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Horror ख़ौफ़

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नरभेड़िया मात्र एक-दो डग में ही साहिल के नजदीक पहुंच गया। उसने उसका बाल बायीं मुट्ठी में जकड़ा और दाहिने हाथ में थमी कटार को हवा में लहराया। मौत को चंद लम्हों की दूरी पर पाकर साहिल ने आँखें बंद कर ली। कुछ क्षणों बाद उसका सिर धड़ से अलग होकर नर-भेड़िये की हाथ में थमा रह जाने वाला था।

साहिल का जेहन ज्ञानशून्य हो गया। बाकी इंसानों की तरह उसने भी कभी कल्पना नहीं की थी कि मौत उसे इतनी आसानी से निगल जायेगी। बंद आँखों के अँधेरे में उसे अपना अतीत याद आने लगा।

किन्तु!

इससे पहले कि वह ढंग से चीख भी न पाता और उसका धड़ प्राणविहीन होकर हवा में लहरा कर जमीन पर गिर पड़ता; एक चमत्कार हो गया। साहिल को महसूस हुआ कि उसके बाल नर-भेड़िये की मुट्ठी से आजाद हो गये हैं।

पहले तो उसे यकीन नहीं हुआ कि ऐसा हुआ है, किन्तु जब यकीन हो गया तो उसने धीरे-धीरे आँखें खोली।

अकल्पनीय घटना घटी थी। नर-भेड़िया साहिल से दस कदमों की दूरी पर धरातल पर पड़ा था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी के शक्तिशाली पदाघात ने उसे रुई के ढेर की भांति हवा में उछल दिया था। वह साहिल को ही देख रहा था। उसकी खौफनाक आँखों में साहिल को जरूर भय नजर आता, अगर उसकी आँखें अंगारों सी सुर्खी न लिए होतीं तो।

साहिल के जिस्म में कम्पन्न हुआ। उसने साँसों को नियंत्रित करने का प्रयास किया, क्योंकि उसके हांफने का स्वर रात के सन्नाटे में खौफनाक रूप अख्तियार कर रहा था। उसकी भयभीत निगाहें नर-भेड़िये पर ठहरी हुई थीं, क्योंकि वह जानता था कि नर-भेड़िया अचानक हुए हमले से हार नहीं मान सकता है। वह दोबारा जरूर झपटेगा।

“अ...आप ठीक तो हैं न साहिल?”

उसके पीछे से संस्कृति की आवाज आयी।

‘स..संस्कृति यहाँ कैसे आयी?’

विचित्र से तरद्दुद में फंसे साहिल ने धीरे-धीरे गर्दन पीछे घुमाई।

पीछे वास्तव में संस्कृति ही थी। उसके हाथ में टॉर्च था। चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे वह खुद भी नहीं समझ पायी हो कि थोड़ी देर पहले जो कुछ हुआ वह कैसे हुआ। हैरत-अंगेज बात ये थी कि उसकी दाहिनी कलाई के स्वास्तिक से तीव्र चमक फूट रही थी। साहिल समझ गया कि उछल कर दूर गिरने के बाद नरभेड़िये की निगाह उस पर नहीं बल्कि उसके पीछे खड़ी संस्कृति पर ठहरी हुई थी।

साहिल ने खड़े होने की कोशिश की, किन्तु अत्यधिक भय और बदन की थरथराहट के कारण उसका प्रयास विफल हो गया।

संस्कृति खौफजदा निगाहें नरभेड़िये पर केन्द्रित किये हुए साहिल की ओर बढ़ी। नरभेड़िया, जो अभी तक धरातल पर पड़ा हुआ था, उसे अपने शिकार की ओर बढ़ता देख उछल कर उठ खड़ा हुआ। संस्कृति सहम कर यथास्थान पर ठहर गयी। टॉर्च की रोशनी को सामने रखने के उपक्रम में उसकी दाहिनी कलाई का रुख नरभेड़िये की ओर हुआ और स्वास्तिक से फूटती चमक तीव्र हो उठी।

नरभेड़िया चाँद की ओर देख कर गरजा। संस्कृति के देखते ही देखते रोंगटे खड़े कर देने वाला चमत्कार हुआ। धवल चाँदनी का एक कतरा ज्यों ही नरभेड़िये की आँखों से टकराया, त्यों ही वह चिंघाड़ उठा। उसकी चिंघाड़ में पीड़ा का समावेश था। पल भर के अंतराल में ही वह नरभेड़िये का रूप त्याग कर अपने मानस रूप में आ गया। हालांकि उसकी आँखें अब भी भेड़िये की आँखों जैसी ही थीं।

“हाथ नीचे करो माया। हमारा शरीर तप रहा है।” अभयानन्द ने दोनों हाथों से स्वास्तिक से बचने का प्रयत्न करते हुए कहा।

संस्कृति ने स्वास्तिक पर नजर डाली। स्वास्तिक यूं चमक रहा था, जैसे अँधेरे में ग्लोइंग टैटूज चमकते हैं।

“मैं माया नहीं हूँ।” स्वास्तिक की शक्ति पर यकीन होते ही संस्कृति का लहजा आत्मविश्वास से परिपूर्ण हो उठा।

“तुम माया हो।” अभयानन्द चीख कर एक तने की ओट में हो गया। और फिर बगैर संस्कृति के सामने आये बोला- “हमें राजा उदयभान ने पीपल से बांधकर अग्नि को समर्पित कर दिया था, क्योंकि उनकी दृष्टि में हमने तुमसे प्रेम करने का दुस्साहस किया था। हमारे जिस दुस्साहस की लिए हमें दण्डित किया गया था, वही दुस्साहस दोहराने के लिए हम वापस आये हैं।”

संस्कृति ने एक नजर साहिल पर डाली, जो खड़े होने की कोशिश करता नजर

आ रहा था।

“मैं किसी उदयभान को नहीं जानती। मुझे नहीं मालूम कि तुम कौन हो? मेरा पीछा छोड़ दो। प्लीज लीव मी!”

“आंग्ल भाषा का प्रयोग मत करो। हमें घृणा है इस भाषा से।” अभयानन्द का क्रोध-मिश्रित स्वर।

“तुम्हारे साथ जो कुछ भी हुआ था उसकी वजह माया थी?”

“हाँ! माया ही थी वजह। माया अर्थात तुम। राजमहल के खानदान में सैकड़ों साल पहले तुमने ही जन्म लिया था। उदयभान तुम्हारे पिता थे।”

संस्कृति को आगे बोलने के लिए कोई वाक्य नहीं मिला। जिस संभावना को वह पहले ही लगभग स्वीकार कर चुकी थी, उस संभावना पर सत्यता की मुहर लगी तो वह चाहकर भी अभयानन्द के दावों निराधार साबित न कर सकी।

“तुम ही माया हो।” संस्कृति को खामोश पाकर अभयानन्द का लहजा उत्साहित हो उठा- “तुम हमारे लिए ही वापस आयी हो। हमारी अतृप्त इच्छा को पूर्ण करने हेतु नया जन्म लिया है तुमने।”
 
“तुमने यश के साथ ऐसा क्या किया है, जो उसकी चेतना चली गयी है? तुम राजमहल में रखे ताबूत में कैसे पहुंचे? तुम इंसान से ब्रह्मराक्षस कैसे बने?......”

संस्कृति अपने जेहन में मचल रहे सभी सवालों को एक-एक करके उगल देती, यदि अभयानन्द ने उसे वाक्य अधूरा छोड़ने पर विवश न किया होता तो।

“हमारा प्रेम-अनुरोध स्वीकार कर लो। हम तुम्हारे समस्त प्रश्नों के उत्तर दे देंगे।”

“अ...अगर मैंने यह अनुरोध स्वीकार नहीं किया तो तुम क्या करोगे मेरे साथ?”

“हम तुमसे सम्बन्ध रखने वाले प्राणियों के जीवन को यातनामय बना देंगे। तब तक उन्हें प्रताड़ित करेंगे जब तक कि तुम हमारी योनि अर्थात ब्रह्मराक्षस योनि स्वीकार नहीं कर लोगी।”

“नहीं!” अभयानन्द की कुत्सित मंशा जानकर संस्कृति दहल गयी- “मैं तुम्हें ऐसा नहीं करने दूंगी।”

“तुम अज्ञानता के वशीभूत होकर हमसे वार्तालाप कर रही हो माया। यदि हमारे सामर्थ्य और क्रोध की पराकाष्ठा का आंकलन करना चाहती हो तो राजमहल के संग्रहण-कक्ष में रखे शंकरगढ़ के इतिहास के उस रक्तिम अध्याय को पढ़ो, जो हमने शंकरगढ़ के सैकड़ों पशुओं और नागरिकों के रक्त से लिखा है। अथवा अपने कुलगुरू से उस भयावह रक्तपात की गाथा सुनो, जो श्मशान में सजीवन की हत्या से प्रारंभ होकर द्विज की हत्या पर समाप्त हुआ था।”

“व....वापस चलो संस्कृति।” साहिल अब उठ खड़ा हुआ था। उसने हांफते हुए कहा- “यह दरिन्दा तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। तुम्हारी दाहिनी कलाई का स्वास्तिक तुम्हारी सुरक्षा के लिए ही है। शायद कोई था, जो ये बात जानता था कि ये शैतान वापस लौटेगा, इसीलिये उसने तुम्हें यह सुरक्षा चिह्न दिया है।”

“इतनी बड़ी भूल मत करना माया। अन्यथा एक बार पुन: हमारा पशु-रूप नरभेड़िया काल के रूप में शंकरगढ़ में तांडव करेगा। एक बार पुन: शंकरगढ़ के वासी रात्रि में घरों से बाहर निकलना बंद कर देंगे। एक बार पुन: उन्हें अभयानन्द की चीखें सुनाई देंगी। एक बार पुन: मृत्यु उनके घरों के द्वार खटखटायेगी।”

“तुम ऐसा नहीं कर सकते।”

“हम करेंगे। अपनी अतृप्त इच्छा की पूर्ति के लिए हम ऐसा ही करेंगे। शंकरगढ़ वासियों के प्राण अब तुम्हारे निर्णय पर टिके हुए हैं माया। हम तुम्हें आठ पहर का समय देते हैं। यदि तुम समर्पण हेतु तैयार हो जाना तो मरघट के उजाड़ मंदिर में आकर अपने निर्णय से हमें अवगत करा देना। यदि आठ पहर व्यतीत हो जाने के पश्चात तुम मंदिर में नहीं आयी तो हम तुम्हारे इस कृत्य को तुम्हारी अस्वीकृति समझेंगे और उसी रात्रि शंकरगढ़ में एक भेड़िया-मानव कटार लेकर आएगा।”

संस्कृति एक बार फिर कुछ बोल पाने की स्थिति में नहीं थी। उसकी दृष्टि उस तने पर ठहरी रही, जिसके पीछे अभयानन्द छिपा हुआ था। काफी समय व्यतीत हो गया लेकिन अभयानन्द की आवाज दोबारा नहीं आयी।

“ल...लगता है वह चला गया।” साहिल ने कहा। अब वह काफी हद तक संयत हो चुका था।

साहिल का स्वर कानों में पड़ते ही संस्कृति की तन्द्रा भंग हुई। वह उसके समीप पहुँची।

“आप...आप ठीक तो हैं न?”

