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Horror ख़ौफ़

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साहिल ने सत्रहवीं बार रुमाल से चेहरे का पसीना पोछा। पसीने के आधिक्य के कारण उसका रुमाल अपना प्राकृतिक सफ़ेद रंग खो चुका था। उसके बदन पर मौजूद कपड़े इस कदर भीगे हुए थे मानो वह किसी तालाब में डुबकी लगा कर आया हो। बस ने उसे शंकरगढ़ से चार कि.मी. पहले ही छोड़ दिया था। गाँव तक का फासला तय करने के लिए कोई अन्य विकल्प उपलब्ध न होने के कारण उसे पदयात्रा करनी पड़ रही थी। उसने प्रशासन का इस बात के लिए शुक्रिया अदा किया कि बस स्टैंड से गाँव तक के लिए पक्की सड़क मुहैया थी, अन्यथा गत रात्रि हुई भीषण बारिश के कारण खराब हो चुके मिट्टी के रास्ते पर चलने में उसे अच्छी-खासी कठिनाई का सामना करना पड़ सकता था। साहिल आज ढंग से महसूस कर रहा था कि बारीश के बाद की धूप असहनीय होती है। उसे इस धूप में चलते हुए लगभग पैंतालीस मिनट होने को आए थे। थोड़ी दूर पर गड़े माइलस्टोन पर ‘शंकरगढ़- १ कि.मी.’ लिखा नजर आया। उसने राहत की सांस ली क्योंकि उसकी पचहत्तर फीसदी पदयात्रा पूरी हो चुकी थी।

अब तक की पदयात्रा के दौरान उसे दूर-दूर तक बंजर भूमि और ऊंचे-ऊंचे टीले ही नजर आए थे, किन्तु अब वह जैसे-जैसे बस्ती के निकट पहुंच रहा था वैसे-वैसे बंजर भूमि का स्थान हरे-भरे खेत लेते जा रहे थे। पसीने के रूप में शरीर से अधिक मात्रा में पानी बाहर निकल जाने के कारण इस वक्त उसे पानी की नितांत आवश्यकता थी। ‘खेतों की सिंचाई के लिए आस-पास कोई ट्यूब वेल जरूर होगा।’ इस उम्मीद में उसने दूर तक फैले खेतों पर दृष्टि दौड़ायी। लगभग दस मिनट में तय किये जा सकने वाले फासले पर उसे ट्यूब वेल की लाल कोठरी नजर आयी। वहां स्थानीय लोगों की मौजूदगी देख उसने अनुमान लगाया कि ट्यूब वेल चल रहा था।

वह ट्यूब वेल तक पहुंचा। वहां लगभग दस की तादात वाली छोटी सी भीड़ थी। जिसमें लड़कों के अलावा दो-चार वयस्क भी थे। कुछ लोग ट्यूब वेल की बड़ी टंकी में उछल-कूद कर रहे थे, कुछ कपड़े उतारकर केवल अंडर गारमेंट पहने हुए टंकी में कूदने लायक जगह होने की राह देख रहे थे और कुछ छोटी टंकी के पास बैठकर कपड़ों पर साबुन घिस रहे थे।

अपने बीच साहिल के रूप में एक अजनबी को पाकर टंकी में ‘छपाक-छई’ कर रहे लड़के अपनी हरकतें रोक कर उसे घूरने लगे, किन्तु साहिल ने उन्हें नजरअंदाज करते हुए वाटर बॉटल निकाला और उसे भरने के बाद एक तरफ खड़ा होकर चेहरा धोने लगा। इस कार्य में कई बॉटल पानी खर्च करने के बाद उसने पीने हेतु बॉटल में साफ़ पानी भरा और प्रस्थान को उद्यत हुआ ही था कि एक आदमी पूछ बैठा-

“शहर से आये हो क्या भाई साहब?”

“जी हाँ! शंकरगढ़ को जाना है।” साहिल ठिठका।

“किसके यहाँ?” किसी दूसरे ने पूछा।

“राजमहल।” साहिल ने राजमहल नाम इसलिए लिया क्योंकि उसे मालूम था कि उसका गंतव्य शंकरगढ़ और आस-पास के गाँवों में ‘राजमहल’ के नाम से विख्यात है।

“राजमहल?” कई लोगों ने समवेत स्वर में कहा- “लेकिन वहां क्यों जा रहे हो शहरी बाबू? वहां तो पहले से ही कोहराम मचा हुआ है।”

“कोहराम मचा हुआ है?” साहिल के माथे पर सिलवटें उभरीं- “क्या मतलब?”

लोगों ने एक दूसरे को घूरा, मानो इस सवाल का जवाब तलाश रहे हों कि एक अजनबी के सामने राजमहल की घटनाओं का जिक्र करना उचित है या नहीं? अंतत: उनमें से एक ने कहा- “ठाकुर साहब की बिटिया संस्कृति है उस कोहराम की वजह।”

“लेकिन कैसे?” संस्कृति का जिक्र सुनकर साहिल रोमांचित हुआ।

“रसूख वाले लोगों का मामला है इसलिए अन्दर की पूरी बात तो हमें नहीं मालूम लेकिन इतना जरूर मालूम है कि ठाकुर साहब की बिटिया को तहखाने में एक ताबूत मिला है।”

“लेकिन अचरज की बात तो ये है भइया कि उस तहखाने तक उनकी बिटिया पहुँची कैसे? जबकि वह तहखाना तो परिवार के लोगों तक की आँखों से ओझल था।” किसी अन्य ने कहा।

“अरे इसमें अचरज जैसी कोई बात ही नहीं है कन्हैया।” एक आदमी ने कन्हैया नाम के उस आदमी को घूरा- “राजमहल में काम करने वाले बंशीधर ने बताया कि ताबूत में से कोई संस्कृति को बुला रहा था। उसी बुलावे का पीछा करते-करते वह तहखाने तक पहुँची थी।”

साहिल को जेहन में घंटियाँ बजती महसूस हुईं । उसने सम्मोहित अवस्था में पूछा- “ता...ताबूत से भ..भला आवाज कैसे आ सकती है?”

“नहीं आ सकती...।” आदमी ऐसी भाव-भंगिमाएं बनाते हुए बोला जैसे साहिल को डरा रहा हो- “ताबूत से आवाज नहीं आ सकती, इसीलिए तो राजमहल में कोहराम मचा हुआ है।”

साहिल खामोश रह गया। प्रतिक्रिया के लिए उसके पास शब्द नहीं थे।

“क्या हुआ शहरी बाबू? डर गये क्या?” ताबूत का जिक्र करने वाले आदमी ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा। उस आदमी की शारीरिक भाषा देख साहिल को एक पल के लिए महसूस हुआ कि वह आदमी उसे अजनबी समझ कर परेशान कर रहा है, किन्तु इस मुद्दे के छिड़ जाने के बाद अन्य लोगों के चेहरे पर नजर आने वाला दहशत देख साहिल को उसकी बातों में सच्चाई नजर आयी।

“क्या सचमुच ऐसा ही कुछ हुआ था?” उसने आशंकित स्वर में पूछा।

“बिल्कुल ऐसा ही हुआ था।” इस बार दूसरे आदमी ने कहा- “वैसे भी राजमहल में जो कुछ भी हो जाए कम ही है। उस खानदान का इतिहास ही खून से लिखा गया है। हम तो हमारे दादा-परदादा के मुंह से राजमहल के पुरखों के जुल्म-ओ-सितम के किस्से सुनते आये हैं। सोयी रही होगी कोई अतृप्त आत्मा उस ताबूत में, जो जवान लड़की की आहट पाते ही जाग उठी है।”

“लेकिन...लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है?”

“क्यों नहीं हो सकता भाई साहब? पुरखों ने जो जुलुम (जुल्म) किया है उसका हिसाब-किताब आने वाली पीढ़ियों को ही चुकता करना होगा न? कुछ लोग तो ऐसा भी कहते हैं कि वह राजमहल किसी ब्रह्मपिशाच के साए में हैं।”

“ब्रह्मपिशाच?” साहिल का असमंजस भरा स्वर- “ये ब्रह्मपिशाच कैसे प्राणी होते हैं?”

“प्राणी नहीं; पिशाच होते हैं। कुछ लोग उन्हें ब्रह्मराक्षस भी कहते हैं।”

“ओह।” साहिल के लिए यह नाम नया नहीं था, उसने इस विषय में और अधिक जानने के ध्येय से सवाल किया- “क्या आप इस बारे में और कुछ बता सकते हैं? मेरा मतलब है कि वह ब्रह्मराक्षस कौन है? राजमहल किस प्रकार उसके साए में आया?”

लोगों ने एक दूसरे की ओर देखा। उनके हाव-भाव ने दर्शाया कि उन्हें जो कुछ मालूम था उसे बताने में वे हिचकिचा रहे थे। टंकी में उछल-कूद कर रहे लड़कों की भी इस वार्तालाप में रूचि जाग उठी थी। वे भी उनकी बातों को तन्मयतापूर्वक सुनने लगे थे।

“पहले आप ये तो बताइये कि आप राजमहल जा क्यों रहे हैं?”

