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Horror ख़ौफ़

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वह दरगाह जंगल के न जाने किस हिस्से में था, जिसके आंगन में महताबी रोशनी बिखरी हुई थी। मजार पर चढ़ी चादर के फड़फड़ाने की ध्वनि हवाओं की सरसराहट के साथ मिल कर परिवेश को रहस्यमय बना रही थी। दूर कहीं से भेड़ियों के चीखने की आवाजें आ रही थीं। मजार से थोड़े ही फासले पर एक वृध्द फकीर काबा की दिशा में उन्मुख था, जिसके सिर पर जालीदार टोपी थी और दोनों हाथ दुआ मांगने के अंदाज में ऊपर उठे हुए थे।

‘ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मद रसूल अल्लाह!’

(अल्लाह के सिवा और कोई परमेश्वर नहीं है और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं।)

उसने हथेलियों को आँखों से लगाया। ठुड्डी को दोनों कन्धों से स्पर्श कराने के पश्चात उठने ही वाला था कि दरगाह की चारदीवारी में लगे कमजोर दरवाजे पर दस्तक पड़ी। फ़कीर जोरों से खांसा और निकट ही पड़ी लाठी को टटोलकर उठाया। उसके खांसने के अंदाज और जर्जर जिस्म के कम्पन को देखकर लग रहा था कि उसकी अवस्था अस्सी साल से ऊपर थी। कांपते जिस्म का आधे से अधिक बोझ लाठी पर और कुछ कमजोर पैरों डालते हुए वह फ़कीर आगे बढ़ा। उसके दरवाजे तक पहुँचने में अधिक समय लगने के कारण दस्तक की कई बार पुनरावृत्ति हुई। आगंतुक बेहद जल्दी में जान पड़ता था।

“अल्लाह की हुक्म के बगैर एक पत्ता तक नहीं हिल सकता। फिर न जाने क्यों इन इंसानों को इतनी घबराहट रहती है।” दरवाजे पर लगातार पड़ती थाप से भन्नाकर फ़कीर बड़बड़ाया और चाल में थोड़ी तेजी लाकर दरवाजे तक पहुंचा। सांकल गिराने के बाद वापस मुड़ते हुए बोला- “खुल गया। दाखिल हो जाओ।”

दरवाजा एक झटके से खुला और आगंतुक तेजी से चारदीवारी में प्रविष्ट हो गया।

“मुझे...मुझे आपके मदद की जरूरत है बाबा।” आने वाला शख्स इस प्रकार हांफ रहा था, मानो लम्बी दौड़ लगाकर आया हो- “अगर अपने मदद नहीं की तो इंसानों का भगवान पर से भरोसा उठ जाएगा।”

फ़कीर ने आगंतुक की ओर देखने तक का जहमत नहीं उठाया और लाठी टेकते हुए टीन की छत वाली एक छोटी सी कोठरी की ओर बढ़ गया। आगंतुक तड़प कर उसके पीछे भागा।

“दो जिंदगियां एक शैतान के चंगुल में तड़प रही हैं बाबा। आपको हमारी मदद करनी होगी।”

“शैतान के खात्मे में अभी वक्त है। ठहर जा और सांस ले ले।” फ़कीर ने सुराही से पानी का भरा गिलास निकाला और साहिल की ओर बढ़ा दिया। आगंतुक को पानी की जरूरत थी, फ़कीर ये बात ताड़ गया था। साहिल ने उसके हाथ से गिलास झपटा और एक ही सांस में खाली कर दिया।

 
12

“नीच! पापी!”

पुजारी ने लात का भीषण प्रहार द्विज की छाती पर किया और वह तख़्त से सीधा धरातल पर आ गिरा। अत्यधिक पीड़ा के बावजूद भी उसके होठों से आह तक नहीं निकली। उसका चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था। सिर पर पट्टी बंधी हुई थी। चेहरे पर पश्चाताप के भाव थे। पुजारी से दृष्टि मिलाने तक का साहस नहीं था उसमें। वह जमीन से उठने की कोशिश न करते हुए पुजारी के दूसरे प्रहार की प्रतीक्षा करता रहा। मगर पुजारी ने उस पर दूसरा प्रहार नहीं किया। केवल एक प्रहार को ही पर्याप्त समझकर उन्होंने गीता का अधोलोखित श्लोक कहा-

“त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तरमादेतत्त्रयं त्यजेत्।।

(अर्थ- काम, क्रोध व लोभ। यह तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले हैं अर्थात् अधोगति में ले जाने वाले हैं, इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।)

श्लोक सुनने के बाद भी द्विज ने दृष्टि ऊपर नहीं उठायी।

“एक ब्राह्मण होकर भी तू गीता के इस श्लोक को कैसे भूल गया?” पुजारी ने इस कदर दांत पीस कर कहा मानो वाक्यों के जरिये अपनी सम्पूर्ण क्रोधाग्नि को द्विज के ऊपर उड़ेल देना चाहते हों- “तू ये कैसे भूल गया कि मोह ही मनुष्य की अधोगति का महत्वपूर्ण कारक होता है। तुझे ये क्यों नहीं स्मरण रहा कि तेरे भाई की काया में आत्माओं का देवता प्रविष्ट हो रहा था? तुझे ये क्यों नहीं स्मरण रहा कि यदि अभयानन्द की काया को समाप्त नहीं किया गया तो श्मशानेश्वर नाम का वह अशरीरी पिशाच उसकी काया में कैद घृणित वासानाओं की शक्ति पाकर नर-भेड़िये के रूप में अवतरित हो उठेगा? तुझे ये क्यों नहीं स्मरण रहा कि तेरा भातृ मोह सम्पूर्ण शंकरगढ़ के हित के लिए घातक हो जाएगा। तू तो गणित जैसे व्यवहारिक विज्ञान का प्रकांड ज्ञाता था द्विज, कहाँ लुप्त हो गयी थी तेरी व्यवहारिकता जो तूने अभयानन्द को बचाने की चेष्टा में समूचे राज्य के प्रारब्ध को दांव पर लगा दिया। बड़े भाई के प्रति जिस मोह को तूने चौबीस वर्षों से जड़ करके रखा हुआ था, वह मोह अचानक चैतन्य कैसे हो उठा?”

“क्षमा कर दीजिये गुरुदेव।” द्विज पुजारी के चरणों में सिर रखकर फफक-फफक रो पड़ा- “मैं धर्मसंकट में था। बाल्यावस्था में जो अग्रज मेरी लेशमात्र पीड़ा पर भी द्रवित हो उठता था, उसी अग्रज का जीवित दाह-संस्कार देख सकने का साहस नहीं था मुझमें। इसीलिए मैंने शंकरगढ़ और अभयानन्द के जीवन में से

अभयानन्द के जीवन को प्राथमिकता देनी चाही थी।”

“तू धर्मसंकट में नहीं था द्विज। तू तो मोह जनित स्वार्थ के वशीभूत था।”

“आप मेरी दशा को चाहे जो संज्ञा दें गुरुदेव किन्तु सत्य यही है कि मैं विवश था।”

“विवश तो तू था ही। तू मोह की विवशता में जकड़ा हुआ था। किन्तु तेरी उस विवशता की आड़ में तेरा अपराध नहीं छिप सकता। तूने तो ऐसा अपराध किया है कि उस अपराध का दुष्प्रभाव समूचे राज्य पर पड़ेगा।”

“मुझे क्षमा कर दो गुरुदेव। क्षमा कर दो मुझे।”

“तेरा अपराध अक्षम्य है द्विज। तू स्वयं से ये प्रश्न पूछ कि यदि तेरी वर्षों पुरानी निष्ठा को देख मैं तुझे क्षमा कर भी दूं, तो क्या तेरे अपराध का दुष्प्रभाव शंकरगढ़ पर नहीं पड़ेगा? क्या शंकरगढ़ की निरीह प्रजा को पिशाच के क्रोध का भाजन नहीं बनना पड़ेगा?” पुजारी के चेहरे पर विवशता भरी झुंझलाहट काबिज हो गयी- “तूने क्या कर दिया द्विज? भातृ मोह में पड़कर तूने शंकरगढ़ को विनाश के किस गर्त में धकेल दिया? काश...काश उसी क्षण मैं तेरा गला दबाकर वध कर दिया होता, जिस क्षण तू एक धुल-धूसरित बालक के रूप में अपने भाई को ढूँढते हुए शंकरगढ़ आया था और मैंने तुझे त्रासदी का मारा हुआ अनाथ समझकर देवी-मंदिर में आश्रय दिया था।”

द्विज व्यथित होता रहा। कुछ सीमा तक पुजारी के वाक्-बाणों से तो कुछ सीमा तक अपने कृत्य की विभीषिका की कल्पना से।

“चला जा नराधम। मेरे दृष्टि-विस्तार से ओझल हो जा। आज से तू मेरे लिए परित्यक्त है।” घृणा के आवेश में आकर पुजारी ने द्विज के चेहरे पर थूक दिया।

“मैं ऐसा नहीं होने दूंगा गुरुदेव!” थूक को पोंछते हुए द्विज ने बिलख कर कहा- “मैं अपने अपराध की काली छाया शंकरगढ़ पर नहीं पड़ने दूंगा।”

“तू कुछ नहीं कर सकता द्विज। तू अब चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता।”

“नहीं गुरुदेव! आपने मेरे नेत्र खोल दिए। मैं अब स्वयं जाकर भइया का दाह-संस्कार करूंगा।”

पुजारी एक गहरी सांस लेकर खामोश रह गये।

“मैं जा रहा हूँ गुरुदेव। मैं भइया की झोपड़ी में जा रहा हूँ।”

द्विज उठने को उद्यत हुआ किन्तु पुजारी की वाणी ने उसे जड़वत कर दिया-

“कोई लाभ नहीं है। अभयानन्द के अर्द्धमृत शरीर को कापालिक उठा ले गये। तुम्हें अब वहां कुछ नहीं प्राप्त होगा।”

द्विज के हाथ-पाँव थरथरा उठे। भावी रक्तपात और महाविनाश की असली अनुभूति तो उसे अब जाकर हुई।

“कापालिक..कापालिक कैसे पहुंचे भइया तक?”

“मुझे नहीं ज्ञात।” पुजारी का लहजा अब थोड़ा नर्म पड़ गया था। क्रोधाग्नि के मंथर पड़ जाने के बाद उन्हें द्विज द्वारा उठाये गये कदम के पीछे छिपी स्वाभाविक भावुकता का आभास होने लगा था- “पीपल के तने में आग लगाने के बाद भीषण बारिश के आने के आसार देखते हुए महाराज समेत समस्त जन लौट आये थे। वापसी के उपरान्त तुम्हें यहाँ न पाकर मुझे आभास हो गया था कि रक्त-संबंध के कारण पनपी भावुकता तुम पर हावी हो चुकी है और तुम अभयानन्द को बचाने के असंभव कृत्य को संभव बनाने हेतु निकल पड़े हो। मैं एक क्षण का भी विलम्ब किये बिना अभयानन्द की झोपड़ी की ओर दौड़ पड़ा था, किन्तु विधाता ने नियति में जिस घटना को लिख रखा था, वह घटना घट चुकी थी। मुझे विलम्ब हो चुका था। अभयानन्द की झोपड़ी में तुम अचेतावस्था में पड़े थे। तुम्हारे सिर से रक्तस्राव हो रहा था। स्पष्ट था कि तुम्हारे सिर पर प्रहार करके तुम्हें अचेत किया गया था। झोपड़ी में तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई नहीं था।”

द्विज की आँखों के सामने वह दृश्य घूम गया, जब वह अभयानन्द के बदन पर औषधि का लेप लगा रहा था और उसी क्षण उसे अपने सिर पर भीषण प्रहार का अनुभव हुआ था। द्विज सहज ही इस निष्कर्ष पर पहुँच गया कि प्रहार करने वाले अभयानन्द के तंत्र-समुदाय के कापालिक ही थे, जो उसे तलाशते हुए आये थे।

“म..मैं ये क्या कर बैठा? क्या कर बैठा मैं?” पश्चाताप के आंसुओं से द्विज के गाल भीगने लगे- “नियति के कालचक्र ने छला है मुझे। न तो मैं बड़े भाई के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सका और न ही समाज के प्रति अपने दायित्वों का। मैं तो दोनों ही परीक्षाओं में अनुत्तीर्ण हो गया गुरुदेव। माँ मुझे इसलिये पापी कहेगी क्योंकि मैंने समाज के भय से अपने भाई को अपनाकर उसे समय रहते सद्मार्ग पर लाने का प्रयत्न नहीं किया और शंकरगढ़ की प्रजा मुझे इसलिए पापी कहेगी क्योंकि उसी भाई के प्रति मेरा मोह एक पिशाच के अवतरण का निमित्त बनेगा। ये विधाता का कैसा गणित था गुरुदेव, जो मुझ जैसा सांसारिक गणित का प्रकांड ज्ञाता भी नहीं समझा सका?”

