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A Horror Novel - स्वाहा complete

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रेखा के लिए यह अजीब रात थी। बडे अजीब अंदाज में गुजरी।

वह करवटें बदलती रही । सोना चाहा पर सो न सकी । बार बार रासमोन का चेहरा सामने आत्ता था । यहीँ अहसास कचीटता रहा कि उसने रासमोन का दिल तोड़ा है ।

वेसे उसका यूं मायूस हौकर चला जाना ही अच्छा । वह रूक जाता तो जाने और क्या-क्या कहता और उसके कहे वे शब्द रेखा के पावो की जजीर चन जाते । रेखा को अहसास था कि वह एक मायावी लोक में और गेर-इन्सानी प्राणियों के बीच है । सो 'एक हसान' व 'गैर इंसान' का मिलाप भी मुमकिन नहीं । फिर उसै तो हर कीमत्त पर अपनी दुनिया में वापिस जाना था । वहां जाकर अपने चाचा रमाकात सै उसकी ज्यादतियों ब गुनाहों का हिसाब लेना था । रमाकांत उसके बाप कृष्णकांत का कातिल था । उसके भाई इंद्रजीत को इस नर्क मे धकेलने की जिम्मेवारी भी उसी पर थी । वह अभी इन बखेडों में केसे फंस सकती थी?

यही सब सोचते-सोचते जाने कब रेखा को नींद आ गई । और फिर प्रात: उजाला फैलने के बाद एक दासी ने गुलाब की कली सै उसके गालों पर स्पर्श करके उसे जगाया ।

रेखा जागी तो दासी का मुस्कराता चेहरा सामने था । दासी ने अभिवादन किया व फिर बोली "जल्दी तेयार हो जाएं कासगन आपके प्रतीक्षक हैँ। "

रेखा ने बिस्तर छोड़ दिया । हाथ मुह धोये और फिर दासियों ने उसे तेयार होने में मदद की ओर रेखा दासियों के साथ बिभित्र रास्तों सै होती हुई कासगन के कमरे में पहुच गई । कासगन उसे देखकर खड़ा हो गया ।

"आओ, रेखा ! नाश्ता कर लो । " उसने मेज की तरफ इशारा किया । मेज पर बिभिन्न व्यजन चिने हुए थे। रेखा ने अपनी पसन्द का नाश्ता किया ।

"रेखा मैंने कुएं के वासियों को बुलवा लिया है। वे बाहर मोजूद है। वे लोग तुम्हें उस 'मुक्ति द्वार' तक पहुचा देंगे। उससे आगे ये लोग नहीं जा सकतें । " कासगन ने बताया ।

"ठीक है, मै वहां तक पहुच गई तो फिर आगे जाने की कोई-न कोई राह निकल आएगी । ” रेखा बोली ।

"आओ चलें।" कासगन उठ खड़ा हुआ।

वे महल के दरवाजे पर पहुचे । रेखा ने वहा एक कुर्सी देखी । कुर्सी खाली थी व उसके ही पास कुए के वासी थे । वे दो थे और वे दोनों वही थे जो रेखा को 'मुक्ति द्वार' से यहां तक उडाकर लाए थे।

रेखा ने दरवाजे से बाहर कदम रखा और इधर उधर नजर दोडाई ।

"रासमोन कहां है? " रेखा ने पूछा ।

"वह अपना कमरा बंद करके सो रहा है । " कासगन ने बताया-"वह रातभर जागता रहा है। मैने उसे उठाया नहीं, कहो तो उठा दूं। ”

"नहीँ-नहीं उसे सोने दीजिए। " रेखा बोल उठी ॥ कासगन बोला--"रेखा इस कुर्सी पर बैठ जाओ । ये दोनों तुम्हें उडाकर ले जाएगे' । "

रेखा खामोशी से कुर्सी पर बैठ गई ।

" अच्छा, रेखा जाओ । आसमान वाला तुम्हारी हिफाजत करे। ” कासगन कीं आवाज भर्रा गई । वो अपने अश्रु रोकने की कोशिश कर रहा था।

"अच्छा, कासगन असमान वाला तुम्हारी भी हिफाजत करे । " रासमोन से कह देना-"वो मुझे याद आता रहेगा । "

"लो, वह आ गया, रेखा। " कासगन ने दरवाजे की तरफ इशारा किया ।

रेखा ने मुडकर. देखा-रासमोन इधर ही आ रहा था । उसके बाल बिखरे हुए थे । चेहरे पर उदासी थी । रेखा को वो मजनूं की तस्वीर नजर आया । साफ लग रहा था वो बिस्तर से उठकर सीधे इधर आया था ।रेखा के दिल की धडकने बरबस ही तीव्र हो गई । वह मत्र'-मुग्ध स्री ही कुर्सी सै उठी व रासभोन की तरफ बढ, गई I कासगन वहीँ खडा था । रेखा इतनी आगे बढ… गई थी कि कासगन उन दोनों की बातचीत नहीँ सुन सकता था ।

अब उनके पास कहने सुनने को रह ही क्या गया था? यह आखिरी मुलाकात थी । कुछ ही देर बाद रेखा को उड जाना था ।

"रासमोन, अच्छा हुआ तुम आ गये । " रेखा मुस्कराते हुए, अपनत्व सै बोली ।

“सोचा तो था कि जाते हुए न देखूगा, लेकिन दिल ने बगावत कर दी। मजबूर होकर आ गया । "

"कितना अच्छा है तुम्हारा दिल? " बेअख्तयार ही बोली थी रेखा।

"और मैं?" बडे. शोक से पूछा गया।

"तुम बहुत बुरे हो।"

"वह क्यो? " रासमोन हैरान हुआ था ।

"रात को कितनी आवाजें दी तुम्हें, लेकिन तुमने पलटकर भी नहीं देखा। " रेखा ने जैसे शिकायत की।

"तुम भी अभी वैसा ही करोगी । यहाँ से चली जाओगी और मैं आवाजें देता रह जाऊगा। " रासमोन ने उदास सी मुस्कान के साथ कहा।।

"यह मेरी मजबूरी है। " रेखा ने गहरी सॉस ली ।

"तुम मेरी दुनिया में आई ही क्यों थी?" रासमोन भर्राई आवाज में बोला।

"मैं कहा आईं? " रेखा बलात् ही मुस्कराई-- "मुझें तो लाया गया था।"

"लाया गया था तो मुझें सोने देती क्यो मुझे जादू से मुक्त कराया?"

"तुम्हें अफसोस हे कि जादूगरनी सारबरी के न ही सके?" रेखा ने शोखी से कहा।

"शायद हां कम से कम वह मेरी तो हो जाती । "

" अफसोस क्यों करते हो फिर चले जाना शिकार पर?" रेखा ने जैसै सुझाया-- "उसे तो अब भी तुम्हारी इतजार होगी ।"

"जाते हुए ऐसी बातें न करो । " रासमोन उसकी आखों में झाककर बोला।

"अच्छा! अब मुझें इजाजत दो । अब चलती हूं। मेरी कोई बात बुरी लगी हो तो माफ करना। "

"रेखा । " रासमोन ने पुकारा।

रेखा पलटते-पलटते रुक गई और उसे साबालियां नजरों से देखा।

"यह कबूल करो। " रासमोन ने अपने लिबास से सुर्ख गुलाब की एक ताजी कली निकाली। "
 
"वाह! ! कितनी_ खूबसूरत कली है यह कितना हसीन तोहफा है। बाप के दिये हीरों के हार से भी भारी । " रेखा प्यार भरी इस 'भेट पर वास्तव में ही खुश हो गई थी "मैं इसे खुशी से कबूल करूँगी I "

"ऐसे नहीं । " रेखा ने कली लेने को हाथ आगे बढाया. तो रासमोन ने अपना हाथ पीछे कर लिया ।

"फिर कैसे?"

" मै इसे अपने हाथो से तुम्हारे वालों में सजाना चाहता हूं। "

रेखा ने क्षणभर को सोचा। बडी मासूम सी ख्वाहिश थी। उसने बिना कुछ कहे अपनी गर्दन हिलाई ।

रासमोन के चेहरे पर एकाएक गुलाब से खिल उठे। उसने प्यार से वह मह्रकती कली रेखा के रेशमी बालों में टाक दी I

" रेखा यह कली उस वक्त तक नहीं मुर्झाऐगी-जब तक में जिन्दा हूं। जब यह कली मुर्झाँ जाए तो समझ लेना कि मैं इस दुनिया मे - नही रहा । " रासमोन ने भावभीने लहजे में रह्रस्योंद्घाटन किया ।

"रासमोन मेरी दुआ है कि यह कली मेरे पास सदैव यू ही तरो-ताजा रहे।"

"आसमान वाला तुम्हें हमेशा खुश रखे। जाओ, बस अब चली जाओ।"

रेखा ने नजर भरकर रासमोन को देखा। रासमोन की खूबसूरत आकर्षक आखों में नमी आ गई थी। इससे पहले कि उसकी आखो में आसू भर आएं-वह जल्दी से पलटी और जाकर फिर कुर्सी पर बैठ गई।

"ले जाओ इसे।" कासगन ने कुएं के प्राणियों को हुक्म दिया । वे दोनों बौने तेजी से कुर्सी की तरफ बडे । दोनों ने दाए-बाए होकर अपने कंधे कुर्सी से लगाए और देखते-ही-देखते वे शून्य में ऊपर उठते चले गये।

रेखा ने पहले कासगन की तरफ व फिर रासपोन की तरफ देखकर हाथ हिलाया । कासगन ने जवाबी हाथ हिलाया, लेकिन रासमोन बुत बना खडा रहा । जैसे पत्थर का हो कुएं के वे बौने अजीब से प्राणी कुर्सी को बहुल तेजी से उडाये_लिए जा रहे थे । रेखा मुडकर उस वक्त तक पीछे देखती रही जब तक वे दोनों नजर आते रहे । फिर बीच में एक पहाड़ आ गया-ओर जब वह पहाड सामने से हटा तो फिर पीछे कुछ नहीं था ।

अब वहा एक हरा-भरा इलाका था घने पेड थे , झरने थे। उडते_पक्षी थे । नहीं था तो वह सोने का महल नहीं था ।

रेखा ने भीगी आखो… को बंद किया तो दो आसू उसके गालों पर बह निकले । उसने आसू पोंछकर अपने बालों में अटकी हुईं गुलाब की कली निकाल ली I कली हाथ में लेकर कोमलता से ही अपने फूल की पत्ती से होंठ उस गुलाब की कली पर रख दिए I

बहुत तेजी से उडी जा रही थी । वे दोनों बिचित्र बौने कुर्सी अपने कन्धों पर उठाये हुए थे।।

।पहाडी_सिलसिला पार होते ही बह कुर्सी अब नीचे की तरफ जाने लगी । फिर रेखा को एक चट्टान में बड़ा-सा सुराख नजर आया । इस सुराख के नीचे एक झरना उबल रहा था । कुर्सी अब उस बडे से सुराख की तरफ बढ रही थी ।

फिर कुर्सी उस बडे से सूराख में दाखिल हो गई। यह दरअसल एक गार था और इस रास्ते से 'मुक्ति द्वार' में पहुचा जाता था । सो, वे गार से निकलकर कुए में पहुच गए।

रेखा ने नीचे झाका तो उसे खौलता हुआ तैल-सा नजर आया जिससे धुंआ उठ रहा था।

कुर्सी अब ऊपर उठने लगी । कुएं में गहन अंधकार था । उसने सिर ऊपर उठाकर देखा तो बहुत ऊपर एक छोटा सा सुराख दिखाई दिया ।

