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A Horror Novel - स्वाहा complete

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उसने एक झरोखे का पर्दा ह्रटाकर बाहर झांका यह इस भवन का पिछवाड़ा था । ऊँचे पेड़ ओर उसके बीच बिछी घास नजर आई । घास के साथ किनारॉ पर फूलो की क्यारिया थीं । यहां भी उसे कोई प्राणी नजर नहीं आया। इसान, पशु पक्षी कुछ भी नहीं, दूर तक सन्नाटा था। एक अजीब तरह की खामोशी थी । किसी हौलनाक तूफान के आने से पहले की खामोशी ।

रेखा उस कमरे में, काले चिराग के इतजार' में यूं ही घूमती, बैठती और टहलती रही । यहा' तक कि शाम गहरी होने लगी । फिर डूबने से कुछ देर पहले ही अचानक कमरे का दरवाजा खुला और काला चिराग चेहरे पर गहरी उदासी लिए अदर दाखिल हुआ। उसके हाथ में एक बडी ट्रे नुमा तश्तरी थी, जिसमें खाना रखा हुआ था। तश्तरी उसने मेज पर रख दी ।

रेखा खाना देखकर परेशान हो गई। ' 'खाना ! इतनी जल्दी ? "

"तुम खाना देखकर परेशान मत होवो। जब तुम्हारा जी चाहे खाना । यह उसी तरह गर्म और ताजा रहेगा जेसा कि अब है । खाना मैं इस वक्त इसलिए ले आया हूँ कि मैं अघेरा होने सै पहले यहा' से चला जाऊगा' । फिर में प्रात: आऊगा । जाना मेरी मजबूरी है ।। तुम बेचिन्त रहो I खाओ, पियो और आराम करो । सुबह मै आऊँगा तो तब तुम्हारे भाईं के बारे में हर प्रश्न का उत्तर दूगा' । मैं तुम्हें उसक्री जिन्दगी की कहानी सुनाऊगा । अच्छा अब मैं चलता हूँ। तुम बस एक बात का ख्याल रखना-इस कमरे से बाहर निकलने की कोशिश मत करना । पर्दे उठाकर बाहर झाकना' भी मत कि हो सकता है कि तुम्हें कोई ऐसा दृश्य नजर आ जाए जो तुम्हारे होशो-ह्रबास गुम कर दे । बाहर से सुनाई देने बाली आवाज पर भी ध्यान मत देना । अब यह बताओ कि कमरे में शमा रोशन कर दूं या फानूस ।। मैं फानूस रोशन किए देता हू-शमा की रोशनी हल्की रहेगी। ' '

यह कहकर उसने उगली का इशारा किया और कमरे में लटके तीनों फानूस प्रकाशमान हो गये। कमरा पूर्णत: रोशन हो गया ।

' 'आप सुबह कितने बज आएगे?" रेखा ने चिन्तिन स्वर में पूछा।

' 'मैं सूरज को पहली किरण के साथ हाजिर हो जाऊगा । " काले चिराग का जबाब था।

' 'में अपने भाई के बारे में कुछ शीघ्र अति शीघ्र जानना चाहती हूँ। ' ' रेखा ने अपने मन की बात कही ।

' 'बस, एक रात का इतजार और । प्रात: में सब बता दूंगा । बता तो में आज भी देता लेकिन जब भी आया सोता हुआ पाया। ' ' काले विराग ने जेसे सफाई दी।

' 'आप मुझे उठा देते। " रेखा के लहजे में शिकायत थी ।

' 'तुम बहुत गहरी नींद में थीं । जी न चाहा कि तुम्हें उठाऊं। अच्छा मै चलता हूँ। प्रात: भेट होगी। खाना खा लेना और जो हिदायत दी है उन पर अमल करना । देखौ, फिर समझाता हूँ। बाहर मत झाकना और न बाहर की आवाजों पर ध्यान देना। आओ, दरवाजा अन्दर से बन्द कर लो I अगर दरवाजे पर दस्तक हो तो कदापि मत खोलना। दस्तक देने वाला मैं नहीं होऊगा'। यह बात अपने मस्तिष्क में भली-भाति' बैठा लो । ' ‘

यह कहने के बाद उसने कमरे का भीतरी दरवाजा खोला और बाहर निकल गया। रेखा ने दरवाजा भीतर से वद कर लिया । वह दरवाजा भी वद' कर लिया जो बाहर की तरफ खुलता था। पर्दे अच्छी तरह गिरा लिए ।

काला चिराग उसे अच्छा खासा डरा गया था!

और फिर ......

रात लगभग ग्यारह बजे उसे भूख महसूस हुई । वह मेज के निक्ट कुर्सी घसीट कर बैठ गई। खाना स्वादिष्ट और गर्म था । उसने पेट भरकर खाना खाया और फिर कमरे में ही चहलकदमी करने लगी ।

टहलते-टहलते उसे अचानक चमत्कारी डायरी का ख्याल आया। उसने अपने बेग में सै डायरी निकाली और कुर्सी पर बैठकर उसका एक एक पेज पलटने लगी। वह अपने भाई इन्द्रजीत के बारे में सोचती जा रही थी । लेकिन कुछ नहीँ हुआ। किसी भी पृष्ठ पर कुछ लिखा हुआ दिखाई नहीं दिया । निराश होकर. उसने डायरी बैग में बापस रख ली ।

अब वह आरामदायक बिस्तर पर लेट गई थी। खाना उसने भरपेट खाया था । करने को कुछ था नहीं। सोचने क्रो बहुत' कुछ था। सोचते-सोचते उसकी पलको' में नींद उतरने लगी ।

अभी वह ठीक से सो भी नहीँ पाई थी कि घबराकर उठ बैठी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि उसने कोई ख्वाब देखा है या यह सब कुछ उसने जागते में देखा है।

उसने देखा कि यह किसी खण्डहर में पत्थर पर लेटी हुई है। चाद पूरे यौवन पर है और हर त्तरफ चमगादडें उड रही _ हैं। बडी बडी चमगादढें । एक-दो चमगग्दडें उसकी तरफ भी लपकी थीं । तभी उसकी आख खुल गई थी I

यह केसा भयानक ख्वाब था । यह ऐसा भयावह ख्वाब था किं रेखा जब भी सोने लगती यह सपना उसे दिखने लगता। वह आखें खोलती तो बाहर से अजीब-अजीब व हौलनाक आवाजे आने लगतीं । कभी कुत्ते भौंक रहे हौते। कभी बिल्लियां लड़ रही होतीं। कभी उल्लू बोल रहे हौते । कभी गीदडो, की आवाजें सुनाई देती । ये आबार्जे कभी हल्की हो जाती और कभी ऐसी तेज कि दिल दहल उठे।

रेखा को ऐसा लगता जैसै बाहर डैक पर कोई साउण्ड ट्रेक सुनाया जा रहा हौ ।

अजीब मुसीबत थी। वह सोती तो भयानक खाब उसकी आखों' में उतर आता और जाग जाती तो बाहर कीं हौलनाक ड्रामाईं आवाजें सुनाई देने लगर्ती ।

बस इसी तरह आखों' में रात कट गई और फिर सुबह हुई तो उसे नींद ने आ दबोचा।

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रेखा उस वक्त गहरी नींद में थी, जब कोई दरवाजे पर निरंतर दस्तक दे रहा था।

दस्तक की इस निरन्तर आबाज पर रेखा की आख' मुश्किल से खुली I उसने अपनी कलाई घडी. पर नजर डाली । सात बज रहे थे।

बह्र फोरन उठकर खडी, हो गई । दरवाजे पर यकीनन काला चिराग होगा उसने सोचा।

आगन्तुक काला चिराग ही था । अपने वायदे के अनुसार वह दिन निकलत्ते हो आ पहुचा' था। रेखा कीं आखें' नोंद से बोझिल हो रही थ्री । आखों' में लाल डोरे पडे हुए थै-जो उसकी आखों' को और भी आकर्षक बना रहे थे । खूबसूरत नशीली आखें। काला चिराग उसकी आखो में झाकने लगा।

रेखा ने जुम्हाई ली और बोली "रात में एक पल भी नहीं सो सकी हूँ। ' '

"जानवरों क्री आवाजॉ से डरती रही? ' काले चिराग ने पूछा।

"जानवरों को आवाजों से इतना नहीं, जितना चमगादडों से... ।"

”क्या मतलब?” वह एकदम चौक गया।

"मुझे जब भी नोंद आती-एक भयानक ख्वाब देखने लगती I जेसे मैं किसी खण्डहर में पत्थर पर लेटी हुई हू और बडी…-बडी चमगादड़े इधर-उधर उडती. फिर रही हैं । एक दो मेरी तरफ भी लपकती महसूस होती । " रेखा ने बताया।

"ओह ।। " काले चिराग ने अपना सिर पकड… लिया-- "वास्तव में गलती मुझसे हुई, मुझें इस बात का ख्याल ही नहीं रहा । ' '

"केसी गलती? किस बात का ख्याल?" रेखा उलझकर रह गई थी।

"बस हो गई एक गलती । " काले चिराग ने टालने के अन्दाज में लापरवाही से कहा-- "आज क्री रात तुम्हें यह ख्वाब बिल्कुल दिखाई नहीँ देगा । "

' 'ठीक है। ' रेखा ने गहरी सास' ली ओर बहस न करना ही उचित्त सभझां ।

"अब तुम जाकर 'मुहे-हाथ धो लो। मै तुम्हारे लिए नाश्ता लेकर आता हूँ। फिर इत्मीनान से बैठकर बात करेंगे l ' ' यह कहकर काला चिराग उठ गया और भीतरी दरवाजे से बाहर निकल गया ।

उसके जाने के बाद रेखा ने खिडकी. से पर्दा ह्रटाकर बाहर झाका' I सब कुछ बैसा ही था । वह हमाम में चली गई। इत्मीनान से हाथ-मुह धोया और बाहर आ गई।

रेखा अभी आकर कुर्सी पर बैठी ही थी काला चिराग तश्तरी उठाए अंदर दाखिल हुआ। उसने तश्तरी मेज पर स्ख दी जो नाश्ते के व्यजनों से भरी हुई थी ।

' 'मुझें बडी, शर्मिन्दगी होती है कि आप मेरे लिए ट्रे उठाकर लाते है। क्या इस महलनुमा भवन में कोई भी सेवक नहीं है?" रेखा ने पूंछा।

' 'यहां बहुत से लोग हैँ-लेकिन ऐसा कोई भी नहीं जो यह काम कर सके । तुम्हें शर्मिन्दा होने की कोई जरुरत नहीं, नाश्ता करो. । ' ' काले चिराग ने गोल-मोल सा जवाब दिया।

' 'आप समझ में न आने वाली बातें बहुत करते है । क्या आपको दूसरे को उलझाकर बहुत मजा आता?!

"मै किसी को क्या उलझांउगा मैं तो स्वयं एक लम्बी अवधि से उलझा हुआ हूँ। ' '

' 'आपको किसने उलझाया?" रेखा ने टोस्ट पर मक्खन लगाते हुए पूछा।

"बकाल ने... I ' '

रेखा चौंकी, उसने तेजी से पूछा----"यह बकाल आखिर क्या बला है? आपने कल भी इसका जिक्र किया था..॥' '

' 'उसे बला न कहो मैं उस पर मरता हूँ। ' '

' 'मरता हूँ...?' ' रेखा तनिक सम्भल गई ।

"हां मरता हूँ। मगर अफसोस कि वह किसी और पर मरती है... । "

' ' 'किस पर.. .? ' '

' 'तुम्हारे भाई इन्द्रजीत पर.. . । ' '

रेखा उलझती जा रही थी, उसने काले बिराग का आशय समझते हुए कहा-- ' 'यह कैसा मरना है कि वह उस पर मरती भी है और उसे कैद भी रखा है? ' '

' 'यही तो रहस्य है और मैं यही सब बताने के लिए तुम्हें यहां पर लाया हू॥"

' ' 'तो फिर बताइये। मै सुनने के लिए व्यग्र हूँ।" '

काला बिराग कुछ क्षण खामोश रहा और फिर इस खामोशी को तोडते पूछा-- "तुम अपने भाई हन्द्रजीत के बारे में कितना जानती हो?"

"सिर्फ इत्तना ही मेरे भाई इन्द्रजीत को जब वह बारह तेरह वर्ष- चौदह बरस के थे तो मेरे चाचा रमाकांत ने जब वह शिकार करने गए ये उसका अपहरण करबा लिया था और फिर उन्हे जान से मरवा दिया था। मेरे पापा कृष्णकांत की हत्या करने से पहले रमाकांत ' ने यही बताया था कि वह इन्द्रजीत्त को कत्ल करवा चुका है । लेकिन मेरा भाई तो जिन्दा है I इसका मतलब है कि रमाकात को कोई गलतफ़हमी हुई I "

“नहीं गलतफहमी नहीं हुई। उसे उसके लोगों ने यही बताया था कि वे उसके आदेशानुसार इन्द्रजीत को कत्ल कर आएं हैं । उसके लोगों ने इन्द्रजीत क्ती लाश के टुकडे देखे थे।"

"मेरे भाई की लाश के टुकडे... l ‘ ' रेखा ने घबराकर पूछा ।

' 'हा,, तुम्हारे भाई की लाश के टुकडे जो एक एक करके उन लोगों के सामने गिरे । "

' 'फिर मेरा भाई जीवित केसे है?" रेखा बौखला सी गई--“क्या उस झोपडी. में मेरे भाई के अलावा कोई और भी है । ' '

"कोई और नहीं वह तुम्हारा अपना सगा भाई इन्द्रजीत्त ही है। ठहरो, में तुम्हें शुरू से बताता हू। ' ' काले चिराग ने गहरा सास' लेकर कहा, फिर शून्य में निहारते आगे सुनाया--

' 'तुम्हारा भाई दिल्ली में एक बहुत अच्छा पब्लिक स्कूल मे शिक्षा प्राप्त कर रहा था I उस वक्त वह आठवीं या नौवीं क्लास में था । वह एक कुशाग्र बुद्धि और तेज तर्रार लडका. था । छोटी सी उम्र में ही उसने बहुत कुछ सीख लिया था । गाव की जिन्दगी से उसे प्यार था और शिकार का शोक तो उसे जुनून की हद तक था । उसका निशाना बहुत अच्छा था । उसके पास इटली क्री बनी दोनाली बन्दूक थी । इस बन्दूक का लाईसैन्स तो तुम्हारे पिता के नाम था लेकिन इसका प्रयोग अधिकतर इन्द्रजीत ही करता था। बह बंदूक हवेली में ही रखी रहती थी । तुम्हारे चाचा रमाकात कां छोटा बेटा विजय हालाकि इन्द्रजीत से उम्र में बडा था, इन्द्रजीत से उसकी दोस्ती और घनिष्ठता ज्यादा थी । साबनपुर में वे दोनों हर जगह साथ साथ रहते थे। ' '

"आखिरी बार इन्द्रजीत सावनपुर आया तो रमाकात ने उसके लिए जाल बुन रखा था। इन्द्रजीत उसके लिए खतरा बनता जा रहा था । बेचारे के बाप ने तो भाई से कभी हिसाब न मागा' था लेकिन बेटा हिसाब मागने लगा था । सो रमाकांत ने सोच लिया था कि इस बार इन्द्रजीत्त का पूरा हिसाब साफ का देगा । तुम्हारा भाई इन्द्रजीत जब भी सावनघुर आत्ता तो उसके साथ दो अंगरक्षक रहते थे। और इन अगरक्षकों की मौजूदगी में कोई भी खेल खेलना आसान नहीँ था। सो तुम्हारे चाचा रमाकात ने इन्द्रजीत के लिऐ जगल में फंदा तैयार करवाया । इन्द्रजीत्त को शिकार का शोक था ही सौ . इस बार जब रमाकांत ने उसे यह सूचना दी कि सावनपुर के जगल में हिरण देखे गए हैं.......