“तुम राज्य से चले जाओ। मैं महाराज से कह दूंगा कि तुमने अपराध बोध से ग्रस्त होकर आत्महत्या कर लिया।” पुजारी भी द्विज की मनोव्यथा पर द्रवित होने लगे थे।

“नहीं गुरुदेव!” द्विज ने चेहरा ऊपर उठाया- “जो पाप मैंने किया है, उसके प्रायश्चित के लिए मेरे अश्रू पर्याप्त नहीं है। यदि श्मशानेश्वर भइया के शरीर को माध्यम बनाकर अवतरित हुआ तो मैं उसका सर्वनाश करके, अपने पाप का प्रायश्चित करूंगा।”

“ये असंभव...।”

“मैं इसे संभव बनाऊंगा गुरुदेव!” पुजारी का कथन पूर्ण होने से पूर्व ही द्विज का लहजा दृढ़ हो उठा- “मैं इसे संभव बनाऊंगा।”

वह धरातल से उठ खड़ा हुआ। उसके मुखमंडल पर किसी अलौकिक आत्मविश्वास का प्रखर तेज विद्यमान हो उठा था।

“मैं वापस आऊँगा गुरुदेव! मैं अपनी भूल को सुधारने वापस आऊँगा।”

द्विज के प्रस्थान के पश्चात भावी अनिष्ट की कल्पना में खोये पुजारी गर्भगृह की ओर मुड़े।

गर्भगृह में सन्नाटा फैला हुआ था। हालांकि प्रात: कालीन वंदना हो चुकी थी किन्तु देवी के निवास की भव्यता मानो कहीं लुप्त हो गयी थी। प्रतीत हो रहा था कि मंदिर के परिवेश का हर एक कोना श्मशानेश्वर के अवतरण का मातम मना रहा था।

“माँ भगवती तुम्हें तुम्हारे उद्देश्य में पूर्ण करें द्विज! तुम पापी नहीं हो। नियति के कालचक्र ने सचमुच छला है तुम्हें।”

पुजारी ने हाथ जोड़कर और आँखें बंद करके प्रार्थना की।

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रात खामोश थी।

वातावरण में केवल अभयानन्द की कराह व्याप्त थी। उसके अधजले शरीर को कई भेड़िए वृत्ताकार दायरे में घेर कर बैठे थे। नीचे की ओर झुके हुए उनके थुथुन उनके शोकग्रस्त होने का संकेत दे रहे थे। यह दायरा श्मशानेश्वर की पाषाण-प्रतिमा के ठीक सामने बना हुआ था। एक कापालिक अभयानन्द को औषधि लगा रहा था। दायरे से थोड़ी ही दूर पर वह स्थान था, जहां अघोरा को दफनाया गया था। कब्र के उभरे हुए भाग पर दीप जल रहे थे। वातावरण में इन दीपों की रोशनी के अतिरिक्त अन्य कोई रोशनी नहीं थी। तारे भी मानो कापालिकों के इस महाशोक पर मुस्कुराने का साहस नहीं कर पा रहे थे। अंधेरे के कारण स्याह रूप ले चुकी श्मशानेश्वर की मूर्ति और भी भयावह हो उठी थी।

कमर में काली कोपीन लपेटे हुए कई कापालिक इधर-उधर यूं टहल रहे थे, मानो वे समय के गुजरने की धीमी गति पर क्रोधित हों। कुल मिलाकर वह शोकग्रस्त वातावरण सामान्य मनुष्यों के लिए मरघट से भी अधिक भयावह था।

औषधि लगा चुकने के बाद कापालिक उठा और भेडियों के दायरे को लांघ कर समीप ही टहल रहे एक कापालिक के पास पहुंचा।

“गुरु अभयानन्द की काया में महाप्रभु श्मशानेश्वर का आगमन एक दिवस पूर्व ही प्रारम्भ हो चुका है।” उसने कहा- “प्रभु को उनकी काया में पूर्णतया आविष्ट होने के लिए तीन दिवस निर्धारित हैं। आज की मध्य-रात्रि के गुजर जाने के पश्चात दूसरा दिवस भी पूर्ण हो जाएगा। कल मध्यरात्रि तक काया-प्रवेश की प्रक्रिया पूर्ण हो जायेगी। गुरुदेव के शरीर को नष्ट करने के प्रयास में उसे तीन चौथाई तक जला दिया गया है, इसलिए गुरुदेव कल मध्यरात्रि तक दाह की पीड़ा को भोगते ही रहेंगे। हम औषधि इत्यादि के प्रयोग से केवल उनकी पीड़ा को कम कर सकते हैं। उन्हें पीड़ा से मुक्ति तो तभी मिलेगी, जब प्रभु, गुरुदेव की काया में पूर्णतया प्रविष्ट होकर अवतरित हो उठेंगे और गुरुदेव की आत्मा अपनी काया छोड़क़र प्रभु श्मशानेश्वर के साम्राज्य में विलीन हो जाएगी।”

उपरोक्त सूचना को सुनने के बाद कापालिक के जबड़े भींच गये। उसने दर्द से तड़प रहे अभयानन्द को देखा और खूंखार लहजे में कह उठा- “गुरुदेव के अतिशय कष्ट का मूल्य चुकाना होगा शंकरगढ़ को। उनके कष्ट का कारक बनकर उदयभान ने साक्षात काल को अपने राज्य में आमंत्रित किया है। अकल्पनीय रक्तपात को देखकर उनके नेत्र भी रक्त-वर्षा करने लगेंगे। हम गौण वंश के कापालिक हैं, हमारा बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। प्रभु श्मशानेश्वर का अवतरण होगा। निश्चित ही होगा।”

“राज्य के सैनिक गुरुदेव के शरीर को ढूंढने के लिए जंगल के कोने-कोने में बिखरे हुए हैं। किन्तु हमें इसका भय नहीं है क्योंकि हमने इस स्थान को भ्रम के आवरण में ढक रखा है। यदि कोई सैनिक इस ओर आया तो दृष्टि-भ्रम में उलझ जाने के कारण उसे कुछ नहीं नजर आ सकेगा।”

“अत्युत्तम!” कापालिक, जो अभयानन्द के बाद मठ का प्रमुख था, प्रशंसात्मक लहजे में बोला- “अब तुम विश्राम करो। गुरुदेव की सेवा में दूसरे सदस्य को लगा दो।”

निर्देश देने के बाद मठ-प्रमुख ने आकाश की ओर देखकर अनुमान लगाया कि रात्रि का तीसरा पहर आरम्भ ही होने वाला था।

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कालचक्र पहले ही रचा जा चुका था।

द्विज के मोह ने जिस महाविनाश की पृष्ठभूमि तैयार की थी, उसे ईश्वर ने नियति का रूप दे दिया था। ऐसे में भला कौन था, जो उस महाविनाश को असंभाव्य घोषित कर पाता?

समय अपने स्वाभाविक गति से व्यतीत हुआ और देखते ही देखते श्मशानेश्वर की काया-ग्रहण प्रक्रिया का तीसरा दिन भी पूरा हो गया।

और फिर!

पहली तीन रातों तक श्मशानेश्वर का कहर मूक चौपायों पर टूटा और फिर

चौथी रात अपनी स्याह कालिमा से शंकरगढ़ के प्रारब्ध पर कालिख पोतने आयी।

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श्मशान भूमि के उस हिस्से में अग्न्याधान को प्राप्त हो चुकी एक चिता के लपटों की रोशनी व्याप्त थी। दाह के पश्चात की क्रिया संपन्न कराने के लिए लगभग बीस लोगों का हुजूम श्मशान भूमि में उपस्थित था। मरघट का स्वाभाविक मातमी वातावरण आज कुछ इसलिए भी भयावह हो रहा था क्योंकि दक्षिण में फैले घने जंगल से लगातार भेड़ियों के चीखने की आवाजें आ रही थीं। वायु के तीव्र वेग के कारण चिता की लपटें विचित्र ध्वनि उत्पन्न करते हुए इधर-उधर लहरा रही थीं।

शव को मुखाग्नि देने वाला चारों ओर फैले निविड़ अंधकार को देख रहा था। उसका मस्तिष्क जीवन और मृत्यु के दर्शन पर चिंतन करने में व्यस्त था, इसलिए उसका ध्यान उस चर्चा की ओर नहीं था, जो शव-यात्रा में साथ आये लोगों के बीच चल रहा था।

“राज्य में अफवाह फैली हुई है कि पिछले तीन दिनों से चोरी किये गये जिन चौपायों की लाशें यहाँ मरघट में बरामद हो रही हैं, उन्हें मारने वाला कोई जंगली पशु नहीं है।”

“तो फिर कौन हो सकता है?”

“शायद कोई ऐसा पशु, जिसमें शेर या चीते से भी अधिक दरिन्दगी भरी हुई है।”

लोगों के बीच खामोशी छा गयी। उनकी कल्पना में उस भयानक पशु का अक्स उभरने लगा।

“सुनने में ये भी आता है कि जहाँ पर अभयानन्द को जलाया गया था, अगली सुबह वहां से उसकी राख भी नहीं मिली थी।”

“राख कहाँ से मिलेगी, जब वह कापालिक पूरी तरह जला ही नहीं था।”

“लेकिन वह पूरी तरह जला क्यों नहीं होगा?”

“क्या उस रात की तेज मूसलाधार बारीश को भूल गये तुम लोग? जिसके उफान को देखकर ऐसा लगा रहा था, जैसे शैतान भी ये नहीं चाहता था कि उसका भक्त जल कर मरे।”

“अगर उस बारीश के कारण अभयानन्द बच भी गया होगा तो फिर उसे पीपल से उतारा किसने होगा? और फिर वह गया कहाँ होगा?”

“वह जंगल में रहने वाले दुष्ट कापालिकों के मठ का स्वामी था। क्या कापालिक उसे बचाने के लिए आये नहीं होंगे?”

“किन्तु मैंने उसे अपनी आँखों से देखा था। उसे पूरी तरह आग के हवाले कर दिया गया था। कापालिक आखिर उसे ले जाकर किये क्या होंगे? उसकी तो मृत्यु सुनिश्चित थी।”

उपरोक्त तर्क देने वाला कई निगाहों का केंद्रबिंदु बन गया।

“क्या तुम्हें नहीं मालूम कि अभयानन्द श्मशानेश्वर सिद्धी का अनुष्ठान पूर्ण कर चुका था? उस अनुष्ठान को पूर्ण करने वाले मनुष्य के शरीर में श्मशानेश्वर निवास करने लगता है। यदि उस मनुष्य के शरीर को तीन दिनों के अन्दर नष्ट नहीं किया जाता है तो श्मशानेश्वर उसी शरीर को धारण करके जी उठता है।”

“हे देवी माँ!” कमजोर दिल वालों ने मुंह पर हाथ रख लिया- “शुभ-शुभ बोलो! ईश्वर न करें ऐसा हो।”

“अगर ऐसा हो गया...।” किसी एक ने डरावनी शक्ल बनाते हुए कहा- “तो अनर्थ हो जाएगा। खून की नदियाँ बह जाएंगी। पूरा शंकरगढ़ वीरान हो जाएगा। पिशाच को किसी भी उपाय से रोका नहीं जा सकेगा। ईश्वरीय शक्तियां भी उसके आगे कमजोर पड़ जायेंगी। श्मशानेश्वर के बारे में पुराने ग्रंथों में लिखा है कि वह यमराज का दूसरा रूप है। वह भड़मानस के रूप में आता है। उसके हाथ और पैरों के नुकीले नाखूनों से लहू टपकता है। आँखें धधकते लावे की भांति सूर्ख होती हैं। वह दाहिने हाथ में कटार लेकर शिकार पर निकलता है। बाएं हाथ की मुट्ठी में शिकार के बाल जकड़ता है और कटार से उनकी गर्दन धड़ से अलग कर देता है।”

ठीक इसी क्षण!

जंगल से एक भयानक गर्जना उठी। लोगों ने काँप कर उसकी दिशा में देखा।

“इतनी रात गये जंगल में कौन गरज रहा है? ये तो किसी शेर या चीते की गर्जना नहीं है।”

दहशत के कारण लोगों के पसीने छूट गये। उन्होंने जलती चिता की ओर देखा। शव के पूरा जलने में अभी समय था।

“कहीं कोई अनिष्ट तो नहीं होने वाला?”

