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काला चिराग तेज तेज कदम उठाता हुआ महल कैं अन्दरूनी दरवाजे से अन्दर चला गया। दरवाजा जोरदार आबाज से वन्द हुआ और फिर दरवाजे के पीछे कुछ खट खट-सी सुनाई दी। जैसे दरवाजे को ताला लगाया जा रहा हो।
इंद्रजीत्त अब कमरे में अकेला रह गया था ।लेकिन यह अकेलापन उसके लिए नया नहीं था । एक उम्र बीती थी एक्रान्त मे । वह इत्मीनान सै चाय पीने लगा। चाय ने ताजगी पहुचाई थी । चाय पीकर वह बिस्तर पर लेट गया । बेहद आरामदय बिस्तर था। थोडी ही देर में उसकी आखो मे नींद उतरने लगी । इस वक्त रेखा उसके ख्यालों मे थी । वह इसी के बारे में वडी चिन्ता के साथ सोच रहा था।
"जाने वह इस वक्त कहा होगी? वह उसे मुश्किल से निकालने आई थी खुद ही मुश्किल का शिकार हो गई।
जाने अब उस पर क्या बीत रही होगी? 'मृत्यु-कूप' के बारे में काले चिराग का विश्वास है कि उसमे धकेला जाने वाला कभी जिन्दा नहीं बचता। रेखा कीं जिन्दगी की आशा करना बेकार है, लेकिन इस मृत्यु कूप पर जाकर देखना तो चाहिये। "
उसने काले चिराग सै 'मृत्यु कूप' पर चलने का अनुरोध का फैसला किया व आखें मूंद लीं ।
यह 'मृल्यूद्वार' या 'मृत्यु कूप' भी खूब था । बास्तव मे यह मौत का ही कुआ था ।उस दिन राकल, रेखा को फरेब देकर 'मृत्यु कूप' तक ले आया था । फिर जब राकल के इशारे पर दो हथियारवद सिपाही रेखा को उसके बाजूओं से पकडकर खींचने लगे तो रेखा को खतरे की सजीदगी' का अहसास हुआ ।
रेखा की छटी इन्द्र जाग गई। उसे अहसास हुआ कि उसके साथ बुरा होने वाला है। वह बिफर उठी और राकल पर गुर्राई--"राकल यह क्या बदतमीजी है ?"
"हा-हा-हा। " राकल ने कहकहा लगाया था-"जो राकल का कहा नहीँ मानता उसे अपनी गुस्ताखियों की सजा भुगतनी ही पडती है । "
"लेकिन तू तो मुझें किसी को पैगाम देने के लिए कैदखाने सै निकालकर लाया था । "
”पैगाम तो मैं तुझे दूगा। मौत का पैगाम ।" यह कहकर वह फिर विक्षिप्त हसी हसने लगा था । ”काले चिराग ने तेरे बारे में ठीक कहा था कि तू एक खब्बीस प्राणी है। " रेखा आपे सै बाहर हो रही थी ।
”उसने ठीक कहा था I मैं वाकई एक शैतान हूं। अब तू मेरी शैतानियत देख I " यह कहकर अपने सवारों सै मुखातिब हुआ था-- "इसे उठाओ और 'मृत्यु द्वार' में डाल दो। "
फिर जो कुछ हुआ पलक झपकने मे हुआ। लगडे राकल का हुक्म पाकर दोनों सवार, उसके हाथ खींचते हुए आगे बड़े फिर एक जगह रूककर उन्होंने रेखा के पैर पकडकर, उसे ऊपर उठाया । और डण्डा-डोली के अदाज में उसे झुंलाया और फिर एक अजीब सी आवाज निकालकर उसे हवा में उछाल दिया । यूं रेखा जब नीचे गिरी तो उसे अहसास हुआ कि उसे कहा फेंका गया है। यह एक बहुत गहरा कुंआ था और वह उसमें गिरती चली जा रही है।
रेखा के साथ लगडे राकल के इस फरेब के बारे में पाठक पढ चुके हैं ।
बहरहाल, रेखा की मुश्किलें कम नहीं हुई थी और राकल अपना रंग दिखा गया था। कुए के अन्दर गहरा अंधेरा था। रेखा को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। उसने सहारा लेने को, कुछ पकड़ने. को हाथ मारे, लेकिन उसके हाथ में कोई चीज नहीं आई। वह हाथ पाव मारते मारते चीखने लगी-- "बचाओ...बचाओ... । "
