ बढाकर. जग उठाया और उसी मै मुह लगाका दो घूंट पानी पिया । फिर सीधी लेटकर छत को खाली-खाली नजरों से घूरने लगी।

अब उसका भय शने-शने कम होता जा रहा था।

रेखा के लिए यह बड़ा विचित्र अनूठा अनुभव था। सब कुछ ही तो आशा विपरीत हो रहा था। इसकी आशा तो उसे कदापि नहीं थी कि दरवाजा इस तरह खुला मिल जाएगा, रेखा उस कमरे में जाने की तीव्र इच्छा रखती थी-क्योंक्रि बडे दादा हरि ओम ने उसके ख्वाब को उस दरवाजे सै जोड दिया था।

कैसा अनूठा अनुभव था यह कि रेखा अपने आपको किसी अज्ञात गैर इंसानी' प्राणी के' प्रेरित किए ..बरबस ही और सम्मोहित्त सी---- उस दरवाजे तक जा पहुची थी । उस अदृश्य अमानवीय प्राणी ने ही उसे बेबस कर अपना आदेश मानने को विवश कर दिया था। वह दरवाजे तक पहुची फिर उस पर रहस्योद्घाटन हुआ कि जिस दरवाजे चाबी के लिए वह हकलान हो रही थी--वह दरवाजा लाॅक्ड था ही नही,,पर विडम्बना यह भी थी कि लाख चाहते हुए दरवाजा खुला मिलने पर भी अंदर नही जा सकी थी । जरा सा अंदर जाना तो दूर की बात वह

दरवाजा खोलकर अंदर झाककर देख भी न सकी थी । दरवाजा खूलते ही ऐसी ठण्डी हवा , कि खून को जमा दे । उस कमरे मे तो खिडकीया भी नही थी फिर भी ऐसी खून जमा देने वाली शीत लहर ।।

बहरहाल इतना फायदा हुआ था कि अब रेखा जान गई थी कि वह दरवाजा लाक्ड नही है । यह हकीकत अगर वो मौसी और अमर भाई को बताती तो उन्होंने सिर्फ हैरान ही नही खौफजदा हो जाना था ।

रेखा सोचने लगी कि वह इस भेद को भेद ही रखे --किसी को न बताए कि दरवाजा खुला है दिन के वक्त मौका पाकर उस कमरे मे घुस जाऐ ।

ऐसी बातें सोचते सोचते लगभग तीन बजे रेखा एक बार फिर नींद की बाहो मे थी और उसे पुरसकून नींद आई थी ।

रात को देर से सोई थी ।-- सो प्रातः जल्दी उठने कासबाल ही नही था । माया कई बार ऊपर चक्कर लगा गई थी--उसे रेखा का दरवाजा हर बार बंद ही मिला था ।। रेखा के बारे मे गंगा मौसी कई बार पूछ चुकी थी और उसे हर बार यही जबाब मिला था--

"वह सो रही है, बडी बीवी । दरवाजा भीतर में बन्द है। "

गगा' मोसी ने नाश्ता अपने कमरे मे मंगवा कर किया था और अखबार भी पढ लिया था । मगर रेखा के उठने की सूचना उन्है अब तक नही मिली थी । और फिर साढे नौ बजे, आफिस जाने से पहले अमर, गगा मौसी से बिदा लेने आया तो उन्हें वक्त का अहसास हुआ।

गंगा मोसी की बैचेनी बडी I उसने माया को आवाज दी।

' 'आई बर्ड बीबी।"

माया कमरे में आई लो अमर भी मौसी के पास था ।

"अच्छा मोसी! मै चलता हूँ। " अमर ने कहा और कमरे से निकल गया।

"बडी बीबी...बह जी दूध फ़ट गया है । ' ' माया ने मुह' खोला-वो यही बताने को इधर आ रही थी कि गगा मोसी ने उसको आवाज़ लगा दी थी।

' 'ह्मय... । " गगा मोसी ने बडा, सा मुह खोलकर इस तरह अपने दोनों हाथ सीने पर रखै जैसे दूध न फ़टा हो बम फट गया हो I
 
" अरी, निगोडी. ! यह तूने सुबह-सुबह केसी अशुभ खबर सुनाई । यह तो बड़ा अपशगुन है । अमर सुन तो I जरा एक मिनट ठहर ! यह कहकर गगा मोसी मुह ही मुंह' में कुछ पढने लगी ।

' 'अरे, मोसी! कुछ नहीं हुआ । दुध ही तो फटा है !! मै दूध वाले को कहता, जाऊगा- वह अभी और दे जाएगा। आप भी मोसी, दिन प्रतिदिन, वहमी होती जा रही है । ' ' अमर ने मुस्कराते हुए कहा I

”तुम्हें नहीं मालूम, अमर । दूध का फटना अच्छा नहीं होता I " मौसी ने कुछ पढने के बाद--अमर के मुह पर तीन फूंके मारा I

' 'क्या हो जाता है? ' ' अमर ने शोखी से पूछा I

"भगवान करे आज का दिन खैरियत से गुजर जाए। ' ' मोसी ने सवाल का सीधा स्पष्ट जबाव नहीं दिया था।

' ' अरे. छोडो. भी I कुछ नहीं होगा? खराब दूध था-फट गया । अच्छा में चलता हूँ। कोई वहम न पालना मौसी I "

अमर चला गया।

गगा मोसी माया से सम्बोधित हुई “माया, ऐसा करो फटे हूए दूध में एक लाल मिर्च डालकर उसे एक उबाला दे दो। "

“इससे क्या होगा, बडी… बीवी? ' ' माया की जिज्ञासा जागी I

' 'जो कहा वो करो-ज्यादा बहस करने की जरूरत नहीं है । ' ' गगा मौसी ने गुस्से सै कहाI

' 'जी, बीबी ! ' ' माया फौरन सम्भल गई।

' 'आपने मुझें आवाज लगाई थी? " ' ' हां , देखौ ! जाकर रेखा क्रो उठाओ । साढे नौ बज रहे हैँ । ' '

' 'दरवाजा बन्द हो तो खटखटा दूं?'' माया ने जैसै इजाजत चाही ।

' 'हां-कुछ कहे तो मेरा नाम 'ले देना ।

गंगा' मौसी ने शात' होते समझांया--"और सुन जानें से पहले किचन में जाना । फटे दूध में लाल मिर्च डालकर उसे उबाल दे कर सिंक में बहा देना। समझ गई ना मेरी बात… l"

‘ 'जी अच्छी तरहा " माया ने कहा और कमरे से निकल गई।

माया भी गंगा मोसी की बदलती फितरत को लेकर हैरान थी ।

पता नहीँ आजकल बडी बीबी को क्या होता जा रहा है। बात-बात्त पर बहम करने लगी है । कोई छींक दिया तो क्यों छींका। बालों में कधी' उलझ गई या वाल सुलझाते हुए कधी' हाथ से निक्लकर फर्श पर जा पडी, दीवार पर से बिल्ली गुजर गई, रात को कहीं से किसी मुर्गे की बाध सुनाई दे गई या ऐसी की कोई अपशुकनी समझी जाने बाली बात हो गइ तो बडी. बीबी लग गई उसके पीछे।

अब यह दूध फटने में कुछ भी असाधारण क्या था। पर उनके लिए तो यह बड़ा खतरनाक अपशुगन था इसके तोड के लिए उन्होंने लाल मिर्च डातकर उस टूघ को एक उबाल देने को कहा था ।

यह सोचते हुए माया ने मुह बिचकाया था। हां-माया भी एक चीज थी। वह गगा' मोसी के सामने तो कुछ नहीं बोलती थी लेकिन उनकी इन अधविश्वासपूर्ण हिदायतों पर भी कभी नहीँ चलती थी।

गगा मौसी की हिदायत पर माया किचन में पहुची और दूध भी सिक में बहा दिया मगर उसम लालमिर्च न डाली थी । फिर पतीला धोकर वह जल्दी से ऊपर चली मई।

वह ऊपर पहुची तो उसे रेखा का दरवाजा खटखटाने की जरूरत न पडी। दरवाजा खुला हुआ था और रेखा तोलिये से मुह पोछते हुए बाथरूम से निकल रही थी। रेखा उसे देखकर मुस्कराई और बोली

“जी…।"

' 'राम-राम बीबी! ' ' माया ने उसके हाथ से तोलिया लेकर गेलरी में फैला दिया और फिर वापस आकर बोली-"बीबी, आपको बडी बीवी ने बुलाया हे। "

"मुझ आज उठने मै देर हो गई। क्या मोसी ने नास्ता कर लिया?"