कई लोगों की आशंकित निगाहें आकाश की ओर उठ गयीं। काले घने बादल

उनके सामने रहस्यमयी दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। निर्जन मरघट में झूमते वृक्षों की स्याह आकृतियाँ भयावह लगने लगी थीं। चिता की लपटें भी अब पहले से उग्र हो उठी थीं। विगत तीन दिनों से मरघट में पाये जा रहे पशुओं के शव को लेकर फ़ैली अफवाहें सच का रूप लेती नजर आने लगीं।

“हमें वापस लौटना होगा।” किसी ने प्रस्ताव रखा- “कोई हमारा काल बनकर मरघट की ओर आ रहा है। ये सब उसी के आने संकेत हैं।”

“ऐसे कैसे जा सकते हैं?” उस शख्स ने, जिसने शव को मुखाग्नि दी थी, उपरोक्त प्रस्ताव रखने वाले को घूरा- “अभी अंतिम संस्कार.....।”

कथन पूर्ण होने से पूर्व ही उसी दुर्दांत गर्जना ने एक बार फिर मरघट को कंपा डाला। इस बार गर्जना निकट से आयी थी। लौटने की राय देने वाले को हावी होने का अवसर मिल गया।

“मर चुके इन्सान के लिए जान गंवाना मूर्खता भरी भावुकता मात्र है। महापंडित से विमर्श करके अधूरे अंतिम संस्कार को पूर्ण करने का कोई विकल्प ढूंढा जा सकता है, किन्तु यदि हम यहाँ उपस्थित रहे तो जो रहस्यमयी मौत हमारी ओर बढ़ रही है, उससे बचने का हमारे पास कोई विकल्प नहीं होगा।”

मृतक के संबंधियों को भी ये कथन तार्किक लगा। पल-प्रतिपल भयावह होता जा रहा मरघट का वातावरण, चिता पर रखे अधजले शव के प्रति लोगों की संवेदनाओं पर भारी पड़ने लगा।

“हम वापस लौट रहे हैं।” एक व्यक्ति ने घोषणा के स्वर में कहा।

“सजीवन अभी लौटा नहीं।”

प्रकरण से इतर वाक्य के मुखरित होते ही लोगों को झटका लगा।

“सजीवन कहाँ गया है?” दल के नेतृत्वकर्ता की भूमिका में आ चुके आदमी ने पूछा।

“हमने उसे दक्षिण की ओर अँधेरे में जाते देखा था। हमें लगा प्राकृतिक कर्म से निवृत्त होने के लिए जा रहा होगा, इसलिए टोकना उचित नहीं समझा।”

सभी की भयाक्रांत दृष्टि दक्षिण की ओर उठ गयी। दूर तक काजल से भी काला अन्धेरा व्याप्त था। ये रूह तक को कंपा देने वाली भीषण गर्जनाओं का ही खौफ था, जो प्रत्येक के मन में यह विश्वास पनपने लगा था कि सजीवन अब उस अँधेरे से कभी बाहर नहीं आयेगा। जंगल से आती वृक्षों की मद्धिम सरसराहट से बोध होता था कि भयानक अन्धेरा सजीव होकर सांसें ले रहा है।

“वापस चलो! सजीवन..सजीवन अब कभी नहीं लौटेगा।”

‘जब मनुष्य के प्राणों पर संकट आता है तो वह सभी नैतिक मूल्यों को विस्मृत कर देता है।’ वे वापस मुड़ने को उद्यत हुए ही थे कि-

“आ....ह!”

अँधेरे के गर्भ से एक क्षीण आह निकली।

लोग ठिठक कर रुक गये। दम साधे हुए अँधेरे को ही घूर रहे थे कि अचानक उनकी धड़कनें थम गयीं। खून से लथपथ सजीवन अँधेरे में से लड़खड़ाता हुआ बाहर निकला। साथियों पर दृष्टि पड़ते ही उसका वह हौसला जवाब दे गया, जिसके दम पर उसने किसी अज्ञात मुसीबत से बच कर यहाँ तक का फासला तय किया था। धरातल पर गिरने के पश्चात उसने हाथ आगे बढाकर मदद की गुहार लगाई। उसका गला आवाज निकालने में असमर्थ हो चुका था। लोग उसकी ओर लपके।

सजीवन के कपड़े फट गये थे, जहाँ से झाँक रहे जिस्म के हिस्से रक्तरंजित थे। उसके दोनों गालों और हाथ पर भेड़िये के पंजों के निशान थे। उसकी एक पिंडली खून से लथपथ थी, ऐसा लग रहा था, जैसे वहां से मांस का एक बड़ा हिस्सा काट खाया गया हो।

“क्या हुआ तुम्हें?”

“कहाँ थे तुम?”

“किसने तुम पर हमला किया?’

उपरोक्त अनगिनत सवालों के जवाब में सजीवन केवल निगाहों के जरिये अपने जख्मों की ओर इशारा करता रहा। उस पर निश्चेतना हावी हो रही थी। गला सूख रहा था और पलकें बंद होती जा रही थीं। बोलने के प्रयास में उसका मुंह खुल अवश्य रहा था किन्तु जुबान कोई हरकत नहीं कर पा रही थी। चाहकर भी कुछ न बोल पाने की तड़प उसके चेहरे पर स्पष्ट नजर आ रही थी।

“इस पर जरूर पिशाच ने ही हमला किया है।”

पहले से ही खौफजदा लोग सहज ही उपरोक्त निष्कर्ष पर पहुँच गये। रही सही कसर बेहद नजदीक से आयी तीसरी गर्जना ने पूरी कर दी।

“वह आस-पास ही है।”

लोगों ने चलने में असमर्थ हो चुके सजीवन की ओर देखा। उसने दोनों हाथ जोड़ लिए। याचना और पीड़ा के भाव से युक्त उसका चेहरा दयनीय हो उठा था। वह बार-बार अँधेरे की ओर देख रहा था।

“ये अब चल नहीं सकता।”

“अब क्या होगा? इसे कैसे चलेंगे हम?”

समूह का नेतृत्व करने वाले ने एक नजर अँधेरे पर डाली। एक-एक करके सभी लोगों के चेहरे का मुआयाना किया और फिर एक झटके से निर्णायक लहजे में कह उठा- “अगर हम यहाँ से सही-सलामत निकलना चाहते हैं तो हमें सजीवन को यहीं छोड़ना होगा।”

‘ये क्या ..ये क्या कह रहे हो तुम?”

“पागल मत बनो। पिशाच के मुंह इसका खून लग चुका है। वह इसे किसी भी दशा में जीवित नहीं छोड़ेगा। अगर हम इसे साथ लेकर भागेंगे तो इसके साथ हम भी पिशाच का शिकार बनेंगे।”

उसने झुंझलाते हुए कहा। उसका बदन पसीने से भीगा हुआ था। सांसें तेज हो

गयी थीं। हालांकि वह भी बुरी तरह बदहवास था, किन्तु अन्यों की अपेक्षा इतना संयत जरूर था कि कोई निर्णय ले सकने में सक्षम था। बाकियों की दशा ऐसी थी जैसे कलेजे का साथ-साथ उनका जेहन भी हलक में अटक गया था। सजीवन थोड़ी देर पहले जिन साथियों के साथ मौजूद था, उन्हीं की अब स्वार्थपरक बातें सुनकर उसका कलेजा असहनीय कष्ट से फट पड़ा। हृदय की उस टीस के आगे जिस्म की पीड़ा भी हार गयी।

“पिशाच के भोजन को हाथ मत लगाओ तो पिशाच तुम्हें भी हाथ नहीं लगाएगा। कम से कम इस मरघट से तो हम सही-सलामत निकल ही जायेंगे।”

इस आख़िरी निर्णय का सभी ने भरे दिल से स्वागत किया। सजीवन ने मदद को आगे बढ़ाये हुए अपने हाथ को पीछे खींच लिया। उसने आँखें बंद करके आख़िरी बार इष्ट को याद किया और स्वयं को प्रारब्ध के बंधन में ढीला छोड़ दिया।

“चलो यहाँ से। जल्दी चलो। पिशाच यहीं आस-पास ही है।”

और फिर!

सजीवन ने क्षण-प्रतिक्षण दूर होती गयी कदमों की पदचाप को सुना।

‘यही सांसारिक रिश्तों का घिनौना रूप है।’

इससे पहले कि वह आगे कुछ सोच पाता महापिशाच की रूह थर्रा देने वाली गर्जना को उसने बेहद निकट सुना। इसके पश्चात उसने केवल इतना ही महसूस किया कि कोई उसके दोनों पैरों को पकड़कर दूर तक घसीट कर ले जा रहा है, तत्पश्चात सब-कुछ अन्धेरे में डूब गया।

एक साथी के प्राणों के मूल्य पर अपने प्राण बचाकर भाग रहे स्वार्थी इंसानों ने पर्याप्त दूरी पर पहुंचकर पीछे मुड़ कर देखा। सब-कुछ अँधेरे में गर्त हो चुका था। चिता के लपटों की रोशनी में उन्हें नजर आया कि जहाँ पर थोड़ी देर पहले सहारे की भीख मांग रहा सजीवन पड़ा हुआ था, वहां अब कुछ नहीं था। उनके भय का कुछ अंश जिज्ञासा में परिणित हुआ और वे ठिठक गये।

और फिर अचानक!

अँधेरे को चीरकर महापिशाच बाहर आया।

वह दो पैरों पर खड़ा अतिशय ऊंचाई वाला एक नर-भेड़िया था। उसके दाहिने हाथ में मौजूद कटार से खून टपक रहा था। बायें हाथ की मुट्ठी में उसने सजीवन के कटे शीष के बालों को जकड़ रखा था। उसके जबड़ों से सजीवन के शरीर के किसी हिस्से का मांस लटका हुआ था।

“भ..भ...भ....ग....ग....गो!”

इस बार जब उनके पाँव मुड़े तो फिर उन्होंने दोबारा पलटने की जुर्रत नहीं की।

श्मशानेश्वर ने प्रचंड स्वर में दहाड़ कर अपने पहले मानव-शिकार का जश्न मनाया।

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वह न जाने रात्रि का कौन सा पहर था, जब माया ने चौंक कर आँखें खोल दी। कुछ क्षणों तक वह जड़वत रही। ये ज्ञात होते हुए भी कि उसकी नींद खुल चुकी है, वह अपने हाथ-पाँव न हिला सकी। कुछ क्षणों बाद जब हालात सामान्य हुए तो वह उठ कर बैठी।

“इतना भयानक दु:स्वप्न!”

बड़बड़ाते हुए उसने सीने पर हाथ रख कर साँसों को संयत करना चाहा। एक अजनबी खौफ उस पर अनवरत हावी हो रहा था। शयन-कक्ष में अंधकार था। केवल चन्द्रमा की क्षीण रोशनी ही थी, जो वहां बिखरी हुई थी।

वह पलंग से उतरी। करतल ध्वनि उत्पन्न करके दासी को कक्ष में आने का संकेत देकर बरामदे की ओर बढ़ गयी। काले बादलों से घिरा चाँद बीमार नजर आ रहा था। बरामदे से लटके रेशमी परदे हवाओं से अठखेलियाँ करते हुए फड़फड़ा रहे थे।

माया का दु:स्वप्न साधारण नहीं था।

उसने अभयानन्द को देखा था, जो उसके देखते ही देखते भयानक नर-भेड़िये में तब्दील हो गया था। उसने भागना चाहा था, किन्तु उस भेड़िया-मानव ने दौड़ कर उसकी कलाई पकड़ ली थी। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार उसने देवी-मंदिर जाने की राह में पकड़ा था। स्वप्न के उन क्षणों के खौफ को याद करके वह काँप गयी। उसने कलाई को देखा। उसे अब भी वहां भेड़िये के नाखूनों के चुभन का आभास हो रहा था।

कक्ष में दासी के प्रवेश की आहट पाकर उसने उसकी ओर मुड़े बगैर ही आदेश दिया- “कक्ष में उजाला कर दो।”

आदेश पाकर दासी कक्ष में जगह-जगह मौजूद स्वर्ण दीपाधारों पर रखे दीपों को जलाने में व्यस्त हो गयी।

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“अनिष्ट! घोर अनिष्ट!” कुलगुरु दक्षिण की दिशा में चले गये खून से सने भेड़िये के पंजों के निशान को देखते हुए भयभीत स्वर में बोले- “जो संदेह हमारे मन में था, वह स्वयं ही सत्य सिद्ध हो गया।”

मरघट में महाराज, सेनापति और कुलगुरु के साथ-साथ सैनिकों की एक छोटी टुकड़ी भी उपस्थित थी। सजीवन के क्षत-विक्षत शव पर कपड़ा डाल दिया गया था। उसकी अकाल और हृदयविदारक मृत्यु ने श्मशानेश्वर के जागरण के

