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वह आदमी बुरी तरह हांफ रहा था। गली के एक मोड़ पर ठहरकर उसने पीछे देखा। गली सुनसान थी, अतः सुनसान ही नजर आयी। पीछे पसरे सन्नाटे को देख उसने राहत की सांस ली और एक दीवार की टेक लेकर पंजों के बल बैठ गया। ‘जिन लोगों व्दारा उसका पीछा किया जा रहा था, वे गलियों की भुलभलैया में उलझ गये।’ इस ख्याल ने उसके पकडे जाने की प्रबल संभावना को धराशायी कर दिया। उसका सीना तेजी से ‘फुल-पिचक’ रहा था। दौड़ने के कारण पसलियों के पास वाले हिस्से में होने वाले दर्द के समाप्त होने तक उसने यथास्थान पर ही बैठ कर सुस्ताने का निर्णय लिया और आंखें बन्द कर ली। उसके जिस्म पर मौजूद कपड़े इस श्रेणी के नहीं थे कि उसे भगौड़ा या लुच्चा समझा जा सकता, किन्तु उसकी वर्तमान अवस्था इंगित कर रही थी कि वह तीन किलोमीटर से कम की दौड़ लगा कर नहीं आया था। झुग्गी-झोपडियों से भरी गली ये बताने के लिये पर्याप्त थी कि वह शहर का ‘स्लम’ एरिया था। गली में कोई आदमजात नजर आ नहीं आ रहा था। एक-दो कुत्ते जगह-जगह पर जमा गन्दगियों पर मुंह मारते हुए जरूर नजर आ रहे थे।
“वह आदमी इसी तरफ आया था यश।”
गली के सन्नाटे में उपरोक्त वाक्य के गूंजते ही खौफ की एक सर्द लहर आदमी के जिस्म में सरगोशी करती चली गयी। उसने आंखें खोली, और खुद को दीवार से चिपकाए हुए पीछे देखा। गली के जिस मोड़ पर इस वक्त वह था, उसके ठीक पहले वाले मोड़ पर दो आदमी नजर आ रहे थे। उनमें से एक सामान्य था, जबकि दूसरे की शारीरिक भाषा ऐसी थी, जैसे उसे ये संसार नया लग रहा हो। मोड़ पर आकर उनके ठिठक जाने की वजह ये थी कि उसी मोड़ से एक अन्य गली दूसरी दिशा में गयी थी। कदाचित वे इस इस सवाल में उलझ गये थे कि भागने वाला शख्स किस गली में गया होगा? जिस मोड़ पर वे दोनों थे, आदमी उसके ठीक बाद आने वाले मोड़ पर ही छिपा हुआ था। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि वे दोनों आपस में कुछ विचार करने के बाद उस गली में घुस गये, जो इस मोड़ के विपरित दिशा में गयी थी। ये चमत्कार होते ही भगौड़े ने चैन की सांस ली, किन्तु वह समझ चुका था कि बगैर गंतव्य तक पहुंचे ही ठहर जाना खतरे से खाली नहीं था, इसलिये वह उठा और अपनी मंजिल की ओर बढ़ चला। हालांकि वह दौड़ नहीं रहा था किन्तु उसके चाल की तेजी असाधारण थी।
करीब दस मिनट बाद वह एक झुग्गी के सामने पहुंचकर ठहरा। उसकी हालत अब पचहत्तर फीसदी सामान्य हो चुकी था। जिस झुग्गी के सामने पहुंचकर वह ठहरा था, वह भी गली के अन्य झुग्गियों जैसा ही था, यानी कि टिन की सीलिंग और पैरों का एक मजबूत प्रहार तक झेल पाने में अक्षम लकड़ी का दरवाजा।
ताला खोलने के ध्येय से आदमी ने जेब से चाबी निकाला तो जरूर लेकिन उस वक्त बुरी तरह उछल पड़ा जब पाया कि दरवाजे पर कोई ताला नहीं लटक रहा था। तात्पर्य ये था कि कोई उससे पहले ही अन्दर दाखिल हो चुका था। तेजी से धड़कते दिल के साथ उसने दरवाजा भीतर की ओर धकेला और अन्दर प्रविष्ट हुआ। अन्दर वही था, जिसके होने का अनुमान उसने उसी समय लगा लिया था, जब दरवाजे का ताला खुला हुआ पाया था।
“अरुणा दादी आप? इस समय?”
