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नरभेड़िया मात्र एक-दो डग में ही साहिल के नजदीक पहुंच गया। उसने उसका बाल बायीं मुट्ठी में जकड़ा और दाहिने हाथ में थमी कटार को हवा में लहराया। मौत को चंद लम्हों की दूरी पर पाकर साहिल ने आँखें बंद कर ली। कुछ क्षणों बाद उसका सिर धड़ से अलग होकर नर-भेड़िये की हाथ में थमा रह जाने वाला था।
साहिल का जेहन ज्ञानशून्य हो गया। बाकी इंसानों की तरह उसने भी कभी कल्पना नहीं की थी कि मौत उसे इतनी आसानी से निगल जायेगी। बंद आँखों के अँधेरे में उसे अपना अतीत याद आने लगा।
किन्तु!
इससे पहले कि वह ढंग से चीख भी न पाता और उसका धड़ प्राणविहीन होकर हवा में लहरा कर जमीन पर गिर पड़ता; एक चमत्कार हो गया। साहिल को महसूस हुआ कि उसके बाल नर-भेड़िये की मुट्ठी से आजाद हो गये हैं।
पहले तो उसे यकीन नहीं हुआ कि ऐसा हुआ है, किन्तु जब यकीन हो गया तो उसने धीरे-धीरे आँखें खोली।
अकल्पनीय घटना घटी थी। नर-भेड़िया साहिल से दस कदमों की दूरी पर धरातल पर पड़ा था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी के शक्तिशाली पदाघात ने उसे रुई के ढेर की भांति हवा में उछल दिया था। वह साहिल को ही देख रहा था। उसकी खौफनाक आँखों में साहिल को जरूर भय नजर आता, अगर उसकी आँखें अंगारों सी सुर्खी न लिए होतीं तो।
साहिल के जिस्म में कम्पन्न हुआ। उसने साँसों को नियंत्रित करने का प्रयास किया, क्योंकि उसके हांफने का स्वर रात के सन्नाटे में खौफनाक रूप अख्तियार कर रहा था। उसकी भयभीत निगाहें नर-भेड़िये पर ठहरी हुई थीं, क्योंकि वह जानता था कि नर-भेड़िया अचानक हुए हमले से हार नहीं मान सकता है। वह दोबारा जरूर झपटेगा।
“अ...आप ठीक तो हैं न साहिल?”
उसके पीछे से संस्कृति की आवाज आयी।
‘स..संस्कृति यहाँ कैसे आयी?’
विचित्र से तरद्दुद में फंसे साहिल ने धीरे-धीरे गर्दन पीछे घुमाई।
पीछे वास्तव में संस्कृति ही थी। उसके हाथ में टॉर्च था। चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे वह खुद भी नहीं समझ पायी हो कि थोड़ी देर पहले जो कुछ हुआ वह कैसे हुआ। हैरत-अंगेज बात ये थी कि उसकी दाहिनी कलाई के स्वास्तिक से तीव्र चमक फूट रही थी। साहिल समझ गया कि उछल कर दूर गिरने के बाद नरभेड़िये की निगाह उस पर नहीं बल्कि उसके पीछे खड़ी संस्कृति पर ठहरी हुई थी।
साहिल ने खड़े होने की कोशिश की, किन्तु अत्यधिक भय और बदन की थरथराहट के कारण उसका प्रयास विफल हो गया।
संस्कृति खौफजदा निगाहें नरभेड़िये पर केन्द्रित किये हुए साहिल की ओर बढ़ी। नरभेड़िया, जो अभी तक धरातल पर पड़ा हुआ था, उसे अपने शिकार की ओर बढ़ता देख उछल कर उठ खड़ा हुआ। संस्कृति सहम कर यथास्थान पर ठहर गयी। टॉर्च की रोशनी को सामने रखने के उपक्रम में उसकी दाहिनी कलाई का रुख नरभेड़िये की ओर हुआ और स्वास्तिक से फूटती चमक तीव्र हो उठी।
नरभेड़िया चाँद की ओर देख कर गरजा। संस्कृति के देखते ही देखते रोंगटे खड़े कर देने वाला चमत्कार हुआ। धवल चाँदनी का एक कतरा ज्यों ही नरभेड़िये की आँखों से टकराया, त्यों ही वह चिंघाड़ उठा। उसकी चिंघाड़ में पीड़ा का समावेश था। पल भर के अंतराल में ही वह नरभेड़िये का रूप त्याग कर अपने मानस रूप में आ गया। हालांकि उसकी आँखें अब भी भेड़िये की आँखों जैसी ही थीं।
