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A Horror Novel - स्वाहा complete

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इन्द्रजीत्त अन्दर आया तो वह अन्दाजा नहीं लगा पाया कि राकल ने उल्लू कीं लाश के साथ क्या किया है । राकल ने मृत उल्लू र्की तरफ इशारा करते हुए कहा ।

"इसे बाहर ले जा । रेत खोदकर गाड दे ।"

इन्द्रजीत्त अन्दर आया तो वह अन्दाजा नहीं लगा पाया कि राकल ने उल्लू कीं लाश के साथ क्या किया है । राकल ने मृत उल्लू र्की तरफ इशारा करते हुए कहा ।

"इसे बाहर ले जा । रेत खोदकर गाड दे ।"

"मेरे पास यहा खोदने को कुछ भी नहीं है। "

"अपने हाथों से रेत हटाकर, छोटा-सा गड़ा वना और फिर इसे रेत से ढक दे। “

इन्द्रजीत ने ऐसा ही किया l बाहर ले जाकर उसने उल्लू को रेत में दबा दिया और हाथ झांड़ता हुआ उठ खड़ा हुआ।

इन्द्रजीत वापिस झोंपडी में पहुचा तो वह यह देखकर हैरान रह गया कि राकल के घाव तेजी सै भर रहे थे और फिर कोई आधे घण्टे में ही वो पूर्णतया स्वस्थ व सामान्य हो गया। वह वहुत खुश था और उठकर बैठ गया था।

राकल को खुश देखकर इन्द्र वोला---"देख राकल मैने तेरे साथ दुश्मनों का सा सलूक नहीं किया।“

"मै मानता हूं। " राकल उसका आभारी था।

"फिर मुझे सच-सच क्यों नहीं बता देता?”

"किस बारे में? "

"रेखा के बारे मैं । मेरी बहन के बारे में। मुझे बता दे कि वह कहां है?”

"आह । " रेखा का नाम सुनकर राकल ने एक सर्द आह भरो और खाली-खाली नजरों से इन्द्र को देखने लगा ।

उसकी समझ मॅ नहीं आ रहा था कि इन्द्र को क्या जवाब दे। उसने सिर झुका लिया । इंद्रजीत जवाब का प्रतीक्षक था, पर जब राकल काफी देर तक कुछ नहीं बोला तो इन्द्र ने उसे पुकारा---"राकल ।"

राकल ने अपना सिर उठाया, फिर धीरे सै बोला-- "जो होना था, हो चुका। अब कुछ नहीं हो सकता ।”

इन्द्र को उसके जवाब पर हैरत हुई। वह कुछ समझ ही नहीं पाया था। यह उसके सवाल का जवाब भी तो नहीं था। इन्द्र क्रो लगा जेसे राकल उसै सही जवाब नहीं देना चाहता, सो उसने भी आगे कोई सवाल नहीं किया।

एक लम्बी खामोशी के बाद राकल ही बोला था-- ”इन्द्रजीत, क्या यह मुमकिन है कि तू कुछ देर के लिए झोपडी. से बाहर चला जाए । "

"हा , क्यों नहीं?" इन्द्र खडे होते हुए बोला-- "लेकिन बात क्या है?"

"जव तू थोडी. देर बाद वापिस आयेगा तो सब कुछ जान लेगा।" राकल ने जवाब दिया ।

इंद्रजीत उसके कहने पर झोपडी. से बाहर चला गया I वह घूमकर झोपडी के पीछे चला गया और फिर कुछ देर वहां _खडे रहने के बाद जब वापिस आया और झोपडी मे कदम रखा तो हैरान रह गया।

लगडा राकल झोपडी. में मोजूद नहीं था।

इन्द्र फ्तटका झोंपडी, से बाहर आया। उसने चारों तरफ नजर दौडाई., लेकिन उसे राकल कही जाता हुआ भी नजर नहीं आया । हां, एक उल्लू जरूर उडता. हुआ दक्षिण दिशा में जाता नजर आया था।

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राकल इन्द्रजीत को धोखा देकर निकल गया था , लेकिन वह इस बात से बेख़बर था कि खुद उसकी किस्मत ने उसके साथ कितना बड़ा फरेब किया था। उस पर कितनी बडी चोट लगाई थी I

और यह बात उसे सुनहरे खण्डहर पहुचकर मालूम हुई। वहां का नक्शा ही बदला हुआ था । सरदार कोलाना ने सुनहरे खण्डहर की ईट से ईंट बजा दी थी। अब यहा कुछ न बचा था। हर चीज तबाह हो गई थी। हर तरफ तबाही फैली हुई थी और सरदार कोलाबा के हरकारे राकल की धात में बैठे थे।

सुनहरे खण्डहरों मॅ जब वह अच्छी तरह घूम लिया और उसने अपनी बर्बादी के निशान हर तरफ देख लिए तो कोलाना के हरकारे उसके सामने आ गए। अपने महल व अपने इस मायालोकं की बर्बादी देखकर राकल पहले ही अधमरा हो रहा था सरदार कोलाबा की हरकर्तों को देखकर उसके होश ही उड गये।

सरदार कोलाबा के हरकारों ने उसे देखते-ही-देखते जजीरों मे जकड़ लिया और फिर जिस तरह काले चिराग को लै जाया गया था-बैसै ही राकल को ले जाया गया और उसे सरदार कोलाबा के सामने ले जाकर डाल दिया गया।

सरदार कोलाना ने अपने लम्बे वालों पर हाथ फेरा और मुस्कराते हुए बोला-- "आओ, फरेबी! "

"सरदार कोलाबा देवा काली की कसम मैने कोई फरेब नहीं दिया । "

"देख़, देवा काली की अगर झूठी कसम खाएगा तो में तुझे छोडूंगा' नहीं। अभी खत्म कर दूगा'।"

“में सच कहता हूं सरदार । मैंने तुझसे जो वायदा किया था वह मैं हर कीमत पर पूरा करता। मै सूरज निकलते ही काला चिराग क्रो लैकर यहां पहुच जाता, लेकिन 'मुक्ति द्वार' पर बेशुमार भेडियों, ने मुझ पर हमला कर दिया और मुझे घसीटते हुए ले गये। रास्ते में मैं जख्मी कीं पीड़ा बर्दाश्त न कर सका और बेहोश हो गया और जब मुझे होश आया तो बहुत देर हो चुकी थी । अब सरदार तू ही बता कि इसमे मेरा क्या कसूर है?"

“तेरे बारे में काला चिराग सही कहता है कि तू बड़ा 'ख़ब्बीस' है I तूने वाकई बढी… शानदार कहानी गढी, है और ऊपर से देवा काली की कसम भी खा ली है । "

"मैं सच कहता हूं सरदारा तू मेरा यकीन क्यों नहीं करता?"

”चल, कहता होगा तू सच । अब में क्या… कहूँ । तू वक्त पर नहीं पहुचा', लिहाज वो हो गया जो होना चाहिये था।”

"तुने मुझे कही का न छोड़ा-विल्कुत्त तबाह कर दिया । " राकल ने जेसे प्रलाप किया।

”तू जानता है कि काला चिराग हमारा कितना खास और महत्त्वपूर्ण आदमी है। तूने उसे क्या सोचकर कैद किया?”

"वस सरदार I गलती हो गई मुझसे । मुझे माफ कर दे । " राकल दीन भाव से बोला ।

" माफी। " सरदार कोलाना ने एक पैशाचिक कहकहा लगाया--”जरूर! ! पर तुझे सिर्फ एक ही सूरत में माफी मिल सकती है । "

"वह क्या? "

"तुझे वकाल से हाथ धोने पडेगी। "

"क्या तुझे वह पसन्द आ गई है? क्या तू उससे शादी करना चाहता है, सरदार? " राकल ने तेजी से पूछा I इस पर सरदार कोलाना ने फिर एक जोरदार कहकहा लगाया, फिर बोला--"अहमक I "

राकल ने उसे उलझी उलझी निगाह से देखा--”में समझ नहीं। "

"तू समझेगा भी नहीं । मैंने तुझे अहमक यूं ही नहीं कह दिया । अरे बेवकूफ वह काले चिराग की मुहब्बत है । तुझे बकाल को उसके लिए छोडना होगा ।"
 
"तू समझेगा भी नहीं । मैंने तुझे अहमक यूं ही नहीं कह दिया । अरे बेवकूफ वह काले चिराग की मुहब्बत है । तुझे बकाल को उसके लिए छोडना होगा ।"

"यह जुल्म है। " राकल ने विरोध दर्शाया l

"और तुम्हारी बहन ने जो 'आदम की औलाद' की जिन्दगी हराम कर रखी है वह जुल्म नहीं है क्या?"

"मैं नहीं जानता। " राकल अनजान बन गया ।

"लेकिन मै बहुत कुछ जानता हूं। मैंने एक फैसला किया है । “

" वह क्या?" राकल ने धडकते, दिल के साथ पूछा--और अब जो सरदार कोलाना ने उसे अपना फैसला सुनाया , राकल को जैसे साप' ही सूघ' गया। वह चींखकर बोला - "नहीँ! ऐसा कदापि नहीं हो सकता I "

"क्यों नहीं हौ सकता। " सरदार कोलाना ने कदरे गुस्से से कहा- "और तू कोन है एतराज करने वाला?"

"मै तेरे इस फैसले को मानूं न मानू लेकिन बकाल किसी कीमत पर राजी नहीं होगी I वह तो उसकी शक्ल तक देखने को तेयार नहीं। " राकल बोला ।

"उसे बुलाओ।" सरदार ने हाथ से इशारा किया ।

उसका इशारा पाकर दो दासियाँ तेजी से बाहर निकल गई और आनन फानन में बकाल को कलाई सै पकडकर ले आई। वकाल ने जब अपने भाई को जजीरो में जकडा हुआ देखा तो उसे सख्त सदमा पहुचा' I राकल ने उसे दासियों के साथ खुश-खुश आते देखा तो वह सुलग ही तो उठा। उसकी तबाही में सीधे उसकी इस बहन का ही हाथ था और बकाल उसे खुश नजर आ रही थी ।

"सरदार कोलाना की दासियों वकाल का हाथ छोड दो और इज्जत के साथ तख्त पर वेठाओं । " सरदार कोलाना ने हुक्म दिया ।

आदेश सुनते ही दासियों ने फौरन उसके हाथ छोइ दिए और फिर सिर नवाते' हुए उसे तख्त पर बैठने का इशारा किया, लेकिन वकाल अपनी जगह खडी रही ।

"क्या हुआ, आगे क्यों नहीं वढती, क्या तुझें इज्जत रास नहीं ।" सरदार कोलाना शुष्क लहजे मैं वोला।

"जिसका भाई जंजीरों में जकडा. हुआ उसके सामने खड़ा हो वह किस तरह बैठ सकती है, सरदार?"

"सरदार कोलाना कीं दासियों! राकल कीं जजीरें खौल दो ।" सरदार ने तुरन्त हुक्म दिया-“बकाल का एतराज है I "

सरदार के इस आदेश का भी तुरन्त पालन हुआ। राकल को मुक्त किया गया और फिर उसे भी एक कुर्सी पेश की गई । उसे सहारा देकर कुर्सी पर बैठाया । उसके कुर्सी पर बैठने के बाद बकाल ने भी आसन सम्भाल लिया, लेकिन उसके चेहरे पर परेशानी बनी रही।

सरदार कोलाना बोला-- ”हमने एक फैसला किया है। तेरी गेरमौजुदेगी में तेरे भाई को अपना फैसला सुनाया तो उसने कहा कि तू इस फैसले को नहीं मानेगी, इसीलिए तुझे तलब किया गया है कि तुझे भी फैसला सुनाया जाए I "

"अपना फैसला सुना। ” वकाल लापरवाही से बोली।

“ राकल तू बता I " सरदार ने राकल की तरफ देखा।

"सरदार क्रोलाना तेरी शादी काले चिराग से करना चाहता है। " राकल ने बताया।

यह सुनते ही बकाल के होश उड गये। वह गुस्से सै बोली--"ऐसा हरगिज नहीं हो सकता । "

"कुछ ऐसा ही अभी तेरे भाई ने भी कहा था। अब तुम दोनों मेरी बात कान खौलकर सुन लो । सरदार कोलाना-ने निर्णायक अन्दाज में कहा-- "मेरा फैसला सूरज की तरह अटल है। आज रात ठीक बारह बजे देवा काली के सायबान तले तुझे और काले चिराग को शादी के बंधन में बांध दिया जाएगा I "

और वह अब फिर अपनी दासियों से सम्बोधित हुआ-- "सरदार कोलाना की दासियों! बकाल को अपने साथ ले जाओ और शादी की तैयारियां करो I ”

सरदार क्रोलाना के दरबार में इस वक्त जितनी दासियाँ हाजिर थी सभी ने बकाल को अपने घेरे मे लिया और उसे अन्दर ले गई। बकाल तो जैसे जड़ होकर रह गई थी । यह भी नहीं सूझा था कि कैसी प्रतिक्रिया जाहिर करे?

