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A Horror Novel - स्वाहा complete

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‘ 'इन्द्रजीत्त बहुत ही बुद्धिमान लडका था। दस बारह साल की उम्र तक पहुचते पहुचते उसने वहुत कुछ सीख लिया । तैराकी घुडसवारी ड्राईविंग कुश्ती निशानेबाजी उसकी उठान भी बहुत अच्छी थी। वह बारह सार की उम्र मे भी चौदह साल साल का लगता था l और तुम्हारे पिता कृष्णकांत की पसन्द के विपरीत उसे दिहात की जिन्दगी से बहुत लगाव था । उसका बस नहीं चलता था कि वह सावनपुर में ही स्थाई रूप सै आकर रहे I इन्द्रजीत ने यह भी बहुत जल्द जान लिया था कि उसके चाचा ने अपने बडे भाई के सीधेपन से खून फायदा उठाया था । इन्द्रजीत जान गया था कि उसके बाप की ज़मीन-जायदाद कितनी है।"

'' औय जव रमाकांत ने इन्द्रजीत्त क्रो सिर उठाते देखा तो वह चिन्तित्त हो उठा और लगा विभित्र तरकीबें सोचने। उसके साजिशी दिमाग में साजिशें पकने लगी। अपने भाई से उसे कोई ख़तरा न था क्योंकि वह चौव्वन साल का हो चुका था और अपनी जिन्दगी के अन्तिम चरण में पहुच रहा था । मगर किशोर इंद्रजीत तो उसकी निगाह में वह डाकू था जो घर की दीवारो' पा चढने की कोशिश कर रहा III--अगर उसे फोरन ही न रोका गया तो उसका घर में घुस आना यकीनी था।"

"ख़लनायिकी फितरत वाले वाले रमाकांत का शातिर दिमाग वडी तेजी से काम कर रहा था। वह तुम्हारे भाई इन्द्रजीत क्रो लेकर विभित्र मसूबों पर सोच बिचार कर रहा था। उधर तुम्हारा चाचा अपना जाल बुनने में व्यस्त था तो इधर तकदीर अपना खेल खेल रही थी । रमाकांत किसी भी तरह कृष्णकात के इकलौते वारिस से छुटकारा चाहता था कि एक और बारिस दुनिया में आ गया।"

"और वह तुम थीं। बारह बर्ष बाद, भगवान ने कृष्णकात' के घर में एक बार फिर खुशियों के दीप रोशन कर दिए I कृष्ण कात को बेटी की बहुत ख्वाहिश थी । उसकी यह ख्वाहिश आखिर तुम्हारी मोहिनी सूरत में पूरी हो गई ।' '

' 'तुम्हारे भाई इन्द्रजीत ने जब से सावनपुर के चक्कर लगाने शुरू किये थे, तब से ही रमाकात के तेबर बदलने लगे थे । और इन तेवरों क्रो कृष्णकांत भलीभाति समझ रहे थे । इन्द्रजीत्त जब भी सावनपुर जाता कृष्ण कांत का दिल अज्ञात भय से घडकने लगता I वह अपने बेटे को जाने से नहीं रोकते थे-लेकिध दिल से चाहते थे कि वह सावनपुर न जाए। उनके दिल में अदेशे से उठते थे। और अपने अज्ञात खौफ से पेशेनजर उन्होंने इन्द्रजीत के साथ दो ट्रेण्ड बॉडीगार्ड भेजने शुरू कर दिए थे। यू जब इन्द्रजीत्त अपने बाडीगाडों के साथ हवेली के सामने जीप से उतरता तो रमाकात की आखों में किसी काटे क्री तरह चुभ जाता। ' '

' ' और फिर अन्तत: तुम्हारे चाचा रमाकात ने एक मसूबा बना ही लिया कि उसे क्या करना है । रमा कात का छोटा वेटा विजय हालाकि इन्द्रजीत से उम्र में बडा था लेकिन उसकी इन्द्रजीत से घनिष्ठता थी । साबनपुर में वे जहा भी जात्ते इकट्ठे जाते । इन्द्रजीत को अपने बाप की तरह शिकार का शोक था। एक बार जब वह सावनपुर पहुचा तो हमेशा क्री तरह तीतर के शिकार का प्रोग्राम बन गया। ' '

' 'रमाकात ने इस बार सारी योजना बना रखी थी । इन्दजीत के दोनों बाडीगार्डों' क्रो दूध में अफीम मिलाकर दे दी गई और सुबह सवेरे जब इन्द्रजीत अपने चैचरे भाई विजय और दूसरे नौकरों के साथ शिकार पर जाने क्रे लिए निकला तो हवेली के फाटक पर उसे सूचना दी गई कि उसके दोनों बाडीगार्ड गहरी नींद सो रहे है । बार-बार उठाये जाने पर भी नहीं उठे हैं । इन्द्रजीत ने सोचा शायद दोनों रात भर ताश खेलते रहे होंगे । पर इंद्रजीत को शिकार पर अपने इन बाॅडीग़ार्डो की जरूरत भी नहीं थी। वह उन दोनों को सोता छोडकर शिकार पर निकल गया । "

“और फिर...अस्पताल में तुम्हारे पिता को दो खबरें मिलीं । तुम अदाजा' लगा सकती हो कि वे दो खबरें क्या रही होंगी I भईं, पहली खबर तो तुम्हारे बारे में थी I यह खुशखबरी कृष्ण कांत को पूरे बारह साल बाद मिली थी। जव नर्स ने एक फुल-सी बच्ची पैदा होने की सूचना तुम्हारे बाप को दी तो यह खबर सुनकर वह मारे खुशी के नाचने ही तो लगे थै । इतनी खुशी तो उन्हें तुम्हारे भाई इन्द्रजीत के जन्म पर भी नहीँ हुई भी। तुम्हारे पिता को लडकिया बहुत पसन्द थीं I वह तुम्हारे जन्म को बडी धूमधाम से मनाना चाहते थे लेक्लि वक्त ने कुछ और ही गुल खिला दिया ।"

' 'एक अच्छी ख्वय के बाद फोरन ही एक दूसरी बुरी ख्वर मिली और यह बुरी खबर थी तुम्हारे भाई इन्द्रजीत के बारे में और यह ख़बर लेकर आया था रमाकांत का बडा बेटा सूरज ।!

’ 'उस वक्त जब तुम्हारा बाप तुम्हारे जन्म की खुशखबरी किसी को सुनाने को बेताब था ऐन उस वक्त सूरज अचानक ही तुम्हारे बाप के सामने आकर खड़ा हो गया था । उसका सिर झुका हुआ था और चेहरे पर वहशत बरस रही थी। कृष्णकांत उसकी सूरत देख़कर अपनी खुशी भूल गए । उन पर थर्राहट व्याप्त हो गई I तत्काल ही उनके दिमाग में जो पहला ख्याल आया था कि उनके भाई रमाकात का देहान्त हो गया है। लेकिन रमाकांत भला आसानी से मरने वाली चीज कहा था। यह खबर तुम्हारे चाचा के बजाय तुम्हारे भाई के बारे मै थी।"

सूरज...ने बडे नाटकीय अवाज मे अपना सिर उठाया...बाहे फैलाई और तुम्हारे पिता से लिपट कर बेतहाशा रो पढा। और रोते-रोते बोला--

”ताया जी, हमारे भाई को डाकू उठा ले गये । ' ' यह ख्वर सुनकर कृष्णकात की जहन में सन्नाटा उतर गया। घबराकर ही पूछा-"किस भाई को...?"

‘ 'हमारे भाई, इन्द्रजीत्त को… l ' ' सूरज ने अपनी भीगी पलके पोंछते हुए कहा ।

"इस तरह अस्पताल में तुम्हारे पिता को दो अच्छी बुरी खबरें एक साथ मिली I और उनका हाल हुआ सो हुआ। लेकिन जब तुम्हारे चाचा रमाकात को यह खबर मिली कि बड़े भाई के यहां बारह साल के बाद बच्ची ने जन्म लिया है तो वह खुशी जो इन्द्रजीत क्रो डाकुओं द्धारा उठाए जाने की वजह से हुईं थी-दिल में तीर बनकर चुभ गई।

"उसने अपने तौर पर जायदाद के बारिस को मिटाने की कोशिश की थी । लेकिन ऊपर वाले ने उसकी कोशिश को नाकाम बना दिया था । वह बडे शेतानी मिजाज का आदमी था उसके दिमाग में जो शैतानी आ जाती थी उसे निकालना फिर आसान न होता I जायदाद के लालच ने उसको अंधा कर दिया था I उसके दिमाग में यह बात बैठ चुकीं थी कि जायदाद के मालिक यानी तुम्हारे पिता कृष्णकात को कुछ नहीं कसना है I क्योकि वह तो खुद ही मौत के करीब होता जा रहा था । कितने बरस और जीता । और जायदाद के वारिसों को छोडना नहीं है। ताकि लाठी भी न टुटे और जितने भी साप राह में आए मर जाएं । और उस पर कोई उंगली भी नहीं उठा सके।"

"तुम्हार भाई इन्द्रजीत्त के साथ क्या हुआ? जगल में उसका अपहरण किसनै किया और किसने करवाया. ..वो कहा पहुचा और उस पर क्या बीती? अगर मौका मिला तो यह सब बाद में बताऊगा, फिलहाल तुम अपने बारे में जान ली। एक बेनाम सी खटक जो तुम्हारे पिता के दिल में होती रहली थी...ओर कई अनजाने अन्देशे से जो उनके दिमाग में सिर उठाते रहते थे...इन्द्रजीत्त के अपहरण ने उन्हे… सच साबित कर दिखाया था। वह नहीं चाहते थे कि इन्द्रजीत सावनपुर जाए लेकिन वह लडका मानता ही नहीं था। अखिर नतीजा सामने आ गया । अब वह अपने भाई कीं तरफ से शंकित हो गया l उन्हें अन्दाजा हो गया कि रमाकांत क्या चाहता है । लेकिन समस्या यह थी कि वह उनका माई था-विना सबूत के वह उससे कुछ नहीं कह सकते थे I ' '

"तुम्हारे पिता बिना प्रमाण के उसकी तरफ उगली उठाने को तैयार न थें-और रमाकात ऐसा शातिर था कि सबूत छोडता, न था। तुम्हारे भाई को ख़त्म करवा के वह बहुत खुश था कि अपनी राह का सबसे बड़ा काटा' निकाल फेंका है I लेकिन तुम्हारे जन्म ने उसके सपनो को खाक में मिला दिया था और यह उसे बर्दाश्त न था I ' '

' 'सो उसने अपने दिमाग की कमान में साजिश का एक तीर और चढाया, और अब तुम उसके निशाने पर थीं। लेकिन वो जानता था-जिस लडकी… को निशाना बनाने जा रहा है उसका नाम शीना है जो अपने आप में चीते कीं खसलत रखती है ।' '

"जिस नाम को सुनकर तुम बार बार चौकती ही। यह अर्थपूर्ण लेकिन प्यारा सा नाम वास्तव में तुम्हारे दादा सर निहाल चंथ क्रो बहुत पसन्द था। वह प्राय: कहा करते थे कि अगर मेरी कोई लडकी. होती तौ मॅ उसका नाम शीना रखता। भगवान ने उन्हें कोई बेटी न दी। जब तुमने जन्म लिया तो तुम्हारे पिता क्रो अपने पिता क्री तृष्णा याद आई और उन्होंने तुम्हारा नाम शीना रख दिया ।।

लेकिन.. .यह प्यार भरा नाम चल न सका ।

हालात ने ऐसा पलटा खाया की तुम्हारा नाम बदलकर रेखा रख दिया गया ।

इस तरह तुम अपने असली नाम के बारे में कुछ न जान सकीं। यह नाम बस कुछेक जहनों में ही सुंक्षित रह गया।”

' ‘तुम्हारे पिता कृष्णकांत अपने भाई की तरफ सै शकित तो हो ही चुके थे, लेकिन उनकी फितरी शराफत ने कोई सीधा व सख्त कदम न उठाने दिया । वह जालिम की बजाय मजलूम बनना पसन्द कर लेते थे । वह मुह' पर जवाबी थप्पड मारने की बजाये अपना दूसरा गाल पेश करनै के आदी थे। ' '

"हर कोई उसे समझा रहा था कि तुम्हारा भाई हस्ती मिटाकर, जमीन जायदाद पर कब्जा कर लेना चाहता है। इन्द्रजीत्त को भी उसने गायब करवा दिया है और अब उसके बाद शीना का नम्बर है। होशियार हो जाओ । लेकिन जवाब में बह हसकर कहते-- "'अरे नहीं ऐसा कैसे हो सकता है?"

