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साहिल ने सत्रहवीं बार रुमाल से चेहरे का पसीना पोछा। पसीने के आधिक्य के कारण उसका रुमाल अपना प्राकृतिक सफ़ेद रंग खो चुका था। उसके बदन पर मौजूद कपड़े इस कदर भीगे हुए थे मानो वह किसी तालाब में डुबकी लगा कर आया हो। बस ने उसे शंकरगढ़ से चार कि.मी. पहले ही छोड़ दिया था। गाँव तक का फासला तय करने के लिए कोई अन्य विकल्प उपलब्ध न होने के कारण उसे पदयात्रा करनी पड़ रही थी। उसने प्रशासन का इस बात के लिए शुक्रिया अदा किया कि बस स्टैंड से गाँव तक के लिए पक्की सड़क मुहैया थी, अन्यथा गत रात्रि हुई भीषण बारिश के कारण खराब हो चुके मिट्टी के रास्ते पर चलने में उसे अच्छी-खासी कठिनाई का सामना करना पड़ सकता था। साहिल आज ढंग से महसूस कर रहा था कि बारीश के बाद की धूप असहनीय होती है। उसे इस धूप में चलते हुए लगभग पैंतालीस मिनट होने को आए थे। थोड़ी दूर पर गड़े माइलस्टोन पर ‘शंकरगढ़- १ कि.मी.’ लिखा नजर आया। उसने राहत की सांस ली क्योंकि उसकी पचहत्तर फीसदी पदयात्रा पूरी हो चुकी थी।
अब तक की पदयात्रा के दौरान उसे दूर-दूर तक बंजर भूमि और ऊंचे-ऊंचे टीले ही नजर आए थे, किन्तु अब वह जैसे-जैसे बस्ती के निकट पहुंच रहा था वैसे-वैसे बंजर भूमि का स्थान हरे-भरे खेत लेते जा रहे थे। पसीने के रूप में शरीर से अधिक मात्रा में पानी बाहर निकल जाने के कारण इस वक्त उसे पानी की नितांत आवश्यकता थी। ‘खेतों की सिंचाई के लिए आस-पास कोई ट्यूब वेल जरूर होगा।’ इस उम्मीद में उसने दूर तक फैले खेतों पर दृष्टि दौड़ायी। लगभग दस मिनट में तय किये जा सकने वाले फासले पर उसे ट्यूब वेल की लाल कोठरी नजर आयी। वहां स्थानीय लोगों की मौजूदगी देख उसने अनुमान लगाया कि ट्यूब वेल चल रहा था।
वह ट्यूब वेल तक पहुंचा। वहां लगभग दस की तादात वाली छोटी सी भीड़ थी। जिसमें लड़कों के अलावा दो-चार वयस्क भी थे। कुछ लोग ट्यूब वेल की बड़ी टंकी में उछल-कूद कर रहे थे, कुछ कपड़े उतारकर केवल अंडर गारमेंट पहने हुए टंकी में कूदने लायक जगह होने की राह देख रहे थे और कुछ छोटी टंकी के पास बैठकर कपड़ों पर साबुन घिस रहे थे।
अपने बीच साहिल के रूप में एक अजनबी को पाकर टंकी में ‘छपाक-छई’ कर रहे लड़के अपनी हरकतें रोक कर उसे घूरने लगे, किन्तु साहिल ने उन्हें नजरअंदाज करते हुए वाटर बॉटल निकाला और उसे भरने के बाद एक तरफ खड़ा होकर चेहरा धोने लगा। इस कार्य में कई बॉटल पानी खर्च करने के बाद उसने पीने हेतु बॉटल में साफ़ पानी भरा और प्रस्थान को उद्यत हुआ ही था कि एक आदमी पूछ बैठा-
“शहर से आये हो क्या भाई साहब?”
