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A Horror Novel - स्वाहा complete

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दरवाजा वर्षा ने खोला ।

उसने इन्द्रजीत क्रो दरवाजे पर देखकर 'नमस्कार' किया और फिर रेखा की तरफ देखा जेसे उसके आदेश की प्रतीक्षक हो।

"बर्षा, तुम जाओं । अपनी सहेलियों के साथ नुमाईश देखो । "

”ओ० के० । " कहती हुई वर्षा पलट गई। उसके साथ ही झद्गजीत्त ने अन्दर जाने के लिए कदम उठाये तो रेखा ने हाथ के इशारे से रोकते हुए बदस्तूर शोखी के साथ कहा--

" सब्र जरा सब्र । धीरज धरै जरा भैय्या !"

तभी बर्षा अपनी सहेलियों के साथ बाहर निकल गई । रेखा ने कमरे मे झाककर देखा । नयना कुर्सी पर बैठी थी । दरबाजे की तरफ उसकी पीठ थी ।

"जाईए भैय्या। अंदर आइये और मिलिए उस आर्टिस्ट से जो खुद अपने आप मे एक शाहकार है !"

"तुम भी चलो।"

"जी नही। में मैहमानों को अटेण्ड करने जा रही हू। अंकल अकेले है । आप अकेले अंदर जाइए । डरिए मत ।"

"डर किस बात का ।" यह कहकर इंद्रजीत दरबाजा धकेल अंदर प्रबिष्ट कर गया ।

रेखा ने दरबाजा बाहर से बन्द कर दिया व मुस्कराती हुई प्रदर्शनी हाॅल की तरफ लौट आई ।

रेखा के रवैये से उलझा हुआ इंद्र बहुत आहिस्ता से कमरे में दाखिल हुआ था।

नयना उसकी तरफ पीठ किये बैठी थी । जब दरवाजा जोर से बन्द हआ तौ उसने एकदम पलटकर देखा। एक बिजली सी चमकी । बादल गर्जे और दिलो पर बूदाबादी-सी शुरु हो गई। इस तरह मिल जाएगे कभी सोचा भी नही था l नयना दरबाजा बंद होने की आवाज पर पलटी थी और पलटकर देखते ही अहसास हुआ जैसे इस एक क्षण मे उसकी किस्मत ही पलटा खा गई हो I कमरे मे प्रवेश करने वाले इन्द्रजीत को उसने एक नजर में ही पहचान लिया था।

वह तो उसका प्यार था। उसका इन्द्रजीत था । यह तडपकर उठी।

नयना का पलटना इन्द्रजीत्त के लिए भी तो एक भूकम्प से कम न था ।।। यह उसकी निगाहों ने क्या देखा? यह उसके दिल के दरवाजे पर किसने दस्तक दी I

बीते वक्त की गर्द ने हालाकि दोनों सूरतें धूंधला दी थीं ।

15 सालों में सूरतें कितनी बदल गई थीं, लेकिन प्यार करने वाले सिर्फ चेहरों से एक दूसरे को नहीं पहचानते-आखो से ज्यादा उनके दिल पुकार उठते हैं ।

इन्द्रजीत्त के दिल ने भी पुकारा था--"अरे ॥ यह तो उसकी नयना है।” वह तडपकर आने बढा ॥

"नयना...यह्र तुम हो I "

नयना बेअख्तयार उसकी बाहो में समा गई और रो दी--"हां...यह में हूं नयना.. .मेरे देवता।"

ब्रैकरार इन्द्र ने उसे खुद से अलग किया। उसक्ती ठोडी को अपनी दो उगलियाँ' से उठाया। नयना की कजरारी आखें आसुआँ से भीग रही थी'-कजरा फैल चला था।

"अरे, रो मत नयना! देखौ, आखों का काजल फैलने लंगा है। लोग देखेंगे तो क्या कहेगे।"

"मैने लोगों क्री परवाह कभी नहीं कीं इन्द्र।" वह पलकें झपकाती बोली "जब तुम होते हो तो फिर कोई दूसरा नहीं होता । मैने तो अपने पिताश्री की परवाह नहीं की I अपने मगेतर' के बारे में नहीं सोचा । मैं लोगों क्री भला क्या परवाह करूँगी। आह! ! मेरे प्रियतम्। प्रभु भी केसी परीक्षाएं लेता है! इन्द्र, मैं कल भी तुम्हारी थी और आज भी तुम्हारी हूं और प्यार सच्चे हों तो भगबान को भी झुकना ही पडता है।"

”त.. .तुम. ..सच कह रही हो, नयना ।" इन्द्र भावुक हो उठा ।

" हां इन्द्र! मैं तो अभी वहीं खडी हूं जहां तुम मुझे छोडकर गए थे।" नयना खुद को सम्भालते बौली"क्या तुमने अभी तक मेरी पेटिग्स नही देखी।"

"नहीं अभी कहा? उस शरीर लडकी, ने मुझें अदर जाने ही कहा दिया । मुझसे उद्घाटन करवाया और फिर सीधे यहां ले आई। "

"तभी तो... । वर्ना तुम मझसै यह सवाल न करते । "

"बैठो, नयना । " इन्द्र ने उसे वापिस कुर्सी में बैठा दिया और उसे मुग्ध-सा निहारने लगा। नयना सम्भल चुकी थी। उसने पूछा"यह लडकी. कोन है, इन्द्र? उसने मेरे साथ इस कदर व्यवहार किया है कि में बता नहीं सकती। फिर...फिर उसने मेरी तस्वीरों सै पहचान लिया जबकि मेने अपना नाम भी गलत बताया था। "

"वह तुम्हें कैसे न पहचानती । " इन्द्र मुस्करा दिया-" वह तो तुम्हें मुझसे ज्यादा जानती है। "

"क्या लगती है वह तुम्हारी?" नयना चौकन्नी नजर आने लगी. "क्या सम्बन्ध है तुम्हारा उससे?”

"बहुत्त निक्ट का सम्बंध है। " इन्द्र ने अपनी चमकती आखों' सै उसकी तरफ देखा--"वह मेरी छोटी बहन है। "

”ओह ! " नयना ने राहत का गहरा सास लिया--"बहुत प्यारी है। "

"हा, प्यारी भी और शरीर भी । देख' लो, उसने न मेरे बारे में तुम्हें कुछ बताया और न तुम्हारे बारे में मुझें... I"

नयना अपलक इन्द्र को निहारे जा रही थी। उसने पूछा--'इन्द्र ! तुम कहां चले गए थे..?"

"बताउगा' हर वह बात बताऊंगा जो तुम जानना चाहोगी। फिदहाल, बस इतना जान लो कि किसी ने मेरा अपहरण कर लिया था । मैं किसी के जादू में कैद था । मेरी यह बहन रेखा ही मुझे वहां से मुक्त कराकर लाई है । " इन्द्र बोला--"नयना, मैं तुम्हें कभी नहीं भूला । बरस बीत गए एक जिद्दी प्रेतात्मा क्री यात्तनामय कैद में । तुम्हारे बारे में सोचते हुए भी भय लगता था । बरस बीत गए थे और जाने क्या-से-क्या हो गया था कि तुम पहचानने सै भी इंकार कर दो । यह सोचता रहता था, पर मेरा यह इरादा था कि एक बार तुम्हारी हवेली जाकर जरूर देखूंगा । मैं वहां आने का मन बना ही रहा था l "

नयना ने कुछ कहना चाहा, पर तभी दरवाजे पर दस्तक हुईं और दरवाजा खोल रेखा मुस्कराती हुई भीतर आ गई ।

" आर्टिस्ट साहिबा! आप यहां विराजमान हैं और लोग वहा प्रशसा के फूल बरसा रहे है। तारीफ पर-तारीफ हो रही है और वहां यह नियामतें बटोरने वाला कोई नहीं है । " फिर वह इन्द्र से सम्बोधित हुई "और वी० आई० पी० गेस्ट आपको ढूँढ रहे है' कि बन्दा 'रिबन' काटकर किधर खिसक गया । अगर आप लोगों की मिलनी सम्पन्न हो गई हो तौ प्रदर्शनी में तशरीफ ले चलें I "

"आओ,नयना.' मुझें अपनी पेटिग्स दिखाओ । "

"हां, चलिये ना । " नयना फौरन उठते हुए बोलो ।

वे रेखा के साथ हौ लिए थे, पर नजरे अब भी चुरा रहे थे।

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नयना क्या मिल गई थी इन्द्रजीत की जिन्दगी की पतझड में बहार आ गई थी। कुछ ऐसा ही हाल नयनका भी था I नयना ने तो यह इतने बरस ही इन्द्र की याद में और उसके इतजार में गुजार दिये थे।

जिस दिन इन्द्रजीत जगल में गुम हो गया था-बह दिन नयना की जिन्दगी का बडा महत्वपूर्ण दिन था । इंद्रजीत के रूप मे उसने अपना जीवन साथी और अपना प्यार पा लिया था । इन्द्रजीत को मदारी राजू के मंत्रजाल से निकालने मे नयना ने बडी भाग दौड़ की थी और अतत्त': इन्द्र को पा लिया था ।

उस दिन ही तो उसने और इन्द्रजीत ने सब तय कर डाला था। इंद्रजीत ने उस दिन दिल्ली अपने घर अपने मां बाप के पास वापिस जाना था और फिर अपने मा बाप को बेह्ररामनगर लेकर आना था । नयना के पिता, राजा बहराम नगर विदेशों की सैर को गए हुए थे। वह कुंछ दिन में ही वापिस आने वाले थे I नयना ने इन्द्रजीत को पसंद करने के बाद अपने पिता को साफ साफ कह दिया था कि वह अपने मगेतर बलराज से शादी नहीं करेगी और राजा साहब ने एक रवायती बाप बनने के बजाए नयना से कहा था कि वह उसके इंकार की वजह देखना चाहेंगे । तय नयना ने सोच लिया था किं इन्द्रजीत जैसे ही अपने मां-बाप के साथ वापिस आएगा तो वह अपने इंकार क्री 'वजह' यानि इद्रजीत को राजा साहब के सामने पेश कर देगी और उसे पूर्ण विश्वास था कि उसके पिता 'राजा साहव' इस 'वजह' क्रो फोरन कबूल कर लेगे I

लेकिन ऐसा नहीं ही सका था I

इन्सान सोचता कुछ है होता कुछ है। भाग्य में कुछ ओर ही लिखा हुआ था I इन्द्रजीत अपने घर जाने से पहले ही उसी दिन जगल में कही गुम हो गया। नयना उसे पागलों की तरह जगल में पुकारती और ढूढती रही, पर व्यर्थ । अब उसे क्या मालूम था कि उसके इन्द्रजीत क्रो प्रेत्त-सून्दरी बकाल ले उडी है I नयना को जगल से इन्द्र की कमीज और उसका घोडा. लेकर ही निराश लौटना पड़ा था।

फिर नयना रोज ही जगल जाने लगी । वह दिन-दिन भर जगल' में भटकती फिरती, लेकिन उसकी हर कोशिश निष्फल रही । इन्द्र न मिलना था न मिला । इन्द्र की फैकीं हुई कमीज ही उसके लिए जीने का सहारा और पूजा की 'खडाऊ' बन गई थी। नयना उसे आखो… सै लगाती उसे चूमती सूघती'। इस कमीज में उसका प्यार-उसका इन्द्रजीत बसा हुआ था ।

कुछ दिनों बाद राजा साहब भी अपनी विदेश-यात्रा से लौट आए I उन्होंने अपनी बेटी को उलझा हुआ व चिन्तित पाया तो वह स्वयं चिन्तित्त हो उठे I नयना उनकी इक्लोती व लाडली बेटी थी । वह उसे किसी कीमत पर परेशान नहीं देख सकते थे, लेकिन अब वेटी को जो दुख था उसका उपचार राजा साहब के पास भी नही था।

कुछ दिन-माह्र बीत जाने के बाद राजा साहब ने चाहा कि वह नयना की शादी कर दे, लेकिन नयना ने सख्ती से इंकार' कर दिया ।

इन्द्रजीत्त के बाद अव कोई उसकी जिन्दगी में नहीं आ सकता था।

राजा साहब ने नयना को अपने मंगेत्तर कुंवर बलराज के साथ शादी करने को मजबूर नहीं किया लेकिन वह शादी के लिए जोर जरूर डालते रहै और यू ही दवाब डालते-डालते वह चल बसे । इतनी बडी हवेली में नयना अकेली रह गई | नयना ने हिम्मत न हारी व अपनी जमीदारी को खुद सम्भाल लिया । राजा साहब की जिन्दगी में सारे काम कारिन्दो ने सम्भाले हुए थे,इसलिए भी नयना को खास मुश्किल पेश नहीं आईं।

बैराग सा अपना रखा था नयना ने I सो खुद को व्यस्त रखने को उसने जनहित के सामाजिक कामों में वड चढकर हिस्सा लेना शुरू कर दिया I उसने अपनी जभीदारी में ही वहां के लोगों के लिए कई परियोजनाएं शुरू कीं । एक अच्छा स्तरीय अस्पताल बनाया, स्कूलों और कालेज की स्थापना की, गरीब लडकियों की शादी-व्याह में आर्थिक सहयोग की जिम्मेवारी अपने सिर ली I ऐसे भलाई के कामों से उसे राहत मिली ।

लेकिन बिछोह का गम प्यार की कसक ही थी जो उसे कभी कभी बेचैन कर देती थी I तब उसने पेन्टिंग की तरफ ध्यान दिया I इस शोक की खातिर प्रशिक्षण के लिए एक विख्यात 'पेन्टर' को कई माह तक हवेली मैं रखा। इस पेन्टर ने बहा की देहाती जिन्दगी को रगों' में उभारा और नयना को भी चित्रकारी सिखाई ।

बस, फिर जब भी वक्त मिलता-मन उचाट होने लगता वह अपने दिल के जख्म के मरहम के तोर पर पेन्टिंग करने बैठ जाती । इस तरह उसने इन्द्रजीत्त के नाम पर ही यह बरस बिता दिए I इंद्रजीत की गुमशुदगी उसके लिए एक पहेली थी I दिल में एक फास' बनकर चुभ गई थी। एक टीस थी जो रह रहकर उठती थी । नयना किसी 'सोशल' काम में व्यस्त होती कि अचानक ही इंद्रजीत की याद घटा बनकर दिल पर छा जाती । फिर उसे कुछ याद न रहता कि वह कहा है, क्या कर रही है? वह होती और इन्द्रजीत्त के साथ बीते क्षण होते.. उसकी यादे होती I कभी वह बहुत निराश हो जाती कि इन्द्रजीत अब कभी वापिस नहीं आएगा...ओर कभी उसके दिल में आशा के दीप जल उठते नहीँ वह जरूर आएगा।

यूँ ही जिन्दगी बीतती गई I

और अब अतत': उसके नाम पर जीने कीं तपस्या रग' लाई...उसका इतजार' सफल रहा । उसका इन्द्र आ गया था । उससे आ मिला था।