साहिल के गले पर गहरे खरोंच थे। कुहनी छिल गयी थी। चेहरे पर भी हल्के-फुल्के घाव नजर आ रहे थे।

“जान बचाने के लिए शुक्रिया।” साहिल ने गहरी सांस लेते हुए कहा- “मौत को पहली बार इतने करीब से देखा मैंने। लेकिन तुम यहाँ तक पहुँची कैसे?”

“मुझे ठीक वैसा ही एहसास हुआ, जैसा वैभव की मौत की रात हुआ था। मुझे लगा आज रात फिर कुछ होने वाला है। फिर मुझे याद आया कि आज रात आप मरघट में आने वाले थे, इसीलिये मैं बेचैन होकर राजमहल से यहाँ के लिए निकल पड़ी। अगर मैंने पल भर की भी देरी की होती तो.....!”

“क्या ये बात किसी को मालूम है?”

“नहीं! मैंने किसी को नहीं बताया है। अन्यथा कोई मुझे आने ही नहीं देता।”

“उसने तुम्हें निर्णय के लिए आठ पहर का समय दिया है।”

“आठ पहर यानी कि चौबीस घंटे?”

“हाँ! तुम्हारे इनकार की दशा में वह शंकरगढ़ में एक बार फिर वही तबाही मचाएगा, जो शायद उसने सैकड़ों साल पहले मचायी थी।”

“ओह माय गॉड! अब मुझे क्या करना होगा?” संस्कृति का बदहवास स्वर।

“तुम्हारे पास दो रास्ते हैं। या तो तुम खुद को शैतान की बाँहों में सौंप दो, या फिर शंकरगढ़ को तबाही के रास्ते पर धकेल दो।”

“मैं इन दोनों में से कोई रास्ता अख्तियार नहीं कर सकती। न तो मैं शैतान की माशूका बन सकती हूँ, और न ही अपने गाँव में उस शैतान को तबाही का आमंत्रण दे सकती हूँ। मेरी सेफ्टी के लिए मेरे पास स्वास्तिक है, लेकिन मेरे गाँव के लोगों के पास सेफ्टी के लिए कुछ नहीं है।”

“हमारे पास एक तीसरा रास्ता भी है।”

“क्या है वह रास्ता?” संस्कृति उतावले लहजे में बोली।

“हमें चौबीस घंटे के अन्दर शैतान को ख़त्म करना होगा।”

“बट हाउ कैन इट बी पॉसिबल?”
 
“हमें पहले अभयानन्द की पूरी कहानी जाननी होगी। इसके लिए हमारे पास दो रास्ते हैं। पहला ये कि हम राजमहल में रखा शंकरगढ़ का इतिहास पढ़ें और दूसरा ये कि तुम किसी ऐसे पैरासाइकोलॉजिस्ट का सेशन अटेंड करो, जो पास्ट लाइफ रिग्रेशन में स्पेशलिस्ट हो।”

“यानी कि आपको यकीन हो चुका है कि मैं ही माया थी?”

“क्या तुम्हें अब भी यकीन नहीं है?”

संस्कृति कुछ नहीं बोली।

“देखो संस्कृति! हमारे पास वक्त बहुत कम है। तुम्हारे पिछले जन्म के बारे में जानने के लिए हम हस्तलिखित पांडुलिपियों को खंगालने में समय नहीं गंवा सकते हैं। ऐसे में हमारे पास केवल यही रास्ता बचता है कि हम किसी पैरासाइकोलॉजिस्ट के पास जायें।”

“अभयानन्द आपसे क्या पूछ रहा था?”

“द्विज नाम के किसी व्यक्ति का पता पूछ रहा था। मैंने जो संभावना व्यक्त की थी, वह संभावना सच निकली। अभयानन्द और माया के बीच कोई तीसरा भी था, और उस तीसरे का नाम द्विज था। मुझे सब-कुछ समझ में आ गया है।” साहिल इस कदर चहका मानो उसने कोई बहुत बड़ी गुत्थी सुलझा ली हो। वह पूर्ववत अंदाज में आगे कहता चला गया- “यश पर दो बार हुए हमले का कारण मुझे समझ में आ गया है। यश ही पिछले जन्म में वह द्विज था, जो अभयानन्द के अलावा माया का दूसरा प्रेमी था। इस जन्म में अभयानन्द अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी यश यानी कि पिछले जन्म के द्विज को अपने रास्ते से हटाना चाहता है, इसके लिए वह साधारण आदमियों की मदद ले रहा है क्योंकि जो स्वास्तिक तुम्हारी दाहिनी कलाई पर बना है, वही स्वास्तिक यश की कलाई पर भी बना हुआ है। अभयानन्द, यश को स्वयं अपने हाथों से नहीं ख़त्म कर सकता है। शायद यही वजह है जो यश पर हुए दोनों हमले जानलेवा तो थे, किन्तु उन्हें अंजाम देने वाला साधारण इंसान ही था।”

“मुझे आपकी थ्योरी में झोल नजर आ रहा है।” संस्कृति ने सोचने का उपक्रम करते हुए कहा- “अभयानन्द तब वजूद में आया जब राजमहल के रहस्यमयी तहखाने से ताबूत निकाला गया। जबकि यश की याद्दाश्त तो उससे पहले ही गुम हुई है। यहाँ तक की उस पर दोनों हमले भी अभयानन्द के जागने से पहले ही हुए है। ऐसे में हम ये कैसे मान लें कि यश पर हुए हमले और उसकी याद्दाश्त जाने के पीछे अभयानन्द है?”

“शायद तुम उस औरत को भूल रही हो संस्कृति, जिसने जानबूझकर मुझे और यश को हमलावर की लाश का पता बताया था।”

“ओह!” संस्कृति को मानो पल भर में ही सब-कुछ स्पष्ट हो गया- “इसका मतलब ये हुआ कि यश की याद्दाश्त जाने से लेकर अभयानन्द को जगाने तक में उस रहस्यमयी औरत का ही हाथ है।”

“यस! वह औरत ही है जो हमें रहस्य की तह तक पहुंचा सकती है।”

“लेकिन हम उस औरत को ढूंढेंगे कहाँ?”

“हमें उसे ढूँढने की जरूरत नहीं है। अब उस औरत के आदमी खुद हम पर नजर रखेंगे, क्योंकि अभयानन्द को मैंने अभी तक यश का ठिकाना नहीं बताया है। अभयानन्द किसी भी कीमत पर यश तक पहुंचना चाहेगा, और उसे यश तक पहुंचाने के चक्कर में वह औरत कम से कम एक बार हमारे सामने जरूर आयेगी। लेकिन पहले मुझे तुम्हारे और यश के पिछले जन्म की कहानी मालूम करनी है, क्योंकि पिछले जन्म की कहानी में ही इन सवालों के जवाब छिपे हुए हैं कि अभयानन्द ने किस प्रकार द्विज को मौत के घाट उतारा? उसके प्रकोप को किस प्रकार शांत किया गया था? जो ताबूत तहखाने से बरामद हुआ, उस ताबूत के तहखाने में होने के पीछे क्या रहस्य था? और उस ताबूत में आखिर था क्या? द्विज और अभयानन्द के बाद माया का क्या हुआ?”

“लेकिन मुझे मेरा पिछला जन्म कैसे याद आएगा?”

“मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ संस्कृति कि इसके लिए हमें किसी पैरासाइकोलॉजिस्ट की कंसल्टेंसी की जरूरत होगी। मैं तुम्हें पहले भी बता चुका हूँ कि मैं एक ऐसे पैरासाइकोलॉजिस्ट के बारे में जानता हूँ, जो पास्ट लाइफ रिग्रेशन में दक्ष हैं। वे इलाहाबाद और प्रतापगढ़ के बीच पड़ने वाले एक छोटे से कस्बे राजगढ़ में रहकर प्रैक्टिस करते हैं।”

“तो फिर हम राजगढ़ के लिए कब निकालेंगे?”

“अभी!”

“अभी?” संस्कृति चौंकी।

“हाँ, अभी! ये मत भूलो कि हमारे पास सिर्फ चौबीस घंटे हैं। अगर हमने चौबीस घंटों में पिछले जन्म की ये गुत्थी नहीं सुलझाई तो शंकरगढ़ ब्रह्मराक्षस के जबड़ों में समा जाएगा।”

संस्कृति दुविधा में फंसी नजर आने लगी।

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8

“असंभव!”

