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Horror ख़ौफ़

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उसी रात सम्पूर्ण शंकरगढ़ में यह राजाज्ञा प्रसारित कर दी गयी कि अभयानन्द को प्राचीन पीपल से बांधकर ज़िंदा जलाया जाएगा। मजबूत कलेजे वाले नागरिकों से यह आग्रह किया गया था कि वे बड़ी तादात में उपस्थित होकर इस लोमहर्षक घटना के साक्षी बने, ताकि वे आने वाली पीढ़ी को बता सकें कि किस प्रकार एक वहशी अपराधी को भयानक और ऐतिहासिक मृत्युदंड दिया गया था।

शंकरगढ़ के इतिहास में अभयानन्द पहला ऐसा अपराधी था, जिसे दंडस्वरूप अग्नि को जीवित सौंपा जाने वाला था। राज्य में दहशत का वातावरण न बनने पाये इसलिए यह प्रसारित नहीं किया गया था कि अभयानन्द के शरीर में महापिशाच अपना घर बना रहा है, किन्तु ये हिदायत अवश्य दी गयी थी कि जब उसे पीपल की ओर ले जाया जा रहा हो तो उस क्षण कमजोर दिल वाले पुरुष, गर्भवती महिलाएं और बच्चे उसके सम्मुख न आयें।

उस रात शंकरगढ़ के आबोहवा में दहशत घुल गया था।

‘अभयानन्द का जीवित दाह-संस्कार किया जाने वाला है।’

जिस किसी ने भी सुना, उसके रोंगटे खड़े हो गये। उसमें इतना भी साहस नहीं शेष रहा कि वह बुराई के विनाश की इस ऐतिहासिक घटना का साक्षी बनने के लिए पीपल के पेड़ तक जा सके।

कुल जमा पचास-साठ नागरिक ही ऐसे थे, जो इस लोमहर्षक घटना को आंखों से देखने का साहस जुटा पाए थे। वे बन्दीगृह की इमारत के बाहर मशाल लिये हुए खड़े थे। उनकी संख्या की दोगुनी संख्या में वहां सैनिक उपस्थित थे। कुलगुरु आचार्य दिव्यपाणी, महाराज उदयभान सिंह और राज्य के समस्त पदाधिकारी भी वहां मौजूद थे।

अभयानन्द को बाहर लाया जा चुका था। उसका शरीर अब भी पहले की तरह ही जड़ अवस्था में था। शारीरिक परिवर्तन बस इतना ही हुआ था कि उसके जबड़े के दोनों किनारों के दांत नुकीले होकर बाहर निकल आये थे, हाथ-पैर के नख बढ़ने लगे थे और शरीर पर भेड़िये के खाल की पतली परत चढ़नी प्रारंभ हो गयी थी।

‘महाराज ने सर्वथा उचित निर्णय लिया है।’

‘जगद्जननी ने हमारी विनती सुन ली।’

‘इस पिशाच को जला देना ही राज्य के हित में है।’

कुलगुरु के आदेश पर अभयानन्द का शरीर एक काले कपडे में ठीक उसी प्रकार लपेट दिया गया जिस प्रकार किसी शव को कफ़न में लपेटा जाता है।

अभयानन्द ने कोई प्रतिकार नहीं किया।

धूपबत्ती का एक मोटा बण्डल जलाकर वातावरण को सुगन्धित किया गया। कुलगुरु ने कमण्डल का जल अंजुली में लेकर गीता के श्लोक का उच्चारण किया-

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।

(अर्थ- जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होती है।)

तत्पश्चात उन्होंने जल को काले कपड़े में लिपटे अभयानन्द पर छिड़क दिया।

इस बार अभयानन्द की ओर से प्रतिक्रिया हुई। वह यूं फड़फड़ाया मानो उसका दम घुट रहा हो।

“श्मशानेश्वर क्रोधित हो रहा है। इसे धातु की जंजीरों में जकड़ो। शीघ्रता करो।”

पहले से तैयार सैनिक आदेश का पालन करने में जुट गये।

“अभयानन्द की काल-कोठरी का शुद्धिकरण कर दो।” कुलगुरु शिष्यों की ओर मुड़े- “वहां उपस्थित उसके दूषित औरा को नष्ट करने के लिए ये आवश्यक है।”

उपरोक्त कार्य हेतु नियुक्त किये गये शिष्य वहां से प्रस्थान कर गये।

“इसे प्राचीन पीपल तक घसीटते हुए लाया जाय। इसे जीवित नहीं, मृत समझो। अभयानन्द तो उसी क्षण मृत्यु को प्राप्त हो गया था, जिस क्षण उसने अघोरा के शरीर में निवास करने वाले श्मशानेश्वर का आह्वान किया था और उसे अपने शरीर में आमंत्रित किया था। इससे पूर्व कि श्मशानेश्वर, अभयानन्द के शरीर में पूर्णतया प्रतिस्थापित हो जाए, हमें उसके शरीर को नष्ट करना होगा। जला देना होगा। बोलो हर हर....”

“महादेव।”

वातावरण असंख्य जयघोष से कम्पित हो उठा।

शिकंजों में जकड़ा अभयानन्द बुरी तरह छटपटा रहा था। सैनिक उसे घसीटते हुए गंतव्य की ओर ले जाने लगे।

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द्विज के साँसों की गति उग्र थी। वह देवी-मंदिर के अहाते में था। पुजारी बाबा राज्य में हुई मुनादी को सुनकर अभयानन्द के ‘दाह-संस्कार’ में गये हुए थे। द्विज अस्वस्थ्य होने का बहाना करके पुजारी बाबा के साथ नहीं गया था। गर्भगृह में दीप जल रहा था।

द्विज दूर नजर आ रहे मशालों की लौ के उस समूह को देख रहा था, जो राज्य

के बाहर स्थित पुरातन पीपल की ओर बढ़ रहा था।

“वे ले जा रहे हैं। वे अभयानन्द को ले जा रहे हैं।” द्विज व्यग्र भाव से बड़बड़ाया- “उफ़! ये क्या कर दिया मैंने। ईश्वर मुझे कभी क्षमा नहीं करेगा। अभयानन्द के साथ जो अमानवीय घटना घटित होने वाली है, उसका निमित्त मैं ही हूँ। मैं पाप का भागी हूँ। यशप्राप्ति की लालसा और माया की आसक्ति में मुझे ये स्मरण ही नहीं रहा कि...।”

द्विज ने आगे का कथन जान-बूझकर अधूरा छोड़ दिया। चेहरे पर नजर आती व्यग्रता आंसुओं में परिणित होकर आँखों से बहकर गालों पर लुढ़क आयी।

वह कई क्षणों तक आँखें मूंदे हुए आत्ममंथन करता रहा। फिर उसने आँखें खोली। भीड़ के कोलाहल का धीमा स्वर मंदिर तक आ रहा था। द्विज अपने स्थान से उठा और गर्भगृह में प्रविष्ट हो गया। उसने घंटे की ध्वनि उत्पन्न की और हाथ जोड़कर भगवती के सम्मुख नतमस्तक हो गया।

“आप तो अंतर्यामिनी हो माँ। आप तो मेरी व्यग्रता का कारण समझ रही हो। ये ज्ञात होते हुए भी कि अभयानन्द निरीह पशुओं का रक्त पीता था, वह बलिवेदी पर मासूमों इंसानों की बलि चढ़ाता था, मैं उसके लिए क्यों व्यथित हूँ? इस प्रश्न का उत्तर आपके नेत्रों से ओझल नहीं है। उसके दुष्कर्मों का भयावह दंड देख कर मेरे हृदय में करुणा का भाव जागृत हो रहा है। मेरा मार्गदर्शन करो भगवती। मैं किस मार्ग को चुनूं? शंकरगढ़ की प्रजा के हित का मार्ग चुनूं, या फिर अभयानन्द के हित का, जो....।” द्विज ने एक बार फिर अपना कथन अधूरा छोड़ दिया।

वह नतमस्तक होकर सिसकता रहा। दीपक के सुनहरे प्रकाश में भगवती के सुन्दर, तेजोमय और कान्तियुक्त मुखमंडल पर मुस्कान थी। मानो वे द्विज की दुविधा पर मुस्कुरा रही थीं। विधाता के रचे हुए उस प्रारब्ध पर मुस्कुरा रही थीं, जो न केवल शंकरगढ़ में भीषण रक्तपात का कारण बनने वाला था, अपितु द्विज के जीवन में आने वाले एक बड़े परिवर्तन का सूत्रधार भी बनने वाला था।

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“आज अभयानन्द जिस दशा को प्राप्त होने वाला है, वह बुराई पर अच्छाई के विजय का एक नवीन उदाहरण होगा। एक आततायी के पापों का भीषण दंड होगा। हमें स्मरण है कि ये वही नराधम है, जिसने गरीब बिरजू के लहू से एक पिशाच के चरण धोए, जिसने राजकुमारी माया का मार्ग रोकने का दुस्साहस किया और जिसका सामना करने से तुम लोग सदैव कतराते रहे। ये मृत्यु को प्राप्त हो चुका है। अब इसका शरीर मरघट के एक भयानक पिशाच को पोषण प्रदान कर रहा है। इसलिए इसके शरीर को नष्ट करना अनिवार्य है। जिस प्रकार तुम मोह के बंधनों से मुक्त होकर अपने किसी प्रिय की निष्प्राण काया का दाह-संस्कार करते हो, उसी प्रकार तुम्हें इस पिशाच का भी दाह-संस्कार करना है। तुममें से प्रत्येक के हाथ में मशाल है। मेरा संकेत प्राप्त होते ही उसे नराधम पर उछालना है। इसे इसके दुष्कृत्यों का दंड देना है। यही इसकी नियति है। परमात्मा ने इसका अंत इसी प्रकार होना सुनिश्चित किया है।”

आचार्य दिव्यपाणी प्राचीन पीपल के सम्मुख उपस्थित हुए, लगभग पचास की तादात वाले जनसमूह को संबोधित कर रहे थे। अभयानन्द को पीपल के तने से बाँध दिया गया था। उसके चेहरे से काला कपड़ा हटा दिया गया था, ताकि शंकरगढ़ के लोग खौफ का पर्याय बन चुके अभयानन्द के चेहरे पर भी खौफ देख सकें, किन्तु स्थिति विपरीत थी।

अभयानन्द का मुखमंडल भयानक हो उठा था। उसके चेहरे और सिर पर पशुओं की भांति बाल उगने प्रारम्भ हो गये थे। आँखें पूर्णतया भेड़िये की आँखों में तब्दील हो चुकी थीं, किन्तु उन आँखों में भय नहीं बल्कि दहकते अंगारों सी लालिमा थी। वह तने से छूटने का प्रयास कर रहा था, किन्तु शिकंजों की खनखनाहट के स्वर के साथ उसका हर प्रयास विफल सिद्ध हो रहा था।