अब नयना के चारों तरफ रग ही-रग थे...फुल-ही फूल...थै...खूशबू ही खूशबू थी ।

वह खुशी के अहसास के साथ गेलरी में यहां-वहां घूमती फिर रही थी । उसका इन्द्रजीत्त उसके साथ था । उसकीं बनाई मुंह बोलती तस्वीरों को देखकर इन्द्र बहुत खुश हुआ । उसे अदाजा' ही नहीं था कि नयना उसे इस कदर डूबकर चाहती है l हर तस्वीर मे नयना की बेपनाह मुहब्बत मोजूद थी ।

इन्द्र खुद भी रेगिस्तान में एक मुद्दत तक कैद व बकाल की यातनामय वासना का शिकार रहा था। मर-मर कर जिया था । एकान्त के उन क्षणो में उसे भी नयना याद आती थी.. .बहुत याद आती थी, लेकिन उसकी याद में ऐसी तडप_न थी जो यह नयना की इन क्लाकृर्तियों में देख रहा था । अगर उसके दिल में भी मुहब्बत की यही शिद्दत होती तो अपनी दुनिया में लौट आने के बाद उसने सीधा बहराम नगर क्री हवेली का रुख करना था I उसकी यह सोच ही उसे शर्मिन्दा कर रही थी ।

आर्ट गैलरी मॅ नयना के रग देखकर उसका जी चाह रहा था कि वह उसके कदमों में बैठ जाए. . उसका दास बन जाए ।

उस दिन रेखा ने चाहा कि 'प्रदर्शनी' का वक्त खत्म होने के बाद वह नयना की अपने साथ माडल टाउन ले जाए और उससे रात भर बातें करे । न उसे सोने दे न खुद सोए. लेकिन इन्द्रजीत्त ने मना कर दिया । उसने कहा--

"नहीँ रेखा। पहले हमें बहराम नगर जाना चाहिये। उसके बाद ही हम वहीं उसे अपने यहा आने की दावत देंगे। ”

रेखा को भाईं का कहना मानना पड़ा।

अगले ही दिन ।

सुबह रेखा व इन्द्रजीत नाश्ता कर रहे थे। रेखा पटर पटर नयना की बातें किए जा रही थी । वह जल्दी सै-जल्दी बहराम नगर जाना चाहती थी । इंद्रजीत खुद बेचैन था सो-दोनों ने बहराम नगर जाने का अपना प्रोग्राम तय कर लिया ओर सुकून महसूस कर रहे थे।

अभी यह बातचीत चल ही रही थी कि नौकर रामू ने आकर इत्तला दी… "साहव जी! आपका फोन है ?"

”कौन है?" इन्द्र ने पूछा।

“वो जी कोई प्रेम सागर साहब हैं।"

"उसे सुबह सुबह क्या हो गया I" इन्द्र ने जैसे खुद से कहा, फिर नौकर से बोला-" उन्हें बताओं कि मै नाश्ता कर रहा हू ,अभी थोडी देर बाद उन्हें रिग करता हूं। "

"जी ।" नौकर पलट गया।

“यह प्रेम सागर साहव कौन है-भैय्या ?" रेखा ने पूछा ।

" इसे नहीं जानती I " इन्द्र बोला--"मेरा स्कूल का दोस्त है। कुछ दिन पहले सयोग' से मुलाकात हो गईं थी । वह भी अपने ही रेस्तरां में । "

”अच्छा...क्सिने पहचाना? " रेखा ने दिलचस्पी लेते पूछा I

"भई, पहचाना तो मैंने ही । " इन्द्र ने बताया-- "हुआ यह कि एक दिन मै लच के लिए घर आने के लिए निकल रहा था कि मैने दो बन्दो को रेस्तरां में दाखिल होते देखा I इन दोनों में ही एक प्रेम सागर था । शक्ल जानी-पहचानी लगी-जहन पर जोर दिया तो याद आ गया कि यह तो अपना क्लास फैलो सागर है । क्लास में हम दोनों एक ही डेस्क पर बेठत्ते थै और हममें खासी घनिष्ठता थी । उसका घर भी यहीं माडल टाऊन में ही था और हम एक-दूसरे के घर आते जाते थे।
 
"उसे पहचाना तो किशोरावस्था की यादें उमड़ आई मैंने घर आना कैंसिल किया और रेस्तरां में लौट आया I वे दोनों एक मेज पर बैठ चुके थे । मैं उनके पास से गुज़रा और उसे एक बार बड़े ध्यान से देखा । यकीन आ गया कि वह प्रेम सागर ही है । मैं अपने आफिस में आकर बैठ गया और सोचने लगा कि उससे किस तरह मुलाकात की जाए? वह खाना खाने आए थे। मुझे शरारत सूझी । मैंने उनके खाना खा लेने का इतजार किया ओर इस बीच खुद भी खाना खा लिया । खाने के बाद उन्होंने कॉफी मगवाई I"

"जो बेचारा उन्हें अटेंड कर रहा था, उसे मैंने हिदायत की कि जब वे बिल मार्गे तो बिल मुझसे लेकर जाए I मेंने एक बिल मंगबाकल उस पर राशि लिखने के बजाए एक डायलाग लिख दिया । जब उन्होने- बिल मगवाया तो बेयरा मेरे पास आया । मैने उसकी प्लेट में वह बिल डाल दिया और समझा दिया कि जो साहब लाल टाई लगाये हुए हैं बिल उन्हीं के सामने जाकर रखै । वेयरे ने पूरे अदब के साथ बिल प्रेम सागर के सामने रख दिया । सागर अपने साथी से बातें कर रहा था । उसने बेध्यानि में बिल पर नजर मारी तो उसके चेहरे पर कई रग आए और गए ।

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उसकी सूरत ही देखने वाली हो रही थी । उसने गुस्से सै बेयरे की तरफ देखा और गुर्राया-- "यह क्या बकबास है? "

मैंने बैयरे को समझा दिया था। वह आदरपूर्ण मुद्रा मे और खामोश रहा I

" यह किसने लिखा है? " बेयरे को खामोश देखकर उसे और गुस्सा आ गया--"बोलते क्यो नहीं?"

"यह हमारे साहब ने लिखा है जी I " बेयरे ने धीमे से जवाब दिया ।

"रेखा.... दरअसल मैने बिल पर बात ही ऐसी लिख दी थी कि उसका आग बबूला होना स्वाभाविक था! जानती हो मैने क्या लिखा था । मैंने लिखा था कि इतने बड़े रेस्तरों में आखिर -क्या सोचकर लंच लेने आ गए हो तुम अपनी औकात क्यों भूल गए।" इंद्र ने बताया व खिलखिला कर हस दिया, फिर आगे बोला--"उसने बेयरे को घूरते हुए कहा। कहां है तुम्हारा साहब? मुझें उसकी सुरत दिखाओ । मैं ऐसे छ: रेस्तरां खरीदकर रख सकता हू। आखिर उसने मुझे समझा क्या है?"

"और फिर वह गुस्से से भरा हुआ मेरे आफिस मे दाखिल हुआ, उसके पीछे-पीछे वह व्यक्ति भी था जिसके साथ वह लंच लेने आया था I " इन्द्र बताता गया-- "मैं बड़े शहाना अंदाज में अपनी कुर्सी पर बैठा हुआ था । मैंने इत्मीनान से उसकी तरफ देखा व कहा--" ' यस! कहिये...।"

”मेरी सूरत देखते ही वह आगे बढते-बढते रूक गया । मुझें देखा व चौंका था। फिर मेरी आवाज सुनी तो मुझ फौरन पहचान लिया और अपनी बाहें फैलाकर मेरी तरफ बढा ।।

"ओये कमीने तू.... ।"

"हा में । " मेने उसे गले से लगाते हुए कहा--"बडे गुस्से में था । क्या इरादे थे?"

"मै यह रेस्तरां खरीदने आया था ।" उसने मुहे बनाते हुए कहा-- "मै हैरान था कि बिल पर ऐसा जुमला लिखने वाला कोन हो सकता है? गधा हूं मै । मुझे समझ जाना चाहिये था यह जुर्रत सिर्फ तू ही कर सकता है।"

"सच, रेखा । प्रेम सागर सै मिलकर बड़ा अच्छा लगा था I हमने बैठकर पिछली यादों को ताजा किया। उसे मेरी गुमशुदगी का पापा से मालूम हो गया था । वह जब तक मॉडल टाउन में रहा यहां हमारे घर आता रहा था। फिर उसके पेरेन्टस बम्बई शिफ्ट कर गये। इधर मेरे मिलने की आस भी कम होती गई। उसका आना जाना भी कम हो गया। कालेज से निक्लकर उसने अपने पापा का आँफिस सम्भाल लिया था । उसके पापा फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर थे । प्रेम सागर ने इस काम को आगे बढाया और प्रोड्यूसर बन गया । उसे मालूम था कि यह रेस्तरां हमारा है, इसलिए वह इस रेस्तरां में आता रहता था । कभी कभार पापा से भी मिल लिया करता था। इस तरह उसने मुझे किसी-न-किसी तरह याद रखा हुआ था ।

"आज की तारीख में वह देश के बडे फिल्म प्रोड्यूसरों में से है । उसे पापा के मर्डर के बारे में भी मालूम था I उसे इस बात में दिलचस्पी नहीं थी कि रेस्तरां अब कौन चला रहा है। उस दिन वह एक अर्से के बाद हमारे रेस्तरां में एक डायरेक्टर के साथ आया था ।"

"उसकी सुनने के बाद, मैँने अपनी सुना दी । मेरी कहानी के बाद वह बडी सजीदगी से बोला कि-"यार, यह तो बडा सब्जेक्ट है क्यों न इस कहानी पर फिल्म बनाई जाए। मेंने उसके सामने हाथ जोड़ दिये और बोला-- "यार, मुझे तो माफ ही कर I आज सुबह सुबह जाने उसे क्या मुश्किल पेश आई है?"

"आपके दोस्त ने आपको हीरो बनाने की आँफर नहीं की?" रेखा हसते हुए बोली ।

"यह तो वह कई बार कह चुका है।" इन्द्र मुस्करा दिया । रेखा एकदम सजीदा' हो गई--"ओह नो! आप फिल्मों के चक्कर में मत पड़ जाइयेगा।"

"फिल्म देखता तो हू नहीं, चक्कर में क्या खाक पडूगा । " कहते हुए इन्द्रजीत फोन करने के लिए उठ गया। उसने प्रेम सागर को फोन किया । सम्बन्ध स्थापित होने पर बोला --"हां, भई। खैरिफ्त तो है। "

"यार, आज शाम को बिजी तो नहीं हो?" प्रेम सागर ने पूछा था।

"नहीं ... क्यो ? "

" ’ फिर तू मेरे आँफिस में आ जा ।"

"आ जाऊगा... लेकिन तेरे दफ्तर भी तो कई है कहां आऊ ?"

"ग्रीन मार्क वाले आँफिस में। वही ठीक रहेगा।"

"ठीक है, पर गुरु चक्कर क्या है?"

”यार एक शख्स से तुझे मिलाना चाहता हूं। तेरे वापिस आ जाने की सुनकर वह तुमसे मिलने को बैचैन है। " प्रेम सागर ने बताया।

"ऐसा कौन शख्स हे गुरु?" इन्द्रजीत सोच में पड़ गया।

"यह सस्पेंस है। उसने अपना नाम बताने से मना किया है। "

"तू तो उससे अच्छी तरह वाकिफ है ना?" इन्द्र ने शंकित लहजे मे पूंछा।

"हां !! मै उसे अच्छी तरह जानता हूं। अच्छा आदमी है। तू उसे मेरा दोस्त समझ । "

"वह मुझसे क्यों मिलना चाहता है?"

"यह वह तुम्हें खुद बताएगा। "

"अजीब चीज है वो। हर बात राज में रखना चाहता है। "

"हां, अजीब तो है, लेकिन अजीब के साथ शरीफ भी है। " प्रेम सागर उसकी वकालत किये जा रहा था।

"अच्छा. ठीक है I मैं शाम को पहुच जाऊंगाl" यह कहकर इन्द्रजीत ने रिसीवर रख दिया।

वह रिसीवर रखकर खड़ा हुआ कि रेखा भी वहा पहुच गई। वह फिर बैठ गया और उसने रेखा को भी बैठने का इशारा किया।

"खैरियत तो है।" रेखा ने पूछा।

”हा, खैरियत है । कोई शख्स मिलना चाहता है और मजे की बात यह है कि मिलने से पहले न यह अपना नाम बताना चाहता है और ना काम।"

“फिर? आपने क्या कहा?"

”शाम को मुलाकात का वायदा कर लिया है ।"

”पता नहीं क्या खेल है?" रेखा भी आशंकित हो उठी । बहा बौडीगार्ड के बिना न जाइएगा । "

“परेशानी की कोई बात नहीं है । सागर उससे अच्छी तरह वाकिफ है l" इन्द्रजीत ने इत्मीनान दिलाते हुए कहा ।

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शाम को इन्द्रजीत, प्रेम सागर के ग्रीन पार्क वाले ऑफिस में पहुच गया।

इन्द्रजीत वहां पहुचा तो प्रेम सागर किसी शख्स से कारोबारी बातचीत में व्यस्त था। उसने खडे होकर इन्द्र का स्वागत किया । सामने बैठे शख्स से उसका परिचय कराया। इन्द्रजीत ने उसे बडे गौर सै देखा, लेकिन पहचान नहीं सका ।

इन्द्रजीत की सवालिया नजरों के जवाब में प्रेम सागर मुस्कराते हुए बौला-- ”जो तुमसे मिलना चाहता है, वह यह नहीँ है इन्द्र! वह अन्दर बैठा है। " उसने अन्दरवाले अपने खास कमरे की तरफ इशारा किया "उससे अन्दर जाकर मिल लो ।"

इन्द्रजीत खामोशी के साथ आगे बढ गया। उसन बद दरवाजा आहिस्ता सै खोला और कमरे में दाखिल हो गया। अदर एक शख्स मोजूद था, जो इन्द्र को देखते ही उठ खड़ा हुआ और इन्द्र कीं तरफ तेजी से लपका I

इन्द्रजीत्त एक कदम पीछे हटा, उसने अपने बगली हौलस्टर सै रिवाल्वर निकालने में बडी. फुर्ती दिखाई थी। रिवाल्वर उस शख्स पर तानत्ते हुए तेजी सै बोला--
 
"खबरदार जहां से उठे हो फौरन वही जाकर बैठ जाओ । वर्ना गोली चला दूगा । "

वह शख्स बहीं रूक गया । तभी प्रेम सागर कमरे में आया और यह सब देखकर चीखा--" अरे इन्द्र ! यह क्या कर रहै हो? "

"सागर, तुमने बहुत बडी हिमाकत कीं है। क्या तुम इसको अच्छी तरह जानते हो।"

"हा. जानता हू। मैंने तुम्हें बताया तो था।"

"यह अजगर की औलाद है-क्या इसने तुम्हें यह भी बताया था।" इन्द्रजीत रिवाल्वर अब भी साधे हुए था… "यह मुझे देखतें ही लपका था। मेंने फुर्ती न दिखाई होती तो अब तक गर्दन इसके हाथ मे होती।"

वह शख्स इत्मीनान से खडा था । वह तो इन्द्र के इस रवैये पर भी हैरान नहीं था ।

प्रेम सागर बौला--"इन्द्र, यह क्या बेवकूफी है? रिवाल्वर जेब में रखो I मैँने तुम्हें बुलाया है तो कुछ सोचकर ही बुलाया होगा । "

"तुमने मुझे इस सपोले का नाम क्यों नहीं बताया था। " इन्द्रजीत भी गुस्से से बोला ।

"मैने मना किया था । " इस बार वह शख्स बोला--"इसलिए कि नाम जान लेने के बाद शायद आप मुझसे मिलने नहीं आते I क्यों ? "

"दीपक अब तुम्हारे बाप और मेरे चाचा ने कोन-सा जाल फैकने के लिए तुम्हें यहां भेजा है?" इन्द्रजीत्त बदस्तूर तीखे स्वर में बोला।

यह शख्त उसके दुश्मन चाचा रमाकात का बेटा दीपक था।

”मुझे बाबा ने नहीं भेजा है । " दीपक बोला--"मुझे तो उसकी सूरत से भी नफ़रत है I "

"मैं तुम पर केसे ऐतबार कर लूं?" इन्द्रजीत उसे घूरते हुए बौला।

"मै कब तुझसे ऐतबार करने क्रो कह रहा हूं?" दीपक बदस्तूर शांत भाव से बोला--”मै सिर्फ इतना चाहता हु कि तुम इत्मीनान से, बैठकर ठण्डे दिल से मेरी बात सुन लो। "

"तुम्हारे पास कोई हथियार है?"

