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धर्मयुद्ध (विजय विकास अंलफासे सीरीज)

वही हुआ जिसका डर था-यानी टॉर्चर के कारण ड्राइवर चीखता-चिल्लाता-रोता-गिडगिडाता किन्तु बिना कुछ बताए बेहोश हो जाता । हालाकि' कक्ष अत्यन्त छोटा होने के कारण. विकास को उसे बहुत ज्यादा टॉर्चर करने में दिक्कत हो रही थी-टॉर्चर कै लिए उसके पास शस्त्र भी छोटे-मोटे. ही थे और वेसे भी वह ड्राइवर को मार ड्रालने की हद तक टॉर्चर नहीँ कर सकता था।

उसके मरते ही रही-सही आशा भी घूमिल हो जानी. थी I . .

कक्ष कै अन्दर विकास के पास जो साधन थे उसने वे सभी उस हद तक इस्तेमाल कर लिए थे जिस हद तक कर सकता था ।

उसका अनुमान था कि ड्राइवर थोडे-से टॉर्चर के बाद ही बक देगा ।

किन्तु-वह अत्यन्त ही सख्त निकला ।

यातनाएं सहता हुआ वह पाचवी बार भी बेहोश हो गया-कदाचित ड्राइवर की इस दृढता, कै पीछे उसका यह समझ जाना था कि जब~ तक वह नम्बर नहीँ बताएगा तब तक सुरक्षित है यानी बिकास उसे मार नहीं सकता और जब तक वह नम्बर नही बताएगा तव तक विकास भी यहां कैद रहेगा…वह समझ चुका था कि उसके टूटते ही न केवल विकासं इस कैद से मुक्त हो जाएगा, बल्कि उसी क्षण उसे भी गोली मार दी जिऐगी निश्चय कर लिया था कि यदि मरना ही है तो विकास को साथ लेकर क्यो न मरे.....

…इसी विचार वे उसे जुबान ना खोलने पर दृढ कर दिया था I

सुबह के सात बज गए ।

बैन के बाहर चहलकदमी करते हुए सरदार का दिल बहुत जोर-जोर से धडखने लगा…उसे यकीन-सा हो गया था कि ड्राइवर किसी भी तरीके से जुबान खोलने वाला नही हे…उघर करीम चाचा ने एक घण्टे पह्रले अन्दर से कहा था कि सिर्फ एक अक तलाश करना बाकी रह गया । . .

साढे सात बजे-अचानक ही वेन के पिछले हिस्से का शटर 'उठता चला गया ।

सरदार उस तरफ़ लपका-करीम चाचा वेन से बाहर कूद पडे… उनका सारा जिस्म पसीने से तर-बतर था…चेहरे पर थकान के स्पष्ट लक्षण-मस्तक से पसीना पोछते हुए वे वुदचुदाए-“उफ्फ इतना पेचीदा लॉक मैने पहले कभी नहीँ देखा…पहली बार ही किसी लाक को खोलने मे मुझे इतना समय लगा है ।

सरदार कुछ नही बोला । हाशमी और मुमताज भी वेन के खुले दरवाजे से हाल के फ़र्श पर कूद पडे…रात के दो बजे के करीब मुमताज की चेतना वापस लौट चुकी थी…उसके जख्म पर पट्टी बधी थी…अत्यधिक खून निक्ल जाने के कारण चेहरा भले ही पीला नजर आ रहा हो किंतु दर्द या थकान का कोई चिह नहीं था I

बाहर निकलते ही उसने पूछा---- "ड्राइविंग कक्ष का दरवाजा खुला या नहीं?”

"नहीं॥ " सरदार का संक्षिप्त उत्तर ।

"ओह ॥"

मेजर हाशमी अभी कुछ कहना ही चाहता था कि ड्राइदिग' कक्ष से विकास की आवाज उभरी… लगता है कि ककरीम चाचा अपनी कोशिश मे कामयाब हो गए हैं?”

करीम चाचा उस तरफ बढते हुए बोले-“हां विकास बेटे लेकिन तुम?”

“मैं तो इस हरामजादे ड्राइवर के रहमोकरम पर हू करीम चाचा । "

"क्यों-क्या कहता है?"

. “यदि यह कुछ कहे तो सारी समस्या ही हल न हो जाए?“

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हाशमी ने पूछा…"इस वक्त वह किस हालत मे है?"

“बेहोश । I"

“होश में लाकर इस हरामजादे को और ज्यादा टॉर्चर करो I"

"कोई फायदा नहीं होगा हाशमी अकल…मैं इसे इतना ज्यादा टॉर्चर कर चुका हूं कि अब यह मेरे एक ही थप्पड में मर सकता है ।यह कुछ नहीँ बताएगा क्योंकि समझ चुका है कि यह केवल उसी समय तक जीबित है जव तक यह जुबान बन्द रखे हे ।"

"त तो फिर-अब क्या होगा?"

"मै खुद उलझन में हू…इस हरामजादे ने अजीब समस्या खडी कर दी है…समझ में नहीं आ रहा. हे कि क्या करू-जो कुछ मैंने मजलिस्तान में किया है उसकी गूंज सारी दुनिया में गूज रही होगी या कुछ ही देर बाद गूज जाऐगी…अगर मैने फोरन दुनिया के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की तो सारी दुनिया के सामने मेरे देश की स्थिति बडी अजीब हो जाएगी ।"

"और वह काम तुम उस केबिन से बाहर निकले बिना नहीं कर सकते ।"

अन्दर सग्नाटा छा गया

जैसे विकास के पास करने के लिए कुछ रहा ही न हो l

सभी उलझन में फस गए थे…किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था…क्या करें?

अब सिर्फ एक तरकीब रह गई है । अचानक सरदार ने कहा ।

अन्दर से तुरन्त पूछा गया-."'क्या?"

करीम चाचा-हाशमी ओंर मुमताज ने भी आशाजनक प्रश्नवाचक चिन्ह के साथ सरदार की तरफ देखा--

कुछ सोचते हुए सरदार ने कहा---" ड्राइवर के अलावा केवल दो व्यक्ति इस लॉक के नम्बर को जानते है-पहला कर्नल तोम्बो ओंर दूसरा मेजर मुकाम्बो !"

"ओह !"

"किसी तरह उनमें से किसी को कब्जे में करके नम्बर पूछा जाए !"

विकास ने कहा-- "यह त्तो हो सकता है लेकिन....!"

"लेकिन क्या?"

~~~

~~~
 
"कोई गारटी नहीं हैं कि आप लोग उनमें से किसी को कब्जे. में करके उसकी जुबान खुलवा ही ले---सबसे पहले तो उन्हें कब्जे में करना ही एक लम्बा काम है…उसके बाद उनके मुह से नम्बर उगलवाना-वे आसानी से नम्बर नहीं उगतेगें-प्रक्रिया लम्बी है । यदि तुम लोग उनमें से किसी की जुबान खुलवाने में क्रामयाब हो भी गए तब भी इतनी देर हो चूकी होगी कि मेरा देश बदनाम हो चुका होगा ।"

"सो तो है…लेकिन; इसके अलावा ह्मारे पास रास्ता भी क्या है?”

अदर पुन खामोशी छा गई ।

वेन कै बाहर भी वैसा ही सन्नाटा था-किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे या क्या करे-ड्राईबर ने उन्हें ऐसी दुविधा में फसा दिया. था किं उनके दिमाग जाम होकर रह गए थे ।

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सन्नाटा काफी लम्बा हो गया।

ड्राइविंग सीट पर बैठा बिकास जाली कै पार खडे सरदार, करीम चाचा हाशमी औंर मुमताज कौ स्पष्ट देख सकता था…जैसी स्थिति में वे चारों खडे थे लगभग वैसी ही स्थिति में बिकास भी था-झुझलाहट-सी सवार थी उस पर-उसे बधे रहने की आदत नही थी…इस छोटे-से केबिन में बडे ही अनोखे ढग से कैद होकर रह गया था वह-झुझलाहट इस केबिन पर थी ।

ड्राइवर पर थी ।

उस पर जो रेशम की डोरी में ज़कडा सीट पर पडा था-वुरी तरह जख्मी । बेहोश । . . उसपर नजर पडते ही बिकास का सारा चेहरा भभक उठा-जी चाहा कि हाथ बढ़ाकर ड्राइवर का गला दबा दे वह और उस वक्त तक दबाता ही रहे, जव तक कि उसके प्राण-पखेरू उड न जाए परंतु…ऐसा मी तो नहीं किया जा सक्ला था । कैसी विवशता थी विकास कसमसा उठा-ऐसी कैद अपनी जिन्दगी में उसने पहले कभी नहीं देखी थी । अचानक ही जाली के पार खडे सरदार ने पूछा--"क्या सोच रहे हो मिस्टर बिकास?"

