S
StoryPublisher
Guest
अब यह मामला ज्यादा सगीन हो गया लगने लगा था। लेकिन स्थिति की इस गम्भीरता को वह रेखा के सामने जाहिर नहीं करना चाहता था l
अमर ने माया को हुक्म दिया माया! सारे काम छोडकर यह खून साफ कर दो... ।"
"साहब जी! अगर आप पिंजरे' से उल्लू को निकालकर बाहर फैक दे तो में यह पिन्जरा' भी धो दूं। " माया बोली।
"ठीक है... । ' ' अमर समझ गया कि माया उस मरे हुए उल्लू सै डर रही है।
वह फोरन आगे बढा-पिजरे' को पैर से जरा आगे खिसकाया। फिर सूखै-साफ फर्श पर बैठकर उसने पिंजरे' का दरवाजा खोला और हाथ डालकर उल्लू का फैला हुआ पख पकडा उसने उल्लू क्रो बाहर खींच लिया। उसने सोचा था कि वो इस मरे हुए उल्लू को बराबर वाले खाली प्लाट की तरफ उछाल देगा... ।
लेकिन...वह अभी उल्लू का पख पकडकर ख़ड़ा ही हो रहा था कि एकाएक जबदस्त फडफडाहट, की आबाज आई। उल्लू का पंख अमर के हाथ से निकल गया ।
यह देख सब सन्नाटे में आ गए ।
वह उल्लू अमर के हाथ में बुरी तरह फडफडाया.. था। और फिर जेसे ही अमर की गिरफ्त ढीली हुई, उल्लू उसके हाथ से निक्लक उडता हुआ छत्त की तरफ उड गया था ।
रेखा चीख माराकर पीछे हटी।
माया भी बुरी तरह चिल्लाई। अमर ने अपने हवास पर कावू रखा और एकदम कहकहा लगाकर हसा। ~
"कमबख्त जिंदा' था।"
' 'यह...यह क्या हुआ?" ' रेखा चकरा गई थी।
"कुछ नहीं हुआ... । " अमर मुस्कराते हुए वोला… ' 'हाथो के तोते उडने की बजाये आज हाथो के उल्लू उड़ गये I”
"आपको मजाक सूझ रहा है मेरी जान पर वनी हुयी है। "
माया खून पौछने में लग गई थी । अमर ने रेखा की बात पर कोई तवजो न दी और कुछ कहै बिना अपने कमरे की तरफ चल दिया ।
और यह भयावह स्वप्न-सा घटना क्रम यहीं खत्म न हुआ था।
यह दूसरे दिन शाम कीं बात है। रेखा सामने बगले में अपनी सखी रजनी से मिलने गई हुई थी ।
अमर अपने आँफिस में था I घर पर गगा मौसी और माया के अलावा कोई न था।
और यह वही वक्त था कि घर की कॉलबेल बजी ।
_ माया ने दरवाजा खोलकर बाहर झाका तो उसकी ऊपर की सास ऊपर और नीचे कीं सास नीचे रह गयी। सामने, बरामदे में, वही रहस्यमय व्यक्ति खड़ा था। और इस वक्त वो जैसै गुस्से में था। माया क्रो देखते ही वह सर्द लहजे में बोला।
' 'हमारा परिन्दा बापस कर दो... I "
"परिन्दा...अच्छा वह उल्लू.. ॥ वह तो जो मर गया... I” माया ने जल्दी सै बात पलटी--' 'नहीं जी...वो तो...बो तो जी उड गया... ।"
”शीना को एक अमानत दी गई थीं बडे अफसोस की बात है कि वह उसकी हिफाजत न कर सकीं I "
'है जी... । " माया मुह खौलकर रह गई।
' '....वह आजाद हो गया है और यह कोई अच्छी बात नहीं... t” उस रहस्यमय व्यक्ति ने बदस्तुर तीखे लहजे में कहा---' 'अपनी शीना बीबी को बुलाओ।"
' 'हैं जी...! मेरी तो कुछ समझ में नहीं' आरहा हैं। आप क्या कह रहे हैं?" माया बौखला गई थी।
"तुम्हारी रेखा बीबी कहा' हैं?"