"नहीं मेरी तलाशी लेना चाहो तो ले सकते हो I "

"हां में तुम्हारी तलाशी जरूर लूगा'।" इन्द्र आगे बढा। उसने सीधे हाथ से उस पर रिवाल्वर ताने रखा और बाएं हाथ से 'भली-भाति' ही उसके जिस्म व कपडो. को खगाल डाला ।

दीपक सच्चा था । उसके पास किसी किस्म का हथियार नहीं था । इन्द्र ने रिवाल्वर जेब के हवाले किया व एक कुर्सी खीच उस पर बैठते हुए बोला--"हा दीपक कहो?! क्या कहना चाहते हो । "

माहौल बेहत्तर होता देख प्रेम सागर, यह कहते हुए बाहर निकल गया… "अच्छा, तुम दोनों वार्ते करो मैं बाहर जाता हूं!"

दीपक भी कुर्सी पर बैठ गया और कितनी ही देर इन्द्रजीत्त को निहारता रहा।

"इन्द्रजीत । मेरे भाई! मैं तुमसे क्षमा चाहता हूं।" अत्तत: वह बोला।

"किस वात की क्षमा? तुमने क्या किया है?" इन्द्र का लहजा भावहीन था।

"यह ठीक है कि मेंने कुछ नहीं किया, लेकिन मेरे बाप ने बहुत कुछ किया है । मैं उसी की माफी माग रहा हूं। "

"तुम्हारे बाप ने मेरे बाप की जायदाद हथिया ली. ..उसने मेरे कत्ल की साजिश रची । उसने मेरे वाप को कत्ल किया । आखिर में किस-किस बात को माफ कर दू। " इन्द्रजीत का दर्द उसके होंठों पर आ गया था ।

"यह तुम क्या रहे हो? अंकल क्रो पापा ने कत्ल किया था, लेकिन उन्होंने तो स्यूसाइड किया था । "

"मेरे पापा को भला आत्महत्या करने की क्या जरूरत थी? एक नेकदिल निस्वार्थ व्यक्ति भला खुदकुशी क्यों करेगा? उन्हें मारा गया है और उन्हें मारने वाला तुम्हारा बाप था मेरा लालची चाचा। हमारे घर का नौकर इस भेद सै वाकिफ था । इसलिए उसे भी उसकी बीबी के साथ खत्म करवा दिया गया। " इन्द्र के लहजे में खट्टास बढती, ही जा रही थी ।

"भगवान जानता है मैं इस बारे में कुछ नहीँ जानता। "

"अभी कुछ दिन पहले ही मैँने अपना एक आदमी सावनपुर भेजा था I तुम्हारे बाप के नाम एक पत्र दिया था। उस आदमी का जो हश्र हुआ...क्या तुम उससे भी वाकिफ नहीं हो?"

"सिर्फ इतना जानता हूं कि कोई शख्स तुम्हारा खत लेकर सावनपुर गया था। उस आदमी के साथ क्या किया गया? मै कुछ नहीं जानता। "

"क्या तुम सावनपुर में नहीँ रहते ?"

"नहीं । मुझे तो सावनपुर छोड़े -एक अर्सां हो गया है I मैं ही या जिसने बाबा से जायदाद के बटवारे की बात की I उन्होने-जायदाद के बटबारे से इकार कर दिया लेकिन मुझे इतना रुपया दे दिया कि मैंने दिल्ली आकर एक सिनेमा खरीद लिया । इस्री सिलसिले में प्रेम सागर से परिचय व फिर दोस्ती हुई । जब मुझे हवेली से यह ख़बर मिली कि तुम लौट आए हो तो मैं तुमसे मिलने की सोचता रहा। इसे सयोग' ही कहा जा सकता है कि प्रेम सागर तुम्हारा बचपन का दोस्त निकला और मेरे बार बार कहने पर वह हमारी मुलाकात कराने को तैयार हो गया ।"

"तुम यहा' कहा' रहते हो?"

"मै प्रति बिहार में रहता हू'। "

“कितने बच्चे हैँ तुम्हारे?"

दीपक हौले से मुस्कराया, फिर बोला-- "मैँने शादी नहीं की हैँ। "

" अरे, क्यों? "

"बाबा शादी ब्याह को कारोबारी निगाह से देखते है। लडकी. चाहे लूली लगडी हो-लेकिन अमीर घराने की होनी चाहिये । मैं ऐसी शादी के लिए राजी न हुआ और इस जिम्मेदारी से बच गया । हां, सूरज भाई और विजय भाई की शादी हो चुकी है । दोनों जमीदार घरानों की जाहिल औरतें है । भाइयों की भी क्या कहूं? इन्द्र मैं पूछता हू-ज़मीदारी क्या सिर्फ जुल्म और दहशत का नाम है। मेरा उस हबेली मे दम घुटने लगा था । पता नहीं लोग किसी को दुख पहुचकर किस तरह खुश रह लेते हैँ। "

"देख लो । मिसाल तुम्हारे सामने है । तुम्हारे बाबा ने हमें कौन-सा घाव नहीं लगाया। फिर भी खुश है कि आज तक उसका कुछ भी नहीं बिगडा I " इन्द्र ने तीखे लहजे मे कहा ।

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"ऐसा नहीं है। मैं उन्हें रात रात भर हवेली के चक्कर काटता हुआ देखता रहा हूं। कभी कभी तो उन्है पूरी रात नींद नहीं आती । फिर विजय भाई और सूरज भाई सै भी एक शीत युद्ध है । इधर बाबा एक चालाक लोमड्री बने हुए है। वह अपने जीते जी जायदाद का बटवारा नहीं चाहते और उनके मरने के दूर तक आसार नहीं हैं। दोनो भाइयो को भी महीने एक्त बंधी स्कम मिलती हे । दोनों ही अब बाबा के अधीन नहीं रहना चाहते और बाबा जायदाद बाटकर अपने हाथ कटवाना नहीँ चाहतै, लेकिन आखिर कब तक...?"

"क्या तुम अपने हिस्से क्री जमीनों पर अपना हक छोड चुके हो?" कुछ सोच कर पूछा इन्द्र ने ।

"नहीं । " दीपक ने दृढ, शब्दों में कहा-"वैसे मै अकेला हूं और अब भी मेरे पास जो कुछ है, वह मेरे लिए बहुत है । " इन्द्र को सुनकर हैरत ही हुई थी।

"इन्द्र ! तुम्हारे पापा मेरे आइडियल थे I मैने जिन्दगी में उन्हीं जैसा बनने के सपने देखै है । यह जानकर बडा दुख पहुचा है कि वह मेरे बाबा के हाथों कत्ल हुए । अब तुमसे माफी भी मागूं तो किस मुह से? मेरे नीच बाप ने तुम्हारे सामने मेरी गर्दन झुका दी है I "

उस दिन दीपक जितनी देर बैठा रहा, बस ऐसी ही बातें करता रहा लेकिन इन्द्रजीत्त उसकी बातों पर आखें मूदकर विश्वास नहीँ करना चाहता था । उसने उसकी बातों की छानबीन की तो सब सच निकला । हवेली छोडे उसे वाकई एक मुद्दत हो चुकीं थी I वह अब दिल्ली में था और दिल्ली-गाजियाबाद सीमा पर छोटा-सा सिनेमा का मालिक था ।

फिल्म वितरण क्षेत्र में भी हाथ पाव मार रहा था। उसकी रिहायश प्रीत विहार में थी और वहां वह एक नौकर के साथ रहता था l

इन्द्रजीत्त उसको लेकर आशवस्त ही हुआ था ।घर का भेदी लंका ढाने निक्ला था तौ यह कोई अचरज की बात नहीं थी ।

इन्द्रजीत्त इस मोहरे को इस्तेमाल की बाबत सोचने व बलदेव अंकल से विचार विमर्श करने लगा था ।

रेखा बहराम नगर जाने के लिए बेचैन थी । उसने अपनी होने वाली भाभी, यानि राजकुमारी नयना के लिए ढेरों तोहफे ख़रीद लिए थे।

रेखा नयना से फोन पर बातचीत करती रहती थी। उसने नयना को अपने बहराम नगर पहुंचने के बारे में बता दिया था और नयना ने उनकी सुविधा के लिए ड्राइवर भेज दिया था ताकि वह उनका मार्गदर्शन कर सके । और इन्द्रजीत्त व रेखा अपनी गाडी, में नयना की भेजी जीप के पीछे-पीछे ही बहराम नगर पहुचे थे।

जब दोनों गाडिया गढी, बहराम नगर के गेट सै अदर दाखिल हुइ तो नयना, हवेली की खिडकी में खडी थी । उसकी बेकरारी का अजीब आलम था l जाने कितनी बार खिडकी का चक्कर काट चुकीं थी ।

इन्द्रजीत्त जब राजूमदारी की कैद से निकलकर पहली बार यहां इस हवेली में पहुचा था, तो तब भी नयना की बेकरारी का यही आलम था । वह रात उसने आखों में गुजारी थी यह रात भी उसने करवटें बदलते बिताई थी । बरसॉ पहले का वह दिन और उसके मजरों ने ही उसे सोने न दिया था।

आज इन्द्रजीत फिर आ रहा था। उसने अपना बरसों पुराना वायदा पूरा कर दिया था । हालाकि आज उसके घर में उसके मां-बाप नहीँ थे पर जो घर में था उसे ही लेकर हवेली में मह्रच चुका था । नयना गाडिया देखते ही ऊपरी मजिल से फोरन नीचे आ गई और गढी के दरवाजे पर उसने इन्द्र और रेखा का स्वागत किया । स्वागत करने बाद मे नयना के साथ-ह्रवेली का वफादार ड्राइवर रघुबीर सिह भी था।

हवेली के दरवाजे पर यह इन्द्रजीत व नयना की दूसरी मुलाकात थी। इस दूसरी मुलाकात पर उन्हे पहली मुलाकात की एक-एक बात याद आ रही थी।

ड्राइवर रघुवीर सिह ने बड़े अदब सै झुककर इन्द्र को सलाम किया था व फिर नजरें झुका, हाथ बाधकर खडा हो गया ।

"कैसे हो रघुबीर सिंह? " इन्द्र उसे पहचानते ही अपनत्व से बोला था और साथ ही उससे मिलाने के लिए अपना हाथ भी निसक्रोच उसकी तरफ बढा दिया।

"साहब जी! आपको मेरा नाम भी याद है। मै कितना खुशनसीब इंसान हूं?"

रघुबीर सिह सचमुच ही एक खुशनसीब इंसान था । वह एक जमाने मे ड्राइवर था । थोड़ा-बहुत पढा लिखा था । नयना का विश्वासपात्र था ।।

सो, जब राजा साहब स्वर्ग सिधारे तो नयना ने रघुबीर को गढी. की देखभाल के लिए उसका निगरान नियुक्त कर दिया । अब यह बूढा एक तरह से नयना का प्राइवेट सेक्रेटरी भी था ।

बहरहाल, मेहमानों का भरपूर स्वागत हुआ था । दोपहर के खाने के बाद इन्द्रजीत कुछ देर आराम के लिए लेट गया था । शाम के वक्त दरवाजे पर दस्तक हुईं तो उसने सोचा कि रेखा होगी। उसने आवाज लगाई

"आ जाओ! कौन है?"

दरवाजा खुला तो पहले ट्रे नजर आईं फिर वे हाथ जिनमें ट्रे थी। इन्द्र फोरन बेड सै उतरकर उसके पास पहुच गया --"अरे, नयना! आपने क्यों कष्ट किया?"

"मेरा जी चाहा कि तुम्हें अपने हाथों चाय पिलाऊ'। " नयना मनमोहक अदाज से मुस्कराई।

"रेखा कहां है?"

"उसको कम्पनी देने के लिए मैने अपने स्कूल की दो टीचरों को बुला लिया था। वह उनके साथ है । बुलवाऊ। "

"बेवकूफ हुईं हो । " इन्द्र शोखी से बोला--"उसे उधर ही रहने दो। " इन्द्र ने उसे ऐसी प्यार भरी नजरों से देखा कि वह उसकी नजरों की लख नहीं ला सकीं! उसने नजरें झुका लीं-- "आखिर हमें भी तो दो बातें करने को वक्त मिलना चाहिए । क्यो? "

"इसीलिये तो आई हू-ज़नाव के पास ।" नयना ने जबाव दिया ।

नयना ट्रे सैन्टर टेबल पर रख चाय बनाने लगी I इन्द्र ने उसका केतली वाला हाथ पकड लिया और बौला--"तुम इस कदर प्यारी क्यो हो?"

" अरे....अरे....हाथ छोडो,चाय गिर जाएगी । "

"गिर जाने दो । "

"प्लीज इन्द्र... ।" नयना ने गुहार की ।

इन्द्र ने हाथ छोड दिया । नयना ने कप उसकी तरफ बढाते, वह सवाल कर डाला जिसने उसे बरसों से हकलान कर रखा था… "इन्द्र तुम जंगल में कहां गायब हो गए थे...?"