“हमारे शरीर को नष्ट करना इतना सहज नहीं है मूर्खों!” अभयानन्द चिघाड़ा- “हमने इसे हमारे आराध्य देव श्मशानेश्वर को सौंप दिया है। महान श्मशानेश्वर इसकी रक्षा करेंगे। वे इसे पर्याय बनाकर अपने विकराल स्वरूप में अवतरित होंगे। शंकरगढ़ उनका भयानक शाप झेलेगा। भीषण रक्तपात से इस राज्य की धरती लाल हो उठेगी। यह राज्य इस सीमा तक जनशून्य हो जाएगा कि आने वाली पीढ़ियाँ इसे श्मशानगढ़ के नाम से स्मरण करेंगी।”

अभयानन्द का रूप और उसकी भीषण गर्जना देख प्रत्येक प्राणी ये अटकलें लगा रहा था कि यदि ‘काल’ मानव रूप में कहीं रहता होगा तो वह अभयानन्द जैसा ही दिखता होगा। प्रचंड ज्वाला के साथ लपलपाती मशालों को पीपल की जड़ में रखने भर की देरी थी कि उसके तने से बंधे अभयानन्द के जिस्म का आग की लपटों से घिर जाना निश्चित था, किन्तु किसी में भी इतना साहस नहीं था कि वह मशाल लेकर सबसे पहले आगे बढ़ता। अभयानन्द का खौफ उनके मानस पटल पर पत्थर की लकीर के रूप में अंकित हो गया था। दिव्यपाणी ने एक सैनिक के हाथ से मशाल ले लिया। महाराज समेत राज्य के अन्य पदाधिकारियों

ने भी उनका अनुसरण किया।

“सच्चिदानन्द परमेश्वर तुम्हें इस दूषित काया से मुक्त करें। तुम्हें बोध करायें कि तुमने उस दुर्लभ मानव-योनि का दुरूपयोग किया है, जिसे धारण करने हेतु देवगण भी तरसते हैं। तुमने अपना सम्पूर्ण जीवन वाममार्गी साधना में व्यतीत किया है। तामसी शक्तियों को साधने की लालसा के कारण तुम्हारे विचार भी तामसिक हो चुके हैं। मानवों के कल्याण के लिए तुम्हारा वध अत्यावश्यक है। ॐ शांति:!”

दिव्यपाणी ने अपना मशाल अभयानन्द पर उछाल दिया। उसके होठों से भयमिश्रित चीत्कार निकली, किन्तु किसी को भी उस पर दया नहीं आयी क्योंकि वह दया का पात्र नहीं था। देखते ही देखते अनगिनत मशाल उस पर आकर गिरे और पीपल का तना भयानक आग की चपेट में आ गया।

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लम्बे समय से सिसक रहे द्विज ने कोई ध्वनि सुनकर चेहरा ऊपर उठाया। सामने कुछ नहीं था, सिवाय सुनहरे प्रकाश में चमकती भगवती की प्रतिमा के।

“क्या ये संकेत है?” द्विज ने मानो प्रतिमा से पूछा- “क्या ये संकेत है कि मैं...। हाँ! नि:संदेह ये मेरी दुविधा के अंत का संकेत है।”

बदहवास सा द्विज गर्भगृह से बाहर आया। उसने आकाश की ओर देखा। वहां अब स्याह मेघ अपना आधिपत्य जमा चुके थे। उनके चन्द्रमा पर आच्छादित हो जाने के कारण वातावरण में अमावस सा अंधकार छा गया था। हवाएं तीव्र हो उठी थीं। प्रकृति के रूप में अकस्मात हुए इस परिवर्तन पर द्विज मानो झूम उठा।

“मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर मिल गया। भगवती ने मेरे विरोधाभास का अंत कर दिया।” वह प्रांगण के मुख्य द्वार की ओर दौड़ पड़ा।

यही वह क्षण था, जब गर्भगृह का दीपक पुन: बुझ गया।

 
“आगे क्या हुआ कुलगुरु?”

कुलगुरु के खामोश होते ही अरुणोदय, चंद्रोदय और दिग्विजय, तीनों भाईयों ने समवेत स्वर में पूछा। कुलगुरु ने आगे के भोज-पत्रों को उलटा-पलटा। उनके निचले हिस्से पर अंकित ‘पत्रक-संख्या’ का अवलोकन किया।

“क्या हुआ कुलगुरु?” दिग्विजय ने आशंकित लहजे में पूछा।

“ऐसा कैसे हो सकता है?” कुलगुरु के स्वर में अविश्वास का भाव था- “भोज-पत्र गायब कैसे हो सकते हैं?”

“क्या?” तीनों भाईयों के पैरों तले जमीन खिसक गयी- “क्या आगे के पत्रक गायब हैं?”

“हाँ! वे समस्त पत्रक गायब हैं, जिनमें अभयानन्द-प्रकरण की आगे की कथा है। देवी-मंदिर से द्विज के प्रस्थान की घटना के बाद की घटनाओं से सम्बंधित कोई पत्रक इस ग्रन्थ में नहीं है। पत्रक गायब किये गये हैं।”

“किन्तु ऐसा कौन कर सकता है?” चंद्रोदय ने व्याकुल लहजे में कहा- “इस ग्रंथागार में हम तीनों भाईयों के अलावा किसी अन्य को प्रवेश की अनुमति नहीं है। इसकी चाबी बड़े भइया हमेशा अपने जनेऊ में धारण किये रहते हैं।”

“पत्रकों का गायब होना यह सिद्ध कर रहा है कि कोई अन्य भी था, जो आप तीनों से छिपकर इस ग्रंथालय में प्रविष्ट हुआ था। उसने पत्रक गायब किया, क्योंकि शायद वह नहीं चाहता था कि अभयानन्द की इसके बाद की कथा के विषय में हम जानें। संभव है कि उसने दिग्विजय के अनजाने में इस ग्रंथागार की नकली चाबी तैयार कर ली हो।”

“लेकिन ऐसा कौन कर सकता है? जहां तक मुझे याद है, मैंने चाबी को कभी खुद से अलग नहीं किया।”

“कोई तो अवश्य है दिग्विजय, जिसने ऐसा रहस्यमयी कार्य किया है। मरघट से ताबूत का गायब होना और श्मशानेश्वर के रूप में अभयानन्द का लौटना किसी षडयंत्र के तहत संभव हुआ है।”

माहौल गंभीर हो गया। वातावरण में अब केवल कुलगुरु के खड़ाऊँ की ‘खट-खट’ गूँज रही थी, जो हाथ पीछे किये हुए टहलने लगे थे।

“अब हमें अभयानन्द की आगे की कहानी कैसे मालूम होगी?” लम्बी खामोशी के बाद अरुणोदय ने मुंह खोला।

इससे पहले कि कुलगुरु कोई जवाब देते, ग्रंथागार के दरवाजे पर दस्तक हुई। चारों की निगाहें उस ओर गयीं। वहां खड़े नौकर ने अधोलिखित सूचना दी-

“इलाहाबाद के किसी थाने से एक कांस्टेबल आया है ठाकुर साहब।”

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दरवाजे पर थाप पड़ी, किन्तु अन्दर से कोई आवाज नहीं आयी।

“दरवाजा खोलो यश!”

दस्तक देने वाली महिला ने आवाज लगाई। उसके हाथ में दोपहर के भोजन की थाली थी।

इस बार भी भीतर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी।

महिला परेशानी हुई। इस बार उसने दरवाजे को तेजी से हिलाया।

“तुम ठीक तो.....।”

महिला के आगे के लफ्ज वजूद में न आ सके। तेज धक्के से दरवाजे के कपाट खुल गये। विचित्र ऊहापोह में डूबी महिला कमरे में दाखिल तो हुई, किन्तु उसके बाद एक भी कदम आगे न बढ़ा सकी। अन्दर के दृश्य पर नजर पड़ते ही उसका समूचा जिस्म थरथरा उठा। दोनों हाथ भोजन की थाली का भार सम्भालने में असफल हो गये और थाली जमीन पर गिर पड़ी।

महिला पहले तेज स्वर में चीखी, फिर इस कदर जड़ हो गयी, मानो यह उसके जीवन की आखिरी चीख रही हो।

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दोपहर के दो बज गये थे।

साहिल और संस्कृति हीलिंग सेंटर से बाहर आए।

“ब्रह्मराक्षस के दिये हुए अल्टिमेटम के सोलह घण्टे हम गंवा चुके हैं। अब हमारे पास केवल आठ घण्टे हैं।” साहिल झुंझलाया- “हम अब भी बैकफुट पर ही हैं। ब्रह्मराक्षस से जुड़ा ऐसा कोई भी रहस्य हमारे हाथ नहीं लगा, जिसे हम उसके खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकें।”

“मुझे जो विजन्स दिखे थे, उसके आधार पर डॉक्टर पुष्कर त्रिवेदी ने क्या एडवाइस दी?”

“डॉक्टर ने जो कुछ बताया उसे केवल एक ही लाइन में समराइज किया जा सकता है।”

“और वह लाइन है क्या?”

“हमारे अनुमान सही निकले। तुम माया की पुनर्जन्म हो। तुमने भी वही स्केचेज बनाए, जो यश ने बनाये थे। एण्ड नाउ आयम श्योर अबाउट दैट; यश, व्दिज का पुनर्जन्म है। डॉक्टर त्रिवेदी ने अगर कुछ नया बताया तो केवल यही कि पिछले जन्म में तुम्हारी मौत जलकर हुई थी। आग से लगने वाला डर तुमसे तुम्हारे पिछले जन्म से ही जुड़ा है, इसीलिए तुम माचिस की एक तीली जलाने से

भी कांपती हो।”

“ये सारे अनुमान तो हम पहले ही लगा चुके थे। केवल इतनी बातों से हमारी कोई प्रॉब्लम नहीं सॉल्व होगी।”

“इससे अधिक जानने के लिए तुम्हें मल्टीपल सेशन अटेंड करने होंगे और हमारे पास वक्त नहीं है। हमारे पास केवल आठ घण्टे हैं और इन आठ घंटों में अगर हमने कुछ नहीं किया तो तुम्हारे गांव वाले एक वहशी पिशाच को तांडव करते हुए अपनी आंखों से देखेंगे।”

“अब हम कहां जाएंगे?”

“इलाहाबाद की एक पब्लिक लाइब्रेरी में। मैं वहां जाकर पैरानॉर्मल घटनाओं और ऑकल्ट पर आधारित कुछ रेफरेंस बुक की स्टडी करना चाहता हूं। हो सकता है कि हमें ब्रह्मराक्षस और उसे काबू में करने के कुछ सुराग मिले।”

“यानी कि अब हमारे पास केवल यही एक रास्ता है कि हम किताबों में ब्रह्मराक्षस को मारने की विधि ढूंढ़े।” संस्कृति हताश स्वर में बोली- “जो कि मिलना मुश्किल है।”

साहिल कुछ नहीं बोला। चेहरे पर परेशानी के भाव लिए हुए वह प्रतापगढ़ से आने वाली बस की राह देखने लगा, ताकि इलाहाबाद पहुंच सके।

“आप कुछ बोलते नहीं?”