वह 'मुक्ति द्वार' का मुहाना था ।रेखा का दम घुटने लगा। इस कुए की फिजा बडी दमघोटू थी ।

"और तेज़ उडो । इस कुएं से जल्दी निकलो । " रेखा ने बेचैन होकर कहा ।

दोनों बौने काफी तेज उड़ रहे थे । रेखा कीं परेशानी महसूस कर उन्होंने अपनी गति और भी तेज कर दी । रेखा ऊपर 'मुक्ति द्वार' के मुहाने की तरफ देख रही थी-जो धीरे-धीरे बडा, होता जा रहा था ।

फिर वह वक्त आया कि कुर्सी 'मुक्ति द्वार' से बाहर निकल आई । उन दोनों बोनो ने कुर्सी को एक पत्थर पर उतार दिया और वे खुद सीधे खडे हो गए I

रेखा ने गहरे गहरे सास लेकर अपने हचास बहाल किए और चारों तरफ नजर दौडाई । यह वही जगह थी जहा से उसे 'मुक्ति द्वार' नामक कुएं में फेका गया और यह बही पत्थर था जिस पर खडे होकर उस लगडे, प्रेत ने उसे कुएं में फैकनै का हुक्म दिया था । अब उस पत्थर पर उसकी कुर्सी रखी हुई थी।

"हम यहां ज्यादा देर नहीँ रूक सकते हम जाते हैं I " कुएं के प्रार्थी ने कहा।

”ठीक है, जाओ। "

दोनों अजीबो-गरीब बड़े-बड़े कानों वाले बौनों ने पत्थर पर खड़े-ख़ड़े ही कलाबाजी खाई और सीधे 'मुक्ति द्वार' मे जा गिरे । उनके गायब होने के बाद रेखा अकेली रह गई और यह एक अजीबो गरीब मजर था। एक अति सुन्दर जवान लडकी-अति आकर्षक राजसी लिबास में-एक शाही कुर्सी पर किसी शहजादी की तरह बैठी थी और दूर-दूर तक कोई नहीं था I न इन्सान न गेर इसान। यह एक पथरीला इलाका था । छोटे-बड़े पहाड दूर तक फैले हुए थे।

अब वह क्या करे?

यहीँ सोचते हुए रेखा कुर्सी सै उठकर पत्थर पर खडी हो गई और यूं अब जो उसकी परेशान निगाहे जमीन पर गई तो वह हैरान रह गई।

नीचे जमीन पर लगडे, प्रेत राकल का 'राजदण्ड' पड़ा हुआ था। वह इस छडी को अच्छी तरह पहचानती थी । यह छडी. साप' की तरह बल खाई हुईं थी । वह पत्थर से उतरकर नीचे पहुची-ओर वह छडी उठा ली।

यह 'राजदण्ड' यहां क्यों है? यह छडी, तो उस शैतान 'प्रेत के हाथ में थी । वह उसे यहां क्यों छोड गया? यह छडी तो उसकी वैसाखी का काम देती था।

रेखा का दिमाग तेजी से सोचने लगा ।

क्या हुआ राक्ल को? कुछ तो यकीनन घटा था । फिर जेसे जैसे रेखा आपने इर्द गिर्द नजर डालती गई उसके सामने नये-नये सुराग आते गए। उसने जगह जगह मरे हुए उल्लू देखै । ऐसा लगता था कि जैसै इन उल्लू को किसी खुखार जानवर ने झंझोड़ा हो । फिर उसने करीब ही घोडों की लाशें देखीं वह भी क्षत्त-विक्षप्त अवस्था में थीं। आस पास जो मजर फैले हुए थे उनसे यही महसूस होता था जैसै यहा घमासान सघर्ष हुआ हो ।

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घमासान सघर्ष तो हुआ ही था ।

रेखा को क्या मालूम था कि उन खूनी क्षणों में क्या कुछ हो गया था । उसकी जान का दुश्मन राकल और उसके भाई इद्गजीत्त की जान की दुश्मन बकाल अब इस दुनिया में नहीं रहे थे और उसका भाई इन्द्रजीत पूर्णतया स्वस्थ हो गया था । इन्द्रजीत्त का दीमकजदा चेहरा बिल्कुल साफ हो गया था और अब वह अपने हमदर्द काले चिराग के साथ था । काला चिराग उसे 'ख्वाब महल ले गया था।

और जहां, इस वक्त इन्द्रजीत्त बिस्तर पर लेटा रेखा के ही बारे में सोच रहा था । फिर वह अपनी बहन के बारे में सोचते-सोचते उनींदगी में चला गया । उसने ख्वाब में देखा कि उसकी बहन रेखा एक बड़े से पत्थर पर एक खूबसूरत

कुर्सी पर शहजादी की तरह बैठी है और उसके निकट ही 'मुक्ति द्वार' है।

इस खवाब को देखते ही इद्रजीत क्री आख खुल गई । वह समझ नहीं पाया कि यह किस किस्म का ख्वाब था । पत्थर पर कुर्सी और कुर्सी पर शह्रजादिंयों की तरह शोभामान रेखा । ख्याल आया कि वह अपनी बहन के बारे में ही सोचते-सोचते सो गया था-शायदृ इसीलिए वह ख्वाब में आ गई थी ।

इन्द्रजीत्त व्याकुल हो उठा ।

उसका दिल इस ख्वाब क्रो महज एक ख्वाब मानने को तैयार नहीं था । यही महसूस हो रहा था जेसे उसने जागते में रेखा को देखा है। वह ख्वाब इतना ही स्पष्ट व सजीव था । अब उसके अन्दर बेचैनी पुकार पुकार कह रही थी कि 'मुक्ति द्वार' की तरफ चलो । वह विस्तर से उठ गया ।

उसने मुह हाथ धोये । मुह हाथ धोते हुए वह यही सोच रहा था कि काले चिराग को कैसे बुलाये। बहन का ख्याल बुरी तरह बेचैन कर रहा था । वह काले चिराग के बारे में ही सोचते हुए स्नानागार से बाहर निकला तो हैरान रह गया ।

काला चिराग बडे इत्मीनान से कुर्सी पर बैठा हुआ था । वह इन्द्रजीत को बाहर निकलते देखकर मुस्कराया और वोला--“क्या बात है इन्द्रजीत्त तुम कुछ जल्दी उठ गये?"

"अच्छा हुआ तुम आ गये। मै यहीँ सोच रहा था कि तुम्हें केसे बुलाऊ'?"

"खैरियत तो है कोई गडबड… हो गई क्या?"

"नहीं गडबड… कोई नहीं हुईं । मैने एक अजीब ख्वाब देखा और मेरी आख खुल गई ।"

"ख्वाब ! क्या बकाल ख्वाब में आ गई?"

इन्द्रजीत ने ह्रसकर कहा… "नहीं बकाल_ तो नहीं, अलबत्ता मेरी बहन ख्वाब में आगई।"

"रेखा को देखा तुमने ख्वाब में । " काला चिराग की उत्सुकता जागी-"क्या कह रही थी, वह ख्वाब में?"

"बडा अजीब ख्वाब देखा है मैँने। रेखा एक वडे से पत्थर पर क्लात्मक कुर्सी पर शह्रजादियों की तरह बैठी है और उसके करीव ही 'मुक्ति द्वार है। "

"बस, इतना ही देखा?"

" हां !"

"उसने कुछ कहा नहीं? "

"वह शाही कुर्सी पर शाही लिबास पहने शहजादिर्यों की तरह जरूर बैठी थी लेकिन उसके चेहरे पर परेशानी के भाव थे। वह इधर-उधर नजरे घुमाकर देख रही थी।" इन्द्र ने बताया ।

"तुम्हें यह अहसास कैसे हुआ कि उसके नजदीक ही 'मुक्ति द्वार' है ।"

"यह मुझे खुद नहीँ मालूम, लेकिन जब मेरी आख' खुली तो यह अहसास, यह सोच मेरे दिमाग में मोजूद थी कि रेखा 'मुक्ति द्वार' के निकट बैठी है ।"
 
"मुक्ति द्वार नामक कुए के आस-पास का इलाका पथरीला है और यह भी सही है कि उसके करीव छोटे बडे पत्थर बिखरे पडे हैं। कुछ पत्थर तो छोटी चट्टानों जितने है। " काले चिराग ने सोचपूर्ण लहजे में कहा--"एक बात बताओ, क्या तुम समझते हो कि तुमने सच्चा खवाब देखा है l"

"बिल्कुल मेरा दिल पुकार पुकारकर कह रहा है कि रेखा 'मुक्ति द्वार' पर मोजूद है। "

"ठीक है । फिर समय नष्ट नहीं करते, फौरन चलते है। "

"क्या अपना सामान समेट लूं?"

"नहीँ, कुछ मत समेटो । " काले चिराग ने खडे होते हुए कहा "बस, यहा सै निकल चलने की फिक्र करो । "

"तो फिर चलो । मैं चलने के लिए तुमसे भी ज्यादा बेकरार हूं। "

"आओ फिर मेरे साथ । " यह कहकर काला चिराग, इस 'ख्वाब महल' के भीतरी दरवाजे कीं तरफ वढ़ गया ।

उसे उधर जाते देखकर इन्द्रजीत को हैरत हुई क्योंकि काले चिराग ने साफ शब्दों में उसे अन्दर न जाने को कहा था । अब यह खुद ही उसे महल के अदर' ले जा रहा था।

"महल के अदर 'कहा' जा रहे हो? वहा जाने को तो तुमने मना किया था?” इद्रजीत. पूछे बिना नहीं रह सका ।

"साथ ही, मेंने एक बात और भी कही थी। "

"वो क्या?”

"यही कि तुम्हें सवाल करने की इजाजत नहीं है । " काला चिराग ने मुस्कराकर याद दिलाया I

"ओह हां! अच्छा ठीक है नहीं करता सवाल । ऐसे सवाल करने का क्या फायदा जिनका जवाब न मिले?"