उसने अब तक तीतर का शिकार किया था । किसी बडे जानवर का शिकार नहीं किया था । उसने उस दिन ही शिकार का प्रोग्राम बना लिया......

.....सुबह सवेरे ही वह और नोकरो के साथ शिकार पर जाने को तेयार हो गये ।। इस प्रोग्राम के लिए दो जीपों का इन्तजाम किया गया था। प्रोग्राम अनुसार सभी तेयार हो जीपो में बैठ चुके थे। तुम्हारे भाई के बाडीगार्डो का इंतजार था । फिर किसी ने आकर बताया कि वे दोनों तो नशे में गहरी नींद सो रहे हैं और उठाए नहीं उठ रहे हैं.....

..... फिर एक मुलाजिम ने तुम्हारे भाई को बताया कि वे दोनो तो देर तक शराब पीते और ताश खेलते रहे हैं । इन्द्रजीत्त को जगल में उनकी जरूरत नहीं थी । वह उन दोनों को छोडकर विजय के साथ शिकार पा निकल लिया।"

"रमाकात' का यह बेटा बिजय अपने बाप के साथ इस साजिश में शामिल था। वह हन्द्रजीत को जगल मै उन्हीं रास्तों पर ले गया, जहा रमाकांत के गुडे डाकुओं के भेष में छिपे हुए थे। फिर जैसे ही विजय और तुम्हारा भाई इन्द्रजीत उनकी पहुच' में आए, वे डाकू घोडे दौडाते बाहर निकल आए और एक डाकू ने इन्द्र क्रो उठाकर अपने घोडे पर लाद लिया......

..... वे चारों डाकू तुम्हारे भाई इन्द्रजीत को ले उड़े। यू अपहरण का यह खेल पूरा हुआ । बाद मै यही खबर लेकर बिजय का बड़ा भाई सूरज दिल्ली तुम्हारे बाप के पास पहुच गया जिसे सुनकर तुम्हारे पिता दुखी हो गए । "

.........उधर हुआ ये था कि वे कथित डाकू जगल में काफी अंदर जाने के बाद एक जगह ठहर गए थै। एक ने इन्द्रजीत क्रो धोड़े से उतारा ओर एक वृक्ष के तने से बाध दिया । इन्द्रजीत्त की सिट्टी पिट्टी गुम थी । उसे मामले की गम्भीरता का अहसास हो चुका था । अब वह पछता रहा था कि उसने अपने बाप के कहै पर अमल न करके कितनी बडी गलती की हे। कृष्णकांत' ने उसे हिदायत दी थी कि अपने अंगरक्षकॉ के बिना कही न जाना कि अगर इस मौके पर भी उसके बाॅडीगार्ड उसके साथ होते तो इतनी आसानी से उसका अपहरण सम्भव न था ।"

"तुम लोग कौन हो? क्या चाहते हो?" उसमे उन डाकुओँ से पूछा था।

"हम लोग तुम्हारी मोत हैँ-तुम्हें यहां कत्ल करने के लिए लाए हैं। " उस डाकू ने हंसकर जबाब दिया था जो उसे अपने घोडे, पर लाद कर लाया था....
 
"मेंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? तुम लोग मुझें कत्ल क्यों करना चाहते हो? देखो, क्या ऐसा नही हौ सकता कि तुम मेरी जान बख्श दो इसके बदले मैं में तुम्हें एक मोटी रकम अपने बाबा से दिलवा सकता हू।"

" रकम तो हम ले चुके। " दूसरा डाकू बोला-"ओर यह रकम हमने तुम्हारी जान लेने के लिए ली है । हम अपने किये हुए सौदे से कभी नहीं फिरते । अब यह तुम्हारी किस्मत की जान लेने का सौदा पहले हो गया... I"

"वै चार थै। डाकुओं की तरह ही चारों के चेहरों पर कपडा, बंधा हुआ था । उनमें से दो इस हक में थे कि इन्द्रजीत को फोरन गोलियों से छलनी कर दिया जाए । एक का ख्याल था कि उसकी जान लेने की बजाए उसे यूं ही बंधा छोड दिया जाए कि इस वीरान जगल में वह भूख प्यास से खुद ही मर जाएगा। इस बाबत चौथा डाकू डावांडोल था-वह कभी सोचता कि उसे तत्काल गोली मारकर किस्सा निपटा दिया जाए-कभी उसे इन्द्रजीत कीं किशोर अवस्था पर रहम आ जाता और वह अपने उस साथी का हमख्याल बन जात्ता जिसका ख़याल था कि इन्द्रजीत को बंधा छोडकर ही चल दिया जाए।"

उन चारों में इस समस्या पर विवाद चल ही रहा था कि इन्द्रजीत बोला--- "मेरी बात सुनो... I "

वे चारों दूर खडे थे। उसकीं आवाज सुनकर एक उसके नजदीक चला गया और बोला-- "हा, बोलो... I"

"अब जब किं मुझे कत्ल करना ही चाहते हो तो क्या मरने वाले की आखरी ख्वाहिश नहीं पूछोगे? ' '

वह डाकू हंस' दिया हसते हुए ही बोला---"हा'...हां, क्यों नहीं बोलो। बताओ तुम्हारी आखिरी ख्वाहिश क्या है? " .

"मैं उस शख्स का नाम जानना चाहता हूँ जिसने तुम्हें इस काम पर लगाया है? ” इन्द्रजीत ने पूछा।

"बस इतनी-सी बात-- ' ' डाकू हसा', और उसने बताया-"उसका नाम है रमाकांत है ।"

' 'ओह मेरे चाचा । ' ' इन्द्रजीत्त को जेसे विश्वास ही न 'आया उसने एक ठण्डी सास ली । "हे प्रभु! तू ही इसाफ' करने वाला है । ”

डाकू अपने शिकार की विवशता पर हसता हुआ, दूर खडे अपने साथियों के पास लोट गया ।

.....................

"क्या पूछा था?" एक ने सवाल किया... . .

' 'अपने नाम की सुपारी देने वाले का नाम पूछ रहा था । ' '

' 'क्या तुमने बता दिया?"

"हा मैंने बता दिया । यह मरने वाले की आखिरी ख्वाहिश थी-मेंने पूरी कर दी I " उसने कहकहा उगला I

उसके साथी भी हसै', फिर एक बोला--"चलो अब जब उसकी आखिरी ख्वाहिश भी पूरी हो गईं-फासी कीं तैयारी करो । "

”पहली गोली कौन चलाएगा? ' ' दुसरे ने पूछा।

"मैं क्लाऊगा' । " पहले वाला बोला।

“और गोली कौन चलाएगा? '

”दुसरे मैं चलाऊगा' । " दूसरा बोला।

"और तीसरी? “ पहले ने पूछा।

"यार दो गोलियां बहुत हैँ क्यो अपनी गोली जाया करते हो I ' ‘ तीसरे ने राय दी!

' 'यार तुम क्या कहते हो?" पहले वाले ने चौथे से पूछा।

वह जैसे असहाय सा बोला…"यार, मुझसे इस पर गोली नहीं चलाई जाएगी चौथे ने साफ जबाब. दिया I चौथा वही था जो उसे मारने की बजाये यूं ही बंधा छोड़ जाने के हक में था ।

“ओये, हटो बुजदिलो। ' ' पहले ने तीसरे और चौथे शख्स क्रो अपने सामने से हटाया, अपने कंघे से राईफल उतारी नाल खौलकर कारतूस चेक किया । कारतूस मोजूद था। नाल बद करके उसने घोडा, चढाया. और वन्दूक सीधी करके उसने इन्द्रजीत्त के दिल का निशाना लिया और बोला--

' 'पहली गोली मै चलाता हूं-और यह आखिरी भी होंगी, I इसी गोली से इसका काम तमाम हो जाएगा। ' '

निशाना लेकर उसने अभी ट्रेगर पर उगली धरी ही थी और वो उसे दबाना ही चाहता था कि चीखती हुई आबाज उभरी…

"गोली मत चलाऔ। " चारों ने एक साथ पीछे मुडकर. देखा और देखते ही रह गये ।

आने वाला वडा… अजीब व्यक्ति था। वह एक पेड की ओट से अचानक ही बाहर आया था । वह जाने उस 'पेड के पीछे कब से खडा था I

वो एक मोटा ताजा शख्स था । ऊपर का धड नगा' था । नीचे उसने एक पटियाली सी धोती बांध रखी थी। उसका बदन घने बालों से भरा हुआ था। गले में उल्लू का पंजा ताबीज की तरह लटका हुआ था। बडी-बडी खोफनाक मूछे', सिर मुडां हुआ और चमकता हुआ, जैसे सिर पर तैल चुपड़ रखा हो । कंधे पर सुर्ख मुह वाला बन्दर बैठा हुआ था। बन्दर ने अपने दोनों हाथ उसके सिट पर रखे हुए थे I उस शख्स के हाथो में एक मजबूत लट्ठ था I उसे' देखकर यह अनुमान लगाना कठिन था कि बह कौन है और इस जगल' में क्या कर रहा है ।

' 'यार, यह बनमानुप कहा से आ गया I क्या ख्याल है पहले इसी पर गोली चला दू? ' ' पहले बाले ने अपने बराबर खडे साथी से पूछा।

' 'बिना वजह अपने सिर खून लेने से क्या फायदा-इसे नजदीक आने दो पता तो चले कि यह आखिर है कौन?“ दूसरे ने राय दी ।

इतने में वो इन चारों के करीव आ गया । उसके अंदाज में जरा-सा भी डर खौफ नहीं था I बो इत्मीनान से चलता हुआ उस डाकू के सामने पहुच या, जो इन्द्रजीत्त पर, गोली चलाने. वाला था।

"क्यों मार रहै हो इस बालक को?" उसकी आबाज उसके व्यक्तित्व की तरह भारी थी।

' 'तुम कौन हो और इस जगल' में क्या कर रहे हो?“

’ 'हम अपने जानवरों के साथ जगल' मा फिरने आएं हैँ। सव म्हारे को राजू मदारी कवे (कहे) है l" उस बेढब से शख्स ने अपना परिचय दिया।

_ “ओह .I तो मदारी हो । चलो फिर इधर जो तमाशा हो रहा है वह देख लो । तुम भी क्या याद रखोगे।। ' '

' 'लो, यह भी कोई खेल हो रिया है। बन्दूक चला के मानस की जान ले ली। कहो तो हम दिखाएं तमाशा । “

' 'तुम क्या तमाशा दिखाओगे।।." एक डाकू व्यगपूर्ण' लहजे में बोला ' 'क्या तुम इस लडके क्रो हाथ लगाए बिना, छुरी, चाकू गोली चलाए, खत्म का सकत्ते हो?"

" हा, कर सकूं सू । ' ' राजूम दारी विश्वास पूर्ण दृढ लहजे मे बौला---''हाथ लगाए बिना इस बालक के टोटे टोटे कर सकू हूं । ”

"टोटे-टोटे हाथ लगाए बिना??" उनमें से एक दिलचस्पी दर्शाते हुए पूछा, फिर बोला-- ' 'यह कैसे मुमकिन है? '

"देख लेना अपनी आखों' से। ' ' राजू मदारी तेजी से बोला--"आगिया (आज्ञा) हो तो किं दिखा दे तमाशा। शुरू करें खेल । " वह अपने बंदर के सिर पर हाथ फेरने लगा ।

' 'वक्त क्यों जाया कर रहे हो यार। " दूसरे बाला डाकू बोला--' 'अपना काम निपटाओ और निकल लो। "

' 'इतनी जल्दी भी क्या है? इसने दावा किया है कि यह हाथ लगाए बिना इसके टोटे-टोटे कर देगा। जरा हम भी तो देख लें इसका तमाशा। हां. मदारी । अगर नाकाम रहे तो फिर क्या होगा?" '

बोलने वाले के स्वर मैं धमकी थी।

”फिर कै (क्या) होगा, तुम्हारी दम्यूक (बन्दुक) होगी और राजूमदारी का सीना । समझ गए ना? "

" हा समझ गए | चलो फिर हो गई बात . दिखाओ अपना जलवा। ”

"अभी लो।" राजूमदारी खुश होकर बोला। उसने बन्दर का हाथ पकड़कर उसे जमीन पर उतारा ।

बंदर खामोशी से एक जगह बैठ गया मानो वह भी तमाशा देखने को उत्सुक हो गया हो।

राजूमदारी ने अपनी लाठी से एक बडा. दायरा खींचा और उन चारो से बौला---"इस चक्कर के भीतर पाव न रखना ।”

"ठीक है... । " चारो ने इकरार किया ।

और फिर बह बेढव-सा मदारी उस दायरे के एक तरफ बैठ गया। आलती-पालती मारकर, उसने साधुओ की तरह आसन जमाया। उसने अपनी बडी बडी सुर्ख आखों' से उन चारो की तरफ देखा और फिर अपने लट्ठ को एक तरफ फैक दिया । वह लाठी जमीन पर गिरते ही लहरा गई । वह लाठी मोटी रस्सी का रूप अख्तियार कर गई थी, और धीरे-धीरे शून्य में ऊपर की तरफ बुलन्द होती जा रही थी।

और फिर देखते ही देखते वह इतनी वुलन्द हो गई कि उसका ऊपर का सिरा आखों' में ओझल हौ गया। राजूमदारी के इस तमाशे ने ही उन चारों को हैरान कर दिया था। पर अभी आगे भी तो बहुत कुछ होना था I राजूमदारी ने इशारे से कहा--"छोरे को बुलाओ... I”

"अच्छा! " पहला डाकू बोला-"क्या उसे खोलकर लाना होगा... । ' '

राजूमदारी ने इशारे में कह दिया----”हा , फुर्ती दिखाओ ॥"

उस डाकू ने अपने एक साथी क्रो इशारा किया कि वड इंद्रजीत को खोलकर ले आए और खुद उसने राजूमदारी की तरफ बंदूक तान ली कि अगर कोई गडबड._ होती नजर आए तो इस बेढब इन्सान क्रो गोली मार दे। हकीकतन वे अब इस मदारी से कुछ कुछ खौफजदा हो उठे थे ।

राजूमदारी ने उसे वन्दुक तानते देखा, लेकिन कोई परवाह नहीं की कि उसे निशाने पर ले लिया गया है। वह पूर्ण निश्चिन्तता के साथ पडता रहा। वह डाकू जब इन्द्रजीत को खोल कर लाया और वे राजूमदारी के खींचे दायरे के पास आ गएं तो राजूमदारी ने इन्द्रजीत्त क्रो घेरे के अन्दर जाने का इशारा किया। इन्द्रजीत्त हैरान-परेशान उस दायरे के अन्दर आ गया ।
 
अब राजूमदारी नै इन्द्रजीत्त को अपने करीव बुलाकर कुछ समझाया और फिर उसे वापस अपनी जगह जाने को कहा ।

"बालक क्या नाम से तेरा? " राजूमदारी ने ऊची आवाज मे पूछा । "इन्द्रजीत . . । "

"इस रस्सी पर चढ सके' है क्या तू?"

