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A Horror Novel - स्वाहा complete

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रेखा बाहर निक्ली तो उसने झोपडी के सामने एक सजी सजाई ऊठनी' को पाया, जो बैठी हुई थी।

बकाल ने उसे उस ऊठनी पर सवार कर दिया और खुद निकट खडे घोडे पर बैठ गई। बकाल के पीछे आठ सशस्त्र घुडसवार¸ मौजूद थे, बकाल के इशारे पर दो घुडसवार. आगे आए ऊठनी के आगे ख़ड़े हो गए। दो घुड़सबार ऊठनी के पीछे और उनके पीछे बकाल और शेष चारों घुडसवार ।

तब' अकाल ने कूच का इशारा किया। दो घुडसवारों ने अजीब-सी आवाज निकाली। वह ऊठनी ऊठकर खडी हो गई । .

और फिर यूं अगले ही क्षण बकाल का यह छोटा-सा काफिला दक्षिण दिशा की तरफ घूल उड़ाता हुआ रवाना हो गया ।

तीन घन्टे के फासले के बाद, जब सूर्यं पश्चिम में झुकने लगा, सामने किसी इमारत के आसार नजर आए। यह किसी प्राचीन भबन के खण्डहर थे। खण्डहर, सूरज की पीली रोशनी में इन खण्डहरों का रग' और भी चमक उठा था ।

फिर वे लोग इन खण्डहरों में प्रवेश कर गये । इन खण्डहरों के बीच एक रास्ता अन्दर को जाता था. रास्ता तग' था, लेकिन इतना तग नहीं था कि दो साथ न गुजर सकें।

ये बड़े अजीब से खण्डहर थै। ऊँची नीची दीवारें थीं । इन दीवारों के बीच अदर' दाखिल होने को बिना 'पट' के दरवाजे थे । ये दीवारें न तो टूटी-फूटी थी और न ही यह अहसास होता था कि यह कोई विधिवत भवन है।

यह छोटा सा काफिला इन खण्डहरों के बीच घूमता घामता काफी अन्दर तक चला गया ।

तब अचानक ही एक बड़ा सा दरवाजा नजर आया। यह विशाल फ्रंटनूमा दरवाजा बन्द था, अगले दो धूडसबारो ने दरवाजे के सामने खडे होकर चीखकर कहा---

"दरवाजा खोलो बकाल की सवारी आई है । ' '

यह आवाज सुनले ही छ: आदमी दरवाजे की दाहिनी दिशा में बनी कोठरी से निक्ले और छ: आदमी बाईं तरफ की कोठरी सै बाहर आए और उन सबने मिलकर उस विशाल भारी दरवाजे को खोला।

दरवाजा खुलते ही सारे घुडसवार घोडों से उतर गए। रेखा को ऊठनी सै उतारा गया। बकाल भी अपने घोडे से कूद आई थी । जेसे ही रेखा ऊठनी से नीचे उतरी, जकाल ने उसका हाथ थाम लिया और वे दोनों दरवाजे के अन्दर दाखिल हो गई । उनके भीतर जाते ही उन बारह आदमियों ने मिलकर पट बन्द कर दिये और अपनी कोठरियों में वापस चले गए । फाटक के दूसरी तरफ सामने ही सीढिया थीं।

दरवाजा बन्द होते ही बकाल ने सीढिया चढना शुरू की। सीढिया चढते चढते, रेखा को ऊपर एक दरवाजा नजर आया । इस दरवाजे पर एक हथियारबद दरबान मौजूद था। वह बकाल को देखकर उसके सम्मान में कमर के बल झुका, फिर सीधा होकर बोला---"क्या आदेश है, बकाल ।।' '

"राकल से मिलना चाहती हूँ। उसकी अमानत उसे सौंपने आई हूँ.. । ' '

' 'अच्छा, ठहरो । ' ' दरवान ने आगे बढकर, बद दरवाजे पर लगी जजीर को एक विशिष्ट अदाज में बजाया। कुछ ही क्षणों में दरवाजे में एक छोटी खिड़की खुली ओर उसमें से एक शख्स ने अपना मुह चमकाया, बोला--

"हा क्या कहते हो? "

“राकल को सुचना दो, बकाल आईं हे...साथ ही उसकी आमानत भी साथ लाइ है। " दरबान ने बताया।

"ठीक है । ' ' कहते हुए उस शख्स ने खिडकी बन्द कर ली ।

कुछ देर बाद दरवाजा खुला। रेखा क्रो दुसरी तरफ एक बहुत बड़ा उल्लू नजर आया जो सामने के चबूतरे पर अपनी एक टाग पर खड़ा था और उसने अपनी एक आख बन्द कर रखी थी। बराबर में एक बहुत बड़ा स्तून था ।

बकाल रेखा का हाथ थामे अदर दाखिल हुई और उस चबूतरे के निकट पहुचकर रूक गई। उसने सिर उठाया और उस एक टाग वाले उल्लू के सामने आदर से सिर नवाया। उसने रेखा को भी झुकने का इशारा किया था-लेकिन रेखा सीधी खडी रही । तब उस विशालकाय उल्लू ने अपनी आख खोल दी और अपनी दोनों आखो से पहले वकाल और फिर रेखा को देखा ।

"राकल, मेरे भाई! तेरी अमानत ले आई हूँ…इसे कबूल कर । " बकाल ने बडे आदर से कहा।

उस उल्लू ने अपनी एक टाग पर खड़े-खड़े ही अपने दोनों पख खोलकर फडफडाए । उसके पंख इतने बडे थे कि उनके हिलने से रेखा और बकाल को अपने चेहरों पर हवा के थपेडों का अहसास हुआ।

उसके पंख फडफडाने.. का मतलब यह था कि उसने रेखा को कबूल कर लिया है।

' 'मैं तेरी शुक्र गुजार हू मेरे भाई। ” बकाल फिर सम्मानपूर्ण लहजे में झुकी।

तभी बराबर वाले विशाल स्तम्भ के पीछे से एक के बाद दुसरी औरत निकलती नजर आई ।

वे सात औरतें थीं । चिताकर्षक सफेद रंगत गोल खूबसूरत चेहरे, एक जेसे छोटे कद, एक जेसा सुर्ख रग' का लिबासा शायद उनके चेहरे भी एक जेसे हो थे। अगर कोई अतर था भी दो वह एक नजर देखने में महसूस नहीं होता था ।

वे औरतें, पक्तिबद्ध' चलती हुई, उस विशालकाय उल्लू के पीछे से घुमती, सीढिया उतराकर रेखा के गिर्द घेरा डालकर खडी. हो गई ।

फिर इन सात औरतों में सै दो ने रेखा के हाथ पकड लिए । तीसरी औरत ने उसे पीठ से कोमलता से आगे धकेला। वे दोनो औरतें रेखा के हाथ थामे आगे चलने लगीं। शेष पांच उसके पीछे चल दीं।

वे सीढिया चढकर उस उल्लू के पीछे आई और वहां से बढ़कर स्तम्भ की ओट में चली गई । रेखा ने देखा कि इस स्तम्भ के पीछे की तरफ एक दरवाजा था जो नीचे से नजर नहीं आता था । इस दरवाजे में से सीढियां नजर आ रही थीं, जो नीचे की तरफ चली गई थीं ।

वे दोनों औरतें रेखा का हाथ पकडे नीचे उतरने लगीं।

रेखा के चले जाने के बाद बकाल, राकल से मुखातिब होकर बोली--- " राकल, मेरे भाई! मुझे तुमसे कुछ बात करनी है । "

बकाल की बात सुनकर उस विशालकाय, खौफ़नाक उल्लू ने उसे घूरकर देखा फिर अपनी एक आख बद कर ली...ओर साकत हो गया।

बकाल ने महसूस कर लिया कि, राकल अब यहां नहीं है। सो वह भी सीढियां चढकर. स्तम्भ के पीछे पहुची और दरवाजे में प्रवेश करके तेजी से सीढिया उतरने लगी ।

यह एक बहुत बड़ा तहखाना था-ज़हां जगह जगह रोशनी हो रही थी।। तहखाने में दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था । वे औरते रेखा को अपने ठिकाने पर ले जा चुकी थी।

बकाल सीढिया उतराकर आगे बड्री तो उसे गोल चेहरे बाली एक सेविका दिखाई दी I तो एकाएक ही कही से प्रकट हुईं थी । बह बकाल को देख, उसके सामने आदर सै सिर नवाकर खडी. हो गई।

"राकल कहां है? " बकाल ने उसके निक्ट पहुचकर पूछा I

उस सेविका ने मुह' से कुछ कहने की बजाय एक तरफ इशारा किया । बकाल उसके पीछे-पीछे चलने लगी । यूं बह्र विभित्र दरवाजों के सामने से हुई, एक बड़े से दरवाजे के सामने आकर रूक गई । और जब बक्राल भी इस दरवाजे के सामने पहुच' गई तो वह सेविका उल्टे कदमों लौट गई।

बकाल ने दरवाजे पर हाथ रखा तो वह फोरन खुल गया । वह बेघडक दरवाजे में प्रदेश कर गई। अन्दर आक्रर उसने… पलटकर दरवाजा बन्द किया और आगे बढ़ी।

दरवाजे से कुछ ही कदम के फासले पर एक पर्दा लटक रहा था। वह पर्दा ह्रटाकर दूसरी तरफ पहुची तो उसने देखा कि कमरे के ठीक बीर्चों-बीच एक ऊची मसन्द पर राकल शोख रग शाही लिबास पहने बैठा है ।

कमरे में सुर्ख रग का मोटा कालीन बिछा हुआ था और कमरा भरपूर रोशनी में जगमगा रहा था I

राकल-सिह्रासननुमा मसद पर किसी राजा की तरह बैठा हुआ था। उसके गले में मोतियों का कीमती हार पडा हुआ था । घुंघराले बाल, सुर्खी लिए सावली रंगत, बलिष्ट, स्वस्थ बदन और एक हाथ में साप कीं तरह बल खाया हुआ राज़-दण्ड।

वह बकाल को 'देखकर मुस्कराया बकाल उसे देखकर. मुस्कराई और उसके चरणों में बैठ गई ।

' 'बो कहा है, मेरे भाई?" ' बकाल ने पूंछा I

”कौन रेखा? '' राकल ने जानना चाहा I

" नहीं, वह चमगादड़ का बच्चा॥ ' ' बकाल बिफर गई ।।

राकल ने यह सुनकर एक गगनभेदी कहकहा लगाया, फिर बोला--' 'तूने उसका नाम खूब रखा है, बकाल। ' '

' 'वह है कहां । "

“हमारी कैद में… I " राकल ने बताया

”बैसे बकाल तूने उसके साथ बड़ा जुल्म किया है? "

' 'मेरे भाई, क्या तुम चाहते हो कि में उस चमगादढ़ के बच्चे के साथ शादी कर लूँ? ''

' 'यह मैंने कब कहा । देवा काली की कसम बो है तेरा सच्चा आशिक।" राकल बौला--"सच तो यह है कि मुझे उस पर रहम आता है।"

"यह राकल को रहम कब से आने लगा । " राकल ने व्यग्य कसा ।।

' 'खैर छोड, यह बता तू यहां मुझसे क्या बात करने आई थी? ' ' राकल ने विषय बदलत्ते हुए पूछा।
 
' 'मै तुमसे इन्द्रजीत के बारे में बात करना चाहती थी… । ' '

' 'क्या हुआ उसे...? ' '

‘ 'मेरे भाई, तू जानता है कि मैं उसके बिना नहीँ रह सकती । ' ' बकाल ने अपनी इच्छा स्पष्ट की । मैं उसे जीवन भर के लिए अपना बनाना चाहती हूँ।''

' 'उसके लिए तू अमल कर तो रही है। " राकल सजीदा दिखने लगा। ' 'उसका क्या बना? ''

' 'वह एक लम्बा अमल है I अभी प्रारम्भ ही हुआ है। जाने उसमें कितना वक्त लगे। ' ' बकाल ने समस्या बताईं ।

' 'वक्त की क्या चिन्ता है l ' ‘

‘ 'वक्त की तो मुझें बिल्कुल परवाह नहीं है । परवाह मुझें उस चमगाद्रड़ के बच्चे क्री है । वह निरन्तर मेरे खिलाफ साजिशों में लगा है I मुझें उसकी सूरत से भी नफरत है । मैं चाहती हूँ क्रि उसे आसूओं की दीवार में चिनवा दिया जाए। वह जब तक जिन्दा रहेगा मुझें बेचैन और अशात करता रहेगा I ' '

' 'यह काम इतना आसान नहीं है I सरदार कोलाना, अपने काले चिराग जैसे महत्वपूर्ण बन्दे क्री मोत पर एक तूफान खडा… कर देगा।"

' 'मै कुछ नहीं जानती, मेरे भाई । मुझे इस काम को आसान बनाना होगा I " बकाल ने जिद कीं ।

' 'अच्छा ठीक है I तू परेशान न हो, मैं करता हूँ कुछ I " राकल ने उसे बहलाना-चाहा I

मैं उसे आसुओ की दीवार में चिना हुआ देखना चाहती हूँ। ' '

"इस काम को बहुत होशियारी सै करना होगा... । " राकल सोचपूर्ण लहजे में बोला--' 'पूरी गोपनीयता के साथ करना होगा I ' ' .