“मैं प्रयास कर रहा हूं। और फिलहाल प्रयास करना ही हमारे हाथ में है। दुआ करो कि कोई रास्ता निकल आए।”

“मेरे साथ जो भी सुपरनेचुरल हैप्पेनिंग्स हुए, उसकी वजह एक ताबूत का बाहर आ जाना है, लेकिन यश के साथ ऐसा क्या हुआ रहा होगा, जो उसे रहस्यमय सपने आने शुरू हुए?”

“वही तो पता नहीं चल पा रहा है।”

“आई थिंक एक बार यश को भी रिवर्स मेमोरी थेरेपी दिलवानी चाहिए।”

“नहीं। यश इसके लिए मेंटली फीट नहीं है। वह ऑलरेडी ऑउट ऑफ मेमोरी है। अधिक मेंटल प्रेशर देने पर वह पागल हो सकता है।”

संस्कृति खामोश रह गयी।

गहन विचारों में खोये साहिल की तन्द्रा सेलफोन की रिंग से भंग हुई।

“हैलो!” कॉल रिसीव ने करने के बाद उसने सामान्य स्वर में कहा, किन्तु दूसरी ओर से आयी सूचना सुनते ही वह लगभग चीख पड़ा- “लेकिन...लेकिन ऐसा हुआ कैसे?”

संस्कृति भी बुरी तरह चौंकी।

“ओके! मैं आ रहा हूं।”

“क्या हुआ?” साहिल के कॉल डिसकनेक्ट करते ही संस्कृति ने रोमांचित लहजे में पूछा।

“यश ने अपने जिस्म पर चाकू से कई गहरे जख्म बना लिए हैं। प्राइमरी ट्रिटमेन्ट के लिए उसे गांव के सरकारी अस्पताल में एडमिट कराया गया है। क्रिटिकल कंडीशन होने पर उसे कहीं और भी रेफर किया जा सकता है। हमें गांव जाना होगा।”

“ओह मॉय गॉड!”

संस्कृति कांप कर रह गयी।

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“हमें यहां बुलाने की वजह?” दिग्विजय ने सख्त स्वर में पूछा। उनका अंदाज बता रहा था कि एक मामूली पुलिस ऑफिसर व्दारा थाने बुलाया जाना, उनकी शान के खिलाफ था।

“आपको एक लाश की शिनाख्त करनी है।”

“लाश की शिनाख्त?” दिग्विजय का लहजा कांपा, किन्तु इंसपेक्टर का अगला वाक्य सुनकर उन्होंने राहत की सांस ली।

“एक आदमी की लाश है, जो हमारे लॉकअप में पड़ी है। उसके बारे में पड़ताल करने पर हमें कुछ पता चला है, उसी के बाबत कुछ पूछताछ करनी है। प्लीज मेरे साथ आइए।”

इंसपेक्टर, दिग्विजय को लेकर लॉकअप में पहुंचा। उसके इशारे पर एक कांस्टेबल ने लाश पर से कपड़ा हटाया।

दिग्विजय लाश को पहचानते थे।

“इसका नाम भीमा है। स्लम एरिया के एक झोपड़पट्टी में रहता था। वहीं से हमें इसकी लाश बरामद हुई। शुरूआती जांच में पता चला है कि ये आपके यहां नौकर था।”

“हां! तीन महिने पहले ही नौकरी छोड़ी थी इसने।”

“क्यों?”

“कोई ठोस वजह नहीं बताया था।”

“कब से आपके यहां था?”

“लगभग पांच सालों से।”

कांस्टेबल ने लाश को फिर से ढक दिया।

इंसपेक्टर, दिग्विजय को लेकर केबिन में आया और मेज की दराज से कुछ चीजें निकालकर उनके सामने मेज पर फैला दिया। उनमें विदेश यात्रा से सम्बन्धित दस्तावेज और कुछ तस्वीरें थीं।

“ये हमें भीमा की झोपड़ी से बरामद हुए। वह हाल ही में कैम्ब्रिज से लौटा था। क्या आप उसे इतनी तनख्वाह देते थे ठाकुर साहब कि वह सेविंग्स के जरिए एक फॉरेन टूर अफोर्ड कर सकता था?”

“क्या एक नौकर को इतनी तनख्वाह दी जाती है ऑफिसर?”

दिग्विजय के सवाल में छिपे अपने जवाब को पाने के बाद इंसपेक्टर ने अगला सवाल किया- “क्या आपको उसके कैम्ब्रिज टूर के विषय में कुछ मालूम था?”

“ये कैसा बेतुका सवाल है?” दिग्विजय झुंझलाए- “उसे राजमहल की नौकरी छोड़े हुए तीन महीने हो चुके थे। इन तीन महिनों में वह कहां गया, क्या किया; इस बाबत भला मेरे पास क्या जानकारी हो सकती है?”

“ठण्डे दिमाग से सोचिए ठाकुर साहब। पूरे मामले को पुलिसिया निगाहों से देखिए। आपकी बेटी भी तो कैम्ब्रिज में ही थी। वह भी हाल में ही इण्डिया लौटी है। क्या इस बात की संभावना नहीं बनती कि भीमा के कैम्ब्रिज जाने का कनेक्शन आपकी बेटी से जुड़ा हो?”

“क्या मतलब?”

“कई मतलब हो सकते हैं। हो सकता है कि आपका कोई राइवल....।”

“नहीं।” इंसपेक्टर की बात पूरी होने से पहले ही दिग्विजय ने लापरवाह अंदाज में कहा- “कैम्ब्रिज में संस्कृति के साथ कुछ नहीं हुआ था।”

“यानी कि कैम्ब्रिज में भीमा और संस्कृति का आमना-सामना नहीं हुआ था।”

“जी नहीं। और ऐसा होना मुमकिन भी नहीं है, क्योंकि भीमा न तो संस्कृति को पहचानता था और न ही संस्कृति, भीमा को। संस्कृति दस सालों से कैम्ब्रिज में ही थी। स्कूल और डिग्री की पढ़ाई उसने वहीं से पूरी की थी।”

“संस्कृति इस वक्त कहां है?”

“शंकरगढ़ में ही।”

थोड़ी सी असहजता के बाद दिग्विजय ने झूठ बोल दिया। उनके झूठ बोलने के पीछे दो कारण थे। पहला ये कि उन्हें संस्कृति को ढूढ़ने के मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली से कहीं ज्यादा भरोसा अपने आदमियों पर था, और दूसरा ये कि वे अपने बेटी के अचानक घर से चले जाने की घटना को अखबारों की सुर्खियां नहीं

बनाने देना चाहते थे।

“हो सकता है हमें संस्कृति से भी मिलना पड़े। बाई द वे, अब आप इन तस्वीरों को देखिए। ये भी भीमा के ठिकाने से ही बरामद हुए हैं।”

तस्वीरों की संख्या तीन थी। एक तस्वीर किसी नवयुवक की थी, दूसरी

तस्वीर एक अधेड़ उम्र के महिला की थी और तीसरी तस्वीर जमीन पर खून से लिखी इबारत की थी।

“खून से लिखी गयी ये इबारत, भीमा की लाश के पास उसी के खून की स्याही से लिखी हुई पाई गयी थी। इस युवक की तस्वीर भी हमें उसके कैम्ब्रिज यात्रा के दस्तावेजों में मिली। क्या आप इस युवक को जानते हैं?”

दिग्विजय ने इनकार में सिर हिलाया।

“क्या आप किसी ऐसे इंसान को जानते हैं, जिसकी कलाई पर स्वास्तिक चिह्न हो, और जिसके मरने की बात इस खूनी इबारत में की गयी है?”

“शायद वैभव की कलाई पर रहा हो, क्योंकि फिलहाल तो वही है, जिसकी मृत्यु रहस्यमयी परिवेश में हुई है।”

“हम आलरेडी पता कर चुके हैं। वैभव की कलाई पर स्वास्तिक चिह्न नहीं था।”

“हम्म।” इंसपेक्टर ने गहरी सांस ली और आगे कहा- “इसके अलावा हमने भीमा के ठिकाने से तंत्र-मंत्र की कुछ किताबें भी बरामद कीं।”

“तंत्र-मंत्र की किताबें?” दिग्विजय के कान खड़े हो गये।

“जी हां। भीमा गैरकानूनी तांत्रिक गतिविधियों में लिप्त था, इस बात की संभावना पर तब सत्यता की मुहर लग गयी, जब हमें तंत्र की एक किताब के बीच इस औरत की तस्वीर मिली।”

इंसपेक्टर ने महिला की तस्वीर की ओर इशारा किया। दिग्विजय ने भी तस्वीर पर दृष्टिपात किया।

“इसका नाम अरुणा है। स्थानीय लोगों के बयान के मुताबिक भीमा इससे मिलता-जुलता था। ये खुद भी उससे मिलने बस्ती में आया करती थी। क्या आप इसे जानते हैं।”

“नहीं।”

“इस महिला को लोग भयानक तांत्रिक बताते हैं। इसके खिलाफ बच्चों को चुराने के अनगिनत केस दर्ज हैं। लोगों का कहना है कि ये तांत्रिक अनुष्ठानों में नवजात शिशुओं की बलि चढ़ाती है। ये अभी-तक पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ी है।”

दिग्विजय की आंखों के आगे तारे नाच रहे थे। ‘तांत्रिक महिला’ , ‘नरबली’ ,

‘भीमा का उस महिला से जान-पहचान होना’ , ‘इतिहास के पुलिन्दे से भोजपत्रों को गायब होना’ ; ये सभी घटनाएं उन्हें एक क्रम का रूप लेती हुई नजर आने लगीं।

‘इसका मतलब कि कुलगुरु का कहना सही है। अभयानन्द की वापसी एक षड़यंत्र के तहत हुई है।’

प्रत्यक्ष नें उन्होंने कहा- “क्या मैं इस महिला की तस्वीर को अपने साथ ले जा सकता हूं।”

“ऑफकोर्स!”

“मैं अपने सोर्सेज के जरिए भी इसकी तलाश करवाऊंगा।”

“विगत दिनों में जो कुछ भी हुआ है वह साधारण नहीं है ठाकुर साहब। आपकी बेटी के व्दारा ठुकाराए जाने की अगली रात को ही मिनिस्टर के बेटे की दर्दनाक हत्या हुई। दिल दहला देने वाले इस हत्याकाण्ड में ‘माया’ जैसा एक रहस्यमयी नाम उभरकर सामने आया। आप मेरा मंतव्य तो समझ रहे हैं न?”

“आप निश्चिन्त रहिए ऑफिसर। मैं कानून की हर संभव मदद करूंगा। हम शाही खानदान के लोग भी कानून की इज्जत करते हैं।”

“एक अच्छी मुलाकात के लिए धन्यवाद ठाकुर साहब।”

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“यश की हालत अब कैसी है पापा?” द्रुतगति से लॉबी में दाखिल हुए साहिल के पांव उस आदमी के पास ठिठक गये, जो वार्डबॉय के साथ बातें कर रहा था। आदमी ने पहले साहिल को घूरा फिर उसके साथ खड़ी संस्कृति को।

“यश की हालत अब कैसी है?” साहिल ने हांफने हुए अपना सवाल दोहराया।

“स्थिति अब काबू में है। भाग्य अच्छा था, जो खून अधिक बहने से पहले ही तुम्हारी माँ कमरे में पहुँच गयी। अब हम उसके होश में आने का इन्तजार कर रहे हैं।”

“थैंक गॉड!” साहिल का मन किसी अज्ञात श्रद्धा से भर उठा। उसके साथ-साथ संस्कृति ने भी राहत की सांस ली।

“अभी ईश्वर को धन्यवाद देने का वक्त नहीं आया है साहिल।”

“क्या मतलब?” साहिल चौंका।

साहिल के पिता ने उसके मुखमंडल का अवलोकन किया और सख्त स्वर में कहा- “क्या तुम हमसे कुछ छुपा रहे हो साहिल?”

