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घर पहुँचकर रेखा और नयना तो अन्दर चली गई थी और इन्द्र दीपक व प्रेम के साथ ड्राईगरूम मे बैठ गया था ।
दीपक ही नहीं, प्रेम सागर भी इस हमले का विवरण जानने को बेताब था ।
दीपक के पूछने पर जब इन्द्रजीत ने उन्हें कटारी के बारे में अब इस हमले का सबब मोटे तोर पर समझाया तो दीपक ने मन ही मन भगवान का शुक्रिया अदा किया था और राहत की गहरी सास ली थी । वह इन्द्रजीत के सामने और अधिक शर्मिंन्दा होने सै बच गया था।
चाय पीने के बाद जब दीपक ने जाने की इजाजत मागी किं उसका एक बेहद जरूरी काम से वापिस जाना जरूरी था तो इन्द्र ने प्रेम सागर क्रो जबरदस्ती रोक लिया । उसने कह्वा--"दीपक की तो मजबूरी है, पर तुम खाना खाये बिना नहीं जाओगे । "
प्रेम सागर रूक गया ।
रेखा को जब मालूम हुआ कि इन्द्र ने प्रेम सागर को रोक लिया है तो उसने अपनी खास निगरानी में खाने की तैयारी शुरू कर दी । समय समय पर वह बैठक के फेरे भी लगाती रही । नयना भी उसके साथ ही होती । इन्द्रजीत, प्रेम सागर क्रो अपनी आप बीती सुना रहा था । जब इन्द्र की कहानी खत्म हो गई तो अब होने वाली बातों में नयना व रेखा भी शरीक थी ।
फिर एक वक्त ऐसा भी आया कि इन्द्रजीत बाथरूम जाने की इजाजत लेकय वहां सै उठ गया । नयना ने कुछ सोचा और कुछ देर बाद वह भी उठकर बहा चली गई। अब ड्राईगरूम में रेखा प्रेम सागर के साथ अकेली रह गई थी । खुद को अकेली महसूस करते ही रेखा अन्दर ही अन्दर कसमसाने लगी । उसे नयना पर बडा गुस्सा आया कि वह एकाएक ही ओर कुछ कहे बिना ही ड्राइगरूम सै चली गई थी ।
जाहिर है अब रेखा अगर चाहती भी तो उठ नहीं सकती थी, क्योकिं प्रेम सागर को अकेला छोड देना अभद्रता होती । वह हिम्मत करके बैठी रही । प्रेम सागर जी अभी नयना से बडी बेतकल्लुफी से बात कर रहा था-अचानक खामोश हो गया था-जेसे उसे साप सुध गया हो ।
प्रेम सागर कुछ देर खामोशी से नजरें झुकाये बैठी रेखा को देखता रहा । रेखा प्रेम सागर से अपनी पहली मुलाकात पर अपने व्यवहार से आत्मग्लानी हो रही थी ।
रेखा ने अचानक नजरे उठाई और उसे देखा। वह सोफे पर पूर्ण निश्विन्तता के साथ बैठा था। उसी क्षण उसने भी नजरें उठाकर रेखा को देखा । नजरों-से नजरे मिलीं और फिर दोनो ही जैसै पलके झपकाना भूल गए।
आखों ही-आखों में कोई बात हुईं और नजरों के ये तीर ही जैसै दोनों के दिलों में उतरते चले गए।
न किसी ने कुछ कहा-न किसी ने कुछ सुना-फिर भी बहुत कुछ कहा गया-बहुत कुछ सुना गया। बेरूखी गायब थी शिकायतें जाती रही थीं ।
