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A Horror Novel - स्वाहा complete

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वर्षा का बताया हुआ नम्बर उसने अखबार के हाशिये पर लिख लिया और फिर इधर उधर दो चार बातें करने के बाद उसने रिसीवर रख दिया । अब उसे अकल बलदेव की फोन कॉल का बेचैनी सै इतजार था।

फिर. ..कोई डेढ घन्टे बाद फोन की घटी' बजी । रेखा ने झपटकर रिसीवर उठा लिया, बौली--“हैलो।”

"हां, रेखा ! में बलदेव राज़ बोल रहा हूँ। ' '

"आप कहां से फोन कर रहे हैं अंकल?"

"मै एक सेफ जगह से फोन कर रहा हूँ. ।' ' अकल बलदेव उसका आशय समझकय बौलै--"कोठी से तो बात नहीं कर सकता था ना । ' '

”अकल । मुझे आपको एक इम्पोर्टेन्ट जानकारी देनी है। "

"हां !! कहो ।“

' 'क्या पुलिस ने घर के नौकर घनश्याम और उसकी बीबी को अपनी इन्वेस्टीगेशन में रखा हुआ है?"

‘ 'हा इन्सपेक्टर ने उसका ब्यान लिखा था । मेरे सामने की बात है। पुलिस इस किस्म की बारद्रात में सबसे पहले धर के नौकर चाकरो पर ही शक करती है।"

' 'और ऐसा पुलिस बिल्कुल ठीक ही करती है, अकर I " रेखा उत्तेजित-सी बोली I

' 'धनश्याम को मैं बरसों सै जानता हूँ। यह कृष्णकांत की पूजा करता था, बेटी! वह तुम्हारे पापा का वफादार था । " ‘

" मगर ! मेरा दिल कहता है कि यह घनश्याम कातिल से अच्छी तरह वाकिफ है। ' '

' 'यह....यह तुम कैसे कह सकती हौ?"

' ' आप सिर्फ इतना करो कि अपने तोर पर यह मालूम करा ले कि उसकी वेटी का एक्सीडेन्ट हुआ था या नहीं I ' '

"यह तो कोई ऐसा मुश्किल काम नहीं । मै अभी किसी को उसकी बेटी के यहा यह मालूम करने भेज देता हूँ। "

"और जब यह मालूम हो जाए कि उनकी बेटी का कोई एक्सीडेन्ट नहीं हुआ तो फिर घनश्याम को छोडिऐगा नहीं। पुलिस के ज़रिये थाने मे ड्रिलिगरूम की सैर करवा दीजिएगा। फिर वह खुद ही हत्यारे रमाकांत का नाम उगल देगा...।"

' 'पर तुम्हें घनश्याम जैसै वफादार पर यह शक क्यों कर हुआ?“

“इस शक की वजह है मैं आपको बताऊगी आप शायद यकीन नहीं करेंगे I आप बस वह करके देख लीजिए जो मैँने आपसे कहा है। हकीकत सामने आ जाएगी l अकल'... ।"

' 'अच्छी बात है I मैं अपने तोर पर एक्सीडेन्ट क्री तस्वीक करबाये लेता हूँ। तुम बेफिक्र हो जाओ । मैं रात को घर से तुम्हें फोन करूंगा । बॉय.. . I "

'‘ बॉय l" रेखा ने रिसीवर रखकर एक गहरा और ठण्डा सास लिया और सोचा-अव जरूर कुछ न कुछ हो जाएगा।

और वाकई कुछ न कुछ हो गया।

लेकिन इस होनी के लिए रेखा को दस बजे तक इतजार करना पड़ा I

रात दस बजे अंकल बलदेव राज का फोन आया। रेखा गगा मोसी के कमरे में बैठी थी। फोन भी उसी ने उठाया I

' 'हैलो . . .!"वह बोली ।

' 'हां, रेखा । यह मैं हूँ बलदेव राज... . । "

"क्या हुआ अंकल ?" रेखा ने बेताबी सै पूछा--" आपने मालूम करवाया?"