रेखा की इन र्चीखौ सै कुएं की दीवारों में खलबली मच गई I कुएं की दीवारों मै जगह जगह छोटे-छोटे खोह थे और इन खौहों में कुएं के जीव प्राणी आराम कर रहे थे। रेखा की र्चीखों ने इन प्राणियों को जगा दिया था।
इस प्रेत्तलोक के तो चप्पे चप्पे पर रहस्य थे ।
"अरे देखो यह तो किसी इंसान की आबाज है । " किसी ने नीचे झांककर कहा ।
“इंसान की बच्ची है । " नीचे वाले गार से आबाज आई ।
”अरे, इसे पकडो । इसे पानी में गिरने से बचाओ । ”
रेखा को मालूम न था कि कुएं के ये प्राणी उसकी जिन्दगी बचाने के लिए प्रयत्नशील हैं। वह निरूतर चीखे जा रही थी-- "बचाओ...बचाओ... । "
बचने की कोई उम्मीद न थी। कोई उसे बचा भी कैसे सकता था? शायद वह बैअख्तयार ही चीख रही थी अपना खौफ कम कर रही थी।
लेकिन कुए के वे जीव क्षणभर में ही हरकत में आ गए थे। और फिर नीचे गिरते हुई रेखा को अचानक यूं महसूस हुआ जैसे किसी ने उसे थाम लिया हो। फिर यह अहसास जागा कि वह नीचे गिरने की बजाय ऊपर की तरफ उठ रही है । नजर उसे कुछ भी नहीं आरहा था । यही महसूस हो रहा था जैसै वह किसी तख्ते पर बैठी हो। उसने सिर उठाकर एकदम ऊपर देखा । कुएं का मुंह उसे किसी सुराख की तरह नजर आ रहा था। इसी से उसे कुएं की गहराई का भी अंदाजा हो गया था। थोडा _ सा ऊपर आने के बाद रेखा को महसूस हुआ, जैसे उसे कही बैठा दिया गया हो। उसने हाथों से टटोलकर देखा तो पथरीली सी जगह महसूस हुई। उसके चारों तरफ अंधेरा' था। ऊपर कुएं का मुहाना भी नजर नहीं आ रहा था।
कुए की दीवार में बने इस छोटे से गार में जो गैर इन्सानी प्राणी आबाद थे-वे दो मर्द और एक औरत थी । बे रेखा को देखकर बहुत खुश थे। रेखा इस गार के पथरीले फर्श पर बैठी थी और वै दोनों मर्द पागलों की तरह उसके गिर्द नाच रहे थे जबकि औरत एक तरफ खडी हैरत से उसे देख रही थी ।
यह खबर कि एक इन्सान की बच्ची कुएं में आ गई है ऊपर सै नीचे तक कुए कीं हर खोह में फैल गई थी । यह गार कुएं के लगभग बीच में था। कुए के प्राणी ऊपर व नीचे से रेखा को देखने आ रहे थे।
रेखा को कुछ मालूम न था कि उसके गिर्द क्या हो रहा है? उसे यह अहसास तो था कि उसके आस पास कोई है-बोलंने की आवाजें भी आ रही थीं, लेकिन ये लोग कौन-सी भाषा बोल रहे थे और क्या कह रहे थे-यह उसकी समझ में नहीं आ रहा था । बहरहाल, बह इसी में खुश थी कि वह कुएं में गिरने से बच गई थी। मौत किसी गोली की तरह उसके कान के पास से गुजर गई थी।
रेखा का खौफ कम हो गया था,लेकिन दिल किसी तरह भी ठिकाने पर नहीं आ रहा था। बदहवासी भी पूर्ववत: ही थी और वह गहरे-गहरे सास ले रही थी। निश्विन्नता के बावजूद उसकी घबराहट नही जा रही थी। उसे अपना दम घुटता महसूस हो रहा था।
"ऐ तुम लोग इसे ऊपर क्यों उठा लाए हो इसे कुए में क्यों नहीं गिरने दिया?" उस औरत ने जो खोह के एक कौने मे खामोश खड़ी थी नाचते हुए मदों से पूछा।
”तू नहीं जानती कि यह कौन है?" एक मर्द ने जवाब दिया ।
”जानती हूं। इन्सान की बच्ची है। "
"तो फिर ऐसा उल्टा सबाल क्यों किया?"