“मैं एक आर्टिस्ट हूँ। कुछ दिन पहले एक समारोह के लिए राजमहल वालों ने मुझसे कुछ बैनर, पोस्टर और इनविटेशन कार्ड डिजाईन करवाए थे, उसी का पेमेंट लेने जा रहा हूँ।” साहिल को मालूम था कि कुछ दिन पहले ही संस्कृति के घर वापसी की खुशी में समारोह का आयोजन हुआ था, इसलिए उसने समारोह का नाम लेकर सफल झूठ बोला।

“तब तो आपको असली बात बताने में कोई हर्ज नहीं है। हमें लगा कि आप

राजमहल वालों के चमचे हैं, इसलिये आपको उनका राज बताने में हिचकिचा रहे थे।”

“आखिरकार वह राज है क्या?” साहिल की उत्कंठा चरम पर पहुँच गयी।

“वैसे तो राजमहल के इतिहास में उनके पूर्वजों की कई खौफनाक कहानियाँ दर्ज हैं, लेकिन जिस कहानी को सुनकर आज भी शंकरगढ़ के लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं वह कहानी माया और अभयानन्द की है। माया शंकरगढ़ के राजघराने की एकलौती राजकुमारी थी, जबकि अभयानन्द राज्य का ही एक ब्राह्मण था। कोई नहीं जानता था कि वह शंकरगढ़ में कहाँ से आया था? लोगों को उसके ब्राह्मण होने का कैसे पता चला? यह भी एक रहस्य ही है, जो हमें भी नहीं मालूम है। गाँव के बड़े-बूढ़े बताते हैं कि अभयानन्द की दृष्टि माया पर थी। उसके बारे में प्रचलित था कि वह दक्षिण की श्मशान भूमि के उस पार फैले घने जंगलों में रहने वाले कापालिकों के पास काली विद्या सीखने के लिए जाता था। ज्यों ही राजा उदयभान सिंह को पता चला कि अभयानन्द कापालिकों के संपर्क में हैं और माया पर बुरी नजर रखता है त्यों ही उस दुराचारी ब्राह्मण पर कहर टूट पड़ा। राजा के आदेश पर शंकरगढ़ के लोगों द्वारा उसे पीपल के पेड़ से बांधकर जिन्दा जला दिया गया, क्योंकि उन दिनों यह बात प्रचलित थी कि काली विद्याओं में लिप्त लोगों को ज़िंदा जला देने से उनके प्रभावों और कुकृत्यों का दमन हो जाता है। आपको रास्ते में पीपल का वह पेड़ नजर आया भी होगा। उस पेड़ के इर्द-गिर्द बने चबूतरे पर पिंजरे जैसे मंदिर में एक मूर्ति है, जिसे राजमहल वालों द्वारा ब्रह्म बाबा मानकर पूजा जाता है। ये ब्रह्म बाबा कोई और नहीं ठाकुर खानदान के उस वक्त के पुरोहित दिव्यपाणी हैं, जिन्होंने प्राणाहुति देकर अभयानन्द के प्रकोप से शंकरगढ़ के साथ-साथ राजमहल वालों को भी मुक्ति दिलाई थी।”

“इस प्रकार तो अभयानन्द एक बुरा इंसान साबित होता है, यदि उसे ज़िंदा जलाया गया तो इसमें गलत क्या किया गया?”

“अभयानन्द भले ही बुरा था, लेकिन था तो इंसान ही, और इंसान भी साधारण नहीं बल्कि एक ब्राह्मण, जिन्हें उन दिनों ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। उसने माया पर बुरी नजर डाली थी, लेकिन उसका कोई अहित तो नहीं किया था न? फिर उसे ज़िंदा जला देने की क्या जरूरत थी? राज्य के क़ानून में उसके कुकर्मों के लिए और सजाएं भी तो रही होंगी।”

“ओह! लेकिन जब अभयानन्द को ज़िंदा जला दिया गया था, तो फिर उसके किस प्रकोप को मिटाने के लिए दिव्यपाणी को प्राणाहुति देनी पड़ी?”

“शंकरगढ़ के लोगों को अभयानन्द की असली ताकत का अंदाजा उसकी मौत के बाद लगा। अभयानन्द को जलाए जाने के तीन दिनों के भीतर ही शंकरगढ़ में एक दहशत फ़ैली। शुरूआती दौर में उस दहशत के चपेट में लोगों के गाय, बकरी, भेड़ जैसे पालतू पशु आये। रात के अँधेरे में कोई उन्हें उनके खूंटे से छुड़ा ले जाता था, फिर सुबह दक्षिण के मरघट में उन चौपायों की लाश पाई जाती थी। उनके सिर किसी धारदार हथियार से धड़ से अलग किये गये होते थे। उन्हें जिस प्रकार चीरा-फाड़ा गया होता था, उसे देखकर गांव वाले यही अंदाजा लगाते थे कि पशुओं को उठाने वाला कोई वहशी जानवर था, किन्तु फिर एक दिन ऐसा हादसा हुआ जिसने शंकरगढ़ वालों की इस गलतफहमी को दूर कर दिया कि उनके पशुओं को कोई वहशी जानवर उठा ले जाता था।”

“क्या हुआ था?” साहिल का लहजा कांपा।
 
“पशुओं की चोरी बहुत अधिक बढ़ जाने के कारण लोग अपने-अपने चौपायों को घर के भीतर बांधने लगे थे तथा शिकायत मिलने पर राजा ने भी रात के समय अपने आदमियों की गश्त बढ़ा दी थी। परिणाम ये हुआ था कि दो दिनों तक किसी के भी चौपाये चोरी नहीं हुए थे। किन्तु फिर तीसरे दिन दक्षिण के मरघट में बेहद दर्दनाक घटना घटी।” बताने वाले आदमी की भाव-भंगिमाएं बड़ी तेजी से परिवर्तित हुयीं। उसकी आँखें हैरतंगेज ढंग से बड़ी हो गयीं और लहजा सर्द हो गया। उसने आगे कहा-“उस दिन आधी रात को शंकरगढ़ में कुछ लोगों की तेज चीख-पुकार गूंजी थी। सारे लोग आधी नींद से जाग गये थे। बाहर निकलने पर उन्होंने पाया था कि चीख-पुकार मचाने वाले वे लोग थे, जो लगभग घंटे भर पहले ही एक लाश के क्रियाकर्म के लिए मरघट में गये थे। वे लोग इतने डरे हुए थे कि ढंग से कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे। उस रात गर्मी अधिक नहीं थी लेकिन उनके जिस्म पसीने से इस कदर भीगे हुए थे, जैसे वे किसी नदी में डुबकी लगा कर आये हों। काँप तो ऐसे रहे थे मानो उनके सामने मौत खड़ी हो। बहुत प्रयास करने पर एक आदमी ने मुंह खोला था। उसने टूटे-फूटे लहजे में केवल इतना कहा था कि मरघट में कोई जानवर आया है, जिसने सजीवन पर हमला कर दिया है।”

“ये सजीवन कौन था?”

“उन्हीं लोगों में से एक था, जो लाश का क्रियाकर्म करने गये थे।”

“फिर क्या हुआ?”

“उस आदमी की बात सुनते ही सारे शंकरगढ़ के लोग लाठी और मशाल लेकर मरघट की ओर चल पड़े थे। लोगों के मरघट पहुँचने तक अनहोनी घट चुकी थी। यानी कि सजीवन मारा जा चुका था। हैरत की बात तो ये थी कि उसकी लाश की हालत भी बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी चौपायों के लाशों की होती थी। अब इतना तो तय हो चुका था भाई साहब कि सजीवन की हत्या करने वाला भी वही था जिसने चौपायों की हत्या की थी। चौपायों की भांति सजीवन की गर्दन भी किसी धारदार हथियार से धड़ से अलग की गयी थी। उसकी आंतें बाहर बाहर खींच ली गयी थीं। शरीर पर नोचे-खसोटे जाने के भी निशान थे। मारने वाला वहां नहीं था, लेकिन लाश के पास खून से सने उसके पंजों के निशान जरूर थे, जिसे गाँव वालों ने आसानी से पहचान लिया था। उनके अनुसार खून से सने वे पंजे किसी भेड़िये के थे।”

“जो अन्य लोग लाश के क्रियाकर्म के लिए गये थे, उन्होंने तो उस जानवर को देखा रहा होगा। क्या उन्होंने इस बात की पुष्टि नहीं की कि वह कैसा जानवर था, कौन सा जानवर था?”

“खौफजदा होने के कारण तत्काल तो वे लोग कुछ भी नहीं बता पाए थे, लेकिन कुछ दिन बाद हालत सामान्य होने पर उन्होंने बताया था कि अँधेरे में से निकल कर सजीवन पर अचानक जिस जानवर ने हमला किया था वह एक भेड़िया था, दो पैरों पर चलने वाला भेड़िया।”

“व्हाट? दो पैरों पर चलने वाला भेड़िया?” साहिल का आश्चर्यमिश्रित स्वर।

“जी हाँ भाई साहब। दो पैरों पर चलने वाला भेड़िया। उन लोगों ने बताया था कि उसका कद गाँव के सबसे लम्बे आदमी अकरम पहलवान से भी ऊँचा था। उसके एक लम्बी पूंछ थी। कान, आँखें, दांत, शक्ल; सब-कुछ भेड़िये जैसा था।”

“ओह! तो क्या उन दिनों वेयरवुल्फ वजूद में थे? मैंने तो आज तक इन्हें केवल हॉलीवुड फिल्मों में ही देखा है।” साहिल ने स्वयं से कहा।

“वेयरवुल्फ मतलब?” आदमी ने चेहरे पर नासमझी का भाव लिए हुए पूछा।

“गाँव वालों ने भेड़िये के पंजों के जो निशान देखे थे, वे कहाँ तक गये थे?” साहिल ने आदमी के सवाल को नजरअंदाज करते हुए पूछा, क्योंकि वह उसे वेयरवुल्फ का मतलब समझाने में वक्त बर्बाद किये बिना अपनी उत्कंठा शांत करना चाहता था।

“खून से सने पंजों के निशान मरघट से बाहर निकलने के बाद जंगल में चले गये थे। उन दिनों उस जंगल में डरावने कापालिक रहा करते थे, जो शैतान की पूजा करते थे और तांत्रिक शक्तियां प्राप्त करने के लिए उसे नरबली चढ़ाया करते थे। इसलिए उस रात कोई भी गांव वाला जंगल में जाकर उस भेड़िये को ढूँढने का

साहस नहीं कर सका था।”

“फिर इसके बाद क्या हुआ था?”