दरवाजे पर पहुँचकर काले चिराग ने दरवाजा खोला और इन्द्र को अपने पीछे आने का इशारा किया । जब वे दरवाजे से बाहर निकल आए तो काले चिराग ने दरवाजे में एक मोटा सा ताला लगा दिया और चाबी ह्रबा में उछाल दी जो फौरन ही गायब हो गई । फिर उसने इन्द्रजीत्त का हाथ थाम लिया और

"इन्द्रजीत मेरे साथ दौडना। "

इन्द्र को भला क्या एतराज हो सकता था, लेकिन उसे ज्यादा नहीं दौडना_ पडा I दौड लगाते ही उसके सामने अंधेरा सा छा गया। बहुत गहरा अंधेरा था-ऐसा अंधेरा' कि हाथ को हाथ सुझाई नहीं दे रहा था।

फिर कुछ देर बाद ही उसकी आखों के सामने से अचानक अंधेरा हट गया l उसने खुद को एक पथरीले इलाके में पाया । उनके सामने ही एक छोटी-सी चट्टान थी । वे उस चट्टान की और सै निक्ले कि सामने एक बडे पत्थर पर रेखा क्रो राजसी परिधान में एक कुर्सी पर बैठे देखा तो इन्द्रजीत को अपनी आखों' पर बिश्वास नहीं आया । उसने सोचा वह पहले ख्वाब देख रहा था या अब देख रहा है I उसने फोरन अपनी बाह पर चुटकी ली, पीड़ा का अहसास हुआ ।

"इन्द्रजीत तुम्हारा ख्वाब तो वाकई सच निक्ला । "

वे दोनों अभी रेखा से दूर थे और पत्थरों की ओट में छिपते, कभी बाहर निक्लते रेखा की तरफ बढ रहे थे।

रेखा इर्द-गिर्द का जायजा लेने के बाद पुन: कुर्सी पर आ बैठी थी । लगडे_ प्रेत, राकल की छडी उसके हाथ में थी और वह यही सोच रही थी कि अब क्या करे? किसे अपनी मदद के लिए पुकारे? तभी उसकी नजरे अचानक सामने उठी तो उसका ऊपर का सास' ऊपर और नीचे का नीचे रह गया। हैरत सै आखें फैल गई I एक अविश्वसनीय नजारा उसके सामने था । गजब ही तो था कि उसका भाई इन्द्रजीत और उसका हमदर्द काला चिराग हसते-मुस्करात्ते उसकी तरफ बडे चले आ रहे थे।

रेखा से रूक पाना कठिन हो गया । उसने राकल का 'राजदण्ड' परे फेंका और पत्थर से धडधड करती नीचे आ गई । हवा के तेज झोंके की मानिन्द ही वह इन्द्र के पास पहुची' थी ।

"मेरे भाई! " कहते हुए वह इन्द्र के गले लग गई और सिसक पडी।

"ओ मेरी रेखा मेरी प्यारी बहन रेखा । " इन्द्र ने उसे अपने बाजुओं में समेट लिया।

काला चिराग बहन-भाई के मिलन के इस हृदयविदारक दृश्य को बडी दिलचस्पी से देख रहा था I इंद्रजीत भी तो भावावेश में रो पड़ा था I

"भई, यह आखिर कब तक रोते रहोगे? यह तो खुशी के क्षण है। " काले चिराग ने हसकर कहा ।

तब इन्द ने रेखा को अपने से अलग किया, खुद को सम्भाला व फिर रेखा सै सम्बोधित हुआ-"इनसे मिले यह इस अचरज लोग के है नाम है काल चिराग ."

"इन्हे' में केसे भूल सकती हूं। " रेखा ने अपने आसू पौछते हुए कहा । फिर काले चिराग सै पूछा "आप कैसे हैं?"

"मैं बिल्कुल ठीक हूं। मैं ही नहीं, तुम्हरा भाई इन्द्रजीत भी बिल्कुल ठीक है । क्या तुमने इसका चेहरा गोर से देखा?"

काले चिराग के कहने पर रेखा नै फौरन अपने भाई के चेहरे की तरफ देखा। यह देखकर कि इन्द्र के चेहरे पर जो दीमक सी लगी हुई थी, बिल्कुल साफ हो गई हे-उसे बहुत खुशी हुई I इस वक्त उसका आई बहुत प्यारा लग रहा था। एकदम फिल्मी हीरो ।

"ओह वाकई... l " उसके मुह से निकला-- "भाई, यह केसे हुआ?"

"यह हम बाद में बताएगे' । पहले तुम यह बताओ कि तुम्हें यह रत्नजडित्त कुर्सी और यह शाहाना लिबास कहा सै मिला? तुम्हें तो 'मुक्ति द्वार' में फेका गया था । तुम जिन्दा कैसे बच गई? कही तुम रेखा की 'आत्मा' तो नहीं हो?" काले चिराग ने हंसकर पूछा।

"मै एक जिन्दा ह्रकीकत हूं। यह ठीक है कि मुझे उस नर्क कुण्ड में फैका था और यह भी सच है कि उस कुए में धकेला शख्स कभी नहीँ बच सकता । मैं अगर बच गइ तो इसे मेरी किस्मत समझे या फिर एक चमत्कार । "

" आखिर यह सब हुआ केसे?" इन्द्र ने पूछा।

"इसे चमत्कार ही समझो, इन्द्र! इत्मीनान से बताऊगी । एक लम्बी कहानी है । " रेखा ने मुस्कराकर कहा।

"रेखा, तुम यह न समझो कि तुम्हारे पास ही सुनाने को बहुत कुछ हैं I हमारी सुनोगी तो हैरान रह जाओगी ।" इन्द्र बोला ।

"ठीक है-ठीक है । " काला चिराग बोला "यह सुनने-सुनाने का सिलसिला यहां नहीँ । 'ख्वाब महल' में पहुंचकर ही सुनी जायेगी ये आप बीतियां I "

"यह 'ख्वाब महल' कहा' है?" रेखा ने पूछा।

"करीव ही है । तुम यह बताओ, यह कुर्सी भी साथ ही जाएगी?" काले चिराग में पूछा।

"जी तो नहीं चाहता ऐसी कुर्सी छोडने को ।" रेखा बोली-"पर अब ऐसा मोह भी नहीं है कि जहमत उठाई जाये I "

“अक्लमंदी' की बात है । " काला चिराग हसते हुए बोला "छोडो इसे-आओ चलें I"

फिर वे तीनों घूमकर उस चट्टान की ओट में आ गये जहां वे पहले पहचे थे।

"तुम दोनों मेरे हाथ पकड लो और हाथ पकडकर, आखें बन्द कर लो॥"काले चिराग ने अपने दोनों हाथ आगे कर दिये I

रेखा ने बायां और इन्द्र ने दायां हाथ पकड़ लिया । फिर उन्होंने जेसे ही आखें' बन्द कीं-एक झटका-सा लगा I ऐसा लगा जैसे धरती फट गई हो और वे नीचे गिरते चले जा रहे हो, पर यह स्थिति कुछ क्षणों से ज्यादा नहीं रही I फिर काले चिराग की आवाज उभरी-- "अब औखें खोल दो ।"

इन्द्रजीत ने आखें' खोलीं तो उसने खुद को महल में पाया I रेखा साथ ही थी। रेखा के लिए यह जगह नईं थीं I

"तो यह है 'ख्वाब महल' ?" वह चारों तरफ निगाहें दौडाते बोली और फिर आगे बढकर. एक कुर्सी पर बैठ गई I

इन्द्रजीत और काला चिराग भी कुर्सियों पर बैठ गए।

"यह किसका महल है? " रेखा ने पूछा ।
 
"बस, अपना ही समझो । " काले चिराग ने मुस्कराकर कहा ।

"जब मैं अपनी दुनिया से आई थी तो आपने मुझे इसी तरह के एक महल में ठहराया था जहां मैं रातभर डरती रही थी । पूरी रात सो नहीं सकी थी । मैं जब भी आख' बद करती थी खुद को एक अंधेरे हाल में पाती जहां बेशुमार चमगादड़े उडती. हुई नजर आती । "

"वह मेरी गलती से हुआ, लेकिन यहा ऐसा कुछ नहीँ होगा । " काले चिराग ने मुस्कराकर कहा ।

"यहां बाहर निकलने में पाबन्दी तो नहीं। " रेखा ने कुछ सोचते हुए पूछा ।

"नहीं । लेकिन बाग की चारदीवारी सै बाहर जाने की इजाजत नहीं और न ही इस कमरे से महल के अदर जाने की जरूरत है । " काले चिराग ने खुलासा किया ।

"चलो यह तो तय हुआ। " रेखा ने निश्विन्तता दर्शाई--”अब मुझें हालात से भी आगाह कर दो I आखिर हमें एक दूसरे की कहानी जान लेनी चाहिये I "

"तुम्हें कहां तक की कहानी की घटनायें याद है?" काले चिराग ने पूछा ।

रेखा याद करते बोली "तो मै अपनी सुनाती हूं। भाई हम तीनों इसी तरह रेगिस्तान में उस झोपडी में थे जिसमें भाई इन्द्रजीत कैद थे और चुडैल बकाल से छुटकारे के रास्ते सोच रहे थें कि वो बुला अचानक आ चढी और पहले तो उसने आपको जजीरो में पकड़ा और कुछ सवार आपको घसीटते हुए ले गए। उसके बाद वकाल अपने साथ ले गई । इस तरह हम तीनों जुदा हो गए । "

"मुझें बकाल के भाई राकल के लोगों ने गिरफ्तार किया था । राकल ने मुझ कैदखाने में डाल दिया I वहां से सरदार क्रोलाना ने मुझे आजाद करवाया और लगडे राकल के ठिकाने सुनहरे खण्डहर की ईंट-से-इट बजा दी I " काले चिराग ने बताया ।

"बकाल मुझें भी अपने भाई राकल के पास ले गई और उसके सरक्षण में देकर चली गई। राकल मुझें अपनी बनाना चाहता था जो मुझे मजूर न था । नतीजे में मुझें कैद में डाल दिया गया और कई दिन भूखा प्यासा कमरे में बंद रखा । वहां दादा हरिओम की पुण्यात्मा ने मेरी मदद की और मुझें मरने नहीं दिया । दो-तीन दिन बाद जब राकल ने कमरा खुलवाया तो उसका ख्याल था कि मैं भूख से इतनी निढाल हो चुकीं होऊगी' कि उसका कहा फोरन मान लूगी लेकिन जब उसने मुझें आशा के विपरीत सकुशल स्वस्थ देखा तो वह हैरान रह गया।

"तब पता चला कि बकाल को सरदार कोलाना ने अगुवा करवा लिया और उसके बदले उसने काले चिराग यानि आपको मागा है । राकल ने मेरे बारे में फैसला कर लिया था कि मुझे मोत के मुह में झोंक देगा I इसलिए वह मुझे धोखे से सुनहरे खण्डहर से निकाल लाया और मुझें 'मुक्ति द्वार' नामक मौत के कुए' में फिकवा' दिया । ”

रेखा ने अपनी आपबीती कह सुनाई। "रेखा मैं हैरान हूं कि तुम बच केसे गई?” काले चिराग ने कहा ।

"बस, ऊपर वाले ने बचा लिया । " रेखा आभारी सी बोली-”कुएं में गिरते वक्त मेरी चीखों ने कुएं के बौने प्राणियों को जगा दिया । उन्होंने मुझे बचाया और फिर इनाम के लालच में कासगन कीं बस्ती तक पहुचा' दिया । वहां एक अजीबो गरीब कहानी मेरी प्रतीक्षक थी।"

और फिर कासगन कीं बस्ती में रेखा के साथ जो बीती वह सविस्तार उन्हें सुना डाला । हर बात बता दी मगर वह बात छिपा ली जो कभी छिपाये नहीं छिपती । रासमोन उसको भा गया था । उसने रासमौन का जिक्र तो किया लेकिन यह नहीँ बताया कि वो उस पर मर मिटा था और खुद भी उसके आकर्षण में बंध गई थी। रेखा की आपबीती खत्म हुई तो काला चिराग अपनी कहानी ले बैठा ।

लगडे प्रेत राकल के सुनहरे खण्डहर की तबाही उसकी गिरफ्तारी-सरदार कोलाना के सामने उसकी पेशी फिर बकाल के साथ उसक्ती शॉदी-वकाल की आत्महत्या-उसकी अन्तेयष्टि राकल का सरदार कोलाना को घायल करके निकल जाना-देवा काली का दरबार-राकल की सजा ए मौत फिर उसकी भी अन्तेयष्टि-और उसी अवसर पर इंद्रजीत का मिल जाना----

इन्द्रजीत्त का मिल जाना इन्द्र को सुनहरी पखों बाली मक्खियों का काटना इन्द्रजीत का भला चगा हौना-बकाल और लगडे राकल का जमीन में उतर जाना-उनका भयावह अजाम. और इन्द्रजीत्त का काले चिराग के साथ 'ख्वाब महल' में आना।

रेखा व काले चिराग के बाद इन्द्रजीत्त ने अपनी आपबीती छेडी और उसने वह सारी बातें रेखा को सुना दीं जिनसे वह वाकिफ न थी ।

इन्द्रजीत्त की आपबीती सुनकर अब पूरी कहानी, रेखा के सामने आइने की तरह चमकने लगी । वह खुश थी कि उसने अपने भाई इन्द्रजीत्त को पा लिया । अब वह यही चाहती थी कि जैसे भी शीघ्र अति शीघ्र अपनी दुनिया में लोट जाए ताकि अपने चाचा रमाकांत से उसके एक एक जुल्म का हिसाब ले सके ।

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एक दूसरे के हालात जानने के बाद रेखा बोली-- "काले चिराग, साहब । अब आप हम पर एक अहसान और कर दे । हमेँ हमारी दुनिया में पहुँचा दें।

काले चिराग ने कोई जवाब नहीं दिया । वह बडे नाटकीये व रहस्यमय अदाज में कुर्सी सै उठा और बिना कुछ कहै, महल के भीतर दरवाजे से अन्दर चला गया और फिर दरवाजा खटाक से बन्द हो गया।

रेखा ने अपने भाई की तरफ देखा, फिर चिन्तित्त स्वर में बोली "इन्हें क्या हुआ?"