"क... कुछ नहीं ।" कहते-कहते उसकी लृष्टि फ़र्श पर फिक्स उन चार गनों पर स्थिर हो गई, ,जो एक बटन दवाते ही सर्किट की तरह आगे की तरफ़ सरक जाती थीं-उन्हें देखते ही विकास के दिमाग में जाने क्या बिचार आया कि उसने बटन दबा दिया ।

हल्की-सीं खडखडाहट के साथ चारों गने सरकी-उनके सरकने ¸ तक स्टील' की बाडी में उनकी नालों के बराबर दायरे खुल गए और चारों गनों की नाले उन्हीं में से गुजरकर झाकने लगी

स्टील की चादर मे नाले एकदम फिक्स थीं-एक सूत जगह भी रिक्त नहीं. थी ॥॥

"ये तुम क्या कर रहे हो बिकास?" हाशमी की आवाज ।

विकास ने जाली के पार देखा....चारों की नजर वेन के अगले हिस्से से बाहर निकली चार नालों पर थी-उपरोक्त सवाल हाशमी ने . उन्ही नालों को द्रेखत्ते हुए किया था।

"एक मिनट-खामोश रहिए ।" कहऩे के साथ ही विकास ने बटन आँफ किया ।

गनें पीछे की तरफ सरक गईं-वेन की बाडी मेँ बने चारों मोखले बन्द ।

विकास ने बटन पुन आन किया-चार मोखले बने-चारों गने आगे की तरफ सरकी----मोखलों के पार निकलकर वेन के बाहर झाकने लगीं।

फिर…विकास बार-बार बटन को आँन-आँफ करने. लगा I

रहू-रहकर मोखला बनने और बन्द होने लगा-गने आगे-पीछे सरकने लर्गी-बटन आन होते ही चार मोखले बनते…सरकरर चारों नाले उनमे समा जाती-आंफ़ होते ही गने वापस सरक आतीं ।

मोखले बन्द I

किसी बिचार से विकास की आखे चमक उठी l

सरदार ने पूछा…“ये तुम क्या कर रहे हो विकास?”

"देखते रहिए ।" कहने के साथ ही विकास ने बटन आँफ किया । गने अन्दर की तरफ़ सरक गईं-मोखले बंद…बिकास ड्राइविग सीट से उठ खडा हुआ-झुका-दोनों हाथों से उसने फर्श पर फिक्स चार में से एक गन पर अपने दोनों हाथ जमाए फिर एक तेज झटका दिया ।

गन सरकने वाली पत्ती से अलग होकर उसके हाथ में आ गई ।
 
वे कई तार टूट गए थे जिन्होने इस गन को सरकने वाली पत्ती पर फिक्स कर रखा था…विकास ने गन एक तरफ डाली और' बटन आंन कर दिया-मोखले बने-तीन गने सरककर अपने-अपने मोखलो में फिक्स हो गई किंतु एक मोखला यू ही बना रहा-सरकने वाली पत्ती सरकी जरूर थी किन्तु मोखले पर फिक्स होने के साथ अब गन अटैन्ड कहा थी?

"अरे-एक गन कहा है? " मुमताज कह उठी ।

"मेरे पास । विकास ने जवाब दिया…"मैंने उसे उखाड लिया ।

"म मगर क्यों?”

"अब वेन की इस मजबूत स्टील की चादर के आर-पार गन क्रो , नाल के व्यास का मोखला बन गया है । वह तो हम देख रहे हे…लेकिन इससे होगा क्या?"

इस बार लडके के प्यारे होंठों पर बडी ही प्यारी मुस्कान उभरी बोला---"अब मुझे अपना काम करनै के लिए चालक कक्ष का दरवाजा खुलने का इन्तजार करना ज़रूरी नहीं है I"

" क्या मतलब? "

" आठ बज रहे हैं I" विकास ने रिस्टवॉच पर नज़र डालते हुए , कहा-"रेडियो स्टेशन काफी पहले ही चालू हो चुका होगा।। फौरन अपने अभियान की तरफ निकल जाना चाहिए ।"'

"कौन-से अभियान की तरफ?”

"उसी पर जिसके लिए वै इस कैद से निकलने के लिए इतना व्यग्र …था अथवा जिस अभियान पर रवाना होने की योजना हमने इस वेन को किडनैप करने से पहले बनाई थी-आपने कहा था कि यह सब कुछ करने से पहले इस वेन को कब्जे में करना जरूरी है-इस वक्त वेन हमारे कब्जे. मेँ है ।"

“म.... मगर-तुम तो इस केबिन मे कैद.....!"

" अभियान पूरा करने के लिए. अब मेरा इस कैद से निक्लना जरूरी नहीँ है ।"

“हम सभझे नही ।"

"इस वेन से निकलने मे मुझे समय लगेगा…मेरे पास उतना समय नहीं हे…आप' जानते हैं कि यदि बहुत जल्दी ही मेरी आवाज़ सारी दुनिया में न गूजी तो सब गडबड हो जाएगा ।"

" वह सब तो ठीक है लेकिन इस तरह कैद में रहकर भला तुम कैसे......... ?"
 
आप इस मोखले के माध्यम से माइक मुझे दे देंगे ।"

“ओह । ” सरदार के मुह से यह एकमात्र शब्द निक्ला और फिर उसकी आखों में बिकास के लिए स्पष्ट प्रशंसा के भाव उभर आए । वह ~ पूरी तरह समझ चुका था कि कि उस शैतान लडके की योजना क्या हे

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बहुत तेज और लम्बे…लम्बे कदमो के साथ र्कनल तोम्बो राष्ट्रपति भवन के उस छोटे-से कमरे में प्रविष्ट हुआ जिसमें गार्जियन पहले से ही मोजूद थे…उसे देखते ही एक साथ दोनों ने व्यग्रतापूर्बक पूछा… क्या रहा?”

"सेमिनार से मेरी ब्राते हो गईं हैँ I "

"क्या बातें हुईं?"

" भारतीय सरकार विकास को कब्जे मेँ करने के लिए एक जासूस भेज रही हैँ।"

इबलीस कह उठा…"एक जासूस?"

"भला एक जासूस उस शैतान का क्या बिगाड सकेगा? ” गार्जियन बोला…"वह लडका पूरी फौजों के बस का रोग नहीं है…उसके लिए तो भारत कै सारे जासूसों की टीम चाहिए-फिर भी यह दावे के साथ नहीँ कहा जा सकता कि डबल एक्स फाइव उनके काबू मेँ आ ही जाऐगा एक तो वह खुद ही शैतान-दूसरे इस वक्त तो वेन भी उसकें पास हे-नही एक जासूस तो उसे छू तक नहीं सकेगा I"

"मैने भी यही कह्म था ।।"

“ फिर ....?"

"सेमिनार कै गृहमन्त्री का कहना है कि वह जासूस विकास का गुरु हैं l"

”गुरु ।।" इबलीस ने कहा…"कही वही, तो नहीं जिसके बारे में विकास ने बातों-बात्तों में जिक्र किया था?”

" हा वही I" कर्नल तोम्बो ने बताया---"उसका नाम विजय हे ।"

यह सव कुछ सुनकर भी गार्जियन और इवलीस के चेहरे पर सन्तुष्टि कै भाव नहीं उभरे-वे यकीन नहीं कर पा रहे थे कि विकास कै मुकाबले में कोई अकेला व्यक्ति ही ऐसी हस्ती हो सकता है, जो बिकास को काबू मे कर सकै.…

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गार्जियन ने कह ही दिया-"मुझें तो यकीन नहीं है कि विजय अकेला बिकास का क्राबू में कर लेगा I”

"वह उसका गुरु है I”

"कछ भी सही…मुझे नहीं लगता-इस वक्त वेन भी तो उसी के कब्जे में है ।"

“फिर भी वह उसका गुरू हे और गुरु-गुरु ही होता है ।"

इबलीस ने जैसे अपने ही मन को समझाया…"'मुमकिन है खुद विकास ने अपने गुरु की काफी तारीफ़ की थी…यदि भारतीय सरकार उसे विकास के मुकाबले पर भेज रही है तो अवश्य ही वह भी क्रोई चीज होगी ।"

"खैर-बह कब आ रहा है?" गार्जियन ने पूछा ।

कर्नल तोम्बो ने क्लाई में बंधी रिस्टवाॅच पर नजर डाली और बोला…"'इस वक्त साढे नौ बजे हैं-यहां कै और इण्डिया के टाइम में सिर्फ पन्द्रह मिनट का अन्तर है-इण्डिया में इस वक्त सवा नौ बज रहे होंमे-अपने हिसाब से वह ठीक दस बजे वहा से रवाना हो जाएगा और हमारे हिसाब से यहा ठीक शाम पाच बजे पहुचेगा . .!"

