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दरवाजा वर्षा ने खोला ।
उसने इन्द्रजीत क्रो दरवाजे पर देखकर 'नमस्कार' किया और फिर रेखा की तरफ देखा जेसे उसके आदेश की प्रतीक्षक हो।
"बर्षा, तुम जाओं । अपनी सहेलियों के साथ नुमाईश देखो । "
”ओ० के० । " कहती हुई वर्षा पलट गई। उसके साथ ही झद्गजीत्त ने अन्दर जाने के लिए कदम उठाये तो रेखा ने हाथ के इशारे से रोकते हुए बदस्तूर शोखी के साथ कहा--
" सब्र जरा सब्र । धीरज धरै जरा भैय्या !"
तभी बर्षा अपनी सहेलियों के साथ बाहर निकल गई । रेखा ने कमरे मे झाककर देखा । नयना कुर्सी पर बैठी थी । दरबाजे की तरफ उसकी पीठ थी ।
"जाईए भैय्या। अंदर आइये और मिलिए उस आर्टिस्ट से जो खुद अपने आप मे एक शाहकार है !"
"तुम भी चलो।"
"जी नही। में मैहमानों को अटेण्ड करने जा रही हू। अंकल अकेले है । आप अकेले अंदर जाइए । डरिए मत ।"
"डर किस बात का ।" यह कहकर इंद्रजीत दरबाजा धकेल अंदर प्रबिष्ट कर गया ।
रेखा ने दरबाजा बाहर से बन्द कर दिया व मुस्कराती हुई प्रदर्शनी हाॅल की तरफ लौट आई ।
रेखा के रवैये से उलझा हुआ इंद्र बहुत आहिस्ता से कमरे में दाखिल हुआ था।
नयना उसकी तरफ पीठ किये बैठी थी । जब दरवाजा जोर से बन्द हआ तौ उसने एकदम पलटकर देखा। एक बिजली सी चमकी । बादल गर्जे और दिलो पर बूदाबादी-सी शुरु हो गई। इस तरह मिल जाएगे कभी सोचा भी नही था l नयना दरबाजा बंद होने की आवाज पर पलटी थी और पलटकर देखते ही अहसास हुआ जैसे इस एक क्षण मे उसकी किस्मत ही पलटा खा गई हो I कमरे मे प्रवेश करने वाले इन्द्रजीत को उसने एक नजर में ही पहचान लिया था।
वह तो उसका प्यार था। उसका इन्द्रजीत था । यह तडपकर उठी।
नयना का पलटना इन्द्रजीत्त के लिए भी तो एक भूकम्प से कम न था ।।। यह उसकी निगाहों ने क्या देखा? यह उसके दिल के दरवाजे पर किसने दस्तक दी I
बीते वक्त की गर्द ने हालाकि दोनों सूरतें धूंधला दी थीं ।
15 सालों में सूरतें कितनी बदल गई थीं, लेकिन प्यार करने वाले सिर्फ चेहरों से एक दूसरे को नहीं पहचानते-आखो से ज्यादा उनके दिल पुकार उठते हैं ।
इन्द्रजीत्त के दिल ने भी पुकारा था--"अरे ॥ यह तो उसकी नयना है।” वह तडपकर आने बढा ॥
"नयना...यह्र तुम हो I "
नयना बेअख्तयार उसकी बाहो में समा गई और रो दी--"हां...यह में हूं नयना.. .मेरे देवता।"
ब्रैकरार इन्द्र ने उसे खुद से अलग किया। उसक्ती ठोडी को अपनी दो उगलियाँ' से उठाया। नयना की कजरारी आखें आसुआँ से भीग रही थी'-कजरा फैल चला था।
"अरे, रो मत नयना! देखौ, आखों का काजल फैलने लंगा है। लोग देखेंगे तो क्या कहेगे।"
"मैने लोगों क्री परवाह कभी नहीं कीं इन्द्र।" वह पलकें झपकाती बोली "जब तुम होते हो तो फिर कोई दूसरा नहीं होता । मैने तो अपने पिताश्री की परवाह नहीं की I अपने मगेतर' के बारे में नहीं सोचा । मैं लोगों क्री भला क्या परवाह करूँगी। आह! ! मेरे प्रियतम्। प्रभु भी केसी परीक्षाएं लेता है! इन्द्र, मैं कल भी तुम्हारी थी और आज भी तुम्हारी हूं और प्यार सच्चे हों तो भगबान को भी झुकना ही पडता है।"