बकाल के जाने के बाद कोलाना, राकल से मुखातिब हुआ--"अब तू बोल तेरा क्या किया जाए?"

"यह तू अच्छा नहीँ कर रहा सरदार।"

"वह इन्सान की बच्ची कहां है, जिसे तेरी वहन ने तेरी सेवा में पेश किया था? " सरदार कोलाना ने सर्द-सी मुस्कान के साथ पूछा l

"उसे मैंने 'मुक्ति द्वार' में फिकवा दिया। " राकल ने स्पष्ट उदिता से काम लेते जवाब दिया।

"तेरी वहन ने उसके भाई पर कब्जा कर लिया और तूने उस बेचारी को मौत के हवाले कर दिया । फिर भी तू मुझसे कहता है कि मैं अच्छा नहीं कर रहा । क्या मैं पूछ सकता हूं कि तू और तेरी बहन ने अब तक जो किया है-अच्छा किया है? "

राकल इस बात का क्या जवाब देता । उसने अपना सिर झुका लिया ।

"अब तुझे एक काम करना होगा। " उसे बोलते न देख सरदार बोला ।

"हुक्म कर सरदार कोलाना। " राकल का सिर अभी भी झुका हुआ था।

"शादी मे शामिल होने के बाद तुझे उस 'आदम जात' यानि इन्द्रजीत्त को स्वस्थ करना होगा और फिर उसे उसकी दुनिया में छोडकर आना होगा । "

"मुझे मजूर' है सरदार कोलाना।“ राकल एकदम बोला।

“यह मत समझना कि इस तरह तू फरार का रास्ता पा जाएगा। तुझे अपनी 'रूह' को गिरवी रखकर जाना होगा। जब तू मेरे हुक्म क्रो पूरा करके वापिस आएगा तो फिर

सोचा जाएगा कि तुझे माफ किया जाए _या नहीं।"

"मुझें यह भी मजूर है।"

"फिर ठीक है । " क्रोलाना ने कहा और फिर अपने सैवको से बौला..."सरदार कोलाना के सेवको! राकल को इज्जत से ले जाओ । इसे खास मेहमान का दर्जा दो। "

सरदार कोलाना के छ: सेवक आगे बडे और राकल को बड़े सम्मान के साथ मेहमान खाने की तरफ ले गए।

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राकल के जाने के बाद सरदार कोलाना ने दरबार में मौजूद अपने सेवकों को जाने का इशारा किया और दरबार खाली हो गया ।

अब वहां सरदार कोलाना अकेला रह गया था।

उसने तीन बार ताली बजाई । ताली की आबाज सुनकर 'वो' एक खम्बे की आड से निकला और मुस्कराता हुआ सरदार कोलाना के सामने आ खडा, हुआ। सरदार कोलाना ने उसे अपने करीव ही मसन्द पर बैठा लिया। सरदार कोलाना के करीब बैठने का सम्मान यहा' सिर्फ उसी को प्राप्त था । 'बो' सरदार कोलाना का दिमाग था..उसका दायाँ हाथ था...उसका सब कुछ था । 'वो' काला चिराग था । 'काले चिराग' तुझे बकाल मुबारक हो। आज की रात वह तेरी हो जाएगी I" सरदार ने मुस्कराते हुए कहा।

"मै तेरा गुलामा तेरा शुक्रगुजार हूं। " काले चिराग ने आदरपुर्ण लहजे में जबाव दिया था।

”एक बात बता मैने जो किया ठीक किया। "

"इन्द्रजौत को मैं खुद उस दुनिया में छोडकर आना चाहता हूं। " काले चिराग ने अपनी इच्छा जाहिर की।

"तेरा क्या ख्याल है कि उसकी 'रूह' गिरवी होने के वावजूद वह मेरे साथ धोखा करेगा।”

"उसने इन्द्रजीत्त की बहन को 'मुक्ति कूप' में फिकवा दिया है। इस बात कीं क्या जमानत होगी कि वह उसे वाकई उस दुनिया तक छोड आएगा। " काले चिराग ने शंका व्यक्त की--"अगर उसने रास्ते में हाथ दिखा दिया तो फिर क्या होगा? "

"हां, यह बात भी तू ठीक कहता है। उस 'खब्बीस' ( धूर्त शेतान) का कोई भरोसा नहीं । यूं भी इस अय्यार का जिन्दा रहना ठीक नहीँ । फिर भी तेरा क्या ख्याल है-खत्म कर दिया जाए उसे?”

"हां। यही मुनासिब है। " काले चिराग ने सहमति दर्शाई-- "अगर वह जिन्दा रहा तो बकाल को बहलाता रहेगा I मेरी जान का दुश्मन तो वह पहले ही था-अव तू भी उसकी फहरिस्त (लिस्ट) में आ गया है । माफी कीं सूरत में कुछ समय बाद फिर सिर उठाएगा। इसलिए बेहत्तर तो यही कि इस नाग के फन उठाने से पहले ही उसका फन कुचल दिया जाए।"

"ऐसा ही होगा । " सरदार कोलाना ने सजीदगी' से सहमति दर्शाई "लेकिन तू जानता है कि उसे ख़त्म करने के लिए काली देवा से इजाजत लेनी होगी । "
 
"मैं समझता हूं कि यह इजाजत बडी आसानी से मिल जाएगी क्योकिं उसके जुर्मों कीं पत्री काफी लम्बी है।” काले चिराग ने कहा ।

“तू बेफिक्र हो जा I में देवा काली के दरबार में जाकर इजाजत नामा ले आऊगा'। तू तव तक अपनी दिलरूबा के साथ जश्न मना । " सरदार हस दिया था।

"मै तेरा गुलाम. ..तेरा शुक्रगजार हूं।" काला चिराग बोला।

"जा कुछ देर आराम कर ले।”

काला चिराग जाकर सो गया और फिर जब वह सोकर उठा तो सूरज ढल रहा था । साये फैल रहे थे। देवा काली के सायबान वाले में लोग एकत्रित होने शुरू हो गये ये।

और यह देवा काली का सायबान भी अजीब चीज था ।

चार स्तम्भ खडे थे। इन रतम्भो पर न कोई छत थी और न ही सायबान नाम की कई चीज । चारों स्तम्भो के बीच एक छोटा-सा 'हौज' था । इस हौज में पानी न था, आग भरी हुई थी। इस हौज की आग आज तक नहीं बुझी धी । बस, इसी स्थान का नाम देवा काली का सायबान था।

अंधेरा हौते ही इस हौज की आग से बेशुमार मशालें रोशन कीं गई और उन्है मेदान में जगह जगह गाड़ दिया गया' I यू शादी के समारोह आयोजन का प्रारम्भ हुआ।

जब खूब अंधेरा हो गया तो जजीरी नाच शुरू हुआ । सिर्फ लोहे की जंजीरे पहने कद्दावर बलिष्ठ खूबसूरत औरतें मैदान मे ऊतर आई और उन्होंने जंजीरो के एक दूसरे सै टकराकर "जंजीरो के नाच" की शुरुआत की। एक खास अंदाज में उठते हुए कदम जजीरों की झंकार और कद्दाबर औरतों के खूबसूरत चमकते बदन देखने बालों को मंत्र मुग्ध किए दे रहे थे।

जब एक ग्रुप नाचते-नाचते थक जाता तो उसकी जगह नया ग्रुप जगह ले लेता । चौदवी का चाँद पूरे आबो-ताव व योवन के साथ आकाश के माथे पर झूमर बनकर जगमगाने लगा और बारह बजने को हुए तो सरदार कोलाना ने एक मशाल उठाकुर दुल्हा-दुल्हन को देवा काली के सायबान में लाने का इशारा किया।

थोडी देर बाद जब सरदार कोलाना की नजर देवा काली के सायबान की तरफ उठी तो वह यह देखकर परेशान हो गया कि वहां सिर्फ काला चिराग था । यह बडी अशुभ व अपशुगनी की बात थी। देवा काली के सायबान में तो दूल्हा-दुल्हन एक साथ जाकर खडे होते थे।

फिर यह बकाल आखिर कहा गई?

सरदार कोलाना अपने आसन से उठा तो उसे उठता देखकर नाचने बाली औरतें ठहर गई। पत्थर हो गई। उन्होने भी काले चिराग को देवा काली के सायबान में अकेले खडे देख लिया था।

मेदान में नाच रुकत्ते ही सन्नाटा छा गया । मशालें जल्दी-जन्दी जाने लगीं । मशालों की रोशनी खत्म हौ गई, सिर्फ चाद' की रह गई।

सरदार कोलाना तेज-त्तेज कदम उठाता देवा काली के सायबान के पास पहुचा । काले चिराग का चेहरा, हौज में दहकती आग क्री वजह से लाल हो रहा था । उसके चेहरे पर गम व रोष के बादल छाये हुए थे।

"तू अकेला क्यों है ? " सरदार ने पूछा ।

"वह चली गई। मेरी बकाल चली गई। ”

"क्या कहता है । सरदार कोलाना के इलाके से कोई कैसे फरार हो सकता है। यह बात तू अच्छी तरह जानता है ना ?"

"सरदार कोलाना, तेरा गुलाम सव कुछ जानता है। वह फरार नहीं हुई। काश वह फरार हो जाती। "

"फिर क्या हुआ?" सरदार चौका ।

"वह 'पिघल' गई। ख़त्म हो गई वह!!" काले चिराग ने दर्दनाक खबर सुनाई।

"पिघल गई।"

" देवा वाली की कसम !"

" यह उसने क्या बेवकूफी की?" सरदार कोलाना परेशान हो गया।

"उसे मेरी सूरत सै भी नफरत थी।" काला चिराग व्यथित स्वर मे बोला ”वह भला मुझसे शादी क्यों कर लेती? यह मेरी भूल थी।।"

“आ मेरे साथ । मुझे दिखा कहा है बौ?"