”हा, क्यों नहीं। बडी आसानी से । "

“तो फिर चढ जा... । "

"राजूमदारी ।" पहले वाला डाकू एकदम से बोला-- ' 'एक बात का ख्याल रखना-अगर तुमने कोई होशियारी की तो जान से जाओगे। "

राजूमदारी ने उसकी बात सुनी अनसुनी कर दी और वह इन्द्रजीत्त से बोला-"सुना नही तुमने। रस्सी पकडो, और ऊपर चढो । "

इन्द्रजीत को कोई दिक्कत नहीं आ रही थी । वह रस्सी पकडे.. हाथ व पैरों के जरिये ऊपर ही ऊपर वढता चला गया यहां तक कि वह नजरो से गायब हो गया।

"इन्द्रजीत्त ! " मदारी ने पुकार-"ऊपर पहुच गया रे? ' '

"हा , पहुच गया । " ऊपर से आवाज आई-लेकिन वह दिखाई नहीँ दिया।

वे चारों दम साधे रस्सी के ऊपरी सिरे को देख रहे थे। जहां पहुचकर इन्द्रजीत गायब हो गया था ।

"अपनी कमीज उतारकर नीचे फैंक।" राजूमदारी ने हुक्म दिया।

और कुछ ही क्षणों' बाद एक कमीज ऊपर से लहराती हुई नीचे जमीन पर आ गिरी । वह इन्द्रजीत की कमीज थी ।

"चल अब बनियान भी उतार... । "

यह आदेश मिलते ही बनियान मी लहरराती हुई नीचे जमीन पर गिरी। यूं राजूमदारी ने एक एक करके इन्द्रजीत के सारे कपडे नीचे मंगवा लिए ।

"इव (अब) तेरे बदन पर क्या है रे बालक? ' '

"कुछ नहीं... । " ऊपर से इन्द्रजीत की आबाज आई।

"ठीक हैँ।" राजू मदारी निश्चन्त सा बोला और फिर वह उन चारो की तरफ देखते उनसे सम्बोधित हुआ। अब असली तमासे शुरू होवे है । जरा हौसले से देखना । तम्मू (तुम) भी कहोगे कि क्या चीज देखने को मिली।”

यह कहते हुए उसने अपनी धोती का पट खोलकर उसमें लिपटा हुआ चाकू निकाला और धोती फिर कसकर बांध ली। छ: इंच से भी लम्बे फल का यह चाकू खौलकर उसने जमीन पर रख दिया-और अपने बन्दर को इशारा किया।

बंदर हरकत में आया और चाकू अपने मुह', में दबाकर बडी. फुर्ती सै रस्सी पर चढ गया। यह गया और वह आया का प्रदर्शन करते बंदर उसी तेजी से लौट भी आया था । पर अब वह चाकू उसके मुह' में नहीं था। वह खामोशी से राजू मदारी के पास आ बैठा ।

राजूमदारी ने आखें' वन्द क्री और तेजी से कुछ पढने… लगा।

कुछ देर बाद उसने आखै' खोलीं तो उसकी बडी-बडी आखों' में खून उतरा हुआ था । उसकी आखें' ऐसी खौफनाक नजर आ रही थीं कि उन चारों में से किसी की भी हिम्मत न थी कि उसकी आखों' में आखें' डालकर देख सके ।

अब उसने ऊगली से जमीन पर एक रेखा खींची और आदेश पुर्ण स्वर में फुफकारा--', ' 'सीधा हाथ !" '

कुछ क्षणों में ही सीधा हाथ कंधे से अलग होकर जमीन पर आ गिरा। ऐसा लगता था जैसै चाकू से काटकर फेंका गया हो । वह रक्त रंजीत' हौ रहा था।

राजूमदारी ने घरती पर दूसरी लकीर खीची वह बौला-"उल्टी बाह। "

और कुछ ही क्षणों में दूसरी बाह भी क्टकर खून उगलती जमीन पर आ गिरी।

उसने तीसरी रेखा धरती पर खींची और हुक्म दिंया-"दाई टाग'।"

दाई टाग' आने में चन्द सेकेण्ड लगे।

और फिर इसी तरह चौथी, पाचवी ओर छठी लकीर पर बाई टाग', सिर और फिर कटा हुआ धड नीचे आ गिरा और वह सिर और दूसरे अग इन्द्रजीत के ही थे।

इस मजर ने उन चारों भाड़े के कातिलों की सिंट्टी पिट्टी गुम कर दी। उन्होंने तो इस बेढब… शख्स को महज बंदर का तमाशा दिखाने वाला मदारी ही समझा था । लेकिन वह तो उनसे भी बडा और सगदिल कातिल निक्ला था । उसने जेसा कि दावा किया था हाथ लगाए बिना ही इन्द्रजीत के टुकडे कर द्रिऐ थे। जिन्हें वह वे चारों अपनी आखों' से आश्चर्यचकित होकर देख रहे थे।

"इब यूं आखै फाडे के. (क्या) देखो हो। जाओ, अपना रास्ता पक्रड्रो । सुबह सुबह ताव दिलवाकर हमसे खून करबा दिया वो भी एक बालक का । महापाप करवाया रे तुम ने हमसे। अब अपनी शक्ले-गुम करो रे। म्हारे को कहीं गुस्सा न आ जाए और फिर तुम चारो' भी इधर इस दायरे मेँ कटे फटे पड़े न दिखो । जाओ, भागो... ।"

यह बात उसने इस अदाज में कही कि उन चारों के पैर उखड गये ।

"वैसे भी वे इन्द्रजीत को यहां कत्ल करने के लिए लाए थे वो उसे गोली मारकर कत्ल करते, अब वह बिना गोली के कत्ल हो गया था । ऐसी निर्ममता के साथ तो वे भी उसे नहीं मार सकते थै ।

अब उनका यहां रुकना-बेकार था, फिर इस बेढब. मदारी का खौफ था ही चारों अपने-अपने घोडे की तरफ लपके-उछलकर उन पर सवार हुए और उन्हें एडिया मारकर हवा हो गए। जगल' में कुछ देर तक उनके घोर्डों, की टापों की आबाज गूजती रही, फिर मध्यम पड… गई ।

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राजू मदारी को जव यकीन होगया कि वे चारों दूर जा चुके है तो उसने अपनी रन पर हाथ मारकर जोरदार कहकहा लगाया और फिर अपने बराबर बेठे बंदर से बोला

"ला रे रसिया चाकू... I "

वह बेचारा बदर भी इतनी देर से अपने मुह' में चाकू दबाए परेशान हो रहा था-उसने फौरन ही उसके सामने आकर चाकू अपने दातों से छोड दिया । मदारी ने खुला हुआ चाकू बन्द किया और अपनी धोती में बाध लिया। फिर उसने ऊंची आवाज में पुकारा--

"आ रे छोरे।"

यह आवाज सुनकर इन्द्रजीत्त जो एक पेड के पीछे छिपा तमाशा देख रहा था। हसता हुआ पेड कीं ओट से निकल आया और राजू मदारी के सामने आकर खड़ा हो गया ।

अब न वहां हन्द्रजीत्त की लाश के टुकड़े थे, न आकाश की तरफ जाती रस्सी थी। हां, उस मदारी की लाठी जमीन पर उसी तरह पडी थी जेसी उसने फेंकी थी।

इन्द्रजीत की समझ में कुछ न आया कि यह सब क्या तिलस्म था। उसे इस बात की खुशी थी कि उसकी जान बच गई थी । किराए के उन कातिलों से राजू ने उसे बचा लिया था चाहै अपनी नजरबन्दी के जह के सदके ही सही। हुआ यह था कि

"राजूमदारी बहा सै कुछ दूर समाधि लगाए बैठा, जाने किस साधना में लीन था । उसका बन्दर रसिया पेडों पर इधर से उधर झूमता फिर रहा था । यह बन्दर रसिया सई था, जिसने इन्द्रजीत को पेड सै बंधा देखा था और फिर फौरन ही राजूमदारी के पास जाकर उसे इशारे से अपनी समाधि से उठने पर मजबूर कर दिया था ।

फिर इधर आकर राजूमदारी ने छिपकर यहां का तमाशा देखा था और यह समझने में देर नहीं लंगी थी कि किराए क्रे कातिल है और इस लडके को मारकर निक्ल जाने का इरादा रखते हैँ । उसे पहली नजर मैं ही किशोर इन्द्रजीत्त बहुत अच्छा लगा था उसका कोई बेटा न था। बस एक बेटी थी। इन्द्रजीत्त से एक दो साल बडी होगी । उसने फोरन ही इन्द्रजीत को बचाने और अपना बेटा बनाने का फैसला का लिया।

इस राजूमदारी ने बदर और रीछ जरूर पाल रखे थे। लेकिन वह गली कूचो मे रीछ बन्दर का तमाशा दिखाने बालो में से न था । वह अपने फल का प्रदर्शन राजाओं नवाबों, जागीरदारों और बडे लोगों क' सामने करता था। और अपने इस धन्धे मे राजूमदारी का नाम भी था कि बडे-बड़े लोग उसे अपने यहां के बडे समारोहों, में बुलाते रहते थे।

उसका दो-ढाई घन्टे का तमाशा लोगों को दम-ब-खुद कर देता था।

राजूमदारी एक मुद्दत से एक मददगार की तलाश में था । उसकी बेटी अब जबान हो गई थीं । राजूमदारी के साथ वही जाती थी, लेकिन वह अब नहीँ चाहता था कि इन तमाशों में अपनी बेटी को साथ रखे। इन्द्रजीत्त को देखकर उसके दिल क्री कली खिल गई ओर उसने खड़े-खड़े फैसला कर लिया कि उसे उन चारों कातिलों से इन्द्रजीत की जान केसे बचानी है।

उनसे जान छुडाने_ में उसे ज्यादा मेहनत न करनी पडी. थी। वे चारों मूर्ख खुद ही उसके जाल में फस' गए थे। फिर जव उन्होंने इन्द्रजीत के टुकड़े घरती पर गिरते देखै तो उनके होश ही उड़ गए थे और फिर उन्होंने वहां सै भाग लेने में ही भलाई समझी थी । कातिल तो चले गए थे पर अब राजूमदारी के सामने मसला यह था कि वह इन्द्रजीत को अपना कैंसे बनाए ।।

इन्द्रजीत छोटा जरूर था-लेकिन नादान न था। अब तो उसे यह भी मालूम हो गया था कि शिकार की आड में उसके कत्ल की साजिश रची गई थी और यह साजिश उसके चाचा रमाकांत' ने की थी। उसके दिल मेँ इतकाम की आग भडक उठी ।

लेकिन फिलहाल तो उसके सामने इस जगल से निकलकर दिल्ली पहुचने की समस्या थी।

इन्द्रजीत्त अपनी इस समस्या के बारे में सोच रहा था ओर राजू मदारी सोच रहा था कि इन्द्रजीत की रूह पर किस तरह कब्जा किया जाए कि वह सब कुछ भूल जाए और उसे छोडकर कहीँ जाने का नाम न ले ।

"छोरे तू क्रोन है?" उसने इन्द्रजीत से पूछा । " और ये बदमाश तमने कहा से लाए? "

जबाब में इन्द्रजीत ने संक्षेप में अपने बारे में सब कुछ बता दिया । चौधरी रमाकात' और सावनपुर के बारे में सुनकर राजूमद्रारी र्चोंका। यह नाम उसका कही सुना हुआ था । सारी बात सुनकर उसने इन्द्रजीत्त को तसल्ली दी ।

"तुम अब बेफिक्र हौ जाओ छोकरे। तुम्हें अब कोई खतरा नहीं है ।" वह बोला था-“मेरे साथ मैरी वस्ती चलो । वहां से तुम्हारा दिल्ली _जाने का वन्दोवस्त कर दिया जाएगा । "

राजूमदारी अगर उसे साथ जाने की पेशकश न करता, तो भी इन्द्रजीत ने उसके साथ जाना ही था । वह जगल से अकेला तो निकल नहीँ सकता था। उसने राजूमद्रारी की पेशकश फौरन कबूल कर ली-और उसके साथ हो लिया।

.........................