”त.. .तुम. ..सच कह रही हो, नयना ।" इन्द्र भावुक हो उठा ।
" हां इन्द्र! मैं तो अभी वहीं खडी हूं जहां तुम मुझे छोडकर गए थे।" नयना खुद को सम्भालते बौली"क्या तुमने अभी तक मेरी पेटिग्स नही देखी।"
"नहीं अभी कहा? उस शरीर लडकी, ने मुझें अदर जाने ही कहा दिया । मुझसे उद्घाटन करवाया और फिर सीधे यहां ले आई। "
"तभी तो... । वर्ना तुम मझसै यह सवाल न करते । "
"बैठो, नयना । " इन्द्र ने उसे वापिस कुर्सी में बैठा दिया और उसे मुग्ध-सा निहारने लगा। नयना सम्भल चुकी थी। उसने पूछा"यह लडकी. कोन है, इन्द्र? उसने मेरे साथ इस कदर व्यवहार किया है कि में बता नहीं सकती। फिर...फिर उसने मेरी तस्वीरों सै पहचान लिया जबकि मेने अपना नाम भी गलत बताया था। "
"वह तुम्हें कैसे न पहचानती । " इन्द्र मुस्करा दिया-" वह तो तुम्हें मुझसे ज्यादा जानती है। "
"क्या लगती है वह तुम्हारी?" नयना चौकन्नी नजर आने लगी. "क्या सम्बन्ध है तुम्हारा उससे?”
"बहुत्त निक्ट का सम्बंध है। " इन्द्र ने अपनी चमकती आखों' सै उसकी तरफ देखा--"वह मेरी छोटी बहन है। "
”ओह ! " नयना ने राहत का गहरा सास लिया--"बहुत प्यारी है। "
"हा, प्यारी भी और शरीर भी । देख' लो, उसने न मेरे बारे में तुम्हें कुछ बताया और न तुम्हारे बारे में मुझें... I"
नयना अपलक इन्द्र को निहारे जा रही थी। उसने पूछा--'इन्द्र ! तुम कहां चले गए थे..?"
"बताउगा' हर वह बात बताऊंगा जो तुम जानना चाहोगी। फिदहाल, बस इतना जान लो कि किसी ने मेरा अपहरण कर लिया था । मैं किसी के जादू में कैद था । मेरी यह बहन रेखा ही मुझे वहां से मुक्त कराकर लाई है । " इन्द्र बोला--"नयना, मैं तुम्हें कभी नहीं भूला । बरस बीत गए एक जिद्दी प्रेतात्मा क्री यात्तनामय कैद में । तुम्हारे बारे में सोचते हुए भी भय लगता था । बरस बीत गए थे और जाने क्या-से-क्या हो गया था कि तुम पहचानने सै भी इंकार कर दो । यह सोचता रहता था, पर मेरा यह इरादा था कि एक बार तुम्हारी हवेली जाकर जरूर देखूंगा । मैं वहां आने का मन बना ही रहा था l "
नयना ने कुछ कहना चाहा, पर तभी दरवाजे पर दस्तक हुईं और दरवाजा खोल रेखा मुस्कराती हुई भीतर आ गई ।
" आर्टिस्ट साहिबा! आप यहां विराजमान हैं और लोग वहा प्रशसा के फूल बरसा रहे है। तारीफ पर-तारीफ हो रही है और वहां यह नियामतें बटोरने वाला कोई नहीं है । " फिर वह इन्द्र से सम्बोधित हुई "और वी० आई० पी० गेस्ट आपको ढूँढ रहे है' कि बन्दा 'रिबन' काटकर किधर खिसक गया । अगर आप लोगों की मिलनी सम्पन्न हो गई हो तौ प्रदर्शनी में तशरीफ ले चलें I "
"आओ,नयना.' मुझें अपनी पेटिग्स दिखाओ । "
"हां, चलिये ना । " नयना फौरन उठते हुए बोलो ।
वे रेखा के साथ हौ लिए थे, पर नजरे अब भी चुरा रहे थे।
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"बर्षा, तुम जाओं । अपनी सहेलियों के साथ नुमाईश देखो । "
”ओ० के० । " कहती हुई वर्षा पलट गई। उसके साथ ही झद्गजीत्त ने अन्दर जाने के लिए कदम उठाये तो रेखा ने हाथ के इशारे से रोकते हुए बदस्तूर शोखी के साथ कहा--
" सब्र जरा सब्र । धीरज धरै जरा भैय्या !"