जनरल इबलीस ने कुछ कहने के लिए अभी मुह खोला ही था कि अचानक कमरे में पिक-पिक की ध्वनि गूजने लगी-तीनों चौंके ।

लम्बे कदमों के साथ गार्जियन एक अलमारी के समीप पहुचा ।

किवाड खोले.......अलमारी में एक शक्तिशाली ट्रासमीटर फिक्स था ।

जब तक उसने ट्रांसमीटर आँन किया तब तक इबलीस और तोम्बो भी उसके दाए-बाए पहुच चुके थे…माइक से निक्लकर एक _ आवाज निरन्तर कमरे में गूज रही थी…“हैलो...... हैलो…कैप्टन मलखान हीयर सर…कैप्टन मलखान रिपोर्टिंग-ओवर ।"

"यस-गार्जियन हीयर,…रिपोर्ट ।"

"स. . .सर !" मलखाने की आवाज… से ही, जाहिर था कि वह बुरी तरह आतकित हैँ, बोला-"वेन राजधानी की सडकों से गुजर रही है-वह अपने चारों तरफ़ आग बरसाती चली जा रही हे सर-हमारे सैनिक उस पर फायरिंग कर रहे हैं-मगर सिर्फ हमारे सैनिक ही मारे जा रहे हैं सर…जिन सडकों से वेन गुजरती जा रही है उन पर मौत का नगा नाच हो रहा है l"

"उफ्-इस वक्त वेन कहा है? "

"मल्ला बाजार से गुजर रही है सर…हम _क्या करें?"

गार्जियन ने इबलीस और कर्नल तोम्बो की तरफ देखा---दोनों के चेहरों पर हल्दी पुती हुई--- पीले जर्द-हबाइयां उड़ रही थी…मुह से कोई आवाज न फूट सकी-फिर माइक पर खुद गार्जियन ने ही कहा----"वेन पर फायरिंग बन्द कर दो कोई फायदा नहीं होगा…सिर्फ उस पर नजर रखो और हल पल की रिपोर्ट दो।"

इबलीस बडबडा उठा… शाम को पाच बजे तक तो वह राजधानी को राख का ढेर बना देगा।

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राजधानी की सडकों’ पर से गुजरती हुई वैन अपने पुर्व निर्धारित .. लक्ष्य की तरफ़ बढी चली जा रही थी-गति बहुत तेज थी…होती भी क्यों नहीं…ड्राइबिग' सीट पर विकास जो था-एक, के अतिरिक्त सभी मशीनगनों की नाले स्टील की वाडी से बाहर झांक रही थी ।

तीन आगै की तरफ़-तीन… दाएं…बाएं-एक पीछे ओँर एक छत . से निकलकर आसमान की तरफ़ ताक रही थी…विकास तो चालक कक्ष मे कैद था ही-पिछला हिस्सा भी इस वक्त अन्दर से लॉक था । पिछले हिस्से में' करीम चाचा-मेजर हाशमी…रहीँम-सुल्तान और रक्त तिलक कै दो अन्य सदस्य थे-वेन में इस वक्त नुफ्ताज नही थो ।

इस अभियान पर साथ आने की वहुत जिद की थी उसने ।

उसके जख्मी होने के. कारण सभी चाहते थे कि वह आराम करे-किसी कै समझाने पर न मानी क्रिन्तु सरदार के आदेश के सामने उसे झुकना पडा I

वेन के पिछले हिस्से की कमाड हाशमी के हाथ मे थी । रक्त तिलक के सभी सदस्य अपनी-अपनी कुर्सियों पर अपने हिस्से में आई गने संभाले बेठे थे…नजरे उस स्कीन पर थीं जिस पर इस बख्तरबन्द वेन के हर तरफ कै दृष्य को देखा जा सकता था I स्कीन पर दृश्य भी वेन की-सी रफ्तार से ही भाग रहे थे ।

शुरू में वेन पर फायरिंग जरूर हुई थी पंरन्तु अब नहीं हो रही थी-वेन को जिस रास्ते से गुजरना होता, उस रास्ते, पर. पहले से ही भगदड मच जाती-वैन को सडक बिल्कुल खाली मिलती थी ।

नागरिक और सैनिक उसे देखते ही छप जाते । वेन से बाहर निकली हुई गनें भी अब कोई फायरिंग नहीं कर रही थी ।

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---किंन्तु किसी भी दुश्मन के हमले के जवाब में हमेले करने के लिए पूरी तरह मुस्तेद थी ।

आतक फैलाती हुई वेन बीस मिनट बाद जहा रुकी वह मजलिस्तान के रेडियो स्टेशन की इमारत थी…इमारत कै अन्दर घुसने के बाद वेन टर्न हुई…पीछे सरकी और पिछला हिस्सा इमारत के दरवाजे से सट गया-विकास इस वक्त इमारत के लम्बे-चौडे लॉन को देख रहा था ।

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जल्दी से लॉक खोलो करीम चाचा । मेजर हाशमी कह उठा l

करीम चाचा उस कुर्सी पर बैठे थे जिस पर से आसमान की तरफ़ ताक रही मशीनगन कट्रोल होती थी-बे' कुर्सी से उठे…लाॅक के समीप पहुचे और एक ही मिनंट मे उन्होंने नम्बर लॉक खौल दिया।

-शटर अभी पडा. हुआ था ।

यत्रचलित से मेजर हाशमी और ऱहीम हाथ में रिबॉंल्बरे हिए शटर के नजदीक पहुचे-नम्बर एडजस्ट करते ही करीम चाचा वहा से हट गए थे…वे स्टील की दीवार से चिपक गए I

रहीम हाथ में रिवाल्वर लिए मुस्तेद खडा था जबकि हाशर्मी ने शटर उठा दिया…शटर उठते ही बाहर की तरफ़ से एक गोली चली मगर कोई नुकसान नहीँ ।

हाशमी और रहीम पहले ही शटर कै दाए-बाए पोजीशन ले चुके थे ।

अब रहीम ने फायर किया ।

दरवाजे के पार एकमात्र सेनिक चीखकर ढेर हो गया-फिर हाशमी के साथ ही रहीम ने भी बैन से बाहर और रेडियो स्टेशन की इमारत के दरवाजे के अन्दर जम्प लगा दी ।

उनके ऐसा करते ही करीम चाचा ने शटर गिरा दिया ।

लॉक के नम्बर गडबडा… गए ।

सुल्तान ने कहा-”वेन को टर्न कीजिए मिस्टर विकास I"

इस आवाज को सुनते ही विकास ने गेयर बदला-वेन आगै बढा द्री-नन में बैन को घुमाया उसने । वेन पूरी तरह टर्न हुई यानी अब बिकास जाली के पार चमक रहे स्टेशन की इमारत के उस दरवाजे को साफ देख सकता था जिसके अन्दर पेजर और रहीम गए थे ।

बैन को दरवाजे की तरफ बढाया ।

आहिस्ता से सरकती हुई वैन का अगला हिस्सा दरवाजे पर जा पडा-बस-इत्तना काम करने के बाद विकास ने इंजन बन्द कर दिया…एक नज़र उसने समीप ही बधे पडे जख्मी और बेहोश ड्राइवर क्रो देखा…फिर जाली के पार इमारत कै अन्दर घूरने… लगा l

बाहर से देखने पर दृश्य बडा ही अजीब सा लग रहा था-वेन' कै अगले हिस्से ने इमारत के दरवाजे को पूरी तरह ढक रखा था-लांन से दूर-हर तरफ़ सैनिक छुपे थे किंन्तु किसी में वेन की तरफ… बढने का साहस नहीं था क्योंकि वेन की बाडी से झाक रही गने ऐसे किसी भी सैनिक को भूनकर रख देने कै लिए तत्पर थीं-वैन के बडे कक्ष मे बेठे` सुल्तान आदि चारों तरफ नजर रखे हुए थे l

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प्रसारण कक्ष और उसके आसपास अपना आधिपत्य जमाने मे हाशमी और रहीम को बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करनी पडी, क्योंकि वहा एकमात्र उस सैनिक के अलावा अन्य कोई सैनिक नही था जिसे वे पहले ही ढेर कर चुके थे…रेडियो स्टेशन पर काम करने वाले साधारण कर्मचारी ही थे ।।

. रेडियो स्टेशन में मिलिट्री का काम भी क्या?

साधारण कर्मचारियों को रिवाॅल्बर की मौजूदगी ने ही कपकपा दिया-उनकी दो-चार धमकियों ने ही किया यह कि सारे कर्मचारी ह्यथ उठाकर एक पक्ति मेँ खडे हो गए ।

प्रसारण कक्ष में एक फिल्मी गाना गूज रहा था I

" तुम इन पर नजर रखना रहीम ।" कहने के बाद हाशमी शीशे का दरवाजा खोलकर प्रसारण कंक्ष में दाखिल हो गया-एक माइक पर रिकार्ड चल रहा था, दूसरा एक खाली कुर्सी के सामने स्टैण्ड पंर फिक्स था…उसने स्टैंण्ड पर फिक्स माइक को अलग किया । माइक' कै साथ जुडा तार काफी लम्बा था ।

माइक हाथ में लिए वह प्रसारण कक्ष से निकलकर दरवाजे की तरफ़ लपका ।

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“ये रेडियो मजतिस्तान की उर्दूं सर्विस है I कूछ ही देर पहले आप फिल्मी नगमें सुन रहे थे ।"

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एक आवाज ने कहा "ये नगमें उर्दू सर्विस सुनने वालों को एक ज़रूरी सूचना देने के लिए रोके गए है-यह

जरंरी सूचना दे रहे है--मिस्टर विकास-उम्मीद है कि मजलिस्तान के हुक्मरान भी सुन रहे होंगे । . . .