' 'मैं जानती हूँ कि तू चाहेगा तो हजार रास्ते निकाल लेगा... ।" बकाल की आखों में आशा की चमक भर आई थी--' 'अच्छा अब मै चलती हूँ। तुझे रेखा का साथ मुबारक हो । "

' 'वह कहा है?" राकल ने पूछा ।

' 'सेविकाएं उसे तेयार कर रही होंगी। दोडा. धैर्य करो-आने ही वाली हे।" बकाल अपनी मुस्कान दबाते बोली--' 'बैसे तू उसे वहा से लेकर आया खूब । वह तेरी अय्यारी को उम्र भर नहीं समझ सकती। "

इस पर राकल ने फिर एक जोरदार कहकहा लगाया और फिर अपनी राजदण्ड सी दिखती लम्बी लाठी सहारा लेकर उठ खडा हुआ। उसने इस राजदण्ड को बैसाखी की तरह अपनी बगल में दबाया और अभी मसंद से उतरकर वह दो कदम ही चला था कि देखते ही देखते नज़रों से ओझल हो गया।

फिर बकाल भी उठी और वह पर्दा हटाकर दरवाजे से बाहर निकल गई।

बकाल के बाहर जाते ही राकल फिर अचानक प्रकट हुआ और अपने राजदण्ड को बैसाखी क्री त्तरह्र बगल र्मे लगाये फिर मसंद पर आ बैठा। उसके होठों पर मुस्कराहट थीं और आखों में ख्वाहिशों के दीये टिमटिमा रहे थे।

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और राकल बोला-- ' 'आ जाओ... ।”

पर्दा हटाकर व दौनों उसके सामने आकर खडी हो गई। उन दोनों के सिर झुके हुए थे।

' 'क्या हुआ? " राकल ने पूंछा ।

' 'वह न स्नान करती है, न लिबास बदलती है और न ही यहां आने के लिए तैयार है । "

' 'क्या तूने उसे बताया कि उससे कौन मिलना चाहता है? ' '

' 'नही । हमने उसे तेरा नाम नहीं बताया है-वेसे बो काले चिराग के बारे में वार बार पूछती है। ' '

' 'उससे कहो कि तुम्हें राकल ने बुलाया है। राकल से मिल लो - उसे काले चिराग से राकल ही मिलवा सकता है ।" राकल के होठों पर धुर्ततापूर्ण मुस्कान थी।

"ठीक हें। " दोनो सेविकाओं ने सिर नचाया और उल्टे कदम चलती हुई पर्दे के पीछे चली गई।

वे दोनों दरवाजे से निकलकर तेज-तेज चलती उस जगह पहुची' जहां रेखा को रखा गया था । रेखा मसहरी के कोने पर सिर झुकाए बैठी थी।

वह कुछ समझ नहीँ पा रही थी कि क्या करे। हालात ने इस कदर से और विपरीत दिशा में पलटा खाया था कि बेबस होकर रह गई थी।

उसने तो सोचा था कि काले बिराग की मदद से अपने भाईं को लेकर अपनी दुनिया में चली जाएगी और वहां पहुचकर उसका उपचार कराएगी। वह अपने भाई को पूर्णत: स्वस्थ देखना चाहती थी और फिर अभी तो उसके जीवन का अति महत्वपूर्ण काम बाकी है । अभी उसे अपने भाई की बर्बादी और-बाप क्री हत्या का प्रतिशोध लेना है। वह रमाकात्त' को किसी कीमत पर नहीं बख्शेगी । उसे एक न भूलने वाला पाठ पढाकर रहेगी पर यहां तो पासा ही पलट गया था । वह मंजिल के करीव आकर अचानक मजिल' से दुर हो गई थी ।

काला विराग बंदी बना लिया गया था । वह एक हमदर्द इसान था। यह सत्य था क्रि वह रेखा की मदद अपने स्वार्थ हेतू यानी बकाल को पाने के लिए कर रहा था लेकिन उसकी इस चाहत से उसके भाई को भी तो छुटकारा मिल रहा था ।

अब जाने काले चिराग के जहन में क्या मन्सूबा...कैसी योजना थी। काश । बकाल कुछ देर और न आती तो काला चिराग उसे अपनी योजना बता चुका होता और उस पर अमल करके अपने भाई की मुक्ति के लिए संघर्षरत होती । अब वह एक गहरे कुंए में थी जिसके पानी में वह तैर तो सकती थी लेकिन उसमें से निकल नहीं सकती थी I

दरवाजे पर आहट हुई। रेखा ने सिर उठाया तो अपने सामने दो सेविकाओं को पाया । वे अपनी शक्ली-सूरत से जुडवा बहने. लगती थीं । वे उसके निकट आकर बड़े अदब से खडी हो गई I

‘ फिर उसके सामने जरा सा झुकी और सीधी हो गई I उनमें से एक बोली-- "तुझे बुलाया है I' ' अजीब अदाज था यह बातचीत का ।

' 'किसने बुलाया है?" रेखा ने पूछा I

"राकल ने। ' ' बताया गया।

' 'तो चलो । ' ' रेखा यह सुनते ही अपना बैग कंधे पर डालकर चलने के लिए तेयार हो गई।

' 'ऐसे नहीँ । ' ' दासी बोली ।

"फिर कैसे? " रेखा ने पूछा I

"पहले स्नान कर लो...तुम थक गई होंगी । नहा-धोकर लिबास बदल लो। फिर चलो... । ' '

' 'नहीं मैं थकी नहीं हूँ। मै फोरन राकल से मिलना चाहती हूँ। मेरा भाई रेगिस्तान में जाने केसा होगा?"

' 'हमें नहीं मालूम कि तू क्या कह रही है। ' ' दासी धीमे से बोली ।

"तुम्हें समझने की जरूरत भी नहीँ है। ' ' रेखा बैचैन-सी बोली-' 'तुम लोग बस मुझे राकल के पास ले चलो ।"

"इस तरह राकल नाराज होगा। तू उसका आदेश मान लेगी तो वह तुझे काला चिराग से मिला देगा...उसने यही कहा है। " दासी बदरस्तूर धीमे से बोली थी।

रेखा चौंकी । दासी के इस कथन से उसे राकल क्री नीयत का अदाजा करते देर न लगी। उसका दिमाग घूम गया। वह बिफाकर बोली--- ' ''राकल से जाकर बोलो कि आने से इकार कर दिया है I "

' 'नहीं ऐसा न करो । ' ' दासी सहमकर बोली--' ' आप उसके क्रोध से वाकिफ नहीं । ' '

"जो मैने कहा है उससे जाकर कह दो । रहा उसका गुस्सा तो वह मैं देख लूगी l उसने मुझे समझा क्या है? ' '

"एक बार और सोच लें ।' ' दोनों दासिया' जाते-जाते रूक गई।

' 'सोच लिया। इज्जत है तो सब कुछ है। इज्जत नहीं तो कुछ भी नहीं । तुम जाओ I ' ' दासियाँ सहमी-सहमी सी कमरे से निकल गई ।

रेखा का दिमाग तप रहा था। वह गुस्से में कमरे में चहलकदमी करने लगी I

तपते जहन में सोचें बवण्डर बन चली थीं I

' 'आखिर उसने मुझें समझ क्या रखा है । ये किस तरह के दुष्ट लोग हैँ। एक यह इसकी बहन हे जिसने मेरे भाई पर कब्जा कर रखा है, जोर-जबरदस्ती से काम ले रही है और एक यह है जो मुझ पर कब्जा जमाने की सोच रहा है। आखिर वह काला चिराग भी तो है-- उसने तो कभी गलत निगाहों से नहीँ देखा हालाँकि मैं उसके साथ रही I वह एक सच्चा और नेक हिल आदमी था I जाने राकल ने उसका क्या हश्र किया होगा। आह । चाहत ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा-एक ऐसी औरत के पीछे बर्बाद हो रहा था जो उससे सीधे मुह' बात करने को तेयार न थी I "

"बकाल का दीवाना है बौ और बकाल उसे चमगादड़ का बच्चा कहकर पुकारती थी । वह ऐसा क्यों कहती थी-महज अपमानित करने के लिए या इसके पीछे भी कोई भेद है।

" भेद !"

और त्तब रेखा को याद आया कि जब काला चिराग उसे महल में लेकर गया था तो वहां कोई नहीं था। और रेखा के पूछने पर क्या यहां कोई नहीं है तो काला बिराग ने उसे जो मजर दिखाया था...वह बडी. बडी. चभगादडो का था । फिर रात जब वह सोई थी तो आखें बद करते ही वह खुद को एक पत्थर पर सोता पाती थी और उसके इर्द गिर्द चमगाद्रड़े ही दिखाई देती थीं ।

_ सोचो में अन्देशों का जहर घुलने लगा ।

' 'कही काला चिराग' कोई ऐसा ही प्राणी तो नहीं। ' ' वह सोचते सोचते रुक गईं--' 'क्या ऐसा कुछ भी हो सकता है। कही' वह चमगादड़ तो नहीं । हां, यहीं....। " यह सोचकर ही रेखा को पसीना आ गया ।

वह अभी इन्हीं कलप्नाओं में उलझी हुई थी कि अचानक दरवाजा खुला और राकल मुस्काता हुआ-अपने राजदण्ड को बैसाखी बनाए बडे इत्मीनान से अन्दर दाखिल हुआ।

रेखा टहल रही थी । वह फोरन उठकर मसहरी पर बैठ गई। राकल उसके करीव आकर रुक गया ।

' 'मुझे पहचाना। " उसके चेहरे पर एक शेतानी मुस्कराहट थी ।

' 'जी हां, पहचान लिया। आपके तो मुझ पर बहुत से अहसान हैँ… । ' ' रेखा खुद को सम्भालते हुए बोली---- ' 'और मै… । "

लेकिन राकल ने उसकी बात काटते हुए कहा-- 'आपके नहीं, 'तेरे' कहो । ' ' उसने अपने एक हाथ की उगली इंकार में हिलाई ।

' 'तेरा कहो । यहां तेरा कहा जाता है।"

' 'यह तो धृष्टता है । ' ' रेखा बोली ।

' 'हमारे यहा इसे धृष्टता नहीं समझा जाता । ' '

"अच्छा खैर, में यह कह रही थी कि.. . । "

"मैने तुझे बुलाया था तू आई क्यों नहीं । तू नहीं जानती कि राकल से इंकार का क्या मतलब होता है। "

"नहीँ, मैं नहीं जानती। तू क्या... । "

"ठीक है, मै ही तुझे बतलाता हू। पर पहले यह भी सुन ले कि सच यह है कि में तुझसे प्यार करता हू।”
 
रेखा विफर उठी, फुफकार कर बोली--"और मै तेरी सूरत पर थूकने के लिए भी तैयार नहीँ। आखिर तू भी चुडैल बकाल का भाई निकला ।"

राकल के लिए रेखा के ये तेवर और उसका यह जवाब अप्रत्याशित था । वह एक क्षण के लिए सिट पिटा गया। अपने अदर सिमट गया, सहम गया। पर फिर उसने फोरन ही खुद को सम्भाल लिया। उसे एक कमजोर इसान-वह भी एक औरत से डरने कीं भला क्या जरूरत थी।

राकल ने अपना एक अमल किया और रेखा चकरा कर रह गई।

राकल ने साप की तरह बल खाया हुआ अपना राजदण्ड अपनी बगल से निकाला और उसे मध्य से पकडकर… अपना हाथ ऊपर उठाया और अपनी एक टाग पर नाचना शुरू कर दिया ।