' 'लेकिन ऐसा हो रहा था । तुम्हारी मां, तुम्हें जन्म देने के बाद, मुश्किले से तीन माह ही जिन्दा रह सकी । उन्हें अपने बेटे इन्द्र से बहुत मुहब्बत थी। उसके गुम होने की खवर ने ही उन्हें दुनिया से बेगाना कर दिया था I कृष्णकांत' जब भी घर लौटते-चह बस एक ही सबाल पूछती "मेरा इन्द्र कहा है? ''

' 'तुम्हारे पिता कृष्णकांत' कोई छोटे मोटे आदमी न थे । असीमित रसूख था उनका , फिर रुपये पैसे की कोई भी कोई कमी न थीं । पुलिस ने सावनपुर के जगलों का और उस इलाके का चप्पा-चप्पा छान मारा-लेकिन इन्द्रजीत्त का कोई सुराग न मिला । उसका कुछ पता लगता भी कैसे उसे डाकुओं ने उठाया ही कहां था । बहरहाल इन्द्रजीत न मिला, न उसके बारे में कोई ख़बर मिली और न ही उसकी लाश मिली । तुम्हारी मा' अपने बेटे क्री याद में होश गबा बैठी और फिर अन्तत: तीन माह की अवधि में तडप तडप कर मर गई। आखिरी सास लेते बक्त एक फ्रेम की हुई तस्वीर उनके सीने पर रखी हुई थी यह तुम्हारे भाई इन्द्रजीत्त क्री तस्वीर थी। बेटे इन्द्र की गुमशुदगी और सारिका की मौत ने तुम्हारे बाप क्रो हिलाकर रख दिया । वह बहुत कुछ सोचने पर मजबूर हो गए थे । अब उन्हें तुम्हारी चिन्ता दिन रात्त खाए जाती थी । कुछ इसके इशारे मिले थे जिससे यह जाहिर होता था कि रमाकात्त अब तुम्हारी जान का दुश्मन बन चुका है।"

' 'सौ अब सबसे बडी समस्या यही सामने थी कि तुम्हारी जिन्दगी केसे सुरक्षित रखी जाए । तुम्हारे पिता नहीं चाहते थे कि तुम्हारी जान भी, जायदाद की बलिवेदी पर चढा दी जाए I बह तुम्हें तुम्हारे चाचा की पहुच से और हाथों सै हमेशा के लिए महफूज कय लेना चाहते थे। सो उन्होंने एक प्लानिंग की और खूब थी उनक्री प्लानिंग ।"

”तुम्हारे पिता के एक बहुत अच्छे दोस्त थे रामदास । रामदास अम्बाला में रहते थे। उ…होंने रामदास को फोन करके दिल्ली बुलवा लिया। उन्हें सारे हालात बताए और उनसे बिनती की कि वह तुम्हें अपने साथ ले जाएं और अपनी वेटी बनाकर तुम्हारी परवरिश करें । उनकी समस्या जमीन जायदाद की न थी...तुम्हारी जिन्दगी कीं थी। कृष्णकांत की चिन्ता यही थी कि उन्हें अपनी बेटी की जिन्दगी बचानी है अगर यह बच गई तो बडी होकर अपना हक खुद हासिल कर लेगी और अगर यह मर गई तो फिर जायदाद किस काम की । बेटा पहले ही गायब कर दिया गया था और वह खुद बुढापे के आगन में था।"

"तुम उस वक्त तीन माह की थी जब तुम्हें रामदास के साथ अम्बाला रवाना कर दिया गया I यह काम बडी होशियारी और पूरी गोपनियता के साथ किया गया था। रामदास अपनी पत्नी के साथ आए थे। वे तुम्हें लेकय सकुशल अम्बाला पहुच गए तो उन्होंने तुम्हारे पिता को यह सूचना दे दी । तुम्हारी कुशलता को सूचना मिलते ही तुम्हारे बाप ने एक खबर तुम्हारे चाचा को भिजवा दी । और यह ख्वर थी तुम्हारी मौत कीं। यह ख्वर सुनकर तुम्हारा चाचा झुम उठा। वह तुम्हारे खून से अपने हाथ रगने से बच गया था। अब उसकी राह में कोई पत्थर न था...कोईं दीवार न थी । "
 
”तुम्हारी मौत क्री ख्वर पाकर रमाकांत अपनी बीवी के साथ दुखी शक्ल बनाए तुम्हारे पिता की कोठी पहुचा । यह जग-दिखावा भी तो जरूरी था। बह मुश्किल सै शाम तक रूका I उसे तो सावनपुर लोटने की जल्दी थी। वह रात को अपनी हवेली में पहुचकर घी के दीये जलाना चाहता था।"

"तुम्हारे पिता का नाटक सफल रहा । रमाकांत के बहमों गुमान में भी यह बात न आ सकी कि उसके सीधे से भाई ने उसे खुला फरेब दे दिया है, वह बहुत खुश था। दोनों वारिसों से उसे छुटकारा मिल चुका था I वस, भाई रह गया था तो उसका क्या था, पर वह भी तो असली तोर पर जभीन-जायदाद, हवेली और बागों से दूर था, बहुत दूर । जब तक जीता है, जिये। उसके बेटे दिल्ली जाते तो वे अपने ताया से कुछ न कुछ झाड़ ही लाते थे । ”

"संक्षेप मे यह कि तुम मरकर भी अम्बाला में परवरिश पाने लगीं। नाम शीना से बदलकर रेखा रख दिया गया। रामदास तुम्हारे मा बाप बन गए ओंर यूं बरसौ तक तुम्हें मालूम… न हो सका कि रामदास तुम्हारे असली पिता नहीं । "

"अम्बाला में तुम रामदास के घराने में पली बडी...शिक्षा प्राप्त की । यहा के कॉलेज में ग्रेब्यूएशन किया। इस बीच तुम्हारे पिता कई बार अम्बाला आक तुम्हें देख गए थै। तुम्हें उन्हें रामदास के अभिन्न घनिष्ट मित्र की हैसियत से जानती थी I मैट्रिक पास करने के बाद पहली बार तुम दिल्ली गईं-रामटास और उनके घर बालों के साथ । तुम अपने बाप कृष्णकांन्त के ही मेहमान बनकर रहे थे। और इस बीच अपने प्रति कृष्णकांत के अति स्नेह और असाधारण व्यवहार से तुम्हारे दिल में कई सदेह उपजै। उनके पिता तुल्य लाड प्यार व अपनत्व ने तुम्हें कुछ सोचने को विवश कर दिया था। कुछ सदेह दूर कर दिए कि कृष्णकांत चूकि परिबारहीन अकेले व्यक्ति थे इसलिए वह तुम्हें बेटियो कीं तरह चाहने लगे थे। ''

'' फिर ग्रेज्यूएशन के बाद जब तुम दूसरी बार दिल्ली गई तो पहले की तरह ही रामदास की फैमिली भी साथ थी। रामदास एक सच्चे और पक्के किस्म के इन्सान थे। उन्होंने तुम्हारे सिलसिले में जो बचन दिया था उसे पूरी इमानदारी से निभाया । इस बार वह जब तुम्हें लेकर दिल्ली पहुचे तो दिल में बडी बेकली सी थी। वह चाहते थे कि अब तुम्हारे पिता के बारे में बता दिया जाए। सयोग से अब तुम्हारे पिता भी यही चाहते थे कि इस राज से पर्दा हटा दिया जाए। दुनिया वालों के सामने नहीं बल्कि अपनी हद तक ।' '

"यूं रात को एकान्त में अपने कमरे में बुलाकर रामदास ने तुम्हारा हाथ तुम्हारे पिता के हाथ में दे दिया और कहा कि यह तुम्हारे असली पिता हैं । बस इतना ही बताया और यह बता कर तुम्हें एक कठिन परीक्षा में डाल दिया । तुम्हारे दिल में एक अनूठी सी पीडा ने जन्म लिया । विश्वास- अविश्वास के हिंडोले पर सवार, इस पीड़ा के साथ ही तुमने सोचा कि अगर तुम्हारे पिता कृष्णकांत है तो फिर वे क्या हालात थे जिनसे बेबस हो रामदास ने तुम्हें बाप बनकर पाला? और इस भेद से वे दोनों ही पर्दा उठाने को तेयार न थै।

"और इसी रात एक हादसा पेश आया। मुकद्दर का लिखा--रामदास को दिल का दौरा पडा और अस्पताल पहुचते पहुचते वह स्वर्ग सिधार गए।। "

' 'अब तुम्हारे अम्बाला लोटने का कोई सवाल नहीँ था। तुम्हें दिल्ली रोक लिया गया I दुनिया बालों का यही बताया गया कि तुम यहां एम.ए. ज्वाईन करना चाहती हो, सो इसलिए तुम्हें यहां रोक लिया गया है। ”

“मगर अब एक और समस्या उठ खडी. हुई I तुम्हारी शक्ल और तुम्हारा रग-रूप तुम्हारी मा सारिका सै बहुत मिलता है-ओर बढती. उम्र के साथ साथ यह समानता गहरी होती जा रही थी । कुछ झलक तुममें तुम्हारे पिता की भी है । कृष्णकांत के घर में जो भी तुम्हें देखता वह देखता ही रह जाता। और तब वह बरबस ही सारिका का जिक्र किंए बिना न रहता ।”

"ऐसे में एक बार तुम्हारा चाचा दीपक किसी काम से दिल्ली आया । उसने तुम्हें देखा तो बस देखता ही रह गया। उसे फोरन ताई याद आई । सावनपुर लौटकर उसने इस बात का जिक्र अपने बाप से किया । रमाकांत फौरन ही अपनी बीबी के साथ दिल्ली पहुच गया I और आशा विपरीत दो-तीन दिन अपने भाई के यहां मेहमान रहा । "

“एक रात जब सव खाना खाने में व्यस्त थे तो रमाकात्त की नजरें बार-बार तुम्हारी तरफ उठ रही थी । इन नजरों को तुम्हारे पिता भी महसूस का रहे थे लेकिन वह खामोशी सै खाना खाने में मस्त थे । तब रमाकात तुम्हारे पिता से सम्बोधित हुआ बोला--" भाई जी I यह आपके दोस्त कीं बेटी तो हू ब हू हमारी स्वर्गीय भाभी पर गई है । कमाल की समानता है यह तो आपकी बेटी लगली है । ' '

“तुम्हें हालाकि यह हकीकत बता दी गई कि तुम कृष्णकांत की बेटी हो-लेकिन साथ ही तुम्हें यह बात एक रहस्य ही बनाए रखने को भी कहा गया था । तुम्हें बता दिया गया था कि यह भेद खुल जाने से तुम्हारी जान को खतरा हो सकता है। इसलिए तुम अपने चाचा की इस बात पर चोंकी जरूर, लेकिन खामोश बैठी रहीँ l "

