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A Horror Novel - स्वाहा complete

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जाने वह कब तक चलती रही । उसे होश नहीं था । दिल मैं जुनून व्याप्त था और यह विक्षिप्तता उसे ले जा रही थी । वह अपनी बस्ती सै बहुत दूर निकल आईं। थी और अब रेल की पटरी के साथ साथ चली जा रही थी ।

उसकी निगाहो में इन्द्रजीत्त घूम रहा था ।उसके साथ बीते दिन, उसकी आखो' के सामने सजीव हो रहे थे और उसका जेहन अपने आपसे ओर अपने हर्द-गिर्द से बेगाना होता जा रहा था। वह नहीं जानती थी कि वह कहा जा रही है...क्यो चल रही है? और वह ट्रेन अचानक ही उसके सिर पर आ पहुची थी। कटारी पटरियों के बीच चल रही थी । उसके साथ रीछ था और रीछ कीं पीठ पर बंदर बैठा हुआ था। इससे पहले कि कटारी को कुछ होश आता पूरी ट्रेन ही धड-धड़ करती उस पर से गुजर गई।

उन तीनों में से कोई भी जिन्दा न बचा ।

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इस ख़बर को सबसे पहले दीपक ने देखा था ।

हग्लाकि वह कटारी की सूरत से परिचित नहीं धा-लेकिन अखबार में छपी उसकी फोटो देखकर और उसका नाम पढ़कर उसे जाने क्यों यह महसूस हुआ कि यह इन्द्रजीत्त वाली ही कटारी है । ट्रेन के हादसे ने उसे दो हिस्सों में काट डाला था । उसका चेहरा बिल्कुल साफ था । कोई घाव तक न आया था। उसकी खूबसूरत आखें पूरी तरह खुली हुई थीं । हादसे के बावजूद, चेहरे पर किसी प्रकार की पीडा भाव नहीं थे । हा, आखों से प्रतीक्षा की पीड़ा जरूर झलकती थी । इस ट्रेन एक्सीडेंट में उसके साथ ही उसके दौनों वफादार जानवर भी चल बसे थे।

खबर पढने. के बाद दीपक ने चाहा कि वह फोन पर इन्द्रजीत्त को हादसे की खबर दे दे, लेकिन फिर वह रुक गया कि खाभखाह क्यों हनीमून मनाते जोडे को डिस्टर्ब करे I उसने उस अखबार को सम्भालकर रख लिया।

तीसरे दिन दीपक ने उन तीनों की दावत की। जब रात को सबने खाना इत्यादि खाना खा लिया और गप्पें शुरू हुई तो दीपक को खयाल आया और. वो अख़बार निकाल लाया । इन्द्रजीत्त के पास बैठकर उसने उसे वह तस्वीर दिखाई ।

"जरा इसे देखना।"

इन्द्रजीत्त ने उसके हाथ से अखबार लेकर जैसे ही उस तस्वीर पर नजर डाली...उसके दिल कीं धडकने तेज हो गई और उसके मुह' से निक्ला

" अरे, यह तो कटारी है । " कटारी का नाम सुनकर नयना एकदम चौंकी । वह फोरन उठकर इन्द्र के पास आ गई। रेखा प्रेम सागर के पास बैठी थी। उसने वहीँ से पूछा---"'क्या हुआ कटारी को। "

"वह रेल के नीचे आकर कट गई। " दीपक ने बताया।

"चलो, अच्छा हुआ, वर्ना वह मेरे हाथो मारी जाती । " वह नफरत्त से बोली I

"उसकी इस टिप्पणी पर इन्द्रजीत्त ने उसे देखा लेकिन बोला कुछ नहीं।

"साले साहब । वह शादी वाली रात ही मरी है। बाह, क्या सिज्यूशेन थी। एक तरफ हीरो अपनी सुहाग सैय्या पर अपनी नई जिन्दगी की शुरुआत कर रहा था, तो दूसरी तरफ अंधेरी रात में रेल की पटरी पर एक ठुकराई हुई औरत अपनी मौत की आगोश में जा रही थी । बाह ।। बाह ।। क्या सिंच्चुऐशन है। कट इधर...कट उधर, एक तरफ रोशनी...एक तरफ अंधेरा... ।"