“जी हाँ! शंकरगढ़ को जाना है।” साहिल ठिठका।
“किसके यहाँ?” किसी दूसरे ने पूछा।
“राजमहल।” साहिल ने राजमहल नाम इसलिए लिया क्योंकि उसे मालूम था कि उसका गंतव्य शंकरगढ़ और आस-पास के गाँवों में ‘राजमहल’ के नाम से विख्यात है।
“राजमहल?” कई लोगों ने समवेत स्वर में कहा- “लेकिन वहां क्यों जा रहे हो शहरी बाबू? वहां तो पहले से ही कोहराम मचा हुआ है।”
“कोहराम मचा हुआ है?” साहिल के माथे पर सिलवटें उभरीं- “क्या मतलब?”
लोगों ने एक दूसरे को घूरा, मानो इस सवाल का जवाब तलाश रहे हों कि एक अजनबी के सामने राजमहल की घटनाओं का जिक्र करना उचित है या नहीं? अंतत: उनमें से एक ने कहा- “ठाकुर साहब की बिटिया संस्कृति है उस कोहराम की वजह।”
“लेकिन कैसे?” संस्कृति का जिक्र सुनकर साहिल रोमांचित हुआ।
“रसूख वाले लोगों का मामला है इसलिए अन्दर की पूरी बात तो हमें नहीं मालूम लेकिन इतना जरूर मालूम है कि ठाकुर साहब की बिटिया को तहखाने में एक ताबूत मिला है।”
“लेकिन अचरज की बात तो ये है भइया कि उस तहखाने तक उनकी बिटिया पहुँची कैसे? जबकि वह तहखाना तो परिवार के लोगों तक की आँखों से ओझल था।” किसी अन्य ने कहा।
“अरे इसमें अचरज जैसी कोई बात ही नहीं है कन्हैया।” एक आदमी ने कन्हैया नाम के उस आदमी को घूरा- “राजमहल में काम करने वाले बंशीधर ने बताया कि ताबूत में से कोई संस्कृति को बुला रहा था। उसी बुलावे का पीछा करते-करते वह तहखाने तक पहुँची थी।”
साहिल को जेहन में घंटियाँ बजती महसूस हुईं । उसने सम्मोहित अवस्था में पूछा- “ता...ताबूत से भ..भला आवाज कैसे आ सकती है?”
“नहीं आ सकती...।” आदमी ऐसी भाव-भंगिमाएं बनाते हुए बोला जैसे साहिल को डरा रहा हो- “ताबूत से आवाज नहीं आ सकती, इसीलिए तो राजमहल में कोहराम मचा हुआ है।”
साहिल खामोश रह गया। प्रतिक्रिया के लिए उसके पास शब्द नहीं थे।
“क्या हुआ शहरी बाबू? डर गये क्या?” ताबूत का जिक्र करने वाले आदमी ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा। उस आदमी की शारीरिक भाषा देख साहिल को एक पल के लिए महसूस हुआ कि वह आदमी उसे अजनबी समझ कर परेशान कर रहा है, किन्तु इस मुद्दे के छिड़ जाने के बाद अन्य लोगों के चेहरे पर नजर आने वाला दहशत देख साहिल को उसकी बातों में सच्चाई नजर आयी।
“क्या सचमुच ऐसा ही कुछ हुआ था?” उसने आशंकित स्वर में पूछा।
“बिल्कुल ऐसा ही हुआ था।” इस बार दूसरे आदमी ने कहा- “वैसे भी राजमहल में जो कुछ भी हो जाए कम ही है। उस खानदान का इतिहास ही खून से लिखा गया है। हम तो हमारे दादा-परदादा के मुंह से राजमहल के पुरखों के जुल्म-ओ-सितम के किस्से सुनते आये हैं। सोयी रही होगी कोई अतृप्त आत्मा उस ताबूत में, जो जवान लड़की की आहट पाते ही जाग उठी है।”
“लेकिन...लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है?”
“क्यों नहीं हो सकता भाई साहब? पुरखों ने जो जुलुम (जुल्म) किया है उसका हिसाब-किताब आने वाली पीढ़ियों को ही चुकता करना होगा न? कुछ लोग तो ऐसा भी कहते हैं कि वह राजमहल किसी ब्रह्मपिशाच के साए में हैं।”
“ब्रह्मपिशाच?” साहिल का असमंजस भरा स्वर- “ये ब्रह्मपिशाच कैसे प्राणी होते हैं?”