अफवाहों पर पूर्ण-विराम लागते हुए उन्हें सच का रूप दे दिया था।

“उन नागरिकों के दावे सही थे कुलगुरु, जिनके चोरी हए चौपायों के शव पहले ही यहाँ मरघट में प्राप्त हो चुके थे। उनका यह संदेह मिथ्या नहीं था कि अभयानन्द ब्रह्मपिशाच के रूप में लौट आया है।”

“हमें उसी क्षण अनहोनी का आभास हो गया था, जब अभयानन्द के दाह-कर्म की अगली सुबह हमें पीपल के पास दाह का कोई अवशेष नहीं प्राप्त हुआ था।” कुलगुरु ने कहा- “इस संभावना की ओर हमारा ध्यान गया था कि कहीं अभयानन्द के शरीर को कापालिक न उठा ले गये हों, किन्तु हमने ये सोचकर इस पर विचार नहीं किया था कि यदि कापालिक, अभयानन्द को पीपल से उतारकर ले गये भी होंगे तो असाधारण रूप से जल चुका उसका शरीर श्मशानेश्वर के काया-ग्रहण के लिए अपनी उपयुक्तता गँवा चुका होगा। यही कारण रहा कि विगत तीन दिवसों से राज्य में हो रहे पशुओं की चोरी को हमने अभयानन्द की वापसी से जोड़कर नहीं देखा, किन्तु अब सजीवन की मृत्यु इस भयानक रहस्य को अनावृत्त कर चुकी है कि श्मशानेश्वर अवतार ले चुका है।”

“किन्तु ऐसा कैसे संभव है कुलगुरु?” महाराज ने विचलित स्वर में कहा- “असाधारण रूप से जल जाने के उपरान्त भी कोई कैसे बच सकता है? जिस क्षण हम लौटे थे, उस क्षण पीपल भीषण आग की चपेट में था।”

“अप्रतिम जिजीविषा के कारण अभयानन्द का सहजता से प्राणोत्सर्ग नहीं हुआ। संभव है कि अग्नि की प्रचंडता उसकी वासना की प्रचंडता के आगे ठहर न पायी हो। हमें ये भी स्मरण होना चाहिए राजन कि जिस क्षण हमने वापसी की थी, उस क्षण तीव्र बारीश के संकेत प्राप्त हो रहे थे।”

महाराज कुलगुरु का आशय समझ गये। उन्हें उस क्षण पर अफसोस होने लगा, जब उन्होंने अभयानन्द की दाह-क्रिया समाप्त होने से पूर्व ही लौटने का आदेश दे दिया था।

“अब क्या होगा कुलगुरु?”

सेनापति के यक्ष-प्रश्न ने कुलगुरु को विचलित किया। उन्होंने एक गहरी साँस लेकर दक्षिण में फैले घने जंगल को देखा। जंगल भयानक प्रतीत हो रहा था। उसकी भयावहता कुछ इस कारण भी बढ़ी-चढ़ी हुई थी, क्योंकि अब उसमें एक नर-भेड़िया निवास कर रहा था।

“वह अपनी शक्तियां समेट रहा है। जैसे-जैसे उसकी रक्त-तृष्णा बढ़ेगी, उसके नर-संहार का तरीका भी परिवर्तित होगा। अभी तक उसने चौपाये पशुओं और रात को मरघट में उपस्थित एक मनुष्य का ही वध किया है। कोई आश्चर्य नहीं कि वह अपनी तृष्णा मिटाने के लिए राज्य में आना प्रारंभ कर दे। लोगों के बाहर निकलने की प्रतीक्षा न करके उनके घरों में प्रवेश करके उनका वध करने लगे। यदि वह मानवों का सामूहिक वध भी करे तो इसे उस पिशाच की भयावहता के अनुसार कम ही कहा जाएगा।”

“हे भगवती!” भयावह प्रारब्ध की कल्पना से वहां उपस्थित लोगों के रोंगटे खड़े हो गये- “तो क्या जिस रक्तपात को टालने के लिए हमने अभयानन्द को राज्य के इतिहास का सर्वाधिक क्रूर दंड दिया, वही रक्तपात अब भी होगा?”

“ऐसा ही होगा राजन। रक्तपात को टालने का अब कोई भी मार्ग शेष नहीं है, सिवाय सजग रहने के। राज्य के प्रत्येक नागरिक को मृत्यु से अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी। सैन्य सुरक्षा बढ़ानी होगी। नागरिकों की सुरक्षा के लिए कुछ नए मापदंड बनाने होंगे। उन्हें हिदायत देनी होगी कि वे समूह में रहने का प्रयत्न करें। रात को अकेले भ्रमण न करें और न ही किसी अपरिचित दस्तक पर घर के द्वार खोलें।”

“किन्तु इस तरह भय के साए में कितने दिनों तक जीवन यापन किया जा सकता है?”

“जितने दिनों तक विधाता ने हमारे भाग्य में लिखा होगा। जब तक हम अभयानन्द पर नियंत्रण पाने का कोई विकल्प नहीं तलाश लेते, तब तक कुछ इसी तरह की जीवन-शैली अपनानी होगी।” कहने के बाद कुलगुरु महाराज की ओर पलटे- “सैनिकों की एक टुकड़ी को अभयानन्द की तलाश में वन में भेज दीजिये सेनापति जी।”

“किन्तु उससे क्या होगा कुलगुरु?”

“दिन के समय तामसिक शक्तियां क्षीण रहती हैं। हालांकि इसकी संभावना कम ही है, किन्तु अगर अभयानन्द नजर आया तो उसे बंधक बनाना सहज होगा।”

वहां उपस्थित सैन्य-टुकड़ी के सैनिक आतंकित नजर आने लगे।

“क्या किसी पैशाचिक प्राणी को बंधक बनाना सच में सहज होगा कुलगुरु?” सेनापति ने आशंकित लहजे में पूछा।

“सहज तो अब कुछ भी नहीं रहा सेनापति। कुछ भी नहीं।” कुलगुरु ने ठंडी आह भरकर पराजित स्वर में कहा। उनके भाव इंगित कर रहे थे कि किसी निर्णय के परिणाम को लेकर वे स्वयं भी आश्वस्त नहीं थे।

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“देवी-मंदिर हेतु प्रस्थान का समय हो चुका है।” माया ने कक्ष में आयी हुई उस दासी को फटकारते हुए कहा, जो अपराधी भाव से गर्दन नीचे झुकाये हुई थी- “क्या तुम्हें ज्ञात नहीं कि द्विज को एक क्षण का भी विलम्ब स्वीकार्य नहीं?”

“क्षमा करें राजकुमारी जी!” दासी ने गर्दन झुकाए हुए ही उत्तर दिया- “महाराज का आदेश है कि आप राजमहल से बाहर न निकलें।”

“ओह!” माया ने एक गहरी सांस ली- “अब मुझे ज्ञात हुआ कि मेरे कक्ष के बाहर अचानक सैनिकों की संख्या क्यों बढ़ाई गयी? किन्तु मुझ पर लगे इस प्रतिबन्ध का कारण?”

“क्या आपको कारण नहीं ज्ञात राजकुमारी जी?” दासी ने माया की ओर देखा फिर स्वत: ही उत्तर दिया- “वह दुष्ट कापालिक, जिसने आपके साथ दुर्व्यवहार किया था, लौट आया है।”

माया को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। बीती हुई रात का स्वप्न याद आते ही उसके जिस्म में सिहरन दौड़ गयी।

“किन्तु....।” उसके होठों से अस्फुट सा स्वर निकला- “किन्तु ऐसा हुआ कैसे? उसे तो जीवित जला दिया गया था न?”

“तेज बारिश के आ जाने के कारण उसे आग के हवाले करके लोग लौट आये थे। कुलगुरु ने संभावना व्यक्त की है कि लोगों के लौट आने के बाद वहां कापालिक आये रहे होंगे और अभयानन्द को लेकर चले गये होंगे। कुलगुरु ने पूर्व में ही चेतावनी दे रखी थी कि यदि अभयानन्द का शरीर तीन दिनों के अंदर समाप्त नहीं किया गया तो उसमें श्मशानेश्वर पूर्णतया प्रवेश कर जाएगा।”

“ओह!” माया के चेहरे पर दहशत की छाया मंडराई- “तो इसका तात्पर्य ये है कि वे कापालिक अभयानन्द के शरीर को अपने साथ इसलिए ले गये क्योंकि वे चाहते थे कि श्मशानेश्वर उस शरीर में प्रविष्ट हो। और..और उनकी ये चाहत पूर्ण भी हो गयी है।”

“और ऐसा होने के पश्चात सबसे बड़ी असुरक्षा आप पर ही मंडरा रही है राजकुमारी जी। वह आपको अपनी गंदी नियत का शिकार बनाने के लिए ही लौटा है।”

“हे देवी माँ!” माया ने शुष्क हो चुके गले को थूक सटककर तर किया- “अब क्या होगा?”

“कुलगुरु ने भी अभी कोई उपाय नहीं बताया है, सिवाय कुछ सुरक्षा निर्देश देने के। उन्हीं सुरक्षा निर्देशों में से एक निर्देश ये भी है कि आपको राजमहल से बाहर न निकलने दिया जाए। सम्पूर्ण राज्य में आतंक की लहर है। लोग दिन के प्रकाश में भी एक पग तक चलने में डर रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि पूरा शंकरगढ़ ही वीरान हो गया है।”

माया के चेहरे की उलझनें क्षण-प्रतिक्षण गहराती चली गयीं। लम्बी खामोशी के बाद उसने पूछा- “द्विज कहाँ हैं?”

“स्पष्ट तो नहीं ज्ञात राजकुमारी, किन्तु राज्य में अफवाह है कि वे देवी-मंदिर छोड़ कर चले गये हैं।”

“क्या?” ये माया के लिए चौंकने का दूसरा अवसर था- “किन्तु क्यों? वे देवी-मंदिर छोड़ कर क्यों चले गये?”

“इसका कारण तो देवी-मंदिर के पुजारी ही बता सकते हैं राजकुमारी।”

माया के चेहरे पर अब दहशत और उलझन का मिला-जुला प्रभाव नजर आने लगा था।

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द्विज की हालत बदरंग हो चुकी थी।

दाढ़ी के बाल सामान्य से अधिक लम्बे हो गये थे। पैर के पंजों की दशा, मुखमंडल की मलीनता, अस्त-व्यस्त और गंदे कपड़े दर्शा रहे थे कि वह लम्बी पदयात्रा करके उस दुर्गम पहाड़ी प्रदेश में पहुंचा था, जहाँ दूर तक गगनचुम्बी पर्वतों और उनकी तलहटी में बसे जंगलों के सिवाय और कुछ नहीं नजर आ रहा था। उसने कंधे से एक झोला लटका रखा था। उसकी दशा ऐसी थी, जैसे कोई भिक्षुक भिक्षाटन हेतु निकला हो।

वह एक पहाड़ी पर खड़ा तलहटी में फैले जंगल को देख रहा था। दिन पहर भर चढ़ चुका था। दिवाकर की रश्मियों की उष्णता महसूस होनी शुरू हो चुकी थी। उसने गर्दन घुमाकर चारों दिशाओं का अवलोकन किया। वह प्रदेश जनशून्य था। दूर-दूर तक केवल पहाड़ और जंगल थे।

किसी विशेष चिह्न की तलाश में थिरकती द्विज की निगाहें एक दिशा में ठहर गयीं। दूर तलहटी में एक पहाड़ी नदी बह रही थी। सूर्य के प्रकाश में चमकती नदी की अथाह जलराशि द्विज को स्पष्ट नजर आ रही थी। नदी के आस-पास किसी जीर्ण-शीर्ण मंदिर के होने का संकेत भी मिल रहा था किन्तु घने जंगल के कारण मंदिर की आकृति स्पष्ट नहीं नजर आ रही थी।

द्विज के चेहरे पर एक चमक उभरी। उसने झोले में से एक नक्शा निकाला और नजर आ रही नदी के आस-पास के क्षेत्रों को नक़्शे से मिलाने लगा।

“संभवत: यही वो स्थान है। यही वो स्थान है।”

हर्षातिरेक में द्विज का बदन थरथरा उठा। मुखमंडल की मलीनता कहीं लुप्त हो गयी और उसका स्थान उत्साह ने ले लिया। उसने नक़्शे को झोले में रखा और जल्दी-जल्दी पहाड़ी की ढलान पर उतरने लगा।

हालांकि अभीष्ट नदी पहाड़ की चोटी से नजदीक जान पड़ी थी किन्तु द्विज को उस तक पहुँचने में दो घंटे लग गये। नदी के तट तक पहुँचते-पहुंचते उसका उत्साह ठंडा पड़ चुका था। जिस्म पसीने से तर हो गया था और गला सूख चुका था। गंतव्य मिल जाने के उत्साह को दो घंटे की पर्वतीय पदयात्रा की थकान ने क्षीण कर दिया था।