काला चिराग सरदार कोलाना को उस कमरे में ले गया जहा बकाल पिघली' हुई पडी थी । बकाल का सुहाग जोडा मसहरी के एक तरफ पडा था और महल मेँ फर्श पर गहरे सुर्ख रग का द्रव्य था जेसे पिघली हुई आईसक्रीम लेकिन यह द्रव्य बिल्कुल पारे की तरह था यानि कि उसे मुट्ठी में भरें तो मुट्ठी में कुछ न रहे और हाथ भी ख़राब न हो ।

बकाल ने अपनी जान अपने हाथो ले ली थी। काले चिराग से शादी से बचने के लिए आत्महत्या कर ली थी।

काला चिराग बेहद उदास था । अगर उसे यह मालूम होता कि बकाल उससे इस कदर नफरत करती है कि 'पिघलने' की यातना को झेल लेगी, लेकिन उससे शादी नहीं करेगी तो वह शादी की पेशकश को बापस ले लेता । यूं वकाल के जिन्दा रहने की सूरत में वह कम सै कम उसकी शक्ल तो देख सकता था।

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अब तो सारा खेल ही खत्म हो गया था।

बबरहाल, इस मायावी लोक की रस्म के अनुसार चांदी की एक गागर मंगबाई गई । काले चिराग ने उस 'पिघले' द्रव्य को गागर में उडेला', उसके मुह पर कपडा बाधा' और गागर को अपने कंधे पर उठाता सरदार के महल से निकलकर देवा काली के सायबान की तरफ बढा ।

देवा काली के सायबान में पहुचकर काले चिराग ने गागर हौज की दीवार पर रख दी और फिर उसने इस जलते हुए हौज के सात चक्कर काटे । सात चक्कर पूरा करने के बाद उसने गागर उठाई ओंर उसे एक वार फिर अपने कंधे पर रखकर चाद' की दिशा में चल पडा । उसके पीछे चार घुडसवार चल रहे थे जो जरूरी सामान लिए हुए थे।

काला चिराग, बकाल के द्रव्य बाली गागर क्रो लिए तव तक चलता रहा, जब तक चाद दुवलाने नही तगा। जव चांदनी' फीकी पडने… लगी तो वह एक रेत के टीले के निकट पहुचकर रूक गया ।

उसे रुकता देखकर वे चारों घुडसवार भी फौरन उसके पास पहुचकर घोडों से उतर गए। काला चिराग एक जगह चुनकर गागर अपने कंधे से उत्तारकर रख चुका था । उन चारों घुडसबारो ने रेत में लोहे की जेसी लम्बी कीलें गाडी। इन कीलों में अपने साथ लाई जजीरे बाधी' और फिर इन चारों जजीरों' के सिरे कीलों के बीची-बीच रखी हुई गागर की गर्दन में कस दिये । फिर वे चारों पीछे हट गये व एक कत्तार में सिर झुकाकर खडे हो गये।

काले चिराग ने घुटनों के बल बैठकर अपनी मुट्ठी में रेत भरी और वह रेत अपने सिर में डाल ली । फिर उसने अपने हाथ पीछे करके कहा-- "लाओ... । "

एक घुडसवार, आगे बढा और एक वैलचा काले चिराग के हाथों में थमा दिया । काला चिराग वेलचा हाथ में लेकर खडा हो गया । फिर उसने वह बेलचा जोर से गागर पर मारा और सात कदम पीछे हटकर खड़ा हो गया ।

बकाल तूने जिससे मुहब्बत की वह तुझसे नफरत करता रहा और जिसने तुझसे मुहब्बत कीं उससे तू नफरत करती रही और यही नफरत तुझे आसमानों में ले गई। तुझे क्या मिला-यह अब तू अच्छी तरह जान गई होगी। काश तुझे जिन्दगी गवाने' से पहले अक्ल आ गई होती। तुझे सच्ची मुहब्बत की पहचान हो गई होती। मैं तुझसे आज भी मोहब्बत करता हू और जिन्दगी भर इसी तरह करता रहूगा'। तू मेरे दिल में, मेरी आखों' में, मेरे ख्यालों में जिन्दा रहेगी। चांद-सूरज के मालिक से मैं तेरी मुक्ति की दुआ करता हूं। "

यह कहते कहते उसकी आखो से दो आसू टपके और रेत में लीन हो गए।

फिर वह आगे बढा । उसने गागर के निकट पहुचकर बेलचे से गागर पर रेत डाला । सात वार रेत डालने के बाद वह पीछे हटा और बेलचा उस घुडसवार के हाथ में दे दिया जिससे लिया था । इसके वाद वह एकतरफ सिर झुकाखर खडा हो गया ।

वे चारों घुडसवार आगे बढे । उन चारों के हाथ में वेलचे थे।

वे बेलचो में रेत भर भरकर उस गागर पर डालने लगे। थोडी. ही देर में जजीरे' रेत मे दब गई और रेत गागर की गर्दन तक पहुच गई। दफनाने की रस्म पूरी हो चुकीं थी।

एक घुडसवार. ने अपना घोडा. काले चिराग को पेश किया। काला चिराग उस पर सवार हो गया। वह घुडसबार अपने एक साथी के साथ उसके घोडे पर सवार हो गया था और यू वापस्री का सफर शुरू हो गया।

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सूरज उदय होने तक वै अपने इलाके में पहुच गए।

तभी उन्हें अपने सामने से एक घुडसवार वहुत तेजी से घोडा दौडाता आता नजर आया । जब वह निकट आया तो काले चिराग ने देखा कि वह सरदार कोलाना का खास मुहाफिज था और उसके चेहरे पर हवाइयां उड रही थीं।

"क्या हुआ?" काले बिराग ने पूंछा।

"काला चिराग जल्दी चल, तुझे सरदार ने तलब किया है । वह काफी देर ले तैरा प्रतिक्षक है। " वह हरकारा बोला।

"क्या तुझे इस इंतजार' की वजह मालुम है?" कुछ सोच पूछा था काले चिराग ने ।

"वही खब्बीस । " हरकारे ने जवाब दिया ।

"क्या लंगडे राकल ने कोई गडबड… कीं है?" काले चिराग ने उसका इशारा समझ, जानना चाहा।

"उस खबीस ने सरदार पर हमला किया और निकल गया। " हरकारे ने बताया।

"सरदार जख्मी तो नहीँ हुआ। "

"हाथ जख्मी हुए हैं । आखे बच गई।“

"ओह ! " काला चिराग पहले ही क्या कम उदास था-इस सूचना ने उसे और भी उदास कर दिया। उसने अपने घोडे को ऐड़ लगाइ और फिर जैसै हवा में उडता… हुआ सरदार कोलाना के महल पर पहरा गया ।
 
काले चिराग को कमरे मे आते देखकर, सरदार कोलाना ने हाथ के इशारे से दास व दसियों को कमरे से चले जाने का इशारा किया। वह एक ऊंच्ची कुर्सी पर बैठा था ओर काले चिराग को देखकर मुस्करा रहा था ।

"परेशान मत होओ। मे ठीक हूं। ”

"वह आखिर कार अपनी शैतानियत दिखाने से बाज नहीं आया। आखिर यह सब हुआ कैसे ?" काले चिराग ने चिन्तित लहजे में पूछा ।

"तेरे जाने के बाद जब मैंने वकाल कै 'पिघलने' की इतला उस तक भेजी तो वह अपने कमरे मेँ नहीं था। उसके गायब होने की इतला पर मैं परेशान हो गया । मैं यह देखने के लिए कि मामला क्या है, अपने कमरे से बाहर आया तो वह मेरी घात में था। बस, बो अचानक मुझ पर हमलावर हुआ। उसके हमलावर होते ही अचानक मेरी नजरे उस पर पडी, ओर मेरे हाथ आखों पर चले गए। मेरी आखें वच गई। हां, हाथ जख्मी हो गए। खैर, बो बचकर कहां जाएगा? वहुत हो गई। अब हमें देवा काली के दरबार मैं जाना होगा।"

”पहले उसे 'सुनहरे खण्डहरों' मे न तलाश कर लें। " काले चिराग ने सुझाव दिया।

”अब्दल तो वो वहा जाएगा नहीं । अगर गया भी तो यहां उसका हाथ आना मुश्किल होगाI " सरदार कोलाना ने कुछ सोचते हुए कहा ।

"क्या पता हाथ आ ही जाए। हमें वहां जाकर देखना चाहिए। हाथ अगर न भी आया, तो यह अदाजा' तो हो ही जाएगा कि वो नहीं है। देवा काली को बताने मै आसानी होगी।'' काला चिराग बोला ।

"तूने देवा काली को क्या समझा है?” सरदार कोलाना को गुस्सा आ गया ।

"मै तेरा गुलाम मेरा यह मतलब न था । " काले चिराग ने फोरन सिर झुका लिया।

“अब तू इन बार्तों को छोड और देवा काली के दरबार ये चलने की तैयारी कर ।" सरदार ने हुक्म दिया ।

"आज ही जाना होगा ।" काले चिराग ने पूछा ।

" हां !"

”तेरे हाथ जख्मी है, सरदार कोलाना।। " काले चिराग ने चिन्ता व्यक्त की।

"इससे क्या फर्क पडता है?" सरदार कोलाना ने जबाव दिया । फिर कुछ सोचते हुए बोला--"ये जख्मी हाथ गवाही के काम आऐगे।''

" तू ठीक कहता है। तो मैं जाने के लिए सवारी का इन्तजाम करवाता हूं। " यह कहकर काला चिराग बैठक सै बाहर आ गया । थोडी देर बाद ही वे तेज रफ्तार ऊटों पर सवार देवो काली के 'अग्रि मन्दिर' की तरफ उडे जा रहे थे।

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उड़ा तो 'वो' भी जा रहा था ।

लेकिन उसका रुख 'सुनहरे खण्डहरों' की तरफ न था। वो उस रेगिस्तान की तरफ जा रहा था, जहां इन्द्रजीत्त की झोपडी थी ।

उधर काला चिराग और सरदार कोलाना-देवा काली के दरबार मैं पहुचे तो इधर लगडा राकल इन्द्रजीत की झोपडी कीं छत पर आ बैठा।

इन्द्रजीत अपनी झोपडी में सो रहा था। उसके पास काम ही क्या था । खाना और सो जाना । इस वक्त भी वह खाना खाकर सोया था ।

अचानक उसे यूं महसूस हुआ जैसे कोई भारी पक्षी उसके सीने पर आ बैठा है।

वह हडबडा.. उठ गया!

उसने झोपडी में चारों तरफ देखा। कहीं कोई पक्षी न था । शायद वह ख्वाब देख रहा था । वह उठकर खड़ा हो गया और अपनी झोपडी से बाहर निकल आया। जब से इस झोपडी, के निगरान उल्लू और नाग-मरे थे, तब से उसे झोपडी सै निकलने में कोई दिक्कत नहीं थी । यह आजादी मिले अभी दिन ही कितने हुए थे-ओर वह अब यही सोचता रहता कि जरा उसकी सेहत व ताकत बहाल हो जाए तो वह यहा से जाने के बारे में सोचे।

बाहर निकलकर उसने सामने दूर तक नजर डाली l कुछ न था । बस रेत के बवूले नाच रहे थे । वह यूं ही टहलता हुआ झौपड्री के पीछे चला गया।

इन्द्रजीत्त के झोपडी. के पीछे जाते ही वह उल्लू नीचे उतरा और झट सै झोपडी के दरवाजे में दाखिल हो गया । इन्द्रजीत्त झोपडी का चक्कर काटकर वापिस आया। उसे प्यास महसूस हो रही थी। वह दरवाजे में दाखिल हौता जैसे ही सीधा खडा, हुआ तो राकल को अपने सामने देखकर आश्चर्यचकित रह गया राकल बुरी तरह हाफ रहा था, जेसे बड़ी बहुत दूर से दोडता हुआ आया हो ।

"राकल तू। " इंद्रजीत ने हैरान होकर कहा--"तू उस वक्त कहा गायब हो गया था? "

"गायब होना और हाजिर होना हमारे लिए कोई मसला नहीं है।" राकल बोला "मै अब तुझसे आखिरी मुलाकात करने आया हूं। "

"पर क्यों? "

"इन्द्रजीत् मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है। मै जानता हू कि मेरा बुलावा किसी भी वक्त आ सकता है। सरदार कोलाना अब तक देवा काली के दरबार में पहुच' चुका होगा । मैंने जो कुछ किया है-उसकी सजा बहरहाल मुझें भुगतनी ही होगी। मुझें हर कीमत पर 'पिघलना' होगा। "

"पिघलना क्या मतलब? "

"तू नही समझेगा। जो कह रहा हू-तू बस सुनता जा । " राकल ने गहरे गहरे सास' लेते हुए कहा-"तूने पूछा था कि तेरी बहन रेखा कहा है-ओर मैने तुझे गोल मोल सा जबाब दे दिया था यही कहा था कि वह गुम हो गई है।"

"हा' । मुझे याद है । तूने यही कहा था ओर फिर इससे पहले कि हम इस बावत और बात करते, तू गायब हो गया था।

"इन्द्रजीत ! " राकल ने उसकी आखों' में झाकते हुए पूछा---"एक बात बता । बकाल तेरे लिए क्या है?"

"बकाल मेरे लिए आग है जो मुझें जलाती है । वह दोधारी तलवार है जो मेरे वजूद को रक्त रजित' करती है । वह गले में फसी' हई हड्डी है जिसे निगलना आसान नहीं और उगलना भी मुश्किल है।”

"इन्द्रजीत तेरी आग अपनी ही आग में जल मरी । तेरी दोधारी तलवार खुद को लहुलुहान कर बैठी । " राकल के चेहरे पर पीडा. के भाव उभर आए थे।

“में नहीं जानता कि तेरा मतलब क्या है?”