रेखा मसहरी पर बैठी धी।

मसहरी कमरे के ठीक मध्य में थी । राकल ने मसहरी के गिर्द नाचते हुए चक्कर लगाने शुरू कर दिये। वह बिल्कुल मलगों की तरह नाच रहा था। हालाकि' उसके पैर या हाथ में घुघरू नहीं थे...लेकिन छम-छभ की आवाजें आ रही थीं।

लगडे.. राकल के इस बेहूदा अमल पर रेखा चकराकर रह गई। वह परेशान सी उसे नाचते हुए देख रही थी। रेखा का ख्याल था कि यह लगड़ा प्रेत उसके इकार' पर, सख्त जबाब पर, उसे कोई सख्त सजा देगा। लेकिन यहां तो मामला . ही उल्टा हो गया था । वह क्रोधित होने की बजाय नाच रहा था, वह भी एक टाग' पर ।

उसके नाच में एक' विशेष निपुणता थी और वह बेहद तेजी से नाच रहा था और यह तेजी क्षण-प्रतिक्षण बढती… जा रही थी। उसके होंठ सख्ती से भिचै' हुए और निगाहे रेखा पर केन्दित थीं। उसको इस कदर तेजी से घूमते देखते रहने पर रेखा क्रो चक्कर आने लगे थे। लेकिन राकल तो जेसे इस क्षण जुनून के हवाले था।

उसकी गर्दिश तेज से अधिक तेज होती जा रही थी । ऐसी तेज कि अब उस पर नजर जमाना भी कठिन हो रहा था ।

फिर वह क्षण आया कि वह नजर आना बंद हो गया था और अगले ही क्षण जो चीज चक्कराती हुईं नज़र आई वह राकल न था।

छमछम की आवाज बन्द हो चुकीं थी। नाच खत्म हो चुका था और अब एक उल्लू उस बडे कमरे में रेखा के गिर्द घूम रहा था। इस उडते. उल्लू क्रो देखकर रेखा क्ती चीख निकलते-निकलते रह गई थी।

अभी वह सोच ही रही थी कि क्या. करे कि उस उल्लू ने अपने पंजे निकालकर उस पर हमला कर दिया। और यह हमला सीधे उसकी आखों पर था. रेखा अगर एक तरफ झुककर तत्काल ही लेट न गई होती तो उल्लू उसकी आख जख्मी कर गया होता। फिर भी उसके सिर के कुछ बाल उसके पजे में उलझकर टूट गये थे ।

इससे पहले कि उल्लू उस पर दूसरा बार करता--रेखा फैसला कर चुकी थी कि उसे क्या करना है। उसने तेजी से करवट ली और मसहरी पर रखा अपना ब्रैग फ्फड़ लिया I वह खडी हुई-इधर उल्लू ने उस पर पलटकर हमला किया-उघर रेखा ने भरा बेग घुमाकर उस पर मारा । उल्लू वैग की जद में आ गया। बैग ऐसै वेग और ताकत सै उसके लगा कि वह पलटकर दीदार से जा टकराया-और फिर पट से फर्श गर गिरा।

दरवाजा खुला हुआ था। बैग कंधे पर डाल, रेखा ने दरवाजे की तरफ दौड… लगा दी और तेजी से कमरे से बाहर निकल गई। निक्लते ही पलटकर दरवाजा भी बद' कर दिया था उसने।

बाहर से दरवाजे की चिटकनी बद की और तेजी से इधर उधर देखा ।

आस पास कोई न था । पूरा हाल खाली पड़ा था। दूर सामने तहखाने की सीढिया नजर आ रही थीं । एक भी क्षण गवाये बिना रेखा ने पूरी ताकत से सीढियों की तरफ दौड लगा दी i

सीढिया_चढकर. जब यह बड़े स्तम्भ के दरवाजे से बाहर आई तो उसका ख्याल था कि यहां उसे जरूर दासिया नजर आएणी। लेकिन यहां भी सन्नाटा व्याप्त था। जब वह उस स्तून के गिर्द घूमती चबूतरे कीं तरफ आई तो वहा वह विशालकाय उल्लू एक टाग पर खडा नजर आया।

इस विशालकाय उल्लू का रूख सामने दरवाजे की तरफ था और वह बिल्कुल उसी तरह साकत-निश्चल खडा था जेसा रेखा ने उसे छोडा था। रेखा इस वक्त उसकी पीठ तरफ थी ।

वह धीरे-धीरे चलती हुई सीढिया उतरने लगी । दरवाजे के लिए उस उल्लू के सामने सै गुजरना जरूरी था । उसने सीढी. की ओट में बैठकर तेजी से बेग खोला और उसमें सै चाकू निकाल लिया।

यह एक बडे फल का चाकू था। उसने सोच लिया था कि अगर इस उल्लू ने उस पर हमला किया तो वह इस चाकू से उसका मुकाबला करने की कोशिश करेगी ।

यह एक बडे फल का चाकू था। उसने सोच लिया था कि अगर इस उल्लू ने उस पर हमला किया तो वह इस चाकू से उसका मुकाबला करने की कोशिश करेगी ।

चाकू हाथ में थामकर वह बडी सतर्कता के साथ नीचे उतरी और फिर चबूतरे क्री दीवार के साथ चलती हुई उस जगह पहुची जहां उल्लू खड़ा हुआ था । फिर वह तेजी से आगे बढकर… फोरन पलटी । चाकू वाला हाथ उसने उठाया हुआ था कि अगर उस उल्लू ने उसे देखकर पीछे से हमला किया तो वह इसके लिए तेयार थी।

लेकिन उल्लु तो आराम से अपनी जगह खड़ा रहा यथावत निश्चल साकत । उसकीं एक आख' बन्द थीं और वह एक टाग पर खडा था । जाने क्यों रेखा को लगा जैसै उल्लू में जान ही नहीं हे ।

उल्लू की एक आख खुली हुई थी और रेखा हाथ में खुला चाकू लिए खडी थी ।

लेकिन उल्लू क्री आखों में कोई गर्दिश नहीं दिखी थी। वेसे भी वह असाधारण-विशाल आकार का उल्लू था. ..असली की बजाये नक्ली दिखाई देता था । इस वक्त वह बिल्कुल निर्जीव दिखाई दे रहा था। रेखा जब बकाल के साथ पहली बार उसके सामने आई थी तो उसकी आखो में गर्दिश दिखाई दी थी और उसने अपने 'पंख' भी फडफडाए थे।।

बहरहाल, इस क्षण यह अच्छी ही बात थी कि वह किसी बेजान क्री तरह स्थापित था। रेखा फौरन ही दरवाजे की तरफ झुंक्री ।

बद दरवाजे को जब उसने खोला और बाहर एक कदम रखा तो उसके सिर पर कोई चीज गिरी और फिसलकर गर्दन में आ गई। फिर एक जोरदार झटका लगा और उसका दम घुटने लगा । उसने चाहा कि सम्भरकर अपनी गर्दन में लगने वाले रेशमी फंदे को किसी तरह तग होने से रोक सके । लेकिन उसे इसका मौका नहीं मिला।

जो कुछ हुआ आनन-फानन हुआ!

उसकी गर्दन मे फंसा फंदा तग होता गया । वह उतराकर पीछे की तरफ गिरी और बेहोश हो गई । उसके गले में फंदा डालने वाली दो देबकाय औरते थीं । काली-भुज़ग भयावह... । अगर यह औरतें रेखा के गले में फंदा डालने की बजाय अपनी शक्ल ही उसे दिखा देती तो रेखा ने फोरन ही बेहोश होकर गिर जाना था ।

इन औरतों ने पीछे से रेशमी फदा रेखा पर फेंका था । वे उल्लू के विशालकाय बुत के बराबर चबूतरे पर खडी थीं और बडी, तेजी से ही स्तम्भ के दरवाजे से निकलकर चबूतरे पर पहुची थीं और उन्होंनै रेखा के दरवाजे सै निकल सकने से पहले बडी दक्षता के साथ उसके गले में फंदा डालकर उसे मीछे घसीट लिया था ।

इन दोनों काली-भुजग', खौफनाक औरतों ने बेहोश रेखा क्रो अपने कंधो पर डाल लिया और बडी फुर्ती से चबूतरे की स्रीढिया' चढकर स्तून के पीछे पहुची और भूमिगत तहखाने क्रे दरवाजे में प्रवेश कर, खटाखट सीढिया उतरती चली गई ।

वे राकल के कमरे में पहुची और उन्होंने रेखा को राकल के कदमों में डाल दिया । यहा' कदमों की बजाये 'कदम' कहना चाहिये। क्योंकि राकल तो एक टांग का था । वह भारी चादर ओढे. मसन्द पर बैठा था । उसकी साप की तरह बल खाती लाठी उसके हाथ में थी और चेहरे पर पीडा के तीखे भाव थे। उसके दायें. हाथ पर गम्भीर चोट आई थी ऐसी कि वह अपने इस हाथ को हिलाने में भी असमर्थ था ।

उसने अपने बल खाये राजदण्ड को रेखा के शरीर से स्पर्श कराया । इस बीच वे वहशी औरतें उसके गले से फंदा निकाल चुकी थी और बापस जा चुकी थी ।

राजदण्ड के शरीर से स्पर्श करते ही रेखा के बदन में भूचाल सा आ गया उसने फोरन आखें खोल दीं । आखै खुलते ही उसकी नजर सीधी राकल पर पडी। वह अपनी पीडा, के बावजूद उसे बडे प्यार और चाव से देख रहा था ।

रेखा फोरन उठकर खडी. हो गई । उसका बैग और चाकू निकट कालीन पर पड़े थे । उसने सोचा कि झुककर उठा ले, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकी। क्योकि राकल ने उसके इरादे को भाप लिया था और उसने अपनी छडी से चाकू को अपनी त्तरफ घसीटकर अपने पाव तले तबा लिया था । और फिर बडे अजीब से लहजे में बोला था--

' 'वार करना चाहती हो?"

"हां।" रेखा ने बेधडक, कहा।

"और कितने वार करोगी । अभी तो मुझ पर वार करके भागी है । ' '

"मैं तेरी सूरत बिगाड देना चाहती हूँ।” रेखा अपने रोष पर काबू नहीँ पा सकी थी।

"तू जानती है कि तूने क्या कर दिया हे-तूनै मेरा एक बाजू बेजान कर दिया है । ' ' राकल का लहजा संयत लेकिन शिकायत भरा था।

"काश ! मैं तुझे खत्म कर सकती । '' I

"मैं तो वैसे ही मरा हुआ हूँ मुझे और क्या मारना? ' ' राकल ने फिर शिकायती अंदाज' अपनाया।

"अभी तू मरा नहीं। भगचान ने चाहा तो जरूर मरेगा, मेरे ही हाथों मरेगा और साथ में तेरी बहन क्री भी अर्थी उठेगी।" रेखा भडक रही थी।

"हा. ...हा.. .हा... । ' ' उसने एक घिनौना कहकहा लगाया. फिर नाटकीय अंदाज' मॅ बोलि--' 'क्या औरतों वाली बाल करती हो I "

"औरत को कमजोर न समझ । " रेखा फुफकारी।

"तू नहीं जानती कि तू कहां है । तू यह नहीं जानती कि तू किसकी कैद में है । तेरी खुद की अर्थी उठने में यहां देर न लगेगी । " राकल ने अब तेवर बदले ।

"मेरा चाकू मुझे दे दे । “ रेखा ने जेसे धमकी दी ।

"ले उठा ले । " कहते हुए उसने चाकू मै ठोकर मार दी । चाकू रेखा के पैरों में आ गया I

पर फिर रेखा जैसे ही चाकू उठाने के लिए झुंकी-राकल ने उसके सिर पर अपनी भारी छडी सै वार किया; रेखा ' झुकी झुकी बही त्यौराकर गिर पडी।

तब राकल ने बैठे बैठे अपनी छडी मसद पर खट खट बजाई और यह आबाज सुनते ही वही दोनों वहशी औरतें पर्दा हटाकर अदर आ गई।

"उठाओ इसे और कैदखाने में फेंक दो, तीन दिन भूखा रखो । जाओ... ।" राकल दडाड़ा था। उन दोनों काली भुजग औरतों ने उसे उठाकर कधो… पर डाला और कमरे से निकल गई । उन्होंने' रेखा को इस मायबी धरती के कैदखाने के दरवाजे पर पहुचा' दिया ।
 
कैदखाने के इस दरवाजे से भी उन्ही जैसी एक काली-भुजग' देवकाय औरत बाहर आई थी । उसने एक नजर बेहोश रेखा को देखा, जो उनके कंधो पर सोई हुईं थी और फिर उसने उनसे सम्बोधित होते पूंछा।।

' 'कौन है यह. .. ?"