राजू मदारी ने बहा से थ्रोड़े फासले पर अपना डेरा डाला हुआ था।

वह तन्त्र मन्त्र का ज्ञाता था और इसी सम्बन्ध में अपनी साधना के लिए वह इन बीहडो का रूख करता था । उस दिन भी वह वहां किसी मन्त्र-सिद्धि के अपने अमल में मग्न था । वह इन्द्रजीत को लेकर उसी अमल वाली जगह पर पहुचा' ।

बदंर'_ रसिया उसके कंधे पर चढा हुआ था ।

. उस जगह धरती पर रीछ क्री खाल थी। एक तरफ झोली रखी हुई थी । खाल के सामने पानी से एक बाल्टी रखी थी। राजूमदारी ने इस, बाल्टी में से इन्द्रजीत को पानी पिलाया और फिर रीछ की छाल तह करके झोली में डाली । झोली अपने कन्धे पर लटकाई I बाल्टी हाथ में पकडी। रसिया क्रो कंधे पर चढाया… और फिर लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ एक तरफ चल दिया l

इन्द्रजीत्त उसके पीछे हो लिया था l

लगभग दो घन्टे निरंतर चलते रहने के बाद वे जगल से और फिर एक नहर के पुल को पार करके जिस जगह पहुचे बहा सामने ही झोपड़ियों की एक बस्ती थी । इन झोंपडियों. में कुछ कच्चे पक्के मकान भी दिखाई दे रहे थे । यही वह बस्ती थी जहा राजू मदारी रहता था।

इस बस्ती में राजूमदारी का मिट्टी का बना दो कमरों का मकान था । कमरों के सामने एक खुला सहन था ओर सहन के गिर्द चार फुट ऊँची एक कच्ची चारदीवारी खिची' थी।

यह एक छोटी-सी बस्ती थी, जिसमें अधिकांश खेल-तमाशे दिखाने वाले मदारी आबाद थे। हर डेरे के सामने रीछ, बन्दर, बकरे व कुत्ते बंधे हुए थे। राजूमदारी ’का मकान सबसे अच्छा और बडा. था । वह इस बस्ती का सरदार था और मुखिया कहलाता था। राजूमदारी की बेटी का नाम कटारी था I

कटारी चौदह पन्द्रह साल की एक यौवन के आगन में कदम रखती आकर्षक अधखिली कली थी। वह अपनी मां पर गई थी। उसकी मां को मरे दो सोल हुए थे। उसकी मा बस्ती की सबसे खूबसूरत औरत थी। यहीँ हाल कटारी का था । वह बस्ती की सबले खूबसूरत लडकी, थी। राजमदाऱी के यहा' दो लडके, भी हुए थे लेकिन वे दोनों चार साल के होकर चल बसे थे ।। दोनों की ही मोत गर्दन तौड से हुई थी ।

राजूमदारी को बेटे की बडी. लालसा थी और उसे अपनी यह लालसा पूरी होती नजर आ रही थी I इन्द्रजीत्त के रूप में उसे एक पला पलाया बेटा मिल गया था। वह रास्ते भर सोचता आया था कि बरती में पहुचकर वह इन्द्रजीत पर ऐसा क्रोन-सा जादू टोना करे कि वह उसका गुलाम और आज्ञाकारी बनकर बस्ती मे रह जाए और कहीँ जाने का नाम न ले ।

और राजू मदारी के लिए यह कोई कठिन काभ न था। वशीकरण मत्रों' का सिद्ध था वहा किसी के दिल पर कढना जमाने के उसे बहुत से अमल आते थे। रात के शहनशाह उल्लू का पजा उसके गले में ताबीज के रूप में पड़ा हुआ था। यह राजूमदारी एक पहुचा' हुआ आमिल और तात्रिक' था ।

उसने घर पहुचकर सबसे पहला काम ही यही किया । एक छोटे से सफेद कागज पर उल्लू के पंजे' से कुछ रहस्यमय निशान बनाए। निशान बनाने के दोरान वह बडबडाता भी जा रही था। फिर उसने कटारी से एक गिलास शर्बत लाने क्रो कहा । कटारी ने शर्बत से भरा गिलास बाबा के सामने रखा तो उसने उस उल्लू क्रै पजे' को शर्बत मै डालकर , उसे थोडा हिला लिया और कटारी से कहा कि वो यह शर्बत को इन्द्रजीत क्रो दे आए।

इन्द्रजीत दूसरे कमरे में खाट पर पसरा पड्रा था। वह एक लम्बी दूरी तय करके आया था। थक गया था।

कटारी कमरे में दाखिल हुई तो इन्द्रजीत ने नजरें उठाकर उसकी तरफ देखा। कटारी ने हालाँकि 'घर में आते हुए पहले ही देख लिया था-लेकिन वह उसके सामने अब आई थी। कटारी ने भी उसे गोर से देखा। दोनों एक दूसरे क्रो देखकर एक साथ मुस्कराएं I कटारी ने गिलास आगे बढाया,

"लो पी लो।"वह्र बौली। . इन्द्रजीत ने गिलास उसके हाथ से ले लिया। शर्बत मीठा और ठण्डा था ।। उसे बहुत प्यास लगी थी । उसने एक ही सास मे पूरा गिलास पी लिया ।

अमल किए इस इस शर्बत ने अपना रग' दिखाया। इस शर्बत ने उससे उसका अतीत तो नहीं छीना I इन्द्रजीत्त की यह तो याद रहा कि वह कौन है। कहां से आया है। लेकिन वह अपने भविष्य और भाबी प्रोग्रामों से बेगाना हो गया । इस बस्ती का आकर्षण और इस घर सै दिलचस्पी उसके मन-मस्तिष्क पर हावी हो गई I यही का हौकर रह जाने की तमन्ना दिल में समा गई ।

_ कभी अन्दर सै कोई जोर लगाता, उसे याद दिलाता कि उसे अपने घर दिल्ली जाना है। अन्दर की इस आवाज पर वह कभी उठ खडा, भी. होता लेकिन बावजूद कोशिश के वह इस बस्ती की सीमाओं से निकल न पाता।

उस पर घबराहट सी छा जाती। इस तरह दो साल बीत गए । तात्रिक' राजूमदारी ने धीरे-धीरे उसे अपना फन सिखाना शुरू कर दिया। इन्द्रजीत अब छोटे-मोटे तमाशे करके देखने बालों क्रो हैरान कर देता था ।

राजूमदारी ने नजरबदीं' के तमाशों के साथ साथ उसे जगल' का इल्म भी सिखाना शुरू कर दिया था। राजूमदारी जानवरो की आवाजों का माहिर था । वह अपने मुह' से ऐसी आवाजें निकालता था कि बाछित पक्षी या जानवर उसकी आबाज सुनकर उसके सामने आ जात्ता था।

इन्द्रजीत्त क्रो शिकार का शोक था हौ-उसनै बहुत जल्द विभिन्न परिंदो और पशुओं की आवाजे सीख ली और अब यह उसका प्रिय शुगल था कि वह सुबह-सवेरे जगल का रूख करता-ओर जगल में उसे जहां कहीँ भी तीतर नजर आता वह जाल विछाकर बैठ जाता. और अपने मुह से तीतर को बुलाने की आवाज निकालता।

दो चार आवाजों के बाद तीतरों का जबाब आने लगता और वे उडते हुए. दौडते… हुए उसकी तरफ खींचे चले आते और फिर जब वह देखता कि आठ-सात तीतर जमा हो गये हैं तो वह झटका मारकर जाल खींच लेता I यू चार पाच तीसर जाल में जरूर फस जाते। वह इन तीतरों को जाल से पिंजरे' में हस्तान्तरित कर लेता और बस्ती में आ जाता ।

कटारी इन तीतरों को बडे शोक से पकाती और यू दावते उडती. ।

बस्ती के निक्ट ही एक नहर थी । इन्द्रजीत अपनी तैराकी का शोक इस नहर में पूरा करता I राजूमदाऱी भी अपने खेल-तमाशो में उसे अपने साथ रखने लगा था।

यूं वक्त गुजरता गया यहां तक की इन्द्रजीत जवान हो गया। एक तो इन्द्रजीत वेहद खूवसूरत था, ऊपर से जबान और फिर जादूगर तांत्रिक भी। अपने इन गुणों के सदके वह आस-पास के इलाकों में बेहद लोकप्रिय बन चुका था।

बस्ती की नव यौवनाएं उसकी एक नजर को तरसती थीं-मगर वह नजर उठाकर नही देखता था। खुद कटाऱी हालाँकि उससे दो-तीन साल बडी थी लेकिन अपना दिल हार बैठी थी। वह इन्द्रजीत पर हर वक्त अपनी जान न्यौछावर करने के लिए तेयार रहती थी । मगर इन्द्रजीत अपनी घुन में मग्न रहता था । राजूमदारी उसे बेटे की तरह चाहता था-इसलिए इन्द्रजीत भी साफ पाक नजर से देखता था।

यूं ही एक दिन राजा बहराम नगर का एक करिन्दा, राजूमदारी के पास, बहराम नगर के राजा का पैगाम लेकर पहुचा। दो दिन बाद ही राजा की बेटी नयना की सगाई थी और इस मोके पर राजूमदारी के खेल-तमाशे का आयोजन रखा गया था। राजू मदारी को ऐसे महत्त्वपूर्ण बुलावो पर खुशी होती थी। उसने फौरन ही हामी भर ली और प्रोग्राम तय कर लिया।

दो दिन बाद दोपहर को राजा साहब की गाडी उन्हें र्लेर्ने आगई। वे ढाई… घन्टे के सफर के बाद बहराम नगर पहुच' गए। राजा की हवेली इस मोके पर दुल्हन की तरह सजी हुई थी। हवेली के हरे भरे लाॅन मे राजूमदारी का खेल होना था। शाम होते ही मेहमान आना शुरू हो गए।

राजूमदाऱी के लिए एक छोटा सा स्टेज बनाया गया था । सामने घास पर कुर्सिंया बिछी हुईं थी । लोग आते-जाते थे और बैठते जाते थै। मदारी, इन्द्रजीत के साथ स्टेज पर मौजूद था। वे अपने खेल की तैयारियों में व्यस्त थै।

कुछ देर बाद सामने की विशेष सिंहासन' नुमा कुर्सियों पर राजकुमारी नयना और उसका मगेतर कुवंर बलराज आकर बैठ गए। नयना की तरफ उसके होने वाले ससुर थे और कुवंर बलराज के साथ राजा बहराम नगर आकर विराजमान हो गए। कुर्सियां अब आमत्रित मेहमानों से भरी नजर आ रही थीं।

राजा बहराम नगर ने राजूमदारी सै खेल शुरू करने का इशारा किया और राजूमदारी ने अपने गले मै पडे हुए रात के _शहंशाह उल्लू के पंजे क्रो चूमकर एक नार लगाया और राजा बहराम नगर को झुंककर सलाम किया।

_ सलाम के बाद उसने पेशेवर मदारियों की त्तरह बासुरी' अपने होठो से लगाई और दाए' हाथ में डुगडुगी लेकर दोनों को एक साथ बजाना शुरू किया । बासुरी' कीं लय और डुगडुगी क्री ताल पर इन्द्रजीत ने नाचना शुरू किया।

यू 'दोनों ने मिलकर एक समां-सा बाध' दिया ।

इन्द्रजीत काली पेन्ट और लाल कमीज पहने हुए था-इस पर उसका सुर्ख सफेद रंग, घुंघराले बाल, कानों में ,पडे बाले-आकर्षक चुम्बकीय आखै और फिर एक खास विशिष्ट अदाज' का नाच देखने वालों की नजरें उस पर इस तरह गई हुई थीं जेसे वह इस दुनिया का इंसान' न होकर अतरिक्ष का कोई प्राणी हो।

नाव और सगीत समाप्त हुआ तो इन्द्रजीत स्टेज सै राजा बहराम नगर के पास पहुचा' और बडे आदरपूर्ण लहजे में अग्रेजी' में बोला

"श्रीमान जी, मुझे मगनी की अंगूठी दरकार है।"

उसे इगलिश बोलते देखकर नयना को एक खुशगवार हैरत हुई और इससे पहले कि उसके पिताश्री कुछ कहते उसने जल्दी से ही मंगनी' की आगूठी उगली' से निकालकर इन्द्रजीत के हबाले करनी चाही। इन्द्रजीत ने इशारे सै उसे रोका और फिर उसने चौडे मुह की शीशे की एक बोतल का ढक्कन खोला और राजकुमारी नयना को अंगूठी' उसमें डालने का इशारा किया ।।

नयना ने अपनी अंगूठी' इसमें डाल दी । इन्द्रजीत ने वहीँ खड़े-खड़े ब्रोतल का ढक्कन बद किया और इस अगली पक्ति में बैठे हुए लोगों क्रो एक एक करके बोतल में बन्द लडकी की अंगूठी दिखाई और फिर उस बोतल को लेकर स्टेज पहुच गया और उस बोतल क्रो एक स्टूल पर रख दिया ।

बोतल में बंद अगूठी' सबको दिखाई दे रही थी। अब इन्द्रजीत ने अपनी जेब से एक काला रुमाल निकाला और उसे एक खास अन्दाज में लह्रराकर बोतल पर डाल दिया । बोतल रूमाल से छिप गई। राजूमद्रारी ने बासूरी और डुगडुगी बजाते हुए स्टूल के गिर्द एक चक्कर लगाया । चक्कर ख़त्म होते ही इन्द्रजीत ने वह रुमाल बोतल से खींच लिया।

देखने वालो ने देखा कि अंगूठी बोतल सै गायब धी। नयना का दिल धक्क सै रह गया। उसने अपने मगेतर कुवंर बलराज की तरफ देखा ।
 
”आश्चर्यजनक ! अविश्वसनीय ! कुवर' के मुह' से निक्ला ।

तभी राजू मदारी बोल उठा "सत्यानास । राजा साहब । म्हारे छोटे से गलती हो गई। राजकुमारी जी की अनूठी' मिलना अब मुश्किल है । "

' 'अरे, यह क्या बोल रहे हो?” कुवंर बलराज परेशान होकर बोला। राजा साहब उसकी बगल में बैठे थे । वह आराम से बेठे मुस्कराते रहे I उन्होंने' कोई टिप्पणी नहीं की थी।

राजूमदारी भी कुवंर की अनसुनी कर दूसरा तमाशा दिखाने में जूट गया। पेशेवर मदारिंयो के-सै खेल दिखाए जा रहे थै । इस बार राजूमदारी ने इन्द्रजीत को स्टेज पर लेटने को कहा-जब वह लेट गया तो राजूमदारी ने उसके ऊपर एक बहुत बडी सफेद चादर डाली और लोगो से विनती की कि बहुत ही नाजुक खेल है I इसमें लडके, की जान भी जा सकती है-इसलिए इस तमाशे के दौरान कोई एक शब्द भी न बोले और आपने हाथ भी एक दुसरे से दुर रखें।

यह चेतावनी सुनकर सच लोग सम्भलकर बैठ गए। कोई शख्स अगर हाथ बांधे बैठा था तो उसने अपने दोनों हाथ अलग कर लिए और पूरी तवब्जो के साथ तमाशा देखने लगे ।

राजूमदारी अब बासुरी' और डुगडुगी बजाते हुए इन्द्रजीत के गिर्द चक्कर लगा रहा था । तीन चक्कर काटने के बाद ही हन्द्रजीत्त का बदन जमीन से उठने लगा। यहा तक कि वह उठते-उठते चार फुट बुलन्द हो गया। वह लेटी अवस्था में ही ऊपर उठा था और अब किसी अकडी, हुई लाश की तरह दिखाई दे रहा था । उसके शरीर के साथ साथ चादर भी उठी थी । चादर बहुत बडी थी इसलिए उसके किनारे स्टेज को छू रहे थे ।

यह एक सांस रोक देने वाला मजर था।

_ कुछ देर के बाद राजूमदारी ने उल्टे फेरे लेने शुरू किये। इस तरह इन्द्रजीत्त का शरीर नीचे आ स्टेज से लग गया I और अब जब राजूमदारी, ने चादर उसके ऊपर से ऊठाई तो इन्द्रजीत मुस्कराते हुए उठ खडा हुआ । लोगों ने ज़बर्दस्त तालियां बजाई ।

तभी सहसा, जैसे राजकुमार नयना क्रो अपनी अगूठी' याद आईं। वह अपने बाप से सम्बोधित होते हुए बोली--" ' पिताश्री! वह मेरी अंगूठी...? "

' 'वेटी ! वह तो अब समझो प्रभु. ..चरणों में गई । ' ' राजा साहब ने हंसकर कहा ।

' 'हाय, नहीं।" नयना उदास नजर आने लगी I

तब राजा साहब ने राजूमदारी को इशारा किया. बोले-" भई हमारी बेटी की अगूठी' का भी कुछ करो ।"

जवाब हन्द्रजौत्त ने दिया । वह शालीनता के साथ बोला था--"सर !! वह अंगूठी' तो हमारे पास नहीं है।''

' 'तो फिर कहां गई? ' ' इस बार नयना. का मगेतर' कुंवर' बलराज 'ने पूछा। उसका लहजा कदरे सख्त था।

' 'सर ।आप अपनी जेबै देखें-कही आपके पास तो नही !"