"नहीं जानता तो जान ले कि तेरी बकाल 'पिघल' गई। उसने खुदकशी कर ली। "

"खुदकुशी कर ली बकाल ने-अरे यह क्या हो गया?" इन्द्रजीत की हालत अजीब हो रही थी । उसे तो जैसै अपने कानों पर यकीन नहीं आ रहा था । उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह खुश हो या सजीदा' हो जाए। दिमाग ही जेसे ठस्स होकर रह गया था । वह खाली-खाली निगाहों सै राकल को देखने लंगा ।

"हां । इन्द्रजीत । मेरी बकाल मर गई I" राकल क्री आबाज में भर्राह्रट थी--"तेरी बकाल मर गई।"

"ओह! यह बहुत बुरा हुआ-या शायद अच्छा हुआ । " इन्द्र अन्तत: बोला I

"यह बहुत बुरा हुआ है, इन्द्रजीत ओर यह सव उस चमगादड़ के बच्चे की वजह से हुआ है।” राकल के तेवर ब्दले।

"कौन चमगादड़ का बच्चा? मै समझा नहीं । "

"वही काला चिराग । मैरी बहन बकाल कीं-काले चिराग के साथ जबरदस्ती शादी की जा रही थी और यह उसे बर्दाश्त न था । उसने खत्म होना' पिघलना' मजूर कर लिया, लेकिन उसकी होना मजूर न किया। इन्द्रजीत, सच यही है कि वह तेरी थी-और तेरे सिवाय उसे कुछ सूझता ही नहीं था । वह बडी मेहनत सै एक अमल-एक अनुष्ठान कर रही थी-जिसके बाद तू हमेशा-हमेशा के लिए उसका हो जाता । वह तुझ पर मरती थी और अन्तत्त: तुझ पर कुर्बान हो गई। इन्द्रजीत, अब तू आजाद है। जा अपनी दुनिया मै लोट जा I मेरे पास वक्त कम है। मुझसे अब कोई सवाल न कर । जा बाहर तेरे लिए सवारी मौजूद है उस पर बैठ जा। वह धुए की दीवार पार करा देगी और धुएं के उस पार तेरी दुनिया। चल उठ, जल्दी कर। देवा काली के दरबार में कार्यवाही शुरू हो चुकीं होगी और अब वस किसी भी क्षण मुझें मौत का पैगाम दिया जाने बाला है । जा इन्द्रजीत-जा। देवा काली तेरी रक्षा करे । हो सके तो मुझें माफ कर देना। मैने तेरी वहन रेखा को 'मुक्ति कूप' मे फिकवा दिया है । उसने मेरी बात नहीं मानी थी। मै उसके जादू का शिकार था। आह । आ पहुचा बुलाबा। अब जाता हूं। " वह बोलते-बोलते एकदम चुप हौ गया।

फिर जो कुछ हुआ, पलक झपकने में हुआ था। राकल एकदम सिमटा-उल्लू के रूप में दिखा जो पंख _फडफडाता हुआ झोंपडी के दरवाजे सै निकल गया।

इन्द्रजीत भी लपकता बाहर आया था । उसने आकाश मैं दूर तक देखा, लेकिन कहीँ कुछ नहीं था। तपता रेगिस्तान-सुनसान आकाश ।।

और फिर इन्द्रजीत की नजर झोंपडी के ठीक सामने उस सजी सजाई ऊटनी पर _ पडी जो शात भाव से बैठी जुगाली कर रही थी । यानि कि राकल ने जो कुछ कहा था-सच हो गया था ।

इन्द्रजीत ने अब समय नष्ट करना उचित नहीँ समझा । उसने जल्दी-जल्दी अपनी जरूरी चीजे समेटीं और उस ऊटनी पर सवार हो गया। ऊटनी उसके बैठते ही उठी और हवा हो ली।

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इन्द्रजीत की झोपडी से निकलते ही हवा तो खैर 'वो' भी हो गया था । उसे यूं महसूस हो रहा था जेसे वह खुद न उठ रहा हो-कोईं उसे उडाये. ले जा रहा हो।

उसके कानों सै निरन्तर देवा काली की कर्कश आबाज टकरा रही थी "राकल आ-राकल आओ।" और फिर ।

इस आवाज को सुनते सुनते उसे यूं महसूस हुआ जैसै किसी ने अचानक उसके पंख पकड़कर किसी छोटे-से दरवाजे में धकेल दिया हो और फिर उसकी आखों के आगे अंधेरा' छा गया । काला बादल सा आ गया।

"देवा काली -राकल आ गया है। " एक उच्चे कद का शख्स दरवाजे से अन्दर दाखिल हुआ। उसके हाथ में कोई चीज लटकी हुई थी जो काली चादर से ढकी हुई थी।

"इसे इधर ले आ। ” एक कर्कश आवाज आई। वह एक लपलपाता शोला था। इस शोले में एक छवि सी लहराई थी ओर यह आवाज भी वहीं से आईं थी। यह देवा काली का दरबार था।
 
एक बहुत बडा. हॉल जिसमें बेशुमार स्तम्भ थे। हर स्तम्भ के साथ एक दासी खडी' हुई थी। सामने ही एक वहुत वडा स्टेज था । इस स्टेज पर बारह फुट ऊची और तीन फुट मोटी एक शमां (मोमबत्ती) स्थापित थी। यह शमा` सारी की सारी सोने की बनी हुई थी। यह शमां प्रकाशमान थी और इसकी 'लो' भी खासी वडी थी ।

"लो' के लपलपाते इस शोले में एक चेहरे की छबि दिखाई देती थी और इस्री शोले रो कर्कश अवाज आती थी । यह देवा काली था ।

सरदार कोलाना...और काला चिराग सगमरमर' के फर्श पर आलती पालती मारे बैठे थे I यह पूरा हाँल उसकी दीवारें, उसके तमाम स्तम्भ सगमरमर' के थे। इस दरबार की अपनी एक छटा, अपना एक सोन्दर्य था, जिसे देखकर-देखने बाला मत्र' मुग्ध सा रह जाए।

देवा काली का हुक्म सुनकर वह देवकाय शख्स आगे बढा और उसने काली चादर से ढकी चीज को संगमरमर के चबूतरे पर रख दिया ।

"चादर हटा। " शोले से आवाज आई। सवने उसका चेहरा देखा। शमां की 'लो' मे हरकत हुई और जरा-सा लहराई थी-उसी में वह छबि दिखाईं दी थी उसी से आबाज आई थीं।

देवा काली के आदेश का पालन करते हुए उस देवकाय गुलाम ने चबूतरे पर रखी उस 'शे' से एकदम चादर हटा दी । यह एक पिंजरा था-जिसमें एक उल्लू बन्द था। उस देवकाय शख्स ने वह काली चादर अपने सिर पर 'साफे' की तरह बाधी और उलटे कदमों वापिस हो गया ।

अब हॉल में सरदार कोलाना, काला चिराग और दासियों के सिवाय कोई न था। सरदार और काले चिराग की नजरे 'शमा' की 'लो' पर थीं । पिंजरे में वन्द उल्लू एक टांग पर सीधा खड़ा था।

"राकल, क्या तू जानता है कि तूने और तेरी बहन वकाल ने क्या हगामे खडे कर रखै है?" देवा कालो की तीखी आवाज सुनाई दी और साथ ही शमा की 'लो' में उसके चेहरे की छवि लहराईं--"खैर, यहां बकाल का क्या जिक्र । वह खुद अपने हाथों अपनी जिन्दगी गवां बैठी है I उसने अपने किए की खुद सजा पा ली। मगर अब तू बता तेरे जुर्मो की पत्री भी कुछ कम नहीं है । तेरे साथ क्या किया जाए? तू इन दोनों को तो देख ही रहा है। ये दोंनों मुझे तेरे बारे मे बहुत कुछ बता चुके हैं । इनके बताए कीं रोशनी में अब तुझे सजा भुगतनी होगी I क्या तू इसके लिए तैयार है नहीं भी होगा तो कोई बात नहीँ। मैं तेरी गेर हाजिरी में ही अपना फैसला सूना चुका हूं। अब तुझे भी खुद अपनी जान लेनी होगी I ।"

"देवा काली तेरी कसम-मैने जो कुछ किया है उसे अच्छी तरह जानता हू। मैंने तेरे बनाए हुए कानून क्रो तोडा. है और मेरे गुनाहों के जुर्मों की फाहरिस्त खासी लम्बी है। मुझे हर सूरत मे 'मरना' होगा । मैं इसके लिए तैयार हूं। " यह कहकर उसने पिजरे मे फंख फडफडाए।

"तू खुद 'पिघलना' पसन्द करेगा या तुझे 'पिघलाया' जाए । जिन्दगी ले ली जाए तुझसे। " देवा काली की आवाज गूजी ।

"खुद अपनी जान देना मेरे लिए आसान नहीं। " राकल की आबाज बडी मुश्किल से निकली थी।

"ठीक है । " देवा काली ने कहा व फिर सरदार और काला चिराग से पूछा--"तुम दोनों मे से कोई यह काम करना चाहेगा? "

"नहीं देवा काली । " उन्होंने समवेत स्वर में इंकार' किया था ।

"ठीक है, फिर मै बंदोबस्त करता हूं। " देवा काली ने कहा और फिर वह निकट खडी. एक दासी से मुखातिब हुआ--“इसे पिघलाने की तैयारी करो... । "

देवा काली का हुक्म सुनकर वह दासी आगे बडी । गर्वित्त चाल चलती हुई पिजरे' के निकट आई । पिजरे' की खिडकी. खोलकर उसने उस उल्लू को पकड, लिया और खींचकर बाहर निकाल लिया और अब वह उसके पख पकडे इत्मीनान से चलती हुई देवा काली के सामने आई , देवा काली के सामने बड़े सम्मान से झुकी और सीढ़ियाँ चढकर उस विशाल ऊची' 'शमा' के निकट पहुच' गई ।

"इस खब्बीस क्रो नीचे रख ।" देवा काली ने हुक्म दिया।

दासी ने चट चट करके उल्लू के दोनो बाजू'(पख")तोड़ दिये और फिर 'शमां' के नीचे रख दिया और खुद फोरन ही पीछे हट गई ।

वह विशल शमा जरा तिरछी हुई और एकदम से बहुत सारा मोम जेसा द्रव्य उस उल्लू पर गिरा, सीधी हो गई । वह द्रव्य देखते ही-देखते जम गया उसने सफेद रग अपना लिया। ऐसा लगता था जेसे वह उल्लू सफेद बर्फ का बना हो ।

"उठा ले इस खब्बीस क्रो। " देवा काली की आवाज गूजी । दासी ने झुककर दौनों हाथों से उठा लिया । वड सीढिया_उतरकर सरदार कोलाना और काले चिराग क्री तरफ बडी। उसने बारी-वारी से उन दोनो को वह सफेद उल्लू देखने को दिया । उन दोनों ने अपने हाथ में लेकर अच्छी तरह देखा और फिर दासी को वापिस कर दिया ।

दासी ने उस सफेद उल्लू को एक छोटे-से चबूतरे पर रख दिया।

"नाचो... ।" देवा काली ने हुक्म दिया।

वह दासी हुक्म सुनते ही तेजी से दौडती. हुईं सीढियों… के नजदीक आई और फिर लहराकर नाचने लगी । उसके नाच शुरू करते ही तमाम स्तम्भो के साथ खडी. हुई दासियाँ भी लहराकर देवा काली के सामने आ गई। वे सब की सब गहरे सुर्ख रग' के लिबासों मे थीं । उनके बल खाते गोरे बदन तलवारों की तरह चमकने लगे ।

सरदार कोलाना और काला चिराग के लिए यह नजारा इतना दिलकश था कि वे तो जेसे पलके झपकाना ही भूल गये। फिर उनको होश उस वक्त आया जब देवा काली की कर्कश आबाज गूजी--'"बस ।"

इस आवाज के साथ ही सारी दासियाँ जहां व जिस अदाज मे थीं ठहर गई । फिर वे हवा के तेज झोंके की तरह अपनी अपनी जगह पर पहुच गई । अब वहां वह अकेली दासी ही रह गई थी जिसने राकल को पिजरे से खींचकर निकाला था ।

उसने अपने हाथ ऊचे' करके एक' बार ताली बजाई। फिर हर दासी-एक एक बार ताली बजाती गई। जब यह ताली की आवाज अन्तिम स्तम्भ जो दरवाजे के निक्ट था-पर गूजी तो वह दरवाजा खुला और दो लम्बे गुलाम अन्दर दाखिल हुए ।