“न..नहीं। ब...बि..बिल्कुल भी नहीं।” साहिल हकलाया।

“क्या यश को वास्तव में केवल वही बीमारी है, जो तुमने हमें बताया था? यानी कि क्लाइमेटिक चेंजेज की वजह से होने वाली सर्दी-खांसी?”

साहिल की हकलाहट इस सीमा तक बढ़ गयी कि वह इस बार कुछ नहीं बोल पाया।

“तुम्हारे अंदाज बता रहे हैं कि यश के साथ हुए किसी गंभीर वाकये के विषय तुमने हमें बताना जरूरी नहीं समझा।”

“आप...आपको ऐसा क्यों लगा कि मैं कुछ छुपा रहा हूँ।”

“क्योंकि यश ने खुद के साथ जो सुलुक किया है, डॉक्टर ने उसकी वजह सीवियर डिप्रेशन बताई है। तुम दोनों भाई तो एक साथ ही रहते थे। क्या तुम्हें नहीं मालूम कि यश के साथ ऐसी कौन सी घटना घटी कि वह अवसाद जैसी गंभीर मानसिक बीमारी का शिकार हुआ?”

“हो सकता है कि उसकी एकेडमिक लाइफ में कुछ हुआ रहा हो, जिसे उसने मुझसे नहीं... ।”

“पहले मेरी पूरी बात सुनो साहिल।” पिता ने इस बार क्रोध-मिश्रित स्वर में साहिल की बात काटते हुए कहा- “यश ने अपना बदन काटा, इसकी वजह को डॉक्टर ने डिप्रेशन बताया, लेकिन उसने अपने बेडरूम में जो हरकत की है, उसकी वजह डिप्रेशन नहीं हो सकती।”

साहिल की धड़कनें तेज हुईं। यही हाल संस्कृति का भी हुआ।

‘तो क्या यश ने घर पर ऐसी कोई हरकत की है, जिससे लोगों को पता चल गया कि वह अपनी याद्दाश्त खोकर पूर्वजन्म और वर्तमान जन्म के बीच के गैप में उलझ गया है?’

प्रत्यक्ष में साहिल ने समर्पण कर दिया।

“ये सही है पापा कि मैंने यश के केस को स्मूदली हैण्डल करने के लिए आपको उसकी असली बीमारी नहीं बतायी। लेकिन आप यकिन कीजिए मैं उसे कुछ नहीं होने दूंगा।”

“तुम्हारी बेवकुफाना हरकत से स्थिति बहुत गम्भीर हो गयी है साहिल।” पिता चिंतातुर हो उठे- “यश ने अपने कमरे में जो कुछ किया है, उसे देख कर तुम्हें भी आभास हो जाएगा कि उसकी बीमारी किस हद तक बढ़ गयी है।”

“ऐसा क्या कर दिया है उसने?”

“तुम खुद जाकर देख लो।”

कहने के बाद पिता ने मुंह फेर लिया।

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घर की स्त्रियां साहिल को एक अनजान लड़की के साथ देख कर बुरी तरह चौंक गयीं।

“क्या तुम हॉस्पिटल से आ रहे हो?”

“हां। यश अब ठीक है। उसके जख्मों की ड्रेसिंग कर दी गयी है। दर्द के एहसास से बरी रखने के लिए उसे बेहोशी का इंजेक्शन दिया गया है।” साहिल ने यश के कमरे की ओर बेतहाशा भागते हुए जवाब दिया। संस्कृति की कलाई उसके हाथ में थी, इसलिए उसके साथ संस्कृति को भी दौड़ना पड़ रहा था।

साहिल की हरकत पर हर कोई घबराकर उसके पीछे भागा। यश का बेडरूम दूसरी मंजिल पर था। जब घर के लोग साहिल तक पहुंचे तो वह कमरे के चौखट पर खड़ा कमरे का दृश्य देख रहा था।

“ओह...माय गॉड....।” संस्कृति ने द्रवित होकर आंखें बन्द कर ली- “ये सब क्या हो रहा है?”

साहिल कमरे का दृश्य देखने के बाद बोलने में अक्षम हो चुका था। वह केवल थरथराते हुए बदन और विस्फारित नेत्रों के साथ सामने की दीवार पर कई खून से लिखे वाक्यों को पढ़ रहा था-

‘मैंने पाप किया है।’

समूचा दीवार इसी एक जुमले से भरा हुआ था।

यदि केवल इतना ही होता तो शायद कम भयावह होता। साहिल के बदन की थराथराहट और संस्कृति के भयभीत होने की असली वजह कमरे के फर्श पर खून से बनायी गयी एक आकृति थी। एक शीशविहीन धड़ की आकृति, जिस पर सूखे चुके खून के कारण मक्खियां भिनभिना रही थीं। पूरे कमरे में यहां तक की बिस्तर पर भी खून के छींटे थे और वस्तुएं अस्त-व्यस्त थीं, जिनमें एक रक्तरंजित चाकू भी था।

“उसे रंग की तलाश थी।” वर्तमान हालात के साथ सामंजस्य बैठाने के बाद साहिल दहशत भरे स्वर में बोला- “रंग न मिलने के कारण उसने अपने बदन के खून को रंग बना लिया। उस पर कोई जुनून हावी हुआ था और उसी जुनून के तहत उसे स्केच बनाने की तलब महसूस हुई रही होगी।”

संस्कृति ने धीरे-धीरे आंखें खोली।

“लेकिन...उसने इस बार फर्श पर स्केच क्यों बनायी?”

साहिल कम्प्यूटर टेबल पर मौजूद प्रिन्टर तक पहुंचा। प्रिन्टर का पेपर पीस चेक किया। वहां पेपर न पाकर वह छोटी बहन की ओर मुखातिब हुआ- “क्या तुमने यहां से कुपियर पेपर निकाला था सुमन?”

“हां!” सुमन नाम से सम्बोधित लड़की ने कहा- “मुझे प्रोजेक्ट वर्क के लिए कुछ प्रिन्टआउट्स चाहिए थे, इसलिए मैंने वे पेपर्स खर्च कर डाले।”

“यानी कि कम्प्यूटर का प्रयोग करने के लिए तुम सुबह यश के कमरे में आयी थी।”

“हां।”

“क्या कर रहा था वह?”

“भइया सोये हुए थे। मैंने उन्हें डिस्टर्ब नहीं किया और प्रिन्ट्स निकालने के बाद कम्प्यूटर ऑफ करके चुपचाप चली गयी थी।”

“तुमने कुछ देखा था कमरे में?”

“हां।”

“क्या?” साहिल से पूर्व ही संस्कृति ने व्यग्र लहजे में पूछा।

“स्टडी टेबल पर पेपरवेट से एक प्रिटिंग पेपर दबाया हुआ था। मैंने उत्सुकतावश उस पेपर को देखा और डर गयी।”

“क्या था उस पेपर में?”

“एक स्केच था, जिसमें एक नरभेड़िया पीछे से एक आदमी के कंधे में दांत गड़ा रहा था।”

“तुमने ये बात किसी को बताई क्यों नहीं?”

“मुझे लगा जब आप यश भइया को छोड़ने आए थे, तब वह स्केच आपने बनाया रहा होगा और अपने साथ ले जाना भूल गये होंगे। आप गॉथिक कॉमिक्स के लिए ऐसे स्केचेज पहले भी बना चुके हैं, इसलिए मुझे ये बात अजीब नहीं लगी और मैंने किसी को नहीं बतायी।”

साहिल ने स्टडी टेबल की ओर देखा। वहां पेपरवेट के नीचे कोई कागज न पाकर उसने पूछा- “स्केच कहां है?”

सुमन बुकशेल्फ की ओर बढ़ी और एक किताब के बीच से निकालकर स्केच साहिल की ओर बढ़ा दिया- “मैंने इसे महफूज रखने के लिए एक किताब के पन्नों के बीच रख दिया था।”

साहिल और संस्कृति दोनों ने स्केच का अवलोकन किया। संस्कृति ने एक बार पूरे कमरे में निगाहें दौड़ायी। उसे महसूस हुआ कि वह हालीवुड की किसी हॉरर फिल्म के सेट पर है।

“जब आप कमरे में आयी थीं, तो यश किस अवस्था में था मम्मी?”

“वह फर्श पर लहुलूहान पड़ा था। उसकी पलकें कुछ खुली और कुछ बन्द थीं। वह आधी बेहोशी की हालत में था। उसके होठों से केवल यही निकल रहा था- मैं पापी हूं।”

“किस पाप की बात कर रहा था वह?” संस्कृति का स्वर।

“हर सवाल की तरह इस सवाल का जवाब भी तुम दोनों के पिछले जन्म में ही छुपा हुआ है।”

संस्कृति ने वालक्लॉक की ओर देखा। वहां पांच बजा देखकर उसका दिल बैठने लगा।

“समय की डेडलाइन पास आ चुकी है।”

साहिल अपने होंठ चबाने लगा।

“स्केच बनाने का ये तलब भी उसी तलब जैसा रहा होगा, जिसके तहत वह

पहले भी चार स्केचेज बना चुका था। वह तलब साधारण नहीं था, तभी तो यश ने अपनी जान की परवाह न करते हुए स्याही की कमी को पूरा करने के लिए अपने बदन को काटकर पानी की तरह खून बहाया।”

संस्कृति समेच वहां उपस्थित सभी लोग उस घड़ी की कल्पना से सिहर उठे, जब यश स्वयं ही अपने जिस्म पर चाकू चला रहा था।

“शुक्र है कि उसने गले पर या अन्य नाजुक नसों पर चाकू नहीं फेरा, अन्यथा हम उसे हमेशा के लिए खो चुके होते।”

“लेकिन ये सब हुआ कैसे? यश को ऐसी बीमारी लगी कैसे?”