"तुम्हारा शक ठीक निकला रेखा । घनश्याम की बेटी का कोई एक्सीडेंन्ट नहीँ हुआ । उस दिन वह घर से निकली ही नहीं तो एक्सीडेन्ट कहां से होता । " बलदेव राज ने बताया ।

' 'ये लोग अपनी बेटी के पास रहे भी थे ये या वहां सिरे से गए ही नहीं?" रेखा ने पूछा।

' 'नहीं । गए थे और रात को वहीँ रहे थे। "

' 'अब बताएं अंकल! मेरा शक ठीक था ना? " रेखा ने दाद चाही I

' 'तुम्हें बहुत दूर की सूझी रेखा I ' ' बलराज को दाद देनी पडी थी-- ''मै हैरान हूँ। काश ॥यह बात मेरे दिमाग में भी आ जाती ।। "

"मुझे पूरी डिटेल बताए अंकल । ' '

' 'घर में पाठ रखना था I बहुत से लोग आए हुए थै । तुम्हारे चाचा तो कल ही अपनी फैमिली के साथ जा चुके थे। लेकिन आज उनका एक बेटा दीपक पहुचा हुआ था I वह भी अजनबियों क्री तरह बैठा रहा फिर पाठ शुरू हौते ही मुझसे मिले बिना निकल गया। दिन ढलने तक कोठी मेहमानों से खाली हो गई। वर्षा और उसकी मां क्रो भी मैने घर भेज दिया । बस, कोठी में मैं अकेला रह गया था फिर घनश्याम और उसकी बीबी मौजूद थे जो कोठी के काम समेटते फिर रहे थे। मैं बैठक में बैठा उस लड़के का आन्तजार कर रहा था जिसे मेंने खोजबीन के लिए घनश्याम की बेटी के घर भेजा था।''

"आपने लडके को देर से भेजा। " आप तो कह रहे थे कि मैं अभी किसी को भेजे देता हूँ। ' '

”हा, मैने देर से भेजा।" बलदेव राज ने कबूला-"क्रोठी में पाठ रखने की व्यस्तता थी दूसरे जिस लडके. को मैं इस मिशन पर भेजना चाहता था, उसे मैने और भी कई काम--धंधे सौंपे हुए थे । वह खाली होते ही शाहदरा चला गया और अब उसे गये हुए काफी देर हो गई थी और मैं उसी के इन्तजार में बैठा था।"

"खैर, फिर ?"

"वह लडका. करीब आठ बजे वापस आया । उसने बताया कि घनश्याम की बेटी भली-चगी है I उसके हाथ की कोई हड्डी बड्डी नहीं टुटी । ना ही उसके हाथ पर किसी किस्म का बेन्डेज था । घनश्याम की वेटी पुष्पा दस्तक देने पर खुद ही दरवाजे पर आई थी । लडके¸ ने उसका जायजा लेते हुए पूछा-' 'क्या तुम ही पुष्पा हो धनश्याम की बेटी?" ' उसने हां कहा तो लडके ने जैसा कि मेंने उसे समझाकर भेजा था जेब से सौ का नोट निकालकर उसकी तरफ बढाया और. कहा--"यह सौ का नोट तुम्हारे बाप ने भेजा है-कहा है कि इंजेक्शन खरीद कर फोरन लगवा ले , वर्ना हाथ की हड्डी जुडने में देर लगेगी । वैसे यह तो बताएं कि आपके कौन से हाथ की हड्डी टुटी है। इस पर वह घबराकर बोली--' 'भगवान न करे मेरे हाथ की कोई हड्डी टुटे, तुम यह कैसी बातें कर रहे हो । ' ' लडके… ने पूछा ' 'कल तुम्हारा एक्सीडेन्ट नहीं हुआ?" वह सुनकर परेशान हो गई-"हे राम । तुम क्या कह रहे हो। भगवान न करे कि मेरा एक्सीडेन्ट हो मै तो कल घर से ही नहीं निक्ली तुम्हें जरूर कोई गल्तफहमी हुई है । "

' 'ओह फिर? " रेखा की उत्तेजना वढती जा रही थी।

'फिर क्या? लडके_ ने भी हैरत दिखाते हुए पूछा, क्या तुम्हारे बाबा का नाम घनश्याम नहीं है?" तो बोली--"हा, मेरे बाबा का नाम घनश्याम ही हैँ । वह कल ही तो एक रात रहकर यहां से गए है। ' ' तो लडके. ने पूछा--' 'तो क्या तुमने फोन करके उन्हें नहीँ बुलाया था? ' ' उसने जबाब दिया-' 'नहीं मा और बाबा खुद ही आए थे। उन्हें मैरी याद आ रही थी । मुझसे मिलने आए थे। " लडके. की सन्तुष्टी हौ गई थी । वह खुद को हैरान-परेशान दिखाता वहा' से लोट आया था।!

"यानी कि तस्वीक हो गई कि पापा के इस वफादार नौकर ने एक नाटक ही किया था। ' '

"हां। " बलदेव राज ने एक दुख भरी सास' ली--' 'कलियुग है बेटी! !!"