"बो तो जी घर में नहीँ हो ।।"
' 'जानता हूँ। उनसे कहना क्रि अब मेरी मुलाकात उनसे रेगिस्तान में होगी। लाओ, वह खाली पिन्जरा मेरे हवाले कर दो . . l ‘ '
"अच्छा जी, आप ठहरें...मै लाती हूँ।! माया बडी तेजी सै पिजरा उठा लाई। वह करीव ही दीवार के साथ रखा था--' 'यह लो, जी… ।”
उस रहस्यमय व्यक्ति ने पिंजरा अपने हाथ में ले लिया । फिर हाथ ऊपर करके पिंजरे' क्रो बडी… हसरत भरी नजरो से देखा और जाने के लिए पलटा ।
' 'वो जी...आपका नाम क्या है? बीबी से में क्या कहूंगी कि कौन आया था... ।"
' 'काला चिराग...।' ' उस रहस्यमय व्यक्ति ने जाते-जाते मुडकर कहा-- '’मेरा सदेशा देना मत जाना।"
' 'नहीं जी... ।' ' माया ने यकीन दिलाया।
' 'हां, उनसे कहना कि कोई रेगिस्तान में उनका इन्तजार कर रहा हैं.. .यहां वक्त बर्बाद न करें. .. I "
"अच्छा जी, कह दूगी I " माया थूक निगलते बोली।
वह रहस्यमय व्यक्ति, खाली पिंजरा घुमाता हुआ तेजी सै आगे बढ गया। माथा ने फोरन दरवाजा बन्द कर लिया I दरवाजा बन्द करके वह कुछ देर खामोशी-सै खडी, रही। फिर उसने दरवाजा खोलकर बाहर झांका । वह जा चुका था ।
माया तत्काल बाहर निकली और सडक_पार करके सामने वाले वगले के दरवाजे पर पहुची' कॉल बैल दबाई दरवाजा रजनी के नौकर ने खोला।
'‘ हा..क्या है? '
"बीबी कहा है ।। रेखा बीबी...!"
' 'अन्दर है... । ' ' नौकर ने कहा और एक तरफ हटते माया को अन्दर आने को रास्ता दे दिया । "रेखा ने माया को भीतर आते देखा तो उसका माथा ठनका। उसने तेजी से पूछा ।
“क्या हुआ, माया?? खैर तो है?“
''हा जी, बिल्कुल खैर है, वो जी बडी बीबी बुला रही हे ।"
"रेखा उठ खडी हुई। मै चलती हूं रजनी.. .तुम आना... ।' '
रजनी उसे गेट तक छोडने आई।
रेखा और माया सडक. पार कर अपने बगले' के गेट के करीब आ गई तो, माया ने उसके निकट हौते बडी राजदारी से कहा --
'' बीबी, वो आया था? "
' 'वो काले कपडों वाला?" रेखा ने ठिठकते हुए पूछा ।
' 'हां जी, पर आपको केसे फ्ता चल गया... । ' '
“तुम्हारी शक्ल देखकर। हवाईया जो उड रही हैँ I ' '
' 'बो जी खाली पिन्जरा ले गया है और आपके लिए एक सन्देशा दे गया है।"
और माया ने उस रहस्यमय व्यक्ति के साथ हुई बातें सविस्तार कह सुनाई।
यह सब सुन रेखा का रग उड गया । एक अज्ञात-सा भय उसके दिमाग पर छा गया था। वे बातें करते हुए ही अन्दर आए थे। अपने कमरे में आकर रेखा एक कुर्सी पर बैठ गई तो माया बैड के कौने पर आ बैठी।
रेखा की समझ में नहीं आ रहा था यह रहस्यमय व्यक्ति है कौन जो अचानक ही कहीँ से प्रक्ट हो जाता था । नाम भी बड़ा अजीब था । काला चिरागा भला यह भी कोई नाम हुआ। चिराग से तो रोशनी फूटती है और रोशनी काली कब होती है ।