' 'हां जी, नाश्ता कर लिया और अखबार भी पढ़ लिया। अब वह परेशान है कि आप अब तक क्यों नहीँ उठी।”

“मौसी भी बस.... ।" रेखा मुस्करा दी-खामखाह ही परेशान हो जाती है, आजकल ।

‘एक खबर है बीबी कि दूध फट गया है । ' ' माया ने बडी सजीदगी सै बताया।

"तो और आ जाएगा। इसमें परेशानी बाली क्या बात है? ' ' रेखा हस दी थी ।

' ‘ हां ,, बीबी आप कितनी अच्छी-कितनी समझदार हैं। ' ' माया बहकी।

' ’मैं तुम्हारी बात समझी नहीं माया । " रेखा को उसकी यह चहकार अर्थपूर्ण लगी थी।

' 'बडी' बीवी नीचे परेशान बैठी हैँ । उनका ख्याल है कि आजके दिन जरूर कुछ होकर रहेगा।"

और माया के ये शब्द. रेखा के दिमाग पर हथौडे की तरह लगे। उसे फोरन ही रात्त की घटना याद आ गई। रहस्यमय कमरे का दरवाजा लाक्ड न था-वह हाथ लगाते ही खुल गया था ओर यह भेद अभी सिर्फ रेखा ही जानती थी । यानी कि रेखा अगर यह सब जाकर मौसी को बता दे तो उनका अंधविश्वास यकीन में बदल जाएगा। इससे बडी. बात आज के दिन और क्या हह सकती थी ।
 
'' आपको क्या हुआ. वीबी । यह आप क्यों एकदम परेशान सी दिखने लगी " माया ने टोका ।

' 'कुछ नहीं, माया । मै तो बस, वह तुम्हारी बडी बीबी के बारे में सोच रही थी. वह अब जरूरत से ज्यादा अधविश्वासी हो चली हैं । ' '

"हां बीबी, बहुत ज्यादा। उन्होंने कहा था कि फटे हुए दूध मे लाल मिर्च डालकर सिंक में वहा दूं। मै ऐसे ही दुध को बहा आई हूँ। मेने ठीक किया न? "

"हां, माया! तुमने ठीक किया । ये सब बेकार की बातें है।' ' रेखा मुस्करा दी फिर आगे बोली-- "माया एक बात बताओ । तुम इस घर मे कब से हो? ''

' 'कोईं चार साल तो हो गाए होंगे । '' माया ने बताया। वह रेखा की तरफ देखने लगी थी।

' 'तुमने कभी उस दरवाजे को खुला देखा है जिस पर ताबीज बंधा है?"

"नही, बीबी। क्यो... ?"

"कभी तुम्हारे दिल में खुद-बुद नही हुई कि उस दरवाजे के खोलकर देखा जाए? "रेखा ने सवाल किया ।

“ शुरू शुरू मे तो ख्वाहिश थी, वीबी! कि इस कमरे में क्या रखा है? लेकिन' बडी बीबी ने उस कमरे के बारे में कुछ ऐसा डरा दिया था कि मै कभी उस दरवाजै के सामने ख़ड्री भी नहीं हुई । बडी बीबी ने तो उस ताबीज की वजह से दरवाजे की सफाई करने को भी सख्ती से मना कर दिया था । वह कभी कभी खुद ही साफ कर दिया करती है, उस दरवाजे को । लेकिन आप यह क्यों पूंछ रही है, बीबी?"

"ऐसै ही पूछ रही हूँ। " रेखा सीढियां उतरते हुए बोली ।

' ’बीबी! आपको इस घर में आए करीव एक साल तो हो ही गया है अब से पहले तो आपने कभी पूछा नहीं।”

"मेने एक बार मौसी से पूछा था तो उन्होंने बताया था कि उस कमरे में काठ कबाड है. कि वह एक तरह का स्टोर है। उस ताबीज के बारे में उ…होंने बताया था कि वह पिछले मकान मालिक का लटकाया हुआ हैं ताकि घर में बरकत रहे । अब मेरी तबियत में भी चूकि खाज नहीं-इसलिए कभी उस कमरे की तरफ पलटकर भी नहीँ देखा ।‘ '

“तो अब क्या हुआ?'' माया ने पूंछा, वह कुछ शकित और सतर्क-सी नजर आने लगी थी। रेखा ने शायद माया को अपनी राजदार बनाना चाहा था । वह मद मद मुस्कराते हुए बोली-"अब मेरा जी चाहता है कि उस कमरे का राज मालूम करू। माया क्यों न हम दोनों मिलकर उस कमरे में चलें?"

"मुझें तो बीबी आप माफ करे... ।" माया ने हाथ जोड… दिए…"मुझे अभी यहा नोकरी करनी है जी। ऐसा अच्छा घर और ऐसे अच्छे लोग मुझे कहां मिलेंगे । आप तो जी मुझे बस नोकरी करनै दे... । ' '

"अच्छा जाओ, मेरा नाश्ता लाओ। और इस बात का जिक्र मौसी, से न करना । मैं मोसी के कमरे में जा रही हूँ। नाश्ता वहीँ ले आना। ' '

गंगा मौसी के कमरे में जाते वक्त जब रेखा की नजर उस रहस्यमय दरवाजे पर पडी तो उसके दिल क्री धड़कन बरबस ही तेज हो गई। दरवाजा ज्यों का त्यों बन्द था और वह काला ताबीज भी वेसे ही दरवाजे के हैण्डल पर ‘झूल रहा था । गगा' मोसी के कमरे का दरवाजा खुला हुआ था और अंदर से गंगा मोसी के बोलने की आवाजे आ रही थीं ।

रेखा कमरे में दाखिल हुईं तो उसने गंगा मौसी को फोन पर चीख़-चीख का बातें करते पाया, रेखा ने हाथ, के इशारे से उनका अभिवादन किया और उनके कमरे में कालीन पर बैठ गई।

"लो वह आ गई । " गंगा' मोसी ने फोन पर शायद उसी के बारे में बताया था।

"किसका फोन है. मौसी?“ रेखा ने उत्सुक्सावश पूछा।

"तुम्हारे बलदेव अकल का ।" गंगा मोसी के चेहरे पर रग आया हुआ था।

"हा... I " रेखा खुशी से चिल्लाइ--"जरा फोन मुझे दें।"

"लो भई, रेखा से बात करो।” गंगा मोसी ने रिसीवर रेखा के हाथ में दे दिया।

"नमस्कार अक्ल'।" रेखा बोली---"केसे हे आप..?"

"नभस्कार । मै बिल्कुल ठीक हूँ। पर तुम मुझे कुछ परेशान तग रही हो।"

' 'ओ नहीं अकल, ऐसी कोई बात नहीं है... ।"

"यह बताओ, तुम खुश तो हो वहां?" बलदेव अंकल ने पूछा।

'मै यहां बहुत्त खुश हूँ। गगा' मौसी मेरा बहुत ख्याल रखती है। फिर भी मेरा दिल्ली आने का जी चाहता हैं।"

' ' कुछ और रूक जाऔ-मै खुद तुम्हें लेने आऊगा I" बलदेव अंकल के स्वर में चिन्ता का भाव था।

"ऐसा तो आप पिछले कई माह से कह रहे है. अंकल... !“

"तुम्हें कुछ और रूपये भेज दूगा। “ अंकल ने जेसे बहलाना चाहा था।

' 'रुपयों का में क्या करूगी अंकल..?"रेखा रूठती सी वोली--' 'आपने जो रूपये पहले भेज रखै है वही खर्च नहीं हुए हैं। मनी मेरी प्राब्लम नहीं है अकल'।"

' 'मैं तुम्हारी प्राब्लम अच्छी तरह जानता हूँ। लेकिन तुम्हें कुछ सब्र करना होगा ।"

”ठीक है, अकल', जेसा आप कहें।” रेखा ने गहरी सास लेकर विषय बदला--' 'वहां वर्षा कैसी है?"