' 'रमाकात की इस बात ने कृष्णकात्त को भीतर तक दहला दिया' था । उन्हें यही लगा था कि रमाकांत ने तुम्हें उनकी वेटी के रूप में पहचान लिया है । उन्होने तुरन्त निर्णय लिया कि वह शीघ्र ही तुम्हें कोठी से कहीं और भेज देगे क्योंकि रमाक्रात के मनहूस साये से तुम्हें बचाना जरूरी था।"

"सो उन लोगों के विदा होते ही तुम्हारे पिता ने फौरन बलदेव राज को फोन किया। बलदेव राज ही एक ऐसा शख्त था जिस पर इस मामले में भरोसा किया जा सकता था । बलदेव राज सै तुम्हारे पिता की दूर की रिश्तेदारी थी और दोस्ती भी थी । वह तुम्हारे पिता के रेस्टोरेन्ट में रोज ही आते थे । लेकिन आज उन्होने बलदेव राज को अपनी मॉडल टाऊन वाली कोठी में बुंलवाया । उन्होंने उससे जरूरी विचार विमर्श किया । कुष्णकात ने हर वह बात जो तुम्हारे बारे में बताई जा सकती थी, बता दी। हर राज से पर्दा हटा दिया। बलदेव राज को भी खतरे का अहसास हुआ और वह तुम्हें तुरन्त ही अपने घर ले गए ।"

' 'माडल टाऊन से तुम्हारा बलदेव राज के यहा शिफ्ट कर जाना सुकून-बख्व था-लेकिन यह सुकून ज्यादा समय तक बना न रह सका । तुम्हारे तीनो कजन और तुम्हारे चाचा अपने काम से दिल्ली आते जाते रहते थे। एक शाम जब तुम करोल बाग में घूम रही थी तो तुम्हारे चाचा-चाची ने तुम्हें देख लिया और तुम्हें देखते ही उन्है साप सुंघ गया।“

' 'वे दोनों शापिंग करना भूल गए और सीधे मॉडल टाउन पहुचे । शाम का वक्त था तुम्हारे पिता रेस्टोरेन्ट जाने को तैयार हो रहे थे वह अपने रेस्तरां में सर शाम दो तीन घटे बैठा करते थे। यहां बैठकय वह बिजनेस सै ज्यादा अपने दोस्तों में वक्त गुजारते थे । उन्होंने रेस्तरां जाने का प्रोग्राम केन्सिल कर उसने भाई-भाभी का स्वागत सत्कार किया। उन्हें मालूम हुआ कि वे लोग सुबह से दिल्ली आए हुए हैं और रात को वापस लोट जाने का इरादा था-लेकिन अब वे एक रात बहीं रहकर कल सुबह बापस जाएगे। “

फिर रात खाने की मेज पर बातों ही बातों में तुम्हारे चाचा ने तुम्हें करोल बाग में देखे जाने का जिक्र किया और अपनी भारी मूंछो को सहलाते हुए बोले--

' 'भाई जी! वह तो बिल्कुल आपकी बेटी लगती है । वह यहां से कहा चली गई है । उसे अपने पास रखिये ना... I"

"देखने-सुनने में यह एक सादा-सा वाक्य था-लेकिन उन शब्दों के पीछे जो जहरीले इरादे छिपे हुए थे उनका अहसास करके तुम्हारे पिता सूखे पत्ते की तरह कापने लगे। उन्होंने सोचा कि अब तुम्हारा दिल्ली में रहना खतरे से खाली नहीं है । "

"रमाकात के जाने के बाद तुम्हारे पिता घबराए हुये बलदेव राज के घर शक्तिनगर पहुचे । सलाह-मशविरा हुआ, तय पाया कि तुम्हें फोरन बगलौर भेज दिया जाए, और यूं तुम एक साल पहले दिल्ली से बगलौर आ गई... I. और अपने खुद यह हालात तुमसे भी छुपे हुए नहीं हैं... ।"

"हमारा ख्याल है कि हमने तुम्हारी जिन्दगी से सम्बन्धित महत्वपूर्ण सबालो का जबाब दे दिया। हमने तो वे राज भी बता दिए है' जो पिता ने तुमसे छिपाकर रखे है l वह तुमसे बेपनाह मुहब्बत करते हैँ। तुम्हारी जिन्दगी बचाने के लिए उन्होंने जो कुछ किंया-लह्र शायद ही कोई बाप अपनी बेटी के साथ कर सके। अच्छा, हम चलते है। हमें गया वक्त न समझना हम वापस ओयेंगे । "

फिर एक अनहोनी हुई! बडा, अजीब हुआ। रेखा की नज़रें अभी आखिरी शब्दों पर ही थी कि लफ्ज उडने… लगे और देखते ही देखते वह मेज ऐसा साफ m हो गया जेसे उस पर कुछ लिखा था ही नहीं।

रेखा की यह दास्तान काफी लम्बी थी। पॉकेट डायरी के बीस-बाईस' पृष्ठों तक फैली हुई रेखा ने जल्दी-जल्दी पृष्ठ उल्टे लेकिन अब किसी भी पेज पर कुछ नहीं था।

एक शब्द. कोई एक वाक्य तक नहीं लिखा था।

वह डायरी पहले की तरह कोरी हो गई थी I
 
रेखा उस डायरी को पकड़े कितनी ही देर तक हैरान परेशान-सी बैठी रही। सोचती रही ।

डायरी में लिखे हालात में सै बहुत सी बातें वह पहले से ही जानती थी । पर फिर भी डायरी का लिखा, लुप्त होने के बाद भी अपने पीछे बहुत से सवाल छोड गया था l

रेखा' की जिन्दगी क्या थी-एक अनूठी अविश्वसनीय दास्तान ।

अपनी ही जिन्दगी के बहुत से रहस्य रेखा पर खुल गए थे । वह वहुत कुछ जान गई थी । शायद सब कुछ ।

लेकिन कहां ? अभी… भी तो बहुत कुछ रहस्य के पर्दो के पोछे था । उसका भाई कहां था? उसके साथ क्या बीती? इस बारे में रेखा कुछ नहीं जान पाई थी। रेखा को इतजार करने को कहा गया था ।

अपने चाचा रमाकांत' का चेहरा बार बार रेखा की नजरों के सामने आरहा था । इस धूर्त च लालची शख्स ने उसके बाप की जिन्दगी में कैसा जहर घोल दिया था । सारी पुंश्तेनी जायदाद पर उसका कब्जा था । फिर भी उसे सुकून न था । बडे भाई की शराफत से नाजायज फायदा उठाकर बौ हर चीज पर कब्जा करता चला जा रहा था । वह शेतान इस बात से अनजान था कि किस्मत उसके साथ क्या खेल रही है । जो दूसरों के लिए गड़ढे. खोदते हैं अन्तत: वही गड्डे उनके लिए बर्बादी का सबब बन जाते है' । हर जुल्म का अजाम होता है, हर रात का एक सवेरा होता है ।

रेखा सोच रही थी कि उसके पिता ने अपने आप पर किस कदर जुल्म किया । अपनी बेटी की जिन्दगी बचाने के लिए अपने बुढापे. में अकेले जिन्दगी गुजारना मजूर कर लिया था और अपनी बेटी क्रो बुरी नजर और मात से दूर रखा ।

रेखा का दिल भर आया ।

' 'मेरे बाप...मेरे महान् बाप...मैं आपकी महानता को सिर नवाती हूँ। आपके प्यार क्री ऋणी हूँ। आपकी भावनाएं पूजनीय रहीँ, निस्वार्थ रहीं । लेकिन मुझें आपसे एक शिकायत भी है । आपने मुझें अपना हमराज क्यों नहीं बनाया। यही सोचा होगा आपने कि अगर मुझे हालात मालूम हॉ गए तो मैं परेशान हो जाऊगी । उलझ जाऊगी ओर यह भी मुमकिन है कि राज को राज न रख सकू और दुश्मन जो मेरी जान के पीछे था-ना जाने कब बार कर जाए। यही सोचा होगा न आपने । ' '

रेखा जज्बात की रौ में सोचती चली गईं ।

' 'एक बाप के नाते तो आपने ठीक सोचा लेकिन मुझसे मेरी सोचें छीन ली---. मुझे अनने फर्ज से दूर रखा I औलाद का भी तो कोई हक होता है...काई फर्ज बनता है। आपने अब तक अपना फर्ज निभाया। अब...अब मैं अपना फर्ज निभाऊगी । मेरा इन्तजार कीजिए। मै आ रही हूँ। में एक-एक को देख लूगी । जुल्मों...जबर की इस कहानी पर अब मेरी ही मर्जी का "दी एण्ड" लगेगा। अपनी जमीन का एक टुकड़ा भी किसी के कब्जे में न जाने दुगी । अब वेचिन्त हो जाएं । मैं अपने भाई को तलाश करूगी । आप अगर बूढे हो गए हैं तो क्या हुआ? मै तो जवान हूँ। लडकी हू तो क्या हुआ. . . आपको लड्का बनका दिखाऊगी । आपकी शीना बनका दिखाऊगी । अब आपको किसी से डरने की

जरूरत नहीं है... I ' ' रेखा बहुत देर तक ऐसी ही बातें सोचती रही ।

उसे अपने बाप पर बहुत तरस आ रहा था I और अपने निर्दयी चाचा पर बेहद गुस्सा। वह कितनी ही देर तक यू सोचो पर ताव खाती रही और फिर एक दृढ, इरादे के साथ उठी।

उसने फैसला कर लिया था कि वह दिल्ली जाएगी।

वह अब तक बडी, खामोशी से हर एक का हर फैसला मानती आ रहा थी । लेकिन अब उसने सोच लिया था कि किसी की बात नहीं मानेगी.. .वही करेगी जो उसके दिल में आएगा। उसके दिल मे तूफान उठ रहे थे और अब तूफानों पर बाध बांधने का उसका कोई इरादा नहीं था ।

अंकल बलदेव राज ने उसे मना किया था कि वह भ्रूलकर भी दिल्ली कभी फोन न करे। जब भी फोन करेगे वो खुद ही करेंगे ।

अंकल की इस हिदायत पर वह मन ही मन निर्णायक अदाज में उठी ।

साईड टेबिल पर रखे फोन को उठाकर बैड पर रखा और फिर बडे इत्मीनान से अंकल बलदेव राज के घर का नम्बर मिलाने लंगी ।

नम्बर लगा और उधर घन्टी बजने लंगी।

घन्टी बजती रही और कई घटिया बजने के बावजूद किसी ने रिसीवर न उठाया तो वह चिन्तित हो उठी ।

यह बात वह अच्छी तरह जानती थी कि इस वक्त अंकल' बलदेव घर पर नहीँ हौंगे-काॅलेज गए होंगे । लेकिन घर में घर के दूसरे _ लोगों को तो होना चाहिए था । पर अब यही लग रहा था कि घर में कोई नहीं है।

कही गलत नम्बर न मिल गया हो? यही सोचकर उसने दोबारा नम्बर मिलाया, पर व्यर्थ I घन्टी बजती रही और रिसीवर किसी ने नहीं उठाया।

निराश हो रेखा ने फोन उठाकर यथास्थान पर रख दिया । उसके जहन में अब तक उद्धिग्नता-सी थी । वह उडकर दिल्ली पहुच जाना चाहती थी । वह अपने बाप के चरणों में बैठकर उन्हें बताना चाहती थी कि वह हर उस भेद क्रो जान गई है जो उससे आज तक छिपाया गया है-ओंर अब उसके दिल में लावा उबल रहा है वह अपने निर्दयी चाचा को किसी कीमत पर भी नहीं बख्शेगी । वह उसे शूट कर देगी ।

रेखा ने इसी बेचैनी के आलम में बैड पर अपना तकिया ठीक किया-फिऱ डायरी उठाकर लेट गई। वह डायरी को तकिये के नीचे रखकर कुछ देर आखें' बन्द करके लेट जाना चाहती थी I डायरी को तकिये तले रखने से पहले उसने ऐसे ही उसके पृष्ठों को पलटकर देखा और उसे डायरी के पेजों के बीच सुर्खी सी महसूस हुई I

उसका दिल अचानक ही तेजी सै धडकने लगा । उसने जल्दी-जल्दी, एक एक पन्ना पलटकर वह पेज निकाला ।

उस पेज पर छोटा सा अठन्नी के बराबर सुर्ख धब्बा था, बिल्कुल ताजा खून का । डायरी बन्द होने क्री वजह से यह खून दुसरे पृष्ठ पर भी लग गया था। और पेज क्री पीठ पर भी झलक आया था।

यह खून कहा से आया?