‘ 'यह क्या बेहूदगी है? " इस बार कुंवर' को सचमुच गुस्सा आ गया ।

"कुंवर जी! इसमें इतना गुस्सा खाने कीं क्या जरूरत है। ' ' राजा साहब हसते हुए बोले-- "लडका कह रहा है तो अपनी जेबें देख लो । ' '

अपने ससुर के अदाज' पर कुवंर उलझ गया । वह उठकर खडा, हो गया। उसने कोट क्री जेबें देखने के बाद-जैसै ही पेन्ट की जेब में हाथ डाला तो अँगूठी उसके हाथ मे आ गई।

उसने घबराकर हाथ जेब सै बाहर खींचा तो यह देखकर परेशान हो गया कि यह वही अगूठी' थीं जो उसने नयना क्रो पहनाई थी ।

इन्द्रजीत्त ने उसके हाथ सै अगूठी लेकर तमाम लोगों को दिखाई I लोगों ने एक फर्माईशी कहकहा लगाया । इन्द्रजीत्त ने वह अंगूठी शुक्रिये के साथ, राजकुमारी नयना क्री हथेली पर रख दी।

जाने क्यो इस वक्त नयना का जी चाहा कि काश । इन्द्रजीत ने यह अनूठी' उसके हाथ पर रखने क्री बजाय उसकी उगली' में पहना दी होती । अपनी इस ख्वाहिश पर वह मन ही मन मुस्करा दी थी ।

इंसान' की जिन्दगी में कभी-कभी कुछ बातें अजीब होती हैं । वह अपनी किसी भी सोच पर चकित रह जाता है । उसकी समझ में नहीँ आता कि उसने ऐसा क्यो किया। शायद मुहब्बत और चाह की भावना ....एकदूसरे को पसद' करने का अहसास ऐसे ही क्षणों की देन होता है । राजकुमारी नयना की मगनी' हो चुकी थी । मगनी अगूठी उसकी उगली' में थी । मगेतर' उसके बराबर में बैठा था I एक साल बाद शादी होने वाली थी । इसके बावजूद राजकुमार नयना के दिल में अचानक इस ख्वाहिश का पैदा होना कि-काश! !! वह अंगूठी हाथ पर रखने' की बजाए उगली में पहना

देता --कैसी बिचित्र बात थ्री? केसी अजीब सोच थी ।

और यह बात उसके दिल में क्यों आई थी? यह ख्वाहिश उसके मन में क्यों उठी थी यह वह नहीं जानती थी।

अंगूठी' वापस लौटाते वक्त इन्द्रजीत भी बहक गया था। उसने सोचा था-काश ।बो हमेशा के लिए गायब कर सकता ।

अपनी इस सोच पर उसे अंदर ही अंदर हसी आई ।

राजू मदारी की अल्हड जबान बेटी कटारी, नयना से कही ज्यादा खूबसूरत थी और वह इन्द्रजीत से प्यार भी बहुत करती थी-लेकिन इन्द्रजीत ने उस पर कभी ध्यान नहीं दिया था। उसी पर क्यों-किसी भी लडकी. की तरफ उसने कभी ध्यान नहीं दिया था । लेकिन नयना को देख़कर उसके दिल को जाने क्या हो गया था । अपने इस रबैये पर वह बार-बार गोर कर रहा था-मगर उसकी समझ में भी कहा कुछ आ रहा था।

. अब खेल के सिलसिले में उसकी एकाग्रता टूट गई थी और वह बार-बार गलती कर रहा था और राजूमदारी से डाट खा रहा था---- "होश कर! होश कर?"

राजूमदारी के बार-बार टोकने पर उसे होश करना पड़ा। यह जादू के और नजरबन्दी के खेल थे। वैध्यानी घातक भी सिद्ध हो सकती थी।

अतत्: खेल तमाशा खत्म क्या हुआ। राजूमदारी ने राजा साहब सै ईनाम बटोर-इजाजत ली और वापसी का सफर अपनाया। राजा साहब की गाडी ही उन्हें बस्ती तक छोडने आई थी।

तौबा तौबा

अभी चुडैल नही आई जो इंद्रजीत को प्यार करती

कटारी इंद्र से प्यार करती

इंद्र नयना से प्यार करता

फिर बीच मे बिल्ली इंद्र को उड़ा ले गई।।

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वे रात को अपनी बस्ती में वापस पहुच गए ।

राजा साहब की गाडी उन्हें उनके ठिकाने पर छोड. गई-लेकिन इन्द्रजीत का दिल अपने ठिकाने पर नहीं रहा था। उसका दिल तो कही… दुर-बह्रराम नगर में ही रह गया था और वह एक चेहरा था जो उसकी आखो में समाकर रह्र गया था ।

राजकुमारी नयना की छबि उसकी निगाहो से हटती ही नहीं थी । फिर वह हुआ जिसकी कि आशा ही नहीं की जा सकती थी ।

एक शाम राजा बहराम नगर की गाडी, मदारियों की इस बस्ती आबादी से दूर, बाहर करीव आकर खडी हो गई थी । गाडी में सिर्फ ड्राईवर ही था और वह इन्द्रजीत की तलाश में यहां आया था।

इन्द्रजीत घर पर मौजूद था

उसने ड्राईवर को अपने दरवाजे पर देखा तो उसके चेहरे पर अनार से फूटने लगे। ड्राईवर ने इधर-उधर देख़कर उसके कान के निकट, राजदराना सरगोशी में कहा था "राजकुमारी जी आई हैँ। "

" ओह ।" इन्द्रजीत्त के बदन में सनसनी-सी दौड गई। उसने भी सरगोशी में पूंछा-"कहा हे वह?"

"नहर के पुल पर I वहां वह आपका इतजार कर रही हैं । "

"मेरा इतजार'! " इन्द्रजीत का दिल तेजी से धडकने. लगा।

"ओह ! चलो । "
 
राजा साहब की गाडी. बस्ती के बाहर खडी थी। इंद्रजीत उसमें बैठकर वहां पहुचा' । ड्राईवर ने गाडी, रोक दी I इन्द्रजीत उठकर तेजी सै भागा । पुल के उस पार चादर में लिपटी राजकुमारी उसे नजर आ रही थी । उसने चादर कुछ इस ढंग' से लपेट रखी थी कि आसानी से पहचानी न जा सके।

इन्द्रजीत जब नयना के पास आ पहुँचा तो सूर्यं अस्त हो चुका था । शाम गहरा रही थी। अंदेरा…फैलता जा रहा था। इन्द्रजीत उसके सामने पहुचकर खामोशी से खडा हो गया ।

नयना ने अपने चेहरे से चादर हटाई और धीरे से बोली-"मै हू नयना।"

"जानता हूँ। "

"सच बताना क्या तुम्हें मेरे यहां आने की आशा थी?"

"नहीं बिल्कुल नहीं। " इन्द्रजीत ने स्पष्टवादिता से काम लेते हुए कहा।

“लेकिन मैं तो आ गई हूं तुम्हारी आशा के विपरीत ।“ राजकुमारी नयना की आखों में डूबते सूर्य की सुर्खी थी I "क्या तुम्हें मेरा आना अप्रिय लगा?"

"बिल्कुल नहीं।” इन्द्रजीत ने फिर सच्चाई से कहा ।

“तुम्हें तो लकडी. होना चाहिए था ।"

"वह क्यों?" इन्द्रजीत हैरान हुआ।

"कोई बात खुलकर कहते ही नहीं ।" वह हसी । उसकी हसी' मैं बडा… जादु था I

"आप क्या कहलवाना चाहती है? ' ' I

"यह बताओं तुम कौन हो? "

" में . ..मैं इन्द्रजीत हूँ। "

"मैने' तुम्हारा नाम नहीं पूछा है। तुम्हारा नाम में जानती हूँ..। "

' ' फिर? फिर क्या जानना चाहती हो?"

' 'तुम इस धंधे , इस बस्ती और इन लोगों में बिल्कुल , 'मिस फिट' नजर आते हो । “ नयना ने अपनी निगाहें उसके चेहरे पर गाड दी थी, ' 'जेसे टाट में मखमल का पैबन्द । "

इन्द्रजीत ने सकुचाते हुए कहा---"अगर मैं कहूँकिं आप ठीक ठीक हैँ तो क्या आप मान लेंगी।”

"हां, क्यो नहीं?" नयना के होठों पर मुस्कान तैर आई। "मैं सच्चाई जानना चाहती हूँ।"

' 'मै एक फरेब में फसा' हुआ हूँ। ' ' इन्द्रजौत्त ने जवाब दिया, वह एकाएक ही उदास दिखने लगा था "जानता हूँ कि फरेब का शिकार हू फिर भी इस तिलस्म, इस जादू से निक्लने को जी नहीं चाहता। मैं तो जैसे कैदी हूँ किसी का।"

' 'किसके कैदी हो? राजूमदारी के?“

"हां-यूं ही समझो... ।"

"निश्चिन्त हो जाओं I मै तुम्हें इसकी केद से निकाल लूगी । ' ' वह खुल के मुस्कराई, उसके मोतियों जैसे दाँत चमके--"और तुम्हें अपना कैदी बना लूंगी' । बोलो, बनोगे मेरे कैदी?"

"हाँ, खुशी से... I" इन्द्रजीत बेअख्तयार बोला था ।

' 'इतनी जल्दी इकरार न करो-अच्छी तरह सोच-समझ लो । मैं तीन दिन के बाद फिर आऊगी। यहीं इसी पुल पर. इसी वक्त, मेरा इन्तजार करोगे ना?"

' 'हा । क्यों नहीं I " इन्द्रजीत मुस्कराया।

"तो फिर जाओ... ।"

' 'जाऊं कैसे...जाने कौं जी नहीं चाहता । जिंदगी में पहली बार अहसास हुआ कि मै....मै हूँ।"

”यह तो बडी. अच्छी, बडी. शुभ शुरूआत है। आज तुम्हें अपने होने का अहसास हुआ है फिर वह दिन ज्यादा दुर नहीं जव तुम्हें मेरे होने का विश्वास हो जाएगा... I“

इन्द्रजीत चौंका. उसने धीरे से पूंछा---"तुम भी कैद में हो किसी की? '

"हा एक अगूठी' की कैद में...। ' ' नयना ने बडे… अजीब से उदास लहजे मे कहा-"वह अंगूठी मेरे हाथ पर रखी गई थी । तुमने ही रखी थी वह वह अगूठी' अभी तक मेरे हाथ में है...र्मेने आज तक पहनी !"

कितनी बडी-कैसी जज्वाती बात कह दी थी नयना ने। इन्द्रजीत भाव व्हियल-सा बोला--' 'लाओ दिखाओ हाथ-कहा' है वह अंगूठी'?"

नयना ने अपनी चादर सै हाथ निकाला और उसके सामने करके मुट्ठी खोल दी । लेकिन उसके हाथ में कुछ न था, हाथ खाली था। अपनी मुट्ठी खाली देखकर नयना परेशान हो गई। बात परेशान होने ही वाली थी । उसने गलत नहीं कहा था। मगनी' वाले दिन इन्द्रजीत ने वह अंगूठी गायब करने के बाद फिर जब नयना की हथेली पर रखी थी तो नयना ने उसे पहनने के बजाये अगूठी' अपने मगेतर कुवंर कीं जेब मे डाल दी । और फिर जाते हुए जव कुवंर ने उसे अगूठी वापस की तो उसने वह अपने पर्स में डाल ली । तब से अब तक वह अगूठी' नयना के पर्स में थी। आज कार से उतरते

वक्त उसने वह अंगूठी पर्स से निकालकर अपनी मुट्ठी में दबा ली थी और अभी कुछ क्षण पहले वह अगूठी' उसके हाथ में थी । बस, मुट्ठी खोलते ही वह अंगूठी गायब हो गई I

‘ ' 'कहा है अंगूठी ? ' ' उसे हैरान-परेशान देख इन्द्रजीत ने पूछा।

"मुझे नहीं मालूम कहा गई?" नयना बोली--' 'अभी तो मेरे हाथ में थी। “

' 'कहा है अंगूठी ? ' ' उसे हैरान-परेशान देख इन्द्रजीत ने पूछा।

"मुझे नहीं मालूम कहा गई?" नयना बोली--' 'अभी तो मेरे हाथ में थी। “

तब इन्द्रजीत ने अपनी बंद मुट्ठी उसके सामने की और मुट्ठी खोल दी, बोला-"यह तो नहीं...?"

वह अंगूठी इन्द्रजीत कीं हथेली पर थी। नयना चहकी यहीँ तो है। यह तुम्हारे पास कैसे आ गई I जादू। ' ' वह जैसे सब समझ गई थी-" आह तुम कितने बडे जादूगर हो ? ' '

' 'यह अगूठी तुमने अब तक पहनी क्यों नहीं...? '' इन्द्रजीत ने किसी सोचके वशीभूत पूछा था।

' 'जब तुमने मुझे अंगूठी' लौटाई थीं तो तभी मेंरे दिल में यह ख्वाहिश मचली थी कि काश । मेरे हाथ पर रखने की बजाय तुम यह अगूठी मुझे पहना देते । " नयना ने निसकोच' कहा था ।

' 'उस वक्त मेरे दिल में भी एक खाहिश जागी थी।” इन्द्रजीत भी कहै बिना नहीं रह सका ।

"वह क्या...?" नयना ने उसकी आखों' में झाकते हुए पूछा था।

"मेने सोचा था कि काश ।यह अंगूठी मै हमेशा के लिए गायब कर सकता। "

"ऐसा हौ सकता है

" नयना भावावेश में बोली-"यह्र अंगूठी हमेशा के लिए गायब हो सकती है। “

”वह केसे?" इन्द्रजीत की बेताबी भी देखने वाली थी।

"वह ऐसे...देखो यू.।"..यह कहकर नयना नें अंगूठी नहर के बहते पानी में उछाल दी जो फौरन डुब गई।

"यह...यह तुमने क्या किया?" इन्द्रजीत परेशान हो उठा।

"कुछ नहीं... । मैं इस अंगूठी की कैद' से आजाद हो गई हूँ। “

इन्द्रजीत उसका आशय समझ रहा था, वड कुछेक क्षण उसकी आखो' में झाकता' रहा, फिर पूछा उसने, "कहीं तुमने जल्दबाजी से काम तो नहीँ लिया,,.?"