"शायद हमारी बापसी का जिक्र पसन्द नहीं आया ।।| " इन्द्रजीत बोला--"और मुझे तो लगता है कि वह हमें इस कमरे में बन्द कर गया है।"

"हाय, नहीं | " रेखा विचलित हो उठी--"मै जाकर दरवाजा देखूं !"

"हां, देखो, पर यह ख्याल रखना कि दरवाजा खुला हुआ हो तो वाहर निकलने की कोशिश न करना । " इन्द्र ने उसे सचेत किया ।

रेखा उठ गई व भीतरी दरवाजे क्री तरफ बढी । उसने दरवाजे को अपनी तरफ खींचकर देखा। दरवाजा नहीं खुला। शायद उधर से कुंडी लगी हुईं थी।

"दरवाजा तो बन्द है, भाई। " वह परेशान हो उठी थी ।

"अच्छा, मैं महल का बाहरी दरवाजा देखता हूं।" इन्द्र उठकर बाहरी दरवाजे की तरफ बढ गया ।

इन्द्र ने बाहर वाला दरवाजा अपनी तरफ खींचकर देखा । दरवाजा फोरन खुल गया ।

"यह दरवाजा तो खुला हुआ है। " उसने बहन को बताया।

"शुक्र है। " रेखा ने ठण्डी सास लेते कहा।

"कैद का खतरा तो टल गया। " इंन्द्रजीत ने भी राहत कीं सास' ली थी । उसने सुझाव दिया… "आओ बाहर चलें। बाग में जाकर बेठत्ते हैं।"
 
रेखा उसकी तरफ बढ गई। फिर वे दोनों ही सीढिया उतरकर बाग में पहुच' गए और एक घने साये तले घास पर बैठ गए। कुछ क्षण चुप्पी में बीते । फिर रेखा, इन्द्र के चेहरे क्री तरफ देखते बोली-- " भगवान की बडी कृपा हुई है भाई कि आपका चेहरा ठीक हो गया, वर्ना मैं तो बहुत चिन्तित थी। "

"रेखा । मैने बडी यातनापूर्ण जिन्दगी गुजारी है । पीछे पलटकर देखता हू--तो रूह तक काप जाती है|"

"यह सब हमारे शैतान चाचा रबिकात की वजह से है। न वह आपकी हत्या का षड्यंत्र रचता न आप इन हालात का शिकार होते।"

"रेखा, यह दौलत इसान को ऐसा निर्मम क्यों बना देती है?" इन्द्र खोये हुए अंदाज में बोला।

”दौलत है ही ऐसी जालिम चीज अच्छे भले आदमी को पागल कर देती है।"

इन्द्र ने तर्क दिया-"तो फिर हमारा बाप क्यो न पागल हुआ। क्या उनके पास चाचा रविकात सै कम दौलत है?"

बाप के जिक्र पर रेखा कुछ क्षण खामोश रही । उसके चेहरे पर दुख के बादल छा गये, वह कुछ क्षण भाई की सूरत देखती रही, फिर बोली-- "भाई, एक वात बताऊं । मैंने यह बात आपको पहले इसलिए नहीं बताई कि आप पहले ही हौलनाक यातनाएं झेल चुके थे और मैं आपके दुख बढाना, नहीं चाहती थी I

"ऐसी क्या वात है, रेखा !" रेखा की सजीदगी ने इन्द्र को परेशान कर डाला था ।

"भाई ।" रेखा अपना होंठ चबाते बोली-- "हमारे मम्मी-पापा अब इस दुनिया में नहीँ रहे है ।"

"क. . .क...क्या... ?" यह खबर इन्द्र पर बिजली बनकर गिरी ।

इन्द्रजीत जब अपने मां बाप से बिछुडा था तो उसकी उम्र बारह तेरह साल की ही थी । बरसों उसे अपने मां बाप या परिबार की कोई खबर न थी और....

जहनी तोर पर शेतानों का गुलाम वने रहकर उनके बारे में कुछ सोच ही नहीं पाया था ।

"मम्मी को क्या हुआ, रेखा !" उसने भर्राये गले मे पूछा।

"‘भाई, मम्मी को तो आपका गम ले बैठा । आपके अपहरण के बाद वह तो मुश्किल से तीन माह ही जीबित रहीं । सुना है वह बस हर वक्त आपकी तस्वीर लेकर घूमती रहती थी । जब उनका देहान्त हुआ-तब भी उनके सीने पर आप ही की फ्रेम लगी फोटो थीं और नजरे दरवाजे की तरफ । "

यह सुनका इन्द्र की आखों' से आंसू बह निकले । वह घुटनों में मुह देकर सिसक सिसककर रोने लगा। उसे रोता देखकर खुद रेखा भी सब्र न कर सकी । वह भी बेअख्तयार रोने लगी।

दिल का दर्द आसू बनकर बह रहा था ।

"और पापा । " इंन्द्रजीत ने रोते-रोत्ते पूछा।

रेख के आसू थम गए। उसने सिर उठाकर अपने भाई की तरफ देखा व बोली-- "बाप की हत्या कर दी गई। "

"ह्रत्या! किसने हत्या की उनकी?"

"हमारे चाचा रविकांत ने । " रेखा सर्द लहजे में बोली ।

”उसने...उसने मेरी ह्रत्या करवाने की साजिश कीं मेरी मां को मार दिया मेरे बाप को कत्ल कर दिया।" इन्द्र ने अपने आसू पोंछ डाले व फुफकारती आवाज में बोला-- “रविकात फिक्र मत करो । अब तुम्हारी मोत तुमसे दूर नहीं है और बह भी ऐसी भयानक कि दुनिया देखेगी ।"

"हा, भाई! उसको छोडना नहीँ है। उसने हमें तबाह कर दिया है । ”

"मैं उसे देख लूगा । " इन्द्र भी अपना रोष नहीं दबा पा रहा था।

"अरे भई, किसे देख लोगे? मैं तो यहा हू और मैने तुम लोगों का कुछ बिगाड़ भी नहीं है।” अचानक काले चिराग की आवाज आई। वह पेडो के झुण्ड से बाहर आया था । जाने बो वहां दुबकर इनकी बातें सुन रहा था या फिर उन्हें तलाश करता हुआ इधर आ निकला था।

" आप आ गए? " रेखा मुस्कराने की कोशिश करते हुए बोली--"आप कहा चले गए थे ?"

"मैं अपने सरदार कोलाना के पास गया था। उससे इजाजत लेनी जरूरी थी ।"

" ओह तो मिल गई इजाजत?"

"हां I. लेकिन इन्द्रजीत तुम किसको देख लेने कीं बात कर रहे थे?" उसने पूछा।

"है एक शेतान शख्स हमारी दुनिया का । उसने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। "

"अपने चाचा रविकांत की बात कर रहे हो?" काले चिराग धीरे सै पूछा।

"हां, उसी की । लेकिन तुम उसे कैसे जानते हौ ? "

"मै केसे जानता हूं। भला यह भी पूछने की बात है। " काले चिराग ने मुस्कराकर कहा--"मुझसे यह पूछो कि मै क्या नहीं जानता । "

"यानि कि सवाल करने क्री इजाजत है... I" इन्द्रजीत ने फोरन कहा।

"नहीं नहीं... । " काले चिराग ने घबराकर कहा--"तुम्हारा कोई भरोसा नहीं। पता नहीं क्या पूछ बैठो?"

”बस, घबरा गये । " इन्द्र उसकी बौखलाहट सै आनन्दित होते बोला।

”अब आपने क्या तय किया?” रेखा ने बातचीत का रुख मोडा।

"किस बारे में? "

"हमारे यहां से जाने के बारे में । "

"अभी तो आप लोग अंदर चले खाना इत्यादि खा लें। फिर कुछ करते हैँ I "

"मुझे तो भूख नहीं है । " इन्द्र बोल उठा l

"भूख तो भइया, मुझें भी नहीं है।"

”अरे, आखिर ऐसा क्या हुआ कि दोनों की भूख उड गई?" काले चिराग ने बारी बारी से उनकी तरफ देख था ।

" कुछ नहीं हुआ I " रेखा अब उसे क्या बताती कि उसने अपने भाई को क्या खबर सुनाईं है? वह अपना जाती दुख उसे बताती भी तो क्यो?

बात टालने के लिए वह उठकर खडी हो गई और इन्द्र से बौली--"आओ, भाई, अन्दर चलें । ”

वे तीनों अन्दर आए।
 
मेज पर खाना सजा हुआ था । दोनों में सै किसी ने भी खाने की तरफ नहीं देखा।

इंन्द्रजीत बिस्तर पर आ लेटा और रेखा कुर्सी पर बैठ गई ।

काले चिराग ने उलझन भरी निगाहों से उनकी तरफ देखा, फिर बौला--"ठीक है मै अब चलता हूं। सूरज डूबते ही आऊगा । तब तक आप दोनों आराम करें । भूख लगे तो खाना मौजूद है। खा लेना । खाना ताजा और गर्म मिलेगा। "

"मैं जानती हूं। " रेखा बोली।

"हां, तुम तो जानती ही हो। " काले चिराग ने मुस्कराकर दिखाया---"तुम तो पहले भी देख चुकीं हो । "

"वह केसे?" इन्द्र की निगाहें अपनी बहन की तरफ उठ गई थीं।

रेखा ने बताया-- ”जब मै अपनी दुनिया से यहा पहुची थी तो काले चिराग साहब ने इसी तरह के गुप्त महल में मुझे महमान रखा था l आपके बारे में और आपकी कहानी सुनाई थी और फिर उसके बाद ही मुझे आपसे मिलाने ले गए थें । "

"ओह हां! मुझे याद आ गया । " इन्द्र ने गहरी सास ली थी ।

"खैर अब मुझे इतना और बता दो कि तुम कहां पहुचना चाहोगे?" काले चिराग ने पूछा!

"क्या मतलब?" रेखा बोली "अपनी दुनिया में पहर्चेगे और कहां?"

