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हम उन दोनों को इस कदर घबराए हुए देखकर न सिर्फ डर गए थे, बल्कि मैंने हड़बड़ी में तुरंत कार की तरफ भागकर कार का दरवाजा खोल दिया। सब लोग जल्दी से कार के अंदर बैठ गए। मैं कार स्टार्ट कर ही रहा था कि बैक सीट पर बैठा जय चिल्ला उठा –
"गाड़ी निकालो। गाड़ी यहाँ से निकालो! फ़ास्ट… फ़ास्ट! जल्दी करो प्लीज़!"
मैं कार स्टार्ट करने लगा। मेरे बगल वाली सीट पर बैठा रोनित पहले तो ज्योति और जय को पीछे मुड़कर देखता रहा और फिर अगले ही पल चिल्लाया –
“यार राज, जल्दी गाड़ी निकालो यहाँ से!”
मेरे पास सोचने-समझने का समय नहीं था तो सिचुएशन को समझते हुए मैंने बिना वक़्त गवायें कार को तेजी से भगाया। मैं जानता था पहले से ही हम सभी बहुत बुरी तरह से डरे हुए थे। फिलहाल जय और ज्योति को ढूँढ़ने की हमारी कोशिश पूरी हो चुकी थी।
पिछली सीट पर बैठा हुआ जय बिल्कुल घबराया हुआ था। उसके बगल में बैठी हुई ज्योति बिल्कुल उदास थी और लगभग रो रही थी। ज्योति ने कसकर जय को पकड़ रखा था।
"तुम दोनों ठीक तो हो न? हुआ क्या है, कुछ बताओगे?" मैंने कार का स्टेयरिंग संभालते हुए कहा। कार अब 60 की स्पीड पर उस वीरान सड़क पर लहरा रही थी।
वह दोनों खामोश थे। मैं बार-बार मुड़कर उनको पीछे देखने की नाकाम सी कोशिश कर रहा था; क्योंकि मेरा पूरा ध्यान इस समय कार को संभालने में था।
"शुक्र है, तुम दोनों सही सलामत हो। मेरा तो मन बहुत बुरी तरह से घबरा चुका था। ओह गॉड! अब हम जल्दी से बस इस जंगल से बाहर निकल जायें।" रोनित ने कहा।
ज्योति और जय ने रोनित की किसी बात का जवाब नहीं दिया। वह लगातार खिड़की से बाहर झाँक रहे थे।
"तुम लोग बोल क्यों नहीं रहे हो? अभी हमें डॉली को भी ढूँढ़ना है।" मुझे याद आया कि हमने डॉली को पीछे ही छोड़ दिया था। इसके साथ ही मैंने कार का ब्रेक लगाया ही था कि इतने में जय ने पीछे से मेरे कंधे को जोर से हिलाते हुए कहा – "कार मत रोको, प्लीज़ कार मत रोको!"
"बताओगे, हुआ क्या है? तुम दोनों इतने घबराए हुए क्यों हो? मुझे सब कुछ ठीक नहीं लग रहा।"
"मैं तुम्हारे सारे सवालों के जवाब दूँगा। प्लीज गाड़ी मत रोको राज!" पीछे से फिर जय की चीखती हुई आवाज़ मुझे सुनाई पड़ी।
कार में बैठे हुए हम चारों बिल्कुल दहशत में थे। पीछे हम डॉली को छोड़ चुके थे और इधर ज्योति और जय के मिलने के बाद भी जय की हरकतें हमें और खौफ के दलदल में धकेल रही थी।
"पता नहीं, किस मनहूस घड़ी में हम निकले थे। अब तो मुझे और भी बहुत डर लग रहा है। तू ठीक तो है न जय?" रोनित ने अपनी घबराई आवाज़ में पूछा।
जय ने सिर हिलाकर हाँ में इशारा किया। फिर एक बार उसने मुझ से रिक्वेस्ट की– "प्लीज राज, गाड़ी भगाओ!"