“जो भी हुआ था बहुत बुरा हुआ था। असल में भेड़िये द्वारा लोगों को चीरे-फाड़े जाने का सिलसिला सजीवन की हत्या से शुरू होकर कई दिनों तक चला था। कई लोग भेड़िये की भूख की भेंट चढ़े। लोग मानने लगे कि मरघट में एक भेड़िया रात के अँधेरे में लोगों को मौत बाँटता है। यदि गाँव में रात को किसी मौत होती थी तो लोग दिन का उजाला फ़ैल जाने के बाद ही उसके दाह-संस्कार के लिए मरघट में जाते थे। इस बात की भनक भेड़िये को लग गयी कि लोगों ने रात को मरघट में आना बंद कर दिया है, इसलिए अपनी भूख मिटाने के लिए वह रात को शंकरगढ़ में आने लगा। वह लोगों को घरों से बाहर निकालने के लिए उनके दरवाजे खटखटाता था। इंसानों की भाषा में उनसे मदद की गुहार लगाता था, और उनके बाहर आते ही उनके खून से अपनी प्यास बुझा लेता था।”

“एक मिनट...एक मिनट!” साहिल ने उसे आगे बोलने से रोका- “वह वेयरवुल्फ आई मीन भेड़िया इंसानों की भाषा कैसे बोल लेता था?”

साहिल की बात सुन लोगों ने एक-दूसरे की ओर देखा। कहानी सुनाने वाला आदमी यूं मुस्कुराया मानो साहिल ने कोई बेवकूफाना सवाल पूछ लिया हो।

“मेरे सवाल का जवाब दो।” साहिल का व्यग्र स्वर।

“वह भेड़िया इंसानों की तरह दो पैरों पर चलता था, ये जानने के बाद भी शायद आप ये नहीं समझ पाए कि वह भेड़िया कोई साधारण भेड़िया नहीं बल्कि अभयानन्द का ही पैशाचिक रूप था। वह मरने के बाद पिशाच बन गया था; ब्रह्मपिशाच, जिसे दुनिया वाले ब्रह्मराक्षस भी कहते हैं। वह प्रतिशोध साधने के लिए शंकरगढ़ में लौट आया था।”

“ओह माय गॉड!” साहिल ने दहशत भरे स्वर में कहा- “यानी कि मैंने ब्रह्मराक्षस के बारे में जो कुछ पढ़ा था वह सच है। हर ब्रह्मराक्षस का एक पशु रूप होता है और ये लोग जिस ब्रह्मराक्षस की बात कर रहे हैं, उसका पशु रूप नरभेड़िया था।”

“जहाँ कहीं ये लिखा गया है, बिल्कुल सही लिखा गया है साहब।”

“अभयानन्द के मारे जाने के बाद माया का क्या हुआ? क्या ब्रह्मराक्षस बनने के बाद अभयानन्द ने उस पर भी हमला किया था? दिव्यपाणी ने उस पिशाच से शंकरगढ़ वालों को छुटकारा कैसे दिलाया था?”

“माया के बारे में हमें कुछ अधिक नहीं मालूम है। राजमहल वाले अभयानन्द वाला काण्ड कभी जुबान पर नहीं लाते। हमने जो कुछ आपको बताया उसे अपने बाप-दादा के जरिये सुन रखा है। वे बताते थे कि राजमहल के पुरोहित दिव्यपाणी ने कोई अनुष्ठान किया था, उस अनुष्ठान के पूरे हो जाने के बाद उन्होंने उसी पीपल के पेड़ के नीचे स्वेच्छा से प्राण त्याग दिया था। कहा जाता है कि दिव्यपाणी आज भी उस पीपल के पेड़ पर निवास करते हैं और हर किस्म के प्रकोपों से शंकरगढ़ की रक्षा करते हैं। राजमहल वाले ब्रह्म बाबा के रूप में दिव्यपाणी की ही तो पूजा करते हैं। शरीर त्यागते वक्त दिव्यपाणी ने राजा उदयभान सिंह को ये चेतावनी भी दी थी कि आने वाली पीढ़ी को अभयानन्द प्रकरण की भनक न लगने पाए।”

“यानी कि जो कहानी आप लोगों ने मुझे सुनाई, उसके बारे में राजमहल वालों को कुछ नहीं मालूम होगा?”

“कुछ कहा नहीं जा सकता भाई साहब। जो कुछ ठाकुर की बेटी के साथ तहखाने में हुआ, उसके बाद राजमहल के वर्तमान कुलगुरु ने उन्हें उनके इतिहास के बारे में कुछ न कुछ तो जरूर बताया होगा।”

राजमहल के भयानक इतिहास से अवगत होने के बाद साहिल को कई कड़ियाँ जुड़ती नजर आने लगीं। यश का स्केच बनाना, उसका कोमल से माया का जिक्र करना और इन्टरनेट पर लगातार दो दिनों तक ब्रह्मराक्षस के विषय में खोज करना; ये घटनाएं भी इसी ओर संकेत कर रही थीं कि माया और ब्रह्मराक्षस का; उसके याद्दाश्त जाने की घटना से कोई न कोई कनेक्शन जरूर था।

“क्या सोचने लगे भाई?” साहिल को विचारमग्न देख एक आदमी ने उसे टोका।

“क...कुछ नहीं।” उसकी तन्द्रा भंग हुई- “मुझे बातें करते हुए काफी देर हो गयी। अब चलना चाहिए। शाम तक शहर वापस भी लौटना है।”

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वैभव की आखिरी चीख केवल शहर में ही नहीं, शंकरगढ़ में भी गूंजी थी। उसकी मौत ने न केवल सूबे की सियासत में बल्कि राजमहल में भी भूचाल ला दिया था। मृत्युंजय, बेटे के चिता पर भी सियासत की रोटियां सेंकने से बाज नहीं आया और वैभव की हत्या को अपोजिशन की गहरी साजिश बताते हुए पूरे अपोजिशन को ही निशाने पर ले लिया। वहीं दूसरी ओर वैभव की मौत का समाचार मिलते ही दिग्विजय ठाकुर को कुलगुरु की भविष्यवाणी याद आ गयी।

उनकी घबराहट के चरम पर पहुंचने में जो कसर बाकी रह गयी थी, उसे सुजाता ने उन्हें यह बताकर पूरा कर दिया कि पिछली रात संस्कृति को पूर्वाभास हुआ था और उसने महसूस किया था कि कहीं कुछ अप्रत्याशित घटित होने वाला है। शहर में अटकलों का बाजार गर्म था और राजमहल में दहशत का।

“तबीयत कैसी है अब संस्कृति की?” दिग्विजय ने खिड़की के पास खड़ी सुजाता से पूछा।

“कल रात देर से नींद आने के कारण आज सुबह दस बजे तक सोती रही। मैंने उसे ये सोचकर जगाना आवश्यक नहीं समझा था कि कम से कम जब तक सोई रहेगी तब तक दहशत से दूर रहेगी।”

“इस समय क्या कर रही है?”

“अपने कमरे में है। शतरूपा है उसके साथ।”

दिग्विजय ने कुछ नहीं कहा और सेंटर टेबल पर पड़ा अखबार उठाकर हैडलाइन पर सरसरी नजर डालने लगे। वे वैभव की हत्या की खबर सुबह से लेकर अब-तक कई दफे पढ़ चुके थे। टिवी पर इस भयानक हत्याकाण्ड की लाइव रिपोर्टिंग भी देख चुके थे। सुजाता उनके पास आयीं और थोड़े चिंतित स्वर में पूछीं- “कुलगुरु ने आपको क्या बताया था?”

“कुछ विशेष नहीं।” दिग्विजय ने अखबार एक ओर रखने के बाद चश्मा उतारकर सेंटर टेबल पर रखा और कुर्सी की पुश्त से सिर टिका लिया।

“फिर भी कुछ तो बताया ही होगा न?” सुजाता का लहजा थोड़ा व्यग्र हुआ।

“बस इतना कि ताबूत की आवाज संस्कृति को जिस नाम पुकार रही थी, उस नाम की एक राजकुमारी हमारे खानदान में जन्मी थी और उस पर राज्य के ही एक ब्राह्मण अभयानन्द की कुदृष्टि थी। वह ब्राह्मण कापालिकों के सम्पर्क में था। चूंकि राज्य में तंत्र-साधना निषेध थी इसलिए उसने कापालिकों से सम्बन्ध बना कर अपराध किया था और इस अपराध के दण्डस्वरूप उसे पीपल के पेड़ से बांधकर जिन्दा जला दिया गया था।”

“हे ईश्वर!” सुजाता भयभीत हुईं- “तो क्या अभयानन्द लौट आया है? और हमारी बेटी को माया का पुनर्जन्म समझकर परेशान कर रहा है?”

“शायद! कुलगुरु ने भी ऐसी ही संभावना व्यक्त की है।”

“तो फिर....तो फिर अब क्या होगा?”

“उपाय तलाशने के लिए वे पहले हमारे खानदान का इतिहास पढ़ेंगे।”

सुजाता कुछ नहीं बोलीं। चेहरे पर चिंता के भाव लिए हुए दिग्विजय के पास ही पड़ी एक दूसरी कुर्सी पर बैठ गयीं। जब उनके मध्य खामोशी अधिक लम्बी हो गयी तो सुजाता ने कहा- “कुलगुरु ने वैभव को लेकर जो भविष्यवाणी की थी वह भविष्यवाणी भी आखिरकार सच हो गयी। संस्कृति को वैभव की हत्या का पूर्वाभास भी हुआ। ये सब-कुछ बेहद डरावना है। राजमहल पर कोई बड़ा संकट आने वाला है।”

“मुझे भी ऐसा ही लग रहा है।” दिग्विजय ने आंखे बन्द कर ली थीं। बन्द आंखों के साथ ही उन्होंने आगे कहा- “तहखाने में उतर कर संस्कृति ने जरूर किसी ऐसे रहस्य को छेड़ दिया है, जिसे हमारे पूर्वज भी हमारे सामने नहीं आने देना चाहते थे।”

“पिछली रात संस्कृति को न जाने क्यों ऐसा लगा था कि उस स्थान से ताबूत को किसी ने निकाल लिया है, जिस स्थान पर उसे दफनाया गया था।”

इससे पहले कि सुजाता के कथन पर दिग्विजय कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करते,

बाहर से कुछ आवाजें आयीं।

“शोर कैसा है?” दिग्विजय खिड़की की ओर लपके।

इस वक्त वे सुजाता के साथ जिस कमरे में थे, वह कमरा राजमहल की दूसरी मंजिल पर था, और खिड़की से राजमहल का प्रवेश व्दार स्पष्ट नजर आता था।

प्रवेश व्दार पर एक नवयुवक था, जो दरबानों से अन्दर आने के लिए बहस कर रहा था। पहनावे से वह शहरी मालूम होता था। उसके पीठ पर एक लैपटॉप बैग और हाथ में पानी का बॉटल था। उसकी हालत देखकर लग रहा था कि वह पैदल ही लम्बी दूरी चल कर आया था। दरबानों व्दारा रोके जाने पर वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा था। उसकी बातें तो स्पष्ट नहीं सुनाई दे रही थीं, किन्तु इतना जरूर स्पष्ट हुआ-

‘मुझे अन्दर जाने दो। मेरा संस्कृति से मिलना बहुत जरूरी है।’

“कौन है ये लड़का? संस्कृति से क्यों मिलना चाहता है?” सुजाता ने दिग्विजय की ओर देखा।

“आने दो उसे।” दिग्विजय ने खिड़की से ही आवाज लगाई।

आवाज सुनकर दरबानों ने ऊपर खिड़की की ओर देखा। दिग्विजय का इशारा पाते ही वे युवक के रास्ते से हट गये।

दिग्विजय और सुजाता के ड्राइंग हॉल तक पहुंचते-पहुंचते वह लड़का भी अन्दर आ चुका था।

“नमस्कार ठाकुर साहब!” उसने विनम्र स्वर में कहा।

अभिवादन के पश्चात दिग्विजय ने कहा- “तुम संस्कृति से क्यों मिलना चाहते हो?”

