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Horror ख़ौफ़

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इस बार संस्कृति ने चौंक कर दरवाजे की ओर देखा। ‘दरवाजे पर कोई था।’ इसका आभास उसे पहली दफा हुआ। उसने दरवाजा खोला। सामने भोजन की थाली लिये हुए सुजाता खड़ी थीं। उनके पीछे एक नौकर था, जिसके एक हाथ में लालटेन और दूसरे हाथ में केरोसिन का छोटा सा गैलन था। संस्कृति की अवस्था देखते ही सुजाता बुरी तरह चौंक पड़ीं।

“क्या कर रही थी तू?” उन्होंने धूल और पसीने से सनी अपनी बेटी को सिर से पांव तक घूरा और उसके जवाब की प्रतीक्षा किये बगैर अन्दर दाखिल हो गयी। नौकर ने लालटेन को दीवार से निकली एक खूंटी पर टांगा, और केरोसिन का गैलन फर्श पर रखकर लौट गया।

“ये सब क्या है....?” सुजाता ने फर्श के उस कोने पर नजर डाली, जहां मौजूद लकड़ी के टुकड़े अब कमरे में चारों तरफ बिखरे नजर आ रहे थे।

“तू इतनी घबरायी हुई क्यों है?”

“क्या आपको भी फर्श के नीचे से किसी के हांफने की आवाज सुनाई दे रही है?”

“नहीं तो?” सुजाता ने उसे हैरानीपूर्वक घूरा- “लेकिन तू ये क्यों पूछ रही है?”

“क्योंकि मुझे सुनाई दे रही थी।” संस्कृति का बदहवास लहजा- “ऐसा लग रहा था कि हांफने की आवाज लकड़ियों के नीचे से आ रही है, लेकिन लकड़ियों के हटाने पर पता चला कि आवाज फर्श के नीचे आ रही थी।”

“अगर ऐसा है तो अब क्यों नहीं आ रही है आवाज?”

“प...पता....पता नहीं। आपके आने से पहले तक तो आ रही थी।”

सुजाता पहले तो हैरान हुईं, लेकिन शीघ्र ही इसे संस्कृति का वहम मानकर मुस्कुरा उठीं।

“लगता है कमरे में अकेले होने के कारण तू डर गयी। यहां पर ऐसा कुछ भी नहीं है।” कहने के बाद सुजाता फर्श के उस भाग पर जाकर खड़ी हो गयीं।

“हां। मैं डर ही गयी थी, लेकिन मेरे डर की वजह वहम नहीं था मम्मी। मैंने पूरे होशो-हवास में आवाज सुनी। शायद इस फर्श के नीचे कोई तहखाना है, जिसमें जाने का रास्ता किसी दूसरे कमरे में से है।”

“इस कमरे के नीचे कोई तहखाना नहीं है। तुमने ये कैसे सोच लिया कि तहखाना हो सकता है? अगर तहखाना होता भी तो इतनी रात गये कोई तहखाने में हांफता क्यों? और हांफता भी तो उसकी आवाज तुम तक कैसे पहुंच पाती?”

संस्कृति कुछ नहीं बोली। उसका ध्यान ‘माया’ शब्द पर आकर ठहर गया, जिसे किसी ने उसके कानों में दो दफे फुसफुसा कर बोला था। पहले तो वह इसके बारे में सुजाता को बताने को उद्यत हुई, किन्तु कुछ सोचकर उसने ये विचार स्थगित कर दिया।

“बाहर चल। तू इस कमरे में डर गयी है। यहां रहना अब ठीक नहीं।” सुजाता ने संस्कृति की बांह पकड़ी। भोजन की थाली को उन्होंने एक पुराने मेज पर रख दिया था।

“नहीं।” संस्कृति ने झटका देकर अपनी बांह छुड़ा ली- “मैं बाहर नहीं आऊंगी। तब तक नहीं आऊंगी, जब तक डैडी वैभव के साथ मेरी शादी करने का इरादा त्याग नहीं देते।”

सुजाता असमंजस में पड़ गयीं। संस्कृति के विचारों से वह सहमत तो थीं, किन्तु खुलकर उसका समर्थन नहीं कर सकती थीं।

“तू डर गयी है। अकेले इस कमरे में रही तो और ज्यादा डर जाएगी। तेरी तबीयत खराब हो जाएगी।”

“मैं डरी नहीं हूं। अभी-अभी आपने ही तो कहा कि मैं वहम का शिकार हुई थी।” संस्कृति का लहजा दृढ़ हुआ। वह भयभीत करने वाली उन घटनाओं को भूल गयी, जो थोड़ी देर पहले इस कमरे में उसके साथ घटी थीं।

“जिद मत कर। तेरे पापा तुझसे भी अधिक जिद्दी हैं। अपनी जिद पूरी करने के लिये वे तुझे महिनों तक इस कोठरी में बन्द कर सकते हैं।”

“ये मेरे लिये भी ठीक रहेगा। तब तक मैं मर जाऊंगी और उस लम्पट से शादी न करने की मेरी जिद पूरी हो जाएगी।”

“क्या तुझे ये लगता है कि हमने तुझे इसीलिये बड़ा किया है ताकि अंधेरी कोठरी में बन्द करके मार सकें?” सुजाता झल्ला उठीं।

“नहीं। आप लोगों ने तो मुझे इसलिये बड़ा किया है ताकि एक जानवर के साथ जीवन-भर तिल-तिल कर मरने के लिये मजबूर कर सकें।” संस्कृति का व्यंग्यात्मक लहजा।

“ये भी तो हो सकता है कि शादी के बाद वैभव सुधर जाए।”

“ये भी तो हो सकता है कि शादी के बाद वह और भी बिगड़ जाए।”

“तो तूने ये पक्का कर लिया है कि हमारे बुलाने पर भी इस कमरे से बाहर नहीं आएगी?”

“आऊँगी। लेकिन तभी जब डैडी अपना फैसला बदल देंगे।”

सुजाता ने मेज पर रखे भोजन की थाली पर एक दृष्टि डाली और कहा- “खाना तो खाएगी न?”

“आप छोड़ जाइए। जरूरत महसूस हुई तो खा लूंगी।”
 
सुजाता ने कुछ नहीं कहा और हार कर कमरे से बाहर चली गयीं। उनके बाहर जाते ही संस्कृति ने लपक कर दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया। वह दौड़कर कोने में पहुंची और फर्श से कान लगाकर कुछ सुनने का प्रयास करने लगी, किन्तु कुछ सुनाई नहीं दिया। हांफने का स्वर अब शायद पूरी तरह बन्द हो चुका था। अंतत: उसने अपने कान हटा लिये। कमरे में चारों ओर नजरें दौड़ायी। फावड़ा और कुदाल पर नजर पड़ते ही उसे लगा मानो मुंहमागी मुराद पूरी हो गयी।

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3

ड्राइंग हॉल के सोफे पर आसीन सन्यासी के शरीर पर गेरुआ वस्त्र था। उम्र साठ वर्ष से अधिक थी। माथे पर त्रिपुण्ड और गले में बड़े-बड़े मनकों वाली रुद्राक्ष माला थी। लावण्यमय चेहरे पर गम्भीर भाव थे, मानो समाधीग्रस्त हों। सोफे के इर्द-गिर्द दो युवा सन्यासी खड़े थे, जो शायद उसके शिष्य थे। सन्यासी के सम्मुख मौजूद सोफे पर ठाकुर परिवार का प्रत्येक सदस्य उपस्थित था, सिवाय संस्कृति के।

“हमने संस्कृति का विवाह करने का निश्चय किया है कुलगुरू।” दिग्विजय ने शालीन स्वर में कहा- “इसीलिए हमने आपको मुहूर्त और कुण्डली-मिलान इत्यादि औपचारिकताओं हेतु राजमहल में आमंत्रित किया है।”

दिग्विजय के इशारे पर सुजाता ने दो जन्मपत्रिकायें कुलगुरू की ओर बढायीं। एक शिष्य ने उन्हें थाम लिया।

“ये संस्कृति और उसके होने वाले वर की कुण्डली है कुलगुरू। कृपया इनका अवलोकन करके आप सुनिश्चित करें कि ज्योतिषिय दृष्टि से यह विवाह उपयुक्त है या नहीं?”

“सबसे पहले वर की जन्मपत्री दिखाओ।”

आदेश का शीघ्र ही पालन हुआ। जन्मपत्री के मुख्यपृष्ठ पर ‘वैभव सिंह ठाकुर’ की जन्मतिथि; दिन और समय के साथ अंकित थी। मुख्यपृष्ठ पर दर्ज विवरण को पढ़ने के बाद कुलगुरू ने कई पन्नों को एक साथ पलटा और जन्मपत्री के उस पृष्ठ पर पहुंच गये, जिस पर जातक के जन्म समय की ग्रह-दशाओं का विवरण अंकित था।

ड्राइंग हॉल की पैनी खामोशी के बीच ठाकुर परिवार के प्रत्येक सदस्य की निगाहें कुलगुरू पर ही ठहरी हुई थीं। करीब दस मिनट तक ग्रह दशाओं का अवलोकन करने के पश्चात कुलगुरू ने दाहिनी तरफ खड़े शिष्य की ओर हथेली फैलायी, जो शिष्य के लिए संकेत था कि उन्हें कागज-कलम की आवश्यकता है। शिष्य संकेत समझ गया और कंधे से लटकी झोली से कागज-कलम निकालकर उनकी फ़ैली हुई हथेली पर रख दिया।

कुलगुरू ने पहले उंगलियों की गाठों पर कुछ गणनाएं की, तत्पश्चात आँखे बंद करके थोड़ी देर तक आत्मचिंतन किया। उपरोक्त क्रियाकलापों के बाद उन्होने कागज़ पर एक आयत खींचा और उसके दो विकर्ण खींचकर उसे चार छोटे-छोटे त्रिभुजों में विभक्त कर दिया। अपने चिंतन को उन्होंने अंकों और अक्षरों के रूप में उन छोटे त्रिभुजों में प्रदर्शित कर दिया। इसके बाद सोफे की पुश्त से सिर टिका कर इस प्रकार गहरी सांस लिए मानो उस निष्कर्ष पर पहुंच चुके हों, जिस पर पहुंचना चाहते थे। दो मिनट की खामोशी के बाद उन्होंने अपना रूख दिग्विजय की ओर किया और कहा- “क्या तुमने वैभव नाम के इस लड़के के साथ संस्कृति की शादी करने का पूरा मन बना लिया है ठाकुर?”

“ह...हां कुलगुरू। वैभव हमें अपनी बेटी के लिये योग्य वर लग रहा है।”

कुलगुरू ऐसे अंदाज में मुस्कुराये, जैसे दिग्विजय के निर्णय का उपहास कर रहे हों।

“किसी निर्णय का अस्तित्व में आना मनुष्य के विवेक पर निर्भर करता है, किन्तु उस निर्णय का साकार होना परमेश्वर की इच्छा पर निर्भर करता है।”

“हम समझे नहीं कुलगुरु।”

“इस लड़के के साथ तुम्हारी बेटी के विवाह का कोई संयोग नहीं बन रहा है।”

ड्राइंग हॉल में पैना सन्नाटा खींच गया। सुजाता ने मन ही मन प्रसन्न होते हुए दिग्विजय की ओर देखा। उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। स्थापित राजनेता के साथ सम्बन्ध बनाने की उनकी महत्वाकांक्षा धू-धू कर जल उठी थी।

“इस लड़के की वर्तमान ग्रह-दशाएं इंगित कर रही हैं कि ये अपनी आयु पूर्ण कर चुका है। इसके जीवन में अब मात्र सात दिन ही शेष रह गये हैं।”

“तो क्या इसका मतलब है कि सात दिन के अन्दर वैभव की मौत हो जाएगी?”