“प्राणी नहीं; पिशाच होते हैं। कुछ लोग उन्हें ब्रह्मराक्षस भी कहते हैं।”
“ओह।” साहिल के लिए यह नाम नया नहीं था, उसने इस विषय में और अधिक जानने के ध्येय से सवाल किया- “क्या आप इस बारे में और कुछ बता सकते हैं? मेरा मतलब है कि वह ब्रह्मराक्षस कौन है? राजमहल किस प्रकार उसके साए में आया?”
लोगों ने एक दूसरे की ओर देखा। उनके हाव-भाव ने दर्शाया कि उन्हें जो कुछ मालूम था उसे बताने में वे हिचकिचा रहे थे। टंकी में उछल-कूद कर रहे लड़कों की भी इस वार्तालाप में रूचि जाग उठी थी। वे भी उनकी बातों को तन्मयतापूर्वक सुनने लगे थे।
“पहले आप ये तो बताइये कि आप राजमहल जा क्यों रहे हैं?”
“मैं एक आर्टिस्ट हूँ। कुछ दिन पहले एक समारोह के लिए राजमहल वालों ने मुझसे कुछ बैनर, पोस्टर और इनविटेशन कार्ड डिजाईन करवाए थे, उसी का पेमेंट लेने जा रहा हूँ।” साहिल को मालूम था कि कुछ दिन पहले ही संस्कृति के घर वापसी की खुशी में समारोह का आयोजन हुआ था, इसलिए उसने समारोह का नाम लेकर सफल झूठ बोला।
“तब तो आपको असली बात बताने में कोई हर्ज नहीं है। हमें लगा कि आप
राजमहल वालों के चमचे हैं, इसलिये आपको उनका राज बताने में हिचकिचा रहे थे।”
“आखिरकार वह राज है क्या?” साहिल की उत्कंठा चरम पर पहुँच गयी।
“वैसे तो राजमहल के इतिहास में उनके पूर्वजों की कई खौफनाक कहानियाँ दर्ज हैं, लेकिन जिस कहानी को सुनकर आज भी शंकरगढ़ के लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं वह कहानी माया और अभयानन्द की है। माया शंकरगढ़ के राजघराने की एकलौती राजकुमारी थी, जबकि अभयानन्द राज्य का ही एक ब्राह्मण था। कोई नहीं जानता था कि वह शंकरगढ़ में कहाँ से आया था? लोगों को उसके ब्राह्मण होने का कैसे पता चला? यह भी एक रहस्य ही है, जो हमें भी नहीं मालूम है। गाँव के बड़े-बूढ़े बताते हैं कि अभयानन्द की दृष्टि माया पर थी। उसके बारे में प्रचलित था कि वह दक्षिण की श्मशान भूमि के उस पार फैले घने जंगलों में रहने वाले कापालिकों के पास काली विद्या सीखने के लिए जाता था। ज्यों ही राजा उदयभान सिंह को पता चला कि अभयानन्द कापालिकों के संपर्क में हैं और माया पर बुरी नजर रखता है त्यों ही उस दुराचारी ब्राह्मण पर कहर टूट पड़ा। राजा के आदेश पर शंकरगढ़ के लोगों द्वारा उसे पीपल के पेड़ से बांधकर जिन्दा जला दिया गया, क्योंकि उन दिनों यह बात प्रचलित थी कि काली विद्याओं में लिप्त लोगों को ज़िंदा जला देने से उनके प्रभावों और कुकृत्यों का दमन हो जाता है। आपको रास्ते में पीपल का वह पेड़ नजर आया भी होगा। उस पेड़ के इर्द-गिर्द बने चबूतरे पर पिंजरे जैसे मंदिर में एक मूर्ति है, जिसे राजमहल वालों द्वारा ब्रह्म बाबा मानकर पूजा जाता है। ये ब्रह्म बाबा कोई और नहीं ठाकुर खानदान के उस वक्त के पुरोहित दिव्यपाणी हैं, जिन्होंने प्राणाहुति देकर अभयानन्द के प्रकोप से शंकरगढ़ के साथ-साथ राजमहल वालों को भी मुक्ति दिलाई थी।”
“इस प्रकार तो अभयानन्द एक बुरा इंसान साबित होता है, यदि उसे ज़िंदा जलाया गया तो इसमें गलत क्या किया गया?”
