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A Horror Novel - स्वाहा complete

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घर पहुँचकर रेखा और नयना तो अन्दर चली गई थी और इन्द्र दीपक व प्रेम के साथ ड्राईगरूम मे बैठ गया था ।

दीपक ही नहीं, प्रेम सागर भी इस हमले का विवरण जानने को बेताब था ।

दीपक के पूछने पर जब इन्द्रजीत ने उन्हें कटारी के बारे में अब इस हमले का सबब मोटे तोर पर समझाया तो दीपक ने मन ही मन भगवान का शुक्रिया अदा किया था और राहत की गहरी सास ली थी । वह इन्द्रजीत के सामने और अधिक शर्मिंन्दा होने सै बच गया था।

चाय पीने के बाद जब दीपक ने जाने की इजाजत मागी किं उसका एक बेहद जरूरी काम से वापिस जाना जरूरी था तो इन्द्र ने प्रेम सागर क्रो जबरदस्ती रोक लिया । उसने कह्वा--"दीपक की तो मजबूरी है, पर तुम खाना खाये बिना नहीं जाओगे । "

प्रेम सागर रूक गया ।

रेखा को जब मालूम हुआ कि इन्द्र ने प्रेम सागर को रोक लिया है तो उसने अपनी खास निगरानी में खाने की तैयारी शुरू कर दी । समय समय पर वह बैठक के फेरे भी लगाती रही । नयना भी उसके साथ ही होती । इन्द्रजीत, प्रेम सागर क्रो अपनी आप बीती सुना रहा था । जब इन्द्र की कहानी खत्म हो गई तो अब होने वाली बातों में नयना व रेखा भी शरीक थी ।

फिर एक वक्त ऐसा भी आया कि इन्द्रजीत बाथरूम जाने की इजाजत लेकय वहां सै उठ गया । नयना ने कुछ सोचा और कुछ देर बाद वह भी उठकर बहा चली गई। अब ड्राईगरूम में रेखा प्रेम सागर के साथ अकेली रह गई थी । खुद को अकेली महसूस करते ही रेखा अन्दर ही अन्दर कसमसाने लगी । उसे नयना पर बडा गुस्सा आया कि वह एकाएक ही ओर कुछ कहे बिना ही ड्राइगरूम सै चली गई थी ।

जाहिर है अब रेखा अगर चाहती भी तो उठ नहीं सकती थी, क्योकिं प्रेम सागर को अकेला छोड देना अभद्रता होती । वह हिम्मत करके बैठी रही । प्रेम सागर जी अभी नयना से बडी बेतकल्लुफी से बात कर रहा था-अचानक खामोश हो गया था-जेसे उसे साप सुध गया हो ।

प्रेम सागर कुछ देर खामोशी से नजरें झुकाये बैठी रेखा को देखता रहा । रेखा प्रेम सागर से अपनी पहली मुलाकात पर अपने व्यवहार से आत्मग्लानी हो रही थी ।

रेखा ने अचानक नजरे उठाई और उसे देखा। वह सोफे पर पूर्ण निश्विन्तता के साथ बैठा था। उसी क्षण उसने भी नजरें उठाकर रेखा को देखा । नजरों-से नजरे मिलीं और फिर दोनो ही जैसै पलके झपकाना भूल गए।

आखों ही-आखों में कोई बात हुईं और नजरों के ये तीर ही जैसै दोनों के दिलों में उतरते चले गए।

न किसी ने कुछ कहा-न किसी ने कुछ सुना-फिर भी बहुत कुछ कहा गया-बहुत कुछ सुना गया। बेरूखी गायब थी शिकायतें जाती रही थीं ।

जो, जो कुछ कहना चाहता था-खामोशी कीं जुबान ने ही दूसरे तक पहुचा दिया ।

कुछ देर बाद नयना वापिस आ गई और उन दोनों को खामोश देख चकित सी बौली

"अरे, ऐसा सन्नाटा! यह चुप्पी! बैठक में कदम रखते मुझे तो लगा था जैसै यहां कोई है ही नहीं।"

"कमाल है। बहरहाल, अब तो यकीन आ गया कि हम यहां मौजूद हैं। " प्रेम सागर बोला ।

"हां तो यकीन करना पड रहा है, लेकिन एक बात पर फिर भी हैरत है । "

"वह क्या?" प्रेम सागर ने पूछा तो रेखा ने चौंककर नयना की तरफ देखा।

"इस कद्र खामोशी क्या आप दोनों को बात करने की मनाही है?" नयना हौले सै हस दी थी ।।

"जिस तरह एक हाथ से ताली नहीं बजती-वैसे ही एक तरफा बातचीत भी नामुमकिन है। " प्रेम सागर ने कनखियों से रेख की तरफ देखते जबाब दिया ।

" अरे! " नयना बवार शोखी से बोली "क्या आपकी बात का रेखा ने जबाब नहीं दिया I "

"औ-नहीँ l ऐसी अभद्रता की आप उनसे कैसे उम्मीद रख सकती है I " प्रेम सागर तेजी से वोला-"दरअसल मैने कोई बात ही नहीँ की । हुआ यह कि मेम साहब सिर झुकाए कुछ सोच रही थी-मैने इन्हें डिस्ट्रव करना अच्छा नहीं समझा । वैसे, मिस नयना! मैं आपको एक बात बता दूं। कभी कभी खामोशी भी जुबान बन जाती है और ऐसी खामोशी पर हजार लफ्ज कुर्वान किए जा सकते हैँ। "

"सुना है और अनुभव भी किया है।" नयना ने भी शोखी अपनाई--"कि जव लब खामोश हो तो आखों ही आखों मे भी बातें हो ही जाती हैं । क्या आप यह कहना चाहते हैं कि बातें नजरों नजरों में हो रही थी । "

''मैं अभी आती हूं। " रेखा एकदम हडबडाकर… उठी। यही अहसास दिल धडका गया था जेसे नयना ने उसकी चोरी पकठ ली हो । वह घबरा-सी गई । उससे बैठा नहीं रहा गया ।

"कहा जा रही हो?" नयना ने उसका हाथ पकडने की कोशिश की ।

"किचन में । " कहते हुए वह तेजी से बाहर निकल गई।

रजिशें जाती रही थीं I रेखा, प्रेम सागर को भा गई थी, इसलिए नहीं कि यह रिश्ता उसके अपनों यानि उसके दोस्त इन्द्रजीत व बलदेव राज अकल की स्वाहिश थी, बल्कि इसलिए कि रेखा में उसे वह सब्र-कृछ नजर आया था जो वह अपनी जीवन-संगनी' में चाहता था ।

रेखा ने हां कर दी थी और अब उसके दिल की धडकनो. में भी प्रेम सागर था,पर अभी लज्जा सकोच की दीवारें नहीं ढही थी । यूं ही एक दिन जब रेखा अपनी आर्ट गैलरी में अपने आफिस में एक पेन्टिंग-को 'फाइनल-ट्चिस' दे रही थी कि दरवाजे पर किसी की दस्तक से चौकी। उसने पलटकर देखा जो प्रेम सागर दरवाजे पर खड़ा उससे अन्दर आने की अनुमति माग रहा था।

"हमें अन्दर तो आ सकता हूं ना...?"

उसे देख़कर न जाने क्यों रेखा के हवास गुम हो जाते थे। वह अंदरही अदर सिमटने लगती थी । उसे लज्जा आने लगती थी । इस वक्त भी यही हुआ । वह उसे देखते गडबडा गई । ब्रुश भी ठीक से रखा नहीं गया । वह उठकर रेखा के कपडों पर गिरा और एक सुर्ख धब्बा बना गया ।

"जी ..आइए। ” वह खुद को सम्भालने का यत्न करते वोली ।

प्रेम सागर बडी लापरवाही से अन्दर आया और कुर्सी घसीटकर बैठ गया । रेखा ने तौलिये से अपने हाथ और कपडे साफ किये और सिकुडी सिमटी सी अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गई। उसकी नजरें मेज पर थी'।

प्रेम सागर आज निर्णायक मूड में आया था । वह कुछ क्षण उसे निहारता रहा फिर धीरे सै बोला-- "रेखा । "

उसके मुह से अपना नाम सुनकर रेखा को एक खुशी का अहसास हुआ। उसने अपनी घनेरी पलके उठाई-ओर अपनी काली खूबसूरत आखों से उसे देखा-- "जी । "

"आपके बडो ने कुछ सोचा व चाहा था उसका जबाब मैं आपके होंठों सै सुनना चाहता हूं। चाहै, यह जवाब इकार में ही क्यों न हो, लेकिन इंकार' करने से पहले यह जरूर सोच लीजिएगा कि शायद फिर में जिन्दगी भर शादी की सोचूं ही नहीँ । "

उफ ! यह बेबाकी । यह अधिकारपूर्ण लहजा I रेखा का दिल धडकने लगा । सब कुछ ही तो रेखा को गुदागुदा भी गया था। उसने भी हिम्मत जुटाई व धीमे से बोली "मैने इसका फैसला अपने बडों पर ही छोड दिया है ।"

"और आपके बडों का फैसला क्या है?"

"यह आप बडों सै ही पूछे । " प्रेम सागर को मुस्कराते देख, रेखा भी अपनी मुस्कान रोक न पाई थी और फिर शायद बिषय बदलने को पूछा--"आपके लिए_ क्या मगवाऊ? ठण्डा या गर्म...?"

"शुक्र है कुछ तो औकात की आपने हमारी । "

" प्लीज । आप मुझें शर्मिंन्दा करने की कोशिश न करें । उस दिन मैने आपके साथ बदसलूकी की मैं क्षमा प्रार्थी हूं। " रेखा ने कई बार सोचा था आज अवसर मिला था, तौ उसने फोरन माफी माग ली थी ।

"माफी तो मुझे मागनी चाहिये । " प्रेम सागर वोला--"इन्द्र से तय करने के बाद ही मुझे आपसे मिलने आना चाहिये था । "

" ना ? अब आप ऐसी कोई बात नहीं करेगे... । " तभी घटी के जबाज में चपरासी ने अन्दर कदम रखा और रेखा ने पूछा--"हां, तो क्या?"

"कॉफी मिल जाएगी... । "

"हां , क्यो नहीं?" रेखा बोली व फिर चपरासी से सम्बोधित हुई--"काॅफी बनाओ-अच्छी सी । "

"रेखा ऐसा नहीं हो सकता कि हम कही बाहर चलकर कॉफी पीयें?" प्रेम सागर ने आगे झुकते हुए और झिझकते हुए धीमे स्वर में फरमाइश की I

"क्यो नही हो सकता?" रेखा अब खुशदिली दिखा रही थी ।

"तो फिर चलो कही बाहर चलते है।"

चपरासी जाते जाते रूक गया था और जैसे रेखा के जबाब का प्रतीक्षक था। रेखा उससे बोली ----"रहने दो । काफी की जरूरत नहीं है । हम बाहर जा रहे है । "

यह मुलाकातों की शुरूआत्त थी।।

दो चार मुलाकातों मे ही बात कहा से कहां पहुच गई । दोनों ने एक दुसरे क्रो विश्वसनीय एवं अपने योग्य पाया। जिस दिन वे मिल न पाते थे तो रात को अपने बिस्तरों पर लेटे टेलीफोन के तारों के जरिये अपनी भावनाओं को व्यक्त करते ।

यही हाल कुछ इधर भी था। इधर यानि इन्द्रजीत और राजकुमारी नयना के बीच प्रेम सागर और रेखा की मुहब्बत तो नई नई थी लेकिन नयना व इन्द्रजीत्त तो बरसों से एक दूसरे को जानते थे चाहते थे। हां यह दुसरी बात थी कि उनके सपने भी एक लम्बे समय बाद साकार हुए थे। अब हाल यह था कि जव तक वे एक दूसरे को मिल नहीं लेते थे वेकरार दिलों को चेन नहीँ आता । फिर एक दिन सवाल पेदा हुआ "आखिर कब तक? " और यह सवाल रेखा ने न प्रेम सागर से किया या-न नयना ने इन्द्रजीत से । यह सबाल अंकल बलदेव ने किया था ।
 
इस सबाल को सुनकर इन्द्रजीत्त क्रो जैसै होश आ गया था । अकल बलदेव ने बहुत सही वक्त पर यह सवाल उठाया था। दो प्रेम कहानिया लिखी जा रही थी, परवान चढ रही थी और अब इतना वक्त गुजर चुका था कि अब इन

कहानियों पर 'दी एण्ड' लिखा जाना जरूरी था।

और यह 'दी एण्ड' अन्तत्त: शादी था और अकल बलदेव व गंगा मौसी इस खुशी को बडी धूमधाम से मनाना चाहते थे । तब तय यह हुआ कि पहले मगनी' की जाए और मगनी' की रस्म किसी बड़े होटल में पूरी हो । किसी भी तरफ पैसे की कमी तो थी नहीँ-सो इन्द्रजीत और प्रेम सागर की मगनिया एक ही होटल में और एक ही वक्त में होने का प्रोग्राम तय हो गया ।।

नयना के मां-बाप नहीं थे । वह अकेली थी । ले-देकर उसके चाचाजाद भाईं थे और उधर प्रेम सागर की पारिवारिक स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी । रेखा व इन्द्रजीत्त के मां-बाप भी कहा थे? रेखा के,सिर पर हालाकि इन्द्रजीत मौजूद था लेकिन इन्द्रजीत के सिर पर कोई नहीं था। ले-देकर एक अंकल बलदेव थै, इसलिए सभी ने उन्हें ही अपना सरपरस्त व अविभावक बना लिया ।।

अब बलदेव अकल लडकी वाले भी थे और लडके वाले भी । यू उन्हे एक महत्वपूर्ण केन्द्रीय हैसियत ब भूमिका प्राप्त हो गई । गगा मौसी को बंगलौर बुला लिया गया था । एक सप्ताह बाद मगनिया होने चाली थीं इसलिए अमर अभी नहीं आया था । उसका प्रोग्राम एक दिन पहले आने का था । गगा मोसी बरसों बाद अपने शहर यानि दिल्ली आई थी । यहां आकर उन्हें अपनी जवानी याद आ गई थी।

रेखा, गंगा मौसी के आने सै बहुत खुश थी । वह बार बार उनके गले में बाहें डालकर बस यही कह रही थी "मौस्री! मैं आपको जाने नहीं दूंगी।"

"क्या मत्तलब है तेरा क्या तू यहीँ बैठी रहेगी?"

" हा, मौसी! " रेखा हस दी "मेरा मतलब यह था कि आपको शादी से पहले नहीं जाने दूंगी ।"

"अरी पगली अभी तो तेरी शादी को दो महीने हैं । मगनी के बाद मुझें जाना होगा। अमर वहां अकेला है। हां-शादी से पहले आ जाऊगी यह वायदा पक्का।"

"अमर की तो फिक्र हैँ-यहां कोई और भी अकेला है. .. इसकी फिक्र नहीं आपकी? "

गगा मोसी ने एकदम चोंककर रेखा को देखा । उन्हें रेखा से ऐसी किसी बात की आशा नहीं थी। उन्हें रेखा का इशारा तो समझ में आ गया था फिर भी अपना सन्देह्र दूर करने के लिए पूछा ।

"किसकी बात का रही हो?"