रेडियो पर गूंजने वाले इन शब्दों को सुनकर सूटकेस में कपडे आदि रखता हुआ विजय बुरी तरह चोंककर घूमा…रेडियो को घूरने लगा वह-विकास का नाम सुनते ही दिल धक्क से रह गया था ।

जिस्म के सभी मसामो' ने एक साथ ढेर सारा पसीना उगल दिया, जबड़े कस गए ।

मज़लिस्तान की यात्रा के लिए ही वह सूटकेस तैयार कर रहा था ।

इस वक्त जान…बूझकर ही उसने रेडियो मज़लिस्तान से मिला रखा था कदाचित इसलिए क्योंकि कुछ ही देर मेँ उसे मजलिस्तान रवाना होना था-मजलिस्तान से सम्बन्धित्त समाचारों में उसे दिलचस्पी थी किन्तु इस रेडियो पर उसने विकास के बोलने की उम्मीद नहीँ की थी ।

"मैं विकास बोल रहा हूं ।

विकास की आवाज ने उसके जिस्म में सनसनी-सी दौडा थी ।

गम्भीर स्वर… मैं जानता हू क्रि मेरी आवाज मजलिस्तान के अवाम कै अलावा इस पाक मुल्क पर जबरन हुकूमत करने बाला जालिम ज़नरल इबलीस भी सुन रहा है…उसके सेमिनेरियन आका भी सुन रहे हैं और मजलिस्तान के बाहर वे लोग भी सुन रहे हैं जो खुशकिस्मती' या बदकिस्मती` से इस वक्त रेडियो मजलिस्तान से नगपे सुन रहे थे ।

“ सुनने वालों में ज्यादातर जानते हैं कि मैं भारतीय हू…कुछ लोग यह भी जानते हैं कि मुझे डबल एक्स फाइव कहा जाता है लेकिन यहा मैं स्पष्ट कर दू कि मैं इस बार डबल एक्स फाइब नहीं हू…भास्तीय प्रतिनिधि.. नही हूं-बल्कि इस वक्त मैं एक भारतीय नागरिक होने के नाते भी रेडियों पर नहीँ बोल रहा हूं--अतः मेरे किसी भी कृत्य का जिम्मेदार भारतीय सरकार नहीं होगी---

इस वक्त मैं सिर्फ बिकास हू-विकास-सिर्फ एक इसान । एक ऐसा इंसान जो निरही और कमजोर इसानों पर जुल्म होते नहीं देख

सकता… जालिम कै खिलाफ ज़ग छेड देना जिसका सिद्धान्त है । यह जंग सिर्फ एक इंसान ने एक शैतान के खिलाफ छेडी है-----

रेडियो पर मुझे कई कारणों से बोलना पढ़ रहा हे…"सबसे पहला कारण दुनिया को यह बता देना है कि मैं भारत का प्रतिनिधि नहीं हूं…दूसरा कारण मजलिस्तान में लगा प्रेस सेंसरशिप है इसी वज़ह से वे हकीकतें जो मजलिस्तान मे घट रही है दुनिया के किसी दुसरे मुल्क तक नहीं पहुच पा रही हैं…रेडियो जालिम इबलीस का है…अखबारों में वही लिखा जाता है जो इबलीस चादृत्ता है--- पूर्व राष्ट्रपति सादात को शेतान कहा जाता रहा हैं और जनरल इबलीस को मसीहा बनाकर, सारी दुनिया के सामने पेश किया जाता रहा है, जबकि वस्तुस्थिति ठीक इसके… विपरीत हे-तीसरी वजह इस मुल्क. के साथ लगातार बलात्कार करने वाले उस जालिम हुक्मरान की आख खोल देना है जो यह समझता है कि मजलिस्तान का अवाम उसका गुलाम है I

कथित सेनिक विद्रोह से पहले इस मुल्क पर अवाम की वोटों से चुने गए राष्ट्रपति सादात हुकूमत कर रहे थे शायद कथित सैनिक विद्रोह मैंने इसलिए कहा, क्योंकि वह हकीककत में सैनिकल विद्रोह नहीं था, बल्कि तानाशाह इबलीस द्वारा ऐसा झूठा प्रचार किया गया ।

मजलिस्तान के पिसते हुए अवाम की जिस आवाज का इस मुल्क में

लगी प्रेस सेंसरशिप ने गला घोंट दिया है, उसी आवाज को सारी दुनिया में पहुचा देने के लिए मैं इस रेडियो पर' बोल रहा हू. . .सच्चाई वह नहीं हे, जो कथित सैनिक विद्रोह के 'बाद से मजलिस्तान का अखबार या रेडियो बता रहा 'हे-सच्याई ये है कि इबलीस न सिर्फ जालिम और तानाशाह है, बल्कि हत्यारा और देशद्रोही हे-लोकप्रिय राष्ट्रपति सादात ने संमिनार को अपना मित्र देश समझकर उसकी सेनाओं को मजलिस्तान मे आमत्रित किया था…क्रिन्तु फिर खुद सादात के बार-ब्रार अनुरोध करने के बावजूद सेमिनार की सेनाए यहा से नहीं गईं-जाती भी क्यों-सेमिनेस्पिन हुक्मरानो के दिलों में बदी जो आ गई थी । मजलिस्तान का यह मित्र देश इस मुल्क से अपनी सेनाए हटाने के लिए सादात सरकार के सामने शर्त रखने आया-ऐस्री शर्त जिन्हें कम-से-कम सादात जैसा देशभक्त राष्ट्रपति कभी स्वीकार नहीँ कर सकत्ता-दूसरी तरफ जनरल इबलीस राष्ट्रपति की गद्दी हथियाने के नापाक ख्वाब देख रहा था-याद रहे, यह वही इबलीस है, जिसके नाम से पहले 'जनरल' शब्द लगाने वाले का नाम भी सादात हे-वह अन्दर-ही-अन्दर में सादात के खिलाफ विद्रोह भडका रहा था, क्रिन्तु मजलिस्ता की सेना मे गद्दार कम और देशभक्त ज्यादा थे…इबलीस का साथ… गद्दार ही दे सकते थे और उनकी सख्या' इतनी कम थी कि उनकी मदद से सात जन्म भी इबलीस अपने नापाक इरादों मेँ कामयाब नहीं हो सकता था परंन्तु तभी सेमिनार के अधिकारियों की मुलाकात उससे हो गई…दोनों काणे थे-दोनॉ को आखें मिल गईं-सेमिनेरियनो ने उसे राष्ट्रपति बनाने का क्चन दिया ओर उसने उनकी वे सब बाते मान ली जो सादात ने नही मानी थीं-सोदा हो गया…इसी सौदे का परिणाम यह कथित सेनिक विद्रोह था-जिसके बारे में यह प्रचार किया गया कि मजलिस्तान का अवाम भी विद्रोह के साथ था-हकीक़त ये है कि मजलिस्तान की भोली जनता के खिलाफ़ गद्दार इबलीस और सेमिनेरियनो ने मिलकर एक षडयत्र रचा-उस रात सारे मजलिस्तान में मौत ने ताडव किया…नंरसहार हुआ…खून की नदिया बहीं सारा मुल्क आग की लपटों मेँ घिर गया…सादात की ही नहीं…बल्कि हजारों बेगुनाहो क्री हत्या कर दी गईं और ऐसा करने वाले थे इबलीस-उसके देशद्रोही चन्द सेनिक-कर्नल तोम्बो-गार्जियन और सेमिनार' की वे सेनाएं जो पहले ही. इस मुल्क के चप्पे-चप्पे पर कब्जा कर चुकी थीं । अगले दिन से मजलिस्तानी अखबारों ने वही छापा. ..रेडियो ने वहीं' , कहा, जो इबलीस, र्क्नल तोम्बो और गार्जियन चाहते थे l , मगर सच्याई वह नही हे ।

सच्चाई ये हे कि मजलिस्तान की जनता की आवाज और आरजुओं का गला घोंटा जा रहा है । उन पर मनमाने जुल्म किए जा रहे है । सच्चाई ये है कि इस मुल्क को गुलाम बना लिया गया है मुल्क पर हुकूमत' करने बाला इबलीस., कर्नल' तोंम्बो और गार्जियन की कठपुतली हे…सेमिनार, नाम के बड़े मुल्क ने मजलिस्तान पर अपना कब्जा कर लिया हे-इबलीस ने सेमिनार की शर्तें स्वीकार की थी, उनके मुताबिक ही मजलिस्तान में सेमिनार के लडाकू. हवाई अड्डे-नौ सैनिक अड्डे और छावनियों की स्थापना की जा रही है-सच्वाई यही है-यह कि एक वार फिर वही हुआ हे जैसा इतिहास के मुताबिक हमेशा ही सम्पन्न देश अपने से छोटे मित्र देश के साथ करते रहे हैं I