जो, जो कुछ कहना चाहता था-खामोशी कीं जुबान ने ही दूसरे तक पहुचा दिया ।
कुछ देर बाद नयना वापिस आ गई और उन दोनों को खामोश देख चकित सी बौली
"अरे, ऐसा सन्नाटा! यह चुप्पी! बैठक में कदम रखते मुझे तो लगा था जैसै यहां कोई है ही नहीं।"
"कमाल है। बहरहाल, अब तो यकीन आ गया कि हम यहां मौजूद हैं। " प्रेम सागर बोला ।
"हां तो यकीन करना पड रहा है, लेकिन एक बात पर फिर भी हैरत है । "
"वह क्या?" प्रेम सागर ने पूछा तो रेखा ने चौंककर नयना की तरफ देखा।
"इस कद्र खामोशी क्या आप दोनों को बात करने की मनाही है?" नयना हौले सै हस दी थी ।।
"जिस तरह एक हाथ से ताली नहीं बजती-वैसे ही एक तरफा बातचीत भी नामुमकिन है। " प्रेम सागर ने कनखियों से रेख की तरफ देखते जबाब दिया ।
" अरे! " नयना बवार शोखी से बोली "क्या आपकी बात का रेखा ने जबाब नहीं दिया I "
"औ-नहीँ l ऐसी अभद्रता की आप उनसे कैसे उम्मीद रख सकती है I " प्रेम सागर तेजी से वोला-"दरअसल मैने कोई बात ही नहीँ की । हुआ यह कि मेम साहब सिर झुकाए कुछ सोच रही थी-मैने इन्हें डिस्ट्रव करना अच्छा नहीं समझा । वैसे, मिस नयना! मैं आपको एक बात बता दूं। कभी कभी खामोशी भी जुबान बन जाती है और ऐसी खामोशी पर हजार लफ्ज कुर्वान किए जा सकते हैँ। "
"सुना है और अनुभव भी किया है।" नयना ने भी शोखी अपनाई--"कि जव लब खामोश हो तो आखों ही आखों मे भी बातें हो ही जाती हैं । क्या आप यह कहना चाहते हैं कि बातें नजरों नजरों में हो रही थी । "
''मैं अभी आती हूं। " रेखा एकदम हडबडाकर… उठी। यही अहसास दिल धडका गया था जेसे नयना ने उसकी चोरी पकठ ली हो । वह घबरा-सी गई । उससे बैठा नहीं रहा गया ।
"कहा जा रही हो?" नयना ने उसका हाथ पकडने की कोशिश की ।
"किचन में । " कहते हुए वह तेजी से बाहर निकल गई।
रजिशें जाती रही थीं I रेखा, प्रेम सागर को भा गई थी, इसलिए नहीं कि यह रिश्ता उसके अपनों यानि उसके दोस्त इन्द्रजीत व बलदेव राज अकल की स्वाहिश थी, बल्कि इसलिए कि रेखा में उसे वह सब्र-कृछ नजर आया था जो वह अपनी जीवन-संगनी' में चाहता था ।
रेखा ने हां कर दी थी और अब उसके दिल की धडकनो. में भी प्रेम सागर था,पर अभी लज्जा सकोच की दीवारें नहीं ढही थी । यूं ही एक दिन जब रेखा अपनी आर्ट गैलरी में अपने आफिस में एक पेन्टिंग-को 'फाइनल-ट्चिस' दे रही थी कि दरवाजे पर किसी की दस्तक से चौकी। उसने पलटकर देखा जो प्रेम सागर दरवाजे पर खड़ा उससे अन्दर आने की अनुमति माग रहा था।
"हमें अन्दर तो आ सकता हूं ना...?"