उस औरत की उम्र पचास वर्ष से अधिक थी, रंग निहायत ही गोरा था। बदन पर काले रंग की प्लेन साड़ी और दोनों भौहों के ठीक बीच में पचास पैसे के सिक्के के आकार वाली लाल रंग की साधारण सी बिन्दी थी। मांग सूनी थी। लम्बे काले और अधपके केश खुले हुए थे, जो पीछे कमर तक लटक रहे थे। गले में बड़े-बड़े मनकों वाली माला थी। आंखें सामान्य से अधिक आकार वालीं और काजल से परिपूर्ण थीं। देखने वाला पल भर में ही अनुमान लगा सकता था कि उसने काजल आंखों की खूबसूरती बढ़ाने के ध्येय से नहीं, अपितु उन्हें भयानक बनाने के ध्येय से लगाया था। वह दरवाजे के ठीक सामने पड़ने वाली दीवार से सटाकर रखी गयी लकड़ी की कुर्सी पर बैठी हुई थी। एक पैर को जमीन पर टिकाए हुई थी, जबकि दूसरे को घुटने से मोड़कर कुर्सी पर ही रखे हुए थी। उसके बाएं हाथ में एक लाठी थी, जिसका ऊपरी सिरा चमगादड़ की मुखाकृति वाला था। दाहिने हाथ में एक लंबा चाकू था, जिसके चमचमाते फल में वह अपना अक्स निहार रही थी। चेहरे पर व्याप्त भयानक क्रोध और असमान्य ढंग से काजल किये हुए आंखों के कारण उसका गोरा चेहरा डरावना हो उठा था। लगातार पान चबाने की आदी होने के कारण उसके होठों की सुर्खी कई गुना बढ़ी हुई थी। आदमी का सम्बोधन सुनकर ‘अरुणा दादी’ नामधारी उस भयानक औरत की दृष्टि सामने की ओर उठी।
“अ....आप...इस वक्त...?” आदमी हकला उठा।
“एक चाकू खरिदा है हमने।” अरुणा ने चाकू के फल पर अपनी उंगलियां फिराते हुए भयानक अंदाज में कहा- “हम इसके धार की जांच करना चाहते थे, इसीलिए यहां चले आए।”
“म....म....मैं....स....म....झा नहीं अरुणा दा....दी।” आदमी का हलक सूख गया।
चाकू के फल पर उंगलियां फिराने के कारण उनसे बह निकले खून को चाटते हुए अरुणा ने पूर्ववत् भयानक अंदाज में कहा- “कपाट बन्द करके हमारे पास आओ। ढंग से समझा देते हैं।”
आदमी शायद अरुणा का अंदाज देख कर भावी घटना की कल्पना कर चुका था। कपाट बन्द करके उसकी ओर बढ़ते हुए आदमी की टांगें कांपी। लम्बी दौड़ के बाद शक्ति क्षीण होने में जो कसर बाकी रह गयी थी, उसे अरुणा के खौफ ने पूरा कर दिया। आदमी के पीले चेहरे और कांपते बदन को देख ऐसा लगा मानो वह पचास वर्षीय किसी औरत की ओर नहीं, बल्कि अपनी मौत की ओर बढ़ रहा था।
“ज....जी अरुणा द...दा...दी।” अरुणा के सम्मुख पहुंचकर उसने थूक सटका।
“घुटनों पर बैठ जाओ।”
आदमी ने आदेश का पालन किया। अरुणा ने चाकू के फलक में फिर से अपना अक्स देखा, तत्पश्चात उसे आंखों के नजदीक ले जाकर धार की तीक्ष्णता को परखा और अगले ही पल आदमी के गले पर लाल रंग की पतली रेखा खींच गयी। एक सेकेण्ड से भी कम समय लगा उस आदमी को बेजान मुर्दे में तब्दील होने की राह पर अग्रसर होने में। उसके होंठों में कम्पन हुआ, किन्तु वह कम्पन को वाक्य में तब्दील कर सके, इसके लिये आवश्यक सामर्थ्य खो चुका था। पलकें खोले रखने का प्रयास किया किन्तु उसे ऐसा महसूस हुआ मानो पलकों पर मन भर वजनी पत्थर रख दिया गया हो। आदमी का बेजान जिस्म जमीन पर गिरता, इससे पहले ही अरुणा ने उसके लम्बे बालों को अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया। जिस्म जमीन पर गिरने के बजाय लहराकर रह गया। बन्द हो चुकी पलकों का कम्पन बता रहा था कि वह प्राणोत्सर्जन के अंतिम चरण में था।