उसने झोले को कंधे से उतारकर चट्टान पर रखा और नदी की गहरी जलधारा में खड़े होकर उसकी शीतलता से स्वयं को तृप्त करने लगा। हाथ-मुंह धोने और प्यास बुझाने के बाद उसने नदी के दूसरे किनारे पर दृष्टि डाली।

उस पार भयानक श्मशान भूमि थी। काली पड़ चुकी जमीन और अनुष्ठान के चिह्न देखकर द्विज ने अनुमान लगाया कि वह श्मशान-भूमि तंत्र-साधना के लिए उपयोग में लाई जाती रही होगी। वातावरण शांत था। पक्षियों का कलरव भी नहीं था। निस्तब्धता के बीच जल-प्रवाह का कल-कल परिवेश में सुरीला संगीत बनकर गूँज रहा था। जिस जीर्ण-शीर्ण मंदिर की मौजूदगी को उसने पहाड़ी से ही महसूस कर लिया था, वह श्मशान के ठीक बीच में था, जो अपनी दशा और छोटे आकार के कारण श्मशान की भांति ही निर्जन दिखाई दे रहा था।

द्विज ने अपनी धोती को घुटनों के ऊपर चढ़ाया और नदी में जगह-जगह उभरे हुए चट्टानों का आश्रय लेते हुए नदी पार करके दूसरे किनारे पर पहुंचा। नक़्शे के आधार पर वह पहले ही सुनिश्चित कर चुका था कि यही उसका गंतव्य है, इसलिए बिना किसी हिचकिचाहट या भय के उसके कदम मंदिर की ओर बढ़ गये।

मंदिर में एक भयावह देवी-प्रतिमा स्थापित थी, जो तंत्र की कोई अधिष्ठात्रि देवी प्रतीत होती थीं। प्रतिमा में देवी, कमल के फूल पर मैथुनरत कामदेव और रती पर दोनों पाँव रख कर खड़ी थीं। उनके बायें हाथ में कटार थी और दायें हाथ में स्वयं उनका ही कटा हुआ शीश था। कंधे पर यज्ञोपवीत और गले में नरमुंडों की माला थी। देवी के कटे हुए कबंध से रक्त की तीन धारायें छूट रही थीं, जिनमें से दो उनके दायें-बायें निर्वस्त्र खड़ी दो योगिनियों के मुख में प्रवेश कर रही थीं और तीसरी धारा स्वयं देवी के कटे हुए शीश के मुख में प्रवेश कर रही थी। प्रतिमा की भयावहता इस कदर परकाष्ठा के चरम पर थी कि उसे देखने के पश्चात साधारण प्राणी उस दुर्गम प्रदेश के बियावान श्मशान में रुकने का साहस नहीं कर सकता था।

“शरणागत की रक्षा करो देवी छिन्नमस्ता! रक्षा करो।” द्विज प्रतिमा के सम्मुख साष्टांग लेट गया- “आप तंत्र की दश महाविद्याओं में पांचवें स्थान पर अवस्थित हो। जब जगत में तमोगुण का आधिक्य होता है तो आप का ही आविर्भाव होता है। आप तामसिक हो। तम को स्वयं में समाविष्ट करके जगत का उद्धार करने वाली हो। इसीलिए मैं आपकी शरण में आया हूँ। तामसिक साधनाएं पाकर अवतरित हो उठे श्मशानेश्वर की शक्तियों को अब केवल आपकी तामसिक शक्तियां ही परास्त कर सकती हैं। रक्षा करो माँ! तामसिक बाधा से हमारी रक्षा करो।”

द्विज भाव-भिभोर होकर गिड़गिड़ाता रहता अगर मंदिर के बाहर से उसे यह कर्कश स्वर न सुनाई पड़ा होता-

“कौन है रे! देवी के सम्मुख जाने का दुस्साहस कैसे हुआ तेरा?”

रोमांच से द्विज के रोंगटे खड़े हो गये। होठों से शब्दों का प्रवाह थम गया।

‘अघोरनाथ आ गये।’

उसने घबराकर आंखें बन्द कर ली और मन ही मन छिन्नमस्ता के स्वरूप का ध्यान किया।

प्रचण्ड चण्डिकां वक्ष्ये सर्वकाम फलप्रदाम्।

यस्या: स्मरण मात्रेण सदाशिवो भवेन्नर:।।

(अर्थ: ‘चण्डिका देवी का प्रचण्ड स्वरूप सभी कार्यों को सिद्ध करने वाला फलदायी होता है। जिनके स्मरण मात्र से नर शिव सदृश हो जाता है।’

द्विज अपने स्थान से बगैर हिले प्रतिमा के सम्मुख साष्टांग लेटकर, मस्तक को धरातल से टिकाए हुए ध्यान-श्लोक का उच्चारण करता रहा।

कर्कश आवाज दोबारा नहीं गूंजी बल्कि इसके विपरित लाठी टेकने का स्वर सुनाई दिया। व्दिज ने अनुमान लगाया कि आगन्तुक लाठी टेकते हुए मन्दिर में प्रवेश कर रहा था। उसकी सांसें उग्र हुईं। उसने जल्दी-जल्दी श्लोक का उच्चारण पूर्ण किया और सांस रोककर ध्वनि की अगली प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करने लगा।

लाठी की आख़िरी ‘ठक’ द्विज के पैरों के पास आकर रुक गयी। उसने पलकें भींच ली और देवी के रौद्र रूप का ध्यान करने लगा।

“उठ!” आगंतुक ने सख्त स्वर में आदेश दिया।

द्विज पूर्ववत पड़ा रहा।

“उठ!” इस बार आगंतुक लहजा क्रोध से परिपूर्ण था।

“नहीं!” द्विज ने निर्भीक स्वर में उत्तर दिया- “यदि मैं देवी के चरणों में से उठा तो इस गोपनीय तंत्र-पीठ पर आने के अपराध में आप अपना शूल मेरी छाती में उतार देंगे। आप देवी के चरणों में पड़े भक्त की हत्या नहीं कर सकते, इसलिए मैं यहाँ से नहीं उठूंगा। मैं मृत्यु का आलिंगन नहीं करना चाहता।”

“तू कोई कपटी प्राणी ज्ञात होता है। कौन है? और यहाँ क्यों आया है?”

“मुसीबत का मारा हूँ प्रभु! आपका कृपा-फल प्राप्त करने आया हूँ।”
 
जब द्विज को कई क्षणों तक अघोरनाथ की वाणी नहीं सुनायी दी तो वह आगे कुछ बोलने ही वाला था कि अचानक अघोरनाथ बोल पड़े- “इस महागोपनीय तंत्र-पीठ का पता किसने दिया तुझे?”

“जिस तामसिक बाधा से मैं और मेरा राज्य ग्रस्त हो चुका है, उसके निवारण की तलाश में मैं दर-दर भटकता हुआ काशी स्थित नागा साधुओं के सबसे प्राचीन अखाड़े ‘आह्वान अखाड़ा’ पहुंचा था। मेरी बाधा की तामसिक प्रवृत्ति से आहत होकर अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी स्वरूपानंद ने मुझे यहाँ का पता बताया। स्वयं उन्होंने अपने हाथों से मुझे यहाँ आने के मार्ग का नक्शा बनाकर दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मेरी तामसिक बाधा को वही साधक हर सकता है, जिसने तंत्र की पांचवीं महाविद्या की अधिष्ठात्रि देवी माँ छिन्नमस्ता को सिद्ध किया हुआ हो।”

द्विज को एक बार फिर अघोरनाथ की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं सुनायी दी।

“स्वामी स्वरूपानन्द ने मुझे ये भी बताया था कि अलौकिक शक्तियां प्राप्त करने के लोभ में इस गोपनीय तंत्र-पीठ पर आने वाले कपटी मनुष्यों को देखते ही आप उनका वध कर देते हैं और अमावस की मध्य-रात्रि को उनके शव पर शव-साधना करते हैं। आपके इस कोप से बचने के लिए ये युक्ति मुझे उन्होंने ही बतायी थी कि यदि मैं माता के सम्मुख दंडवत हो जाऊं तो उस दशा में आप मुझ पर प्रहार नहीं करेंगे।”

“किस बाधा से त्रस्त है तू?”

“सर्वप्रथम मुझे अभयदान दीजिये प्रभु! अन्यथा मैं देवी के चरणों में मस्तक पटक-पटक कर प्राण त्याग दूंगा।”

“उठ जा!”

“नहीं! बिना वचन लिए मैं नहीं उठूंगा।”

“एक साधक पर संदेह प्रकट करता है मूर्ख!” अघोरनाथ इस बार तेज स्वर में

चीखे।

“आप तो काल की गति के ज्ञाता हैं प्रभु! क्या आपको मेरी विवशता नहीं दिखाई दे रही है? मैं इस तंत्र-पीठ पर आकर जिस हठयोग की कामना कर रहा हूँ क्या उस दुस्साहस के दंडस्वरूप ये संभव नहीं है कि यदि मैं बिना अभयदान लिए उठा तो आप मेरा वध कर देंगे?”

“कुशल तर्कशास्त्री प्रतीत होता है तू।” अघोरनाथ का स्वर आश्चर्यजनक ढंग से नर्म पड़ गया। ऐसे ही तो होते हैं सच्चे साधक। पल भर में प्रचंड अग्नि की भांति उग्र तो पल भर में ही किसी बालक की भांति सौम्य हो जाने वाले। उन्होंने आगे कहा- “निर्भय हो जा! तेरा वध नहीं करेंगे हम। यदि तेरे कर्म सात्विक हुए तो महामाया की प्रेरणा से तेरी सहायता करेंगे।”

द्विज की बाछें खिल गयीं। उसने श्रद्धाभाव से अभिभूत होकर छिन्नमस्ता का आभार प्रकट किया और धीरे-धीरे अपने स्थान से उठा, अघोरनाथ की ओर

पलटा।

द्विज को महसूस हुआ कि अचानक उसे शिव के सम्मुख खड़ा कर दिया गया है। उसने अपने जीवन में पहली बार किसी सिद्ध पुरुष से साक्षात्कार किया। अघोरनाथ के सुडौल जिस्म पर किसी शव की ताजी राख का लेप था। कमर में एक मृगचर्म के अतिरिक्त बदन पर रेशम का एक धागा तक नहीं था। माथे पर त्रिपुंड और गले तथा कलाईओं में दुर्लभ रुद्राक्ष की मालाएं थीं। आखें उदीयमान सूर्य की भांति रक्तवर्ण थीं, जिनसे असहनीय चमक प्रस्फुटित हो रही थी। उनके दाहिने हाथ में उनके कद के आकार का त्रिशूल था। सिर पर एक वयस्क मनुष्य की भुजाओं की लम्बाई की आधी ऊंचाई वाला घना जूड़ा था, जिसमें जकड़ी लटें भुजंग के समान नजर आ रही थीं।

द्विज उनके पैरों से लिपट गया।

“आपको वचनबद्ध करने के लिए क्षमाप्राथ्री हूँ प्रभु! किन्तु आपका कोपभाजन बनने से बचने के लिए यही एक मार्ग था।”

“व्यथा क्या है तेरी?”

“श्मशानेश्वर को काया प्राप्त हो गयी है।”

द्विज ने एक झटके से कह दिया क्योंकि स्वरूपानन्द ने उसे सख्त हिदायत दी थी कि यदि अघोरनाथ समस्या के विषय में पूछें तो उन्हें बिना कोई भूमिका बांधे बता दे। स्वरूपानन्द के अनुसार, कोई सिद्ध पुरुष सामने वाले के किसी छिपे हुए अवगुण को देखकर कब उसकी सहायता से इनकार कर दे, इस विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता।

अघोरनाथ ने चौंक कर अपने कदमों में पड़े द्विज को देखा।

“ये सत्य है प्रभु! श्मशान भूमि में विचरने वाले एक महापिशाच की आत्मा काया ग्रहण करके अवतरित हो उठी है।”

अघोरनाथ के चेहरे पर अविश्वास के भाव थे। द्विज को उनके चेहरे पर भय की छाया भी नजर आ रही थी।

“रक्षा कीजिये प्रभु!”

अघोरनाथ ने द्विज से अपने पैरों को छुड़ाया और मंदिर से बाहर आ गये। द्विज भी उनके पीछे-पीछे बाहर आ गया।

“कैसे हुआ ऐसा?” लम्बी खामोशी के बाद जब अघोरनाथ को महसूस हो गया कि द्विज का कथन सत्य है तो उन्होंने मुंह खोला- “श्मशानेश्वर तो मरघट की सर्वोच्च पैशाचिक शक्ति है। एक वृक-मानव है। ब्रह्मराक्षस योनी का कष्ट भोगने से बचने के लिए दुराचारी ब्राह्मण उसकी साधना करके उसे अपने शरीर में आमंत्रित करते हैं। अपनी आत्मा का उसके साथ सौदा करते हैं। उसके साम्राज्य में शरण पाने के मूल्य पर उसे अपना शरीर सौंपते हैं। तेरे राज्य में किसने उसकी भयानक साधना की? किस मूर्ख ने उसे अपना शरीर सौंपा?”