"बिल्कुल ठीक है। तुम्हें याद करति हैं । "

' 'मैं भी उसे याद करती हूँ। ' '

बलदेव अंकल ने दो…चार बातें और की और उन्होंने वहीँ कहा जो वह प्राय: कहा करते थे। यानी कि रेखा खुद को खुश रखे और वह शीघ्र ही आकाय रेखा को दिल्ली ले जाएगे। .

रेखा ने चाहा कि कल ख्वाब देखने से लेकर उस रहस्यमय कमरे तक क्री सारी आप बीती कह सुनाये। मगर वह कुछ सौचकर रूक गई । वह जानती थी कि यह सब सुनकर अंकल परेशान हो जाएगे और वह यही नहीं चाहती थी कि बलदेव अकल' उसकी वजह से परेशान हो ।

वह तो उसकी वजह से पहले ही परेशान थे और ये अविश्वसनीय घटनाएं उन्हे और भी बौखला देंगी।

बलदेव अंकल ने शादी नहीं की थी, हालाकि वह पचास वर्ष के हो चुके ये। गंगा मोसी उनसे दो चार बरस ही छोटी होगी। जवानी के दिनों में बलदेव अंकल और गगा मोसी के बीच जबरदस्त इश्क चला था l खानदानी मतभेदों तथा दुश्मनी की वजह से ही उनकी शादी न हो सकी थीं-लेकिन उन्होंने अपनी मुहब्बत को रूसवा न होने दिया था ।

गगा मोसी को दिल्ली छोडे एक लम्बा समय हो चुका था। अपने जीजा के स्वर्ग सिधार जाने के बाद गगा मौसी स्थाई रूप से अपनी बहन के साथ ही आकर रहने लंगी थी और उनकी बहन का एक ही बेटा था अमर । बहन भी चल बसी तो अमर और वह अकेले रह गए ।

गंगा मोसी क्रो विरासत्त में जो कुछ मिला था वह सब उन्होंने अमर के सुपुर्द कर दिया I अमर कन्सट्रैक्शन के घधे में था । बंगले बनाकर बेचता था । वह गंगा' मौसी से आठ-दस साल छोटा था और अब चालीस साल के लपेटे में था ।

शादी अमर ने भी नहीं की थी और न ही करने का इरादा रखता था। कहता वह यही था कि में शादी नहीं करूंगा लेकिन क्यों नहीँ करेगा-यह आज तक उसने किसी को नहीं बताया था।

बताया तो खैर गंगा मोसी ने भी किसी को कुछ नहीं था। वह तो रेखा को फोन पर उनकी बलदेव अक्ल' की बातचीत से कुछ-कुछ अदाजा' हुआ था ओर तब रेखा ने गंग् मौसी से बहुत सारे सवाल किए थे और रेखा की जिद पर गगा मौसी क्रो अतत'. अपनी कहानी सुनानी पडी थी और यूं रेखा इस प्रेम कहानी की पहली राज़दार बनने का सौभाग्य पा सकी थी ।

रेखा में ऐसी कोई बात थी ही कि उससे अपने दिल की बात कहने को जी चाहता था और वह खुद ऐसी थी कि अपने दिल की बात्त किसी को नहीं बताती थी I और इसकी तजह शायद यही थी कि वह किसी को भी अपना हमदर्द व हमराज न मानती थी । यही वजह थी कि उसने अपने भीतर ही अपनी एक दुनिया आबाद कर ली थी ।

हां! रेखा जब अकेली होती तो हकीकतन तब भी अकेली न होती थी। सोचों की ख्यालों की एक भीड होती थी । वह जागती आखो से ख्वाब देख रही होती। उसकी कल्पना शीलता, सवेदन शीलता भी बडी अनूठी और शक्तिशाली थी। अगर वह टेलीविजन पर हिमपात का, वर्फ गिरने का सीन देख रही होती और अगर वह चाहती कि वह खुथ इन दृश्यों का हिस्सा बन जाए तो वह अपनी कल्पनाओं के जरिये उन दृश्यों का हिस्सा बन जाती थी । उसे फौरन ही ठण्डक महसूस होने लगती थी।

बहरहाल, आज भी अंकल' की फोन काल ने रेखा को उलझा दिया था। उन्होंने' रेखा को अभी कुछ और समय यहीँ रहने को कहा था । ऐसा क्यो था, यह रेखा नहीं जानती थी । रेखा यह भी नहीं जानती थी कि बलदेव अकल उसे यहां क्यो छोड़ गए थे और उसकी ख्वाहिश के वावजूद उसे दिल्ली क्यों नहीं बुलाते थे? आखिर उनकी क्या समस्या थी? अंकल यह भी नहीं बताते थे बस हसकय टाल जाते थे या कहते थे अच्छा बताऊगा-- सब्र करो । ' '

पर अब तो हालात के रग ही दूसरे थे।

रेखा को जब से वह सपना दिखाई देना शुरू हुआ था, वह मानसिक रूप से उलझनों का शिकार होकर रह गई थी।

उसके दिल का चैन लुट गया था । घटनाए भी तो होश उडाने. वाले हो रहे थे-वह डरालना ख्वाब-बड़े दादा का लिफाफा रहस्यमय शख्स का उल्लू दे जाना.. .उल्लू का खून...खून आलुदा कदमों के निशान...रहस्यमय कमरा...कमरे में जाने की तीव्र इच्छा.. .कमरे का बन्द न होना... ।

दोपहर का खाना खाकर रेखा अपने ब्रैड पर लेटी हुई यह सब ही सोच रही थी कि सहसा उसके दिल में एक लहर-सी उठी l आखें बन्द-सी होने लर्गी । उसके कानों में जैसें कोई कह रहा था कि चलो रेखा--उस रहस्यमय कमरे में चलो।

और यह खवाहिश इतनी तीव्र थी कि रेखा किसी सम्मोहित व्यक्ति की तरह उठ गई।

फिर नूत्र' मुग्ध सी ही वह नीचे पहुची' तो उसे कोई दिखाईं नहीं दिया । गगा मौसी अपने कमरे में थी और उनका दरवाजा बन्द था। माया भी अपना काम संभालकर अपने कमरे में जा चुकी थी और ऊपर तो घर में कोई था ही नहीं।

रेखा बडे इत्मिनान से चलती हुई उस रहस्यमय कमरे के सामने पहुच गई। दरवाजे के हैण्डल पर हल्का दबाव डालकर उसने दरवाजा खोला।

बद दरवाजा अभी थोड़ा सा खुला था कि भीतर से एक मर्दाना आवाज उभरी-- “अभी नहीं, रात को आना... । ' '
 
फिर नूत्र' मुग्ध सी ही वह नीचे पहुची' तो उसे कोई दिखाईं नहीं दिया । गगा मौसी अपने कमरे में थी और उनका दरवाजा बन्द था। माया भी अपना काम संभालकर अपने कमरे में जा चुकी थी और ऊपर तो घर में कोई था ही नहीं।

रेखा बडे इत्मिनान से चलती हुई उस रहस्यमय कमरे के सामने पहुच गई। दरवाजे के हैण्डल पर हल्का दबाव डालकर उसने दरवाजा खोला।

