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A Horror Novel - स्वाहा complete

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काला चिराग तेज तेज कदम उठाता हुआ महल कैं अन्दरूनी दरवाजे से अन्दर चला गया। दरवाजा जोरदार आबाज से वन्द हुआ और फिर दरवाजे के पीछे कुछ खट खट-सी सुनाई दी। जैसे दरवाजे को ताला लगाया जा रहा हो।

इंद्रजीत्त अब कमरे में अकेला रह गया था ।लेकिन यह अकेलापन उसके लिए नया नहीं था । एक उम्र बीती थी एक्रान्त मे । वह इत्मीनान सै चाय पीने लगा। चाय ने ताजगी पहुचाई थी । चाय पीकर वह बिस्तर पर लेट गया । बेहद आरामदय बिस्तर था। थोडी ही देर में उसकी आखो मे नींद उतरने लगी । इस वक्त रेखा उसके ख्यालों मे थी । वह इसी के बारे में वडी चिन्ता के साथ सोच रहा था।

"जाने वह इस वक्त कहा होगी? वह उसे मुश्किल से निकालने आई थी खुद ही मुश्किल का शिकार हो गई।

जाने अब उस पर क्या बीत रही होगी? 'मृत्यु-कूप' के बारे में काले चिराग का विश्वास है कि उसमे धकेला जाने वाला कभी जिन्दा नहीं बचता। रेखा कीं जिन्दगी की आशा करना बेकार है, लेकिन इस मृत्यु कूप पर जाकर देखना तो चाहिये। "

उसने काले चिराग सै 'मृत्यु कूप' पर चलने का अनुरोध का फैसला किया व आखें मूंद लीं ।

यह 'मृल्यूद्वार' या 'मृत्यु कूप' भी खूब था । बास्तव मे यह मौत का ही कुआ था ।उस दिन राकल, रेखा को फरेब देकर 'मृत्यु कूप' तक ले आया था । फिर जब राकल के इशारे पर दो हथियारवद सिपाही रेखा को उसके बाजूओं से पकडकर खींचने लगे तो रेखा को खतरे की सजीदगी' का अहसास हुआ ।

रेखा की छटी इन्द्र जाग गई। उसे अहसास हुआ कि उसके साथ बुरा होने वाला है। वह बिफर उठी और राकल पर गुर्राई--"राकल यह क्या बदतमीजी है ?"

"हा-हा-हा। " राकल ने कहकहा लगाया था-"जो राकल का कहा नहीँ मानता उसे अपनी गुस्ताखियों की सजा भुगतनी ही पडती है । "

"लेकिन तू तो मुझें किसी को पैगाम देने के लिए कैदखाने सै निकालकर लाया था । "

”पैगाम तो मैं तुझे दूगा। मौत का पैगाम ।" यह कहकर वह फिर विक्षिप्त हसी हसने लगा था । ”काले चिराग ने तेरे बारे में ठीक कहा था कि तू एक खब्बीस प्राणी है। " रेखा आपे सै बाहर हो रही थी ।

”उसने ठीक कहा था I मैं वाकई एक शैतान हूं। अब तू मेरी शैतानियत देख I " यह कहकर अपने सवारों सै मुखातिब हुआ था-- "इसे उठाओ और 'मृत्यु द्वार' में डाल दो। "

फिर जो कुछ हुआ पलक झपकने मे हुआ। लगडे राकल का हुक्म पाकर दोनों सवार, उसके हाथ खींचते हुए आगे बड़े फिर एक जगह रूककर उन्होंने रेखा के पैर पकडकर, उसे ऊपर उठाया । और डण्डा-डोली के अदाज में उसे झुंलाया और फिर एक अजीब सी आवाज निकालकर उसे हवा में उछाल दिया । यूं रेखा जब नीचे गिरी तो उसे अहसास हुआ कि उसे कहा फेंका गया है। यह एक बहुत गहरा कुंआ था और वह उसमें गिरती चली जा रही है।

रेखा के साथ लगडे राकल के इस फरेब के बारे में पाठक पढ चुके हैं ।

बहरहाल, रेखा की मुश्किलें कम नहीं हुई थी और राकल अपना रंग दिखा गया था। कुए के अन्दर गहरा अंधेरा था। रेखा को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। उसने सहारा लेने को, कुछ पकड़ने. को हाथ मारे, लेकिन उसके हाथ में कोई चीज नहीं आई। वह हाथ पाव मारते मारते चीखने लगी-- "बचाओ...बचाओ... । "

रेखा की इन र्चीखौ सै कुएं की दीवारों में खलबली मच गई I कुएं की दीवारों मै जगह जगह छोटे-छोटे खोह थे और इन खौहों में कुएं के जीव प्राणी आराम कर रहे थे। रेखा की र्चीखों ने इन प्राणियों को जगा दिया था।

इस प्रेत्तलोक के तो चप्पे चप्पे पर रहस्य थे ।

"अरे देखो यह तो किसी इंसान की आबाज है । " किसी ने नीचे झांककर कहा ।

“इंसान की बच्ची है । " नीचे वाले गार से आबाज आई ।

”अरे, इसे पकडो । इसे पानी में गिरने से बचाओ । ”

रेखा को मालूम न था कि कुएं के ये प्राणी उसकी जिन्दगी बचाने के लिए प्रयत्नशील हैं। वह निरूतर चीखे जा रही थी-- "बचाओ...बचाओ... । "

बचने की कोई उम्मीद न थी। कोई उसे बचा भी कैसे सकता था? शायद वह बैअख्तयार ही चीख रही थी अपना खौफ कम कर रही थी।

लेकिन कुए के वे जीव क्षणभर में ही हरकत में आ गए थे। और फिर नीचे गिरते हुई रेखा को अचानक यूं महसूस हुआ जैसे किसी ने उसे थाम लिया हो। फिर यह अहसास जागा कि वह नीचे गिरने की बजाय ऊपर की तरफ उठ रही है । नजर उसे कुछ भी नहीं आरहा था । यही महसूस हो रहा था जैसै वह किसी तख्ते पर बैठी हो। उसने सिर उठाकर एकदम ऊपर देखा । कुएं का मुंह उसे किसी सुराख की तरह नजर आ रहा था। इसी से उसे कुएं की गहराई का भी अंदाजा हो गया था। थोडा _ सा ऊपर आने के बाद रेखा को महसूस हुआ, जैसे उसे कही बैठा दिया गया हो। उसने हाथों से टटोलकर देखा तो पथरीली सी जगह महसूस हुई। उसके चारों तरफ अंधेरा' था। ऊपर कुएं का मुहाना भी नजर नहीं आ रहा था।

कुए की दीवार में बने इस छोटे से गार में जो गैर इन्सानी प्राणी आबाद थे-वे दो मर्द और एक औरत थी । बे रेखा को देखकर बहुत खुश थे। रेखा इस गार के पथरीले फर्श पर बैठी थी और वै दोनों मर्द पागलों की तरह उसके गिर्द नाच रहे थे जबकि औरत एक तरफ खडी हैरत से उसे देख रही थी ।

यह खबर कि एक इन्सान की बच्ची कुएं में आ गई है ऊपर सै नीचे तक कुए कीं हर खोह में फैल गई थी । यह गार कुएं के लगभग बीच में था। कुए के प्राणी ऊपर व नीचे से रेखा को देखने आ रहे थे।

रेखा को कुछ मालूम न था कि उसके गिर्द क्या हो रहा है? उसे यह अहसास तो था कि उसके आस पास कोई है-बोलंने की आवाजें भी आ रही थीं, लेकिन ये लोग कौन-सी भाषा बोल रहे थे और क्या कह रहे थे-यह उसकी समझ में नहीं आ रहा था । बहरहाल, बह इसी में खुश थी कि वह कुएं में गिरने से बच गई थी। मौत किसी गोली की तरह उसके कान के पास से गुजर गई थी।

रेखा का खौफ कम हो गया था,लेकिन दिल किसी तरह भी ठिकाने पर नहीं आ रहा था। बदहवासी भी पूर्ववत: ही थी और वह गहरे-गहरे सास ले रही थी। निश्विन्नता के बावजूद उसकी घबराहट नही जा रही थी। उसे अपना दम घुटता महसूस हो रहा था।

"ऐ तुम लोग इसे ऊपर क्यों उठा लाए हो इसे कुए में क्यों नहीं गिरने दिया?" उस औरत ने जो खोह के एक कौने मे खामोश खड़ी थी नाचते हुए मदों से पूछा।

”तू नहीं जानती कि यह कौन है?" एक मर्द ने जवाब दिया ।

”जानती हूं। इन्सान की बच्ची है। "

"तो फिर ऐसा उल्टा सबाल क्यों किया?"

"इसका करोगे क्या? " औरत ने पूंछा ।

“क्या जरूरी है कि तू जिस बात क्रो नहीं जानती उस बात को जाने। "

"बताने मे क्या हर्ज है?"

"क्या तूने कासगन का ऐलान नहीं सुना । "

”केसा ऐलान? मुझे तो नहीँ मालूम ।"

"हां तुझें कैसे मालूम होगा तू कौन-सा कुए से निकली है? "

”कुछ बताओ तो... । "

"पहाडों के इस पार कासगन कीं वस्ती है और यह ऐलान होता रहता है कि अगर कहीं कोई आदमजात नजर आ जाए तौ उसे फौरन उसके सामने पेश किया जाए। 'इसान' को पकड़कर लाने वाले को मुह मागा इनाम देगा I"

" ओह्न तो क्या तू इसै कासमन के सामने पेश करने का इरादा रखता है. " औरत ने पूछा ।

"तो और क्या?" वह झूम-झूमकर नाचने लगा।

"लेकिन इनाम का हकदार तो मै हूं।" नीचे वाले गार का बासी बोला-- "मैंने इसे पहचानकर बताया था कि यह इन्सान की बच्ची है। "

"सबसे पहले देखा तो मैने था।" ऊपर वाले ने कहा।

"तूने कैसे देखा था? हम सब तो सो रहे थे। ”

"मैं इसकी चींख की आवाज पर जाग गया था । मैने फौरन ही झांक्कर देखा था। "

अब उन दौनों में तू मै मै होने लगी कि इनाम का असली हकदार कौन है? तब सबसे नीचे बाली खोह से एक को बुलाया गया । यह समस्या उसके सामने चली गई। उसने कहा कि इनाम के हकदार दोनों हैं वह भी जिसने पुष्टि की थी कि यह इंसान क्री बच्ची है ।

इधर पंचायत लगी थी । फैसले हो रहे थे और उधर रेखा को कुछ भी मालूम न था कि उसके बारे में क्या तय हो रहा है .....

उसके सिर की कीमत लंग चुकी थी ओर अब बह किसी कासगन के हवाले की जाने वाली थी। उसकी हालत खराब थी। सासें किसी तौर पर भी संयत नहीं हो पर रही थी I दम घुटने की अवस्था बढती जारही थी। वह अपने दोनों हाथों से गला पकडर लम्बे लम्बे सास ले रही थी ।बुजुर्गं के फैसला देते ही रेखा एक तरफ लुडक गई। वह बेहोश हो चुकीं थी।

"अरे, इसे क्या हो गया? देखौ । " औरत ने सबका ध्यान रेखा की तरफ खींचा ।

"क्या हुआ?" एक साथ कईं आवाजें आई ।

"यह होश गवां बैठी है । इसे जल्दी से पहाडों के उस पार ले जाओ-वरना यह मर जाएगी। यहाँ का वातावरण शायद इसे रास नहीं आया। " बुजुर्ग ने बेहोश को देखकर कहा।

फोरन ही उन दो मर्दों (कुएं के गेर इन्सानी प्राणियों)-जिन्हें इनाम का हकदार करार दिया गया था ने रेखा को उठाया और सम्भालते हुए कुंए की तह मै जाने लगे । वह बहुत गहरा कुंआ था I इसे 'मृत्यु कूप' ठीक ही कहा जाता था । कुए कीं तह में कोई तेल जेसी चीज उबल रही थी । उससे धुआ उठ रहा था । इस उबलते द्रव्य में गिरते ही आदमी कण कण हो जाता था । कुएं का वातावरण आम व्यक्ति के अनुकूल नहीं था ।

रेखा शायद इसीलिए बेहोश हो गई थी । वे दोनो उसे सम्भाले हुए तह में जाने की बजाय-जहां तेल सा द्रव्य उबल रहा था और उसकी गर्मी काफी ऊपर तक महसूस हो रही थी-एक गार में घुस गया। यह खोह खली थी । यह दरअसल यहां से बाहर निकलने का रास्ता था । वे दोनों उसे उठाये हुए, उडते_ हुए ही पहाडों की तरफ जा रहे थे।
 
पहाड… उन्होंने उडते हुए ही पार किए थे और फिर वे रेखा को सम्भाले धीरे थीरे नीचे आने लगे। फिर उन्होंने एक बहते झरने के निकट एक बडे से पत्थर पर रेखा को लिटा दिया । यह एक महकते वातावरण वाला स्थान था I रेखा के हवास कुछ ही देर में बहाल हो गए। फेफडो_ में ताजा हवा पहुची तो उसने फौरन आखें खोल दीं ।और आखें खुलने के वाद उसे जो कुछ नजर आया वह अविश्वनीय था।

उसे कुएं में फेंके जाने के बाद के हालात याद आए। यह भी याद आया कि वह बेहोश हो गई थी, पर अब आख खुली थीं, तो न घुप्प अंधेरा… था ना कुएं का दमघोटु वातावरण । यह एक खूबसूरत पहाडी इलाका था। सामने एक झरना बह रहा था । ऊचे-ऊचे' पेड़ थे। बिल्कुल ही अपनी घरती के पहाडी इलाकों जेसा दृश्य था ।

रेख उठकर बैठ गई और अब उसने अपने सामने एक पत्थर पर इन अजीबो-गरीब प्राणी को देखा । वे दो थे। कद मुश्किल से उनका एक डैढ़ दो फुट रहा होगा। उनके सिर के बाल जमीन तक पहचे हुए थे। छोटे-छोटे हाथ-पाव मोटे होठ मुह' में टात कोई न था आखें गोल व हरे रग की थीं ।

रेखा को उठने देखकर वे दोनों भी पत्थर पर खडे हो गये और खडे खडे ही उडते हुए उसके निकट आकर रूक गये। रेखा उन दोनों को अपने नजदीक देखकर सहम गई। उसने कहा-- "कौन हो तुम लोग?"