“बहुत लम्बी कहानी है मम्मी।” साहिल ने गहरी सांस लेते हुए कहा- “बताने का वक्त नहीं है हमारे पास।”

“यानी कि....यानी कि तुम्हारे पापा का अनुमान सही निकला। तुमने यश को लेकर कोई बड़ी बात हमसे छुपायी है।”

साहिल कुछ नहीं बोला। उसे सारे रास्ते बन्द होते नजर आ रहे थे।

“क्या ये कोई भूत-प्रेत का चक्कर है? अगर ऐसा है तो हम किसी तांत्रिक को ढूंढ़ेगे।”

“नहीं मम्मी।” साहिल ने सख्त स्वर में कहा- “यश का केस ओझाओं और तांत्रिकों जैसे लुटेरों के वश का नहीं है। यश की बीमारी का इलाज केवल अपने सूझ-बूझ, साहस और ईश्वर पर विश्वास के बल पर ही ढूंढ़ा जा सकता है।”

संस्कृति ने एक बार फिर वाल-क्लॉक को देखा। मिनट की सुई पांच मिनट आगे खिसक चुकी थी।

“हमें जल्द ही कोई प्लानिंग करनी होगी।” इस बार संस्कृति लगभग रो पड़ी।

कुछ देर तक की खामोशी के बाद साहिल ने मुंह बोला- “मेरे पास एक प्लान है लेकिन मैं श्योर नहीं हूं कि वह काम करेगा। अगर वह प्लान फेल हो गया तो हमें ब्रह्मराक्षस के कहर को ईश्वर की इच्छा समझ कर स्वीकार करना होगा।”

‘ब्रह्मराक्षस’ नाम सुनकर संस्कृति के सिवाय हर कोई चौंका, किन्तु साहिल ने इस पर ध्यान नहीं दिया।

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“हमारा नौकर भीमा, जिसका गला रेत कर कत्ल कर दिया गया, अरुणा नाम की इस तांत्रिक औरत के सम्पर्क में था।” दिग्विजय ने अरुणा की तस्वीर कुलगुरु की ओर बढ़ा दी।

कुलगुरु ने तस्वीर थाम लिया। उसे गौर से देखा।

“क्या आप इसे जानते हैं?”

कुलगुरु कुछ बोले बगैर उस तस्वीर को निरखते रहे। उनकी निगाहें तस्वीर में

अरुणा के कानों से लटक रहे कुण्डल पर थीं।

“ये महिला सामान्य तांत्रिक नहीं है। ये तामसिक कापालिकों के ‘गौण’ नामक समुदाय की वंशज है, क्योंकि गौण वंश की कापालिक स्त्रियां ही कानों में ऐसे कुण्डल धारण करती हैं।”

“भीमा गौण वंश की कापालिका के सम्पर्क में क्यों था?”

“गोपनीय ग्रन्थागार से शंकरगढ़ के इतिहास के भोज-पत्रक गायब हैं, ये जानते हुए भी आप ये प्रश्न पूछ रहे हैं?”

“अर्थात आप इस बात के प्रति आश्वस्त हो चुके हैं कि हमारे अनजाने में ग्रन्थागार की नकली चाबी तैयार करवाकर भोज-पत्रक भीमा ने ही गायब किये थे।”

“निःसंदेह ऐसा ही हुआ है। भीमा को इस कृत्य के लिए अरुणा ने ही विवश किया रहा होगा। अभयानन्द के लौटने के पीछे हमें जिस षड़यंत्र का आभास हुआ था, वह षड़यंत्र अरुणा का ही रचा हुआ है।”

“भीमा की लाश के पास खून से लिखी एक इबारत पायी गयी थी, जिसमें इस बात की चेतावनी दी गयी थी कि कलाई पर स्वास्तिक निशान वाला कोई शख्स मरेगा। आप तो जानते ही हैं कुलगुरु कि संस्कृति दाहिनी कलाई पर स्वास्तिक चिह्न के साथ जन्मी है। वह आधी रात से ही गायब भी है। कहीं ऐसा तो नहीं कि....।” दिग्विजय ने वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

“नहीं ठाकुर साहब। लिखे गये सन्देश के व्याकरण पर ध्यान दीजिए। ‘मरेगा’ शब्द का प्रयोग किया गया है, अर्थात जिस स्वास्तिक निशान वाले मनुष्य को चेतावनी दी गयी है वह पुरुष है, कोई स्त्री नहीं।”

इससे पूर्व की दिग्विजय कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करते, ड्राइंग हाल के दरवाजे पर आहट हुई। आहट के कारण पर दृष्टि पड़ते ही दिग्विजय चौंक पड़े।

दरवाजे पर साहिल और संस्कृति थे।

“तुम...तुम आ गयी संस्कृति?” दिग्विजय पहले सुखद आश्चर्य से अभिभूत हुए, तत्पश्चात साहिल को जलती निगाहों से घूरते हुए पूछा- “तुम कहां ले गये थे मेरी बेटी को।?”

“वक्त गुस्सा करने का नहीं है पापा।”

संस्कृति आगे बढ़ी। उसने और साहिल ने रास्ते में ही ये तय कर लिया था कि प्लान में साथ देने के लिए ठाकुर साहब को कन्विंस करने का काम संस्कृति करेगी।

“हमारा गांव विनाश की दहलीज पर खड़ा है। वह आ चुका है। वेयरवुल्फ आ चुका है। आज रात दस बजे तक अगर उसे कंट्रोल नहीं किया गया तो

शंकरगढ़ की मिट्टी का रंग लाल हो जाएगा।”

“य...ये क्या...।”

“उसे बोलने दीजिए ठाकुर साहब।” कुलगुरु ने दिग्विजय की बात काटकर कहा। संस्कृति की आवाज सुनकर राजमहल के सभी सदस्य और नौकर-चाकर ड्राइंग हाल में आ गये।

“मैं सच कह रही हूं पापा। वह मेरे लिए वापस आया है। मैं ही माया थी। ताबूत में से उसने मुझे मेरे पिछले जन्म के नाम से पुकारा था। हमें हिम्मत से काम लेना है। साहिल के पास एक प्लान है।”

दिग्विजय ने कुलगुरु की ओर देखा। कुलगुरु साहिल की ओर बढ़े। अरुणा की तस्वीर उन्होंने उसे दिखायी।

“इस महिला को पहचानते हो बेटा?”

“ये...ये वही औरत है, जिससे मैं और यश झुग्गी-बस्ती की गलियों में मिले थे। इसी ने तो हमें लाश का पता बताया था।”

पूरे प्रकरण से अनजान होने के कारण दिग्विजय और कुलगुरु साहिल के कथन का आशय तो नहीं समझ सके, किंतु उन्हें उस पर भरोसा जरूर हो गया।

“योजना क्या है तुम्हारी?” कुलगुरु ने पूछा।

“प्लीज आप लोग मेरे साथ बाहर आइए।”

कुलगुरु और दिग्विजय, यश तथा संस्कृति के साथ बाहर आए। बाहर खड़ी गाड़ी में घायल यश बेहोशी की अवस्था था। उसका सिर डॉक्टर पुष्कर त्रिवेदी की गोद में था। साहिल यश के अलावा केवल डॉक्टर त्रिवेदी को ही अपने साथ लाया था। उसने गाड़ी का डोर खोला और बेहोश यश की ओर संकेत करते हुए

कहा- “ये मेरा भाई यश है, जो अपनी याद्दाश्त खो बैठा है।”

दिग्विजय, यश को पहचान गये, क्योंकि वे पुलिस स्टेशन में उसकी तस्वीर देख चुके थे, जिसके बारे में इंस्पेक्टर ने बताया था कि वह भीमा की झोपड़ी में रखी तंत्र की किताबों के बीच मिला था।

 
11

“इतना दुस्साहस?” अभयानन्द की भीषण गर्जना से अरुणा कांप गयी- “इतना दुस्साहस कि वे हमारे साम्राज्य की परिधि में प्रविष्ट होकर हमारे ही विरुध्द षड़यंत्र रच रहे हैं?”

अरुणा समझ गयी कि अभयानन्द का संकेत किस ओर है।

“आप निश्चिन्त रहें प्रभु।” अरुणा ने उसे शांत करने के ध्येय से कहा- “वे व्दिज को लेकर शंकरगढ़ में आए अवश्य हैं, किन्तु वे जात स्मरण की प्रक्रिया पूर्ण नहीं कर पाएंगे। वे व्दिज के वर्तमान जन्म को पूर्वजन्म की स्मृतियों का स्मरण नहीं करा पाएंगे।”

“ज्ञात करो कि उनकी योजना क्या है?” अभयानन्द का व्याकुल स्वर।

आदेश सुनकर अरुणा के चेहरे पर कातर भाव छा गये।

“क्षमा कर दीजिए प्रभु।” उसने करबध्द होकर यूं कहा, मानो कोई अक्षम्य अपराध कर बैठी हो- “मेरी तंत्र दृष्टि राजमहल के क्षेत्र में दाखिल नहीं हो पा रही है। मैं ये ज्ञात करने में स्वयं को असमर्थ पा रही हूं कि व्दिज का इस जन्म का भाई किस योजना के साथ यहां आया है।”

अभयानन्द ने अरुणा के अनुमान के विपरित प्रतिक्रिया दी। वह कुपित होने के स्थान पर विचारमग्न होकर दूर जलती हुई चीता को देखने लगा।

“तंत्रदृष्टि राजमहल की दीवारों को भेद नहीं पा रही है, इसका तात्पर्य केवल एक ही हो सकता है कि राजमहल की परम्पराओं के संरक्षक कुलगुरु ने राजमहल को सुरक्षा घेरे में ले लिया है।”

“हां प्रभु।”

अभयानन्द के होठों पर कुटिल मुस्कान थिरकती चली गयी।

“राजमहल वासियों की कोई युक्ति सफल नहीं हो सकती है अरुणा। हम किसी भी मूल्य पर द्विज को उसका पूर्व जन्म याद नहीं आने देंगे। जात-स्मरण की प्रक्रिया को कभी पूर्ण नहीं होने देंगे हम।”

“किन्तु प्रभु....!” अरुणा का चिंतित स्वर- “यदि उनकी युक्ति सफल हो गयी तो...।”

“नहीं! नहीं सफल हो सकती।” अभयानन्द की बड़ी-बड़ी आँखें रहस्यमयी हो उठीं- “तुम गौण कापालिकों का वंश हमारे एक रहस्य से आज तक अनभिज्ञ रहा है। वह रहस्य ही आज द्विज के जात-स्मरण की प्रक्रिया का सबसे बड़ा बाधक बनेगा।”

“रहस्य? कैसा रहस्य प्रभु?” अरुणा चौंकी। उसने स्वप्न में भी कल्पना नहीं

की थी कि अभयानन्द का कोई रहस्य ऐसा भी होगा, जो उसकी निगाहों से ओझल होगा।

अभयानन्द ने अरुणा के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया। वह सधी हुई चाल चलते हुए श्मशानेश्वर की प्रतिमा के सम्मुख पहुंचा। दोनों भुजाएं फैलाकर उसने आँखें बंद कर ली। उसके गले से भेड़िये की गुर्राहट निकली। जिस्म थरथराया।

अरुणा हैरान थी। ये बात उसकी समझ से परे थी कि जिस राजमहल की दीवारों को कोई तंत्र-युक्ति नहीं भेद सकती थी, उस राजमहल में चल रही योजना को अभयानन्द किस प्रक्रिया के तहत विफल करने की कोशिश कर रहा था।

“तुम पापी हो द्विज। तुमने पाप किया है।”

अभयानन्द के गले से कांपता स्वर निकला। अरुणा की आँखें कुछ सोचने के प्रयास में गोल हो गयीं।