"मुझे नहीं मालूम ।" नयना बडी. मासूमियत से बोली-- "जो हुआ है, बेअख्तयार-बरबस ही हुआ है । यह दिल का मामल है दिल ही जाने... । "

"नयना जी! यह दिल भी कितनी अजीब चीज है। कोन जाने, कब, कहा, किस पर आ जाए। "

"हाय... ! तुम्हारे मेरा नाम लिया । जरा फिर सै लेना। “ नयना का स्वर हसरतों भरा था ।

"नयना... !" इन्द्रजीत ने भी जैसें मत्र'-मुग्ध ही नाम दोहराया था ।

"इन्द्रजीत ..मेरे इन्द्रजीत. .. ! " नयना ने जवाब मे उसका नाम इस कदर चाहत सै लिया कि इन्द्रजीत को पहली बार अपने नाम पर गर्व हुआ।

' 'अच्छा नयना... । यह बताओं इस वक्त तुम वक्त कहा' से आ रही हो?" कुछ सोचकर पूछा था, इन्द्रजीत ने ।

"बहराम नगर से' और दिल्ली जारही हूँ। तीन दिन बाद बापस आऊगी । इसी वक्त, यही इसी पुल पर मेरा इन्तजार करना । मेरा इंतजार करोगे, इन्द्र! " नयना ने बेकरारी से पूछा।

”हा, क्यों नहीं । मैं तुम्हारा इतजार जरूर करूगा। " दिल्ली का नाम सुनकर इन्द्रजीत की मनोस्थिति अजीब ही गई। उसे यूं लगा जैसे किसी ने अचानक धूल से सने आईनें को झांडकर उसके सामनें कर दिया हो ।
 
दिल...जहां वह पैदा हुआ, जहा उसका घर था, जहा उसके पापा थे। उसकी प्यारी-स्री मां थी । यह तो उसकी जिन्दगी के सारे ही जख्म हरे हो गए थे। उसके दिल में टीस-सी उठने लगी थी ।

“क्या हुआ इन्द्र? यह अचानक तुम्हें क्या हो रहा है?” इन्द्रजीत क्री हालत बदलते देखकर नयना ने पूछा ।

' 'कुछ नहीं । जब तुम दिल्ली से बापस आओगी तो सब कुछ बताऊंगा । अभी वे बातें ही कर रहे थे कि उन्हें कोई अपनी तरफ आता दिखाई दिया ।

' 'वह आ रहा है। अब तुम जाओ। मै तुम्हारा इतजार' करूगा। ' ' इन्द्रजीत बोला।

राजकुमारी नयना तीन दिन के बाद मुलाकात का वायदा करके चली गई।

तीन दिन बाद जब वह लौटी और नहर के पुल पर पहुची' तो इन्द्रजीत उसका प्रतीक्षक था। और इस मिलन पर _इन्द्रजीत ने उसे अपने बारे मॅ सब कुछ बता दिया ।

नयना' को जब यह मालूम हुआ कि इन्द्रजीत, राजूमदारी का बेटा नहीं, बल्कि वह दिल्ली की एक प्रसिद्ध हस्ती कृष्णकांत' की औलाद है और सावनपुर के रमाकांत का भतीजा है तो उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। वह चकित थीं इतने बड़े घराने और बाप का बेटा अपना घर बार छोडकर… इन बीहडो में क्यो और किस तरह जिन्दगी गुजार रहा है ।

वास्तव में नयना जादू -टोने के प्रभाव ब मत्र-शक्ति से अनजान थी । इसलिए अश्चचर्यचकित थी । ये अविश्वसनीय क्रिया कलाप जादू अच्छे भले आदमी की मत मार देता है। इन्द्रजीत तो उस वक्त बच्चा था I कथन है कि जिस तरह लोहे को लोहा काटता है, जहर को जहर मारता है उसी तरह जादु-टोने का इलाज भी जादू से ही जा सकता था। पर नयना का जादु तांत्रिक' राजूमदारी के जादू से क्या टकरा सकता था?

राजकुमारी… नयना को अपने रूप-योवन के जादू पर बडा, भरोसा था। उसे पूस विश्वास था कि वह शीघ्र ही अपने जादू से वह इन्द्रजीत क्रो अपना कैदी बना लेगी। इन्द्रजीत स्वयं भी और दिल से उसका कैदी बनने को तेयार था।

वक्त बीतता। रहा....... ।

नयना और इन्द्रजीत के बीच इन मुलाकार्तों को तीन माह बीत गए। तीन माह किसी मामले को सुलझाने के लिए बहुत होते हैँ। मामला धीरे धीरे सुलझता जा रहा था । नयना की मुहब्बत की शक्ति, उसका आकर्षण, उसका जादू दिन-प्रतिदिन इन्द्रजीत को अपनी गिरफ्त में लिये जात्ता था।

नयना की चाहत में वह सब कुछ भूलता जा रहा था। राजूमदारी ने अपनी तात्रिक्त शक्तियों सै इन्द्रजीत के प्रियजनों को उसके दिल से निकाल दिया था और इन्द्रजीत इस बस्ती का होकर रह गया था। वह अकेला कही निकल भी जाता तो मत्र-पाश की वजह से कही दूर नहीं जा सकता था । ऐसी कोई सोच दिशा में आते ही उसका दिल यू घबराने लगता कि मन चाहता कि वह शीघ्र अति शीघ्र बस्ती वापस पहुच' जाए.. .राजू मदारी और कटारी के पास उनके घर में और फिर उसे बस्ती में उनके पास ही पहुंचकर' सुकून मिलता था।

पर अब नयना का जादू भी अपना प्रभाव दिखा रहा था। नयना के प्यार में खोकर इन्द्रजीत अपने आप क्रो भूलता जा रहा था ।

इस बीच नयना भी सच्चाई से अवगत हो गई थी । जान गई थी कि वह भी इन्द्रजीत को राजूमदारी के जादू ने इस तरह जकड़ा हुआ है कि वह अपने मां-बाप क्रो भी भूल चुका है। उनकी मुहब्बत उसके दिल से निकल गई है । यहा' तक कि अपने चाचा रमाकात से बदला लेने की उग्र भावना भी उसके दिल में न रही थी। बस-केवल राजूमदारी ही याद रह गया कि वही अब उसका सब कुछ है I

अब नयना जब भी उससे मिलती, वह उससे उसके शहर की बात करती, उसके मां-बाप की चर्चा करती और उसके चाचा रमाकात का जिक्र करती, जिसने उसके कत्ल की साजिश कीं और उनकी जमीन-जायदाद पर कब्जा कर लिया था । इन्द्रजीत इन बातो को भूला नहीं था । लेकिन ये सव बातें अपना प्रभाव खत्म कर चुकी थीं। उसे अपने घर क्री अपने घरवालों की, किसी की कोई परवाह न रही थी । लेकिन नयना ने उसके दिल और उसकी भावनाओ के आईने से गर्द साफ करनी शुरू की थी, इन्द्रजीत को अपना चेहरा धुंधला-धुधला नजर आने लगा था ।

लेकिन यह धुंधलाहंट भी अस्थाई और क्षणिक थी । इन बातों के सदर्भ में वह जब तक नयना के करीव उसके सामने रहता उसकी हां में हा मिलाता पर फिर उससे जेसे ही दुर होता और राजूमदारी का चेहरा देखता तो फिर सब कुछ भूल जाता-और राजूमदारी का जादू उसके सिर पर चढकर, बोलने लगता ।

जादू वो जो सिर चढकर बौले । राजूमदारी जब आखो मे आखै डालकर यह पूछ लेता कि केसा है रे, तू इंद्रजीत? तन्ने कोई कष्ट तो ना है? तौ हन्द्रजीत के जहन में उठने वाले यादों के भंवर झाग की तरह बैठ जाते। राजू मदारी का जादू कोईं जादू नहीं था। रात के शहशाह, उल्लू के पंजे' से बनाया हुआ शर्बत उसने इन्द्रजीत को पिलाया था और उसके इस जादू…टोने का तोड अच्छे अच्छे के पास नहीं था।

नयना उसे याद दिला-दिलाकर समझा समझाकर थक गई थी।। लेकिन इन्द्रजीत राजूमदाऱी क्ती दिमागी गुलामी सै मुक्त नहीं हो पा रहा था। इन्द्रजीत उसके सामने होता तो उसकी हां में हा मिलाता जाता। दिल्ली अपने मांबाप के पास जाने का इरादा बाध लेता। लेकिन बस्ती में पहुचते' हौ वह अपने बाप कृष्णकांत को भूलकर राजूमदाऱी का बेटा बन जाता ।

इस तरह से वह इस' पहुचे' हुए तात्रिक' का कैदी था। लेकिन ऐसा कैदी था जिसके पावों' में पडी बेडी, किसी को नजर न आती थी । स्थिति यूं बनी कि राजकुमारी नयना इस सिलसिले में बेहद सजीदा हो गइ थी । वह इन्द्रजीत पर मर-मिटी थी और उसकी खातिर सबको मिटा' देना चाहती थी।।

तब नयना ने अपने हमराज ड्राईवर रघुबीर सिह' से बात क्री। उसने एक दिन बहराम नगर जाते हुए रास्ते में उससे पूछा--"रघुमीर सिह' क्या तुम्हारीं नजर में कोई ऐसा आदमी है जो जाटू-टोन का तोड़ जानती हो? कोई आमिल.. कोई तात्रिक- वान्त्रिक ? "

प्रौढ, रघुबीर सिह ने सोचपूर्ण खामोशी के बाद हाँ जबाब दिया था-' हां, एक है तो ऐसा बंदा राजकुमारी जी पर उससे बात करनी होगी । किस पर हुआ है जादू-टोना आप यह बता दें?”

"वह अपन जादूगर इन्द्रजीत है ना, उन पर ।" डन्द्रजीत का नाम सुनकर ड्राईवर हस' ही तो दिया था। ”आप भी क्या बात कर रही हैं, राजकुमारी जी...?“

" क्यों ??! ऐसा मैने क्या कह..?"

' 'आप भी कमाल ’करती हैं राजकुमारी जी । इन्द्रजीत जी तो खुद इतने बडे जादूगर हैं कि उन पर भला किसका जादू चलेगा? "

' 'बस, रघुबीर सिह्र'। यही तो सारी समस्या है। बेशक वो बडे जदूगर हैँ-लेकिन उन पर उनसे भी बडे… एक जादूगर ने जादूकर रखा है । उसने इन्द्रजीत को कैद कर रखा है । तुम्हें याद नहीं जब वह एक दिन हमारे साथ बलराम नगर जा रहे थे तो रास्ते में उनकी तबियत केसी खराब हो गई थी । वह बार बार यही कह रहे थे कि मुझें वापस मेरी बस्ती में ले चलो...मेरा दिल कोई मुट्ठी में जकड रहा है । फिर हमें मजबूरन उन्हें उनकी बस्ती में छोडकर आना पड़ा था।

" और फिर अपनी वस्ती के करीव पहुचकर वह बिल्कुल भले-चगे' हो गये थे । जैसे कुछ हुआ ही न था। याद आया ना तुम्हें?" नयना ने उसे याद दिलाया।

”हा । तो उस दिन कुछ ऐसी ही बात थी? '' ' ड्राईवर सहमकर बोला'' ' 'लेकिन क्सिने केद का रखा है?"

' 'राजूमदारी ने। “ नयना ने बताया।

' 'तो क्या...क्या इन्द्रजीत उसके बेटा नहीं हैँ? ‘ रघुवीर सिह' को हैरत ने आ घेरा

"नहीं । वह तो एक बहुत अमीर बाप के बेटे हैं। किसी तरह राजूमदारी के चुगल मैं फस' गए हैं।”

"ओह । फिर तो उनके लिए कुछ करना पडेगा। अजीब किस्सा है, मै कल ही योगी दयाल से बात करता हूँ। "

' 'लेकिन रघुबीर सिह' वो तो एक सपेरा है। वह जादू-टोने के मामले में क्या कर सकेगा । ' ' नयना ने शक्रा' व्यक्त क्री।

"दयाल कोई ऐसा वैसा सपेरा नहीं है।" रघुबीर ने जबाब दिया-' 'ये सपेरे भी जादु-टोना जानी हैं। ये सबलोग एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैँ राजकुमारी जी । शैतान के चेले । ' ' वह हसा' और फिर आगे बोला ”अगर उसके बस की बात न हुई तौ फिर किसी तत्र' मत्र जानने वाले तात्रिक' क्रो ढूंढेगे । ' '

' 'ठीक है, किं शाम को आकर मुझें बताना और हां- राजा साहब को बात का पता न चले !"

" आप बेफिक्र रहे !" ड्राइवर रघुवीर ने विश्वास दिलाया ।

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ड्राईवर रघुवीर बडे काम और बडे विश्वास का आदमी था । उसी की हिम्मत थी कि उसने जान हथेली पर रखकर नयना को इन्द्रजीत से मिला दिया था । यह भी वह अच्छी तरह जानता था कि जिस दिन भी राजा साहब को यह मालूम हो गया कि उनकी वेटी को उसने मदारियों की बस्ती पहुचा दिया है तो वह उसकी जिन्दगी का आखिरी दिन होगा।

राजकुमारी नयना ने जब पहली बार इन्द्रजीत सै मुलाकात की ख्वाहिश की थी तो रघुबीर सिंह' ने उसे दवे शब्दों में समझाने क्री कोशिश की थी, लेकिन नयना तो इन्द्रजीत के लिए पागल हौ रही थी । वह भला कहा मानने बाली थी। " नयना ने बडे दृढ शब्दों में उससे कहा था कि अगर वो उसके साथ न या तो वह अकेली ही उससे मिलने चली जाएगी-और फिर लोटकर 'भी नहीं आएगी । नयना की इस धमकी पर ही बो उसका साथ देने को मजबूर होगया था-क्योकि' वह जानता था कि अगर ऐसा हो गया तो राजा साहब जिन्दा ही मर जायेगे I नयना उनकी इकलौती संतान थी I और जिस तरह किसी देव की जान किसी तोते में होती है बैसे ही राजा साहब की जान नयना में थी I

ड्राईवर रघुवीर ने दुसरे ही दिन सवेरे दयाल से मुलाकात थी । वह रघुवीर को अच्छी तरह जानता था कि वह राजा साहब के बुलावे पर कई बार हवेली आ चुका था और हर बार रघुबीर ही उसे गाडी में लेकर आता और फिर छोडकर, आता था। दरअसल, मदारियों के खैल-तमाशॉ के साथ ही राजा साहब क्रो सांप-नेवले की लड़ाई देखने का भी बहुत शोक था।

उस दिन सुबह ही सुबह जब योगी दयाल ने उसको अपने दरवाजे पर देखा तौ उसकी बाछे' खिल गई। उसने समझा था 'कि राजा साहब का बुलावा आया है।

उसने रघुवीर को अपने पलंग' पर बिठाते हुए पूछा--"सब खैरियत है ना रघुबीर बाबा?”

"प्रभु कृपा है सब, दयाल!! एक काम है तुमसे।" रघुबीर ने सीधे मतलब बात की थी।

"आज्ञा करो, बाबा I"

"तुम यह जादू टोने का तौड़ भी जानते हो या सिर्फ सपेरे ही हो…?"

"अरे बाबा! सपेरे तो हम खानदानी हैँ पर काला इल्म भी जानते हैँ । यह तत्र' मत्र हमने एक बडे और पहुचे' हुए सन्यासी' से सीखा है। आज्ञा दो क्या करना है?"

"टोने का तोड करना है दयाल और कुछ नहीं करना है । जो बोलोगे वह मिल जाएगा। खर्च की बिल्कुल फिक्र न करना l "

"ठीक है बाबा। किस पर हुआ है टोना?"