“अभयानन्द भले ही बुरा था, लेकिन था तो इंसान ही, और इंसान भी साधारण नहीं बल्कि एक ब्राह्मण, जिन्हें उन दिनों ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। उसने माया पर बुरी नजर डाली थी, लेकिन उसका कोई अहित तो नहीं किया था न? फिर उसे ज़िंदा जला देने की क्या जरूरत थी? राज्य के क़ानून में उसके कुकर्मों के लिए और सजाएं भी तो रही होंगी।”
“ओह! लेकिन जब अभयानन्द को ज़िंदा जला दिया गया था, तो फिर उसके किस प्रकोप को मिटाने के लिए दिव्यपाणी को प्राणाहुति देनी पड़ी?”
“शंकरगढ़ के लोगों को अभयानन्द की असली ताकत का अंदाजा उसकी मौत के बाद लगा। अभयानन्द को जलाए जाने के तीन दिनों के भीतर ही शंकरगढ़ में एक दहशत फ़ैली। शुरूआती दौर में उस दहशत के चपेट में लोगों के गाय, बकरी, भेड़ जैसे पालतू पशु आये। रात के अँधेरे में कोई उन्हें उनके खूंटे से छुड़ा ले जाता था, फिर सुबह दक्षिण के मरघट में उन चौपायों की लाश पाई जाती थी। उनके सिर किसी धारदार हथियार से धड़ से अलग किये गये होते थे। उन्हें जिस प्रकार चीरा-फाड़ा गया होता था, उसे देखकर गांव वाले यही अंदाजा लगाते थे कि पशुओं को उठाने वाला कोई वहशी जानवर था, किन्तु फिर एक दिन ऐसा हादसा हुआ जिसने शंकरगढ़ वालों की इस गलतफहमी को दूर कर दिया कि उनके पशुओं को कोई वहशी जानवर उठा ले जाता था।”
“क्या हुआ था?” साहिल का लहजा कांपा।
साहिल ने सत्रहवीं बार रुमाल से चेहरे का पसीना पोछा। पसीने के आधिक्य के कारण उसका रुमाल अपना प्राकृतिक सफ़ेद रंग खो चुका था। उसके बदन पर मौजूद कपड़े इस कदर भीगे हुए थे मानो वह किसी तालाब में डुबकी लगा कर आया हो। बस ने उसे शंकरगढ़ से चार कि.मी. पहले ही छोड़ दिया था। गाँव तक का फासला तय करने के लिए कोई अन्य विकल्प उपलब्ध न होने के कारण उसे पदयात्रा करनी पड़ रही थी। उसने प्रशासन का इस बात के लिए शुक्रिया अदा किया कि बस स्टैंड से गाँव तक के लिए पक्की सड़क मुहैया थी, अन्यथा गत रात्रि हुई भीषण बारिश के कारण खराब हो चुके मिट्टी के रास्ते पर चलने में उसे अच्छी-खासी कठिनाई का सामना करना पड़ सकता था। साहिल आज ढंग से महसूस कर रहा था कि बारीश के बाद की धूप असहनीय होती है। उसे इस धूप में चलते हुए लगभग पैंतालीस मिनट होने को आए थे। थोड़ी दूर पर गड़े माइलस्टोन पर ‘शंकरगढ़- १ कि.मी.’ लिखा नजर आया। उसने राहत की सांस ली क्योंकि उसकी पचहत्तर फीसदी पदयात्रा पूरी हो चुकी थी।