“केवल मौत नहीं, भयावह मौत होगी। राहू का मारकेश प्रबल हो चुका है। कोई कुछ नहीं कर सकता। राहू का प्रभाव हमारे जीवन पर छाया के रूप में पड़ता है। इसके मारक योग बनने का तात्पर्य होता है कि जातक के जीवन पर पड़ने वाली उसकी छाया नकारात्मक अर्थात अनिष्ट की द्योतक हो चुकी है। ऐसी स्थिति में ये मान लेना चाहिए कि जातक किसी अपवित्र ऊर्जा अर्थात प्रेतबाधा के प्रभाव में है। ऐसे जातकों की दिल दहलाने वाली प्रेतजनित मौत होती है।” कुलगुरु का स्वर विषादपूर्ण हो गया। वैभव के भयावह मौत की कल्पना मात्र से वे द्रवित हो उठे थे।

“प्रेतबाधा? प्रेतजनित मौत? य..ये सब क्या है कुलगुरू?” रोमांच के कारण दिग्विजय के रोंगटे खड़े हो गये। यही हाल वहां उपस्थित अन्य लोगों का भी था- “वैभव के जीवन में कोई अमानवीय व्यतिक्रम कैसे हो सकता है?”
 
“विधि का विधान है।” कुलगुरु का पूर्ववत गंभीर स्वर- “और विधि के विधान हमारे पूर्वजन्म के कर्मों द्वारा निर्धारित होते हैं। इस जन्म में हम जो सुख या दुःख भोगते हैं, वे हमारे पिछले जन्मों के कर्मों के फल ही तो होते हैं।”

“क्या इस विधान को टाला नहीं जा सकता?” दिग्विजय ने पूछा।

“ज्योतिष शास्त्र भावी घटनाओं की ओर मात्र इशारा करता है। उन घटनाओं में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप ज्योतिषशास्त्र की परिभाषा में शामिल नहीं है। यदि वैभव के सन्दर्भ में कोई उपाय शेष रहता तो उसकी कुण्डली में ज्योतिष का ऐसा दुर्लभ संयोग बनता ही नहीं।”

“तो क्या अब हमें अपना निर्णय स्थगित करना होगा?”

“यदि नहीं करोगे तो नियति यह काम स्वयं कर देगी।”

ड्राइंग हॉल में एक बार फिर निस्तब्धता छा गयी।

“हमें अब चलना चाहिए।” लम्बी खामोशी को निरर्थक प्रतीत होता देख कुलगुरू ने कहा।

“आप एक बार संस्कृति की जन्मपत्री भी देख लीजिए। हो सकता है कोई समाधान निकल आए।” अरुणोदय ने कहा।

“कोई लाभ नहीं है अरुण। संस्कृति की जन्म-पत्री हमने ही बनायी है, इसलिये हमें मालूम है कि ग्रह-दशाएं उसके जीवन को किस प्रकार प्रभावित कर सकती हैं।”

कहने के बाद कुलगुरु प्रस्थान के ध्येय से खड़े हो गये।

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“एक्सक्यूज मी गाइज! क्या आप में से कोई बता सकता है कि डिपार्टमेण्ट ऑफ मैथेमेटिक्स किस ओर है?” साहिल ने कॉरिडोर में खड़े छात्रों के हुजूम से पूछा।

“आप इस कॉरिडोर के एण्ड में जाकर राइट टर्न ले लीजिए। खुद को मैथेमेटिक्स डिपार्टमेण्ट के कॉरिडोर में खड़ा पाएंगे।”

“थैंक यू।”

आभार ज्ञापन के बाद साहिल तेज कदमों से कॉरिडोर के छोर की ओर बढ़ा, जहां से दायीं ओर मुड़ने पर गणित विभाग का कॉरिडोर आरम्भ हो गया। प्रोफेसर्स के चैम्बर के दरवाजों पर लिखे नामों पर दृष्टिपात करते हुए वह आगे बढ़ा। अंतत: उसकी तलाश का अन्त हुआ। वह जिस चैम्बर के सामने ठिठका था, उस पर अंग्रेजी में लिखा था- ‘प्रो. उदयराज चव्हाण : सीनियर प्रोफेसर एण्ड हेड ऑफ डिपार्टमेण्ट’। शायद यही चैम्बर साहिल का गंतव्य था। उसने दरवाजे को आहिस्ता से नॉक किया।

“यस।” अन्दर से किसी लड़की की मधुर आवाज आयी।

साहिल अन्दर झांका। रिवॉल्विंग चेयर खाली था। प्रोफेसर चव्हाण इस वक्त

चैम्बर में नहीं थे।

“प्रोफेसर से मुलाकात कब-तक हो सकती है?”

“अभी नहीं हो सकती है। फाइनल ईयर की क्लास ले रहे हैं।”

विजिटर्स चेयर पर मौजूद लड़की ने बगैर साहिल की ओर देखे हुए कहा। किसी किताब के अध्ययन में व्यस्त उस लड़की की उम्र पच्चीस वर्ष के आस-पास थी। रंग गोरा और परिधान में सादगी का समावेश था।

“कब तक लौटेंगे?”

लड़की ने वॉलक्लॉक की ओर देखा और कहा- “पीरियड ओवर होने में अभी पन्द्रह मिनट का समय है। आप चाहें तो उनके आने तक वेट कर सकते हैं।”

“जी शुक्रिया।”

साहिल अन्दर प्रविष्ट हुआ और लड़की के बगल वाले विजिटर्स चेयर पर आसीन हो गया। चैम्बर की खामोशी इस दर्जे की थी कि ए.सी. चलने की आवाज भी स्पष्ट सुनाई दे जा रही थी। करीब बीस मिनट बाद प्रोफेसर महोदय ने केबिन में कदम रखा और साहिल अपनी जगह से खड़ा हो गया।

“हैलो साहिल।” प्रोफेसर ने सुखद आश्चर्य के साथ कहा और रिवॉल्विंग चेयर पर आसीन होने के बाद साहिल को भी बैठने का इशारा करते हुए कहा- “तुम्हारे भाई की हालत अब कैसी है?”

प्रोफेसर का वाक्य सुन कर लड़की हौले से चौंकी। उसे पहली दफा पता चला था कि आने वाला शख्स यश का भाई था।

“इसी सिलसिले में मुझे आपसे कुछ बात करनी है प्रोफेसर।”
 
“यस ऑफकोर्स।” प्रोफेसर ने गर्मजोशी के साथ कहा- “मेरा अगला पीरियड चालीस मिनट बाद है। तब तक के लिये मैं फ्री हूं।”

साहिल ने एक नजर लड़की पर डाली, जो अब किताब बन्द करके प्रोफेसर और उसके वार्तालाप में रुचि लेने लगी थी।

“क्या आप बता सकते हैं कि पिछले दिनों जब यश दो महिने का वर्कशॉप अटैण्ड करने के लिये कैम्ब्रिज गया था, तो उसके साथ क्या हुआ था?”

“मैं तुम्हें पहले भी बता चुका हूं कि कैम्ब्रिज में यश के साथ ऐसी कोई भी घटना नहीं घटी थी, जिसे याद्दाश्त चले जाने जैसी दुर्घटना की वजह समझा जा सके।”

“प्लीज आप याद करने की कोशिश कीजिए प्रोफेसर। दिमाग पर जोर डालिये। कैम्ब्रिज में जरूर उसके साथ कुछ हुआ था, अन्यथा मेरा हंसता-खेलता भाई वहां से लौटने के दो दिनों के भीतर ही यूं अपनी पहचान नहीं खो सकता था।”

प्रोफेसर चव्हाण ने ऐनक उतारकर मेज पर रखते हुए कहा- “मैं तुम्हारी दशा समझ रहा हूं साहिल, किन्तु सच वही है जो मैंने तुम्हें बताया। कैम्ब्रिज में ऐसा कुछ नहीं हुआ था, जैसा तुम समझ रहे हो।”

“नहीं। मैं नहीं मान सकता।” साहिल ने भावावेश में आकर दोनों मुक्का मेज पर इतनी तेजी से मारा कि उस पर मौजूद वस्तुएं हिल गयीं- “यश का दो महिने का कैम्ब्रिज टूर सामान्य नहीं गुजरा था। उसके साथ कुछ तो जरूर हुआ था।”

साहिल की हरकत पर उसके बगल में मौजूद लड़की ने प्रोफेसर चव्हाण की ओर देखा। उसके चेहरे के भावों से लग रहा था कि यदि प्रोफेसर ने उसे बोलने का मौका दिया तो वह कुछ महत्वपूर्ण बातें बता सकती है, किन्तु प्रोफेसर ने उसे बोलने का मौका नहीं दिया, और खुद कहा- “गेट रिलैक्स्ड साहिल। यदि यश की याद्दाश्त अचानक गुम हुई है तो अचानक ही लौट भी आएगी। मेडिकल साइंस में ऐसा अक्सर होता है। तुम्हें डॉक्टर्स पर भरोसा रखना चाहिए।”

“डॉक्टर्स भी इस सडेन मेमोरी लॉस की कोई वजह नहीं तलाश पा रहे हैं। हर कोई ये सोचकर शॉक्ड है कि नॉर्मल कण्डिशन में एक इंसान की अचानक पूरी याद्दाश्त कैसे गुम हो सकती है?”

“सॉरी साहिल! मैं नहीं मान सकता कि कैम्ब्रिज में यश के साथ कोई अप्रिय घटना घटी थी।”

साहिल शांत हो गया। उसने कुर्सी की पुश्त से सिर टिकाकर आंखें बन्द कर ली।

“तुमने अभी-अभी कहा कि यश कैम्ब्रिज से लौटने के दो दिन बाद अपनी पहचान खोया था। कहीं ऐसा तो नहीं कि जिस घटना को तुम वजह के रूप में तलाश रहे हो, वह घटना उन्हीं दो दिनों में घटी है?”

“कैम्ब्रिज से लौटने के बाद यश दो दिनों तक फ्लैट से बाहर नहीं निकला था। उसने पूरे अड़तालीस घण्टे फ्लैट पर मेरे साथ ही गुजारे थे। इन दो दिनों में उसका व्यवहार बहुत बदल चुका था। हमेशा बक-बक करने वाला यश गुमशुम रहने लगा था। उन अड़तालीस घण्टों में उसने सिवाय इण्टरनेट सर्फिंग के और कुछ भी नहीं किया था। उस वक्त मैं यही सोचता रहा कि वह सोशल मीडिया पर एक्टिव होगा। फिर तीसरे दिन की सुबह मैंने उसे आइने के सामने खड़ा पाया। अपने अक्स को वह यूं घूर रहा था, मानो इस बात को लेकर दुविधा में हो कि वह अक्स उसी का है या किसी और का। मेरे हस्तक्षेप पर उसने मुझसे सवाल किया कि मैं कौन हूं? पहले तो मुझे लगा था कि वह मजाक कर रहा है, लेकिन धीरे-धीरे उसकी हरकतों ने स्पष्ट कर दिया कि वह अपनी पहचान खो चुका था।”

“डॉक्टर्स ने इन सबके बारे में क्या बताया है?”

“ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि उसके ब्लड में विटामिन बी 12 का लेवल नॉर्मल लेवल से बहुत कम है। डॉक्टर्स के मुताबिक़ बी 12 नर्व सेल्स की प्रॉपर फंक्शन के लिये जरूरी विटामिन होता है और शरीर में इसकी मात्रा में अनियमितता होने से चेतना से जुड़ी बीमारियाँ होती हैं।”

“इसका मतलब कि यश पहले से ही अल्जाइमर जैसी भूलने की बीमारी से ग्रसित था?”

“डॉक्टर ने तो फिलहाल यही कहा है प्रोफेसर। उनके अनुसार यश बहुत पहले से ही अल्जाइमर का पेशेण्ट था। नजरअंदाज किये जाने के कारण भूलने का साधारण सा रोग इस हद तक बढ़ गया कि उसके समूचे याद्दाश्त का दुश्मन बन बैठा।”

“बट सर....।” काफी देर बाद लड़की ने मुंह खोला- “यश की हरकतों से हमें कभी ऐसा नहीं महसूस हुआ था कि वह भूलने की बीमारी से ग्रसित है। इवेन कभी-कभी तो हम उसकी मेमोरी-पॉवर देखकर शॉक्ड भी हुए थे। लम्बे-लम्बे एक्वेशन्स और प्रॉसिजर्स उसकी जुबान पर रहते थे। यदि वह मेमोरी लॉस की शिकायत के साथ जी रहा था तो मैथ का अच्छा स्टूडेंट कैसे था?”