आगे का रास्ता थोड़ा घुमावदार था। मैं इससे ज्यादा तेज उस साँप जैसी घुमावदार सड़क पर नहीं चला सकता था। मैं मजबूर था। मैंने सामने का रास्ता देखा जो अब भी वैसा ही भयानक और सुनसान नजर आ रहा था। या सीधे शब्दों में कहूँ तो वह जंगल, वह माहौल और हमारे आस-पास की हर चीज़ जैसे हमें काटने को दौड़ रहा था। मैं कार का गियर बदलता रहा और कार की स्पीड उस घुमावदार सड़क पर कंट्रोल करता रहा। इधर जय मुझे कार की स्पीड बढ़ाने को कहता रहा। लेकिन मैं जानता था, मैं अपनी पूरी कोशिश कर रहा था।
"देखो जय, अभी हमें डॉली को भी ढूँढ़ना है! वह भी पीछे जंगल में खो चुकी है। हमें उसे ढूँढ़ना ही होगा। तुम लोग मुझे बताओगे आखिर यह सब चल क्या रहा है?" मैंने इतना कहा ही था कि मुझे ज्योति की रोने की आवाज़ सुनाई देने लगी।
मैं बिल्कुल घबरा गया।
"ज्योति, तुम रो क्यों रही हो? तुम दोनों बोलते क्यों नहीं कि क्या हुआ है? तुम लोग वहाँ पर इस तरह से भागते हुए क्यों आए जंगल से? ज्योति, कुछ बोल क्यों नहीं रही है? प्लीज, हमें बताइए! हम लोग बहुत परेशान हैं। डॉली भी गायब है। हम उसे ढूँढ़ने गए थे लेकिन वह हमें वहाँ पर नहीं मिली। लेकिन उसकी कार हमें मिली।”
"हाँ, मैं जानता हूँ!" जय की मासूम आवाज़ जैसे ही रोनित और मैंने सुनी हम शॉक रह गए।
“क्या? तुम कैसे जानते हो? तुम्हें तो हम अभी बता रहे हैं डॉली के बारे में।" रोनित ने घबराई आवाज़ में पीछे मुड़कर कहा।
“क्योंकि डॉली का एक्सीडेंट हो चुका है जिसके बारे में तुम जानकर भी अंजान हो।” ज्योति ने अपनी खामोशी तोड़ी दी। इतना सुनते ही हम ज्योति को घूरने लगे। कार के अंदर फैले हुए अंधेरे में भी जैसे हम एक-दूसरे का चेहरा आसानी से पढ़ पा रहे थे। कार अब भी 60 की स्पीड से दौड़ रही थी। मैं कभी कार की स्टेयरिंग संभालता तो कभी रोड की तरफ देखता। रह-रह कर मैं पीछे मुड़कर उन तीनों को देखने की कोशिश भी करता रहा।
“पागल हो गई हो क्या? यह क्या कह रही हो? डॉली का एक्सीडेंट हो गया है और यह बात हमें मालूम है, लेकिन हम अंजान हैं इन सब चीज़ों से?” मैंने घबराई हुई आवाज़ में कहा।
“ज्योति, तुम रो क्यों रही हो? देखो, डॉली ठीक है! उसे कुछ नहीं हुआ है। हम बस जल्दी ही उसे ढूँढ़ लेंगे।”
मैं ऐसा कह तो रहा था लेकिन चाहकर भी जैसे मैं कार को वापस उल्टी दिशा में मोड़ नहीं पा रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे उस कार पर अब मेरा कंट्रोल था ही नहीं।
“जय, तुम बोलते क्यों नहीं? क्या बात है? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। तुमने ऐसा क्यों कहा। तुम जानते हो न, हमें कार मिल चुकी है। वहाँ पर मेरी कार तो बिल्कुल सही थी। डॉली जाने कहाँ गायब थी। आई नो, वह ठीक होगी।”
"राज सही कह रहा है। हमने देखा, उसकी कार को कुछ नहीं हुआ था। सो प्लीज, कह दो कि यह सब झूठ है। मुझे बहुत डर लग रहा है।" रोनित ने लगभग रोते हुए कहा।
"डॉली कहाँ गई? उसके बारे में कोई खबर नहीं मिली। तुम इतने दावे से कैसे कह सकते हो कि उसका एक्सीडेंट हो गया था और तुम यह क्या कह रहे हो कि हम उसके बारे में जानते हैं, पर अनजान है।” मैं उन पर चिल्ला रहा था। उनकी बातें सुनकर मेरे सिर पर जैसे गुस्से का पहाड़ फूटने लगा था मैं उन पर पागलों की तरह एक के बाद एक सवाल दागे जा रहा था।
“किसी के मानने न मानने से सच्चाई नहीं बदलेगी। हाँ, मैं सच कह रहा हूँ! डॉली का एक्सीडेंट हो गया है और तुम लोग इस बात को जानकर भी अनजान हो। यह सब कुछ मैं जान चुका हूँ। मैं सच कह रहा हूँ। मेरी बात ध्यान से सुनो, तुम्हें मेरी बात पर विश्वास करना होगा।” जय अपनी बात पर डटा हुआ था।
मैं उन दोनों को बचपन से जानता था। ज्योति और जय ऐसे सिचुएशन में मज़ाक बिल्कुल नहीं कर सकते थे। लेकिन उनकी बात सच थी या नहीं, इस पर मुझे इतनी आसानी से कैसे यकीन होता।
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"गाड़ी निकालो। गाड़ी यहाँ से निकालो! फ़ास्ट… फ़ास्ट! जल्दी करो प्लीज़!"