एक के हाथ मे गागर थी और दूसरे के हाथ मे एक मशाल ।

चादी की गागर उस सफेद उल्लू क्रो हटाकर उस छोटे-से चबूतरे पर रखी गई । फिर उस उल्लू क्रो दोनों गुलामों ने हाथों में उठा लिया ।

दासी वह मशाल लेकर सीढियों. की तरफ बढी । फिर उसने बुझी हुईं मशाल को हाथ बढा' करके ' शमा' की 'लो' मे जलाया और तेजी से भागती हुई वह गुलामों के पास आई । उसने उस जलती हुई मशाल को उस जड उल्लू के नीचे रखा। मशाल का शोला इतना तेज था कि उसकी आच दिखाते ही वह उल्लू पिघलने लगा और देखते-ही देखते 'पिघलकर' नीचे रखी गागर मे समा गया । गागर पर एक काला कपड़ा बाध दिया गया ।

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”इस खनीस को ले जाओ और इसकी बहन बकाल के नजदीक इसे भी जजीरे' पहनाकर दफना दो।“ देवा काली ने सरदार कोलाना सै कहा ।

ये सुनकर वे दोनों उठे। काले चिराग ने उस गागर को अपने कंधे पर रख लिया और फिर वे दोनों देवा काली के अग्रि मन्दिर से बाहर निक्ल आए । उनकी ऊटनिया' तैयार ही थीं । वे दोनों अपनी अपनी ऊटनी पर सवार हो गए। गागर काले चिराग ने अपनी गोद में रख ली थी। यू वे दौनों खुश खुश अपने इलाके की तरफ चल दिए।

खुश तो इस वक्त इन्द्रजीत्त भी था।

उसकी ऊटनी हवा से वातै करती उडी जा रही थी और इन्द्रजीत्त इस नर्क से निकलकर अपनी दुनिया में पहुच जाने की कल्पना कीं खुशी से फूला नहीं समा रहा था।

फिर जाने क्या हुआ कि उसकी तूफानी वेग से दौडती. हुई ऊटनी एकाएक रूक गई। ऐसा लगता था जेसे किसी ने अचानक उसके पेर पकड़ लिए हो। इन्द्रजीत क्रो एक जोरदार झटका लगा और वह ऊटनी से नीचे आ गिरा।

और जब वह अपने कपड़े झाडता उठा तो उसे अपने सामने चार जजीरों' से बंधी एक गागर दिखाई दी। यह बड़ा ही आश्चर्यजनक दृश्य था।

लोहे की चार मोटी कीलें, उनसे बघी' हुईं जजीर्रे', बीच में रखी गागर और इन चार जजीरों से बधी' हुई गागर की गर्दन । गागर के मुह' पर लिपटा हुआ काला कपडा और चारों तरफ वीरान निर्जन रेगिस्तान, ऊँचे नीचे रेत के टीले I तेज चलती हवा।

काले चिराग ने हालाकि इतनी रेत डाली थी कि जजीरें रेत में दब गई थीं और गागर की महज गर्दन नजर आ रही थी, लेकिन अब उस पर से काफी रेत उड चुकी थी । शायद रेगिस्तानी तेज हवाओं ने उसकी रेत उडा दी थी। जजीरे साफ नजर आ रही थी और गागर आधी रेत में दबी हुई थी।

इन्द्रजीत क्ती समझ में नहीं आया कि क्या चीज है? इस गागर को यू जजीरों सै क्यों बाधा गया है और इसके मुह पर कपडा, क्यो लिपटा हुआ है? पहला ख्याल यही आया था किं आगे बढकर, देखना चाहिये कि कहीँ इस गागर में खजाना तो नहीं छिपा हुआ है। दौडती. हुइ ऊटनी का अचानक यहां रूक जाना क्या अर्थ रखता है? शायद किस्मत उस पर मेहरबान हो गई है और उसे किसी विपुल खजाने का स्वामी बनाने पर तुली हुई है।

उसने दो कदम गागर की तरफ बढाए. फिर उसे ऐसे ही ऊठनी' का ख्याल आया। उसने पीछे मुडकर, देखा व सहमकर रह गया। ऊटनी का दुर तक पता नहीं था। वह वापिस पलटकर उस जगह जहां ऊटनी' खडी हुई थी। वहां से कहीं आगे जाने के निशान न थे I ऊटनी जिधर से आई थी, उधर रेत पर अलबत्ता ऊटनी के पैरों के निशान मौजूद थे। ऐसा लगता था जैसै ऊटनी को किसी ने खड़े-खड़े उठा लिया हो।

दिल दहला देने वाली स्थिति थी। अब वह अपनी दुनिया में कैसे पहुचेगा'? राकल ने कहा था कि यह ऊटनी' धुएं की दीवार पार करा देगी और यूं वह अपनी दुनिया में पहुच जाएगा, इसीलिए वह यह सफर ऊंटनी' की ही मर्जी से कर रहा था । उसने ऊटनी को अपनी मर्जी से किसी तरफ मोडने, की कोशिश नहीं की थी । ज्यू ज्यू बक्त बीत रहा था, इन्द्र इस पर खुश था कि उसकी दुनिया करीव आती जा रही है, लेकिन फिर ऊटनी के एक झटके से रूकने और उसके बाद उसके गायब हो जाने ने उसकी समस्त आशाओं पर पानी फेर दिया था।

अब सुंनसान तपता रेगिस्तान था । वह था और उडती, हुई रेत थी। यानि कि वह वक्त अब ज्यादा दूर नहीं था,जव मौत पख फडफडाती हुई उसके सिर पर मडरा' रही होगी।

वह फिर वापिस पलटा।

अब उसके सामने फिर वह गागर थी , काले कपडे से बधी व जजीरों में जकडी । उसे खोलकर देखना चाहिये कि आखिर इसमें है क्या? इस सोच के साथ ही वह धीरे-धीरे कदम जमाता हुआ गागर के नजदीक गया। काला कपड़ा यूं गागर के मुह पर बधा' हुआ था कि वह उसे आसानी से खोल सकता था। वह रेत पर घुटनों के बल बैठ गया था और गागर के मुह पर बंधा कपडा, खोलने लगा । कपडा… खोलने के बाद जब उसने कपड़ा गागर के मुह सै हटाया और यह देखने के लिए आगे की झुका कि इसमें किस प्रकार का खजाना है तो उसे एकदम पीछे हट जाना पडा।

मगर देर हो चुकी थी I

उसमें खजाना नाम की कोई चीज न थी और उसमें से जो चीज बरामद हुईं, उससे बचने के लिए पीछे हटना जरूरी था, लेकिन वे सख्या में इतनी थीं कि उनकी गिरफ्त से बचना मुमकिन नहीं था।

वे शहद की मक्खियों जेसी कोई चीज थीं। वे गागर से निक्ली भी मक्खी की तरह वे सैकडों, बल्कि हजारो की तादाद मे थीं…गहरे सुर्ख रंग की और सुनहरे परो वाली मक्खियां ।

देखते ही देखते ये इंद्रजीत के चेहरे पर छा गई-कुछ ऐसै कि उसका चेहरा गायब हो गया। वे उसके चेहरे पर अपने तेज सुइयों जेसे डक मार रही थीं । काटने की तीब्र पीड़ा से इन्द्र पर नीम बेहोशी छाने लगी और फिर कुछ ही देर बाद वह अपने होशो-हबास पूर्णतया खो चुका था।

लेकिन इन मक्खियों को इसकी क्या परवाह कि उनके काटने का इन्द्रजीत पर क्या असर हो रहा है? वह होश में है या बेहोश । उनका काम काटना था-वे काटे जा रही थीं। वे उसके पूरे वदन पर छा चुकी थीं और जो अमल वे कर रही थी । बह एक तरह से मौत के ही बरावर था।

वे मक्खियां इन्द्रजीत के 'आधे चेहरे' की तरह उसके पूरे बदन को दीमकजदा करने पर तुली हुई थीं और इन्द्रजीत को नहीं मालूम था कि ये मक्खियां उसका क्या हश्र करने पर तुली है ।

हश्र तो सरदार कोलाना और काले चिराग ने लगडे प्रेत राकल का देखा था और बड़ा लुफ्त आया था। वे दोनों एक धूर्त को मारकर बहुत खुश थे और अब देवा काली के निर्देशानुसार उसे 'जजीर' करने' (दफनाने) जा रहे थे।

देवा काली के ' अग्नि मदिर' सै निकलकर वे पहले अपने इलाके में पहुचे थे-जहां उन्होंने राकल की 'गागर' को "जंजीर" करने का बन्दोबस्त किया था और फिर वे उटों पर सवार होकर उस जगह की तरफ चल दिए ये, जहा उन्होंने वकाल की गागर क्रो 'जजीर'किया था । काले चिराग ने कहा भी धा कि वह अकेला ही राकल क्री गागर को जजीर' कर आएगा, लेकिन सरदार क्रोलाना नहीं माना था। वह भी साथ आ गया था।

राकल वास्तव में जाते-जात्ते हाथ दिखा गया था । वह एक धूर्त फितरत प्राणी था और अन्त तक धूर्त ही रहा था। उसने अपनी धूर्तता दिखाई थी और मरने से पहले वह इन्द्रजीत्त के ताबूत में आखिर कील ठोंक गया था । ऐसे में इन्द्रजीत की मौत निश्चित थी । इन्द्रजीत पर यह मक्खियों का हमला उसी की कारस्तानी थी । वक्त तेजी से बीत रहा था । मक्खियां अपने काम पर लगी हुई थीं । इंद्रजीत बदस्तूर बेहोश था और सरदार कोलाना तथा काला चिराग इस तरफ बढे आ रहे थे। फिर वह वक्त भी आया कि उनकी रेत उडाती_ ऊटनिया दिखाई देने लगी और देखते ही-देखते वे बकाल के इस 'मकबरे' या 'कब्र' पर आ पहुचे'।

ऊटनी' पर बैठे बैठे सबले पहले काले चिराग की नजर बकाल बाली गागर पर _पडी।

गागर रेत से बाहर थी और उसके मुह' पर कपडा, बधा' हुआ न था I अरे, यह क्या हुआ? फिर उसकी नजर एक इन्सानी वजूद पर पडी… जो एक जजीर' पर लटका हुआ था और सुर्ख रग' की मक्खियां उसके पूरे वदन पर छाई हुई थीं ।

"मैं तेरा गुत्ताम...सरदार वह देख... ।" काला चिराग अपनी ऊटनी को बैठाते हुए बोला। और जब सरदार क्रोलाना ने उस तरफ नजर कीं तो उसके मुह से भी बैअख्तयार निकला-- "अरे यह क्या है?"

फिर वह भी अपनी ऊटनी को जल्दी-जल्दी बैठाने लगा । इन दौनों की ऊटनियो को बैठता देखकर पीछे आने वाले पाचों' घुडस्वार अपने घोडों से उतर पडे । वे घोडे छोड़कर आगे बडे । काले चिराग ने ऊटनी से उतरकर राकल क्री गागर रेत पर रखी और तेजी से आगे बढा, लेकिन फोरन ही स्क गया I उसे एकदम खतरे का अहसास हुआ मानव शरीर से चिमटी सुनहरे परों व गहरे सुर्ख रग' क्री हजारों मक्खियां उसने देख ली र्थी । वह जानता था कि अगर इन मक्खियों को उडाने की कोशिश की गई तो वे इन दोनों को भी चिपट जाएगी' और फिर पीछे आने वाले घुडसवार. भी उनकी लपेट में आ जाएगे' । आगे बढ़ते हुए सरदार क्रोलाना का हाथ पकडकर उसने उसे भी आगे जाने से रोक दिया ।

"यह कौन है?” सरदार आश्चर्यचकित था।

"यह मक्खियां कहा' सै आईं और यह गागर क्यों खुली हुई है?"

“सरदार-मै तेरा गुलाम...मै तेरे कुर्बान. . .मै नहीं जानता कि यह कौन है-और यह मक्खियां कहां से आई है? अलबत्ता इतना अदाजा जरूर कर सकता हूं कि किसी जिज्ञासा के मारे हन्सान...ने इस गागर का मुह खोलकर देखा और इस मुश्किल में पड़ गया।"

"क्या ये मक्खियां इस गागर से निकली है क्या ऐसा भी हो सकता है?" सरदार के स्वर का लहजा चिन्तापूर्ण था।

"ऐसा ही हुआ लगता है। " काले चिराग ने जबाब दिया ।
 
" देख तो, गागर के -अन्दर कुछ है या नहीं !"