"क्या उस बन्दे को यहा लाना होगा?" रघुबीर ने पूछा।

”हा', बाबा । "

”पर योगी दयाल वह यहां नहीं आ सकते... ।।"

"वह क्यो बाबा?" योगी दयाल की आखे' सिकुड. गई l

”उसे तत्र'-मत्र' के जरिये वांघ दिया गया है, वह चाहने और कोशिश के बावजूद भी अपने इलाके से नहीँ निक्ल सकता। निक्लता है तो उसका दिल घबराने लगता है I तुरन्त तबियत खराब हो जाती है ।" रघुबीर ने उसे बताया ।

"फिर तो कोई जबरदस्त बंदा है उसके पीछे । कोई पहुचा' हुआ तात्रिक'। "

"बस, डर गये योगी महाराज । “ रघुवीर ने उसे 'महाराज' का सम्बोधन दिया और चैलेज भी।

“योगी दयाल ने डरना नहीँ सीखा बाबा । " योगी दयाल अपनी पर आ गया-- "हम चलेंगे तुम्हारे साथ । पर जाना कहा होगा...? "

"बस, डर गये योगी महाराज । “ रघुवीर ने उसे 'महाराज' का सम्बोधन दिया और चैलेज भी।

“योगी दयाल ने डरना नहीँ सीखा बाबा । " योगी दयाल अपनी पर आ गया-- "हम चलेंगे तुम्हारे साथ । पर जाना कहा होगा...? "

……

' 'यहा' से तीन-चार धन्टे का सफर है । वह मदारियों क्री बस्ती कहलाती है। "

''ठीक है हम चलेंगे। वो मदारी हम योगी-खूंब मुकाबला होगा। "

'' ड्राईवर रघुवीर ने योगी दयाल से अपनी मुलाकत कीं बाबत आकर राजकुमारी नयना को बताया तो नयना-ने उसे अगले ही दिन सवेरे दयाल के साथ मदारियों की बस्ती में जाने की हिदायत कर दी। वह अब यह मामला शीघ्र, अति I शीघ्र निपटा देना चाहती थी।

' रघुबीर ने उसके आदेश का पालन किया वह योगी दयाल के साथ बस्ती में पहुचा' और दयाल को नहर के पुल के निकट बैठाकर खुद बस्ती में इन्द्रजीत को बुलाने चला गया।

इंद्रजीत घर पर ही था।

दरवाजे पर ड्राईवर रघुबीर को देखला कटारी का माथा ठनका । रघुबीर दौ-तीन माह अंदर कई चक्कर वस्ती के लगा चुका था । आज भी जब इन्द्रजीत उसके साथ जाने के लिए तेयार हुआ तो कटारी ने उसे टोका--

”कहा जा रहे हो? “

"राजा साहब का ड्राईवर आया है। बो शायद राजा साहब का कोई संदेशा लाया है। उसके साथ जा रहा हूँ।” इंन्द्रजीत ने लापरवाही से जबाब दिया।

"यह ड्राईवर कुछ ज्यादा ही आने लगा है । " कटारी ने तुनकर कहा ।

"यह असल में मेरा दोस्त बन गया है दिल्ली आते जाते मुझसे मिलने चला आता है। " इन्द्रजीत ने बात बनाई।

" अच्छा, पर जल्दी आ जाना, में कहीं राह ही न देखती रहूँ.. । "

“तुझे मुझसे कोई काम है, क्या?"

“मुझे तुमसे कोई काम नहीं है। " कटारी नै बडी, अदा से हाथ जोडते. हुए कहा--"बस, जल्दी आ जाना।”

"ठीक है जो हुक्म! ” इन्द्रजीत ने भी शोखी से कहा और बाहर निकल आया।

इंद्रजीत और रघुबीर चुपचाप चलते बस्ती से बाहर आ गए । वस्ती सै निक्लते ही रघुबीर ने उसे कहा--"मै अपने साथ एक तांत्रिक' को लेकर आया हू । ' '

”तात्रिक ।।" इन्द्रजीत कुछ समझा नहीं था--"वह क्यों आया है?"

' "उसे राजकुमारी जी ने भेजा है और कहा है कि आपको इस योगी तात्रिक की हिदायत पर अमल करना होगा। "

"कहा" है बो योगी?”

”मैं उसे पुल से जरा आगे एक पेड के नीचे बैठाकर आया हूँ। ' '

और फिर जब वे पुल के उस पार ढलान. पर उतराकर पहुचे' तो योगी दयाल उनका प्रतीक्षक था। यह एक ऐसी जगह थी जहा किसी की निगाह मुश्किल ही से पड़ सकती थी । सपेरे दयाल ने इन्द्रजीत को बडे गौर से देखा और फिर उसे अपने सामने बैठने का इशारा किया। इन्द्रजीत बैठ गया तो दयाल ने उसकी आखों' में आखें डाल दीं। कुछ देर तक उसने कोई मत्र' पढा, फिर बोला--

"अपने मन में किसी पक्षी का नाम सोच लो । "

' 'सोच लिया.. . । ' ' इन्द्रजीत ने फौरन कहा I

"अपनी आखें बन्द कर लो । "

और फिर जब वे पुल के उस पार ढलान. पर उतराकर पहुचे' तो योगी दयाल उनका प्रतीक्षक था। यह एक ऐसी जगह थी जहा किसी की निगाह मुश्किल ही से पड़ सकती थी । सपेरे दयाल ने इन्द्रजीत को बडे गौर से देखा और फिर उसे अपने सामने बैठने का इशारा किया। इन्द्रजीत बैठ गया तो दयाल ने उसकी आखों' में आखें डाल दीं। कुछ देर तक उसने कोई मत्र' पढा, फिर बोला--

"अपने मन में किसी पक्षी का नाम सोच लो । "

' 'सोच लिया.. . । ' ' इन्द्रजीत ने फौरन कहा I

"अपनी आखें बन्द कर लो । "

........

"कर ली । “ इन्द्रजीत अपनी आखें बन्द करते बोला l

योगी दयाल ने अपनी एक हथेली उसकी बद आखों' के सामने की और बोला-""आखें' मत खोलना । आखें' खोले विना ही मेरी बात का जबाब देना... I क्या तुम्हें मेरा हाथ नजर आ रहा है?"

"नहीं । ' ' इन्दजीत ने जबाब दिया । योगी दयाल ने फिर कोई मंत्र पढा-फिर पूछा--' 'अब कुछ नजर आ रहा है?“

' 'जो' परिन्दा मेने सोचा था वह सामने बैठा नजर आ रहा है। " इन्द्रजीत का जवाब था।

"ठीक...अभी आखें' मत खोलना । अभी तुम्हें मेरा हाथ भी नजर आएगा। ' ' कहते हुए दयाल ने फिर एक मत्र' पड़ा, और कहा- ” अब देखो. . . l "

वह परिन्दा गायब हो गया । अब अंधेरा है । अंधेरा चुभने लगा। और अब में तुम्हारा हाथ देख सकता हूँ।“

"शुक्र है, मौला। ' ' दयाल ने एक गहरी सास' ली--"अब मेरी हथेली मे गोर से देखो। ' '

इन्द्रजीत क्री आखें बद थी। बद आखों' से ही वह देयाल क्री हथेली क्रो गोर से देख रहा था।

पहले तो हथेली में हाथ की लकीरों के सिवाय दिखाई नहीं दिया-लेकिन फिर फौरन ही वे लकीरें धुंधला गई और एक स्पष्ट तस्वीर सामने आ गई।

यह एक जीत्ते-ज़ागते साप' की तस्वीर थी । वह कुण्डली मारे और फन फैलाइए झूम रहा था ।

' 'कुछ नजर आया, नौजवान?" योगी दयाल ने पूछा ।

' 'एक साप नजर आ रहा है जो फन फैलाए लहरा रहा है।" इन्द्रजीत ने जो देखा वह बताया।

' ' "किस रग' का साप' है? ' योगी दयाल ने पूछा।

' 'एकदम काला है और चमकीला... । ' ' इन्द्रजीत सम्मोहित्त-सा बोला।

"इसके फन को गौर से देखो. . . । ' '

' 'ठीक है । देख रहा हूँ। ' '

' 'क्या इसके फन पर किसी किस्म का निशान है? ''

"ऐ...हां...एक दायरा-सा है। ' '

' 'गोर से देखो, यह दायरा क्या किसी पक्षी की आख' जेसा है?”

"हां है तो । ' '

"बिल्कुल उसी पक्षी की आख' जेसा जो तुमने सोचा था?"

' 'हा बिल्कुल । ' '

' 'क्या इस परिन्दे का नाम उल्लू है?"

' 'हां-योगी जी ।।' ‘

‘ 'क्या तुम्हें वह साप' अब भी नजर आ रहा है?"

"बिल्कुल उसी पक्षी की आख' जेसा जो तुमने सोचा था?"

' 'हा बिल्कुल । ' '

' 'क्या इस परिन्दे का नाम उल्लू है?"

' 'हां-योगी जी ।।' ‘

‘ 'क्या तुम्हें वह साप' अब भी नजर आ रहा है?"

......

"नहीं I"

. . ' 'मेरा हाथ दिखाई दे रहा है?"

' 'वह भी नहीं । ' '

' 'ठीक है अब तुम अपनी आखै खौल लो... । "

' 'इन्द्रजीत ने अपनी आखें' खोली तो उसे कुछ देर तक कुछ नजर न आया । थोडी देर तक वह आखै' खोलता ओर बन्द करता रहा । तब जाकर उसकी आखों' की रोशनी बहाल हुई।

' 'जाओ नौजवाना अब तुम जाओ। " योगी दयाल ने उससे कहा ।

इन्द्रजीत फोरन खडा हो गया । वह खडा हुआ तो उसे चक्कर-सै आ गये। उसने फौरन ड्राइवर रघुबीर का हाथ पकड लिया ।

' ‘क्या हुआ?” रघुबीर ने चिन्तित स्वर में पूछा I

"कुछ नहीं ऐसे ही सिर घूम गया था।" इंद्रजीत ने मुस्कराते हुए कहा ।

' 'अच्छा, योगी महाराज... I. " रघुबीर दयाल से बोला-- "आप यहीं बैठे में इन्हें बस्ती तक छोडकर आता हूँ।"

"ठीक है, जाओ । पर जल्दी आना । हमें वापस भी जाना है। " योगी दयाल बोला।

वे दोनों जाने लगे तो योगी दयाल को जेसे अचानक कुछ याद आया, उसने पुकारा, सुनो. बाबा!

"हां-क्या योगी महाराज?" रघुबीर ने पलटकर पूछा ।

"इससे पूछो-यह यहा' सै निकलना भी चाहता है या नहीं…।।"

' 'क्यों इन्द्रजीत, साहब I. क्या इच्छा हे आपकी?“

" हा ।। योगी जी! मैं यहा' से भाग जाना चाहता हूँ। फरार हौ जाना चाहता हूँ। " इन्द्रजीत ने अपने मन की कही।

"रघुबीर ने बताया था कि.... राजूमदारी अपने गले में कोई चीज लटकाये रहता है । किसी परिन्दे का पंजा बंजा?" योगी दयाल ने सवालिया अदाज' में पूछा ।

"हां योगी जी । " इन्द्रजीत ने जेसे पुष्टि की I "उसके गले में उल्लू का पजा होता है। ”

' 'और क्या तुम वह पंजा उसके गले से उतार सकते हो? ' योगी दयाल ने पूछा।

इन्द्रजीत ने सोचपूर्ण स्वर में जवाब दिया…“काम है तो मुश्किल-फिर भी में कोशिश करूगा.. ।"

"शाबाश अगर तुमने उसके गले से पजा' काट लिया तौ मेरा काम आधा रह जाएगा। उसकी शक्ति आधी रह जाएगी ।मुझे उसे पछाडने. में आसानी रहेगी।" योगी बोला ।

“देखो मैं करता हू कोशिश I” इन्द्रजीत ने जबाब दिया-“आओ रघुबीर बाबा।“
 
फिर वे दोनों साथ-साथ चलते पुल पर आए । रास्ते में रघुबीर ने इंद्रजीत को बताया कि राजकुमारी नयना अगले दिन ही दिल्ली जाते वक्त उससे मिलने आऐगी। उसने कहा--

”तुम कल नहर के पुल पर हमारा इतजार' करना । "

' 'किस वक्त...?” इन्द्रजीत ने पूछा I नयना से मिलने कीं इतजार मे उसे भी ती बेचैनी-सी रहती थी।

फिर वे दोनों साथ-साथ चलते पुल पर आए । रास्ते में रघुबीर ने इंद्रजीत को बताया कि राजकुमारी नयना अगले दिन ही दिल्ली जाते वक्त उससे मिलने आऐगी। उसने कहा--

”तुम कल नहर के पुल पर हमारा इतजार' करना । "

' 'किस वक्त...?” इन्द्रजीत ने पूछा I नयना से मिलने कीं इतजार मे उसे भी ती बेचैनी-सी रहती थी।

....

"शाम तो हो ही जाएगी । "

' 'ठीक है। मैं पुल पर इतजार करता मिलूगा'।"

इंद्रजीत को बस्ती के करीव छोड ड्राईवर रघुबीर ने आकर योगी दयाल क्रो गाडी में बैठाया और उसे भी उसके डेरे पर छोडा । वह जब राजा साहब की हवेली पर पहुचा' तो राजकुमानी नयना को अपना प्रतीक्षक पाया I

रघुबीर ने नयना क्रो इन्द्रजीत और योगी दयाल कीं मुलाकात और वहां जो कुछ भी हुआ था, सब सविस्तार कह सुनाया I

राजकुमारी ने पूर्ण एकाग्रता के साथ सब सुना और फिर पूछा-- "अब तुम्हारे इस योगी महाराज का क्या प्रोग्राम है?"

"प्रोग्राम क्या राजकुमारी जी... ।' '

"इद्रजीत क्रो जादू के प्रभाव से मुक्त कराने का केसा प्रोग्राम है...?“

"वह बता रहा था कि इन्द्रजीत जिस ताकत के कब्जे में है-उसकी तोड के लिए सख्त मेहनत करनी होगी । उसे कई रातें जंगल में रहकर जाप करना होगा । उसके बाद साप अपना ‘काम दिखाएगा। यह साप बही होगा. जो इन्द्रजीत जी को, योगी के हाथ में नजर आया था I योगी दयाल के अमल के बाद वह जगल' मे से प्रक्ट होगा और योगी उसे पकडकर पिटारी में बद करेगा, और उसे लेकय वह राजूमदारी के घर की तरफ रवाना हो जाएगा । वह साप वहा' क्या करेगा, यह योगी ने नहीं बताया। बस इतना ही कहा है कि उसके बाद इन्द्रजीत जी आजाद हो जाएगे' । "

' 'भगवान करे, ऐसा ही हो। ' ' नयना… ने आखें मूद', हाथ जोड दुआ मागी', फिर पूछा--"कितनी रकम मागता' है?"