बद दरवाजा अभी थोड़ा सा खुला था कि भीतर से एक मर्दाना आवाज उभरी-- “अभी नहीं, रात को आना... । ' '

इस आवाज में एक आदेश था-नम्रता या निभन्त्रण नहीं था। बडी गूंजदार आबाज थी I लहजा अगर सख्त नहीं तो नर्म भी नहीं था । कोई व्यक्ति अपने काम में मग्न तथा व्यस्त हो और आप उसकी एकाग्रता में खलल बनना चाहें तो फिर इसी तरह के शब्द सुनने को मिलते है।

यह आबाज सुनकर रेखा को भी कुछ ऐसा ही महसूस हुआ था जैसै उसने दरवाजा खोलकर बेजा हस्तक्षेप कर डाला हो।

उसने फोरन दरवाजा बन्द कर दिया I फिर दरवाजा खुला ही कितना था। जितना खुला था उसमें अंधकार-के अतिरिक्त कुछ नजर नहीं आया था।

वह धडकते दिल से भागती हुई सीढियों तक आई I तेजी से सीढिया चडी और अपने कमरे में घुस, , धम्म सै बैड पर आ बैठी । शुक्र कि किसी ने उसे उस रहस्यमय कमरे को खौलते ओर फिर फोरन ही वहा से भागकर आते हुए नहीं देखा था ।

रात को उसने दरवाजा खोला था तो दरवाजा खोलते ही वेहद ठण्डी हवा का एक तेज झोंका भीतर सै आया था। लेकिन अब इस वक्त ऐसा महसूस नहीं हुआ था। ठण्डी हवा थी न गर्भ हवा थी और ना ही वह बू थी जो मुद्दत सै बन्द किसी कमरे में पैदा हो जाती है। इस बार हवा के बजाय आवाज आई थी। बडी ही रोबदार आवाज थी।

”अभी नही रात को आना... । ' '

उसने अब तक जब-जब भी इस कमरे के बारे मेँ सोचा था तो यही सोचा था कि इस कमरे में कोई रहस्य नहीं है-और इसे महज वहम या अंदविश्वास के कारण ही बन्द कर दिया गया हे, लेकिन अब धीरे-धीरे इस कमरे के रहस्य उस पर खुलते जा रहे थे और अब बह यह सोचने को विवश हो गई थी कि इस कमरे में जरूर कोई बला है । उस मर्दाना आबाज ने डर शक व सदेह को यकीन में बदल दिया था।

बहरहाल, रेखा निश्चय कय चुकी थी कि वह उस कमरे में जाकर रहेगी। यह जानकर रहेगी कि आखिर वहा क्या है? बडे दादा हरि ओम ने उसके ख्वाब के जवाब में इस कमरे क्री तस्वीर बनाई थी। साफ इशारा किया था कि उसके भयावह समने का हल इसी कमरे में है।

वह बैचेनी से रात का इन्तजार करने लगी ।

अतत: रात की कालिमा हर तरफ फैली ।

आकाश अंदकारमय और गहरे काले बदलो से ढका हुआ था । दो बज गए । एक उल्लू इस बगले के ऊपर से कई बार गुज़र चुका था ओंर दो जब गुजरता था तो एक तेज चीख मारता और उसके पखाँ क्री फडफडाहट दुर तक गूंज जाती ।

इस बंगले के सात चक्कर लगाने के बाद वह रेखा के कमरे की छत पर बैठ गया।

रेखा हडबडाकय.. उठ बैठी । उसे यू महसूस हुआ था जैसै कोई विशाल पक्षी उसके सीने पर जा बैठा हो।

आंख खुली तो उसे अहसास हुआ कि वह जैसे ख्वाब देख रही थी। घडी पर नजर डाली, दो बजकर पांच मिनट हुए थे। रात का खाना खाकर वह अपने कमरे में आ गई थी | फिर यह सोचते-सोचते कि वो किस वक्त उस काले कमरे में जाए. ..उसै नींद ने आ दबोचा था और अब उसकी आख खुलीं तो दो से ऊपर का टाईम था।

कमरे में लाईट जल रहो थीं I दरवाजा बन्द था।

उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था सीने पर किसी बडे परिन्दे का अहसास ख्वाब था ख्याल था या उसका वहम ।

खैर, अब वह उठ गई थी। रात क्रो आने कीं हिदायत्त उसके कानों में गूज रही थी। नीचे जाने की ख्वाहिश दिल में मचलने लगी थी, जोर पकड रही थी । कोई उमे कह रहा था "'चलो, नीचे चलो... ।"

और फिर बही हुआ वह किसी सम्मोहित्त प्राणी क्री तरह उठी व मत्र-मुग्ध अदाज़ में बाहर निकली और सीढिया उतरने लगी।

बरामदे की लाइट भी प्रकाशमान थी. वह बडे इत्मीनान सै उस रहस्यमय कमरे के दरवाजे पर जा खडी हुई । फिर ताबीज को छुये-छेडे बिना हैण्डल क्रो हल्का-सा घुमाया और दरवाजा खट की आवाज के साथ थोड़ा-सा खुल गया।

वह क्षण भर को ठिठकी रही-जेसे अन्दर आने की अनुमति चाहती हो।

तभी भीतर से आवाज आई ' 'अन्दर आ जाऔ-"कब तक दरवाजे पर खडी रहोगी?"

वह फोरन ही दरवाजा खोलकर भीतर समा गई । पर कमरे का दृश्य देखकर उसका ऊपर का सास ऊपर और नीचे का सास नीचे रह गया । उसने तो सोचा तक भी नहीं था कि अन्दर यह सब होगा। उसकी कल्पना में तो यही था कि कमरा अन्दर से बेहद अंधकारमय होगा क्योकि उसे बताया गया था कि कमरे क्री दीवारों पर ही नहीँ छत पर भी काला रंग. करवाया गया है । जगह-जगह जाले लगे होंगे और भीतर बरसों से बन्द कमरे में अन्दर कीडे मक्रोड़े से रहे होंगे । बन्द कमरे में वू हौगी. सीलन होमी I लेकिन यहां का तो नक्शा ही उल्टा था।

'जब वह दरवाजा. खोलकर अन्दर आई तो उससे कहा गया-- ' 'दरवाजा बन्द कर दो... । "
 
और वह दरवाजा वन्द करके पलटी तो उसने देखा कि कमरे में वेहद रोशनी है जैसे दिन निक्ला ही I कमरे में ठीक मध्य में एक ऊँचे आसन पर एक शख्त तडक-भडक, लिबास में बैठा है । कमरे में सुर्ख रग का मोटा कालीन बिछा हुआ है। वह अधेड उम्र व्यक्ति किसी स्टेट का राजा लग रहा था, उसका बैठने का अन्दाज कीमती राजसी पौशाक स्वस्थ बलिष्ठ जिस्म एक हाथ में साप' की तरह वल खाया 'राजदण्ड' .I

रेखा ने थूक निगली, वह इस अनूठे प्रभावशाली व्यक्ति से अपनी निगाहें नहीं हटा पा रही थी ।

' ' आओ, बैठो I ' ' उस शख्स ने आदेश पूर्ण स्वर में कहा ।

रेखा अभी सोच ही रही थी कि वह कहा' बैठे' 'क्योंकि उस कमरे में कुर्सी नाम क्री कोई चीज नहीं थी। पर तभी अगले ही क्षण उस शख्स के सामने कुछ ही फासले पर मखमल की गद्दी वाला एक स्टूल प्रकट हुआ।

उस शख ने मुस्कराकर ही इस आसान की तरफ इशारा किया था ।

रेखा यत्रवत सी ही बढी और उस स्टूल पर बैठ गई। और अब रेखा कीं नजर उस व्यक्ति के पैरों पर पडी, वह नगे पांव था- पर उसका एक पैर था ।

"तुम चकित हो? ''