और जवाब में इन्द्र ने, चाय की चुस्कियों के दौरान, अपनी आपबीती संक्षेप में सुना डाली। नयना गुंगी ही तो हो गई थी । वह सकते की अवस्था में बैठी अपलक उसे देखती ही रही। यह केसी तिलस्वी कहानी थी? अविश्वसनीय । लेकिन यह सब उसके महबूब पर बीती थी। वह उसे कैसे झूठला सकती थी । फिर इन्द्र के पास रेखा के रूप में एक गवाह भी तो मौजूद था l

"क्या हुआ? " उसे संज्ञा-शून्य देखकर इन्द्रजीत ने उसकी आंखों के सामने अपना हाथ लहराया।

"भगबान लाख़ लाख शुक्र है इन्द्र कि तुझे उस जादूगरनी की कैद से मुक्ति मिल गई । ना केवल मुक्ति मिली बल्कि तुम सकुशल वापिस भी आ गए। अगर तुम्हारा चेहरा दीमकजदा ही रहता तो फिर.,.तो फिर... । " नयना कांपकर रह गई थी ।

"मेरी तो जिन्दगी ही एक श्राप बनकर रह जाती। मैं अपने दीमकजदा चेहरे को छिपाये फिरता और बस... ।।" इन्द्रजीत ने ठण्डी सास लेकर कहा ।

नयना को तो अब जैसै इस बावत बातें करने से ही घबराहट हो रही थी। वह बौली--"कहीँ बाहर निकलते हैँ। मैँ घोडे कसवात्ती हू--तुम तब तक लिबास बदल लो। "

इन्द्र खिल उठा, बोला--"हां मेरा जी भी घुडसदारी. को चाह रहा था। बरसों बीत गए है घुडसदारी. किए... । "

यूं.. कुछ देर बाद ही जब वे दोनों हवेली से बाहर निकले तो घोडे तैयार खडे थै । दोनों ही सफेद रग के घोडे थे I इन्द्रजीत्त और नयना घोडों पर सवार हो गए । रेखा हवेली के दरवाजे पर खडी… थी। सफेद घोडों, पर सवार वे दोनों रेखा को बहुत अच्छे लगे । उसके मुह से दौनों के लिए लम्बी उम्र कीं दुआ निक्ली और वह उस वक्त तक हवेली के दरवाजे पर खडी, रही जब तक वे बडे दरवाजे से बाहर नहीं निक्ल गए I

कुछ दूर तक वे दोनों बातें करते, धीरे धीरे चलते रहे । फिर खुले इलाके में पहुच इन्द्रजीत बोला "क्या ख्याल है, जगल की तरफ चलें?"

इन्द्रजीत्त की आपबीती सुन लेने के बाद नयना जगल का रूख नहीं करना चाहती थी, लेकिन इन्द्र की इच्छा के आगे वह चुप रही। वह भयभीत होने का अहसास भी नहीँ होने देना चाहती थी, तुरन्त बोली...."चलें । "

दोनों ने घोडों को ऐड लगाईं और दोनों घोड़े हवा से बातें करने लगे।

जगल में दाखिल हो वे उस स्थान पर पहुच गए जहां एक चबूतरा बना हुआ था I यही वह जगह थी जहा प्रेतात्मा बकाल इन्द्रजीत को मायावी रेगिस्तान में ले गई थी! इस चबूतरे पर निगाह पडते. ही इन्द्र एकाएक खोफजदा हो गया।

चबूतर पर उसने जो कुछ देखा, उसे देखकर उसके होश उड गए। सख्त सर्दी के वाबजूद भी उसका बदन पसीने से भीग गया । सामने चबूतरे पर बीचो बीच एक उल्लू एक टांग पर ख़ड़ा था और उसकी एक आख बद थी ।

उसे देखते ही इन्द्रजीत ने अपने घोडे को मोडा व लगभग चींखते हुए बोला "नयना! भागो। "
 
नयना ने भी उस विशालकाय उल्लू को देख लिया था और उसे देखकर उसका दिल धक्क से रह गया था। उसने फौरन अपने घोडे की लगाम खीची और उसका रूख मौडकर ऐड लगा दी । हबा से बाते करते , दोनों घोडे कुछ ही देर मे जगल से बाहर थे। उनमें कोई बात नहीँ हुई और वे घोडे दौडाते रहे । उन्होंने गढी के दरवाजे पर ही पहुचकर दम लिया । बड़े दरवाजे से हवेली की असली इमारत खासी दूर थी । अन्दर एक विशाल व विस्तृत बाग था । इन्द्रजीत्त को दुर एक लाॅन पर रेखा बैड-मिल्टन खेलती नजर आईं । वे दोनों बडे दरवाजे के पास ही घोडों, से उतर गए। घोडे गेट पर मौजूद नौकरों ने सम्भाल लिए थे ।

वे दोनों रेखा की तरफ बढ गए थे। रास्ते में नयना ने सहमी आबाज में पूछा--"इन्द्र वह क्या था?"

"कुछ नहीं कह सकता मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा। " इन्द्रजीत्त भी तो अभी तक उलझन का शिकार था ।

"किसी उल्लू को, एक टाग पर खडे… मैंने पहली बार देखा है I क्या वह उल्लू लगडा था और फिर उसका आकार... । उफ... I " नयना ने झुरझुरी-सी ली ।

"भगबान बेहतर जानता है कि वह क्या चीज था?" इन्द्र अपने होंठों पर जिव्हा फिराते बोला "हमसे गलती हो गई । हमें जगल की तरफ नहीँ जाना चाहिए था । "

इन्द्र भुक्तभोगी था। वह अदर तक सिहर उठा था । यूं ही बातें करते हुए रेखा के पास पहुच गए। रेखा ने उनसे भी बैड मिन्टन खेलने को कहा । ध्यान बटाने को वे कुछ देर तक इस खेल में मस्त रहे और फिर हवेली में आ गए।

इन्द्रजीत किसी अनिष्ट की आशका से ग्रस्त था। वह रात के खाने सै पहले जाना चाहता था, लेकिन नयना ने आग्रह करके रोक लिया । वह रात उन्होंने हवेली में ही बिताई। तीनों रात गए तक बातें करते रहे थे । सुबह देर से उठे और फिर लगभग दस बज नाश्ता करने के बाद रेखा व इन्द्रजीत ने नयना सै इजाज़त ली और अपनी गाडी. में दिल्ली का रुख किया l

इन्द्रजीत एक टाग पर खडे विशालकाय उल्लू क्रो अपने जहन सै नहीं निकाल पाया था ।

दिल्ली में नयना के रिश्ते के चाचा रहते थे।

उनकीं 'भव्य-विशाल कोठी दिल्ली के गोल्ड लिक' के इलाके में थी । यह एक भरा पूरा घर था और नयना का दिल इस घर में बहुत लगता था । नयना प्राय: दिल्ली आती रहती थी । चाचा का काफी समय पहले देहान्त हो चुका था-घर में अब चाची थी।

नयना के चाचा चार भाई और बहनें थीं । एक छोटी बहन के सिवाय सबकी शादियां हो चुकी थी।

इन्द्र से मिलने क्री चाह ही नयना को इस बार फिर दिल्ली खींच लाई थी। रेखा उसे अपने यहा आने का नियत्रण देकर आई थी ।

दिल्ली पहूचकर नयना ने सबसे पहले रेखा को फोन किया। नयना की आबाज सुनते ही रेखा झूम गई । वह चहकती सी बोली "कहा से बोल रही है, आप?"

"तुम्हारे शहर से। " नयना ने बताया-"दिल्ली पहुच गई हूं।"

"अच्छी खबर है। भैय्या सुनेंगे तो खुश हो जाएगे' ।" रेखा ने चुस्की ली ।

"तुम अपनी कहो । "

"मै अपनी क्या क्यूं? " रेखा ने ठण्डी सास' ली "मेरा तो जी चाहता है कि आपको कहीँ जाने ही न दूं। "

"औह । " नयना ने हसकर दिखाया, फिर बात बदलते हुए कहा "आज का क्या प्रोग्राम है?"

"आप घर आ जाएं हमारे। कहे तो गाडी भेज दूं।"

"घर आना कोई प्राब्लम नहीं है । गाडी है मेरे पास । " नयना ने कहा "मैं कुछ और सोच रही थी । "

''वह क्या? "

"आज फिल्म 'मुगले आजम' रिलीज हो रही है । " नयना बोली "क्यों न उसका पहला शो देखा जाए। काफी समय से कोई फिल्म नहीं देखी है मैंने । "

"आइडिया बुरा नहीं। " रेखा खिल उठी-"मैं...भैय्या से इजाजत ले लेती हूं। आप आ जाएं और हां, रात का खाना आपको हमारे साथ ही खाना होगा।"

"मंजूर... । " नयना ने चहककर कहा। फिल्म का पहला दिन और पहला शो था और इस फिल्म के लिए भीड का टूट पडना स्वाभाविक था। वे सिनेमा हाल पर पहुची' तो मायूसी का ही सामना करना पडा। ‘हाऊस फूल' का बोर्ड गेट के पास ही रखा उनका मुह चिढा रहा था ।

"गलती हौ गई । " रेखा पछताते हुई बोली "भैय्या सै कहा होता तो वह टिकट मगवाकर' रखते । "

नयना भी निराश नजर आ रही थीं । वह कुछ कहने को ही थी कि तभी एक शख्स उनके पास आया और बडे ही आदर के साथ बोला "मैं इस थिएटर का मैनेजर हूं। आप यहा क्यों खडी. है । आप मेरे आफिस में आएं-आपको टिक्ट मिल जाएगी । " रेखा व नयना ने उस शख्स पर नजर डाली व फिर एक दूसरे क्री तरफ देखा। सफेद शर्ट-पेन्ट में वह शख्स उन्हें शरीफ-सुशील ही लगा था। नयना ने सोचा कि शायद उसे राजा बहराम नगर कीं बेटी क्री हैसियत से पहचान लिया हो और रेखा ने यह सोचा कि उसके भाई इन्द्रजीत की वजह से उन पर यह इनायत की गई हो । बहरहाल उम्हें दो टिकट चाहिये थे जो उन्हें पूरे सम्मान के साथ दिए जा रहे थे तो भला उन्हें क्या एतराज हो सकता था? वे मैनेजर के साथ हो ली। मैनेजर उन्हे अपने आँफिस में ले गया और उन्हें सोफे पर बैठने का इशारा किया और फिर उसी आदर व शालीनता के साथ पूछा

"आपके लिए क्या मंगवाऊ चाय या ठण्डा ?"

"थैक्स! ! इस कष्ट कीं जरूरत नहीं l " नयना बोली… "हमे टिक्ट मिल जाएं यही हमारे लिए बहुत है । वर्ना हम तो मायूस लौट रहे थे। "

लेकिन शख्स नहीं माना और उसने मना करने के बावजूद कोका कोला मंगवा ली, इतना ही नहीँ एंट्री… शुरू होने से पहले ही खुद उनके साथ जाकर उन्हे उनकी सीटों तक बैठाकर आया । उसने तो टिकट की पैमेन्ट तक से इकार कर दिया था । रेखा और नयना आखिरी वक्त तक हैरान परेशान रही । इस शहर के इस प्रमुख थिएटर पर उन्हें जो बी आई पी ट्रीटमेंट दिया गया था-वह उन दोनों की समझ से बाहर था ।

बहरहाल, मैटिनी शो देखकर वे दोनों जब घर पहुची और रेखा ने इन्द्रजीत्त से सारा माजरा बयान किया तो वह मुस्करा दिया ।

"क्या हुआ ‘भैय्या आप मुस्करा रहे है । "

"इस फिल्म का डिस्ट्रीब्यूटर अपना प्रेम सागर है । ” इन्द्र ने बताया "मैंने प्रेम सागर के बारे में तुम्हें बताया था ना और इस थिएटर में भी उसकी थर्टी परसेन्ट की भागीदारी है । "

"ओह माई गाड'! तभी तो में कहूंकि आखिर हमेँ इतना महत्त्वपूर्ण समझने वाला शख्स यहां कौन है?"

"क्या वह तुम लोगों के सामने आया था?" जाने क्या सोच इन्द्रजीत्त ने पूछा था ।

"नहीँ । " रेखा बोली ।

"क्या तुम उसे पहचानती हो? "

"नहीं! " रेखा ने जवाब दिया-"पर वो शख्स यकीनन मैनेजर ही था। वह उम्र में आपसे कही बडा लगता था, जबकि आपके स्कूर के दोस्त प्रेम सागर को तो आपकी उम्र का होना चाहिये। "

"तुम्हारे दिमाग की दाद देनी पडेगी_ । " इन्द्र मुस्कराते हुए बोला "खैर, कभी मिलवाऊगा तुम्हें उससे। वह जवान ही नहीं, मुझसे ज्यादा खूबसूरत, स्मार्ट व मधुर भाषी भी है। कितना व्यवहारिक होगा, इसका अदाजा तो तुम इसी से लगा सकती हो कि उसका नाता 'बालीवुड' से है वह एक दूरदर्शी फिल्म प्रोड्यूसर जाना जात्ता है । बैसे मैं जानता हू कि किसी का भी चेहरा देख़कर उसकी अच्छाइयों बुराइयों को आइने कीं तरह समझने की खासियत रखती हो तुम । इस दोस्त के वारे में भी बताना। " रेखा ने चौककर ही अपने भाई की तरफ देखा । भाई क्री यह ख्वाहिश उसे बडी अजीब लगी थी । वैसे यह सच था कि रेखा को इन्सानी चेहरे पढने में दक्षता प्राप्त थी I वह किसी का भी चेहरा देखकर उसके बारे में अच्छी या बुरी राय बना लेती थी । यूं ही नहीं कहा जाता कि इन्सान का चेहरा उसके भीतर का आइना होता है और यह आइना कभी झूठ नहीं बोलता । बस, आइना देखना आना चाहिये ।

रेखा की अपनी जिन्दगी भी तो दर्पण क्री त्तरह निर्मल ब स्वच्छ थी । उसने बडे दुख उठाए थे। मा उसे जन्म देने के कुछ माह वाद ही मर गई थी, और इससे भी बडा दुख यह था कि वह बाप के होतें हुए भी बाप के प्यार व लाड दुलार से वंचित रही । चाचा के जुल्म सहे l रेगिस्तान के तूफानों से खेली । एक के बाद एक परीक्षा आती गई और वह इन आजमाइशों में ऐसी उलझी रहीँ कि कभी अपने बारे में सोचने का अबसर ही नहीँ मिला ।

अब जिन्दगी ने उसे थोडी राहत दी थी ।
 
रात को बेड पर करवटे बदलते हुए उसकी क्लपनाओं में मायावी प्रेत्तलोक का रासमोन आ जाता । उसकी दी हुईं गुलाब कीं चफ्लॉ क्ली उसके पास अब भी धी और एक खूबसुंत चाटी' के पूल्लादन्न में उसके बेड की साइड टेवल पर रखी हुई थी और यह ऐसी जगह थी जहां उठते बैठते उस पर नजर पडत्ती_ रहती थी। इस गुलाब की कली की ताजगी और खुशबू में कोई फर्क नहीं आया था ।

रेखा इस प्यार के तोहफे पर अगर नजरें जमा देती-या ऐसै ही उसे देख लेती तो रासमौन का मासूम चेहरा उसकी निगाहों में उभरने लगता । रासमोन सच ही में उससे मुहब्बत करने लगा था, पर रेखा उसकी मुहब्बत का जबाब्र मुहब्बत से केसे दे सकती थी? वह जानती थी कि रासमोन, उस लोक का वासी था जो गैर इन्सानो की दुनिया थी । रेखा न तो उसकी दुनिया में रह सकती थी और न ही उसे अपनी दुनिया में बुला सकती थी । फिर प्यार बढाने. या सपने देखने से क्या फायदा?