"इसका करोगे क्या? " औरत ने पूंछा ।
“क्या जरूरी है कि तू जिस बात क्रो नहीं जानती उस बात को जाने। "
"बताने मे क्या हर्ज है?"
"क्या तूने कासगन का ऐलान नहीं सुना । "
”केसा ऐलान? मुझे तो नहीँ मालूम ।"
"हां तुझें कैसे मालूम होगा तू कौन-सा कुए से निकली है? "
”कुछ बताओ तो... । "
"पहाडों के इस पार कासगन कीं वस्ती है और यह ऐलान होता रहता है कि अगर कहीं कोई आदमजात नजर आ जाए तौ उसे फौरन उसके सामने पेश किया जाए। 'इसान' को पकड़कर लाने वाले को मुह मागा इनाम देगा I"
" ओह्न तो क्या तू इसै कासमन के सामने पेश करने का इरादा रखता है. " औरत ने पूछा ।
"तो और क्या?" वह झूम-झूमकर नाचने लगा।
"लेकिन इनाम का हकदार तो मै हूं।" नीचे वाले गार का बासी बोला-- "मैंने इसे पहचानकर बताया था कि यह इन्सान की बच्ची है। "
"सबसे पहले देखा तो मैने था।" ऊपर वाले ने कहा।
"तूने कैसे देखा था? हम सब तो सो रहे थे। ”
"मैं इसकी चींख की आवाज पर जाग गया था । मैने फौरन ही झांक्कर देखा था। "
अब उन दौनों में तू मै मै होने लगी कि इनाम का असली हकदार कौन है? तब सबसे नीचे बाली खोह से एक को बुलाया गया । यह समस्या उसके सामने चली गई। उसने कहा कि इनाम के हकदार दोनों हैं वह भी जिसने पुष्टि की थी कि यह इंसान क्री बच्ची है ।
इधर पंचायत लगी थी । फैसले हो रहे थे और उधर रेखा को कुछ भी मालूम न था कि उसके बारे में क्या तय हो रहा है .....
उसके सिर की कीमत लंग चुकी थी ओर अब बह किसी कासगन के हवाले की जाने वाली थी। उसकी हालत खराब थी। सासें किसी तौर पर भी संयत नहीं हो पर रही थी I दम घुटने की अवस्था बढती जारही थी। वह अपने दोनों हाथों से गला पकडर लम्बे लम्बे सास ले रही थी ।बुजुर्गं के फैसला देते ही रेखा एक तरफ लुडक गई। वह बेहोश हो चुकीं थी।
"अरे, इसे क्या हो गया? देखौ । " औरत ने सबका ध्यान रेखा की तरफ खींचा ।
"क्या हुआ?" एक साथ कईं आवाजें आई ।
"यह होश गवां बैठी है । इसे जल्दी से पहाडों के उस पार ले जाओ-वरना यह मर जाएगी। यहाँ का वातावरण शायद इसे रास नहीं आया। " बुजुर्ग ने बेहोश को देखकर कहा।
फोरन ही उन दो मर्दों (कुएं के गेर इन्सानी प्राणियों)-जिन्हें इनाम का हकदार करार दिया गया था ने रेखा को उठाया और सम्भालते हुए कुंए की तह मै जाने लगे । वह बहुत गहरा कुंआ था I इसे 'मृत्यु कूप' ठीक ही कहा जाता था । कुए कीं तह में कोई तेल जेसी चीज उबल रही थी । उससे धुआ उठ रहा था । इस उबलते द्रव्य में गिरते ही आदमी कण कण हो जाता था । कुएं का वातावरण आम व्यक्ति के अनुकूल नहीं था ।
रेखा शायद इसीलिए बेहोश हो गई थी । वे दोनो उसे सम्भाले हुए तह में जाने की बजाय-जहां तेल सा द्रव्य उबल रहा था और उसकी गर्मी काफी ऊपर तक महसूस हो रही थी-एक गार में घुस गया। यह खोह खली थी । यह दरअसल यहां से बाहर निकलने का रास्ता था । वे दोनों उसे उठाये हुए, उडते_ हुए ही पहाडों की तरफ जा रहे थे।