उसे देख़कर न जाने क्यों रेखा के हवास गुम हो जाते थे। वह अंदरही अदर सिमटने लगती थी । उसे लज्जा आने लगती थी । इस वक्त भी यही हुआ । वह उसे देखते गडबडा गई । ब्रुश भी ठीक से रखा नहीं गया । वह उठकर रेखा के कपडों पर गिरा और एक सुर्ख धब्बा बना गया ।
"जी ..आइए। ” वह खुद को सम्भालने का यत्न करते वोली ।
प्रेम सागर बडी लापरवाही से अन्दर आया और कुर्सी घसीटकर बैठ गया । रेखा ने तौलिये से अपने हाथ और कपडे साफ किये और सिकुडी सिमटी सी अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गई। उसकी नजरें मेज पर थी'।
प्रेम सागर आज निर्णायक मूड में आया था । वह कुछ क्षण उसे निहारता रहा फिर धीरे सै बोला-- "रेखा । "
उसके मुह से अपना नाम सुनकर रेखा को एक खुशी का अहसास हुआ। उसने अपनी घनेरी पलके उठाई-ओर अपनी काली खूबसूरत आखों से उसे देखा-- "जी । "
"आपके बडो ने कुछ सोचा व चाहा था उसका जबाब मैं आपके होंठों सै सुनना चाहता हूं। चाहै, यह जवाब इकार में ही क्यों न हो, लेकिन इंकार' करने से पहले यह जरूर सोच लीजिएगा कि शायद फिर में जिन्दगी भर शादी की सोचूं ही नहीँ । "
उफ ! यह बेबाकी । यह अधिकारपूर्ण लहजा I रेखा का दिल धडकने लगा । सब कुछ ही तो रेखा को गुदागुदा भी गया था। उसने भी हिम्मत जुटाई व धीमे से बोली "मैने इसका फैसला अपने बडों पर ही छोड दिया है ।"
"और आपके बडों का फैसला क्या है?"
"यह आप बडों सै ही पूछे । " प्रेम सागर को मुस्कराते देख, रेखा भी अपनी मुस्कान रोक न पाई थी और फिर शायद बिषय बदलने को पूछा--"आपके लिए_ क्या मगवाऊ? ठण्डा या गर्म...?"
"शुक्र है कुछ तो औकात की आपने हमारी । "
" प्लीज । आप मुझें शर्मिंन्दा करने की कोशिश न करें । उस दिन मैने आपके साथ बदसलूकी की मैं क्षमा प्रार्थी हूं। " रेखा ने कई बार सोचा था आज अवसर मिला था, तौ उसने फोरन माफी माग ली थी ।
"माफी तो मुझे मागनी चाहिये । " प्रेम सागर वोला--"इन्द्र से तय करने के बाद ही मुझे आपसे मिलने आना चाहिये था । "
" ना ? अब आप ऐसी कोई बात नहीं करेगे... । " तभी घटी के जबाज में चपरासी ने अन्दर कदम रखा और रेखा ने पूछा--"हां, तो क्या?"
"कॉफी मिल जाएगी... । "
"हां , क्यो नहीं?" रेखा बोली व फिर चपरासी से सम्बोधित हुई--"काॅफी बनाओ-अच्छी सी । "
"रेखा ऐसा नहीं हो सकता कि हम कही बाहर चलकर कॉफी पीयें?" प्रेम सागर ने आगे झुकते हुए और झिझकते हुए धीमे स्वर में फरमाइश की I
"क्यो नही हो सकता?" रेखा अब खुशदिली दिखा रही थी ।
"तो फिर चलो कही बाहर चलते है।"
चपरासी जाते जाते रूक गया था और जैसे रेखा के जबाब का प्रतीक्षक था। रेखा उससे बोली ----"रहने दो । काफी की जरूरत नहीं है । हम बाहर जा रहे है । "
यह मुलाकातों की शुरूआत्त थी।।
दो चार मुलाकातों मे ही बात कहा से कहां पहुच गई । दोनों ने एक दुसरे क्रो विश्वसनीय एवं अपने योग्य पाया। जिस दिन वे मिल न पाते थे तो रात को अपने बिस्तरों पर लेटे टेलीफोन के तारों के जरिये अपनी भावनाओं को व्यक्त करते ।
यही हाल कुछ इधर भी था। इधर यानि इन्द्रजीत और राजकुमारी नयना के बीच प्रेम सागर और रेखा की मुहब्बत तो नई नई थी लेकिन नयना व इन्द्रजीत्त तो बरसों से एक दूसरे को जानते थे चाहते थे। हां यह दुसरी बात थी कि उनके सपने भी एक लम्बे समय बाद साकार हुए थे। अब हाल यह था कि जव तक वे एक दूसरे को मिल नहीं लेते थे वेकरार दिलों को चेन नहीँ आता । फिर एक दिन सवाल पेदा हुआ "आखिर कब तक? " और यह सवाल रेखा ने न प्रेम सागर से किया या-न नयना ने इन्द्रजीत से । यह सबाल अंकल बलदेव ने किया था ।