“क्यों...?” अरुणा ने अधमरे आदमी के चेहरे पर इस कदर दृष्टिपात किया मानो वह जीवित हो। उसकी भावभंगिमाओं में तेजी से परिवर्तन हुआ। काजलयुक्त भयानक आंखों में लहू उतर आया। उसने इस कदर दांत पीसे मानो लफ्जों को उगलने से पहले चबाना चाहती हो- “क्यों तूने बेवकूफी कर दी भीमा? झुग्गी में रहने वाले तुझ जैसे दरिद्र को कैम्ब्रिज की चमक-धमक से रूबरू कराया हमने, क्या इसीलिये कि तू यश नाम के छोकरे की हत्या में विफल हो जाए? तेरी पहली खता को माफ करते हुए तुझे यश को ठिकाने लगाने के लिये यहां हिन्दुस्तान में दूसरा मौका दिया, क्या इसीलिये ताकि इस बार तू विफल होने के साथ-साथ उन दोनों को अपने ठिकाने का भी पता बता दे? नहीं भीमा, हमें तुझसे बहुत उम्मीदे थीं। हमारे पूर्वज राजमहल के तहखाने में कैद जिस अभिशाप के उपासक थे, उस अभिशाप को हम एक बार फिर राजमहल पर जलजला बनकर टूटते हुए देखना चाहते हैं, और इस काम में हमने तुझे सहयोगी के रूप में चुना था, लेकिन तू.....तू हमारा सहयोगी कहलाने की एक भी कसौटी पर खरा नहीं उतर पाया। कैम्ब्रिज में यश पर सार्वजनिक स्थल पर हमला करने की गलती करके तूने अपनी मूर्खता का पहला परिचय दिया, और फिर यहां हिन्दुस्तान में उसी गलती को दोहरा कर तूने अपनी मौत के फरमान पर दस्तखत कर दिये। तेरा अंजाम यही होना था, और हो भी गया।”
अरुणा ने भीमा का बाल छोड़ दिया, और उसका जिस्म कटे वृक्ष की मानिंद लहराकर जमीन पर गिर पड़ा। इसके बाद उसने चाकू पर लगा खून साड़ी में पोछा और उसकी नोक को भीमा के लहू में डूबोकर जमीन पर कुछ लिखने लगी।
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“वह आदमी इसी तरफ आया था यश।”
गली के सन्नाटे में उपरोक्त वाक्य के गूंजते ही खौफ की एक सर्द लहर आदमी के जिस्म में सरगोशी करती चली गयी। उसने आंखें खोली, और खुद को दीवार से चिपकाए हुए पीछे देखा। गली के जिस मोड़ पर इस वक्त वह था, उसके ठीक पहले वाले मोड़ पर दो आदमी नजर आ रहे थे। उनमें से एक सामान्य था, जबकि दूसरे की शारीरिक भाषा ऐसी थी, जैसे उसे ये संसार नया लग रहा हो। मोड़ पर आकर उनके ठिठक जाने की वजह ये थी कि उसी मोड़ से एक अन्य गली दूसरी दिशा में गयी थी। कदाचित वे इस इस सवाल में उलझ गये थे कि भागने वाला शख्स किस गली में गया होगा? जिस मोड़ पर वे दोनों थे, आदमी उसके ठीक बाद आने वाले मोड़ पर ही छिपा हुआ था। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि वे दोनों आपस में कुछ विचार करने के बाद उस गली में घुस गये, जो इस मोड़ के विपरित दिशा में गयी थी। ये चमत्कार होते ही भगौड़े ने चैन की सांस ली, किन्तु वह समझ चुका था कि बगैर गंतव्य तक पहुंचे ही ठहर जाना खतरे से खाली नहीं था, इसलिये वह उठा और अपनी मंजिल की ओर बढ़ चला। हालांकि वह दौड़ नहीं रहा था किन्तु उसके चाल की तेजी असाधारण थी।
