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वही हुआ जिसका डर था-यानी टॉर्चर के कारण ड्राइवर चीखता-चिल्लाता-रोता-गिडगिडाता किन्तु बिना कुछ बताए बेहोश हो जाता । हालाकि' कक्ष अत्यन्त छोटा होने के कारण. विकास को उसे बहुत ज्यादा टॉर्चर करने में दिक्कत हो रही थी-टॉर्चर कै लिए उसके पास शस्त्र भी छोटे-मोटे. ही थे और वेसे भी वह ड्राइवर को मार ड्रालने की हद तक टॉर्चर नहीँ कर सकता था।
उसके मरते ही रही-सही आशा भी घूमिल हो जानी. थी I . .
कक्ष कै अन्दर विकास के पास जो साधन थे उसने वे सभी उस हद तक इस्तेमाल कर लिए थे जिस हद तक कर सकता था ।
उसका अनुमान था कि ड्राइवर थोडे-से टॉर्चर के बाद ही बक देगा ।
किन्तु-वह अत्यन्त ही सख्त निकला ।
यातनाएं सहता हुआ वह पाचवी बार भी बेहोश हो गया-कदाचित ड्राइवर की इस दृढता, कै पीछे उसका यह समझ जाना था कि जब~ तक वह नम्बर नहीँ बताएगा तब तक सुरक्षित है यानी बिकास उसे मार नहीं सकता और जब तक वह नम्बर नही बताएगा तव तक विकास भी यहां कैद रहेगा…वह समझ चुका था कि उसके टूटते ही न केवल विकासं इस कैद से मुक्त हो जाएगा, बल्कि उसी क्षण उसे भी गोली मार दी जिऐगी निश्चय कर लिया था कि यदि मरना ही है तो विकास को साथ लेकर क्यो न मरे.....
…इसी विचार वे उसे जुबान ना खोलने पर दृढ कर दिया था I
सुबह के सात बज गए ।
बैन के बाहर चहलकदमी करते हुए सरदार का दिल बहुत जोर-जोर से धडखने लगा…उसे यकीन-सा हो गया था कि ड्राइवर किसी भी तरीके से जुबान खोलने वाला नही हे…उघर करीम चाचा ने एक घण्टे पह्रले अन्दर से कहा था कि सिर्फ एक अक तलाश करना बाकी रह गया । . .
साढे सात बजे-अचानक ही वेन के पिछले हिस्से का शटर 'उठता चला गया ।
सरदार उस तरफ़ लपका-करीम चाचा वेन से बाहर कूद पडे… उनका सारा जिस्म पसीने से तर-बतर था…चेहरे पर थकान के स्पष्ट लक्षण-मस्तक से पसीना पोछते हुए वे वुदचुदाए-“उफ्फ इतना पेचीदा लॉक मैने पहले कभी नहीँ देखा…पहली बार ही किसी लाक को खोलने मे मुझे इतना समय लगा है ।
सरदार कुछ नही बोला । हाशमी और मुमताज भी वेन के खुले दरवाजे से हाल के फ़र्श पर कूद पडे…रात के दो बजे के करीब मुमताज की चेतना वापस लौट चुकी थी…उसके जख्म पर पट्टी बधी थी…अत्यधिक खून निक्ल जाने के कारण चेहरा भले ही पीला नजर आ रहा हो किंतु दर्द या थकान का कोई चिह नहीं था I
बाहर निकलते ही उसने पूछा---- "ड्राइविंग कक्ष का दरवाजा खुला या नहीं?”
"नहीं॥ " सरदार का संक्षिप्त उत्तर ।
"ओह ॥"
मेजर हाशमी अभी कुछ कहना ही चाहता था कि ड्राइदिग' कक्ष से विकास की आवाज उभरी… लगता है कि ककरीम चाचा अपनी कोशिश मे कामयाब हो गए हैं?”
करीम चाचा उस तरफ बढते हुए बोले-“हां विकास बेटे लेकिन तुम?”
“मैं तो इस हरामजादे ड्राइवर के रहमोकरम पर हू करीम चाचा । "
"क्यों-क्या कहता है?"