"डरो मत, हम तुम्हें नुक्सान नहीं पहुचाऐगे' I " उनमें सै एक बोला। बडी, वरीक सी आवाज थी ।

"यह कौन सी जगह है? "

"यह कासगन की वस्ती है। " जबाब मिला-- "वह तुम उस पहाड़ी पर जो चमकता हुआ महल देख रही हो वहां रहता है वो । हमें वहा जाना है। तुम तैयार हो जाओ । "

और रेखा अभी समझ भी नहीं पाई थी क्रि कौन कासगन क्रोन-सा चमकता महल और वहा क्यो जाना है कि उन दोनों ने उसके बाजू पकड़ लिए। रेखा को एक झटका लगा और वह शून्य में झूलती उडने लगी । वे दोनों ठिगने उसके बाजू पकडे बडे आराम से हवा मे उड रहे थे।

यही लग रहा था जेसे रेखा उनके लिए कोई हल्की फुल्की गुडिया_हो।

वे कुछ ही देर में उस चमकता महल के सामने पहुच गए। वह एक गुम्बदनुमा महल था । बहुत बडा। उसमे सिर्फ एक ही दरवाजा था और वह पूरा महल की तरह चमक रहा था। कुए के प्राणी रेखा क्रो सीढियों… पर छोडकर, दरवाजे पर पहचे। जाते हुए उनमें से एक ने कहा… "तुम आराम से सीढिया चढती हुई ऊपर आओ । हम जाकर दरवाजा खुलवाते हैँ।"

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हैरान परेशान रेखा जब ऊपर पहुची तो वह दरवाजा खुल चुका था । दरवाजे के अन्दर से बडी महकती हवा आ रही थी और एक भालाधारी व्यक्ति रग विरगे' कपडे मे खडा. था । वह उन दौनो ठिगनो से सवाल-जवाब कर रहा था ।

रेखा करीव पहुची' तो भालाधारी उसे दिलचस्पी सै देखने लगा और फिर उसने उन कुएं के प्राणियों से पूछा "यह है वह? "

"हा I" एक ने जवाब दिया ।

"ठीक हे । तुम इसे लेकर अन्दर आओ । मैं कासगन को इतला करवाता हूं। " यह कहकर वह भालाधारी अन्दर की तरफ चल दिया l उन दौनों ने रेखा के हाथो की उगलिया पकड ली व फिर वे चिकने फर्श पर फिसलने लगे । वे बडे आराम से रेखा के साथ चल रहे थे।

बाहर से यह गुम्बदनुमा महल सोने की तरह चमक रहा था, तो अन्दर से इसके दरो-दीवार चादी' की तरह के थे। लगता था जेसे यह महल सोने चादी का बना हुआ हो ।

थोड़ा आगे जाने के बाद सीढिया आ गई जो नीचे की तरफ जा रही थी और उस भालाधारी शख्स को उन्होंने उन्हीं सीढियों. से नीचे जाते देखा था । उसके अनुसरण में वे भी सीढियां उतरने लगे ।

वह एक गोल जीना था, जो बहुत गहराई तक चला गया था । रेखा सीढियां उतरते थकने लगी जबकि वे दोनों उसकी उगलियां पकडे स्टिग की तरह उछलते हुए मजे से सीढिया उतरते चले जा रहे थे । अंततः सीढ़ियाँ ख़त्म हुई ।

रेखा ने इत्मीनान का सास लिया । सामने एक दरवाजा था जिस पर सुर्ख पर्दा लहरा रहा था । वह भालाधारी उन्हें इस दरवाजे पर खडा, मिला । उसने इन तीनों को इशारे से अदर. जाने को कहा । कुएं के प्राणियों ने रेखा कीं उगलिया छोड दीं और फिर वे तेजी से पर्दा हटाकर अदर चले गए। उनके पीछे-पीछे रेखा भी अन्दर दाखिल हुई । रेखा ने सामने एक कुर्सी पर एक उम्रदराज, लेकिन एक बड़े ही प्रभावशाली व्यक्ति वाले व्यक्ति को बैठे देखा । दो दासियां उसके दायें बायें खडी उसे मोर के पंखों वाले पखों से हवा दे रही थीं । बिल्कुल राजसी ठाठ का माहौल था ।

कुए' के प्राणी उस शख्स के कदमों से लिपट गये और फिर उनमें सै एक बोला-- "कासगन, देख, हम तेरे लिए क्या लाए है?"

"हां, मैं देख रहा हूं। " उम्रदराज कासगन ने अपनी चमकती आखों से रेखा की तरफ देखा--"यह तुम्हें कहा मिली ? "

"इसे हमारे कुएं में फेंका गया था ।" जवाब मिला ।

" अच्छा क्या तुमने इसै कुछ बताया है?" कासगन ने पूछा ।

"नहीं हमने इसे कुछ नहीं बताया।"

"बढिया । " उसने अपने दायें तरफ खडी. दासी की तरफ देखा, उससे बोला---"इसे भीतर ले जाओ । हम अभी आते हैँ I "

वह दासी रेखा को अपने पीछे आने का इशारा करके सफेद पर्दे के पीछे गायब हो गई। रेखा पर्दा हटाकर उसके पीछे हो ली थी। अन्दर एक छोटा सा तालाब था और वह दासी तालाब के किनारे-किनारे चल रही थी । इस तालाब में कमल खिले हुए थे और बत्तखें तैर रही थीं ।दासी तालाब का चक्कर लगाकर एक बरामदे में दाखिल हो गई । सामने ही एक दरवाजा था । दासी इस दरवाजे पर रूक गई और उसने रेखा को अन्दर जाने का इशारा किया ।

रेखा ने डरते-डरते अन्दर कदम रखा । यह भव्यता से सजा एक बेहद खूबसूरत शयन-कक्ष था । आरामदयक बिस्तर देखकर वह उसकी तरफ बडी, ब फिर इत्मीनान से उस पर लेट गई । इस मायावी लोक के अचरज अब उसे खोफजदा नहीं करते थे । वह बहुत थकी हुईं थी । लेटते ही उसे नीद ने आ दबोचा।

कुछ ही देर में वह बेसुधी की नींद में थी ।

ओर फिर......

वह जाने कब तक सोती रही ।

आख खुली तो शयन कक्ष में फानूस जगमगा रहे थे I वह अंगडाई लेकर उठकर बैठ गई I और अब शांतचित्त होकर उसने अपनी वर्तमान स्थिति के बारे में सोचा । यही सोचा कि अब न जाने उस पर क्या मुसीबत टूटने वाली है । वे बौने उसे यहां क्यो उड़ा लाए थे? यह कासगन आखिर क्या 'शे' है अब उसे क्या करना चाहिये?

अभी वह बिस्तर पर बैठी सोच ही रही थी कि क्या करे कि तभी कई दासियां कमरे में दाखिल हुई। वे अपने हाथो में कुछ सम्मान उठाए हुए थीं।

बडे खिले खिले ब मोहक थे इन दासियों के चेहरे और होठों पर भी बडी. मनमोहक मुस्कान थी । इन दासियों ने अपने हाथ का सामान रखकर बारी बारी से रेखा क्रो सलाम किया।

रेखा को यूं अहसास हुआ जैसे वह किसी देश की शहजादी हो ।

दो दासियां उसके कदमों में बैठ गई । एक ने उसके पाव उठाकर चांदी के गहरे थाल मे रखै और दुसरी दासी नें उसके पैर पर पानी डालना शुरू किया । यूं एक दासी जब रेखा के पैर धोने लगी तो उसे बडा अजीब-सा लगा । वह अपने पैर सिकोडती हुए बोली--

"अरे यह क्या करती हो? हटो मैं खुद धो लूगी हाथ पाव'। "

"यह कासगन का हुक्म है। अगर उसके हुक्म की तामील न हुईं तो वो हमारी गर्दनें कटवा देगा । तुम हमारी जिन्दगी की दुश्मन न बनो। ” एक दासी ने बडी शालीनता के साथ कहा ।

इसके बाद कुछु कहने सुनने की गुजाईश न रही ।

रेखा खामोश होकर बैठ गई और दासिंयां जल्दी जल्दी अपने काम निपटाने लगीं। रेखा के हाथ पांव धोने के बाद बडी… नफासत से उसका मुह धोया गया। लिबास बदला गया। उसके बाल बनाये गए । यूं जव वह पूरी तरह तैयार हो गई तो उसके सामने एक आइना लाया गया और रेखा आइने में अपने आपको देखकर हैरान रह गई l उसे बडे लग्न से तैयार किया गया था। लिबास और बनाव श्रृगांर ने उसके सौंदर्य को चार चाद लगा दिये थे।

"यह मुझे आखिर किसलिए सजाया-सवारा गया है?" आइने मे खुद को निहारते पूछा था रेखा ने।

जबाव में रेखा के सामने से आइना हटा लिया गया । दासियां एक एक करके कमरे से निकली l रेखा हैरान हुई कि उनमे से किसी ने भी उसके सवाल का जबाव नहीं दिया था। जब आखिरी दासी भी कमरे से बाह्रर निकलने लगी तो रेखा ने उसे टोका-- "अरे बात सुनो ॥"

वह दासी ठिठक कर रूक गई व रेखा को अजनबी निगाहों से देखने लगी-बोली कुछ नहीं।

"तुमने बताया नहीं यह सब क्या है?"

"हम नहीँ जानते।" वह वडी शालीनता से बोली और फिर फौरन कमरे से निकल गई I

दासियों के जाने के वाद वह उठकर खडी हो गई और अपना राजसी लिबास सम्भालकर कमरे में टहलने लगी । लिबास इतना भारी व नीचे तक लटका हुआ था कि उसके साथ चह्रलकदमी करना मुश्किल था।

वह कमरे में रखी ऊची कुर्सी पर अपना लिबास समेटकर बैठ गई।
 
वुच्छ देर बाद एक दासी आई। उसने कासगन के आने का ऐलान किया I जब वह उम्रदराज लेकिन प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला कासगन कमरे में दाखिल हुआ तो रेखा उसके सम्मान में उठ खडी हुई। कासगन ने उसे बैठने का इशारा किया और खुद उसके सामने रखी दूसरी कुर्सी पर आ बैठा ।

कागसन उसे एकटक निहारने लगा जेसे सोच रहा हो कि बात कहा सै शुरू की जाए।

रेखा उसके बोलने की प्रतीक्षक रही, लेकिन जव वह खामोशी से उसे घूरता ही रहा तो रेखा. ने नजरे उठाकर उसे देखा I कासगन की वडी वडी आखों मे अजीब सी चमक थी ।

वह उसे ज्यादा देर तक न देख सकी और अपनी निगाहें झुका ली और वह बोला, उसने पूछा "क्या नाम है तुम्हारा? "

"मैं रेखा हूं। " रेखा ने अपना नाम बताया ।

और अब वह जैसे सीधे सीधे अपने मक्सद पर आते बोला था… "खूबसुरत नाम है । बहरहाल, रेखा! हम एक मुसीबत में गिरफ्तार है । हमें तुम्हारी मदद की सख्त जरूरत है। "

"मेरी मदद की?"रेखा हैरान हुई- "मैं भला आपकी क्या मदद का सकती हूं। "

"तुम किसी को जिन्दगी दे सकती हो I " उस प्रभावशाली बूढे ने बडी अजीब वात्त कही ।

"जिन्दगी जिन्दगी तो ऊपर वाले के हाथ में है। "

"जानता हूं। पर तुम एक जरिया एक माध्यम बन सकती हो। "

"आखिर संयुक्ति क्या है, कुछ पता तो चले ?"

"आओ मेर साथ । " यह कहकर कासगन खडा हो गया । दो दासियों ने रेखा का पीछे से उसका भारी लिबास संभाल लिया । कासगन चला तो रेखा उसके पीछे-पीछे हो ली l

कासगन जिस दरवाजे सें आया था उसी से वापिस हुआ । यह इस चमकते महल का अदरूनी दरवाजा था, क्योंकि रेखा को जिस दरवाजे में लाया गया था उसके सामने एक खूबसूरत तालाब था ।

एक लम्बी राहदारी सै गुजरने के बाद बो दायीं तरफ मुडा. तो सामने ही एक सुनहरा दरवाजा दिखाई दिया । दरवाजा सोने का बना नजर आता था ओर दरवाजे पर फूल-वूटों के अलावा खूबसूरत पत्थर भी जडे हुए थे ।

दासियों ने इस सुनहरे दरवाजे के पट खोले व खुद पीछे हट गई । कासगन भीतर दाखिल हो गया और फिर जब रेखा कमरे में प्रवेश करने लगी तो दासियों ने उसके लिवास छोड़ दिया और वे खुद दरवाजे पर ही रूक गई । रेखा के अन्दर जाने के बाद उन्होंने दरवाजा बन्द कर दिया l

रेखा अपना लिबास घसीटती हुईं आगे वडी । यह एक खासा बड़ा कमरा था और इस कमरे में मध्य में एक शीशे का ताबूत रखा हुआ था । इस ताबूत के अलावा कमरे में कोई और चीज नहीं थी I ताबूत के ऊपर अलबत्ता एक फानूस लटका हुआ था जिसकी रोशनी ताबूत पर पड रही थी । बाकीं कमरे में मलगजा सा अन्धेरा था।

कासगन इस ताबूत के पास जाकर खडा हो गया और रेखा को मुडर देखा। रेखा आगे बढी. और उसके बराबर जाकर खडी हो गइ ।

रेखा ने ताबूत की तरफ देखा। ताबूत में एक शरीर लेटा हुआ था जो सुर्ख रग र्का रेशमी चादर से ढका हुआ था । बो जो कोई भी था एक अच्छे लम्बे कद का व्यक्ति था ।

कासगन ने ताबूत का ढक्कन खोल दिया व रेखा को आगे आने का इशारा किया I रेखा आगे आ गई तो कासगन ने उस शरीर के चेहरे से चादर हटा दी I

चादर हटते ही कमरे में उजाला-सा हो गया I वो जो भी था एक खूबसूरत नौजवान था-साक्षात् कामदेव I यू लगता था जेसे अभी अभी सोया हो । उसके होंठों पर एक मीठो सी मुस्कान थी । चमकदार सुर्खी लिए बाल लम्बी घनी पलकें केसर मिले दूध सी रगत। जाने इस नौजवान के चेहरे पर क्या बात थी कि बस जी चाहता था कि उरी देखते ही रहो ।

रेखा उसे मत्र-मुग्ध सी देखै जा रही थी।

"रेखा, यह मेरा बेटा है रासमोन । " कासगन की भारी आवाज -गूंजी तो रेखा की तन्द्रा टुटी ।

" जी।" वह एकदम घबरा कर बोली ।

“ यह जिंदा है लेकिन मूर्दें से बदतर है।"

“यह क्या कहा आपने?" रेखा उलझ सी गई थी।

"हा-मर गया होता तो सब्र आ जाता । यह न मरता है न जीता है । "

"जी , हुआ क्या है?” रेखा की जिज्ञासा बढती जा रही थी ।

"यह बेहोश है। " कासगन बाबा ने बताया ।

"इसे कोई बीमारी है?"

"नहीँ बीमारी कोई नहीं है।"

" ओह । " रेखा ने एक गहरी सास ली, पूंछा--"यह कब से बेहोश है? "

"एक मुद्दत हो गई । एक अर्सा बीत गया । इतना लम्बा कि मेरे सब्र का पैमाना छलकने को है I "

"आपने कहा था कि मैं आपकी मदद कर सकती हूं। क्या आपने इसी सिलसिले में मदद की बात की थी?"