हम अपने समाज को शिक्षित कहते नहीं थकते-- विकसित कहते-कहते नहीं थकते हम--हम यह दावा भी पेश करते रहे हैं कि हर छोटे-बड़े राष्ट्र को अपनी प्रभुता बनाए रखकर बिकास करने के पूरे अबसर और अधिकार प्राप्त है लेकिन नही समय-समय पर घटने वाली ऐसो घृणित घटनाएं हमें बताती रही हैं कि हम स्वार्थी हैँ…स्वार्थ के लिए बेगुनाहों के खून की नदिया बहा सकते हैं…कमजोर को दोस्त कहकर उसकी पीठ में छुरा घोंप सकते हैं… हमारा विकसित समाज मेरी आवाज को सुन रहा है और यदि वह सचमुच विकसित है तो सेमिनार का विरोध करे…उस सबके खिलाफ़ एकाग्र होकर आवाज बुलन्द करे जो यहा हो रहा है…यदि ऐसा नहीं भी हुआ तो मैं दावा करता हूं कि बहुत दिनों तक मजलिस्तान सेमिनार के खूनी पजे' की गिरफ्त. में नहीं रहेगा-विद्रोह की उस रात से ही मजलिस्तान के देशभक्त युवक रक्त तिलक नामक एक दल के झडे तले इक्रट्टे होकर इबलीस सरकार के खिलाफ़ जेहाद छेडे हुए हैं…मैं रक्त तिलक का सदस्य तो नहीं हूं लेकिन इस रेडियो पर उन्हीं की मदद से-उन्हीं की तरफ़ से बोल रहा हू…मैँ सिर्फ इसानियत के नाते रक्त तिलक और इस मुत्क के अवाम के साथ हूं।"

विकास रुका-"रेडियो पर खामोशी छा गई ।

घडकते_ दिल से विजय सब कुछ सुन रहा था ।

दुनिया. के लिए मेरा सन्देश खत्म…और अब वे सुनें जिन्होंने . इस मुल्क को गुलाम बना रखा है…हाँ-मैं तुम्ही से कह रहा हू गद्दार इबलीस-कर्नल तोम्बो--गार्जियन और यदि सेमिनार सुन रहा हैँ तो

वह भी कान खोलकर सुन ले…विकास इस मुल्क की जनता पर हुए एक्र-एक जुल्म का हिसाब. लेगा…इस मुल्क के अवाम को गुलाम बनाने के तुम्हारे जुर्म की सजा देने के लिए आया हू मै । मगर उससे पहले मैं एक मौका देता हू…मैं-इस घोषणा के तीन घण्टे बाद तक कुछ नहीं करूगा…इसं बीच यदि सेमिनार की सेनाए मज़लिस्तान से लौटने लगी तो में खामोश रहूगा-मेरी घोषणा के तुरन्त बाद से सेमिनार की सेनाए इस मुल्क से बाहर निकलना शुरू कर दें वरना तीन घण्टे 'बाद मैं जो कुछ करूगा उसकी कल्पना भी तुम नहीँ कर सकते… कर्नल तोम्बो गार्जियन औंर हर सेमिनेरियन सेनिक को में जान बचाकर इस मुल्क से निकल जाने का एक मोका देता हू-इबलीस को यहीं छोड दिया जाए, उसका फैसला मजलिस्तान की जनता करेगी-तीन घण्टे…सिर्फ तीन घण्टे हैं ।

बस…रेडियो पर दहाडते शेर की दहाड शान्त हों गई I

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अपनी बात पूरी. करने के बाद जिस वक्त विकास ने लम्बा माइक गन की नाल के लिए बने छेद के माध्यम से बाहर निकाला उस वक्त उसकी आखें अंगारो के समान दहक रही थी--चेहरा भभक रहा था-अंतिम' शब्द कहते-कहते, स्वयं उसी के रोंगटे खडे होगए थे ।

छेद के पार खडे हाशमी ने माइक सभाला और रेडियो स्टेशन के . अन्दर चला गया-उस स्थान से गुजरा जहा रहीम कर्मचारियों को' कवर किए खडा था ।

इघर हाशमी के जाते ही बिकास ने इज़न स्टार्ट किया-वैन पीछे की तरफ़ यानी दरवाजे से दूर हटी टर्न हुई औऱ फिर वेन का पिछला हिस्सा दरवाजे से आ सटा I

अन्दर से करीम चाचा ने दरवाजा खोला ।

हाशमी और रहीम निर्विघ्न अन्दर दाखिल हो गए ।इस बीच ड्राइविंग सीट पर बैठा विकास.-जाली कै पार फेले . लम्बे-चौड़े लान का निरीक्षण. कर रहा था…-यहां-वहा से उसने झाककर' वेन क्री तरफ़ देखती हुई बहुत-सीं गने देखीं…यानी उनकी स्पीच के बीच बैन क्रो चारों तरफ़ से धेर लिया गया ।

विकास के होंठों पर हल्की सी मुस्कान उभर आई । .

तभी उसने वेन का पिछला शटर बन्द होने की आवाज सुनी । यह. आवाज इस बात की द्योतक थी कि हाशमी और रहीम सुरक्षित वैन के

पिछले कक्ष में पहुच चुके है ।

उतने वेन आगे बढा दी।

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रेडियो पर विंकास ने जो कुछ कहा था उसकी भिन्न राष्ट्रों और भिन्न व्यक्तियों पर तीखी किंतु भिन्न प्रतिक्रिया हुई मज़लिस्तान की साधारण जनता में जहा खुशी की लहर दौड गई वहीँ सेमिनार की सेनाओँ के छक्कै छूट गए, रक्त तिलक के सदस्य जहा खुशी से झूम उठे वहीं इबलीस र्क्नल तोम्बो और गार्जियन झुझला गए…अपने बाल नोंच लिए उन्होंने ।

सेमिनार तिलमिला उठा-पश्चिमी देशो ने ठहाके लगाए ।

सबसे अजीब हालत भाऱत की थी।

बिजय की थी ।

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रेडियो पर होने वाले इस प्रसारण से पहले जो बात बहुत कम लोगों को मालूम थी, वह एकदम सारी दुनिया को पता लग गई…आग. की तरह यह बात फैलती चली गई कि विकास भारत के विरुद्ध हो गया है…क्रई कूटनीतिज्ञों का तो यह भी कहना था कि…यदृ सब भारत की ही साजिश है ।

अन्तर्राष्ट्रिय जनमत भारत और सेमिनार के विरुद्ध इकाटठा हो रहा था ।

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सम्बन्ध स्थापित होते ही सेमिनेरिंयन सीकैट सर्विस के चीफ ने पूछा… "प... प्रघग्नमत्री महोदय?”

"हम बोल रहे हैं I" दूसरी तरफ से बेहद गरिमा युक्त स्वर उभरा ।

"क्या रिपोर्ट है? "

" स सर !" चीफ ने कहा… "कुछ ही देर पहले मजलिस्तान से गार्जियन ने ब्रात क्री थी…वहा क्री हालत बडी अजीब है-हरं प्राणी पर विकास के नाम की दहशत छाई हुई हे खुद कर्नल तोम्बी और गार्जियन तक उखड गए हैं-उनका कहना है कि मजलिस्तान मे हमारे सैनिक विकास से टकाकर लेने के लिए तैयार नहीं हैं-सभी पर उसका आत्तक हे…भले ही कोई सेनिक मुंह से नहीं कह रहा है, परन्तु सबकी इच्छा मजलिस्तान छोड. देने की हे…वह्म मौजूद~ हमारी सेनोओं का मनोबल टूट चुका है । धारणा यह हे कि 'विकास की माग मान लेने के अलावा अन्य कोई चारा नहीं है…उन सबक्रो अपनी मौत बहुत निकट नजर आ रही है…गाजिंयन का कहना है कि विकास के पीछे रक्त तिलक की ताकत से बढकर. हपारी उस बख्तरबन्द गाडी. की ताकत है जो इस वक्त उसके कब्जे में है-रखीं गई अवधि के बाद से वेन की मदद से विकास जो चाहे कर सकता हे…गार्जियन ने यह भी कहा हे कि सेमिनेरियन सेनाए मजत्तिस्तान से कूच करने के आदेश की प्रतीक्षा कर रही हे-यदि समय रहते विकास को न रोका गया तो ~ हमारी सेनाए विद्रोह करके बिना आदेश के भी हथियार डालकर विकास से जग करने से इनकार कर सकती है l”

"ओह-हालात इतने बिक्ट हो गए हैं।"

"जीहाँ ।”

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"इधर अन्तर्रारुट्रीय मच पर हमारी स्थिति वडी. अजीब हो गई है--- मज़लिस्तान की जो स्थिति कल तक सारी दुनिया के सामने अंधेरे में थी वही अब सारी दुनिया को पता है…अपने दोस्त और दुश्मन कें सवालों का जवाब देना हमारे लिए कठिन हो रहा हे I"

“आदेश दीजिए सर…हम क्या करे?"