“यही तो मैं भी नहीं समझ पा रहा हूं। यश के मेडिकल टेस्ट की रिपोर्ट्स जो बता रही हैं, उस पर यकीन करना आसान नहीं है। ऐसा लगने लगा है कि टेस्ट ठीक से कंडक्ट नहीं किए गये हैं।” थोड़ी देर रुक कर साहिल ने आगे कहा- “क्या आप जानना चाहेंगे प्रोफेसर कि कैम्ब्रिज से लौटने के बाद दो दिन तक उसने इंटरनेट सर्फिंग के दौरान क्या सर्च किया था?”

“ऑफकोर्स।”

साहिल ने जेब से यश का सेलफोन बाहर निकाला और ब्राउजर हिस्ट्री ओपन करने के बाद मोबाइल प्रोफेसर को थमा दिया। ब्राउजर हिस्ट्री में कई हिन्दी ब्लॉग और वेबपेज के यूआरएल नजर आ रहे थे। हैरानी तो इस बात की थी कि सारे वेबपेज एक ही सर्च टर्म से जुड़े हुए थे।

“ब्रह्मराक्षस।” प्रोफेसर के होठों से अस्फुट सा स्वर निकला और इसी के साथ उनके माथे पर बल पड़ गये।

“यस प्रोफेसर। मुझे लगा था कि वह सोशल मीडिया पर एक्टिव है, जबकि वास्तविकता ये थी कि वह दो दिन से इसी नाम यानी ब्रह्मराक्षस से जुड़ी ब्लॉग्स और वेबसाइट्स खंगाल रहा था।”

“लेकिन क्यों?”

“आई डोण्ट नो। सब-कुछ अजीब है। उसे अचानक ब्रह्मराक्षस के विषय में जानने की क्या जरूरत पड़ गयी थी?”

“सॉरी साहिल।” प्रोफेसर ने मोबाइल साहिल की ओर बढ़ाते हुए कहा- “नॉर्मल पर्सन काण्ट डू एनिथिंग इन सच कण्डिशन। यू शुड टेक हिम टु अ स्पेशलिस्ट।”

“श्योर सर। थैंक्स फॉर योर टाइम।”
 
साहिल उठा और शेकहैण्ड के बाद चव्हाण के चैम्बर से बाहर आ गया। जिस उम्मीद के साथ वह यहां आया था, उस उम्मीद का स्थान अब तमाम उलझनों ने ले लिया था। वह लम्बे-लम्बे डग भरते हुए कॉरिडोर पार कर ही रहा था कि तभी पीछे से आवाज आयी- “एक्सक्यूज मी।”

वह ठहरा। पीछे पलटा। जिस लड़की को उसने प्रोफेसर के चैम्बर में देखा था, वही लड़की लगभग दौड़ते हुए उसकी ओर आ रही थी।

“क्या हुआ? आपने मुझे रोका क्यों?” उसके पास आते ही साहिल ने पूछा।

“मैं शायद आपकी कुछ हेल्प कर सकती हूं।” लड़की ने तेज चलने के कारण उखड़ चुकी साँसों को नियंत्रित करने का प्रयास करते हुए कहा।

“रियली?” साहिल रोमांचित हुआ- “लेकिन कैसे?”

“मेरा नाम कोमल अवस्थी है। मैं भी आपके भाई की तरह एक रिसर्च स्कॉलर हूं। मेरे प्रोफेसर दो हफ्ते के लिए एज अ गेस्ट लेक्चरर ‘रामानुजन इंस्टिट्यूट ऑफ मैथेमेटिक्स, चेन्नई’ गये हुए हैं, इसलिए मेरे पास एक हफ्ते से कोई काम नहीं है, सिवाय एक चैम्बर से दूसरे चैम्बर में फुदकने के।”

“आप किस प्रकार मेरी हेल्प कर सकती हैं?”

“दरअसल मैं बताना चाहती थी कि कैम्ब्रिज के दो महीने के वर्क शॉप में मैं भी यश के साथ थी। मैं कुछ जानती हूं या फिर कह सकते हैं कि मेरे पास कुछ चीजें हैं, जो ये बता सकती हैं कि वहां उसके साथ क्या हुआ था?”

“ ‘चीजे’ बता सकती हैं? आई मीन कि आप नहीं बता सकतीं?”

“एक्चुअली पूरी बात मुझे भी नहीं मालूम है कि यश के साथ क्या हुआ था, लेकिन मेरे पास कुछ क्लू हैं, जिन्हें देखने के बाद आप किसी निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं। और इसके लिए आपको आज शाम मेरे फ्लैट पर आना होगा।”

“आपकी फ्लैट का एड्रैस?”

“मैं यूनिवर्सिटी कैम्पस में ही रहती हूं। रोहिणी हॉस्टल के पीछे वाले अपार्टमेण्ट के सारे फ्लैट रिसर्च स्कॉलर्स के ही हैं। उनमें से ग्राउण्ड फ्लोर का फ्लैट नं. नाइन मुझे तब तक के लिए अलॉट किया गया है, जब तक कि मेरी रिसर्च पूरी नहीं हो जाती।”

“थैंक यू...। लेकिन टाइम?”

“मैं यूनिवर्सिटी से पांच बजे फ्री होती हूं। छः बजे के बाद आप एनी टाइम आ सकते हैं। मुझे इन्तजार रहेगा।”

“श्योर।” साहिल ने कृतज्ञता भरी मुस्कान के साथ कहा।

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“ये उसका कोई बेहूदा बहाना होगा, स्टोररूम से बाहर आने का।” दिग्विजय क्रोध से फुंफकार उठे।

“नहीं जी। ऐसी बात नहीं है। मैंने उसके चेहरे पर सचमुच डर देखा था। मैंने उसके सामने स्टोररूम से बाहर आने का प्रस्ताव भी रखा था। यदि वह केवल स्टोररूम से बाहर आने के लिये झूठ बोल रही होती तो मेरे प्रस्ताव को मानकर उसी समय स्टोररूम से बाहर आ जाती।” सुजाता ने कहा।

“तो क्या तुम ये मान रही हो कि उसने जो कहा वह सच था? उसने जमीन के नीचे से किसी के हांफने की आवाज सुनी थी; क्या तुम इस पर यकीन करने लगी हो?”

“न जाने क्यों उसकी बातें सच लग रही हैं। वह स्टोररूम साल में बस एक-दो बार ही खुलता है, ऐसे में.......।”

“देखो सुजाता...।” सुजाता की बात काटकर दिग्विजय ने तीखे स्वर में कहा- “मैं इसी राजमहल में जन्मा हूं। यहाँ के चप्पे-चप्पे के बारे में पता है मुझे। स्टोररूम के नीचे कोई तहखाना नहीं है।”

“तो फिर.... तो फिर संस्कृति को जमीन के नीचे से हांफने की आवाज क्यों सुनाई दी?”

“उसे कोई आवाज नहीं सुनाई दी थी। ये सब या तो उसका वहम रहा होगा, या फिर हमें परेशान करने के लिए की गयी कोई भद्दी शरारत।”

सुजाता कुछ बोलने को उद्यत हुईं, किंतु दिग्विजय के इस वाक्य ने उन्हें खामोश कर दिया- “मैं पहले से ही कुलगुरू की बातों को सोच-सोच कर परेशान हूँ। बेहतर होगा कि तुम अपनी बेटी के कारनामें सुनाकर मेरी उलझनें और मत बढ़ाओ।”

कहने के बाद दिग्विजय कमरे से बाहर निकल गये।

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“आप करते क्या हैं?” कोमल ने चाय का ट्रे सेंटर टेबल रखा और साहिल के

सामने वाले सोफे पर बैठते हुए पूछा।

“क्या मतलब?”

“आई मीन आप किस प्रोफेशन से जुड़े हुए हैं?”

“फ्रिलांस ग्रॉफिक डिजायनर हूं। लिंक्ड इन पर अच्छा नेटवर्क बना चुका हूं, इसलिये घर बैठे ही अच्छे क्लाइण्ट्स मिल जाते हैं।”

“आपने अभी-तक चाय का कप क्यों नहीं उठाया?”

“मैं चाय पीने से ज्यादा ये जानने के लिए उतावला हूँ कि कैम्ब्रिज में मेरे भाई

के साथ क्या हुआ था?” साहिल ने चाय का कप उठाया तो जरूर, किंतु उसे होठों से लगाए बगैर ही कहा।

“कुछ अजीब तो उसके साथ जरूर हुआ था।” कोमल ने चाय की चुस्कियां लेते हुए कहा- “कुछ ऐसा, जिसके होने के बाद ऊटपटांग आदतें उसके जीवन का हिस्सा बन गयीं थीं। वर्कशॉप में साथ गये प्रोफेसर चव्हाण को उसने कुछ नहीं बताया था, क्योंकि उसे भय था कि यदि प्रोफेसर चव्हाण को ये पता चल गया कि वह मानसिक रूप से बीमार होने लगा है, तो उसे उस वर्कशॉप को बीच में ही छोड़ कर इंडिया लौटना होगा, जिसमें शिरकत करने के लिए मैथ का हर रिसर्च स्कॉलर तरसता है।”

“यानी वह जिन अजीब आदतों का शिकार हुआ था, वे आदतें उसके मानसिक रूप से बीमार होने की परिचायक थीं?”

“ह...हाँ! शायद ऐसा ही कुछ।” कोमल ने थोड़े दबे स्वर में कहा।

“क्या उसने आपको बताया था कि उसके साथ क्या हुआ था?”

“नहीं।”

“तो फिर आपको कैसे पता चला कि समथिंग स्ट्रेंज वाज हैप्पेण्ड विद हिम?”

“क्योंकि मैंने यश में वे अजीब से चेंजेज अपनी आंखों से देखे थे, जो एक रहस्यमयी घटना के बाद उसकी लाइफस्टाइल का हिस्सा बन गये थे।”

“क्या थे वे चेंजेज? और तुम किस रहस्यमयी घटना की बात कर रही हो?”

“यश ‘अटेम्प्ट टू मर्डर’ का शिकार हुआ था।”

“व्हाट?” साहिल चौंका- “हाउ इज इट पॉसिबल? कैम्ब्रिज में उसका कौन दुश्मन पैदा हो गया?”

“पता नहीं।” कोमल ने कंधे उचकाए- “पराये देश में, जहाँ वह पहली बार एक एजुकेशनल टूर पर गया था; उस पर जानलेवा हमला हुआ। वजह मेरे समझ से परे है, तभी तो मैंने उस घटना को रहस्यमयी कहा।”

“यश उस ‘अटेम्प्ट टू मर्डर’ से बचा कैसे? ये बात आपको कैसे पता चली?

आई मीन प्रोफ़ेसर चह्वाण को क्यों नहीं पता चल पायी?”

“यश पर अटैक सुबह के टाइम एक पार्क में हुआ था। उस वक्त केवल मैं उसके साथ थी। हम दोनों जॉगिंग के लिए निकले थे। उसका लक अच्छा था, जो बुलेट उसकी कनपटी के पास से होते हुए निकल गयी थी। पब्लिक प्लेस होने के कारण अटैकर को दूसरा मौका नहीं मिल पाया था। प्रोफ़ेसर चह्वाण को यश ने ये सब नहीं बताया था, क्योंकि वह नहीं चाहता था कि इस बात को लेकर कोई बखेड़ा हो, और उसका वर्कशॉप स्पॉइल हो जाए।”

“ये लड़का भी अजीब है। इतनी बड़ी घटना को छुपा ले गया।” साहिल

झुंझलाया।

“उससे भी अजीब बात ये है कि अज्ञात हमलावर ने उस पर हमला करने के लिए पब्लिक प्लेस को चुना।”

“उसका दुश्मन कौन हो सकता है? और फिर यदि हमलावर का पहला अटेम्प्ट फेल हो चुका है तो संभव है कि वह यहां इंडिया में फिर से प्रयास करे।”

“आई एग्री।”

“लेकिन उस ‘अटेम्प्ट टू मर्डर’ का उसके याद्दाश्त चले जाने से क्या कनेक्शन हो सकता है?”