"हां तुम मरे बेटे रासमोन की जिन्दगी बचा सकती हो । तुम चाहो तो यह होश में आ सकता है । "

"आखिर केसे?" रेखा की उलझन बढती जा रही थी ।

"आओ, मेरे साथ । मै तुम्हें बताना हूं। " यह कहकर कासगन ने रासमोन का चेहरा ढका, ताबूत बन्द किया और फिर दरवाजे की तरफ बढ गया । रेखा भी उसके पीछे हो ली थी ।

दरवाजे पर दासियां मौजूद थीं । रेखा के बाहर निकलते ही उन्होंने उसका भारी लिबास सम्भाल लिया I रेखा अब इत्मीनान से बूढे कासगन के पीछे चलने लंगी ।

बिभिन्न राहदारियो से होते हुए कासगन अतत्त': एक वडे दरवाजे में दाखिल हो गया । इस दरवाजे पर दोनों तरफ भालेधारी रक्षक खडे थे । रेखा ने भीतर पहुँचकर देखा, यह एक बड़ा कमरा था । इसमें एक शाही मसन्द मौजूद थी ।

कासगन इस मसन्द पर जा बैठा । फिर उसने अपने पास ही रखी एक खूबसूरत गद्देदार कुर्सी पर रेखा को बैठने का इशारा किया I

रेखा बैठ गई, तो बूढे कासगन ने तमाम दासियों को बाहर निकलने का इशारा किया। जब दासियाँ बाहर चली गई और दरवाजा बन्द हौ गया तो कासगन रेखा के तरफ देखते हुए बोला--

"रेखा तुम मेरी आखिरी उम्मीद हो । अगर तुम रासमोन को न बचा सकी तो फिर कोई उसको नहीं बचा सकेगा और सारबरी अपने संकल्प में सफल हो जाएगी। मेरा बेटा मुझसे छिन जाएगा । "

"यह सारबरी कौन है? " रेखा ने पूछा-- ”और उसका आपके बेटे रासमोन सै क्या संम्बध… है?"

"ठहरो मैं तुम्हें शुरू से सारी कहानी सुनाता हूं । " कासगन बोला और फिर उसन हालात बयान करते हुए कहा--"मेरे वेटै रासमोन को शिकार का बहुत शोक है। वह जब भी शिकार पर जाता मैं उसे सचेत करना नहीं भूलता कि बेटा, शिकार के लिए जिधर जी चाहे जाना बस पश्चिम की तरफ न जाना और वह मेरे इस आदेश का हमेशा ध्यान रखता था, पर एक बार उसके जी में न जाने क्या आई कि वह पश्चिम की तरफ शिकार खेलने निक्ल गया और उस जादूगरनी के इलाके में पहुच' गया । वहां जादूगरनी कावेरी की बेटी सारबेरी ने रासमोन को देखा तो अपना दिल हार बैठी । उसने फोरन एक खूबसूरत हिरणी का रूप धारण किया और उसके सामने आ गई I

"...ऐसी खूबसूरत हिरणी को देख़कर रासमोन दीवाना हो गया और उसने अपना घोडा उसके पीछे लगा दिया । बौ हिरणी पर तीर चलाना चाहता था, लेकिन बो तो छलावा थी । तीर चलाना तो दूर की बात उस पर नजर रखना मुश्किल हो रहा था । वह अभी यहां होती तो पलक झपकने में वहां । रासमोन उसके पीछे 'निषेध इलाके' में जा पहुचा । यहा सारबरी की ख्वाहिश पर उसकी मां कावेरी ने अपने जादू का तीर मेरे बेटे पर चला दिया I वह जादूगरनी कावेरी के उस इलाके से किसी तरह निकल तो आया लेकिन अपने महल तक पहुचते पहुचते. उसकी हालत ख़राब होने लगी । तमाम वैद्य हकीमों को बुलाकर दिखाया गया-लेकिन कोई भी उसका इलाज नहीँ कर सका और यूं अत्तत्त': वह अपने होश गवा बैठा । "...जब वैद्य हकीम उसे ठीक न कर सके तो मैने कई जादूगरों से सलाह मशवरा किया।

तब सारे किस्से का पता चला । कावेरी के जादू के तोड़ के बादशाह त्रिमूर्ति है ।वो तीन चेहरों वाला जादूगर है इसलिए उसे त्रिमूर्ति कहते है। त्रिमूर्ति की शर्त है कि अगर कोई आदम जात उससे कहानी सुन ले तो बौ उसे एक ऐसी चीज दे देगा जिससे न सिर्फ उसको होश आ जाऐगा बल्कि उसकी काबेरी के जादू से भी जान छूट जाएगी। "

"यह तो कोई ऐसी शर्त्त नहीं है । कोई भी उसकी कहानियाँ सुनकर उससे जादू का तोड़ ला सकता है। " रेखा बोली ।

"अब तक्त दस 'इन्सान' अपनी जान गवा… बैठे हैं I " बूढ़े कासगन ने रहस्योद्घाटन किया ।

"जान गवां बैठे हैं I " रेखा ने चकित भाव से दोहराया ।
 
" वास्तव मे त्रिमूर्ति की एक शर्त और है कि जब वह कहानी सुन रहा हो तो बो 'इन्सान' बीच में बोलेगा नही । अगर बोलेगा तो अपनी जान से जाऐगा ।। नतीजा यह है कि अब तक दस इन्सान त्रिमूर्ति की कहानियो की भेंट चढ चुके है ।हमने उन इंसानों को किस तरह हासिल किया यह मैं ही जानता हू। अब तुम मेरी उम्मीद का आखरी चिराग हो क्योंकि इस जादू की सीमा दो बरस है और दो बरस पूरे होने मे अब सिर्फ दस दिन बाकी है | इन दस दिनो मे अगर उस जादू का तोड न हुआ तो रासमोन की 'रूह' पर जादूरनी कावेरी का कब्जा हो जाएगा और फिर मै जिन्दगी भर अपने बेटे का मुह न देख सकूंगा'।" यह कहते हुए बूढे कासगन की आखों में आसू भर आए I

अब रेखा को सूरते हाल का पता चला । वह समझ गई कि कुयें के प्राणियों ने उसकी जान जरूर किसी इनाम के लालच में बचाई थी जो उन्हे इस बूढे सै हासिल हो गया होगा, पर अब वह क्या करे ---- त्रिमूर्ति के सामने जाने सै इंकार कर दे? हा, उसे ऐसा ही करना चाहिए।

वह बोली "यह सब जान लेने के बाद आपका क्या ख्याल है कि मै खुशी से त्रिमूर्ति की भेंट चढ जाऊ'?"

"ऐसा न कहो । मै तुम्हें कामयाब देखना चाहता हू। तुम जरा अपने होशो हबास बनाये रखना । पूरे इत्मीनान से उसकी कहानी सुनती रहना। बस, बीच में बोलना नही है । "

"जब दस इंसान खामोशी से उसकी कहानी नहीं सुन सके और मौत के घाट उतर गए तो इसका साफ साफ मतलब है कि उसकी कहानी में कोई ऐसी बात जरूर है कि सुनने वाला बोले बिना नही रह सकता I "

“हां शायद ।" बूढे ने मूंडी हिलाई।

"फिर वहां जाने की क्या-जरूरत है? मैं क्यों अपनी जान गवाऊ I बेवकूफ समझा है।"

”देखो, बात न करो । कुएं के प्राणियों ने तुम्हारी जान मेरी खातिर बचाई है, वरना तुम तो मर ही चुकी थी और फिर तुम्हें मुझ बूढे का कुछ तो ख्याल रखना चाहिये I मुझे पूरा विश्वास है कि तुम त्रिमूर्ति की कहानियाँ सुनने में कामयाब रहोगी । फिर देखौ, मैं तुम्हारे लिए क्या करता हू। मै यह सोने चाँदी का महल तुम्हारे हवाले कर दूंगा । तुम हिम्मत तो करो । जरा जाकर तो देखो । " कासगन ने जैसे गुहार की थी l

"मैं नहीं जाऊगी I " रेखा ने एक एक शब्द पर जोर देते हुये दो टूक लहजे में कहा ।

और अब बूढे के तेवर बदल गए "नहीं जाओगी तो जिन्दा फिर भी नहीं रहोगी I" उसने भी जैसे निर्णायक लहजा अपना लिया । फिर उसने दो बार ताली बजाई । तत्काल ही दौ दासिया दरवाजा खोलकर भीतर आ गई I बूढे कासगन ने उन्हें हुक्म सुनाया ”लामौस को लाओ l "

उसका यह आदेश सुनकर दोनों दासियां काप गई I वे कापती हुई ही उल्टे पांव वापिस हो गई। दरवाजा पुन: बन्द हो गया । रेखा ने बूढे कासगन के आदेश की प्रतिक्रिया को उन दोनों दासियों के चेहरों पर पढ़ लिया था । उसे अंदाजा हो गया था कि कासगन ने जरूर कोई भयानक आदेश दिया है ~ कोई ऐसा हुक्म जिसकी इन दासियो को आशा नहीं थीं ।

रेखा ने बूढे पर नजर डाली । उसके माथे पर भी वल पड़े हुए थे-- आखों में गुस्सा भरा हुआ था और वह एकटक छत की तरफ देखे जा रहा था।

रेखा ने सोचा कि वह इस बूढे से पूछे कि वह क्या इरादा रखता है। तह लामौस कौन है ? फिर सोचा-छोड्रो, लामौस को सामने आने दो । जो होगा देखा जाऐगा !"

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इन्तजार के क्षण बडे जानलेवा रहै।

फिर कमरे का बडा दरवाजा खुला ओर एक कद्दावर काला भुजग हब्शी कमरे में दाखिल हुआ I उसका कसरती स्याह बदन चमक रहा था l वो सिर्फ एक रेशमी सलवार पहने हुए था I सिर पर लाल रूमाल बंधा था और हाथ मै चमडे का लम्बा सा क्रोड़ा था ।

इस हब्शी के बाद एक कठहरा अन्दर दाखिल हुआ I इस कठहरे में पहिये लगे हुए थे ओर इसे छ: गुलाम धख्का देकर ला रहे थे । इस कठहरे को कमरे के बीचो बीच लाकर रोक दिया गया! यह एक ऊचा लम्बा बाॅक्स सा था-जो तीनों तरफ से बन्द था । रेखा अंदाजा न कर सकी कि कठहरे में क्या है? उसने सोचा यह शायद चलती-फिरती काल कोठरी है और शायद उसे इसी में कैद करके यहां से ले जाया जाएगा।

"लामौस कितने दिन से भूखा है?" बूढे कासगन ने पूछा ।

“तीन दिन से मेरे आका! " हब्शी ने बड़े आदरपूर्ण स्वर में जबाव दिया I

”जरा हमें इसकी शक्ल दिखाओ I "

तब उस हब्शी ने कोडा, लहराकर कठहरे का रुख बदलने का इशारा किया । छ: गुलाल्मों ने फोरन कठहरा घुमाकर उसका रूख बूढे कासगन की तरफ कर दिया ।

उसे देख़कर रेखा के होश उड गये I सलाखों के पीछे एक भूखा शेर कठहरे में बेचैनी से चक्कर लगा रहा था । हब्शी ने अपना क्रोड़ा लहराया तो वह शेर बेअख्तयार दहाड़ा I शेर की दहाड ने रेखा के रहे सहे हवास भी गुम कर दिये।

"इस लडकी. को उठाकर लामौस के कठहरे में डाल दो । " बूढे कासगन ने बडे सख्त लहजे में हुक्म दिया।

हुक्म सुनते ही वह हब्शी आगे बढा I

उसने रेखा की कलाई अपने मजबूत हाथ में थाम ली और उसे बेदर्दी से खींचता हुआ कठहरे की तरफ बढा । इस बीच दो गुलाम कठहरे के ऊपर चढ चुके थे। उन्होंने रेखा को कठहरे में डालने के लिए उसकी छत्त से एक तख्ता खींच लिया ।तख्ता हटते ही लामौस नामक इस शेर ने एक जोरदार दहाड मारी । पूरा कमरा गूज गया । तव उस हब्शी ने रेखा को किसी गुडिया, की तरह अपने हाथों पर उठा लिया और फिर वह रेखा को उछालकर कठहरे के ऊपर खडे गुलामों के हाथो में देने ही वाला था कि रेखा ने एक जोरदार चीख मारी

I I ठहरो I I

बूढे कासगन ने हाथ उठाकर हब्शी को रूकने का इशारा किया । हब्शी रुक गया, लेकिन उसने रेखा को अपने हाथो से नहीं उतारा था ।

"क्यों क्या कहती है?"

"म...म...मै वहां जाने के लिए तैयार हूं। मुझे आमौस के हवाले न करो । " रेखा कापते स्वर में गिडगिडाई ।

"इसे इज्जत के साथ नीचे उतार दो | " बूढे ने हब्शी को हुक्म दिया ।

हब्शी ने बडी एहतियात व बडे आदर के साथ रेखा को नीचे उतार दिया और खुद गर्दन झुकाकर खडा हो गया।

"जाओ लामौस को ले जाओं। " कासगन हब्शी सै सम्बोधित हुआ--"और इसे इसकी पसन्द कीं भरपेट खुराक खिलाओ I"

यह आदेश सुनते ही दोनों गुलाम कठहरे की छत से कूदकर नीचे आ गए और फिर जिस तेजी और फुर्ती से कठहरे को लाए थे, उसी तेजी ब फुर्ती से वापिस ले गए।

कमरे का दरवाजा फिर बन्द कर दिया गया । रेखा कमरे के महल में खडी हाफ रही थी । एक दिल दहला देने वाला अनुभव हुआ था उसे I वह सोच भी नहीं सकती थी कि यह… उम्रदराज ब शालीन सम्भ्रांत सा दिखने वाला शख्स दिल से ऐसा क्रूर ब निमर्म है I इसने एक नाजुक सी लड़की के लिए कैसी बर्वरता पूर्ण मौत की सोची थी ।

रेखा ने सोचा ऐसी वहशत भरी मौत से तो बेहतर त्रिमूर्ति की कहानिया सुनना है। खामोश रहकर जान बचा सकने का एक मौका तो हासिल होगा । हो सकता है कि बीच में न बोलने में सफल रहे। यूं उसकी जान भी बच सकती थी और इस बूढे. से ईनाम भी पा सकती थी।

बूढा कासगन अपनी कुर्सी सै उठा I रेखा को सहारा देकर उसने उसे कुर्सी पर बैठाया। रेखा के होशो हबास अभी तक गुम थे I सुनने की ताकत ही जैसे छिन गई हो ।

रेखा को कुर्सी पर वैठाकर बूढे कासगन ने ताली बजाई । दरवाजा फोरन खुला और दो दासियाँ अंदर आकर सिर नवा कर खडी हो गई ।

"शर्बत लाओ.. . I " कासगन ने हुक्म दिया ।

दासियां उल्ट कदमों वापिस गई । आदेश पालन में ज्यादा देर नहीं लगी । चादीं के थाल मे शीशे का जग था-जिसमें लाल रग का शर्बत भरा हुआ था और शीशे के ही अति नाजुक गिलास भी थाली में रखै हुए थे । जूठे कासगन ने अपने हाथों से शर्बत का गिलास भरकर रेखा को पेश किया।

रेखा का गला सुख रहा था I काटे से पड रहे थे। उसने कासगन से गिलास लिया और फिर एक ही सास' में गट-गट कर सारा शर्बत पी गई । मन-मस्तिष्क को राहत देने वाला यह शर्बत बहुत ही राहत भरा था। इसे पीते ही रेखा के दिल को कराकर आ गया I जब उसने खाली गिलास थाली में रखा तो बूढा कासगन तब तक उसके लिए दुसरा गिलास भर चुका था ।

रेखा अब घूंट घूंट करके इस शर्बत की चुस्की लेने लगी I

गिलास खत्म होने को आया तो कासगन ने तीसरा गिलास भरना चाहा-लेकिन रेखा ने उसे इशारे से मना कर दिया । वह खाली गिलास थाली में रखते हुए बोलो