वह राजसी पौशाक वाले प्रौढ़ शख्स ने बडी गर्जदार आबाज मे सबाल किया ।

' 'हां... ।" रेखा मुश्किल से ही कह पाई।

"इस कमरे का माहोल देखकर?@ '

अगला सबाल था।

' 'हा । ' ' रेखा ने संक्षिप्त-सा जवाब दिया।

"जो रात तुम लोगों के लिए रात्त है, वह रात हम लोगों के लिए दिन है । हमारी रातें प्रकाशमान होती है और दिन अंधेरे, जब तक तुम लोग सो जाते हो तो हम बाहर आते हैँ। सर्वत्र हमारा राज्य होता है । "

' ' आप कौन है?" ' रेखा ने साहस कर पूछा ।

"यह मैं बताना भी चाहू तो नहीं बता सकता । समझाना चाहूँ तो भी नहीँ समझा सकता। केवल इतना समझ लो कि तुम्हारे कारण से मुझें आजादी मिली है। में तुम्हारा आभारी हूँ। कृन्तज्ञ हूँ। ' '

"मैरे कारण से? ' ' रेखा आश्चर्यचक्ति थी ।

' 'वह केसे...? ' '

"न तुम यहां आतीं, न पिन्जरे में वो आता, न खून फैलत्ता और न उस खून में हम गुसल (स्नान) करते । "

' 'मैं अब भी नहीं समझी। आप क्या कह रहे है? ' ' रेखा वास्तव में ही कुछ नहीं समझी थी।

' 'हम समझा भी नहीं सकते और तुम्हें कुछ समझने कीं आवश्यकता 'भी नहीं... ।“ यह कहकर उसने अपना हाथ फैलाया और उसकी हथेली पर एक किताब नमुदार हुई। यह लो यह हमारी तरफ से एक तुच्छ-सी भेंट है। इसे रख लो !"

रेखा ने उठकर उसकी हथेली पर रखी किताब ले ली और चाहती थी कि उसे खोलकर देखे कि वह शख्स बोत उठा---"नहीं अभी नहीं। अपने कमरे में जाकर देखना।"

"जी, अच्छा । आपका धन्यवाद... ।"

'तब वह अयेड़ उम्र शख्स जो अपने गेटअप व सेटअप से किसी ऐतिहासिक ड्रामे का पात्र लगता था अपनी बलखाती छडी, के सहारे उठा और बोला

" अब तुम जाओ । और हां. कोई आवश्यक नहीं कि हमारे भेद तुम लोगों पर खौलती फिरो। मैरी बात समझ गई न तुम. .. I ’ '

"हा.. । "रेखा ने नम्रता से गर्दन हिलाई और वापसी के लिए मुडी। और अभी उसने दौ ही कदम बढाए होंगे कि कमरे में एकाएक अंधेरा छा गया। उसने पीछे मुडकर. देखा ।

घुप्प अंधेरा था और एक विचित्र-सी ठण्डक ।

वह दरवाजे के निकट थी, मगर उसे दरवाजा नजर नहीं आ रहा था। उसने जल्दी से टटोलकर दरवाजे का हेण्डल ढूंढा और घुमाया और दरवाजा खोलकर बाहर आ गई । बाहर का वही माहौल था। उसने पलटकर दरवाजा बन्द किया । दो-तीन लम्बे-लम्बे गहरे सास लिये ।

फिर वह तेजी से कदम उठाती हुई अपने कमरे में आ गई। और दरबाजा बन्द कर लिया। रेखा दरवाजा बन्द कर रही थी तो उसे किसी परिंन्दे क्री चींख और परों की फडफडाने क्री तेज आबाज सुनाई दी थी।

पंखों की यह फडफडाहट. और चीख सुनकर उसकी निगाहों के सामने पिंजरे वाला उल्लू आ गया था। पिन्जरे में उल्लू का जख्मी होना, बेपनाह खून का बहना, खून से सने पदचिन्ह और फिर उस धायल उल्लू का उड… जाना ।

और इसके साथ ही रेखा को उसके कहे शब्द याद आए… "न...तुम यहा आती, न पिन्जरे में बो आता, न खून फैलता और न ही उस खून में हम गुसल करते... ।"

क्या था यह सव? यह क्या गोरख धन्धा था? रेखा की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। क्या, वह एक टाग वाला प्रेत खुश था और अपनी आजादी को रेखा से जोडकर देखता था। अपनी आजादी की खुशी में वो रेखा को एक तोहफा दे गया था ।

रेखा ने बैड पर बैठकर उस तोहफे को उलट-पलट का देखा ।

खूबसूरत चमडे की जिल्द थी और वह कोई किताब न थी बल्कि डायरी थी । बिना लाईनों का सफेद चमकदार कागज सारे ही पेज साफ तथा सादे थे। उन पर कुछ भी नहीं लिखा गया था । बडा, बिचित्र तोहफा था।

रेखा उलझन व परेशानी का ही शिकार थी । उसने इस डायरी को एक पैकेट निकालकर उसके कवर में रख दिया। वह पाकेट डायरी सहज ही में इस कवर में आ गई । उसके इस कवर को भी अपनी विडियो केसैट्स के बीच रख दिया । अब इस डायरी पर आसानी से ही किसी की निगाह नहीं पड़ सकती थी । वैसे भी उसके कमरे में माया के अलावा कोई नहीं आता था और माया को चीजो से खामखाह छेडछाड करने की आदत न थी। कभी-कभार अमर आ जाता था वह भी रेखा के अनुनय पर । थोडी देर वैठकर गप-शप लगाता और चला जाता । गगा' मोसी तो अपने घुटनों की प्राब्लम से ऊपर आती-जाती नहीं थी।

रेखा अब अपने आप को हल्का-फुलका महसूस कर रही थी। तनाव जाता रहा था और उसकी आखो' में नोंद उतर रही थी । आखे बोझिल हो रही थीं । वह बिस्तर पर लेटी कि पांच मिनट के, अंदर ही गहरी नींद में थी ।

और फिर.....
 
सुबह जव रेखा मुह हाथ धोकर नीचे पहुची तो गंगा मोसी प्रतिदिन की तरह डायनिंग टेबल पर उसकी प्रतीक्षक थीं । वह उसे देखकर मुस्कराई ।

' ' आओ रेखा... । "

, " आ -गई मोसी । ” रेखा चहक्री-उन्हें _नमस्कार किया व कुर्सी खींचकर उनके निकट बैठ गई । जबाब में गगा मोसी ने दुआए दी थी । ,

"माया कहा है ?" रेखा ने पूछा ।

“माया आ रही है l चाय लेने गई हे।"

"मैं आ गई बीबी । " यह कहते हुए माया कमरे में प्रविष्ट हुई। केतली मेज पर रखी-उसे टी-क्रोजी से ढका ओर कुर्सी घसीटकर खुद भी बैठ गई |

जब से रेखा आई थी-बह नाश्ते के लिए माया को साथ ही बैठाती थी । मौसी को एतराज हुआ था। लेकिन नेकदिल गगा मौसी ने रेखा की खुशी के कारण इसे अपनी आन का मसला नहीं बनाया था।

"भाई कहा है? " रेखा ने स्लाईस पर मक्खन लगाते हुए पूछा।

"भाई अपने कमरे में होगा और सौ रहा होगा। “

' 'नाश्ता नहीं करेगे वह?"