“जी मेरा नाम साहिल है। पेशे से ग्राफिक डिजायनर हूं। इलाहाबाद में रहता हूं। मेरे पास कुछ जानकारियां हैं, जिनका सम्बन्ध आपकी बेटी संस्कृति से है।”

“यदि ऐसा है तो उन जानकारियों को तुम हमारे साथ साझा कर सकते हो।

संस्कृति से मिलने की क्या आवश्यकता है?”

“आवश्यकता है ठाकुर साहब। दरअसल मैं जो कुछ जानता हूं उसके विषय में सीधे संस्कृति से बात करने के बाद ही कोई निष्कर्ष निकाला जा सकता है।”

“ऐसा क्या जानते हो तुम?”

“माया के बारे में जानता हूं।”

“मा..या...?” दिग्विजय के होंठों से सिसकारियां छूट गयीं। उन्होंने सुजाता की ओर देखा। सुजाता भी उन्हीं की भांति हैरान नजर आ रही थीं।

“इस नाम से हमारा कोई वास्ता नहीं है।” दिग्विजय ने साहिल के कथन की सत्यता परखने के ध्येय से झूठ बोला।
 
“मुझसे कुछ भी मत छिपाइए ठाकुर साहब। मुझे सब-कुछ पता है। इस नाम से भला आपका वास्ता कैसे नहीं हो सकता? यही तो वह नाम है, जिससे ताबूत में लेटे शख्स ने संस्कृति को पुकारा था। यही तो वह नाम है, जो वैभव की गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर उसी के खून से लिखा हुआ पाया गया था।”

साहिल के बेबाक लहजे ने दिग्विजय को सोचने पर मजबूर कर दिया।

“हो कौन तुम?” दिग्विजय का सशंकित लहजा।

“एक शरीफ इंसान, जिसके भाई के साथ शायद वैसा ही कुछ हुआ है, जैसा इस वक्त आपकी बेटी के साथ हो रहा है।”

“मतलब?”

“मेंरे भाई की याद्दाश्त जा चुकी है। किसी को नहीं मालूम कि उसके साथ क्या हुआ था।”

“तुम्हारे भाई के केस का सम्बन्ध मेरी बेटी से कैसे हो सकता है?”

“सम्बन्ध है ठाकुर साहब, क्योंकि मेरे भाई के साथ जो भी रहस्यमय घटना घटी है, वह कैम्ब्रिज में ही घटी है, यानी कि उसी स्थान पर जहां से आपकी बेटी डिग्री लेकर लौटी है।”

दिग्विजय के साथ-साथ सुजाता के चेहरे पर भी उलझन नजर आने लगी। कुछ देर तक सोचने के बाद उन्होंने कहा- “ठीक है। हम संस्कृति को यहीं बुला रहे हैं। तुम्हें उससे जो भी बात करनी है, हमारे सामने करनी होगी।”

“सॉरी ठाकुर साहब, लेकिन ये संभव नहीं है। संस्कृति से मैं अकेले में बात करना चाहता हूं, क्योंकि मुझे उससे कुछ ऐसे सवाल भी पूछने पड़ सकते हैं, जिनके जवाब शायद वह आपकी मौजूदगी में न दे सके या देने में असहज महसूस करे।”

“किसी अजनबी को घर की बेटी के साथ अकेले बात करने की इजाजत देना

हमारी परंपरा नहीं है।”

“अगर ऐसा है तो मैं आपकी परंपरा को नहीं तोडूंगा। आप कमरे के दरवाजे पर अपने आदमी खड़े कर दीजिये। मैं दरवाजा अन्दर से नहीं बंद करूंगा।”

“उसकी जरूरत नहीं है।” दिग्विजय को साहिल, शक्ल और पहनावे से शरीफ लगा, इसलिए उन्होंने थोड़े नम्र स्वर में कहा- “सुजाता तुम दोनों के साथ रहेगी। ये तुम दोनों की बातों में कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगी।”

“थैंक यू सो मच ठाकुर साहब।”

और फिर सुजाता, साहिल को लेकर संस्कृति के कमरे में पहुँचीं। उनके संकेत पर शतरूपा कमरे से बाहर निकल गयीं। अब कमरे में साहिल, संस्कृति के अलावा केवल सुजाता थीं।

संस्कृति ने पहले साहिल को फिर नेत्रों में प्रश्नचिह्न लिए माँ हुए की ओर देखा।

“ये साहिल है। तुमसे कुछ जरूरी बात करना चाहता है।”

सुजाता की ओर से परिचय की औपचारिकता पूरी हो जाने के बाद ने साहिल ने बातचीत का सिलसिला शुरू किया।

“दरअसल मैं एक फ्रिलांस आर्टिस्ट हूं। मेरा भाई भी आपके आने से कुछ दिनों पहले ही कैंब्रिज से लौटा है। वह एक रिसर्च स्कॉलर है और एक एजुकेशनल टूर के तहत वहां गया था।”

“ओह! पिछले दिनों यूनिवर्सिटी की ‘सोसाइटी ऑफ़ मैथेमेटिक्स’ की ओर से एक इंटरनेशनल वर्कशॉप ऑर्गेनाइज किया गया था। उसमें कुछ रिसर्च स्कॉलर्स इंडिया से भी थे।”

“यस। मैं उसी सिलसिले में आपसे कुछ बात करना चाहता हूँ।”

“मेरा नाम संस्कृति है। आप मुझे ‘आप’ के बजाय मेरे नाम से बुला सकते हैं।” संस्कृति मुस्कुराई। साहिल की विनम्रता उसे पसंद आयी थी।

“थैंक यू सो मच संस्कृति!” साहिल भी अभिवादन स्वरूप मुस्कुराया- “बातों का सिलसिला शुरू करने से पहले मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहता हूं।”

साहिल ने बैग से वही स्केचेज निकाले, जो कोमल ने उसे दिये थे और उसे संस्कृति की ओर बढ़ाते हुए बोला- “मेरे पास ये कुछ स्केचेज हैं। मैं चाहता हूं कि पहले तुम इन्हें एक बार ध्यान से देख लो।”

“ऐसा क्या हैं इनमें?”

संस्कृति ने उन्हें थाम लिया। उत्सुकतावश सुजाता ने भी उन स्केचेज को एक नजर देखा। संस्कृति ने एक-एक करके उन चारों पर दृष्टिपात किया और फिर बोली- “मुझे इनमें कुछ भी स्पेशल नहीं नजर आ रहा।”

“मैंने इन्हें ध्यान से देखने के लिए कहा था।”

इस बार ध्यान से देखने पर संस्कृति को स्केचेज की वह विशेषता नजर आ गयी, जो साहिल उसे दिखाना चाहता था।

“य...ये तो मेरी ही स्केच लगती है।” उसने उस स्केच को देखते हुए कहा, जिसमें किसी राजकुमारी की वेशभूषा वाली लड़की तालाब में अपना अक्स निहार रही थी।

“और ये उस महल का, जिसमें इस वक्त हम खड़े हैं।” साहिल ने राजमहल के स्केच की ओर संकेत करते हुए कहा।

“किसने बनाए हैं ये स्केचेज?” संस्कृति अचम्भित हुई।

“मेरे भाई ने।”

“आपके भाई ने? बट कैसे? डज ही नो मी?”

“यही तो जानने के लिए तुम्हारे पास आया हूं। मुझे पता चला है कि उस वर्कशॉप में तुमने भी शिरकत की थी, जिसे अटैण्ड करने के लिए यश दो महिने की कैम्ब्रिज टूर पर गया था।”

“सही पता चला है। हालांकि मैं इलीजिबल नहीं थी, लेकिन मेरे ब्राइट एकेडमिक रिकॉर्ड को देखते हुए मुझे डीन की ओर से स्पेशल परमिशन मिली हुई थी।”

“एक्जैक्ट्ली। मैं उसी वर्कशॉप की बात कर रहा हूं। और तुम ये जानकर हैरान रह जाओगी कि उस वर्कशॉप से लौटने के दो दिनों के अन्दर ही यश अपनी याद्दाश्त खो बैठा।”

“लेकिन....लेकिन इस घटना का मुझसे क्या कनेक्शन है?”