वह इस खून को देख़कर सहम गई। तब अचानक उसके दिल में जानलेवा ख्याल आया।
 
लेकिन अपने हम प्रलयकारी' ख्याल को तुरन्त ही अपने जहन से झटक दिया।

नहीँ ऐसा नहीं ही सकता। यह उसके बाप का खून नहीं हो सकता। वह यह भी नहीँ समझ पा रही थी कि खून को देखकर उसे अपने बाप कृष्णकांत का ख्याल ही क्यों आया।

यह ख्याल जिस तरह भी आया, बहरहाल उसे बेचैन कर गया । उसकी रूह में काटें भर गए। वह अपनी निगाहे खून के उस धब्बे से हटा नहीं पाई। फिर देखते ही देखते वह खून सूखने लगा । और कुछ ही देर में उस पेज से मिटकर लुप्त हो गया।। वह पेज अब फिर साफ था l साफ और सफेद ।

रेखा ने डायऱी के पेजो पर दोबारा तेजी से नजर डाली, लेकिन डायरी अब फिर से सादा हो चुकीं थी ।

उसने डायरी तकिये के नीचे रखी ओर फोन सरका एक बार फिर अकर बलदेव के नम्बर मिलाने लगी । इस बार भी , उधर घटी बजी निरंतर बजती रही लेकिन कॉल किसी ने रिसीव नहीं की।

रेखा की बेचैनी बढती जा रही थी। उसने कुछ सोच अमर के आँफिस का नम्बर लगाया।

कॉल अमर ही नै रिसीव की थी । अमर की आवाज पहचानकर वह बोली

"भाई मै बोल रही हूँ रेखा ।"

"जौ, रेखा खैरियत?"

"खैरियत ही है I आप मेरा एक काम कर दे भैया ।। मै फौरन दिल्ली जाना चाहती हूँ-- आप किसी भी पलाईट से मेरी सीट कम्फर्म करा दे ।

"सीट तो मिल जाएगी लेकिन यह आपको खडे पाव दिल्ली जाने की क्या सूझी? " अमर ने पूछा।

”बस, मेरा जी बहुत घबरा रहा है। मैं फोरन दिल्ली जाना चाहती हूँ।" रेखा ने दृढ. तथा निर्णायक स्वर में अपनी बात दोहराई थी I

_ "ठीक है । आप तैयारी करें-मैं किसी को भेजता हूँ एजेन्ट के पास ।"

”थेंक्स, भैया? " रेखा ने रिसीवर को कान से हटाया ।

"हेलो । " अमर जल्दी से बोला। ’

" जी.....जी...?" रेखा ने रिसीवर फिर कान से लगा लिया।

"आपने मौसी से बात कर ली हैं। उन्होने आपको अकेले जाने कीं परमीशन दे दी है न?”

”नहीँ, भैया! मौसी से मैंने अभी बात नहीँ की है, अभी नीचे जाकर उन्हें बताती हूँ। उन्हें राजी करती हूँ। आप मेरे टिकट का इन्तजाम करें... । "

' 'ठीक है, मैं करता हूँ। इतजाम होते ही तुम्हें फोन करूगा । "

"ओ० के० भैया! वन्स अगेन थेक्स ।। ' ' रेखा ने कहा और फिर रिसीवर रखकर एक गहरा सास लिया ।

अब उसे गंगा मौसी से बात करनी थी ।

रेखा नीचे पहुची तो उसने माया क्रो किचन में व्यस्त पाया । किंचन में झाककर ' बह गंगा मोसी के कमरे कीं तरफ बढ गई। गगा मोसी चश्मा लगाए कोई उपन्यास पढ़ रही थी I रेखा दबे पाव चलती हुई उसके निकट पंलग' पर आ वैठी । गगा मौसी उसे टेख़कर मुस्करा दी-उपन्यास बंद करते बोली--

"सौ कर आ रही हौं?"

"नहीं मौसी! " रेखा अपनी उदासी छिपा नहीं पा रही थी ।

' 'रेखा खेर तो है, बेटी! " मोसी जरा सम्भल कर बैठ गई।

"मोसी'! मैंने अमर को फोन करके प्लेन का टिकट मगवाया है। मै दिल्ली जाना चाहती हूँ।”

"हाय ।।" मोसी ने अपना हाथ सीने पर रखत्ते हुए पूछा-- ' 'कब.....क्यों ?? ' '

"आज ही। चाहे जिस भी फ्लाईट से हौ सके।"

"यह कैसे हो सकता है... l" मोसी फिक्रमद' दिखने लगी-- ' 'तुम जानती हो कि तुम्हारे अकल बलदेव ने क्या कह रखा है I "

' 'मैं जानती हू।" रेखा बोली--''यही ना कि मुझे यहा से कहीं जाने न दिया जाए।"

“हा यही।" मोसी का लहजा उलझा उलझा था।

' 'मोसी! " रेखा बदस्तूर शात-सहज भाव में बोली--' 'यह अकल' बलदेव मेरे बारे में फैसला करने वाले कौन हैं?"

”यह तुम किस प्रकार की बातें कर रही हो? "

"मौसी आप मेरे बारे में कुछ नहीं जानतीं। काश । आप मेरे बारे में कुछ जानती होती या मैं ही आपको सब कुछ बता सकती I"

"मैं समझी नहीं... I"

"दिल्ली से लौटकर सब समझा दुगी, मौसी । " रेखा ने यह मौसी की तसल्ली के लिए कह दिया था । क्योंकि यह तो वह खुद भी नहीं जानती थी दिल्ली से वापस भी आएगी था नहीं।

गगा मौसी एक बहुत ही प्यारी व सहृदय महिला थी । रेखा क्रो उनसे लगाव हो गया था-खुद गगा उस पर क्या कम जान छिडकती थी । रेखा जानती थी कि दिल्ली जाने के बाद वह मौसी को बहुत 'मिस' करेगी।

रेखा ने मौसी को ज्यादा बहस करने का मोका नहीं दिया न उन्हें कुछ बताया। लगभग तीन बजे को अमर का फोन आया I उसने बताया कि शाम की फ्लाईट से रेखा की सीट रिजर्व हो गई है।

गंगा मोसी क्री परेशानी बडी ही थी। रेखा के इस प्रोग्राम ने उन्हें विचलित कर दिया था ।
 
बलदेव राज ने जिन्दगी में पहली बार उन्हें कोई जिम्मेदारी सौंपी थी। वह इस जिम्मेदारी को बाखूबी निभा भी रही थी । वह रेखा का बहुत ख्याल रखती थी । ऐसे ही जैसे एक मां अपनी जबान बेटी का ख्याल रखती है । रेखा ने भी उन्हें कभी परेशान न किया था I रेखा खुद भी एक शालीन, आज्ञाकारी और सुलझी हुई लडकीं थी ।

और इस सुलझी हुई लडकी के दिमाग मे' अचानक यह क्या ख्याल समाया था कि वह अचानक दिल्ली जाने पर तुल गई थी । अब तो सीट भी कांफर्म हो गई थी। और वह ऊपर अपना सूटकेस तैयार कर रही थी ।

इस बीच गगा' मौसी, अपने तौर पर बलदेव राज क्रो कई बार फोन लगा चुकी थी। मगर उधर कोई उठा ही नहीं रहा था। यही लगता था घर बद है और वे सब कहीं चले गए हैं।

गंगा मौसी कितनी देर से अपने पलग पर पाव लटकाये बैठी थी। दिल बेचैन था। वह बलेदव को फौरन हालात से आगाह कराना चाहती थी l पर उनसे सम्बन्ध स्थापित करने में सफलता नहीं मिल रही थी ।

फिर अपनी इसी चिन्ता में वह एकाएक जाने क्या सोच मुस्करा दी । बडी फीकी-सी मुस्कान थी ।

बलदेव और वह तो शायद एक नदी के दो भिन्न किनारे थै । दोनों ने ही यूं ही एक-दूसरे के साथ लेकिन एक दूसरे से दूर...पूरी जिन्दगी गुजार दी थी । आज प्रयलोपरान्त सम्बन्ध स्थापित नहीं हो रहे थे-उनकी जिन्दगी भी गुजर गई थी । बिना तार मिले I

गगा मौसी की नजरें बार-बार फोन की तरफ उठ रही' थीं I और उनकी वर्तमान परेशानी में अपने अतीत के भुले-बिसरे अहसास एक कसक बन उभर रहे थे।

बडी. ही विचित्र-सी मनोदशा का शिकार थी अब वह ।

तभी एकाएक फोन की घन्टी बजी। उन्होंने एकदम से हाथ बढाकर… रिसीवर उठाया।

"हैलो! कौन है?" जाने किस अहसास के वशीभूत ही उ…होंने तडपकर पूछा था ।

"बलदेल ।।।"

" आप कहा है? मै कब से आपको कान्टेक्ट करने की कोशिश कय रही हूँ।"

"में मॉडल टाउन गया हुआ था कृष्णकात' के यहां । मैं मौका निकालकर घर आया हूँ। ताकि तुम्हें फोन कर सकू' ।"

"आप इतने परेशान क्यो हैं?" गगा मोसी ने तेजी से पूछा--"कुशलता तो है? "

' 'वहुत बुरी खबर है, गगा' । ' ' उधर सै बडे ठण्डे और गहरे सास की आवाज आई।

' 'हे भगवाना क्या हुआ?" गगा मौसी का दिल धक्क से रह गया।

"रेखा कहा' हे। उसे बुलाओ और जितनी जल्दी हो सके दिल्ली भेज दो।”

"आखिर क्यो... ? तुमने मेरे सबाल का जवाब नहीं दिया । क्या हुआ है। "

रेखा के पापा अब नहीँ रहे है। उन्हें किसी ने कत्ल कर दिया है। " बडी ही धमाका खेज खबर थी ।

"हे प्रभु! " गगा मोसी ने अपना दिल पकड़ लिया, फिर खुद क्रो सम्भालते बोली--" बलदेव, यह केसा विचित्र सयोग है. . . । "

"कैसा संयोग'?"

' 'रेखा खुद दिल्ली जाने के लिए तडप_ रही है। शाम की फ्लाईट से उसकी सीट बुक हो चुकीं है। और इस वक्त वह अपना सामान पेक का रही है । मै दरअसल इसी सिलसिले में फोन पर तुमसे बात करना चाहती थी कि उसे दिल्ली भैजू' या न भेजू?"