“यही सवाल तो मेरे जेहन में भी है।”

“इस ‘अटेम्प्ट टू मर्डर’ के बाद वे कौन सी ऊटपटांग आदतें थीं, जो यश की जीवन-शैली का हिस्सा बन गयी थीं?”

“ ‘अटेम्प्ट टू मर्डर’ की घटना के बाद मैं अक्सर उसके कमरे से बातचीत की आवाजें सुना करती थी। शायद वह खुद से बातें करता था। मैंने कई बार उसे रात के समय कॉरिडोर में टहलते हुए देखा था, ठीक वैसे ही जैसे कोई शख्स नींद में चलता है।”

“ये विश्वास करना बेहद मुश्किल है कि केवल ‘अटेम्प्ट टू मर्डर’ के कारण यश को ‘स्लीप-वॉकिंग’ और ‘सेल्फ-टॉकिंग’ जैसी आदतें पड़ गयीं। उसके साथ कुछ और भी हुआ रहा होगा। आई मीन कुछ ऐसा जिसका उस पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा।”

“सॉरी टू से बट यदि उसके साथ ऐसा कुछ हुआ रहा होगा तो मुझे इस बारे में कुछ नहीं मालूम।”

“तो क्या आपने केवल यही बताने के लिये मुझे यहां बुलाया था?”

“नहीं। मेरे पास कुछ है, जो मैं आपको दिखाना चाहती हूं, लेकिन उससे पहले

मैं ये जानना चाहती हूं कि क्या आप माया नाम की किसी ऐसी लड़की को जानते हैं, जिसके साथ यश का अफेयर है?”

“टोटल बकवास।” साहिल के चेहरे पर सख्त विरोध के भाव उभरे- “वह खुले विचारों का जरूर है, लेकिन किसी अफेयर में इन्वॉल्व नहीं है। आपने ये क्यों पूछा? आपको ऐसा क्यों लगा कि उसका माया नाम की किसी लड़की के साथ अफेयर है?”

“क्या यश को ड्राइंग का शौक है?”

जवाब के बजाय एक और सवाल से साहिल झुंझलाया, किंतु बात को अधिक लम्बा न खींचने के ध्येय से बिना किसी टिप्पणी के कह दिया- “नहीं। वह स्कूल टाइम से ही ड्राइंग में कमजोर है।”

“एक मिनट रुकिये।”

कोमल अपनी जगह से उठी और स्टडी टेबल तक पहुंची। जब वापस आई तो उसके हाथ में कुछ ड्राइंग शीट थे, जिन्हें उसने साहिल की ओर बढ़ाते हुए कहा- “ये स्केचेज आपके भाई ने ही बनाए हैं।”

साहिल ने चेहरे पर कौतुहल का भाव लिए हुए उन पन्नों को थाम लिया, जो संख्या में चार थे। पहले पन्ने पर एक महल का स्केच था। दूसरे पन्ने पर जलते हुए पीपल के पेड़ को दिखाया गया था, जिसके तने पर कोई इंसान बंधा हुआ नजर आ रहा था। तीसरे पन्ने पर एक व्यक्ति को दर्शाया गया था, जिसकी वेशभूषा पुरातन काल के ब्राह्मणों से मिलती-जुलती थी। साहिल उस स्केच को देख कर चौंका था, क्योंकि पुरातन काल के उस ब्राह्मण की आकृति यश की मुखाकृति से मिलती-जुलती थी। चौथे पन्ने पर तालाब के किनारे घास पर लेटी एक राजकुमारी का स्केच उकेरा गया था, जो दाहिने गाल पर हाथ रखे हुए तालाब के जल में अपनी परछाईं देख रही थी।

“मुझे नहीं मालूम कि ये स्केचेज किस चीज़ से जुड़े हैं। लेकिन इस एक स्केच के बारे में यश ने मुझे एक बात बताई थी।” कोमल ने उस स्केच पर उंगली रखते हुए कहा, जिसमें तालाब के किनारे लेटी राजकुमारी पानी में अपनी परछाईं देख रही थी।

“क्या ये स्केचेज वास्तव में यश ने ही बनाये हैं?”

“ऑफकोर्स। यश ने ही बनाये हैं।”

“आपको यश ने इस राजकुमारी जैसी लड़की के बारे में क्या बताया था?”

“उसने कहा था कि माया नाम की ये लड़की उसकी ड्रीम गर्ल है।”

“और आपने यकीन कर लिया? क्या आपने उससे ये नहीं पूछा कि सैकड़ों साल पुरानी दुनिया की ये लड़की उसकी ड्रीम गर्ल कैसे हो सकती है?”

“हर लड़का या लड़की अपने पार्टनर में प्रिंसेज या प्रिंस की छवि देखता है, इसलिए मुझे लगा कि उसने माया नाम की अपनी गर्लफ्रेंड को प्रिंसेज के रूप में रिप्रेजेंट के लिए ये स्केच बनाया होगा।”

“क्या आपको यकीन है कि ड्राइंग से दूर भागने वाला एक लड़का किसी प्रोफेशनल स्केच आर्टिस्ट की तरह ये स्केचेज बना सकता है?”

“इट मे बी पॉसिबल।” कोमल ने कंधे उचकाए- “हो सकता है उसने कहीं से स्केचिंग सीखी हो।”

“क्या उसने ये स्केचेज आपके सामने बनाये थे?”

“नहीं। उसने मुझे ये स्केचेज बनाने के बाद दिखाए थे।”

“तो फिर आप इस बात को लेकर इतनी श्योर कैसे हो सकती हैं कि ये

स्केचेज उसी ने बनाए हैं?”

“क्योंकि ये बात खुद उसी ने मुझसे कही थी। इवेन मैंने उससे पूछा भी था कि उसे स्केचिंग कैसे आती है, तो उसने इस जवाब से मुझे चौंका दिया कि स्केचिंग उसके जीवन का हिस्सा रह चुका है।”

“ये स्केचेज अभी तक आपके पास क्यों है?”

“बाय मिस्टेक मैं इन्हें अपने रूम में ले कर आ गयी। सोचा था, उसे बाद में रिटर्न कर दूंगी, लेकिन भूल गयी।”

“ये सब कुछ इंडिया लौटने से कितने दिन पहले हुआ था?”

“लगभग हफ्ते भर पहले।”

साहिल के पास अब कहने को कुछ नहीं बचा, इसलिए वह खामोश रह गया।

“मुझे लगता है कि आपको अब यश के विषय में किसी पैरासाइकोलोजिस्ट से कंसल्ट करना चाहिए।”

“क्या मैं इन स्केचेज को अपने साथ ले जा सकता हूँ?”

कोमल ने गर्दन हिलाकर ‘हाँ’ में जवाब दिया।

“थैंक्स फॉर योर सपोर्ट।”

कहने के बाद साहिल सोफे से उठ खड़ा हुआ।

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संस्कृति का जिस्म धूल और पसीने से तर हो चुका था। उसने हांफते हुए फर्श में किए गये सुराख की ओर देखा। सुराख में नजर आ रहा घुप्प अंधेरा खौफनाक था।

स्टोररूम के नीचे तहखाना होने की उसकी शंका बेबुनियाद नहीं थी। पिछली रात और आज पूरे दिन उसने कुदाल और फावड़े की मदद से फर्श में इतना पर्याप्त सुराख बना डाला था कि अब वह आसानी से तहखाने में उतर सकती थी। जिस कोने में उसने सुराख किया था, उस कोने में रखे हुए टूटे फर्नीचर्स को दरवाजे के पास जमा कर दिया था, ताकि कोई दरारों से झांक कर यह न जान सके कि वह फर्श की खुदाई कर रही है। हालांकि अब-तक परिवार का कोई भी सदस्य उसकी कुशलता के प्रति आश्वस्त होने के लिए नहीं आया था, सिवाय सुजाता के, जो दिन में तीन बार आकर दरवाजा पीट चुकी थीं, किंतु हर बार उसने कोई जवाब नहीं दिया था।

संस्कृति ने तहखाने के तल का पता लगाने के ध्येय से एक पत्थर सुराख में टपकाया। पत्थर के तल से टकराने के बाद आई आवाज से उसने अंदाजा लगाया कि तल तकरीबन आठ फीट नीचे था। थोड़े समय के आराम के बाद उसने कोने में पड़ी रस्सी उठायी। योजना के मुताबिक उसने रस्सी का एक सिरा दरवाजे के हैण्डल से बांधा और दूसरा सिरा सुराख में लटका दिया। इसके बाद खूंटी से लालटेन उतारकर तहखाने में झांकी।

लालटेन की रोशनी ने अपने सामर्थ्य के अनुसार तहखाने में व्याप्त अंधेरे का हनन किया। संस्कृति को वही नजर आया, जिसकी उसने पहले से ही कल्पना कर रखी थी। पक्का फर्श और उस पर जमी धूल की मोटी परत। उसके द्वारा लटकाई गयी रस्सी फर्श से दो फीट ऊपर समाप्त हो रही थी। संस्कृति को लगा कि रस्सी पर फिसलते हुए वह बिना किसी कठिनाई के तहखाने में उतर सकती है।

उसने बाएं हाथ में लालटेन लटकाया और दाहिने हाथ से रस्सी पकड़कर नीचे लटक गयी। कुछ ही सेकेण्ड में उसके पैर ‘धप्प’ की आवाज करते हुए तहखाने के तल से टकराये। फर्श पर जमी धूल की मोटी परत हवा में उड़ी। कुछ पल ठहरकर संस्कृति ने धूल का गुब्बार छंटने का इंतजार किया, तत्पश्चात लालटेन की रोशनी में तहखाने के जर्रे-जर्रे का मुआयना करने लगी।

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4

“क्या तुम जानते हो यश कि तुम मैथ के एक अच्छे स्टूडेंट हो?” साहिल ने यश के प्लेट में चावल डालते हुए कहा। एक बज चुका था। क्योंकि वक्त लंच का था, इसलिये दोनों डायनिंग टेबल पर थे।

“मैथ क्या है?”

“एक सब्जैक्ट।”

“और सब्जैक्ट?”

“हम जब किसी टॉपिक को लेकर डिटेल स्टडी करते हैं, तो वह टॉपिक सब्जेक्ट कहलाने लगता है।”

“यानी कि टॉपिक किसी सब्जैक्ट का छोटा रूप होता है?”

“डेफिनेटली।” साहिल उत्साहित स्वर में बोला। यश के सोचने-समझने की शक्ति सही-सलामत थी, ये जानकर उसने राहत की सांस ली।

“मैथ में किस टॉपिक की डिटेल स्टडी की जाती है?”