' 'हमें नहीँ मालूम कौन है? ' ' एक औरत ने जवाब दिया ।

"फिर यहां लाने का मकसद...?"

"राकल ने भेजा है ॥ उसका हुक्म है इसे तीन दिन तक भूखा रखना है। "

' 'ठीक है। इसे नीचे लिटा दो I इसे बेहोश किसने किया है?"

' ' राकल ने. . . । ' ' यह कहकर उन औरतों ने रेखा को जमीन पर लिटा दिया । उसका बैग भी उसके साथ रखा और बापस चली गई

कुछ देर बाद जब रेखा को होश आया तो उसने स्वयं क्रो एक छोटे से कमरे में बद पाया।

वह फोरन उठकर बैठ गई । बिबेक जागा. हवास बहाल हुए तो उसने दरवाजे को झझौडा दरवाजा बाहर से बद' था। कमरे में कोई झरोखा या खिडकी, इत्यादि भी न थी। हां, काफी ऊँचाई पर एक रोशनदान जरूर था। रोशनदान बडा था-लेकिन इतना ऊचा था कि रेखा उसमें से झाककर बाहर नहीं देख सकती थी। जमीन पर एक चटाई पडी हुई थी ।

शुक्र था कि उसका बेग उसके पास पडा. था। रेखा ने बैग अपनी तरफ खींचकर उसकी तलाशी ली। चाकू बैग में नहीं था, जबकि उसकी बल्की चीजें बैग में ही थीं । उसे याद आया कि वह चाकू उठाने के लिए झुकी थी कि कोई भारी चीज उसके सिर पर आकर लगी थी । फोरन अपने सिर पर हाथ फेरा । सिर में किसी प्रकार का जख्म, निशान था पीड़ा न थी ।

राकल ने उससे प्रतिशोध लिया था और उसे कैदखाने में डलवा दिया था । रेखा ने एक गहरी सास' ली ।

जो हुआ था वह उसकी आशाओं के विपरीत था। वह नहीं जानती थी कि राकल ने उसके बारे में केसा आदेश दिया है । वह आगे के बारे में सोचती रही थी । उसे कैद की कठिनाईयों का अहसास न था, जबकि हुआ यह था कि वे लोग उसे इस कोठरी में डालकर जैसे भूल हो गये थे।

दो दिन बीत गए और इस कमरे का दरवाजा किसी ने नहीं खोला। उसके कान किसी आहट को तरस गए थे। भूख के मारे उसका बुरा हाल था। एक छोटी-सी सुराही में पानी मौजूद था और अब वह भी खत्म हो रहा था। उस पर कमजोरी छाने लगी थी। वह निढाल-सी पडी थी । आखे बार बार बद हो जाती थीं ।

उस पर गशी-बेहोशी के दौरे पड रहे. थे ।

इस अवस्था में जबकि वह न होश में थी-न बेहोश थी । जाग रही थी, न सो रही थी, या फिर वह जैसे गहरी नींद में थी, रेखा को यूं लगा जैसे बडे दादा हरिओम--उसके करीव बैठे हुए हो। वही दादा हरिओम, जिनके मृत्यु-पूर्व के छोडे पत्र ने ही रेखा के लिए इस वर्तमान घटनाक्रम के द्वार खोले थे । दादा का नूरानी चेहरा देखकर उसे सुकून महसूस हुआ । वह उनसे कुछ कहना चाहती थी...लेकिन वह बोल नहीं पाई।

दादा हरिओम भी जेसे उसकी बेबसी को समझ जाते हैं और हाथ के इशारे से उसे शातचित रहने का सुझाव देते हैं।

रेखा अब शात चित । धेर्यं-घीरज बाली थीं। उसने आखें' मूंद ली' और सोने की कोशिश की । अपनी इस कोशिश में वह सफल रही थी-या फिर सुध खो बैठी थी ।

कितनी ही देर वह इसी बेसुधी में रही और फिर जब उसकी आख खुली, या उसको सुध लौटी और विवेक जागा तो उसे अपने पास कोई नजर नहीं आया। पर वह अब शातचित्त' थी, सयत थी ।

कसक थी तो बस इसकी कि काश! ! बडे दादा ने उससे बात की होती पर ऐसा न हो सका था ।

पर अब एक नया होसला उसके साथ था। वह अब तक अकेली और असहाय थी-पर अब दादाजी के हाथ अपनी पीठ पर होने का अहसास उसकी हिम्मत बढा गया था।

वह धीरे-धीरे उठकर बैठ गई ।

तभी एक आहट सी महसूस हुई। यह आहट दरवाजे पर नहीं हुई थी । यह आवाज ऊपर रोशनदान से आईं थीं । गिलहरी की आबाज के साथ ऊपर रोशनदान में से कोई चीज लुढकी थी ।

रेखा ने रोशनदान की तरफ देखा तो उसे गिलहरी की दुम दिखाई दी । और फिर 'फोरन ही कोई चीज लुढककर उस पर जा गिरी। रेखा ने ऊपर से गिरने वाली इस चीज को देखा तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा।

वह सुर्ख रग का एक सेव था ।

रेखा ने उसे उठा लिया ओर आभारी नजरों से ऊपर देखा। रोशनदान में से एक गिलहरी का चेहरा दिखाई दे रहा था। उसके देखते ही गिलहरी पीछे हट नजरों से गायब हो गई।

रेखा को अब पुख्ता यकीन हो गया कि वह अकेली नहीं है ।

सैव खासा बडा था। बडा… लजीज। खुशबूदार और मीठा भी था। इस सेव में जाने क्या बात थी कि उसे खाकर पेट भरने का अहसास हुआ। रेखा के होशो हवास बहाल हुए और वह अब सोचने-समझने योग्य हो गई।

रेखा ने राकल की बात मानने से इंकार कर दिया था फिर अपना बैग मारकर उसका एक बाजू भी घायल कर दिया था। परिणामस्वरूप उसे कैदखाने में डाल दिया गया था और फिर दो दिन बीत गए थे। किसी ने भी पलटकर इस कमरे क्री तरफ देखने का कष्ट नहीं किया था ।

दरवाजा बद था। फरार का कोई रास्ता न था। छत के करीव एक रोशनदान था भी तो रेखा की पहुच से बहुत ऊँचा था।

रेखा नहीँ' जानती थी कि इस रोशनदान के उस तरफ क्या है। काश ।। वह किसी तरह रोशनदान से बाहर का निरीक्षण कर पाती।

रेखा को अपना भाई इन्द्रजीत याद आया जाने वह किस हाल में होगा? चुडैल बकाल ने यहा से वापस जाकर इन्द्र के साथ जाने क्या सलूक किया होगा।

रेखा को काले चिराग की भी फिक्र थी । जाने उसके इस हमदर्द पर क्या बीती है और उसका क्या ह्रश्र किया जा चुका है। बह अब क्या करे I वह तो अपने भाई इन्द्रजीत को बचाने के लिए आई थी-पर वह अब खुद विपदा में फस' गई थी । अगर दैवयोग से उसे यह सेव न मिलता तो उसकी तो हालत और भी बिगड़ जानी थी ।

उसने सेब के बारे में सोचा।

प्रश्न यह भी था कि यह सेब कहा से आया था? इस रेगिस्तान में और ऐसा रसीला और खुशबूदार सैव । फिर इसे रोशनदान तक किसने पहूचाया । गिलहरी तो ऐसे फल खाने की खुद शौकीन होती हे । उसने खुद क्यों नहीं खाया? नीचे क्यो लुढका. दिया? फिर इस सैव मे ऐसी पोष्टिकता कहा से आई कि खाते ही भर पेट खाने कीं तृप्ति महसूस हुईं? क्या यह सिलसिला जाऱी रहेगा-या महज़ सयोग से ऐसा हो गया है ?

और फिर बड दादा हरिओम के यहां आने का अहसास महज एक ख्वाब था...उसका भ्रम था या वो वास्तव में ही उसका हौंसला बढाने¸ क्रो यहा आए थै?

बडे दादा से इन कठिन घडिंर्यों_ में सहायता व होसला-अफजाई की आशा की जा सकती थी।

रेखा इन्हों उलझनों का शिकार थी ओर अपनी मुक्ति का रास्ता सोच ही रही थी कि दरवाजे पर कुछ हलचल की आवाज आई-जेसे कोई बाहर से दरवाजा खोल रहा हो।

रेखा कुछ सम्भलकर बैठ गई I

कुछ क्षणों बाद दरवाजा खुला। उसके सामने राकल खडा. था। बगल में, बैसाखी की तरह अपनी छडी, दबाये और कंधो पर एक भारी चादर डाले I

राकल ने रेखा को चाक-चौबन्द बैठे देखा तो बडा हैरान हुआ I दो दिन की भूख ने उस पर जरा भी असर नहीं किया था। वह तौ समझ रहा था कि मारे भूख के रेखा की बुरी हालत होगी। यहां तो मामला ही कुछ और निकला ।

“केसी है तू। ' ' वह राजदण्ड नुमा _छडी के सहारे कमरे में आया।

"देख ले।। इतनी मोटी मोटी आखे तो हैँ तेरी।”

”पर...पर यह कैसे सम्भव है।" वह अभी तक हैरान था I

"सबकुछ मुमकिन हैं, इस मायवी धरती पर क्या सम्भव नहीं है। देख लिया कैद करके और भूखा रखकर । मै कोई मामूली लड़की नहीं हूँ।" रेखा ने रोब जमाने कीं कोशिश की।

“मैने कब कहा कि तू मामूली लडकी. है I मामूली होती तो यहां तक केसे आ जाती?"

" राकल क्या तू अपनी बहन को समझा नहीं सकता । " रेखा ने विषय बदलते हुए कहा।

" क्या समझाऊं?" जेसे वो जानता ही न हो।

"यही कि वो मेरे भाई का पीछा छोड दे ।"

"अगर मै उससे यह कहूंगा तो वह पलटकर मुझे कहेगी.. . । “

"तुझे वह क्या कह सकती है ? "

“वह कहेगी कि रेखा को आजाद कर दे तो मैं उसकी यह बात कैसे मान सकता हूँ। मैं रेखा को आजाद करने के लिए तो नहीं लाया यहा । ” वह रेखा को लगावट से निहारते हुए बोला ।

' 'रेखा तेरी कैद में नहीं रह सकती । और यह बात तू अच्छी तरह जानता है । तू अपना वक्त बर्बाद कर रहा है।"

' 'तू वक्त की बात करती है-मैं तेरे पीछे खुद बर्बाद हो गया । यह प्रेम की जग' है जिसमें सव कुछ जायज होता है यह बात तू भी अच्छी तरह जानती होगी । ' '

' 'जानती हूँ। ' ' रेखा के लहजे में य्यग्य भर आया--' 'अच्छी तरह जानती हूँ कि तेरी तबाही अब ज्यादा दूर नहीं है।"

"हा...हा...हा ! ' ' राकल ने खलनायकी कह्रकहा लगाया-- "मै अगर तबाह हुआ तो न तू रहैगी और न तेरा भाई रहेगा। " राकल ने धमकी दी I

‘ 'देखा जाएगा... । ” रेखा भी डरने वालो में से नहीं थी।

' 'चल अब मेरे साथ ।“ राकल ने अपने मतलब की बात कही।

"कहा?" रेखा ने पूछा।

"जिन्दगी के हर आराम और अनन्द क्रो पाने के लिए।”

" मुझें बस मेरा भाई चाहिये॥" रेखा ने कुछ सोचर कहा…"इसके लिऐ मझे क्या करना होगा?" वो राकल क्री आखों में झाकने लगी।

”मुहब्बत का जबाब मुहब्बत सै देना होगा। “ राकल की आखों में चमक भर आई थी।

उसने साफ साफ कहा।

' 'लेकिन मुझें तो तुमसे मुहबत्त नहीं है । "

' 'हो जाएगी। तू मेरे बारे में सोचना तो शुरू कर । " राकल ने काटा फैका I

"एक लंगडे और बाजू टूटे शख्स के बारे में मेरे जैसी लडकी सोचे भी तो क्या?” रेखा ने जवाब दिया ।

और रेखा के इस जवाब ने जेसे उसके अदर' आग लगा दी। उसने अपनी बगल के नीचे से छडी निकाल ली और अपनी एक टाग पर जमकर खडा हो गया । फिर उसने हाथ ऊपर उठाया और चाहा कि छडी रेखा के सिर पर दे मारे।