अभयानन्द ने चिंघाड़ते हुए मन्दिर के खम्भे पर एक शक्तिशाली प्रहार किया। जर्जर खम्भा प्रहार सह नहीं सका और ध्वस्त हो गया। खम्भे और छत से ईंट-पत्थर उखड़कर अभयानन्द के ऊपर गिरे। वह चोटिल हुआ किन्तु उसके मुंह से ‘शी’ तक की आवाज न निकली। जिस्म में लेशमात्र भी जुम्बिश न हुई।

अरुणा सिहर उठी। कुछ अभयानन्द के क्रोध से तो कुछ इस भय से कहीं उसकी क्रोधाग्नि पूरे मन्दिर को न नष्ट कर दे।

“शांत हो जाइए प्रभु।” अरुणा विनीत स्वर में बोली- “ये पराजय नहीं है आपकी। हम संस्कृति की कलाई पर मौजूद सुरक्षा चिह्न का कोई उपाय ढूंढ़ निकालेंगे।”

“संस्कृति नहीं....।” अभयानन्द यूं चीखा मानो मेघ गरजे हों- “वह माया है। वही माया जिसके साथ हमारे संसर्ग की लालसा अधूरी रह गयी थी, जिसे हम अपनी भैरवी बनाने में विफल रहे थे।”

“मैं क्षमाप्रार्थी हूँ प्रभु। मुझे ज़रा भी भान नहीं था कि जो सुरक्षा चिह्न द्विज के नए जन्म की कलाई पर है, वही माया के नए जन्म की कलाई पर भी होगा।”

“प्रश्न ये है अरुणा कि वह सुरक्षा चिह्न माया की कलाई पर आया कैसे? अघोरनाथ ने तो सुरक्षा चिह्न द्विज को दिया था, फिर वह माया की कलाई पर कैसे आ सकता है? अगर पिछले जन्म में द्विज ने अघोरनाथ के दिए हुए सुरक्षा चिह्न का स्वयं उपयोग न करके उसे माया को सौंप दिया था तो फिर नए जन्म में द्विज की कलाई पर वह कैसे आया?” अभयानन्द के मुखमंडल पर अरुणा को पहली दफा उलझन नजर आयी, अन्यथा इससे पूर्व उसने उसके चेहरे पर क्रोध का धधकता ज्वालामुखी ही देखा था। अभयानन्द ने आगे कहा- “सुरक्षा चिह्न केवल एक था। उसे या तो द्विज की कलाई पर होना चाहिए था या फिर माया के, लेकिन वास्तविकता ये है कि सुरक्षा चिह्न माया और द्विज दोनों की कलाई पर है। कैसे? कैसे संभव है ऐसा?”

जवाब की आशा में उसने अरुणा की ओर देखा, किन्तु अरुणा के चेहरे पर ऐसे कोई भाव नहीं थे जिससे अभयानन्द को लगता कि उसे जवाब मालूम है।

“हमें आशंका हो रही है अरुणा कि हमारे साथ षडयंत्र हुआ है।”

“कैसा षडयंत्र प्रभु?”

“जब हम माया से वार्तालाप कर रहे थे तो उस युवक ने, जो इस जन्म में द्विज का भाई है, कहा था, ‘यह दरिन्दा तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। तुम्हारी दाहिनी कलाई का स्वास्तिक तुम्हारी सुरक्षा के लिए ही है। शायद कोई था जो ये बात जानता था कि ये शैतान वापस लौटेगा, इसीलिये उसने तुम्हें यह सुरक्षा चिह्न दिया है।’ हमें उसके द्वारा व्यक्त की गयी संभावना सत्य प्रतीत हो रही है अरुणा। अघोरी ने हमारे साथ षडयंत्र रचा है। संभवत: उसे ये अनुमान हो चुका था कि कापालिकों का गौण नामक जो वंश हमारे दमन के पश्चात बिखर गया था, उसी वंश की कापालिका भविष्य में हमारे पुनरोत्थान का कारण बनेगी, इसलिए उसने षडयंत्र रचा। वह इस तथ्य से अवगत था कि स्वास्तिक नामक पवित्र चिह्न हमारी दुर्बलता का कारण है। यदि माया की कलाई पर वह चिह्न होगा तो हम उसे बलपूर्वक ब्रह्मपिशाच योनी अपनाने हेतु बाध्य नहीं कर पायेंगे, यही सोचकर उसने माया की कलाई पर पवित्र चिह्न के रूप में जन्म-जन्मान्तर तक न मिटने वाली अमिट छाप छोड़ दी।”

“ये..ये आपके उद्देश्य में बाधक है प्रभु। हमें तो अब-तक यही ज्ञात था कि पवित्र चिह्न की अमिट छाप केवल द्विज की कलाई पर है, इसलिए हम आपके जागने से पूर्व द्विज के नए जन्म यश को मार्ग से हटाकर आपके उद्देश्य तक पहुँचने का निष्कंटक मार्ग तैयार करना चाहते थे, किन्तु अब ऐसा प्रतीत होने लगा है कि मात्र द्विज के नए जन्म को मार्ग से हटाकर आपका उद्देश्य पूर्ण नहीं होगा।”

“पूर्ण होगा।” अभयानन्द के हलक से पैशाचिक गुर्राहट निकली- “हमारा उद्देश्य पूर्ण होगा। अघोरी ने माया को सुरक्षा चिह्न अवश्य दिया है, किन्तु अब वह स्वयं तो उसके साथ नहीं है न। हमारे संकेत पर शंकरगढ़ में मृत्यु का तांडव शुरू होगा। उस तांडव पर अंकुश लगाने के लिए माया स्वयं ही विवश होकर उस पवित्र चिह्न की उपेक्षा करेगी। और उसकी उपेक्षा से चिह्न की पवित्रता नष्ट हो जायेगी। तुम केवल आठ पहर की प्रतीक्षा करो अरुणा। उसके पश्चात यदि माया ने समर्पण नहीं किया तो मानव-रक्त की छींटों से शंकरगढ़ की धरती रक्त-वर्ण हो उठेगी। मरघट में आने वाली चिताओं की लपटों से दिशाएं जल उठेंगी।”

अरुणा के चेहरे पर भयानक मुस्कान काबिज हो गयी। उसकी आँखें उस दृश्य की कल्पना में खो गयीं, जिसमें एक खौफनाक नरभेड़िया अपनी भयानक कटार से शंकरगढ़ के लोगों को मुंडविहीन कर रहा था।

“किन्तु...!” अभयानन्द के हस्तक्षेप से अरुणा की कल्पना में विघ्न पड़ गया- “किन्तु अरुणा ये स्मरण रहे कि द्विज को मार्ग से हटाना है क्योंकि यदि उसके नए जन्म यश को पूर्वजन्म की गाथा का स्मरण हो गया तो संभव है कि वह एक बार पुन: हमें चिरनिद्रा में सुलाने का विकल्प ढूंढ ले, जैसा उसने पूर्वजन्म में किया था।”

“अवश्य प्रभु। मैं कल ही अपने आदमियों को यश की तलाश में फैला दूंगी।”

“अपने सहयोगियों को अन्यत्र भेजने की आवश्यकता नहीं है अरुणा। उन्हें केवल द्विज के इस जन्म के भाई साहिल पर दृष्टि रखने के लिए कहो। द्विज का पता स्वयं ज्ञात हो जाएगा।”

“जो आज्ञा प्रभु!”

अभयानन्द के चेहरे पर एक बार फिर वही खौफनाक भाव नजर आने लगा, जो थोड़ी देर पहले गहरे उलझनों के नीचे दब गया था।

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“ठण्ड लग रही है?”

‘हाँ’ में जवाब पाकर उस बारह वर्षीय बालक ने अपना कम्बल उतारकर एक छोटे बच्चे के बदन से लपेट दिया।

“अब भी लग रही है?”

छोटे बच्चे ने ‘ना’ में गर्दन हिलाई।

“भूख भी लगी है?”

इस बार भी उस छोटे बच्चे ने ‘ना’ में गर्दन हिलाई।

‘कौन हैं ये दोनों?’

अँधेरे में खड़ा यश बुदबुदाया। वह उन दो बच्चों को देख रहा था, जिनमें से एक आगे-आगे मशाल लेकर चल रहा था और दूसरा, जो आयु में उससे छोटा था, उसके पीछे-पीछे चल रहा था।

थोड़ी देर बाद दोनों बच्चे आराम करने के उद्देश्य से मुख्य मार्ग से उतरकर एक पेड़ के नीचे आ गये। बड़े ने साफ़-सुथरी जगह देखकर छोटे को बैठा दिया और मशाल की सहायता से थोड़ी दूर पर आग जला दिया। अभी कुछ ही क्षण बीते थे कि वे दोनों चौंककर दक्षिण दिशा में देखने लगे। उन्हें शायद कोई आवाज सुनाई पड़ी थी। हालाँकि अँधेरे में खड़े यश को कोई आवाज नहीं सुनाई दी थी।

‘आखिर..आखिर ये दोनों हैं कौन?’ यश ने एक बार फिर स्वयं से सवाल किया।

उसके देखते ही देखते बड़े बच्चे ने छोटे को कुछ समझाया और मशाल लेकर दक्षिण दिशा में चला गया। उसके जाने के बाद छोटा बच्चा सोने का प्रयत्न करने लगा।

‘मुझे इस छोटे बच्चे से पूछना चाहिए।’

मन में उठे विचार को साकार रूप देने के लिए वह अँधेरे से बाहर निकलकर छोटे बच्चे की ओर बढ़ा। छोटा कम्बल में मुंह छुपाये सोने की कोशिश कर रहा था। यश ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया ही था कि अचानक वहां मौजूद अलाव की रोशनी गायब हो गयी और परिवेश में गहन अंधकार छा गया।

यश का दिमाग जब कुछ सोचने के काबिल हुआ तो उसे महसूस हुआ कि वह बिस्तर पर था और आँखों के आगे अँधेरा इसलिए था क्योंकि वह कमरे का बल्ब ऑफ़ करके सोया था।

‘तो क्या ये एक सपना था?’

यश बिस्तर से उठा और अँधेरे में टटोलकर बल्ब ऑन किया। वह कमरे में ही था। उसने सचमुच सपना देखा था।

‘क्या वजह हो सकती है इस सपने की?’