दीपक ही नहीं, प्रेम सागर भी इस हमले का विवरण जानने को बेताब था ।
दीपक के पूछने पर जब इन्द्रजीत ने उन्हें कटारी के बारे में अब इस हमले का सबब मोटे तोर पर समझाया तो दीपक ने मन ही मन भगवान का शुक्रिया अदा किया था और राहत की गहरी सास ली थी । वह इन्द्रजीत के सामने और अधिक शर्मिंन्दा होने सै बच गया था।
चाय पीने के बाद जब दीपक ने जाने की इजाजत मागी किं उसका एक बेहद जरूरी काम से वापिस जाना जरूरी था तो इन्द्र ने प्रेम सागर क्रो जबरदस्ती रोक लिया । उसने कह्वा--"दीपक की तो मजबूरी है, पर तुम खाना खाये बिना नहीं जाओगे । "
प्रेम सागर रूक गया ।
रेखा को जब मालूम हुआ कि इन्द्र ने प्रेम सागर को रोक लिया है तो उसने अपनी खास निगरानी में खाने की तैयारी शुरू कर दी । समय समय पर वह बैठक के फेरे भी लगाती रही । नयना भी उसके साथ ही होती । इन्द्रजीत, प्रेम सागर क्रो अपनी आप बीती सुना रहा था । जब इन्द्र की कहानी खत्म हो गई तो अब होने वाली बातों में नयना व रेखा भी शरीक थी ।
फिर एक वक्त ऐसा भी आया कि इन्द्रजीत बाथरूम जाने की इजाजत लेकय वहां सै उठ गया । नयना ने कुछ सोचा और कुछ देर बाद वह भी उठकर बहा चली गई। अब ड्राईगरूम में रेखा प्रेम सागर के साथ अकेली रह गई थी । खुद को अकेली महसूस करते ही रेखा अन्दर ही अन्दर कसमसाने लगी । उसे नयना पर बडा गुस्सा आया कि वह एकाएक ही ओर कुछ कहे बिना ही ड्राइगरूम सै चली गई थी ।
जाहिर है अब रेखा अगर चाहती भी तो उठ नहीं सकती थी, क्योकिं प्रेम सागर को अकेला छोड देना अभद्रता होती । वह हिम्मत करके बैठी रही । प्रेम सागर जी अभी नयना से बडी बेतकल्लुफी से बात कर रहा था-अचानक खामोश हो गया था-जेसे उसे साप सुध गया हो ।
प्रेम सागर कुछ देर खामोशी से नजरें झुकाये बैठी रेखा को देखता रहा । रेखा प्रेम सागर से अपनी पहली मुलाकात पर अपने व्यवहार से आत्मग्लानी हो रही थी ।
रेखा ने अचानक नजरे उठाई और उसे देखा। वह सोफे पर पूर्ण निश्विन्तता के साथ बैठा था। उसी क्षण उसने भी नजरें उठाकर रेखा को देखा । नजरों-से नजरे मिलीं और फिर दोनो ही जैसै पलके झपकाना भूल गए।
आखों ही-आखों में कोई बात हुईं और नजरों के ये तीर ही जैसै दोनों के दिलों में उतरते चले गए।
न किसी ने कुछ कहा-न किसी ने कुछ सुना-फिर भी बहुत कुछ कहा गया-बहुत कुछ सुना गया। बेरूखी गायब थी शिकायतें जाती रही थीं ।
जो, जो कुछ कहना चाहता था-खामोशी कीं जुबान ने ही दूसरे तक पहुचा दिया ।
कुछ देर बाद नयना वापिस आ गई और उन दोनों को खामोश देख चकित सी बौली
"अरे, ऐसा सन्नाटा! यह चुप्पी! बैठक में कदम रखते मुझे तो लगा था जैसै यहां कोई है ही नहीं।"
"कमाल है। बहरहाल, अब तो यकीन आ गया कि हम यहां मौजूद हैं। " प्रेम सागर बोला ।
"हां तो यकीन करना पड रहा है, लेकिन एक बात पर फिर भी हैरत है । "
"वह क्या?" प्रेम सागर ने पूछा तो रेखा ने चौंककर नयना की तरफ देखा।
"इस कद्र खामोशी क्या आप दोनों को बात करने की मनाही है?" नयना हौले सै हस दी थी ।।