उसी क्षण वह पहाड सी औरत कमरे में दाखिल हुई जों इस कैदखाने की निगरान थी । उसने आते ही चेतावनी देते स्वर में पुकारा--"राकल ।"

राकल का हाथ उठा का उठा रह गया । वह पहले ही गुस्से में था-इस हस्तक्षेप पर भिन्नाकर रह गया।

"क्या है?" वो दहाडा। वह पहाड-सी काली भुजग औरत उसके सामने आकर झुक्री और आदर से बौली----"सरदार कोलाना का कारिन्दा आया है । वो तुझसे मिलना चाहता है l "

सरदार कोलाना का नाम सुनकर राकल का ऊपर उठा हाथ नीचे गिर गया । उसने अपना राजदण्ड बगल में दबा लिया। एक नजर रेखा की तरफ देखा, जेसे कहता हो---

"मेरा इन्तजार कर...तुझे अभी आकर देखता हूं ।" फिर फौरन पलटा और उस देवकाय औरत के साथ हो लिया। रेखा उन्हें जाते हुए देखती रही।

वो लम्बी लगडी देवकाय औरत तहखाने के दरवाजे तक रेखा के साथ आई।

सामने दो हथियारबंद निगरान मोजूद थे- वो उनको देखकर वापिस लोट गई। लगड़ा प्रेत राकल आहिस्ता आहिस्ता आगे बढता रहा। वै दौनों दरबान आगे-आगे चलने लगे ।

प्रेतलोक की हर बात ही निराली थी।
 
रेखा जैसे किसी प्राचीन युग के किसी जालिम निर्दयी राजा के राज्य में पहुची' हुई थी। उन दो सशस्त्र निगरानो के पीछे पीछे जब राकल इस मायावी भवन के बडे दरवाजे के सामने पहुचा तो एक दरबान ने चींखकर कहा ।

“दरवाजा खोल-राकल आया है I सरदार कोलाबा के कारिन्दे सै मिलना चाहता है I"

यह ऐलान सुनकर छ: आदमी उस विशाल दरवाजे के दाहिने और और छ: आदमी बायें ओर की कोठड्री से बरामद हुए-और इन बारह आदमियों ने मिलकर उस वडे… और भारी दरवाजे को खोला । दरवाजा खुला तो सामने घोडे, पर सवार इस मायावी दुनिया के सरदार कोलाबा का कारिन्दा नजर आया । वह सावली रगत का एक अजीब से चेहरे का व्यक्ति था । राकल को देख वह फौरन घोडे से नीचे उतर आया व गर्वित चाल चलता हुआ राकल के निकट पहुचा।

"हां बोल सरदार कोलाना के कारिन्दे कैसे आया?"

"क्या तू जानता है कि तुझसे कितनी बडी गलती हुई है?" सरदार कोलाना का हरकारा बौला।

"तू सरदार का कारिन्दा है, कारिन्दा ही रह-सरदार न बन । जो पैगाम लाया है वह कह, बेकार बातें न कर । "

"काला चिराग कहां है?" हरकारे ने पूछा।

"कौन काला चिराग? यह नाम मेरे लिए नया है।" राकल अनजान बन गया।

"राकल फिर बकाल भी तेरे लिये नया नाम होगा?” हरकारा उसे घूरते हुए बोला।

"बकाल मेरी बहन है । " राकल कुछ परेशान दिखने लगा ।

"क्या तू जानता है कि इस वक्त बकाल कहा है?"

"क्या मतलब?" उसकी परेशानी बढ़ गई।

"मेरी बात का जवाब दे ताकि मैं तुझे सरदार का पैगाम सुना सकूं । "

"यही है । मेरे पास सुनहरे खण्डहर में । ”

"और काला चिराग कहां है?"

"मैने कहा ना कि मैं किसी काले चिराग को नहीं जानता । "

"कहीं ऐसा न हो कि तुझे अपनी बहन बकाल की तलाश में सरदार क्रोलाना के पास जाना पडे और फिर सरदार ऐसा ही जवाब देगा कौन बकाल यह नाम तो मेरे लिए नया है I"

”तू कहना क्या चाहता है?" राकल ने गुस्से सै कहा।

"जो मै कहना चाहता हुं-वह तू अच्छी तरह समझ गया है, राकल तुझे अगर अपनी बहन बकाल प्यारी हो तो काले चिराग क्रो सरहद पर पहुचा देना । तुझे डेढ दिन दिया जाता है। वक्त गुजरने के बाद तू यह बात अच्छी तरह जानता है किं क्या होगा ।"

"क्या होगा?" राकल यह बात अच्छी तरह जानता था, फिर भी सवाल किया उसने।

"न तू रहेगा और ना बकाल । "

"मैं इसे एलाने जंग समझू। ”

"बिल्कुल इसमें कोई शक नहीं । " कारिन्दे ने पुष्टि कर दी-- “लेकिन यह एलाने जग उस वक्त ही तो मुकम्मल होगा जब तू सरदार कोलाबा को जाकर बताएगा कि तूने राकल को पैगाम दे दिया है। " राकल बोला।

" तू ठीक कहता है । "

“और अगर पैगाम देने वाला बापिस ही न जा सके तब?"

कारिन्दा उसका आशय समझ तेजी से बोला-- "नहीं ऐसा नहीं हो सकता। तू इस तरह की हिमाकत नहीं कर सकता । तू अच्छी तरह जानता है कि सरदार कोलाबा कित्तना ताकतवर हुक्मरान है? फिर तुझे यह भी मालूम होगा कि तेरी वहन बकाल उसके कब्जे में है। वो ईट सै ईट बजा देगा । "

राकल दुविधा का शिकार नजर आने लगा। अपनी बहन बकाल के बारे में उसे कुछ भी तो मालूम नहीं था कि वह कहां है और अगर वह वाकई सरदार के कब्जे में थी तो फिर इस कारिन्दे का किस्सा निपटाना हिमाकत ही थी! बकाल की जिन्दगी खतरे में पड जानी थी । राकल को अपनी बहन सै वहुत प्यार था और वह उसे किसी कीमत पर भी खोना नहीं चाहता था।

राकल के लिए जरूरी था कि वह कोई कदम उठाने सै पहले वह अपनी बहन की गिरफ्तारी का सबूत मागे'। सबूत मिलने पर इस कारिन्दे को जाने दे और उसकी दी हुई मोहलत में ही सरदार के खिलाफ कोई ठोस कदम उठाने की सोचे ।

वह कारिन्दे सै बोला-- "सरदार कोलाबा के हरकारे! क्या सरदार ने बकाल की गिरफ्तारी का कोई सबूत भी भेजा है? "

"हा भेजा है । " हरकारा मुस्कराते हुए बोला और उसनें अपने लिबास में हाथ डालकर कोई चीज निकाली और राकल की तरफ उछाल दी।

राकल के साथ आने वाले दरबानों में से एक ने इस चीज को लपक लिया और फिर बड़े सम्मान के साथ राकल को पेश किया । राकल ने इस चीज को उलट पुलट कर देखा I यह बकाल कीं अगूठी थी । यह अनूठी' राकल ने ही उसे दी थी । इस आगूठी' में नग की जगह उल्लू की आख कीं पुतली लगी थी। यह आख की पुतली किसी हीरे की मानिन्द ही चमक रही और इस मायालोक मे यह अंगूठी हर भाई, बहन के जवान होने पर उसे पहनाता था। किसी लकडी के हाथ में यह अनूठी' देखकर ही कोई लडका, लडकी की तरफ आकर्षित होता था और बाद में अपना रिश्ता भिजवाता था ।

इस अंगूठी को देखकर राकल को यकीन आ गया कि उसकी बहन वाक़ई सरदार कोलाबा के कब्जे में है, क्योंकि इस इस अंगूठी को एक बार पहन लेने के बाद कोई भी लडकी, शादी से पहले नहीं उतारती थी। जाहिर था यह अंगूठी बकाल की उगली' से जबरदस्ती ही उतारी गई होगी ।

राकल के तेवर बदल गए, पर वह अपना रोष दबाते हुए बोला-- “सरदार कोलाबा से कहना कि उसने मेरी बहन पर कब्जा करके अच्छा नहीं किया । "

“और राकल, क्या तूने काला चिराग को गिरफ्तार करके अच्छा किया है?" हरकारे ने आखें दिखाई ।

“वह मुजरिम है । "

“चल, तूने उसके अपने पास होने का इकरार तो किया। थोडी देर पहले तक तो तू उसके नाम सै भी वाकिफ न था । बैसे, क्या में पूछ सकता हूं कि उसका क्या कसूर है?" हरकारे ने पूछा।

"वो खामखाह बकाल के पीछे लगा हुआ है।"

"वह बकाल सै मुहब्बत करता है और मुहब्बत करना कोई जुर्म नहीं है।”

“उसकी यह जुर्रत पसन्द नहीं।"

"खैर, यह मसला मेरा है ना तेरा है । यह मसला काले चिराग और बकाल के बीच का है । मैने तुझे सरदार का पैगाम दे दिया । उसकी दी हुई निशानी भी तुझे दिखा दी । अब तू बता क्या कहता है?"

"मैं कल सूरज निकलते ही काले चिराग को सरहद पर पहुचा दूगा'। "

"ठीक है। बकाल की निशानी मुझें लोटा दे। " यह कहते हुए हरकारे ने अपना हाथ बढा दिया ।

राकल ने वह अगूठी' उसकी तरफ उछाल दी जिसे उसने वडी दक्षता के साथ लपक ली ।

फिर वह तेजी से वापिस मुडा-दौडकर अपने घोडे के निकट पहुचा उछलकर सवार हुआ… ऐड लगाई और यूं पलक झपकते ही आखों' से ओझल हो गया ।
 
राकल ने एक ठण्डा और गहरा सास लिया।

उसका दिमाग चकरा रहा था। वह सोचने लगा-यह सब क्या हो गया? सरदार ने कैसे जान लिया कि काला चिराग उसके कब्जे में है, फिर उसने बकाल को कहा से और कैसे अगवा कर लिया? लगता है, उसने बकाल को रेगिस्तान से अगवा करवाया है। वह जरूर इन्द्रजीत सै मिलने गई होगी। इस पागल के इश्क ने तो उसे कहीं का नहीं छोड़ा । अब उसे काले चिराग को छोडना. ही होगा, वर्ना सरदार कोलाबा ऐसा सिरफिरा शख्स है कि वो सुनहरे खण्डहर पर चढाई भी कर सकता है।

हरकारे के जाने के बाद उन बारह आदमियों ने यंत्रवत् ही प्राचीर के भारी फाटक को बन्द कर दिया। दरवाजे की आवाज होने पर राकल चौका। वह वापिस मुडा और सीढिया चढने. लगा। उसके सशस्त्र दरबान उसके आगे थे।
 
राकल ने फिर कैदखाने का रूख किया था ।

उसे देखते ही देवकाय औरत ने कैदखाने का दरवाजा खोला और उसके पीछे पीछे चल दी। वे उस कोठरीनुमा कमरे के दरवाजे पर पहुचे-जहां रेखा कैद थी। उस देवकाय, काली, भैंगी औरत ने दरवाजे पर लगा ताला खौल दिया।

लगडा राकल बैसाखी के सहारे खट् खट करता कमरे में दाखिल हुआ।

रेखा ने उसे देखा व खामोशी से देखती रह गई । उसकी समझ में नहीं आया था कि यह लंगडा अभी तो उसके हार्थों जलील होकर गया है और अब फिर आ गया है। यह ढीठपन की इन्तहा थी । राकल के चेहरे पर थकान व मायूसी के भाव देख रेखा समझी कि यह शेतान शायद अपने रवैये पर शर्मिन्दा है और शायद अब उससे क्षमा मागने आया है।

लेकिन ऐसा नहीँ था । वह शेतान तो कोई और ही मसूबा' लेकर आया था।

राकल कुछ देर रेखा के सामने खमोश खडा रहा I फिर धीरे से बोला-- " रेखा, बहुत बुरी खबर है रेखा, वहुत बुरी खबर है । "

"क्या हुआ?" रेखा को बरबस ही अपने भाई इन्द्रजीत का ख्याल आया था कि कही, भगवान न करे, उसे कुछ हो गया हो। " मेरा भाई तो सकुशल है । "

"हा', वह तो ठीक ही होगा । उसे क्या होना है !" शुष्क स्वर में बोला--"बैसे यह सारा फसाद उसी का फैलाया हुआ है I "

"मेरे भाई ने-मेरे भाईं ने क्या फसाद फैला दिया है, वो तो खुद एक मजलूम और तुम्हारी बहन की ज्यादतियों का शिकार हुआ शख्स है। भला वह क्या फसाद फैला सकता है?” किसी अज्ञात आशका से रेखा का दिल धडकने लगा था ।

”उसने मेरा सिर झुका दिया है। " राकल ने शिकायती लहजे में कहा।

"आखिर कुछ पता तो चले कि ऐसा क्या किया है मेरे भाई ने?"