प्रेम सागर अपनी घुन में जेसे फिल्म की शूटिंग किए जा रहा था । फिर वह एकाएक सजीदा. होकर बौला--- " मतलब है कि यह कितनी अजीब बात है इन्द्र कि उसकी मौत का वक्त वही है जो तुम्हारी शादी का है। क्या वह तुम्हारी शादी बर्दाशत नहीं कर सकी, लेकिन दिलचस्प सवाल यह है कि उसे तुम्हारी शादी का पता केसे चला? फिर अपने तौर पर तो वह तुम्हें कत्ल कर चली थी।। कहीं ऐसा तो नही' कि अपने बाप का बदला लेने के लिए उसने तुम पर हमला जरूर किया लेकिन कातिलाना नहीं । वह यकीनन जानती थी कि तुम बच जाओगे । "

प्रेम सागर जाने क्या क्या कहता रहा, लेकिन इन्द्रजीत उसकी बात कहा सुन पा रहा था। वह तो अखबार में छपी कटारी की तस्वीर में ही खोया हुआ था और उसके चेहरे पर धीरे-धीरे उदासी की मलीनता उभरती आ रही थी ।

फिर ऐसी ही उदासी की मार रेखा पर भी पडी।

होटल में खुशियों के दस दिन गुजारने के बाद-प्रेभ सागर ने अपने बंगले , इन्द्रजीत ने माडल' टाउन और अंकल बलदेव ने शक्ति नगर का रूख किया। तीनों अपनी-अपनी दुल्हनों को अपने-अपने घर ले गये।

ये दस दिन तो जेसे पलक झपकत्ते ही बीत गए थे।

बारहवै दिन इन्द्रजीत ने सबको अपने घर पर आमंत्रित किया। रेखा घर पहुचते' ही सीधी अपने कमरे में गई।

उसका बेडरूम लाॅक्ड था । रामू ने दरवाजा खोला ।। रेखा अन्दर आई व दरवाजा बन्द कर लिया । उसके कमरे में एक अजीब: सी उदासी फैली हुई थी-जेसै कमरे की हर शै उसकी याद में उदास हो।

पर्स वेड पर फेंककर उसने सबसे पहले उस नाजुक सै फूलदान की तरफ ध्यान दिया-जिसमें मायावी लोक की दी हुई गुलाब की कली सजी रहती थी। जो एक मुद्दत सै तरो ताजा थी और खुशबू बिखेरती रहती थी, लेकिन अब जो उसने कली पर नजर डाली तो वह कली फुत्तदान पर लटकी हुई नजर आई। कली मुरझा चुकीं थी । उसकी खुशबू भी खत्म हो चुकी थी ।

रासमोन ने रेखा को वह कली देते हुए कहा था कि जब यह कली मुरझा जाएगी तो समझ लेना कि वह इस दुनिया में नहीं रहा।

"ओह !" रेखा के दिल से एक हुक-सी उठी। यह क्या हो गया, वो क्यो मर गया? कली को देखकर अंदाजा होता था जैसें उसे मुरझाये हुए दस-बारह्र दिन हो चुके हों ।

"ओह्र ! " तो क्या रासमोन भी रेखा को किसी और की बनती देखकर बर्दाश्त न कर सका । अजीब स्थिति थी । अविश्वनीय, लेकिन सत्य ।

"रासमोन मुझें माफ कर देना । " रेखा ने उस सूखी कली को गुलदान से निकालकर अपने कोमल होंठ उस पर रख दिये। उसने अपनी आखें बन्द कर लीं।