द्विज ने पूरे प्रकरण का सविस्तार वर्णन कर दिया।

“पाप तो तूने किया ही है द्विज! एक ऐसा पाप किया है तूने जिसका प्रतिफल आज पूरा शंकरगढ़ भुगत रहा है। यदि तूने अभयानन्द के शरीर को जल जाने दिया होता तो श्मशानेश्वर अवतरित न हो पाता। किसी स्थान पर श्मशानेश्वर के अवतरण का तात्पर्य होता है उस स्थान का विनाश। उस स्थान को ईश्वर छोड़ कर चले जाते हैं। और फिर ऐसे स्थान पर किसी भी धार्मिक अनुष्ठान का कोई फल नहीं प्राप्त होता। कोई भी तांत्रिक उस पिशाच से मनुष्यों को मुक्ति नहीं दिला पाता।”

“किन्तु आप तो तांत्रिकों से भी ऊपर एक सिद्ध पुरुष हैं। आपने मानवों के कल्याणार्थ ही तंत्र पर अपना आधिपत्य स्थापित किया है। क्या आप भी मुझे मेरे पाप के प्रायश्चित का मार्ग नहीं सुझा सकते?”

“तूने जो पाप किया है, वह तमोगुण के प्रभाव में आकर नहीं किया है। उस पाप के पीछे तेरा कोई स्वार्थ न होकर केवल भातृ-प्रेम ही था। इसलिए तेरे कर्म तुझे प्रायश्चित का एक अवसर अवश्य देंगे।”

“अर्थात...।” सुखद आश्चर्य से व्दिज का लहजा कंपकपाया- “अर्थात उस पिशाच से मुक्ति पाने का अभी भी कोई विकल्प शेष है प्रभु?”

“मार्ग तो अवश्य ही है, किन्तु विकट है। प्राणों का घोर संकट है, तथापि कार्य के सिध्द होने की संभावना तुच्छ है।”

“आप मार्ग बताएं प्रभु। मैं नगण्य संभावना वाले मार्ग पर भी चलने को तत्पर हूं। मैं अपनी संकल्प और इच्छाशक्ति से कार्य-सिध्दी की उस नगण्य संभावना को शत-प्रतिशत संभावना में परिवर्तित कर दूंगा।”

“तेरे विचार अत्युत्तम हैं।” अघोरनाथ की आंखों में व्दिज के लिए प्रशंसात्मक भाव उभरे- “तंत्र की शक्तियां संकल्प और इच्छाशक्ति से ही संचालित होती हैं। जितना दृढ़ संकल्प होता है, उतनी ही प्रभावशाली तंत्र की शक्तियां होती हैं।”

“आप राह दिखायें प्रभु। मैं अपना संकल्प क्षीण नहीं पड़ने दूंगा।”

अघोरनाथ ने कुछ नहीं कहा। सोचनीय मुद्रा में चहलकदमी करते हुए वे नदी के तट तक आये।

“राह बताने से पूर्व हमें अनुमति लेनी होगी।” उन्होंने नदी की विपुल जलराशि पर इस कदर दृष्टिपात करते हुए कहा, जैसे जल की धारा में कुछ तलाश रहे हों।

“कैसी अनुमति प्रभु? आपको भला किससे अनुमति लेनी होगी?”

“तंत्र के प्रयोग के नियमों के अंतर्गत एक नियम ये भी है कि साधक को किसी साधारण मनुष्य को भौतिक लाभ प्रदान करने के लिए अपनी सिद्धी के प्रयोग से पूर्व उस सिद्धी की अधिष्ठात्रि देवी से अनुमति लेनी होती है। ऐसा श्रीमद्भागवत गीता में कहे गये कर्म-सिद्धांत की निरंतरता को बनाये रखने के लिए आवश्यक है। सम्बंधित मनुष्य के कर्म सात्विक होने तथा उसे तंत्र का लाभ प्रदान करने पर उसके कर्मों के हिसाब में कोई व्यतिक्रम उत्पन्न न होने की दशा में ही अधिष्ठात्रि देवी उसके हित के लिए तंत्र के प्रयोग की अनुमति देती हैं। एक सच्चा तांत्रिक वही होता है, जो तंत्र के नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करता है।”

द्विज का कलेजा हलक में आ फंसा।

“यदि देवी ने आपको अनुमति नहीं दी तो?”

“तेरा प्रकरण सुनने के पश्चात इसकी संभावना बहुत कम है कि देवी तंत्र-क्रिया की अनुमति नहीं देंगी। श्मशानेश्वर तेरे ही भूल के कारण अस्तित्व में आया है, इसलिए देवी तुझे भूल सुधारने का अवसर अवश्य देंगी।”

“आप देवी से अनुमति कब मांगेंगे?”

“आज रात्रि अमावस्या है। देवी को जागृत करने के लिए उपयुक्त अवसर है। हम शव-साधना के माध्यम से आज ही देवी का आह्वान करेंगे।”

व्दिज ने राहत की सांस ली, किन्तु इससे पूर्व कि वह कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करता, जल की लहरों पर ठहरी अघोरनाथ का निगाहों में चमक आ गयी। वे व्दिज की ओर पलटे और नदी के दूसरे किनारे की ओर संकेत करते हुए बोले- “उस पाट पर एक युवक का शव आ लगा है। उसे खींचकर हमारे पास ला। आज रात्रि की शव-साधना में हम उसे ही प्रयुक्त करेंगे।”

द्विज ने उस पार नजर डाली। उसे कहीं कोई शव नहीं दिखा। उसने चेहरे पर आश्चर्य लिए हुए अघोरनाथ की ओर देखा।

“शव को इस पार ला।” उन्होंने अपना आदेश दोहराया।

द्विज ने अघोरनाथ के कोप से डरकर कोई प्रश्न नहीं किया और नदी की जलधारा में उतर गया। वह एक बार फिर चट्टानों का सहारा लेकर उस पार पहुंचा। उसके हैरत की सीमा न रही। तट पर सचमुच एक युवक का शव आ लगा था। चट्टान की आड़ में होने के कारण लाश किनारे से नजर नहीं आयी थी।

युवक की अवस्था बीस-बाईस वर्ष से अधिक नहीं थी। लाश को देखकर ये बताना कठिन था कि उसकी मृत्यु की वजह क्या थी? द्विज ने अनुमान लगाया कि युवक ने आत्महत्या के ध्येय से गहरे पानी में छलांग लगाया होगा। लंबे वक्त तक पानी में रहने के कारण लाश घिनौनी हो गयी थी। द्विज ऐसी चीजों का अभ्यस्त नहीं था। उसने किसी तरह अपनी उबकाई रोकी और लाश का बाल

पकड़कर उसे खींचते हुए दूसरे किनारे तक ले आया।

“सर्पदंश से मृत्यु हुई है इसकी।” अघोरनाथ ने शव का अवलोकन करते हुए कहा- “परंपरा के अनुसार इसके शव का दाहकर्म न करके नदी में प्रवाहित कर दिया गया। साधू-संतों, अत्यल्प वयस के बालकों अथवा सर्पदंश के शिकार हुए व्यक्तियों के शव को जलाने की बजाय नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। ऐसे शवों को ही हम अपनी साधना में प्रयुक्त करते हैं। अब तू अपने स्थान को लौट जा।”

“किन्तु प्रभु....!”

“संशय रहित मन के साथ लौट जा।” अघोरनाथ ने द्विज की बात काटकर कहा- “तेरे शंकरगढ़ पहुँचने से पूर्व ही हम वहां पहुँच चुके होंगे। हम तुझे वहीं पर बतायेंगे कि महापिशाच को किस प्रकार नियंत्रित किया जाएगा।”

“क्या ये संभव नहीं है प्रभु कि मैं आपको साथ लेकर अपने राज्य को प्रस्थान

करूं?”

“नहीं!” अघोरनाथ ने तीखे स्वर में मना किया- “उसके लिए तुझे आज रात्रि इस श्मशान भूमि में ठहरना होगा और ये तंत्र पीठ है। यहाँ अमावस्या की रात होने वाली मायावी तंत्र-क्रियाओं को देख तुझ जैसे सामान्य मनुष्य भय से पागल हो जाते हैं।”

 
13

“द्विज आपसे मिलने के इच्छुक हैं महाराज।”

द्वारपाल के उपरोक्त सन्देश को सुनते ही सभागार में चल रही महत्वपूर्ण मंत्रणा पर विराम लग गया।

“द्विज?” महाराज के माथे पर बल पड़े- “अर्थात..अर्थात वे लौट आये?”

“जी हाँ, महाराज।”

उदयभान ने एक नजर उपस्थित सभासदों पर डाली। प्रत्येक के चेहरे पर मंत्रणा से अधिक द्विज के आगमन में दिलचस्पी देख कर उन्होंने आदेश दिया- “भेज दो उन्हें।”

द्वारपाल के जाने के थोड़ी देर बाद द्विज ने सभागार में प्रवेश किया।

उसे देखकर महाराज समेत सभी सभासद चौंके। सामने जो मनुष्य खड़ा था, उसका परिचय यदि द्वारपाल ने पूर्व में ही द्विज के रूप में नहीं दिया होता तो उसे कोई नहीं पहचान पाता। उसके दाढ़ी के बाल बढ़ने के साथ-साथ सफाचट सिर पर भी बाल उग आये थे। उसके कपड़े धूल से सन गये थे। नंगे और धूलधूसरित पैरों से खून बहकर सूख गया था।

“आप कहाँ गये थे द्विज? आपकी दशा इंगित कर रही है कि आप माह भर की पदयात्रा से लौटे हैं।”

“आपका अनुमान सत्य है महाराज। मैं लम्बी अवधी की यात्रा से लौटा हूँ, जिसका मुख्य उद्देश्य उस भूल की प्रायश्चित का मार्ग तलाशना था, जिसके कारण आज शंकरगढ़ की धरती लहूलुहान हो रही है।”

“स्पष्ट कहिये द्विज।”

द्विज ने विनम्र भाव से सभासदों की ओर देखा और एक कुशल याचक की भांति शालीनता पूर्वक बोला- “आप से एकांत का अनुरोध करना चाहता हूँ महाराज। आपके समस्त प्रश्नों के उत्तर मात्र आपके और कुलगुरु की उपस्थिति में देना चाहता हूँ।”

द्विज का अनुरोध स्वीकार कर लिया गया। जब सभागार में केवल महाराज और कुलगुरु रह गये तो द्विज ने मुंह खोला- “मैं राज्य का अपराधी हूँ महाराज। पूरे प्रकरण को सुनने के बाद मेरे प्रति आपके मन में व्याप्त सम्मान रसातल को चला जाएगा और उसके स्थान पर घृणा व्याप्त हो जाएगी।”

“आप कहना क्या चाहते हैं द्विज? कैसा अपराध किया है आपने?” महाराज ने आशंकित लहजे में पूछा।

द्विज ने गहरी सांस ली और फिर उसी गाथा को यहाँ भी दोहरा दिया, जिसे

उसने अघोरनाथ के सम्मुख कहा था।

द्विज के अपराध से अवगत होने के पश्चात महाराज और कुलगुरु ने अवश्य ही उसे घृणित स्वर में फटकारा होता, यदि उन्होंने उसके मुखमंडल पर घोर पश्चाताप का भाव नहीं देखा होता।

“ओह!” महाराज ने रोष से परिपूर्ण लहजे में कहा- “हमें तो स्वप्न में भी ये भान नहीं था कि अभयानन्द नाम के उस दुष्ट कापालिक के साथ आपका रक्त-संबंध था। हम आज तक इसी विश्वास से बंधे रहे कि अभयानन्द को ले जाने वाले कापालिक थे। किन्तु आज आपने स्वयं ही सिद्ध कर दिया कि हमारा वह विश्वास मात्र एक मिथ्या भ्रम था। ये कैसा भातृप्रेम था द्विज, जो आपने अभयानन्द के शरीर में प्रवेश कर चुके पिशाच की भयावहता से अवगत होते हुए भी उसके शरीर को नष्ट होने से बचाने का प्रयत्न किया और सम्पूर्ण राज्य को एक पिशाच के सम्मुख भोज के रूप में प्रस्तुत कर दिया? क्या आपको सूचना है कि राज्य में हर रात एक महापिशाच मृत्यु बांटने आता है? उसके दूषित अस्तित्व के कारण राज्य के निर्धन किसानों की फसलें तक नष्ट हो चुकी हैं?”