"जिस तरह एक हाथ से ताली नहीं बजती-वैसे ही एक तरफा बातचीत भी नामुमकिन है। " प्रेम सागर ने कनखियों से रेख की तरफ देखते जबाब दिया ।
" अरे! " नयना बवार शोखी से बोली "क्या आपकी बात का रेखा ने जबाब नहीं दिया I "
"औ-नहीँ l ऐसी अभद्रता की आप उनसे कैसे उम्मीद रख सकती है I " प्रेम सागर तेजी से वोला-"दरअसल मैने कोई बात ही नहीँ की । हुआ यह कि मेम साहब सिर झुकाए कुछ सोच रही थी-मैने इन्हें डिस्ट्रव करना अच्छा नहीं समझा । वैसे, मिस नयना! मैं आपको एक बात बता दूं। कभी कभी खामोशी भी जुबान बन जाती है और ऐसी खामोशी पर हजार लफ्ज कुर्वान किए जा सकते हैँ। "
"सुना है और अनुभव भी किया है।" नयना ने भी शोखी अपनाई--"कि जव लब खामोश हो तो आखों ही आखों मे भी बातें हो ही जाती हैं । क्या आप यह कहना चाहते हैं कि बातें नजरों नजरों में हो रही थी । "
''मैं अभी आती हूं। " रेखा एकदम हडबडाकर… उठी। यही अहसास दिल धडका गया था जेसे नयना ने उसकी चोरी पकठ ली हो । वह घबरा-सी गई । उससे बैठा नहीं रहा गया ।
"कहा जा रही हो?" नयना ने उसका हाथ पकडने की कोशिश की ।
"किचन में । " कहते हुए वह तेजी से बाहर निकल गई।
रजिशें जाती रही थीं I रेखा, प्रेम सागर को भा गई थी, इसलिए नहीं कि यह रिश्ता उसके अपनों यानि उसके दोस्त इन्द्रजीत व बलदेव राज अकल की स्वाहिश थी, बल्कि इसलिए कि रेखा में उसे वह सब्र-कृछ नजर आया था जो वह अपनी जीवन-संगनी' में चाहता था ।
रेखा ने हां कर दी थी और अब उसके दिल की धडकनो. में भी प्रेम सागर था,पर अभी लज्जा सकोच की दीवारें नहीं ढही थी । यूं ही एक दिन जब रेखा अपनी आर्ट गैलरी में अपने आफिस में एक पेन्टिंग-को 'फाइनल-ट्चिस' दे रही थी कि दरवाजे पर किसी की दस्तक से चौकी। उसने पलटकर देखा जो प्रेम सागर दरवाजे पर खड़ा उससे अन्दर आने की अनुमति माग रहा था।
"हमें अन्दर तो आ सकता हूं ना...?"
उसे देख़कर न जाने क्यों रेखा के हवास गुम हो जाते थे। वह अंदरही अदर सिमटने लगती थी । उसे लज्जा आने लगती थी । इस वक्त भी यही हुआ । वह उसे देखते गडबडा गई । ब्रुश भी ठीक से रखा नहीं गया । वह उठकर रेखा के कपडों पर गिरा और एक सुर्ख धब्बा बना गया ।
"जी ..आइए। ” वह खुद को सम्भालने का यत्न करते वोली ।
प्रेम सागर बडी लापरवाही से अन्दर आया और कुर्सी घसीटकर बैठ गया । रेखा ने तौलिये से अपने हाथ और कपडे साफ किये और सिकुडी सिमटी सी अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गई। उसकी नजरें मेज पर थी'।
प्रेम सागर आज निर्णायक मूड में आया था । वह कुछ क्षण उसे निहारता रहा फिर धीरे सै बोला-- "रेखा । "
उसके मुह से अपना नाम सुनकर रेखा को एक खुशी का अहसास हुआ। उसने अपनी घनेरी पलके उठाई-ओर अपनी काली खूबसूरत आखों से उसे देखा-- "जी । "
"आपके बडो ने कुछ सोचा व चाहा था उसका जबाब मैं आपके होंठों सै सुनना चाहता हूं। चाहै, यह जवाब इकार में ही क्यों न हो, लेकिन इंकार' करने से पहले यह जरूर सोच लीजिएगा कि शायद फिर में जिन्दगी भर शादी की सोचूं ही नहीँ । "
उफ ! यह बेबाकी । यह अधिकारपूर्ण लहजा I रेखा का दिल धडकने लगा । सब कुछ ही तो रेखा को गुदागुदा भी गया था। उसने भी हिम्मत जुटाई व धीमे से बोली "मैने इसका फैसला अपने बडों पर ही छोड दिया है ।"
"और आपके बडों का फैसला क्या है?"