उसने स्टडी टेबल पर रखे कांच के जग का पानी गिलास में उड़ेला और एक ही साँस में पी गया। प्यास बुझाने के दौरान उसने उस हल्के दर्द को नजरअंदाज कर दिया, जो ठीक उस जगह पर हो रहा था जहाँ गर्दन और कंधे का जोड़ होता है।

इस वक्त वह गाँव में था। साहिल ने घर के किसी भी सदस्य पर ये नहीं जाहिर किया था कि यश अपनी पहचान गँवा चुका है। उसने यश को भी समझाया था कि वह परिवार के सदस्यों के प्रति अपने व्यवहार से ये दर्शाने की कोशिश करे कि वह सामान्य है और बस थोड़ा सा बीमार है। ये यश के लिए आसान नहीं था, फिर भी साहिल ने इसे कुछ हद तक आसान बनाने की कोशिश जरूर की थी। जैसे कि उसने फोटो एल्बम के जरिये उसे पहले ही ये बता दिया था कि परिवार के किस सदस्य से उसका क्या रिश्ता है। वापस शहर लौटने से पहले उसने उसे घर का नक्शा भी ढंग से समझा दिया था। लोग यश से अधिक बातचीत न कर सके इसके लिए उसने उन्हें हिदायत दी थी कि यश बीमार है और डॉक्टर ने उसे बिना किसी व्यवधान के ज्यादा से ज्यादा समय तक आराम करने की सलाह दी है। दिखावे के लिए वह शहर से कुछ टेबलेट्स भी लेता आया था, जो रंग-बिरंगी टॉफियों के अलावा कुछ नहीं थे। हालांकि यश को ये सब बेहद अजीब लग रहा था। उसे बार-बार ये एहसास सता रहा था कि वह अजनबियों के बीच है, फिर भी उसका पिछला पूरा दिन आराम से गुजरा था। रात का खाना उस स्त्री ने उसके बेडरूम में ही पहुंचा दिया था, जो साहिल के अनुसार उन दोनों की माँ थीं।

प्यास बुझने के बाद यश का ध्यान दर्द की ओर गया, जो हर गुजरते क्षण के साथ बढ़ता जा रहा था। उसने गर्दन पर हाथ फेरा। उसने इसे एक ही पोजीशन में देर तक सो लेने के कारण होने वाला सामान्य दर्द समझकर नजरअंदाज करना चाहा, किन्तु न कर सका, क्योंकि दर्द ऐसा था जैसे कोई नश्तर गर्दन और कंधे के जोड़ वाले स्थान पर धंसाया जा रहा हो। जिस अनुपात में दर्द की तीव्रता बढ़ रही थी, उससे अनुमान लगता था कि हर लम्हें के साथ नश्तर मांस में गहराई तक उतरता जा रहा था। थोड़े समय बाद ही दर्द असहनीय सीमा तक तीव्र हो उठा।

‘उफ़! ये अचानक दर्द कैसे शुरू हो गया?’

यश गर्दन पकड़कर बिस्तर पर बैठ गया। दर्द अब उसके बर्दाश्त की सीमा लांघने लगा था। उसकी सांसें तेज और जिस्म पसीने से तर होने लगा।

‘आह!’

वह तड़प उठा। उसे महसूस हुआ जैसे दर्द वाले हिस्से से मांस का लोथड़ा काट कर बाहर निकाला जा रहा हो। कपड़े पसीने से लगातार भीगते जा रहे थे। साँसों की रफ़्तार में त्वरित वृद्धि हो रही थी। गर्दन पकड़े हुए ही उसने आदमकद आईने पर नजर डाली। सीलिंग फैन के पूरी गति से चलने के बावजूद भी पसीने से लथपथ अपना चेहरा देख वह घबरा गया।

‘मुझे प्राकृतिक वायु की जरूरत है।’

वह जैसे-तैसे बिस्तर से उठा। खिड़की तक पहुंचा। खिड़की खोलते ही उसे ताजी हवा की ठंडक महसूस हुई। बेचैनी और दर्द के बीच उसे वही राहत मिली, जो किसी को गहरे घाव पर औषधि में डूबी रुई का फाहा रखने पर मिलती है।

बाहर वातावरण में पूर्णमासी की चाँदनी छिटकी हुई थी। हल्के-फुल्के बादल क्षणिक अंतराल पर चाँद के ऊपर से तैर कर गुजर जा रहे थे, किन्तु इससे चाँद की दुधिया चाँदनी पर कोई असर नहीं पड़ रहा था।

जल्द ही यश का पसीना सूख गया। इस बीच आश्चर्यजनक ढंग से उसका दर्द भी यूं गायब हो चुका था, जैसे पहले कभी रहा ही न हो।

‘कमाल है! चाँद की रोशनी पड़ते ही दर्द गायब हो गया?’

सुखद आश्चर्य में डूबकर यश ने गर्दन पर हाथ फेरा। दर्द अब पूरी तरह ख़त्म हो चुका था। तो क्या पूनम के इस चाँद की रोशनी में कोई औषधीय प्रभाव घुला हुआ था? यश को फिलहाल इस सवाल के जवाब से कोई मतलब नहीं था, क्योंकि दर्द से निजात पाने के बाद उसके अंग यूं शिथिल पड़ गये थे, जैसे दिन-भर दिहाड़ी करके आने वाला कोई मजदूर चारपाई पर निढाल होकर पड़ जाता है।

खिड़की बंद करके वह बिस्तर पर आ गया।

‘सपने में नजर आये दोनों लड़के कौन थे? उन्हें कैसी आवाज सुनाई दी थी? क्या बड़ा लड़का फिर वापस उस जगह पर लौटा होगा? मेरे कंधे में अचानक दर्द क्यों उठा? चाँद की रोशनी पड़ते ही दर्द गायब कैसे हो गया?

सामान्य परिस्थितियों में यश शायद उस सपने को साधारण सपना समझकर ख़ारिज कर देता, लेकिन मौजूदा हालात इस पक्ष में गवाही नहीं दे रहे थे कि वह सपना साधारण था। बहरहाल उपरोक्त सवालों पर विचार करते-करते उसकी नींद उचट चुकी थी। अब दोबारा आने की संभावना भी नहीं थी। उसने समय काटने के संसाधन की तलाश में कमरे में नजर दौड़ाई। कंप्यूटर टेबल पर मौजूद प्रिंटर में लगे

सादे कागजों पर दृष्टि पड़ते ही उसे सुकून का एहसास हुआ।

वह बिस्तर से उतरा। टेबल तक पहुंचा और पेपरवेट के नीचे से एक कागज़ निकाल लिया। थोड़ी देर बाद ही कलम की नोक उसकी उँगलियों के इशारे पर पन्ने पर थिरक रही थी। जैसे-जैसे कलम की नोक थिरकती गयी वैसे-वैसे सादे कागज पर एक आकृति जन्म लेती गयी।

लगभग दस मिनट बाद जब यश ने अपनी ओर से उस स्केच को मुकम्मल मान लिया तो उसे गौर से देखा।

“ये..ये क्या बना डाला मैंने?”

अनजाने में ही यश ने ऐसा कुछ बना डाला था, जिसे देखने के बाद उसकी स्वयं की आँखों में भी दहशत भरती चली गयीं।

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जिस समय साहिल, संस्कृति को लेकर इलाहाबाद पहुंचा उस समय शहर जम्हाई ले रहा था, पूरी तरह जगा नहीं था।

साहिल संस्कृति को साथ लेकर मरघट से सीधे शंकरगढ़ रेलवे स्टेशन पहुंचा था। हालांकि शंकरगढ़ कोई बड़ा रेलवे स्टेशन नहीं था, तथापि साहिल को भरोसा था कि वहां से इलाहाबाद जाने का कोई रास्ता निकल ही आएगा। साहिल का भरोसा नहीं टूटा था। उसे एक ऐसा ऑटोवाला मिल गया था, जो शाम के वक्त किसी सवारी को छोड़ने स्टेशन आया था, किन्तु वापसी में सवारी न मिलने के कारण रात स्टेशन पर ही रुक गया था और सुबह की सवारी लेकर इलाहाबाद के लिए निकलने वाला था।

साहिल के अनुरोध पर वह दोगुने किराए में उन्हें इलाहाबाद छोड़ने के लिए राजी हो गया था और इस प्रकार वे दोनों तीन बजे तक सिविल लाइन्स इलाहाबाद पहुंच गये। साहिल के कहने पर संस्कृति ने राजमहल के मुख्य गेट पर एक खत छोड़ दिया था, जिसमें उसने स्पष्ट लिख दिया था कि वह कहां और किस उद्देश्य से जा रही है।

साहिल, संस्कृति को लेकर फ्लैट पर पहुंचा।

“आप अभी तक बैचलर हैं?” फ्लैट पर ताला लगा देख संस्कृति ने पूछा।

“क्या मैं तुम्हें शादीशुदा लगता हूं?” साहिल ताले में चाबी लगाते हुए

मुस्कुराया।

जब संस्कृति को सुझा ही नहीं कि क्या जवाब दे तो साहिल ने दरवाजा भीतर की ओर धकेलते हुए स्वयं ही कहा- “दरअसल घर में सबसे बड़ा होने के कारण दबाव तो बहुत है। मम्मी हर रोज शिकायत करती है कि उसे खाना बनाने में दिक्कत होती है, लेकिन मैं शादी को टालने की कोशिश कर रहा हूं। दरअसल ये फ्लैट किराए का है और मैंने सोच रखा है कि जब तक खुद का फ्लैट, एक फोरव्हीलर और स्विट्जरलैण्ड में हनीमून मनाने के लिए पर्याप्त बैलेंस नहीं इकट्ठा कर लेता, तब तक शादी नहीं करूंगा।”

“वाऊ!” संस्कृति साहिल के साथ ही अन्दर दाखिल हुई- “काफी एम्बिसियस हैं आप।”

“होना ही चाहिए। एम्बिशन्स ही तो हैं, जो हमारी लाइफ में थ्रिल भरते हैं, वरना विदाउट एनी एम्बिशन जीने वाले बन्दों की लाइफ तो किसी बोरिंग नॉवेल जैसी ही होती है। और वैसे भी जो चीजें लाइफ में केवल एक बार होने वाली हैं, उन्हें ग्रैण्ड तरीके से ही करना चाहिए।”

साहिल ने लैपटॉप बैग सोफे पर पटका और किचन की ओर संकेत करते हुए कहा- “किचन उस साइड है। अगर तुम चाहो तो मेरे फ्रेश होने तक चाय बना सकती हो।”

“जरूर। लेकिन शर्त है कि आपके किचन में ओवन होना चाहिए, क्योंकि मुझे लाइटर जलाने में डर लगता है।”

“ओह! रियली?” साहिल ने उसे हैरत से घूरा।

“हम्म! बचपन से ही। मैं तो अभी तक इस बात को लेकर हैरान हूं कि मैं लालटेन लेकर तहखाने में कैसे उतर गयी थी?”