द्विज ने अपराधी भाव से गरदन झुका लिया।

“वाद-विवाद से कोई लाभ नहीं है राजन!” कुलगुरु ने हस्तक्षेप किया- “द्विज ने थोड़े समय पूर्व ही कहा कि वे अपने भूल के प्रायश्चित का मार्ग तलाश करने गए थे।”

“हाँ महाराज!” द्विज ने उत्साहित होकर चेहरा ऊपर उठाया- “मैं उस महापिशाच के अंत का मार्ग तलाशने गया था।”

“जिस महापिशाच का प्रादुर्भाव होने पर देवता भी अपने निवास से पलायन कर जाएँ, जिस महापिशाच को वश में करने का उपाय दुर्लभ ग्रंथों में भी अंकित न हो, उस महापिशाच का अंत करने का मार्ग आखिरकार आपको कैसे प्राप्त हुआ?”

“मैं असम के एक दुर्गम प्रांत में स्थित माँ छिन्नमस्ता के तंत्र-पीठ पर गया था।”

“क्या?” कुलगुरु बुरी तरह चौंके- “आप...आप तंत्र-पीठ पर गये थे?”

“हाँ कुलगुरु।”

“किन्तु तंत्र-पीठ तो अत्यंत गोपनीय होते हैं। वहां पहुँचने का मार्ग किसने बताया आपको?”

“पुजारी बाबा द्वारा लताड़े जाने पर जब मेरा मोह-भंग हुआ तो मुझे बोध हुआ कि मैं न केवल राज्य के विनाश की पटकथा लिख बैठा हूँ अपितु अपने बड़े भाई को भी अनंत-काल तक के लिए श्मशानेश्वर के नरक रूपी साम्राज्य में भटकने हेतु विवश कर चुका हूँ। अपने भूल के प्रायश्चित का मार्ग तलाशने के लिए मैं देशाटन को निकल पड़ा। अनेक तीर्थों का भ्रमण करते हुए मैं सनातन-संस्कृति की राजधानी काशी जा पहुंचा। किसी सिद्ध तांत्रिक की तलाश मुझे नागा-साधुओं के अखाड़े की ओर खींच ले गयी। आह्वान अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी स्वरूपानन्द ने भी श्मशानेश्वर के सन्दर्भ में असमर्थता जतायी, किन्तु उन्होंने मुझे असम के एक दुर्गम और पर्वतीय प्रांत में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बसे भयावह श्मशान तक जाने का नक्शा बनाकर दिया, जो वास्तव में एक गोपनीय तंत्र-पीठ है, जहाँ एक सिद्ध योगी-पुरुष अघोरनाथ निवास करते हैं।”

“अघोरनाथ?” कुलगुरु के नेत्र आश्चर्य से फैल गये- “तो क्या आपको अघोरनाथ के दुर्लभ दर्शन का लाभ प्राप्त हुआ?”

“क्या आप उन्हें जानते हैं कुलगुरु?” द्विज के कुछ बोलने से पूर्व ही महाराज ने कुलगुरु को लक्ष्य करके पूछा।

“वे छिन्नमस्ता के महासाधक हैं। द्विज जिस तंत्र-पीठ का वर्णन कर रहे हैं, वही उनका निवास स्थान है। वह स्थान इतना गोपनीय, रहस्यमयी और भयावह है कि यदि स्वामी स्वरूपानन्द ने द्विज को उस स्थान का नक्शा नहीं दिया होता तो द्विज वहां कभी नहीं पहुँच पाते और यदि किसी तरह पहुँच भी जाते तो जीवित वापस नहीं लौट पाते। तंत्र-समुदाय के साधक अघोरनाथ को शिव का स्वरूप मान कर उन्हें अपने आदर्श की संज्ञा देते हैं। ये अवश्य ही द्विज के पूर्वजन्म के पुण्य कर्मों अथवा सात्विक विचारों का प्रतिफल है, जो ये उस तंत्र-पीठ से जीवित लौट आये। पापी मनुष्यों अथवा तंत्र के दुरुपयोग की कामना रखने वाले साधकों के सम्मुख आते ही अघोरनाथ उग्र होकर कल-भैरव का रूप धारण करके उसका वध कर देते हैं।”

द्विज के सत्साहस से अवगत होते ही महाराज के चेहरे पर छाये रोष के बादल छंटने लगे।

“हम आपके साहस की प्रशंसा करते हैं द्विज।”

“नहीं महाराज! मैं जिस विकट संकट का निमित्त बना हूँ, उसका अंत करने के लिए मात्र इतना ही साहस पर्याप्त नहीं है। मेरे साहस की असली परीक्षा तो अब होनी है।”

“अघोरनाथ ने श्मशानेश्वर के प्रकोप को शांत करने का क्या उपाय बताया द्विज?” कुलगुरु ने पूछा।

“उन्होंने कोई मार्ग बताये बिना ही मुझे लौट जाने का आदेश दिया था। उन्होंने कहा था कि वे स्वयं शंकरगढ़ आयेंगे और उसी समय महापिशाच की शान्ति का उपाय बताएंगे। उन्होंने ये दावा भी किया था कि वे मुझसे पूर्व ही यहाँ

उपस्थित हो जायेंगे।”

“ओह!” कुलगुरु की आँखें सोचनीय मुद्रा में गोल हो गयीं- “तो क्या वे यहाँ आ चुके हैं?”

“हाँ कुलगुरु! मैं स्वयं भी अचम्भित रह गया, जब देवी-मंदिर पहुँचने पर मैंने पाया कि अघोरनाथ मुझसे पहले ही वहां पधार चुके है और पुजारी बाबा को अपना परिचय देकर उन्हें सम्पूर्ण प्रकरण से अवगत भी करा चुके हैं।”

“इस क्षण कहाँ हैं वे?” महाराज और कुलगुरु ने समवेत स्वर में पूछा। दोनों के लहजे में रोमांच का पुट था।

“उन्होंने अभयानन्द का निवास देखने की इच्छा प्रकट की थी, सो इस क्षण वे अभयानन्द की कुटी में ही होंगे। मैं आप लोगों को उनके आगमन की सूचना देने ही आया हूँ।”

महाराज द्विज का मंतव्य समझ गए। उन्होंने करतल ध्वनि उत्पन्न करके एक दास को सभागार में बुलाया और आदेश दिया-

“हमारी सवारी तैयार की जाये।”

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अघोरनाथ उस शय्या का ध्यानपूर्वक निरिक्षण कर रहे थे, जिस पर द्विज ने अभयानन्द को लिटाया था। अधजले शरीर से बहने वाला तरल शय्या पर सूख चुका था, जिस पर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं। अघोरनाथ उस सूखे हुए तरल से घिरे स्थान का निरिक्षण करके अभयानन्द की कद-काठी का आकलन कर रहे थे। उनके मुखमंडल पर उतने ही शांत भाव थे, जितने शांत भाव एक ध्यान-मग्न योगी के मुखमंडल पर होते हैं।

द्विज, कुलगुरु और महाराज के आगमन की आहट महसूस करके भी उन्होंने उनकी दिशा में गर्दन नहीं घुमाया।

“पिशाच शक्तिशाली है।” अघोरनाथ ने सूखे हुए तरल का अवलोकन करते हुए कहा- “प्रतिशोध की भावना ने उसे भयानक बना दिया है। अभयानन्द के अवचेतन मस्तिष्क में उपस्थित गन्दी वासनाएं श्मशानेश्वर के सूक्ष्म शरीर की शक्ति प्राप्त करके प्रचण्ड रूप से भड़क उठी हैं। उन वासनाओं को पूर्ण करने के लिए श्मशानेश्वर क्रूरता की बड़ी से बड़ी सीमाएं भी लांघ जाएगा।”

“किन्तु प्रभु, पन्द्रह दिन से राज्य में जो नरसंहार हो रहा है, उसे रोकने का कोई तो मार्ग होगा। संसार में पिशाच के साथ-साथ ईश्वर का भी तो अस्तित्व है।”

महाराज का विनम्र स्वर कानों से टकराते ही अघोरनाथ उनकी ओर मुड़े। कई क्षणों तक उनके मुखमण्डल को निरखने के पश्चात उन्होंने मुंह खोला- “है। उपाय है। यदि उपाय न होता तो हम सहस्र कोस की यात्रा तय करके यहां आते ही

क्यों?”

सुखद रोमांच से अभिभूत होकर तीनों ने राहत की सांस ली।

“किन्तु...!” अघोरनाथ ने व्दिज पर निगाह डाली- “हम व्दिज को तंत्र-पीठ पर ही इस कटु सत्य से अवगत करा चुके हैं कि उपाय प्राणघातक है। सफलता की प्रायिकता शून्य नहीं है तो शून्य से बहुत अधिक भी नहीं है।”

“मैं आपको सम्पूर्ण स्थिति से अवगत करा चुका हूं प्रभु!” व्दिज ने अधीर लहजे में कहा- “आप केवल उपाय बताएं। मैंने जो भूल की है, वह भूल विनाश का बादल बनकर शंकरगढ़ पर कहर बरसा रहा है। जिस राज्य ने मुझे एक अनाथ के रूप में अपने दामन में आश्रय दिया, उस राज्य पर मेरे कारण आए संकट को टालने में यदि मेरे प्राण भी चले जाएं तो भी मैं अब तक काल के गाल में समा चुके नागरिकों की हत्या के पाप से मुक्त नहीं हो पाऊंगा।”

अघोरनाथ ने गहरी सांस ली और शय्या पर बनी अभयानन्द की अनुकृति पर दृष्टिपात करने के बाद कहना प्रारम्भ किया-

“जो मनुष्य श्मशानेश्वर को अपनी काया में आमंत्रित करता है, वह मनुष्य सर्वप्रथम उस काया से श्मशानेश्वर का निष्कासन कराता है, जिसमें उसका वर्तमान निवास होता है। यह क्रिया काया-संयुग्मन के माध्यम से पूर्ण की जाती है, जिसके लिए एक वयस्क नरबली की आवश्यकता होती है। नरबली हेतु चयनित मनुष्य की काया को श्मशानेश्वर के पूर्ववर्ती धारक की काया के साथ संयुग्मित कराया जाता है। दो शरीरों के संयुग्मन का अर्थ होता है कि वे दोनों शरीर भौतिक रूप से पृथक होते हुए भी एक दूसरे से जुड़ जाते हैं। सरल अर्थों में केवल इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि वे दो शरीर एक प्राण हो जाते हैं। इसके पश्चात चयनित मनुष्य की बलि चढ़ा दी जाती है। उस मनुष्य की मृत्यु होते ही श्मशानेश्वर के धारक की भी मृत्यु हो जाती है और उसी क्षण श्मशानेश्वर अपने पूर्ववर्ती धारक का शरीर छोड़कर नये धारक के शरीर की ओर आकर्षित हो जाता है और तीन दिवसों की प्रक्रिया के पश्चात वह नये धारक के शरीर में पूर्णतया आविष्ट हो जाता है।”

“किन्तु इस प्रक्रिया में काया-संयुग्मन अथवा नरबली की क्या आवश्यकता है? क्या श्मशानेश्वर स्वयं अपनी शक्तियों के बल पर पूर्ववर्ती धारक से नवीन धारक में स्थानान्तरित नहीं हो सकता?” कुलगुरु ने पूछा।

“नहीं। श्मशानेश्वर अपने वर्तमान धारक की काया से तब तक निष्कासित नहीं होता जब तक कि उस काया को नष्ट न कर दिया जाए।”

“क्षमा चाहता हूं प्रभु...!” कुलगुरु ने एक बार फिर हस्तक्षेप किया- “किन्तु क्या आप इस प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं कि पूर्ववर्ती धारक के शरीर को नष्ट करना

क्यों आवश्यक होता है?”

“श्मशानेश्वर एक दूषित आत्मा है। जब वह पिछले धारक के शरीर में लम्बी अवधि तक निवास कर लेता है तो आत्मा की स्वाभाविक प्रवृत्ति के फलस्वरूप उसे उस शरीर से मोह हो जाता है। नये धारक के शरीर में प्रविष्ट कराने के लिए, श्मशानेश्वर के उस मोह को भंग करना आवश्यक होता है और ऐसा पुराने धारक के शरीर को नष्ट करके ही किया जा सकता है।”

“पूर्ववर्ती धारक के शरीर को नष्ट करने की यह क्रिया ‘काया-संयुग्मन’ के माध्यम से क्यों सम्पादित की जाती है? पूर्ववर्ती धारक के शरीर को प्रत्यक्ष रूप से क्यों नहीं नष्ट किया जाता?”

व्दिज के प्रश्न पर अघोरनाथ ने उसे इस कदर घूरा, मानो उसका प्रश्न मूर्खतापूर्ण हो।

“यदि तुम्हें तुम्हारी काया नष्ट करनी आवश्यक हो जाए, तो क्या ये कार्य तुम्हारे लिए सहज होगा?”