संस्कृति हैरान हुई। यही हाल सुजाता का भी था।

“कनेक्शन है संस्कृति। बहुत गहरा कनेक्शन है। यश के साथ कैम्ब्रिज में क्या हुआ था, ये जानने के लिए जब मैंने पड़ताल की तो जो नाम सबसे रहस्यमयी बनकर सामने आया, वह था-‘माया’।”

“माया।” संस्कृति रोमांचित हो उठी- “य...ये तो वही नाम है, जिस नाम से मुझे ताबूत से आवाज आयी थी। प्लीज आप मुझे पूरी बात बताइए।”
 
“यश के जीवन में बदलाव की शुरूआत उस पर कैंब्रिज में हुए एक जानलेवा हमले के बाद से हुई थी। कोमल नाम की उसकी रिसर्च फेलो, जो टूर में उसके साथ थी, ने बताया कि उस जानलेवा हमले के बाद यश का बर्ताव बदल गया था। वह खुद से बातें करने लगा था और नींद में चलने लगा था। ड्राइंग बनाने के मामले में फिसड्डी होने के बावजूद उसने ये चार स्केचेज बना डाले थे। कोमल के अनुसार उसने तुम्हारी शक्ल से मिलती-जुलती शक्ल वाली इस राजकुमारी को माया कह कर सम्बोधित किया था। केवल इतना ही नहीं उसने तो माया को अपनी प्रिंसेज तक कह डाला था।”

सुजाता की धड़कनें तेज हो गयीं। ‘संस्कृति, माया का पुनर्जन्म हो सकती है।’ ये आशंका उन्हें सच में बदलती नजर आने लगी।

“फिर क्या हुआ था?” संस्कृति का लहजा पहले से भी अधिक रोमांचित हो उठा।

“पता नहीं। वर्कशॉप खत्म होने के बाद वह इण्डिया लौट आया। दो दिनों तक वह नेट सर्फिंग में बिजी रहा था। फिर दो दिन बाद मुझे पता चला कि वह अपनी याद्दाश्त खो चुका था। उसके सेलफोन की ब्राउजर हिस्ट्री चेक करने पर मैंने पाया कि उसने उन दो दिनों तक लगातर ब्रह्मराक्षस के बारे में सर्च किया था।”

“ब्रह्मराक्षस क्या होते हैं?”

“पिशाच! जो अपनी अतृप्त इच्छाओं के साथ सामान्य रूप में हमारे बीच भटकते हैं। इनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि ये वे दुराचारी ब्राह्मण होते हैं, जो किसी कारणवश समय से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।”

“ओह मॉय गॉड! लेकिन मैथ के रिसर्च स्कॉलर को ऐसे किसी राक्षस के बारे में जानने की क्या जरूरत पड़ गयी?”

“इसी सवाल ने तो आज मुझे तुम्हारे सामने लाकर खड़ा किया है। क्या तुम पुनर्जन्म में यकीन करती हो?”

“पुनर्जन्म यानी कि रिइनकारनेशन ?”

“हाँ।”

“इस बारे में कई लोगों के जरिये सुन चुकी हूं लेकिन अभी-तक ऐसी किसी घटना से दो-चार नहीं हुई हूं, जिससे इस सिध्दान्त पर यकीन करने या न करने की जरूरत महसूस हो।”

“तो फिर समझ लो संस्कृति कि वह समय आ चुका है जब तुम्हें रिइनकारनेशन थ्योरी पर यकीन कर लेना चाहिए।”

“मतलब?”

“क्या तुम ये नहीं पूछोगी कि स्केचिंग की एबीसीडी तक न जानने वाले यश ने ये स्केचेज कैसे बना लिये? उसने तुम्हारी शक्ल वाली लड़की की स्केच को माया क्यों कहा?” संस्कृति को खामोश पाकर साहिल ने ही इन सवालों का जवाब दिया- “यश ने वे स्केचेज इसलिए बना लिये क्योंकि स्केचिंग की एबिलिटी उसमें पिछले जन्म से आयी है।”

संस्कृति ने पास ही खड़ी सुजाता को देखा। वे साहिल के कथन से सहमत नजर आ रही थीं।

“आप इतने यकिन के साथ कैसे कह सकते हैं?”

“अनुमान के आधार पर। मैंने रिइनकारनेशन के बारे में इण्टरनेट पर और किताबों में पढ़ा है, इसलिए मुझे इस पर यकीन है।”

“यानी कि आप मान चुके हैं कि माया और ब्रह्मराक्षस, ये दो नाम यश के साथ उसके पिछले जन्म के कारण जुड़े हुए हैं?”

“हालांकि शुरूआत में मेरा ये यकीन कच्चा था, लेकिन रास्ते में गांव वालों से सदियों पुरानी कहानी सुनने के बाद मेरा यकीन पक्का हो गया।”

“गांव वालों ने ऐसी कौन-सी कहानी आपको सुनाई?”

“उनकी सुनाई हुई कहानी के अनुसार माया एक राजकुमारी थी, जो सैकड़ों

साल पहले इसी राजमहल में जन्मी थी और जिस पर अभयानन्द नाम के एक तांत्रिक ब्राह्मण की कुदृष्टि थी। ऑकल्ट जैसी चीजों पर प्रतिबन्ध होने के बावजूद भी अभयानन्द ने ऑकल्ट को अपनाया था तथा राजघराने की लड़की पर बुरी नजर डालने का दुस्साहस भी किया था, इस दोहरे अपराध के कारण राजा उदयभान सिंह के आदेश पर शंकरगढ़ के लोगों ने उसे पीपल के पेड़ से बांधकर जिंदा जला दिया था। अकाल मृत्यु के कारण उसे मुक्ति नहीं मिली थी और वह ब्रह्मराक्षस बन गया था।”

साहिल के कथन और कुलगुरु के कथन में समानता पाकर सुजाता काँप उठीं।

“तो क्या....तो क्या मैं माया की पुनर्जन्म हूं? और...और तहखाने के ताबूत में से जो मुझे बुला रहा था वह ब्रह्मराक्षस था?”

“अब तक की कहानी से तो यही अंदाजा लग रहा है। फिलहाल तुम मुझे बताओ कि तहखाने में तुम्हारे साथ हुआ क्या था?”

“वह तहखाना अण्डरग्राउण्ड था। उसमें कहीं से भी आने-जाने के लिए रास्ता नहीं था।”

“तो फिर उस तहखाने में तुम पहुंची कैसे?”

“वैभव से शादी करने से इनकार कर देने के कारण मुझे स्टोररूम में बन्द कर दिया गया था, जहां मुझे कई दफे ऐसा लगा जैसे कोई मेरे पीछे खड़ा होकर फुसफुसाते हुए मुझे माया नाम से पुकार रहा हो। फुसफुसाहट इतनी क्लीयर थी कि मैं इसे वहम कह कर टाल न सकी। ध्यान देकर सुनने पर मुझे आभास हुआ कि वह फुसफुसाहट स्टोररूम के एक कोने में जमा लकड़ियों के ढेर के नीचे से आ रही थी। मैंने लकड़ियों को हटा डाला, किन्तु आवाज लकड़ियों के नीचे से नहीं बल्कि फर्श के नीचे से आ रही थी। मैं इतनी एक्साइटेड हो चुकी थी कि रूम में पड़े कुदाल से फर्श में सुराख कर बैठी। फर्श के नीचे तहखाना निकल आया। मुझे पुकारने वाला उसी तहखाने में मौजूद था।”
 
“ओह!” साहिल ने संस्कृति को विस्मित नेत्रों से घूरा। वह सहसा इस बात पर यकीन न कर सका कि एक डरी हुई लड़की फर्श तोड़ कर उसके नीचे मौजूद तहखाने में उतरी थी- “तहखाने में उतरने पर क्या देखा तुमने?”

“वह तहखाना किसी कॉन्फ्रेंस हॉल जैसा बड़ा था। सेंटर में एक ताबूत रखा हुआ था, जिसकी लम्बाई एक कॉफिन के बराबर थी। ताबूत से एक विशेष चिह्न के आकार का ताला लटका हुआ था। उस पर संस्कृत की कुछ लाइनें भी लिखी हुई थीं। मुझे पुकारने वाला उसी ताबूत में लेटा हुआ था। उसी ने मुझे बताया कि मैं उसकी प्रेमिका माया हूं। वह मुझसे प्रेम करता था, लेकिन उसका प्रेम परवान चढ़ पाता, इससे पहले ही उसे पीपल के पेड़ से बांधकर जिन्दा जला दिया गया था। उसकी बातें सुन मैं बुरी तरह डर गयी और तहखाने से बाहर निकलने की कोशिश करने लगी, लेकिन रस्सी टूट जाने के कारण मेरी कोशिश कामायाब न हो सकी। मैं तहखाने में फंस गयी। मेरी बेबसी पर ताबूत में लेटा शैतान जोर-जोर से हंसने लगा था। देखते ही देखते ताबूत से सफेद धुन्ध निकलकर तहखाने में भरने लगी। उस धुन्ध के चपेट में आते ही मैं होश खोकर गिर पड़ी। आँख खुलने पर मैंने खुद को बिस्तर पर पाया।”

संस्कृति ने एक सांस में कह डाला।

“तुम्हारे साथ तहखाने में हुई घटना भी गांव वालों की सुनाई हुई कहानी के सच्ची होने की गवाही दे रही है। ताबूत में लेटा शैतान कोई और नहीं अभयानन्द ही है, जो भयानक मौत के बाद ब्रह्मराक्षस बन गया था। ताबूत से लटके ताले का आकार स्वास्तिक जैसा रहा होगा, और उस पर लिखी संस्कृत की लाइनें गीता का श्लोक रही होंगी।”

“यानी कि आपको भी ऐसा लग रहा है कि शंकरगढ़ के इतिहास में ऐसी कोई घटना घटी है, जिसका जवाब मुझे देना होगा? यू मीन कि कोई मेरी पास्ट लाइफ निकलकर मेरी जिन्दगी में वापस आना चाहता है।”

“आना चाहता है नहीं, शायद आ चुका है।”

“व्हाट?”

“देखो संस्कृति।” साहिल ने गहरी सांस लेते हुए कहा- “यदि ये सब-कुछ सामान्य परिस्थितियों में हुआ होता तो शायद मैं भी इन बातों पर यकीन नहीं करता लेकिन मौजूदा हालातों में जो कुछ हो रहा है, उसके पीछे कोई साइंटिफिक लॉजिक ढूंढ़ना फिलहाल पॉसिबल नहीं है। मंत्री जी के बेटे वैभव की मौत क्या तुम्हें सामान्य हत्या लगती है?”