“हाथ नीचे करो माया। हमारा शरीर तप रहा है।” अभयानन्द ने दोनों हाथों से स्वास्तिक से बचने का प्रयत्न करते हुए कहा।
संस्कृति ने स्वास्तिक पर नजर डाली। स्वास्तिक यूं चमक रहा था, जैसे अँधेरे में ग्लोइंग टैटूज चमकते हैं।
“मैं माया नहीं हूँ।” स्वास्तिक की शक्ति पर यकीन होते ही संस्कृति का लहजा आत्मविश्वास से परिपूर्ण हो उठा।
“तुम माया हो।” अभयानन्द चीख कर एक तने की ओट में हो गया। और फिर बगैर संस्कृति के सामने आये बोला- “हमें राजा उदयभान ने पीपल से बांधकर अग्नि को समर्पित कर दिया था, क्योंकि उनकी दृष्टि में हमने तुमसे प्रेम करने का दुस्साहस किया था। हमारे जिस दुस्साहस की लिए हमें दण्डित किया गया था, वही दुस्साहस दोहराने के लिए हम वापस आये हैं।”
संस्कृति ने एक नजर साहिल पर डाली, जो खड़े होने की कोशिश करता नजर
आ रहा था।
“मैं किसी उदयभान को नहीं जानती। मुझे नहीं मालूम कि तुम कौन हो? मेरा पीछा छोड़ दो। प्लीज लीव मी!”
“आंग्ल भाषा का प्रयोग मत करो। हमें घृणा है इस भाषा से।” अभयानन्द का क्रोध-मिश्रित स्वर।
“तुम्हारे साथ जो कुछ भी हुआ था उसकी वजह माया थी?”
“हाँ! माया ही थी वजह। माया अर्थात तुम। राजमहल के खानदान में सैकड़ों साल पहले तुमने ही जन्म लिया था। उदयभान तुम्हारे पिता थे।”
संस्कृति को आगे बोलने के लिए कोई वाक्य नहीं मिला। जिस संभावना को वह पहले ही लगभग स्वीकार कर चुकी थी, उस संभावना पर सत्यता की मुहर लगी तो वह चाहकर भी अभयानन्द के दावों निराधार साबित न कर सकी।
“तुम ही माया हो।” संस्कृति को खामोश पाकर अभयानन्द का लहजा उत्साहित हो उठा- “तुम हमारे लिए ही वापस आयी हो। हमारी अतृप्त इच्छा को पूर्ण करने हेतु नया जन्म लिया है तुमने।”
साहिल का जेहन ज्ञानशून्य हो गया। बाकी इंसानों की तरह उसने भी कभी कल्पना नहीं की थी कि मौत उसे इतनी आसानी से निगल जायेगी। बंद आँखों के अँधेरे में उसे अपना अतीत याद आने लगा।
किन्तु!
इससे पहले कि वह ढंग से चीख भी न पाता और उसका धड़ प्राणविहीन होकर हवा में लहरा कर जमीन पर गिर पड़ता; एक चमत्कार हो गया। साहिल को महसूस हुआ कि उसके बाल नर-भेड़िये की मुट्ठी से आजाद हो गये हैं।
पहले तो उसे यकीन नहीं हुआ कि ऐसा हुआ है, किन्तु जब यकीन हो गया तो उसने धीरे-धीरे आँखें खोली।
अकल्पनीय घटना घटी थी। नर-भेड़िया साहिल से दस कदमों की दूरी पर धरातल पर पड़ा था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी के शक्तिशाली पदाघात ने उसे रुई के ढेर की भांति हवा में उछल दिया था। वह साहिल को ही देख रहा था। उसकी खौफनाक आँखों में साहिल को जरूर भय नजर आता, अगर उसकी आँखें अंगारों सी सुर्खी न लिए होतीं तो।
साहिल के जिस्म में कम्पन्न हुआ। उसने साँसों को नियंत्रित करने का प्रयास किया, क्योंकि उसके हांफने का स्वर रात के सन्नाटे में खौफनाक रूप अख्तियार कर रहा था। उसकी भयभीत निगाहें नर-भेड़िये पर ठहरी हुई थीं, क्योंकि वह जानता था कि नर-भेड़िया अचानक हुए हमले से हार नहीं मान सकता है। वह दोबारा जरूर झपटेगा।
“अ...आप ठीक तो हैं न साहिल?”
उसके पीछे से संस्कृति की आवाज आयी।
‘स..संस्कृति यहाँ कैसे आयी?’