वड सन्देशा दे गया था कि अब रेगिस्तान मे मुलाकात होगी। पर रेखा क्रो किसी रेगिस्तान में जाने कीं क्या जरूरत थी । अगर कोई उसकी इन्तजार किसी रेगिस्तान में कर है तो फिर जिन्दगी भर इंतजार ही करता रहेगा। वह यहां आराम सै रह रही थी-उसे रेगिस्तान में भटकने की भला क्या जरूरत है ।
वह यह सोच रही थी और नहीं जानती थी कि बौ जो सोच रही है गलत सोच रही है। आने बाता वक्त उसके लिए जो जाल बुन रहा था उस जाल में फंसकर' उसे न जाने कहा कहा भटकना था ।
माया रेखा को खामोश बैठा देखकर खडी हो गई, बीबी, मैं नीचे जा रही हूँ-जरा किचन देखूं।
माया के नीचे चले जाने के बाद रेखा कुर्सी सै उठी और टेर्लोफान उठाकर बैड पर ले आईं और आलती-पालती मारकर बैठ गई। उसने अमर का नम्बर लगाया और रिसीवर कान से लगा लिया । दो घटिया बजने के बाद किसी ने रिसीवर उठाया।
उथर से
' 'हेलो ।' ' कहने वाला व्यक्ति अमर नहीं था-उसका असिस्टेन्ट आनन्द था।
' 'भाई कहा हैं? ' ' रेखा ने उसकी आबाज पहचानकर पूछा था ।
आनन्द भी रेखा की आवाज को पहचानता था, सो फौरन समझ गया कि किस भाई कौ पूछा जा रहा है। उसने जबाव दिया--' 'जी वह तो चले गए।"
'' कहा . .? "
' 'किसी साहब से मिलने गए हैँ-वहां से घर चले जायेगे । ' '
' 'अच्छा, ठीक है । ‘ ' कहकर रेख ने रिसीवर रख दिया । बाहर अब बारिश होने लगी थी ।
रिसीवर रखने के बाद वह यू ही दरवाजे को देखती रही । दरवाजे को देखते देखले उसे यू महसूस हुआ जैसै कोई अन्दर आया है। यह उसकी अजीब आदत थी । उसे बैठे बैठाये ही अपने गिर्द किसी दुसरे की मौजूदगी का अहसास हो रहा था I किसी अमानवीय प्राणी की मौजूदगी का अहसास ।
अमर ने माया को हुक्म दिया माया! सारे काम छोडकर यह खून साफ कर दो... ।"
"साहब जी! अगर आप पिंजरे' से उल्लू को निकालकर बाहर फैक दे तो में यह पिन्जरा' भी धो दूं। " माया बोली।
"ठीक है... । ' ' अमर समझ गया कि माया उस मरे हुए उल्लू सै डर रही है।
वह फोरन आगे बढा-पिजरे' को पैर से जरा आगे खिसकाया। फिर सूखै-साफ फर्श पर बैठकर उसने पिंजरे' का दरवाजा खोला और हाथ डालकर उल्लू का फैला हुआ पख पकडा उसने उल्लू क्रो बाहर खींच लिया। उसने सोचा था कि वो इस मरे हुए उल्लू को बराबर वाले खाली प्लाट की तरफ उछाल देगा... ।
लेकिन...वह अभी उल्लू का पख पकडकर ख़ड़ा ही हो रहा था कि एकाएक जबदस्त फडफडाहट, की आबाज आई। उल्लू का पंख अमर के हाथ से निकल गया ।
यह देख सब सन्नाटे में आ गए ।
वह उल्लू अमर के हाथ में बुरी तरह फडफडाया.. था। और फिर जेसे ही अमर की गिरफ्त ढीली हुई, उल्लू उसके हाथ से निक्लक उडता हुआ छत्त की तरफ उड गया था ।
रेखा चीख माराकर पीछे हटी।
माया भी बुरी तरह चिल्लाई। अमर ने अपने हवास पर कावू रखा और एकदम कहकहा लगाकर हसा। ~
"कमबख्त जिंदा' था।"
' 'यह...यह क्या हुआ?" ' रेखा चकरा गई थी।