"'बस , बहुत है । "

"अब तुम अपने कमरे में जाओ-खाओ, पीओ, आराम करो। कल ठीक तीन बजे तुम्हें त्रिमूर्ति कै दरबार में भेज दिया जाएगा I " यह कहकर उसने दो बार ताली बजाई । फोरन ही दरवाजा खुला, दो दासिया अदर आई ।

"पूरे सम्मान के साथ रेखा को इसके शयन-कक्ष में पहुचाओ और इसकी हर जरूरत पूरी करो । " यह आदेश देकर बूढा… कासगन कमरे से निकल गया।

दासियों ने रेखा को उसके बेडरूम मे पहुचाया" I रेखा क्रो अपना वह भारी लिबास काफी परेशान कर रहा था । उसने एक दासी से हल्का-फुल्का लिबास मागा' तो उसे फोरन ही एक 'नाइट सूट' पेश कर दिया गया ।

उस शर्बत ने रेखा के मन मस्तिष्क पर अच्छा असर डाला था। सारा तनाव, सारी चिन्ताएं जाती रही थी I उसकी ख्वाहिश पर उसे खाना पेश किया गया । खाना बहुत स्वादिष्ट था। रेखा ने खूब तृप्त होकर खाया ।। खाने इत्यादि से निवृत हो उसने दासियों को विदा किया व दरवाजा बद करके टहलने लगी ।

वह शेर के मुह' में जाने से तो बच गई थी, लेकिन अब त्रिमूर्ति उसका क्या हश्र करेगा? उसे इसकी चिन्ता सताने लगी थी ।

बूढे. के बेटे रासमौन का चेहरा बार-बार उसकी नजरों के सामने आ रहा था । वह एक्त बहुत ही खूबसूरत नवयुवक था I इतना खूबसूरत कि उसके चेहरे से नजरे हटाना मुश्किल हो जाए। ऐसा खूबसूरत और मासूम-सा नौजवान किसी जादूगरनी कावेरी के जादू के असर में अपने होश गवा' बैठा था। वह दो साल से इसी दयनीय अवस्था में था । अपने बेटे के लिए बूढे कासगन की बेचैनी व चिन्ता स्वाभाविक थी। वह तो अपने बेटे के लिए अपने इस सोने-चादी' के महल को भी कुर्बान कर देने को तैयार था । वह किसी भी तरह अपने बेटे को जादूगरनी कावेरी के जाल से मुक्त कराना चाहता था I

रेखा के दिल में रासमौन के प्रति हमदर्दी उमडने लगी। वह उसके लिए कुछ करना चाहती थी, लेकिन उसके बस में कुछ नहीं था I

पूरे हालात व पूरी कहानी ही बदल गई थी।

रेखा इस मायालोक मै अपने भाई इंद्र को आजाद कराने आई थी। उसका भाई एक प्रेतनी बकाल के जादू में गिरफ्तार था । बकाल ने उसे बन्दी वना रखा था । यह कैसी दुनिया कैसा लोक था कि यहां हर कोई इश्क में फंसकर पागलपन की सीमा को छूने लगता था और वह अपनी 'चाहत' को जबरदस्ती अपना बनाने की कोशिश करता था।

बहरहाल, कुछ भी था । इस हालात से अब रेखा को निपटना ही था।

बूढे कासगन ने बताया था कि सिर्फ दस दिन रह गये थे और अगर दस दिन तक कावेरी के इस जादू का तोड हासिल न किया गया तो रासमौन हमेशा-हमेशा के लिए सारवरी का हो जाएगा ।

"भगवान करे ऐसा न हो।" रेखा के दिल ने बरबस ही दुआ मागी ।

बूढे कासगन की ख्वाहिश पूरी करने का फैसला रेखा ने मौत के खौफ से किया था, लेकिन अब उसके अदर से ख्वाहिश उभर रही थी । उसका जी चाह रहा था कि वह उसके लिए कुछ करे।
 
" आखिर क्यों? क्या सिर्फ अपनी जान बचाने के लिए? " रेखा नहीं जानती थी कि तीन मूर्ति कौन है I कासगन ने बताया था कि वो जादूगरो का बादशाह है और उसके तीन चेहरे है' । इन तीन मुहो से तीन कहानियाँ सुननी थीं। कहानियां सुनना तो एक दिलचस्प अमल है लेकिन यह अजीब कहानियां थीं। कहानिया सुनने वाला कत्ल भी किया जा सकता था।

वह टहल टहलकर थक गई-लेकिन उसकी समझ में कोई हल नहीं आया । अबल तो उसकी समझ में यह बात नहीं आई थी कि आखिर जादूगरों के बादशाह त्रिमूर्ति की कहानियां खामोशी से क्यों नहीँ सुनी जा सकती । कहानियां सुनते हुए बीच में क्या बोलना जरूरी -ज़बकि यह शर्त भी मालूम हो कि बोलते ही जान जाएगी फिर भी लोग बोल उठते हैं। इसका मतलब था कि कहानियो के दौरान वह कोई ऐसी वात्त जरूर कहता है-जिसके जवाब में सुनने वाला बरबस ही बोल पडता है।

आखिर वह ऐसा क्या कहता होगा? टहलते-टहलते व सोचते-सोचते रेखा थक गई तो बिस्तर पर गिर पडी I

रेखा को अपनी मजबूरियों का अहसास होने लगा था । कोई नहीँ जो उसकी मदद करे । फिर सहसा उसे राकल याद आया । इस लगडे प्रेत की कैद में भी वह ऐसै ही हालात का शिकार थी I राकल उसे कैद में डालने के बाद भूल गया था और वह मारे भूख के निढाल हो गई थी I तब उस अर्द्धबेहोशी की स्थिति में उसे बड़े दादा हरिओम का ख्याल आया था । दादा हरिओम ही वह पहचे हुये शख्स थे जिन्होने-मरने से पहले उसके नाम एक खत छोडा था और इन हौलनाक्र घटनाओ का सिलसिला उस पत्र के साथ ही शुरू हुआ था ।

लगडे प्रेत्त की कैद में रेखा को दादा हरिओम के आने का अहसास हुआ था और फिर उस कैदखाने के रोशनदान से एक गिलहरी ने एक सेब उसके ऊपर गिराया था । वह सेब ऐसा ताजा, मीठा व पौष्टिक था कि उसको खाने के बाद ही रेखा मौत के मुह में जाने से बच गई थी ।

हां-बह दादा हरिओम ही थे जिन्होंने उसे मौत का ग्रास बनने से बचा लिया था ।

अब एक बार फिर रेखा मौत के दहाने पर आ गई थी I काश । दादा हरिओम उसकी मदद को आ जाएं । उसके दिल की गहराइयों से यह ख्वाहिश उभरी थी ।

रेखा यही सब और यूं ही सोचते-सोचते सो गई ।तब वह अनहोनी घटी।

दादा हरिओम ख्वाब में आ गए थे । उनके चेहरे पर निचिन्ततापूर्ण मुस्कग्न थी। उनका मुस्कराना नूरानी चेहरा देखकर रेखा को बड़ा सकून सा महसूस हुआ । उसने आगे ख्वाब मे दादा हरिओम के दौनों हाथ पकड़ लिए और वह अनुनय भरे स्वर में बोली

"दादा मै बडी मुश्किल में हूं। "

"क्या मुश्किल, बेटा मुझे बताओ?" दादा हरिओम ने अपना एक हाथ छुडाकर, उसके सिर पर फेरा ।

"आप तो सब जानते है I. मैं क्या कहूं? कोई ऐसा अमल बता दीजिये कि मैं त्रिमूर्ति की कहानियां बिना मुह खोले-खामौशी से सुन सकूं ।

"'हर कहानी सुनाने वाला यही चाहता है कि उसकी कहानी के दौरान कोई न बोले । अगर त्रिमूर्ति भी यही ख्वाहिश रखता है तो रेखा बेटी,चाहिये कि उसकी कहानी खामोशी से सुन लो । "

"दादा मै तो खामोशी से सुन लूगी'! मै क्यों बीच में बौलुगी, लेकिन पहले जो दस 'आदम जात' इन्सान उसकी कहानी और यह जानते हुए भी कि बोलने कीं सजा मौत है वे बिना बोले नहीं रह सके और मौत के घाट उतर गये । तो दादा, मैं बोले बिना कैसे रह सकूंगी । "

"तुम क्या चाहती हो?”

"उसकी कहानियां खामोशी सै सुनना चाहती हूं।"

"फिर तो एक ही तरकीब है । "

"वह क्या? "रेखा ने पूछा ।

”तुम गूंगी हो जाओ । " दादा हरिओम ने मुस्कराते हुए कहा।

" गूंगी बन जाऊं?"

"गूगी बनने का क्या फायदा होगा?"

" मै गुगी बनने को नहीं गूगी होने को कह रहा हूं।"

"वह किस तरह दादा? "

”मैं तुम्हें एक अमल बताऊंगा' । जब तुम इस 'शब्द' को दौहराओगी तो, तुम्हारे बोलने की शक्ति समाप्त हो जाएगी। वो तीन चेहरों वाला शैतान तुम्हें कितना ही बोलने पर उकसावे और तुम बोलना भी चाहो तो बोल नहीं पाओगी। कोई अगर तुम्हारी गर्दन पर छुरी भी रख दे और कहे कि बोलो वर्ना कत्ल किये देता हू तो उस वक्त भी तुम्हारी जुबान नहीं खुलेगी । "

"वाह दादा जी । यह हुई ना बात ।" उछल ही तो पडी थी--"आप अब मुझे जल्दी सै वह 'अमल' बता दीजिये। "

"ठीक है-अब तुम मेरी बात पूरे ध्यान के साथ सुनो और समझ लो।" और फिर पुण्यात्मा दादा हरिओम ने रेखा को जो कुछ भी समझाया, वह रेखा ने अच्छी तरह समझ लिया।

इसके तुरन्त बाद ही अचानक रेखा कीं आख खुल गई। दादा हरिओम के आगमन का अहसास अभी भी उसके दिमाग में ताजा था । यही महसूस हो रहा था जैसे दादा हरिओम अभी अभी उसके पास से उठकर गये हॉ। जाने यह मुलाकात ख्वाब में हुई थी या होशो-हवास में जागते हुए । बहरहाल, जैसै भी हुई थी हो गई थी। दादा हरिओम एक बार फिर कठिन घडी. में उसकी मदद को आ गए थे-और क्या शानदार तरकीब बता गए थे।

अब रेखा को अपनी सफलता का पूर्ण विश्वास हो गया था। अब उसे किसी प्रकार की चिन्ता नहीं रही थी। वह बडे सुकूंन से सो गई ।

और देर तक सोती रही ।

और फिर ।

सूरज चढ, आने पर पदक दासी ने गुलाब की कली का स्पर्श रेखा के दमकते गाल पर करके उसे उठाया। कली की खुशबू गाल पर नर्म कोमल स्पर्श के अहसास ने उसकी बद आखों को खोल दिया ।आख़ खुली तो उसने एक सुन्दर दासी को अपने ऊपर झुके हुए पाया I रेखा उसे देखकर मुस्कराई I दासी ने जबाब में मुस्करा कर वह गुलाब की कली उसके हाथ में दे दी । रेखा ने कली को सूघा बडी ही मस्त कर देने बाली खुशबू थी । वह उठने लगी तो दासी उसे सहारा देने के लिए आगे बढी ।

रेखा मुस्कराते हुए बौली--"शुक्रिया इसकी जरूरत नहीं है I "

" जरूरत है । " दासी बडी शाइस्तगी के साथ बोली "आप हमे अपनी किसी सेवा से ना रोकें । "

" अच्छा ठीक है । अगर तुम्हारी खुशी इसी में है तो ऐसा ही सही । " कहते हुए रेखा ने अपना एक हाथ उसकी तरफ बढा, दिया । दासी ने उसका हाथ बडी कोमलता से थामकर उसे बड़े प्यार सै उठाया। रेखा बिस्तर पर उठकर बैठ गई तो दासी बोली "अब आप नहा धो लें । तब तक नाश्ता तेयार हो जाएगा। आपको याद होगा कि आज दोपहर तीन बजे आपको त्रिमूर्ति के दरबार में हाजिर होना है । "

"जानती हूं। " रेखा ने खुशगवार लहजे में कहा I

"जानती हैं तो फिर फोरन तशरीफ ले चलें । हमारे पास वक्त ज्यादा नहीं है। "

"ठीक है, चलो । " रेखा उठकर खडी हो गई ।

रेखा जब हमाम में उतरी तो उसके साथ ही दो दासिया भी अदर आ गई और उन्होंने रेखा को निर्वस्त्र करने के लिए अपने हाथ बढाये ।

"नहीं । " रेखा ने पीछे हटते सख्ती सै कहा । दोनों दासियां सहमकर पीछे हट गई।

"तुम दोनों जाओ में अभी नहाकर आती हूं। "

"लेकिन । " एक दासी ने कुछ कहना चाहा।

"लेकिन बेकिन कुछ नहीं । " रेखा उसकी बात काटते बोली-“मै तुम लोगों की मौजूदगी किसी तोर भी बर्दाश्त नहीं पाऊगी।" .

दासियाँ हमाम सै बाहर निक्ल गई और रेखा ने दरवाजा अदर' से बद कर लिया ।

रेखा नहाने के बाद जब आइने के सामने खडी अपने बाल सुखा रही थी तो एकाएक ही बूढे कासगन के बेटे रासमोन का खयाल-जेसे उसके रेशमी बालों में चमकते मोती की तरह आ अटका । रेखा अपने रेशमी खूबसूरत बालों को झटकते-झटकत्ते रूक गई I वह हालाकि सामने आइने मे अपना चेहरा देख रही थी, लेकिन उसकी कल्पना में कुछ और था-बह तो जेसे खुली आखों से कुछ और ही देख रही थी ।

हां-इस वक्त रासमोन ही था जो उसकी नजरों में समाया हुआ था । उसका कामदेव सा चित्ताकर्षक चेहरा जैसै उसके दिल में उतरा जा रहा था । वह बेखुद सी हो अपने आपको ही भूली जा रही थी ।

फिर जैसै उसे होश आ गया । उसने घबराकर इधर-उधर देखा। यह यह उसे क्या हो गया था? यह कैसा अहसास था? यह केसी सोच थी? वह कमरे में अकेली थी । यह देख उसे इत्मीनान हुआ। उसने अपनी घबराहट पर काबू पाया और जल्दी-ज़ल्दी अपने बाल झटककर बाहर निकल आई ।

कमरे में वे दोनों दासिया उसकी बैचेनी सै प्रतीक्षक थी । रेखा ने खुद क्रो उन दोनों के हवाले कर दिया । उन दोनों ने रेखा को एक वेहद खुबसूरत लिबास पहनाया, उसे सजाया सवारा और जब वह तैयार हो गई और उसने नाश्ता इत्यादि भी कर लिया तो कासगन को सूचित किया गया ।

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सूचना मिलते ही, कासगन उसे अपने कमरे मॅ तलब करने की बजाय स्वयं उसके कमरे में आ गया । रेखा एक ऊची कूर्सी पर बडी शान सै बैठी थी । उसका चेहरा खिला हुआ था । कासगन को देखकर उसने उठना चाहा लैकिन कासगन ने उसे इशारे से उठने सै रोक दिया-ओर फिर खुद आगे बढ़, उसके सामने आ, उसके सम्मान में झुका और फिर बोला....