मैं कार स्टार्ट करने लगा। मेरे बगल वाली सीट पर बैठा रोनित पहले तो ज्योति और जय को पीछे मुड़कर देखता रहा और फिर अगले ही पल चिल्लाया –
“यार राज, जल्दी गाड़ी निकालो यहाँ से!”
मेरे पास सोचने-समझने का समय नहीं था तो सिचुएशन को समझते हुए मैंने बिना वक़्त गवायें कार को तेजी से भगाया। मैं जानता था पहले से ही हम सभी बहुत बुरी तरह से डरे हुए थे। फिलहाल जय और ज्योति को ढूँढ़ने की हमारी कोशिश पूरी हो चुकी थी।
पिछली सीट पर बैठा हुआ जय बिल्कुल घबराया हुआ था। उसके बगल में बैठी हुई ज्योति बिल्कुल उदास थी और लगभग रो रही थी। ज्योति ने कसकर जय को पकड़ रखा था।
"तुम दोनों ठीक तो हो न? हुआ क्या है, कुछ बताओगे?" मैंने कार का स्टेयरिंग संभालते हुए कहा। कार अब 60 की स्पीड पर उस वीरान सड़क पर लहरा रही थी।
वह दोनों खामोश थे। मैं बार-बार मुड़कर उनको पीछे देखने की नाकाम सी कोशिश कर रहा था; क्योंकि मेरा पूरा ध्यान इस समय कार को संभालने में था।
"शुक्र है, तुम दोनों सही सलामत हो। मेरा तो मन बहुत बुरी तरह से घबरा चुका था। ओह गॉड! अब हम जल्दी से बस इस जंगल से बाहर निकल जायें।" रोनित ने कहा।
ज्योति और जय ने रोनित की किसी बात का जवाब नहीं दिया। वह लगातार खिड़की से बाहर झाँक रहे थे।
"तुम लोग बोल क्यों नहीं रहे हो? अभी हमें डॉली को भी ढूँढ़ना है।" मुझे याद आया कि हमने डॉली को पीछे ही छोड़ दिया था। इसके साथ ही मैंने कार का ब्रेक लगाया ही था कि इतने में जय ने पीछे से मेरे कंधे को जोर से हिलाते हुए कहा – "कार मत रोको, प्लीज़ कार मत रोको!"
"बताओगे, हुआ क्या है? तुम दोनों इतने घबराए हुए क्यों हो? मुझे सब कुछ ठीक नहीं लग रहा।"
"मैं तुम्हारे सारे सवालों के जवाब दूँगा। प्लीज गाड़ी मत रोको राज!" पीछे से फिर जय की चीखती हुई आवाज़ मुझे सुनाई पड़ी।
कार में बैठे हुए हम चारों बिल्कुल दहशत में थे। पीछे हम डॉली को छोड़ चुके थे और इधर ज्योति और जय के मिलने के बाद भी जय की हरकतें हमें और खौफ के दलदल में धकेल रही थी।
"पता नहीं, किस मनहूस घड़ी में हम निकले थे। अब तो मुझे और भी बहुत डर लग रहा है। तू ठीक तो है न जय?" रोनित ने अपनी घबराई आवाज़ में पूछा।
जय ने सिर हिलाकर हाँ में इशारा किया। फिर एक बार उसने मुझ से रिक्वेस्ट की– "प्लीज राज, गाड़ी भगाओ!"