“मैं मैथ के बारे में ज्यादा नहीं जानता, लेकिन एक बार जब तुम्हारी यादें तुम्हारे साथ थीं तब तुमने ही मुझे बताया था कि ईश्वर ने ब्रह्माण्ड के नियमों को एक स्पेशल लैंग्वेज में लिखा है, उसी लैंग्वेज को मैथ कहते हैं। यानी कि मैथ की स्टडी का मतलब है, उन नियमों को समझना जिनसे ये ब्रह्माण्ड संचालित होता है। ये ऐसा लैंग्वेज हैं, जिसे वर्ड्स और सेन्टेस के बजाय नम्बर्स और एक्वेशन्स के फॉर्म में लिखा जाता है।”

यश ने आँखें बन्द कर लीं। उसके अंदाज से लगा कि वह साहिल की बातों को समझने की कोशिश कर रहा था, किन्तु जल्द ही इस प्रयास में असफल होने के बाद उसने आंखें खोल दी।

“लैंग्वेज किसे कहते हैं? नम्बर्स और एक्वेशन्स क्या होते हैं? ब्रह्माण्ड क्या है?” यश ने व्यग्र लहजे में कई सवाल कर डाले।

“भाषा विचारों को दूसरों के सम्मुख रखने का एक माध्यम है। संख्याएं हमारे जीवन को सुनियोजित रखने वाली राशियां हैं। किसी स्टेटमेण्ट का मैथेमैटिकल फॉर्म एक्वैशन और हमारा परिवेश ब्रह्माण्ड कहलाता है।” साहिल ने जल्दी-जल्दी कहा और लम्बी सांस लेते हुए बोला- “मैं जानता हूं कि मौजूदा हालात में ये सब समझना तुम्हारे लिये आसान नहीं है, लेकिन मेरा एकेडमिक बैकग्राउण्ड इतना ब्राइट नहीं रहा है कि मैं ये सब तुम्हें सिम्पल वे में समझा सकूं।”

हर बार की तरह इस बार भी यश ने भावशून्य प्रतिक्रिया दी, और चावल के बीच दाल उड़ेलने लगा।

“मैं समझता हूं कि मैथ में गहरी रुचि होने के कारण उससे जुड़ी कुछ चीजें तुम्हारे सबकॉन्शियस माइण्ड का हिस्सा बन गयी होंगी। मेरे कहने का मतलब है कि याद्दाश्त खो देने के बाद भी अपने सब्जेक्ट से जुड़ी कुछ चीजें तुम अभी भी जानते होगे।”

“क्या आपकी ये थ्योरी मुझे मेरी पहचान वापस दिलाने में कोई मदद कर सकती है?”

साहिल ने खामोशी अख्तियार कर ली और यश की प्लेट देखने लगा। वह प्लेट में चम्मच भर चला रहा था। अब-तक की बात-चीत के दौरान उसने एक भी निवाला हलक के नीचे नहीं उतारा था।

“मैं नहीं जानता कि कब और किस परिस्थिति में तुम्हारी चेतना वापस आ सकती है, लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि यदि तुमने सबकॉन्शियस माइण्ड का सहारा लिया तो बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं।”

“मैंने आपसे वही तो पूछा कि मेरा सबकॉन्शियस माइण्ड मेमोरी रिगेन करने में किस प्रकार मेरी सहायता कर सकता है?”

“ये समझने के लिए तुम्हें सबसे पहले सबकॉन्शियस माइण्ड की कार्यप्रणाली को समझना होगा। हमारे दिनचर्या की काफी एक्टिविटीज ऐसी होती हैं, जिन्हें पूरा करने के लिये हमें उन्हें याद नहीं रखना पड़ता, क्योंकि उन एक्टीविटीज को पूरा करने का जिम्मा हमारे अवचेतन मस्तिष्क का होता है। उदाहरण के तौर पर श्वसन क्रिया को ही लेते हैं, क्या हमें ये याद रखना पड़ता है कि हमें एक मिनट में साठ बार सांस लेना है? नहीं! हमें याद रहे या न रहे ये प्रक्रिया सतत रूप से चलती रहती है। उस वक्त भी जब हम नींद में होते हैं। हमारे फेफड़ों को श्वसन के विषय में हमेशा याद दिलाते रहने वाला कौन होता है?”

“सबकॉन्शियस माइण्ड?”

“एक्सैक्ट्ली! दरअसल श्वसन हमारी अनिवार्य आवश्यकता है और जीवन के लिए अनिवार्य जैविक क्रियाओं को पूर्ण करने की जिम्मेदारी चेतन मस्तिष्क की नहीं बल्कि अवचेतन मस्तिष्क की होती है, क्योंकि चेतन मस्तिष्क भुलक्कड़ प्रवृत्ति का होता है। जैविक क्रियाओं के साथ-साथ उन सभी क्रियाओं को, जिन्हें हम अपने जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बना लेते हैं, पूरा करने की जिम्मेदारी अवचेतन मस्तिष्क को हस्तान्तरित हो जाती है। जब अवचेतन मस्तिष्क हमारी किसी भौतिक आवश्यकता को संपादित करने में अक्षम होता है तो वह अभीष्ट क्रिया को पूर्ण करने के लिये अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करता है।

मैं इसे एक एग्जाम्पल की हेल्प से तुम्हें और बेहतर ढंग से समझा सकता हूं। सपोज दैट कोई स्टूडेंट एग्जाम में टॉप मोस्ट रैंक सेक्योर करने के लिये पजेसिव है,

और वह दिन-रात यही सोचता है कि उसे एट एनी रेट टॉप रैंक एचीव करनी है। वह ज्यों-ज्यों अपने लक्ष्य के प्रति उग्र चिन्तन करता जाता है, त्यों-त्यों लक्ष्य प्राप्त न होने की दशा में उसके अवसाद ग्रस्त होकर आत्महत्या कर लेने या फिर मानसिक संतुलन खो बैठने की संभावना भी प्रबल होती जाती है। अंततः टॉप रैंक सेक्योर करना उसके जीवन का अनिवार्य लक्ष्य बन जाता है, और ऐसा होते ही अवचेतन मस्तिष्क जागृत हो उठता है। लड़के का कॉन्शियस माइण्ड यानी कि चेतन मस्तिष्क पढ़ाई करने की जो भी स्ट्रेटेजी बनाता है, सबकॉन्शियस माइण्ड यानी कि अवचेतन मस्तिष्क उस स्ट्रेटेजी के पूर्ण होने के लिये अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करने में जुट जाता है। चेतन मस्तिष्क और अवचेतन मस्तिष्क का यह सम्मिलित प्रयास तब तक चलता रहता है जब तक कि लड़के के जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी, एग्जाम में टॉप करने की उसकी मंशा फलीभूत नहीं हो जाती है।”

“इतने लम्बे-चौड़े एग्जाम्पल का सीधा सा मतलब यही है कि हम जैसा सोचते हैं, हमारे आस-पास वैसा ही एटमास्फीयर क्रियेट होना शुरू हो जाता है।”

“एब्सल्युटली राइट माय डियर।” साहिल उत्साहित हो उठा। यश की सोचने की क्षमता सही सलामत थी, इसका एक और बेहतर उदाहरण उसे देखने को मिला था। यश ने बिल्कुल वही समझा था, जो साहिल उसे समझाना चाहता था। वह उत्साहित अंदाज में आगे कहता चला गया- “यही तो कारण है कि ‘बी पॉजिटिव थ्योरी’ हर मोटिवेशनल स्पीकर के शो का अहम हिस्सा होता है। हर इंटरप्रेन्योर इसीलिए इस बात पर जोर देता है कि हमेशा उस चीज के बारे में सोचो, जो तुम बनना चाहते हो, या फिर जिसे अपने जीवन में साकार होते हुए देखना चाहते हो, क्योंकि हमारे विचार ही हमारी सफलता के लिये आवश्यक परिवेश का निर्माण करते हैं।”

“आपके अनुसार मैं अपनी चेतना भले ही गंवा चुका हूं, लेकिन वे चीजें आज भी मेरे अवचेतन मस्तिष्क का हिस्सा होंगी, जो कभी मेरे जीवन की अनिवार्य आवश्यकताएं हुआ करती थीं।”

“यस। यू आर ऑन राइट ट्रैक। मैथ तुम्हारे जीवन का अभिन्न अंग था। तुम मैथ के लिये पजेसिव थे, इसलिए इस चेतनाविहीन अवस्था में भी वह तुम्हारे अवचेतन मस्तिष्क में संरक्षित होगा।”

“यानी कि मैं किसी अनजान शक्ति के वशीभूत होकर इस अवस्था में भी मैथ के प्रॉब्लम्स सॉल्व कर सकता हूं?”

“उसे अनजान शक्ति नहीं अवचेतन मस्तिष्क की शक्ति कहते हैं। एक मिनट रुको।”

साहिल इतना रोमांचित हो उठा था कि ये भी भूल गया कि वह लंच के लिए बैठा है। उसने लंच को प्लेट में अधूरा छोड़ा, नैपकिन से हाथ पोछा और शो-केस की ओर बढ़ गया। शो-केस के कांच के कपाट के उस पार नजर आ रही मैथ की अनगिनत किताबों के बीच रखा एक फाइल उठाया और उसे लेकर वापस डायनिंग टेबल तक आया।

“इस फाइल को देखो यश।”

यश ने फाइल थाम लिया। उसके अंदाज से झलकती निराशा अब उत्सुकता में तब्दील हो चुकी थी।

“सिग्निफिकेन्स ऑफ डिफरेन्शियल एक्वेशन्स इन मेडिकल साइंस: हॉडकिन हक्सले मॉडल।”

फाइल का टाइटल पढ़ने के बाद यश ने साहिल के चेहरे पर दृष्टिपात किया।

“इस टाइटल को पढ़ने के बाद तुम्हारे मन में क्या आ रहा है?”

“ये नाम कहीं सुना हुआ लग रहा है। ऐसा लगता है जैसे मैं इस टॉपिक के बारे में बहुत कुछ जानता हूं, लेकिन उसे आपके सामने रख नहीं पा रहा हूं।” यश ने दिमाग पर जोर डालते हुए कहा।

“कोशिश करो यश।” साहिल ने उकसाया- “ये तुम्हारा ही लिखा हुआ रिसर्च पेपर है, जिसे तुमने कैम्ब्रिज में रिप्रजेन्ट किया था। तुम्हें इस टॉपिक के बारे में कुछ न कुछ जरूर याद आएगा।”

यश ने आंखें बंद कर ली। उसके माथे पर पड़ने वाली सिलवटों ने इंगित किया कि मौजूदा फाइल की विषयवस्तु को याद करने के प्रयास में वह एक मानसिक द्वंद्व से जूझने लगा था।

“नहीं याद आ रहा है मुझे।” अंततः उसने आंखें खोल दी और लंबी-लंबी सांसें लेने लगा। चेहरा तनावग्रस्त हो उठा था।

साहिल ने पानी का गिलास उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा- “पानी पी लो।”

यश को सचमुच पानी की जरूरत थी। उसने गिलास को एक ही सांस में खाली करके टेबल पर रख दिया। लंच का ख्याल दोनों के ही जेहन से रुख्सत हो चुका था।

थोड़ी देर की खामोशी के बाद साहिल ने जेब से पेन निकाला और उसे यश की ओर बढ़ाते हुए कहा- “लिखने की कोशिश करो। हो सकता है कि तुम जो बता नहीं पा रहे हो, उसे शब्दों में ढाल सको।”

यश ने पेन लिया और फाइल का ब्लैंक पेज खोला। पेन हाथ में आते ही मानो उसकी उंगलिया मचलने लगीं थीं। किसी अज्ञात प्रेरणा के सम्मोहन में बंधे यश द्वारा पेन की नोक को कागज पर रखने भर की देर थी कि शब्द खुद-ब-खुद कागज पर उतरने लगे। सुखद आश्चर्य के सैलाब में डूबा साहिल, यश की उन बातों को शब्दों का रूप लेते हुए देखता रहा, जिन्हें वह लफ्जों का रूप देने में विफल रहा था। उसके अंदाज से लग रहा था कि वह मात्र एक जरिया था, शब्द किसी और की प्रेरणा से पन्ने पर उतर रहे थे। करीब दस मिनट तक लिखने के बाद यश ने लिखे हुए वाक्यों को साहिल की ओर बढ़ा दिया।

“तुम खुद मुझे सारांश सुना दो, क्योंकि मेरी इंग्लिश कमजोर है।”

“संक्षेप में कहा जाए तो ये रिसर्च ऑर्टिकल मेडिकल साइंस में डिफरेन्शियल एक्वेशन के सिग्निफिकेन्स के बारे में है। ये ऑर्टिकल विशेष रूप से हॉडकिन-हक्सले मॉडल पर केन्द्रित है। दरअसल हॉडकिन-हक्सले मॉडल एक गणितीय मॉडल है, जो न्यूरॉन्स में एक्शन पोटेन्शियल के प्रारम्भ होने और संचरित होने का विवरण प्रस्तुत करता है। ये मॉडल नॉन-लीनियर डिफरेन्शियल एक्वेशन्स का सेट होता है, जो न्यूरॉन जैसे उत्तेजनशील कोशिकाओं के इलेक्ट्रिकल करैक्टरस्टिक्स........।”

“बस....।” साहिल ने उबकर यश की बात काट दी, क्योंकि वह भारी-भरकम सिध्दान्त उसके सिर के ऊपर से जाने लगा था- “मैं जो जानना चाहता था, मुझे पता चल गया।”

साहिल की आंखों में व्याप्त हो उठी चमक बता रही थी कि उसे पहली दफा यश की हालत को लेकर सकारात्मक संकेत प्राप्त हुए थे। उसने आगे कहा- “इस वक्त मैथ से अनजान होने के बावजूद भी तुमने मैथ के एक रिसर्च ऑर्टिकल को समराइज कर डाला। अब तो तुम्हें यकीन हो गया होगा कि मैंने जो कुछ कहा वह सब सच है, कोई काल्पनिक सिध्दान्त नहीं। तुम्हारा चेतन मस्तिष्क जिन बातों को भूला चुका है, वे बातें अभी भी तुम्हारे अवचेतन मस्तिष्क में संरक्षित हैं।”

“वह सब तो ठीक है। लेकिन मेरा ये सवाल तो अब भी अपनी जगह पर है कि मैं मेरी मेमोरी रिगेन कैसे कर सकता हूं?”