"अपनी दुनिया में तौ जाओगे-लेकिन किस जगह पहुचना चाहोगी?" काले विराग ने अपना आशय स्पष्ट करते पूछा-- "क्या उस मकान में जहां से तुम्हें लाया गया या सावनपुर की अपनी पुश्तैनी हवेली में या अपने पिता कीं माडल टाऊन वाली कोठी में । फिर एक समस्या यह भी है कि तुम भाई बहन दोनों एक ही स्थान पर पहुचना चाहोगे या अलग जगहों पर । यह सब बातें तय कर लौ । अंधेरा होते ही मैं आ जाऊगा । फिर तुम दोनों क्रो तुम्हारी इच्छानुसार ही जहां चाहोगे पहुचा दिया जाएगा। " काले चिराग ने कहा और फिर महल के भीतरी दरवाजे की तरफ बढ़ गया ।

वे दोनों ही उसे देखते रह गये काला चिराग एक कद्दावर शख्स था। ढीला ढाला काला लिबास-कंधे पर पडे हुए लम्बे लम्बे वाल । देखने में ही रहस्यमय काले चिराग के व्यत्तित्त्व में एक अजीब सा आकर्षण था ।

वह थोड़ा सा दरवाजा खौलकर भीतर समा गया और फिर दरवाजा खटाक से बद हो गया ।

उसके जाने के बाद, रेखा, सोचपूर्ण लहजे में बोली--- "भाईं, काले विराग ने सवाल तो ठीक उठाया है।"

"कैसा सवाल?“

"यही किं हम सावनपुर जाएं-दिल्ली पहचे या फिर बगलोर का रुख करें।"

"तुम बताओ, क्या करना चाहिये? "

"मेरा जी तो यह चाहता है कि जिस ' भूतहा कमरे' से यहाँ ट्रासफर हुई हू वहीँ वापिस पहुचू और आपको भी अपने साथ ले जाऊ । " रेखा ने अपनी इच्छा जाहिर की ।

”यानि बगलौर गगा मोसी के घर में।"

"हां । " रेखा ने जवाब दिया, पर फिर अगले ही क्षण वह सोच पूर्ण लहजे मॅ बोली-- "मगर...मगर, अगर में आपके साथ उस घर के उस 'काले कमरे' से निकली तो गंगा मौसी और अमर को सन्तुष्ट करना मुश्किल हो जाएगा। मैं उम्हें क्या बताऊगी । बताऊगी' भी तो कोन यकीन कर लेगा? सभी हमारा मजाक उडाऐगे या पागल समझेंगे।" रेखा खुद ही हस भी दी--"सच कहूं भैया! मुझें तो खुद इन हालात पर बिश्वास नहीं आ रहा । यह सब एक ख्वाब-सा होता है। सच, अभी भी लगता है जेसे में कोई स्वप्न देख रही हू और जब आख खुलेगी तो सारी हकीकत सामने आएगी और सारा फरेब खुल जाएगा।"

इन्द्रजीत ने गहरी सास ली… "कहती तो ठीक हो कोई यकीन नहीं करेगा, पर हमें जरूरत ही क्या है कि हम दुनिया वालों को अपनी कहानी सुनाते फिरें। हमें किसी से सनद लेने की क्या जरूरत है? अपनी कहानी भी सुनाएं और झूठे भी कह्रलाएं । "

"चलो, एक बात तो तय हो गई कि अपनी दुनिया में जाकर यहा हम पर जो कुछ बीता है, वह किसी को नहीं सुनाएगे' I जरूरत के अनुसार कोई ऐसी कहानी गढ लेगे कि लोगों को यकीन आ जाए और उनकी जिज्ञासा शात हो सके । अब सबाल यह है कि हम दोनों एक साथ चलें या अलग अलग ।!

"अलग अलग ही जाना होगा। " इन्द्र जेसे निर्णायक लहजे में बोला--- "अगर हम एक साथ ही उस 'काले कमरे' से प्रकट हुये तो सारे लोग घर छोडकर. भाग जाएगे। "

"ठिक कहते हैं आप । ऐसा ही करते है। मै अब आपको अकेला नहीँ छोड सकती I मुझे डर लगता है । "

"किस बात का डर । "

"अगर हमने अलंग अलग जाने की इच्छा व्यक्त की तो यह काला चिराग हमें जाने कहा कहा पहुचा दे । हो सकता है, यह हमें जुदा कर दे । "

दुध का जला, छाछ फूंक कर पीता है वाली बात थी । रेखा ने आशंका व्यक्त की-- "यह आपको तो हमारी दुनिया पहुचा' दे लेकिन मुझे यहा से न जाने दे। "

"यह शंख्त फरेबी नहीं लगता । " इन्द्र ने असहमति जताई- "अगर इसे हमें जुदा ही करना होता 'तो फिर मिलाता ही क्यों? फिर यह तुम्हारी बडी इज्जत करता है रेखा।"

" हां । इतना तो में भी जानती हूं कि यह राकल की तरह नहीं है। इस पर बिश्वास किया जा सकता है। ऐसा कभी नहीं हुआ है कि इसकी नीयत पर शक किया जाए । "

रेखा बोली "बहरहाल हमें काले चिराग पर विश्वास करना होगा । यह हमारी मजबूरी भी है। हम उसके ही रह्रमो करम पर है । " वे काफी देर तक बैठे इसी समस्या पर विचार-विमर्श करते रहे। अंतत: उन्होने' एक सयुक्त फैसला ले लिया । क्या करना है, कैसे करना है, यह सोच लिया?

सब तय करने के बाद, वे थ्रोडा, आराम करने के लिए सो गये ।

फिर जब रेखा की आंखों खुली तो शाम होने वाली थी I उसने इन्द्रजीत को जगाया । मुह हाथ धोने के बाद रेखा की जिद करने पर इन्द्रजीत्त ने थोड़ा बहुत खाना भी खा लिया। रेखा ने भी उसका साथ दिया था ।

सूरज ढलते ही काला चिराग आ पहुचा'! वह खामोशी से आकर बैठ गया । रेखा ने उसे गौर से देखा ।

वह नजरें नीची किये गर्दन झुकाये किसी गहरी सोच में था ।

"क्या हुआ ?" रेखा ने पूछा ।

"कुछ नहीं। " उसने नजरे उठाकर खाली-खाली निगाहों से रेखा को दख़ते हुए कहा।

'फिर इतने उदास क्यो नजर आ रहे हो?”

"बिदा की बेला है-क्या मुझे खुश होना चाहिये?" वह उदास सा ही बोला।

"आपको तो होना ही चाहिये।" रेखा ने जेसे उसकी प्रशसा' की… "आप हमारे हमदर्द हैं। हमारे मुक्तिदाता है। "

काले विराग के होंठो पर फीकी सी मुस्कान उभरी, उसने एक गहरी सास' ली फिर बोला-"खैर ॥ मै तुम दोनों से ही कहना चाहूगा कि मेरे किसी रवैये सै तुम्हें कोई दुख पहुचा हो तो मुझें गैर इन्सानी प्राणी समझकर माफ कर देना। "

"आपने हम दोनों का बहुत ख्याल रखा। हम दोनों ही आपके आभारी हैं। हमें शर्मिन्दा न करें। हा'-अगर हम दोनों से कोई गुस्ताखी हो गई हो तो उसे दिल से माफ कर दीजियेगा। 'इन्सान' बहरहाल, खता का पुतला है । " रेखा बोली।

"अब तुम मुझे शर्मिन्दा कर रही हो? मैं... । "

रेखा उसकी बात काटते बौली-"मैं एक तुच्छ सा तोहफा आपकी भेंट करना चाहती हूं। आशा है, आप इंकार' नहीं करेगे । " और उसने कासगन का दिया हीरों का हार गले से उतारकर अपने दोनों हाथों पर रखा और हाथ काला चिराग के सामने कर दिये।

"अरे यह कैसे हो सकता है और यह तुम्हें दिया किसने? में इसे कबूल नहीं कर सकता। "

”इसके अलावा हमारे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं है। " इन्द्र बोला ।

“कुछ देने की जरूरत भी नहीं है । अपनी दुनिया में जाकर 'अच्छे शब्दों’ से याद कर लैना-बस, यही मेरे लिए सबसे कीमती है । " काले चिराग ने हसते हुए कहा ।

"हम जब तक जीयेँगे आपको याद रखेंगे। आपको भला कौन भूल सकता है?" रेखा ने कहा ब वह हार दौबारा अपने गले में पहन लिया ।

"आप लोगों ने क्या तय किया? किस तरह जाना है और कहा जाना है!" काले चिराग ने पूछा।

“हम लोगों ने तय तो कर लिया है-लेकिन आपसे पूछना भी जरूरी है कि क्या ऐसा हो भी सकता है या नहीँ?"

"हर वह बात मुमकिन है जो आप चाहें। मेरी तरफ से खुली आजादी है । आप बताएं क्या चाहती है?"

तब रेखा ने उसे अपना वह मन्सुबा बताया, जो उन्होंनै आपस में तय किया था । काला चिराग खामोशी से सुनता रहा । फिर बौला--"ठीक है आप लोग चलने की तैयारी करें।"

काला चिराग ने तैयारी में इन्द्र की मदद की। उसने इन्द्र को कई जोडी, कपडों. सै भरा एक बैग उपलब्ध कराया । रेखा को भी उसकी जरूरत की चीजें दी, फिर वे तीनों उठ खडे हुए ।

"रेखा, अभी बैठो। पहले मैं इन्द्रजीत को इसकी दुनिया मे पहुचा दू-क्योकि तुम अलग अलग अपनी दुनिया में जाना चाहते हो। "

"ठीक है । "

"आओ इन्द्रजीत । उठाओ अपना बेग और चलो अपनी दुनिया में। "

इन्द्र ने अपना बैग उठा लिया! वह रेखा के करीव आया ओर धीरे सै बोला
 
"अच्छा, रेखा! मैं चलता हूं। तुम डरना मत । भगवान ने चाहा तो सब ठीक ही रहेगा। "

"भगवान ठीक ही करेगे। अच्छा, विदा। ” रेखा ने दिल कड़ा करके कहा ।

इन्द्र व काला चिराग महल के भीतरी दरवाजे से बाहर निक्ल गए । उनके जाने के बाद दरवाजा खटाक सै बन्द हो गया । दरवाजा बन्द होते ही रेखा का दिल कापने लगा । खौफ की एक सर्द लहर सी उसकी रीढ की हडी में दौडती चली गई । उसे बस यही अदेशा था कि कहीं काला चिराग धोखा न दे जाये । बहरहाल अब कुछ नहीं हो सकता था । उसने आखें बन्द कर-प्रभु से लौ लगा ली और सकुशल अपनी दुनिया में व अपने घर पहुचने की दुआ मागने लगी ।

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सूरज कब का डूब चुका था ! बाहर अंधेरा फैल चुका था । रेखा ने पर्दा हटाकर बाहर झांका तो उसे तारों भरा आकाश नजर आया । चाँद भी निकल आया था लेकिन वह सामने नहीँ था। चादनी पूरे बाग पर बरस रही थी । काला चिराग काफी देर बाद वापिस आया। वह पसीना-पसीना हो रहा था । उसके काले कपडे जगह जगह से भीगे हुए थे।

रेखा ने राहत की सास ली थी । अन्देशें जाते रहे थे। उसने पूछा--"क्या हुआ?"

"तुम्हारा आई सकुशल अपनी दुनिया में पहुच गया है । " काले चिराग ने बताया ।

"आप... आप पसीने से नहाये हुये है । " रेखा के स्वर में सहानुभूति भर आई थी ।

"यह पसीना नहीं है । " काले चिराग ने मुस्कराकर कहा ।

"फिर क्या है?" रेखा का संयत होता दिल फिर धडकने लगा था ।

"छोडो इस बात को।" काला चिराग बोला-- "अपना बेग उठाओ, मेरे पास आ जाओ ॥" रेखा खामोशी से उठी और अपना बेग कंधे पर रखकर उसके पास जा खडी हुई।

काले चिराग ने अपना सीधा हाथ उसकी तरफ बढा दिया, बोला "मेरा हाथ पकड लो । " रेखा ने निसकोच उसका हाथ थाम लिया-जो बर्फ की तरह ठंडा था ।

"अब ऊपर छत्त की तरफ देखौ । " काले चिराग ने कहा । रेखा ने कुछ कहे बिना ही अपनी नजरें छत पर जमा र्दी ।

"क्या नजर आ रहा है?" काले चिराग ने पूछा ।

"छत । " उसने जबाब दिया ।

"और अब?"