विचित्र से तरद्दुद में फंसे साहिल ने धीरे-धीरे गर्दन पीछे घुमाई।
पीछे वास्तव में संस्कृति ही थी। उसके हाथ में टॉर्च था। चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे वह खुद भी नहीं समझ पायी हो कि थोड़ी देर पहले जो कुछ हुआ वह कैसे हुआ। हैरत-अंगेज बात ये थी कि उसकी दाहिनी कलाई के स्वास्तिक से तीव्र चमक फूट रही थी। साहिल समझ गया कि उछल कर दूर गिरने के बाद नरभेड़िये की निगाह उस पर नहीं बल्कि उसके पीछे खड़ी संस्कृति पर ठहरी हुई थी।
साहिल ने खड़े होने की कोशिश की, किन्तु अत्यधिक भय और बदन की थरथराहट के कारण उसका प्रयास विफल हो गया।
संस्कृति खौफजदा निगाहें नरभेड़िये पर केन्द्रित किये हुए साहिल की ओर बढ़ी। नरभेड़िया, जो अभी तक धरातल पर पड़ा हुआ था, उसे अपने शिकार की ओर बढ़ता देख उछल कर उठ खड़ा हुआ। संस्कृति सहम कर यथास्थान पर ठहर गयी। टॉर्च की रोशनी को सामने रखने के उपक्रम में उसकी दाहिनी कलाई का रुख नरभेड़िये की ओर हुआ और स्वास्तिक से फूटती चमक तीव्र हो उठी।
नरभेड़िया चाँद की ओर देख कर गरजा। संस्कृति के देखते ही देखते रोंगटे खड़े कर देने वाला चमत्कार हुआ। धवल चाँदनी का एक कतरा ज्यों ही नरभेड़िये की आँखों से टकराया, त्यों ही वह चिंघाड़ उठा। उसकी चिंघाड़ में पीड़ा का समावेश था। पल भर के अंतराल में ही वह नरभेड़िये का रूप त्याग कर अपने मानस रूप में आ गया। हालांकि उसकी आँखें अब भी भेड़िये की आँखों जैसी ही थीं।
“हाथ नीचे करो माया। हमारा शरीर तप रहा है।” अभयानन्द ने दोनों हाथों से स्वास्तिक से बचने का प्रयत्न करते हुए कहा।
संस्कृति ने स्वास्तिक पर नजर डाली। स्वास्तिक यूं चमक रहा था, जैसे अँधेरे में ग्लोइंग टैटूज चमकते हैं।
“मैं माया नहीं हूँ।” स्वास्तिक की शक्ति पर यकीन होते ही संस्कृति का लहजा आत्मविश्वास से परिपूर्ण हो उठा।
“तुम माया हो।” अभयानन्द चीख कर एक तने की ओट में हो गया। और फिर बगैर संस्कृति के सामने आये बोला- “हमें राजा उदयभान ने पीपल से बांधकर अग्नि को समर्पित कर दिया था, क्योंकि उनकी दृष्टि में हमने तुमसे प्रेम करने का दुस्साहस किया था। हमारे जिस दुस्साहस की लिए हमें दण्डित किया गया था, वही दुस्साहस दोहराने के लिए हम वापस आये हैं।”
संस्कृति ने एक नजर साहिल पर डाली, जो खड़े होने की कोशिश करता नजर
आ रहा था।
“मैं किसी उदयभान को नहीं जानती। मुझे नहीं मालूम कि तुम कौन हो? मेरा पीछा छोड़ दो। प्लीज लीव मी!”
“आंग्ल भाषा का प्रयोग मत करो। हमें घृणा है इस भाषा से।” अभयानन्द का क्रोध-मिश्रित स्वर।
“तुम्हारे साथ जो कुछ भी हुआ था उसकी वजह माया थी?”
“हाँ! माया ही थी वजह। माया अर्थात तुम। राजमहल के खानदान में सैकड़ों साल पहले तुमने ही जन्म लिया था। उदयभान तुम्हारे पिता थे।”
संस्कृति को आगे बोलने के लिए कोई वाक्य नहीं मिला। जिस संभावना को वह पहले ही लगभग स्वीकार कर चुकी थी, उस संभावना पर सत्यता की मुहर लगी तो वह चाहकर भी अभयानन्द के दावों निराधार साबित न कर सकी।
“तुम ही माया हो।” संस्कृति को खामोश पाकर अभयानन्द का लहजा उत्साहित हो उठा- “तुम हमारे लिए ही वापस आयी हो। हमारी अतृप्त इच्छा को पूर्ण करने हेतु नया जन्म लिया है तुमने।”