गगा मौसी ने मुह बनाते जवाब दिया…"उसने कभी हमारे साथ नाश्ता किया है जा आज करेगा ।' '

"'अब मौसी ऐसा भी नहीँ हैँ-कितनी बार तो हमारे साथ नाश्ता किया है उन्होने ।"

"अब रहने भी दो, रेखा। साल में एक्र-दो बार कर लिया तो क्या इसको बकायदा नाश्ता करना कहते है।"

”अच्छा ठहरिये। मैं उन्हें उठाकर लाती हूँ। “

' 'लीजिये, वन्दा खुद ही आ गया ।'' अमर ने कमरे में प्रवेश करते… कहा । उसने शायद यह बातें सुन ली थीं...''यह मोसी जरूर मेरी बुराईयाँ कर रही होंगी । ' '

"भाई, क्या ऐसी-वेसी... I” रेखा हसकर बोली-- "मोसी की लाड भरी बुराईयों का क्या कोई अन्त होता है।"

माया अमर के लिए सिके हुए स्लाईंस लाने उठ गई।

" मौसी! यह आप मुझ कुवारे के पीछे क्यों पडी रहती है।” अमर ने शोखी सै कहा।

“तो कर ले ना शादी किसने मना किया है? " मौसी जलकर बोली ।

' 'इन्होंने मना किया है। " अमर ने बडी मासूमियत से कहा।

गंगा' मोसी समझी कि अमर ने रेखा क्री तरफ इशारा किया हे । वह एकदम चौक गई। खुद रेखा भी यहीं समझी थी कि इशारा उसी र्का तरफ है। वह आश्चर्य भरी नजरों से अमर क्रो देखने लगी। .

”इन्होंने...किसने?“ गगा मौसी ने तीखे स्वर में पूछा I

‘ 'वो उन्होने-.. । " अमर ने कमरे के बाहर की तरफ इशारा किया ।

' ' बाहर कोन है? किसको खडा करके आए हो ???

"ओ हो, मौसी! इतनी अक्लमन्द होकर भी मेरा इशारा नहीं समझी । बौ कमरे वाले महापुरुष ने... ।" इतना कह कर क्षण भर क्रो रूका मौसी की आखों में उलझन के भावों को गहराते देख वह आगे बोला--"क्या भूल गई मोसी इस घर को खरीदने कीं दूसरी शर्त यह भी कि इस घर में बच्चे न रहे तो अच्छा है। अब मोसी मैं अगर शादी कर लेता तो इन आठ सालों में कितने बच्चे आपके दाए बाए खेल रहे होते तो फिर हम कहा जाते । ' '

अमर के इस जवाब पर रेखा, बैअख्तयार मुस्करा दी, बोली--''आप भी कमाल करते हैं भाई । आपने इस कारण अब तक शादी नहीँ की?"

" अरे रेखा, तुम किसकी बातो में आ रही हो । ' ' मोसी बोल उठी- ' 'यह एक नम्बर क्री चीज हे-अमर जिसका नाम हो ।". .

" थैंक गॉड, मोसी! आपने मुझे दो नम्बर की चीज नहीं कहा!" अमर हस दिया ।

' 'भाई एक बात बताए। " रेखा ने सजीदगी अपनाई।

"एक नहीं दो बात पूछे। लेकिन ये बातें शादी के बारे में नहीं होंगी । ' '

' 'ठीक है। ' ' रेखा खुलकर मुस्कराई ---"मै तो यह पूछ रही थी कि उस रहस्यमय कमरे को कभी किसी ने खोलने की कोशिश की । ' '

' 'नहीं आज तक नहीं । ' ' अमर सजीदा' हौते बोला-' 'लेकिन यह ख्याल आपके दिल में क्यों आया? "

' 'बस ऐसे ही... । ' रेखा बोली- ''हो सकता है यह दरवाजा बन्द ही न हौ। क्यों न यह देख लिया जाए कि वह बन्द है या खुला हुआ। अगर खुला हो तो फिर अंदर जाने की हिम्मत की जाए। आखिर पता तो चले कि बन्द दरवाजे के पीछे क्या है? ''

' 'आपका मतलब है कि वह दरवाजा बंद नहीँ है? ' ' अमर ने सीधा सबाल किया ।

"हां-हो भी सकता है। क्योंकि आपमें से किसी ने उस दरवाजे के हैण्डल को घुमाने की कोशिश नहीं की है या कीं है? "

' 'नहीँ की. ..ओर वह इसलिए नहीं कि इस बंगले' को बनवाने वाले, इसके पिछले मालिक मिस्टर वासूदेव ने इस सिलसिले में हमें सख्ती से मना किया था । इस कमरे की कहानी अब तुम भी जानती हो। हम खामखाह ही कोई मुसीबत क्यो मैल लेते । वेसे मैं इस कमरे क्रो बाधने वाले आमिल रोशन अली के क्वार्टर पर गया था । मालूम हुआ है कि वो अलीगढ शिफ्ट कर गए हैँ। "
 
मौसी बोल उठी-' 'रेखा यह तुम्हारे सिर पर उस कमरे का भ्रूत्त क्यो सबार है। तुम आखिर क्या करना चाह रही हौ। पहले ही इस घर में क्या कम रहस्यमय, समझ में न जाने वाली घटनाएं घट रही है । उस रात का वाक्या जब भी याद आता है दिल धडधड… करने लगता है।''

"अरे मोसी। आप दिन-ब-दिन इतनी कमजोर दिल क्यों होती जा रही हैँ। आप डरे नहीं । मैं करूँगी यह काम I! रेखा ने दृढ़ स्वर में कहा।

"शी...ऽऽऽऽ I. ' ' गगा मोसी ने होठों पर उगली' रखकर उसे बोलने से मना किया ।

रेखा ने देखा कि माया जा रही है । वह खामोश हो गई। नाश्ता बडी', बेदिली से हुआ। नाश्ते के बाद जब माया बर्तन समेटकर किचन में चली गई तो रेखा अमर से सम्बोधित हुई । पूछा

"आप क्या चाहते है...? ' '

' 'भई आप जब लेडिज होकर भी दुस्साहस दिखाने को तैयार है फिर मै तो मर्द हूँ। मै भला पीछे कैसे हट सकता हू। ' '

रेखा खिल उठी हर्षित सी बोली-- ये हुई ना बाता तो फिर चलिए चलकर देखते है नेक काम मे देर काहे की ....॥"

रेखा को अब अपने आप पर सदेह होने लगा था । यह उसे क्या हो रहा था । क्या वह किसी दिमागी बीमारी का शिकार हो गई थी? इन्ही बिफरी सोचो के बीच उसे ध्यान आया कि उस लगडे प्रेतराज नै उसे एक तोहफा दिया था।

"मुझें जाकय वह डायरी देखनी चाहिये. .. ? " उसने सोचा था।

"ओ क्या हुआ?" ' पीछे से गगा मोसी की आबाज आई। वह धीरे धीरे चलती अब पहुची थी और अपने कमरे के दरवाजे पर खडी हुई इन्हें परेशान नजरो सै देख रही थी।

' 'दरवाजा लॉक है, मोसी! ' ' अमर ने उन्हे बताया ।

' ‘मेरे लिए यह कौन-सी नई बात है। यह बात तो में जब से इस घर में आई हूँ जानती हूँ-पिछले सात आठ सालों सै। ' ' मौसी बडबडाती हुईं अपने कमरे में चली गई।

फिर अमर ने भी कुछ कहे बिना अपने कमरे का रूख किया। उसे ऑफिस कै लिए तैयार होना था।

और अब रेखा दरवाजे के सामने अकेली रह गई थी । उसने ऊपर जाने के लिए सीढियों, की तरफ कदम बढाए. लेकिन दो चार कदम चलकर वह ठिठकी और वापस पलटी। उसने सोचा एक बार फिर क्यों न दरवाजे को आजमाये । अब बह अकेली थी सो शायद… ।

उसने बडी, सावधानी से दरवाजे के हेण्डल पर हाथ रखा...नीचे की तरफ दबाब डाला। हैण्डल नीचे ही गया, लेकिन दरवाजा न खुला। दरवाजा वाकई लाक्ड था।

अब वह अपने प्रति चिन्तित हो उठी थी । अब वह बिश्वास व अविश्वास जैसी दुविधा में फसकर रह गई थी। होने या ना होने का दारोमदार अब उस डायरी पर था, जो उसने एक कैसेट कवर में केसटों के बीच छिपाकर रखी थी।

वह तेजी से सीढियां चढती हुई ऊपर पहुची । दरवाजा बन्द किया और फिर धडकते दिल से केसर्टों के रेक की तरफ बढी ।

निक्ट जाकर उसने पंक्तिवद्ध क्रैसटों पर निगाह डाली तो उसे वह कैसट कवर नजर आगया जिस पर कोई लेबल नहीं लगा था । उसने जल्दी से वह कवर बाहर निकाला और उस कवर मे रखा डायरी बाहर खीच ली।

चमड़े कीं जिल्द वाली खूबसूरत डायरी मौजूद थी। रेखा ने आखें बन्द करके भगवान का शुक्रिया अदा किया। अगर यह डायरी न मिलती तो वह अपनी ही नजरों में खुद को पागल मानने को मजबूर हो जाती और यह सोचने को विवश हो जाती कि अब तक जो भी हुआ उसके जहन की कल्पना मात्र ही थी। और अब वह सोच रही थी कि लगडे प्रेतराज का तोहफा मोजूद था और उसे यह तोहफा उसी काले कमरे के अन्दर दिया गया था। वह कमरे मे किस तरह गई थी? कमरे का दरवाजा अगर उस वक्त खुला था तो अब किस तरह बन्द हो गया था?