"कुछ नहीं हुआ... । " अमर मुस्कराते हुए वोला… ' 'हाथो के तोते उडने की बजाये आज हाथो के उल्लू उड़ गये I”
"आपको मजाक सूझ रहा है मेरी जान पर वनी हुयी है। "
माया खून पौछने में लग गई थी । अमर ने रेखा की बात पर कोई तवजो न दी और कुछ कहै बिना अपने कमरे की तरफ चल दिया ।
और यह भयावह स्वप्न-सा घटना क्रम यहीं खत्म न हुआ था।
यह दूसरे दिन शाम कीं बात है। रेखा सामने बगले में अपनी सखी रजनी से मिलने गई हुई थी ।
अमर अपने आँफिस में था I घर पर गगा मौसी और माया के अलावा कोई न था।
और यह वही वक्त था कि घर की कॉलबेल बजी ।
_ माया ने दरवाजा खोलकर बाहर झाका तो उसकी ऊपर की सास ऊपर और नीचे कीं सास नीचे रह गयी। सामने, बरामदे में, वही रहस्यमय व्यक्ति खड़ा था। और इस वक्त वो जैसै गुस्से में था। माया क्रो देखते ही वह सर्द लहजे में बोला।
' 'हमारा परिन्दा बापस कर दो... I "
"परिन्दा...अच्छा वह उल्लू.. ॥ वह तो जो मर गया... I” माया ने जल्दी सै बात पलटी--' 'नहीं जी...वो तो...बो तो जी उड गया... ।"
”शीना को एक अमानत दी गई थीं बडे अफसोस की बात है कि वह उसकी हिफाजत न कर सकीं I "
'है जी... । " माया मुह खौलकर रह गई।
' '....वह आजाद हो गया है और यह कोई अच्छी बात नहीं... t” उस रहस्यमय व्यक्ति ने बदस्तुर तीखे लहजे में कहा---' 'अपनी शीना बीबी को बुलाओ।"
' 'हैं जी...! मेरी तो कुछ समझ में नहीं' आरहा हैं। आप क्या कह रहे हैं?" माया बौखला गई थी।
"तुम्हारी रेखा बीबी कहा' हैं?"
"बो तो जी घर में नहीँ हो ।।"
' 'जानता हूँ। उनसे कहना क्रि अब मेरी मुलाकात उनसे रेगिस्तान में होगी। लाओ, वह खाली पिन्जरा मेरे हवाले कर दो . . l ‘ '
"अच्छा जी, आप ठहरें...मै लाती हूँ।! माया बडी तेजी सै पिजरा उठा लाई। वह करीव ही दीवार के साथ रखा था--' 'यह लो, जी… ।”
उस रहस्यमय व्यक्ति ने पिंजरा अपने हाथ में ले लिया । फिर हाथ ऊपर करके पिंजरे' क्रो बडी… हसरत भरी नजरो से देखा और जाने के लिए पलटा ।
' 'वो जी...आपका नाम क्या है? बीबी से में क्या कहूंगी कि कौन आया था... ।"
' 'काला चिराग...।' ' उस रहस्यमय व्यक्ति ने जाते-जाते मुडकर कहा-- '’मेरा सदेशा देना मत जाना।"
' 'नहीं जी... ।' ' माया ने यकीन दिलाया।
' 'हां, उनसे कहना कि कोई रेगिस्तान में उनका इन्तजार कर रहा हैं.. .यहां वक्त बर्बाद न करें. .. I "
"अच्छा जी, कह दूगी I " माया थूक निगलते बोली।
वह रहस्यमय व्यक्ति, खाली पिंजरा घुमाता हुआ तेजी सै आगे बढ गया। माथा ने फोरन दरवाजा बन्द कर लिया I दरवाजा बन्द करके वह कुछ देर खामोशी-सै खडी, रही। फिर उसने दरवाजा खोलकर बाहर झांका । वह जा चुका था ।
माया तत्काल बाहर निकली और सडक_पार करके सामने वाले वगले के दरवाजे पर पहुची' कॉल बैल दबाई दरवाजा रजनी के नौकर ने खोला।
'‘ हा..क्या है? '
"बीबी कहा है ।। रेखा बीबी...!"