बलदेव राज ने गहरी सास' ली । वोला-"दिल को दिल से राह होती है गंगा ! उसे आने दो मैं एयरपोर्ट पर रिसीव कर लूगा' । अब मुझें यह मशविरा दो कि उसके बाप की मोत कीं सूचना उसे अभी दे दू या उसके दिल्ली पहुचने के बाद. . . I ' '

"मुझे तो लगता है कि उसे अपने बाप की मौत की इतला मिल चुकीं है। ' '

"वह कैसे...?? ' ' बलदेव हैरान हुआ था ।

' ' यह तो नहीं जानती l लेकिन यह उसका अचानक ही दिल्ली के लिए रवाना होने का फैसला करना और उसकी उदास बेचैन हालत इस बात्त का सबूत है कि उसके दिल ने इस हादसे को किसी न किसी तरह महसूस कर लिया है I ' '

”हैरत की ही बात है । ' ' बलदेव राज बडबड़ाया । फिर बोला---------- ' 'खैर, तुम ऐसा करना गगा कि चलते वक्त उसके इस अहसास को और गहरा कर देना । ताकि यहां मुझसे यह हौलनाक ख्वय सुन कोई गहरा शॉक न लगे। तब तक वह खुद को ऐसी किसी भी ख़बर के लिए सम्भाल चुकीं होगी । ' '

‘ 'ठीक है । मै उसे बता दूगी किं आपका फोन आया था और आप उसे रिसीव करने एयरपोर्ट पर मौजूद होंगे... l ' '

' 'में रखता हूँ. . I ' ' बलदेव राज ने कहा और रिसीवर रख दिया ।

और फिर... I

शाम को जब रेखा घर से रवाना होने लगी तो गंगा मोसी ने उसे गले सै लगाकर बस इतना ही कहा--

"तुम्हारी यह बेचैनी और एकदम से दिल्ली जाने का फैसला...मेरा तो दिल बैठा जा रहा है बेटी! कभी कभी दिल अज्ञात अन्देशों के कारण ही फैसला करता है । भगवान न करे, तुम्हारी यह बेचैनी भी कुछ, ऐसी ही हो । अपने दिल की गवाही पर तुम दिल्ली जा रही हो ता इस दिल को काबू में रखना । हौंसले से काम लेना । शायद वहां पहुचक तुम्हें कोई बुरी खबर सुनने को मिलै । ' '

' 'मैं बुरी से बुरी खबर सुनने के लिए भी तैयार हूँ मौसी! मुझमें बड़ा हौसला है। आप चिन्तित न हो । ' ' यह कहकर रेखा, अमर के साथ गाडी में बैठ गई।

और गाड़ी ने एयरपोर्ट का रुख किया।

दिल्ली के एयरपोर्ट पर अंकल बलदेब रेखा के प्रतीक्षक थे।
 
रेखा के गेट से बाहर निकलते ही वह उसकी तरफ लपके। उनका जी चाहा कि वह रेखा से लिफ्ट कर रो पडे । कृष्णकांत रिश्तेदार के अलावा बलदेव राज का वहुत प्यारा दोस्त था और आने वाली उसके इस दोस्त का खून थी I उसे लिपटाकर न रोते तो फिर किसे लिपटकर रोते।

बलदेव राज की हालात बुरी हो रही थी । उसने अपने आप को सम्भाला और रेखा के सिर पर हाथ रखकर उसे हल्का-सा गले सै लगाया और बोले---

' 'केसी हो रेखा । ' '

रेखा ने जवाब देने के बजाय उनकी आखों' में झाका और बडे सजीदा लहजे में पूछा--' 'मेरे पापा कीं मौत कैसे हुई?"

यह सुनकर बलदेव राज हडबडा ही तो गया। वह तो यही सोच कर परेशान और हलकान होता रहा था कि वह रेखा को उसके बाप की मौत की खबर किन शब्दों में और केसे देगा ।

लेकिन रेखा तो जैसे उस मजिल से आगे निक्ल चुकीं थी । तो क्या गंगा ने उसे सब कुछ बता दिया?

' 'तुम्हारी गंगा मौसी ने तुम्हें क्या बताया? ' ' उसने धीमे स्वर में पूछा था।

"खाला ने तो मुझे कुछ भी नहीँ बताया । यह भी नहीं कि मेरे पापा मर चुके हैं। ' ' बडा अजीब-सा लहजा था रेखा का ।।

' 'फिर तुम्हे केसे मालूम हुआ कि तुम्हारे पापा का देहान्त हो चुका है?''

"देहान्त नहीं...खून कहिये खून...'! मेरे पापा का खून हुआ है । ' ' रेखा बडे ही रहस्यमय अन्दाज के साथ बोली थी।

"आह... ! ' ' अंकल बलदेव राज का मुह मारे हैरत के खुल गया, "आओं चलो। रास्ते में तुम्हें सब कुछ बताता हूँ। "

रेखा के पापा कृष्णकात मॉडल टाउन बाली अपनी कोठी में अकेले रहले थे। अब उनकी उम्र भी किसी का मुकाबला या विरोध करने वाली नहीं थी । उनकी हत्या कर देना कोइ कठिन काम नहीं था।

कोठी में उनके साथ सिर्फ एक नौकर और नौकरानी ही तो थे। दोनों मियां-बीवी थे और कृष्णकात के बहुल पुराने मुलाजिम थे ।

घनश्याम और राघा की वेटी थी जो शादीशुदा थी। रात क्रो अचानक उन्हें अपनी बेटी के एक्सीडेन्ट की सूचना मिली तो वे कृष्णांत से इजाजत लेकर अपनी बेटी के घर शाहदरा चलै गए। उनकी बेटी अस्पताल से घर पहुच चुकीं थी ।

बस यह रात ही कयामत की थी ।

हत्यारा शायद घात लगाए बैठा था I सुबह को दूध वाले ने बैल बजाई। कोठी का फाटक खटखटाया और कोई बाहर न निक्ला तो उसे फिकर हुई, क्योकि ऐसा आज़ तक नहीं हुआ था। उसने बराबर बाली कोठी बालों को बताया, जब लोगों ने गेट के अंदर कूदकर देखा तो कोठी का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था और कृष्णकात खून सै लथपथ पड़े थे। उनके दाए हाथ मे रिवाल्वर दबा हुआ था ।

कातिल ने भी आत्महत्या का केस बनाने कीं कोशिश क्री थी । गोली कनपटी में लगी थी। गोली बहुत करीव से चलाई गई थीं । वाई कनपटी में सुराख हो गया था और गोली अन्दर ही कही फंसे गई थी । हत्यारे से बस यहीँ चूक हो गई थी । सुराख बाई तरफ था, जबकि उनका रिवाल्वर उनके दाए हाथ में पकड़ा हुआ था।

प्रारम्भिक तफतीश से ही यह बात साफ हो गई थी कि कृष्णकांत साहब ने आत्महत्या नहीं क्री-बल्कि उन्हे मारा गया है । कृष्णकान्त उम्रदराज बूढे जरूर थे। लेकिन उम्र के लिहाज से उनका स्वास्थ्य ईष्या योग्य था । फिर उनके आत्महत्या करने की कोई वजह भी सामने नहीं थी। ऐसे में उन्हें आत्महत्या करने की जरूरत ही क्या थी?

अपने बाप क्री हत्या की कहानी सुनकर रेखा गुमसुम हो गई। वह तो जैसे पत्थर कीं होकर रह गई थी ।

बलदेव अंकल उसे रास्ते भर सात्वना देतें रहे...समझांत्ते रहे। वह खामोशी से सब सुनती रही और खाली-खाली निगाहों से अंकल को देखती रही।

मॉडल टाऊन की बह कोठी जहां कृष्णकांत' कीं हत्या हो गई थी रिश्तेदारों, प्रियजनों व शुभचिन्तको से भरी हुई थी। रेखा के चाचा रमाकांत का पूरा परिवार मौजूद था और उनका नाटक जारी था।

हां, भाई के गम में रमाकात की बुरी हालत थी । उस पर बार-बार गशी के दौरे पड़ रहे थे। उसके बेटे उसे सभाल' रहे थे।

' ' पापा! यह क्या कर रहै हैँ?" बडा बेटा कई बार पूछ चुका था।

पर रमाकात तो जानता था कि यह नोटकी जरूरी है I वेसे भी उसे बलदेव राज कीं अनुपस्थिति खल रही थी।

रमाकांत अपने तोर पर ही सोच रहा था । उसे इसी बात की फिक्र हो रही थी कि बलदेव राज इस वक्त कहा है और किसे लेने गया है। रमाकांत दो आसू बहाकर बाजी जीत लेना चाहता था। सावनपुर की जायदाद तो उसके कब्जे में थी ही-अब माडल टाऊध की यह कोठी और रेस्टोरेन्ट भी उनका होने वाला था । क्योकि अपने बडे आई कृष्णकांत का बारिस अब वही तो था।

उसकी शातिर मसूबाबन्दी आखिर कामयाब हो गई थी । और वह अपनी इस कामयाबी पर जितना भी खुश होता कम था । लेकिन यह वक्त तो रोने का था और वह रो रहा था। सिसक-सिसक कर रो रहा था । रह-रह कर बिलख रहा था l

अंकल बलदेव राज की पढाई, हुई पट्टी के मुताबिक-रेखा खामोशी से औरतों में एक तरफ जाकर बैठ गई। चेहरा दुपट्टे से ढका हुआ था ।

अर्थी उठाई जाने से पहले मरने वाले का चेहरा दिखाया गया । शब कमरे में रखा था।

दिवगत के चरण स्पर्श करने वाले, आखिरी बार उनका चेहरा देखने वाले एक दरवाजे में प्रवेश करके चेहरा देखते हुए दूसरे दरवाजे से निकल रहे थे ।

जब घर की औरतों की बारी आई तो रेखा भी उन औरतों में शामिल थी। वह शव के निक्ट पहुचते ही अपने हवास गवा बैठी । सोचा-समझां सब कुछ भूल कर वह अपने बाप के शव पर झुक गई और चीख मारकर रोने लगी। वर्षा उसके साथ थी जो उसे संभालने की कोशिश कर रही थी।

तभी दरवाजे पर रमाकात दिखाई दिया । बह शायद रेखा की चीख सुनकर आगे बढ़ आया था।

औरतें उसे देखकर इधर उधर होने लगी । लगातार विलाप करती रेखा के पास पहुचकर' झुका और उसके भद्दे और खुरदरे हाथ की गिरफ्त रेख के नर्म कोमल हाथ पर मजबूत होती गई।

बिलखती हुई रेखा एकदम खामोश हो गई।

उसने पहले आपने हाथ कौ और फिर हाथ पकड़ने वाले को देखा, फिर बडे ही सर्द लहजे में बोली… ''चाचा रमाकांत! अपना गन्दा हाथ परे कर लो। "

रमाकात से इस अंदाज में और इस तरह बात करने बाला आज तक पैदा न हुआ था। वह तो सावनपुर का हुक्मरान था। ऊँचा बोलना तो दूर की बात थी लोग सामने सिर उठाकर बात नहीं करते थे । तो फिर यह आज...आज किसकी शामत आई। बोलने वाली का न सिर्फ अंदाज सख्त था बल्कि जो शब्द उसने उगले थे, वे शब्द नहीँ थे, तीर थे, जो रमाकांत के दिल में जा फसे थे।

रमाकांत धूर्त इन्सान था ऐसा शातिर नौटकीबाज जो साप क्रो लाठी तोडे… बिना मारना जानता था । इस लकडी ने जो कहा वह उसने अच्छी तरह सुन लिया था । सुन लिया था और यह अदाजा भी लगा लिया था कि बोलने वाली यकीनन कोई चीज है । जो उसने उसका नाम लेकर इतनी बडी बात यूं आसानी से कह दी थी ।