व्दिज झेंप गया। उसे अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया था। थोड़ा-बहुत जो संशय था, उसे अघोरनाथ के स्पष्टीकरण ने दूर कर दिया।

“जो मनुष्य नरबली हेतु उद्दिष्ट होता है, उसे काया-संयुग्मन के व्दारा माध्यम बनाया जाता है ताकि श्मशानेश्वर के वर्तमान धारक को होने वाला मृत्यु का भावी भीषण कष्ट, उसके साथ युग्मित शरीर को हस्तान्तरित हो जाए।”

“तो इसका तात्पर्य ये हुआ कि बिरजू ही वह व्यक्ति था, जिसे श्मशानेश्वर के पूर्व धारक अघोरा के साथ युग्मित करके उसकी बलि चढ़ायी थी ताकि अघोरा को उसके शरीर के मौत की अनुभूति न होने पाए।”

“हां दिव्यपाणी!” अघोरनाथ, कुलगुरु दिव्यपाणी की ओर मुखातिब हुए। उनकी आंखों में दिव्यपाणी के लिए प्रशंसा के भाव थे- “तुमने कुलगुरु होने के कर्तव्य का कुशलतापूर्वक पालन किया था और राजा को अभयानन्द का शरीर नष्ट करने का सर्वथा उचित परामर्श दिया था। ये विधि का विधान ही था, जो तुम्हारा परामर्श अपेक्षित परिणाम देने में विफल रहा।”

“अब उस विफलता के प्रकोप से कैसे बचा जा सकता है प्रभु?”

अघोरनाथ के चेहरे पर एक बार फिर गम्भीर भाव व्याप्त हो गये। थोड़ी देर के मनन के बाद उन्होंने कहा- “उपाय यही है कि जो तब नहीं किया गया, उसे अब किया जाए।”

“अर्थात?” महाराज, कुलगुरु और व्दिज का समवेत स्वर।

“अर्थात अभयानन्द के शरीर को नष्ट कर दिया जाए।”

“किन्तु....किन्तु ये तो असंभव है।” व्दिज की लहजा थरथराया- “वह तो

मृत्यु का देवता बन चुका है। आप जो करने का परामर्श दे रहे हैं, उसे कोई उपाय नहीं माना जा सकता है। ये तो ठीक वैसा ही है, जैसे एक अजेय पिशाच का सामना करके उसे पराजित करने के लिए कहा जा रहा हो। हर रात दक्षिण के जंगल के जंगल से आने वाली भेड़िया-मानव की गर्जना सुन जिस राज्य मातम की लहर दौड़ जाती हो, वह राज्य उस भेड़िया-मानव का प्रत्यक्ष सामना कैसे कर सकेगा?”

“धैर्यहीन मत बनो व्दिज!” व्दिज की विकलता देख कर अघोरनाथ मुस्कुराए- “यदि तुम्हें पिशाच का प्रत्यक्ष सामना करने का परामर्श देना ही एकमात्र विकल्प होता, तो हम स्वयं यहां क्यों आते?”

“ओह! तो क्या पिशाच के शरीर को नष्ट....।”

“हां!” अघोरनाथ, व्दिज का कथन पूर्ण होने से पूर्व ही बोले- “एक सहज युक्ति है हमारे पास।” अघोरनाथ ने शय्या पर दृष्टिपात करते हुए आगे कहा- “जिस काया-संयुग्मन के माध्यम से श्मशानेश्वर ने नवीन काया अर्जित की है, वही काया-संयुग्मन उसके उस नवीन काया के नाश का कारण बनेगा। हम शत-प्रतिशत अभयानन्द के समरूप आटे के एक पुतले का निर्माण करेंगे, जो पूर्णतया उसी की कद-काठी का होगा। काया-संयुग्मन प्रक्रिया के तहत उस पुतले का सम्बन्ध अभयानन्द से स्थापित करने के पश्चात हम उस पुतले का दाह-संस्कार कर देंगे। पुतले के दाह की प्रक्रिया पूर्ण होते ही अभयानन्द की पैशाचिक काया भी भस्म हो जाएगी।”

उपाय सुनने के पश्चात भी तीनों में से कोई कुछ नहीं बोल सका। तीनों में से किसी को भी ये विश्वास नहीं हो सका कि जिस कृत्य को अघोरनाथ ने लगभग असंभव बताया था, वही कृत्य इतनी सहजता से संभव हो सकता है। अघोरनाथ उन तीनों के मंतव्य को भांप गये।

“ये प्रक्रिया उतनी सहज नहीं है, जितनी तुम लोग अनुमान लगा रहे हो। अभयानन्द को ज्यों ही ये ज्ञात होगा कि उसकी काया को उसके समरूप आटे के पुतले के साथ संयुग्मित किया जा रहा है, त्यों ही उसका क्रोध भड़क उठेगा। अब तुम लोग सहजता से ये अनुमान लगा सकते हो कि श्मशानेश्वर के क्रोध का सामना करते हुए उसके पुतले का दाह-संस्कार करना किस सीमा तक कठिन कार्य होने वाला है।”

झोपड़ी में निस्तब्धता छा गयी।
 
“श्माशानेश्वर के क्रोध का सामना करने की रणनीति तुम लोगों को स्वयं बनानी होगी।”

अघोरनाथ का कथन सुन व्दिज की तन्द्रा भंग हुई- “क्या आप उस पिशाच

का सामना करने के लिए हमें कोई सुरक्षा नहीं प्रदान कर सकते?”

“हम व्दिज को एक सुरक्षा चिह्न अवश्य प्रदान कर सकते हैं।” अघोरनाथ ने अपने गले से लटके लोहे के स्वास्तिक चिह्न को निकाला और उसे व्दिज को सौंपते हुए कहा- “यद्यपि ये पवित्र स्वास्तिक चिह्न इस अभियान में तुम्हारी रक्षा करेगा, किन्तु इसे अभ़ी सिध्द नहीं किया गया है, इसलिए इसमें अभी अलौकिक शक्तियां नहीं हैं।”

“वे अलौकिक शक्तियां कैसे जागृत होंगी प्रभु?”

“उसके लिए तुम्हें देवी छिन्नमस्ता की एक दिवसीय साधना करनी होगी। ह्रीं हूं ऐं ऊं वज्रवैरोचनीये फट् स्वाहा। देवी के इस चतुर्दशाक्षर मंत्र का दस लाख बार जाप करने के उपरांत तुम्हें स्वास्तिक को हवन की अग्नि में रक्ततत्प करके अपनी कलाई से स्पर्श कराना होगा। चूंकि स्वास्तिक रक्ततत्प होने के कारण अत्यंत उष्ण होगा, इस कारण वह तुम्हारी कलाई को स्पर्श करते ही जले के निशान के रूप में अपनी छाप छोड़ देगा। इस प्रकार तुम्हारी दाहिनी कलाई पर अंकित हुआ स्वास्तिक ही तुम्हारा सुरक्षा-चिह्न होगा, जिसे धारण करने के पश्चात श्मशानेश्वर तुम्हें स्पर्श तक नहीं कर पायेगा। उसके सम्मुख आते ही तुम्हारा यह सुरक्षा चिह्न आश्चर्यजनक ढंग से चमक उठेगा।”

द्विज ने स्वास्तिक को श्रद्धापूर्वक माथे से लगाया।

“पिशाच का भयावह रूप देखकर तुम्हारा आत्मविश्वास डगमगाने लगे तो तुम आत्मज्ञान का मार्ग पकड़ लेना। गीता के सांख्ययोग का कोई भी श्लोक इसमें तुम्हारी सहायता कर सकता है, क्योंकि इस सम्पूर्ण अध्याय में वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन की कायरता का हनन करने के लिए आत्मा के अविनाशी प्रकृति का ही वर्णन किया है। अभयानन्द के पुतले के दाह-संस्कार की क्रिया मैं अवश्य संपन्न कराऊंगा किन्तु उसे एक निश्चित समय तक रोकने का दायित्व तुम्हें ही स्वीकारना होगा द्विज।”

“मैं सहर्ष प्रस्तुत हूँ। मैं अपने प्राणों का मूल्य चुकाकर भी पिशाच का मार्ग रोक कर रखूंगा।”

अघोरनाथ महाराज की ओर मुड़े।

“तुम राज्य के सैनिकों को आदेश दे दो कि वे दक्षिण के जंगल में कूच कर जाएँ और समस्त नराधम कापालिकों का निर्ममता से वध कर दें, ताकि वे भविष्य में फिर कभी तंत्र जैसे विलक्षण एवं अद्भुत ज्ञान को कलंकित न कर सकें।”

महाराज के नेत्र भय से विस्फारित हुए ही थे कि अघोरनाथ पुन: बोल पड़े-

“निर्भय रहो! जब तक हम इस राज्य में हैं, महापिशाच दिन के प्रकाश में किसी पर हमला करने का दुस्साहस नहीं कर सकता।”

“जो आज्ञा प्रभु!”

“अभयानन्द के पुतले के निर्माण कार्य प्रारंभ कर दिया जाए। द्विज की साधना पूर्ण होते ही हम अपने अभियान का आरम्भ करेंगे।”

अंतिम आदेश देने के बाद अघोरनाथ झोपड़ी से बाहर निकल गए।

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“द्विज! आप यहाँ?”

माया, द्विज को अपने कक्ष में पाकर बुरी तरह चौंकी।

“हाँ!” द्विज ने भावहीन स्वर में उत्तर दिया। उसने कंधे से एक झोला लटका रखा था। असम से लौटने के बाद वह पहली दफा माया से रू-ब-रू हो रहा था।

“आप कहाँ चले गए थे?”

माया मचलकर द्विज से लिपट जाने को आतुर हुई, किन्तु अगले क्षण भूल का एहसास होते ही उसके कदम द्विज से पर्याप्त फासले पर ठहर गए।

“अपने उस भूल को सुधारने का मार्ग तलाशने गया था, जिसके कारण आज राज्य में एक रक्तपिपासु पिशाच का आतंक व्याप्त है।”

“आपका मंतव्य हम समझे नहीं द्विज। भेड़िया-मानव के रूप में अभयानन्द की वापसी आपके किस भूल का दुष्परिणाम है।”

द्विज ने माया की ओर से दृष्टि फेर ली, जबकि माया गहन उत्कंठा के कारण रोमांचित हो उठी।

“स्पष्ट कहिये द्विज कि आपने कौन सी भूल की है।”

“क्या बिना किसी टिप्पणी के मेरी पूरी बात सुन सकोगी माया?”

माया की मूक सहमति पाकर द्विज ने पूरा किस्सा सुना दिया।

“अभयानन्द मेरे वही अग्रज थे, जिनके साथ मैंने त्रासदी वाली उस रात शंकरगढ़ की यात्रा की थी, जिस रात ऋण न चुकाए जा पाने के दशा में जागीरदार ने कई किसानों के घरों को आग की लपटों की भेंट चढ़ा दिया था, जिनमें मेरा परिवार भी था। कुछ भी शेष नहीं बचा था मेरे पास, सिवाय अतिशय प्रेम करने वाले एक अग्रज के, किन्तु ईश्वर ने उस अग्रज को भी उसी रात मुझसे अलग कर दिया था।”

किसी पाषाण-प्रतिमा की भांति निश्चल खड़ी होकर पूरा प्रकरण सुनने के बाद माया इस दुविधा से जूझने लगी कि द्विज की करुण गाथा पर संवेदना प्रकट करे या फिर उसके भातृप्रेम पर रोष। अंतत: संवेदना रोष पर हावी हो गयी।

“नियति ने आपके साथ आश्चर्यजनक खेल....।” माया ने सहानुभूति भरे लहजे में कुछ कहना चाहा किन्तु द्विज ने उसे अवसर नहीं दिया।

“नहीं माया! इस क्षण मुझे तुम्हारी संवेदनाओं की नहीं अपितु किसी अन्य

भाव की आवश्यकता है।” अचानक ही द्विज के लहजे में असहजता का पुट शामिल हो गया।

माया चेहरे पर नासमझ भाव लिए हुए द्विज को देखने लगी, जबकि द्विज ने कंधे से लटके झोले में से एक पत्रक निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दिया। पत्रक को मोड़कर मौली धागे से बांधा गया था। इस क्षण माया को उसके चेहरे पर वही असहजता नजर आ रही थी, जिसे उसने थोड़ी देर पहले उसके लहजे में महसूस किया था। माया ने कांपते हाथों से पत्रक थामा, मौली धागे को खोला और अगले ही क्षण उसकी दृष्टि के सम्मुख द्विज के व्यक्तित्व का सर्वथा नवीन पहलू था।
 

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