“कोई बात नहीं। वैसे मेरे पास ओवन है बट मैं वापस आकर खुद बना लूंगा। तुम तब तक मेरे लैपटॉप में मौजूद फाल्गुनी पाठक के सांग्स सुन सकती हो। मैंने सुना है कि ये मैक्सिमम्मी लड़कियों की फेवरिट सिंगर हैं।”

कहने के बाद साहिल वाशरूम की ओर बढ़ गया।

लगभग आधे घण्टे बाद वे दोनों फ्रेश होकर एक साथ चाय सिप कर रहे थे। साथ ही साथ साहिल अपने लैपटॉप का कोई फोल्डर भी खंगाल रहा था।

“क्या ढूंढ रहे हैं आप?” संस्कृति ने चाय का आखिरी घूँट भर कर कप को प्लेट में रख दिया।

“डॉक्टर पुष्कर त्रिवेदी का कांटेक्ट। दरअसल डॉक्टर पुष्कर मेरे रेगुलर क्लाइंट हैं और मैं अपने रेगुलर क्लाइंट्स की कांटेक्ट डिटेल्स लैपटॉप में सेव रखता हूँ।”

“रेगुलर क्लाइंट्स मतलब?”

“उनके कॉन्फ्रेंस या सेमिनार के लिए एड मटेरियल हमेशा मैं ही डिजाइन करता हूँ। उनके वेबसाइट की थीम डिजाइनिंग से लेकर ग्राफिक डिजाइनिंग तक मैंने ही किया है। इमरजेंसी एपॉइन्मेण्ट लेने के लिए मैं उनसे पर्सनली कांटेक्ट करना चाहता हूँ।”

“ओह!”

साहिल को अभीष्ट फाइल ढूँढने में अधिक वक्त नहीं लगा। उसने लैपटॉप के डिस्प्ले पर नजर आ रहे कांटेक्ट नंबर को सेलफोन पर उतारा और ‘एक्सक्यूज मी’ बोल कर बाहर चला गया।

दस मिनट बाद जब वह वापस आया तो उसके चेहरे पर प्रसन्नता थी।

“गुड न्यूज़ संस्कृति! तुम्हारे केस में डॉक्टर पुष्कर की दिलचस्पी जगाने में मैं सफल रहा। शायद इसकी वजह ये है कि डॉक्टर पुष्कर की अब तक की प्रैक्टिस के दौरान पहली बार उनके पास सही मायने में रीइनकारनेशन का कोई केस आया है।”

“तो क्या आपने उन्हें सब-कुछ बता दिया? आई मीन अभयानन्द के बारे में भी?”

“नहीं! मैंने उन्हें वेयरवुल्फ के बारे में नहीं बताया, क्योंकि इससे कोई फायदा नहीं होता। एक डॉक्टर ऐसी बातों पर कभी यकीन नहीं करेगा। मैंने उनसे केवल इतना कहा है कि राजमहल के छुपे हुए तहखाने में तुम्हें किसी के हांफने का डरावना स्वर सुनाई दिया था। तहखाने में उतरने के बाद तुम्हें पता चला कि आवाज तहखाने में रखे ताबूत से आ रही थी, जिसके अनुसार तुम अपने पिछले जन्म में किसी की प्रेमिका थी। पुनर्जन्म सिद्धांत की समर्थक होने के कारण तुम उनका पास्ट लाइफ रिग्रेशन सेशन अटैंड करने की इच्छुक हो।”

“टाइम क्या दिया है उन्होंने?”

“हमें उनकी ओपीडी शुरू होने के समय ही जाना होगा। चूंकि प्रत्यागमन के लिए पेशेंट को गहरे सम्मोहन की अवस्था में जाना होता है, इसलिए मनोचिकित्सक सबसे पहले ये सुनिश्चित करता है कि पेशेंट दिमागी तौर पर इस हेतु तैयार है या नहीं। इसके लिए सम्बंधित व्यक्ति को मानासिक परीक्षणों की एक श्रृंखला से गुजरना होता है। इस प्रक्रिया के पूर्ण होने में और रिपोर्ट आने में दो से तीन घंटे का वक्त लगता है। इसके बाद अब यह रिपोर्ट पर निर्भर करता है कि पेशेंट का प्रत्यागमन सत्र तुरंत शुरू किया जाएगा या उसे कुछ मनोवैज्ञानिक सलाह देकर नेक्स्ट फॉलो अप के लिए बुलाया जाएगा।”

“इसका मतलब कि ये श्योर नहीं है कि मेरा सेशन आज से ही शुरू होगा।”

“हमें प्रे करना चाहिए कि ऐसा न हो क्योंकि तुम्हारे नेक्स्ट फॉलो अप तक सबकुछ तबाह हो चुका होगा।”

“अगर मेरा सेशन आज हो भी गया तो इस बात की क्या गारंटी है कि हम उस ब्रह्मराक्षस को रोक ही लेंगे?”

संस्कृति के चेहरे पर गहरा अवसाद छा गया।

“सकारात्मक सोचो संस्कृति। आमानवीय ताकतों से युद्ध के दौरान सकारात्मक सोच और संकल्प ही परिणाम के निर्णायक होते हैं, क्योंकि ये हमारे अन्दर छुपी हुई ईश्वरीय शक्तियों को जगाते हैं। हमारे दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति की ही देन है, जो आज हम चाँद पर पहुँच चुके हैं, ब्रह्माण्ड में व्याप्त ऊर्जा का उपयोग करना सीख चुके हैं और नंगी आँखों से नजर तक न आने वाले एक शुक्राणु से मानव-शरीर के बनने की पूरी प्रक्रिया समझ चुके हैं।”

“हम यहाँ से कब निकलेंगे?”

साहिल की बातों से संस्कृति को कुछ तसल्ली हुई थी।

“डॉक्टर की ओपीडी आठ बजे शुरू होती है। यहाँ से राजगढ़ पहुँचने में एक घंटा लगता है।”

“यानी कि हमें सात बजे निकलना होगा।”

“हाँ! और सात बजने तक मैं एक जरूरी काम फिर से करना चाहता हूँ।”

साहिल अपनी जगह से उठा। संस्कृति को उसका जरूरी काम तब समझ में आया, जब उसने यश का बैग लाकर सोफे पर पटक दिया।

“मैं यश के लगेज की तलाशी लेना चाहता हूँ। हालाँकि ये काम मैं पहले भी कर चुका हूँ लेकिन तुम्हारे सामने एक बार फिर करना चाहता हूँ। हो सकता है, जो मुझे नजर नहीं आया वह तुम्हें नजर आ जाए।”

साहिल ने बैग का चेन खोला।

उसमें बस कुछ किताबें और नोटबुक्स ही थे। सेम बैकग्राउण्ड की होने के कारण संस्कृति ने उत्सुकतावश उन्हें उलटपलट कर देखा। वे सभी रिफरेंन्स बुक्स थीं, यानी कि उसके स्तर से ऊपर की चीज।

“इसमें तो केवल रिसर्च की किताबें और नोट्स ही हैं। मुझे इनमें ऐसा क्या नजर आ सकता है, जो हमारी तलाश के लिए फायदेमन्द होगा?”

“ध्यान से देखो संस्कृति।” साहिल ने बैग की किताबों को एक-एक करके बाहर निकालते हुए कहा- “यश इसी बैग के साथ कैम्ब्रिज से लौटा था। उसके कपड़ों का बैग अलग था। उसके साथ जो कुछ भी हुआ है, कैम्ब्रिज में हुआ है, यानी कि उस जगह पर जहां से तुम लम्बा वक्त गुजार कर लौटी हो। मुझे ये उम्मीद है कि तुम्हें इन नोट्स और किताबों में कुछ ऐसा दिख सकता है, जो कैम्ब्रिज से जुड़ा होगा और जिसे हम सूत्र के रूप में इस्तेमाल करके आगे बढ़ सकते हैं।”

“ओह!”

साहिल का मंतव्य समझकर संस्कृति उन नोट्स और किताबों को गम्भीरता पूर्वक उलटने-पलटने लगी।

बीस मिनट गुजर गये।

“मुझे तो इस बार भी कुछ नजर नहीं आया।”

साहिल ने गहरी सांस लेकर स्पाइरल बाइण्डिंग वाली एक नोटबुक को सेंटर टेबल पर पटक दिया।

“एक मिनट!” किसी अन्य किताब के पन्ने पलट रही संस्कृति सेंटर टेबल पर पड़े उस नोटबुक को देखते ही चौंकी।

उसने हाथ में मौजूद किताब को एक तरफ रखा और उस नोटबुक को उठा लिया, जिसे थोड़ी देर पहले साहिल देख रहा था।

“कुछ नजर आया क्या?” साहिल ने उतावले लहजे में पूछा।

संस्कृति की निगाहें नोटबुक के आखिरी सादे पन्ने पर लिखे टैक्स्ट पर ठहरी हुई थीं। दरअसल वह किसी वेबपेज का एड्रेस था, जिसके ठीक नीचे एक आईडी और पासवर्ड लिखा हुआ था।
 
संस्कृति की निगाहें नोटबुक के आखिरी सादे पन्ने पर लिखे टैक्स्ट पर ठहरी हुई थीं। दरअसल वह किसी वेबपेज का एड्रेस था, जिसके ठीक नीचे एक आईडी और पासवर्ड लिखा हुआ था।

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“य....ये यहां कैसे आ गया?” संस्कृति के स्वर में हैरत थी।

“क्या तुम इस वेबपेज के बारे में कुछ जानती हो?”