"उसकी जो सारी रात अकेला खडा बारिश में भीगता रहा । " रेखा ने बेशर्मी दिखाई, अपने ही अंदाज में गंगा मौसी की जवानी के प्यार की तरफ इशारा कर डाला।

"नहीं रेखा नहीं !" गंगा मोसी ने अपनी आखें बन्द कर ली-"मुझसे ऐसी बातें न करो।"

पर रेखा ने तो जैसे कुछ और ही ठान रखी थी। वह शिकायती, लेकिन अपनत्वपूंर्ण स्वर में बौली-"हाल्कि अकल से कभी इस बारे में बात नहीं हुई है, लेकिन यह बात मै बहुत अच्छी तरह जानती हू किं वह बहुत अकेले है। वह आपको बहुत मिस करते हैँ, मौसी।"

"जो होना था-वह्र हो चुका ।" गगा मौसी ने आखे' खोली तो दो मोती आखों से निकलकर गालों पर लुढकने लगे।

" हालाकि आपसे भी मैने कभी इस विषय पर बात नहीँ की है।" रेखा अपनी ही धुन में बोले गई--"लेकिन मैं यह भी अच्छी तरह जानती हू कि आप खुद भी बहुत अकेली है। आप भी आज तक उन्हे मिस करती है.।"

"बस कर रेखा, बस । " उनकी आवाज गले में रूधंने लगी-"सूख चुके घावों को अब न कुरेद । मै वह सब याद नहीं करना चाहती । "

" आप शादी क्यो नहीं कर लेती बलदेव अकल से...?" रेखा थी कि चुप होने को तैयार नहीं थी। बह अपने दिल की बात अत्तत्त: निर्लज्ज बन जुबान पर ले आई I

"ऐसा नही' हो सकता-ऐसा केसे हो सकता है यह कहकर गंगा मोसी रेखा के कमरे से निकल गई।

रेखा ने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की । आज के दिन के लिए इतना ही काफी था। उसने बरसो की राख मे दबी हुई चिगारी को अच्छी तरह कुरेद दिया था । अब इस चिगारी को थोडी हवा देने की जरूरत थी ताकि वह भडक -उठे ओर यह काम वह पूरे धैर्य व धीरज के साथ करना चाहती थी।

गंगा मौसी के जाने के बाद रेखा अपने कमरे से निकली । किचन में रामू शाम कीं चाय की तैयारियों में व्यस्त था।

"साहब कहां है ?" रेखा ने उससे पूछा ।

"साहब अभी उठे है, शायद बाथरूम में है। "

"ठीक है । मैं बाहर लॉन में जा रही हूं। हम चाय वहीँ पीयेंगे I साहब से कह देना। “

"जी अच्छा।"

रेखा टहलती हुई उस पेड़ के नीचे पहुची जहां उसने कटारी को वैठकर उसकी तस्वीर बनाना शुरू की थी तो एकाएक ही उसकी आखो… के सामने उस दिन का सारा दृश्य घूम गया । उसे मलाल हुआ कि उसने खामखाह ही एक तमामशेवाली को कोठी मे बुला लिया था। अगर उसका चाकू ठीक निशाने पर लग जाता तो वह यकीनन इस हादसे से पागल ही हो जाती।

कटारी भी अजीब औरत थी I

उसकी मुहब्बत नफरत मे बदल चुकी थी । यह तो भगबान ने इन्द्रजीत को बचा लिया था वर्ना मदारी की यह बेटी तो अपना हाथ दिख चुकीं थी ।

इन्द्रजीत्त ने राजू मदारी के इस चाकू को अपने पास रख लिया था । यह वही चाकू था जिसने बचपन में इन्द्रजीत्त को कत्ल होने से बचा लिया था और इन्द्रजीत्त के चाचा के भाडे के वह चारों कातिल-राजूमदांरी के जादू के प्रभाव में इन्द्रजीत्त के कटकटकर गिरने वाले अगो को देख मारे दहशत के भाग निकले थे। (आप यह रोमाचक घटना पहले भाग उपन्यास स्वाहा में पढ चुके है)

रेखा नहीं चाहती थी कि इस भालू क्रो घर में रखा जाए, लेकिन इन्द्रजीत्त ने इस चाकू क्रो बेटरूम में सजा लिया था ।

वह चाकू उसने खूबसूरत जग मे साइड टेबिल पर रखा था और अब उठते बैठते उस पर उसकी नजरें पडती. रहती थी' ।

रेखा इन्ही' ख्यालों में गुम थी कि "खैरियत तो है-कहा गुम थी? " इन्द्रजीत लॉन में बिछी मेज की तरफ बढते. हुए बोला ।

रामू इस मेज पर चाय के बर्तन सजा रहा था ।

"मुझे वह कमीनी याद आ गई थी... ।" रेखा बोली ।

"कटारी I " इन्द्रजीत हसा।

"उस मनहूस का नाम न लिया करो । " रेखा झलाकर बोली"जेसा नाम वेसा ही काम । "

"रेखा अब उस हादसे को भूल भी जाओ । अब तो मेरा बाजू भी ठीक हो गया है । "

"मैं उसे भूली नहीँ हूं। बह जिस दिन भी नजर आगई अपने गार्ड को हुक्म देकर गोलियों सै छलनी करवा दूगी' । ” रेखा ने गुस्से से कहा।

" ठीक है जो मर्जी आए करना । चलो, अब चाय भी लो। " इन्द्रजीत कपों में चाय उडेलने. लगा। हां, वह गगा' मौसी कहि है? उन्हें नहीं बुलाया बाहर?"

"नहीं । मैं उनकी चाय लेकर उनके कमरे में जाऊगी। " रेखा ने अपना इरादा स्पष्ट किया "मुझें जरा आपसे एक बात करनी है । "

"ऐसी कौन सी बात है जो उनके सामने नहीं की जा सक्ली । "

"है न एक ऐसी ही बात । " रेखा के लहजे की खट्टास जाती रही थी I

"वह क्या?" इन्द्र की दिलचस्पी जागी ।

"उनकी शादी की बात । "

"उनकी शादी की बात । " इन्द्रजीत ने हैरत सै दोहराया-"यानि गगा मोसी की शादी की बात । " उसने जैसे पुष्टि चाही थी।

"जी।" रेखा मुस्करा दी।

' ' किससे.... किससे ? "

"आप फिर परेशान हो गए।" रेखा मुस्काए जा रही थी "बलदेव अकल से और किससे?"

"ऐ । ”इंद्रजीत उछल ही तो पड़ा।

और अब जब रेखा ने इन्द्रजीत को उन दोनों की इश्क की कहानी सुनाई तो इन्द्र को और भी हैरत हुई ।

अनूठी कहानी थी । दोनों युवावस्था में एक-टूसरे क्रो चाहते थे और शादी नहीं हो सकी थी तो अब तक कुबारे थे।इन्द्र व रेखा देर तक इसी विषय पर वातें करते रहे।

"देखना भैय्या- मैं इनकी शादी करवाकर रहूगी । " रेखा ने किसी जिद्दी बच्ची की तरह अपना संकल्प दोहराया "और आपको मेरी मदद करनी होगी। "

इन्द्रजीत को वायदा करना पड़ा था। …।…

गमा मोसी का मामला अभी दूर था । अभी तो खुद रेखा की मंगनी सिर पर थी । और फिर जब मगनी का दिन आया तो वह हो गया जिसकी किसी ने कल्पना ही नहीं की थी।

उस दिन उस 'थ्री-स्टार' होटल का 'मैरिज हाल' मेहमानों से भरा हुआ था। हर तरफ रग ओ नूर की बारिश थी।

नयना , रेखा और इंद्रजीत स्टेज पर आ बैठे थे। प्रेम सागर अभी नहीं पहुचा था। हालाकि उसे भी अब तक पहुच जाना चाहिये था ।

रेखा की नजरें बार-बार उठती और फिर निराश होकर लोट आतीं । इन्द्रजीत भी फिक्र मंद नजर आ रहा था।
 
परेशान बलदेव राज भी था। वह जानता था कि प्रेम सागर और दीपक ने एकसाथ आना था और अभी तक उनमें से कोई भी नही पहुचा था।

मेहमानों कीं बेचैनी भी अब साफ नजर आ रही थी। कुछ सोच बलदेव राज ने इन्द्रजीत के पास जाकर कहा--"तुम्हारी और नयना की रिंग सेरेमनी करा देते हैं । मेहमान परेशान हो रहे हैँ। "

"नही अंकल! अपनी मगनी से पहले मैं अपनी वहन की मगनी की रस्म अदा करना चाहूगा।"

"और अगबान् न करे । " बलदेव राज ने झिझकते हुए कहा-"किसी वजह से प्रेम सागर न पहुचा तब । "

"तो मेहमानों को बगैर मगनी के ही खाना खिला दिया जएगा । " इन्द्रजीत्त ने निर्णायक स्वर मे कहा ।

जब निश्चित समय से एक घन्टा ऊपर हो गया तो चारों तरफ खलबली मच गई। बलदेव राज एक बार फिर इन्द्रजीत के पास आए और बोले

"इन्द्र ! समझ मे नहीं आ रहा कि मामला क्या है? प्रेम सागर न घर पर है न अपने आँफिस में । मैने दीपक को भी फोन कर काटेक्ट करने की कोशिश की है । वह भी कही उपलब्ध नहीं है । उन दोनों ने इकट्ठे ही आना था । मुझें लगता है कि कुछ खास ही घटा है, कहां दीपक भी अपनी रेखा वहन कीं मगनी' को लेकर वहुत खुश था । दीपक भी अपने घर पर नहीँ है और उसके सिनेमा के मेनेजर ने बताया है कि वह आज घर पर आए ही नहीं हैँ। "

"फिर अव... । " इन्द्रजीत्त की तो जैसै आवाज ही नहीँ निकल रही थी । बलदेव राज जल्दी से बोले--"मै खुद जाकर देखता हू ॥ शादी ब्याह के मोके पर देर हो ही जाती । कहीं वह ब्यूटी पार्लर न चला गया हो । " इस मजाकिया टिप्पणी के साथ उन्होने' जेसे मामले की गम्भीरता को कम करना चाहा और फिर वह फोरन ही हाल से निकल गया ।

हकीकतन वह खुद रेखा या इन्द्र से ज्यादा परेशान थे। मेहमान परेशान हो रहे थे कि आखिर 'रस्म' कब अदा की जाएगी । जब एक घन्टा और बीत गया और अंकल बलदेव भी पलटकर न आए और न ही फोन पर उनकी इत्तला आईं तो इन्द्रजीत ने खाना शुरू करवा दिया ।

बिना रस्म के खाना शुरू होने पर सवाल उठे और इन्द्रजीत को इन सवालों का सामना करना पड़ा। बहरहाल, सस्पेंस भरे माहौल में ही मेहमानों ने खाया खाया और मेहमान विदा होने शुरू ही हुए थें कि तभी अकल बलदेव लोट आए । उनका मुह लटका हुआ था । वह यकीनन कोई अच्छी ख़बर नहीं लाए थे ।

"क्या हुआ?" एक तरफ ले जाकर इन्द्रजीत्त ने पूछा ।

”प्रेम सागर को किडनेप कर लिया गया है । " बलदेव राज ने अविश्वसनीय ख़बर सुनाई ।

"किंडनेप ।" यह ख्वर बिजली बनकर इन्द्रजीत्त पर गिरी… "यह आप क्या कह रहे है? उसकी किसी से क्या दुश्मनी है ??"

"उसका ताल्लुक फिल्म इण्डरट्री से है और उस दुनिया में ऐसे अपहरण किसी न किसी अण्डरदर्ल्ड के इशारे पर होते है । दुश्मनी नहीं, फिरौती के लिए खेले जाते हैँ यह घिनौने खेल । यह बात तो में यकीन से कह सक्ला हू कि उसकी किसी से दुश्मनी नहीं हो सकती।"

"कहां से किया गया उसका किडनेप?" इन्द्र 'के माथे पर पसीना चुधिया आया था।

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"उसके घर के बाहर से। "

"प्लीज अंकल मुझे डिटेल बताओ।"

और बलदेव राज ने बताया--"मै जब उसे ढूढत्ता हुआ ग्रीन पार्क वाले बंगले पर पहुँचा तो देखा कि गेट पर ताला पड़ा हुआ था। मुझें वहां देख उनके पडोस की कोठी मे रहने वाली मिसेज बत्रा फौरन बाहर आई। और यह जानने के बाद कि मैं प्रेम सागर के वाकिफकारो में हू । उसने बताया--" प्रेम सागर ने अपनी मंगनी मे चलने की दाबत दे रखी थी । हमने यहा से इकट्ठे ही निकलना था । उस समय पर हम अपनी गाडी से बाहर निकले तो हमने अपने गेट पर से ही देखा कि वह अपने बगले से बाहर खडी अपनी कार की तरफ आ रहे थे , उनके साथ उनका कोई दोस्त भी था और फिर हमारे देखते ही-देखते एक सूमो उनकी गाड़ी के पाम आकर रूकी । और सुमो से तीन रिवाॅल्बर धारी कूदकर बाहर आए । उनमें से दो ने उन्हें अपने रिवाॅल्बरो के निशाने पर धकेलते हुए उन्हें उनकी ही गाड़ी मे ही बैठाया और तीसरे ने ड्राइवर क्रो बाहर खींचकर ड्राइविंग खुद संभाल ली और फिर वे गाडी को ले उडे । सुमो उनके पीछे हो ली । आनन-फानन में नजरो से ओझल हो गये । मेरे हसबैंड ने दौड़कर ड्राइवर को संभाला।"

“कुछ मालूम हुआ उसके साथ उसका वह दोस्त कौन था?" इंद्रजीत ने बात काटते हुए पूछा ।

"पडोसन_ उसे नहीं पहचानती थी पर मेरा ख्याल है कि उसके साथ जरूर दीपक रहा होगा। " बलदेव राज ने कहा-- "उन दौनों ने इकट्ठे ही यहा पहुचना था। यह मुझे मालूम है I“

" वह दीपक ही होगा।" इन्द्र के चेहरे पर तमतमाहट के भाव उभरे वह दीपक ही था अंकल और मै दावे से कह सकता हू कि अपहरण की यह साजिश प्रेम सागर के लिए नहीं दीपक के लिए रची गई थी ।किडनैपर प्रेम सागर जान बूझकर या फिर मजबूरी के कारण अपने साथ ले गए है। क्या उस पडोसी ने इस वारदात की रिपोर्ट पुलिस को की है ?"

"मिसेज बत्रा ने बताया कि उसके हसवैण्ड ड्राइवर के साथ स्टेशन ही गए है। उन्होंने शायद सूमो का नः नोट किया था । "

"मेरी समझ में मामला आ रहा है। हमें पुलिस स्टेशन चलना चाहिए। मै समझ सकता हू कि यह किसका किया धरा है । आओ, चले । "

“पर तुम्हारी मगनी । "

इन्द्रजीत उनकी बात काटते हुए बौला--"अपनी बहन की मंगनी से पहले में अपनी मंगनी कैसे कर सकता हू । आप … चलें ।"

"और यह मेहमान !"

"मेहमान खाना खा ही चुके है । इन्हें गगा मोसी देख लेंगी । उनसे कह देते हैँ ....॥" वे गंगा मौसी के पास पहुचे और पीछे कीं जिम्मेवारी उन्हें सौंपते हुए बलदेव राज बोले---

"गंगा-कोई मेहमान खान खाये बिना न जाये, यह आपने देखना है । मै इन्द्र के साथ थाने जा रहा हूं !"

" हे !! भगवान, खैर तो है।" बलदेव राज ने उम्हें संक्षेप में अपहरण की कहानी सुनाई और फिर इन्द्र के साथ बाहर निकल गया ।

मगनी स्थगित करने के सिवाय अब कोई चारा नहीं था। वैसे भी यह बात छिपने बाली नही थी और इस बात को छिपाने की जरूरत भी नहीं थी । सबको मालूम हो गया।

इस बारदात का सबसे ज्यादा असर रेखा पर पडा था। वह हसती-हसती एकदम खामोश हो गई । इस बात को सुनते ही वह एकदम साकते हो गई।

नयना उसके बराबर ही बैठी थी । उसने उसे फोरन सम्भाल लिया। नयना को भी इस महत्वपूर्ण व खूबसूरत समारोह मे विघ्न पडने का बहुत अफसोस था , लेकिन वह इतनी स्वार्थी भी न थी कि अपनी उँगली मे मंगनी की अंगूठी पहनकर बैठ जाती ।

बैसे भी वह रेखा को अब बहुत चाहने लगी थी। रेखा का दुख अब उसका अपना दुख था।

रेख ने सम्भाल लिया । मेहमानों क्रो विदा कर वह भी नयना, गंगा मोसी और बलदेव राज के परिवार के सदस्यों के साथ क्रोठी पर लोट आई ।इन्द्रजीत्त की ही तरह उसका दिल भी यही कह रहा था कि अपहरण प्रेम सागर का नहीं, बल्कि जरूर दीपक का हुआ है और यह अपहरण भी उसके खलनायक कमीने चाचा रमाकात ने कराया है ।

दीपक के प्रति अब रेखा या इन्द्रजीत के मन में कोई घृणा कोई वैमनस्य नहीं रहा था । दीपक खुद ही दुश्मनो की पक्ति से निक्ल आया था और इन लोगों ने उसे दुत्कारा नहीं था । जाहिर है, दीपक का रेखा व इन्द्र से जा मिलने कीं खबर उसके बाप से छिपी न रही होगी और उस जैसे हिंसक प्रवृति के शख्स को यह केसे बर्दाश्त हो सकता था?

पर प्रेम सागर ।। क्या उसका अपहरण महज इस कारण हुआ था किं वह उस दुर्भाग्यपूर्ण घडी में दीपक के साथ था या फिर प्रेम सागर को भी जान वूझकर निशाना बनाया गया था । जाहिर था-रमाकांत रेखा व इन्द्रजीत को खुशियाँ बटोरते कैसे देख सकता था, पर यह गुत्थी रेखा को परेशान किए हुए थी और इन्द्रजीत को भी ।

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इन्द्रजीत और रेखा का अन्देशा गलत नहीं था।

दीपक का, अपने बेटे का अपहरण करने कीं साजिश रमाकात की ही थी । उसी के भाडे के टट्टू दीपक को किडनैप करने पहुचे थे।

सावनपुर की अपनी हवेली के बरामदे में रमाकांत बडी बेचैनी से टहल रहा था। उसकी नजरें बार-बार अपनी कलाई घडी, पर पड़ रही थीं । उसके बाकी दोनों बेटे सूरज और विजय भी अपने कमरों से निकल आए थे। उन्हें भी दीपक के आने की इन्तजार थी। इस बात की सूचना उन्हें मिल ही चुकीं थी कि दीपक को उसके एक दोस्त के साथ अपने कब्जे में कर लिया गया हे।

थोडी. देर बाद ही हवेली का गेट खुलने की आवाज आई । दो गाडिया एक लम्बी विदेशी कार व एक सूमो अंदर दाखिल हुई I रमाकांत के होंठों पर मुस्कान नाच गई । वह हवेली के अन्दर चला गया और अपने कमरे मे जाकर उस ऊँची कुर्सी पर बैठ गया जिस पर वैठकर वह को खुदा समझा करता था।

कुछ देर बाद राहदारी में भारी कदमों की आबाज आईं-फिर खुले दरवाजे सै सबसे पहले दीपक अन्दर आया I उसके पीछे दो रिवाल्वरधारी थे। उनके पीछे सुरज और बिजय थे।

"बाबा .I " सुरज ने अन्दर आते ही बताया--"‘यह लोग इसके साथ इसके एक दोस्त को भी उठा लाए है। क्या उसे भी यहां ले आये?"

"दोस्त को! " रमाकात ने अपनी सुर्ख आखो से रिवाल्वरधारियों को घूरा।

"मजबूरी थी, मालिक । " उनमें से एक बौला--"ये दोनों इकट्ठे कही जा रहे थे I हमने उसे पीछे छोडना ठीक नहीं समझा । ओह । यह अच्छा ही हुआ। हमें उसके पास से एक रिवाल्वर मिली है। वह कार भी उसी की है।”

"औह । " रमाकांत ने गहरी सास ली… "कोई तोप ही होगा इसका वह हमदर्द । खैर, उसे बाद में देखेंगे । हां बेटे ! " उसने अपनी खूनी आखें दीपक पर टिका दी--"कौन है तुम्हारा यह दोस्त?"