पर मौके की नजाकत का अहसास था रमाकांत को । उसने अपना हाथ फोरन हटा लिया-जेसें किसी गलतफहमी में ही उसने रेखा का हाथ पकड़ लिया हो ।

उसके हाथ छोडते. ही रेखा सीधी खडी, हो गई। उसने काखियों से रमाकांत की तरफ' देखा। रमाकांत' बडे गौर से उसी के चेहरे को देख रहा था । फिर रेखा वहां रूकी नहीं-ओरतों को हटाते हुए अन्दर चली गई।

रमाकांत ने आदतन_ ही अपनी भारी पूछो पर हाथ फेरा और पलट लिया।

किसी और औरत ने रेखा की बात सुनी हो न सुनी हो...लेकिन वर्षा ने तो वह सब भली भाति' सून लिया था। वर्षा हैरान रह गई थी। वह रेखा की हकीकत से अनजान थी, वह तो उसे अकल रामदास कीं वेटी ही समझती थी ।

यह वर्षा अकल बलदेव राज की भाजी थी I बहन के विधवा हो जाने के बाद बलदेव राज ने दोनों मां बैटी क्रो अपने पास बुला लिया था, अब वहीं उन दोनों के अभिभावक और सरंक्षक थे। वर्षा बदहवास हो उठी थी, वह तेजी से अपने मामू की तलाश में निकली, वह इस खतरनाक बात को अपने मामू के कानों तक पहुचा देना चाहती थी ।
 
इधर रमाकांत को भी बलदेव राज की तलाश थी। वह जानना चाहता था कि आखिर यह गुस्ताख लडकी, है कौन? अगर बलदेव राज की बेटी हे तो उसका कृष्णकांत के शब से लिपटकर रोने का क्या मतलब? यह अब तक कहा थी? इतनी देर से क्यो पहुची? और सबसे बडा जवाब तलब सवाल तो यह था कि उसने, उसे इस कद्र नफरत से हाथ हटाने को क्यों कहा? यानी कि रमाकांत रेखा को लेकर परेशानी का शिकार था I

रमाकात से पहले बर्षा ने अपने मामू क्रो खोज लिया था, वह बलदेव राज को एक कोने में ले गई और उन्हें सारा माजरा कह सुनाया I बलदेव राज परेशान हो उठा।

"तुम रेखा को मेरे पास लेकर आओ । " वह इतना ही कह सका था I

बर्षा पलट ली थी I बलदेव राज बेचैनी से उसकी इतजार करनै लगा I फिर कुछ ही देर बाद रेखा, वर्षा के साथ आती नजर आई I सफेथ दुपट्टे में उसने अपना आधा चेहरा ढक. रख था । ' बलदेव राज ने इधर उधर देखा और फिर कुछ सोचकर तेजी से सर्वेन्ट क्वार्टर की तरफ बढ गया । वर्षा और रेखा भी उसके पीछे वहा गई। कृष्णकांत का नौकर घनश्याम अपनी बीबी राधा के साथ कोठी में ही था ।

"हा क्या हुआ? “ बलदेव राज ने पूछा ।

"वर्षा आपको बता चुकीं है। " रेखा ने भावहीन स्वर में जवाब दिया ।।

"तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिये था। मैने पूरे रास्ते तुम्हें इतना समझाया भी... ।।"

"उसने मेरा हाथ पकड लिया था। मैं बस अपना गम भी भूल गई और उस पर बरस पडी ।। " रेखा ने सफाई पेश की।

"हैरत है-उसने जवाब में कुछ न कहा। "

"अच्छा हुआ कि वह कुछ न बोला। वर्ना मैं भी उसै बता देती कि में कौन हूँ?”

"वह बहुत चालाक है। " बलदेव राज हाथ मलते बोला-"तुम खुद पर काबू न रख पाई और अपने पापा के शव से लिपटकर रोने लगीं । उसे उसकी खबर मिली तो वह फोरन वहां पहुचा । उसने हाथ पकडकर, उठाना चाहा कि तुम से पूछ सके कि तुम कौन हो? लेकिन तुम्हारे दुस्साहस ने उसके होश उडा, दिये I यह...यह्र ठीक नहीँ हुआ है बेटी। अब उसका शक यकीन में बदल चुका होगा और वह तुम्हारी तलाश में तो है ही... I " बलदेव राज ने अंदाजा लगाया था

जो बिल्कुल ठीक था ।

"मैं उससे कब तक छिपूंगी?" रेखा बोली। यह सवाल भी था और रेखा का वह संकल्प भी जो वह कर चुकीं थी।

"तुम नहीं जानती हो-वह कितना सगदिल और क्रूर आदमी है । " अंकल बलदेव ने उसे समझाने की कोशिश की।

"मैं उससे ज्यादा सगदिल ओर क्रूर बन जाऊगी। " रेखा ने समझने से इंकार कर दिया।

"हम कानूनी लडार्ह_लडेगे । " बलराज दबी जुबान में बोला--- ''जायदाद के कागजात और वसीयत हमारे वकील के पास मौजूद हैं I कल वकील साहव यहा आएगे' I बसीयत सबके सामने पढकर सुनाई जाएगी। मैं जानता हूँ कि तुम्हारे पापा की 'बिल’ में क्या है? मैं खडे होकर ऐलान कर दूगा कि कृष्णकांत का वारिस कौन हे । खैर, यह तो कल की बात है । फिलहाल, मैं चाहता हूँ कि तुम वर्षा और उसकी मम्मी के साथ अभी घर चली जाओ। मैं तुम लोगों के पहुचने का इतजाम कर देता हूँ। आओ, मेरे साथ।। "

बलदेव राज़ क्वार्टर से बाहर निकल आया। उसने रेखा को अपनी बहन और भाजी के साथ अपनी गाडी में अपने घर को रवाना कर दिया ।।

ड्राईवर उन्हें गाडी में चुपचाप निकाल ले गया था। यह काम इतनी तत्परता व गोपनियता के साथ हुआ कि वह गुस्ताख़ लडकी जो शब से लिपटी विलाप कर रही थी अब यहां क्रोठी मे नहीं है।

उन्हें रवाना कर, बलदेव राज ने राहत की सांस ली थी । शुक्र था कि रेखा ने उसकी बात खामोशी से मान ली थी I जाने सै इकार' नहीं किया था।

बलदेव राज ने अदर आते ही अर्थी उठाए जाने का इशारा किया। यूं रमाकांत को उससे बात करने का मौका नहीं मिला। श्मशान घाट पर अन्तिम क्रियाकर्म में रात के आठ बज गए और वहां से निकलते ही बलदेव राज ने अपने घर का रूख किया । पहले उसका इरादा रात को मॉडल टाउन वाली कोठी पर ही रहने का था लेकिन इन बदली हुई परिस्थितियों में उसने रमाकांत से दुर ही रहना उचित समझा था।

और फिर...., अगले दिन खानदान के बड़े-बुजगों के बीच वकील साहब ने वसीयत खोलकर पडी । इस वसीयत के अनुसार मॉडल टाऊन की कोठी व मालरोड का रेस्टोरन्ट रेखा के नाम किया गया था । सावनपुर क्री जमीन-जायदाद का हकदार रेखा के भाई इन्द्रजीत को ठहराया गया था। यह भी स्पष्ट कर दिया गया था इन्द्रजीत के न मिलने की सूरत में रेखा ही जायदाद के उस हिस्से की स्वामिनी होर्गी।

यह वसीयत रमाकात के सिर पर किसी पत्थर कीं तरह लगी I वह यह वसीयत सुनते ही किसी बावले कुत्ते की तरह काटने को दौडा । उसने वसीयत की नकल फाडर पुर्जे-पुर्जे कय दी और फुफकारता हुआ कोठी से निकल गया।

बलदेव राज को अब रेखा की फिक्र थी I रमाकांत अब बावला हो चुका था, वह किसी भी वक्त रेखा को काट सकता था I अंकल बलदेव राज ने पहला काम यही किया कि जो भी फ्लाईट उप्लब्ध हो सकी-उससे ही रेखा को बगलोर वापस भेज दिया । यूं बह्र चौबीस घन्टे के अंदर वापस बंगलौर पहुच' गई ।

रेखा वापस नहीं जाना चाहती थी। अंकल बलदेव उसे स्वर्गीय बाप की कसम देकय ही उसे बापस भेज सका था।

बलदेव राज ने उसे समझाया था… -रेखा बेटी! तुम्हारे बाप ने तुम्हारी जिन्दगी बचाने को ही अपनी जिन्दगी नर्क बना ली थी । तुम्हारी जिन्दगी की हिफाजत के लिए ही तुम्हें मरा घोषित कर दिया था l पूरी जिन्दगी तुम्हारे लिए तरसते रहे। लेकिन अपनी हसरतों व मुहब्बत के लिए तुम्हें मौत में धकेलना पसन्द न किया। अब तुम चाहती हो कि में तुम्हें अपनी जान खतरे में डालने की इजाजत दे दूं। तुम्हें भेडियो की भेट चढा दूं । वह मुझें तुम्हारा अभिभावक गार्जियन बनाकर गए हैं।। भगवान न करे तुम्हें कुछ हो गया तो उनकी आत्मा किस कदर तडपेगी । रेखा, तुम्हें तुम्हारे स्वर्गीय बाप की कसम, तुम्हें वापस बंगलौर जाना होगा । तुम्हारी तरफ से कानूनी लडाईं_ लडने. के लिए मैं यहां मोजूद हूँ। तू इत्मीनान रख मेरे होते हुए तुमसे तुम्हारा हक कोई नहीँ छीन सकता ।"

और इसका जवाब रेखा ने यूं दिया था'--!ठीक है, अंकल में चली जाती हूँ। लेकिन यह बात में अच्छी तरह जानती हूँ कि मेरे भाई इन्द्र का अपहरण मेरे इस चाचा रभाकात ने ही किया है और मेरा विश्वास है कि इन्द्र जिन्दा है, और रमाकात ही के कब्जे में है I अकल में जमीन-जायदाद पर लानत भेजती हूँ-मुझे अपना भाई चाहिये। में उन्हें दुढना चाहती हूँ। अगर वह मुझे मिल गए तो में यहां से वहां तक एक एक को देख लूंगी । "

' 'रेखा बेटी! मैं इस मामले में तुम्हारी हर मुमकिन मदद करने को तेयार हूँ। भगवान ने चाहा तो इन्द्रजीत भी जरूर आएगा । तुम फिक्र न करो। अच्छा जाओ पलाईट का वक्त हो रहा है । अपना ख्याल स्खना... ।" बलदेव राज ने रेखा को गले लगा का भावभीनी विदाई दी थी I

"बॉय अक्ल'... I. ' ' रेखा की आखें भर आईं। वह अपने आसू पीते हुए तेजी से रनवे की तरफ बढ़ गई थी। रेखा जहाज में पहुचकर पेचौ ताव खाती रही।
 
उसे एक तरफ अपने बाप की मौत का गहरा सदमा था तो दूसरी तरफ इस बात का दुख था कि वह कायरों की तरह वहां से जान बचाकर भाग आई थी। अंकल बलदेव ने उसके साथ बड़ा जुल्म किया था। खामखाह पापा की कसम दी । ऐसे में उसे दिल्ली छोडनी ही थी ।

वह दिल्ली छोड आई थी। जालिमो और साजिशों के लिए खुला मैदान छोड दिया था। चाचा रमाकात के प्रति तो उसके दिल में ऐसा आक्रोश था कि जी चाहता था कि फोरन जहाज से छलाँग लगाकर सावनपुर

पहुचे और अपने चाचा रमाकात पर गोलियों की बरसात करके उसे सचमुच की छलनी बना दे I

काश! ! वह लडका. होती तो अकल बलदेब यूं भयभीत होकर उसे बंगलोर रवाना हर्गिज न करते । वह इस वक्त अपने बाप की कोठी में होती और वहां बैठकर दुश्मनों के खिलाफ प्लानिंग कर रही होती ।

इन्ही बिफरी सोचो के दोरान उसने खुद क्रो बहलाया, सोचा कोई बात नहीं है। वह लडकी. होकर भी ऐसे दुस्साहस दिखाएगी कि रमाकात के होश उड जाएगे । अपने चाचा के होश तो उसने उस वक्त उडा. दिए थे जब चाचा ने उसका हाथ पकड़ा था।। उसकी डाट सुनकय वह केसा भीगी बिल्ली बन गया था।

इस अहसास ने रेखा को बडा सुकून बख्शा । बहरहाल रेखा बगलोर पहुची तो उसे रिसीव करने क्रो एयरपोर्ट पर अमर मोजूद था।

अमर का उदास चेहरा देखकर ही रेखा को याद आयी कि वह दिल्ली से अपने बाप का क्रियाकर्म करके आ रही है। रेखा करीब आई तो अमर धीमे से बोला....