"अच्छा तू यहीँ ठहर, मैं घूमकर उधर जाता हूं। "

काला चिराग गागर की तरफ बढ़ गया । वह उन मक्खियों सै बचता-जरा घूमकर गागर के निकट पहुचा उसने डरते-डरते गागर मॅ झांककर देखा। गागर विकृत खाली थी ।

काला चिराग सावधानी से चलता हुआ लौटकर सरदार के पास आया। उसने बताया--"सरदार ॥ गागर खाली है।"

"ओह-यह तो बहुत बुरा हुआ। " सरदार कोलाना यह सुनता फोरन पीछे हटते हुए बोला । उसके चेहरे पर गहरी चिन्ता के भाव थे।

"में तेरा गुलाम...मैं समझा नहीं । "

"यह मक्खियां उस बदनसीब इंसान को खत्म कर देंगी। जो करना है जल्दी कर । "

"क्या करूं, तू बता?"

"इन मक्खियों का तोड मक्खियां ही हो सकती है । " सरदार सोचपूंर्ण लहजे में वोला।

"मक्खियां… ?" काला चिराग ने जेसे अविश्वास से दोहराया--”लेकिन दूसरी मक्खियां आएगी कहा' सै?"

"राकल कीं गागर का मुह खोल दे।”

"देख लो सरदार! कहीं मामला सगीन बनकर न रह जाए। "

”फिर इस 'मानव' की जान केसे बचेगी?”

“सरदार । यह भी तो हो सकता है कि यह 'मानव' अब तक मर चुका हो।" काले चिराग ने राय व्यक्त की।

"अगर ऐसा होता तो मक्खियां इसका पीछा कब का छोड चुकी होतीं। "

"ओह! " काले चिराग की मुंडी सहमति में हिली --"यह बात भी तू ठीक कहता है। "

”मै अगर ठीक कहता हूं तो फिद देर न कर गागर को उस 'मानव' के करीव रखकर उसका मुह खौल दे। कपडा. हटाते ही फौरन भाग आना।"

तब काले चिराग ने रेत पर से राकल की गागर उठाई व सतर्क अदाज' में चलता हुआ 'जजीर" के पास पहुचा' फिर गागर रेत पर रखी और बैठकर इसे गागर के मुह' पर से काला कपडा. खोलने लगा। कपडा खोलकर एक झटके से अपनी तरफ खींचा व दौडता. हुआ पीछे हट गया ।गागर के मुह' से कपडा हटते ही एक तेज भिनभिनाहट कीं आबाज आई ओर इस गागर में से भी मक्खियां निकलनी शुरू हो गई। कुछ क्षणों तक ये मक्खियां गागर के ऊपर मडराईं' और फिर इन काली मक्खियों ने सुर्ख रग व सुनहरे पखों' वाली मक्खियों पर हमला कर दिया ।

यह घमासान का सघर्ष था । सुर्ख मक्खियां फट फट करके रेत पर गिरने लगीं। काली मक्खियों ने वह तबाही मचाई कि सच देखते रह गए।

जब सारी 'लाल मक्खियां मर गई तो इन काली मक्खियों ने उस मानव शरीर यानि इन्द्रजीत पर हमला करने की ठानी और अभी वे उसके शरीर के ऊपर तेजी से चक्कर काट रही र्थी कि वे एकाएक बूंद बूंद होकर उस मानव शरीर पर गिरने लगी जिसकी सूरत नज़र नहीं आ रही थी।

यूं कुछ ही देर में वे सारी मक्खियां 'पिघल' कर इन्द्रजीत के बदन पर टपक पडी। उसका वदन 'सुर्ख द्रव्य' सै ढक गया । जिस तरह जहर का इलाज जहर से किया जात्ता है और लोहे को लोहा काटता है, कुछ बैसा ही काम इस वक्त इन मक्खियों ने किया था I इन मक्खियों ने न सिर्फ दूसरी मक्खियों को मार दिया था-बल्कि सुर्ख मक्खियों के काटने से जो क्षति इन्द्रजीत को पहुची' थी उसकी भरपाई हो गई थी।

काली मक्खियां सुर्ख घोल की सूरत मै उसके बदन पर छा गई थी । इस सुर्ख द्रव्य ने इन्द्रजीत का सुकून पहुचाया । सुर्ख मक्खियों के काटने से उसके बदन में जो आग भर गई थी । वह अब ठण्डी पडती जा रही थी । उसके होंशो हवास बहाल होते जा रहे थे।

कुछ देर बाद उसकी अचेतना समाप्त हो गई। होश-हबास पूर्णतया बहाल हुए तो उसने आखे' खौल दीं। आखें खुली तो उसने खुद को एक मोटी जजीर' पर पड़ा पाया । वह फौरन उठकर बैठ गया I वह उठा तो वह सुर्ख-द्रव्य किसी खाल की तरह उसके बदन से उतरता हुआ रेत पर आ रहा था । यह सुर्ख-द्रव्य, अन्तत्त: एक जगह एकत्रित होकर रेत में लीन हो गया। वह रेत में जज्ज हो फैला नहीं, वल्कि इस तरह गायब हुआ कि उसका निशान तक नहीं रहा। कुछ यही हाल उन सुर्ख मक्खियों का हुआ। वे सुर्ख ब्रदन व सुनहरे परो बाली मक्खियां पड़े-पड़े सुर्ख में परिवर्तित हो गई-ओर हुककर एक-दूसरे में मिल गई और फिर यह द्रव्य भी रेत के सीने उतरता चला गया। कुछ देर बाद रेत पर किसी प्रकार का निशान भी नहीं रहा था।

यूं वे दोनों बहन-भाई अपने भारी वजूद के साथ जमीन की कोख में उतर गए। शायद यूं ही राकल और बकाल ने प्रेत, योनि से मुक्ति पाई थी।

इन्द्रजीत्त बडे अचरज सै उस सुर्ख द्रव्य को रेत में समाते देखता रहा। उसकी समझ मै नहीं आया कि उसके समूचे बदन पर यह सुर्ख खाल-सी क्या थी? वह तो असख्य' मक्खियों के आ चिपकने व काटने सै बेहोश तो गया था और उन मक्खियों का कोई वजूद ही न रहा था ।

फिर एक बात उसने और महसूस की थी कि अब उसके शरीर मै किसी प्रकार की निर्बलता नहीं रही थी। वह स्वयं को चाक-चौचन्द महसूस कर रहा था ।
 
उसने गर्दन घुमाकर अपने चारों तरफ का जायजा लिया और उसकी निग़ाहैँ काले चिराग पर आकर ठहर गई! उसने देखा काला चिराग थोडे ही फासले पर खड़ा उसे ही हैरत भरी नजरों से देख रहा था और उसके साथ ही एक और शख्स भी खडा. था जो अपने रख-रखाब सै सरदार मालुम होता था । वह भी एकटक उसे ही देख रहा था। इन दोनों के पीछे इन्द्र ने पाच मुहाफिज सैनिको को भी देखा और दो ऊटनियो व पाच' घोडों. क्रो भी ।

इन्द्रजौत फोरन उठकर खडा हो गया। काला चिराग आगे बढा उसके करीब पहुचा और बोला--"इन्द्रजीत तुम?"

"हा', मैं। मुझें देखकर आप हैरान क्यों हैं? "

"इन्द्रजीत्त तुम यहा कहा? मेरा मतलब है कि तुम यहा केसे आ गए? यहा आस पास तुम्हारी कोई सवारी भी नजर नहीं आ रही है। "

"सब बताता हूं।" इन्द्र ने एक गहरी सास' ली। फिर सरदार क्रोलाना की तरफ इशारा करते हुए पूछा- “यह कौन है?"

"वह मेरे आका हैँ सरदार कोलाना। आओ मेरे साथ तुम्हें उनसे मिलबाऊं।"

जब वे दोनों सरदार के पास पहुचे तो उसने पूछा-- "तू जानता है इसे?”

"हा ।। बहुत अच्छी तरह यह मेरा रकीब (प्रेम प्रतिद्वन्द्धी) है। " काले चिराग ने हंसकर कहा ।

" रकीब । " एक क्षण को सरदार कोलाना कुछ नहीं समझ सका । फिर समझ में आया तो उसने मुस्कराकर कहा-- "ओह ॥ तो यह है वो नौजवान जिस पर बकाल कुर्वान हो गई । "

"तू ठीक समझा सरदार । "

"इसे बता कि अब बकाल कहा है? यह उसका नाम सुनकर परेशान हो गया है।"

"हां क्या हुआ बकाल को? " इन्द्रजीत वाकई परेशान हो गया था हालाँकि राकल ने बकाल की मौत के बारे में उसे बताया था, लेकिन इन्द्र को उस फरेबी की बात का यकीन नहीं आया था । काले चिराग ने कुछ कहने से पहले एक गहरा सास लिया और फिर उसके चेहरे पर उदासी छा गई । फिर वह भारी स्वर में बोला

"तुम्हारे लिए खुशखबरी है और मेरे लिए बुरी खबर ॥" इतना वता काला चिराग खामोश हो गया।

इन्द्रजीत बेचैन हो उठा, बोला- "तुम खामोश क्यो हो गए? आखिर कुछ पता तो चले हुआ क्या है?" वह शायर्द बकाल की मौत की तस्वीक कर लेने को बेताब था ।

"इन्द्रजीत ।। मेरी बकाल मर गई। उसने अपनी जान दे दे दी । वह मुझे छोडकर चली गई। "

"ओह ।" इन्द्र का मुह खुला का-खुला रह गया । उसके लिए इससे बडी खुशखबरी तो कोई दुसरी हो ही नहीं सकती थी । इस खुशखबरी को सुनकर तो उसे कहकहे लगाने चाहिये थे, लेकिन जाने क्यों वह इतना खुश न हो सका जितना होना चाहिये था।

बकाल अगर उसके लिए एक यातना थी, तो इस काले चिराग के लिए उसकी जिन्दगी । वह काले चिराग की महबूबा थी। उसके लिए इसने न जाने क्या क्या जतन किए थे। सो-इस वक्त इन्द्र को खुश होने के बजाय काले चिराग के दुख में शरीक होना चाहिए था।

"मुझे अफसोस हुआ ।" वह धीरे से बोला।

"हैरत है तुम्हे तो खुश होना चाहिये।"

"यह ठीक है कि उसने मेरी जिन्दगी नर्क बना दी थी । एक लम्बे समय तक उसने मुझे यातनाओं का शिकार बनाकर रखा, लेकिन मै इनना सगदिल' नहीं कि यह भूल जाऊ कि वह तुम्हारी जिन्दगी थी । बहरहाल, यह सब कैसे हुआ ?” इन्द्रजीत ने जानना चाहा I

और काले चिराग ने बताया- "जब बकाल ने अपने भाई राकल के जरिये मुझे गिरफ्तार करवा लिया तो यह बात मेरे आका से छिपी न रह सकीं । उन्होने राकल का अपहरण कर लिया और राकल को कालवा भेजा कि बकाल चाहिए तो काले चिराग को डेढ दिन बाद सरहद पर पहुचा दो । राकल किसी वजह से वक्त पर नहीं पहुच सका तो मेरे सरदार ने उसके सुनहरे खण्डहरों की ईट से-ईट बजा दी । राकल को भी गिरफ्तार कर लिया गया। अब राकल कीं अपनी अहमियत खत्म हो चुकीं थी । वह एक गुनाहगार और कैदी था। सरदार ने अपना फैसला सुनाया कि काले चिराग और वकाल की शादी कर दी जाए। शादी की तैयारियां पूरी हुई-तो खबर आई कि बकाल ने आत्महत्या कर ली । इन्द्रजीत-बह मेरी नहीं होना चाहती थी । वह तुम्हारी थी तुम्हारी ही रही । " यह कहकर काले चिराग ने अपनी भीगी पलके बन्द कर लीं। ..