दो आसू उसकी आखों' से निक्लकर उसके गालों पर वह आए ।

उसने वह सूखी कली अपने पर्स में डाल ली | तभी अचानक उसकी नजरें फूलदान पर पर्डी. । फुत्तदान के नीचे एक कागज दबा हुआ नजर आया।

उसने वह कागज उठा लिया उसे खोलकर देखा तो उस पर कुछ लिखा हुआ नजर आया । कुछ पक्तिया' थीं । वह उन्हें पडती, चली गई।
 
"मगनी वाली रात जब दीपक के साथ ही प्रेम सागर का भी अपरहण हो गया तो वह रात तुम पर कयामत की तरह टुटी । उस रात तुमने मुझें बहुत याद किया। तुम जानती हो कि मैं तुम्हें दुख में नहीं देख सकता । मैं तुम्हारी मदद को पहुच गया l मैने तुम्हारी जिन्दगी के काटे अपनी आखों से चुन लिये । दुश्मनों को चुन चुनकर मार दिया ।। अब तुम्हारी तुम्हारे भाई की जिन्दगी में कोई दुश्मन नहीं । मेरी शुभ कामनाएं तुम्हारे साथ है। सदा खुश रहो...यही दुआ कर सकता हू । तुम्हारा अपना--- काला चिराग .

पत्र पढते पढते, वे शब्द धुधलाने लगे और फिर देखते ही देखते उस कागज पर सै लुप्त हो गये । कोरा कागज रह गया । रेखा ने भावावेश में उस कागज को अपनी मुट्ठी में भीच लिया । उसके कापते' होंठों से निक्ला--- "आप बहुत महान है, काले चिराग । मेरी जिन्दगी की तमाम खुशियां आपके दम से है। आप मेरे मोहसिन हैं I मैं आपको प्रणाम करती हूं। मेरे दिल में आप किसी रोशन चिराग क्री तरह हमेशा जगमगाते रहेंगे । "

साबनपुर का सरबछ अब दीपक के हाथ में आ गया था । और दीपक ने सबके साथ पूरा पूरा इसाफ किया था । उसने अपने भाइयों विजय व सूरज कीं बीवियों व बच्चों को जो उनका हक बनता था-वह तो दिया ही-उसके अलावा भी उसने उन्हें बहुत कुछ बख्श दिया ।

इन्द्रजीत्त को सावनमुर और देहाती जिन्दगी व ग्रामीण वातावरण से दिली लगाव था। वह सावनपुर की अपनी पुश्तैनी हवेली को नये सिरे से बनाने के ख्वाब देखा करता था I आज उसका यह ख्वाब पूरा हो गया था । उसने यह हवेली खरीद ली थी। इस हवेली में जिसका जितना हिस्सा बनता था-वह इन्द्रजीत्त ने अदा कर दिया था।

ज़मीदाऱी के जुल्मों की प्रतीक इस हवेली क्रो तोडा, जा रहा था ।

हवेली के खातमे के साथ ही तो जर्मीदार रमाकात के जुल्मों की दास्ताने भुलाई जा सकती थीं । रमाकांत क्रो अपने जुल्मों का हिसाब देना पडा था । उसके पार्थिव शरीर को तो चिता' की आग भी नसीब नहीं हो सकीं थी।

पर मरने के बाद भी जैसे उस दुष्टात्मा को दूसरो की खुशियां बर्दाश्त नहीं थीं ।

जिस ठेकेदार क्रो हवेली तोडने. का काम दिया गया था-उसके लिए यह काम जारी रखना मुश्किल हो रहा था। यह भूतहा वाकया जेसे जेसे बार-बार सामने आ रहा था-त्यों-त्यों मजदूर भागते जा रहे थे।