"हम इसी वक्त भारत सरकार से बात करते हैं ।" प्रधानमम्बी ने कहा… "तुम वहा की सीक्रेट सर्विस कै चीफ से बात करो-सख्त स्वर में उनसे कहो कि भारत बिकास के कृत्यों की जिम्मेदारी से युक्तं नहीं हो सकता…यदि उन्होंने मजलिस्तान में विकास को किसी भी किस्म की तबाही मचाने से पहले नहीँ रोका तो न सिर्फ भारत और सेमिनार ‘की दोस्ती खत्म हो जाएगी बल्कि उसी क्षण से सेमिनार भारत का सबसे बडा दुश्मन होगा I”

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विकास कै अन्तिम शब्द सुनते-सुनते विजय का सारा जिस्म पसीने से तर-ब-तर हो गया-मुट्ठिया कस गई-'जबडे स्वय ही मिचते चले गए…पत्थर की शिला सी बना हुआ बहुत देर तक यू ही खडा रहा-फिर फोन की तरफ लपका । ब्लैक ब्वाॅय के नम्बर डायल किए । मगर-सम्बन्थ स्थापित नहीं हो सका…लाइन एगेज थी…उसने पुन नम्बर' डायल किए-इस बार भी लाइन ऐंगेज, कई बार रिंग करने पर भी जब लाइन एगेज' रही तो वह झुझला-सा उठा । रिसीवर पटक दिया… तेज कदमों के साथ अभी वह बाहर निकलने के लिए कमरे के दरवाजे तक पहुचा ही था कि फोन की घटी घनघनांने लगी ।

विजय घूमा I

तेज कदमों कै साथ फोन तक पहुचा फिर रिसीवर उठाकर-“हैलो ।“

"मैं ब्लेक ब्वाय बोल रहा हू सरा"

"ओह तुम-कितनी देर से कोशिश कर रहा हूं…तुम्हारा फोन एगेज' क्यों चल रहा था?"

" एगेज-ओह लगता हे सर कि हम दोनों एक ही समय में एक-दूसरे को रिग करते रहे ।"

"क्या मतलब?"

विकास कै अन्तिम शब्द सुनते-सुनते विजय का सारा जिस्म पसीने से तर-ब-तर हो गया-मुट्ठिया कस गई-'जबडे स्वय ही मिचते चले गए…पत्थर की शिला सी बना हुआ बहुत देर तक यू ही खडा रहा-फिर फोन की तरफ लपका । ब्लैक ब्वाॅय के नम्बर डायल किए । मगर-सम्बन्थ स्थापित नहीं हो सका…लाइन एगेज थी…उसने पुन नम्बर' डायल किए-इस बार भी लाइन ऐंगेज, कई बार रिंग करने पर भी जब लाइन एगेज' रही तो वह झुझला-सा उठा । रिसीवर पटक दिया… तेज कदमों के साथ अभी वह बाहर निकलने के लिए कमरे के दरवाजे तक पहुचा ही था कि फोन की घटी घनघनांने लगी ।

विजय घूमा I

तेज कदमों कै साथ फोन तक पहुचा फिर रिसीवर उठाकर-“हैलो ।“

"मैं ब्लेक ब्वाय बोल रहा हू सरा"

"ओह तुम-कितनी देर से कोशिश कर रहा हूं…तुम्हारा फोन एगेज' क्यों चल रहा था?"

" एगेज-ओह लगता हे सर कि हम दोनों एक ही समय में एक-दूसरे को रिग करते रहे ।"

"क्या मतलब?"

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"काफी देर से में भी यही कोशिश कर रहा था-आपफा फोन मुझे कम से कम पांच बार एगेज मिला-अब कही छठी बार जाकर आपसे सम्बन्ध्र स्थापित हो सका है !"

"ओह-क्या बात है ?"

" क्या आपने. रेडियो मजलिस्तान. पर गूजने वाली विकास की . आवाज सुनी हे सर?”

" हा सुनी है I” विजय अजीब-से झुझलाहट भरे स्वर में कह उठा-----"आज यह महसूस हो रहा है काले लडके कि हमने उस बेवकूफ़ क्रो भारतीय. सीक्रेट सर्विस' का जासूस बनाकर अपनी जिन्दगी की सबसे वडी भूल की है-वह भावुक हे-नेकी और बदी में फर्क करने वाला कभी एक अच्छा जासूस नहीं हो सकता I"

"स सर-कुछ ही देर पहले खुद प्रधानमत्री ने मुझसे बातें की हे…वे बहुत नाराज हैं…बडा ही सख्त स्वर था उनका-उनके बाद, सेमिनेस्पिन सौक्रेट सर्विस के चीफ ने भी मुझसे बाते की…सेमिनार की तरफ से एक तरह से धमकी दी गई है कि यदि हमने समय रहते बिक्रास क्रो नहीं रोका तो हमारे हक में ठीक नहीं होगा।"

"गलती उनकी नहीं प्यारे…सोना अपना ही खोटा हे ।"

"म मगर-अब क्या करे सर-जिस फ्लाहट से आप जा रहे हैं उससे शाम तक मजलिस्तान पहुवेगे जबकि विकास ने सिर्फ तीन घटे का समय दिया है-तीन घटे ब्राद वह मज़लिस्तान में तबाही मचा देगा I” ,

"ऐसा नहीँ होगा काले लडके-विजय अभी मरा नहीं है कि वह बेवकूफ़ मनमानी करत्ता रहे-यदि वह नही रूका तो मेरी गोलिया उसकी लाश बिछा देगी-देश की प्रतिष्ठा को धूल मे मिलाने की कोशिश करने वाला एक भी इंसान जिन्दा नहीं रहेगा-फिर भले ही वह विकास क्यों न हो ।"

" म....मगर सर…आप भला कर ही क्या सकते हैं?"

" हम उस फ्लाइट से मजलिस्तान नहीं जाएगे काले लडकै,…' हमारे लिए इसी वक्त एयरस्फोर्स कै किसी ऐसे विमान का इन्तजाम करो जो हमें तीन घंटे से पहले ही मजलिस्तान पहुचा दे ।"

"में यही सोच रहा हूं सर I"

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"सोचो मत-- काम करो ।" बिजय ने कहा-’"हंमारे पास तीन

घण्टे है…सिर्फ तीन घंटे…यदि समय रहते दिलजले को नहीं रोका गया तो हिन्दुस्तान की प्रतिष्ठा पर एक ऐसा बदनुमा दाग लग जाऐगा जिसे कभी कोई इस मुल्क के दामन से साफ़ नहीं कर सकेगा I"

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सरदार के हाथ में इस वक्त रोशनी के ढेर सारे झाग फेंकने वाली विशाल टार्च थी-जिस्म पर वही परम्परागत लिबास यानि चुस्त स्याह कपडा…क्रेपस्रोल वाले जूते और चेहरे पर नकाब…जिस स्थान. से वह गुज़र रहा था उस स्थान पर अधेरा था I

घटाटोप. अधेरा--ऐसा कि जिसमेँ हाथ को हाथ सुझाई न दै ।

इस अधेरे के बीच उसके हाथ में दबी टॉर्च मार्ग दरशन कर रही थी…अकेले ही तेज कदमों के साथ बढा चला जा रहा था वह-यह एक सुरग थी-किसी पहाड के गर्भ र्में । s सुरग काफी चौडी थी-करीब पाच गज चौडी ।।

सरदार इस तरह बढ़ा चला जा रहा था जैसे इसमें से गुजरने का अभ्यस्त रहा हो।

कई मोड पार करने कै बाद वह एक हाल जैसे स्थान पर पहुच गया…-ह्यथ मेँ दबी टॉर्च की रोशनी एक पथरीले चबूतरे पर रखे पैट्रोमेक्स पर स्थिर हो गई। वह पैट्रोमेक्स की तरफ ही बढा ।।

निकट पहुचकर उसने जेब से माचिस निकाली और पैट्रोमेक्स ~ जला दिया…सारे हाँल मे पैट्रोमेक्स का तीव्र दुधिया प्रकाश फेल गया ।

टॉर्च आँफ करके उसने पेट्रोमेक्स के समीप ही रख दी ।

फिर-एक नजर सारे हाल पर डाली ।

हाल में आने का रास्ता वह सुरग ही थी जिसके माध्यम से वह यहां आया था-हाल के दाहिने कोने में एक अन्य छोटी सी सुरंग का दरवाजा था…-हॉल से शुरू होकर जाने वह सुरग कहा जाती थी…हां