तभी बर्षा अपनी सहेलियों के साथ बाहर निकल गई । रेखा ने कमरे मे झाककर देखा । नयना कुर्सी पर बैठी थी । दरबाजे की तरफ उसकी पीठ थी ।
"जाईए भैय्या। अंदर आइये और मिलिए उस आर्टिस्ट से जो खुद अपने आप मे एक शाहकार है !"
"तुम भी चलो।"
"जी नही। में मैहमानों को अटेण्ड करने जा रही हू। अंकल अकेले है । आप अकेले अंदर जाइए । डरिए मत ।"
"डर किस बात का ।" यह कहकर इंद्रजीत दरबाजा धकेल अंदर प्रबिष्ट कर गया ।
रेखा ने दरबाजा बाहर से बन्द कर दिया व मुस्कराती हुई प्रदर्शनी हाॅल की तरफ लौट आई ।
रेखा के रवैये से उलझा हुआ इंद्र बहुत आहिस्ता से कमरे में दाखिल हुआ था।
नयना उसकी तरफ पीठ किये बैठी थी । जब दरवाजा जोर से बन्द हआ तौ उसने एकदम पलटकर देखा। एक बिजली सी चमकी । बादल गर्जे और दिलो पर बूदाबादी-सी शुरु हो गई। इस तरह मिल जाएगे कभी सोचा भी नही था l नयना दरबाजा बंद होने की आवाज पर पलटी थी और पलटकर देखते ही अहसास हुआ जैसे इस एक क्षण मे उसकी किस्मत ही पलटा खा गई हो I कमरे मे प्रवेश करने वाले इन्द्रजीत को उसने एक नजर में ही पहचान लिया था।
वह तो उसका प्यार था। उसका इन्द्रजीत था । यह तडपकर उठी।
नयना का पलटना इन्द्रजीत्त के लिए भी तो एक भूकम्प से कम न था ।।। यह उसकी निगाहों ने क्या देखा? यह उसके दिल के दरवाजे पर किसने दस्तक दी I
बीते वक्त की गर्द ने हालाकि दोनों सूरतें धूंधला दी थीं ।
15 सालों में सूरतें कितनी बदल गई थीं, लेकिन प्यार करने वाले सिर्फ चेहरों से एक दूसरे को नहीं पहचानते-आखो से ज्यादा उनके दिल पुकार उठते हैं ।
इन्द्रजीत्त के दिल ने भी पुकारा था--"अरे ॥ यह तो उसकी नयना है।” वह तडपकर आने बढा ॥
"नयना...यह्र तुम हो I "
नयना बेअख्तयार उसकी बाहो में समा गई और रो दी--"हां...यह में हूं नयना.. .मेरे देवता।"
ब्रैकरार इन्द्र ने उसे खुद से अलग किया। उसक्ती ठोडी को अपनी दो उगलियाँ' से उठाया। नयना की कजरारी आखें आसुआँ से भीग रही थी'-कजरा फैल चला था।
"अरे, रो मत नयना! देखौ, आखों का काजल फैलने लंगा है। लोग देखेंगे तो क्या कहेगे।"
"मैने लोगों क्री परवाह कभी नहीं कीं इन्द्र।" वह पलकें झपकाती बोली "जब तुम होते हो तो फिर कोई दूसरा नहीं होता । मैने तो अपने पिताश्री की परवाह नहीं की I अपने मगेतर' के बारे में नहीं सोचा । मैं लोगों क्री भला क्या परवाह करूँगी। आह! ! मेरे प्रियतम्। प्रभु भी केसी परीक्षाएं लेता है! इन्द्र, मैं कल भी तुम्हारी थी और आज भी तुम्हारी हूं और प्यार सच्चे हों तो भगबान को भी झुकना ही पडता है।"
”त.. .तुम. ..सच कह रही हो, नयना ।" इन्द्र भावुक हो उठा ।