“गुड क्वेश्चन यश।” साहिल ने चुटकी बजाते हुए कहा- “मेडिकल साइन्स में मेमोरी लॉस के अब-तक जितनी भी केसेज आए हैं, उनमें से अधिकतर का इलाज डॉक्टर्स के एफर्ट के बजाय पेशेण्ट के सेल्फ एफर्ट से ही कारगर हो पाया है, इसलिए तुम्हें मेमोरी रिगेन करने के लिये मेरे साथ सम्मिलित प्रयास करना होगा।”

“लेकिन वह प्रयास होगा क्या?”

“इसके लिये तुम्हें सबसे पहले कॉन्फिडेण्ट होना पड़ेगा।” साहिल ने गहरी सांस ली और कहा- “इसके बाद हम साथ मिलकर अपने आस-पास बिखरी कड़ियों को जोड़ेंगे, और उनकी एनालिसिस से ये पता लगाएंगे कि कैम्ब्रिज में तुम्हारे साथ क्या हुआ था? तुम्हारी एक रिसर्च फेलो ने मुझे बताया कि वहां तुम पर जानलेवा हमला हुआ था।”

“तो क्या वह अटैक ही मेरे मेमोरी लॉस की वजह है?”

“शायद। डायरेक्टली या इनडायरेक्टली तुम पर हुआ अटैक भी तुम्हारे सडन मेमोरी लॉस के अज्ञात कारणों में से एक हो सकता है।”

“इसका मतलब कि कारण और भी कई हैं, जो आपको नहीं मालूम हैं।”

“हां। क्योंकि तुम पर जो अटैक हुआ था, वह फेल हो गया था। जिस अटैक में तुम्हें खरोच तक नहीं आयी थी, उस अटैक को सडन मेमोरी लॉस की वजह मान लेना थोड़ा अजीब लग रहा है। इसीलिये मैंने कहा कि तुम्हारे सडन मेमोरी लॉस के और भी कई कारण हो सकते हैं, जो अज्ञात हैं। मुझे लगता है कि तुम कैम्ब्रिज में सिर्फ ‘अटैम्प्ट टू मर्डर’ का ही नहीं बल्कि कुछ अन्य रहस्यमयी गतिविधियों का भी शिकार हुए थे।”

“ऐसा क्या हुआ रहा होगा मेरे साथ, जो अचानक मुझे अपनी पहचान से हाथ धोना पड़ा?”

“ये जानने का एक जरिया मेरे पास है।” साहिल ने क्षण भर के मौन के बाद आगे कहा- “कैम्ब्रिज के वर्कशॉप में पार्टिसिपेट करने वाले इण्डियन रिसर्च स्टुडेण्ट्स के ग्रुप को तुम्हारे रिसर्च गाइड यानी कि प्रोफेसर उदयराज चव्हाण लीड कर रहे थे। इसलिये प्रोफेसर के पास उन इण्डियन रिसर्च स्टूडेंट्स के पेपर प्रेजेण्टेशन का रिकॉर्ड मौजूद होगा।”

“उस रिकॉर्ड से हमें क्या फायदा हो सकता है?”

“उस रिकॉर्ड के जरिए हम ये पता कर सकते हैं कि तुम्हारे अलावा और ऐसे कितने स्टूडेंट थे, जिन्होंने अपने रिसर्च पेपर में बायोलॉजी में मैथ के सिग्निफिकेंस को लेकर नयी संभावनाओं की ओर प्रोफेसर्स का ध्यान आकर्षित किया था।”

यश खामोशी के साथ साहिल को घूरता रहा। वह अभी तक उसके कथन का आशय नहीं समझ पाया था।

“देखो यश....।” साहिल ने समझाने वाले अंदाज में कहा- “स्टूडेंट लाइफ में कुछ स्टूडेंट्स के कई प्रतिद्वंद्वी ऐसे भी होते हैं, जो उनसे आगे निकलने की होड़ में उन्हें शारिरिक और मानसिक रूप से हानि पहुंचाने से भी परहेज नहीं करते। मुझे ऐसा लग रहा है कि तुम्हारे उत्कृष्ट शोध कार्य को दबाने के लिए तुम्हारे ही किसी प्रतिद्वंद्वी ने ऐसी गतिविधियों को अंजाम दिया है, जिसके कारण तुम अब-तक अर्जित की हुई अपनी सभी उपलब्धियों को गंवाकर स्वयं की पहचान भी खो बैठे हो।”

“यदि ऐसा है तो मेरा वह प्रतिद्वंद्वी कौन हो सकता है?”

“इसके लिये हमें प्रोफेसर चव्हाण के पास मौजूद रिकॉर्ड को खंगालना होगा। हमारे शक की सुई उस रिसर्च स्कॉलर के ऊपर ठहरेगी, जिसके रिसर्च पेपर का टॉपिक तुम्हारे टॉपिक से मिलता-जुलता होगा।”

यश ने कुछ नहीं कहा।

“बातें बहुत हो चुकी यश। लंच स्टार्ट करते हैं।”

“या....श्योर....।” कहने के बाद यश ने पहला निवाला हलक के नीचे उतारा।

“एक बात पुछूं यश?” थोड़ी देर बाद साहिल ने उसे अर्थपूर्ण नजरों से देखते हुए कहा।

“हां जरूर।” यश मुस्कुराया, आज उसके चेहरे पर नित्य की अपेक्षा रौनक थी।

साहिल ने थोड़ी देर तक यश के चेहरे के भावों को परखा। पिछले कई दिनों से उसके चेहरे पर नजर आने वाले अवसाद को छंटता देख उसे अपना सवाल पूछने के लिये ये समय उपयुक्त लगा।

“क्या सोचने लगे आप?”

“ब्रह्मराक्षस......क्या...त....तुम इसके बारे में कुछ जानते हो?”

“मैं तो अपने बारे में भी कुछ नहीं जानता, तो फिर इस ब्रह्मराक्षस के बारे में कैसे जान सकता हूं?” यश ने लापरवाह अंदाज में कहा और पानी का ग्लॉस होठों से लगा लिया।

“कोई बात नहीं। मैंने बस यूं ही पूछ लिया था।” साहिल ने भी लापरवाह अंदाज में कहा होने का दिखावा किया और लंच में व्यस्त हो गया। उसने जान-बूझकर माया और कैम्ब्रिज टूर के दौरान उसके बनाए हुए स्केचेज का जिक्र नहीं किया।

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राजमहल में कोहराम मचा हुआ था। संस्कृति का ऐसे तहखाने में बेहोश पाया जाना, जिसके अस्तित्व से आज-तक राजमहल का कोई भी सदस्य वाकिफ नहीं था, हर किसी के हैरत की खुराक बना हुआ था। सुबह-सुबह ही एक नौकर ने स्टोररूम के दरवाजे की दरारों से भीतर झांकने का प्रयास किया था। हालांकि उसे कुछ नजर तो नहीं आया था, किन्तु इतना जरूर समझ गया था कि कोई अन्दर का माहौल न देख सके, इसके लिये उसकी छोटी मालकिन ने दरवाजे पर कबाड़ का ढेर जमा कर दिया था। वह भाग कर दिग्विजय के पास पहुंचा था और उनके सामने अपने विचार कुछ इस तरह रखे थे-

‘स्टोररूम में छोटी मालकिन न जाने क्या कर रही हैं मालिक। उन्होंने अन्दर से न केवल दरवाजा बन्द किया है, बल्कि दरवाजे पर कबाड़ भी जमा कर दिया

है, ताकि कोई ये न देख सके कि वे अन्दर क्या कर रही हैं।’

ये बात साधारण नहीं थी, और न ही समझ के दायरे के भीतर की चीज थी, इसलिये दिग्विजय तत्काल ही नौकर के साथ स्टोररूम की ओर दौड़ पड़े थे। दरवाजा पीटे जाने के बाद भी कोई उत्तर न मिलने के कारण जल्द ही पूरे राजमहल में ये बात जंगल में लगे आग की तरह फैल गयी थी कि स्टोररूम में बन्द संस्कृति कोई जवाब नहीं दे रही है। राज-परिवार का हर सदस्य और नौकर दरवाजे पर जमा हो गये थे। दरवाजे पर पड़ने वाली अनगिनत थाप के बाद भी अन्दर से कोई प्रतिक्रिया न आती देख हर कोई इस शंका से ग्रस्त हो गया था कि कहीं संस्कृति ने स्वयं को कोई हानि तो नहीं पहुंचा ली। अंतत: दिग्विजय ने आदेश दिया था- “दरवाजा तोड़ दो।”

मालिक का आदेश मिलते ही नौकर अपने प्रयास में जुट गये थे। करीब आधे घंटे की कमरतोड़ मेहनत के बाद मजबूत दरवाजा टूट तो गया था, किन्तु अन्दर की ओर कबाड़ का ढेर जमा होने के कारण कमरे में दाखिल होने के लिये जगह बनाने में भी उन्हें पन्द्रह मिनट लग गये थे।

स्टोररूम के एक कोने का फर्श तोड़ कर सुराख बनाया गया था। संस्कृति की गैरमौजूदगी और सुराख में लटक रही रस्सी ने अंदर दाखिल होने वालों को बताया था कि वह तहखाने में थी। ‘सदियों पुराने राजमहल में एक तहखाना भी था’ इस सच्चाई ने सभी को स्तब्ध कर दिया था। कौतुहल और अविश्वास की अधिकता के कारण किसी के होठों से बोल तक नहीं फूट सके थे।

सुजाता ने दिग्विजय को इस अंदाज में देखा था, मानो उन्हें याद दिलाना चाहती थीं कि संस्कृति के जिस भय को उन्होंने वहम कह कर टाल दिया था, वह भय जायज था। दिग्विजय के आदेश पर दो नौकर सुराख से तहखाने में कूदे थे और अगले ही क्षण उन दोनों ने ऊपर खड़े लोगों को सूचित किया था कि अंदर छोटी मालकिन निश्चेत अवस्था में पड़ी हुई हैं। सुजाता समेत सभी महिलाओं का कलेजा हलक में आ फंसा था। अनिष्ट की आशंका से अन्य पुरुषों के भी रोंगटे खड़े हो गये थे।

“व...वह...ठ...ठीक तो...है...?” सुजाता का गला रुंध गया था।

“जी हां मालकिन। नब्ज चल रही है।” तहखाने से नौकर की आवाज आयी थी।

“उसे फौरन बाहर निकालो।” ये जानने के बाद की संस्कृति को सिवाय निश्चेतन के और कुछ नहीं हुआ है, दिग्विजय का खोया हुआ हौसला मानो लौट आया था।

और फिर.....आनन-फानन में उसे तहखाने से बाहर निकाला गया था।

इस समय में वह होश में थी। चूंकि पुरुष, नौकरों के साथ तहखाने में उतरे हुए थे, इसलिए कमरे में सिवाय महिलाओं के और कोई नहीं था। बेड के सिरहाने सुजाता बैठी हुई थीं। उनके अलावा कमरे में संस्कृति की दोनों छोटी माएं और दो नौकरानियां थीं।

“मैंने आपसे कहा था मम्मी कि फर्श के नीचे तहखाना है।” संस्कृति के लहजे में अब भी कम्पन था।

“घबराओ मत। अब तुम्हें कुछ नहीं होगा। हम उस तहखाने को ईंट-पत्थरों से बंद करवा देंगे।” सुजाता ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।

“ये इतना आसान नहीं होगा मम्मी। मुझे पता चल चुका है कि हांफने की आवाज केवल मुझे ही क्यों सुनाई दे रही थी?”