"रेखा, मुझें माफ कर देना। "

"किस बात की माफी?" रेखा उलझ-सी गईं..."मैं कुछ समझी नहीं I "

"मैने कल तुम्हे लामौस के कठह्ररे में गिराना चाहा था । मैं अपनी इस ह्ररकत पर वेहद शर्मिंन्दा हूं। तुम नहीं जानती हो कि तुम मेरे लिए क्या हो? तुम एक ऐसी आशा की किरण हो जिसके बाद अंधेरा ही-अंधेरा है । तुम्हारे इंकार ने मुझे पागल कर दिया था । मैं अपने इस पागलपन के लिए तुमसे क्षमा चाहता हूं। " कासगन ने अनुरोध भरे लहजे में कहा I

"हां-आपके इस हुक्म ने मुझे दहला दिया था, लेकिन मैं आपके जज्वात को समझ सकती हू । आप एक बाप हैं। मेरे इंकार' पर आपको गुस्सा आना स्वाभाविक था। आपको इस पर शर्मिन्दा होने की जरूरत नहीं I" रेखा ने खुले दिल सै उसे माफ कर दिया ।

"तुम कितनी महान हो रेखा?"

"मैं बहुत छोटी सी चीज हूं। बहरहाल मैंने तय कर लिया है कि त्रिमूर्ति के दरबार में जाऊगी'। उसकी कहानियां सुनूंगी। मुझे यकीन है कि में वापिस आऊंगी , फिर आपके लिए खुशिया-ही खुशियां होंगीं । "

" 'आकाशवाला तुम्हें कामयाब करे।" कासगन ने 'भाव-विह्ल स्वर में कहा-- "तुम वापिस आओगी और आकाशवाले क्री मेहरबानी सै तुम जरूर वापिस आओगी तो मैं तुमसे वायदा करता हू'कि तुम जो मागोगी वह मैं तुम्हे दुगा । "

"मुझें कुछ नहीँ चाहिये। आपका बेटा उस जादुगानी के जादु से आजाद हा जाए। मैं आप दोनों को गले मिलते हुए देख लूं। बस, यही मेरा इनाम हैं। "

"आकाशबाला' तुम्हें सदा खुश रखै। तुम वाकई महान हो । "

"वस आप बडा बनाकर मुझे मेरी नजरों में छोटा न करें । " रेखा ने मुस्काते हुए कहा "यह बताएं त्रिमूर्ति के दरबार में कब जाना है । "

"इत्तजाम हो रहे हैँ जाने के। मैं भी तुम्हारे साथ चलूगा' I " कासगन ने कहा ।

और फिर ।

जाने के इतजाम' पूरे होते ही कासगन को सुचना दी गई । तब वह रेखा के साथ अपने महल से बाहर निकला । रेखा ने अपने सामने एक खूबसूरत बग्गी को पाया-जिसमें दो खूबसूरत घोडे जुडे हुए थे।

कासगन ने सहारा देकर उसे बग्गी में बैठाया और फिर खुद भी उसके साथ बैठा गया । बग्गी के पीछे सशस्त्र घुडसवारो' का एक दस्ता था । यह छोटा सा काफिला त्रिमूर्ति के इलाके की तरफ चल पडा. । फासला तय करने के बाद जब बग्गी रूकी और रेखा, कासगन के साथ बग्गी से नीचे उतरी तो उसने देखा कि सामने एक गगनचुम्बी ऊँची पहाडी है I इस पहाड़ी की चोटी पर कोई मन्दिर जैसा भवन बना हुआ था और वहां तक जाने के लिए पहाडी को ही तराशकर सीढिया बनाई गई थीं ।

"ऊपर जाना है । " कासगन ने ऊपर देखते हुए कहा।

”चलियै। " रेखा आगे बढी।

वे दोनों सीढिया चढने लगे। सशस्त्र घुडसबारो का दस्ता बग्गी के पास ही रह गया था । सीढिया बहुत ज्यादा थीं I बहां पहुचने में बहुत वक्त लगा । शीढिया चढत्ते_चढते रेखा की सास फूल गयी, लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि उम्र दराज होने के बावजूद कासगन पूर्ववत्: ही सयत व सामान्य था ।

ऊमर पहुंचकर रेखा अन्तिम सीढी पर बैठ गई और लम्बे लम्बे सास लेने लगी।

"क्या हुआ?" कासगन ने चिन्तित्त स्वर में पूछा।

"थक गई। " रेखा ने गहरे सास' लेते हुए कहा-- "और अन्दर जाने से पहले चाहती हूं कि अपनी सास ठीक कर लूं।"

"ठीक है, तुम यहा बैठो । अदर जाकर अपने आने की सुचना देता हू। " यह कहते हुए कासगन दरवाजे की तरफ बढ गया । रेखा निचे देखने लगी l उसे नीचे शाही बग्गी और घुडसबार नजर आ रहे थे, लेकिन बहुत छोटे छोटे। इस वक्त बह बहुत ऊचाई पर थी I फिर उसने मंदिरनुमा भवन पर नजर डाली। भवन बडे. बड़े सुर्ख पत्थरों से बना हुआ था और किसी किले की भाति मजबूत नजर आ रहा था । भवन ऊचा था, लेकिन प्रवेश द्वारा काफी छोटा था।

कासगन ने दरवाजे के निकट जाकर उसके लगे बड़े से कुडे को दरवाजे पर तीन बार मारा। टन...टन...की आबाज हुई । फिर तत्काल ही दरवाजा खुल गया । अंदर से तलबारधारी व्यक्ति बाहर निकला । उसने कासगन को ऊपर से नीचे तक बडे गौर से देखा | फिर उसकी निगाह रेखा पर पडी । उसने दोबारा कासगन की तरफ देखा व धीमे स्वर मे पूछा ।।

"कौन हो?"

"मैं कासगन हूं। तीन मूर्ती को मेरा पैगाम दो । मैं आ गया हू। एक लडकी. साथ लाया हूं।"

"लडकी, वो है जो सामने बैठी है? पर वह वहा क्यों बैठी है?" तलवारधारी ने पूछा।

"इसान की बच्ची है, थक गई है I ' कासगन ने जवाब दिया ।

"अच्छा-अच्छा मै समझ गया। मैं अभी जाकर त्रिमूर्ति को बताता हूं।" तलबारधारी पलटकर अदर चला गया ।

जब तक वह वापिस आया तब तक रेख सयत्त सामान्य हो चुकीं थी। वह उठकर कासगन के पास पहुच गई। तलवारधारी फिर प्रक्ट हुआ बोला ।।

" आओ, मेरे साथ । त्रिमूर्ति प्रतीक्षक्त है, तुम दौनों का । "

वे दोनों दरवाजे में प्रविष्ट हुये तो उस तलबारधाऱी व्यक्ति ने पलटकर दरवाजा बंद कर दिया ओर तलवार सम्भाले बाईं तरफ बढ गया ।घने वृक्षों के बीच एक छोटी सी पगडण्डी भीत्तर तक गई हुई थी। यह रास्ता इतना तग था कि इस पर एक व्यक्ति ही चल सकता था। सो पहले तलवारधारी आगे बढा, फिर रेखा और उसके पीछे कासगन । पेड़ इतने घने थे कि थोडा सा आगे जाते ही अंघेरा गहराने लगा I फिर एक वक्त वह आया कि पूर्ण अंधकार छा गया। रेखा को चलने में कठिनाई आ रही थी। वह अब अन्धों की तरह अपने दोनो हाथ आगे को फैलाकर आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़ रही थी। तलबारधारी आगे जा चुका था। रेखा को रास्ता टटोलते देखकर रूक गया ।

"नाक की सीध में चली आओ। " वह वहीं खड़ा खड़ा बोला "रास्ता बिल्कुल साफ है । ”

"लेकिन मुझें कुछ नजर नहीं आ रहा है।”

तब कासगन उसके आगे आ गया और उसने रेखा का हाथ पक्तड़ लिया और बोला "अब तुम मेरे पीछे आराम से चली आओ।"

"क्या आपको रास्ता नजर आ रहा है?" रेखा ने पूछा I

"हां-क्यों नहीं । " कासगन ने सहज में जवाब दिया I

जो रास्ता घने पेडों से शुरू हुआ था. वह अब एक सुरग में बदल गया था। कुछु देर चलने के बाद रेखा को उजाला महसूस हुआ । तब उसे पता चला कि वह घने पेडों की बजाय किसी सुरग' में चल रही है।

सुरग खत्म हुई तो एक बडा-सा कमरा नजर आया । यह कमरा चारो तरफ सै बद' था। कोई खिडकी-क्रोई दरवाजा न था l अलबत्ता काफी ऊँचाई पर तीन तरफ बड़े-बड़े रोशनदान थे । रोशनी इन्हीं रोशनदानों में सै कमरे में आ रही थी । कमरा बिल्कुल खाली था l फर्श सुर्ख ईंटों का था और बीच में एक वर्गाकार जगह छोड दी गई थी जिसमें घास उगी

हुई थी ।

"बैठ जाओ । " तलवारधारी ने घास की तरफ इशारा किया और खुद तेजी सै पलटकर सुरग में दाखिल हो गया ।

रेखा और कासगन घास पर बैठ गये । घास बहुत घनी थी । वे खामोश बैठे रहे I

" हां , कासगन, बोलो! कैसे आना हुआ?" एक भारी आबाज कमरे में गूंजी I

रेखा ने चोंककर चारों तरफ देखा रोशनदान पर भी नजर डाली-मगर उसे कोई नजर नहीं आया।
 
"त्रिमूर्ति तू तो जानता है कि मेरे बेटे रासमोन पर जादूगरनी कावेरी ने जादू कर रखा है । उसके इस जादू का तोड, सिर्फ तेरे पास है । उस तोड़ को हासिल करने के लिए मैं अब तक दस ’इन्सान' तेरे दरबार में हाजिर कर चुका हूं। "

"और अब तू ग्यारहवां खिलाडी लाया है और वह भी एक लडकी…।" कहकहे के साथ कहा गया ।

"दस 'मानव' तेरी भेंट चढ चुके हैँ-अब तू मुझ पर मेहरबानी कर ।"

“मेरे पास मेहरबानी नाम की कोई चीज नहीं । " त्रिमूर्ति ने फिर एक भयानक कहकहा लगाया और बौला--"अगर यह लडकी… मेरी कहानी सुन लेगी और बीच में नहीं बोली तो मैं उस जादू का तोड़ कर दूगा । दूसरी सूरत में तू जानता है, क्या होगा? "

"त्रिमूर्ति ऐसा न कहो? यह मेरी आखिरी उम्मीद है। अगर यह तेरी शर्तो पर पूरी न उत्तरी तो मेरा बेटा हमेशा के लिए मेरे हाथों सै निकल जाएगा , तू यह बात अच्छी तरह जानता है और तू यह बात भी अच्छी तरह जानता है कि रासमोन मेरा इकलौता बेटा है। "

"इकलौता बेटा है तो फिर मैं क्या करूं?? क्या मैने उससे कहा था कि तू कावेरी के इलाके में चला जा-और सारवऱी को अपना दीवाना बना ले । तूने उसे वहा जाने से क्यो नहीँ रोका? " त्रिमूर्ति के लहजे में सख्ती भर आई थी ।

"त्रिमूर्ति मैंने नहीं रोका? । मैंने तो उसे हमेशा उधर न जाने की हिदायत की. लेकिन होनी को कौन टाल सकता है रासमौन भटक गया और कावेरी के इलाके में जा निकला । उससे गलती हो गईं-तू माफ कर दे।"

"ठीक है अब तू जा । मेरा कहानी सुनाने का वक्त हौ चुका है I तू इस 'मानव पुत्री' को यहा छोड़ जा और पहाडी के कदमों में इस लडकी. की लाश का इतजार कर । जब दस 'इसान' मेरी कहानी न सुन सके और बीच में बोल पडे तो यह्र बेचारी मेरी कहानी क्या सुन पायगी? पहली कहानी में ही चल बसेगी। " त्रिमूर्ति ने फिर कहकहा लगाया। किसी की मौत की कल्पना ही उससे कहकहे लगवा रही थी ।

“अच्छा रेखा! में चलता हूं। मैं तुम्हारी कामयाबी के लिए दुआ मागता हू।" कासगन ने खडे होते हुए कहा ।

"आप बेफिक्र होकर जाएं । मैं जानती हू त्रिमूर्ति मुझे खौफजदा कर रहा है, लेकिन मैं डरने वाली नहीं हूं। भगवान मालिक है, जो होगा देखा जाएगा! " रेखा ने शात सयत लहजे में कहा--"प्रभु ने चाहा तो जीत हमारी होगी। "

"ऐसा ही होगा। मैं पहाडी… के नीचे तेरा इंतजार करूगा । "

"इसकी नहीं कासगन इसकी लाश का इतजार करना । जाओ, अब जल्दी से यहा से निकल जाओं ।"

कासगन ने कोई जवाब न दिया । वह गर्दन झुकाए सुरग में प्रवेश कर गया । रेखा ने उसे हाथ हिलाकर अलविदा कहा । उसने भी जवाब में हाथ हिलाया और फिर वह अंधेरे में गुम हो गया ।

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रेखा अब इस खाली कमरे मे अकेली थी I

वह घास के कालीन पर बैठी त्रिमूर्ति का इतजार करने लंगी । आने वाले वक्त से वह अनजान थी और नहीँ जानती थी कि हालात अब क्या करवट लेगे'? कासगन ने त्रिमूर्ति के बारे में जो कुछ बताया था, उसके अनुसार वह तीन मुह वाला अनूठा इंसान था । वह खुद सामने आएगा या महज उसकी आवाज सुनाईं देगी? अभी तक तो सिर्फ उसकी आबाज ही सुनाई दी थी ।रेखा को इस अजीबो गरीब कमरे में बैठे खौफ सा आ रहा था ।

अन्देशे उसे हलकान कर रहे थे । पता नहीं क्या होने वाला था? जाने वह त्रिमूर्ति की कहानियां सून पाएगी या नहीं? अगर न सुन पाई और बीच में बोल उठी, तो फिर तो उसकी लाश ही यहा से जाएगी । अगर वह मर गई तो उसकी जिन्दगी का मिशन ही अधूरा रह जाएगा ।

वह अपने में इद्गजीत को मुक्त करने को ही इस अज्ञात प्रेत्त लोक में पहुची थी। उसने अपने भाई को पा भी लिया था, पर फिर हालात ने ऐसा पलटा खाया कि वह दूर हो गई । वह निराश नहीं थी । उसे यकीन था कि वह अपने भाइ को जीवित व सकुशल ही अपनी दुनिया मैं ले जाऐगी।

लेकिन अगर वह मर गई तो फिर क्या होगा?

कोई उसकी मौत्त के बारे मे जान भी नहीँ सकेगा वह सोचने लगी उससे गलती हो गई । उसे चाहिये था वह कासगन से वायदा ले लेती कि उसकी मौत की सूरत में उसकी लाश को उसकी दुनिया में पहुचा दिया जाए।

वह सम्भली । आखिर वह ऐसी निराशाजनक बातें क्यों सोच रही है? वह यहा मरने नहीं मैदान मारने आई है I वह सशस्त्र होकर आई है । हरिओम दादा ने उसे इल्म का जो ब्रह्मास्त्र बताया है उसके रहते भला कौन उसे शिकस्त दे सकता है?