साहिल, संस्कृति को उस वेब एड्रेस और लॉग इन क्रेडेंशियल्स में रुचि लेता देख, कोई सूत्र हाथ लगने को लेकर आशान्वित हो उठा।

साहिल की आशा मिथ्या नहीं थी। सचमुच एक सूत्र हाथ लगा था। बहुत बड़ा सूत्र।

“हां!” संस्कृति ने मानो कोई विस्फोट किया- “दरअसल यह कैंब्रिज में ही मौजूद एक फेमस स्प्रिचुअल सेंटर है, जो सेंट जोहन्स कॉलेज के पास है। वहां ज्यादातर ऐसी सिचुएशन्स को हैंडल किया जाता है, जिनका मेडिकल साइंस के पास कोई एक्सप्लानेशन नहीं होता है।”

“ओह! इसका मतलब मेरा अनुमान सही था। यश के साथ कुछ ऐसा हुआ था, जिसका मेडिकल साइंस के पास भी कोई जवाब नहीं था। इसलिए उसे स्प्रिचुअल हीलिंग की जरूरत पड़ी थी।”

“यानी कि वैसा ही कुछ, जैसा मेरे साथ हो रहा है।”

“हाँ!” साहिल ने वेब एड्रेस और लॉग इन क्रेडेंशियल्स पर दृष्टिपात किया- “अब सवाल ये है कि उस स्प्रिचुअल हीलिंग का क्या नतीजा निकला था? और फिर यदि यश इतने बड़े स्प्रिचुअल सेंटर में इलाज के लिए गया था तो मुझे उसके सामान में ट्रीटमेंट से जुड़ा कोई डाक्यूमेंट क्यों नहीं मिला? जैसे फॉलो अप के

डिटेल्स, टेस्ट्स की रिपोर्ट वगैरह।”

“स्प्रिचुअल हीलिंग सेंटर्स में किसी मेंटल इलनेस या फिर पैरानॉर्मल कंडीशन को ट्रीट करने का वहां के एक्सपर्ट्स का अपना तरीका होता है। वे किसी फिजिकल इंस्ट्रूमेंट्स के जरिये बॉडी का चेकअप नहीं करते हैं। बॉडी से निकलने वाली माइक्रोवेब्ज की फ्रीक्वेंसी को महसूस करके वे प्रेडिक्ट करते हैं कि पेशेंट की बीमारी की असली वजह क्या है? मैं इस तरह की स्ट्रेंज ट्रीटमेंट प्रोसीजर पर विश्वास नहीं करती। यश के पास से उस हीलिंग सेंटर से जुड़े किसी डिटेल्स के न मिलने का एक रीजन ये भी हो सकता है कि वह नहीं चाहता था कि लोगों को उसकी मेंटल इलनेस के बारे में पता चले।”

“उसने हीलिंग सेंटर वाली बात कोमल से भी छिपाई थी क्योंकि कोमल ने मुझे इस बारे में कोई इनफ़ॉर्मेशन नहीं दी थी।” साहिल नीचले होठों को दांतों तले दबाकर कुछ सोचता रहा फिर उसने संस्कृति की ओर देखा- “तो क्या यश ने हीलिंग सेंटर में हुए अपने ट्रीटमेंट के सभी पेपर्स कैंब्रिज में ही नष्ट कर डाले होंगे।”

“नहीं! मेरा अनुमान कहता है कि उसने अपने ट्रिटमेन्ट का कोई फिजिकल डॉक्यूमेन्ट अपने पास रखा ही नहीं था।”

“ऐसा कैसे हो सकता है? एट लिस्ट पेमेन्ट्स के रिसिप्ट्स तो उसके पास होने चाहिए थे।”

“आप इस लॉग इन क्रेडेंशियल को भूल रहे हैं। हमारे सवालों के जवाब उस स्प्रिचुअल हीलिंग सेंटर की वेबसाइट पर मिलेंगे।”

साहिल संस्कृति का मंतव्य नहीं समझ पाया। जबकि संस्कृति ने लैपटॉप अपनी ओर खींच लिया।

“क्या आप अपने मोबाइल का हॉटस्पॉट ऑन कर सकते हैं।”

“ऑफकोर्स!”

संस्कृति ने लैपटॉप को हॉटस्पॉट के नेटवर्क से कनेक्ट किया और क्रोम ब्राउजर के एड्रेस बार में ‘स्प्रिचुअल हीलिंग सेंटर’ का वेब एड्रेस टाइप कर दिया।

वेब पेज खुलते ही उसने ‘लॉग इन’ आइकन पर क्लिक किया और यश के नोटबुक से बरामद हुए लॉग इन इन्फॉर्मेशन की मदद से वह लॉग इन करने में सफल भी हो गयी।

साहिल की समझ में जब सारा माजरा आया, तो उसकी आंखें हैरत और प्रसन्नता से फैलती चली गयीं। लॉग्ड इन होने के बाद खुलने वाले पेज पर साहिल और संस्कृति के सामने उनके सभी सवालों के जवाब थे।

“बड़े हॉस्पिटल्स या हीलिंग सेन्टर्स में पेशेन्ट की टेस्ट्स रिपोर्ट, फॉलो अप डिटेल्स और एडवाइजेज वगैरह चीजें वेबसाइट पर उनके एकाउण्ट में फीड कर दी जाती हैं, जिन्हें जरूरत पड़ने पर कभी भी एक्सेस किया जा सकता है। उस हीलिंग सेंटर में भी ऐसी ही व्यवस्था है। इसीलिए यश ने अपने पास कोई फिजिकल डॉक्यूमेन्ट नहीं रखा। केवल एक जगह पर लॉग इन क्रेडेंशियल्स को नोट कर लिया था।”

मॉनिटर पर नजर आ रहा वेबपेज यश के एकाउण्ट का था, जिसमें न केवल उसकी बीमारी, बल्कि हर फॉलो अप के रिपोर्ट की भी पीडीएफ फाइल थी।

“मैं इन डाक्यूमेंट्स को डाउनलोड कर लेती हूं।”

संस्कृति ने साहिल की प्रतिक्रिया का इन्तजार किये बिना ही एक सेपरेट फोल्डर बनाकर उन डाक्यूमेन्ट्स को सेव कर लिया।

“अब हमारे सामने सारे सीक्रेट्स खुलने वाले हैं। मैं एक-एक करके इन फाइल्स को देखती हूं।”

संस्कृति रोमांचित हो उठी थी। जबकि साहिल उसके प्रजेन्स ऑफ माइण्ड की मन ही मन तारिफ कर उठा था। संस्कृति ने सबसे पहले यश के व्दारा भरे गये रजिस्ट्रेशन फॉर्म की पीडीएफ खोली।

“ओह!” फॉर्म देखते ही उसने एक ठण्डी आह भरी।

“क्या हुआ?”

“यश का केस पास्ट लाइफ से जुड़े केसेज हैंडल करने वाले डिपार्टमेंट को फॉरवर्ड किया गया था।”

“व्हाट?”

“यस। रजिस्ट्रेशन फॉर्म में फिल्ड डिटेल्स यही कह रहे हैं। ये देखिए।” संस्कृति ने फॉर्म के टॉप के राइट कॉर्नर में सेंटर की ओर से भरे गये केस नम्बर की ओर संकेत करते हुए कहा- “पीएलएस वन नाइन थ्री फोर! उसका केस नम्बर ही लॉग इन पासवर्ड है। पीएलएस मतलब पास्ट लाइफ सिम्प्टम्स। केस नम्बर के नीचे डिपार्टमेन्ट का नाम भी लिखा है।”

“तो क्या उसके साथ भी तुम्हारे जैसी ही कोई घटना घटी थी, जो उसका केस ऐसे डिपार्टमेंट को फॉरवर्ड किया गया?”

“कोई भी पेशेंट रजिस्ट्रेशन फॉर्म के साथ या तो किसी डॉक्टर का रेफरल लैटर अटैच करता है या फिर सिम्प्टम्स के कॉलम में अपनी प्रॉब्लम फील करता है। यश ने एरिया ऑफ़ प्रॉब्लम के कॉलम में लिखा है कि उसे कोई सपना बार-बार परेशान करता है। चूंकि सपनों को अक्सर पास्ट लाइफ से जोड़कर देखा जाता है, इसलिए उसका केस पास्ट लाइफ से जुड़े केसेज हैंडल करने वाले डिपार्टमेंट को फॉरवर्ड कर दिया गया था।”

“क्या था वह सपना?”

“इसके लिए मुझे फॉलो अप की फाइल देखनी होगी।”
 
संस्कृति ने दूसरा फाइल खोला।

“ये पहले फॉलो अप की रिपोर्ट है। उसकी कंसल्टेंट मिस मार्था थीं। इस रिपोर्ट के अनुसार वह सपने में दो बच्चों को रात के अँधेरे में कहीं जाते हुए देखता था। थोड़ी देर बाद बड़ा बच्चा छोटे को एक पेड़ के नीचे बैठाकर किसी आवाज का पीछा करने चला जाता था। उसके जाने के बाद यश जब छोटे बच्चे से कुछ पूछने के लिए आगे बढ़ता था तो उसकी नींद खुल जाती थी।”

“और कुछ भी लिखा है?”

“हाँ!” संस्कृति ने फाइल का अवलोकन करते हुए कहा- “आगे जो कुछ भी लिखा है, वह अनबिलिवेबल है।”

“ये तो होना ही है। सब-कुछ अनबिलिवेबल ही तो है।”

“इसमें लिखा है कि जब सपने के कारण यश की नींद खुलती थी तो वह अपने गर्दन और कंधे के जोड़ पर ऐसा दर्द महसूस करता था, जैसे वहां से मांस काटकर बाहर निकाला जा रहा हो।”

“ओह!”

“जो बात हैरान करती है वह ये है कि जब यश बेचैन होकर होटल के कमरे से निकलकर कॉरिडोर में टहलने लगता था तो चाँद की रोशनी में उसका दर्द गायब हो जाता था। केस सुनने के बाद मिस मार्था ने उसे हीलिंग सेंटर में ही मैन्युफैक्चर्ड कुछ इंसेन्स स्टिक्स दिये थे। एडवाइज के तौर पर उन्होंने उन इंसेन्स स्टिक्स को कमरे में जलाने के लिए कहा था। मिस मार्था ने अपने एक्सपीरियेन्स के आधार पर ये कन्क्लुड किया था कि यश किसी डॉर्क एनर्जी के कांटैक्ट में है। और वे स्टिक्स उन डॉर्क एनर्जी के प्रभाव को खत्म कर देंगे। उन्होंने नेक्स्ट फॉलो अप के लिए उसे एक हफ्ते बाद बुलाया था। नेक्स्ट फॉलो अप के दौरान क्या पता चला था, ये जानने के लिए उस फॉलो अप की रिपोर्ट देखती हूं।”

संस्कृति केवल तब तक के लिए खामोश रही, जब तक नेक्स्ट फाइल को ओपन नहीं कर ली। टैक्स्ट पर नजर फिराते हुए उसने कहा- “इंसेन्स स्टिक्स का यश पर कोई प्रभाव नहीं हुआ था। जब वह दोबारा मिस मार्था से मिला था तो उसके पास चार स्केचेज थे। उसने मिस मार्था को बताया था कि उसे खुद भी नहीं मालूम कि उसने ये स्केचेज कैसे बना लिए? बस टाइम पास के लिए उसके अन्दर स्केचिंग की इच्छा जगी थी और वे चार स्केचेज वजूद में आ गये थे।”

“ये वही स्केचेज रहे होंगे, जो हम पहले भी देख चुके हैं।”

“मैं उन स्केचेज की डिस्क्रिप्शन पढ़ती हूँ।”

डिस्क्रिप्शन पढ़ने के बाद संस्कृति ने साहिल की संभावना पर सत्यता की

मुहर लगा दी।

“हाँ! वही स्केचेज थे।”

“फॉलो अप रिपोर्ट में क्या दर्ज है?”