संस्कृति ने जब कुछ नहीं कहा तो साहिल ने खुद ही आगे कहा- “बिल्कुल नहीं संस्कृति। वैभव की मौत उसी अंदाज में हुई है जिस अंदाज में ब्रह्मराक्षस हत्याएं करता था, जो यह साबित करता है कि ब्रह्मराक्षस वापस आ चुका है। मैं खुद भी अपने भाई की जिन्दगी को ‘माया’ और ‘ब्रह्मराक्षस’; इन दो रहस्यों के बीच उलझा हुआ देख रहा हूं। कैम्ब्रिज में हुए उस अजीब वाकये के बारे में जानने की कोशिश कर रहा हूं जिसने उससे उसकी पहचान छीन ली है।”

संस्कृति एक बार फिर कुछ नहीं बोली, किन्तु ब्रह्मराक्षस की वापसी की संभावना जाहिर होते ही दहशत उसके और सुजाता के चेहरे पर पाँव पसारने लगा था।

“क्या तुम्हें लगता है कि कोई नॉर्मल बन्दा इन सारे इंसिडेन्सेज को एक्सप्लेन कर सकता है?”

“क्या आप ये कहना चाहते हैं कि मुझे किसी पैरानॉर्मल कंसल्टेन्सी की जरूरत है?”

“केवल तुम्हें नहीं, मेरे भाई यश को भी।”

संस्कृति फिर बगैर कुछ कहे साहिल को घूरती रही।

“यश में कोई ऐसी बात तो जरूर है, जो उसे न केवल तुम्हारी जिन्दगी से बल्कि उस हादसे से भी जोड़ती है, जिसके तहत अभयानन्द को जिन्दा जला दिया गया था।”

“अगर ऐसा है तो वह बात क्या हो सकती है?”

साहिल ने थोड़ी देर तक कुछ सोचने के बाद मुंह खोला- “अगर मैं रिइनकारनेशन को सच मान कर सारे पहलुओं पर गौर करता हूँ तो मुझे ये साबित करने के लिए पर्याप्त तर्क नजर आते हैं कि तुम माया की पुनर्जन्म हो, लेकिन जब मैं यश के बारे में सोचता हूँ तो तस्वीर थोड़ी धुंधली हो जाती है। मन में कई सवाल खड़े हो जाते हैं। जैसे कि वह किसका पुनर्जन्म है? जाहिर है कि वह अभयानन्द का पुनर्जन्म नहीं हो सकता है, क्योंकि अभयानन्द तो जलाए जाने के बाद ब्रह्मराक्षस बन गया था।”

संस्कृति ने एक नजर अपने हाथ में अभी-तक मौजूद स्केचेज पर डाली और कहा- “ये स्केचेज आपके भाई यश ने ही बनाए हैं?”

“तुम्हें कोई शक है?”

“एक्चुअली मैं कन्फर्म रही हूँ क्योंकि अगर ये स्केचेज यश ने बनाए हैं तो उसके द्वारा बनाया गया माया का ये स्केच...।” संस्कृति ने माया का स्केच ऊपर किया- “साबित करता है कि वह भी किसी न किसी तरह माया से जुड़ा है।”

“एब्सोल्युटली यश ने ही बनाए हैं। इवन उसने तो इस लड़की को अपनी प्रिंसेज तक कहा था।”

“ओह! अब ये अनुमान लगाना ज़रा भी मुश्किल नहीं है कि अभयानन्द के अलावा कोई और भी था जो माया पर आसक्त था। यश उसी का पुनर्जन्म है।”

“ओह...!” साहिल के जेहन में मानो कोई बिजली कौंधी- “मेरा ध्यान इतनी साधारण सी बात की ओर अभी तक क्यों नहीं गया था? तुम्हारी एप्रोच सही है संस्कृति, क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो यश, माया की स्केच कैसे बना पाता? और उसे अपनी प्रिंसेज क्यों कहता?”

“अब सवाल ये है कि वह था कौन, जो अभयानन्द के अलावा माया को पसंद करता था? और जिसका रिइनकॉरनेटेड वर्जन यश है?” संस्कृति ने थोड़ा रुककर आगे कहा- “क्या गांव वालों ने किसी ऐसे आदमी का भी जिक्र किया था, जो अभयानन्द के अलावा माया को पसंद करता था?”

“नहीं! उन्होंने इस बारे में कुछ नहीं बताया।”

“ओह!”

“रहस्य की तह तक जाने के लिए मुझे सबसे पहले यश के साथ कैंब्रिज में घटी उस रहस्यमयी घटना के बारे में जानने की कोशिश करनी होगी जिसके तहत उसकी याद्दाश्त चली गयी है। मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता हूँ।”

“क्या?”

“तुम कैंब्रिज में यश से मिली थी?”

“इस सवाल का जवाब मैं तभी दे सकती हूँ जब यश की कोई फोटो देख लूं।”

“श्योर!” साहिल उत्तेजित हुआ- “दरअसल जो स्केचेज तुम्हारे हाथ में हैं, उनमें से एक यश का भी है।”

“यू मीन ये स्केच?” संस्कृति ने उस पेपर को साहिल को दिखाया, जिस पर एक ब्राह्मण का स्केच बनाया गया था।

“हाँ। ये यश का ही स्केच है, जो इस संभावना को और मजबूत करता है कि उसके साथ भी पास्ट लाइफ जैसी अविश्वसनीय घटना जुड़ी हुई है।”

“नहीं! मैं इस शख्स से कभी नहीं मिली।” संस्कृति ने कुछ देर दिमाग पर जोर डाला फिर आगे कहा- “क्या आपके पास यश की कोई फोटो है?”

जवाब में साहिल ने सेलफोन में मौजूद यश की एक फोटो को उसके सामने कर दिया।
 
“नहीं!” संस्कृति ने इस बार दिमाग पर जोर डालने का उपक्रम किये बगैर कहा- “मैं इस शख्स को नहीं जानती।”

“आर यू श्योर कि यश तुम्हें कैंब्रिज में कहीं नहीं दिखा था?”

“यस ऑफ़कोर्स। वैसे इस वक्त यश है कहाँ?”

“उस पर इंडिया में दोबारा अटैक हुआ था। आगे ऐसा कुछ न हो सके, इसलिए मैंने उसे गाँव भेज दिया है।”

“आखिर कौन हो सकता है, जो यश की जान लेना चाहता है? वह भी उस परिस्थिति में जब वह अपनी पहचान से भी वाकिफ नहीं है।”

“शायद एक अधेड़ उम्र की औरत।”

“कौन-सी औरत?” संस्कृति के माथे पर सिलवटें उभरीं।

“दरअसल यश पर दूसरे हमले के दौरान मेरी नजर हमलावर पर पड़ चुकी थी। यश के साथ मैं उसके पीछे भागा था, लेकिन वह शहर के स्लम एरिया की तंग गलियों में हमें चकमा देने में सफल हो गया था। थोड़ी देर बाद हमें एक औरत मिली थी, जिसने उस हमलावर का पता बताया था, किन्तु उस वक्त हमारे पैरों तले जमीन खिसक गयी, जब हमें उस औरत के बताये हुए पते वह हमलावर नहीं बल्कि उसकी लाश मिली। चाकू जैसे किसी धारदार हथियार को उसके गले पर फिरा दिया गया था। केवल इतना ही नहीं उसकी लाश के पास उसी के खून से लिखा हुआ था- ‘माया आ चुकी है। श्मशानेश्वर भी आयेंगे। वह मरेगा जो दाहिनी कलाई पर स्वास्तिक-चिह्न के साथ जन्मा है।’ पता बताने वाली औरत अजीबोगरीब लग रही थी। मुझे पूरा विश्वास है कि उस हमलावर की हत्या उसी औरत ने की है, क्योंकि वह हमारी नज़रों में आ चुका था और हम उसके जरिये रहस्यों की तह तक पहुँच सकते थे।”

“खून से लिखे हुए अल्फाजों के मुताबिक़ उसे मरना है, जो दाहिनी कलाई पर स्वास्तिक चिह्न के साथ जन्मा है, तो क्या यश की कलाई पर सचमुच वह चिह्न है?”

इससे पहले कि साहिल, संस्कृति के सवाल का ‘हाँ’ में जवाब देता, उसकी निगाह संस्कृति की दाहिनी कलाई पर पड़ी। किसी अनजान शक्ति के वशीभूत होकर उसने उसकी कलाई ऊपर उठाई।

“ये निशान...ये निशान तुम्हारी कलाई पर जन्म के समय से ही है?”

“पता नहीं...!” संस्कृति ने कंधे उचकाते हुए सुजाता की ओर देखा- “शायद

मम्मी बता सकती हैं।”

“हाँ! ये निशान संस्कृति की कलाई पर जन्म के समय से ही है।” सुजाता ने इस परिचर्चा के दौरान पहली दफा मुंह खोला- “लेकिन इसका क्या मतलब हो सकता है?”

“केवल एक ही मतलब हो सकता है। और वह ये है कि हमें ये मान लेना चाहिए कि संस्कृति और यश में पिछले जन्म का कोई सम्बन्ध हैं। संस्कृति माया की पुनर्जन्म है। यश किसका पुनर्जन्म है, ये पता लगाना अभी बाकी है।”

“क्या यही स्वास्तिक है?” संस्कृति ने अपनी कलाई पर बने ‘स्वास्तिक’ से मिलते-जुलते आकार वाले जन्मजात चिह्न को ध्यान से देखा।

“हाँ...।” साहिल ने उसकी कलाई छोड़ दी- “बिल्कुल यही निशान यश की कलाई पर भी है। अब तो तुम्हें यकीन हो गया होगा कि कुछ तो है, जो तुम्हें और यश को रहस्यमय ढंग से जोड़ता है, और वह ‘कुछ’ तुम दोनों की पास्ट लाइफ में छुपा हुआ है।”

इस बार जब संस्कृति ने मुंह खोला तो उसके चेहरे पर व्याप्त उलझन लहजे में घुल चुकी थी- “अगर ये स्वास्तिक ही यश पर हुए हमले की वजह है तो हमला मुझ पर भी हो सकता है, क्योंकि मैं भी इस स्वास्तिक के साथ जन्मी हूँ।”

“शायद नहीं! क्योंकि अगर तुम पर हमला होना होता तो अब तक हो चुका होता। तुम उस औरत की हिटलिस्ट में नहीं हो क्योंकि तुम माया हो, जिसे अभयानन्द अपनी प्रेमिका मानता है। इसलिए वह तुम्हें मारना नहीं बल्कि अपने जैसा बनाना चाहेगा।”

“कौन हो सकती वह औरत? उसके अनुसार ‘माया’ यानी कि मैं आ चुकी हूँ, और श्मशानेश्वर आने वाला है, तो क्या ये श्मशानेश्वर अभयानन्द ही है?”