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“मैं पापी हूँ। मैंने पाप किया है।”

बड़बड़ाते हुए द्विज ने दीप जलाकर अभयानन्द की झोपड़ी में प्रकाश किया। बाहर मूसलाधार बारीश उफान पर थी। उसने कम्बल में लिपटा अभयानन्द का जिस्म शय्या पर लिटाया, जो लगभग पूरा जल चुका था। गला हुआ मांस तरल के रूप में बह रहा था। द्विज इस हृदयविदारक दृश्य पर इस कदर विचलित नजर आ रहा था, मानो अभयानन्द उसके लिए प्राणों से भी अधिक प्रिय रहा हो।

बुरी तरह भीगे हुए द्विज ने कंधे से लटका कपड़े का थैला उतारा और उसमें से जलारोधि आवरण में लिपटी औषधियां बाहर निकालीं। तत्पश्चात उन्हें पीस कर लेप तैयार करने में जुट गया।

अभयानन्द के मुंह से हल्की-हल्की कराह निकल रही थी। आँखें बाहर निकल गयी थीं। जलने के कारण वीभत्स हो गये होंठ नीचे की ओर लटक गये थे। जीभ बाहर निकल गयी थी। उसकी कराहट जीवन के अंतिम क्षणों की कराहट प्रतीत हो रही थी। उसके बचने का एक भी लक्षण इंगित नहीं हो रहा था, तथापि द्विज न जाने किस अज्ञात आस के तहत उसे पीपल के तने से उतार लाया था और उसे राहत पहुंचने के ध्येय से शीतल औषधियों का लेप तैयार करने में व्यस्त था, ये ज्ञात होते हुए भी कि अभयानन्द की दूषित काया में अब एक नरपिशाच सो रहा था।

संयोगवश हुई भीषण बारिश को द्विज ने एक संकेत के रूप में ग्रहण किया था। इस संकेत के रूप में कि प्रकृति देवी स्वयं अभयानन्द के प्राणों की रक्षा करने को उद्यत थीं। उसी संकेत के वशीभूत होकर जब वह देवी-मंदिर से दौड़ा था तो उसके कदम सीधे पीपल के पास पहुंचकर ही रुके थे। वह अभयानन्द का जीवन

बचाने जैसे असंभव कृत्य को संभव बनाने में जुटा हुआ था।

उसने लेप लगाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया। अभयानन्द के कराहने का स्वर तीव्र हुआ और रुई के फाहे के बदन से स्पर्श करते ही वह दर्द से तड़प उठा।

“मुझे क्षमा कर दो भइया।” होठों से ‘भइया’ शब्द प्रस्फुटित होते ही द्विज की आँखों से आंसू छलक उठे- “मैं पापी हूँ। आपकी इस दयनीय दशा का उत्तरदायी मैं ही हूँ। मैंने महाराज के सम्मुख ये सोचकर आपके विरूद्ध न्याय की याचना की थी कि जब आप कारावास में चले जायेंगे तो इसी बहाने तामसी साधनाओं से दूर हो जायेंगे, किन्तु मुझे लेशमात्र भी भनक नहीं था कि महाराज आपको इतना भीषण मृत्युदंड दे देंगे।”

अभयानन्द का जिस्म फड़फड़ाया। वह द्विज की बातों का जवाब देने का यत्न

करता नजर आ रहा था, किन्तु स्थिति प्रतिकूल होने के कारण अपने यत्न में सफल नहीं हो पा रहा था।

“भीषण त्रासदी वाली उस रात जब आप मुझे अलाव के पास बैठाकर किसी अनजान स्त्री की चीख का उद्गम स्थल तलाशने गये थे तब क्या मैंने सोचा था कि आप फिर दोबारा नहीं लौटेंगे? नहीं भइया! मैंने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी कि भयानक त्रासदी वाली उस रात के बाद आप मेरे बड़े भाई के रूप में नहीं अपितु एक भयानक कापालिक के रूप में लौटेंगे। आपकी आँखों में मेरे लिए प्रेम नहीं, प्रतिद्वंदिता का भाव होगा। तामसी साधनाओं की बुरी शक्तियां आपको नैतिक मार्ग से पथभ्रष्ट कर चुकी होंगी और आप जीवित अवस्था में ही एक पिशाच जैसा जीवन-यापन करने वाले बन चुके होंगे।”

अभयानन्द का जिस्म फड़फड़ाया। तात्पर्य ये था कि व्दिज के रहस्योद्घाटन ने उसे अचम्भित किया था।

“ये सत्य है भइया। मैं आपका वही व्दिज हूं, जिसे आपने शीत से बचाने के लिए अपना कम्बल उतारकर दे दिया था। आप मुझे नहीं पहचान पाए भइया, किन्तु मैं आपको तभी पहचान गया था, जब आप प्रथम बार शंकरगढ़ आए थे और मेरी दृष्टि आपके गले से लटके तांबे के छल्ले पर पड़ी थी, जिसे मां ने हम-दोनों को बुरी बलाओं से बचाने के लिए हमारे गले में डाला था।”

व्दिज ठहरा। उसने अपने गले से लटक रहे काले धागे को देखा। उसमें तांबे का एक ‘रिंग’ पिरोया हुआ था।

“मुझे नहीं ज्ञात कि उस शापित वन में क्या था, जिसने मेरे भइया को बड़ी निर्ममता से एक भयानक पिशाच में परिवर्तित कर दिया। मुझे नहीं ज्ञात कि उस वन में आपके साथ क्या हुआ था? कौन मिला था आपसे, जिसकी बला आपके ऊपर आ गयी और मां का दिया हुआ छल्ला भी उससे आपकी रक्षा नहीं कर

पाया।”

व्दिज सिसकने लगा। यदि अभयानन्द बोल पाने में सक्षम होता तो निःसंदेह यही पूछता-

‘यदि तुम मुझे पहचान गये थे तो तुमने इस बात का बोध क्यों नहीं कराया कि तुम मेरे बिछड़े हुए भाई हो?’

“मैं करा सकता था।” व्दिज ने मानो भाई के अन्तर्मन के प्रश्न को महसूस कर लिया- “मैं आपको बोध करा सकता था कि मैं ही आपका भाई हूं, किन्तु नहीं करा सका, क्योंकि आप वाममार्गी साधक बन चुके थे और मैं एक वाममार्गी साधक का भाई हूं, ये सत्य मेरे भविष्य पर एक प्रश्नचिह्न लगा देता। देवी-मन्दिर के पुजारी मेरी आध्यात्मिक उपलब्धियों पर प्रश्न उठाने लगते। उन्हें मेरे रक्त में दोष नजर आने लगता। मैं स्वार्थी बन गया था भइया। मैं आपके बिना जी सकता था क्योंकि बीस सालों में मैं इसका अभ्यस्त हो चुका था, किन्तु समाज व्दारा उपेक्षित होकर जीने का साहस मुझमें नहीं था। मैं आपका अपराधी हूं। मां और पिता का अपराधी हूं। मैंने ईश्वर के मार्ग से भटके हुए भाई को सद्मार्ग पर लाने का प्रयत्न नहीं किया। मैं मां को क्या मुंह दिखाऊंगा?”

व्दिज की आंखों में तैरता पानी अब गालों पर लुढ़कने लगा था। वह आगे भी कुछ कहने वाला था कि अचानक उसने अपने सिर पर किसी लाठी का प्रहार महसूस किया। प्रहार इतना भीषण था की व्दिज का चेतना पर से नियंत्रण हट गया और वह अंधकार के गहरे गर्त में डूबता चला गया।

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यश ने आंखें खोल दी। उसे अभी-अभी महसूस हुआ था कि किसी ने उसके सिर पर लाठी से प्रहार किया था। उसके जिस्म पर बीते हुए दिनों के कपड़े थे। किताबों में उसने ऐसे कपड़े सत्रहवीं शताब्दी के ब्राह्मणों के जिस्म पर देखे थे।

‘तो क्या यह मात्र एक सपना था?’

तरद्दूद में फंसे यश ने कमरे का मुआयना किया। कमरा भी सत्रहवीं शताब्दी का कोई स्टडीरूम लग रहा था। उसके सामने एक लड़की बैठी हुई थी, जिसके जिस्म पर भी उसी काल के कपड़े थे। उसके सामने भोजपत्र थे और हाथ में लकड़ी का कलम था। यश के जागने तक वह भोजपत्रों पर कुछ लिख रही थी, किन्तु अब यश को कौतुहलपूर्ण नेत्रों से घूरने लगी थी।

“म....मैं कहां हूं...?” यश ने उस लड़की से हकलाते हुए पूछा।

“ये कैसा प्रश्न है व्दिज? क्या आप अपनी शिष्या माया को भूल गये?” लड़की के आश्चर्य के भाव आए।

“माया...?” यश को अपने जेहन पर कोई दबाव महसूस हुआ। उसे ‘माया’

नाम कहीं सुना हुआ लगा। उस वक्त वह बुरी तरह चीख पड़ा, जब उसे महसूस हुआ कि उसके सिर पर एक भी बाल नहीं है। जिस्म पर हुए अनगिनत जख्मों की परवाह न करते हुए वह एक झटके से उठा और दौड़कर आइने के सामने पहुंचा।

“य...ये क्या हो रहा है मेरे साथ..? मुझ पर कैसा प्रयोग किया जा रहा है?”

यश चीखते हुए खुद को ‘माया’ कहने वाली लड़की की ओर पलटा। उसका सिर सफाचट हो चुका था। वहां पर बालों के तौर पर केवल मोटी शिखा भर थी, जो उसकी गर्दन तक लटक रही थी।

‘माया’ नाम से सम्बोधित लड़की यश की हरकतों का पैनी दृष्टि से मुआयना कर रही थी।

“तुम कुछ बोलती क्यों नहीं? मेरे साथ कैसा प्रयोग किया जा रहा है? मेरे भइया कहां हैं?”

माया ने इस बार भी कोई जवाब नहीं दिया तो यश उस पर झपट पड़ा। उसकी पतली गर्दन को उसने शिकंजे में जकड़ा और उस पर दबाव बढ़ाता हुआ गुर्राया- “कौन हो तुम?”

माया खौफजदा स्वर में चीखी। उसकी चीख के बाहर जाने भर की देरी थी कि कमरे का दरवाजा तेजी से खुला और साहिल, दिग्विजय समेत कई लोगों ने भीतर प्रवेश किया।

साहिल पर दृष्टि पड़ते ही यश, माया को छोड़कर उसकी ओर लपका।

“ये सब क्या हो रहा है भइया?”

“संस्कृति तुम ठीक तो हो?” दिग्विजय ने संस्कृति को लक्ष्य करके पूछा। वह खांसने लगी थी। उसकी आंखों में पानी भर आया था।

यश के सवाल का जवाब देने से पहले साहिल ने संस्कृति की ओर से देखा।

“आपका प्लान फेल हो चुका है साहिल। यश को कुछ नहीं याद आया।”

रिजल्ट की घोषणा सुनते ही सभी पर मानो बज्रपात हुआ।

दिग्विजय ने घड़ी की ओर देखा।

“अब क्या होगा? दस बजने में तो अब आधा घण्टा ही बचा है।”

“कैसा प्लान भइया?” यश भौचक्क- “ये लोग....ये लोग किस प्लान की बात कर रहे हैं?”