"प्रेम सागर और वह सचमुच ही एक तोप है । " दीपक निर्भय, बल्कि गुस्से में बोला--"तुम्हे यह पगा महगा पडेगा, बाबा! प्रेम कीं मगनी थी आज I हम रिंग सेरेमनी में जा रहे थे। उसे जाने दो तो बेहतर है । "

" मंगनी'? प्रेम सागर से ! " रमाकांत के माथे पर सिलवटें उभरी "ओह तो यह है रेखा का होने बाला मगेतर अजीब सयोग है । तौ हमारा बेटा, रेखा की 'रिंग सैरेमनी' मे तशरीफ ले जा रहा था । मुबारक हो । आपको अपनी वहन की मगनी मुबारक हो।"

"बाबा! यह आपने अच्छा नहीँ किया । " दीपक अपने रोष को दबाते हुए बोला I

"और यह तूने अच्छा किया है कि बाप से पूछे बिना इन्द्रजीत और रेखा से रिश्ते बना लिए । " रमाकात ने भी सख्त लहजे मे कहा था I

"मैं अपना अच्छा बुरा खूब समझता हूं।"

"तभी एक ऐसी लडकी. को अपनी बहन बना लिया है जिसके बाप का भी पता नहीं । "

"रेखा मेरे ताया कृष्णकांत' क्री बेटी है I "

”औह, ताया कृष्णकांत । " रमाकांत के स्वर मे व्यग भर आया--"तुझे शायद पता नहीं कि तेरे इस ताया के यहा जो बेटी पैदा हुईं थी, वह मर चुकी है। हमारे पास इसके सबूत मौजूद है। "

"मै सब जानता हूं। " दोपक बोला---" यह भी जानता हू कि मेरे ताया को किसने कत्ल किया है । "

”अच्छा ! " रमाकान्त ने उसे घूरते हुए पूंछा-- "तू और क्या-क्या जानता है...?"

"मैं यह भी जानता हू'किं आज से बीस बाइस साल पहले मेरे भाई इन्द्रजीत को मरवाने की साजिश किसने की थी?” दीपक ने अपने बाप की आखो मे आखें डालकर जवाब दिया ।

"सूरज...बिजय...सुन रहे हो भई ।" रमाकांत ने अपने दीनो बेटों की तरफ देखा व फिर दीपक की तरफ़ मुडत्ते हुए पूछा--"वह किसने की ?"

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“ आपने बाबा! आपने । " दीपक घृणास्पद लहजे में वोला--”आपने वड़े जुल्म किए हैं उन लोगों पर । "

"सुन रहे हो तुम दोनों! " रमाकांत ने फिर अपने बेटों की तरफ देखा "हमने बडे जुल्म किए हैं उन लोगों पर I यह तो अपना बेटा लगता ही नहीं । पता नहीं किस वक्त की पैदाइश है? इसमें जमींदारों वाली कोई बात नहीं है । यह बात मैं तुम दोनों को हमेशा कहता आया हू इसीलिए मेने इस मुसीबत को कुछ दे-दिलाकर यहां से निकाल दिया था। मुझे अगर यह मालूम होता कि दिल्ली जाकर यह हमारे दुश्मनों से मिल जाएगा तो मै इसे कभी वहां न जाने देता । भईं, यह तो बहुत ही बेवकूफ साबित हुआ । " वह दीपक से मुखातिब हुआ "अब तू ही बता । मैं तेरा क्या करू? "

"मै तुम लोगों से कोई नाता नहीं रखना चाहता।" दीपक बोला--"मुझे वापिस जाने दो । "

"ताकि हमारे उन दुश्मनों के हाथ पक्के कर सको I भई खूब ।। बहन बनाया और फिर उसकी शादी भी अपने ही एक दोस्त से करवा रहे हो कि वह नागिन एक दो सपोले पेदा करके हमारे लिए और मुश्किले पैदा करे । विजय इस बेवकूफ को कुछ अकल सिखा और जब तक इसे अक्ल न आ जाये इसे हवेली में केद रख । जा-इस उल्लू क्रो मेरे सामने से ले जा । "

"और बाबा ! बो इसका दोस्त ।" विजय ने पूछा।

"वह भी अभी हवेली का मेहमान रहेगा। मैं सोचता हूं उसके बारे में कुछ. .. । " कहते हुए रमाकान्त खलनायकों की तरह चलता हुआ कमरे से निक्ल गया।

"आओ , चलो भाई । " बिजय दीपक के पास आकर बोला ।

"बिजय, मै कहीं नहीं जाऊंगा' ।"

" भाई आपने कही नहीं जाना । " विजय भी नाटकीय अदाज मे बोला "बस, सिर्फ अपने ही कमरे तक जाना है। वहां चलकर आप-आराम फरमाये । "

"नही बिल्कुल नहीं । मैं इस मनहूस हवेली में एक क्षण भी नहीं रहूगा । मैं इसी वक्त वापिस दिल्ली जाऊँगा I मेरे दोस्त का लौटना जरूरी है I वहा सब हमारे लिए परेशान हो रहे होंगे । " दीपक ने दरवाजे की तरफ कदम बढाए।

पर तभी विजय तेजी से चलकर उसके सामने आ गया और हाथ फैलाकर उसका रास्ता रोक लिया। इसके साथ ही उसने अपने भाई सूरज को कोई इशारा किया ।

सूरज नै इस इशारे को समझते ही जोर सै आवाज लगाईं--"कालू बून्दे-नाटे... । "

उसकी आवाज सुनकर पलक झपकते ही तीन खूंखार बन्दे भीतर आ गये। वे तीनों ही सशस्त्र थे I तीनों अदर आकर विजय के पीछे खडे हो गए। उनमें से एक बोला---

"हुक्म सरकार... । "

"अब क्या कहते हो भाई?" विजय ने मुस्कराकर दीपक की तरफ देखा ।

"यह सब ठीक नहीं कर रहे। "

"ठीक तुम नहीं कर रहै भाई । दुश्मनो से जा मिले हो I आप बहुत सीधे आदमी हो। बौ बहन भाई तुम्हें लूटना चाहते है। तुम्हें उल्लू बना कुछ भी करा सकते है। हम अपनो का तमाशा बनते नहीं देख सकते। आप अपने कमरे में चलें. . . । "

दीपक कुछ नहीं बोला । उसने सिर झुका लिया और कुछ सोचते अपने कमरे का रूख किया।

हवेली का यह कमरा उसका अपना था । उसने कमरे में दाखिल होकर चारों तरफ निगाह डाली और फिर एक कुर्सी पर ढेर हो गया । कमरे में सब ज्यों का त्यों था । दीपक को यह कमरा छोडे बरसों हो गए थे और एक लम्बे समय तक कमरा बन्द रहने की वजह से यहां धूल मिट्ठी होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं था । कमरे मे हर चीज शीशे की तरह चमक रही थी I अभी हाल ही में कमरे की सफाई कराई गई थी । यानि कि इन्हें दीपक के अपहरण में सफलता का पूरा पूरा यकीन था ।

दीपक चिंन्तित्त था। अपने से ज्यादा प्रेम सागर को लेकर चिन्तित था। वे दरिन्दौ के कब्जे में आ फसे थे जो कुछ भी कर सकते थे। दीपक को एकाएक दिल्ली की याद आई। उसके दिल की धडकने तेज हो गई। उसके साथ ही प्रेम सागर भी लपेटे में आ गया था । वे निश्चित वक्त पर होटल नहीं पहुच सके थे। जाने वहा क्या हुआ हो?प्रेम सागर के वहा न पहुचने' पर सारा प्रोग्राम ही गडबडा… गया होगा ।

वह परेशानी की हालत में उठकर टहलने लगा । वह अब प्रेम सागर के बारे में सोच रहा था । रेखा और इन्द्रजीत की परेशानियों के बारे में सोच रहा था ।

करीब पन्द्रह मिनट बाद दरवाजे पर आहट महसूस हुईं जैसे ताला खोला जा रहा हो। फिर दरवाजा खुला और एक नोकरानी खाने की ट्रे लेकर अन्दर आई । उसने ट्रे मेज पर रखी व बड़े आदर सै बोली

"खाना खा लें सरकार । " दीपक कुछ नहीं बोला । नौकरानी वापिस चली गई और दरवाजा फिर बन्द हो गया ।

दसरे दिन सुबह जब बिजय एक नोकर के साथ नाश्ता लैकर आया तो उसने देखा कि दीपक सूट पहने ही बेड पर पडा है l बिजय ने उसे हिलाया "भाई नाश्ता कर लो। उठ जाओ। सुबह हो गई है ।।"

दीपक ने आखें खोल दीं और उठकर बैठ गया I उसने विजय को घूरकर देखा ओर बोला "मेरे दोस्त का क्या हुआ? "

"वह सकुशल है। नाश्ता कर रहा है । हमारा मेहमान है। बेचारा! " विजय के होंठों एक मुस्कान नाच गई--"मगनी की हसरत दिल ही में रह गई बेचारे के । भाई, यह तो बताओ तुम्हारी यह रेखा बहन क्या सचमुच बहुत खूबसूरत है? "

"मेरी समझ में नहीँ आता कि तुम आखिर चाहते क्या हो?"

"आ जाएगा। वह भी समझ में आ जाएगा। फिलहाल तो अपनी कहो तुम क्या चाहते हो ?? तुम्हारा यह भाई तुम्हारी क्या सेवा का सकता है?"

"मुझे टेलीफोन चाहिये । " दीपक बोला ।

विजय ने हंसकर कहा-- "क्यों क्या पुलिस क्रो फोन करने का इरादा है?"

"बेकार बातें मत करो I " दीपक सर्द लहजे में बोला "मुझे रेखा से बात करनी है । चाहे तुम खुद मुझें नम्बर मिला कर देना । "

"बाबा से पूछना पडेगा । " विजय बडी मासूमियत से बोला ।

"यह तुम बाबा के इतने आज्ञाकारी केसे बन गए?" दीपक ने मुह बनाते पूछा ।

"मजबूरी है भाई । " बिजय बोला व हंस दिया--"पर मेरी समझ में नहीं आत्ता कि आखिर तुम उस इन्द्रजीत्त और रेखा के चक्कर मे कैसे फस गए? दुश्मनों से हाथ मिलाना अक्लमदी' तो नहीं होती । "

"तुम लोगों के पापों का प्रायश्चित करने के लिए... । " दीपक ने स्पष्टवादिता सै काम लेते कहा ।

"ओह पर भाई, आप भगवान के लिए पाप पुण्य पर भाषण देना न शुरू कर देना । हम दुनिया में इसलिए नहीं आए हैँ पाप-पुण्य का हिसाब लेकर बैठे जाएं । दो दिन की जिन्दगी है-अगर वह भी ऐश में न गुजारी तो फिर इस जिन्दगी का क्या फायदा?"

"जिस तरह की जिन्दगी तुम लोग गुजार रहे हो, देखना एक दिन इसका फल मिलेगा तुम्हें और यह फल कोई अच्छा नहीं होगा, विजय।"

"भाईं! हम तो सिर्फ गुलाम हैँ। देखते नहीँ कि बाबा जमीन जायदाद पर साप' बने बैठे हैं । बंधी बधाई रकम मिलती है । तुम तो फिर भी खुशकिस्मत हो कि दिल्ली में ऐश करते हो बाबा ने तुम्हें इत्तना कुछ दे दिया... l "

"मुझें जो कुछ उन्होंने-दिया है, वह मेरे हिस्से की जायदाद का एक पस्सेन्ट भी नहीं है ।यह बात तुम अच्छी तरह जानते हो ।

बिजय हस दिया........बोला--"तुम तो दरवेश आदमी हो । तुम्हे जभीन-जायदाद की इच्छा ही नही "

"जरूरत से ज्यादा की ख्वाहिश ही इंसान को शैतान बना देती है।"

"और शेतान को क्या बना देती है भाई?" विजय ने बात निकालते पूछा--"अब हमारी गिनती इन्सानो में तो हो नहीं सकती ।"

"तुम मतलब की बात करो । " दीपक ने बहस से किनारा करते हुए कहा--”मैने तुमसे कहा है कि मैं रेखा से बात करना चाहता हू। तुम इसका बन्दोवस्त करो । ”

"कमाल है । " विजय बोला-"तुम्हारा वह दोस्त प्रेम सागर भी रेखा सै बाल करना चाहता है। वह रेखा को अपनी सलामती की खबर देना चाहता है। तुम भी यही चाहते हो । मैरे दिमाग मे एक आइडिया आया है।"

"क्या आइडिया? "

”यही कि क्यों न में तुम्हारी इस बहना और तुम्हारे उस दोस्त की होने वाली पत्नी को मै खुद फोन करू? तुम्हारी सलामती की खुशखबरी दूं और साथ ही फिरौती की माग भी कर दु। "

"क्या?" चीख ही तो उठा दीपक "फिरौती उसे क्या ज़रूरत पडी है फिरौती देने की?“

"अपहरण और फिरौती का तो चोली-दामन का साथ होता है भैय्या। प्रेम सागर खुद भी मालदार है और वह रेखा का होने वाला पति है...अपनी जिन्दगी के लिए उसे भी तो कुछ कुर्बानी करनी चाहिये। "

"तुम्हारा यह जुल्म तुम्हें जेल की हवा खिला सकता है । तुम नहीं जानते यह प्रेम सागर कितनी बडी चीज है। "
 
"बाबा सै बडी तो होगी नहीं I है भी तो अगुवा के साथ-साथ फिरौती वसूली का जुर्मं भी अगर आमद होगा तो बाबा पर ही तो होगा। अच्छा है, उन्हें काले पानी की सजा हो । पिण्ड तो छूटे हमारा।"

"तुम्हें फिरौती चाहिये?"

"अगर तुम्हे आजादी चाहिये? " विजय बडा. ढीठ साबित हो रहा था।

"हा, मुझे आजादी चाहिये । " दीपक ने उसे घूरा--"अपनी भी और अपने दोस्त प्रेम सागर की भी I "

"ठीक है तो फिर कुछ सोचते है । "

"फिलहाल टेलीफोन के बारे में सोचो। "

"बिजय कुछ सोचते हुए बोला--भाई तुम कपडे बदलकर मुह हाथ धो लो नाश्ता कर लो । फिलहाल मै हवेली का एक चक्कर लगाकर आता हूं। टेलीफोन इस कमरे में नहीं आसकता । फोन मैं तुम्हें अपने कमरे से करवाऊगा, लेकिन इस मामले की हवा सूरज भाई या उस बूढे को नहीं लगनी चाहिये। समझ-गए न भाई?"

"ठीक है । " दीपक उठ खडा. हुआ ओंर तोलिया लेकर बाथरूम में जा घुसा।

बह फ्रेश होकर निकला तो बडे जोर की भूख लग रही थी । उसने डटकर नाश्ता किया व बिजय की इन्तजार करने लगा। दोपहर को एक नौकरानी खाना लेकर आई और विजय का सन्देशा दे गई कि वह चार बजे तक आएगा और विजय ठीक चार बजे आ पहुचा । यह बह वक्त था, जब रमाकात आराम फरमाया करते थे। आराम तो सूरज भी करता था, लेकिन वह आज सुबह ही कहीं चला गया था ।

लाइन क्लीयर थी, लेकिन विजय अपना इत्मीनान कर लेना चाहता था। उसने दीपक सै पूछा "आपने रेखा से क्या बात करनी है?"

"सिर्फ यह कहना है कि हम सकुशल है I"

"आपके ख्याल में क्या उसे आपके अगुवा की इत्तला हो गई होगी ?"

"जरूर हो गई होगी । " दीपक बोला "बैसे तो शायद न भी होती, लेकिन तब प्रेम सागर व रेखा कीं मगनी' का प्रोग्राम था । उन लोगों को प्रेम सागर की इन्तजार रही होगी और फिर तुम्हें शायद यह नहीं मालूम कि प्रेम सागर के एक पडोसी ने हमारा अपहरण हौते देख लिया था । उन लोगों का शक सीधा तुम लोगों पर ही होगा और वे खामोश बैठने वाले नहीं है' । "

"शक होने दो लेकिन आप इस बात का ख्याल रखेंगे कि उसे यह आभास भी होने देने की कोशिश नहीं करेगे कि आप इस वक्त कहा है और यह सारा क्या मामला है?"