“मिस मार्था ने उसे एडवाइस के तौर पर पास्ट लाइफ रिग्रेशन सेशन अटैंड करने को कहा था। उन्हें ये कन्फर्म हो चुका था कि यश को दिखाई देने वाले सपने और सपने के तुरंत बाद होने वाले गर्दन के दर्द का सम्बन्ध उन यादों से था, जो आज भी उसके सबकॉन्शियस माइंड के किसी हिस्से में दफ़न हैं।”

संस्कृति ने अगले पीडीऍफ़ डॉक्यूमेंट को ओपन किया। इस डॉक्यूमेंट में पेजों की संख्या पूर्ववर्ती डाक्यूमेंट्स के पेजों से कहीं ज्यादा थी। संस्कृति ने उन डाक्यूमेंट्स को दस मिनट तक गौर से पढ़ा। जब प्रतीक्षा साहिल के धैर्य से अधिक बढ़ गयी, तो उससे रहा न गया- “क्या लिखा है?”

“ये उन तीन सेशंस की रिपोर्ट है, जो यश ने चार-चार दिन के अंतराल पर अटैंड किये थे। उसे हर सेशन में अलग-अलग विजन नजर आये थे। पहले सेशन में उसने ह्यूमन सैक्रीफाइस जैसा हॉरिबल सीन देखा था।”

“ह्यूमन सैक्रीफाइस यानी नरबली?”

“हाँ! एग्जॉर्सिस्ट आई मीन तांत्रिक जैसे कुछ लोग वेयरवुल्फ की स्टेच्यू के सामने एक इंसान के अंगों को काट रहे थे। नेक्स्ट विजन में उसे पूरी तरह जल चुके एक इंसान को देखा था। शायद वह जिन्दा था क्योंकि एक दूसरा आदमी उसके जिस्म पर दवा का लेप कर रहा था।”

“क्या विजन में यश ने उस आदमी का चेहरा देखा था?”

“नहीं! रिपोर्ट में लिखा है कि उस विजन में आदमी की पीठ यश की ओर थी और वह उसका चेहरा नहीं देख पाया था।”

“तीसरे विजन में क्या देखा था उसने?”

“तीसरे विजन में उसे एक लड़की जिन्दा जलती हुई नजर आयी थी। उसका पूरा जिस्म आग की गिरफ्त में था” कहने के बाद संस्कृति ने एक लम्बी सांस ली और साहिल की ओर मुखातिब हुई- “हीलिंग सेंटर की ओर से यश के अकाउंट में बस इतने ही डाक्यूमेंट्स अपलोड किये गये हैं।”

“ह्यूमन सैक्रीफाइस! पूरी तरह जला हुआ इंसान! जलती हुई लड़की! आखिर ये विजंस यश की पास्ट लाइफ से किस प्रकार कनेक्टेड हो सकते हैं?”

“अभी बहुत सारी कड़ियाँ छूटी हुई हैं। ये तो श्योर है कि ये विजंस यश की पास्ट लाइफ के ही हैं, लेकिन अभी फिलहाल इन विजंस को लेकर किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता है।”

“यश ने इसके बाद कोई सेशन क्यों नहीं अटैंड किया था?”

“पता नहीं!” संस्कृति ने लैपटॉप के मॉनिटर की ओर देखा- “तीन दिन बाद उसे नेक्स्ट सेशन के लिए बुलाया गया था लेकिन वह गया नहीं था।”

“ओह!”

उन दोनों के बीच अब खामोशी काबिज हो गयी।

“मुझे लगता है कि डॉक्टर पुष्कर का सेशन अटैंड करने के बाद अगर मुझे कोई विजन नजर आता है तो उसे यश के विजन के साथ को-रिलेट करके किसी कन्क्लूजन पर पहुंचा जा सकता है।”

साहिल ने वालक्लॉक की ओर देखा। छ: बज चुका था।

 
9

‘मुझे नहीं मालूम कि एक अनजान आदमी पर भरोसा करके उसके साथ जाने को आप क्या समझेंगे लेकिन ये जरूर मालूम है कि मैंने अनजाने में ही सही किन्तु समय के सीने में दफन एक पुराने रहस्य को छेड़ने का जो दुस्साहस किया है, उसका अंजाम शंकरगढ़ के लोग न भुगतें, इसके लिए मेरा साहिल के साथ जाना जरूरी है।

शैतान ने मुझे केवल चौबीस घण्टे का अल्टीमेटम दिया है। इन चौबीस घण्टों में मुझे कुछ सवालों के जवाब ढूंढ़ने हैं और इसी के लिए मुझे अभी आधी रात से ही एक अनजान सफर पर रवाना होना पड़ रहा है। मैं शहर जा रही हूँ। मुझे कोई अन्दाजा नहीं है कि जब मैं चौबीस घण्टे बाद उस सफर से लौटूंगी तो मेरे हाथ में शंकरगढ़ की तबाही का फरमान होगा या फिर ब्रह्मराक्षस की मौत का।’

संस्कृति

अरुणोदय ने संस्कृति का लिखा ख़त पढ़ कर ड्राइंग हाल में मौजूद लोगों को सुनाया। नौकरों के सिवाय वहां राजमहल का प्रत्येक सदस्य उपस्थित था।

“आधी रात?” चंद्रोदय ने दिग्विजय की ओर उन्मुख होते हुए कहा- “तो क्या वह आधी रात को ही उस शहरी लड़के के साथ चली गयी?”

दिग्विजय ने कुछ नहीं कहा। उनका मुखमंडल ये आभास करा रहा था कि वे संस्कृति के कृत्य को सही या गलत की श्रेणी में रखने को लेकर असमंजस में थे। यही हाल बाकी सदस्यों का भी था।

“अनजान सफ़र, शंकरगढ़ की तबाही, चौबीस घंटे का अल्टीमेटम।” झुंझलाये हुए दिग्विजय की निगाहें कर सुजाता पर ठहर गयीं- “आखिर क्या है ये सब? आधी रात को कहाँ चली गयी तुम्हारी बेटी?”

सभी लोग सुजाता को यूं देखने लगे मानो उन्हें संस्कृति के जाने के विषय में सबकुछ मालूम हो, जबकि वास्तविकता ये थी कि सुजाता को भी आभास नहीं था कि संस्कृति इस तरह कहीं चली जायेगी। सुजाता ही क्यों, खुद संस्कृति को भी कहाँ पता था कि पूर्वाभास से भयभीत होकर जब वह मरघट पहुंचेगी तो ऐसी परिस्थितियां निर्मित हो जायेंगी कि वह राजमहल नहीं लौट पायेगी। सुजाता मन ही मन ये अनुमान जरूर लगा रही थीं कि संस्कृति, साहिल के साथ उसी मनोचिकित्सक के पास गयी होगी, जो लोगों को उनके पूर्वजन्म की बातें याद दिलाता है। प्रत्यक्ष में उन्होंने कहा- “मुझे भी कुछ नहीं मालूम है। शायद मेरी आँख लगने के बाद वह चुपके से बाहर निकल गयी होगी।”

“लेकिन उसे बाहर जाने की जरूरत पड़ी ही क्यों?”

“और फिर इस तरह आधी रात को वह कहाँ गयी होगी?”

“उसने ख़त में किस अल्टीमेटम और किस अनजान सफ़र की बात की है?”

उपरोक्त सवाल पूछने वाले प्रत्येक सदस्य की निगाहों का केंद्रबिंदु सुजाता ही थीं। इसकी सबसे ठोस वजह ये थी कि पिछली रात वे ही संस्कृति के साथ सोयी हुई थीं।

“इन सवालों को लेकर मैं भी उतने ही अँधेरे में हूँ, जितने अँधेरे में आप सब हैं। मुझे संस्कृति से इस बेवकूफी की ज़रा भी आशा नहीं थी।” सुजाता ने सफाई दी।

“हम सब भाभी पर नाहक ही गुस्सा हो रहे हैं भइया।” अरुणोदय ने सुजाता का पक्ष लिया- “हमें चौकीदारों से पूछताछ करनी चाहिए।”

“ये काम मैंने सबसे पहले ही किया था। चौकीदारों का कहना है कि उन्होंने न तो संस्कृति को बाहर निकलते हुए देखा था और न ही गेट पर ख़त रखते हुए।”

“ऐसा कैसे हो सकता है? वह राजमहल से गायब तो हुई नहीं होगी। या तो हमारे चौकीदार काम को लेकर मुस्तैद नहीं हैं या फिर वे झूठ बोल रहे हैं।”

“ये सब बाद में सोचने वाली बातें हैं अरुणोदय। फिलहाल तो ये पता लगाना है कि वह बेवक़ूफ़ लड़की गयी कहाँ होगी?”