इंद्रजीत्त अब कमरे में अकेला रह गया था ।लेकिन यह अकेलापन उसके लिए नया नहीं था । एक उम्र बीती थी एक्रान्त मे । वह इत्मीनान सै चाय पीने लगा। चाय ने ताजगी पहुचाई थी । चाय पीकर वह बिस्तर पर लेट गया । बेहद आरामदय बिस्तर था। थोडी ही देर में उसकी आखो मे नींद उतरने लगी । इस वक्त रेखा उसके ख्यालों मे थी । वह इसी के बारे में वडी चिन्ता के साथ सोच रहा था।
"जाने वह इस वक्त कहा होगी? वह उसे मुश्किल से निकालने आई थी खुद ही मुश्किल का शिकार हो गई।
जाने अब उस पर क्या बीत रही होगी? 'मृत्यु-कूप' के बारे में काले चिराग का विश्वास है कि उसमे धकेला जाने वाला कभी जिन्दा नहीं बचता। रेखा कीं जिन्दगी की आशा करना बेकार है, लेकिन इस मृत्यु कूप पर जाकर देखना तो चाहिये। "
उसने काले चिराग सै 'मृत्यु कूप' पर चलने का अनुरोध का फैसला किया व आखें मूंद लीं ।
यह 'मृल्यूद्वार' या 'मृत्यु कूप' भी खूब था । बास्तव मे यह मौत का ही कुआ था ।उस दिन राकल, रेखा को फरेब देकर 'मृत्यु कूप' तक ले आया था । फिर जब राकल के इशारे पर दो हथियारवद सिपाही रेखा को उसके बाजूओं से पकडकर खींचने लगे तो रेखा को खतरे की सजीदगी' का अहसास हुआ ।
रेखा की छटी इन्द्र जाग गई। उसे अहसास हुआ कि उसके साथ बुरा होने वाला है। वह बिफर उठी और राकल पर गुर्राई--"राकल यह क्या बदतमीजी है ?"
"हा-हा-हा। " राकल ने कहकहा लगाया था-"जो राकल का कहा नहीँ मानता उसे अपनी गुस्ताखियों की सजा भुगतनी ही पडती है । "
"लेकिन तू तो मुझें किसी को पैगाम देने के लिए कैदखाने सै निकालकर लाया था । "
”पैगाम तो मैं तुझे दूगा। मौत का पैगाम ।" यह कहकर वह फिर विक्षिप्त हसी हसने लगा था । ”काले चिराग ने तेरे बारे में ठीक कहा था कि तू एक खब्बीस प्राणी है। " रेखा आपे सै बाहर हो रही थी ।
”उसने ठीक कहा था I मैं वाकई एक शैतान हूं। अब तू मेरी शैतानियत देख I " यह कहकर अपने सवारों सै मुखातिब हुआ था-- "इसे उठाओ और 'मृत्यु द्वार' में डाल दो। "
फिर जो कुछ हुआ पलक झपकने मे हुआ। लगडे राकल का हुक्म पाकर दोनों सवार, उसके हाथ खींचते हुए आगे बड़े फिर एक जगह रूककर उन्होंने रेखा के पैर पकडकर, उसे ऊपर उठाया । और डण्डा-डोली के अदाज में उसे झुंलाया और फिर एक अजीब सी आवाज निकालकर उसे हवा में उछाल दिया । यूं रेखा जब नीचे गिरी तो उसे अहसास हुआ कि उसे कहा फेंका गया है। यह एक बहुत गहरा कुंआ था और वह उसमें गिरती चली जा रही है।
रेखा के साथ लगडे राकल के इस फरेब के बारे में पाठक पढ चुके हैं ।
बहरहाल, रेखा की मुश्किलें कम नहीं हुई थी और राकल अपना रंग दिखा गया था। कुए के अन्दर गहरा अंधेरा था। रेखा को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। उसने सहारा लेने को, कुछ पकड़ने. को हाथ मारे, लेकिन उसके हाथ में कोई चीज नहीं आई। वह हाथ पाव मारते मारते चीखने लगी-- "बचाओ...बचाओ... । "