"ठीक है । मैं वायदा करता हूं। "

"आप सिर्फ एक ही बात कहेगे और उससे ज्यादा मैं आपको नहीं बोलने दूंगा । "

"ठीक । " दीपक ने उसक्ती यह वात भी मान ली I

"तो आ जाए' फिर ।" बिजय उठता हुआ बोला।

बिजय उसे अपने ड्राइगरूम में ले आया और टेलीफोन उठाकर अपनी गोद में रखते हुए बोला- "हां, भाई! नम्बर बोलो । "

दीपक ने नम्बर बताया। उसने नम्बर डायल किया । लाइन पहली कोशिश मे ही मिल गई। दो घन्टिंया बजने के बाद उधर नौकर रामू ने कॉल रिसीव की ।

"मुझे रेखा जी से बात करनी है । " बिजय बोला--"उन्हें फौरन बुलाए।"

"जी जरूर । आप होल्ड करें । " रामूं नै कहा ।।

"किसी मर्द ने फोन उठाया था वह रेखा को बुलाने गया है। " विंजय ने दीपक को बताया । तभी उधर से एक नारी स्वर सुनाई दिया----"हैल्लो। "

" आप कौन हैं? क्या आप मिस रेखा है?" विजय ने पूछा ।

" जी...मै रेखा बौल रही हूं। " उधर से घबराकर कहा गया।

"लीजिए अपने दीपक भाई से बात कीजिए... । " यह कहकर विजय ने रिसीवर दीपक की तरफ बढा दिया। टेलीफोन उसने अपनी गोद में ही रहने दिया था और अपनी ऊगली क्रेडिल पर रख ली ताकि लाइन काट सके।

"रेखा हम जहां भी हैँ बिल्कुल ठीक हैं। भगवान ने चाहा ती जन्दी ही आप तक पहुच जाएगे' । किसी प्रकार की चिंता न करना । "

"बस I " कहत्ते हुए बिजय ने क्रैडिल दबाकर लाइन काट दी । दीपक उधर से रेखा का जवाब भी नहीँ सुन सका। उसने रिसीवर विजय को थमा दिया ।

"हो गई रेखा वहन से बात l " विजय रिसीवर रखते हुए बोला । "विजय मैं शुक्रगुजार हूं। "

"यह किया है । अगर 'जेलर साहब' यानि अपने बाबा को मालूम हो गया कि मैंने उसके 'कैदी' को टेलीफोन की सुविधा उपलब्ध कराई है तो वह मेरी गर्दन ही उडा देगे ।" बिजय कुटिल मुस्कान के साथ बोला ।

"तुम बाबा से इतने डरते क्यो हो...? " कुछ सोच पूछा दीपक ने।

"आप बाबा को नहीं जानते, भाई! "

"हमें जितना उन्हें जानता हूं उससे ज्यादा जानने की ख्वाहिश भी नहीं है।" दीपक बोला--"लेकिन एक बात जरूर कहूगा कि उनके पापो की हाडी' भरने में अब ज्यादा देर नहीँ है।"

"मेरा ख्याल है कि अपने बाबा 'शतक' पूरा किए बिना विकट नहीं छोडेंगे I " बिजय ने हंसकर कहा--- "आओं भाई! चलो अपने कमरे मे। बात का वक्त खत्म हो गया है । " दीपक चुपचाप कमरे में आ गया I विजय रात्त क्रो आने का वायदा करके दरवाजा बन्द करके चला गया।।

दीपक रात देर से ही सो पाया था। वह अपने मौजूद हालात व प्रेम सागर के बारे में सोचता रहा था। प्रेम सागर को एक अलग कमरे में बद' किया गया था और दीपक उससे मिल भी नहीं पाया था।

बहरहाल, जेसे जैसै नोंद आई थी और सोने से पहले उसने बहुत-सै फैसले ले डाले थे I

और फिर ।

वह जाने रात का कौन-सा पहर था कि अचानक दीपक की आख खुल गई। उसका गला सूख रहा था। उसने उठकर पानी पिया । गला तर हुआ तो हवास भी बहाल हुए । उसने तकिये के नीचे से अपनी क्लाईं घडी निकाल वक्त देखा इस वक्त एक बज रहा था ।बह्र उठकर खिडकी, की तरफ आया। उसने खिडकी. खोली तो एकदम पखो की फडफडाहट सुनाईं दी । जैसे कोई विशाल पक्षी किसी निकट के पेड़ से उड़ा हो। रात अंधेरी थी । सर्दी का मौसम दम तोड… रहा था । फिर मी हल्की सी ठण्डक थी ।

दीपक ने आखे फाड़ फाडकर बाहर देखा लेकिन आधैरे में कुछ नजर नहीं आया खिडकी मे सलाखें लगी थी। उसने दो सलाखों को पल्ला… ताकत से हिलाया, लेकिन सलाखें टस सं मस नहीं हुई।

वह अभी खिडकी बन्द कर ही रहा था कि पखौ की फडफडाहट फिर सुनाई दी । यू लगा जैसे कोई पक्षी पेड. पर आकर बैठा हो । फिर कुछ ही क्षणों बाद आवाज आनी बंद हो गई। यह ऊल्लू के बोलने की आवाज थी। बडी… अजीब, रहस्यमय व सनसनीखेज सी ।

दीपक ने सामने नजर डाली तो उसे दो गोल-गोल आखें चमकती नजर आई । वह काप उठा ।

उसने फोरन खिडकी बन्द कर दी। खिडकी. बन्द करते ही उसे यूं लगा जेसे बहुत-सै उल्लूओ ने एक साथ र्चीखना आरम्भ कर दिया हो। बह वेड पर अकार बैठ गया ।

वह मनहूस आवाजें निरन्तर आ रही थीं । यह बड़ा अशुभ संकेत था । जग जाहिर है कि जिस जगह उल्लू बौलने लगते हैं वहा वीरानी व वहशत दरसनी शुरू हो जाती है । दीपक सोचे बिना न रह सका । क्या इस हवेली का आखिरी वक्त आ गया है ?

वह अभी यह सब सोच ही रहा था कि दरवाजे पर खडख़डाह्रट_. महसूस हुई।

दीपक की नजरें दरवाजे की तरफ उठ गई । कौन ही सकता है? हालाकि बिजय ने रात को ही आने क्रो कहा था-ओंर वह अभी तक आया नहीं था । क्या अब वही आया है? रात के एक बजे जब हवेली अंघेरे मे डूबी हुईं है और उल्लू अपनी मनहूस आवाजों में बोल रहे हैं । यह का क्रोन-सा वक्त है भला?

अन्तत्त: दरवाजा खुला तो दीपक चोंक उठा । बिजय की बीबी कामिनी मुस्कराती हुई अन्दर प्रवेश कर रही थी ।

लेकिन वह अकेली न थी उसके पीछे ही फोरन विजय का चेहरा भी दिखाई दिया था । विजय ने अन्दर आकर दरवाजा वन्द कर दिया ।

"भैय्या जाग रहे थे । " कामिनी मुस्कास्ती हुई उसकी तरफ बढ़ी।

"भाई कामिनी आपसे मिलने की जिद्द कर रही थी । मैने कहा कि दिन के उजाले में तो यह मुमकिन नहीं रात क्रो चलेंगे । सो, यह मुझें उठा लाई। " बिजय ने बिसात बिछाई ।

"ओह, आओं कामिनी-बैठो । " दीपक ने कुर्सी की तरफ इशारा किया-- "बस, अभी थोडी देर पहले मेरी आख खुली थी । उठकर पानी पीया तो बाहर से उल्लूओं की मनहूस आवाजे आने लगीं । यह उल्लू यहां हवेली में केसे आ गए? जहा उल्लू बोलने लगत्ते है उस जगह क्रो वीरान होने ज्यादा देर नहीँ लगती ।"

"यही तो मै भी कहती हू पर यह माने तब ना । " कामिनी ने शिकायती नज़रों से विजय की तरफ देखा--"भैय्या ॥ ये आवाजें कईं दिनों से सुनाई दे रही हैं । मुझे बड़ा डर लगता है । सभी जानते है कि उल्लू बड़ा मनहूस पक्षी हे । "

"क्या बेवकूफों वाली बातें कर रही हो । " बिजय बौला-"मै भला क्या करू? उन्हें बोलने से केसे रोकू'? "

"अच्छा, छोडो यह बेकार बातें । मुझें भैय्या से बात्ते करने दो।" वह दीपक की त्तरफ घूभी--"हां भैय्या अपनी सुनाओ। मजे में तो हो । अच्छा किया जो यहां से पिण्ड छुडा. लिया । अब तो अपने भाई इन्द्रजीत्त ओर बहन रेखा से खूब निभ रही है । यह बता रहे थे कि कल उन दोनों की मगनी थी, पर बाबा ने सव गुड गौवर कर दिया ! साथ-साथ रेखा के मगेतर को भी उठवा लिया । अब क्या?"

"बाबा ने अपनी बर्बादी को दावत दे डाली है ।" दीपक फुफकारा--"बुढापे मे उनकी मति मार रखी है।"

"सुना । " कामिनी ने बिजय की तरफ देखा-- "यही मै भी कहती हू ना। " वह फिर दीपक से मुखातिब हुई "खैर, और ! सुनाओ। तुमने भी कोई लडकी. बडकी, पसन्द की या नहीं । अब तो बड़े-बड़े लोगों में उठना बैठना है तुम्हारा वह भी दिल्ली जेसे शहर के बडे लोगो' में I"

"पसन्द कर ली है I " दीपक यूं ही बोल उठा- ”जल्दी ही शादी भी कर रहा हूं।"

"बधाइ हो । " कामिनी ने आखै नचाई--"आप अपनी शादी में मुझे तो बुलाएगे' ना?"

"शादी में तो उस वक्त बुलाऊगा जब तुम लोगों की कैद से आजाद होऊगा । " दीपक बोल उठा ।

"तो भैय्या, यह कोन-सी बडी. बात है?" कामिनी को जेसे अपने दिल की बात कहने का मौका मिल गया था " आप जमीनों के कागजात्त पर दस्तखत कर दें फिर आजादी ही आजादी I "

"भाई, बात यह है कि आपको जभीन जायदाद से कोई दिलचस्पी है नहीं । मोटी रकम हथिया ली बाबा से और शहर में अपना धंधा जमा लिया है । भाई, आप ऐसा क्यो नहीं करते कि... I " विजय कुछ कहते कहते रुक गया-फिर उसने अपनी बीवी की तरफ देखा और कहा "तू बोल कामिनी । "

दीपक ने भी कामिनी कीं तरफ देखा और उसने अपनी इस भाभी की आखों' में हवस व लालच कीं चमक साफ साफ देखी । दीपक को अपनी तरफ देखते पाकर, कामिनी के होंठों पर मुस्कान तैर आईं और वह बोली ---

"बात यह है भैय्या कि यह दुनिया कुछ लो, कुछ दो के उसूलों पर चल रही है । आपको आजादी चाहिये हमें आपका हिस्सा चाहिये । आप अपने हक से हाथ खीच लें । अपना हक हमारे सुपुर्द कर दें । हम आपको आजादी देते हैं। "

"बाह कामिनी बहुत खूब । तुम तो अपने शौहर से भी दो हाथ आगे निक्ली ।"

"क्या कहू भैय्या बच्चों के लिए आखिर सब सोचना ही पडता है। इन्हें तो अपने बच्चों के भविष्य की कोई फिक्र ही नहीं। " कामिनी ने बडी. ढिठाई से जवाब दिया ।

"मुझे मजूर है I " दीपक ने पूर्ण गम्भीरता से जवाब देकर सब को चौंका दिया ।

"ऐ क्या कहा?" विजय को तो जैसे यकीन ही नहीं आया था। दीपक इतनी आसानी से मान जाएगा। वह सोच भी नहीँ सकता था ।

"मैंने कहा कि मुझें मजूर है I " दीपक बोला--"मुझे जो मि ल चुका है, मैं उसी में सन्तुष्ट हूं लेकिन एक बात याद रखना विजया अपने हक को छोडने. वाले कागजात पर मैं यहां इस हवेली में साइन नहीं करूगा । "

"फिर कहा करोगे?”बडी बेचैनी से कहा विजय ने ।

"दिल्ली में-अपने घर में बैठकर मेरी यह शर्त मजूर हो तो ठीक है, वर्ना तुम जो चाहे करो। "

"ओह शायद तुम यह समझते हौ कि मैं तुमसे पेपर्स भी साइन करा लूगा' और यहां सै जाने भी नहीं दूगा । "

"हा', मै यही समझता हूं।" दीपक ने साफ शब्दों में कहा ।

"और भाई, अगर तुम अपने शहर में जाकर बदल गए-तुमने दस्तख्त करने से इकार' कर दिया । फिर क्या होगा?"

"विजय, तुम जानते हो कि मैं ऐसा नहीं करूगा। मैं अपने वायदे सै फिरने वाला आदमी नहीं हू | "

विजय भी जानता था कि उसे यह चांस लेना ही पड़ेगा । विजय एकदम बोला---" मै यह बात जानता हूं तो फिर बात पक्की ?"

उसने अपना पंजा आगे बढ़ा दिया ।

“बिल्कुल पक्की I " दीपक ने उसका हाथ थाम लिया ।

"अच्छा तो फिर मैं चलता हूं। सुबह चार बजे आऊगा I तैयार रहना। हम यहा' से निकल चलेंगे । "

"हमारे साथ मेरा वह दोस्त भी होना चाहिये । "

"अरे हा' । " बिजय ने उसकी तरफ देखा, फिर मुस्करा दिया--"अपने चक्कर में मै उसे तो भूल गया था I ठीक है वह भी हमारे साथ ही चलेगा। "

विजय अपनी बीबी के साथ लोट गया ।।

दीपक को हालत की इस करवट की तो कत्ई उम्मीद नहीँ थी। वह सोच भी नहीं सकता था कि उसे यू आसानी से मुक्ति मिल जाएगी । वह अपने बाप की फितरत से वाकिफ था I उस दरिन्दे की नजर में तो अपने बेटे की भी कोई कीमत नहीं थी । उसके बाप को तो यह भी बर्दाश्त नहीं हुआ था कि उसका बेटा अपने चाचाजाद ‘भाई-बहन के पाले में चला जाए । दीपक जानता था कि उसका अपहरण उसको खत्म कराने को ही किया गया है क्योंकि उसका बाप अपने रास्ते के काटे इसी एक हल के साथ निकालने के पक्ष में रहता था ।पर बिजय व उसकी लालची बीबी ने दीपक के लिए हालात्त आसान बना दिये थे।
 
दीपक सोचता रहा कि उसे अब अगला कदम क्या उठाना है-- जाहिर था बिजय ने दिल्ली पहुंचकर' पेपर्स साइन करने की उसकी बात यू ही नहीँ मान ली थी । उसने भी अपना कोई जाल यकीनन फैला रखा होगा ।

बहरहाल, विजय ठीक चार बजे आ पहुचा' । प्रेम सागर उसके साथ था I प्रेम सागर मुस्कराते हुए ही दीपक के गले मिला था । वह कतई चिन्तित्त नहीँ था और इन हालात से लुफ्त लेता नजर आ रहा था ।

वे दोनों विजय के साथ हवेली के एक गुप्त द्वार से बाहर निक्ले I प्रेम सागर की गाडी दरवाजे पर मौजूद थी । ड्राइविंग सीट पर शक्ल से ही खतरनाक दिखता एक व्यक्ति बैठा था । एक और शख्स भी ड्राइवर के साथ वाली सीट पर आ बैठा था । वे तीनो' पिछली सीट पर थे।गाडी_चल पडी।

कुछ दूर निकल आने के बाद दीपक ने कुछ सोच पूछा--"विजय, क्या बाबा को हमारे यहा से जाने का इल्म है?"

"नही । उन्हें अगर मालूम होता तो हमें खुफिया रास्ते से निक्लने की क्या जरूरत थी?"

दीपक का अपना भी यही अदाजा था कि बिजय यह खेल अपने तौर पर पर खेल रहा है । वह अपने बाप को भी डबल क्रास कर रहा था । अपनी अलग खिचडी पका रहा था ।

”पर विजय, यह बात छिपी तो रहेगी नहीं । " दीपक ने विजय को उसकी पोजीशन का अहसास कराना चाहा "उन्हें मालूम हो गया तो फिर क्या होगा ।.”

"तुम बेफिक्र रहो । " बिजय ने पूर्ण निश्चिन्तता के साथ कहा "बाबा को मैं अब देख लूगा । उनसे अब दो हाथ करने का वक्त आ गया है । "

"बाप से लडोगे_।"

"जब कोई बाप हक न दे तो फिर हक छीनना पडता है। यह पाठ उनका ही पढाया हुआ है। वहुत गुलामी हो गई उनकी भाई । " विजय के लहजे में कुछ ऐसा था कि बाप सै लाख अनबन होते हुए भी दीपक ने अपने भीतर एक सर्द सी लहर दौड जाती नजर आई।

ठीक कहत्ते है भगवान के घर देर है अंधैर नहीं और यह भी कि उसकी लाठी आवाज नहीं करती I रमाकांत को अपने किये का फल शायद उसका खून ही चखाना चाहता था ।

.........................

विजत सुबह चार बजे हवेली सै निकला था।

वह उसी दिन शाम को दिन ढलते ही हवेली वापिस पहुच गया। वह अपनी पत्नी को समझाकर निक्ला था कि अगर बाबा उसके बारे में पूछें तो क्या जवाब देना है I अपने दुसरे भाई सूरज कीं तरफ से उसे कोई फिक्र नहीँ थी क्योकि वह चण्डीगढ़ गया हुआ था I सूरज क्रो पॉलीटिक्स का चस्का था I सावनपुंर सीमान्त प्रदेश में था और इस प्रदेश में चुनाव होने वाले थे । वह इन चुनावों मॅ एक प्रमुख पार्टी का टिक्ट हासिल करने को घर से निक्ला हुआ था ।।।।

यानि कि सूरज की वापसी एक सप्लाह सै पहले मुमकिन नहीं थी I और उस की निगाह में यह बड़ा अच्छा वक्त था । वह इस वक्त से फायदा उठा लेना चाहता था I

वह दिल्ली. से अपने बाप की कहानी निपटा देने के पूरे पूरे इन्तजाम के साथ लौटा था और यूं आज की रात्त इन मिया वीबी के लिए उनके मन्सूबो की कामयाबी क्री रात थी।

बिल्कुल ।। दीपक के सहयोग के बाद उसके हौसले बुलन्द थे।

हबेली पहुचकर विजय सीधा अपनी बीबी के पास पहुचा । कामिनी ने नशीली मुस्कान के, साथ पूछा था "यानि कि कामयाब होकर लोटे होI"

”बिल्कुल । दीपक तो सचमुच ही त्यागी जीव निक्ला। " विजय हस दिया--"वह तो बाप की दौलत से हाथ झांडकर बहुत खुश हुआ था I "

"है भगबान शुक्र है कि कोई गडबड.नहीं हुई I यह हमारे लिए अच्छे दिनों के लक्षण हैं I "

"इधर की सुना I " बिजय बोला--"इधर सब ठीक है ना ।"

"ठीक से भी ज्यादा ठीक है । " कामिनी बोली-- "जेसा कि हमारा ख्याल था, बाबा आज अपने ही चक्करो में लगे हुए है। वस, एक बार मुझे बुलाकर कहा कि तुम जब जागो तो मैं तुम्हें होशियार रहने और कैदियों का ख्याल रखने को कह दु।"

विजय हस दिया । उसे अपने बाप के सारे चक्करो का पता था। वह' '‘भली-भाति. जानता था कि हर पन्द्रह-बीस दिन बाद उसके बाप के खास कमरे में क्या होता है I नबाबी दिखते थे वह । थिरकते वदन...तबले की थाप...घुघरूओं की झकार...जामों की खनक और मचलते यौवन की महक... । सब रात गए तक चलता था यह सिलसिला।

ज़मीदार रमाकांत की ऐसी ही महफिल का प्रोग्राम देवयोग से आज के ही दिन था और आज के दिन और यह रात रमाकात ' को किसी और बात की सुध रहनी ही कहा थी?