अब तक की पदयात्रा के दौरान उसे दूर-दूर तक बंजर भूमि और ऊंचे-ऊंचे टीले ही नजर आए थे, किन्तु अब वह जैसे-जैसे बस्ती के निकट पहुंच रहा था वैसे-वैसे बंजर भूमि का स्थान हरे-भरे खेत लेते जा रहे थे। पसीने के रूप में शरीर से अधिक मात्रा में पानी बाहर निकल जाने के कारण इस वक्त उसे पानी की नितांत आवश्यकता थी। ‘खेतों की सिंचाई के लिए आस-पास कोई ट्यूब वेल जरूर होगा।’ इस उम्मीद में उसने दूर तक फैले खेतों पर दृष्टि दौड़ायी। लगभग दस मिनट में तय किये जा सकने वाले फासले पर उसे ट्यूब वेल की लाल कोठरी नजर आयी। वहां स्थानीय लोगों की मौजूदगी देख उसने अनुमान लगाया कि ट्यूब वेल चल रहा था।
वह ट्यूब वेल तक पहुंचा। वहां लगभग दस की तादात वाली छोटी सी भीड़ थी। जिसमें लड़कों के अलावा दो-चार वयस्क भी थे। कुछ लोग ट्यूब वेल की बड़ी टंकी में उछल-कूद कर रहे थे, कुछ कपड़े उतारकर केवल अंडर गारमेंट पहने हुए टंकी में कूदने लायक जगह होने की राह देख रहे थे और कुछ छोटी टंकी के पास बैठकर कपड़ों पर साबुन घिस रहे थे।
अपने बीच साहिल के रूप में एक अजनबी को पाकर टंकी में ‘छपाक-छई’ कर रहे लड़के अपनी हरकतें रोक कर उसे घूरने लगे, किन्तु साहिल ने उन्हें नजरअंदाज करते हुए वाटर बॉटल निकाला और उसे भरने के बाद एक तरफ खड़ा होकर चेहरा धोने लगा। इस कार्य में कई बॉटल पानी खर्च करने के बाद उसने पीने हेतु बॉटल में साफ़ पानी भरा और प्रस्थान को उद्यत हुआ ही था कि एक आदमी पूछ बैठा-
“शहर से आये हो क्या भाई साहब?”
“जी हाँ! शंकरगढ़ को जाना है।” साहिल ठिठका।
“किसके यहाँ?” किसी दूसरे ने पूछा।
“राजमहल।” साहिल ने राजमहल नाम इसलिए लिया क्योंकि उसे मालूम था कि उसका गंतव्य शंकरगढ़ और आस-पास के गाँवों में ‘राजमहल’ के नाम से विख्यात है।
“राजमहल?” कई लोगों ने समवेत स्वर में कहा- “लेकिन वहां क्यों जा रहे हो शहरी बाबू? वहां तो पहले से ही कोहराम मचा हुआ है।”
“कोहराम मचा हुआ है?” साहिल के माथे पर सिलवटें उभरीं- “क्या मतलब?”
लोगों ने एक दूसरे को घूरा, मानो इस सवाल का जवाब तलाश रहे हों कि एक अजनबी के सामने राजमहल की घटनाओं का जिक्र करना उचित है या नहीं? अंतत: उनमें से एक ने कहा- “ठाकुर साहब की बिटिया संस्कृति है उस कोहराम की वजह।”
“लेकिन कैसे?” संस्कृति का जिक्र सुनकर साहिल रोमांचित हुआ।
“रसूख वाले लोगों का मामला है इसलिए अन्दर की पूरी बात तो हमें नहीं मालूम लेकिन इतना जरूर मालूम है कि ठाकुर साहब की बिटिया को तहखाने में एक ताबूत मिला है।”
“लेकिन अचरज की बात तो ये है भइया कि उस तहखाने तक उनकी बिटिया पहुँची कैसे? जबकि वह तहखाना तो परिवार के लोगों तक की आँखों से ओझल था।” किसी अन्य ने कहा।
“अरे इसमें अचरज जैसी कोई बात ही नहीं है कन्हैया।” एक आदमी ने कन्हैया नाम के उस आदमी को घूरा- “राजमहल में काम करने वाले बंशीधर ने बताया कि ताबूत में से कोई संस्कृति को बुला रहा था। उसी बुलावे का पीछा करते-करते वह तहखाने तक पहुँची थी।”
साहिल को जेहन में घंटियाँ बजती महसूस हुईं । उसने सम्मोहित अवस्था में पूछा- “ता...ताबूत से भ..भला आवाज कैसे आ सकती है?”