करीब दस मिनट बाद वह एक झुग्गी के सामने पहुंचकर ठहरा। उसकी हालत अब पचहत्तर फीसदी सामान्य हो चुकी था। जिस झुग्गी के सामने पहुंचकर वह ठहरा था, वह भी गली के अन्य झुग्गियों जैसा ही था, यानी कि टिन की सीलिंग और पैरों का एक मजबूत प्रहार तक झेल पाने में अक्षम लकड़ी का दरवाजा।
ताला खोलने के ध्येय से आदमी ने जेब से चाबी निकाला तो जरूर लेकिन उस वक्त बुरी तरह उछल पड़ा जब पाया कि दरवाजे पर कोई ताला नहीं लटक रहा था। तात्पर्य ये था कि कोई उससे पहले ही अन्दर दाखिल हो चुका था। तेजी से धड़कते दिल के साथ उसने दरवाजा भीतर की ओर धकेला और अन्दर प्रविष्ट हुआ। अन्दर वही था, जिसके होने का अनुमान उसने उसी समय लगा लिया था, जब दरवाजे का ताला खुला हुआ पाया था।
“अरुणा दादी आप? इस समय?”
उस औरत की उम्र पचास वर्ष से अधिक थी, रंग निहायत ही गोरा था। बदन पर काले रंग की प्लेन साड़ी और दोनों भौहों के ठीक बीच में पचास पैसे के सिक्के के आकार वाली लाल रंग की साधारण सी बिन्दी थी। मांग सूनी थी। लम्बे काले और अधपके केश खुले हुए थे, जो पीछे कमर तक लटक रहे थे। गले में बड़े-बड़े मनकों वाली माला थी। आंखें सामान्य से अधिक आकार वालीं और काजल से परिपूर्ण थीं। देखने वाला पल भर में ही अनुमान लगा सकता था कि उसने काजल आंखों की खूबसूरती बढ़ाने के ध्येय से नहीं, अपितु उन्हें भयानक बनाने के ध्येय से लगाया था। वह दरवाजे के ठीक सामने पड़ने वाली दीवार से सटाकर रखी गयी लकड़ी की कुर्सी पर बैठी हुई थी। एक पैर को जमीन पर टिकाए हुई थी, जबकि दूसरे को घुटने से मोड़कर कुर्सी पर ही रखे हुए थी। उसके बाएं हाथ में एक लाठी थी, जिसका ऊपरी सिरा चमगादड़ की मुखाकृति वाला था। दाहिने हाथ में एक लंबा चाकू था, जिसके चमचमाते फल में वह अपना अक्स निहार रही थी। चेहरे पर व्याप्त भयानक क्रोध और असमान्य ढंग से काजल किये हुए आंखों के कारण उसका गोरा चेहरा डरावना हो उठा था। लगातार पान चबाने की आदी होने के कारण उसके होठों की सुर्खी कई गुना बढ़ी हुई थी। आदमी का सम्बोधन सुनकर ‘अरुणा दादी’ नामधारी उस भयानक औरत की दृष्टि सामने की ओर उठी।
“अ....आप...इस वक्त...?” आदमी हकला उठा।
“एक चाकू खरिदा है हमने।” अरुणा ने चाकू के फल पर अपनी उंगलियां फिराते हुए भयानक अंदाज में कहा- “हम इसके धार की जांच करना चाहते थे, इसीलिए यहां चले आए।”
“म....म....मैं....स....म....झा नहीं अरुणा दा....दी।” आदमी का हलक सूख गया।
चाकू के फल पर उंगलियां फिराने के कारण उनसे बह निकले खून को चाटते हुए अरुणा ने पूर्ववत् भयानक अंदाज में कहा- “कपाट बन्द करके हमारे पास आओ। ढंग से समझा देते हैं।”