. “यदि यह कुछ कहे तो सारी समस्या ही हल न हो जाए?“
ॐॐॐॐॐ
हाशमी ने पूछा…"इस वक्त वह किस हालत मे है?"
“बेहोश । I"
“होश में लाकर इस हरामजादे को और ज्यादा टॉर्चर करो I"
"कोई फायदा नहीं होगा हाशमी अकल…मैं इसे इतना ज्यादा टॉर्चर कर चुका हूं कि अब यह मेरे एक ही थप्पड में मर सकता है ।यह कुछ नहीँ बताएगा क्योंकि समझ चुका है कि यह केवल उसी समय तक जीबित है जव तक यह जुबान बन्द रखे हे ।"
"त तो फिर-अब क्या होगा?"
"मै खुद उलझन में हू…इस हरामजादे ने अजीब समस्या खडी कर दी है…समझ में नहीं आ रहा. हे कि क्या करू-जो कुछ मैंने मजलिस्तान में किया है उसकी गूंज सारी दुनिया में गूज रही होगी या कुछ ही देर बाद गूज जाऐगी…अगर मैने फोरन दुनिया के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की तो सारी दुनिया के सामने मेरे देश की स्थिति बडी अजीब हो जाएगी ।"
"और वह काम तुम उस केबिन से बाहर निकले बिना नहीं कर सकते ।"
अन्दर सग्नाटा छा गया
जैसे विकास के पास करने के लिए कुछ रहा ही न हो l
सभी उलझन में फस गए थे…किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था…क्या करें?
अब सिर्फ एक तरकीब रह गई है । अचानक सरदार ने कहा ।
अन्दर से तुरन्त पूछा गया-."'क्या?"
करीम चाचा-हाशमी ओंर मुमताज ने भी आशाजनक प्रश्नवाचक चिन्ह के साथ सरदार की तरफ देखा--
कुछ सोचते हुए सरदार ने कहा---" ड्राइवर के अलावा केवल दो व्यक्ति इस लॉक के नम्बर को जानते है-पहला कर्नल तोम्बो ओंर दूसरा मेजर मुकाम्बो !"
"ओह !"
"किसी तरह उनमें से किसी को कब्जे में करके नम्बर पूछा जाए !"
विकास ने कहा-- "यह त्तो हो सकता है लेकिन....!"
"लेकिन क्या?"
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उसके मरते ही रही-सही आशा भी घूमिल हो जानी. थी I . .
कक्ष कै अन्दर विकास के पास जो साधन थे उसने वे सभी उस हद तक इस्तेमाल कर लिए थे जिस हद तक कर सकता था ।
उसका अनुमान था कि ड्राइवर थोडे-से टॉर्चर के बाद ही बक देगा ।
किन्तु-वह अत्यन्त ही सख्त निकला ।
यातनाएं सहता हुआ वह पाचवी बार भी बेहोश हो गया-कदाचित ड्राइवर की इस दृढता, कै पीछे उसका यह समझ जाना था कि जब~ तक वह नम्बर नहीँ बताएगा तब तक सुरक्षित है यानी बिकास उसे मार नहीं सकता और जब तक वह नम्बर नही बताएगा तव तक विकास भी यहां कैद रहेगा…वह समझ चुका था कि उसके टूटते ही न केवल विकासं इस कैद से मुक्त हो जाएगा, बल्कि उसी क्षण उसे भी गोली मार दी जिऐगी निश्चय कर लिया था कि यदि मरना ही है तो विकास को साथ लेकर क्यो न मरे.....
…इसी विचार वे उसे जुबान ना खोलने पर दृढ कर दिया था I
सुबह के सात बज गए ।
बैन के बाहर चहलकदमी करते हुए सरदार का दिल बहुत जोर-जोर से धडखने लगा…उसे यकीन-सा हो गया था कि ड्राइवर किसी भी तरीके से जुबान खोलने वाला नही हे…उघर करीम चाचा ने एक घण्टे पह्रले अन्दर से कहा था कि सिर्फ एक अक तलाश करना बाकी रह गया । . .