साहिल एक बार फिर खामोश रहा। उसका दिमाग तेजी से कुछ सोच रहा था।

उसके रोंगटे खड़े हो रहे थे। दिल बैठा जा रहा था। हौसले क्षण-प्रतिक्षण क्षीण पड़ते जा रहे थे। अंततः वह भी साधारण इंसान था और किसी पैशाचिक शक्ति से प्रत्यक्ष मुकाबले की कल्पना से उस पर भी दहशत हावी होती जा रही थी।

“होश में आने से पहले तुमने कोई विजन देखा था?” डॉक्टर पुष्कर त्रिवेदी ने

यश से पूछा।

“हां। वह विजन मैं पहले भी देख चुका हूं।”

“क्या था उस विजन में?”

“कोई आदमी था, जो बुरी तरह जले हुए एक आदमी के जख्मों पर मरहम लगा रहा था।”

“तुमने चेहरा देखा उसका?”

“नहीं। मेरी ओर उसकी पीठ थी।”

“तुमने ऐसा विजन पहले कब देखा था?”

“याद नहीं।”

“तुमने अपने जिस्म पर जख्म क्यों बनाए थे? तुमने दीवार पर ये क्यों लिखा कि मैं पापी हूं? तुमने अपने बेडरूम के फर्श पर अपने ही खून से बिना धड़ वाले आदमी का स्केच क्यों बनाया? आखिर उस वक्त चल क्या रहा था तुम्हारे दिमाग में?”

“मुझे नहीं मालूम। दिमाग के हर कोने से यही विचार आ रहा था कि मैं पापी हूं। विजन में नजर आने वाला आदमी भी जले हुए आदमी से यही कह रहा था।”

यश की बातें सुनने के बाद त्रिवेदी ने साहिल के लक्ष्य करके कहा- “हमारा प्लान सचमुच फेल हो गया साहिल। यश को मेमोरी रिगेन में जरा भी बढ़त नहीं मिली। हमें लगा था कि हम सेवेंटीन्थ सेंचुरी का एटमॉस्फियर क्रियेट करके, संस्कृति को यश के सामने माया के रूप में प्रस्तुत करके, उसे उसके पिछने जन्म की याद दिलाने में सफल हो जाएंगे, किन्तु ऐसा नहीं हुआ। हमारी मेहनत बेकार गयी और इसी के साथ किमती समय भी।”

माहौल बोझिल हो उठा। साहिल को गहरी सोच में डूबा देख, उसे डिस्टर्ब करने की किसी में हिम्मत नहीं हुई। यश झुंझलाया हुआ था। इसकी एक वजह ये भी थी कि केशरहित खोपड़ी के कारण उसे अपना चेहरा अजीबोगरीब लग रहा था।

“ये नहीं हो सकता।” साहिल ने हथेली पर मुक्का मारते हुए कहा- “हम एक शैतान से कैसे हार सकते हैं? मेरा प्लान कैसे फेल हो सकता है?”

साहिल का व्यग्र लहजा बता रहा था कि अब वह भी परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने लगा था। यश के चेहरे पर उलझन गहराती जा रही थी। डॉक्टर त्रिवेदी भांप गये कि मौजूदा हालात उसकी मानसिक दशा के प्रतिकूल थे। उन्होंने लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा- “हमें बाहर चलना चाहिए। यश को आराम की जरूरत है।”

सभी ने निर्देश का पालन किया। यश को नींद का इंजेक्शन देने के बाद डॉक्टर

त्रिवेदी भी बाहर आ गये।

“अब तो आप ही कोई उपाय बता सकते हैं कुलगुरु।” दिग्विजय कुलगुरु की ओर मुखातिब हुए।

“ब्रह्मराक्षस को नियंत्रित करने वाले अनुष्ठान अत्यन्त दुर्लभ हैं और उनका वर्णन वर्तमान युग के ग्रन्थों में मिलना असंभव है। हमारे पास आशा की एक किरण थी, किन्तु वह भी बुझ गयी। हमने सोचा था कि शंकरगढ़ के इतिहास में मौजूद प्रकरण से हमें वह अनुष्ठान ज्ञात हो जाएगा, जिसके जरिए उस समय अभयानन्द पर नियंत्रण पाया गया था, किन्तु अरुणा के हाथों की कठपुतली बने भीमा ने भोजपत्रों को गायब करके हमारी सोच को निरर्थक साबित कर दिया। साहिल ने संस्कृति को जात स्मरण की प्रक्रिया से गुजारकर उस प्रकरण को जानना चाहा, किन्तु उसमें भी विफलता ही हाथ लगी। और अब यश के सन्दर्भ में भी हम असफल रहे।”

“कोई तो उपाय होगा कुलगुरु।” सुजाता का स्वर रुआंसा हो उठा- “क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम अभयानन्द से अपने गुनाहों की माफी मांग ले?”

“जो गुनाह राजमहल वालों ने कभी किये ही नहीं, उसकी माफी कैसे मांग लेंगी आप? ये तो बुराई के सामने पराजित हो जाने की स्थिति होगी।”

“अगर हमारी ये पराजय संस्कृति की जान बचा सकती है, तो हम तैयार हैं। हम पराजित होने को भी तैयार हैं।”

“किन्तु इस बात को लेकर किस हद तक निश्चित हुआ जा सकता है भाभी कि अभयानन्द हमें उन गुनाहों के लिए माफ कर देगा, जो हमारे पूर्वजों ने कभी किये ही नहीं?”अरुणोदय ने कहा।

“न ही इस बात की गारण्टी है कि अभयानन्द हमें माफ कर देगा।” लम्बे समय से खामोश संस्कृति ने मुंह खोला- “और न ही इस बात की गारण्टी है कि मुझे हासिल कर लेने के बाद वह शंकरगढ़ पर कहर नहीं बरपाएगा। अब रास्ता केवल एक ही है।”

संस्कृति का लहजा निर्णायक हो उठा। वह साहिल और कुलगुरु समेत सभी की निगाहों का केन्द्रबिन्दु बन गयी। उसके चेहरे के भाव बयां कर रहे थे कि लम्बी

खामोशी के दौरान वह किसी निर्णय पर पहुंचने में कामायाब हो चुकी थी।

“किस रास्ते की बात कर रही हो तुम?” साहिल का आशंकित लहजा।

“मैं उसके पास जाने को तैयार हूं। इससे पहले कि एक वेयरवुल्फ कटार लेकर हम इंसानों की बस्ती में आए, मैं उसके पास चली जाऊंगी।”

“तुम्हें क्या लगता है, तुम्हारे सरेण्डर कर देने से वह मेरे भाई को छोड़ देगा? शंकरगढ़ के लोगों को बख्श देगा?”

“नहीं जानती कि वह ऐसा करेगा या नहीं, लेकिन फिर भी नरसंहार को रोकने के लिए नहीं तो कम से कम टालने के लिए मुझे ये कदम उठाना पड़ेगा। तब तक हो सकता है कि आपको कोई रास्ता मिल जाए।”

“और अगर रास्ता नहीं मिला तो?”

“तो भी हमारे हाथ में कुछ नहीं है। हमारी हालत बिन मांझी के किश्ती जैसी है, जिसका भविष्य दरिया की लहरों पर टिका होता है।”

साहिल कसमसा कर रह गया। बोलना चाहते हुए भी कुछ न बोल सका। उसने खुद को इतना विवश पहले कभी नहीं पाया था। संस्कृति की निगाह उस पर ठहरी हुई थी। उसे अभी तक विश्वास था कि वह अपने दृढ़ आत्मविश्वास, प्रबल इच्छाशक्ति और बौध्दिक कौशल से कोई न कोई रास्ता जरूर निकाल लेगा।

साहिल, यश के कमरे में जाने को मुड़ा।

“कहां जा रहे हो....।”

डॉक्टर त्रिवेदी ने उसे रोकना चाहा, किन्तु वह रुका नहीं।

कमरे में पहुंचकर उसने दरवाजा अन्दर से बन्द किया और लम्बी-लम्बी सांसें लेते हुए सोये हुए यश को घूरने लगा।

“तुम्हें याद करना होगा। तुम्हें तुम्हारा पिछला जन्म याद करना होगा।” उसने यश के पास पहुंचकर उसे झकझोरा, किन्तु दवा के प्रभाव से गहरी नींद में जा चुके यश की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। भावनाओं का आवेग थमने के बाद जब साहिल को होश आया तो वह यश को जगाने का प्रयास छोड़कर इधर-उधर निगाहें दौड़ाने लगा।

“कोई तो रास्ता जरूर होगा। उम्मीद की कोई किरण अभी भी कहीं बाकी होगी।”

साहिल की ईश्वर में अगाध श्रध्दा थी।

‘ईश्वर संकेतों के जरिए हमसे बात करता है। जो उसके संकेतों को समय रहते समझ लेते हैं, वे अपनी हार को भी जीत में बदल देते हैं।’

उपरोक्त वाक्य को साहिल ने अपने अनुभवों की डायरी के पहले पन्ने पर लिख रखा था।

“मुझे रास्ता दिखाओ। मुझे तुम्हारे मार्गदर्शन की जरूरत है।”

उसने आंखें बन्द करके अपने अंतरात्मा को सम्बोधित किया। सभी रास्ते बन्द हो जाने पर वह ऐसा ही करता था।

अचानक हवा के तेज झोंके से खिड़की के दरवाजे खड़खड़ाये और साहिल ने आंखें खोल दी।

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“हमें हमारे विजय श्री की पदचाप सुनाई दे रही है अरुणा।” अभयानन्द ने सर्द लहजे में कहा। वह मानवीय काया में था।

उसका रुख शंकरगढ़ के आबादी वाले क्षेत्र की ओर था। कुछ साये बड़ी तेजी से मरघट की ओर बढ़ रहे थे। वातावरण में फैली शुक्ल पक्ष की चाँदनी में परिवेश का हर एक कोना नुमाया हो रहा था। श्मशानेश्वर की प्रतिमा नित्य की अपेक्षा अधिक भयावह हो रही थी।

चूल्हे पर हांडी चढ़ाने की कोशिश छोड़कर अरुणा अपने स्थान से उठी और मरघट की ओर कदम बढ़ा रहे सायों पर दृष्टिपात करते हुए हिंसक स्वर में बोली- “आपकी प्रतीक्षा का अन्त हुआ प्रभु। और इसी के साथ हम कापालिकों की सैकड़ों साल पुरानी तपस्या भी पूर्ण हुई। आपको आपकी माया का सानिध्य प्राप्त होने वाला है। माया स्वयं आपको समर्पित होने हेतु चली आ रही है। उसने अपने ईश्वर की उपेक्षा कर दी है, इसलिए उसके दैवीय स्वास्तिक की शक्तियां निष्क्रिय हो चुकी होंगी।”