“नहीं आ सकती...।” आदमी ऐसी भाव-भंगिमाएं बनाते हुए बोला जैसे साहिल को डरा रहा हो- “ताबूत से आवाज नहीं आ सकती, इसीलिए तो राजमहल में कोहराम मचा हुआ है।”
साहिल खामोश रह गया। प्रतिक्रिया के लिए उसके पास शब्द नहीं थे।
“क्या हुआ शहरी बाबू? डर गये क्या?” ताबूत का जिक्र करने वाले आदमी ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा। उस आदमी की शारीरिक भाषा देख साहिल को एक पल के लिए महसूस हुआ कि वह आदमी उसे अजनबी समझ कर परेशान कर रहा है, किन्तु इस मुद्दे के छिड़ जाने के बाद अन्य लोगों के चेहरे पर नजर आने वाला दहशत देख साहिल को उसकी बातों में सच्चाई नजर आयी।
“क्या सचमुच ऐसा ही कुछ हुआ था?” उसने आशंकित स्वर में पूछा।
“बिल्कुल ऐसा ही हुआ था।” इस बार दूसरे आदमी ने कहा- “वैसे भी राजमहल में जो कुछ भी हो जाए कम ही है। उस खानदान का इतिहास ही खून से लिखा गया है। हम तो हमारे दादा-परदादा के मुंह से राजमहल के पुरखों के जुल्म-ओ-सितम के किस्से सुनते आये हैं। सोयी रही होगी कोई अतृप्त आत्मा उस ताबूत में, जो जवान लड़की की आहट पाते ही जाग उठी है।”
“लेकिन...लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है?”
“क्यों नहीं हो सकता भाई साहब? पुरखों ने जो जुलुम (जुल्म) किया है उसका हिसाब-किताब आने वाली पीढ़ियों को ही चुकता करना होगा न? कुछ लोग तो ऐसा भी कहते हैं कि वह राजमहल किसी ब्रह्मपिशाच के साए में हैं।”
“ब्रह्मपिशाच?” साहिल का असमंजस भरा स्वर- “ये ब्रह्मपिशाच कैसे प्राणी होते हैं?”
“प्राणी नहीं; पिशाच होते हैं। कुछ लोग उन्हें ब्रह्मराक्षस भी कहते हैं।”
“ओह।” साहिल के लिए यह नाम नया नहीं था, उसने इस विषय में और अधिक जानने के ध्येय से सवाल किया- “क्या आप इस बारे में और कुछ बता सकते हैं? मेरा मतलब है कि वह ब्रह्मराक्षस कौन है? राजमहल किस प्रकार उसके साए में आया?”
लोगों ने एक दूसरे की ओर देखा। उनके हाव-भाव ने दर्शाया कि उन्हें जो कुछ मालूम था उसे बताने में वे हिचकिचा रहे थे। टंकी में उछल-कूद कर रहे लड़कों की भी इस वार्तालाप में रूचि जाग उठी थी। वे भी उनकी बातों को तन्मयतापूर्वक सुनने लगे थे।
“पहले आप ये तो बताइये कि आप राजमहल जा क्यों रहे हैं?”