' 'अन्दर है... । ' ' नौकर ने कहा और एक तरफ हटते माया को अन्दर आने को रास्ता दे दिया । "रेखा ने माया को भीतर आते देखा तो उसका माथा ठनका। उसने तेजी से पूछा ।
“क्या हुआ, माया?? खैर तो है?“
''हा जी, बिल्कुल खैर है, वो जी बडी बीबी बुला रही हे ।"
"रेखा उठ खडी हुई। मै चलती हूं रजनी.. .तुम आना... ।' '
रजनी उसे गेट तक छोडने आई।
रेखा और माया सडक. पार कर अपने बगले' के गेट के करीब आ गई तो, माया ने उसके निकट हौते बडी राजदारी से कहा --
'' बीबी, वो आया था? "
' 'वो काले कपडों वाला?" रेखा ने ठिठकते हुए पूछा ।
' 'हां जी, पर आपको केसे फ्ता चल गया... । ' '
“तुम्हारी शक्ल देखकर। हवाईया जो उड रही हैँ I ' '
' 'बो जी खाली पिन्जरा ले गया है और आपके लिए एक सन्देशा दे गया है।"
और माया ने उस रहस्यमय व्यक्ति के साथ हुई बातें सविस्तार कह सुनाई।
यह सब सुन रेखा का रग उड गया । एक अज्ञात-सा भय उसके दिमाग पर छा गया था। वे बातें करते हुए ही अन्दर आए थे। अपने कमरे में आकर रेखा एक कुर्सी पर बैठ गई तो माया बैड के कौने पर आ बैठी।
रेखा की समझ में नहीं आ रहा था यह रहस्यमय व्यक्ति है कौन जो अचानक ही कहीँ से प्रक्ट हो जाता था । नाम भी बड़ा अजीब था । काला चिरागा भला यह भी कोई नाम हुआ। चिराग से तो रोशनी फूटती है और रोशनी काली कब होती है ।
वड सन्देशा दे गया था कि अब रेगिस्तान मे मुलाकात होगी। पर रेखा क्रो किसी रेगिस्तान में जाने कीं क्या जरूरत थी । अगर कोई उसकी इन्तजार किसी रेगिस्तान में कर है तो फिर जिन्दगी भर इंतजार ही करता रहेगा। वह यहां आराम सै रह रही थी-उसे रेगिस्तान में भटकने की भला क्या जरूरत है ।
वह यह सोच रही थी और नहीं जानती थी कि बौ जो सोच रही है गलत सोच रही है। आने बाता वक्त उसके लिए जो जाल बुन रहा था उस जाल में फंसकर' उसे न जाने कहा कहा भटकना था ।
माया रेखा को खामोश बैठा देखकर खडी हो गई, बीबी, मैं नीचे जा रही हूँ-जरा किचन देखूं।
माया के नीचे चले जाने के बाद रेखा कुर्सी सै उठी और टेर्लोफान उठाकर बैड पर ले आईं और आलती-पालती मारकर बैठ गई। उसने अमर का नम्बर लगाया और रिसीवर कान से लगा लिया । दो घटिया बजने के बाद किसी ने रिसीवर उठाया।
उथर से
' 'हेलो ।' ' कहने वाला व्यक्ति अमर नहीं था-उसका असिस्टेन्ट आनन्द था।
' 'भाई कहा हैं? ' ' रेखा ने उसकी आबाज पहचानकर पूछा था ।
आनन्द भी रेखा की आवाज को पहचानता था, सो फौरन समझ गया कि किस भाई कौ पूछा जा रहा है। उसने जबाव दिया--' 'जी वह तो चले गए।"
'' कहा . .? "
' 'किसी साहब से मिलने गए हैँ-वहां से घर चले जायेगे । ' '
' 'अच्छा, ठीक है । ‘ ' कहकर रेख ने रिसीवर रख दिया । बाहर अब बारिश होने लगी थी ।
रिसीवर रखने के बाद वह यू ही दरवाजे को देखती रही । दरवाजे को देखते देखले उसे यू महसूस हुआ जैसै कोई अन्दर आया है। यह उसकी अजीब आदत थी । उसे बैठे बैठाये ही अपने गिर्द किसी दुसरे की मौजूदगी का अहसास हो रहा था I किसी अमानवीय प्राणी की मौजूदगी का अहसास ।