"छत गायब हो गई है । तारों भरा आसमान दिखाई दे रहा है।

और तभी रेखा को महसूस हुआ जैसे काले चिराग ने अपना हाथ झटककर छुडा लिया हो। वह कुछ देर तक खामोशी सै खडी रही इसी इतजार में कि काला चिराग शायद कोई सबाल करे । लेकिन काले चिराग ने कोई सवाल नहीं किया । काला चिराग उसके नजदीक होता तो सवाल करता-बह तो कब का जा चुका था।

अब रेखा को अहसास हुआ, जैसे आसपास कोई नहीं है वह अकेली खडी है । तन्हाईं के अहसास के साथ ही अचानक रेखा के जिस्म में सर्दी की लहर दौड़ गई । यह सर्दी की लहर किसी खौफ की वजह से न थी, बल्कि यह सदीं तो उसे अपने चारों तरफ बरसती महसूस हो रही थी । जहां वह खडी थी, वहां घुप्प अधैरा था। ऐसा कि हाथ को हाथ सुझाई नहीं दे रहा था ।

उसने अपना एक हाथ बढाकर ऐसै ही अन्धों की तरह्र लहराया। कुछ टटोलने कीं कोशिश की लेकिन उसके हाथ कुछ नहीँ आया । बस हाथ 'शून्य' में हवा में लहराकर रह गया । अब उसने चारों तरफ घूमकर देखा । वह अंधेरे में आखे फाडे देख रही थी कि उसने एक बारीक से सूराख से रोशनी आती महसूस की। इस सूराख का रूप दरवाजे में चाबी के सुराख का सा था ।

और अब सहसा ही, एक खुशी की लहर रेखा के सिर में पैरों तक दौड गई । वह जान गई किं वह इस वक्त कहां है। वह उत्तेजित सी ही आगे बडी और उसने झुंककर उस 'की होल' में झाका बाह्रर, सामने जितना भी हिस्सा नज़र आया व उसका जाना-पहचाना था । मारे खुशी के उसके दिल की धडकने तेज हो गई I दिल इतने जोर से धडक रहा था कि वह उसकी धड़कन की आबाज साफ सुन सकती थी ।

उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया।

इस वक्त वह उस कमरे में मोजूद थी जिसकी दीवारें काली थी-और दरवाजे पर एक ताबीज लटका हुआ था । यानि वह जहा से गई थी वहीँ वापिस आगई थी।

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यहा का मौसम शायद बदल गया था । रेखा बारिशो के मौसम में गई थी ,अब शायद सर्दिया आ गई थीI रेखा नै धडकते दिल के साथ टटोलकर दरवाजे के हैण्डल पर हाथ रखा और उसे हल्का सा दबाया । उसे यह जानकर खुशी हुई कि दरबाजा खुला हुआ था ।

खुशी होती भी क्यों न-- इस दरबाजे के उस तरफ मा सी ममतामयी गंगा मोसी थी जो उसपर अपनी जान छिडकती थी । अमर भाई थे जो उसका बेहद ख्याल रखते थे । माया जी, जिसकी सेवाओं का मूल्य नही था ।

रेखा को कोई अंदाजा - नही था कि इस वक्त रात के कितने बजे है I बरामदे की लाइट जल रही थी । लेकिन ये तो सारी रात ही जलती रहती थी I उसने कान लगाकर आहट लेनी चाही, लेकिन बाहर कोई नही था I

रेखा कुछ क्षणों तक खडी सोचती रही। बाहर तो उसे निकलना ही था। सोचने की बात तो यह थी बाहर निकलकर वह अपने कमरे का रुख करे या गंगा मोसी के कमरे काI वह जानती थी कि उसका कमरा खुला न होगा , गगा मोसी ने जरूर 'लोक' करवा दिया होगा और उसकी चाबी उन्हीं के पास होगी।
 
सदी के कारण उसका बदन कापने लगा था । उसने हैण्डल दबाकर बहुत धीरे से थोडा सा दरबाजा खोला । और गर्दन निकाल कर इधर-उधर देखा I बरामदे मे कोई नहीं था। सन्नाटा व्याप्त था । वह जल्दी से बाहर निकली-- दरबाजा बन्द कर दिया और दरवाजे पर खडे होकर गहरे-गहरे सास लेने लगी और फिर । वह गगा मौसी के कमरे के दरबाजे पर पहुची और यह देखकर उसके आश्चर्य की सीमा न रही-जब उसने गंगा मोसी का दरबाजा थोडा सा खुला देखा । अदर लाइट जल रही थी I ऐसी सर्दी मे दरवाजे के खुले रहने का क्या मतलब? वह निस्शब्द आगे बढ़ी , लेकिन उसके दिल ने अपनी गबाड-धाड बन्द नहीं की।

खुले दरवाजे से उसने देखा कि गगा मोसी तकिया लगाये, बेड पर लेटी है हाथ में कोई खुला उपन्यास है जो बेड पर औधा रखा है । शायद गंगा मौसी पडते-पडते थक गई थी।

रेखा ने सोचा कि मौसी कही पडते-पडते सो न गई हों, लेकिन ऐसा नहीं था। रेखा ने उनकी आखो की तरफ गौर सै देखा I आखें खुली हई…थी… और वह किसी सोच में डूबी हुई छत को घूर रही थी I गगा मोसी का सिर दरबाजे की तरफ था! यानि अगर रेखा दबे पाव उनके कमरे में दाखिल होती तो वह रेखा को न देख पाती । एक शोख मुस्कान रेखा के होठो पर नाच गई और उसने बहुत धीरे-सै दरवाजा खोलकर कदम अन्दर रखा। उसका दिल अब फिर जोर जोर से धडकने लगा था। वह यही चाहती थी कि गगा मोसी के पलटकर देखने से पहले वह मोसी की आखो पर हाथ रख दे...पर I उसने अभी दो कदम आगे बढकर, उनकी आखें बन्द करने के लिऐ अपना हाथ आगे बढाया ही था कि मौसी उसकी तरफ देखे बिना ही बोली--

"माया, मेरी कॉफी में चीनी ज्यादा तो नहीँ डाल लाई?" शायद दरवाजा ज्यादा खुलने की वजह से ज्यादा हबा आई उसी से उन्होने अदाजा लगा लिया कि माया ही कॉफी लेकर आई है ।

रेखा ने कोई जवाब दिये बिना जल्दी से हाथ बढाकर उनकी आखै बद कर लीं । आखों पर हथेली टिकते ही पहले तो उनके चेहरे पर अप्रसन्नता के भाव उपजे, पर पिन तुरन्त ही ये अप्रसत्रता दूर भी हो गई। जाहिर था माया तो उनसे कोई ऐसी हरकत करने की घृष्टता कर नहीं सकती थी I उन्होने नावल छोडकर. आखो पर रखे गये हाथ को छुआ और आश्चर्य कि उन्हें रेखा का हाथ पहचानने में दो क्षण भी न लगे ।

उनके चेहरे पर प्रसन्नतापूर्ण आश्चर्य के भाव फैल गए ।

"मेरी बच्ची यह तुम हो अगर में कोई सपना देख रही हू तो फिर यह सपना कभी न टूटे और अगर यह ख्वाब नहीं ह्रकीकत है तो फिर रेखा-मेरी बच्ची मुझे आबाज दो । मुझे मौसी कहकर पुकारो । "

"मौ. ..सी… .I " रेखा ने धीरे से बड़े चाव से पुकारा ।

रेखा की आवाज सुनते ही उन्होने फौरन उसका हाथ अपनी आखों से हटा दिया । आखो से हाथ हटाया तो रेखा की मनमोहिनी सूरत गगा मोसी के सामने थी। उन्होंने उसका हाथ खीचकर उसे अपने ऊपर गिरा लिया और उसे अपनी बाहों में भरकर बेअख्तयार रो पडी I

रेखा ने भी भावावेश में उन्हें भींच लिया था-और खुद भी अपने अश्रु रोक नहीं सकी थी ।

"ओह, रेखा.. .मेरी बच्ची. . ! तू कहां चली गई थी । रोते रोते गंगा मौसी ने उसका सिर उठाकर उसके गालो को चूमा।। ।

”मै कही नहीं गई थी। आपके पास ही थी, मौसी। आपके आस पास।।"

"रेखा.. .रेखा...अभी कुछ क्षण पहले मैं तेरे ही बारे में सोच रही थी। " मोसी भरी आवाज में वोली-"नावल पढते-पढते अचानक तू याद आ गई थी और टूटकर याद आई थी।"

"देख लें...आपने इधर याद किया-उधर में हाजिर हो गई। " बच्चो की सी चपलता भर आई थी रेखा के स्वर मे । "रेखा तूने मुझे बहुत तडपाया है। "

"मोसी मैं जानती हूं! बस, आप माफ कर दें। "

"मैं तुझे कभी माफ नहीं करूगी । " मौसी ने उठते हुए कहा । देखें, मोसी इतना गुस्सा न करें। गुस्सा आपके स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीँ । " रेखा उनके पाव दबाते हुए बोली ।

"एक शर्त पर माफ करूँगी । "

"मजूर । जल्दी बताएं शर्त । "

"आइदा तू मुझें इस तरह छोडकर नहीं जाएगी। "

"ठीक है, मौसी । मैं आपसे वायदा करती हूं कि अब कभी आपको इस तरह बिना बताये छोडकर, नहीं जाऊंगी । अगर जाऊगी भी तो वैंड वाजे के साथ । "

"हा , यह ठीक है । "

गगा मौसी ने 'हां, ठीक है' कह तो दिया फिर उसके शब्दों का मतलब समझ में आपा तो वह चौंकी । फिर मुस्कराते हुए बोली "ऐ, क्या कहा?" उन्होंने आखें तरेरकर रेखा को घूरा ।

" कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं।" रेखा मासूम बन गई ।

"हां-इसी तरह जाओगी बैड बाजे के साथ तो मैं तुम्हें सौ बार भेजने के लिए तेयार हूं। "

और अपने गाल पीटने व आखें तरेरने की रेखा की वारी थी। वह बोली- "कुछ तो भगवान से डरो मौसी! ऐसा जुल्म तो न करो मुझ पर. . . । "

"क्यों मैने क्या कहा?" मोसी घबरा सीधी गई।

"बडे आराम से मेरी सौ शादियां करा दी । " रेखा ने आखै' चमकाते जवाब दिया ।

"हे, राम । " गगा' मोसी ने बौखलाहट में अपना सिर पीट लिया । रेखा ने साइड टेबल पर रखी घडी पर निगाह डाली,ग्यारह बज रहे थे।