"न मेरी बहन तुम्हारे भाई की मुहब्बत में गिरफ्तार होती ओर न आज यह दिन देखना पडता । मेरी बहन को सरदार कोलाबा ने अगुवा कर लिया है।"

बकाल के अपहरण कीं ख्वर सुन रेखा के दिल में अनार फूटने लगे । एक खुशी की लहर उठी जो उसके पूरे वजूद को लहरा गई। अफसोस भी हुआ कि उस चुडैल के अगुवा की खबर क्यों आई? उसकी मौत या कत्ल की खबर क्यों न आई ?

बहरहाल, वक्त खुशी दर्शाने का नहीं था। उसने सजीदागी अपनाते हुए पूछा-- "पर क्यों?"

"काले चिराग की बजह से। ”

“मैं समझी नहीं। "

"काला चीराग सरदार कोलाना का खास आदमी है। सरदार को किसी तरह मालूम हो गया होगा कि बौ मेरे कब्जे मैं है-सो जवाब में उसने बकाल को अपने कब्जे में कर लिया और अब पैगाम भिजवाया है कि मैं काले चिराग क्रो उसके हवाले कर दू और अपनी वहन को ले जाऊ, वरना वह बकाल को मार देगा और हमला करके मेरे इलाके पर भी कब्जा कर लेगा ।"

"तू यह सब मुझे क्यों बता रहा है?" रेखा चौकन्नी हौते हुए बोली--“मै क्या करू?"

"मुझे तेरी मदद की जरूरत है।"

"हमें भला तेरी क्या मदद कर सकती हूं? मैं तो खुद तेरी कैदी हूं और मेरा भाई तेरी बहन का कैदी है। ”

”मैं काले चिराग को आजाद नहीं करना चाहता इसमें मेरा अपमान है और अपनी बहन को भी सुरक्षित सकुशल वापिस लेना चाहता हूं।"

"मै भला तेरी क्या मदद कर सकती हूं? मैं तो खुद तेरी कैदी हूं और मेरा भाई तेरी बहन का कैदी है। ”

”मैं काले चिराग को आजाद नहीं करना चाहता इसमें मेरा अपमान है और अपनी बहन को भी सुरक्षित सकुशल वापिस लेना चाहता हूं।"

"रेखा ने उसके खेल क्रो समझने कीं कोशिश करते पूछा--"मुझें क्या करना होगा, यह बता?"

"मेरा एक खैरख्वाह है, तुझे उस तक मेरा पैगाम पहुचाना होगा । मेरा कोई आदमी अब सरदार क्रोलाना के इलाके में कदम नहीं रख सकता और मेरे दोस्त तक पहुचने के लिए कोलाना के इलाके से गुजरना पडेगा। तू उसके इलाके से आसानी से गुजर सकती है । तुझ पर कोई शक भी नहीं करेगा। "

"ठीक है-मैं जाने के लिए तैयार हूं ।" रेखा ने फोरन हामी भर ली । यही चाहती थी कि इस केद से किसी तरह मुक्ति मिल जाए I यहा' से निक्लकर ही तो फरार होने का रास्ता मिल सकता था I रेखा अपने फरार होने के बारे में सोच रही थी तो राकल ने कुछ और ही सोच रखा था और उसने जो कुछ सोच रखा था उसके बारे में अगर रेखा को जरा भी शक हो जाता तो वह इस कैदखाने से निकलती ही नहीं I राकल अपनी किस्म का इकलौता कमीना शख्स था । रेखा ने उसका प्रेम निवेदन ठुकराया था-कदम-कदम पर उसको जलील किया था । राकल उसे यूं आसानी से कहा छोडने वाला था।

"आ फिर मेरे साथ ।" राकल ने चलने का इशारा किया।

रेखा ने अपना बिखरा हुआ सामान समेटा। उसका सामान ही क्या था-चन्द जोडे कपडे व कुछ जरूरत कीं चीजे। बैग में भरकर उसने जिप बन्द की । बैग अपने कंधे पर डाला और बोली-- "चल! !"

राकल हमेशा कीं तरह अपने 'राजदण्ड' को बैसाखी बनाये,फर्श पर खट-खटकाते आगे बढा। रेखा उसके साथ हो ली थी । तहखाने की काली भुजग खौफनाक औरत ने उन्हें बडे दरवाजे तक पहुचाया'। झुककर सम्मान दर्शाया व दरवाजा बन्द करके सतर्क खडी हो गई। राकल रेखा के साथ अपने कमरे में पहुचा । उसने अपनी मसन्द सम्भाली और अपने 'राजदण्ड' को तीन बार मसन्द पर मारा I खट-ख़ट की आबाज पर दो गौल चेहरे वाली, जुडवा' बहने सी दिखती, दासियां पर्दा हटाकर अदर आई।

उन्होंने आधा झुंककर राकल का अभिवादन किया और रेखा को आश्चर्यंचक्ति नज़रों सै देखा ।

”क्या हुक्म है राकल?" उनमे से एक ने पूछा ।

"सदर दरवाजे पर मेरा हुक्म पहुचा दो कि सवारी और सवार मुझे तैयार मिलें । मै अभी आता हू।"

"ठीक है राकल । " यह कहकर उन दोनों वे फिर सिर नवाया और पलटकर परदे के पीछे गायब हो गई ।
 
कमरे में अब राकल और रेखा अकेले रह गए थे। रेखा खामोशी थीं खामोश रही । खुद राकल ने भी कोई बात नहीँ छेडी. थी। उसके चेहरे पर सजीदा' सोचपूर्ण भाव थे और वह एकटक परदे की तरफ देखै जा रहा था । यू लगता था जेस उसे किसी के बिछुडने का गम हो।

कुछ देर बाद वह अपने 'राजदण्ड' के सहारे उठा। 'राजदण्ड' क्रो बैसाखी कीं तरह अपनी बगल में दबाया ओर रेखा कीं तरफ देखै बिना बोला --

"आ अब रुख्यत होने का वक्त आ गया । ” रेखा कुछ नहीं बोली व चुपचाप उसके पीछे चल दी। वे सदर दरवाजे पर पहुचे तो एक दरबान ने ऊची' आवाज में कहा--- "राकल आ गया है, दरवाजा खोला जाए। "

हमेशा की तरह छ: आदमी दायीं… कोठरी व छ: आदमी बायी कोठरी से बरामद हुए I उन्होंने बडी, फुर्ती से मशीनी अंदाज' में वह भारी विशाल दरवाजा खोला । दरवाजा खुलते ही लगडा राकल जो अन्तिम सीढी, पर खड्रा था, उतरकर दरवाजे की तरफ बढा ।

दरवाजे के बाहर छ सशस्त्र सवार सतर्क खडे हुए थे। उनके पास ही दो ऊटनिया सजी हुई बैठी थीं। रेखा को एक ऊटनी पर सवार कराया गया । दुसरी पर राकल को बैठाया गया।

फिर राकल ने एक सवार को निकट बुलाकर कुछ हिदायत दी जिसे रेखा दूर होने कारण सुन न सकी I

फिर वह सवार जिसे हिदायत दी गई थी-दौनॉ ऊटनिर्यो' के सामने आया । उसने मुह सै एक अजीब सी आवाज निकाली ।

फिर राकल ने एक सवार को निकट बुलाकर कुछ हिदायत दी जिसे रेखा दूर होने कारण सुन न सकी I

फिर वह सवार जिसे हिदायत दी गई थी-दौनॉ ऊटनिर्यो' के सामने आया । उसने मुह सै एक अजीब सी आवाज निकाली ।

ऊटनिया हिचकोले लेती उठ खडी हुई। फिर यह काफिला खण्डहरों के बीच से गुजरता हुआ मैदान में आ गया ।

सबसे आगे एक घुडसवार. था उसके पीछे रेखा। रेखा के बाद राकल और राकल के पीछे बाकी के पाच घुडसवार और अब यह काफिला बडी तेजी सै पश्चिम की तरफ अग्रसर था ।

रेखा सोच रही थी कि राकल ने कहा था कि उसके दोस्त को उसका पैगाम पहचाना' है ताकि वह सरदार कोलाना के सम्भावित हमले का मुकाबला कर सके और यह भी कि यह पैगाम वही पहुचा' सकती है । वह इसलिए कि लगडे राकल के उस दोस्त तक पहुचने के लिए सरदार कोलाना के इलाके सै गुजारना पडता. है, लेकिन न तो राकल ने उसके हवाले कोई पैगाम दिया था न ही इस सिलसिले में कुछ बताया था और अब वह खुद भी साथ चल रहा था-जबकिं उसका खुद साथ जाना खतरे से खाली नहीं था।

समझ में नहीं आ रहा था कि मामला क्या है?

रेखा की ऊटनी विद्युतीय गति से ,उडी जा रही थी। दुर तक रेत ही रेत थी । रेखा की निगाहें इधर उधर घूम रही थीं कि शायद उसे वह झोपडी नजर आ जाए जिसमें बकाल ने उसके भाई को कैद कर रखा था।

परिस्थितियों ने अजीब करवट ली थी । बकाल को सरदार कोलाना ने अगुवा कर लिया था। रेखा इस पर बहुत खुश थी । अब वह चाहती थी कि किसी तरह सरदार क्रोलाना से मुलाकात हो जाए तो वह उसे बकाल की करतूत बताये। बकाल ने इन्द्र की जो हालत बना रखी थी सरदार उसे देखका बकाल को सजा दे सकता था ।

रेखा ने काले चिराग के बारे में भी सोचा । जाने उसका क्या होगा । बकाल के अपहरण के बाद-उन दौनों के बीच दुश्मनी और भी गहरी हो चुकी होगी I जाहिर था-बकाल के दिल में अगर काले बिराग के लिए थोडी बहुत जगह रही भी होगी तो इस वारदात के बाद अब वह भी न रही होगी।

यह काला चिराग भी विचित्र हस्ती है। खामखाह ही इस बुरी औरत के लिए मरा जा रहा है। ऐसा भी क्या इश्क बकाल जेसी चुडैल. पर तो लानत भेजनी चाहिये। अब रेखा क्या जानती थी कि यह प्रेम रोग क्या होता है? उसकी अपनी जिन्दगी में कभी कोई मर्द नहीं आया था। उसकी तो जिन्दगी ही ऐसे रग' में बीती थी कि वह इन भावनाओं से अछूत रही । प्रेम व चाहत के बारे में कभी सोच ही नहीं पाई। अब मुहब्बत की ये दास्तानें उसे हैरान ही कर रही थीं । काले चिराग का ही नहीं, चुडैल, बकाल की मिसाल भी उसके सामने थी। ऐसी होती है चाहत । आदमी इस कदर बेवस व मजबूर हो जाता है मुहब्बत में।

काले चिराग पर तो रेखा को बडी दया आती थी । वह अपनी चाहत के हाथों विवश होकर बकाल के सामने बिछा जाता था और बकाल उसे निरन्तर ठोकरें मारकर सामने से हटाए जाती थी । रेखा का बस चलता तो वह बकाल के हाथ-पाव बांधकर काले चिराग के सामने डाल देती और कहती कि लो अब इससे अपने सारे बदले ले लो।

बह ऐसी ही बातें जाने कब तक सोचती रही ।

ऊटनी' बदस्तूर अविश्वसनीय तेज गति सै .दोडे जा रही थी।

अब वह अपने सामने कुछ अजीब सा पथरीला इलाका देख रही थी-ऊँची ऊची पहाडिया.. छोटे वडे पत्थर जगह-जगह पडे हुए। आगे बाले सवार ने अब अपनी रफतार कम कर दी थी और फिर थोडा, आगे जाने के बाद वह सवार रूक गया ।

फिर यह काफिला ही अपनी जगह रूक गया।

रेखा को ऊटनी' से उतारा गया। लगडा राकल भी दो सवारों की मदद से नीचे उतर आया। उसने अपनी चादर ओढी और 'राजदण्ड' को बैसाखी कीं तरह अपनी बगल में दबाकर धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा ।

वह एक बिल्कुल ही निर्जन वीरान इलाका था । राकल बड़े रहस्यमय अदाज मेँ आगे बढ़ रहा था। फिर बो एक बडे से पत्थर पर जिसमें कुदरती छोटी छोटी सीढियां थीं चढ़ गया।

अब वह घूमा और उसने अपना 'राजदण्ड' अपनी बगल सै निकालकर ऊपर उठाया । यह एक खास किस्म का इशारा था । इशारा पाते ही दो सशस्त्र सवार रेखा के निकट पहचे' और उन्होंने रेखा के हाथ पकड लिए तथा उसे खींचते हुए आगे बढ़ने लगे।

अब वह घूमा और उसने अपना 'राजदण्ड' अपनी बगल सै निकालकर ऊपर उठाया । यह एक खास किस्म का इशारा था । इशारा पाते ही दो सशस्त्र सवार रेखा के निकट पहचे' और उन्होंने रेखा के हाथ पकड लिए तथा उसे खींचते हुए आगे बढ़ने लगे।

अब रेखा को सहसा स्थिति की सगीनी का अहसास हुआ। उसकी छठी इन्द्री एकाएक जागी-उसे अहसास हुआ कि उसके साथ कुछ होने बाला है। वह एकदम गुस्से मे आकर चीखती सी बोली "राकल, यह क्या बदतमीजी है?"