आदमी शायद अरुणा का अंदाज देख कर भावी घटना की कल्पना कर चुका था। कपाट बन्द करके उसकी ओर बढ़ते हुए आदमी की टांगें कांपी। लम्बी दौड़ के बाद शक्ति क्षीण होने में जो कसर बाकी रह गयी थी, उसे अरुणा के खौफ ने पूरा कर दिया। आदमी के पीले चेहरे और कांपते बदन को देख ऐसा लगा मानो वह पचास वर्षीय किसी औरत की ओर नहीं, बल्कि अपनी मौत की ओर बढ़ रहा था।
“ज....जी अरुणा द...दा...दी।” अरुणा के सम्मुख पहुंचकर उसने थूक सटका।
“घुटनों पर बैठ जाओ।”
आदमी ने आदेश का पालन किया। अरुणा ने चाकू के फलक में फिर से अपना अक्स देखा, तत्पश्चात उसे आंखों के नजदीक ले जाकर धार की तीक्ष्णता को परखा और अगले ही पल आदमी के गले पर लाल रंग की पतली रेखा खींच गयी। एक सेकेण्ड से भी कम समय लगा उस आदमी को बेजान मुर्दे में तब्दील होने की राह पर अग्रसर होने में। उसके होंठों में कम्पन हुआ, किन्तु वह कम्पन को वाक्य में तब्दील कर सके, इसके लिये आवश्यक सामर्थ्य खो चुका था। पलकें खोले रखने का प्रयास किया किन्तु उसे ऐसा महसूस हुआ मानो पलकों पर मन भर वजनी पत्थर रख दिया गया हो। आदमी का बेजान जिस्म जमीन पर गिरता, इससे पहले ही अरुणा ने उसके लम्बे बालों को अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया। जिस्म जमीन पर गिरने के बजाय लहराकर रह गया। बन्द हो चुकी पलकों का कम्पन बता रहा था कि वह प्राणोत्सर्जन के अंतिम चरण में था।
“क्यों...?” अरुणा ने अधमरे आदमी के चेहरे पर इस कदर दृष्टिपात किया मानो वह जीवित हो। उसकी भावभंगिमाओं में तेजी से परिवर्तन हुआ। काजलयुक्त भयानक आंखों में लहू उतर आया। उसने इस कदर दांत पीसे मानो लफ्जों को उगलने से पहले चबाना चाहती हो- “क्यों तूने बेवकूफी कर दी भीमा? झुग्गी में रहने वाले तुझ जैसे दरिद्र को कैम्ब्रिज की चमक-धमक से रूबरू कराया हमने, क्या इसीलिये कि तू यश नाम के छोकरे की हत्या में विफल हो जाए? तेरी पहली खता को माफ करते हुए तुझे यश को ठिकाने लगाने के लिये यहां हिन्दुस्तान में दूसरा मौका दिया, क्या इसीलिये ताकि इस बार तू विफल होने के साथ-साथ उन दोनों को अपने ठिकाने का भी पता बता दे? नहीं भीमा, हमें तुझसे बहुत उम्मीदे थीं। हमारे पूर्वज राजमहल के तहखाने में कैद जिस अभिशाप के उपासक थे, उस अभिशाप को हम एक बार फिर राजमहल पर जलजला बनकर टूटते हुए देखना चाहते हैं, और इस काम में हमने तुझे सहयोगी के रूप में चुना था, लेकिन तू.....तू हमारा सहयोगी कहलाने की एक भी कसौटी पर खरा नहीं उतर पाया। कैम्ब्रिज में यश पर सार्वजनिक स्थल पर हमला करने की गलती करके तूने अपनी मूर्खता का पहला परिचय दिया, और फिर यहां हिन्दुस्तान में उसी गलती को दोहरा कर तूने अपनी मौत के फरमान पर दस्तखत कर दिये। तेरा अंजाम यही होना था, और हो भी गया।”
अरुणा ने भीमा का बाल छोड़ दिया, और उसका जिस्म कटे वृक्ष की मानिंद लहराकर जमीन पर गिर पड़ा। इसके बाद उसने चाकू पर लगा खून साड़ी में पोछा और उसकी नोक को भीमा के लहू में डूबोकर जमीन पर कुछ लिखने लगी।
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