"लेकिन मुझे तो उसकी सूरत से भी नफरत थी। " इन्द्रजीत्त ने स्वष्टवादिता सै कहा।

"कुछ यही रवैया उसका मेरे साथ था। " काले चिराग ने आखें' खोलीं "वह मेरी शक्ल भी देखना नहीं चाहती थी, लेकिन मुझें उसके बिना चेन नहीं था। वह तो क्षण हर पल मेरे मन मस्तिष्क में रची-बसी रहती थी। अब भी बसी हुई है I "

"और राकल का क्या हुआ । " इन्द्रजीत्त ने चर्चा बदलते पूछा ।

"वकाल की मौत के वाद राकल ने मेरे सरदार पर हमला किया और वहां से निकल भागा। तब हमने देवा काली के दरबार में जाने का फैसला कर लिया और जहां जाकर राकल को उसके अजाम तक पहुचाया और अब इस वक्त हम देवा काली के हुक्म पर-राकल के अवशेषों को उसकी बहन वकाल के निकट ही जजीर' करके यानि दफनाने आए थे कि यहा' तुम्हें मौत के मुह' में देखा, लेकिन इन्द्रजीत तुम यहां कैसे पहचे ?" काले चिराग ने पूछा और इस पर इन्द्र ने अपनी विपदा सुनाते हुए कहा

“उस दिन लगडा राकल बेहद जख्मी हालत में मेरी झोपडी तक पहुचा' । उसे भेडिर्यों ने जख्मी किया था। मैं उसे अपनी झौपड़ी में ले आया और वहां उसने अपने जख्मो का इलाज किया । वह ठीक हो गया तो मुझे धोखा देकर उड गया। उस वक्त उसने तुम्हारे सरदार का नाम लिया था और कहा था कि- "मुझें वहां होना चाहिये था।" खैर, दौ चार दिन वाद वह फिर वापिस आया । वह खौफजदा था और उसने मुझें कहा की झोपडी के बाहर मेरे लिए सबारी मौजूद है जो धुएं की दीवार पार करा-मुझें मेरी दुनिया तक पहुचा देगी। मैं फौरन उस पर सवार होकर निकल जाऊं। तब उसने यह भी बताया कि किसी भी क्षण उसके लिए देवा काली का बुलावा आ सकता है। फिर वह अचानक ही गायब हो गया ।"

"उसके जाने के बाद मैं ऊटनी पर सवार हौ चल पड़ा । मै खुश था कि मैँ आजाद हूं। एक लम्बा सफर तय करने के बाद मेरी ऊटनी इसी जगह आकर अचानक रूक गई । मै रेत पर आ गिरा । फिर जब मैंने उठकर सामने देखा तो जजीरो सै बधी एक गागर को पाया । मैं आगे बढा । पीछे मुडकर__ देखा तो ऊंटनी गायब हो चुकीं थी।

"उसके जाने के बाद मैं ऊटनी पर सवार हौ चल पड़ा । मै खुश था कि मैँ आजाद हूं। एक लम्बा सफर तय करने के बाद मेरी ऊटनी' इसी जगह आकर अचानक रूक गई । मै रेत पर आ गिरा । फिर जब मैंने उठकर सामने देखा तो जजीरो सै बधी एक गागर को पाया । मैं आगे बढा । पीछे मुडकर__ देखा तो ऊंटनी गायब हो चुकीं थी। मैं गागर के निकट पहुचा । मेरा ख्याल था कि इसमें किसी प्रकार का खजाना है, पर जब मैने गागर का मुह खोला तो बेशुमार मक्खियों ने मुझ पर हमला कर दिया और मै दर्द की शिद्दत सै बेहोश हो गया । "

"हूं। "इन्द्रजीत कीं आप बीती सुन, काले चिराग ने हुकार' भरी और फिर सरदार कोलाना से सम्बोधित हुआ… "सुना, सरदार । "

"हां । वह खब्बीस जाते जाते इसे धोखा दे गया । अगर हम यहा' नहीं पहुचते' तो यह अपनी दुनिया मै पहुचने' से पहले किसी और दुनिया में पहुच' चुका होता । वह जानता था कि यहां पहुचने' पर गागर नजर आने पर यह उसे खोलकर जरूर देखेगा और यूं अपने अजाम तक पहुच जाएगा। वाह, लंगडे तू भी खूब चीज था। तेरे जेसे शातिर धूर्त हमारी दुनिया में दुर्लभ है। " सरदार कोलाना बोला l

"आप लोगों ने मुझें कैसे बचाया? वै हजारों मक्खियां कहा गई और यह मेरे बदन पर सुर्ख खौल केसा था जो मेरे देखते ही-देखते रेत में इस तरह घुस गया-जेसे बिल में साप'। " इन्द्रजीत्त ने काले चिराग सै पूछा।
 
"बस यूं समझो कि तुम्हारी जिन्दगी थी, जो तुम बच गए-वरना राकल ने तुम्हें मारने में कोई कसर न छोडी, थी । तुम्हें उन सुर्ख मक्खियों से बचाने के लिए हमें राकल के गागर का मुह खोलना पड़ा । उस गागर से निक्लने बाली मक्खियों ने तुम्हारे वदन पर लिपटी मक्खियों पर हमला कर दिया । उन मक्खियों को मारकर खुद म्यान होल बनकर तुम्हारे वदन पर फैल गई ।यूं तुम्हारे बदन की आग जो बकाल की मक्खियों ने लगाई थी, वह राकल की मक्खियों ने बुझा दी और फिर दोनों बहन भाई का स्वाल रेत मैं उतर गया। यह नजारा तो तुमने खुद अपनी आखों से देख लिया। इन्द्रजीत तुम तकदीर के धनी हो कि तुम्हें वकाल से मुक्ति मिल गई। न सिर्फ मुक्ति, बल्कि तुम्हारे चेहरे पर जो दीमक जेसी चीज लग गई थी वह भी दुर हो गई। उस अमल व तात्रिक' अनुष्ठान के प्रभाव भी खत्म हो गए जो उसने तुम्हें हमेशा के लिए अपना बनाना के लिए शुरू कर रखा था। " काले चिराग ने बताया ।

"मेरे लिए यह खुशखबरी है। " इन्द्र बोला "लेकिन यह बात तुम इतने विश्वास के साथ केसे कह रहे हो?"

काले चिराग ने मुस्कराकर कहा "तुम्हें मेरे कहे पर यकीन आ जाएगा। जरा अपने चेहरे पर हाथ फेरकर देखौ। "

इन्द्रजीत ने डरते डरते अपने चेहरे पर एक हाथ फेरा और फिर उसने दोनों हाथों से अपने चेहरे का जायजा लिया। उसकी आखें चमक उठी । वह अपनी खुशी दबाये नहीं रख पा रहा था। उसका चेहरा वास्तव मे ही साफ हो गया था। उसने अपने शरीर में शक्ति तो उठते ही महसूस की थी ।

"मैं तुम्हारा बहुत शुक्रगुजार हूं। " वह बोला।

“शुक्रिया अदा करना है तो मेरे सरदार का करो, मेरे आका का करो जिनका मैं गुलाम हूं।" काले चिराग ने बडी. श्रद्घा के साथ कहा।

इन्द्रजीत ने आभारी नजरों सै सरदार कोलाना की तरफ देखा और आदरपूर्ण स्वर में बोला "सरदार कोलाना, मैं तेरा बडा..अहसानमद हूं। "

"यह सब मैंने अपने काले चिराग के लिए किया, पर अफसोस कि मै उसकी बकाल उसको नहीं दिला सका। " सरदार ने उदास लहजे में जवाब दिया I

“अच्छा हुआ सरदार वह मर गई। अब मुझे अहसास होता है कि मैं खामखाह उसके पीछे लगा हुआ था । वह मेरी न थी I वह किसी और की थी, पर सरदार मैं भी क्या करता । तुम जानते हो- मुझे उससे बहुत मुहब्बत थी । मैं उसे अपने दिल से निकालना चाहता था, लेकिन वह निक्लती ही न थी । मैं क्या करता । मैं भी मजबूर था यह आशिक इस कदर मजबूर क्यों हो जात्ते हैँ?" काले चिराग की आबाज भीग गई थी।

"वेवकूफ ।। " सरदार कोलाना ने उसे डाटा--“एक बकाल मरी है, मैं एक हजार वकालें तेरे लिए इकट्ठी का दूगा' I गम क्यों करता है? "

"मैं तैरे कुर्वान...मै तेरा। " काले चिराग ने आज्ञाकारी सेवक की मानिन्द सिर झुका लिया I

"अब क्या करना ?" सरदार कोलाना ने गागर की तरफ देखते हुए कहा ।

"जो तेरा हुक्म I " काला चिराग आदर से बोला ।

"इन गागरों मे रेत भरकर दफन कर दो फिर आगे कीं सोचते है। " सरदार बोला।

”ठीक है, सरदार । " काला चिराग ने कहा व आज्ञापाललन मॅ लग गया ।

उसने बकाल बाली गागर की जजीर्रे' खोलीं उसमें रेत भरी ओर इस गागर को जमीन पर औधा रख दिया। फिर ऐसा ही उसने राकल वाली गागर के साथ किया । ये दोनों गागरें साथ-साथ रखी गई थीं। काले चिराग ने वकाल कीं गागर की जजीरे कीलों सहित उखाड़ा ली और उसकी गागर पर रख दी । राकल की गागर बने जजीरे करने को भी जजीरें' व कीलें लाई गई थी-वे उसकी गागर पर रख दीं। फिर उसने घुडसवार. को इशारा किया। इन घुडसबारों. ने

देखते ही देखते इतनी रेत इन गागरो पर चढा दी कि वहा एक ऊँचा सा टीला बन गया।

इस सारी कार्यवाही को इंद्रजीत खामोश खड़ा देखता रहा। गागरो को दफनाने का यह काम जब खत्म हो गया तो काला चिराग सरदार के सामने सिर झुकाकर खडा हो गया।

"अब बस्ती की तरफ कूच करो। " सरदार कोलाना ने हुक्म दिया।

"और इन्द्रजीत ।" काले चिराग ने पूछा।

"ओह हां! " सरदार ने इन्द्र की तरफ देखा- "इसका क्या करना है?“

"फिलहाल अपने साथ ही ले जाते है।"

"पर यह बस्ती में तो नहीं जा सकेगा । " सरदार ने जेसे मजबूरी दर्शाई।

"फिर ? "

"ऐसा करो, इसे 'ख्वाब महल' में ले जाओ, लेकिन जरा होशियार रहना। मेरी बात तू समझता है ना।"

"मैं तेरा गुलाम...मै तेरी सव बातें समझता हूं। " काले चिराग ने सीने पर हाथ रखकर तनिक झुकते हुए कहा।

"बस तो फिर रूख्सत हो।" सरदार ने हाथ सै इशारा किया।

“तुझसे पहले मै कैसे रूख्सत हो सकता हू ! सरदारा पहले तू रूख्सत हो। "

"अच्छा ठीक है । " यह कहते हुए सरदार कोलाना एक ऊटनी पर बैठ गया ।

ऊटनी फौरन खडी हो गई।

सरदार क्रोलाना एक ऊटनी पर सवार होते देखकर वे पार्चों घुडसबार उछल उछलकर अपने घोडों. पर बैठ गए व ऊटनी के पीछे आकर खडे हो गये।

सरदार कोलाना ने हाथ हिलाया-जबाव में काले चिराग व इन्द्रजीत ने भी हाथ हिला विदाई इशारा किया । और फिर सरदार कोलाना पाचो सवारी के साथ देखते ही देखते रेत के बादल मै गुम हो गया।

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अब इंद्रजीत और काला चिराग अकेले रह गए थे। काले चिराग ने मुस्कराकर उसकी तरफ़ देखा व बड़े अपनत्व से वोला-"आऔ मेरे साथ ।"

काले चिराग की ऊटनी सामने ही बैठी हुई थी । ये दोनों उस पर सवार हो गए। ऊटनी खडी हुई और इशारा पाते ही हवा हो ली।

अभी उन्हे सफ़र शुरू हुए कुछ ही देर हुई थी कि अचानक ऊटनी कौ ठोकर लगी ओर वह जमीन पर गिर गई। वे दोनों उछलकर रेत के एक टीले पर गिरे और रेत में तेजी से धसते चले गये । यह सब कुछ इस कदर तेजी और आनन -फानन में हुआ कि इन्द्रजीत चकराकर रह गया ।