"हा. . .हा . .हा I " लगडे', ने एक गगनभेदी कहकहा लगाया- "जो राकल का कहना नहीं मानता उसे अपनी गुस्ताखियों क्री सजा भुगतनी ही पडती. हे। "

"लेकिन तू तो मुझे किसी को पैगाम देने के लिए कैदखाने से निकालकर लाया था?”

"पैगाम तो मैं तुझे दूगा--मौत का पैगाम ।" यह कहकर फिर कहकहे लगाने लगा।

“काले चिराग ने तेरे बारे में ठीक कहा था कि तू एक शेतान प्राणी है।" रेखा का गुस्सा बढ़ता जा रहा था ।

"हां उसने ठीक ही कहा था मै वाकई खब्बीस चीज हूं। अब तू मेरी शैतानियत देख ।” यह कहक्रर वह अपने सवारों से सम्बोधित हुआ-- "इसे उठाओ और 'मुक्ति द्वार' मे डाल दो।"

फिर जो कुछ हुआ-जेसै पलक झपकने में हुआ। राकल का आदेश पाकर दोनों सवार उसके हाथ खींचते हुए आगे बडे और फिर एक जगह रूककर उन्होंने रेखा के पैर भी पकड लिये और ऊपर उठाया-डण्डा-डोली के अदाज' में झुलाया और फिर एक अजीब सी आवाज निकालकर हवा में उछाल दिया ।
 
रेखा जब नीचे गिरी तभी उसे अहसास हुआ कि उसे कहा फेंका गया है। वह एक बहुत वडा व गहरा कुआ था ओर वह उसमें गिरती चली जा रही थी। यह 'मुक्ति द्वार' था। इस कुए में फेंका जाने बाला जिन्दा नहीं बचता था मुक्ति पा जाता था ।

राकल, रेखा को कुए में फिकवाने के बाद, उस पत्थरनुमा चट्टान पर खडा बेतहाशा कहकहे उगले जा रहा था। कहकहे थे कि रूकने ही में नहीं आ रहे थे। फिर अचानक उसके कानों से गुर्राहट की आवाज टकराईं और यह आवाज कही निकट ही थी।

राकल के कहकहे एकदम सर्द पड गए। वह अभी तक अपनी एक टाग पर खडा था । उसने घबराकर अपना 'राजदण्ड' बगल में ले लिया और पीछे मुडकर, देखा तो सारा दृश्य ही एकदम बदला हुआ था।

वे खून के प्यासे भैडिये_ थे भारी भरकम और सख्या में अनगिनत इन भेडिर्यों_ ने अपनी सुर्ख लपलपाती जुबानॉ और नुकीले पजों-दार्तों' से उन छ: के छ: सवारों क्रो आनन फानन उधेड़ डाला जो लगडे राकल के साथ आये थे। यह सब इस कदर तेजी से व अचानक हुआ था कि वे सशस्त्र सवार अपने हथियार भी सीधे नहीं कर पाये। बस यूं महसूस होता था जैसै ये खूंखार भेडिये. हवा का पर्दा चीरकर अचानक ही कही से नमूदार हो गए हों।

सबारो को खत्म करने के बाद भेडियों ने घोडों, और ऊठनिर्यों पर हमला कर दिया। राकल 'राजदण्ड' को बैसाखी बनाये उसी पत्थर पर खडा, इन खूखार भैडियो को देख रहा था । मासूम रेखा क्रो मौत के हवाले कर कहकहे लगाने वाले इस लगडे प्रेत ने शायद यह नहीं सोचा था कि दूसरों को मौत देने वाले खुद भी मौत के जाल में फस सकते है I

ये भैडिये दस पन्द्रह न थे --- सैडो कीं सख्वा में थे और इन भेडियों. ने उसे चारों तरफ सै घेर रखा था और अब किसी भी क्षण वे उस पर छलाग' लगा उसकी भी वोटियां कर देने वाले थे। राकल ने बदहवासी पर कावू पाते 'राजदण्ड' अपनी बगल सै निकाला और उसे हाथों में पकड ऊपर उठा लिया । वह अब बडे अजीब से शब्द बोलता जा रहा था। कोई मत्र' पढ़ रहा था शायद वह । उसकी इस हरकत पर वे तमाम भेडिये. एक लम्हें के लिए एक दम पीछे हटकर अपनी जगह स्थिर हो गयें।

पर इन भेडिओं की आखें' राकल पर थीं और वे राकल का जेसे वडे गोर से जायजा ले रहे थे।

राकल का मत्रोच्चारण' जारी था । फिर उसके ऊपर उठे 'राजदण्ड' में से एक फडफडाता हुआ उल्लू निकला फिर इसके बाद एक एक करके उल्लू निकलते गए। आसमान उडते हुए उल्लुओं से भर गया फिर राकल की आबाज पर इन उल्लुओं ने भेडियों. पर हमला कर दिया ।

लेकिन यह हमला कामयाब नहीं हो सका।

वे उल्लू जैसे ही भेडियों पर हमला करने के लिए नीचे आते। भैडिये उनके पंख' अपने जवडो मे दबोच लेते और उन्हें चबाकर उड़ सकने योग्य न छोडते । उल्लू जमीन पर गिरते और दुसरे भैडिये उन्है चीर-फाडकर मौत की गोद में पहुचा देते ।

राकल अपनी तिलस्मी फौज का यह हश्र देखकर कपकपा उठा।

अब आकाश पर एक भी उल्लू नहीँ था। सब ही जमीन पर मुड़े जुडे और उधड़े हुए पडे थे और वे खून के प्यासे भैडिये. फिर उस पत्थर को अपने घेरे में ले रहे थे जिस पर राकल खडा हुआ था। वे भेडिये अपनी चमकती आखौ , लपलपाती जुबानो ब खुले खौफ़नाक जबर्डों सै-बडी, दिलचस्पी के साथ राकल को देख रहे थे । जैसै कह रहे हो-हां, भई । अगर तेरे पास अपने बचाव के लिए कोई और भी चमत्कार हो तो उसे भी आजमा डालो। हमारे पास वक्त बहुत कम है।

राकल के पास अब करने को कुछ नहीं था। वह बड़ी मायूसी सै उन भेडियी को देख रहा था। वह जानता था कि अब किसी भी क्षण ये भेडिये_ उस पर छलाग लगाएगे और चीर फाडकय. बराबर का देगे।"

और जैसी कि राकल की तवक्वी थी, भेडियों. ने उस पर छलांग लगाई और वह पत्थर से लुढकता हुआ जमीन पर आ पड़ा, लेकिन भेडियों. ने उसे नोंचा खसोटा या झिनझोड़ा नहीँ बल्कि उसके हाथ-पाव अपने जबडों. में दबाए और उसे घसीटते हूए ले चले । राकल का बाजू तो पहले ही घायल था रेखा ने ही बैग मारकर उसे जख्मी किया था । अब इन भेडियों. के दातों' की गिरफ्त उसकी जान निकाले दे रही थी। भेडिए, उसकी पीडा की परवाह किए बिना आगे बढते जा रहे थे।

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लगडा राकल एक भारी-भरकम शख्स था। भेडिये जव उसे घसीटते हुए थक जाते तो ताजादम भेडिये, उनकी जगह ले लेते और राकल को घसीटने लगते।

राकल अब दर्द व पीडा, के कारण अपने होश खो चुका था, लेकिन भेडियों, को इस बात की परवाह न थी कि राकल किस हाल मे है I होश में है या होश गवां बैठा है। वे सधे हुए कुत्तों की तरह अपना सफर जारी रखे हुए थे।

यू वे खौफनाक भेडिये पारी बदल बदलकर रातभर सफर करते रहे और अब सुबह के लक्षण नुमायां होने लगे थे। सूरज का किनारा क्षितिज सै उभरता हुआ नजर आ रहा था। उजाला फैलता जा रहा था।

भेडिये_ अब राकल को रेत पर घसीटते ले जा रहै थे। फिर अन्तत: वे भेडिये, एक जगह पहुचकर ठहर गये। यू लगता था, जैसै किसी ने उन्हें रूकने का इशारा किया हो! वे राकल को छोडकर. पीछे हटे और एक दूसरे से मिलकर खडे हो गए और जोर जोर से हाफने लगे।

लंगडा राकल ओधे मुह रेत पर पड़ा हुआ था । उसका वदन जगह जगह सै जख्मी था । भेडिये. अब उसकी तरफ सै कतई लापरवाह थे-मानो उ'होंनेअपने शिकार को निर्देशानुसार अपनी मजिल पर पहुचा दिया हो ।

ये सारे के-सारे भैडिये. अब उस उल्लू पर नजर जमाये हुए थे जो सामने झोपडी, की छत पर बैठा था । वो उल्लू इन भेडियों. को देखते ही बेचैन हो गया था l फिर एकाएक उसने उडने के लिए पर खोले। उसके उडते ही अग्रिम पक्ति में खडे कुछ भेडिये. एक-दुसरे से अलग होकर खडे हो गये।

फिर जैसै ही उल्लू ने उन पर हमला करने को नीचे उडान भरी उसी क्षण दो भैडिओं ने उछलकर उसके परों को अपने जवडी में दबोच लिया । फिर जैसै ही वे दोनों भैडिये. रेत पर गिरे। उनके गिरते ही दुसरे भेडियो ने उस उल्लू क्रो दबोच लिया और नोच डाला I

अव चार भेडिये अपने झुण्ड से निकले और उन्होंने झोपडी के दरवाजे कीं तरफ रुख़ किया जहां एक साप कुण्डली मारे व फन फैलाए भेडियों को अपनी तरफ आते देख रहा था । वे चारों भेडिये साप के निकट पहुचकर एक दूसरे से दुर हो गये ।

साप' के लिए चारों भडियों पर एक साथ नजर रखना मुश्किल होगया। उसे अपनी जान खतरे में नजर आने लगी। उसने घबराकर सामने वाले भेडियै. पर हमला का दिया । अभी वह साप आगे बढकर उस भेडिये_को काट नहीं पाया था कि पीछे से एक भेडिये. ने उसकी दुम अपने जबड़े में ले ली । फिर बाकी के तीनों भेडियों. को उस साप' को उधेड देने में कोई दिक्कत पेश नहीं आई ।

उल्लू और साप को खत्म करने के बाद जेसे भेडियों. का काम पूरा हो गया। उन चारों भेडिर्यों_ने अपनी थूथनी ऊपर उठाकर अजीब सी आवाज निकालीं और फिर एक तरफ को दौड़ लगा दी! उनके आगे निकलते ही वाकी के भेडिये. भी उन चारों के पीछे मे हो लिए ।

भेडियों के इस विशाल झुण्ड के दौडने_कीं वजह सै रेत उडने_लगी।

और फिर वे सब के सब भेडिये रेत के बादल मे इस तरह गुम हो गये जेसे वे रेत के बने हुए थे।

रेगिस्तान के बीच यह इकलौती झोंपडी जो उल्लू व साप की निगरानी में थी, वही झोपडी थी जिसमें बकाल ने इन्द्रजीत को कैद कर रखा था और लगडे प्रेत की वह कामी चुडैल बहन यहीं आकर इन्द्रजीत से अपनी काम बासना शात कराया करती थी और उमे निचोडकर जाती थी कि इन्द्र के लिये हफ्तों हिलना तक दुश्वार हो जाता था।

इन्द्रजीत झोपडी में था और उसे कुछ मालूम नहीं था कि उसकी झोंपडी के आगे क्या तमाशा हो चुका है?