"यह आप बडों सै ही पूछे । " प्रेम सागर को मुस्कराते देख, रेखा भी अपनी मुस्कान रोक न पाई थी और फिर शायद बिषय बदलने को पूछा--"आपके लिए_ क्या मगवाऊ? ठण्डा या गर्म...?"
"शुक्र है कुछ तो औकात की आपने हमारी । "
" प्लीज । आप मुझें शर्मिंन्दा करने की कोशिश न करें । उस दिन मैने आपके साथ बदसलूकी की मैं क्षमा प्रार्थी हूं। " रेखा ने कई बार सोचा था आज अवसर मिला था, तौ उसने फोरन माफी माग ली थी ।
"माफी तो मुझे मागनी चाहिये । " प्रेम सागर वोला--"इन्द्र से तय करने के बाद ही मुझे आपसे मिलने आना चाहिये था । "
" ना ? अब आप ऐसी कोई बात नहीं करेगे... । " तभी घटी के जबाज में चपरासी ने अन्दर कदम रखा और रेखा ने पूछा--"हां, तो क्या?"
"कॉफी मिल जाएगी... । "
"हां , क्यो नहीं?" रेखा बोली व फिर चपरासी से सम्बोधित हुई--"काॅफी बनाओ-अच्छी सी । "
"रेखा ऐसा नहीं हो सकता कि हम कही बाहर चलकर कॉफी पीयें?" प्रेम सागर ने आगे झुकते हुए और झिझकते हुए धीमे स्वर में फरमाइश की I
"क्यो नही हो सकता?" रेखा अब खुशदिली दिखा रही थी ।
"तो फिर चलो कही बाहर चलते है।"
चपरासी जाते जाते रूक गया था और जैसे रेखा के जबाब का प्रतीक्षक था। रेखा उससे बोली ----"रहने दो । काफी की जरूरत नहीं है । हम बाहर जा रहे है । "
यह मुलाकातों की शुरूआत्त थी।।
दो चार मुलाकातों मे ही बात कहा से कहां पहुच गई । दोनों ने एक दुसरे क्रो विश्वसनीय एवं अपने योग्य पाया। जिस दिन वे मिल न पाते थे तो रात को अपने बिस्तरों पर लेटे टेलीफोन के तारों के जरिये अपनी भावनाओं को व्यक्त करते ।
यही हाल कुछ इधर भी था। इधर यानि इन्द्रजीत और राजकुमारी नयना के बीच प्रेम सागर और रेखा की मुहब्बत तो नई नई थी लेकिन नयना व इन्द्रजीत्त तो बरसों से एक दूसरे को जानते थे चाहते थे। हां यह दुसरी बात थी कि उनके सपने भी एक लम्बे समय बाद साकार हुए थे। अब हाल यह था कि जव तक वे एक दूसरे को मिल नहीं लेते थे वेकरार दिलों को चेन नहीँ आता । फिर एक दिन सवाल पेदा हुआ "आखिर कब तक? " और यह सवाल रेखा ने न प्रेम सागर से किया या-न नयना ने इन्द्रजीत से । यह सबाल अंकल बलदेव ने किया था ।