महफिलहाल जमी हुईं थी सो विजय को महफिल के खत्म होने की इन्तजार करनी पडी I

रात के लगभग साढे तीन बजे जब यह महफिल खत्म हुई और रमाकात' अपने खास कमरे से अपने बेडरूम में आकर कपडे, बदल रहा था तो विजय कमरे में दाखिल हुआ।

स्माकात स्लीपिग' गाउन की डोरिया' क्सता और अपनी भद्दी आबाज में गुनगुनाता बाथरूम सै निकला तो उसने बिजय को कमरे में बडे आदर से पीठ पर हाथ बाधे खड़े पाया तो एक क्षण को वह चौंका । फिर मुस्कराते हुए आगे बढा और बोला

"क्या बात है विजय? इस वक्त ।"

"कुछ नहीं, बाबा जी। बस जरा आपसे बात करनी थी । काफी देर से आपके फारिग (खाली) होने का इन्तजार कर रहा था । जेसे ही मालूम हुआ आप अपने कमरे मैं चले गए है। मैं आपसे मिलने आ गया। "

"ऐसी क्या एमरजेन्सी हो गई, सुबह आ जाते। क्या दिन नहीं निक्लना था !!"रमाक्तात वात करने के मूड में नहीं था उसने कडैपन से टालना चाहा I

"सुबह ही हो रही है बावा l यह कौन सी रात है । ज़रा वक्त देखिये। "

" अच्छा, बात कर जल्दी...मुझे नींद आ रही है। " रमाकात' ने बदस्तूर रूखेपन से कहा।

"वह बाबा, दरअसल आपके दस्तख्त लेने हैं। " बिजय ने साजिश की पिटारी खोली।

"दस्तखत ।" रमाकांत. चौका। उसका नशा हिरण हो गया… "वह किसलिए?"

”बाबा । यह आपके यादगार दस्तख्त होंगे। इन दस्तख्तो के बाद मुझे आपके दस्तख्तो की जरूरत नहीं पडेगी, । मैं आपको कष्ट नहीं दुगा।"

"क्या बकबास कर रहे हो-खुलकर बक, क्या कहना चाहता है?" रमाकांत ने अपनी सुर्ख आखो से उसे घूरा।

विजय अभी तक खडा, हुआ था । उसके दोनो हाथ पीठ पीछे थे। उसने दोनों हाथ आगे किए। उसके हाथ में एक फाइल थी । वह फाइल लेकर आगे बढा, रमाकात अब अपनी उस कुर्सी पर बैठ चुका था जिस पर बैठकर वह इंसान नहीँ रहता था । शेतान वन जाता था।

"बाबा-इन कागजात पर नजर डाल लें। " बिजय ने नाटकीयता पूर्ण नम्रता के साथ कहा ।

रमाकात ने फाइल थाम ली। उसे घूरते हुए पूछा "कैसे कागजात है यह?"

" भाई दीपक हक से अपने हाथ खींच गया है। उसने दस्तख्त कर दिये है । दूसरा कागज आपकी 'विल' और आपकी तरफ से मुख्तियारनामा यानि पावर आफ अटार्नी है । इन पर आपको दस्त्तख्त करने है । बिजय बादस्तुर नम्रता के साथ वोला "क्योकि" आप बूढे हो चुके है । जमीन जायदाद का इन्तजाम सम्भालना अब आपके बस का नहीँ रहा। आज के बाद बह जिम्मेदारियां मैं सम्भालूगा । "

"ओह तो मेरे विश्वास का नाजायज फायदा उठाकर यह खेल खेला है । अच्छा हुआ कि तेरी हहकीकत भी मेरे सामने आ गई। मैं तो पर am विस्वास करने लगा "

"बाबा मेरे पास वक्त कम है। आप दया करके इस पॉवर आफ अटार्नी पर साइन कर दें... । " विजय ने फिर अनुरोध किया । रमाकांत का चेहरा दहकता अगारा' बन गया-- "तूने क्या सोचा है कि तू कहैगा और मै दस्तख्त कर दूंगा । "

"मैने तो यही समझा था बावा । हमारी तो संस्कृति यही रही है कि बूढे होने पर राजा अपने राजकुमार को गद्दी पर स्वय बैठा सन्यास ले लेते थे। " विजय यकीनन अपने बाप की बेबसी से आनन्दित्त हो रहा था। उसने अपनी जेब में हाथ डालकर रिवाॅल्बर निकाल लिया "और फिर यह अनुरोध मै नहीं यह कर रहा है। " उसने रिवाॅल्बर लहराकर दिखाया "जल्दी करें वाबा । "

" ओह ।" रमाकात' के चेहरे पर घबराहट के भाव उभरे उसकी जुबान लडखडा गई "ठीक है, करता हूं। तुम यह रिवाल्वर नीची रखो । कहा है मेरा चश्मा...पेन...? वह उधर दराज में होंगे। में ले लूं।"

"ठीक है...विजय ने शाही अदाज' में इजाजत दे दी।

रमाकांत अपनी ऊँची कुर्सी से उठा... अपने वेड के पास आया | फिर साइड टेबल की पहली दराज खोलकर झुककर अन्दर हाथ डाला I दराज के अन्दर लगे एक गुप्त बटन को तीन वार जल्दी जल्दी दबाया, फिरउसी दराज में रखा चश्मा और पैन उठा लिया।

चश्मा व पैन लेकर वह फिर अपनी उसी ऊँची कुर्सी पर आ बैठा जिस पर बैठकर वह इंसान नहीं रहता था।

विजय विजयी अंदाज में अभी तक रिवाॅल्बर ताने था। बाप को चश्मा आखों' पर लगाकर पेन खोलते देखकर उसने रिवाल्वर अपनी जेब में डाल लिया जेसे अब कोई खतरा न रहा हो। रमाकांत ने फाइल खोलकर पूछा--" कहा करू दस्तखत, बेटे? "

"मै बताता हूं बाबा । " विजय खुशी सै झूमता हुआ आगे बढा I कामयाबी दो कदम के फासले पर खडी. मुस्करा रही थी । तभी धाड़ से बेडरूम का दरवाजा खुला। विजय ने चौककर पीछे मुडकर देखा तो उसके छक्के छूट गए।

वे चार थे और चोरो स्टैनगन लिए हुए थे । वे ट्रेण्ड कमाडोज की तरह आगे बडे, और पलक झपकने में विजय को घेरे में ले लिया।

रमाकांत ने पैन बन्द करके चश्मा आखों से उतारा। उसे बडे इत्मीनान से केस में रखा, फिर फाइल बन्द करते हुए मुस्कराकर अपने पुत्र की तरफ देखा ।।

"अरे तुमने तो अपना रिवाॅल्बर जेब में रख लिया है बेटे। " वह बोला--"वडे बेवकूफ हो । खैर कोई वात्त नहीं, निकाल लो रिवाल्वर लेकिन एक बात का ख्याल रखना कि तुम्हारे रिवाॅल्बर से एक गोली नहीं निकलेगी इतनी देर में कम से कम सौ गोलियां तुम्हारे शरीर में पेवस्त हो जाएगी । "

विजय ने उन चारों को देखते ही जेब में हाथ डाल लिया था, लेकिन अब जेब से रिवाॅल्बर निकालना बेकार था । उसने अपना हाथ बाहर निकाल लिया । वह हाथ काप रहा था । जो कुछ था, यह सब आशा के विपरीत हुआ था। घर का भेदी था, लेकिन यह नहीं जानता था कि उसके बाप ने किसी आड़े वक्त के लिए जो फोर्स रखी हुई थी-वह अब

अचानक किस तरह हरकत मे आ गई है । पासा पलट गया था ।

उसका 'खुद मुख्तियारी' का ख्वाब चकनाचूर हो गया था । रमाकात ने वह फाइल उसके मुह' पर दे मारी। कागजात इधर-उधर बिखर गए।

"तुमने क्या समझा था कि तुम रिवाल्वर के जोर पर मुझसे पॉवर आँफ अटर्निं पर दस्तख्त करवा लोगे। " वह फुफकारा--"तुम शायद यह भूल गए कि में तुम्हारा बाप हूं। मैं बूढा हो गया तो क्या हुआ-लेकिन मेरा दिमाग बूढा नहीं हुआ है । "

"बाबा-मुझें माफ कर दीजिये। " विजय ने कापती आवाज में कहा और अपने बाप के कदमों में गिरने लगा।

"नहीँ... । " रमाकांत इतने जोर से चीखा कि वह कदमों में झुकता-झुकता सीधा ख़ड़ा हुआ और फिर डरकर दो काम पीछे हट गया ।

"आस्तीन में साप पालने का शोक नहीँ है मुझें । " वह आगे बोला, उसने उन चारों में से एक क्रो इशारा किया--"इस मनहूस को मेरे सामने से ले जाओ । अभी नीद आ रही है । इसका फैसला में सुबह करूगा । जाओं, ले इसे । हां, एक बात्त का ख्याल रखना यह खुद क्रो बड़ा शातिर समझता है । कोई होशियारी दिखाए तो इसके जिस्म में इतनी गोलिया उतार देना कि सास लेना मुश्किल हो जाए।" लफ्ज नहीं अगारे निक्ल रहे थे उसके मुह से ।

वह उस कुर्सी पर जो बैठा था, जिस पर वह इंसान नहीं रहता था ।

"प्लीज, बाबाजी मुझे माफ कर दें... I" बिजय ने गिडगिडाते.. हुए हाथ जोडे।

रमाकात ने हाथ से इशारा किया और वह कमाण्डो विजय का हाथ पकड़कर उसे खींचते हुए ले गया । उनके जाने के बाद रमाकात ने अपने कमरे का दरवाजा अन्दर से बन्द किया और गाउन की डोरिया खौलते हुए बेड की तरफ बढ गया I

ब्रैड पर बैठकर उसने एक जोरदार जम्हाई ली और मुलायम कम्बल ओढकर, पुल्सुकून अदाज में टार्गे फैला दी ।

अपने हिस्से की जमीन जायदाद अपने भाई विजय के नाम करने में दीपक को जरा भी अफसोस नहीं हुआ था।

विजय उन्हें लेकर सूरज निकलते ही दिल्ली पहुंच गया था । वह दीपक को एक परिचित वकील के यहां ले गया था I प्रेम सागर को भी साथ रखा गया था । बिजय के तेवर देखकर दीपक ने खुद ही प्रेम सागर से अपने साथ रहने का अनुरोध कर डाला था। वकील ने विजय के पक्ष में विजय की इच्छानुसार कागज तैयार करवाये । विजय ने एक पाॅवर आफ अटार्नी भी तैयार करवा ली थी, जिस पर वह अपने बाप के दस्तख्त करवाने का खतरनाक इरादा रखता था l दीपक ने उसे यह कदम न उठाने की सलाह भी दी थी, लेकिन विजय नें उसकी सलाह हसी में उड़ा दी थी ।

"विजय, मुझें उम्मीद नहीं कि बाबा, अपनी मोत के इस परवाने पर आसानी से दस्तखत कर देंगे। " दीपक ने कहा था ।

"आसानी से न किए तो मुश्किल सै करेगे। दरसख्त तो उन्हें हर हाल में करने पर्डेगे। चाहे रिवाल्वर की नोंक पर ही क्यों न करें। " विजय ने हसते' हुए लेकिन दृढ शब्दों में कहा था।
 
जब कागजात तैयार होकर आ गये तो दीपक ने उस वकील के यहां ही उन पर दस्तख्त कर, सारे अधिकार विजय के नाम कर हकीकत में ही राहत की सास' ली थी ।

अब विजय ने उन दोनों क्रो खुशी खुशी विदा किया I वह उन दोनों को बाहर तक छोडने_ आया विजय ने प्रेम सागर से हाथ मिलाते कहा--"मिस्टर प्रम सागर मुझे अफसोस है कि हमारे बाप की जिद पर आपको खामखाह की जहमत उठानी पडी, । अफसोस, इस बात का है कि हमारी घरेलू दुश्मनी के चलते एक बडे शुभ अक्सर पर यह सब कुछ हुआ। रेखा, हमारी बहन है । इस नात्ते से आप हमारे जीजा हुये। बधाई कबूल करे और हां, हमें अपनी शादी पर बुलाना न भूलियेगा... ।"

प्रेम सागर हंस दिया था ।

वैसे वह अभी तक दीपक की बेवकूफी को समझ नहीं पाया था।

दीपक से भी उसने बडी. गर्मजोशी से हाथ मिलाया था । दीपक के इशारे पर प्रेम सागर ने गाडी आगे बढा, दी थी।

"यह क्या किया तुमने दीपक...?" प्रेम सागर ने पहली बार मुह खोला था।

"प्लीज़, प्रेम ।" दीपक ने हाथ उठा उसे खामोश कर दिया "यूं समझौ कि मैंने जिन्दगौ का सुकून खरीदा है । हम इस बारे में बाद में बातें करेंगे, बल्कि में तो चाहता हू कि हम इस बारे में कोई बात न ही करें तो अच्छा है । मुझें मलाल है तो सिर्फ 'इस वात का कि हमसे उयादा परेशानी इन्द्र और रेखा क्रो हुईं होगी । कितना बुरा हुआ यह सब, यह खुद में ही जानता हू। "

"ठीक है।, प्रेम सागर बोला "अब क्या इरादा है, कहा' चलें?"

"तुम तो मॉडल टाउन जाना चाहोगे।" दीपक ने पूछा ।

"जाना तो वहीँ चाहिये। " प्रेम सागर बोला ”तुम कहो,तुम क्या चाहते हो?"

"मै माडल टाउन जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा ।" दीपक धीमे से बोला "क्या ऐसा नहीँ हो सकता अभी तुम अकेले जाओ.. और उन्हें मेरी मजबूरियों से आगाह कर दो।"

"ठीक है । " प्रेम सागर ने सिर्फ इतना ही कहा फिर अगले' ही चौक पर उसने गाडी सडक किनारे करके रोकी और दीपक को उतार दिया ।

प्रेम सागर अब दीपक के घर के हालात व इन दौलत की हबस के मारो के बारे में बहुत कुछ जान गया था । मॉडल टाउन इन्द्रजीत की कोठी क्री तरफ जाते हुए उसने दीपक के बारे में सोचना बन्द किया व रेखा के बारे में सोचने लगा ।

प्रेम सागर जब माडल टाउन पहुचा तो साढे, बारह बजे का वक्त था।

हार्न की आबाज पर गेट नौकर रामू ने खोला था । प्रेम सागर. गाडी अन्दर ले गया_ l एक गार्ड अन्दर अलर्ट ख़ड़ा हुआ था, लेकिन वह प्रेम सागर और उसकी गाडी को पहचानता था । वह इत्मीनान से खडा हो गया ।

नौकर रामू ने ही बताया था कि रेखा मेम साहब अपने कमरे में हैँ।

अपने आने की इतला भिजवाने की बजाय प्रेम सागर खुद उसके कमरे तक पहुचा' । रेखा के कमरे का दरवाजा अधखुला था । प्रेम सागर ने दरवाजे पर ठिठककर एक निगाह अन्दर डाली । रेखा बेड पर सिर झुकाये उदास बैठी थी । वह किसी गहरी सोच में थी । प्रेम सागर ने दरवाजा थोडा और खोला लेकिन रेखा ने निगाह उठाकर नहीं देखा

प्रेम सागर ने दरवाजे पर धीमी सी दस्तक दी व अपने चहकते अदाज' में बौला--"क्या में अन्दर आ सकता हूं? "

आवाज सुनकर रेखा ने यूं ही बेख्याली में दरवाजे की तरफ देखा। उसकी दुनिया ही बदल गई। हर तरफ खुशियों वे रग बिखर गये। अरे, यह कौन आया?