“मैं एक आर्टिस्ट हूँ। कुछ दिन पहले एक समारोह के लिए राजमहल वालों ने मुझसे कुछ बैनर, पोस्टर और इनविटेशन कार्ड डिजाईन करवाए थे, उसी का पेमेंट लेने जा रहा हूँ।” साहिल को मालूम था कि कुछ दिन पहले ही संस्कृति के घर वापसी की खुशी में समारोह का आयोजन हुआ था, इसलिए उसने समारोह का नाम लेकर सफल झूठ बोला।
“तब तो आपको असली बात बताने में कोई हर्ज नहीं है। हमें लगा कि आप
राजमहल वालों के चमचे हैं, इसलिये आपको उनका राज बताने में हिचकिचा रहे थे।”
“आखिरकार वह राज है क्या?” साहिल की उत्कंठा चरम पर पहुँच गयी।
“वैसे तो राजमहल के इतिहास में उनके पूर्वजों की कई खौफनाक कहानियाँ दर्ज हैं, लेकिन जिस कहानी को सुनकर आज भी शंकरगढ़ के लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं वह कहानी माया और अभयानन्द की है। माया शंकरगढ़ के राजघराने की एकलौती राजकुमारी थी, जबकि अभयानन्द राज्य का ही एक ब्राह्मण था। कोई नहीं जानता था कि वह शंकरगढ़ में कहाँ से आया था? लोगों को उसके ब्राह्मण होने का कैसे पता चला? यह भी एक रहस्य ही है, जो हमें भी नहीं मालूम है। गाँव के बड़े-बूढ़े बताते हैं कि अभयानन्द की दृष्टि माया पर थी। उसके बारे में प्रचलित था कि वह दक्षिण की श्मशान भूमि के उस पार फैले घने जंगलों में रहने वाले कापालिकों के पास काली विद्या सीखने के लिए जाता था। ज्यों ही राजा उदयभान सिंह को पता चला कि अभयानन्द कापालिकों के संपर्क में हैं और माया पर बुरी नजर रखता है त्यों ही उस दुराचारी ब्राह्मण पर कहर टूट पड़ा। राजा के आदेश पर शंकरगढ़ के लोगों द्वारा उसे पीपल के पेड़ से बांधकर जिन्दा जला दिया गया, क्योंकि उन दिनों यह बात प्रचलित थी कि काली विद्याओं में लिप्त लोगों को ज़िंदा जला देने से उनके प्रभावों और कुकृत्यों का दमन हो जाता है। आपको रास्ते में पीपल का वह पेड़ नजर आया भी होगा। उस पेड़ के इर्द-गिर्द बने चबूतरे पर पिंजरे जैसे मंदिर में एक मूर्ति है, जिसे राजमहल वालों द्वारा ब्रह्म बाबा मानकर पूजा जाता है। ये ब्रह्म बाबा कोई और नहीं ठाकुर खानदान के उस वक्त के पुरोहित दिव्यपाणी हैं, जिन्होंने प्राणाहुति देकर अभयानन्द के प्रकोप से शंकरगढ़ के साथ-साथ राजमहल वालों को भी मुक्ति दिलाई थी।”
“इस प्रकार तो अभयानन्द एक बुरा इंसान साबित होता है, यदि उसे ज़िंदा जलाया गया तो इसमें गलत क्या किया गया?”
“अभयानन्द भले ही बुरा था, लेकिन था तो इंसान ही, और इंसान भी साधारण नहीं बल्कि एक ब्राह्मण, जिन्हें उन दिनों ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। उसने माया पर बुरी नजर डाली थी, लेकिन उसका कोई अहित तो नहीं किया था न? फिर उसे ज़िंदा जला देने की क्या जरूरत थी? राज्य के क़ानून में उसके कुकर्मों के लिए और सजाएं भी तो रही होंगी।”
“ओह! लेकिन जब अभयानन्द को ज़िंदा जला दिया गया था, तो फिर उसके किस प्रकोप को मिटाने के लिए दिव्यपाणी को प्राणाहुति देनी पड़ी?”
“शंकरगढ़ के लोगों को अभयानन्द की असली ताकत का अंदाजा उसकी मौत के बाद लगा। अभयानन्द को जलाए जाने के तीन दिनों के भीतर ही शंकरगढ़ में एक दहशत फ़ैली। शुरूआती दौर में उस दहशत के चपेट में लोगों के गाय, बकरी, भेड़ जैसे पालतू पशु आये। रात के अँधेरे में कोई उन्हें उनके खूंटे से छुड़ा ले जाता था, फिर सुबह दक्षिण के मरघट में उन चौपायों की लाश पाई जाती थी। उनके सिर किसी धारदार हथियार से धड़ से अलग किये गये होते थे। उन्हें जिस प्रकार चीरा-फाड़ा गया होता था, उसे देखकर गांव वाले यही अंदाजा लगाते थे कि पशुओं को उठाने वाला कोई वहशी जानवर था, किन्तु फिर एक दिन ऐसा हादसा हुआ जिसने शंकरगढ़ वालों की इस गलतफहमी को दूर कर दिया कि उनके पशुओं को कोई वहशी जानवर उठा ले जाता था।”
“क्या हुआ था?” साहिल का लहजा कांपा।