पहले ठेकेदारर क्रो भी इस अनहोनी पर विश्वास न था, लेकिन जव उसने अपनी आखों सै वह सब कुछ देखा...तो उसे भी मजदूरो' की बात का यकीन करना पडा और अब इसके सिवाय कोई चारा नहीं था कि वह दिल्ली जाए ओर इन्द्रजीत्त को सारी सूरतें हाल बता दे, क्योकि इस भयावह मजर' क्री दहशत से एक कमजोर दिल मजदूर बुखार का शिकार होकर चल बसा था।

और मजदूरो' की दहशत बेवजह भी न थी।

हो यह रहा था कि जेसे ही हवेली का कोई नया कमरा तोडा जाता तो उसे कमरे में जमीदार रमाकांत' की वह ऊची' कुर्सी मौजूद होती, जिस पर बैठकर बौ इन्सान नहीं रहता था और इस कुर्सी पर एक भयानक खोपडी. रखी होती थी । यह देख जब दरवाजा खोलने वाले मजदूर खौफ के मारे भागकर हवेली में काम करते हुए दुसरे मजदूरों इकट्ठा करते, उन्हे उस कमरे में लाते तो वह कुर्सी खोपडी. गायब हो जाती।

ठेकेदार ने जब इस प्रेत लीला की दास्तान इन्द्रजीत को सुनाई ।।

तो वह फौरन ही सावनपुर जाने के लिये तेयार हो गया और उसके साथ चल दिया ।

सावनपुर के निक्ट उन्हें बारिश ने आ घेरा I तेज हवा व मूसलाधार वारिश सावनपुर की कच्ची सडके। इन्द्रजीत्त बडी… सम्भालर जीप चला रहा था । ठेकेदार उसके बराबर वाली सीट पर बैठा था।

एक घन्टे पहले तक मौसम अच्छा खास खुशगवार था । बस जेसे जेसे वे सावनपुर के करीब पहुचते गए काली घटाओ ने दोपहर के चमकते सूरज को अपनी पनाह में ले लिया। दिन होते हुए भी चारों तरफ अंधेरा छा गया । इतना अंधेरा कि इन्द्रजीत को जीप की हैड लाइट्स आन करनी पडी।

यूं अचानक बदले इस मौसम में वे थोड़ा-सा ही आगे बडे थे कि उन्हें हेड लाइट्स की रोशनी मे सड़क के बीचो बीच एक श्वेत वस्त्रधारी बुजुर्ग दिखाई दिये जो अपने दोनों हाथ फैलाये खडे थे।

इन्द्रजीत ने फौरन गाडी रोक ली व बन्द जीप की खिडकी, का शीशा उतारकर पूछा

"क्या बात है बाबा ? "

"कोई बात नहीं है बेटा! मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था कि तुम आ जाओ तो तुम्हारे साय सावनमुर चलूं। "

इन्द्रजीत इन बुजुर्ग का मंतव्य नहीं समझ सका, फिर भी उसने पिछला दरवाजा खोल दिया और बोला--"आ जाइये। "

वह बुजुर्ग बडे इत्मीनान से गाडी… में बैठ गए। गाडी स्टार्ट करने से पहले इन्द्रजीत ने गर्दन मोडकर इन बुजुर्ग पर नजर डाली I और उसके आश्चर्य सीमा न रही-जब उसने देखा कि बारिश मॅ खडे होने के बाबजूद उनके कपडे, बिल्कुल सूखे थे। इन्द्रजीत ने उनका चेहरा गोर से देखने के लिए बैक-व्यू-मिरर का कोण ठीक किया । वह एक उम्रदराज बुजुर्ग थे । सफेद लिबास, सिर पर सफेद टोपी भौहें तक सफेद. लेकिन चेहरे पर सुर्खी...एक दिव्य सी आभा । उनके बैठते ही जीप में एक मुग्ध कर देने वाली खुशबू फैल गई थी।

"वेटा, अब मुझे देखते ही रहोगे या गाडी. भी आगे बढाओगे। तुम उस शेतान के बच्चे को नहीं जानते I आज उसने रक्तपात करने का फैसला कर रखा है । " बडे, ठण्डे स्वर में बडी अजीब सी बात कर दी थी।

इन्द्रजीत ने घबराकर गाडी स्टार्ट की और घबराकर पूछा “आप किसकी बात कर रहे है?"