आखिर यह सब क्या रहस्य था?

यहीँ क्या...रेखा की जिन्दगी में तो बैसे भी वहुत से रहस्य थे । उसकी जिन्दगी किसी पहेली से कम न थी ।

चारों तरफ़ इशारे ही इशारे थै और इशारों का कोई हल न था।

कुछ समझ में नहीं आता था । लोग उसे शीना क्यो कहते थे?

देवगत दादा हरि ओम ने उसका असली नाम शीना बताया था। शीना अपने आप में एक रहस्यपूर्ण नाम था।

फिर वह रहस्यमय व्यक्ति 'काला चिराग--उसने भी उसे शीना ही कहा। रेखा नहीँ जानती थी कि उसका यह नाम किसने रखा, कब रखा? उसने तो जब से होश सम्भाला था-अपना नाम रेखा ही सुना था I

उसकी जिन्दगी से जुडा. एक रहस्य यह भी तो था किं वह जिस घर मै पली थी ओंर जिनको अपना मां बाप समझती रही थी-ये उसके मा-बाप न निकले थे।

दिल्ली से उसे यहां क्यों भेजा गया? बलदेव अक्ल उसे दिल्ली क्यो नहीं बुलाते थे?"

फिर वह रहस्यमय सपना...दादा हरि ओम का लिफाफा...यह काला कथित प्रेत्तग्रस्त कमरा...एक सिलसिला था सवालों का । सवाल ही सवाल थे-ओर जवाब किंसी के पास ना था ।

रेखा के दिल में एक हूक-सी उठी । काश । कोई ऐसा होता जो उसकी जात सै पर्दा उठा सके...जो बता सके कि वह कौन है? काश कोई बत्ता सकता? बडी तीव्र इच्छा थी यह रेखा की...ओर इन सब बातों के बारे में उसने आज तक नहीं सोचा था।

"कहा से पायेगी वह अपनी 'पहेली जिन्दणी' का हल । कौन बताएगा यह सब उसे ? वह बेचैनी सी महसूस करने लगी । अजीब-सी मानसिक उद्विग्नता? डायरी उसके हाथ से छूटता कालीन पर गिर पडी । उसने झुककर डायरी उठाई' और बैड पर वैठकर यू ही उसके पन्ने खोलकर देखने लगी।

~ ओर अब उसने डायरी के कुछ पन्नो पर कुछ लिखा हुआ देखा। वह चौकी ।

यह क्या?
 
उसने जब डायरी कवर में रखी थी तो उसमें कुछ भी लिखा न था । पूर्णत: सफेद-साफ पन्ने देखकर वह तब हैरान हुई थी ।

पर अब उसी डायरी के कुछ पृष्ठों पर कुछ लिखा नजर आ रहा था । वह इन पन्नो को देखी लगी।

बडा ही खूबसूरत सुलेख था। एक एक शब्द मोतियों की तरह टंका हुआ था। यह लेख काली स्याही से लिखा गया था । रेखा ने पहला पन्ना सामने किया और पढने, लगी। लिखा था ।

"तुम परेशान क्यों होती हौ? हम बताएंगे तुम्हें-कि तुम कौन हो? तुम्हें तुम्हारे दिमाग में उठने बाले हर सवाल का जवाब मिलेगा I चलौ, पहले अपने बारे में जान लो फिर जो चाहे सबाल कर लेना।"

' 'तुम्हारे पिता एक वहुत बडे जमींदार के बेटे थे । तुम्हारे दादा सर निहाल चंद बडे असरों-रसूख के प्रभावशाली आदमी थे I उन्होंने अग्रेजो सै 'सर' का खिताब पाया। बड़े नेक दिल इन्सान थे। सावनपुर में उन्होंने अपने रहने के लिए जो हवेली बनवाई थी वह अपने तर्ज की अनोखी थी।

.... दूर दूर से लोग इस हवेली को देखने आया करते थे। सर निहाल चंद को देहात की जिन्दगी बहुत पसन्द थी, लेकिन उनके बेटे यानी तुम्हारे पिता कृष्ण कात' ग्रामीण जिन्दगी से एलर्जिक थे, उन्होंने तुम्हारे दादा से जिद्द करके माडल टाऊन दिल्ली में एक कोठी बनवा ली थी। माडल टाउन की उसी कोठी में रहते हुए उन्होंने अपनी पढाई_ पूरी की। तुम्हारे पिता कृष्ण कात भी तुम्हारे दादा की तरह ही एक नेक नियत इंसान थे । उन्होंने अपनी जिन्दगी में कभी किसी को नुक्सान नहीँ फहुचाया था और उनकी तुलना में तुम्हारे चाचा रमाकात ने कभी किसी से सीधे मुह' बात नहीँ की थीं, नेकी करना और गरीबों के काम आना तो दुर की बात है । "

"रमाकात एक साजिशी जहन का व्यक्ति था I बो बचपन ही से ऐसा शातिर था कि शरारत खुद करता था लेकिन डाट' बड़े भाई यानी तुम्हारे पिता को पड़ती थी ओर तुम्हारे पिता कृष्ण कात अपने बडेपन. में उसे माफ कर दिया करते थे । उन दोनों भाईयों क्री जिन्दमी भर यही आदत रही ।

....तुम्हारे चाचा ने अपनी खलनायिकी न छोडी और तुम्हारे पिता ने अपनी फितरत न बदली... ।"

"तुम्हारे दादा सर निहाल चद की मौत्त के बाद.. उनकी वसीयत-के अनुसार जमीन और दूसरी जायदाद का बटवारा हुआ । जायदाद के बटवारे के साथ सावनपुर की हवेली भी बट गई थी । लेकिन तुम्हारे पिता वाले हिस्से पर भी तुम्हारे चाचा का कब्जा था-क्योकि तुम्हारे पिता को देहाती जिन्दगी पसन्द न थीं इसलिए वह कभी-कभार ही सावनपुर का रूख करते थे और फिर अपने बाप की मौत के बाद तो उन्होने सावनपुर का रूख करना ही छोड़ दिया था I इस तरह जमीन जायदाद और हवेली नाम तो तुम्हारे पिता कष्णकात के ही थी । लेकिन वास्तविक कब्जा रमाकात का ही था I "

"तुम्हारे पिता साल...छ. महीने बाद सावनपुर आकर अपनी जमीनों की आमदनी ले जाया करते थे और सावनपुर कभी रुपये-पैसे की गर्ज से नहीं आते थै। असल में उन्हें शिकार का शोक था । वह यहां शिकार खेलने के लिए जाया करते थे और तुम्हारा चाचा रमाकात जमीनों की आमदनी के नाम पर कुछ रकम उनक ब्रीफकेस में रख दिया करता था । कृष्णकांत' ने कभी भी अपने भाई से अपनी जायदाद और आमदर्ना का हिसाब नहीं लिया था।