"मौसी इतनी सर्दी में अपने कमरे का दरवाजा खुला क्यों छोड रखा है ?" रेखा ने पूंछा।

"वो निगोडी माया मेरे पास ही थी । शाम से ही सिर दर्द हो रहा था और वह मेरा सिर दबा रही थी । हम दोनों तुम्हारी ही बातें कर रही थीं । दर्द कुछ कम हुआ तो वो बोली मैं कॉफी बनाकर लाती हूं । उसके जाने के बाद मैंने नावल उठा लिया । दो पेज पढे, फिर पढने. को दिल न चाहा । अचानक तुम्हारी याद आई और मै तुम्हारे बारे में सोचने लगी । माया ही शायद ठीक से दरवाजा बद करके नहीं गई और शायद हवा से थोड़ा खुल गया । तुम दरवाजा खोलकर आई तो मैंने यही समझा कि माया काफी लेकर आईं है। "

"पर मौसी आपने मेरा हाथ पहचाना खूब । " रेखा उसकी बात काटते बोली ।

"अरी पगली! तेरा इतना प्यारा हाथ, भला में भूल सकती हूं। " मोसी उसे प्यार से निहारते बोली।

"माया आने वाली होगी । " रेखा बदस्तुर मूड में बोली--"मै कही छिप जाती हूं। मजा आएगा। पर छिपू कहा'?" उसने कमरे मै निगाहे दौडाई।

" मेरे लिहाफ में छिप जाओ ।" मोसी भी आख मिचौली के मूड में आ गई ।

"मैरे लिहाफ में छिप जाओं।" मौसी भी आख-मिचौली के मूड में आगई।

" नहीं, मौसी ! अगर मैं अचानक उसके सामने लिहाफ में सै निकली तो वह डर जाएगी। चीख मारकर बेहोश हो जाएगी । "

"हां, डर तो बहुत जाएगी वह । पर पर...रेखा, यह तो बताओ, तुम आई किधर से हो?" गगा मोसी को इस बात का ख्याल ही अब आया था।

"ताबीज वाले कमरे से । " रेखा ने मुस्कराकर कहा।

"ताबीज वाले कमरे से । " मोसी हैरान रह गई।

" हां, मौसी ! "

"और तुम गई भी वहीँ से थी?" मोसी ने पूंछा।

"हा मौसी । माया आने वाली होगी । बाकी बातें बाद में । मै बाथरूम में चली जाती हूं। मुझे सर्दी लम रही हे। आपकी शाल ओढ लेती हूं। वह कॉफी लेकर आए तो उसे सोने को कहकर भेज देना । "

रेखा गर्म शाल ओंढकर 'बाथरूम' में चली गई और जाते-जाते कह गई--"मोसी मेरे लिए कॉफी बचाकर रखना ।"

"अच्छा. . .अच्छा । " गगा मोसी ने मुस्कराते हुए कहा I बस, कुछु क्षणों का ही अन्तर रहा I इधर रेखा ने 'बाथरूम‘ का दरवाजा बद किया और उधर नौकरानी माया काफी का मग लेकर अन्दर आई और आते ही बौली

"बडी बीबी यह दरवाजा क्यो खुला है?"

"माया तुम खुद ही तो ठीक बन्द करके नहीं गई थी-खुला छोड़ गई थी वह हवा से और भी खुल गया ओर अब पूछ मुझसे रही हौ । " गगा मौसी प्पार से बोली थी ।

"औह । गलती हो गई । खैर । लीजिये कॉफी । मैं आपके लिए बडी जबरदस्त काफी बनाकर लाई हूं। " माया ने मग उनकी तरफ बढाते. हुए कहा-- "इस वक्त मुझें रेखा बीबी बहुत याद आ रही है ॥ वो बडी शौकीन थी काफी की । "

"हां, माया .I " गंगा मौसी ने गहरा सास लिया "तुम दुआ करो कि वह वापिस आ जाये I "

"में तो हर वक्त दुआ करती हूं बडी बीबी उनके लिए । पता नहीं कहा चली गई?"

"भगबान ही जाने। " मौसी बोली--"अच्छा, माया! तुम अब जाकर सो जाओ । मेरी तबियत अब ठीक है ।

" जी बडी बीवी । मैं जाती हू। आपं दरवाजा अदर से बंद कर लें । "

उसके जाने के बाद गगा मोसी ने फौरन उठकर दरवाजा बद किया और बाथरूम का दरवाजा बजाया । रेखा बाहर निक्ल आई और मौसी से लिपट गई।

"मेरी मीसी...प्यारी मौसी...अच्छी मोसी । " वह झूमती हुई बोली।

"चल तेरी काफी आ गई है पी ले । माया भी तुझे याद करके गई है। " गंगा मौसी उसे लिपटाये लिपटाये वेड पर ले आई । उसे बेड पर बैठाया । काफी का मग उसके हाथ में दिया और खुद लिहाफ ओढकर बैठ गई । रेखा ने भी लिहाफ अपने ऊपर ले लिया।

"मौसी आप नहीं पीयेंगी काफी। "

"नहीँ तू पी I II

रेखा ने एक लम्बा घूंट भरा, फिर पूछा-- "मेरा कमरा बद है। "

"हा'! चाबी मेरे पास है। तुम्हारे कमरे की रोजाना सफाई करवाती हू कि जाने तू कब, किस दिन लोट आये। "

रेखा ने कुछ कहने को मुह खोला ही था कि एकाएक टेलीफोन की घटी बजी । उन दोनों ने ही एक-दुसरे की तरफ सवालिया नजरों से देखा। दोनों की ही आखों में खौफ व हैरत के मिले जुले भाव थे।
 
यह बात ही खौफ़ व हैरत बाली थी । रात के ग्यारह वजे थे । ठिठुरती रात में इस वक्त यह काल किसकी हो सकती है? गगा मोसी हैरान थी।

"मौसी इस वक्त किसका फोन हो सकता है?" रेखा ने पूछा I वह भी तो उलझन का शिकार थी।

”समझ में नहीं आ रहा।" फिर वह एकदम चौंककर बोली अरे कही अमर का न हो । वह किसी की शादी में गया हुआ है । "

रेखा, फोन के ज्यादा निक्ट थी-उसने रिसीवर उठाकर मौसी की तरफ बढा दिया । "हेल्लो । " मौसी माउथ पीस में बोली ।

"हेलो, गगा। कैसी हो? " उधर से पूछा गया ।

"बलदेब यह तुम हो । " गगा मोसी के लहजे में खुशी भर आई थी- "हे भगबान ! आज का यह दिन कितना शुभ है । "

"गंगा, इस वक्त दिन नहीं रात है और वह भी आधी होने को है। " उधर से कहा गया।

"ओह हा, चलो रात सही । " मोसी बदस्तूर चहकी- "आज की यह रात मेरे लिए बडी मुबारक है l "

रेखा ने जल्दी से हाथ के इशारे से मना किया कि मौसी उसके बारे में कुछ न बताये । गंगा मौसी ने उसका मत्तव्य समझकर गर्दन हिला दी ।

"वह क्यो?" बलदेव राज ने पूछा ।

"तुम्हारा फोन जो आया है। " गंगा मौसी ने वात का रूख बदल दिया ।

"में तो फोन करता ही रहता हूं। "

“इस बार तो तुमने कईं दिन बाद फोन किया है।”

"गगा, पूछोगी नहीं कि इतनी रात गये मैंने फोन क्यों किया है?" बलदेव राज अपनी उत्तेजना दबा नहीं पा रहा था ।

"तुमने इतनी रात गये फोन किया है तो जरूर कोई खास बात होगी। "

"हा, बडी. खास बात है। बडी खास खुशखबरी है, गगा! ऐसी कि सुनोगी तो उछल जाओगी। "

”हे भगवान्! ऐसा क्या हो गया? जल्दी बताओ। "

"इस खुशखबरी के मिलते ही मैने तुम्हें फोन किया है। मेरा जी चाह रहा था कि यह खुशखबरी फौरन किसी क्रो सुनाऊ । तुम्हारे अलावा कोई नजर नहीं आया सो फौरन तुम्हारा नम्बर घुमा दिया ।

"प्रमोशन हो गई । क्या अपने कालेज के प्रिन्सिपल बन गये हो? " गगा ने अन्दाजे का तीर चलाया।

" अरे नहीं भई, अपना इन्द्र आ गया है। इन्द्रजीत अपने कृष्णकांत का बेटा...रेखा का भाई। " बलदेव राज ने जैसे धमाका किया ।

"ऐ क्या कहा? क...क...कौन आ गया है ?" गंगा मौसी को जैसे अपने कानों पर विश्वास न आ रहा था ।

"इन्द्रजीत की बात कर रहा हूं। रेखा के भाई इन्द्रजीत कीं । कृष्णकात के बेटे की। " बलदेव राज ने दोहराया।

"है राम, सच । " गगा मौसी यह खबर सुनतकर उछल पडी । उन्होंने जल्दी से माउथपीस पर हाथ रखकर रेखा को बताया--"तुम्हारा भई इन्द्रजीत्त आ गया है।"

"हैं वाकई । " रेखा ने दिखाबटी आश्चर्य दिखाया । उसने मन ही मन शुक्रिया अदा किया कि इन्द्र योजनानुसार अंकल बलदेव राज के पास दिल्ली पहुच गया है ।।

"हां गगा । " उधर से बलदेव राजा ने कहा-- "सच कह रहा हु।"

"किस तरह पहुचा? कहां था इतने बरस?" गगा मौसी ने बेकरारी से पूछा।

"यह लम्बी कहानी है I फिर कभी सुनाऊगा । मुझे उसके आने कीं बहुत खुशी है। अब मै उस शैतान रमाकान्त को नाकों चने चबवा दूगा । अच्छा, यह बताओ, रेखा की कोई खैर-खबर मिली । "

"नहीँ कुछ नहीं । " गगा मोसी ने रेखा की तरफ देखकर मुस्कराते हुए कहा ।

"कुछ समझ में नहीं आता किं यह लडकी कहा गायब हो गई। अगर वह पत्र न छोड जाती-फिर तो यही शक होता कि कही रमान्कात ने ही तो कोई हाथ नहीँ रख दिया । भगवान करे, वह लोट आये और जहां कही भी हो, सकुशल हो I II "

"बलदेव राज, न करो । इन्द्र आ गया है तो मेरा दिल कहता हे कि रेखा भी आ जाएगी। "

"भगवान् ऐसा ही करे । कोई ख़बर मिले तो मुझें फोरन बतायें। "

"तुम्हें नहीँ बताऊगी' तो और किसे बताऊगी । " गंगा मौसी ने जवाब दिया ।

फिर बलदेव राज ने कुछ औपचारिक शब्द कहे व सम्बन्ध विच्छेद कर दिया । गंगा मौसी ने खुशी सै झूमते हुए रिसीवर रेखा को दिया ओर बोली ---

"रेखा! इतनी ढेर सारी खुशियां मुझे एक दिन में मिल गई हैं, कहीं मैं खुशी से मर ही न जाऊं। रेखा, मैने तो सोचा था कि तुम्हारे बलदेव अंकल की दी इस खुशखबरी के जवाब में मै भी उन्हें खुशखबरी सुना दू'। तुम्हारे लोट आने की खुशखबरी। तुमने मना क्यों कर दिया था । "

"ऐसे ही । कल अंकल को फोन पर दे देना यह खुशखबरी। "

"अच्छा, अव तुम यह बताओगे कि तुम कैसे प्रकट हुई ही इस घर में?" मोसी नै पूछा ।

"मौसी, मै कोई भूत्त-प्रेत या जिन्न तो हूं नहीं जो प्रगट होऊगी'। " रेखा ने मुस्कराते हुए कहा ।

"रेखा सच है कि कभी-कभी ऐसा ही सन्देह होने लगता है । " मौसी ने सजीदगी' से कहा ।

"हाय, मौसी! मुझे डराए नहीं, प्लीजा में कोई जिन्न नहीं। "

"फिर तू उस 'काले कमरे' से कहां गायब हो गई थी और अब तीन महीने बाद केसे आ गई हो?" मौसी ने उसे घूरते पूछा ।

"अरे, मुझें गये तीन महीने हो गये?" रेखा को हैरत हुईं थी।

"यानि कि तुम्हें यह भी मालूम नहीं?" मोसी चिन्नित नजर आने लगी ।
 
"नही, मै तौ यह कह रही थी कि तीन माह हो गये मुझे यहा सै गये हुए और मुझें लगता है जैसे अभी दस पन्द्रह दिन ही हुए हैँ । " रेखा ने बात बनाई । वैसे इस बात पर वह हैरान थी । हकीकत में ही उसके अपने ख्याल से दस पन्द्रह दिन से ज्यादा नहीं हुए होगे ।

"तुझे लगते होंगे दस पन्द्रह दिन, मुझे तो यूं लगता हे जैसे तीन साल बाद वापिस आई है तू!"