' 'अकल तो क्या आपने पुलिस को इस बाबत बताया ।" रेखा अजाम जानने को बेचैन हो उठी थी ।

"उस लडके ने आकर मुझे यह सब बताया तो मेने सोचा कि घनश्याम से पूछताछ करू सौ मेंने उस लडके. क्रो ही सर्वेन्ट कवार्टर से घनश्याम को बुलाने भेज दिया। लडके, के जाने के बाद मैने सोचा कि घनश्याम को आने में कुछ देर लगेगी, क्यो न पुलिस को फोन करके इंस्पैक्टर सै बात कर लू। फोन लाउन्ज में था.....

....मैने लाउन्ज में आकर थाने फोन किया । आई ओ इस्पेक्टर यादव थाने में मोजूद था I मैंने अपना परिचय देतें हुए कहा कि मेरे हाथ में एक महत्वपूर्ण क्लू है और अगर वह फोरन कोठी पर आ जाए तो कातिल तक पहुचना आसान हो जाएगा । मेरी बात सुनकर उसने कहा- ''ठीक है मैँ पहुच' रहा हूँ। उधर से सन्तुष्ट होकर मैने रिसीवर रखा तो वह लडका, कमरे में दाखिल हुआ। वह वेहद घबराया हुआ था। उसके चेहरे पर ह्रबाईयां उड रही थीं । वह हडबडाया… बोला-सर, वह कवार्टर-- जल्दी चलिए... I " मैं फौरन उस लडके, के साथ हो लिया I लडके की हालत अजीब हो रही थी । उससे चला नहीं जा रहा था । मेंने उसे सीढियों, पर बैठने क्रो कहा और धडकते, दिल के साथ सर्वेन्ट क्वार्टर कीं तरफ बढ गया।"

' 'फिर .. ? ' '

अंकल बलदेव राज का लहजा ऐसा हो रहा था कि रेखा का दिल भी वैअख्तयार हौ धडकने लगा I

' 'क्वार्टर का दरवाजा खुला हुआ था मैं क्वार्टर के अन्दर घुसता चला गया और अन्दर जाकर मेने जो मजर देखा उसे देखकर सोचना मुश्किल न था कि उस लडके_ की हालत सही खस्ता हो रही थी I अन्दर का यह मंजर' ही ऐसा था कि मजबूत से मजबूत दिल का इन्सान भी काप' कर रह जाए । ' ' बलदेव राज यह कहकर खामोश हो गया I शायद वह मजर उनकी निगाहों में धूम गया था ।

”क्या हुआ अंकल? क्या बो दोनों अपना सामान समेटकर फरार हो चुके थे? " रेखा ने पूछा I

' 'नहीं रेखा । कमरे में दोनों की लाशें पडी, थी। किसी तेज धार हथियार से उन दोनों की गर्दनें काट दी गई थी। फ़र्श पर खून का तलाब-सा नजर आ रहा था। ' '

" ओह! ! माई गॉड! " रेखा दिल थामकर रह गई।

"क्या हुआ, रेखा I. खैर तो है?" गंगा' मोसी ने धबराकर पूछा।

"अभी बताती हूँ मौसी!“ रेखा ने रिसीवर पर हाथ रखकर कहा----"फिर बह हाथ हटाते हुए अकल बलदेव से सम्बन्धित हुई। "अंकल यह तो बहुत बुरा हुआ। लेकिन हैरत की बात है कि कातिल आनन-फानन में कत्ल करके निकल गए और आपको पता भी नहीं चल सका । जबकि आप वहीँ कोठी में मौजूद ये। वया वे लोग चीखै-चिल्लाये भी नहीं? उनके क्वार्टर से कोई आवाज नहीं आई।"

"मैं तो बैठक में बैठा लडके का इन्तजार कर रहा था। मुझे तो यह भी नही मालूम कि वे अपने क्वार्टर में कब चले गए। ऐसा लगता है कि कातिल पहले से ही वचार्टर में घुसे बैठे है। यह वारदात एक बन्दे के बस की बात नहीं। वे कम से कम दो थे I घनश्याम और उनकी बीबी जेसे ही ‘क्वार्टर में पहुचे' उन्हें रिवॉल्वर दिखाकर कावू कर लिया गया। दोनों के ही हाथ पीठ पर बंधे थे और मुह' में कपड़ा ठुसा हुआ था । मेरा ख्याल हे कि उन्है यूं वेवस करने के बाद किसी तेज धार हथियार से उनके गले काट दिये गए। यूं उन्हें चीखने का भी मौका नहीं मिला होगा।"

रेखा कुछ देर खामोश रही, फिर उसने पूछा--' 'पुलिस क्या कहती है?"