"उस खोपडी, वाले की जो मरने के बाद भी कुर्सी छोडने. को तैयार नहीं। मेरी बात समझ गए हो या उस शेतान की औलाद का नाम भी लूं। " बुजुर्ग ने आगे को झुकत्ते हुए जवाब दिया था । अब कुछ कहने सुनने की जरूरत कहा रही थी? अब तो इंद्रजीत जल्द से जल्द हवेली जाना चाहता था। हवेली पहुचते' पहुचते' बारिश बंद हो गई थी I बादल फट गए थे और सूरज फिर से निंक्ल आया था।

उन बुजुर्ग ने इन्द्रजीत को रमाकांत के बेडरूम की तरफ चलने को कहा।

रमाकांत का बेडरूम तोडा जा चुका था। अलबत्ता उसकी कुर्सी बाकी थी। इन्द्रजीत बाबा को बेडरूम के पास ले गया फिर उसने जल्दी-जल्दी उन के आदेशानुसार सूखी लकडियों. के ढेरों से उस कमरे क्रो भरवा दिया ।

वह बुजुर्ग लकडियों. के ढेर सै थोडे फासले पर एक पत्थर पर बैठ गये।

उनके होंठ हिले और बह कुछ पढने. लगे। फिर उन्होंने पढते. पढते इन्द्रजीत्त क्रो इशारा किया । इन लकडियों. पर मिट्टी का तेल छिडका जा चुका था। इशारा पाते ही इन्द्रजीत ने लकडियों के ढेर को आग लगा दी I

देखते-ही देखते आग के शोले आकाश से बातें करनै लगे। हवेली से शोले उठते देखकर सावनपुर के लोग हवेली की तरफ भागे । फिर इन्द्रजीत ने एक अजीब नजारा देखा। उसने एक कुर्सी आग के शोलों पर उतरते देखी । इस पर एक भयानक खोपडी रखी हुई थी I देखते हौ-देख़त्ते वह शोलों में गिरी और तब एक दिल दहला देने वाली चीख सुनाई दी l

फिर कुछ बाकी न बचा। न वह कुर्सी रही, न सत्ता रही, न कुर्सी वाला रहा। सब कुछ जलकर भस्म हो गया I इन्द्रजीत्त फौरन पलटकर उन बुजुर्ग की तरफ भागा,लेकिन ठिठक गया। वहां कुछ नहीं था। वह पत्थर खाली पड़ा था जिस पर वह बुजुर्ग बेठे । इन्द्रजीत इन तिलस्मी शक्तियों क्रे चक्रव्यूह से निकलकर आया था । पुण्य आत्माओं व दुष्टात्माओ के चमत्कारों सै वाकिफ था । साफ था, कोई पुण्यात्मा जो रमाकांत' कीं दुष्टात्मा से हवेली को मुक्त कराने को उसके साथ चली आई थी।

पर वह बुजुर्ग थे कौन? उनसे यह पूछने की हसरत इन्द्रजीत्त के दिल में ही रह गई थी ।

बाद में. .. ।

दिल्ली ।

जब इन्द्रजीत ने पूरी घटना रेखा और प्रेम सागर को सुनाई तो, रेखा ने उन का हुलिया पूछा। इंद्रजीत ने उनका हुलिया बताया।

और उन का हुलिया सुनते ही रेखा खुशी से र्चीखी "अरे. वह दादा हरिओम थे, भैय्या । "

भूत प्रेतों के चक्करो में फसे इन्द्रजीत और रेखा की कदम-कदम पर मदद करने वाले दादा हरिओम की पुण्यात्मा ने आखिर उन्हे हवेली के प्रेत से मुक्ति दिला दी थी l

स्माप्त
 

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