"मौसी! यह आपका प्यार है। " रेखा ने लाड़ से कहा ।

"'रेखा सच बता इस बीच में क्या मैं कभी याद आई थी ??"

”क्यो नहीँ, मौसी? सच आप बहुत याद आई । " रेखा ने उनके कंधे पर सिर रखते हुए कहा--"बार बार याद आई । "

"पर कुछ तो बता रेखा, कि तू इतने दिन रही कहां? " मौसी इस खतरनाक बिषय की तरफ पलट गई।

"मौसी! इस बारे में अगर आप कुछ न ही पूछे तो अच्छा है। " रेखा सजीदा हौते बोली… "मैं आपसे झूठ नहीँ बोलना चाहती और अगर मैंने सच बताया तो आपको यकीन नहीं आएगा। आप सुबह ही मुझे किसी मनोचिकित्सक या फिर पागलखाने ले जाएगी'। "

"ऐसी अविश्वसनीय बात है?" मौसी ने उसक्ती आखों में झांका।

"हां मौसी । ऐसी ही अविश्वनीय बात है I मैं जिन हालात से दो-चार हुईं हूं वह सब मुझें भी किसी भयानक ख्वाब से महसूस हो रहे हैँ । जब मैं ही शक झुबे कीं शिकार हूं तो फिर आपको कैसे यकीन आएगा भला? " रेखा ने बडे सहज भाव से समझाया।

"अच्छा, चलो छोडो । इस बावत हम फिर कभी बात करेगे । फिलहाल तू ये तो बता कि तू इस घर में कैसे दाखिल होगी? मेरा मतलब है माया को कैसे सन्तुष्ट करेगी?"

"कोई मुश्किल नहीं है । माया अपने कमरे में जा चुकी है I अमर भैय्या है नहीं I आप मेरे साथ बाहर चलो और मुझे घर से बाहर निकाल दरवाजा भीतर से बाद कर कमरे में लोट आओ । मैं थोडी देर बाद ही बेल बजाऊगी और साथ ही गेट ख़टखटाऊगी l माया अभी सोईं न होगी । वही उठकर गेट खोलेगी और मैं इस घर मे दाखिल हो जाऊगी । इस तरह घर में मेरो एनट्री का सीन पूरा हो जाएगा। माया ही मेरी आमद की खबर आपको देगी ।भागकर मुझसे पहले आप तक पहुँचेगी । क्यो'?"

"चलो, तुम्हारा दाखिला तो हो गया । अब कहानी क्या सुनाओगी कि कहा चली गई थी? इस बारे मै क्या बताओगी I तू जानती है कि अमर तो बाल की ख्याल निकालने बालों में से है । " गंगा मौसी चिन्तित स्वर में बोली ।

" आप यह सब मुझ पर छोड दे, बस।" रेखा बोली--" आप बस इतनी कोशिश करना कि अमर भैया कम से-कम सवाल करें । "

"ठीक है तो फिर चलो । मौसी उठ खडी हुई-"शुरू करो , अपना यह नाटक ! और हां, मेरी यह शाल उतार दो l माया तुम्हें मेरी यह शाल ओढे. देख़कर परेशान हो जाएगी।"

"हाय, मोसी ! मैं तो ठण्ड से मर ही जाऊगी। " रेखा सिकुडकर बोली I

"कुछ नहीं होगा, तुम्हे । कुछ मिनट की तो बात है I " मोसी बौली-"घर में आते ही यही शाल तुझ पर डाल दूगी I "

और फिर गगा मौसी, रेखा के साथ खामोशी से बाहर आई । रेखा को घर से बाहर कर गगा मौसी ने दरवाजा बन्द किया और पलटकर अपने कमरे में आ गई ।मोस्री कमरे में पहची ही थी कि घर की 'कालबेल‘ बजी साथ ही गेट खटखटाने की जोरदार आवाज गूंजी' । अब रूक-रूक 'बेल' बज रही थी और जोर जोर सै दरवाजा खटखटाया जा रहा था । नोकरानी माया अभी अभी सोई थी । वह जानती थी कि अमर साहब कभी भी आ सकते है। उनके लिए गेट कौन खोलेगा? इसलिए वह चाह रही थी गगा मौसी के पास वैठकर ही अमर साहब का इतजार करे । पर गगा मौसी ने उसे अपने कमरे में भेज दिया था और जिस बात का डर था वही हुआ, यानि अपने कमरे में आते ही वह सो गई । वह गहरी नीद सोती थी I ऐसे में जरूरत पडने_पर गगा मौसी क्रो ही उठना पडता था । वही जाकर माया को जगाती । तब कहीँ दरवाजा खुलता ।

आज़, इस वक्त भी ऐसा ही हुआ । बैल बजती रही । दरवाजे पर ठक्-ठक होती रही, लेकिन सोई पडी माया के कानों पर जू तक न रेंगी । तब गगा मौसी ने जाकर उसके कमरे का दरवाजा बजाया। उसे आवाजें दी । तब कही जाकर उसने अपना दरवाजा खोला । आखें मलती हुई बोली

"जी, बडी बीबी । "

"बडी बीबी की बच्ची! दरबाजे पर जाकर देख कौन है? अमर आया होगा । "

"ओह अच्छा । " यह कहकर उसने तकिये के नीचे से चाबी निकाली और चादर ओढती, हुई बाहर गेट की तरफ भागी । उसने गेट के करीव पहुचकर पूछा-- "कौन!!"

"मै हूं। " रेखा सर्दी कीं वजह सै कापने' लगी थी । उसकी आवाज भी कापाती हुई निकली। माया तत्काल पहचान नहीं पाई ।

“मै, कौन? " उसने फिर पूछा ।

"माया दरवाजा खोलो। मैं हू रेखा ।" रेखा जल्दी से बोली ।

"अरे रेखा बीबी आप । " रेखा की आबाज पहचानते ही, माया पर कम्पन छा गया I मारे खुशी के हाथ पांव फूल गये ।

गगा मौसी बरामदे में खडी थी । माया ने उन्हें देखकर खुशी से आवाज लगाई--"बडी बीबी,,रेखा बीबी I "

"है क्या कह रही हो? ” गगा मोसी ने अनजान बनकर पूछा I

“गेट पर रेखा बीबी हैं.. बडी बीबी! रेखा बीबी । " माया खुशी नहीं समेट पा रही थी ।।

" अरी फिर जल्दी से दरवाजा खोल-यहा खडी क्या कर रही है?"

"ताला खोल रही हूं बडी बीवी I " वह वाकई ताला खोल रही थी, लेकिन उसके हाथ काबू मे नही थेI मारे खुशी के काप रही थी I चाबी ताले मे जा ही नहीं रही थी । जैसे तैसे उसने गेट खोला और बेअख्तार होकर उसफे गले मिलने आगे बढी -लेकिन फिर फोरन ही उसे अपनी हैसियत का ख्याल आ गया । वह तो इस धर की नौकरानी थी । उसने रेखा के हाथ पकड़े- बोली

"रेखा बीबी आप ।" रेखा ने अपने हाथ छुडाकर उसे फोरन अपने गले से लगा लिया ।।

"तुम केसी हो माया?" उसने अपनत्व से पूंछा ।

माथा कुछ बोल न सक्ती। भावावेश ही वह तो रोने लगी थीं। इस बीच धीरे-धीरे चलती गंगा मौसी उनके पास पहुच' गई थी । रेखा माया को छोड़-मौसी से लिपट गई--"मोसी! "

"अरे मेरी बच्ची । मेरी रेखा! कहा चली गई थी तू। " गंगा मौसी नाटक भूल सचमुच ही सिसक उठी थी । उसने ऐसे वेग से रेखा को भीचा था जेसे मुद्दतों बाद अभी मिल रही हो। अजीब भावव्हिल दृश्य था। गगा मौसी को रोते देखकर उसकी आखो से भी बिन बादल बरसात शुरू हो गई । तब गंगा मोसी को सहसा होश आया कि रेखा को सर्दी लग रही होगी। उन्होने रोत्ते-रोत्ते जल्दी से अपनी आखें पोछी और अपनी शाल उतारकर जल्दी से रेखा को ओढा दी और फिर उसे अपने साथ लगाये लगाये अपने कमरे में ले आई।

बाहर अच्छी सर्दी थी । तेज ठण्डी हवा चल रही थी । पाच-सात मिनट में ही रेखा को कंपकपी हो गई थी । मोसी ने उसे बेड पर बेठाकर उसके गिर्द लिहाफ लपेट दिया ।

"मैं काफी बनाकर लाती हूं। " माया बोली ।

"हां, जाओं। जल्दी करो और देखौ एक अण्डा भी उबाल लाना । " मोसी तेजी से बोली।

"मै यूं लाती हूं। " माया ने चुटकी बजाका कहा और हवा के तेज झोंके की तरह बाहर निक्ल गई।

माया के कमरे से निक्लते ही बाहर गेट पर गाड़ी के हार्न की आवाज सुनाई दी । माया जो रसोई की तरफ जा रही थी, एकदम पलटी और फिर दौडते, हुए गेट पर पहुची।

”कौन है? " उसने जैसे सतर्कताबश ही पूछा था I

"दरवाजा खोलो, माया। "

माया ने ताला खौला, दोनों पट खोल दिये । अमर गाडी अन्दर ले आया । माया ने गेट बद कर ताला लगाने में बडी फुर्ती दिखाई थी और इससे पहले किं अमर गाडी. लाॅक करके अपने कमरे का रूख करता-माया दौडती, हुई उसके सिर पर पहुच गई।

"क्या हुआ? माया, खैर तो है। " अमर उसकी यह हडबडाहट… देखकर परेशान हो गया ।

"साहब जी, खैर है...सब खैर है...बल्कि कुछ ज्यादा ही खैर है। " वह बेपनाह खुश थी।

"माया, क्या हो गया? तेरी कोई लाटरी-वाटरी लग गई है क्या??" अमर हस दिया था I

" अरे नहीं साहब जी! बडी. जबरदस्त खुशखबरी है आपके लिए।"

"मेरे लिए ।" अमर हैरान हुआ॥

"साहब जी, हम सबके लिए।"

" कहा है खुशखबरी !" अमर ने मजाक में पूछा I

" साहब जी । बड़ी बीबी के कमरे में जाये और वहा जाकर देखें कि कितनी जबरदस्त खुशखबरी है?"

माया की बेताबी व बेकरारी ने ही अमर की जिज्ञासा को हवा दी थी। वह तेज तेज कदमों से गगा मोसी के कमरे की तरफ चल दिया । माया किचन की तरफ बढ गई!
 

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