"बड़ा अफसोस हुआ, रेखा । "

' 'हां, भैया! मैं बडा अनूठा नसीब लिखाकर लाई हूँ। सब ख़त्म हो गया. भाई! सब रेखा क्री आखों में आसू चमकने लगे ।

"रेखा कुछ खत्म नहीं हुआ। हम इन्सानों की जिन्दगिंयां एक दूसरे के पास प्रभु कीं अमानत हैँ। जो देता है वही लेने का भी हक रखता है। उसने अपना हक इस्तेमाल कर लिया । अब आपको सब करना होगा।" अमर ने उसे ढाढस देने की कोशिश की ।

रेखा कुछ न बोली। जबाब देती भी तो क्या?

"में गाडी लेकय आता हूँ। तुम यहीं रहो।"

अमर चला गया ।

रेखा वहीँ बरामदे के गेट पर अमर का इतजार करने लगी। अमर गाडी लेकर आया तो रेखा यह देखकर चकित रह गई कि पिछली सीट पर गंगा मोसी भी मौजूद थीं । गाडी रूकी तो उन्होंनै दरवाजा खोल बाहर आना चाहा, लेकिन रेखा ने उन्हें गाडी से उतरने का मोका नहीं दिया । रेखा गाडी. में समा गई तो बैठे-बैठे ही गगा मौसी से लिपट गई । उसकी सिसकिया बंध गई।

अमर ने घूमकर तसल्ली देते हुए कहा--- "रेखा, प्लीज !! रोयें नहीं।"

फिर उसने गाडी सै उतरकर रेखा का सामान डिग्गी में रखा। फिर स्टेयरिंग पर आ बैठा। इस ब्रीच रेखा ने खुद को संभाल लिया था ओर अपनी तरफ का दरवाजा भी बन्द कर लिया था । अमर ने गाडी, आगे चढा दी I

रेखा सारे रास्ते गगा' मौसी के कंधे पर अपना सिर रखे बैठी रही और गंगा मौसी बडे दुलार और प्यार से ही उसके सिर पर अपना हाथ फेरती रही ।

घर पहुचे और यहा भी रेखा रात गए तक गंगा मोसी के कमरे में बैठी रही । रेखा ने अपनी जिन्दगी का सारा काला चिट्ठा गगा मौसी के सामने खोल दिया ।

रेखा की जिन्दगी एक पहेली और एक सिर दर्द बनकर रह गई थी । उसकी रहस्यमय जिन्दगी अब खुद उसके लिए एक बोझ बन गई थी । रेखा ने फैसला किया कि अब वह पहेली बनकर न रहेगी और अपने हर हमदर्द के सामने अपनी हकीकते जाहिर कर देगी।

अमर जो रेखा के बारे में कुछ भी नहीं जानता-आज की रात वह भी सब कुछ जान गया था । यह भी समझ गया था कि अब रेखा क्रो अत्याधिक सुरक्षा की जरूरत है।। रेखा की आप बीती ने अमर को उलझा भी दिया था।

रात के लगभग तीन बजे जब रेखा अपने कमरे में जाने के लिए उठी तो गंगा मौसी ने उसका हाथ पकडकर बैठा लिया-बोली

"अब ऊपर जाकय क्या करोगी । यहीं सो जाओ।”

"हां, मौसी यही बेहतर रहेगा I" अमर बोल उठा और फिर खुद कमरे से निकल गया ।

अमर के जाने के बाद गगा' मोसी ने दरवाजा अन्दर सै बन्द कर लिया।

रेखा उनके बाजू पर सिर रखकर लेट गई और जल्दी ही नींद की गोद में पहुच गई ।
 
वह रात रेखा ने गंगा मौसी के कमरे में ही गुजारी।

सुबह जब रेखा की आख खुलीं तो, गगा मोसी नहा धोकर मन्दिर जाने के लिए तेयार थी ।

, रेखा को जाग गई देख मौसी मुस्कराते हुए बोली--' 'जाग गई बेटी! शायद लाईट जलाने से आख खुल' गई है तुम्हारी । … लाइट आँफ कर दूं।"

, ' 'नहीं मोसी! ' ' वह पलग से उतर आई थी। ' 'मैं अपने कमरे में जाती हूँ।“

"जैसी तुम्हारी मर्जी'। " मोसी चली गई।

रेखा ऊपर अपने कमरे में आ गई। उसने भी नहा धोकर मन्दिर जाने का मन बनाया था। ताकि मन को शान्ति प्राप्त हो सके। पर वह अपने कमरे में पहुची तो नीद फिर जोर मारने लगी। वह यह सोचकर थोडी देर लेट जाऊ फिर उठकर नहाती हूँ लेटी तो ऐसी सोई कि सुबह नौ बजे आख खुलीं।

फिर लगभग साढे नौ बजे वह नहा धोकर बाथरूम सै निकली तो माया को अंदर आते देखा I

"आओं माया। कैसे आई? ' ' रेखा ने भारी मन से पूछा था। उसकी उदासी दूर नहीं हुईं थी। दिलो दिमाग पर एक बोझ सा था।

' 'आपका नाश्ता यहीँ ले आऊ बीबी?” वो शायद यही पूछने आई थी।

' 'नहीं में नीचे ही आ रही हूँ नाश्ता मौसी के कमरे में करूगी। ' '

फिर रेखा जब गंगा' मौसी के कमरे में पहुची' तो उसने देखा कि मौसी अखवार देख रही थी । वह मोसी के निकट आ बैठी।

”साढे आठ बजे के करीव बलदेव राज का फोन आया था। मैंने तुम्हें बुलवाया तो तुम सो रही थी, सो तुम्हें उठाना उचित्त नहीँ समझा। फिर बलदेव राज ने भी तुम्हें उठाने से मना कर दिया। बलदेव ने बताया है कि तुम्हारे चाचा अपने परिवार के साथ वापस जा चुका है। जाते-जाते वह बलदेव को धमकियां दे गया है।"

' 'किस किस्म की धमकी?" रेखा ने पूछा।

"यहीँ कि वह बलदेव राज पर मुकदमा दायर करेगा कि रेखा उसके बडे भाई कृष्णकांत की असली बेटी नहीं है और यह सारा स्वाग बलदेव राज ने रचाया है ताकि माडल टाउन वाली कोठी और रेस्टोरेन्ट पर कब्जा कर सके । ' '

' ' अंकल बलदेव तो यह सुनकर परेशान हो गए होंगे? ' '

"अरे नहीं तुमने बलदेव राज को क्या समझा है l वह भी अपनी ही किस्म का बड़ा निडर और जिद्दी इन्सान है, शरीफ और नेकदिल है लेकिन उस वक्त तक जब तक सामने वाला भी शराफत दिखाए।"

' 'काश! ! मेरे पापा भी ऐसै ही होते । शरीफों के लिए शरीफ और बदमाशों के लिए बदमाश !"

' 'तुम अपने पिता की क्या बात करती हो वह तो बहुत ही प्यारे इंसान थे देवत्ता थे देवता । शरीफों के लिए तो शरीफ थै ही बदमाशों के लिए भी शरीफ थे। मैं तुम्हारे पिता क्रो बडे सम्मान की निगाह से देखती हू। आज के इस फरेबी दोर मे ऐसै लोग ढूंढे नहीं मिलते । ' ' गगा मोसी ने बडी श्रद्घा से कहा ।

ये बातें चल ही रही थीं कि माया नाश्ता लै आई।

" बडी देर कर दि तुमने माया l ' '

“बडी बीवी ! सब कुछ ताजा बनाकर लाई हूँ। इसलिए थोडी देर हो गई ।।' ' उसने ट्रे बैड पर रखनी चाही ।

' 'नीचे कालीन पर । " रेखा ने उसे टोका और फिर व्यजनों से भरी ट्रे को देखते हुए बोली-- ' 'भई यह कितने लोगों का नाश्ता बना डाला तुमने ।।' '

"सिर्फ आपके लिए जी। ' ' माया ने मासूमियत से कहा ।

गंगा मौसी बोल उठी---"ज्यादा कहा है !! कर लो। तुमने रात को भी मुश्किल से दो निवाले खाए थे।" …

रेखा ने नाश्ता किया और फिर ऊपर अपने कमरे मेँ चली आई।

उसका सूटकेस अभी तक बद पड़ा था। सूटकेस खोलकर उसने अपने कपड़े निकाले और उन्हें अलमारी में रख दिया। सूटकेस में सबसे नीचे वह डायरी रखी थी । रेखा वह डायरी अपने साथ दिल्ली ले गई थी। दिल्ली उसने जिज्ञासा-वश ही डायरी कई बार खोलकर देखी थी लेकिन कुछ लिखा नजर नहीं आया था।

रेखा… चाहती थी कि उसे पापा के बारे में कोई इशारे मिलें कि उनकी हत्या किसने की है? लेकिन डायरी सादा व साफ ही रही थी। उसने डायरी को कैसटों के बीच रखनी चाही पर तभी उसने ऐसै ही डायरी के पृष्ठों पर नजर डाली और अब उसके हैरत की सीमा न रही।

उसे डायरी में कुछ पैज लिखै नजर आए।

वह फोरन पलटी और बैड पर बैठ गई। फिर ख्याल आया दरवाजा खुला हुआ है। उसने जल्दी से दरवाजा बन्द क्रिया और फिर ब्रैड पर बैठकर डायरी का वह लिखा हुआ पृष्ठ पढने लगी, लिखा था

' 'हम जानते हैं कि तुम क्या जानना चाहत्ती हो। हम तुम्हें बताते हैँ कि तुम्हारे पापा कृष्णकांत' क्रो क्सिने कत्ल किया है । वाक्य में जवाब यह है कि रमाकात्त ने। हां तुम्हारा चाचा ही तुम्हारे पापा का कातिल है।"

"रमाकात उस दिन शाम क्रो सावनपुर सै दिल्ली पहुचा था। वह पूरे इतजामगसे आया था । तुम्हारे पापा ने उस शाम और रात के अपने सारे प्रोग्राम केन्सिल. कर दिए थे। और अपने रसोइये घनश्याम क्रो हुक्म दिया था कि वो रमाकांत की मर्जी का खाना पकाए? खाने इत्यादि से निवृत होकर जब कृष्णकांत बाहर लान में टहल रहे थे तो तब घनश्याम ने उसे अपनी बेटी के एक्सीडेन्ट की खबर दी। यह सूचना उसे फोन पर मिली थी कि बेटी घर से अस्पताल पहुच' चुकी थी । धनश्याम ने बेटी को देखने जाने की इजाजत चाही जो कृष्णकांत ने फोरन दे दी और साथ ही पांच सौ रुपये भी इसथत कर दिए । धनश्याम अपनी बीवी के साथ चला गया । उनके जाने के बाद तुम्हारे चाचा ने कहा---