वह वेअख्तयार होकर उठी और हवा के तेज झोंके की मानिन्द अपने प्रेम से जा लिपटी, पर फिर तुरन्त ही उसे अपनी इस निर्लजता और व्यग्रता पर लज्जा आई । उसने पीछे हटना चाहा, पर प्रेम सागर ने उसे पीछे नहीँ हटने दिया ।

वह अब प्रेम सागर की वाहों के घेरे में जो थी ।

"प्रैम, क्या हुआ था? " रेखा ने उसके सीने में मुह छिपाते हुए पूछा “कहाः चले गए थे तुम? "

"गया नहीँ था ले जाया गया था। " प्रेम सागर चहका "वह भी अपनी ससुराल ।। हमारी मंगनी थी सो ससुर सालों का आशीर्वाद लेने चला गया था । "

"भैय्या, बता रहे थे, आपको किडनैप किया गया था और दीपक भाई भी आपके साथ थे। " रेखा, प्रेम को सकुशल देख खुश थी तो वारदात का विवरण जानने को बेचैन थी ।

"हां, कुछ हुआ तो ऐसा ही था।" प्रेम लापरवाही से बोला "पर शायद यह दुनिया का सबसे अनोखा अपहरण था। बाप ने बेटे का अपहरण करवाया था । दीपक के साथ साथ मुझे भी हाक' ले गए थे ।"

"बाप ने यानि चाचा रमाकांत' ने! " रेखा कुछ बदह्वास हो गई-- "फिर उसने आपको छोड केसे दिया? "

प्रेम सागर ने उसे अपनी बाहों' से मुक्त किया, हालाकि जी तो चाह रहा था किए यह यूं ही उसे अपनी बाहों में लिए खडा रहा और एक कुर्सी पर बैठ गया । .

"हमें तुम्हार चाचा ने नहीं, वल्कि तुम्हारे विजय नाम के भाई ने मुक्त किया है। हमें यहा' दिल्ली तक छोडकर गया ।। बेचारे दीपक को अपने हिस्से की जमीन जायदाद इस विजय के नाम लिखनी पडी है । " प्रेम सागर ने जवाब दिया और फिर उसने संक्षेप में ही रेखा को सब कुछ बता दिया ।

"भगवान का शुक्र है कि बेटे की लालच की वजह से ही सही आप उस दरिन्दे के चगुल' से बच आए हो । दीपक भाई भी आए है।।”

"नहीं । वह शर्मिंन्दा था कि महज उसकी वजह से हमारी मगनी' जैसा प्रोग्राम पूरा न हो सका ।"

"आपको दीपक भाईं को साथ लाना चाहिये था ।।" रेखा बोली "खैर में भैय्या को इतला कर दू। आपके आने की खुशखबरी सुना दूं। वैसे वह आने ही वाले होंगे।" रेखा ने घडी पर नज़र डालकर कहा ।

"गगा मौसी कहा है? " प्रेम सागर को ख्याल आया तो उसने पूछा ।

"यही हैँ। वह बहुत परेशान थी।"

"क्या तुमसे भी ज्यादा ।"

" हा , मुझसे थीं ज्यादा। " रेखा ने शौखी से कहा और उसे गहरी निगाहों से देखकर मुस्करा दी ।

फिर जेसे-जेसै प्रेम सागर के सकूशल लौट आने क्री सुचना मिलती गई, वैसे बैसे लोग आते गए । शाम की चाय पर सब लोग इक्टठे हो चुके थे ।।

मिठाई मगवाई' गई । मिठाई खाई. गई।

प्रेम सागर ने नयना से खास तोर पर खेद व्यक्त किया । वह बोला-”नयना जी । में आपसे बहुत शर्मिंन्दा हूं। मेरो वजह सै आपकी मगनी' भी रूक गई।

"तो फिर क्या हुआ?" नयना लज्जाती-सी मुस्कान के साथ बोली "न हम कही गए है न इन्द्र जीत कही गए हैं। फिर हो जाएगी मगनी' ।

"अरे नयना! खैर ये मगनी तो फिर हो जाएगी, लेकिन तुम जरा इन प्रेम सागर साहव से वायदा ले लो कि कहीं यह फिर से अगुवा नहीं हो जाएगे'। " गगा मौसी ने हसते हुए कहा l उनकी हसी' में दूसरों कीं हसी' भी शामिल थी । रात गये तक यह हगामा जारी रहा ।

रात को जव रेखा बेड पर लेटी तो वह बहुत खुश थी वरना पिछली दौ रातें तो उस पर कयामत बनकर गुजरी थी । दोनों रातें आखों में कट गई थी' और वह निरन्तर रोती रही थी और-इन्ही आसूओ के दौरान उसे काले चिराग की याद आई थी।

मायावी दुनिया की यह रहस्यमय-हस्ती किस कदर मेहरबान थी । उसने इनकी कितनी मदद की थी । अगर वह न होता तो रेखा और इन्द्रजीत का उस मायवी रेगिस्तान सै निक्ल पाना ही नामुमकिन हो जाना था ।

रोत्ते-रोते रेखा ने कई बार सोचा था कि क्या वह काला चिराग दोबारा उसकी मदद को नहीं आ सकता और हर बार उसके दिल व उसके दिमाग ने यही जबाव दिया था कि काले चिराग, उसकी वह दुनिया और उन हालात को एक भयावह ख्वाब समझ भुला देना चाहिये।

आज रात वह बिस्तर पर लेटी तो उसके अग अग सै खुशी फूट रही थी । अब जबकि प्रेम सागर उसके दरिन्दे चाचा. . .के कब्जे सै सकुशल निक्ल आया था, तो न जाने क्यों यह ख्याल, रेखा के जहन में उभरा था कि इस रिहाई में कही' न कही काले चिराग का हाथ है।

यह ख्याल उसे क्यों आया? इस बारे में वह कुछ नहीं जानती थी।

इन्हीं ख्यालों मे गुम रेखा ने जव करबट बदली तो उसकी नजरें साइड टेवल पर रखे नाजुक से फूलदान में सजी उस गुलाब की कली पर पडी जो उसे मायावी लोक के रासमोन ने भेट दी थी । वह कली पूरी तरह तरोताजा थी और खुशवू महक रही थी ।

रेखा उस कली को निहारने लगी ओर देखते ही देखते उसकी आखें' वन्द हो गई। और फिर वह गहरी नींद की आगोश में थी ।

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रेखा, सुबह जब नाश्ते कीं मेज पर पहुची' तो उसके चेहरे पर हवाइयां उड रही थीं । रात्त को वह जितनी खुश थी, इस वक्त वह उतनी ही. ..बल्कि उससे ज्यादा परेशान थी । इन्द्रजीत ने उसका चेहरा देखा तो वह खुद भी परेशान हो गया। यही हाल गंगा' मौसी का हुआ ।

"क्या हुआ रेखा? " इन्द्रजीत्त ने पूछा ।

"भैय्या! रात को मैने दादा हरिओम क्रो सपने में देखा है।"

"अरे, दादा हरिओम क्रो! " गगा मौसी उनका नाम सुनते ही चिन्तित हौ गई "क्या कह रहे थे वह?"

"मौसी वह एक पेड के नीचे बैठे थे। जब मैं उनके सामने पहुची' तो उन्होंने मुझे देखते ही कहा। ” अरे, उस मनहूस को निकाल घर से वर्ना नुकसान उठाएगी । और फिर इससे पहले कि मैं उस मनहूस का नाम उनसे पूछती कि अचानक एक वहुत बडा रीछ कहीं से प्रगट हुआ ओर मेरी तरफ लपका । मैं उसे देखकर र्चीखी और भागी । ठोकर लगी-और तभी मेरी आख खुल गई । " रेखा ने बताया और फिर इन्द्र की तरफ देखते हुए बोली "भगवान न करें, भैय्या जरूर कुछ होने वाला है। "

" अरे कुछ नहीँ होगा रेखा । तू परेशान न हो । " इन्द्रजौत ने तसल्ली दी, लेकिन यह झूठी तसल्ली थी । हकीकत में वह खुद अन्दर से सहम गया था।

"नहीं भैथ्या । जरूर कोई गडबड… है । " रेखा चिन्तित सी बोली-"मेरी समझ में नहीं आ रहा कि हमारे घर में ऐसी मनहूस कौन सी चीज है जिसे निकग्ला जाए। वह कमबख्त रीछ जाने कहा से आ गया, वरना मैं दादा से उस चीज का नाम ज़रूर पूछ लेती l "

"ओह, हां! " इन्द्रजीत का मुह खुला-का खुला रह गया । जैसे उसकी समझ में कुछ आ गया हो ।

" आपको क्या हुआ? " रेखा र्चोंकी ।

"तुम यह बताओ, तुम पर रीछ झपटा था ना । " इन्द्रजीत ने तस्वीक चाही ।

”जी...उसकी वजह से ही तो बात अधूरी रह गई । "

"वात मेरी समझ में आ गई। " इन्द्र सिर हिलाते हुए बोला "मै अभी आता हूं। " यह कहकर वह तुरन्त उठ गया । वह तेजी से चलता हुआ अपने कमरे में पहुचा । उसने अपने ब्रेड की साइड टेबल पर एक प्लेट में वह खुला हुआ चाकू रखा हुआ था जो कटारी ने उस पर फेंका था । यह चाकू राजूमदारी का था और राजू मदारी के शरीर पर इस कद्र बाल थे कि वह इंसान' कम रीछ ज्यादा लगता था। दादा हरिओम ने सपने में जो इशारे दिये थे यकीनन इस चाकू की ही निशानदेही कर रहे थे ।

इन्द्रजीत ने उस चाकू क्रो उठाने कै लिए हाथ बढाया. तो उस पर नजर पडते_ ही उसका हाथ खुद-व खुद रूक गया । चाकू के चमकते फल पर ताजा ताजा खून लगा हुआ था-जेसै उससे अभी अभी किसी को जिबह किया गया हो ।

इन्द्रजीत ने रामूको पुकारा "रामू जल्दी आओ । "

रामू डायर्निग टेबल के निकट खड़ा था-वह आवाज सुनते ही भागा भागा अस्या I ”जी साहब । "

"इन्द्र क्या हुआ?" गंगा मौसी और रेखा भी उसके पीछे पीछे आ गई थी।

"रामू! तुमने इस चाकू से कोई मुर्गी-बुर्गी तो जिबह नहीं क्री?"

इन्द्रजीत ने चाकू की तरफ इशारा किया । रात रामू ने चिकन बिरयानी बनाईं थी और वह इसके लिए मुर्गी लाकर खुद जिबह किया करता था ।

"नहीं साहब जी। " रामू ने चाकू को घूरते हुए जवाब दिया "किचन में दुसरे चाकू है ना जी । "

"फिर इस पर यह खून कैसे लग गया? "

"खून ।" गगा मोसी सहमकर दो कदम पीछे हट गई । रेखा ने दो कदम आगे बढकर चाकू को देखा ।

"हां, वाकई इस पर तो खून लगा हुआ है-यह खून केसे लगा?" वह भी रामू को पूछने लगी।

"मुझें नहीँ मालूम । " रामू ने साफ शब्दों में कहा I

"रामू इसै प्लेट सहित यहा से उठाकर ले जाओ और इसे धोकर अपने कमरे में रख लो। " इन्द्र बोला ।

"जी ठीक है साहब जी I " यह कहकर उसने प्लेट उठाई और उस चाकू को गोर से देखता हुआ बाहर निकल गया ।

"मुझ यूं लगता है जैसे दादा हरिओम का इशारा इस चाकू की तरफ ही हो I " इन्द्र बोला ।

"मुझें भी ऐसा ही लगता है । " रेखा ने सहमति जत्ताई"इस मनहूस चाकू के अलावा हमारे घर में कुछ और है भी नहीँ, लेकिन आपने उस क्यों दे दिया । इसे कही बाहर क्यों नहीं फिकवा दिया ।

"एक रात और देखना चाहता हूं। " इन्द्र ने जवाब दिया । वे बातें करते हुए नाश्ते की मेज पर आ गए ।

बैठे बिठाये यह एक और मुसीबत गले पड़ गई थी । दादा हरिओम ने भी कोई बात खुलकर नहीं कही थी I हालाकि' ऐसा कभी नहीँ हुआ थाI वह जब भी सपने में नजर आए थे-उन्होंने हर बात बड़े विस्तार से समझाई थी I अब पता नहीं उन्होने. इस चाकू को मनहूस करार दिया था या घर में कोई और चीज थी जिस पर अब तक उनकीं नजर नहीं पडी, थी I

पर फिर यह मामला ज्यादा देर तक पहेली न रहा । दोपहर खाना खाने के बाद, रेखा इन्हीं सोर्चों के साथ जरा दो पल के लिए लेटी तो उसकी आख' लग गई और सपने में उसने फिर दादा हरिओम को देखा I

दादा हरिओम एक पेड़ तले बैठे हुए थे। यह कोई हरा-भरा बाग था । ठण्डी हवा चल रही थी । रेखा भी उस बाग में टहलती हुई वहां जा निक्ली थी-जहा' दादा बैठे थे I

रेखा को देखते ही दादा ने उसे डाटा "अरी दिमाग नाम की चीज भी हैं तुम्हारी खोपडी. में या नहीं I उस मनहूस को निकालो घर सै नही तो खून की नदियां वह जायेंगी । "
 
"दादा क्या आपका इशारा उस चाकू की तरफ है?" रेखा ने तुरंत पूछा।

"हां, उसे फौरन घर से बाहर निकालो ।"

"पर दादा, को करे उसका? उसे तोडकर फेंक दें या किसी नदी नाले में फेंक दे?" रेखा ने पूछा ।

”उसे शीघ्र अति शीघ्र किसी कब्र में फिकवा दो और यह काम खुद इन्द्रजीत्त करे I "

रेखा के पूछने पर उन्होंने बताया कि चाकू पर क्या पढ़कर और कब्र में उसे किस तरह डालना है?

तभी रेखा के कानों में रेखा-रेखा की आवाजें आने लर्गी I कोई उसे उठा रहा था। रेखा की आख एकदम खुल गई I उसके सामने गगा मौसी खडी थी ।

"ओह, आप मौसी! क्या बात है?" रेखा ने खुद को सम्भालते हुए पूछा।

"वह प्रेम सागर आए हैं। " मोसी ने बताया ड्राइगरूम में बैठे हैँ। "

रेखा पलंग से उत्तरी, बोली-"और क्या भैय्या भी घर में हैं?"

"हां प्रेम के साथ ही वह भी बैठक में है। "

"मौसी। " रेखा ने बेताबी से बताया"दादा जी को मैने फिर सपने में देखा है। "

"अच्छा! कुछ मसला हल हुआ?"

"हां-सारी बात डिटेल सै हो गई । " रेखा ने जवाब दिया और सब कुछ मौसी को सुना दिया ।

मोसी ने भगवान का शुक्रिया अदा किया कि यह समस्या हल हो गई। अब उस चाकू को किसी कब्र के सुपुर्द करना था ।

रेखा, मोसी के साथ बैठक में पहुची । प्रेम सागर को नमस्ते कह वह इन्द्र के साथ बैठ गई और फिर उन्हें भी सपने में दादा से मिली हिदायत सुनाई।

इन अविश्वसनीय शक्तियों के बारे में ही बातें करते हुए उन्होने चाय दी और फिर इन्द्रजीत और प्रेम सागर, दादा की हिदायत का पालन करने के लिए कब्रिस्तान जाने के लिए निक्ल लिए । प्रेम सागर घर के एक सदस्य की तरह ही इन हालात में दिलचस्पी ले रहा था ।

वे मथुरा रोड स्थित पुराने कब्रिस्तान में पहचे । चाकू इन्द्र के पास था । काफी तलाश के बाद उन्हें अतत: टुटी कब्र नजर आई । इस कब्र में काफी बडा सुराख था । इन्द्र या सागर ने इस कब्र में झांकने की कोशिश नहीं की थी।

इन्द्रजीत्त ने दादा हरिओम की हिदायत के मुताबिक मत्र पढ़कर उस चाकू पर फूंका' और उसे वन्द करके अपनी मुट्ठी मे जकडा, फिर उसने कब्र पर बैठकर अपना हाथ कब्र में डाला और चाकू हाथ सै छोड दिया।

इसके साथ ही वह फोरन पीछे हट गया था।

चाकू के कब्र में गिरते ही सुराख सै पुर का एक चक्रवात-सा निक्ला और हवा मैं लीन होता चला गया ।

इस काम को निपटा वे कब्रिस्तान से निक्ले फिर गाडी में बैठकर रेस्तरां कीं तरफ चले गए।

रेस्तरां में पहूचकर इन्द्रजीत ने कोठी फोन करके रेखा क्रो यह सूचना दे दी कि उसने चाकू को ठीक दादा की हिदायत के अनुसार कब्र मे दफनाने का काम सम्पन्न कर दिया है।

रेखा ने यह सुन राहत की सास' ली थी।

जमींदार रमाकात अपनी ऊची' कुर्सी पर बडी. शान से बैठा था।

उसकी गर्दन अकडी हुई थी I कमर अकडी हुई थी। पूस शरीर अकडा हुआ था। मुंछे तनी हुई थीं । हाथ मैं छडी. थी । हाथ सीधा तना हुआ था । मतलब यह कि उसकी कोई चीज ऐसी न थी जिसमें तनाव न हो, अकड़ा न हो और ऐसा क्यो न होता, बह उस कुर्सी पर बैठा हुआ था जिस पर बैठकर वह इसान नहीं रहता था। उसके निकट ही एक नौकर सिर झुकाए, हाथ बांधे खडा. था। कमरे का दरवाजा खुला हुआ था । कुछ देर बाद एक और नौकर वड़े आदर से चलता हुआ अन्दर आया व उसके निकट आ सिर झुंकाकर खडा. हो गया।

"क्या ख्वर लाए हो?" रमाकांत ने अपनी भारी आबाज में पूछा ।

"सरकार वह सपेरा आया है लाल मोती।" नौकर ने जबाव दिया।

"ओह क्या बेहूदा और बेवकूफाना नाम रखा हुआ है अपना उसने? बुलाआ उसे।"

"जी । " नुर उल्टे कदमों चलता कमरे से बाहर निकल गया । और फिर कुछ ही क्षणों बाद वह वापिस आया तो अकेला नहीँ था । उसके साथ ही एक और व्यक्ति भी था जो वडी. लापरवाह चाल चलता हुआ अन्दर आया था।

रमाकात ने गौर सै उसका चेहरा देखा I वह खासे लम्बे कद का एक सावले' रग' का व्यक्ति था। बाल बडे बड़े और कंधे पर फैले हुए । एक कान मे बाली । एक हाथ में लोहे का कंगन। स्याह कपडे । हाथ में बीन । कंधे पर झोली । यह 'लाल मोती था । सपेरे लाल मोती ने अपने कंधे सै झोली उतारकर जमीन पर रखनी चाही-मगर रमाकांत ने उसे हाथ के इशारे से रोक दिया ।

"तुम्हारी बात हो गई?" रमाकांत ने पूछा।

"हा जी । मेरी बात हो गई। " लाल मोती ने जबाव दिया।

"तुमने सारी बात अच्छी तरह समझ ली।"

"हां, जी । मैने सारी बात अच्छी तरह समझ ली। "

"तो फिर जाओ. .. । " रमाकात ने उसकी चमकती काली आखों में झाका और देखो, काम होशियारी से करना । किसी किस्म की गलती तुम्हें भारी पड सकती है। मै गलती माफ करने का आदी नहीं नहीं बात का खास ख्याल रखना । "

"लाल से आज तक कोई गलती नहीं' हुई है...आज भी कोई गलती नहीं होगी। ”

"ठीक है तो जाओ।"

वह नौकर ओर 'लाल मोती' कमरे से बाहर निकल गए।

बिजय को आज तीन दिन बाद तहखाने से बाहर लाया गया। इन तीन दिनों में उसके साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं हुआ था । वक्त पर उम्दा खाना चाय-पानी किसी चीज की कोई कमी नहीं रखी गई थी। हा, यह काल कोठरी जेसी कैद जरूर थी I

विजय क्री चिन्ता व खौफ हर बीतते क्षण के साथ बढता. ही रहा था । वह अपने बाप को अच्छी तरह जानता था । उसके दरिन्दे बाप ने किसी क्रो माफ करना तो सीखा ही नहीँ था फिर बिजय ने तो उसको रिवाल्वर दिखाया था । कागजात पर दस्तख्त कराने के वाद उसे मार डालने का इरादा भी रखता था । अब जाने उसका बाप उसको क्या सजा दे ?