और फिर-जब उसको होश आया तो उसने अपने आपको एक हरे भरे इलाके में पाया। ऊचे-ऊच्चे घने पेड… खूब हरी कोमल घास, दूर तक फैले रग-बिरगे महकते फूलों कीं क्यारियां, पक्षियों क्ती सगीतमय चहचहाट । एक मुद्दत बाद इन्द्रजीत ने ऐसा नजारा देख था । उसके सामने तो हर वक्त सुनसान तपता रेगिस्तान रहता था। उडती हुई रेत देख-देखकर उसका दिल ऊब गया था।

इस हरे-भरे महकते नजारे ने उसकी रूह में ताजगी भर दी। वह लम्बे-लम्बे और गहरे सास लेने लगा। हालाकि ऊटनी से काला चिराग और वह एक साथ गिरे थे, लेकिन इस वक्त वह अकेला ही था! काले चिराग का कही पता नहीं था। इन्द्रजीत अपने इर्द-गिर्द का जायजा लेने लगा।

जहा पर बैठा था-यह किसी विस्तृत ब विशाल बाग का हिस्सा था। बेशुमार वृक्ष थे और इन्ही पेडों मे से उसे किसी सफेद इमारत का दरवाजा नजर आया था।

तभी अचानक उसे काला चिराग नजर आया । काला चिराग उसी की तरफ आ रहा था और वह शायद इस्री सफेद इमारत के दरवाजे से निकलकर आया था । काला चिराग बहुत तेजी से उसकी तरफ आ रहा था और फिर वह शीघ्र ही इन्द्रजीत्त के पास पहुच गया ।

"आओ इन्द्र ।" उसने इन्द्रजीत को अपने साथ आने का इशारा किया।

" यह हम कहा आ गये है और किस तरह ?” इन्द्रजीत ने उसके साथ चलते हुए पूछा।

" कहा आ गए है-यह तो बता सकता हूं? लेकिन किस तरह, यह समझाना मुश्किल है? मेरे साथ कुछ दिन रहोगे तो इस तरह के चमत्कारों व अनहोनिर्यों के आदी हो जाओगे। ” काले चिराग ने हंसकर कहा ।

"अच्छा चलो, यही बता दो कि यह कैसी जगह है?"
 
"यह ख्वाब महल है। यह जगह तुम्हारे लिए सुरक्षित है।" काले चिराग ने कहा, फिर बोला "एक बात बुरा न मानना! कम से कम सवाल करो तो बेहतर है, क्योकि कुछ सवालों के जबाव मेरे पास नहीं हैं। "

"औह । " इन्द्र मुस्करा दिया-"ठीक है। मै कम से कम सवाल करूंगा।"

"यह हुईं ना बात । " काले चिराग ने अपनत्व दर्शाया-- "अब जरा तेज चलो। "

वे दोनों तेज तेज चलते हुए उस सफेद इमारत यानि ख्वाब महल तक पहुचे और उसमें दाखिल हो गए।

वह महल-सचमुच किसी हसीन ख्वाब सा ही था। ऐसा असरत, ऐसा भव्य किं देखने वाला देखता ही रह जाए। हकीकत में तो ऐसे महल की कल्पना कर पाना भी कल्पनाओं से परे की बात थी।

"इन्द्रजीत तुमने एक लम्बा समय कैद में गुजारा है। एक कठिन व यातनापूर्ण कैद मे। इस रेगिस्तान मे विना किसी के कैद से भी लम्बी सजा काटी है। अब तुम्हें आजाद हौकर कैसा लग रहा है !"

"यकीन ही नहीं आ रहा l" इन्द्र के मुह से बेअख्तयार निक्ला।

”वह सामने एक खूबसूरत हमाम है । बहां तुम्हें अपनी दुनिया का सा ही सब कुछ मिलेगा । वहा जाओ। अपने आपको आईने मे देखो। तुम्हें यकीन आ जाऐगा कि अब तुम किसी की कैद मे नही हो ।"

"बाह ।" काले चिराग की इस बात पर इन्द्रजीत ने खुशी का नारा लगाया और फिर तेजी सै उस हमाम की तरफ वढ़ गया।

"इत्मीनान से गुसल करो। तब तक में तुम्हारे लिए खुशबूदार चाय का इन्तजाम करता हूं । " काले चिराग ने कहा और पलट लिया I इन्द्र हमाम में पहुचा । बरसो बाद उसे एक खूबसूरत आधुनिक हमाम में नहाना नसीब हो रहा था । उसने पूरा शॉवर खौल दिया । गुनगुने पानी की फुबार ने उसके प्यासे बदन को तृप्त करना शुरू कर दिया । आखें मादक से अहसास के साथ मुद' गई । उसके बदन के साथ उसकी रूह तक तृप्त होने लगी।

बडा लुफ्त आया और करार मिला नहाने से। नहाकर जब वह आइने के सामने खड़ा हुआ नो खुद को देखता रह गया । उसे सहसा राजकुमार नयना की याद आई । राजूमदारी की कैद से आजाद होकर वह नयना की हवेली में था। तब भी इसी तरह नहा धोकर यह आइने के सामने खड़ा हो गया था । उस वक्त वह नौजवान था और अब पूर्णतया जवान हो गया था और यह भी प्रभू कृपा थी कि काले चिराग की मेहरबानी से उसके चेहरे की दीमक साफ हो गई थी ओर उसमें ताकत भी आ गई थी । वह अगर खुद को उस दीमक खाई सूरत के साथ देख लेता तो यकीनन गिरकर बेहोश हो जाता ।

बहरहाल, स्वास्थ्य तो उसका अब भी ऐसा कोई ईर्ष्या योग्य न था । वह काफी कमजोर था। धीरे-धीरे ही उसके चेहरे व शरीर की आभा लौटनी थी।

वह अभी आइने में खुद क्रो निहार रहा था कि एक ख्याल ने उसे सहमा दिया । उस दिन-बरसों पूर्व नयना की हवेली के महकते बाथरूम में उसे यही महसूस हुआ था कि बाथरूम में उसके साथ कोई है।

इस ख्याल के साथ ही उसे बकाल याद आ गई I बकाल भी क्या अजीब औरत थी । कैसी मनमोहिनी और होश हर लेने वाली दिलरूबा । बकाल ने उसे बाथरूम में देखा था और उस पर मर मिटी थी । ऐसी मरी थी कि इन्द्र की जिन्दगी को मौत बना दिया था । सच यही था किं बकाल अगर न मरती तो खुद इन्द्र कीं मौत करीव थी।

बकाल अनूठी थी और उसकी यह चाहत भी अनोखी थी । इन्द्रजीत के लिए उसकी चाहत एक सजा थी एक यात्तनापूर्ण सजा थी । वह वकाल की वासना शात' कर रहा था । बकाल के अनूठे बलात्कार का शिकार बनता रहा था ।

इन्द्रजीत अपना अतीत याद करके एकदम सहम गया। उसने जल्दी सै कपडे पहने और बाहर आ गया।

बाहर काला चिराग उसका प्रतीक्षक था । इन्द्रजीत को आते देख वह अपनी कुर्सी पर सम्भलकर बैठ गया और एकटक इन्द्र को निहारने लगा।

"क्या देख रहे हो?" इन्द्रजीत बोला।

"नहाकर तो तुम्हारा रग'-रूप ही निखर आया है, इन्द्रजीत ।। साक्षात् कामदेव नजर आ रहे हो सच बहुत खूबसूरत जवान हो । "

"अब कहां खूबसूरत रहा। मेरी खूबसूरती तो तुम्हारी वकाल दीमक बनकर चाट गई I " इन्द्र के मुह' से वैअख्तयार ही निकला था । फिर उसे ख्याल आया कि वकाल के बारे में काले चिराग के सामने ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये थी। एक तो काला चिराग उस पर जान देता था और फिर अब तो वह इस दुनिया में भी नहीं रही थी ।

"तुम ठीक कहते हो l" काले चिराग. ने फीकीं-सी मुस्कराहट के साथ कहा ।

"तुम्हें मेरी बात बुरी लगी। " इन्द्रजीत ने शर्मिन्दगी से भरे लहजे में पूछा।

"सच्ची बात का क्या बुरा मानना? " वह लापरवाही से बोला--"आओ, चाय पीओ । ”

इन्द्रजीत्त एक कुर्सी खींचकर बैठ गया । उसने ट्रे में एक कप देखा तो काले चिराग से पूछा- "ट्रे में तो एक कप है I " वह चाय बनाने लगा था।

"हां , यह तुम्हारे लिए है। मैं चाय नहीं पीता। " काले चिराग ने कहा "तुम्हें चाय बनाते देखकर मुझें तुम्हारी बहन याद आ गई है !"

बहन का जिक्र सुनकर झन्द्रजीत कुछ परेशान-सा हो गया । उसका हाथ रूक गया । उसने पूछा--"क्या तुम मेरी बहन रेखा के बारे में कुछ जानते हो? बह इस वक्त कहा है?"

"हा-जानता हूं। तुम्हारी बहन रेखा क्रो । बकाल ने उसे अपने लगडे भाई राकल की सेवा में पेश कर दिया था,लेकिन जिस तरह में बकाल को नहीं पा सका । उसी तरह राकल रेखा को हासिल नहीं कर सका । आखिरकार उसने गुस्से में पागल होकर तुम्हारी बहन को 'मुक्ति द्वार' में डलवा दिया । " काले चिराग ने बताया ।

"यह बात तुम्हें केसे मालूम हुई?" इन्द्रजीत्त ने पूछा।

"मुझे राकल ने बताई। "

"यह 'मुक्ती द्वार' क्या है?"

"तुम 'मृत्यु-कूप' यानि मोत का आइना समझ लो। " काले चिराग ने स्पष्ट किंया--"इस कूंये मेँ फिकवाया जाने बाला शख्स कभी जिन्दा नहीँ बचता I "

"क्या तुम यह कहना चाहते हो कि मेरी बहन रेखा मर गई। " इन्द्रजीत ने साफ जबाब चाहा ।

"आसार तो यहीँ बताते हैं। " काला चिराग धीरे सै बोला I

"लेकिन मुझें यकीन है कि मैरी वहन मर नहीं सकती। वह मुझें लेने आईं थी । वह मुझें जरूर लेकर जाएगी। " इन्द्रजीत के लहजे में गजब का आत्म-विश्वास था।

"दिल तो मेरा भी यही कहता है कि वह जिन्दा है । वह मरने वाली चीज नहीं है। तुम दोनों जरूर अपनी दुनिया मैं जाओगे। " यह कहकर काला चिराग अचानक खडा हुआ और उसने अपने लिबास से एक चमकदार खंजर निकाल लिया । काले चिराग ने खड़े होकर जिस अंदाज' में खंजर निकाला था वह अदाज इन्द्रजीत को परेशान कर गया। उसने कप ट्रे में रखा ब हैरान परेशान नजरों सै काले चिराग को देखने लगा।

“मैं अब चलता हूं। " काले चिराग ने खंजर उसकी तरफ बढाते कहा-- "यह खजर अपने पास सम्भालकर रख लो। हो सकता है कि तुम्हें इसकी जरूरत पड जाये। "

"यहां कोई खतरा है?" इंद्रजीत बैचेन हो उठा ।

"नहीं खतरा कोई नहीं । यह तुम्हारे लिए बिल्कुल सुरक्षित जगह है। यह खजर' मैँने तुम्हें सतर्कता के नाते दिया है । तुम इस कमरे से निकलकर अगर बाग में जाना चाहो तो जा सकते हो, लेकिन बाग की चारदीवारी के बाहर कदम मत रखना । दूसरे कमरे के अलावा, महल के अन्दर भी जाने की कोशिश मत करना। सबाल न करने का अनुरोध मैं तुमसे पहले ही कर चुका हूं। लिहाजा सवाल कोई नहीं। अब तुम आराम करो । " यह कहकर वह महल की तरफ जाने लगा ।

"मेरी वहन रेखा का क्या होगा?" इन्द्रजीत ने पूछा और काला चिराग अपनी जगह ठिठक गया ।

"रेखा की फिक्र मुझे खुद भी है । मैं उसके वारे में पता लगता हूं। तुम निश्विन्त होकर सो जाओ । अगर कोई आशाजनक खबर हाथ लगी तो हम इकट्ठे हो जायेंगे उस 'मृत्यु-कूप' पर, ठीक है ।" काले चिराग ने सहमति चाही I

"ठीक हे I " इन्द्रजीत ने सहमति मैं गर्दन हिलाई।
 

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