साढे सात बजे-अचानक ही वेन के पिछले हिस्से का शटर 'उठता चला गया ।
सरदार उस तरफ़ लपका-करीम चाचा वेन से बाहर कूद पडे… उनका सारा जिस्म पसीने से तर-बतर था…चेहरे पर थकान के स्पष्ट लक्षण-मस्तक से पसीना पोछते हुए वे वुदचुदाए-“उफ्फ इतना पेचीदा लॉक मैने पहले कभी नहीँ देखा…पहली बार ही किसी लाक को खोलने मे मुझे इतना समय लगा है ।
सरदार कुछ नही बोला । हाशमी और मुमताज भी वेन के खुले दरवाजे से हाल के फ़र्श पर कूद पडे…रात के दो बजे के करीब मुमताज की चेतना वापस लौट चुकी थी…उसके जख्म पर पट्टी बधी थी…अत्यधिक खून निक्ल जाने के कारण चेहरा भले ही पीला नजर आ रहा हो किंतु दर्द या थकान का कोई चिह नहीं था I
बाहर निकलते ही उसने पूछा---- "ड्राइविंग कक्ष का दरवाजा खुला या नहीं?”
"नहीं॥ " सरदार का संक्षिप्त उत्तर ।
"ओह ॥"
मेजर हाशमी अभी कुछ कहना ही चाहता था कि ड्राइदिग' कक्ष से विकास की आवाज उभरी… लगता है कि ककरीम चाचा अपनी कोशिश मे कामयाब हो गए हैं?”
करीम चाचा उस तरफ बढते हुए बोले-“हां विकास बेटे लेकिन तुम?”
“मैं तो इस हरामजादे ड्राइवर के रहमोकरम पर हू करीम चाचा । "
"क्यों-क्या कहता है?"
. “यदि यह कुछ कहे तो सारी समस्या ही हल न हो जाए?“
ॐॐॐॐॐ
हाशमी ने पूछा…"इस वक्त वह किस हालत मे है?"
“बेहोश । I"
“होश में लाकर इस हरामजादे को और ज्यादा टॉर्चर करो I"
"कोई फायदा नहीं होगा हाशमी अकल…मैं इसे इतना ज्यादा टॉर्चर कर चुका हूं कि अब यह मेरे एक ही थप्पड में मर सकता है ।यह कुछ नहीँ बताएगा क्योंकि समझ चुका है कि यह केवल उसी समय तक जीबित है जव तक यह जुबान बन्द रखे हे ।"
"त तो फिर-अब क्या होगा?"
"मै खुद उलझन में हू…इस हरामजादे ने अजीब समस्या खडी कर दी है…समझ में नहीं आ रहा. हे कि क्या करू-जो कुछ मैंने मजलिस्तान में किया है उसकी गूंज सारी दुनिया में गूज रही होगी या कुछ ही देर बाद गूज जाऐगी…अगर मैने फोरन दुनिया के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की तो सारी दुनिया के सामने मेरे देश की स्थिति बडी अजीब हो जाएगी ।"
"और वह काम तुम उस केबिन से बाहर निकले बिना नहीं कर सकते ।"
अन्दर सग्नाटा छा गया
जैसे विकास के पास करने के लिए कुछ रहा ही न हो l
सभी उलझन में फस गए थे…किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था…क्या करें?
अब सिर्फ एक तरकीब रह गई है । अचानक सरदार ने कहा ।
अन्दर से तुरन्त पूछा गया-."'क्या?"
करीम चाचा-हाशमी ओंर मुमताज ने भी आशाजनक प्रश्नवाचक चिन्ह के साथ सरदार की तरफ देखा--
कुछ सोचते हुए सरदार ने कहा---" ड्राइवर के अलावा केवल दो व्यक्ति इस लॉक के नम्बर को जानते है-पहला कर्नल तोम्बो ओंर दूसरा मेजर मुकाम्बो !"
"ओह !"
"किसी तरह उनमें से किसी को कब्जे में करके नम्बर पूछा जाए !"
विकास ने कहा-- "यह त्तो हो सकता है लेकिन....!"
"लेकिन क्या?"
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