आज तीसरे दिन का सूरज, बिजय के लिए 'ब्लैक वांरट" लेकर निकला था! दो हथियारबद शंख्स तहखाने में उतरे। ज्जिय को बाहर चलने का इशारा किया।

विजय खामोशी से सीढियां चढते, हुए तहखाने से बाहर आ गया। फिर उसे जीप में बैठकर हवेली गेट पर ले जाया गया। गेट पर एक घोडा. कसा हुआ तैयार खडा. था। एक रिंवाल्वरधारी ने विजय को घोडे पर सवार होने का इशारा किया । बिजय जब घोडे पर सवार हो गया तो उस शख्स ने कहा---

"बडे सरकार, बूढे बरगद के पेड के नीचे घोडे पर सवार आपके प्रतीक्षक है। शायद आपके शिकार पर ले जाना चाहते है । "

"अच्छा ॥" विजय घोडे पर सवार हो गया, पर बाप का यह कदम उसको उलझन में डाल गया था।

"एक बात का और ख्याल रखियेगा छोटे सरकार ! सीधे ही बरगद की तरफ ही जाइएगा। अगर इधर उधर भटकने की कोशिश की तो भटक नहीं पायेगे-हर तरफ शिकारी कुत्ते मौजूद हैं। " विजय की मुडी' हिली, उसने कहा--"जानता हू ॥"

.. "तो फिर जाइये, छोटे सरकार प्रणाम ! "

बिजय ने फौरन घोडे को पैर लगाई और बूढे बरगद की तरफ चल दिया । यह बरगद हवेली से कुछ फासले पर था । इस बरगद के चारो तरफ खेत-ही खेत थे।

बिजय जव एक पगडण्डी पर अपना घोडा दौडा. रहा था-तो काले कपडे पहने एक लम्बे कद का मानव-जिसके हाथ में बीन थी अचानक खेतों से निकलकर उसके सामने आ गया। यह सपेरा उसे हाथ उठाकर रुको का इशारा का रहा था ।

बिजय ने लगाम खींची । यह शख्स उसके लिए कतईं अजनबी था। उसके काले कपडों व हाथ में बीन होने कीं वजह से ही अनुमान लग सका कि वह कोई सपेरा है।

विजय उसके निक्ट पहुचा तो, सपेरे ने उसे इशारे से ही घोड़े से उतरने को कहा । विजय घोडे से कूद आया । सपेरे ने उसका हाथ पकड़ा व उसे खेतो में खींचता हुआ ले गया ।

और फिर थोडी देर बाद-जब सपेरा खेतों से निक्ला तो बिजय उसके साथ नहीं था बो खेत में बेसुध पडा था । वह लाल मोती था । लाल मोती, अपनी झोली कंधे पर डाले व बीन हाथ में लिए खेतों से निकलकर पगडण्डी पर आया तो दो घुडसवार_ उसके पास आकर रुक गये ।

"क्या हुआ? " उनमें से एक ने पूछा ।

“वह सामने खेत में उसकी ताश पडी है। जाकर बडे… सरकार को इतल कर दो ।"

"ठीक है, अब तुम फौरन बूढे बरगद के नीचे जाओ। वहां एक जीप खडी. है जो तुम्हें तुम्हारे ठिकाने तक पहुचा देगी।

लाल मोती बूढे बरगद की त्तरफ बढ़ गया । वे दौनों घुडसबार_ जव एक नजर विजय की लाश पर डालकर हवेली की तरफ लोट गये I. तो लाल मोती वही निकट ही एक' पेड, पर. चढकर बैठ गया

कुछ देर बीती फिर एक सूमो खेतों को रोधती हुई उस खेत के निकट आकर रूकी । गाडी से रमाकांत बाहर निक्ला । उसने एक नजर अपने पीछे डाली तो उसे सावनपुर के लोग दौडकर अपनी तरफ़ आते दिखाई दिये । वे विजय को साप द्वारा काटे जाने की खबर सुनकर दौड़ आए थे। अच्छा खासा हजूम था जो दौडा चला आरहा था।

रमाकांत ने इत्मीनान का सास लिया और उस खेत में दाखिल हौ गया I जहां विजय की लाश पडी थी और अभी ड्रामेबाज़ रामकात ने मेरे बेटे कहकर रोना पीटना शुरू ही किया था कि वह लाश बडी फुर्ती से उठकर खडी हो गई। इस लाश के हाथ में एक चमकती हुई कुल्हाडी- थी ।

अपने बेटे विजय को जीवित और उसके हाथ में चमकती हुई तेज धार वाली क्रुल्हाडी. देखकर रमाकात्त क्री सिट्टी गुम हो गई । बह तो बडा खुश खुश लम्बे-लम्बे डग भरता खैत्त में आया था और बह इस ड्रामे का आखिरी सीन कर रहा था और इस सीन को उसने लोगों के सामने पेश करके अपनी कारस्तानी की दाद लेनी थी, लेक्लि यहां तो मामला ही उल्टा हो गया था ।

रमाकात ने बडी. सूझ बूझ कीं सजिश रची थी ।

पर हुआ यह था कि सपेरे ने ही रमाकांत की उम्मीदों पर पानी फेर दिया था I लाल मोती ने विजय को सव सच साफ साफ बता दिया था कि अभी कुछ देर बाद यहां क्या ड्रामा होने वाला है । विजय को अपनी हत्या की योजना के रहस्योंद्धाटन पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ था । वह अच्छी तरह जानता था कि उसका दरिन्दा हिंसक प्रवृत्ति का बाप उसे कभी जिन्दा नहीं छोडेगा. और कत्ल भी इस तरह करेगा कि साफ बचकर निक्ल जाएगा।

बिजय को हैरत तो इस वात पर हुई थी कि इस सपेरे ने एक भारी रकम लेकर क्यों पल्टा खाया । उसने उसके बाप की साजिश का भेद उसके सामने क्यों खोला?

और वह सपेरे से पूछे बिना नहीं रह सका था "योगी, एक बात बता । मेरे बाप ने जो कुछ किया, मेरी निगाह में ठीक ही किया, लेकिन तूने रुपया लेने के वावजूद वादा खिलाफी की । इसकी क्या वजह है?"

वह काले कपडे वाला सपेरा उसका सवाल सुनकर मुस्कराया उसकी मुस्कान बडी आकर्षक थी वह बोला--

"चौधरी विजय ॥ पहली बात तो यह है कि मैं वो सपेरा नहीँ हू--'जिसने रकम वसूल की वो सपेरा तो अपनी झोंपडी में मरा पडा. है । वैसे भी तुम्हारे वाप ने तुम्हारी मौत के बाद उसे मरवा देना था ।रह्र गई यह वात कि मैने तुम्हे तुम्हारे बाप की इस साजिश से क्यों आगाह किया तो इसके पीछे एक राज है । मै वह नहीं हूं जो तुम्हें नजर आ रहा हूं। नहीं...कोईं सवाल मत करी । वक्त बहुत कम हैं... मेरे पास भी और तुम्हारे पास भी! यह कुल्हाडी पकडो और इसके ऊपर लेट जाओ । जव तुम्हारा बाप तुम्हारी लाश पर रोने आये तो लाठी की तरह सीधे ख़ड़े हो जाना। अगर तुम वार करने से एक क्षण को भी चूक गये तो समझ सकते हो क्या होगा? बाप के पास जर्मन रिवाॅल्बर रहता है जिसे निकालने में उस देर नहीँ लगनी। लो यह कुल्हाडी पकडो. खुद जिन्दा रहना चाहते हो तो उस दरिन्दे के जितने भी टुकड़े किए जा सके, कर देना । "

इसके वाद विजय ने उस 'काले कपडे' वाले से कोई सबाल नहीं किया। अब किसी सवाल की कोई गुजाइश भी नहीं रही थी। उसने कुल्हाडी जमीन पर डाली और उस पर लेटकर उसे अपने शरीर के नीचे छिपा लिया था।

रमाकात जिस सूमो में यहां तक पहुचा' था उसे उसका दूसरा वेटा सूरज ड्राइव कर रहा था । वह कल रात ही चण्डीगढ से लोट आया था । उसे पार्टी का टिकट नहीं मिल सका था और फिर उसे हवेली वापिस पहुचकर एक नई ही कहानी सुनने को मिलीं और जो रज' उसे टिक्ट न मिलने पर हुआ था, वह रज एकदम ही खुशी में बदल क्या था, क्योकि' अब भविष्य में सावनपुर का सब कुछ उसका ही होने बाला था और एक बार घना सेठो की जमात मे नाम लिखे जाने के बाद उसे हर छोटी बडी, पार्टी ने टिकट दे देना था।

सूरज, रमाकात के पीछे ही सुमो से उतरा। वह अपने बाप से दस पन्द्रह कदम ही पीछे था। उसक दिल में भी लड्डू फूट रहे थे । बस, अव कल्लाई मेक्स रह गया था।

कुछ देर बाद ही, सावनपुर के लोग अपने छोटे सरकार की लाश देखेंगे जिसे किसी बेह्रद जहरीले साप ने डस लिया था । छोटे सरकार घोडे. पर सबार होकर अपनी जागीर की सैर को निक्ले थे कि एक खैत्त में उस ऐय्याश शख्स ने एक लड़की देखी और वह घोडे सै उतरकर उस लडकी. के पिछे गये । खेतो मे काला साप मोजूद था उसने उन्हें डस लिया ।

और एक मासूम लड़की की इज्जत बच गई।

छोटे सरकार यानि विजय की मौत की यह कहानी गढी. गई भी I इस ड्रामे का हर पात्र अपनी जगह तेयार था और अपनी बारी आने पर अपना रोल निभाने व डायलॉग बोलने का प्रतीक्षक्त था । लेक्लि यहां तो बिसात ही उल्ट गई थी I

वह काले लिबास बाला सपेरा विसात को उल्ट गया था । औधे पडे. विजय के कानों में अभी 'मेरे बेटे' की आवाज आई थी कि वह उछलकर खडा, हो गया और फिर उसने एक भी क्षण गवाये बिना. कुल्हाडी तलवार की तरह घुमाई। बूढे रमाकांत का घमण्डी सिर तन से जुदा होकर जभीन पर जा पडा I फिर बिना सिर का धड. भी किसी शहतीर की तरह धडम¸ से जमीन पर आ पडा । विजय पर जुजून सबार हो गया था । उसने तेजी सै अपने बाप के शरीर को लकडी की तरह फाडकर, रखा सुरज जब खेत में दाखिल हुआ तो अपने भाई विजय को जीवित्त देखकर' उसके जिस्म में सनसनी फैल गई। वह खून में नहाया हुआ था और पागलों की तरह कुल्हाडी बरसा रहा था। सूरज ने फोरन रिवाल्वर निकाल लिया और इसस पहले कि विजय उसकी तरफ आकर्षित होता, उसने रिवाल्वर की तमाम गोलियां बिजय के सिर व पीठ में खाली कर दी ।

बिजय अपने ऊपर गोली चलाने वाले को न देख सका। वह अपने वाप की लाश के टुकडो पर गिरा i उसकी आत्मा भी उसके शरीर को छोड गई थी।

इमली के घने पेड़ पर बैठा वह काले लिवास वाला सपेरा इस दृश्य को देखकर मुस्कराया। अत्तत्त: जुल्म अपने अत' को पहुचा'। हर जुल्म की एक हद होती हे I जव वह हद से निक्ला है तो पिट जाता है l दो जालिम दरिन्दे मारे गये थे। बस एक जालिम बाकी बचा था और उसका भी अत' दूर नहीं था ।

वह काले लिबास वाला सपेरा 'लाल मौती' पेड पर एक खाली पिंजरा लिये बैठा था। जैसे ही सूरज ने अपने भाई बिजय का शरीर छलनी किया उसने खाली पिंजरे' का बडा. सा दरवाजा खौल दिया ।

दरवाजा खुलना था कि पंखों की फ़डफडाहट.. शुरू हो गई । उस खाली पिंजरे' मे बडे-बड़े उल्लू निकलकर हवा में उडने लगे । देखते ही देखत्ते बेशुमार उल्लूओ ने उस खैत्त को अपने घेरे में ले लिया।

इन उल्लूआँ को देखकर सूरज की सिंट्टी पिट्टी गुम ही गई थी। वह भागकर अपनी सूमों मेँ पहुचा' और शीशे चढाकर_ बैठ गया । सावनपुर के लोग जो अब नजदीक आ गये थे, वे भी पीछे ही रूक गये थे । उन उडते. हुए उल्लूओं ने हर व्यक्ति को हेरत में डाल दिया था। फिर इन आश्चर्यचकित लोगों व सूरज ने बडा ही भयानक व अजीब मजर' देखा।

वे उल्लू रमाकांत के टुकड़े टुकडे हुये बदन पर झपटे और उसके विभिन्न अगो' को अपने पंजो में दबाकर उडने… लगे। ये उल्लू खासे विशालकाय थे । रमाकात' की लाश के टुकड़े लेकर उडना उनके लिए कठिन काम नहीं था ।
 
सूरज ने एक उल्लू क्रो अपने बाप के सिर को पजों' में दबाये उडते. देखा I इस उल्लू का रूख हवेली की तरफ था। सूरज ने उसे कुछ दुर तक उडते. देखा, फिर वह अचानक नजरों से ओझल हो गया ।यही हाल उल्लूओँ का भी था।

वे जिस तेजी सै प्रगट हुए थे उसी तेजी से गायब हो गये । उल्लुओं के गायब हो जाने के बाद सूरज सूमों से उतरा। नीचे उतरकर चारों तरफ देखा । अब दूर तक कोई भी उल्लू उडता, हुआ नजर नहीं आ रहा था।

सूरज भागकर खेल में पहुचा । उसके भाई विजय की लाश मौजूद थी, लैकिन उन उल्लूओं ने उसका हाल कुछ इस कदर कर दिया था कि वह पहचानी नही जा रही थी-ओर उसके बाप रमाकात के जिस्म का एक टुकडा भी जमीन पर मौजूद नहीं था l वे गिद्धनूमा उल्लू उसके अगो' क्रो जाने कहा ले उड़ गये थे।

और घनी इमली पर बैठा वह काले लिबास वाला 'लाल मोती' भी अपनी जगह से गायब हो चुका था।

दीपक इस शाम जल्दी ही लोट आया था ।

वह प्राय: 'इबनिग' शो' करवाने के बाद ही अपने सिनेमा से घर लोटता था, पर आज उसकी तबियत सुवह से ही भारी थी, सो यह शाम होते ही वापिस लोट आया था l

घर पहुचकर उसने सीधा अपने बेडरूम का रुख किया था और कपडे बदले विना ही बिस्तर के हवाले हो गया था।

बगले में उसके साथ उसके अलावा सिर्फ एक नौकर विशन ही रहता था । दीपक को निढाल देखकर उसने चिन्तित स्तर में पूछा-- "सर जी, आपकी तबियत ती ठीक है ना?"