“खत में शहर का जिक्र है और हमारे यहाँ का नजदीकी शहर तो इलाहाबाद ही है। जरूर वह इलाहाबाद में ही होगी।”

“उसने चौबीस घंटे में लौट आने को कहा है।” सुजाता ने कहा।

“तो क्या तुम ये कहना चाहती हो कि हम खामोश रहें?” दिग्विजय ने सुजाता को जलती निगाहों से घूरा- “उसे आधी रात को घर छोड़ने की क्यों जरूरत पड़ी? उसे किस शैतान ने चौबीस घंटे का अल्टीमेटम दिया और क्यों दिया? वह किन सवालों के जवाब तलाशने इलाहाबाद गयी? क्या हम ये सब जानने की कोशिश न करें?” दिग्विजय के क्रोध के आगे सभी खामोश खड़े रह गये। वे संस्कृति के गायब होने को लेकर मन ही मन सुजाता पर झल्लाए हुए थे, इसलिए उनकी साधारण बातें भी उन्हें आंदोलित कर दे रही थीं। उन्होंने अरुणोदय के हाथ से संस्कृति का ख़त लिया और सुजाता की आँखों के सामने लहराते हुए आगे कहा- “पढ़ो इसे। तुम्हारी बेटी ने लिखा है कि वह या तो शंकरगढ़ की तबाही या फिर ब्रह्मराक्षस की मौत का फरमान लेकर लौटेगी। क्या तुम्हारे जेहन में ये सवाल नहीं आ रहा है कि ब्रह्मराक्षस से उसकी मुलाक़ात कैसे हो गयी?”

“भाभी के कहने का मतलब है कि जब संस्कृति लौटेगी तो इन सवालों के जवाब खुद मिल जायेंगे।” अरुणोदय ने एक बार फिर सुजाता का पक्ष लिया।

“और अगर नहीं लौटी तो?” दिग्विजय का स्वर व्यग्र हो उठा- “क्या बीते

दिनों इस राजमहल में जो हुआ वह साधारण था? कुलगुरू ने जो कहा है उसके अनुसार क्या ये नहीं लगता कि राजमहल पर कोई भारी अनिष्ट मंडरा रहा है? ऐसे में अगर..अगर संस्कृति किसी मुसीबत में पड़ गयी तो?”

“आप फ़िक्र मत कीजिये मैं इलाहाबाद में मौजूद हमारे सभी सूत्रों के पास ये खबर भिजवा देता हूँ कि यदि संस्कृति उन्हें नजर आये तो उसे अपने पास रोके रखें और हमें सूचित करें। हम खुद भी उसकी तलाश में निकलते हैं।”

“हाँ!” दिग्विजय ने ठंडे स्वर में कहा। उन्हें आभास हुआ कि आवेशित होने से वे मुख्य उद्देश्य से भटक सकते हैं- “यही करना होगा।”

“आज कुलगुरू ने भी आने के लिए कहा था। वे हमें लेकर ग्रंथागार में जाने..।”

चंद्रोदय का कथन पूर्ण भी नहीं हुआ था कि एक नौकर ने सूचना दी- “कुलगुरू महाराज आये हैं मालिक।”

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ग्रंथालय राजमहल की पांचवी मंजिल पर था।

कुलगुरु; दिग्विजय, अरुणोदय और चंद्रोदय को साथ लिए हुए ग्रंथालय के मुख्य द्वार पर पहुंचे। जनेऊ में पिरोई हुई चाबी को उन्होंने दरवाजे से लटक रहे मजबूत ताले में लगाया।

राजमहल की पुरानी परंपरा के अनुसार खानदानी इतिहास को संरक्षित रखने की जिम्मेदारी पुरोहितों की हुआ करती थी। वंश की परम्पराओं के कट्टर पालक दिग्विजय की अगुवाई में ये परम्परा आज भी बरकरार थी। ग्रंथालय की एक चाबी कुलगुरु के पास होती थी और एक चाबी दिग्विजय के पास, ताकि नियमित रूप से ग्रंथागार की साफ़-सफाई होती रहे। ग्रंथागार में प्रवेश की अनुमति केवल पुरुषों को थी। दूसरे खानदान से आयीं बहुओं या फिर शादी के बाद दूसरे खानदान में जाने वाली राजमहल की लड़कियों का ग्रंथागार में प्रवेश वर्जित था। साफ़-सफाई की जिम्मेदारी पुरुषों की थी, ये काम वे स्वयं करते थे।

ताला खोलने के बाद कुलगुरु ने भारी दरवाजे को भीतर की ओर धकेला। इस काम में तीनों भाइयों ने उनकी मदद की। ग्रन्थाकार में हवा आने के लिए सिवाय रोशनदान के और कोई साधन नहीं था। दिग्विजय ने दरवाजे के बगल में ही मौजूद स्विच बोर्ड की सहायता से कक्ष में प्रकाश करने के बाद दरवाजे को अन्दर से बन्द कर दिया।

कक्ष में ग्रन्थों की आलमारी लाइब्रेरी की शक्ल में सजाई गयी थी। वहां राजमहल के इतिहास और देश की गौरवशाली संस्कृति से जुड़े दुर्लभ और प्रमाणिक दस्तावेजों की भरमार थी। वहां पर व्याप्त शान्ति को महसूस करते हुए

ऐसा लगता था जैसे सो रहे इतिहास से छेड़खानी करने से प्रकृति भी डर रही हो।

कुलगुरु एक विशेष आलमारी की ओर बढ़े। तीनों भाइयों ने उनका अनुसरण किया। कक्ष के सन्नाटे में अनगिनत पदचाप प्रतिध्वनित हो उठे।

“उन दिनों लगभग हर राजा के दरबार में लेखक का विशेष स्थान होता था, जिसका मुख्य काम राज्य के घटनाक्रमों का संकलन करना होता था।” कुलगुरु का गम्भीर स्वर सन्नाटे में गूंजा- “हालांकि हर राज्य का लेखक अपने राजा की उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ा कर लिपिबध्द करता था, लेकिन जब कोई दूसरा राजा उस राज्य पर आधिपत्य जमा लेता था तो उस राज्य के लेखक व्दारा संकलित ऐतिहासिक दस्तावेजों को जला देता था और अपने लेखक से उस राज्य का इतिहास नये सिरे से लिखवाता था, जिसमें पराजित शासक की घोर निन्दा और विजेता राजा का अतिशयोक्तिपूर्ण गुणगान होता था। इसीलिए आज भी ये कहा जाता है कि इतिहास हमेशा विजेताओं के गुण गाता है।”

कुलगुरू ने लाल कपड़े में लिपटा एक मोटा और भारी ग्रन्थ आलमारी से निकाल कर मेज पर रख दिया।

“इस हस्तलिखित ग्रन्थ में शंकरगढ़ का सत्रहवीं शताब्दी का इतिहास है। माया और अभयानन्द के प्रकरण का उल्लेख इसी ग्रन्थ में मिलेगा।”

कुलगुरु ने लाल कपड़े की पोटली को खोला और उसमें मौजूद ग्रन्थ को बाहर निकाला। वह ग्रन्थ के रूप में भोजपत्रों का पुलिंदा था, जिसे चांदी के पतले तार से गूंथा गया था।

तीनों भाई सांस रोके हुए इतिहास के सामने आने की प्रतीक्षा करते रहे। कई सौ भोजपत्रों को पलटने के बाद कुलगुरु की निगाहें उस भोजपत्र पर ठहरीं, जहाँ से उनके महत्व की घटना का उल्लेख शुरू होता था।

“हमारे राज्य की बागडोर राजा उदयभान सिंह के हाथों में है। भारतवर्ष में कंपनी का आगमन हो चुका है। न केवल आगमन हुआ है, बल्कि यहाँ के राजाओं का आपसी कलह उनके उपनिवेशों की संख्या को भी हैरतंगेज ढंग से बढ़ा रहा है।” भोजपत्र पर लिखे शब्द कुलगुरू के माध्यम से कक्ष के वातावरण में तैरने लगे- “महाराज उदयभान अपनी दूरदर्शिता से लुटेरे व्यापारियों की कूटनीती को भांप चुके हैं। उपनिवेश की आंधी के शंकरगढ़ तक पहुँचने से पहले ही उन्होंने आस-पास के राज्यों को मैत्री-प्रस्ताव भेजकर उस विदेशी शक्ति के प्रति संगठित होने का संकेत भेज दिया है, जो आने वाले दिनों में पूरे भारतवर्ष को अपनी चंगुल में लेने के लिए प्रयत्नशील है। किन्तु आज मैं जिस प्रकरण को लिपिबद्ध करने बैठा हूँ, वह न तो राज्य की राजनीती से सम्बन्धित है और न ही महाराज उदयभान की शौर्यगाथा से।

मैं जिन घटनाओं का उल्लेख करने जा रहा हूँ, वे इतनी भयावह हैं कि उनका वर्णन करने में मेरी लेखनी भी काँप रही है। हृदय किसी सूखे पत्ते की भांति थर्रा रहा है, तथापि मैं उनका वर्णन करूंगा, ताकि राजवंश की आने वाली पीढियां आवश्यकता पड़ने पर ये जान सकें कि हमने किस प्रकार एक अमानवीय शक्ति का सामना किया था।

यह रक्तरंजित गाथा राज्य की राजकुमारी माया से शुरू हुई थी। माया, जिन्हें दरबार के कवियों ने सौन्दर्य-सम्राज्ञी के अलंकरण से विभूषित किया था। माया, जिनकी विद्वता को देखकर गार्गी का स्मरण हो आता था। माया, जिनके विषय में प्रचलित था कि उनकी मुस्कान मरणासन्न लोगों की साँसों की संख्या में वृद्धि कर देती थी।

जिस अवस्था में सामान्य राजकुमारियां नृत्य और संगीत में रूचि लेती हैं, उस अवस्था में माया की रूचि गणित में थी। विशेष रूप से वैदिक गणित में। उनके लिए महाराज ने वैदिक और आधुनिक गणित में पारंगत एक शिक्षक की नियुक्ति की थी। जिसका नाम द्विज था और जो राज्य के देवी-मंदिर के पुजारी का शिष्य था। मंदिर में संरक्षित दुर्लभ ग्रंथों की सहायता से उसने अत्यंत कम उम्र में ही गणित जैसे जटिल विषय में विशेषज्ञता अर्जित कर ली थी।

माया नित्य संध्याकाल को अध्ययन हेतु द्विज के पास जाया करती थी। कुछ दिनों तक ये क्रिया निर्बाध रूप से चलती रही, फिर एक दिन मनुष्य के भेष में छिपे एक नरपिशाच की दृष्टि माया पर पड़ी और शुरू हुई एक रक्तरंजित गाथा।”

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