हकीकत यह थी कि अब रेखा, निश्चिन्तता व उमगो भरे इन दिनों मे अपनी दुनिया के रासमोन को ढूँढने लगी थी ।

...............................

चाहत का सागर उसके भीतर ठाठें मारने लगा था । और ऐसै में ही यह सुखद सयोग हुआ था । वह सोच भी नहीँ सकती थी कि ऐसा भी हो जाएगा। पर ऐसा होना उसके भाग्य में लिखा था I

वक्त गुजारी के लिए रेखा के हाथ बहुत अच्छा शुगल लग गया था । वह अपनी आर्ट गेलरी में बैठी पेन्टिग में व्यस्त रहती । हाथ साफ हो गया था और क्लपनाएं भी साथ देने लगी थी । दिल के सुकून के लिए यह चित्रकारी एक अच्छा शोक साबित हो रहा था।

एक दिन वह अपनी कल्पना को केनवेस के रगों' मे उत्तार रही थी क्रि चपरासी ने आकर सूचना थी---"मेडम कोई आपसे मिलने आया है।"

"कौन है? नाम नहीं बताया अपना ।” रेखा ने ब्रुश चलाते हुए पूछा ।

"जी नहीँ । बस इतना ही कहा है कि रेखा जी से मिलना है I "

"अच्छा बुलाओ I" रेखा ने बुश रखकर, हाथ कपडे से साफ किए व कुर्सी पर जा बैठी।

चपरासी पलट गया ।

"मैं अदर आ सकता हूं। " कुछ क्षण बाद ही उस शख्स ने दरवाजे पर सै इजाजत्त मागी' ।

रेखा ने नजरे' उठाकर आगन्तुक क्रो देखा तो उसके दिल कीं धडकने. अनायास भी तीव्र हो उठी I जाने क्या हुआ कि उसने अपनी नजरे' सामने एजिल पर लगी पेन्टिग' पर टिका दीं । वह इस कदर बौखला गई थी कि क्या कहे...क्या करे... । कभी ऐसा भी होगा यह तो उसने सोचा भी नहीँ था ।

"जी आइये I " उसके मुंह से जेसे बेअख्तयार ही निक्ला था । आगन्तुक थ्री-पीस सूट पहने हुए था...गौरवर्ण द चुम्बकीय आकर्षण का स्वामी । वह इत्मीनान की चाल चलता हुआ, मेज के करीब आया और एक कुर्सी घसीटकर बैठ गया।

रेखा के माथे पर इस सर्दी में भी पसीना चुधिया आया था I उसे हालात क्री यह करवट बेचैन कर गई थी और वह अपनी मस्त जिन्दगी में कोई तूफान नहीं चाहती थी। वह अपने होंठों पर जिव्हा फिराने लगी।

" क्षमा कीजिएगा I मैने आपको डिस्टर्व तो नहीँ किया।” आगन्तुक बडी नम्रता व बडे अपनत्व से बोला था।

ओर हालाकि अब ऐसी ही अपनत्व को रेखा तडप रही थी...और इस शख्स ने उसके सपनों पर अपना अधिकार जमा रखा था पर रेखा को उसका अपनी जिन्दगी में लोटकर आना बर्दाश्त नहीं था। वह अपने सामने रासमोन को देख रही थीं । एक गेर इन्सान को मायावी प्रेतलोक के प्राणी को जो उसकी जिन्दगी में तूफान ला सकता था।

रेखा ने खुद को सम्भाला-वह ब्रोली-"आप यहां क्यों आए है?"

"आपसे मिलने?" आगन्तुक के होंठों पर दिलफरेब मुस्कान थी और वह बेहद खुश नजर आ रहा था।

"पर क्यों?" रेखा फट ही तो पडी, उसकी आवाज में रोष के साथ-साथ खौफ भी शामिल था।

आगन्तुक के चेहरे के भाव बदले । रेखा के इस अन्दाज से उसे ठेस ही पहुची' थी । वह धीमे से व गम्भीर आवाज में बोला "अगर आपको मेरा आना नागवार गुजरा है तो मै वापिस चला जाता हूं। वेसे मुझे आपसे इस रुखेपन की उम्मीद नहीं थी । यकीनन आपका मूड ठीक नहीं है, पर हमें अपना परिचय तो दूंगा ही। मैं आपके लिए अजनबी हू'-पर मेरा नाम प्रेम है I प्रेम सागर । मै चलता हूं। नमस्कार । " यह कहकर वह खडा…हो गया और फिर रेखा की तरफ देखा बिना ही दरवाजे की तरफ क्षुब्ध सा बढ गया । रेखा का सिर चकरा गया "मैं आपके लिए अजनबी हू'-पर मेरा नाम प्रेम है I प्रेम सागर । " आगन्तुक के ये शब्द रेखा के दिमाग में चक्रवात बनकर गूजने लगे I

रासमोन-प्रेम सागर.. .प्रेम सागर रासपोन...यह कैसी समानता थी...यह्र कैसा चमत्कार था । यह प्रेम सागर केसे हो सकता है-यह तो रासमोन है I इस बदहवासी में रेखा को आभास हुआ जैसे हमशक्ल होते हुए भी-आगन्तुक व रासमोन में कई अन्तर थे । आवाज का अन्तर मुख्य था । यह रासमोन नही था ।

.................................

उसने उसे रासमोन समझा-शायद

इसलिए कि रासमोन उसके दिलो दिमाग पर हावी था और कुछ समानताओं के सबब आगन्तुक में उसे रासमोन ही नजर आया था।

उफ यह क्या हो गया?रेखा ने उसे आवाज देनी चाही...लेकिन आबाज कठ में फसकर रह गई । इस बीच वह दरवाजे से निकल गया । रेखा तेजी से उठकर दरवाजे पर आई तो वह बरामदे कीं सीढिया उतर रहा था । गेट के बाहर उसकी गाडी खडी थी । देखते ही-देखते वह गाडी में बैठा और गाडी को तेजी से निकाल ले गया ।

रेखा बरामदे में खडी उसकी गाडी को जाते देखती रही । फिर अपने कमरे में आ वह अपनी कुर्सी पर धम्म से गिरी ।

"यह उसने क्या किया...यह उसे क्या हो गया था.. .उसे यू बेरूखी से पेश नहीं आना चाहिये था । "

रेखा शर्मिंन्दा थी ।

शर्मसार थी, लेकिन अब तो जो होना था, हो चुका था ।पर क्या दो हस्तियों में ऐसी समानता सम्भव है? वह प्रेम सागर था l वह कितना 'ग्रेसफुल' लग रहा था। ऐसै आकर्षक मर्द कम ही देखने में आते है ।

फिर उसे एकदम झटका सा लगा-उसे जेसे होश आ गया । वह यह क्या बेकार-सी बातें सोचने लगी है I उसे अपने आप पर हेरत हुई । ध्यान बटाने को ब्रुश उठा लिया व फिर केनवेस की तरफ ध्यान दिया और ब्रुश रगों से खेलने लगी ।

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लेकिन उसकी एकाग्रता जाती रही थी । उसे यू महसूस हो रहा था कि उसका कुछ गुम हो गया है, लेकिन क्या गुम हो गया है, इस बारे में वह प्रयत्नोपरान्त भी कुछ न जान सकीं । वह दिन भर खोई…खोई-सी रही । रात को खाने की मेज पर भी उसके हाथ बहुत बैदिली से उठ रहे थे। इन्द्रजीत्त उसे बडे गौर से देख रहा था । अत्तत्त': उससें रहा न गया तो उसने पूछा "रेखा, तुम्हारी तबियत तो ठीक है।" "जी भैय्या। " "फिर क्या बात है, खाना क्यों नहीं खा रही?" "खा तो रही हूं। " "क्या खा रही हो, खाक । ऐसे खाते है खाना । एक नवाला मुह मे रख लिया फिर सो गये?“ इन्द्र के लहजे में प्यार भरी डपट थी। "भैय्या भूख नहीं है। " रेखा असहाय-सी बोली । "खैर, तो है। " इन्द्र चिन्तित हो उठा--"आज तुम्हारी भूख कैसे उढ़ गई?" रेखा कुछ क्षण सिर झुकाए बैठी रही I फिर बोली--" भैय्या एक बात आपको बताऊं?" उसने सिर उठा भाई की तरफ देखा । "बताओ । " "भैय्या.. . ! बौ...आज... आज गैलरी में आपके वो दोस्त हैं ना प्रेम सागर...वह आए थे।" रेखा का ख्याल था कि इस वात कीं इन्द्र पर तीव्र प्रतिक्रिया होगी और इस बात्त पर आश्चर्य व्यक्त करेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। "अच्छा… I " यह कहकर वह फिर तन्मयता सै खाना खाता रहा । फिर उसने एक नजर रेखा पर डाली और शात आव से पूछा-- "अच्छा, फिर।" "कमाल है भैया । आपको इस बात पर हैरत नहीं हुई कि आपका एक दोस्त मुझसे मिलने आया I ”

"हैरत इसलिए नहीँ हुई कि मै जानता था कि वह तुमसे मिलने पहुचेगा । " विचित्र रहस्पोद्धाटन हुआ। "वह क्यों? " रेखा परेशान हो गई I "असल में मैने ही उससे कहा था कि… वह तुमसे मिल ले l" "आपने कहा था । मगर किसलिए. .. ??" "क्या उसने तुमसे कोई वात नहीँ की।" बहन कीं तरफ देखते उल्टा सवाल कर डाला था इन्द्र ने I "मैँने उसकी नौबत ही नही आने दी। उनके कुछ कहने से पहले ही वापिस चलता कर दिया । वह अपना नाम बता लौट गए। " रेखा ने बताया--"पर भैय्या, आपको कुछ बताना तो चाहिये था ।" "पर क्यों?" इन्द्र को हैरत हुई । रेखा ऐसी वदमिजाज और रूखी तो नहीं थी । "बौ...वो.. . मैँने... । " रेखा बताते-बताते रूक गई, अब वह भैय्या को रासमोन व उसको लेकर अपनी चिन्ताओं व भावनाओ का खुलासा तो कर नहीं सकती थी । वह हकलाकर रह गई । "तुमने क्या...? क्या हुआ था तुम्हें...?" ”जी...वो. . दरअसल मेरा ध्यान पेन्टिंग' बनाने में था और किसी का आना मुझे शायद नागबार गुजरा था ।" रेखा ने जल्दी से बात बनाई "जव उनका नाम जाना तो मारे शर्मिंन्दगी के कुछ बोल ही नहीँ पाई और वह चले गए।" "तुमने कोई बदतमीजी तो नहीं की थी?" जाने क्यों इन्द्र चिन्तित हो उठा था? "बदतमीजी तो नहीं अलबत्ता थोडी. बदसलूकी जरूर की है । " रेखा ने बताया व सिर झुका लिया।
 
"हुआ क्या था, आखिर ?" रेखा ने अपनी गलतफहमी का भेद छुपा, जो कुछ हुआ था,इन्द्र को सुना डाला । इन्द्रजीत सोच में पड गया था । उसे खामोश देखकर रेखा ने ही पूछा "बताए ना भैय्या! वह मुझसे मिलने क्यो आए थे?" "एक सम्पन्न, सभ्रान्त दभुगरा एक सुशील, कुमारी सै मिलने क्यों आता है?" इन्द्र ने जवाब दिया, सवाल की सूरत में ही । भैय्या का मंतव्य समझ रेखा का दिल धडकने, लगा--"यह आप क्या कह रहे है, भैय्या?” "यह बलदेव अकल का सुझाव है । उन्होंने बात चलाई तो मेंने प्रेम सागर से कहा कि वह पहले तुमसे मिल ले, देख और समझ ले I खैर, इसमें परेशान होने की जरूरत नहीं है। यह रिश्ता मजूर करना तुम्हारे हाथों में है । " "मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है।" रेखा उलझकर रह गई । "फिलहाल तुम इत्मीनान से खाना खाओ। " इन्द्र ने सुझाव दिया । "बस, मैं खा चुकी । " यह कहकर रेखा उठने लगी। "रेखा, एक बात सुनो । " "जी, भैय्या । " रेखा जाते जाते रुक गई। "रेखा अब तुम्हारी मा बाप और भाई सब में ही हूं और मुझें अपनी जिम्मेवारियों का अहसास है । मै चाहता हू किं तुम प्रेम सागर और प्रपोजल के बारे में गोर कर लो । तुम्हारा जो भी फैसला हो मुझे सुबह बता देना " इन्द्र ने बडी सजीदगी के साथ कहा । "जी, अच्छा । " रेखा जल्दी से बाथरूम में जा घुसी । उसने साबुन से हाथ धोए व आइने में अपनी शक्ल देखी । उसे अपना चेहरा कुछ बदला-बदला सा दिखाई दिया।रेखा जब से दिल्ली आई थी-गगा मोसी को नहीँ भूली थी । दूसरे तीसरे दिन उन्हें फोन कर ही लेती थी । कुछ अपनी सुनाती थी कुछ उनकी सुनती थी । इस परेशानी व उलझन में रेखा को एकाएक गगा मोसी कीं ही याद आई। वह अपने कमरे में पहुची बैड पर बैठकर टेलीफोन अपनी गोद में रखा और गंगा मोसी का नम्बर मिलाने लगी । कॉल गंगा' मौसी ने ही रिसीव की थी । रिसीवर उठा वह अपुने विशिष्ट अदाज में बोली 'थी "जी, कहिये। " "हां मोसी! वया हो रहा है?" नमस्ते नमस्कार के विना रेखा ने सीधे पूछा था। "ओह अच्छा, तुभ हो। " गगा' मोसी के लहजे में खुशी भर आई थी-"तुम मेरी बच्ची! कैसी हो?" "मौसी! मैं ठीक नहीं हूं। " "अरे, क्या हुआ?" मोसी चिंन्सित्त हो उठी । "मुझे आपकी बहुत याद आ रही है।" रेखा ने अपने दिल की कही। "तुम दो चार दिन के लिए यहा' आ जाओ... । " "जी तो यही चाह रहा है कि उडकर, इसी वक्त आपके पास पहुच जाऊं।” "खैर तो है | तुम परेशान लग रही हो। " "परेशान भी हूं और उलझन में भी।" "अरे कुछ बताएगी भी?"