“हो सकता है। वैभव की जिस शैली में हत्या की गयी उसे देखते हुए ये भी लगता है कि वह आ भी चुका है। वह इस जन्म में यश को रास्ते से इसलिए हटाना चाहता होगा क्योंकि वह भी पिछले जन्म में माया से प्रेम करता था। उसने वैभव को इसीलिये बेरहमी से मार डाला क्योंकि वह तुमसे शादी करने को लेकर पजेसिव था। वह औरत जरूर उस ब्रह्मराक्षस की सेविका होगी।”

“तो अब हमें क्या करना होगा? जो कुछ हो रहा है, या आगे जो कुछ होने वाला है उसे कैसे रोका जा सकता है? यश से तो कोई उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि वह सब-कुछ भूल चुका है।”

“तहखाने से ताबूत निकालने के बाद उसका क्या किया गया?”

“श्मशान भूमि में दफन कर दिया गया।”

“ओह!”

“लेकिन कल रात मुझे लगा कि किसी ने ताबूत बाहर निकाल लिया है।”

“वाकई?” साहिल का आशंकित लहजा।

“हां! मुझे वैभव की मौत का भी पूर्वाभास हुआ था। न जाने क्यों मुझे बार-बार ऐसा लग रहा था कि कहीं कुछ होने वाला है।”

“अब इसमें कोई शक नहीं है।” साहिल ने गहरी सांस ली और कहा- “कि तुम माया कि पुनर्जन्म हो और ब्रह्मराक्षस के रूप में अभयानन्द भी वापस आ चुका है। वह तुम पर आसक्त है। उसके विचार तुम पर ठहरे हुए हैं, इसलिए वह जो कुछ भी करेगा; तुम्हें उसका पूर्वाभास होगा।”

“ये सब डरावना है मम्मी।” संस्कृति बेचैन होकर सुजाता की ओर पलटी और भयभीत अंदाज में कहा उठी- “मैं इन सबसे मुक्त होना चाहती हूं। मैं...मैं सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि जिन चीजों पर मैं कभी विश्वास नहीं करती थी, वही चीजें मेरी जिन्दगी का हिस्सा बन जाएंगी।”

“डोंट बी नर्वस!” सुजाता कुछ कहतीं, इससे पहले ही साहिल ने समझाने वाले लहजे में कहा- “सब-कुछ ठीक हो जाएगा। एक पैरासाइकोलॉजिस्ट से मेरी पहचान है। उनके बारे में बहुत कम लोग ही ये जानते हैं कि उन्होंने स्प्रिचुअल ट्रेनिंग ली है और एक बौद्ध मठ से पास्ट लाइफ रिग्रेशन में दक्षता प्राप्त की है। यदि तुम्हारे घरवाले इजाजत देंगे तो मैं तुम्हें उनके पास ले चलूंगा।”

“कब?” सुजाता ने पूछा।

“शायद कल, क्योंकि मैं आज रात तुम्हारे पूर्वाभास की सच्चाई परखने के लिए श्मशान में जाना चाहता हूं। अगर ताबूत को सचमुच दफनाये गये जगह से निकाल लिया गया होगा, तो आज रात श्मशान में मेरा सामना शैतान से जरूर होगा।”

साहिल का इरादा जान कर संस्कृति और सुजाता दोनों कांप गयीं।

“लेकिन इसमें रिस्क है। बहुत ज्यादा रिस्क।”

“जानता हूं, लेकिन रहस्यों की तह तक जाने और अपने भाई की नार्मल लाइफ को दोबारा हासिल करने के लिए मुझे ये रिस्क लेना होगा।”
 
हालांकि रात पूर्णिमा की थी, किन्तु जब कुछ क्षणों के अन्तराल पर पूरे आकार का चाँद आकाश में तैरते स्याह बादलों की ओट में छिप जाता था तो धरा पर अमावस जैसा अंधकार छा जाता था और उस अंधकार में मरघट के जनशून्य हिस्से में खड़ा नरभेड़िये की मूर्ति वाला मन्दिर किसी विशालकाय दानव

सदृश नजर आने लगता था।

अरुणा गोबर के कण्डों से जलाए गये आग पर रखी हुई हांडी को घूर रही थी। भोजन का यह प्रबन्ध वह स्वयं के लिये कर रही थी, क्योंकि मन्दिर में एक ओर खड़ा वह ‘नवजात पुरुष’ शाकाहारी नहीं था, जिसकी दृष्टि दूर जल रही चिताओं से उठती लपटों पर ठहरी हुई थी। अरुणा ने हांडी के नीचे रखे उपलों को व्यवस्थित किया और ‘नवजात पुरुष’ के निकट आयी।

“आस-पास के क्षेत्रों में शवों की संख्या बढ़ गयी है प्रभु। कभी-कभी इतनी अधिक संख्या में शवदाह देख दिग्दाह का भ्रम हो उठता है।” अरुणा ने भी चिता की लपटों पर दृष्टिपात करते हुए कहा।

पुरुष ने कुछ नहीं कहा। वह उसी दिशा में देखता रहा, जो शवदाह के कारण रक्तिम हो उठा था।

“आपको कोई अनुभूति हो रही है प्रभु?”

‘प्रभु’ नाम से सम्बोधित वह पुरुष अरुणा की ओर पलटा। हमेशा की तरह उसके अपलक नेत्रों को देख अरुणा सहम गयी।

“हां!” उसने चित-परिचित गम्भीर स्वर में कहा- “हमें हमारे शिकार के कदमों की ध्वनि सुनाई दे रही है।”

“तो.....तो क्या वह स्वयं मरघट में आया है?”

प्रत्युत्तर में उस पुरुष ने पूरे आकार के उस चाँद की ओर देखा, जो अकस्मात ही बादलों की ओट से निकल आया था। धवल चाँदनी से रू-ब-रू होते ही उसकी आंखें हैरतअंगेज ढंग से परिवर्तित हुईं। यह परिवर्तन पलक झपकने भर के अन्तराल में हुआ। अब उसकी आंखों के दोनों कोटरों में इंसान की नहीं भेड़िये की आंखें चमक रही थीं। ऐसी आंखें, जिनमें वहशियत और खून की प्यास के सिवाय कोई अन्य भाव नहीं था।

उसने आकाश की ओर मुंह उठाया और अगले ही पल मरघट का वह जनशून्य हिस्सा भेड़िये की गर्जना से थर्रा उठा।

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साहिल ठिठक गया। उसके ठिठकने की वजह वह भयानक आवाज थी, जो उसने अभी-अभी सुनी थी। आवाज किसी भेड़िये की थी और आवाज की तीव्रता बता रही थी कि भेड़िया आस-पास ही था।

साहिल ने टार्च पर पकड़ मजबूत की और रोशनी का दायरा उन वृक्षों और झुरमुटों पर केन्द्रित किया, जहां किसी पशु के छिपे होने की प्रबल संभावना थी, किन्तु उसे न तो वृक्षों की ओट में कुछ नजर आया और न ही झाड़ियों में कोई ऐसी हलचल दिखाई पड़ी, जिससे उनमें किसी के छिपे होने का आभास होता।

वह पीछे पलटा। पीछे भी कुछ नहीं था, सिवाय नागिन की तरह बलखाती हुई कुछ दूर जाकर अंधेरे के आगोश में समा गयी उस पतली पगडण्डी के, जिस पर चल कर उसने मरघट तक का फासला तय किया था।

यदि शंकरगढ़ के कुत्तों के भौंकने पर ध्यान न दिया जाये तो भेड़िये की अचानक गर्जना के बाद वातावरण फिर से खामोश हो गया था, किन्तु अब साहिल को यह खामोशी पहले की अपेक्षा अधिक भयानक लगने लगी।

आगे बढ़ने से पहले उसने एक बार फिर सतर्क निगाहों से आस-पास का मुआयना किया और आश्वस्त होकर आगे बढ़ा। उसकी चाल अब मंद पड़ चुकी थी। रोंगटे खड़े होने लगे थे और चेहरे पर खौफ परवाज करने लगा था।

उसे चौकन्ना होकर आगे बढ़ते हुए दस मिनट और व्यतीत हो गये। इस दौरान उसे किसी किस्म का असामान्य अनुभव नहीं हुआ, सिवाय इसके कि हवा अब अचानक अपना रुख बदलने लगी थी। भेड़िये की आवाज भी दोबारा नहीं आयी।

सहसा साहिल को अपने पीछे किसी के पदचाप की ध्वनि सुनाई दी। वह ठिठका। ठिठकते ही पदचाप की ध्वनि भी खामोश हो गयी। शायद कोई था, जो उसका अनुसरण कर रहा था और उसके ठहरते ही खुद भी ठहर गया था। पीछे पलटने से पहले साहिल का दिल जोरों से धड़का। पहले तो उसने आहट के जरिये ये पता लगाने की कोशिश की की वास्तव में कोई पीछे है, या ये सिर्फ उसका वहम है, किन्तु जब कुछ स्पष्ट न हो सका तो वह आखिरकार बेहद तेजी से पीछे पलटा।

‘कोई उसके पीछे था।’ ये महज एक भ्रम साबित हुआ।

‘कदमों की आहट किसकी थी?’

उपरोक्त सवाल के जवाब में उसे केवल दूर तक व्याप्त खौफनाक अँधेरा नजर आया।

“कौन है?”