“तहखाने में तुम्हारे साथ क्या हुआ था, ये हम बाद में जानेंगे संस्कृति। अभी तुम आराम करो।” चन्द्रोदय की पत्नी शतरूपा ने, जो अपनी ऊंची कद, दुग्ध वर्ण और आभूषण से लदी काया के कारण किसी रियासत की महारानी जान पड़ती थी, कहा।

“नहीं छोटी मां।” संस्कृति यूं चौंकी मानो यदि वह लोगों को तहखाने की घटना अभी नहीं बता पायी, तो फिर जिन्दगी उसे ये मौका दोबारा नहीं देगी- “मुझे बताने दीजिए। यदि मैं उन घटनाओं को आप लोगों को नहीं बताऊंगी तो शायद मेरी हालत कभी नहीं सुधर पाएगी।”

शतरूपा ने जेठानी की ओर देखा। सुजाता के भावों से ज्ञात हुआ कि वे तहखाने में बेटी के साथ घटी घटना जानने हेतु व्यग्र थीं।

“ठीक है संस्कृति। बताओ क्या हुआ था तहखाने में?”

“आप लोग यकीन तो करेंगी न?” संस्कृति के आशंकित नेत्र दोनों छोटी माओं और सुजाता पर ठहर गये।

“देखो संस्कृति। स्टोररूम के नीचे गुप्त तहखाने का पाया जाना, सामान्य घटना नहीं है। तुम्हारे साथ तहखाने में घटी घटना यदि असामान्य श्रेणी की होगी तो भी हम उसे तुम्हारा वहम कह कर खारिज कर पाने की स्थिति में नहीं हैं। मौजूदा परिस्थितियों में हर व्यक्ति तुम्हारे शब्दों पर यकीन करने के लिये बाध्य है। तुम पहले बताओ तो सही कि तहखाने में हुआ क्या था?”

उपर्युक्त वाक्य बोलने वाली चन्द्रोदय की पत्नी अनुजा थी। सांवले वर्ण की अनुजा का रुझान सादगी की ओर अधिक था। सौन्दर्य-प्रसाधान और आभूषणों से दूर होने के कारण उसकी काया शतरूपा की भांति कान्तिमय तो नहीं नजर आ रही थी, किन्तु सौन्दर्य में वह शतरूपा से लेशमात्र भी पीछे नहीं थी।

आश्वासन पाकर संस्कृति ने कहना शुरू किया।

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तहखाना मध्यम आकार के किसी सभागार जैसा था, जिसकी लम्बाई और चौड़ाई एकसमान थी। संस्कृति ने अनुमान लगाया कि वह वर्गाकार तहखाना सिर्फ स्टोररूम के नीचे ही नहीं, अपितु राजमहल के कई कमरों के नीचे तक फैला होगा। उसे असली हैरानी तब हुई जब तहखाने में आवागमन हेतु कोई रास्ता नजर नहीं आया। दीवारों पर लाल रंग से संस्कृत में श्लोक लिखे गये थे। लंदन और कैम्ब्रिज में दस साल गुजारने के कारण संस्कृति भारतीय संस्कृति को बहुत पीछे छोड़ आयी थी, इसीलिये तहखाने की दीवारों पर लिखे श्लोकों का अर्थ समझना तो दूर वह ये तक नहीं समझ पायी कि वे श्लोक भारतीय दर्शन में ईश्वर की वाणी कहे जाने वाले ग्रन्थ श्रीमद्भागवत गीता से उद्धृत थे। वर्गाकार फर्श के केन्द्र पर एक ताबूत रखा हुआ नजर आ रहा था, किंतु लालटेन का प्रकाश इतना पर्याप्त नहीं था कि संस्कृति यथा-स्थान खड़े होकर ताबूत का बारिक मुआयना कर पाती। एक ऐसे तहखाने में जिसमें न तो आवागमन का कोई मार्ग था, और न ही उसके अस्तित्व से राजभवन का कोई सदस्य वाकिफ था, किसी पुराने ताबूत की मौजूदगी ने संस्कृति को रोमांचित कर दिया। कौतुहल के वशीभूत होकर वह आहिस्ता चाल चलते हुए ताबूत की ओर बढ़ी। तहखाने के लोमहर्षक सन्नाटे में उसे अपनी पदचाप भी खौफनाक लग रही थी। ज्यों-ज्यों उसके और ताबूत के बीच का फासला कम होता गया, त्यों-त्यों ताबूत की छवि स्पष्ट होती गयी।

समीप पहुंचने के बाद संस्कृति ने पाया कि ताबूत का पूरा आकार इतना पर्याप्त था कि उसमें अच्छी कद-कादी का एक व्यक्ति आराम से लेट सकता था। वह पंजों के बल बैठी और लालटेन की रोशनी समीप ले जाकर ताबूत का निरिक्षण करने लगी। ताबूत पर भी दीवारों की भांति गीता के श्लोक लिखे हुए थे, इसके अलावा ढक्कन पर स्वास्तिक-चिह्न भी बने हुए थे। उससे लटक रहे सिन्दूर पुते हुए ताले का आकार भी स्वास्तिक से मिल रहा था, जिस पर मौली धागे के कई फेरे लपेटे हुए थे। ‘ऑकल्ट’ शब्द हथौड़े की चोट की मानिंद संस्कृति के जेहन में गूंजा। ‘तो इसका मतलब इस तहखाने में किसी पुराने ऑकल्ट को सालों से बंद करके रखा गया है।’ वह खुद से कह उठी- ‘यह तंत्र क्रिया बेवजह तो नहीं की गयी होगी। कोई वजह तो जरूर होगी, लेकिन क्या?’

मन में उपज रहे अनेक सवाल संस्कृति के कौतुहल को पोषित करने लगे, किंतु जवाब जानने का उसके पास कोई भी जरिया नजर नहीं था, सिवाय ताबूत को खोलने के। कुछ सोचकर उसने ताबूत से लटक रहे ताले को हाथ लगाया।

ठीक इसी क्षण ताबूत के अन्दर से किसी के सांस लेने की ऐसी आवाज आयी, जैसे ताले को मात्र स्पर्श कर देने से अंदर सो रहे शख्स की नींद में खलल

पड़ गया हो।

संस्कृति ने भयभीत होकर ताले से अपना हाथ हटा लिया। उसके हाथ हटा लेने के बाद भी सांस चलने की ध्वनि बन्द नहीं हुई।

“ओह...गॉड! व..वह इसी ताबूत....में हैं....! इसी..इसी ताबूत में है वह।”

संस्कृति का कलेजा हलक में आ फंसा। सांस चलने की जिस ध्वनि ने उसे पिछली रात डराया था, वह ध्वनि जमीन में दफन, चारों ओर से बंद तहखाने में मौजूद ताबूत में सोए हुए किसी इंसान के साँसों की थी, इस खौफनाक सच ने उसे जड़ कर दिया। भय उसके मुकम्मल वजूद पर हावी होता चला गया। पीछे पलटने तक का साहस न जुटा सकी, क्योंकि मन में ये आशंका जड़ें मजबूत कर चुकी थी कि पीछे पलटने पर उसका सामना उसी आदमी से होगा, जो ताबूत में लेटा सांसें ले रहा था।

“मा....या.....।” सांसों के बीच वही पुकार, जो वह पहले भी सुन चुकी थी।

संस्कृति का हलक सूख गया। तहखाने में राजमहल का कोई खौफनाक राज दफन है। इस हकीकत ने उसके शेष सभी कौतुहलों का अंत कर दिया। वह अब तहखाने में एक पल भी नहीं ठहरना चाहती थी। बदन की थरथराहट को नियंत्रित करते हुए वह उठ खड़ी हुई। उसे तहखाने का कोना-कोना डरा रहा था। आस-पास किसी साए की मौजूदगी का वहम भी उसके साहस का इम्तिहान लेने लगा।

ताबूत पर नजर गड़ाए हुए वह पीछे खिसकने लगी। तब तक खिसकती रही, जब तक कि उसकी पीठ उस रस्सी से नहीं टकरा गयी, जिससे लटक कर वह तहखाने में उतरी थी। हालांकि रस्सी तक पहुंचते-पहुंचते उसके जिस्म में इतनी ताकत शेष नहीं थी कि ऊपर स्टोररूम में जाने की कोशिश कर सकती, किन्तु फिर भी जीवित रहने की लालसा ने उसके अन्दर साहस का संचार किया। उसने रस्सी को दोनों मुट्ठियों में भींचा और हवा में लटक गयी, ताकि दोनों पैरों की उंगलियों को रस्सी में फंसाकर ऊपर उठ सके।

मनुष्य का बुरा वक्त, दुर्भाग्य के लिए आक्रमण करने का सबसे सही वक्त होता है, ये कहावत एक बार फिर उस समय चरितार्थ हुई, जब तहखाने में लटक रही रस्सी संस्कृति के भार का वहन न कर सकी, और टूट गयी। पुरानी रस्सी से और अपेक्षा ही क्या की जा सकती थी? ‘धप्प’ की आवाज सन्नाटे में गूंजी। संस्कृति को चोट तो लगी। किंतु उसे चोट से कहीं अधिक खौफ की अनुभूति हुई। बाहर निकलने का एकलौता रास्ता बंद होते ही उसके सब्र का बांध टूट गया। उसे ऐसा लगा मानो उस स्थान पर वजनी पत्थर रख दिया गया हो, जहां कलेजा पाया जाता है। विस्फारित नेत्रों से उसने ताबूत की ओर देखा। पास ही छोड़ दिये गये लालटेन की पीली रोशनी में ताबूत पहले से भी भयानक नजर आने लगा था। उससे अब भी आवाज आ रही थी, किंतु संस्कृति के कानों तक मक्खी की भिनभिनाहट के रूप में ही पहुंच पा रही थी। स्टोररूम के दरवाजे पर उसने कबाड़ का ढेर जमा कर दिया था, ताकि राजभवन का कोई सदस्य उस वक्त झिर्री से अन्दर न झाँक सके, जब वह तहखाने में उतरने का रास्ता बना रही हो। उसने बाहर से मदद मिलने की आस तब तक के लिये छोड़ दी, जब तक कि लोगों को ये नहीं पता चल जाता कि अब वह स्टोररूम के बजाय एक गुप्त तहखाने में है। बाहर निकलने के प्रयास के तहत वह लोमड़ी की भांति कई दफे उछली भी, किन्तु पर्याप्त ऊंचाई तक न पहुंच पाने के कारण स्टोररूम का फर्श उसके हाथ तक न आ सका।

“हेल्प मी गॉड प्लीज।”

निराश संस्कृति ने भी अन्त में वही किया, जो विषम परिस्थितियों में हर इंसान करता है, किन्तु यहां भी वही होना था, जो विषम परिस्थितियों में हर इंसान के साथ होता है। तहखाने से बाहर निकलने का कोई दूसरा विकल्प नहीं मिलना था, सो नहीं मिला।

“उफ्फ। ये रस्सी.....।” संस्कृति ने झुंझलाते हुए ऊपर देखा। सुराख से लटक रहा रस्सी का सिरा उसे मुंह चिढ़ाता हुआ नजर आया।

आंखों में दहशत लिये हुए वह फिर से ताबूत की ओर पलटी।

“मा....या....।”

पिछली रात की तरह एक बार फिर उसे महसूस हुआ कि हवा का एक तेज झोंका उसके कान में उपरोक्त शब्द फूंकते हुए गुजर गया।

“क....कौन......हो.....त...तु...म..?मुझे....तंग.....क्यों.....कर.....रहे.....हो...?मेरा....ना....म.....मा....या......नहीं है....।”

संस्कृति ने शून्य को लक्ष्य करके कहा, क्योंकि वह जानती थी कि तहखाने में

उसके अलावा दूसरा जो कोई भी था, हवा में घुला हुआ था।

“हमारे पास आओ।” इस बार फुसफुसाहट की आवाज ताबूत से आयी थी। संस्कृति ने गौर किया कि ताबूत में अब हल्का कम्पन शुरू हो चुका था।

“पास....आओ....हमारे।”

ताबूत से आती रहस्यमयी आवाज में एक आकर्षण था, जो संस्कृति के भय पर हावी हो गया और उसके कदम जेहन से बगावत करके ताबूत की ओर बढ़ गये। किसी अज्ञात सम्मोहन में जकड़ी संस्कृति ताबूत के पास पहुंची।

“हमें....बाहर....निकालो।” इस बार ताबूत से आयी आवाज में आदेश था।

“क....कौ...न.... ह...हो...तु...म?”