"बात दरअसल यह है कि भैय्या के एक दोस्त है प्रेम सागर । भैय्या और बलदेव अंकल ने उन्हें मेरे लिए पसन्द किया है। अब आप बताए मौसी कि मै क्या करू? यह सव क्या हो रहा है।" "'अरे तो इसमें परेशान होने की क्या बात है?" गगा मोसी के लहजे में 'चाव' भर आया था-"जहा 'बैरी' होती है बहा पत्थर होते ही है।" "मोसी में 'बैरी' नहीं हू कि कोई भी बेर तोडने की सोचने लगे !" "हां, तुम 'वैरी' नहीं हो लडकी हो, इसीलिये तो पत्थर नहीं रिश्ता आया है।" मौसी हस दी थी। रेखा ने अपनी उलझन वताई--"भैय्या ने सुबह तक फैसला मागा है। फैसला मुझ पर छोडा गया है।" "तो फिर दे दो फैसला।" "मौसी, मुझे रोना आ रहा है । " "तो रो लो । रोने में तो कोई हर्ज नहीं है। जव पहला रिश्ता आता है तो लडक्रिओ की यही हालत होती है। " "हे भगबान..मौसी आप भी बस।।" और मोसी उसकी बात काटते बौली-"सुना है यह प्रेम सागर बहुत खुबसूरत है , शरीफ़ है और सबसे बडी. बात यह कि पैसे वाला है । परेशान मत होओ । हा, कोई गलत फैसला करने सै पहले उससे एक बार मिल लेना। " "मिल चुकी हूं। आपका कहा सही है, पर मुझसे एक बदसलूकी हो चुकीं है ।" "वह क्या?" रेखा ने उन्हें भी प्रेम सागर के आने व अपने रवैये के बारे मै सुना दिया I "हद की तुने भी । यह भी क्या कोई सलीका होता है किसी आने वाले सै मिलने का । ऐसा तो कोई किसी गैर से भी नहीं करता । " अब रेखा उसे अपने भ्रम व अपनी क्षणिक बदहवासी के बारे में क्या बताती। "बस मौसी, जरा उखडे मूड में बैठी थी । " रेखा बोली, एकदम जेसे उनकी बात पकड़ी पूछा-- "लेकिन मौसी, आपने उसके बारे में केसे सुना? आपको उसके बारे में किसने बताया?" "तुम्हारे बलदेव अकल ने बताया था!" मोसी ने बताया-- "बलराज ने ही पहले इस रिश्ते के बारे मे सोचा था और उसी ने इन्द्रजीत को सुझाया था। "लेकिन मौसी, यह प्रेम सागर मेरे लिए एक अजनबी... !" मोसी ने फिर उसकी बात काट दी, बोली ”क्या तू बलदेच अक्ल और इन्द्र को इतना ही बेवकूफ समझती है। ' "बेवकूफ तो नहीं समझती-हां, दोनों को ही सीधा ज़रूर समझती हु।" "तुम्हारे भाई के बारे में कुछ नहीं कह सकती लेकिन मुझें बलदेव.. राज के बारे में यकीन से कह सकती हू कि वे सीधे बिल्कुल नहीं हैँ । दुनिया देखी है उन्होने।" ...रेखा न एक गहरा सास लिया. फिर पूछा--"मुझे बताओ मौसी कि मैं क्या करू ?" "लडके से मिल लो-अच्छा लगे तो हा' कर दो।" "यानि कि आपको भी यह रिश्ता पसन्द है। आप इसके पक्ष में है।" "बलदेव राज को पसन्द है...इन्द्रजीत्त क्रो पसन्द है...तो फिर मुझ क्यों पसन्द न होगा।" "चाहे मुझे पसन्द हो या न हो?“ रेखा झल्लाकर बोली । "अगर तुम इन्कार कर दोगी तो फिर तुम्हें कोई मजबूर नहीं करेगा ।" मोसी ने फौरन कहा--"लेकिन मैं अपना मशवरा फिर दोहराऊगी कि प्रेम सागर से मुलाकात के बिना इकार न करना ।" "ठीक है, मोसी ।" रेखा ने सहमति दर्शाई, फिर दो-चार इधर-उधर की बातें करके उसने सम्बन्ध विच्छेद कर लिया ।

यह रात रेखा ने लगभग आखों में काटी ।उसे नींद नहीं आई । वह सारी रात सोचती रही । प्रेम सागर में उसे रासमोन नजर आया था । यह समानता अनूठी थी । क्या रेखा का रासमोन की ना सही-इस प्रेम सागर की जीवन-संगनी होना लिखा था । रासमोन के प्रति भी उसकी भावनाएं वेअख्तयार ही नहीं भडकी थी, पर मजबूरियां आडे थी। अब प्रेम सागर के रूप में उसे रासमौन ही उपलब्ध था जिसे इंद्रजीत ही नहीं, वलदेव अक्ल… भी पसद कर रहे थे। वह सोचती रही और सोच सोचकर परेशान होती रही। वह कभी करवटें बदलती, कभी बिस्तर छोडकर टहलने लगती । उसकी नजरें बार-बार 'गुलाब की कली' पर जा ठहरती। कली पर नजर पडती. तो दिल में कसक की एक लहर दौड़ जाती और वह 'गुलाब की कली’ उसे कुछ मुर्झाई मुर्झाई दिखाई देती । प्रात: नाश्ते पर इन्द्रजीत उसका इत्तजार ही करता रहा । आज तक ऐसा नहीं हुआ था कि दोनो ने एक साथ नाश्ता न किया हो । इतजार से बेचैन हो उसने नौकर रामू सै रेखा के बारे में पूछा-- "रेखा मैम साहब कहां है?" "उनके कमरे का दरवाजा वन्द है-शायद वो अभी उठी नहीं । "इन्द्र नाश्ता छोडकर उठ गया। उसने रेखा के कमरे का दरवाजा पहले आहिस्ता सै फिर जोर से बजाया । कोई जबाव न मिला तो उसने दरवाजा जोर-जोर से पीटा साथ ही रेखा को आवाजें दीं, रेखा ने फोरन उठकर दरवाजा खोल दिया । "क्या हुआ रेखा.. ..तुम अभी तक सो रही थीं I ” इन्द्र उसके कमरे में कदम रखते बोला। रेखा के बाल बिखरे हुए थे ब आखें सुर्ख व नींद सै बोझिल थीं । कमरे की लाइट भी जल रही थी। "जी 'मैय्या । " "तुम्हारे कमरे की बत्ती भी जल रही है । " इन्द्र उसे घूरते हुए बोला "क्या तुम रात भर जागती रही हो ।” "जी, भैय्या । " रेखा ने धीरे से कहा । वह वेड पर बैठी और दोनों हाथ मुह' पर रखकर रो पडी। " अरे, रेखा यह क्या?... क्या बचपना है?" " मुंह हाथ धोकर बाहर आ जाओ । नाश्ता ठण्डा हो रहा है। " उसने रेखा का सिर थपथपाया और बाहर निकल आया। थोडी देर बाद जव रेखा नाश्ते की मेज पर आई तो वह अपने आपको काकी सम्भाल चुकी थी। वह चुपचाप नाश्ता करने लगी । इन्द्र कुछ देर तक तो उसकी सूरत देखता रहा, फिर सीधा सवाल किया "हा रेखा! क्या हम प्रेम सागर को इकार कर दें। " रेखा ने कोई जवाब नहीं दिया वस, सिर झुका लिया। "रेखा, क्या बचपना है । शर्माने की जरूरत नहीं है । मैं तुम्हारा जबाव सुनना चाहता हूं। " "मै यह अधिकार आपको देती हूं। आप फैसला कर ले। मुझे आपका हर फैसला मजूर होगा। " रेखा धीरे सै बोली I "मजबूरन । " "नहीं-खुशी सै। " "क्या आज रात में उसे डिनर पर बुला लूं?" "शोक से बुलाएं । " रेखा ने नजरें झुकाए-झुकाए कहा। "अगर इजाजत हो तो नयना को भी बुला लूं।" इन्द्र ने बोझिलता मिटाने को कहा। "इजाजत है I " रेखा अपनी नजरें उठाते एकदम बोली थी I इन्द्र ने शोखी से ही उसका शुक्रिया अदा किया था । वे नाश्ता करते रहे । “ भैय्या आज में बलदेव अकल के यहां वर्षा से मिलने जाऊगी ।" रेखा बोली-- "और लंच वहीं लूँगी । "

" जरूर, पर सिक्योरिटी गार्ड को अपने साथ जरूर लै जाना । " "सिक्योरिटी गार्ड के साथ जाना बडा अजीब-सा लगता है। लोग बडी हैरत से देखते हैं। बडी उलझन होती है। " "मजबूरी है ।" इन्द्रजीत सजीदगी से बौला--"हमे सुरक्षा की तरफ से लापरवाह नहीं रहना चाहिये । " इन्द्रजीत्त के जाने के बाद रेखा ने वर्षा को फोन करके अपने आने की सूचना दी । फिर तेयार -होकर शक्तिनगर की तरफ चल दी । वह गाडी… खुद डाइव कर रही थी । बाॅडी गार्ड, गाडी के पीछे अपनी मोटर साइकिल पर था। जब उसकी गाडी, राना प्रताप बाग के प्राचीन ईटों के गेट से गुजरी और उसकी निगाह दाए हाथ के फुटपाथ पर पडी । तो उसने एक तमाशा दिखाने वाली को देखा। वह औरत बंजारों की वेशभूषा में थी और उसके साथ एक रीछ और बंदर भी था । रेखा ने गाडी की रफ्तार कम कर उस तमाशा दिखाने वाली कीं तरफ देखा। लगभग पैतीस बरस की यह तमाशा दिखाने वालीं रग रूप व नेन नक्श के लिहाज से खासी आकर्षक थी । देखने में वह तीस इक बरस की ही दिखती थी। इस औरत को देखकर रेखा के जेहन में एक ख्याल बिजली की तरह कौधा। उसने अपनी गाडी रोक ली ब गाडी से उतरकर उसके निकट आने की इंतजार करने लगी । जब रीछ बाली औरत ने एक गाडी वाली को अपना इंतजार' करते देखा तो उसने जल्दी-जल्दी कदम उठाए ब रेखा के निकट जाकर बोली "जी, मेम साहब । " "यह बताओ तुम तमाशा दिखाने का क्या लेती हो?" रेखा ने मुस्कराकर पूछा। "यहा फुटपाथ पर देखेगी तमाशा ।" तमाशे बाली हैरान होकर बोली I "नहीं अपने घर पर । यह कहो, तुम पूरे दिन में क्या कमा लेती हो?" "कभी सो कभी पच्चास... ।" औरत आशा भरी नजरो सै रेखा को देखते बोली । रेखा ने पर्स से सौ का नोट निकालकर उसकी हथेली पर रखते हुये कहा--"तुम कर मेरी कोठी पर आ जाना। मैं तुम्हें पाच सौ रुपये और दूगी, लेकिन तुम्हें वहां पाच छ: घन्टे गुजारने होंगे। " बजारन उलझन में पड़ गई। उसने झिझकते, हुए पूछा--"मेम साहब मेरा क्या करना है? " "मै तुम्हारी तस्वीर बनाऊगी। अपने साथ रीछ और बंदर को लाना न भूलना ।” "'नहीं जी | इनको मै कहां छोड सकती हूं? ये तो मेरे साथ होंगे I पर जी, आऊ कहां?" "माडल टाउन आना होगा। ” रेखा ने एक कागज पर उसे अपनी कोठी का पता लिखकर थमा दिया-- "इस पर मेरा पता लिखा है । माडल टाउन देखा है तुमने?" "लै जी आजाद पुर के पास है। " "हां, वहीँ। वहां पहुचकर किसी से यह पता पूछ लेना । मै सुबह दस बजे तुम्हारा इतजार करूगी । " "ठीक है, मेम साहच I मैं पहुच जाऊगी... I” उसने कहा व फिर वह कागज़ व सौ का नोट वडे अहतियात के साथ अपनी चौली में रख लिया । रेखा अपनी गाडी मे बैठ गई और गाड़ी स्टार्ट कय आगे बढा दी I और फिर ..... अगले दिन वह तमाशे वाली ठीक दस बजे माडल-टाऊन वाली कोठी पर पहुच गई थी । रामू ने गेट खोला और अपने सामने एक रीछ वाली को देख मुह बनाते बोला-- "ओ चल, आगे बढ यहां कोई नहीं तेरा तमाशा देखने वाला... I " "ओ भैंसे के सै मुह वाले! अन्दर जाकर मेम साहब को बोल कि तमाशे वाली आईं है। "