रेखा की इन र्चीखौ सै कुएं की दीवारों में खलबली मच गई I कुएं की दीवारों मै जगह जगह छोटे-छोटे खोह थे और इन खौहों में कुएं के जीव प्राणी आराम कर रहे थे। रेखा की र्चीखों ने इन प्राणियों को जगा दिया था।
इस प्रेत्तलोक के तो चप्पे चप्पे पर रहस्य थे ।
"अरे देखो यह तो किसी इंसान की आबाज है । " किसी ने नीचे झांककर कहा ।
“इंसान की बच्ची है । " नीचे वाले गार से आबाज आई ।
”अरे, इसे पकडो । इसे पानी में गिरने से बचाओ । ”
रेखा को मालूम न था कि कुएं के ये प्राणी उसकी जिन्दगी बचाने के लिए प्रयत्नशील हैं। वह निरूतर चीखे जा रही थी-- "बचाओ...बचाओ... । "
बचने की कोई उम्मीद न थी। कोई उसे बचा भी कैसे सकता था? शायद वह बैअख्तयार ही चीख रही थी अपना खौफ कम कर रही थी।
लेकिन कुए के वे जीव क्षणभर में ही हरकत में आ गए थे। और फिर नीचे गिरते हुई रेखा को अचानक यूं महसूस हुआ जैसे किसी ने उसे थाम लिया हो। फिर यह अहसास जागा कि वह नीचे गिरने की बजाय ऊपर की तरफ उठ रही है । नजर उसे कुछ भी नहीं आरहा था । यही महसूस हो रहा था जैसै वह किसी तख्ते पर बैठी हो। उसने सिर उठाकर एकदम ऊपर देखा । कुएं का मुंह उसे किसी सुराख की तरह नजर आ रहा था। इसी से उसे कुएं की गहराई का भी अंदाजा हो गया था। थोडा _ सा ऊपर आने के बाद रेखा को महसूस हुआ, जैसे उसे कही बैठा दिया गया हो। उसने हाथों से टटोलकर देखा तो पथरीली सी जगह महसूस हुई। उसके चारों तरफ अंधेरा' था। ऊपर कुएं का मुहाना भी नजर नहीं आ रहा था।
कुए की दीवार में बने इस छोटे से गार में जो गैर इन्सानी प्राणी आबाद थे-वे दो मर्द और एक औरत थी । बे रेखा को देखकर बहुत खुश थे। रेखा इस गार के पथरीले फर्श पर बैठी थी और वै दोनों मर्द पागलों की तरह उसके गिर्द नाच रहे थे जबकि औरत एक तरफ खडी हैरत से उसे देख रही थी ।
यह खबर कि एक इन्सान की बच्ची कुएं में आ गई है ऊपर सै नीचे तक कुए कीं हर खोह में फैल गई थी । यह गार कुएं के लगभग बीच में था। कुए के प्राणी ऊपर व नीचे से रेखा को देखने आ रहे थे।
रेखा को कुछ मालूम न था कि उसके गिर्द क्या हो रहा है? उसे यह अहसास तो था कि उसके आस पास कोई है-बोलंने की आवाजें भी आ रही थीं, लेकिन ये लोग कौन-सी भाषा बोल रहे थे और क्या कह रहे थे-यह उसकी समझ में नहीं आ रहा था । बहरहाल, बह इसी में खुश थी कि वह कुएं में गिरने से बच गई थी। मौत किसी गोली की तरह उसके कान के पास से गुजर गई थी।
रेखा का खौफ कम हो गया था,लेकिन दिल किसी तरह भी ठिकाने पर नहीं आ रहा था। बदहवासी भी पूर्ववत: ही थी और वह गहरे-गहरे सास ले रही थी। निश्विन्नता के बावजूद उसकी घबराहट नही जा रही थी। उसे अपना दम घुटता महसूस हो रहा था।
"ऐ तुम लोग इसे ऊपर क्यों उठा लाए हो इसे कुए में क्यों नहीं गिरने दिया?" उस औरत ने जो खोह के एक कौने मे खामोश खड़ी थी नाचते हुए मदों से पूछा।
”तू नहीं जानती कि यह कौन है?" एक मर्द ने जवाब दिया ।
”जानती हूं। इन्सान की बच्ची है। "
"तो फिर ऐसा उल्टा सबाल क्यों किया?"