“पहले बाहर निकालो।”

“पहले...ब...ता...ओ...क....कौन....ह...हो तुम....?” संस्कृति का कम्पित स्वर।

“वही हूं, जिसने तुमसे प्रेम करने की सजा पायी थी। वही हूँ, जिसे पीपल के तने से बांध कर जिन्दा जलाया गया था।”

संस्कृति की साँसें तेज हो गयीं। जाने कौन सा कौतुहल था, जो थोड़ी देर पहले खौफ से बुरी तरह कांप रही संस्कृति अब उस इंसान से बातें कर रही थी, जो सदियों से एक ताबूत में कैद था।

“नहीं....तुम इंसान नहीं हो सकते, क्योंकि कोई इंसान एक ताबूत में जिन्दा नहीं रह सकता।”

“हाँ! हम इंसान नहीं हैं, लेकिन तुम्हारे प्रेमी अवश्य हैं। हमें बाहर निकलो माया।”

“म....मैं माया नहीं हूं.....।”

“तुम माया ही हो।” ताबूत में कैद अजूबा चीख उठा- “हमें बाहर निकालो। हम सदियों से तुम्हारी राह देख रहे हैं। हाथ आगे बढ़ाओ और ताबूत खोल दो। आजाद कर दो हमें। सदियों पहले हम-दोनों की जिस मोहब्बत को तुम्हारे जालिम पुरखों ने पैरों तले रौंद डाला था, उसे हम फिर से जवां करेंगे। उस मोहब्बत को हम-दोनों मिल कर परवान चढ़ाएंगे।”

“ये असंभव है। मैं ताबूत में लेटे किसी शैतान की प्रेमिका नहीं हो सकती।”

“तुम हमारी हो।”

ताबूत से इतनी तेज चीखने की आवाज आयी कि समूचा ताबूत हिल गया। ऐसा लगा जैसे संस्कृति को झांसे में ले पाने में खुद को असफल होता देख वह अजूबा झुंझला उठा था। ताबूत के ढक्कन पर अन्दर की ओर से पड़ती तेज थाप से लग रहा था कि अन्दर जो कोई भी था, वह बाहर निकलने का प्रयास कर रहा था।

ताबूत में लेटा जलजला यदि बाहर आ गया तो क्या होगा?

जवाब की कल्पना मात्र से ही संस्कृति की रूह-फना हो गयी, किंतु उसने ये सोच कर राहत की सांस ली कि यदि अन्दर लेटा शख्स ‘इविल स्पीरिट’ की श्रेणी का था, तो वह ताबूत से कम से कम तब तक बाहर नहीं निकल सकता था, जब तक कि स्वास्तिक जैसे पवित्र चिन्ह के आकार का ताला उससे लटक रहा था। हालांकि अभी भी कई प्रश्न ऐसे थे जो अनुत्तरित थे, किंतु उसे इस प्रश्न का उत्तर मिल गया था कि राजमहल का यह तहखाना गोपनीय क्यों था? और इसमें आवागमन का कोई मार्ग क्यों नहीं था? संस्कृति समझ गयी कि उसे ताबूत में लेटे अजूबे से तब तक कोई खतरा नहीं था, जब तक कि वह ताबूत खोल नहीं देती। इस समझ के अंकुरित होते ही उसने निर्भय होकर अपना कदम वापस खींच लिया।

“तुम वापस नहीं जा सकती माया। तुम्हारे कदम जब इस तहखाने की धूल से टकराए, तभी हम समझ गये कि अब हम सदियों की कैद से आजाद होने वाले हैं।”

ताबूत से आयी चेतावनी बेवजह नहीं थी, क्योंकि आवाज के खामोश होते ही ताबूत के ढक्कन के किनारों से सफेद धुआं निकल कर तहखाने में फैलने लगा। संस्कृति के देखते ही देखते धुआं समूचे तहखाने में व्याप्त हो गया। शीघ्र ही परिणाम नजर आया।

संस्कृति होश खोकर जमीन पर गिर पड़ी।

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संस्कृति को कमरे में मौजूद प्रत्येक प्राणी के चेहरे पर दहशत के साये मंडराते हुए नजर आये। उसकी कहानी पर पहली टिप्पणी शतरूपा ने की।

“त...तहखाने में ताबूत...? य....ये तो भयानक है।”

“उससे भी भयानक ये है छोटी मां कि ताबूत में जो कोई भी था, वह खुद को मेरा सदियों पुराना प्रेमी बता रहा था। उसके अनुसार हम दोनों का प्रेम राजमहल के पुरखों के अत्याचार का शिकार हुआ था। उसका कहना था कि उसे पीपल के तने से बांध कर जिन्दा जला दिया गया था।”

“क्या आपको राजमहल के खानदानी इतिहास में घटी ऐसी किसी घटना के बारे में मालूम है दीदी।” अनुजा, सुजाता की ओर मुखातिब हुई।

“नहीं।” सुजाता ने चिंतित स्वर में कहा- “यदि राजमहल के खानदानी रहस्यों के बारे में मुझे पता होता तो क्या मुझे स्टोररूम में तहखाना होने की बात नहीं मालूम होती?”

किसी ने कुछ नहीं कहा। तलवार के धार सी पैनी खामेशी को एक बार फिर शतरूपा ने ही भंग किया- “संस्कृति के अनुसार ताबूत पर सिन्दूर पुते हुए थे। मौली धागे बांधे गये थे और पवित्र स्वास्तिक के आकार के ताले से उसे बन्द किया गया था। राजपरिवार की वर्तमान पीढ़ी का नेतृत्व करने वाले बड़े भाई साहब भी उस तहखाने से अनभिज्ञ थे।” कहते हुए शतरूपा ने एक नजर सुजाता पर डाली और पहले की अपेक्षाकृत थोड़े दबे स्वर में आगे बोली- “कहीं ऐसा तो नहीं दीदी कि हमारे पूर्वजों ने किसी पुराने अभिशाप को तंत्र-क्रिया से नियंत्रित करके राजमहल के तहखाने में दफन किया था? शायद वे नहीं चाहते थे कि आने वाली पीढ़ी कौतुक वश तहखाने में घुसकर उस अभिशाप को जगाए, इसीलिये उन्होंने तहखाने में जाने का न तो कोई दरवाजा बनवाया और न ही अपने बाद की

पीढ़ियों को उस तहखाने के बारे में कुछ बताया।”

“यदि ऐसा है छोटी मां तो ताबूत में सोया हुआ वह अभिशाप मेरा ही इंतजार कर रहा था। मैं तहखाने में जाकर उस अभिशाप को जगा चुकी हूं। उस अभिशाप का पहला शिकार मैं ही बनूंगी।” शतरूपा की थ्योरी सुनने के बाद संस्कृति के लहजे में समाया भय पल-प्रतिपल गहराता चला गया।

“ऐसा कुछ भी नहीं होगा संस्कृति।” सुजाता ने संस्कृति के सर पर हाथ फेरते हुए दृढ़ स्वर में कहा- “अभिशाप ताबूत में कैद है, और हम किसी भी कीमत पर उस ताबूत को खुलने नहीं देंगे।”

इसी क्षण एक नौकर ने आकर सूचना दी कि तहखाने में एक ताबूत पाया गया है, जिसे ठाकुर साहब के आदेश पर बाहर निकाला जा रहा है।

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साहिल स्तब्ध रह गया। उसे मात्र इतना महसूस हुआ कि कोई गर्म चीज तेजी से उसके कान के पास से गुजर गयी। इस अनुभूति के कुछ क्षणोपरान्त ही एक चीख उसके कानों तक पहुंची। जो कुछ उसके कान के पास से गुजरा था, उसकी उष्णता साधारण नहीं था, और न ही वह चीख साधारण थी, जो उसे तुरन्त बाद सुनाई पड़ी थी। अतः वह दामिनी की चपलता को मात देते हुए पीछे पलटा। उसे मात्र यही नजर आया कि रेस्टोरेण्ट के लॉन में पड़ी कुर्सियों में से एक पर आसीन यश के सामने टेबल पर रखा कांच का गिलास टुकड़ों में तब्दील होकर बिखर चुका था। वह हतप्रभ था। शायद गिलास टूटने का कारण अभी तक नहीं समझ पाया था, किन्तु साहिल का कुशाग्र जेहन पल भर में ही ताड़ गया कि उसका भाई एक बार फिर अटैम्प्ट टू मर्डर का शिकार हुआ था और इसी के साथ किस्मत एक बार फिर उस पर मेहरबान हुई थी। बुलेट उसके गिलास को ध्वस्त करता हुआ उस वेटर के जिस्म में जा धंसा था, जो थोड़ी देर पहले समीप के टेबल पर आर्डर सर्व कर रहा था, किन्तु अब जमीन पर पड़ा तड़प रहा था।

पहले तो लोग भौचक्क हुए किन्तु जैसे ही उन्हें एहसास हुआ कि लॉन में फायरिंग हुई है, वे बदहवास नजर आने लगे। भीरू प्रवृत्ति के लोग भागने का रास्ता तलाशने लगे जबकि भलमनसाहत से नाता रखने वाले कुछ लोग घायल वेटर की ओर बढ़े। साहिल इन सब से तटस्थ रहते हुए उस दिशा में मुड़ा, जिस दिशा से फायर होने की संभावना थी। लॉन के गेट पर एक संदिग्ध व्यक्ति दिखा, जो थोड़ा घबराया हुआ नजर आ रहा था। साहिल की दृष्टि पड़ते ही वह तेजी से बाहर भाग गया। साहिल को माजरा समझते देर नहीं लगी। वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो उठे यश की ओर लपका।

“हरी अप।” उसने यश की बांह पकड़ी और गेट की ओर दौड़ लगाया।

“क्या हुआ?” भौचक्क यश, साहिल के साथ दौड़ते हुए पूछा, किन्तु साहिल बगैर कोई जवाब दिये, उसे दौड़ाते हुए गेट के पास पहुंचा। वह संभावना सच हो चुकी थी, जिसकी रूपरेखा साहिल के जेहन में पहले ही बन चुकी थी अर्थात हमलावर उन दोनों के ‘दृष्टि-विस्तार’ से परे हो चुका था, किन्तु शायद ये हमलावर का दुर्भाग्य था अथवा साहिल की तीक्ष्ण दृष्टि का कारनामा, जो उसे सौ गज के फासले पर दायीं ओर मुड़ने वाली गली में किसी के तेजी से घुसने की झलक मिल गयी थी।

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