"मेम साहब । कौन मेम साहब? यहां कोई मेम साहब नहीं रहती।" रेखा. तमाशे वाली की प्रतीक्षक्त थी।। घटी की आवाज पर वह भी रामू कैं पीछे बाम निकल आई थी । रामू को उसने गेट पर किसी से उलझते हुए देखा तो वह तेजी से गैट की तरफ़ आ गई । रीछवाली ने उसे आत्ते हुए देखा तो वह रामू क्रो घूरते हुए बोली-- “झुठ बोलता है ! वो क्या आ रही है मेम साहब ॥ " राजू ने पीछे मुडकर देखा तो रेखा ने उसे इशारे से कहा--"इसे अन्दर आने दो । “ रामू को हैरत हुई, लेकिन उसने गेट खोल दिया। वह अपने रीछ और बन्दर के साथ अन्दर आ गई और बोली--"मेम साहब । मुझे देर तो नहीं हुई ।" "तमने कमाल कर दिया । बिल्कुल ठीक टाइम पर आई हो ।" रेखा ने मुस्काते हुए कहा। और फिर रेखा शुरू हो गई। तमाशेवाली के रूप में उसे एक दिलचस्प विषय मिल गया था, चित्रकारी के लिए । वह तेयार ही थी । उसने पहले अपने कमरे से उस औरत के बिभिन्नो पौजाँ में तस्वीरें उतारी फिर उसने उसे लाॅन में एक पेड, के नीचे एक स्टूल पर बैठा दिया और "एजिल" पर लगे केनवेस पर उसका स्केच करने लगी। इन्द्रजीत का रूटीन था कि वह दोपहर क्रो खाना घर पर ही खाता था । खाना खाकर दो-ढाई घन्टे आराम करता था और फिर शाम की चाय पीकर रेस्तरां का रुख करता था । आज भी वह ठीक दो...बजे घर पहुच गया। गाडी का हार्न सुनकर रामू ने गेट खोला और इन्द्रजीत गाडी को अन्दर ले आया। गाडी की पिछली सीट पर उसका 'बाडी गार्ड' बैठा था । जबकि दुसरा गार्ड कोठी के आहते में अलर्ट खडा था । इन्द्रजीत्त ने गाडी से उतरकर रेखा की तरफ बडी दिलचस्पी से देखा जो बडी. तन्मयत्ता के साथ तस्वीर बना रही थी। रीछवाली पर अभी उसकी नजर नहीं पडी थी, लेकिन रीछवाली ने उसे गाडी से उतरते ही देख लिया था ।और इन्द्रजीत को देखते ही उस पर बडी तीव्र प्रतिक्रिया हुई थी। एकाएक ही जैसै बिजली-सी दौड़ गई थी उसमे । वह विद्युतीय गति से उठी । पलक झपकते ही अपनी कमीज में से एक लम्बा चाकू निकाला और निकट आते हुए इन्द्रजीत का निशाना बडी, महारत के साथ लिया। इन्द्रजीत्त ने उसे अपनी तरफ चाकू फेंकते हुए देख लिया था । वह फौरन एक तरफ हो गया। इस तरह वह चाकू जिसने यकीनन उसके दिल में पैवश्त हो जाना था अपना लक्ष्य चूक गया और उसके बाजू में जा घुसा। दोनों गार्डों ने अपनी स्टेनगने सीधी. कर लीं, लेकिन इन्द्र ने चीखकर कहा "नहीं!” इन्द्रजीत ने उस रीछवाली को पहचान लिया था । वह कटारी थी । तात्रिक राजू मदारी की बेटी कटारी । कुछ ही क्षणों में जाने क्या-सै-क्या हो गया था । इन्द्रजीत अगर अपने गार्डों क्रो मना न करता तो अब तक कटारी की लाश जमीन पर पडी तडप रही होती । चाकू का बार करने के बाद कटारी ने एक क्षण भी नहीं गवाया था । वह अपने रीछ और बन्दर के साथ तेजी से भागती हुई गेट से बाहर निक्ल गई। रामू अभी घर ही मौजूद था । वह गेट बद कर रहा था। उसने कटारी क्रो इन्द्रजीत पर चाकू फेकत्ते हुए देख लिया था। उसने चाहा कि गेट बद करके 'भागती कटारी को रोक दे। इधर से गार्ड भी उसे अपनी गिरफ्त में लेने के लिए आगे बडे। तब इन्द्रजीत ने फिर उन्हें आवाज दी- "उसे जाने दो ।" रामू और गार्ड हाथ मलते रह गए ॥ रेखा हतप्रभ गुंगी बनी खडी थी। उसकी आखो के सामने अंधेरा छाया हुआ था। दिल धाड़-धाड़ कर रहा था और टागे कांप रही थीं । उसे क्या मालूम था कि वह ही अपने भाई की मोत को दावत दे आईं है। खुद ही कातिल को घर बुला लाई है । केसा बिचित्र तमाशा था ? चाकू इन्द्रजीत के बाजू में पैवश्त था, लेकिन आर-पार नहीं हुआ था और हड्डी भी प्रभावित नहीं हुई थी । वह क्रोट पहने हुए था इसलिए बचाव हो गया इंद्रजीत ने चाकू हत्थे से पकड़कर खींच लिया और रक्तरंजित चाकू रामू की बढ़ाते हुए बोला---" इसे धोकर रख लो !"
 
फिर उसने गार्ड की मदद सै कोट उतारा जख्म पर रूमाल बांधा और गाडी की तरफ वढता हुआ बोला--"चलो, अस्पताल चलो । " रेखा भी लपककर आई और फौरन इन्द्र के साथ पिछली सीट पर बैठ गई । वह अब भी फ्टी-फ्टी आखों से अपने भाई को देखै जा रही थी । "रेखा मुझे कुछ नहीं हुआ । मामूली जख्म है ठीक हो जाएगा। तुम बिल्कुल फिक्र न करै। " उसने रेखा को हौसला दिया । रेखा ने कुछ कहे बगैर उसके कंधे पर सिर रख दिया I उसकी आखों सै टप-टप आसू गिरने लगे। अस्पताल में पुलिस कार्रवाई के बाद फोरन मेडिक्ल एड् मिल गई। जख्म गहरा था, लेकिन घातक नहीँ था। भगवान ने उसे बचा लिया था । कटारी ने सीधे दिल पर बार किया था और अगर उसका निशाना न चूकता तो इंद्रजीत की मौत्त यकीनी थी । जिस चाकू सै उस पर वार किया गया था उस चाकू को इन्द्र अच्छी तरह पहचानता था । वह राजू मदारी का चाकू था जो तो हमेशा अपने पास रखता था। राजूमदारी धोखे में मारा गया था । उसका इरादा इन्द्रजीत पर पक्का जादू करके उसे हमेशा के लिए अपनी कैद में ले लेने का था और अपने इस मक्सद में उसने काफी कामयाबी भी पा ली थी, लेकिन वह अमावस की काली अंधेरी रात खुद उसकी जिन्दगी को मौत के आगोश में कैद कर गई थी। राजूमदारी के मत्रपाश से इन्द्र को मुक्त कराने को राजकुमारी नयना ने अपने ड्राइवर रघुबीर सिह के माध्यम से एक सपेरे तांत्रिक योगी दयाल की सेवाए प्राप्त कर ली थीं और इस योगी दयाल ने अनुष्ठान करके राजूमदारी पर ऐसा घातक वार किया था कि उसके बचने का कोई रास्ता न रहा । राजूमदारी खुद को बड़ा जबरदस्त और शक्तिशाली तात्रिक समझता था और यह घमण्ड ही उसे ले डूबा था । वह इन्द्रजीत को मत्रपाश द्वारा अपना गुलाम बना, कैद करते हुए खुद मौत की गिरफ्त में आ गया था । हालाकि अन्तिम क्षणों में वह जान गया था कि उस पर कौन सा तांत्रिक वार किया गया है और यह बार किसने किया है-लेकिन तब कुछ नहीं हो सकता था । वह तडपकर मर गया था । दुसरे दिन जब जगल से उसका बाप घर नहीं पहुचा' था तो कटारी चिन्तात हो उठी थी । उसने एक दिन और इतजार किया और राजू मदारी जब तीसरे दिन भी घर नहीं आया तो कटारी अपने रीछ और बंथर को लेकर जगल की तरफ गई | अत्तत: उसने अपने बाप की लाश खोज निकाली । उसके बाप की लाश हालाकि शिनाख्त योग्य न थी-लेकिन वहा मौजूद दूसरी चीजों से कटारी को यह अंदाजा लगने में देर न लगी कि यह उसके बाप कीं ही लाश है I वहा' इन्द्रजीत्त भी मोजूद नहीं था I कटारी ने रीछ की खाल में गडा. हुआ चाकू खींच लिया और उसी क्षण अपने बाप की सौगन्ध खाई कि वह इंद्रजीत से अपने बाप के कत्ल का इत्तकाम जरूर लेगी कि इन्द्रजीत अगर उसका नहीं हुआ तो फिर किसी का भी नहीं होगा। यूं इतकाम की आग में सुलगती कटारी ने कुछ दिन बाद ही शहरों का रूख किया और आखिर दिल्ली पहुच गई । चाकू फेंककर मारने का फन उसके बाप ने उसे सिखा रखा था-इस क्ला मे उसने और दक्षता प्राप्त कर ली थी I कबीले के बहुत से नौजवान उससे शादी के खाहिशमंद थे, लेकिन उसने अपने कबीलेबालों से साफ साफ इंकार कर दिया था कि वह जब तक अपने दुश्मन सै इतकाम नहीं ले लेगी कभी किसी खुशी का मुह न देखेगी । चाहे अपने दुश्मन को तलाश करने में उम्र ही क्यों न बीत जाए । और यूं उम्र नाकामयाबियों की नजर हो रही थी । उसकी जिन्दगी एक तमाशा बनी हुई थी I कटारी यहां-वहां भटक रही थी कि यह यूं अचानक ही उसकी मजिल उसके सामने आ गई थी । इन्द्रजीत को अचानक अपने सामने देखकर वह शेष सब कुछ भूल गई ब आनन फानन वह कर दिया जिसकी उसने अपने बाप की लाश पर कसम खाई थी । बार करके वह क्षणभर के लिए भी वहा' नहीँ रूकी थी। उसने यह भी नहीं देखा था कि उसका वार कारगर भी हुआ है या नहीं । उसका दुश्मन जिन्दा है या मर गया। उसे अपने बार पर यकीन था । जानती थी कि उसके हाथ से निक्ला हुआ चाकू कभी बेनिशाना नहीं हुआ, पर इसका क्या कीजिए कि मारने वाले से बचाने वाला बडा ।

यह इन्द्रजीत की जिन्दगी में एक नया उफान आया था । दुश्मनों में एक और दुश्मन की वृद्धि हो गई थी । नयना को जब इन्द्रजीत पर हुए हमले की सूचना मिली तो वह फौरन अस्पताल पहुची' I यह सपोग ही था कि वह इन दिनो दिल्ली मे ही थी । वह अस्पताल के प्राइवेट रूम में पहुची तो वहां मेला-लगा हुआ था। नयना के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं । रेखा ने नयना को अस्पताल से ही फोन किया था उस वक्त इन्द्रजीत एमरजेन्सी मिनी आपरेशन थिएटर में था I छोटा-सा आॅपरेशॅन था । घाव साफ करके टाके लगा दिए गए थे । रेखा ने नयना को विवरण नहीं बताया था। बस इतना ही कहा था कि भैय्या जख्मी हैं वह फोरन अस्पताल आ जाए। नयना को देख़कर रेखा ने उसे गले से लगा लिपा और बोली--"परेशान न होये । भैय्या अब बिल्कुल ठीक हैँ। " इन्द्रजीत्त तकिये से टेक लगाए अघलेटा पडा था वह नयना को देख़कर मुस्काया और बौला-”आऔ, नयना... । " इस प्राइवेट रूम में इस वक्त इन्द्रजीत का बचपन का दोस्त प्रेम सागर, अकल बलदेव राज उनका परिवार और रेखा थी । नयना के आने पर प्रेम सागर ने जाने कीं इजाजत चाही । उसके जाने के बाद कमरे में घर के ही लोग रह गये । हालाकि बलदेव राज ने प्रेम सागर को रूकने को कहा था-पर प्रेम सागर ने रूकना मुनासिब नहीं समझा था। बहरहाल, नयना सबसे परिचित थीं । "यह केसे हुआ?" नयना ने पूछा । उसकी आवाज में तडप. थी। "तुम्हें रेखा ने कुछ नहीं बताया । " इन्द्र ने रेखा की तरफ देखा। "नहीं भैय्या। " रेखा बोली-"मैंने जानकर नहीं बताया था कि परेशानी होंगी। " तभी बलदेव अकल ने हसकर बौले--"परेशानी की कोई बात नहीं है बैटी! आपके इन्द्रजीत ने यह जख्म हंसकर खाया है । " "क्या मतलब? " नयना हैरान ही हुई थी… " अंकल मैं आपकी बात समझी नहीं I " "कातिला से इन्होंने पूरा सहयोग किया । उसै पूरे इत्मीनान से कत्ल होने का मोका ए इनायत किया । " "कातिला यह आप क्या कह रहे हैँ, अकल क्या इन्द्र पर कातिलाना हमला हुआ है?" "जी । कातिलाना हमला और वह भी एक औरत ने किया है?" "कौन थी वह? आप पहेलियां बुझा रहे हैं । " इस बार इन्द्र बोला "आपकी दोस्त।" और साथ ही हस भी दिया । "मेरी दोस्त । ” नयना उसका मुह ताकने लगी। "भैय्या, क्यो परेशान कर रहे हैँ । बता भी दो न । " रेखा बोल उठी। "रेखा तुम बताओं । " नयना बोली--"कौन थी वह?" "कटारी नाम है उसका । " रेखा ने बताया "और उस कमीनी को मेंने खुद घर बुलवाया था । " रेखा के लहजे में पछतावा था । "तुम क्यों शर्मिन्दा हो रही हो । तुम्हें क्या मालूम था कि वह कौन है और तुम्हारे भैय्या की दुश्मन है ।" "कटारी...वह्र कटिरी थी। " नयना इन्द्र क्रो घूरने लगी--"राजूमदारी की बैटी । " वह रेखा की तरफ मुडी-"रेखा, प्लीज . मुझे डिटेल में सारी बात बताओ । " रेखा ने सडक_ पर कटारी से मुलाकात और उसे घर बुलाने व फिर बाद के सारे हादसे से नयना को आगाह कर दिया । "इन्द्र, आपने यह क्या किया?" नयना ने सारा वाकया सुन इन्द्र से कहा । ”मेने क्या किया? मैने तो कुछ नहीं किया । "

.............................