' 'भाई साहब, आईए! आपसे कुछ बातें करनी हैं । ' '

कृष्णकात उसे अपने साथ लाउंज में ले आए और अपनी बडे बाजूवाली कुर्सी पर बैठ गये। वह प्राय: टी० वी० अपनी इसी कुर्सी पर बैठकर देखते थे। वह कुर्सी पर बैठ गए ओर उसने रमाकात' से पूछा I

' 'हा, कहो ! क्या बात करनी है? "

जवाब में रमाकात ने अपने ब्रीफकेस में से एक फाईल निकाली और उन्हे थमा दी और बोला--”भाई साहब, आप इन कागजात को पढना. चाहे तो पढ़ लें और ना पढना. चाहें तो भी कोई हर्ज नहीं है I आपको इन पर दस्तखत करने हैँ और हर सूरत में करने हैं। "

भाई के इस अदाज' पर वह चौंके । उसे सिर उठाकर देखा और पूछा' ''क्या मतलब है तुम्हारा? ' '

' 'भाई साहब! ! मतलब यह है कि अब मुझसे आपकी मोत का इतजार' नहीं होता। जो जायदाद मुझे आपकी मौत के बाद नसीब होगी-मै चाहता हूँ कि वह मुझें आपकी जिन्दगी में ही मिल जाए तो है... । ' '

' 'औहा तौ ये जमीनों के कागजात हैं? ' '

' 'जी, ये तमाम जायदाद के कागजात है। आपके दस्तख़र्तो के बाद यह सब कुछ मेरा हो जाएगा ।"

"तुमने यह कैसे समझ लिया कि तुम कहोगे और मैं इन कागजात पर दस्तखत कर दूगा।"

"भाई साहब ।। आप इस जायदाद का क्या करेंगे? कहा ले जाएगें।"

"इस जायदाद के वारिस मोजूद हैँ।"

" मौजुद हैं । ' ' रमाकांत ने दोहराया-- "क्या एक से ज्यादा हैँ?”

तुम्हारा चाचा यह सुनकर परेशान हुआ था। I

"हां-दो हैं। "

"कोन-कोन? जरा हम भी तो सुने...हमें भी तो पता चले। "

" मेरा बेटा इन्द्रजीत-वह एक दिन जरूर वापस आएगा । "

”और दूसरा?" रमाकात ने पूछा।

"दूसरे वारिस का मेरे मरने के बाद तुम्हें पता चलेगा । "
 
रमाकांत ने फोरन ही कोई जबाब नहीं दिया । उसने अपना खोला और रिवाल्वर निकालकर कृष्णकांत पर तान लिया और बोला

"चलो, तो फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ । ' '

' 'यह क्या बेहूदगी है। तुम पागल हो गए हो क्या? इस जायदाद के लिए तुम अपने _बडे भाई की जान लोगे?"

"जायदाद चीज ही ऐसी है, क्या कहूं?"

"तुम जानते ही कि मेरी जमीनें जिंदगी भर तुम्हारे कब्जे में रही हैँ। मेने कभी तुमसे हिसाब तक नहीं मागा । फिर भी तुम मेरी जान के पीछे हो । ' '

' ’तो फिर कर दीजिए ना साईन ताकि तुम्हारे हिस्से की जायदाद पूरी तरह से मेरी हौ जाए। तुम्हें आखिर जरूरत ही क्या है पेसे क्री? रेस्तरां से आपको अच्छी खासी आमदनी है आपके आगे कोई औलाद भी नहीं है। मेरा तो भरा पूरा परिवार है । ' '

' 'मेरा इन्द्रजीत लापता है-मरा नहीं... । ' '

' 'किस खुशफहमी में हैं आप । इन्द्र अब इस दुनिया में नहीँ है । ‘ '

कृष्णकांत ने उसे घूरते हुए पूछा---- "तुम यह केसे कह सकते हो? "

"आज' में आपको राज की बात बताए देता हू। तुम्हारे बेटे इन्द्र को जगल' से मेरे आदमियों ने उठाया था और उसे जहां पहुचाया था आज तक वहां से कोई वापस नहीं लौटा। ' '

कृष्णकांत आपा खो बैठा, बोला "कमीने-तूने मेरे बेटे को मार दिया। मैं तेरा खून पी जाऊँगा ।। ' '

वह कागजात कौ फौरन जमीन पर फेंककर उठने लगे तो रमाकात ने आगे बढ़कर रिवाल्वर उनकी कनपटी पर रख दिया ।

' 'भाई साहब ।। ज्यादा जोश में आने कीं जरूरत नहीं हे। होशमंदी का सबूत दीजिए और खामोशी से कागजात पर दस्तखत करदीजिए...।"

"किसी कीमत पर नहीं… । "

तुम्हारे पिता ने इस क्रूर व्यक्ति की आखों' में आखै डाल दी और बोले--"'कमीने ! जलील ! चलाओ गोली।"

' 'यह लो... । " रमाकात ने एक सैकेंड का भी इतजार नहीं किया। उसने गोली चला दी ।

और इस गोली ने कुच्छेक क्षणों में ही तुम्हारे पिता का काम तमाम कर दिया । यह रिवाल्वर तुम्हारे पिता का ही था । वह रिवाल्वर उसने कृष्णकात के दाए हाथ में थमाया.. कागजात समेटे और बड़े इत्मीनान से कोठी का गेट बन्द करके वहां से निकल गय् ओर रातों रात साबनपुर पहुच' गया।

रमाकात वास्तव में पूरी योजना ब्रनाक्रर आया था। उसने घर के नौकर घनश्याम को धमकी और दौलत की चमक से खरीद लिया था। वो मियां बीवी उसके इशारे पर ही चले गए थे।

उसकी बेटी का एक्सीडेन्ट नहीँ हुआ था ।

हालाकि कत्ल की इस वारदात का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है, लेकिन अगर धनश्याम ओर उसकी बीबी क्रो पुलिस के हवाले कर दिया जाए ती वे रमाकांत की आमद उसकी धमकी और एक लाख रुपये की पेशकश के बारे मे बताने _ में ज्यादा देर नहीं लगाएगे । वह एक लाख रुपया भी बरामद हो जाएगा जो रमाकांत ने घनश्याम क्रो दिया है। रमाक्तात' ने यह 'निर्णायक योजना इसलिए बनाई थी कि वह मामले क्रो आर-पार करने आया था ओर पार करके चला गया था ।

अच्छा हम चलते है-हमें गया वक्त न समझना.. .हम फिर आएगे'। यह सब डायरी में लिखा था । रेखा को उसकी उलझन का जवाब मिल गया था ।

और फिर वही हुआ। रेखा अन्तिम शब्दों पर नजर डाल रही थी कि शब्द हल्के होने शुरु हो गये थे I देखते ही देखते यह सब लिखा हुआ आखों से ओझल हौ गया। डायरी फिर कोरी की कोरी रह गई।

रेखा का ख्याल था कि यह हत्या उसके चाचा ने किसी भाडे के कातिल से कराई होगी। लेकिन यहा तो मामला और ज्यादा सगीन था । यह कत्ल चाचा ने अपने हाथो से किया था।

रेखा के दिल में अपने चाचा के प्रति रोष बढता गया । लगड़े प्रेत्त ने एक अति महत्वपूर्ण रहस्योंद्घाटन किया था कि पूरी जिन्दगी साथ निभाने वाला नौकर बिक गया था । पर यह कोई ऐसी हैरत में डालने बाली बात नहीं थी । जब दौलत जायदाद के लिए भाई ने भाई की इस निर्ममता सै ह्रत्या कर दी तो किसी गैर का लालच में आना क्या मायने रखता था ।।

रेखा ने सोचा कि उसे इस सूरते हाल से फौरन अक्ल बलदेव को आगाह करना चाहिए ।।

पर समस्या यह थी कि वह उन्हें अपनी इस जानकारी का स्रोत क्या बताएगी I यह तो बता नहीं सकती थी कि उसके पास एक ऐसी डायरी है जिसमे उसकी जिन्दगी के रहस्य सुलझ कय आ जाते हैँ और फिर वह शब्द खुद-ब खुद ही मिट भी जाले है।

यह विश्वास करने लायक बात भी न थी। किसी क्रो बताएगी तो खुद का ही मजाक उडवाएगी । सुनने बालों ने तो यही कहना था बाप की मोत के सदमें ने उसके दिमाग को प्रभावित किया है I यह लडकी. रो में वह गई है...पागत हो गई है ।

पर रेखा को विश्वास था कि अकल' बलदेव उसकी बात पर जरूर ध्यान देंगे। पुलिस खोजबीन कय रही है और पुलिस ने नौकर को भी यकीनन अपनी तफतीश मे शामिल किया होगा।

रेखा क्रे जहन में जाने क्या ख्याल आया कि उसकी आखों की चमक बढ़ गई। उसने अकल' बलदेव से फोन पर दिल्ली के माडल टाउन वाली कोठी पर बात करने का फैसला किया-क्योकि अकल बलदेव के वहीँ होने की सम्भावना थी ।

पर वहां का फोन नम्बर रेखा के पास नहीं था।

यह सोचकर कि इस बाबत गगा मोसी से बात करनी चाहिए-रेखा नीचे चली आई। गगा मोसी कालीन पर बैठी सोफे से पीठ लगाए कोई पत्रिका पढ रही थी' ।

"आओ बैटी! बैठो। ' '

' 'मौसी, बदलेब अकल सै बात करनी है।"

"पर अपने धर पर वह कहा होंगे?"

मौसी ने भी वही सोचा था जो रेखा का ख्याल था---”मेरा भी ख्याल है कि वह हमारी मॉडल टाउन बाली कोठी पर होंगे । पर बहा का फोन नम्बर कैसे मालूम हो? ' '

' 'बलदेव अक्ल के घर फोन करो शायद वर्षा या उसकी मम्मी घर पर हौं। उनसे मालूम हो जाएगा फोन नम्बर... । "

' ' गुड आइडिया... l ' ' रेखा बोली और उसने फोन उठाकर सोफे पर रख लिया और नम्बर लगाने लगी। नम्बर तुरंत ही लग गया । दो घटिया बजने के बाद उधर किसी ने रिसीवर उठाकर कहा--"हेलो ॥' '

'‘ रेखा ने वर्षा कीं आबाज फौरन पहचान ली. वह चहकी ' 'वर्षा...मैं रेखा बोल रही? ' '

''कैसी हो रेखा.. .? "

' 'मै ठीक । यह बताओ अकल कहां हैं? ' '

' 'मॉडल टाऊन ! वह तो सुबह के गये हुए हैं I ड्राईवर गाडी. लेकर बापस आने वाला है। मैं और मम्मी जाने वाले है। ' '

“फिर तुम एक काम करो, माडल टाऊध पहुंचकर अकल से कहना कि मुझे फोरन फोन करें। और हां, क्या तुम्हारे पास वहां का फोन नम्बर है?''

"हा है, तुम्हें चाहिये?"

" हा, लिखा दो I!

' ' अच्छा ठहरो, डायरी मॅ देखकर बताती हूँ।" कुछ क्षणों बाद ही वह फिर बोली--"' लिखो। ' '

रेखा ने साईड टेबिल पर रखा हुआ अखबार और बॉलपैन उठा लिया था, बौली--' 'हा बोलो । ' '
 

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