अभयानन्द भयानक ढंग से मुस्कुराते हुए अपनी जगह से हिला। मन्दिर के अहाते के एक छोर से चलकर दूसरे पर पहुंचा। दूधियां चाँदनी में हरकत करती उसकी परछायीं स्वयं अरुणा को भी डरावनी लगी। अभयानन्द के चेहरे पर ऐसे भाव थे, जैसे पूर्वजन्म की तृष्णा के तृप्त होने का अवसर निकट पाकर वह अपने हर्ष की अभिव्यक्ति में असमर्थ हो। उसकी डरावनी और हमेशा अपलक दृष्टि से शून्य को घूरते रहने वाली बड़ी-बड़ी रक्तिम आंखों में पैशाचिक चमक थी। सामान्य मानव का रूप भी उसकी रक्तपिपासु प्रवृत्ति को छिपा नहीं पा रहा था।

“यदि स्वयं हमारे भाई व्दिज ने हमारे साथ छल नहीं किया होता तो माया को देखकर भड़की हमारी तृष्णा तीन सौ वर्ष पूर्व उसी जन्म में तृप्त हो गयी होती, जिस जन्म में हमने महातांत्रिक अघोरा की काया में निवास करने वाले श्मशानेश्वर को हमारी काया में आमंत्रित करके शंकरगढ़ की धरती को रक्त से धो डाला था। व्दिज के छल ने ही हमें लम्बी प्रतीक्षा हेतु विवश किया। अघोरनाथ ने स्वास्तिक चिह्नों और गीता के श्लोकों को प्रहरी बनाकर हमारी आत्मा को हमारे शरीर की राख के साथ राजमहल के भूमिगत कक्ष में भटकने को विवश किया। अंतहीन रक्ततृष्णा से तीन सौ सालों तक तड़पे हैं हम। माया की कामाग्नि में तीन सौ सालों तक झुलसे हैं हम। इतनी सहजता से हमारा प्रतिशोध नहीं पूर्ण होगा अरुणा।” प्रतिशोध साधने के अभयानन्द के भीषण संकल्प से वातावरण भी थरथरा उठा। उसकी आंखों में क्रोध, घृणा और वहशत का सम्मिलित प्रभाव लहू का रूप लेकर तैरने लगा।

“माया स्वयं को हमें सौंपकर हमसे शंकरगढ़ की रक्षा का वचन लेने की

कामना के साथ हमारे शरण में आ रही है, किन्तु उस कमनीय सुन्दरी को आभास तक नहीं है कि उसके समर्पण के कुछ ही क्षणोपरान्त हम शंकरगढ़ के समस्त नागरिकों के रक्त से अपनी सदियों पुरानी तृष्णा मिटाने के अभियान का आरम्भ करेंगे।”

अभयानन्द क्षण भर के लिए ठहरा, तत्पश्चात दांत पीसकर शून्य को घूरते हुए कह उठा- “व्दिज! पूर्व जन्म में भी हम तेरे काल कलवित होने का निमित्त बने थे, इस जन्म में भी हम ही तुझे काल का ग्रास बनने को बाध्य करेंगे। इस जन्म में भी हम अपनी धधकती क्रोधाग्नि को तेरे रक्त से शांत करेंगे।”

अभयानन्द अपने कुत्सित इरादों की घोषणा करता रहा और प्रारब्ध से अनभिज्ञ साये क्षण-प्रतिक्षण निकट आते गये।

आगन्तुकों में चार लोग थे। संस्कृति, दिग्विजय, कुलगुरु और डॉक्टर त्रिवेदी। त्रिवेदी को साथ चलने को लेकर कुलगुरु की संस्तुति नहीं थी, किन्तु ये त्रिवेदी की जिद थी, जो वे उनके साथ मरघट तक आये थे। त्रिवेदी की दिलचस्पी उस पिशाच को देखने में थी, जिसके वजूद को आम जनमानस मिथक अथवा अंधविश्वास कहकर खारिज कर देता है। हालांकि त्रिवेदी के परामनोविज्ञान की सीमा वहीं से शुरू होती थी, जहां विज्ञान की सीमा समाप्त होती थी, किन्तु फिर भी ये उनके कैरियर में पहली दफा था कि वे एक पिशाच से रूबरू होने जा रहे थे।

अभयानन्द का रूप देख दिग्विजय भी भय से कांप उठे थे।

“यही है वह शापित ब्राह्मण, जिसने ईश्वर को ठुकरा कर श्मशानेश्वर को अपना शरीर सौंपा।” कुलगुरु, दिग्विजय के कान में फुसफुसाए किन्तु दिग्विजय का पूरा ध्यान अभयानन्द पर था, जिसकी भयानक आंखें संस्कृति पर ठहरी हुई थीं। वह खामोशी अख्तियार किये हुए अहाते में टहल रहा था, मानो आगन्तुकों को पहले बोलने हेतु आमंत्रित कर रहा था। अरुणा के चेहरे पर व्यंग्यात्मक भाव थे, जो दिग्विजय और कुलगुरु को स्पष्ट लहजे में बता रहे थे कि आज रात मरघट में जो होने वाला है, उसकी सूत्रधार वही है। डॉक्टर त्रिवेदी आंखों में अविश्वास का भाव लिए हुए अभयानन्द का मुआयना कर रहे थे। उन्हें अब भी यकीन नहीं था कि सामने खड़ा आठ फीट ऊंचा मनुष्य वास्तव में एक नरभेड़िया है।

संस्कृति आगे बढ़ी।

“मुझे तुम्हारी शर्त मंजूर है।” उसने अभयानन्द के मुखमण्डल पर नजरें गड़ाए हुए निर्भीक स्वर में कहा- “किन्तु ब्रह्मराक्षस योनि स्वीकार करने से पूर्व मेरी भी कुछ शर्तें हैं।”

“तुम पराजित हो चुकी हो माया। और पराजित मनुष्य शर्त रखने की दशा में नहीं होते हैं। तुम्हारी विकलता बता रही है कि तुमने हमारे दिये हुए समय को हमारे विरुध्द छल करने के असफल प्रयत्न में गंवा दिया है।” अभयानन्द के होठों पर विषाक्त मुस्कान थिरक उठी- “पराजित होकर भी इतना अभिमान कि साक्षात काल के सम्मुख खड़ी होकर उसे प्रतिबन्ध में बांधने की चेष्टा कर रही हो?”

खामोश खड़ी संस्कृति शैतान के चेहरे पर परवाज कर रहे अहंकार को देख रही थी। उसके चेहरे पर एक अलौकिक दीप्ती थी। किसी भी कोण से ऐसा नहीं प्रतीत हो रहा था कि वह विचलित थी। पिशाच के कहकहे उसके लिए भय का पर्याय नहीं बनने पाए थे।

“तुम हमें प्रसन्न करो माया। हमारी क्षुधा को तृप्त कर दो। यदि हम तृप्त हुए तो तुम्हारी विनती को पूर्ण करेंगे। किन्तु भूल कर भी अपनी विनती को प्रतिबन्ध की संज्ञा मत देना।”

अपनी बेटी के प्रति एक पिशाच के घिनौने इरादे सुन कर दिग्विजय का खून खौल उठा। अलौकिक शक्ति से मुकाबला न कर पाने की विवशता उनके चेहरे से क्रोध के रूप में प्रकट होने लगी। कुलगुरु गंभीर थे। उनके चेहरे पर भी संस्कृति की भांति कोई व्यथित भाव नहीं थे। डॉक्टर त्रिवेदी का मुंह खुला हुआ था। उनके चेहरे पर एक अविश्वसनीय घटना का साक्षी बनने का प्रबल कौतुहल व्याप्त था।

संस्कृति आगे बढ़ने को उद्यत थी कि दिग्विजय ने उसकी कलाई थाम ली।

“नहीं संस्कृति।” उनका लहजा भावुक था- “हम क्षत्रिय जरूर हैं किन्तु हमारा

कलेजा इतना मजबूत नहीं है कि अपनी निर्दोष और मासूम बेटी को एक हैवान को सौंप दें।”

“चित भी उसकी है पट भी उसकी है पापा।” संस्कृति के लहजे में भावुकता का पुट नहीं था- “मैं तो राजमहल से ही ये सोच कर चली थी कि खुद को इस पिशाच को सौंपना जुआ खेलने के बराबर है। आप मां भगवती पर भरोसा रखिये। वे हमें और शंकरगढ़ को कुछ नहीं होने देंगी।”

संस्कृति के अंतिम वाक्य में आत्मविश्वास की झलक थी। किसी अज्ञात कारण के वशीभूत होकर दिग्विजय ने उसकी कलाई छोड़ दी और इसी के साथ उसने कदम आगे बढ़ा दिया।

“अभयानन्द के अंकपाश में तुम्हारा स्वागत है सुन्दरी।” अभयानन्द ने दोनों बाहें फैलाकर अट्टहास किया- “किन्तु ठहरो। तुम्हारी कलाई के स्वास्तिक चिह्न का प्रबंध करना है हमें।”

संस्कृति चार कदम के फासले पर ठहर गयी। उसकी कलाई का स्वास्तिक चिह्न उसी प्रकार चमक उठा, जिस प्रकार तब चमका था, जब वह पहली दफा अभयानन्द के सामने गयी थी और साहिल की जान बचाई थी। अंतर था तो केवल इतना कि इस बार अभयानन्द के चेहरे पर भय की बजाय विजय का

अभिमान था।

“हा...हा...हा..!”

उसकी डरावनी हंसी मरघट में गूँज उठी। वातावरण में पहले से ही व्याप्त खौफ और भी गहरा हो गया। भेड़िये समवेत स्वर में इस कदर चिल्लाने लगे मानो आज की रात उनके लिए जश्न की रात हो। एक अतृप्त पिशाच अपनी तृप्ति से चंद क्षणों के फासले पर खड़ा था। बादलों का एक स्याह कतरा श्वेत चन्द्रमा पर मंडराया और अभयानन्द आकाश की ओर मुंह उठाकर भेड़िये के स्वर में चिंघाड़ उठा।

‘वुउऊऊ....!’

करीब पांच मिनट तक उसका स्वर परिवेश को गुंजाता रहा और फिर वहां उपस्थित साधारण मनुष्यों ने अपने जीवन की पहली अलौकिक घटना देखी।

अभयानन्द ने अपने मुंह से काले धुएं का गुब्बार इस प्रकार उगला मानो ईंट के भट्टे की चिमनी ने काला धुंआ उगला हो। धुंए का गुब्बार परिवेश में चक्कर काटता रहा और लोगों के देखते ही देखते एक नरभेड़िये की आकृति में बदल गया। अरुणा ने धुएं की उस आकृति के सम्मुख श्रद्धा से सिर झुका लिया।

डॉक्टर त्रिवेदी को महसूस हुआ मानो वे कोई भयानक स्वप्न देख रहे हों।

‘क्या यही है संसार से छुपा सृष्टि का रहस्य? क्या यही है पराविज्ञान की दुनिया का सच? क्या मैं स्थूल विज्ञान की सीमाओं को लांघ कर पराविज्ञान के संसार में दाखिल हो चुका हूँ?’

☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐
 

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