यह सुरग उस सुरग के मुकाबले काफी संकरी थी जिसके माध्यम से वह यहा आया था । पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद उसने अपने चेहरे से नकाब उतारकर पत्थर कै उसी चबूतरे पर रख दिया जिस पर टॉर्च और पैट्रोमेक्स की रोशनी में अब सरदार, की सूरत बिल्कुल सपष्ट चमक रही थी-वह अधेड, आयु का था-रोबीला चेहरा लाल आखे---- हिटलरी मूंछो वाला वह व्यक्ति शक्ल से ही मिलिट्री का अफसऱ लगता था ।

वह हाँल के एक कोने में पडे भारी पत्थर की तरफ़ बढा…इस पत्थर क्रो उसने अपने बाहुबल से थोडा-सा हटा दिया…पत्थर के पीछे एक शक्तिशाली सैट रखा था ।

इसी सैट पर वह किसी से संबंध स्थापित करने की कोशिश करने लगा…कुछ ही देर बाद वह कह रहा था…“हेलो-हैलो…हैलो चीफ आफ आपरेशन मजलिस्तान हीयर ।

“रिपोर्ट I” दूसरी तरफ से कहा गया।

"आपने मजलिस्तान रेडियो पर विकास की दहाड सुन ही ली होगी । यहा यह बता देना जरूरी है कि उसकी आवाज में मिलिट्री के अफसरों जैसा रौब या कङापन नहीं था-"सारी डोरिया. मेरे हाथ में हैं…बिकास मेंरे इशारों पर नाच रहा हे…कदम-कदम पर वही कर रहा हे जो मै या आप चाहते हैं-बहुत जल्दी ही मजलिस्तान सेमिनेरियन सेनाओं क्रो कूच करना पडेगा ।"

"हमे तुम पर पूरा¸ भरोसा है लेकिन...!"

"लेकिन?”

“कुछ ही देर पहले इण्डिया में स्थित हमारे जासूसों ने एक सूचना भेजी है…उस सूचना का सम्बन्ध तुम्हारे आंपरेशन से है यानी तुम्हारे लिए अत्यन्त ही इम्पोर्टेण्ट इनफॉरमेशन ।"

"बोलिए!"

"विकास को रोकने के लिए भारत से विजय रवाना होने वाला था-मगर उसका प्रोग्राम यात्री विमान से ही मजलिस्तान आने का था क्रिन्तु रेडियो पर विकास को सुनने के बाद उसका प्रोग्राम बदल गया है-अब वह एन 6 नामक बिशेष बिमान से मजलिस्तग्न पहुचने वाला है-यह विमान उसे विकास द्वारा दिए गए तीन घटे से बहुत बहुत पहले ही मज़लीस्तान पहुचा देगा ।"

" ओह !"

"उसके बारे में तुम्हारा क्या बिचार_है?"

"बिचार से क्या मतलब-'मैं समझा नही ।"

"इस वक्त आपरेशन की सभी डोरिया तुम्हारे हाथ में हे…सबसे

महत्वपूर्ण बात ये है कि विकास तुम्हारे लिए काम कर रहा है-----
 
हमारा ख्याल है कि बिजय वहा पहुचकर कोई गडबड कर सकता हे-मुमकिन है कि वह बिकास को भी तुमसे छीनले।"

" फिर?"

"क्यों न हम ऐसा करें कि विजय को मजलिस्तान पहुचने ही न दे?"

"क्या आप ऐसा कर सकते हैं?”

“वेशक....!"

" कैसे ?"

" भारत मे विजय और उस बिमान तक हमारे जासूसों की पहुच है जिससे उसे यात्रा करनी हे…हमारा आदेश मिलते ही वे जासूस, ऐसा प्रबन्ध कर सकते हैं कि विमान मजलिस्तान पहुचने से पहले ही क्रैश हो जाए ।"

"क्या आपने अपने जासूसों को ऐसा हुक्म दे दिया है? "

" अभी नही ।"

"क्यों ?"

“हमने सोचा कि इस आपरेशन के चीफ तुम हो-तुमसे सलाह . . किए बिना हमेँ कुछ नहीं करना चाहिए क्योंकि मुमकिन है कि हमारे किसी काम से ओँपरेशन पर प्रतिकूल असर पडे । "

" आपने हुक्म देने की बेवकूफी न करके अच्छा ही किया ।"

"क्या मतलब?"

" सचमुच यदि आप ऐसा हुवर्म देते और आपके जासूस ऐसा कर देते तो मेरे आँपरेशन पर न केवल प्रतिकूल प्रभाव ही पडता बल्कि सारा ओंपरेशन ही हमारी पकड से निकल जाता।"

" वह कैसे?”

" पहली बात तो यह कि आपके जासूसों के प्रयास से विजय का मर जाना ही जरूरी नहीं था आज से पहले भी आप सैकडों बार उसे मारने की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन नाकामयाब रहे---बैसा ही इस बार भी हो सकता था…फिर भी यदि यह मान लिया जाए कि आपके जासूस उसे खत्म करने में कामयाब हो जाते तब भी बिकास. बहक जाता I”

"हम समझे नहीं ।"

"हमले के वावजूद विजय यदि किसी तरह बचकर मजलिस्तान

पहुच जाता तो वह विकास को अपने साथ हुई दुर्घटना के वारे में बताकर बरगला लेता…यद्रि मर जाता तो-उसकी मौत विकास क्रो पागल कर देती-वह रहस्य बिकास क्रो बता देती जो आज तक उसे मालूम नहीँ है ।"

“कौन-सा रहस्य?"

~ "यही कि मजलिस्तान में पश्चिमी देशं भी सक्रिय हैं ।"

"उसे यह बात कैसे पता लग जाती?"

“कोई मूर्ख भी सोच सकता था कि विजय की मजलिस्तान न पहुचने देना कौन चाह सकता है-विकास तो फिर भी समझदार हे वह समझ जाता कि उसके गुरु के विमान क्रो पश्चिमी देशों ने कैश कराया है और जिस लाइन पर मैंने उसे' लगाया है उस लाझ्व से हटकर वह हमारे खिलाफ हो ज़ाता ।"

“ओह ।"

" अत आपने विजय को टच न करके समझदारी ही को है ।"

"तो इसका मतलब यह कि हम उसे मजलिस्तान पहुचने दे?”

“हां-उसके बारे में आपको फिक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है-ये आँपरेशन मेरे हाथ में है…विकास मेरी मुट्ठी में है-बिजय की बात तब तक बिकास की बुद्धि मैं नहीं धुसेगी जब तक मैं नहीं चाहूँगा …ओर टकराव की दृष्टि में विकास. किसी, भी तरह विजय से कम नहीं हे-फिर मैं भी बिकास के साथ हू-सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात तो ये है कि वेन हमारे कब्जे में है-आप तमाशा देखिए…बहुत्त ही जल्दी आप यह सुनेंगे कि मजलिस्तान. की घरती पर विजय-विकास में से एक मारा गया ।"

"गुड-हमेँ तुम पर पूरा भरोसा हैं…यदि ऐसा हो गया तो हम तुम्हें इतनी दौलत और देंगे जितनी. इस आपरेशन को हैंडिल करने के लिए दी गई है I”

सरदार ने हल्की-सी मुस्कान के साथ पूछा…“ओर यदि में उन दोनों को ही लाशों र्में बदल दूं?" .

" तुम्हें मिलने वाली दौलत दुगनी-तिगुनी भी ही सकती हे । दुगुनी काफी हैं-तो' फिर पूरे पचास लाख डालर तेयाऱ रखिए ।'" कहने के तुरंत बाद ही सरदार ने सम्बन्ध-विच्छेद कर दिया । सैट आँफ किया…पत्थर को यथास्थान पर रखा !!

फिर चबूनरे से पैट्रोमेक्स उठाकर वह उस सकरी' सुरग' के दहाने में समा गया…टेढी-मेढी सकरी' सूरग' में दस मिनट की यात्रा के बाद वह एक छोटीं.-स्री कोठरी के दरवाजे पर पहुचा l

दरवाजा लोहे की मोटीं-मोटी रांर्डों वाला था ।

उसने जेब से चाबी निकालकर दरवाजे में लटक रहा मोटा ताला खोला और कोठरी में पहुच गया-एक कोने मेँ जजीरो' में जकड़ा निर्जीव-सा, फंर्श पर जो व्यक्ति पड़ा था, उसके जिस्म पर मजलिस्तानी सेना की वर्दी र्थी-स्टार्स बता रहे थे क्रि कोई कर्नल है ।

सरदार ने पैट्रोमेक्स कोठरी की एक खूटीं पर टाग दिया ।

कैदी की तरफ बढा…नजदीक पहुचकर उसने अपनी दूसरी ठोकर पूरी बेरहमी के साथ कैदी की पसलियों मे मारी और गुर्राया उठो ।

कैदी के कंठ से एक चीख निकली जो उस खोखले पहाड के गर्भ में ही घुटकर रह गई ।

जंजीरे खडखडाईं ।

खनक के साथ ही कैदी ने अपना चेहरा ऊपर उठाया-वेहरे पर जगह-जगह जख्म कै निशान थे…मूछ और दाढी काफी बढी. हुई थ्री

आखों में वेदना-होंठों पर शुष्कता-सरदार को देखते ही कैदी बुरी तरह चोंककर उछल पडा…"हैँ-त... तुमने मेरा मेकअप भी कर लिया है?”