"वो कहता है कि जो मिल जाएगा-लें लेगा... I"

' 'तुमने उसे यह तो नहीं बताया कि यह काम कौन करवाना चाहता है?"

"नही मैं भला आपका नाम लूगा क्या?" रघुबीर बोला-'''वेसै योगी महाराज को भी इससे गर्ज नही है कि कौन है जो इन्द्रजीत को इस जादुई कैद से मुक्ति दिलाना चाहता है, उसे तो वस पेसे से मतलव है।”

”ठीक है, काम हो जाऐ, हम भी उसे मायूस न करेंगे। और अगर चाहो तो तुम कुछ स्कम उसे पहले ही दे आओ। "

"हा', राजकुमारी जी । कुछ रकम पेशगी दे दी जाए तो अच्छा हे । उसकी दिलचस्पी बढ़ जाएगी।"

"ठीक है। " नयना ने अपना पर्स खोला और कुछ नोट निकालकर रघुबीर की तरफ बढा दिये ।

!ये पांच-पाच सौ के दस नोट है ।"

ड्राईवर रघुबीर सिह' ने राशि योगी दयाल तक पहुचा' दी । पाच' हजार रुपये देखकर योगी दयाल के चेहरे पर रग आ गया और उसके साथ ही उसे जब रघुवीर ने यह बताया कि काम हो जाने पर उसे ओर रुपया भी मिलेगा तो उसकी खुशी की कोई सीमा न रही ।

वह बहुत देर तक रघुबीर से उस जादु के तोड के बारे में बातें करता रहा।

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ओर फिर... !

राजकुमारी नयना अपने वायदे के अनुसार अगले दिन शाम को पुल पर पहुच गई। इन्द्रजीत वहां पहले सै ही मोजूद था । दोनों पुल के दूसरे किनारे पर पहुचकर ढलान पर उतर गए और पेडों में गायब हो गये।

ड्राईवर रघुवीर पुल पर खडा होकर बहते पानी में डूबते सूरज का नजारा करने लगा।

_ अभी शाम गहराई नहीं थी, लेकिन पेड़ों में गहरा अंधेरा फैल चुका था I इतना कि सूरतें भी ठीक से दिखाई नहीं दे रही थीं।

एकान्त पाते ही नयना ने इन्द्रजीत का हाथ अपने हाथ मे लिया और जज्वाती स्वर में बोली…“केसे हो इन्द्र? "

"मैं ठीक ।"

"मैने' तुम्हारी मुक्ति का प्रबन्ध कर दिया है। वह योगी दयाल भी इन तात्रिक्रॉ-आलिमों की बिरादरी का है। दो चार दिन बाद इधर आएगा। यहॉ जगल' में रहेगा । अमल करेगा और फिर अमावस्या की रात तुम्हें उस मत्र' पाश से मुक्ति मिल जाएगी-जिसने तुम्हें विवश कर रखा है इन्द्र, सोचो वह सुबह कितनी हसीन होगी जब तुम आज क्री तरह बेबस न रहोगे और कहीँ भी जाने के लिए आजाद होगे। "

"मैं तुम्हारे इस अहसान को कभी नहीं भूलूगा ।।"

"मुझें भूल जाओगे।" नयना ने हसकर कहा ।

”यह तुमने क्या कह दिया?” इंद्र क्रो सुनकर पीडा, हुई थी जेसे।

”आजादी ऐसी ही चीज है। ' '

इन्द्र शोखी पर उतर आया, बोला “पर मैं आजाद कहां होऊगा । एक कैद से निकलकर दूसरी कैद में चला जाऊँगा ।।"

' ' किसकी केद में . . . ? “

" अरे भूल गई क्या? तुमने पहली मुलाकात में क्या कहा था।”

' 'क्या कहा था....॥" नयना बदस्तूर उसकी सूरत देखती रही।

”यही कहा था कि बेचिन्त हो जाओ I मै इस कैद से निकालकर तुम्हें अपना कैदी बना लूगी । यहीँ कहा था ना I "

नयना के होठों पर मुस्कान तेर आई "क्या तुम मेरे कैदी बनने के लिए तैयार हो..।।.” उसने पूछा।

' 'पहले भी इकरार किया था-अब भी इकरार करता हूँ। तुम्हारा कैदी बनकर मुझें खुशी होगी । ' '

”क्या तुम अपनी इस केद से निक्लकर मेरे साथ बहराम नगर चलोगे? "

' 'जरूर चलूगा'। यह वताओं राजा साहब की हवेली के दरवाजे पर खुल जाएगे..?” इन्द्रजीत ने अपनी आशंका जाहिर क्री I

"मेरे होते हुए तुम्हारे लिए-बहा' के दरवाजे कौन बद' कर सकता है। नयना है मेरा नाम और मैं कोई छुई-मुइं, कायर लडकी नहीं हूँ। मैने अपने पिताश्री को बता दिया है कि मै कुवंर बलराज से शादी नहीं करूगी । "

इन्द्रजीत के लिए यह रहस्योद्धाटन किसी विस्फोट से कम नहीं था। उसने धड़कते दिल के साथ पूछा…"फिर...फिर…उन्होंने क्या कहा? ' '

"मेरे पिता जी मुझे वेहद चाहते हैं । उन्हें मेरे इंकार का अफसोस तो हुआ, लेकिन उन्होंने एक दकियानूसी रवायती बाप की तरह मेरे इकार को अपनी आन की समस्या नहीं बनाईं। उन्होंने कहा कि जिस वजह से तुम इकार' का रही हो-वह वजह मेरे सामने लाओ I बस, अब तुम्हे बहराम नगर ले जाकर अपने पिताश्री के सामने खडा. कर दुगी और बता दूगी' कि यह है वह वजह ।।" नयना बदस्तूर शोखी से बोली। …

' ' फिर जानती हो-उसके बाद क्या होगा?"

"क्या होगा, इन्द्रजीत जी ।”

" धाय.. ..धाय. . ,दो गोलिया' चलेंगी और इन्द्रजीत जी जमीन पर गिरे तडप _ रहे होंगे । ' '

" अगर ऐसा हुआ तो पहली गोली मैं अपने सीने पर खाऊगी'... । " नयना ने सजीदा' होते, दृढ़ शब्दों में कहा।

"सच कहती हो?" इन्द्रजीत क्रो जैसे यकीन नहीं आया ।

"झूठ और सच का फैसला तो आने बाला वक्त करेगा।" नयना अपने प्रेमी के गले का हार बन गई ।

वह मिलन के इन क्षणों क्रो अन्देशो की भेंट नहीं चढाना _ चाहती थी। पर मिलने के क्षण भी कितने छोटे होते है कि हसरतें मिटती नहीँ बल्कि बढ, जाती हैं। नयना को दिल्ली जाने की भी जल्दी थी । वह अपनी प्यासी हसरतों के साथ-अगली मुलाकात का प्रोग्राम तय करने-भबिष्य के सुनहरे सपने देखती दिल्ली चली गई । इन्द्रजीत देर तक खडा. उसकी गाडी की लाल 'टेल लाईट' को देखता रहा, जो न जाने कब की दिखाई देनी बद' हो गई थी । लेकिन वह क्लपना में ही उस सुर्ख बिन्दुओं को वने देखै जा रहा था ।

अ…धेरा गहरा हो चुका था दुर बस्ती में कहीं कही रोशनी नजर आ रही थी। शेष तीनों तरफ ही सन्नाटा व्याप्त था । इन्द्रजीत बस्ती लौट चलने की सोच ही रहा था, कि तभी अचानक किसी ने उसके कंघे पर हाथ रख दिया। हाथ का दबाब महसूस करते ही वह एकाएक सहम गया।

यह एक नर्मं-क्रोमल दवाब था ।
 
इस हरारत 'भरे कोमल दबाव ने उसे भीतर तक दहला दिया था । वह समझ गया कि आने वाला कौन है, लेकिन यही समझ में नहीं आ रहा था कि आने वाला यहा क्यों आया है ।।

"यहां क्यों खडे हो, इन्द्र?" आने वाले ने पूछा ।

"बस ऐसे ही...यूं ही...नहर के बहते पानी को देख रहा था।"

"ऐसे अंधेरे में। " शंकापूर्ण, हैरत भरे स्वर में स्वर मे पूछा गया ।

' 'अंधेरा तो अब हुआ है

।' ' इन्द्रजीत ने सफाई दी, फिर उसके सवालों से ही बचने के लिए तेजी से पूछा---' 'तुम यहा' क्यों आई हो कटारी?"

आने बाली कटारी थी । वह बौली----''तुम्हें बाबा न बुलाया है।“

' 'उन्हें कैसे मालूम कि मै यहा' पुल पर हूँ।" इन्द्र ने पूछा। उसका दिल धडकने लगा था।

"उन्हे मेंने बताया कि तुम पुल पर होवोगे। तुम अक्सर शाम क्रो यहां आकर खडे हो जाते हो ना । ' '

' 'उसने क्यों बुलाया है । " इंद्रजीत ने फिर बिषय बदल दिया ।

'मुझे नहीं मालूम चलकर पूछ लेना... ।"

" चलो .. ॥"

कटारी ने उसका हाथ थामकर चलना चाहा ॥ लेकिन इंद्रजीत ने बडी नर्मी से उससे अपना हाथ छुडा. लिया और तेज तेज चलने लगा।

बस्ती का रास्ता उसका देखा-भाला था, सो वह अंधेरा… भी कोई रूकावट पेदा नहीं कर रहा था।

बरसो हो गए थे उसे इन रास्तों पर चलते हुए l

" ' इन्द्र. । ' ' कटारी जो पीछे रह गई थी उसने उसे आवाज दी ।

"हा । कहो, क्या हुआ? ' ' इन्द्रजीत चलते चलते रूक गया ।

' कटारी कदम बढा उसकी बगल में आ गई। उसने अजीब सै ठण्डे लहजे में पूछा-- ' ‘एक बात पूछू'। सच-सच बताओगे? "

' ' कटारी कोई ऐसी वैसी बात न पूछ लेना कि मैं चाहूँ भी तो सच न बोल सकू'। ' ' इन्द्रजीत अनजाने खौफ का शिकार था, लेकिन वह सहज भाव से ही बोला था-- ' 'अगर तुम कुछ जानती हो तो बेहतर होगा कि उसे एक डरावना सपना समझकर भूल जाओ । ' '

"तुम कितने कठोर हो, इन्द्र... ।' ' कटारी सिसक ही तो उठी। इन्द्रजीत ने जबाब में कुछ नहीं कहा-बस उसका हाथ पक्रड़ लिया और उसे बस्ती में ले आया।

अपने प्रति कटारी की भावनाओं से इन्द्रजीत अनजान नहीं था और अब इन्द्र को इस बात का भी अहसास हो चला था कि कटारी, उसकी और नयना की मुलाकात्तों से अनजान नहीं है। जाहिर है, जब कोई किसी से प्यार करता है तो फिर उससे गाफिल केसे रह सकता है।

कटारी ने आजतक उससे खुलकर बात नहीं की थी। अपनी चाहत उसने उसे, इशारों ही इशारों में दर्शाई थी उसने। इन्द्रजीत ने उसके इशारे को समझते हुए भी उसके किसी इशारे का जवाब नहीं दिया था।

रास्ते में इन्द्रजीत ने यह भी सोचा कि हो सकता है कि कटारी, नयना के बारे में कुछ न जानती हो और अपने हवाले से कोई सच उगलवाना चाहती हो...खुद ही किसी नतीजे या फैसले पर पहुचना' चाहती, हो । लेकिन अब कुछ नहीँ हो सकता था। इंद्रजीत ने उसकी बात खुद ही उडा… दी थी और अब खुद ही उसे छेडना… उचित न था।

इन्द्रजीत घर के आंगन में दाखिल हुआ तो राजूमदारी सामने ही मूढें पर बैठा हुआ था।

उसके दाए' हाथ पर अपने दो पावो पर रीछ बैठा हुआ था और बाए हाथ पर बदर' खडा हुआ था । राजूमदाऱी के दोनों हाथ इन जानवरों के सिरों पर रखै हुए थे। उसके पीछे दीवार में गडी कील में लालटेन लटकी हुई थी और पीछे से पड़ रही लालटेन की रोशनी में वे तीनों वडे अजीबो गरीब दिखाई दे रहे थे । अत्याधिक रहस्यमय और भयभीत कर देने वाले ।

”यो तुझे कहा' मिला रे कटारी?" राजूभदारी ने इन्द्रजीत क्रो घूरते हुए अपनी बेटी से पूछा।

' 'वहीँ बाबा, जहा' मेंने बताया था... । ' ' कटारी ने सादगी से जवाब दिया ।

' 'नहर वाले पुल पर?" राजूमदाऱी ने तस्वीक चाही।

' 'हां बाबा।। ' ' कटारी की मुडी' भी हिली थी।

" ओ रसिया! ' ' और अब राजूमदारी अपने बदर' से सम्बोधित हुआ । बदर' अपना नाम सुनते ही. उसकी गोद में आ बैठा और रीछ अपने दोनों पावो' पर उछलकर खडा. हो गया।

'' अरे, यह तू मेरी गोद में क्यों चढ गया रे रसिया! जा मेरा चाकू तो लेकर आ रे.:. ।' '

चाकू का नाम सुनकर इन्द्रजीत की सिट्टी गुम हो गई।

राजूमदारी का हुक्म सुनकर रसिया उसकी गोद से कूदा और छलाँग लगाता हुआ अन्दर कमरे में चला गया।

और फिर जब कुछेक क्षणों बाद वह वापस आया तो उसके मुह में चाकू दबा हुआ था I वह मदारी के करीव आकर अपने पिछले पेरों पर खडा हो गया और अगले दोनों पाँव अपने सीने पर बाध' लिए और अपना मुह' उठा दिया ।

राजूमादारी ने उसके मुह से चाकू लेकर खोला तो उसका छ इन्च सै भी लम्बा फल लालटेन क्री घुघली रोशनी के बावजूद चमक उठा।

इन्द्रजीत खुले हुए चाकू क्रो देखकर सहम गया । उसे यू ही लगा जैसै घूसट मदारी यह चाकू फैककर उसे मार गिरायेगा। वह दो कदम पीछे हटकर फोरन कटारी की ओट में हो गया।

' ”इधर आ रे छोकरे ।" राजूमदाऱी ने उसे अपने करीब आने का इशारा किया । कटारी उसके सामने से हट गई । इन्द्रजीत आगे बढा और मदारी के निकट पहुचर खामोशी से खड़ा हो गया ।

"देख मन्ने (मेंने') तुझे बहुत से खेल सिखाए हें-ईंब (अब) तुझे वह खेल सिखाता हु रे. जिसकी वजह से तेरी जान बची। ' ' राजूमदारी चाकू कीं धार पर उगली' फिराते बोला ।

यह सुनकय इन्द्रजीत की जान में जान आईं । वह तो समझ रहा था कि नयना से उसकी मुलत्कार्तो का भेद खुल गया है और अब उसे सजा मिलने वाली है।

उसने एक ,गहरी और ठण्डी सास' लेते कहा--! 'हां, बाबा! सिंखाओ... I' '
 

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