"इसका करोगे क्या? " औरत ने पूंछा ।
“क्या जरूरी है कि तू जिस बात क्रो नहीं जानती उस बात को जाने। "
"बताने मे क्या हर्ज है?"
"क्या तूने कासगन का ऐलान नहीं सुना । "
”केसा ऐलान? मुझे तो नहीँ मालूम ।"
"हां तुझें कैसे मालूम होगा तू कौन-सा कुए से निकली है? "
”कुछ बताओ तो... । "
"पहाडों के इस पार कासगन कीं वस्ती है और यह ऐलान होता रहता है कि अगर कहीं कोई आदमजात नजर आ जाए तौ उसे फौरन उसके सामने पेश किया जाए। 'इसान' को पकड़कर लाने वाले को मुह मागा इनाम देगा I"
" ओह्न तो क्या तू इसै कासमन के सामने पेश करने का इरादा रखता है. " औरत ने पूछा ।
"तो और क्या?" वह झूम-झूमकर नाचने लगा।
"लेकिन इनाम का हकदार तो मै हूं।" नीचे वाले गार का बासी बोला-- "मैंने इसे पहचानकर बताया था कि यह इन्सान की बच्ची है। "
"सबसे पहले देखा तो मैने था।" ऊपर वाले ने कहा।
"तूने कैसे देखा था? हम सब तो सो रहे थे। ”
"मैं इसकी चींख की आवाज पर जाग गया था । मैने फौरन ही झांक्कर देखा था। "
अब उन दौनों में तू मै मै होने लगी कि इनाम का असली हकदार कौन है? तब सबसे नीचे बाली खोह से एक को बुलाया गया । यह समस्या उसके सामने चली गई। उसने कहा कि इनाम के हकदार दोनों हैं वह भी जिसने पुष्टि की थी कि यह इंसान क्री बच्ची है ।
इधर पंचायत लगी थी । फैसले हो रहे थे और उधर रेखा को कुछ भी मालूम न था कि उसके बारे में क्या तय हो रहा है .....
उसके सिर की कीमत लंग चुकी थी ओर अब बह किसी कासगन के हवाले की जाने वाली थी। उसकी हालत खराब थी। सासें किसी तौर पर भी संयत नहीं हो पर रही थी I दम घुटने की अवस्था बढती जारही थी। वह अपने दोनों हाथों से गला पकडर लम्बे लम्बे सास ले रही थी ।बुजुर्गं के फैसला देते ही रेखा एक तरफ लुडक गई। वह बेहोश हो चुकीं थी।
"अरे, इसे क्या हो गया? देखौ । " औरत ने सबका ध्यान रेखा की तरफ खींचा ।
"क्या हुआ?" एक साथ कईं आवाजें आई ।
"यह होश गवां बैठी है । इसे जल्दी से पहाडों के उस पार ले जाओ-वरना यह मर जाएगी। यहाँ का वातावरण शायद इसे रास नहीं आया। " बुजुर्ग ने बेहोश को देखकर कहा।
फोरन ही उन दो मर्दों (कुएं के गेर इन्सानी प्राणियों)-जिन्हें इनाम का हकदार करार दिया गया था ने रेखा को उठाया और सम्भालते हुए कुंए की तह मै जाने लगे । वह बहुत गहरा कुंआ था I इसे 'मृत्यु कूप' ठीक ही कहा जाता था । कुए कीं तह में कोई तेल जेसी चीज उबल रही थी । उससे धुआ उठ रहा था । इस उबलते द्रव्य में गिरते ही आदमी कण कण हो जाता था । कुएं का वातावरण आम व्यक्ति के अनुकूल नहीं था ।
रेखा शायद इसीलिए बेहोश हो गई थी । वे दोनो उसे सम्भाले हुए तह में जाने की बजाय-जहां तेल सा द्रव्य उबल रहा था और उसकी गर्मी काफी ऊपर तक महसूस हो रही थी-एक गार में घुस गया। यह खोह खली थी । यह दरअसल यहां से बाहर निकलने का रास्ता था । वे दोनों उसे उठाये हुए, उडते_ हुए ही पहाडों की तरफ जा रहे थे।