मरघट के सन्नाटे में उसकी आवाज दूर तक गूंजी। उसने एक बार फिर टॉर्च के सीमित प्रकाश में आस-पास का मुआयना किया किन्तु परिणाम पहले जैसा ही रहा। ‘ढाक के तीन पात’।

इससे पहले कि वह दोबारा आवाज लगाता अथवा अपने भ्रम को नजरअंदाज करके आगे बढ़ता; कुछ दूरी पर मौजूद झाड़ी में तेज हलचल हुई। इस दफे साहिल को वहम नहीं हो रहा था। उसे झाड़ियों में हो रही हलचल स्पष्ट नजर आ रही थी। वह पूरे होश-ओ-हवास में था।

झाड़ियों के हिलने का ढंग ऐसा था, जैसे उनमें से कोई बाहर निकल रहा हो। साहिल ने शुष्क अधरों पर जुबान फेरी और टॉर्च को दोनों हाथों से इस कदर पकड़ लिया मानो वह टॉर्च न होकर कोई हथियार हो। उसने प्रकाश का गोल दायरा झाड़ी पर ही केन्द्रित रखा। हर गुजरते पल के साथ हलचल तेज होती गयी और इसी अनुपात में साहिल के बदन की कंपकपी भी बढ़ती गयी। लेकिन ठीक उसी क्षण, जब साहिल को लगने लगा था कि अब झाड़ियों में से कोई बाहर आयेगा, हलचल अचानक समाप्त हो गयी। झाड़ी यूं स्थिर हो गयी मानो थोड़ी देर पहले उसमें कोई हलचल न रही हो।

“शैतान मेरे साथ खेल रहा है।” साहिल ने अपनी चौकस निगाहें चारों ओर घुमाई- “वह मुझे भयभीत कर रहा है। अपने हाथों से मारने से पहले मुझे डर के हाथों मारना चाहता है।”

साहिल ने चेहरे के पसीने को आस्तीन से पोछा और श्मशानव्यापी अँधेरे पर नजर डाली।

“कौन है? सामने क्यों नहीं आता?”

“द्विज कहाँ है?”

पीछे से आये सर्द लहजे को सुन साहिल बुरी तरह चौंका। पलटने से पहले उसने थूक सटककर हलक गिला किया और चेहरे के पसीने को आस्तीन से पोंछा। अंतत: कांपते जिस्म के साथ पीछे पलटा।

शैतान ने इस दफे उसके साथ कोई खेल नहीं खेला था। वह सामने आ चुका था।

टॉर्च की रोशनी में वह इंसान बेहद अजीबोगरीब नजर आया। उसके बदन पर वैसी ही सफ़ेद धोती थी, जैसी साहिल मंदिर के पुजारियों के बदन पर देखता था। उसके सफाचट सिर पर शिखा थी और कंधे से यज्ञोपवीत लटक रहा था। उसका कद आठ फीट से भी अधिक था। उसके व्यक्तित्व का सर्वाधिक डरावना पहलू ये था कि उसकी पलकें नहीं झपक रही थीं। साहिल को अपलक घूरतीं उसकी बड़ी-बड़ी आँखें भयावह और रक्तवर्ण थीं। उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे खुली आँखों वाली कोई लाश अचानक अपने पैरों पर खड़ी हो गयी हो।

“क...क्या तुम ही अभयानन्द हो?” खौफ के कारण साहिल की जुबान लड़खड़ा गयी।

“द्विज कहाँ है?” अभयानन्द ने उसके सवाल को नजरअंदाज करते हुए आगे कदम बढ़ाया।

“वहीं ठहर जाओ....मैं....मैं किसी द्विज को नहीं जानता।”

“द्विज कहाँ है?”

शैतान पर कोई फर्क नहीं पड़ा। न तो उसका सवाल बदला और न ही उसके कदम ठहरे। उसकी भयानक आँखें मानो साहिल को नहीं शून्य को घूर रही थीं।

“ओह माय गॉड! संस्कृति का पूर्वाभास सही था। ताबूत जमीन से निकाला जा चुका है। शैतान...शैतान वापस आ चुका है।”

बेचैन लहजे में बड़बड़ाते हुए साहिल ने पहले आस-पास बचने का कोई जरिया तलाशना चाहा, किन्तु फिर निराश होकर उसने अभयानन्द की ओर देखा। अभयानन्द का आगे बढ़ना अनवरत जारी था।

“ठहर जा।” इस बार साहिल का लहजा चेतावनी भरा था- “मेरे पास तुझे देने के लिए कुछ है दुराचारी।”

साहिल ने पतलून की जेब में हाथ डाला। हाथ जब बाहर आया तो खाली नहीं था। उसने स्वास्तिक को अभयानन्द की ओर लहराते हुए निडर होकर कहा- “मैं जानता हूँ कि तू इस पवित्र चिह्न से डरता है।”
 
स्वास्तिक पर नजर पड़ते ही अभयानन्द के हलक से भेड़िये की गुर्राहट निकली। साहिल को हैरानी नहीं हुई क्योंकि अब तक वह इस तथ्य पर यकीन कर चुका था कि अभयानन्द का पैशाचिक रूप नरभेड़िया था। उसे हैरानी तो इस बात की हुई कि अभयानन्द स्वास्तिक को देखकर भयभीत होने के बजाय उसका उपहास उड़ाने के भाव से भयंकर अंदाज में गुर्राया था।

“मैंने कहा वहीं ठहर जाओ।”

यद्यपि साहिल को बोध होने लग गया था कि सुरक्षा का उसका एकलौता इंतजाम धराशायी हो चुका है, स्वास्तिक पर भरोसा करके उसने बड़ी भूल कर दी है; तथापि उसने एक बार फिर चेतावनी भरे लहजे में कहा।

“द्विज कहाँ है?” इस दफे अभयानन्द का लहजा पहले से अधिक कर्कश था।

अब साहिल को मौत सामने दिखाई देने लगी थी। उसने स्वास्तिक को यूं देखा जैसे दुश्मन के सामने खड़े आदमी को अचानक बोध हुआ हो कि उसका रिवाल्वर खाली है। वह पीछे खिसकने लगा।

“म..मैं किसी द्विज को नहीं जानता।”

“द्विज कहाँ है?” ब्रह्मपिशाच गरज उठा। उसकी गर्जना से भयभीत होकर आस-पास के वृक्षों से कई चमगादड़ उड़े।

“त...तुम वापस क्यों आये हो? तुमने मेरे भाई के साथ क्या किया है? तुम संस्कृति के साथ क्या करना चाहते हो?”

अभयानन्द ने कुछ नहीं कहा। उससे अपनी स्थिति छुपाने के लिए साहिल ने टॉर्च बुझा दिया। अब उसे अँधेरे में केवल यही नजर आ रहा था कि कोई दैत्याकार काला साया लगातार उसकी ओर बढ़ रहा था। पीछे खिसकते हुए वह किसी पेड़ के तने से टकरा गया।

मात्र एक सेकेण्ड के लिए उसकी दृष्टि अभयानन्द से हटी। और यहीं पर कहर टूट पड़ा। उसने मात्र इतना देखा कि काला साया उस पर झपट पड़ा था। इसके बाद उसे कुछ नजर नहीं आया। केवल महसूस हुआ कि उसकी गर्दन एक फौलादी पंजे की गिरफ्त में आ चुकी थी। पंजे के नश्तर सरीखे नाखून उसकी नसों में चुभने लगे थे और वह कोई भी आवाज निकाल पाने में असमर्थ हो चुका था।

चाँद बादलों की ओट से बाहर आया और परिवेश दुधिया प्रकाश से नहा उठा। अभयानन्द का खौफनाक चेहरा साहिल ने करीब से देखा। उसकी आँखें अब पहले जैसी नहीं रह गयी थीं। जिस स्थान पर कुछ देर पहले साहिल ने इंसानी आँखें देखी थी, वहां अब एक जोड़ी भेड़िये की आँखें नजर आ रही थीं। उसके जबड़े के दोनों किनारों के दांत लम्बे और नुकीले होकर होठों के किनारों से बाहर निकल आए थे। अभयानन्द अब एक ऐसे इंसान के रूप में साहिल के नजदीक था, जिसकी आँखें और दांत भेड़िये के थे। उसकी गर्दन जिस पंजे के चंगुल में थी, वह पंजा भी भेड़िये के पंजे में तब्दील हो चुका था।

“द्विज कहाँ है?” आधे भेड़िये में तब्दील हो चुके अभयानन्द ने एक-एक हर्फ़ को चबाते हुए अपना सवाल दोहराया। उसका अंदाज बता रहा था कि साहिल को बिना कोई क्षति पहुंचाए जवाब जानने का उसका यह अंतिम प्रयास था।

“म...मैं किसी द्विज को नहीं जानता।” साहिल ने घुटे-घुटे स्वर में अपना पुराना जवाब दोहराया।

अभयानन्द ने भेड़िये के स्वर में तीव्र गर्जना की और साहिल को दूर उछाल दिया। मरघट में साहिल की चीख गूंजने के साथ ही अभयानन्द चाँद की ओर मुंह उठाकर तीव्र स्वर में चीखा। दूर पड़े साहिल को लगा जैसे हजारों भेड़िये समवेत स्वर में रो रहे हों। उसके देखते ही देखते अभयानन्द का समूचा वजूद नरभेड़िये में तब्दील हो गया।

अभयानन्द का नया अवतार शैतान की परिभाषा पर मुकम्मल खरा उतर रहा था। वह दो पैरों पर खड़े, लगभग आठ फीट लम्बे भेड़िया-मानव में बदल चुका था। मानव स्वरूप में जो धोती उसने तन ढापने के लिए बदन से लपेटी थी, वह धोती अब उसके लिए लंगोट का काम कर रही थी। उसका समूचा बदन घने बालों से आच्छादित हो चुका था। सफाचट सिर पर अब घनी केश-राशि नजर आ रही थी, जो अधिकतम सीमा तक उग्र हो उठी हवाओं के कारण शेर के अयाल की भांति लहरा उठी थी। दाहिने हाथ में एक कटार थी और बायाँ हाथ स्वतंत्र था। आँखों में वहशी चमक और चेहरे पर क्रोध का दावानल लिए हुए वह साहिल की ओर बढ़ा।

साहिल ने खड़े होने की कोशिश की, लेकिन कांपते पैर जिस्म का बोझ न संभाल सके। पीछे खिसकाना चाहा मगर हौसले ने साथ नहीं दिया। मौत सामने देख जोर से चीखना भी चाहा मगर जुबान तालू से जा चिपकी।
 

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