लेकिन रमाकात बडे हिसाब-किताब वाला आदमी था। वह बडी खूबसूरती से एक-एक पाई का हिसाब रखै हुए था और एक-एक कदम बहुत सोच-समझ और होशियारी से उठा रहा था।' '

"तुम्हारे पिता आर्ट की दुनिया के आदमी थे । साहित्य व शेरो शायरी से लगान था। खुद भी शेयर कहते थे । पेंटिंग का भी शोऊ था । अपना शोक पूरा करने के लिए उन्होने दिल्ली में एक निजी ‘गैलरी' खोल रखी थी । इस आर्ट गैलरी के साथ ही उन्होंने एक रेस्तरां भी खोल रखा था। रुपये-पैसो की उनके पास कोई कमी नहीं थी I यह व्यबसाय उन्होंने महज अपने दिल बहलाव के लिए खोल रखे थे।"

' 'तुम्हारे पिता ने अभी तक शादी नहीं की थी-जबकि तुम्हारे चाचा क्री शादी तुम्हारे दादा क्री जिन्दगी में ही हो गई थी । । उसके तीन बेटे थे । सूरज, दीपक और बिजय । "

' 'तीनों हवेली में दनदनाते फिरते थे-उन्हें कोई रोकने-टोकने वाला नहीं था। "

”तुम्हारे पिता ने अभी तक शादी नहीं की और शादी न करने की कोई खास वजह भी न थी I उनके शुगल व उनकी व्यस्तताएं ही कुछ ऐसी थीं कि उन्हें फुरसत न मिलती थी । जिन्दगी बस यूं ही गुजरती जाती थी । तुम्हारे दादा ने इस तरफ तवज्जो दिलवाई-लेकिन वह बस हमकर टाल जाते । मा थी नहीं । वह दो बेटों को जन्म देकर कब की परलोक सिधार चुकी थी । अपनी बीबी से सर निहाल चथ को इतनी मुहब्बत थी कि उन्होंने उसके बाद दूसरी शादी करने के बारे में सोचा तक न था और बेटों की शादी में मांओं की दिलचस्पी ज्यादा होती है । वही जिद करके बेटों को शादी के लिए मजबूर कर देती है । यहां कोई जिद करने वाला नहीं था और कृष्णकांत को शादी करने का कोई शौक नहीं था फिर तुम्हारे चाचा तो यही चाहते थे कि बडा. भाई शादी न करे तो अच्छा ही है कि शादी होगी तो औलाद भी होगी और औलाद होगी तो जभीन जायदाद भी बट जाएगी। रमाकांत तो अपने बडे भाई के सामने शादी के बाद की समस्याओं का रोना-रोते, उन्हें शादी से दुर रहने क्रो ही उकसाता रहता था, वह औलाद को मुसीबत कहता था और तुम्हारे बाप को खुशासीब कहता था कि उसने शादी न करके बडी, अक्लमदी' का सबूत दिया था और वह हर तरह के जजाल सै बचे हुए हैँ । "

"लेकिन -सच यह है कि किसी के चाहने या न चाहने से भी कभी कुछ होता है। फिर शादी का मामला तो सीधे तकदीर और सजोग से जुडा. होता है । जब तकदीर इसान क्री जिन्दगी में महकते मह्रकाते खुशगवार लम्हें लाना चाहती हे तो वेसे ही संयोग पेदा कर देती हे I"

"तुम्हारे पिता कृष्णकात चालीस साल के होने क्रो आए ये। शादी का ख्याल कभी उनके जहन में आया भी था तो अब इतनी उम्र हो जाने के बाद वह जहन से बिल्कुल ही निक्ल गया था। पर तभी अचानक एक युवती तुम्हारे पिता की जिन्दगी में आ गई।

तुम्हारे पिता ने अपनी आर्ट गेलरी में एक आर्टिस्ट की चद पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगाई थी। उन्होंने कुछ बहुत ही खास लोगों को वह प्रदर्शनी देखने को आमंत्रित किया था। वह युवती सारिका उस प्रर्दशनी में किसी मेहमान के साथ आई थी । जब उस मेहमान ने सारिका नाम की इस युवती का परिचय तुम्हारे पिता से करवाया तो वह परिचय ही जिन्दगी भर का सम्बन्ध बन गया। "

"पहली मुलाकता में जैसै दोनों ने जाना कि वे एक दूसरे के लिए बने है। जव दो अजनबी एक दूसरे को देखकर यह महसूस करने लगें कि हम एक-दुसरे से सदियों से हैं तो फिर यह मदमाता अहसास एक खुशगवार बंधन में बंध जाता है। वे मिले मिलते रहे और फिय जल्दी 'ही उन्होंने' शादी करने का फैसला कर लिया।

' 'तुम्हारे चाचा रमाकांत' ने जब यह खबर सुनी तो उन्होंने बाहर से तो बडी, खुशी दिखाई, लेकिन अन्दर ही अन्दर उनके सीने पर सांप लोटने लगे । और अगर उसके लिए किसी तरह भी सम्भव होता तो वह यथासम्भव शादी को रोक देता। लेकिन वह बेबसी से हाथ मलता रह गया और तुम्हारे बाप ने शादी कर ली।"

"तुम्हारी मां सारिका, एक बहुत ही सुलझी हुई औरत थी । वह खुद बड़े बाप की बेटी थी I इसलिए धन-दौलत से उसे कोई लगाव नहीं था। उसकी जगह कोई दूसरी औरत होती तो वह अपने पति की विशाल जायदाद और सम्पदा जानकर उस पर अपना कब्जा करने की कोशिश जरूर करती । सारिका ने देखा कि उसके पति को पुश्तैनी जमीन-जायदाद से कोई लगाव नहीं है त्तो उन्होंने भी इस बारे में उनसे कभी कोई बात नहीं क्री I ' '

"तुम्हारा चाचा रमाकात बहुत खुश था क्योकि शादी को एक साल से ऊपर हो गया था और किसी बच्चे के जन्म की कोई खबर नहीं आई थी। तुम्हारे पिता कृष्णकात माडल टाऊन वाली कोठी में सन्तुष्ट-प्रसन्न जिन्दगी वित्ता रहे थे। तुम्हारे चाचा ने कई बार उन्हें सावनपुर आने क्रो कहा था लेकिन तुम्हारे पिता वहां जाने सै कतरात्ते थे । शादी के तुरन्त बाद बस एक बार ही वह सावनपुर गए थे ।

'' बहरहाल, अब तुम्हारे चाचा-चाची को बस यही चिन्ता लगी रहती थी कि अगर कृष्णकांत के यहां अगर कोई बारिस आ गया तो क्या होगा? वो नहीं चाहते थे कि हाथों में आई जायदाद वारिस आ जाने के बाद हाथ से निकल जाए । चाचा चाची ने उन दोनों यानी तुम्हारी मां और बाप पर टोने टोटके भी करवाए । लेकिन बच्चे तो भगवान की देन होने है' I वे ना किसी के चाहे पेदा होते हैँ और न ही किसी के चाहै रोके जा सकते हैं I सृष्टि का स्वामी ही इन्सानो को वारिस दे सकता है।"

' ' शादी के दो साल बाद कृष्णकांत के यहां लडका पेदा हुआ। उसका नाम इन्द्रजीत रखा गया। इन्द्रजीत के जन्म ने सावनपुर की हवेली पर मातम की चादर बिछा दी । जबकि तुम्हारे मा-बाप बहुत खुश थे। ' '

"हां , भाई के नाम पर चौकों मत । तुम्हारा एक सगा भाई इस दुनिया में मौजूद है । वह इस वक्त कहा व किस हालात में यह बाद में जान सकोगी। फिलहाल यह सुनो कि इन्द्रजीत के जन्म ने तुम्हारे चाचा के मन में कैसी आग भर दी I उसके सारे टोनै टोटके बेकार गए। ''
 

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