" हां इन्द्र! मैं तो अभी वहीं खडी हूं जहां तुम मुझे छोडकर गए थे।" नयना खुद को सम्भालते बौली"क्या तुमने अभी तक मेरी पेटिग्स नही देखी।"
"नहीं अभी कहा? उस शरीर लडकी, ने मुझें अदर जाने ही कहा दिया । मुझसे उद्घाटन करवाया और फिर सीधे यहां ले आई। "
"तभी तो... । वर्ना तुम मझसै यह सवाल न करते । "
"बैठो, नयना । " इन्द्र ने उसे वापिस कुर्सी में बैठा दिया और उसे मुग्ध-सा निहारने लगा। नयना सम्भल चुकी थी। उसने पूछा"यह लडकी. कोन है, इन्द्र? उसने मेरे साथ इस कदर व्यवहार किया है कि में बता नहीं सकती। फिर...फिर उसने मेरी तस्वीरों सै पहचान लिया जबकि मेने अपना नाम भी गलत बताया था। "
"वह तुम्हें कैसे न पहचानती । " इन्द्र मुस्करा दिया-" वह तो तुम्हें मुझसे ज्यादा जानती है। "
"क्या लगती है वह तुम्हारी?" नयना चौकन्नी नजर आने लगी. "क्या सम्बन्ध है तुम्हारा उससे?”
"बहुत्त निक्ट का सम्बंध है। " इन्द्र ने अपनी चमकती आखों' सै उसकी तरफ देखा--"वह मेरी छोटी बहन है। "
”ओह ! " नयना ने राहत का गहरा सास लिया--"बहुत प्यारी है। "
"हा, प्यारी भी और शरीर भी । देख' लो, उसने न मेरे बारे में तुम्हें कुछ बताया और न तुम्हारे बारे में मुझें... I"
नयना अपलक इन्द्र को निहारे जा रही थी। उसने पूछा--'इन्द्र ! तुम कहां चले गए थे..?"
"बताउगा' हर वह बात बताऊंगा जो तुम जानना चाहोगी। फिदहाल, बस इतना जान लो कि किसी ने मेरा अपहरण कर लिया था । मैं किसी के जादू में कैद था । मेरी यह बहन रेखा ही मुझे वहां से मुक्त कराकर लाई है । " इन्द्र बोला--"नयना, मैं तुम्हें कभी नहीं भूला । बरस बीत गए एक जिद्दी प्रेतात्मा क्री यात्तनामय कैद में । तुम्हारे बारे में सोचते हुए भी भय लगता था । बरस बीत गए थे और जाने क्या-से-क्या हो गया था कि तुम पहचानने सै भी इंकार कर दो । यह सोचता रहता था, पर मेरा यह इरादा था कि एक बार तुम्हारी हवेली जाकर जरूर देखूंगा । मैं वहां आने का मन बना ही रहा था l "
नयना ने कुछ कहना चाहा, पर तभी दरवाजे पर दस्तक हुईं और दरवाजा खोल रेखा मुस्कराती हुई भीतर आ गई ।
" आर्टिस्ट साहिबा! आप यहां विराजमान हैं और लोग वहा प्रशसा के फूल बरसा रहे है। तारीफ पर-तारीफ हो रही है और वहां यह नियामतें बटोरने वाला कोई नहीं है । " फिर वह इन्द्र से सम्बोधित हुई "और वी० आई० पी० गेस्ट आपको ढूँढ रहे है' कि बन्दा 'रिबन' काटकर किधर खिसक गया । अगर आप लोगों की मिलनी सम्पन्न हो गई हो तौ प्रदर्शनी में तशरीफ ले चलें I "
"आओ,नयना.' मुझें अपनी पेटिग्स दिखाओ । "
"हां, चलिये ना । " नयना फौरन उठते हुए बोलो ।
वे रेखा के साथ हौ लिए थे, पर नजरे अब भी चुरा रहे थे।
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