"क्या सोच रही हो लडकी?" सहसा आवाज आई।

"कुछ नहीं। तेरी प्रतीक्षक हूं! " रेखा ने बडे इत्मीनान से जवाब दिया ।

"क्या नाम है तेरा?"

"मेरा नाम रेखा है। राह बता मुझे और क्तिना इतजार करना पडेगा_?"

"बस, इतजार खत्म हुआ । मेरा वक्त शुरू हो गया है । सामने दीवार की तरफ देख । "

रेखा ने सामने वाली दीवार पर अपनी नजरें गड़ा दीं । उसके देखते ही दीवार में रिक्कता पैदा होनी शुरू हो गई। एक दरवाजा सा बन गया तो दाए' बाएं सरकते दोनों हिसै ठहर गये।

सामने बिल्कुल अंधेरा था । दीवार विभक्त हो जाने से थोडी. सी रोशनी अदर' आईं-लेकिन उसे नजर अब भी कुछ नहीं आया था ।

कुछ देर बाद एक काले रग' का तख्त सा दुसरी तरफ सै अन्दर आता महसूस हुआ-जो फिसला आरहा था। इस तख्त पर तीन सिर रखे हुए थै जो आपस में जुडे हुए थे। वह तख्त पैदा हुई रिक्तता के मध्य आकर रुक गया।

अब रेखा के सामने ताम्बे जेसे रग का एक चेहरा था और इस चेहरे में दाए'-बाएं दो और चेहरे जुडे हुए थेI उसकी आखें बडी बडी और चमकदार थीं। वह बार-बार पलके झपका रहा था। उसकी आखों से ही पता चलता था कि बौ जीवित है, वर्ना वह किसी बुत की तरह रहता।

एक बिचित्र अनूठी हस्ती रेखा के सामने थी। उसे देखकर ही खौफ आता था। रेखा की समझ में नहीं आ रहा था कि वो बोलेगा कैसे? उसकी कटी हुई आधी गर्दन तख्ते पर रखी हुई थी । सिर्फ चेहरा था और बस कुछ नहीँ-वह भी भयावाह व तीन मुह बाला ।

"हां-रेखा। फिर तू तैयार है। " चेहरे के होंठ अचानक हिले । आवाज निकली।

" हां त्रिमूर्ति : मैं पूरी तरह से तेयार हूं। " रेखा ने पूर्ण विश्वास के साथ कहा।

"देख लडकी । अब भी वक्त है । वापिस लोट जा l तू इतनी सुन्दर है कि मेरा जी नहीं चाहता कि तू मारी जाए। तू उस बूढे. कासगन के हाथ कहां से लग गई?"

"तू यह्र सब छोड़ कि मै कौन हू और कहां से आई हूं? तू मुझ पर मेहरबान होने की कोशिश न कर I तेरा खुद का कहना है कि मेहरबानी नाम की चीज तेरे पास नहीं है । चल अब अपनी कहानी शुरू कर। " रेखा दो टूक अदाज में बोली ।

"ठीके है, तू अगर मरना ही चाहती है तो मेरी बला से । मैं पहली कहानी शुरू करने से पहले तुझे एक वार फिर सचेत कर देना चाहता हूं। " इतना कहकर वह कुछ क्षण के लिए रूका I

इत्तनी देर में रेखा ने दादा हरिओम का दिया अमल मन ही मन दोहरा लिया ।

"देख, मेरी कहानी बडे ध्यान के साथ और जब तक मैं यह न कह दूं कि 'कहानी खत्म हुई' बीच मे मत बोलना । अगर बीच में बोली तो यह तेरी हार होगी और तुझे मौत के घाट उतार दिया जाएगा। ठीक है। "

रेखा ने मुडी हिला हामी भरी! बोली कुछ नहीँ I

"अब मैं कहानी शुरू करता हूं। किसी देश में एक मल्लिका थी । बहुत खूबसुरत । उसे कहानी सुनाने का बहुत शोक था । वह हर रात्त एक कहानी सुनाती थी । उसकी कहानी सुनने को हर रात एक नौजवान क्रो लाया जाता था । कहानी सुनाते हुये उस मल्लिका की शर्त भी यही होती थी, कि कहानी खामोशी से सुननी होगी-अगर बीच में बोले तो मौत के घाट उतार दिये जाओगे। इस तरह हर रोज एक खूबसूरत नौजवान कत्ल कर दिया जाता था । रेखा, तू जनती है क्यो?"

त्रिमूर्ति ने अचानक सवाल किया ।

"मुझें नहीं मालूम । " रेखा के होंठ बेअख्तयार हिले।

उसके होंठ जरूर हिले, लेकिन कोई आवाज न निकली थी । अगर होंठों कीं हरकत के अनुसार आवाज भी निकल जाती तो बाजी आरम्भ में ही उल्ट गई थी I वह शर्त हार जाती और उसे फौरन मौत्त की नीद सुला दिया जाता । भला हो, पहुची हुई हस्ती, दादा हरिओम का कि उसने इस मुकाबले के लिए रेखा को तैयार करके भेजा था। उनके अमल ने ही रेखा को बचा लिया था।

रेखा की बोलने की ताकत खत्म हो चुकी थी । वह देख सकती थी सुन सकती थी लेकिन बोल नहीं सकती थी । रेखा को अब अदाजा हुआ कि त्रिमूर्ति किस तरह सहसा धोखा देकर सुनने वाले को बेअख्तयार ही बोलने पर मजबूर कर देता है ।

धूर्त त्रिमूर्ति का यह पहला वार था जिससे रेखा बच गई थी। जवाब न पाकर त्रिमूर्ति ने फिर कहना आरम्भ किया

"हा', तू भला कहां जानती होगी । हर रोज एक नौजवान इसलिए कत्ल कर दिया जात्ता था कि बो मल्लिका की कहानी के दौरान ही बोल उठता था। मल्लिका के शयन-कक्ष में जाने वाले किसी नौजवान को यह अन्दाजा नहीं हो पाता था कि वह किस किस्म की कहानी सुनाती है और जिस काम को वो आसान समझकर मल्लिका के सामने पेश हो जात्ता हे वह काम इस कद्र जानलेवा कैसे हो सकता है? वह मल्लिका असल में जादूगरनी थी I उसने अपने महल में कई शेर पाल रखे थे जो यूं ही आजाद घूमते-फिरते थे । कहानी सुनाने के दौरान भी कोई न कोई शेर उसके शयन-कक्ष में घुस आता था और वो मल्लिका के सामने किसी अजनबी नौजवान को देखकर बिगड़ उठता। बो उस नौजवान पर हमलावर हो जाता। मल्लिका एक तरफ डाटकर अपने शेर को रोकने की कोशिश करती और दूसरी तरफ उस नौजवान से क्तती कि फोरन इस शेर से माफी माग लो कि आईंदा तुम इधर नहीं आओगे, वर्ना यह तुम्हें चीर फाडकर रख देगा और ऐसे में वह नौजवान एकदम घबराकर कहता कि "मुझे माफ कर दो, मैं आईंदा इधर नहीं आऊगा । "

त्रिमूर्ति की कहानी जारी थी कि शेर की चर्चा के साथ ही एक शेर त्रिमूर्ति के पीछे सै अचानक नमूदार हुआ। शेर बिफरा हुआ था । रेखा सहम गई । त्रिमूर्ति ने उस शेर को डाटते हुए-अचानक्त ही रेखा से कहा--

"रेखा,जल्दी से कह दो कि तु आईंदा इधर नहीँ आओगी वर्ना, यह तुम्हें चीर फाडकर, रख देगा I "
 
"रेखा एकदम घबरा गई । अगर वह गूगी न बनी, होती तो उसने बोल उठना था । यह सूरते-हाल ही कुछ ऐसी पैदा हो गई थी कि उसने शेर के हमले से बचने की कोशिश भी की थी पर वह बोल न सकी थी ।

होंठ .....पहले की तरह बस बेआबाज हिल कर रह गए थै और फिर । मारे खौफ के रेखा ने आखै मूंद ली थीं । वह क्षण दूर न था जब शेर ने उसे झझोड…. कर रख देना था, पर ऐसा हुआ नहीँ । शेर के गुरनिं की आवाज भी नहीं आई I त्रिमूर्ति भी खामोश था । रेखा जेसे आखें बद किए बैठी थी वेसे ही सहमी हुईं बैठी रही ।ओर फिर आखिर उसने डरते डरते आखें खोली I शेर न जाने कहा गायब हो गया था और त्रिमूर्ति आखें फाडे उसे बडी हेरत से देख रहा था ।

त्रिमूर्ति की हैरत स्वाभाविक थी । उसकी यह चाल बडी खतरनाक थी I इस फरेब से बचना किसी के बस का नहीं था I त्रिमूर्ति ने कहानी और कहानी का जाल कुछ इस तरह से बनाया था और भूत व बर्तमान क्रो इस तरह मिलाया था कि कहानी के दौरान खामोश बैठना नामुमकिन था I

जाहिर था रेखा खामोश थी तो दादा हरिओम के बताये अमल के सदके। उसकी भी तो सिर्फ आवाज नहीं निकलती थी...सुनाई नहीं देती थी ।

त्रिमूर्ति जादूगरों का बादशाह था । उसके लिए दिखावटी शेर के दिगरे पर दिखाना कोई कठिन काम न था । अप्रत्याशित रूप से ऐसे में कहानी सुनने वाले के होश एकदम उड जाते थे । शेर जैसै खुखार जानवर के सम्भावित हमले से बचने को बोल उठना स्वाभाविक था, पर उसका यह मायाजाल भी बेकार साबित हुआ। रेखा की नजरे त्रिमूर्ति के चेहरे पर थीं और अब वह खुद को सम्भालकर यही सोच रही थी कि देखें त्रिमूर्ति अब क्या चमत्कार दिखाता है? केसा फरेब देता है? अपनी कहानी को किन शब्दों के साथ और कौन सा मोड देकर आगे बढाता हैँ।

रेखा ने देखा त्रिमूर्ति के चेहरे से हैरत गायब हो गई और उसकी जगह अब निराशा ब हताशा के भावों ने ले ली थी। फिर कुछ ही क्षणों में त्रिमूर्ति के चेहरे के ये भाव भी जाते रहै । उसका चेहरा बेजान हौ गया । उसकी आखें भी पत्थरा गई ।

फिर सहसा ही और धीरे धीरे त्रिमूर्ति का चेहरा बाई तरफ घूम गया । अब रेखा के सामने त्रिमूर्ति का दूसरा चेहरा था । सामने आते ही इस चेहरे में सजीवता दिखाईं दी ।

"रेखा तू बडी खुशकिस्मत है कि तूने मेरी पहली कहानी, बीच में बोले बिना ही सुन ली । अब मैं दुसरी कहानी शुरू करता हू सुन I " त्रिमूर्ति अब अपने इस दूसरे मुह से बोला था ।

रेखा ने होंठ खोले बिना उसे दूसरी कहानी शुरू करने का इशारा किया।

दुसरी कहानी भी कुछ इसी किस्म की थी । उसकी कहानी में जगह जगह फंदे थे I खाइयां ओर खन्दर्के थी चमत्कार फरेब भरे नजारे थे, लैकिन रेखा वह सब मुह सीले सुनती रही I वह कुछ न बोली, केसे बोलती? दादा हरिओम का आशीर्वाद अपना काम कर रहा था?

दुसरी कहानी भी नाकाम रही । दूसरा. चेहरा पत्थरा गया । अब त्रिमूर्ति का तीसरा चेहरा सामने आया । यह चेहरा तीसरी कहानी के नाम पर तीसरा फरेब लाया। उसने तरह तरह के हथकण्डे इस्तेमाल किए। रेखा की खामोशी तोडने_ को जिज्ञासा और उकसानै वाले सवालों की बौछार कीं, लेकिन रेखा गूगी बनी बैठी रही । कभी बोली भी तौ आवाज न निकली । वह पूरे इत्मीनान के साथ कहानी के नाम पर उसकी बकवास सुनती रही । फिर त्रिमूर्ति ने तीसरी कहानी की समाप्ति का ऐलान कर दिया । इस घोपणा के साथ ही रेखा का चेहरा खिल उठा । त्रिमूर्ति का मुर्झाँया चेहरा देखने वाला था । फिर उसने धीरे से घोषणा की… "मै हारा, तू जीती। "

रेखा झूम उठी । उसने जल्दी जल्दी से मन-ही-मन में आवाज वापिस लाने का 'अमल' पढा और उसने जैसे ही अन्तिम वार वह 'मत्र' दोहराया जो दादा हरिओम ने उसे बताया था तो उसकी बोलने की शक्ति लोट आई ।।

"त्रिमूर्ति अब तू क्या कहता है? " उसने सजीदा स्वर में पूछा था।

"तू बहुत बडी जादूगरनी हे मुझसे भी बडी, । मैंने आज तक मात नहीं खाई है, लेकिन तूने ऐसा कर दिखाया । " त्रिमूर्ति ने परास्त ब उदास लहजे मे जवाब दिया ।

"भगवान के लिए जादूगरनी कहकर मेरा अपमान न कर। " रेखा बदस्तूर सजीदागी से बोली-- "अब वह बात कर जिसके लिए मैं यहा आईं हू'। "

"अब तू क्या चाहती है?" त्रिमूर्ति ने पूछा

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इस कमरे में एक ही रास्ता था जो सुरग की तरफ जाता था। रेखा फौरन उठकर खडी हो गई और दरवाजे की तरफ बडी । सुरग में गहरा अंधकार था। रेखा कासगन का हाथ पकडकर, उस कमरे तक आईं थी । अब उसे राह दिखाने वाला कोई न था।

लेकिन इस सुरग को लेकर रेखा को यह अनुमान तो था कि रास्ता बिल्कुल साफ व सीधा है-ओर अगर वह सुरग में दाखिल होकर सीधी चलती जाए तो आसानी से बाहर पहुच जाएगी। हिम्मत करके उसने सुरग में कदम रखा और पीछे से जितनी रोशनी आ रही थी उस रोशनी में वह तेज-तेज चलती गई। रोशनी धीरे-धीरे बिल्कुल खत्म हो गई और घोर अंधेरा छा गया।

रेखा न अपनी आखे बन्द कर ली' । आखें खुली रखने का भी कोई फायदा नहीं था । नजर तो कुछ आ नहीं रहा था । भगबना का नाम लेकर वह चलती रही । यूं वह्र पेडों के बीच वाला अंधकारमय रास्ता भी कट गया । रेखा अब दरवाजा देख पा रही थी । इस दरवाजे पर उसे पीले रग के कपडे, पहने एक एक ऊँचे कद का व्यक्ति नजर आया । वह सिर से पैरों तक ढका हुआ था । उसका चेहरा भी चादर में छिपा हुआ था। चादर भी पीले रग की थी । उसके पैरों में लकडी की अनूठे वाली खडाऊ थीं।

रेखा को देखते ही इस ढके छिपे शख्स ने दरवाजा खौल दिया और रेखा का इतजार करने लगा । जब रेखा करीव पहुची तो उसने ढके हुए चेहरे से ही रेखा को देख लिया । हाथ के इशारे से उसे बाहर निकलने के लिए कहा और फिर खुद भी उसके पीछे चल दिया l दरवाजे से निक्लते ही रेखा लगभग दौडती_ हुई सीढियों_ तक पहुच गई । उसने पहली सीढी से नीचे देखा। कासगन बेचैनी से टहल रहा था । उसकी नजर जेसे ही रेखा पर पडी, वह खुशी से दीवाना हो गया ।