आगे का रास्ता थोड़ा घुमावदार था। मैं इससे ज्यादा तेज उस साँप जैसी घुमावदार सड़क पर नहीं चला सकता था। मैं मजबूर था। मैंने सामने का रास्ता देखा जो अब भी वैसा ही भयानक और सुनसान नजर आ रहा था। या सीधे शब्दों में कहूँ तो वह जंगल, वह माहौल और हमारे आस-पास की हर चीज़ जैसे हमें काटने को दौड़ रहा था। मैं कार का गियर बदलता रहा और कार की स्पीड उस घुमावदार सड़क पर कंट्रोल करता रहा। इधर जय मुझे कार की स्पीड बढ़ाने को कहता रहा। लेकिन मैं जानता था, मैं अपनी पूरी कोशिश कर रहा था।
"देखो जय, अभी हमें डॉली को भी ढूँढ़ना है! वह भी पीछे जंगल में खो चुकी है। हमें उसे ढूँढ़ना ही होगा। तुम लोग मुझे बताओगे आखिर यह सब चल क्या रहा है?" मैंने इतना कहा ही था कि मुझे ज्योति की रोने की आवाज़ सुनाई देने लगी।
मैं बिल्कुल घबरा गया।
"ज्योति, तुम रो क्यों रही हो? तुम दोनों बोलते क्यों नहीं कि क्या हुआ है? तुम लोग वहाँ पर इस तरह से भागते हुए क्यों आए जंगल से? ज्योति, कुछ बोल क्यों नहीं रही है? प्लीज, हमें बताइए! हम लोग बहुत परेशान हैं। डॉली भी गायब है। हम उसे ढूँढ़ने गए थे लेकिन वह हमें वहाँ पर नहीं मिली। लेकिन उसकी कार हमें मिली।”
"हाँ, मैं जानता हूँ!" जय की मासूम आवाज़ जैसे ही रोनित और मैंने सुनी हम शॉक रह गए।
“क्या? तुम कैसे जानते हो? तुम्हें तो हम अभी बता रहे हैं डॉली के बारे में।" रोनित ने घबराई आवाज़ में पीछे मुड़कर कहा।
“क्योंकि डॉली का एक्सीडेंट हो चुका है जिसके बारे में तुम जानकर भी अंजान हो।” ज्योति ने अपनी खामोशी तोड़ी दी। इतना सुनते ही हम ज्योति को घूरने लगे। कार के अंदर फैले हुए अंधेरे में भी जैसे हम एक-दूसरे का चेहरा आसानी से पढ़ पा रहे थे। कार अब भी 60 की स्पीड से दौड़ रही थी। मैं कभी कार की स्टेयरिंग संभालता तो कभी रोड की तरफ देखता। रह-रह कर मैं पीछे मुड़कर उन तीनों को देखने की कोशिश भी करता रहा।
“पागल हो गई हो क्या? यह क्या कह रही हो? डॉली का एक्सीडेंट हो गया है और यह बात हमें मालूम है, लेकिन हम अंजान हैं इन सब चीज़ों से?” मैंने घबराई हुई आवाज़ में कहा।
“ज्योति, तुम रो क्यों रही हो? देखो, डॉली ठीक है! उसे कुछ नहीं हुआ है। हम बस जल्दी ही उसे ढूँढ़ लेंगे।”
मैं ऐसा कह तो रहा था लेकिन चाहकर भी जैसे मैं कार को वापस उल्टी दिशा में मोड़ नहीं पा रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे उस कार पर अब मेरा कंट्रोल था ही नहीं।
“जय, तुम बोलते क्यों नहीं? क्या बात है? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। तुमने ऐसा क्यों कहा। तुम जानते हो न, हमें कार मिल चुकी है। वहाँ पर मेरी कार तो बिल्कुल सही थी। डॉली जाने कहाँ गायब थी। आई नो, वह ठीक होगी।”
"राज सही कह रहा है। हमने देखा, उसकी कार को कुछ नहीं हुआ था। सो प्लीज, कह दो कि यह सब झूठ है। मुझे बहुत डर लग रहा है।" रोनित ने लगभग रोते हुए कहा।
"डॉली कहाँ गई? उसके बारे में कोई खबर नहीं मिली। तुम इतने दावे से कैसे कह सकते हो कि उसका एक्सीडेंट हो गया था और तुम यह क्या कह रहे हो कि हम उसके बारे में जानते हैं, पर अनजान है।” मैं उन पर चिल्ला रहा था। उनकी बातें सुनकर मेरे सिर पर जैसे गुस्से का पहाड़ फूटने लगा था मैं उन पर पागलों की तरह एक के बाद एक सवाल दागे जा रहा था।
“किसी के मानने न मानने से सच्चाई नहीं बदलेगी। हाँ, मैं सच कह रहा हूँ! डॉली का एक्सीडेंट हो गया है और तुम लोग इस बात को जानकर भी अनजान हो। यह सब कुछ मैं जान चुका हूँ। मैं सच कह रहा हूँ। मेरी बात ध्यान से सुनो, तुम्हें मेरी बात पर विश्वास करना होगा।” जय अपनी बात पर डटा हुआ था।
मैं उन दोनों को बचपन से जानता था। ज्योति और जय ऐसे सिचुएशन में मज़ाक बिल्कुल नहीं कर सकते थे। लेकिन उनकी बात सच थी या नहीं, इस पर मुझे इतनी आसानी से कैसे यकीन होता।
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