"उस कुतिया की लाश क्यो नहीँ गिराई । उसे फरार होने का मौका क्यों दिया ! " नयना के स्वर में रोष भर आया था । इन्द्र ने कोई जवाब नहीं दिया । सच यही था कि उसे खुद मालूम नहीं था कि उसने ऐसा क्यों किया? बहरहाल नयना ने भी अपने रब का शुक्रिया अदा किया कि इन्द्रजीत्त, कटारी के चाकू से बाल बाल बच गया था ।पर अस्पताल सै घर पर जाने के बाद जख्म भर जाने तक नयना ने इन्द्रजीत से बार-बार यही सवाल किया कि उसने कातिलाना हमले के बावजूद कटारीं को क्यों निक्ल जाने दिया, लेकिन इन्द्रजीत उसे कोई सन्तोषजनक जवाब नहीं दे पाया । वैसे वह खुद भी अपने इस रवैये के बारे में बराबर सोचता रहा था । फिर एक दिन रेखा ने भी यही सवाल इन्द्रजीत सै कर डाला । वह बोली "भैय्या यह चुभन तो जिन्दगी भर मेरे दिल में रहेगी कि मेरी मूर्खता से मेरे भाई पर घातक हमला हुआ, लेकिन यह सवाल भी मेरे दिल में फास बनकर चुभी हुई है कि आपने उस कमीनी को बचकर निकल जाने दिया । भैय्या, कुछ बताए तो आपने ऐसा क्यों किया? " "यह सबाल नयना भी मुझसे कई बार पूछ चुकी हे और रेखा, सच तो यह है कि मैं खुद भी अपने इस रवैये पर चक्ति हूं और इस बावत निरन्तर सोचता रहा हू और मैं अब इस नतीजे पर पहुचा' हूं कि शायद सच्चाई में नयना से कभी नहीं कह सकूगा । रेखा, तुमसे क्या छिपाना? मैंने शायद उसे इसलिए निक्ल जाने दिया कि मैं उसे कोई खुशी देना चाहता था । " सुनकर रेखा को हैरत हुईं थी । वह लगभग चीख ही तो उठी थी "खुशी देना चाहते थे. .. एक कातिला को खुशी? कमाल है, आपने जख्म इसलिए खाया कि जख्म लगाने वाला खुश हो सके I " इन्द्र एकाएक ही बेहद सजीदा नजर आने लगा वह बोला "रेखा तुम तो मेरी आपबीती से वाकिफ हो , कटारी का बाप मेरा मोहसिन था । उसने मुझें कत्ल होने से बचाया था, वर्ना चाचा के भाडे के कातिलों ने मेरी लाश बिछा देनी थी, पर उसका दुर्भाग्य रहा कि वो मेरे ही कारण मारा गया । कटारी बहुत मासूम लडकी. है रेखा और तुम जानती हो कि वह मुझें टूटकर चाहती थी । मै ही उसकी चाहत का जवाब मुहब्बत से नहीं दे सका था । मेरा विश्वास है कि कटारी को मेरी व नयना की गुप्त मुलाकातों की खबर थी । इस पर भी उसने सयम' का दामन हाथ से नहीँ छोडा । तुम अन्दाजा कर सकती हो रेखा, कि जब उसने अपने बाप की क्षत-बिक्षप्त लाश जगल में पाई होगी और मुझे वहा से गायब पाया होगा तो उसके दिल मैं प्रतिशोध की भावना का भडक उठना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। बात असल में यह है रेखा कि मैं कटारी के बारे में हमेशा एक अपराध बोध का ही शिकार रहा हू। उसको जाने देकय मैंने अब इस अपराध बोध से मुक्ति पा ली हे । मेरा ख्याल है तुम मेरी बात अच्छी तरह समझ गई होगी । " पता नही रेखा उसकी बात समझी या नहीं । बह बस इतना कहकर चुप ही रही-- "भगवान् आप पर रहम करे, भैय्या । " और यह भगवान की ही दया थी कि इन्द्रजीत्त, कटारी के जानलेवा वार से साफ बच गया था । और फिर यह भी हुआ था कि इन्द्रजीत को उसी दिन शाम तक घर जाने कीं इजाजत दे दी गई थी । इन्द्रजीत अस्पताल से घर जा रहा था कि दीपक आ पहुचा था । हालाकि प्रेम सागर ने उसके सिनेमा के मेनेजर को इस वाकये की सूचना दे दी थी, पर तब दीपक काम से निक्ला हुआ था और उसे यह इतला लोटने पर ही मिली थी । दींपक खड़े पाव पलट लिया था और सीधे अस्पताल पहुचा था । उसे सिर्फ यही सुचना मिली थीं कि इन्द्रजीत पर कातिलाना हमला किया गया है और वह फना अस्पताल में है । उसने इस घिनौनी कार्रवाई को अपने बाप रमाकात की ही एक चाल समझी थी,सो वह चिन्तित्त होने के साथ-साथ शर्मिन्दा भी था । "इन्द्र, क्या हुआ? खैरियत तो है। किसने हमला किया तुम पर? " उसने पहुचते ही पुछा था । "हां, सब खैरिंयत है ।" इन्द्रजीत मुस्करा दिया था… "बाजू में मामूली जख्म है। ड्रैसिग कर दी गई है । मुझें अस्पताल छोडने. की इजाजत है । दीपक तुम हमारे साथ घर चलो।" दीपक ने प्रेम सागर की तरफ देखा-वह आते हुए प्रेम सागर को भी अपने साथ ले आया था । यूं वे इन्द्रजीत्त के साथ कोठी पर पहचे थे। अकल बलदेव अस्पताल से ही अपने पर चले गए थे। कोठी पर नयना व रेखा इन्द्र के साथ उसकी कार में व प्रेम सागर, दीपक के साथ उसकी कार में पहुँचे थे ।
 
घर पहुँचकर रेखा और नयना तो अन्दर चली गई थी और इन्द्र दीपक व प्रेम के साथ ड्राईगरूम मे बैठ गया था । दीपक ही नहीं, प्रेम सागर भी इस हमले का विवरण जानने को बेताब था । दीपक के पूछने पर जब इन्द्रजीत ने उन्हें कटारी के बारे में अब इस हमले का सबब मोटे तोर पर समझाया तो दीपक ने मन ही मन भगवान का शुक्रिया अदा किया था और राहत की गहरी सास ली थी । वह इन्द्रजीत के सामने और अधिक शर्मिंन्दा होने सै बच गया था। चाय पीने के बाद जब दीपक ने जाने की इजाजत मागी किं उसका एक बेहद जरूरी काम से वापिस जाना जरूरी था तो इन्द्र ने प्रेम सागर क्रो जबरदस्ती रोक लिया । उसने कह्वा--"दीपक की तो मजबूरी है, पर तुम खाना खाये बिना नहीं जाओगे । " प्रेम सागर रूक गया । रेखा को जब मालूम हुआ कि इन्द्र ने प्रेम सागर को रोक लिया है तो उसने अपनी खास निगरानी में खाने की तैयारी शुरू कर दी । समय समय पर वह बैठक के फेरे भी लगाती रही । नयना भी उसके साथ ही होती । इन्द्रजीत, प्रेम सागर क्रो अपनी आप बीती सुना रहा था । जब इन्द्र की कहानी खत्म हो गई तो अब होने वाली बातों में नयना व रेखा भी शरीक थी । फिर एक वक्त ऐसा भी आया कि इन्द्रजीत बाथरूम जाने की इजाजत लेकय वहां सै उठ गया । नयना ने कुछ सोचा और कुछ देर बाद वह भी उठकर बहा चली गई। अब ड्राईगरूम में रेखा प्रेम सागर के साथ अकेली रह गई थी । खुद को अकेली महसूस करते ही रेखा अन्दर ही अन्दर कसमसाने लगी । उसे नयना पर बडा गुस्सा आया कि वह एकाएक ही ओर कुछ कहे बिना ही ड्राइगरूम सै चली गई थी । जाहिर है अब रेखा अगर चाहती भी तो उठ नहीं सकती थी, क्योकिं प्रेम सागर को अकेला छोड देना अभद्रता होती । वह हिम्मत करके बैठी रही । प्रेम सागर जी अभी नयना से बडी बेतकल्लुफी से बात कर रहा था-अचानक खामोश हो गया था-जेसे उसे साप सुध गया हो । प्रेम सागर कुछ देर खामोशी से नजरें झुकाये बैठी रेखा को देखता रहा । रेखा प्रेम सागर से अपनी पहली मुलाकात पर अपने व्यवहार से आत्मग्लानी हो रही थी । रेखा ने अचानक नजरे उठाई और उसे देखा। वह सोफे पर पूर्ण निश्विन्तता के साथ बैठा था। उसी क्षण उसने भी नजरें उठाकर रेखा को देखा । नजरों-से नजरे मिलीं और फिर दोनो ही जैसै पलके झपकाना भूल गए। आखों ही-आखों में कोई बात हुईं और नजरों के ये तीर ही जैसै दोनों के दिलों में उतरते चले गए। न किसी ने कुछ कहा-न किसी ने कुछ सुना-फिर भी बहुत कुछ कहा गया-बहुत कुछ सुना गया। बेरूखी गायब थी शिकायतें जाती रही थीं । जो, जो कुछ कहना चाहता था-खामोशी कीं जुबान ने ही दूसरे तक पहुचा दिया । कुछ देर बाद नयना वापिस आ गई और उन दोनों को खामोश देख चकित सी बौली "अरे, ऐसा सन्नाटा! यह चुप्पी! बैठक में कदम रखते मुझे तो लगा था जैसै यहां कोई है ही नहीं।" "कमाल है। बहरहाल, अब तो यकीन आ गया कि हम यहां मौजूद हैं। " प्रेम सागर बोला । "हां तो यकीन करना पड रहा है, लेकिन एक बात पर फिर भी हैरत है । " "वह क्या?" प्रेम सागर ने पूछा तो रेखा ने चौंककर नयना की तरफ देखा। "इस कद्र खामोशी क्या आप दोनों को बात करने की मनाही है?" नयना हौले सै हस दी थी ।। "जिस तरह एक हाथ से ताली नहीं बजती-वैसे ही एक तरफा बातचीत भी नामुमकिन है। " प्रेम सागर ने कनखियों से रेख की तरफ देखते जबाब दिया ।

" अरे! " नयना बवार शोखी से बोली "क्या आपकी बात का रेखा ने जबाब नहीं दिया I " "औ-नहीँ l ऐसी अभद्रता की आप उनसे कैसे उम्मीद रख सकती है I " प्रेम सागर तेजी से वोला-"दरअसल मैने कोई बात ही नहीँ की । हुआ यह कि मेम साहब सिर झुकाए कुछ सोच रही थी-मैने इन्हें डिस्ट्रव करना अच्छा नहीं समझा । वैसे, मिस नयना! मैं आपको एक बात बता दूं। कभी कभी खामोशी भी जुबान बन जाती है और ऐसी खामोशी पर हजार लफ्ज कुर्वान किए जा सकते हैँ। " "सुना है और अनुभव भी किया है।" नयना ने भी शोखी अपनाई--"कि जव लब खामोश हो तो आखों ही आखों मे भी बातें हो ही जाती हैं । क्या आप यह कहना चाहते हैं कि बातें नजरों नजरों में हो रही थी । " ''मैं अभी आती हूं। " रेखा एकदम हडबडाकर… उठी। यही अहसास दिल धडका गया था जेसे नयना ने उसकी चोरी पकठ ली हो । वह घबरा-सी गई । उससे बैठा नहीं रहा गया । "कहा जा रही हो?" नयना ने उसका हाथ पकडने की कोशिश की । "किचन में । " कहते हुए वह तेजी से बाहर निकल गई।

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"उस कुतिया की लाश क्यो नहीँ गिराई । उसे फरार होने का मौका क्यों दिया ! " नयना के स्वर में रोष भर आया था ।

इन्द्र ने कोई जवाब नहीं दिया । सच यही था कि उसे खुद मालूम नहीं था कि उसने ऐसा क्यों किया?

बहरहाल नयना ने भी अपने रब का शुक्रिया अदा किया कि इन्द्रजीत्त, कटारी के चाकू से बाल बाल बच गया था ।पर अस्पताल सै घर पर जाने के बाद जख्म भर जाने तक नयना ने इन्द्रजीत से बार-बार यही सवाल किया कि उसने कातिलाना हमले के बावजूद कटारीं को क्यों निक्ल जाने दिया, लेकिन इन्द्रजीत उसे कोई सन्तोषजनक जवाब नहीं दे पाया ।

वैसे वह खुद भी अपने इस रवैये के बारे में बराबर सोचता रहा था ।

फिर एक दिन रेखा ने भी यही सवाल इन्द्रजीत सै कर डाला । वह बोली "भैय्या यह चुभन तो जिन्दगी भर मेरे दिल में रहेगी कि मेरी मूर्खता से मेरे भाई पर घातक हमला हुआ, लेकिन यह सवाल भी मेरे दिल में फास बनकर चुभी हुई है कि आपने उस कमीनी को बचकर निकल जाने दिया । भैय्या, कुछ बताए तो आपने ऐसा क्यों किया? "

"यह सबाल नयना भी मुझसे कई बार पूछ चुकी हे और रेखा, सच तो यह है कि मैं खुद भी अपने इस रवैये पर चक्ति हूं और इस बावत निरन्तर सोचता रहा हू और मैं अब इस नतीजे पर पहुचा' हूं कि शायद सच्चाई में नयना से कभी नहीं कह सकूगा । रेखा, तुमसे क्या छिपाना? मैंने शायद उसे इसलिए निक्ल जाने दिया कि मैं उसे कोई खुशी देना चाहता था । "

सुनकर रेखा को हैरत हुईं थी । वह लगभग चीख ही तो उठी थी "खुशी देना चाहते थे. .. एक कातिला को खुशी? कमाल है, आपने जख्म इसलिए खाया कि जख्म लगाने वाला खुश हो सके I "

इन्द्र एकाएक ही बेहद सजीदा नजर आने लगा वह बोला "रेखा तुम तो मेरी आपबीती से वाकिफ हो , कटारी का बाप मेरा मोहसिन था । उसने मुझें कत्ल होने से बचाया था, वर्ना चाचा के भाडे के कातिलों ने मेरी लाश बिछा देनी थी, पर उसका दुर्भाग्य रहा कि वो मेरे ही कारण मारा गया । कटारी बहुत मासूम लडकी. है रेखा और तुम जानती हो कि वह मुझें टूटकर चाहती थी । मै ही उसकी चाहत का जवाब मुहब्बत से नहीं दे सका था । मेरा विश्वास है कि कटारी को मेरी व नयना की गुप्त मुलाकातों की खबर थी । इस पर भी उसने सयम' का दामन हाथ से नहीँ छोडा । तुम अन्दाजा कर सकती हो रेखा, कि जब उसने अपने बाप की क्षत-बिक्षप्त लाश जगल में पाई होगी और मुझे वहा से गायब पाया होगा तो उसके दिल मैं प्रतिशोध की भावना का भडक उठना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। बात असल में यह है रेखा कि मैं कटारी के बारे में हमेशा एक अपराध बोध का ही शिकार रहा हू। उसको जाने देकय मैंने अब इस अपराध बोध से मुक्ति पा ली हे । मेरा ख्याल है तुम मेरी बात अच्छी तरह समझ गई होगी । "

पता नही रेखा उसकी बात समझी या नहीं । बह बस इतना कहकर चुप ही रही-- "भगवान् आप पर रहम करे, भैय्या । " और यह भगवान की ही दया थी कि इन्द्रजीत्त, कटारी के जानलेवा वार से साफ बच गया था ।

और फिर यह भी हुआ था कि इन्द्रजीत को उसी दिन शाम तक घर जाने कीं इजाजत दे दी गई थी । इन्द्रजीत अस्पताल से घर जा रहा था कि दीपक आ पहुचा था । हालाकि प्रेम सागर ने उसके सिनेमा के मेनेजर को इस वाकये की सूचना दे दी थी, पर तब दीपक काम से निक्ला हुआ था और उसे यह इतला लोटने पर ही मिली थी ।

दींपक खड़े पाव पलट लिया था और सीधे अस्पताल पहुचा था । उसे सिर्फ यही सुचना मिली थीं कि इन्द्रजीत पर कातिलाना हमला किया गया है और वह फना अस्पताल में है । उसने इस घिनौनी कार्रवाई को अपने बाप रमाकात की ही एक चाल समझी थी,सो वह चिन्तित्त होने के साथ-साथ शर्मिन्दा भी था ।

"इन्द्र, क्या हुआ? खैरियत तो है। किसने हमला किया तुम पर? " उसने पहुचते ही पुछा था ।

"हां, सब खैरिंयत है ।" इन्द्रजीत मुस्करा दिया था… "बाजू में मामूली जख्म है। ड्रैसिग कर दी गई है । मुझें अस्पताल छोडने. की इजाजत है । दीपक तुम हमारे साथ घर चलो।"

दीपक ने प्रेम सागर की तरफ देखा-वह आते हुए प्रेम सागर को भी अपने साथ ले आया था । यूं वे इन्द्रजीत्त के साथ कोठी पर पहचे थे।

अकल बलदेव अस्पताल से ही अपने पर चले गए थे। कोठी पर नयना व रेखा इन्द्र के साथ उसकी कार में व प्रेम सागर, दीपक के साथ उसकी कार में पहुँचे थे ।
 

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