इधर से रेखा सीढियां उतरने लगी तो उधर से कासगन सीढियां चढने लगा । रेखा उतनी सीढियां उत्तर नहीं पाई थी जितनी सीढिया कासगन चढ़ आया था।

"क्या हुआ? " बडी बेकरारी से पूछा था उसने ।

"विजय । " रेखा ने एक लफ्ज कहा और इस एक शब्द में ही ऐसा जादू था कि कासगन चीख़ ही तो उठा-- "शुक्रिया ! तेरा लाख-लाख शुक्रिया ।"

और फिर तभी उसकी नजरें उस ढके-छिपे शख्स पर पडी जो बडे इत्मीनान से एक-एक करके सीढिया उतरता चला आ रहा था ।

"यह कौन है?" कासगन ने हैरत से पूछा।

"मैं नहीं जानती। " रेखा ने भी उसकी तरफ देखा-- "यह दरवाजे पर मिला था, वहीं से साथ चला आ रहा है। "

वह ढका छिपा शख्स उनके करीब आ गया था पर वह बिना कुछ बोले पूर्ववत्: ही सीढिया उतरता चला गया । रेखा ब कासगन भी सीढियां उतरने लगे ।

"त्रिमूर्ति ने क्या दिया?" कासगन ने कहा।

" कुछ नहीं । बस अपनी शिकस्त कबूलं कीं और कहा-- "अब तू जा-तू जो चाहती है, वैसा ही हो जाएगा।"

"रेखा तुमने तो कमाल कर दिया पर पर यह मुमकिन केसे हुआ?" कासगन को तो जेसे अभी भी यकीन नहीं आ रहा था ।खुशी के मारे उसका दम फूल रहा था देखो मैं न कहता था कि तुम मेरी उम्मीद का आखिरी चिराग हो । तुम जरूर कामयाब होओगी । "

कामयाब तो में खुद को उस वक्त समझूगी-जब रासमोन को होश आ जाएगा और वह उठकर आपके गले लग जाएगा। " ऐसा ही होगा, रेखा! मेरा दिल कहता है ऐसा ही होगा । "

रेखा ने कुछ जवाब देना चाहा था कि उसके मुह' सै निकला--"अरे॥"

"क्या हुआ? "

"वो बग्गी में बैठ गया है !"

कासगन ने नजरें उठाई । उसे बग्गी में पीला लिबास नजर आया I वह ढका हुआ शख्स तेजी से सीढिया उतर बग्गी में जा बैठा था ।

जब रेखा और कासगन बग्गी के निक्ट पहुचे' तो उस ढके छिपे शख्स ने एक तरफ होकर जैसे उनको जगह दी । बग्गी में तीन आदमी बड़े आराम से बैठ सकते थे। रेखा से पहले कासगन ने चढना चाहा तो उस मुह ढके शख्स ने कासगन क्रो बग्गी में बैठने से रोक दिया । वो बोला कुछ नहीं, सिर्फ हाथ का इशारा किया ।

कासगन ने फौरन पीछे ह्रटकर रेखा को बैठने का इशारा किया । रेखा बग्गी के एक कोने में बैठ गई। वह मुह ढक कर दूसरे कोने में बैठा था । उसने हाथ के इशारे में बग्गी चलाने को कहा तो कासगन ने अपने सशस्त्र दस्ते को बग्गी के आगे आने को कहा और फिर उसने उन्ही में से एक के घोड़े को अपने लिए चुन लिया और खुद बग्गी के पीछे आ गया ।

"चलो । " कासगान ने चिल्लाकर हुक्म दिया ।

उसके हुक्म के साथ ही छोटा सा काफिला अपनी मजिल' की तरफ चलं पडा, बग्गी तेजी से दौडे जा रही थी। रेखा बग्गी की खिडकी से कभी पीछे घोडे पर आते कासगन को और कभी पीले कपडों में छिपे उस शख्स को देख रही थी जो बग्गी के एक कोने में दुबका बैठा था ।
 
बडा, ही रहस्यमय था यह ढका-छिपा शख्स । रेखा और कासगन ने उससे कोई सवाल करने का प्रयत्न नहीँ किया। उन्हें शायद यही आशा थी कि इस चादर के पीछे उनकी मुश्किल का हल मौजूद है। जाहिर था वो शख्स त्रिमूर्ति के भेजे ही उनके साथ था।

वह रहस्यमय 'मुहे ढका' खामोश था और रेखा ने भी खामोशी ही श्रेयकर समझी। यह काफिला अपना सफर तय करके कासगन की बस्ती में पहुच. गया बग्गी के रूकते ही 'मुह' ढका' फोरन नीचे उतर गया । कासगन का स्वर्ण महल काफी ऊचाई' पर था । महल तक जाने के लिए सगमरमर' की सीढिया थीं । वो शख्स तेजी से सीढिया चढने. लंगा । रेखा व कासगन को उसका अनुसरण करना पडा, ।

महल हालाकि कासगन का था, लेकिन वो ढका छिपा शख्स सीढिया चढकर महल में कुछ इस तरह दाखिल हुआ जेसे वहीँ महल का मालिक हो और दिलचस्प बात यह रही थी कि महल के दरवाजे पर भालेधारी रक्षक ने भी उसे रोकने की कोशिश नहीँ की, बल्कि उसने झुंककर उस 'ढके-छिपे' शख्स का अभिवादन करके उसे भीतर जाने कीं इजाजत दे दी थी ।

उसके पीछे पीछे रेखा व कासगन भी अन्दर दाखिल हुए । वो बहुत तेज चल रहा था। उसके इस कद्र तेज चलने सै यह अहसास ही नहीं होता था कि उसका मुह ढका हुआ है । पता नहीं वो मुह' पर पडी. चादर में से देख कैसे रहा था? पक्के फर्श पर उसकी लकडी कीं ख़डाऊ_ बहुत जोर जोर बज रही थी ।

वो महल के विभित्र रास्तों से होता अंततः उस कमरे के दरवाजे पर पहुच' गया जिसमें रासमौन एक शीशे के ताबूत में बद था।

उसने पलटकर रेखा कासगन की तरफ देखा जो तेजी से कमरे की तरफ आ रहे थे। वो उन दोनों के निकट पहुचने' से पहले ही कमरे में दाखिल हो गया।

उसने रासमौन के ताबूत के गिर्द सात चक्कर लगाए। फिर उसे खोले बिना ही ताबूत्त के बीचो-बीच खडा हो गया । रेखा व कासगन भी अन्दर आ चुके थे । अब स्पष्ट हो गया कि इस 'मुहं ढके' को जादूगरनी कावेरी के जादू के तोड़ के लिए ही भेजा गया था ।

'मुहं ढके' शख्स ने अपने दोनों हाथ लिबास से बाहर निकाले जो बलिष्ठ व घने बालों से ढके हाथ थे । और फिर अपने पेरों से लकडी के खडाऊ निकाल लिए । फिर उसने उन दोनों खडाऊ क्रो एक साथ तीन बार धीरे-धीरे ताबूत के शीशे पर मारा और फिर उसने अपने दौनों हाथ बुलन्द किए और इस बार पूरी ताकत के साथ शीशे के ताबूत पर मारीं।

खडाऊ ताबूत पर किसी भारी ह्रथोड़े की तरह पडी । शीशे का ताबूत खील-खील हो गया।

लेकिन रासमौन का जिस्म पहले की तरह ही हवा में स्थिर था ।

उस ढके छिपे शख्स ने उसके जिस्म को अपने हाथों पर लिया और उसे फर्श पर रख दिया और स्वयं भी बैठ गया । एक खडाऊ उसने पैर के अंगूठे' में डाल ली और दुसरी खडाऊ, उसने रासमोन के मुह पर रखी।

बस फिर क्षण ही लगे । इधर खडाऊ मुह' पर रखी गई, उधर रासमोन नै दो तीन गहरे गहरे सास लिए और फिर इस तरह आखें खोल दी' जेसे गहरी नीद' से जागा हो । रासमोन ने फोरन उठना चाहा-लेकिन 'ढके' शख्स ने उसे अपनी खडाऊ का दबाव डालकर उसे उठने से रोक दिया ।

और इसके बाद उसने खडाऊ रासमोन के बदन के हर भाग पर फिराईं और फिर उठते रासमोन कौ भी साथ उठने का इशारा किया । रासमान खडा. हो गया तो उसने रासमोन के सिर पर हाथ रखा और देर तक रखै रहा । यूं लग रहा था जेसे वह सिर पर हाथ रखे कुछ 'पढने' मे मस्त हो l

जब तक वह रहस्यमय शख्स रासमोन के सिर पर हाथ रखे खड़ा रहा रासमौन की आखें' बद' रहीँ और फिर जैसे ही उसने हाथ हटाया रासमोन ने आखें' खौल दीं । सबसे पहले उसकी नज़रें अपने बाप कासगन पर पडी और वह बेअख्तयार उनसे लिपट गया । यह वह क्षण था जिसके लिए रेखा ने अपनी जिन्दगी दाव पर लगा दी थी I वह बाप-वेटे को गले लगते देख़कर खुद पर काबू न रख सकी । आसुओं से उसकी आखें भीग गई ।

और जब कासगन भावावेश में यूं अपने बेटे को लिपटे हुए था और रेखा इस मिलन क्रो देखकर आसू बढा रही थी तो उस रहस्यमय व्यक्ति ने अपनी दोनों खडाऊ अपने हाथ में पकडी और निशब्द चलता दरवाजे से बाहर निकल गया । उसके यूं निकल लेने का किसी को अहसास भी नहीं हुआ?

रेखा ने अपने आसू र्पोछे तो वह रहस्यमय व्यक्ति कमरे में मौजूद नहीं था । रेखा दरवाजे की तरफ भागी, लेकिन तब तक वह उसकी पहुच से बहुत दूर जा चुका था ।

काश जाने से पहले वह अपनी सूरत तो दिखा जाता, लेकिन वह तो जिस तरह रहस्य में लिपटा हुआ आया था वेसे ही वापिस भी चला गया l उसके बारे में रेखा कुछ भी नहीं जान सकी ।

.......................................

"कासगन, वो चला गया । " रेखा ने कमरे में वापिस आकर ऊंची आवाज में कहा ।

इस आवाज पर सबसे पहले रासमोन चौका ।उसने अपने बाप के कंधे सै सिर उठाया तो अपने सामने रूप लावण्य ब यौवन के एक ठाठें मारते सागर को देखा । उसे तो कमरे में अपने बाप के अलावा किसी और की मौजूदगी का अहसास तक नहीं था । अब जब रेखा पर निगाह पडी. तो बस उसे देखता ही रह गया ।

हकीकत में रेखा अगर सुन्दर थी तो वह खुद भी किसी से कम न था । उसे देखने वाला भी बस देखता ही रह जाता था रेखा ओर रासमोन की जब नजरें मिलीं तो यूं महसूस हुआ जैसै कहीं दूर पहाडों पर बिजली कौघी हो I दूर तक रोशनी ही रोशनी हो गई और फिर ठंडी' सी पडने… लगीं।

"बाबा , यह कौन है?" रासमोन अपने बाप से अलग होकर रेखा की तरफ बढा।

"रासमौन, क्या तू जानत्ता है कि तू दो साल बाद जागा है । “

"बाबा. ..दौ साल... ।" रासमोन रेखा को भी भूल गया ।

"हां, दो साल । " कासगन ने प्यार व हसरत भरी नजरो से निहारते हुए बौला--"और इन दो सालों में मेंने तेरे लिए क्या क्या न किया, लेकिन कावेरी के जादू का तोड नहीं ला सका । तब यह लडकी, किस्मत से मेरे हाथ लग गई । इसे 'मुक्ति द्वार' वाले कुए' का प्राणी मेरे पास लाया था । यह इंसान' है । यह इतनी मेहरबान साबित हुई है कि इसने अपनी जिन्दगी दाव पर लगाकर तेरी जिन्दगी बचा ली । कितनी महान है यह लडकी रासमोन इसे सजदा कर । "

रासमोन अपने बाप का हुक्म सुनकर फोरन ही रेखा के कदमों में झुकने लगा । रेखा बडी. तेजी से हटी और बरबस ही चींखी ।

"नहीँ ऐसा न करो । मेरी नेकी बर्बाद न करो।"

रासमोन सीधा हो गया । रेखा ने मन-ही-मन शुक्रिया अदा किया था । उसकी निगाह में यह अनर्थ था ।

हकीकतन रासमोन को पहली नजर देखने पर ही रेखा के दिल में अजीब से अहसास जागे थे। इस समय भी वह जेसे अपने आप में न थी । वह जब भी रासमोन को देखती तो दिल बरबस ही तेजी से धडकने, लगता और जब रासमोन को अपनी तरफ देखते पाती तो पलके बेअख्तयार ही झुक-झुक जातीं ।

रेखा को अपने इस अहसासों का अहसास था । वह सोचने लगती

यह मुझे क्या हो गया है? कहीं रासमोन उसके दिल में तो नहीँ उतर गया ।। कही उससे मुहबत तो नहीं हो गई? क्या इसे ही मुहब्बत कहते हैं?

"बाबा I इनका नाम क्या है?" रासमोन ने अपने बाप से पूछा ।

"यह रेखा है । " कासगन ने बताया ।

"रेखा । " रासमोन ने यह नाम 'बडे प्यार भरे लहजे में दोहराया-"रेखा -मै तुम्हारा दिल से आभारी हूं। "

"अब क्या ख्याल है-उस जादूगरनी के इलाके की तरफ फिर जाएगे?" रेखा ने हसकर पूछा ।

"भूल कर भी नहीं । " रासमोन ने कान पकड़े--"तौबा मैरी । "

रेखा का मन उससे अपनत्वपूर्ण बातें करने को कर रहा था । वह फिर उसी बेतकल्तूफी से बोली

"क्या कावेरी कीं बेटी सारबरी ऐसी ही हसीन थी कि उसे देखते ही अपने होश गवां बैठे । "

रासमोन लजा सा गया फिर एक मद सी मुस्कान उसके होठों पर नाच गई। इस सवाल का जवाब वह अपने बाप की मौजूदगी में कैसे दे सकता था ।

"रेखा! तो-बो कहां चला गया?" कासगन को उस रहस्यमय शख्स का ख्याल आया तो उसने पूंछा ।

"मैने उसे जाते नहीं देखा । वो हमें खुशी देकर चला गया। खामोशी से निकल गया ।" रेखा ने बताया ।

"बाबा कौन था वह?" रासमोन ने पूछा।

"मेरा तो खयाल है कि जादूगरों का बादशाह त्रिमूर्ति था । कासगन बोला--"त्रिमूर्ति खुद ॥ "

"त्रिमूर्ति । " रेखा चकित हुई---- "त्रिमूर्ति कैसे हो सकता है। उसके तो तीन मुहं है और...और...तीन चेहरों के अलावा बौ कुछ नहीं है।"

‘'रेखा ! वह त्रिमूर्ती है । जादूगरों का बादशाह । वो कोई भी रूप अपना सकता है। "

रेखा ने गहरी सास' ली- "चलौ बो अब जो भी था..,था। बो रासमोन को कावेरी के जादू सै मुक्ति दिला गया है। त्रिमूर्ति ने अपना वायदा निभा दिया । "

"एक वायदा मेंने भी तुमसे कर रखा है । " कासगन ने ह्रसकर कहा।
 
"वह क्या?" रेखा उसकी सूरत देखने लगी ।

''क्या भूल गई? मैने कहा था कि तुम अगर त्रिमूर्ति के दरबार से कामयाब वापिस आ गई तो तुम जो मांगोगी मैं तुम्हें दूगा । अब वह वायदा निभाने का वक्त आ गया है । बोलो, क्या मांगती हो ।"

रेखा कुछ क्षण सोचती रही । फिर उसने रासमोन की तरफ देखा । रासमौन भी तो उसे ही निहार रहा था । रेखा ने मुस्कराते हुए पूछा-"मैं क्या मागू रासमोन?