सुबह का वक्त था । वह गहरी नींद सो रहा था। फिर उसके कानों में गुर्राहट की-सी आवाजें आई I यह कुछ असाधारण सी आवाजें थीं। इस तरह की आवाजें उसने आज तक नहीँ सुनी थीं ।

वह घबराकर उठ बैठा । फिर ज़ब तक उसके होश हवास बहाल हुए और वह उठकर झोपडी के दरवाजे पर आने के योग्य हुआ उस वक्त तक भेडिये अपना काम दिखाकर जा चुके थे।

दरवाजे के सामने नाग उधडा, हुआ पडा, था । उससे आगे उल्लू भी जमीन पर पख फैलाये बेजान पड़ा था।

वह घबराकर उठ बैठा । फिर ज़ब तक उसके होश हवास बहाल हुए और वह उठकर झोपडी के दरवाजे पर आने के योग्य हुआ उस वक्त तक भेडिये अपना काम दिखाकर जा चुके थे।

दरवाजे के सामने नाग उधडा, हुआ पडा, था । उससे आगे उल्लू भी जमीन पर पख फैलाये बेजान पड़ा था।

इन्द्रजीत इन दोनों शेतान प्राणियों का यह हाल देखकर बहुत खुश हुआ और फोरन दरवाजे से बाहर निकल आया । बाहर निकला तो उसने रेत पर किसी जानवर के पजो के बेशुमार निशान देखै।

और फिर उसकी घूमती नजरे राकल पर पडी । वह रेत में मुह' दिये औंधा लेटा था। इन्द्र तेजी से उसकी तरफ बढा । राकल के कपडे फटे हुए थे । उसके शरीर पर दातों के बेशुमार निशान थे I वह बुरी तरह जख्मी था। उसकी एक टाग घुटने से ऊपर कटी हुईं थी।

यह सब क्या था? प्रेत सुन्दरी बकाल के तिलस्सी निगरान उल्लू ब नाग को किसने मारा था और यह लगडा शख्स कोन है? इसे किसने जख्मी किया था?!?? रेत पर ये हजारों पजों के निशान किस जानवर के थे? यह सुबह-ही सुबह क्या हो गया था?

बहरहाल, कुछ भी था । इन्द्रजीत को उल्लू व नाग के मरने की बेहद खुशी थी । वह अब कम सै कम झोपडी, से बाहर तो निकल सकेगा। बेशक वह फरार होने की जुर्रत नहीं कर सकता था, लेकिन झोपडी… के बाहर घूम फिर तो सकेगा।

इन्द्रजीत ने बडी मुश्किल से उस अजनबी लगडे को सीधा किया-तो उसे अपनी कमजोरी का अहसास हुआ था । उसमें जेसे ताकत ही न थी। वह चाहता था कि इस बेहोश शख्स को अपनी झोपडी, में ले जाए, लेकिन उसे तो उसे सीधा करने में ही कितनी दिक्कत आई थी, तो उसे उठाकर या घसीटकर अन्दर ले जाना उसके बस का कहां था।

वह पलटकर झोंपडी में आया।

उसने सुराही सै कटोरे में पानी निकाला और फिर उस अजनबी शख्स के पास पहुच गया। उसने बेहोश खस्ताहाल अजनबी के चेहरे पर पानी के छिटे मारने शुरू किये।

"अरे भईं! ऐ भाई! होश में आओ। " वह उसे पुकारता भी जा रहा था ।

आखिरकार इन्द्रजीत उसे होश में लाने में कामयाब हो ही गया। राकल कीं आखै' खुली तो उसने खुद को रेत पर लेटा हुआ पाया। वह बुरी तरह घायल था । जख्मो सें टीसे उठ रही थीं । ऊपर आकाश था व सामने एक अजनबी नौजवान बैठा हुआ था I उसने उठने की कोशिश की, लेकिन इन्द्रजीत ने उसे रोक दिया ताकि वह कुछ देर यू ही लेटा रहे और पूर्णतया होश में आ जाए ।

"कौन हो तुम? " इन्द्रजीत ने उसे हमदर्दी' से देखते हुए पूछा ।

"यही सवाल में तुमसे करना चाहता हूं। "

"मै एक कैदी हूं। " इन्द्रजीत ने गहरी सास' ली ।

"कैदी हो । " राकल चौका-"इस रेगिस्तान में तुम्हें किसने कैद किया है?"

"बकाल ने। "

"ओह ! " रकाल अपने होंठों पर जिव्हा फेरकर रह गया।

“क्या तुम वकाल को जानते हो?"

"क्या तुम इन्द्रजीत हो । " राकल ने उसके सवाल का जवाब न देकर उल्टा सवाल कर डाला था ।

इन्द्र को एक अजनबी के मुँह से अपना नाम सुनकर हैरत हुईं । उसने घबराकर पूछा -- "तुम कोन हो?"

"मैं राकल हूं। " राकल ने अपना परिचय कराया I

.. " ओह ।" ..

"क्या तू मुझे जानता है? "

"हां मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूं। तुम मेरी जान के दुश्मन बकाल के भाई हो। "
 
" मुझे किस तरह जानता है?" राकल ने उसे कुरेदा।

"यही सवाल में तुमसे करना चाहता हू। "

"मुझें बकाल ने तेरे बारे में बहुत कुछ बता रखा है।"

“और तेरे बारे मैं सब कुछ मुझे काले चिराग ने बताया है।" इन्द्र उसकी आखों' में झाकते हुए बोला I

"काला चिराग । " राकल एकदम घबरा गया--"ओह गजब हो गया ।"

"क्या हुआ ? "

"इतना दिन चढ़ आया-मुझें तो सूरज निकलत्ते ही काले चिराग को सरदार कोलाबा के सामने हाजिर करना था । ये भेडिये मुझे कहा ले आए। मैं तो समझा था कि वह सरदार कोलाना की फौज है । "

"हू-तो वह बाहर रेत पर भेडियों. के पजों' के निशान है I क्या तुझे भेडियॉ_ ने जख्मी किया है और क्या यहा बकाल के निगरानों को भी उन्ही ने मारा है?" इन्द्रजीत ने पूछा I

"हां-ऐसा ही हुआ है। "

"बकाल, काले चिराग को यहां से जजीरों' में बांधकर घसीटते हुए ले गई थी । वह वेचारा लो रास्ते में ही दम तोड़ गया होगा । "

"वह खब्बीस (शैतान) इतनी आसानी से मरने वाली चीज नहीं I काश, वो मर गया होता तो आज मुझे ये दिन न देखने पडते । "

"यह सरदार कोलाना कौन है?" इन्द्र ने पूंछा।

"काला चिराग सरदार कोलाना का दायां हाथ है । " राकल ने बताया--"सरदार कोलाना को किसी तरह मालूम हो गया कि काला चिराग मेरी कैद में है। उसने बकाल को अगुवा करा लिया-ओर बदले में काले चिराग को मागा । आज सुबह में काले चिराग को उसके हवाले करके अपनी बहन को ले आता, लेकिन अब तो खेल ही विगड़ गया। उसने

मुझें 'वायदा-खिलाफ' समझकर जाने क्या से क्या कर डाला होगा। वह बड़े गुस्से वाला सरदार है और एक बडी फौज का मालिक । "

इन्द्र ने मुस्कराते हुए कहा-"तो बकाल का अपहरण कर लिया गया और अब वह सरदार कोलाबा के कब्जे में है। यह सुनकर मुझे खुशी हुई है"‘

"तेरे लिए खुशी कीं बात होगी-मेरे लिए नहीं । वह मेरी बहन है । मैं उससे वहुत मुहब्बत करता हूं। "

”तूने अपनी बहन को यह नहीं सिखलाया कि दूसरो को कष्ट नहीं देना चाहिये वर्ना अजाम बैसा ही हौता है। "

"वह तो बडी मुबब्बत करती है। "

"बासना पुजारिन है बौ ।एक कामी कुतिया है। मुहब्बत में किसी का जीना हराम कर देना क्या जायज है?"

" तुझे तो वकाल की मुहब्बत पर गर्व होना चाहिये।”

”मेरा सत्यनाश हो गया और तू इसै गर्व की बात कहता है।" इन्द्र खिन्न स्वर मे बोला-- "उससे कह वह अपनी दुनिया अपने लोक के काले चिराग सै प्यार की पींगे बढाये. और मेरी जान बख्श दे I "

! अब तो खुद उसकी जान खतरे में है । "

"भगवान करे, वह मर जाये।” इन्द्रजीत के दिल सै बद्दुआ निकली, लेकिन होंठों पर नहीं आईं। उसे अपनी वहन का ख्याल आया । उसे भी तो बकाल अपने साथ ले गई थी वह कहां है उसके बारे में इस लगडे ने कुछ नहीं बताया था।

"मेरी बहन कहा है? " उसने राकल को घूरते हुए पूछा।

"कौन रेखा?" राकल ने ठण्डा सास लिया।

" वह खैरियत से तो है । "

”मै नहीं जानता।" यह कहकर उसने दूसरी तरफ मुह फेर लिया।

”यह केसे हो सकता है?”इन्द्र तीखे स्वर में बोला-- "राकल तू मुझसै कुछ छिपा रहा है।”

"मै कुछ नहीं छिपा रहा।“ राकल नजरे चुराते हुए ब्रोला--"बस तू यूं समझ कि वह गुम हो गई है।"

”कहां गुम हो गई है?"

"मैं इससे ज्यादा कुछ नहीं जानता।” राकल ने अपने होंठ सख्ती से भीच लिए।

तब इन्द्र को अहसास हुआ कि यह लंगडा जख्मी से चूर और बडी खस्ता हालत में है। इसे तो झोंपडी. में ले जाना चाहिये और इसके जख्मो का कोई इलाज करना चाहिये। यह सवाल जबाब तो बाद में भी हो सकते है।

"आ राकल उठ, मेरे साथ झोपडी में चल। तू वुरी तरह जख्मी है । " इन्द्र के लहजे में हमदर्दी भर आई थी ।

राकल ने आभारी निगाहों सै इन्द्र क्री तरफ देखा । उसे 'इन्सान' कीं महानता का अहसास हुआ। बकाल ने एक ‘इन्सान' को दिल देकर अच्छा नहीं किया, लेकिन अब क्या हो सकता था। मामला बहुत आगे बढ़ गया था I

इन्द्रजीत्त में जितनी शक्ति थी उससे ज्यादा शक्ति लगाकर उसने लगडे राकल को उठने में मदद की-फिर वह उसे किसी-न किसी तरह झोंपडी… में ले आया। वह उसे उठाकर बुरी तरह हाफने लगा था ।

राकल उसे खामोशी से हाफते' हुए देखता रहा। कुछ देर बाद ज़च इन्द्र की हालत सम्भली और उसकी सांसे सयत' हुई तो उसने पूछा

"राकल तेरे जख्म कैसे ठीक होंगे?“

"वह जो बाहर, सामने उल्लू मरा पड़ा है उसे मेरे पास लाओ । " राकल वोला ।

इन्द्रजीत्त बाहर पडे उल्लू क्रो पंख से पकडकर उठा लाया। भेडिर्यों ने उसका सिर व बाजू चबा डाले थे।

”ले l " इन्द्रजीत ने उल्लू उसके करीव रख दिया ।

"अब कुछ देर के लिए झोंपडी. सै चला जा I "

" वह क्यो? " इन्द्र ने हैरानी से पूछा l

"मै जो अपने जख्मो का इलाज करूगा, वह तू देख नहीं पाएगा। "

" अच्छा ठीक है। मै बाहर चला जाता हूं।" यह कहकर वह बाहर निक्ल गया।

इन्द्रजीत्त के बाहर जाने के बाद लंगडे राकल ने उस उल्लू का दिल उसके सीने सै निकालकर अपने मुह में रख लिया और उसे पान की तरह चबाने लगा । फिर उसने उल्लू के खून से अपने हाथ भरे और वह खुन अपने जख्मी पर मलने लगा ।

जब उसने उल्लू का खून अच्छी तरह अपने जख्मो पर मल लिया तो उसने आबाज दी ।।

"आ जा इन्द्रजीत्त अन्दर आ जा । "
 

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