"हा देख ही रहे हो ।" सरदार कुटिल मुस्कान के साथ बोला… . “तुम कहा करते थे कि जिस दिन हाशमी ने मेरी शक्ल देंख ली, उस दिन वह सारी हकीकत समझ जाएगा-लेकिन अफसोस ,ऐसा नहीं

हुआ ।मेरी नकाब उतारने पर भी वह मुझें 'तुम' ही समझा…धोखा खा गया बेचारा…बात-ब्रात पर मुझे कर्नल गद्दाफी ही कह रहा था ।"

कैदी पागलों की तरह चीख पडा…"म मगर-तुम गद्दाफी नहीँ हो-गद्दाफी मैं हूं---ये तुम्हारा असली चेहरा नहीं है-ये मेकअप है । इससे हाशमी धोखा नही खा सकता ।"

"यह फेसमास्क है और इसे देखकर हाशमी धोखा खा चुका है I"

"ह हरामजादे-कुत्ते-मुझें यहा कैद करके तू कर्नल गद्दाफी बनकर घूम रहा हे-सरदार बनकर रक्त तिलक के सैकडों देशभक्त युवको को धोखा दे रहा है तू…कमीने-तेरा यह खेल ज्यादा नहीं चलेगा-जिस दिन हाशमी को पता लग गया कि तू कर्नल गद्दाफी नहीं है---, उस दिन हाशमी तुझे कच्चा चबा जाएगा I" ,

"वह दिन कभी नहीं आएगा, गद्दाफी I”'

"वह दिन ज़रूर आएगा-तुम भी सेमिनेरियनों, से कम नहीं हो । जिस तरह उन्होंने राष्ट्रपति सादात की मदद करने के बहाने इस मुल्क पर कब्जा कर लिया उसी तरह तुमने भी रक्त तिलक की मदद के बहाने मुझें यहा कैद कर लिया और खुद रक्त तिलक पर कब्जा किए पडे हो !"

नकली कर्नल गद्दाफी जोर से ठहाका लगाकर हस पडा-कैदी कर्नल गद्दाफी चीखता हुआ जाने~ क्या-क्या कहता चला गया…उसकी चीखें-गालिया और बददुआए सरदार के ठहाको के नीचे दब गई ।

उस खोखले पहाड के गर्भ में सिर्फ 'सरदार के ठहाको का शासन था ।

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"भारतीय जासूस इडिया के सबसे ज्यादा तेज रफ्तार सैनिक विभाग एन-स्किस के जरिए यहा आ रहा है-राजनगर से _उसकी यात्रा जारी हो चुकी है-केवल दो घटे में वह यहा . . . ।”

"यहा पहुचते ही क्या वह जादू का डडा धुमा देगा ।"

गार्जियन का खिन्न स्वर ।

कर्नल तोम्बो ने कहा… "प्रसारित तो ऐसा ही किया जा रहा हे I" .

" क्या मतलब?" इबलीस'ने पूछा ।

"भारत पर सभी तरह का दबाव डाला गया हे फिर भी. वहा की सरकर. विकास को रोकने के लिए बिजय क्रो ही यहां भेजने पर स्थायी रही…सिर्फ इतनी तब्दीली की गई कि अब वह स्पेशल फ्लाइट से आ रहा है…इसका मतलब ये कि भारतीय सरकार विकास क्रो रोकने के लिए हर तरह से सिर्फ विजय क्रो ही अच्छा समझती हे…'निश्वय ही विजय कोई मार्कें की चीज होगी! ”

"मुझे यकीन नहीं है I" गार्जियन ने वुरा-सा मुह बनाया ।

"क्या मतलब? "

"हालाकि भारतीय सरकार विजय क्रो इस तरह भेज. रही है जेसे वह भारत की सबसे बडी तोप हो किन्तु मैं दावा कर सकता हू कि चाहे वह जितनी बडी तोप हो परन्तु बिकास को नहीं रोक सकेगी-एक तो बिकास ऊपर से वेन भी उसके कब्जे में हे…उसे कोई नहीं रोक सकेगा कर्नल--- मजलिस्तान के चप्पे चप्पे पर सिर्फ वही होगा जो

विकास चाहेगा ।"

"भारतीय जासूस इडिया के सबसे ज्यादा तेज रफ्तार सैनिक विभाग एन-स्किस के जरिए यहा आ रहा है-राजनगर से _उसकी यात्रा जारी हो चुकी है-केवल दो घटे में वह यहा . . . ।”

"यहा पहुचते ही क्या वह जादू का डडा धुमा देगा ।"

गार्जियन का खिन्न स्वर ।

कर्नल तोम्बो ने कहा… "प्रसारित तो ऐसा ही किया जा रहा हे I" .

" क्या मतलब?" इबलीस'ने पूछा ।

"भारत पर सभी तरह का दबाव डाला गया हे फिर भी. वहा की सरकर. विकास को रोकने के लिए बिजय क्रो ही यहां भेजने पर स्थायी रही…सिर्फ इतनी तब्दीली की गई कि अब वह स्पेशल फ्लाइट से आ रहा है…इसका मतलब ये कि भारतीय सरकार विकास क्रो रोकने के लिए हर तरह से सिर्फ विजय क्रो ही अच्छा समझती हे…'निश्वय ही विजय कोई मार्कें की चीज होगी! ”

"मुझे यकीन नहीं है I" गार्जियन ने वुरा-सा मुह बनाया ।

"क्या मतलब? "

"हालाकि भारतीय सरकार विजय क्रो इस तरह भेज. रही है जेसे वह भारत की सबसे बडी तोप हो किन्तु मैं दावा कर सकता हू कि चाहे वह जितनी बडी तोप हो परन्तु बिकास को नहीं रोक सकेगी-एक तो बिकास ऊपर से वेन भी उसके कब्जे में हे…उसे कोई नहीं रोक सकेगा कर्नल--- मजलिस्तान के चप्पे चप्पे पर सिर्फ वही होगा जो

विकास चाहेगा ।"

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"मुमकिन है कि जो आ रहा है वह बिकास से भी कई कदम आगे हो?"

"हालाकि मुझे यकीन नहीं है, लेकिन यदि ऐसा मान भी लिया जाए तो भी जरा दिमाग से सोचो कर्नल-वह कर' ही क्या सकेगा-वेन की मौजूदगी मे कोई कर ही क्या सकता है-वैन अभेद्य है और उसके अन्दर बेठे रक्त तिलक के सदस्य जहा जो चाहें कर सकते है I"

कर्नल त्तोम्बो चुप रह गया ॥

सचमुच उसके पास इस बात का कोई जवाब नही था कि वेनघारी विकास को कुछ भी करने से कोई कैसे रोक सकता है-बेचारा इबलीस बडबडा उठा-,सब कुछ ठीक चल रहा था-भले ही हम रक्त तिलक को खत्म न कर पाए हों लेकिन उससे निपट तो रहे ही थे-हमारा ही बुरा वक्त आया था जो हमने डबल एक्स फाइव क्रो यहां आमत्रित' किया…अब तो गद्दी ही खतरे पे पड गई है ।"

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वेन कै चालक कक्ष में बेहोश पडे ड्राइवर को जीवित रखने के लिए बारीक नलियों से जूस दिया जा रहा था…ग्लूकोस चढाया जा रहा था…दो पतली नलिया गन की नाल कै लिए बने छेद में से गुजरकर ड्राइवर की नाक तक चली गई थीं । इन्ही नलियों के सिरे बैन के बाहर जूस' की दो बोतलों से सम्बद्ध .. थे।

वेन के बाहर एक स्टैण्ड था…-स्टैण्ड पर ग्लसूकोस की बोतल उल्टी लटक रही थी-एक, तीसरी बारीक नली उससे होकर छेद में से गुजरती हुई अन्दर पहुची थी-दाई कलाई की विशिष्ट नस मेँ सिरिंज धंसी थी-उसी के जरिए ड्राइवर कौ ग्लूकोस मिल रहा था ।

सरदार-हाशमी और मुमताज आदि ने बिकास से भी क्रोई ऐसी चीज पेट में डालने के लिए कहा था जिसे छेद के ज़रिए अन्दर पहुचाया जा सके परन्तु विकास वे कुछ. भी न खाते हुए कहा था कि वह कम-से-कम पाच दिन बिना कुछ खाए-पिए स्वस्थ रह सकता है ।।

मुमताज ने रेडियो पर विकास की दहाड सुनी थी l जाने क्यों विकास का एक-एक्र शब्द उसे बहुत अच्छा लगा......था॥॥

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