"रेखा मुझे माग लो । " रासमोन ने कहना चाहा, पर उसके होंठों पर जो बात आई वह कुछ यूं थी-"अपने दिल का कहा मानो...जो वो कहे, वह मांगो ।। "

"दिल I " रेखा खोये हुए अदाज मे बोली--"मेरे दिल मे तो बस मेरा भाई बसा है-जो आपकी इस दुनिया में खो गया है। मै तो उसे ही ढूढने निकली थी । "

''आह । मैं भो कितना खुदगर्ज हूं। तुम से सिर्फ अपनी कहता रहा। तुमसे तुम्हारी सुनी ही नहीं। न यह जाना कि उस 'मुक्ति द्वार' में कैसे पहुची? वहां तुम्हें कौन धकेल गया? माफ करना । मुझे माफ कर देना। "

" बाबा, इस कमरे से बाहर चलें । यहां कब तक ठहरे रहेगे? इन्हें कुछ देर आराम करने दें। " रासमौन ने कहा और दरवाजे की तरफ बढा।

कासगन को भी रेखा के आराम का ख्याल आया । यह बातें तो बाद मे भी हो सकती थी । वह अपने बेटे के पीछे कदम उठाते बोला- "आओ,रेखा । "

फिर कासागन के आदेश पर सेविकाओं ने रेखा को उसके शयन-कक्ष में पहुचा दिया ।

सूरज डूबने को था । रेखा खिडकी… सै पर्दा हटाकर दुर पहाडों मे डूबते सुरज का नजारा करने लगी । सोचें उभरने लगी ।

पता नहीं यह कौन सा सूरज था । अपनी धरती का सूरज था इस मायावी लोक का चांद ! वह कहां-से-कहा आ गई थी । जाने उसका भाई किस हाल मे होगा । अपने 'भाई इद्रजीत्त' को उसने रेगिस्तानी झोपडी, मे छोडा. था और वहां से प्रेतनी बकाल रेखा को पकड़कर ले गई थी और बेबस इद्रजीत्त' कुछ भी नहीं कर सका था । फिर बकाल ने रेखा को अपने भाई राकल, यानि लगडे प्रेत की सेवा मे पेश कर दिया था । लगडे प्रेत राकल ने रेखा को पाने को जाने कितने यत्न किये थे लेकिन वह नाकाम रहा था और अपनी इस शिकस्त का इतकाम लेने के लिए उसने रेखा को 'मुक्ति द्वार' कहे जाने वाले कुए मे फिकवा दिया था। यह रेखा की खुश किस्मत्ती थी कि कुएं में बसै प्राणियों ने उसे कुए मे-गिरते हुए देख लिया था और उबलते हुए पानी मे जाने से बचा लिया था ।

वर्ना रेखा इस घडी, इस खूबसूरत बेडरूम मे जीवित सकुशल न बैठी होती । उसकी हडिया तक पिगलकर अपना वजूद खो बैठी होतीं ।

रेखा इस कल्पना ले ही काप गई।

सूरज पहाडों के पीछे अस्त हो चुका था। अंधेरा तेजी से फैलता जा रहा था । रेखा ने पर्दा बराबर कर दिया-घूमी तो देखा कि कमरे मे दो कनीजें फानूस रोशन कर रही थीं । वे फानूस रोशन करके रेखा की तरफ आईं व सिर नवाकर बडे आदर से बोली--

"हमारे लिए कोई सेवा?"

"कोई नहीँ । मैं थोडी देर आराम करना चाहती हूं। " रेखा बोली।

फिर उसने पूछा-- "महल में क्या हो रहा है?"

"चिरागा (रोशनिया) किया जा रहा है। रात को जबरदस्त जश्न मनाया जाएगा । " एक दासी बोली-"आप कुछ देर सो ले" फिर आपको जश्न के लिए तेयार किया जाएगा।"

"क्या मत्तलब? "

"मत्तलब तो हमेँ नहीं मालूम । हमें तो बस आपको तैयार करने क्रो कहा गया है । "

रात को महल में बड़ा ज़बरदस्त जश्न मनाया गया । बस्ती का हर व्यक्ति आमत्रित था । रेखा को कीमती शानदार लिबास पहनाकर सबसे खूबसूरत और सबसे ऊँची कुर्सी पर बैठाया गया । नाच व सगीत जारी था । हर तरफ रग ओ नूर की बारिश हो रही थी । रेखा का सौंदर्य आखो को चुधिया रहा था। रासमौन उसके बराबर दूसरी कुर्सी पर जो उससे जरा नीची थी-बैठा था, जबकि कासगन एक छोटे से तख्त पर विराजमान था ।

आने वाले मेहमान रेखा के कदमों में तोहफे ढेर कर रहे थे । सबसे अत मै कासगन ने अपना तोहफा भेंट किया। यह हीरों का लश्कारे मारता हार था I कासगन ने अपने हार्थों से रेखा को यह हार पहनाया तो रेखा का सौंदर्य और अधिक जगमगा उठा । रासमोन उसे देखता ही रह गया ।

रेखा ने उसकी तरफ नजरें उठकर देखा तो वह रासमोन की नजरो को ताव न ला सकी और उसने फोरन अपनी निगाहें झुका लीं । उसका दिल अनायास ही धडक उठा। यह उसे क्या होता जा रहा था?

जश्न खत्म हुआ तो कासगन उसके साथ ही उसके कमरे में आ गया । वह रेखा से उसकी आप बीती सुनना चाहता था । रेखा ने उसे अपनी कहानी सुनी दी । वह कौन है कहा से आई है और उसे 'मुक्ति द्वार' नामक कुएं में क्यों फेंका गया? रेखा ने हर वह बात बता दी जो कासगन जानना चाहता था ।

उसकी हादसों भरी दास्तान सुनकर कासगन ने एक गहरी सास लेते हुए पूछा… "अब तुम क्या चाहती हौ?"

"किसी भी तरह अपने भाई तक पहुचना चाहती हूं। " रेखा ने बताया।

"कब जाना चाहती हो?"

"मेरा बस चले तो अभी।"

"खैर यह तो मुमकिन नहीं है। "

"फिर सुबह-ही सुबह । "

"कुछ दिन हमारे साथ रहो । " कासगन ने अनुरोध किया ।

"नहीं रह सकती । "

"मुझसे कुछ मागोगी भी नहीं?"

"आपने इतना कीमती हार दे दिया। अब इसके बाद मागने' को क्या रह गया?"

"यह तो कुछ भी नहीं । तुम कहो तो यह सोने का महल तुम्हारे हवाले कर दूं।"

"नहीं शुक्रिया। मैं सोने-चादी के इस महल का क्या करूगी? मुझे अपनी दुनिया में जाना है और वहा यह महल जा नहीँ सकता। " रेखा ने हंसकर कहा ।

"एक बात कहूं बुरा तो नहीं मानोगी?"

"नहीं मानूगी' । आप कहें जो कहना चाहते हैं। "

"मैने रासमोन की आखों में तुम्हारे लिए चाहत की रोशनी देखौ हैँ और...और... । "

वह अपनी बात पूरी नहीं कर सका I सकोच आडे आ गया था।

रेखा ही बोली--''में जानती हू आप क्या कहना चाहते हैँ?"

"जब जानती हो तो फिर रह क्यों नहीं जाती I मेरे लिए, मेरे बेटे के लिए, हम सबके लिए रूक जाओ। तुमने देखा है-इस थोडी-सी अवधि में ही यह पूरी बस्ती तुम्हारी आभारी हो गई है । तुमने इस बस्ती को नईं जिन्दगी अदा की है। "

"मैं तुम सबकी शुक्गुजार हूं लेकिन मेरी अपनी मजबूरियां हैँ । मुझे हर हालत में अपनी दुनिया में जाना है । वहा कुछ लोगों से अपना हिसाब करना है। " रेखा कुछ भी तो नहीँ भूली थी।

"ठीक है। जैसी तुम्हारी मर्जी।" कासमन उदास लहजे में बौला--"बहरहाल, हम जिन्दगी भर तुम्हें न भूल सकेगे । " वह उठ खड़ा हुआ "मै अब चलता हूं तुम आराम करो । आसमान वाले ने चाहा तो सुबह तुम्हारे जाने का कुछ-न-कुछ बन्दोबस्त हो जाएगा ।मैं कुएं के किसी प्राणी को बुलाता हू। "

"कासगन मैं भी तुम्हें कभी न भूलूगी।"
 
कासगन के जाने के बाद रेखा ने अपना भारी जडाऊ, लिबास उतारा और राहत की एक गहरी सास ली । फिर उसने हाथ मुह धोये और एक खिडकी. का पर्दा हटाकर रेशम जेसे बिस्तर पर आ लेटी । पूरे चाद की रात थी । खिडकी से चाद झाक रहा था । चादनी' उसके चेहरे पर पड़ रही थी । वह लेटे लेटे चाद को निहारने लगी। चाद' को निहारते वह उसी में खो चली थी कि सहसा किसी ने खिडकी के शीशे पर खट-खट की।

रेखा चौक' गई । अब चाद गायब हो चुका था और चाद की जगह एक चेहरा नजर आ रहा-था। चांद-सा चेहरा। यह चेहरा रासमोन का था l

रेखा फोरन उठकर बैठ गई । फिर बिस्तर से उठी और वह शीशे की खिडकी खौल दी ।

"रासमोन तुम ।।"

"हमें देख रहा था कि तुम सो रही हो या जाग रही हो । " रासमोन मुस्कराती निगाहों से ही उसे देखते बोला।

रेखा मुस्कराई- "मैं जाग रही थी । बडी, देर से चाद को देख रही थी।" उसने बताया ।

"तुम्हें चाद अच्छा लगता है?"

"हा बहुत । "

"और मैं?" रासमोन ने दिल ही-दिल में पूछा, पर उसका यह सवाल उसके मन में ही रह गता। पूछ नहीं पाया ।

"तुम बाहर क्यो खड़े हो अन्दर आ जाओ। " रेखा ही उसे बोलते न देख, बोली ।

"क्या यह नहीं हो सकता कि तुम बाहर आ जाओ । खुली फिजा में I "

"हा', हो क्यों नहीं सकता। ठहरो, मैं बाहर आती हू। " रेखा बोली। जेसे वह भी रासमोन से मिलने क्रो लालायित हो ।और फिर लिबास दुरुस्त करने के बाद जब वह दरवाजे से बाहर निक्ली तो रासमोन घूमकर राहदारी में पहुच चुका था । बाहर अभी तक चिरागा (रोशनिया') हो रहा था। बडा. मनमोहक समां था । वे दौनों टहलते हुए तालाब की तरफ निकल गए । तालाब के किनारों पर भी चिराग रोशन थे-जिनका प्रतिबिम्ब पानी में बड़ा दिलफरेव लग रहा था । बतखें एक कोने में एकत्रित होकर शायद सोने कीं तैयारीयां कर रही थी।

"बाबा ने कुएं के प्राणियों को बुलवाया है । वे तुम्हारे जाने का इतजाम' का रहे हैं। " रासमौन ने खामोशी तोडी।

"रासमोन, यह खबर तो तुमने बहुत अच्छी सुनाई। इसका मतलब है कि में सुबह तक यहा से रुखस्त हो जाऊणी। "

"बाबा ने तुमसे कुछ कहा था। " क्षणिक खामोशी के बाद रासमोन ने झिझकते हुए पूंछा ।

"तुम्हारे बाबा सें मेरी बहुत-सी बातें हुई । तुम्हारा इशारा न जाने किस तरफ है? "

"तुम बस, आज रात की मेहमान हो । " रासमौन ने बडी हसरत से कहा।

"हा ।" रेखा सहज भाव में बोली । फिर रासमौन की तरफ देखते हुए पूछा--" क्यों ?"

"जाने वाला रूक नहीं सकता?" रासमौन नजरे चुराते बोला।

"शायद रूक सकता है लेकिन कितने दिन? एक दिन दो दिन ज्यादा से-ज्यादा दस दिन । फिर जाना होगा ओर जब जाना ही मुकद्दर है तो फिर देर करने का फायदा.. .?" रेखा कुछ क्षणों तक खामोश रही, फिर बोली"रासमोन, मुझे जाने दो । कोई ऐसी बात न करो कि मैं उलझन में पड़ जाऊ। "

रासमोन चलते चलते रूक गया । चाद की रोशनी सीधी रेखा के चेहरे पर पढ़ रही थी । उसका सौंदर्य खिल उठा था । रासमौन उसके चाद-चेहरे में ही खो गया था जैसे। उसे रेखा के अनुरोध पर हेरत हुई थी।

और फिर रासमोन ने बड़े जज्बाती अंदाज में कहा… "रेखा, क्या यह नहीं हो सकता कि तुम मुझे अपनी दुनिया में ले जाओ?" रासमोन ने सीधे शब्दों में अपनी चाहत नहीं दर्शाई थी, पर उसका यह अनुरोध ही उसका प्रेम-प्रदर्शंन था और उसका यह अदाज भी रेखा के मन को भा गया था । खुद रेख के दिल मे भी तो रासमोन के प्रति ऐसी ही 'भावनाएं थीं l

"वह क्यों? " रेखा ने भोले व अनजान बनते हुए पूछा ।

"मालूम नहीं। " रासमोन ने फिर नजरे चुराई।

"कमाल है। " रेखा ने शोखी में बात उडानी. चाही- "जाना भी चाहते हो-ओर तुम्हें मालूम भी नहीं कि क्यो?”

"तुम रुक जो नहीं रही। " रासमौन एकदम बोला।

"इसकी बजह मैं तुम्हें बता चुकी हूं।" रेखा सजीदा' होते हुये बोली ।

"फिर मैं क्या करूं?" रासमौन ने उस से जानना चाहा I

"कुछ नहीं । बस, हसी खुशी अलविदा कह दो। "

"नहीं कह सकता। " रासमोन ने जज्बात से भीगी आबाज मे कहा और एकदम मुड़ा और तेज कदमों से वापिस जाने लगा।

"रासमोन ।" रेखा ने पुकारा।

रासमोन नहीं रूका-ना पलटा-बस चलता रहा।

"रासमोन मेरी बात सुनो। " रेखा उसे पुकारती रही पर वह तेज कदमों सै आगे -आगे बढता. रहा। यहा तक कि वह महल के अंदरूनी दरवाजे में प्रवेश करके गायब हो गया।

रेखा अपने कमरे में लोट आई।

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