“नहीं बिशन । कुछ गडबड… है। तुम ऐसा करो चाय बना लाओ। "

"ठीक है सर जी! " यह कहकर विशन मुड़ा ही था कि तभी कॉलबेल बजी।

"विशन देखना तो कौन है दरवाजे पर?" दीपक ने सीधा होक्रर लेटते हुए कहा ।

विशन थोडी देर बाद ही लोटकर अन्दर आया । उसने बताया--"सर जी! बाहर गाडी, में एक बीबी जी बैठी हैं। कहती है' सावनपुर से आई हैँ और अपना नाम कामिनी बताती हैँ I "

"कामिनी । " दीपक बिस्तर से कुछ इस तरह उठा जेसे उसे किसी बिच्छु ने काट लिया हो।

वह तेजी से चलता हुआ बाहर आया । गाडी में वाकई बिजय की पत्नी कामिनी ही थी । वह दीपक को देखकर नीचे उतर आईं।

"कामिनी क्या हुआ कुशलता तो है।"

"कुशलता कहां भैय्या। हमारा सव बर्बाद हो गया। " यह कहकर वह वेअख्तयार ही दीपक से लिपट गइ और विलख़ बिलखकर रोने लगी।

दीपक ने बडी. मुश्किल से उसे अपने से अलग किया और उसे सहारा देकर अपने कमरे मै ले गया I विशन, कामिनी के लिए पानी का गिलास ले आया था।

"हा, कामिनी क्या हुआ?" दीफ्फ ने धडकते दिल से पूछा। कामिनी ने फिर रोना शुरू कर दिया । वह बिलख बिलखकर रो रही थी और अपना सीना भी पीट रही थी। दीपक ने उसके हाथ में बडी मुश्किल से पानी का गिलास थमाया और बोला--" खुद को संभालो कामिनी पानी पी लो । " कामिनी ने बडी मुश्किल सै पानी पिया-बडी. मुश्किल से खुद को सम्भाला। मुश्किल सै चुप हुईं ।

वह बडी अवसरवादी और शातिर चीज थी। ससुर और पति की मौत्त के बाद हवेली में सिर्फ सूरज बचा था। सूरज की बीबी से कामिनी की बनती नहीं थी। मौजूदा हालात में, जमीन-जायदाद सारी-की-सारी ने हडप_कर जानी थी।

शातिर कामीनी ने दीपक को पस्ख लिया था। जानती थी दीपक एक नेकदिल इंसान' था...लालच. स्वार्थ व बहस सै कोसों दूर था... I अब यह दीपक ही उसे इन्साफ दिला सकता था । हालाकि उसके पति बिजय ने दीपक को अपने हक में 'अघिकार-पत्र' लिख़ने को मजबूर कर दिया था । बडी ज्यादती दिखाई थी पर इस पर भी कामिनी को विश्वास था कि वह जव आसू बहाती दीपक के कदमों में गिरेगी तो दीपक उसे माफ कर देगा ।

कामिनी इसीलिए सीधे दिल्ली आई थी। वह अपना दुख बयान करके दीपक की हमदर्दी समेट लेना चाहती थी l ।

कामिनी अपने ड्रामेबाजी से दीपक कीं हमदर्दी बटोरने में कामयाब रही।

सावनपुर से वह एक बडी और बुरी खबर लेकर आई थी । दीपक का वाप और भाई दोनों एक साथ चल चल बसे थे। यह एक पागल कर देने बाला हादसा था, लेकिन दीपक ने जब इस बारे मॅ सुना तो उसके चेहरे सै जरा भी दुख जाहिर नहीं हुआ।

दो दरिन्दे अपने ही हाथों मारे गये थे। हालाकि बाप भाई थे, पर दीपक ने मुद्दर्तों पहले इन रिश्तों की चिता जला दी थी।

वे किसी के बाप भाई न थे।

पैसा उनका बाप और जायदाद उनका भाई था ।

ऐसे लोगों की मौत पर तो दिखावे के दो आसू बहाना भी बेकार था।

कामिनी हालाँकि वापिस जाने को तैयार नहीं थी । वह दीपक को अपने साथ ले जाना चाहती थी-लेकिन दीपक ने झूठे दिलासे देकर उसी रात रवाना कर दिया I कामिनी के बाद दीपक अपने बेडरूम मे आ गया और बेड पर बैठकर उसने मॉडल टाउन इन्द्रजीत को फोन किया। उधर घटी बजनी शुरू हुई तो दीपक ने बाॅल क्लाक पर नजर डाली। रात के नौ बजे थे। तीसरी घटी के बाद उधर किसी ने रिसीवर उठाया। कॉल नौकर रामू ने रिसीव की थी ।

"हा रामू। मैं दीपक बोल रहा हूं। " दीपक बोला--"सब लोग कहां हैँ?"

"नमस्कार साहव जी । " नौकर आदर से बोला, फिर उसने बताया "सब लोग खाना खा रहे हैं, साहव जी। आप होल्ड कीजिए, मैं जाकर बताता हूं। "

"ठहरो रामू मेरी बात ध्यान से सुनो । मैं फोन बन्द कर रहा हू। आधे घटे बाद फिर फोन करूगा। मेरी काल के बारे में उन्हें तुम्हें अभी कुछ नहीं बताना है। मेरी बात समझ गए ना।"

"जी साहब जी। समझ गया जी। "

रामू ने खाने के दौरान तो न बताया, लेकिन जेसे ही वे लोग खाने से फारिग हुए तौ उसने रेखा को दीपक की कॉल के बारे में बता दिया l रेखा फोरन फोन की तरफ बढी । उसने दीपक का नम्बर लगाया और फिर सम्बन्ध स्थापित होने पर बोली--

"आपने फोन किया था, भैय्या। "

"जी, किया तो था। ” दीपक धीरे से वोला ।

"रामू को मना क्यो किया था? आखिर आप ऐसा तक्लुफ क्यों दिखाते है? क्या हम खाना छोडकर, आपका फोन नहीं सुन सकते?" रेखा के लहजे में शिकायत थी।

दीपक ने उसकी अनसुनी-सी करते हुए कहा-- "रेखा, एक ख़बर सुनो। तुम्हारे बाप का कातिल इस दुनिया से उठ गया है। " दीपक का स्वर एकदम भावहीन था।

"यह क्या कह रहे हैं आप?" रेखा का दिल धडकने लगा। " और इन्द्रजीत के कत्ल की साजिश में शरीक विजय भी चल बसा l " दीपक ने आगे बताया।

"दीपक भैय्या मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा कि आप क्या कह रहे है। आप होल्ड रखें, मै इन्द्र भैय्या को बुलाती हूं। " रेखा बदहवास हो रही थी।

और फिर जब दीपक ने इन्द्रजीत को सव-कृछ खुलकर कह सुनाया तो इन्द्रजीत्त ने फौरन कहा "दीपक, मै अभी तुम्हारे पास आ रहा हूं। "

इतना कहकर इन्द्रजीत ने सम्बन्ध विच्छेद कर लिया I रिसीवर रख वह कुछ देर सोचता रहा और फिर उसने रिसीवर उठाकर बलदेव अंकल के नम्बर डायल किये। सावनपुर की ख़बरें सुन इन्द्रजीत्त का दिमाग चकरा रहा था ।
 
बलदेव को उसने सारा वाक्या बताया तो उन्होवे कहा "यह तो बहुत बुरा हुआ है इन्द्र बहरहाल, वे लोग जैसे भी थे दीपक के भाई बाप।। फोरन दीपक के पास शोक के लिए जाना चाहिये। फिर मरने वाले भी तो कुछ थे I "

”जी अंकल।" इन्द्र खुद सोच ही रहा था "मै रेखा के साथ वहा जा व्हा हूं आप भी वहा' पहुच' जाएं। "

और फिर ।।

जव इन्द्रजीत्त, रेखा के साथ दीपक के बगले पर पहुचा' तो दीपक उसे देखते ही वेअख्तयार उससे लिपट गया और रोने लगा। इन्द्रजीत्त ने उसे अपनी वाहो में भीच लिया और फिर धीरे धीरे उसका कंधा थपथपाता रहा...बोला कुछ नहीं।

कुछ देर बाद दीपक उससे अलग हुआ और अपनी आसू भरी आखै पोछ बोला

"यह मत्त समझना कि मैं अपने बाप भाई की मौत पर आसू बहा रहा हूं मुझे तो इस बात पर रोना आ रहा है कि मै एक शेतान बाप का और जालिम भाई का भाईं हूं। इस कलंक के टीके को मैं अपने माथे से मिटाना चाहू भी तो नहीं पिटा सकता... । "

"दीपक...मत करो ऐसी बातें । मैंने अपने बाप के कातिल को माफ किया। मैँने अपने कत्ल की साजिश करने वाले को भी माफ किया । क्यों रेखा, तुम क्या कहती हो?"

"मैं भी यही कहती हू जो आपने कहा । " रेखा धीमे से बोली ।

"आओ दीपका चलें। हमें वहा जाना चाहिये । "

यू सावनपुर जाने का प्रोग्राम बन गया ।

जव वे सावनपुर पहुचे' तो सुबह हो रही थी। गाडी इन्द्रजीत ड्राइव कर रहा था। दीपक उसके साथ अगली सीट पर बैठा था और पिछली सीट पर अकल बलदेव के साथ रेखा बैठी थी । तीन-चार घंटों का यह सफर लगभग खामोशी में कटा था ।

हर व्यक्ति अपनी जगह सोचो में गुम था ।

दीपक की सोचें कुछ ज्यादा ही सजीदा' थीं। उसे अदाजा नहीं था कि अब उसके जिन्दा बचे भाई सूरज का रवैया उसके प्रति केसा होगा?

जब वे सावनपुर पहुचे तो सूरज पूर्वाचल से अपना सिर उभार रहा था। सावनपुर मेँ यह एक नया सवेरा था । नया सूरज था जिसकी नर्म किरणे हवेली के उच्चे' दरवाजे को रोशन कर रही थी । जुल्म का अंधेरा दुर हो रहा था । यह एक नई चमकती सुबह की शुरूआत्त थी।

हवेली के दो 'काले सूरज' अस्त हो चुके थे। एक सूरज रह गया था । उसके बारे में भी एक बुरी ख्वर हथेली में उनकी प्रतीक्षक थी।

हवेली का आखिरी 'काला सूरज' जिसका नाम ही सूरज था-- भी चल बसा था।

हुआ यह था कि सूरज जब विजय को गोलियों से छलनी करने के बाद सूमो में बैठा तो वह बेशुमार उल्लूओं की तवज्जो का केंद्र बन गया था । फिर उसके देखते ही-देख़तै उसके बाप रमाकात कीं लाश के टुकड़े बिशालकाय उल्लू ले उड़े, वहा पडी बिजय की लाश का चेहरा उल्लूओ ने नोच-खसोटकर सत विक्षप्त कर डाला और अब खुद सूरज के लिए मेदान साफ था। वह अन्दर से बहुत खुश था l अब उसे एक नेता बनने से कोई नहीं रोक सकता था I वह सूमो पर निक्ल लिया था । वह खुशी-खुशी हवेली की तरफ चला, पर अभी वह ज्यादा दूर नहीँ पहुचा था कि अचानक उसे फुफकार की आवाज सुनाई दी। उसके बराबर वाली सीट पर एक बेहद खतरनाक चमकीला काला नाग कुण्डली मारे बैठा था । यह साप अचानक ही कही से प्रगट हुआ था और फिर उस नाग ने सूरज को सम्भलने का मोका नहीँ दिया । सांप अविश्वसनीय तेजी से सूरज की तरफ़ उछला और उसने सूरज की गर्दन में दांत गाड़ दिए।

फिर चलती गाडी खुद ही रुक गई और क्यों न रूकती-खुद सूरज की जिन्दगी की गाडी. जो तबाह हो चुकी थी । सूरज के दुखद अत कीं यह कहानी उन्हें सावनपुर पहुचकर ही सुनने क्रो मिली थीं।

वक्त ने एक नई करवट ली थी ।

यह एक नए दौर की शुरुआत थी I जुल्म के बादल, इन्साफ की हवाएं ले उडी. । अन्धेरे छट गए। हर तरफ खुशबू भरी हवाए चलने लगी I बाहर का मौसम अंगडाई लेकर उठ बैठा । हर तरफ हुस्न-ही-हुस्न बिखरा था।

अब कोई रूकावट न रही थी। अब तो खुशियां लुटाने व समेटने के दिन थे।

एक समस्या थी और वह समस्या गंगा मौसी और अंकल बलदेव की शादी की थी । रेखा की उन्हें एक साथ देखने की बडी ख्वाहिश थी । उसने तय कर लिया था कि चाहे कुछ हो जाये, वह उन दोनों को प्रणय सूत्र मे बाधकर रहेगी और यह रेखा की कोशिशों का नतीजा था कि वे अंततः एक होने पर राजी हो गये थे।

रेखा चाहती थी कि उनकी शादी धूमधाम सै हो, लेकिन इसके लिए न गंगा मोसी राजी थी और न ही अक्ल बलदेव । वह चाहते थे कि अब चुपचाप किसी मन्दिर में फेरे ले ले और यूं यह शादी भी अक्ल बलदेव रेखा व इन्द्रजीत की शादी के बाद करना चाहतें थें । मगर इन्द्रजीत की यह इच्छा थी कि वह अपनी शादी से पहले रेखा को बिदा करे और रेखा चाहती थी कि पहले वह भाभी घर में आए-फिर वह घर से जाये।

बहस ने जन्म लिया और इन्हीं मुद्दों पर बहस होती रही I फिर अन्तत्त: इन समस्याओं का हल यू निक्ला कि 'पहले आप-पहले आप' की बजाय-'हम सब एक साथ' पर अमल किया जाए ।

सौ एक बडे होटल मे शादी का हॉल बुक कर लिया गया। इसके साथ ही तीन 'डबल वेड' रूम भी रिजर्व करवा लिये गए थे । मे तीनों कमरे बराबर बराबर थे और पूरे दस दिन के लिए बुक किए गए थे।

शादी समारोह में-खास अतिथि आमत्रित थे। स्टेज पर तीन दुल्हे और तीन दुल्हनें थीं । सबसे दिलचस्प जोडी गंगा मोसी ओर बलदेव की थीं । गंगा' मौसी को पार्लर बालों ने बडे सलीके से सवारा था I इस उम्र में भी चेहरे पर दुल्हनों वाला रूप आ गया था । वह बहुत प्यारी लग रही धी ।नयना और रेखा तो खैर थीं ही सुन्दर, लेक्लि मेकअप ने नयना की उम्र कुछ और ही घटा दी थी। इन तीनों में सबसे कम उम्र दुल्हन रेखा थीं । हल्के सै मेकअप से ही उसका चाद'-सा चेहरा और भी खिल उठा था।

तीनों दुल्हनें एक सी साडियों मे थीं। यही हालत दुल्हो की थी I उनके सूट भी एक रग के थे । जिस तरह दुल्हनों में रेखा नम्बर वन थी वेसे ही मुस्कराते चेहरे बाला प्रेम सागर दूल्हो में नम्बर बन था ।

अतल: सामूहिक शादिर्यों का यह महकता समारोह सम्पत्र हुआ। विदाई का वक्त आया।

सबसे पहले इन्द्रजीत ने अपनी बहन को बिदा किया । फिर अंकल ने इन्द्रजीत्त व नयना को आशीर्वाद दे रुख्सत किया । रह गये गगा मौसी और अंकल बलदेव उन्हें दीपक उनके कमरे तक छोडकर आया।

इस महकते समारोह में सबसे ज्यादा भाग दौड दीपक क्रो ही करनी पडी थी और उसकी खुशी व कार्य -कुशलता सचमुच ही देखने वाली थी ।

यह एक बेहद ही हसीन रात थी और क्यों न होती यह छ दिलों के मिलाप की रात थी। धीमी आच देती हुई सरगोशिया सासों कीं महक मुस्कराहटें नीची निगाहों का नशा खनकती चूडिया , खिलती हुई खुशबूभरे बदन सनसनी फैलाती हुई ख्वाहिशें निखरते हुए अरमान तपती भाव्रनाए क्या नहीं था वहा।

यह एक बेहद हसीन महकर्ता महकात्ती रात थी I

पर यह रात साबिक राजूमदारी की बेटी कटारी पर कयामत बनकर आई ।बडी. बैचैन थी वह और इस बेचैनी से बेचैन वह आखिरकार अपनी झोपडी से बाहर निक्ली । उस पर वहशत व्याप्त थी । यू महसूस होता था जैसै कोई उसका गला दबा रहा हो । धडकने बन्द हुईं जा रही थी । इस वहशत में उसने अपने रीछ को खौल लिया। बंदर निकट ही सो रहा था I वह कटारी को करीव पाकर फोरन उठ गया और 'को कौ' करके कलाबाजियां खाने लगा।

कटारी ने उसकी भी रस्सी खोल ली और फिर उन दोनों से बौली--"चलो, मेरे साथ ।"

खटर-पटर की आबाज सुनकर पडोस. की झोपडी में रहने बाली शायमा की आख' खुल गई। वह इतनी रात गए कटारी को अपने जानवरो के साथ निकलते देखकर हैरान रह गई। वह फौरन बाहर आगई।

“अरे कटारी! इतनी रात में कहा जा रही हो?" उसने कटारी से पूछा।

"कही नहीँ, मौसी ! तू सो जा । " कटारी ने रूखे लहजे में जबाब दिया ।

"अरी फिर भी कुछ बता तो... । " शायमा मोसी चिन्तित हो उठी ।

"क्या बताऊं मोसी? मैं खुद ही नहीं जानती। " कटारी असहाय सी बोली | उस पर न जाने क्या बीत रही थी ।

"तू पागल हुई है क्या?" मोसी उसे घूरने लगी ।

"हा मोसी! पागल ही हो गई हू। मैं जा रही हूं मोसी । मुझे अब मत ढूढना'। मै किसी के ढूढे न मिलूगी'। " कटारी के स्वर में दर्द था । यह कहते हुए उसका गला रूध गया था।

फिर वह स्की नहीं। अपने रीछ और बन्दर के साथ निकल पडी। नहीं जानती थी कि उसे कहा जाना है? बस, कदम उठ रहे थे और वह चल रही थी ।
 

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