”पुलिस के पास फिलहाल कुछ भी कहने को नहीं है । आई ओ खान तो इस निष्कर्ष पर पहुचा' लगता है कि तुम्हारे पापा कृष्णकात की हत्या नौकर घनश्याम ने की थी और जिसके इशारे पर उसने हत्या की उसी ने भेद खुल ~ जाने के पहले ही अपने बन्दौ से घनश्याम और उसकी बीबी का कत्ल करबा दिया।"
 
"नानसैन्स !" रेखा फुफारी-' ' 'लगता है पुलिस पैसा खा गई है और ह्रकीकत को अनदेखा करके उल्टे सीधे निष्कर्ष निकाले जा रही हे। अंकल मैं आपको बताऊं-पापा का मर्डर मेरे चाचा रमाकात ने ही किया है और उसी ने धनश्याम ओर उसकी बीवी को भी हमेशा के लिए खामोश कर दिया है I उन्हें मरवा दिया हे । ताकि पकडे जाने पर उनके खिलाफ गवाही न दे सकें । आप जानते ही हैँ किं रमाकात कैसा शातिर इन्सान है। उसका कोई कुछ न बिगाड सकेगा I उसने आई ओ की जेब भर दी होगी I ' '

"काश । घनश्याम जिन्दा रहता।"

''मेरा जी चाहता है अकल का दिल्ली पहुचू' और अपने चाचा के खिलाफ नम जद रिपोर्ट लिखवा दू।''

"एफ आई आर तो किसी न किसी तरह दर्ज हो ही जाएगी ।‘' बलदेव राज चिन्तित स्वर में बोला--"लेकिन सबूत कहा से आऐगे । किसी को कातिल साबित करने के लिए ठोस सबूत या आई विटनेस की जरूरत होती है I वह हम कहा से लायेंगे?"

"यही तो प्रॉब्लम है।' ' रेखा गहरी सास' लेते हुए बोली-"घनश्याम और उसकी बीवी की गवाही ही उस शेतान को फासी क्रे फदे' तक पहुचा' सकती थी। खैर, कोई बात नहीं। भगवान तो सब कुछ देख रहा है। उसके यहां देर है अंधेर नहीं I भगवान ने चाहा तो यह शेतान भी एक दिन अपने भयानक अजाम' क्रो पहुंचेगा' और उसके अजान क्रो दुनिया देखेगी... I "

"तुम चिन्तित मत होवो रेखा। तुम ठीक कहती हो I वह बक्त दूर नहीं जब रमाकांत अपने अंजाम को पहुचेगा I ” बलदेव राज ने रेखा से सहमति दर्शाई, फिर बाला "पर रेखा I. भगवान के वास्ते तुम आवेश में आकर दिल्ली का रूख नहीं करना।"

"जी अंकल । मैं सब समझती हूँ। "

"हा, बेटी! तुम्हे' अपनी जिन्दगी की हर हालत में हिफाजत करनी है। तुम न रही तो फिर उस शैतान के अजाम' को देखका खुश कौन होगा?"

रेखा अजीब सी हसी' हसी', बोली-----अंकल में इतनी आसानी से मरने वाली नहीं । अगर मरी भी तो चाचा रमाकांत को साथ लेक्रर मरूगी I अभी तो मुझे अपने भाई इन्द्र क्रो तलाश करना है। मैं जानती हू किं मेरे इन्द्र भैया जिन्दा हैँ और भगवान ने चाहा तो मैं बहुत जल्द उन तक पहुच जाऊगी I इसका मुझे पूरा बिश्वास है ।। ' ‘

"भगवान करें कि तुम्हारा बिश्वास सही निकले। कोई ऐसा चमत्कार हो जाए क्रि इन्द्र हमसे आ मिले ।" बलदेव राज सजीदगी' के साथ बोले थे---"तुम्हारे पापा रमाकांत भी कहा करते थे कि मुझे यू विश्वास होता है जेसे मेरा बेटा जिन्दा है ओर एकदम अचानक मेरे सामने आ जाएगा।"

“हा अकल । पापा को तो मरते दम तक यकीन था, वर्ना वह सावनपुर वाली जायदाद उनके नाम नहीं करते।"

"कत्ल सै एक दिन पहले वह रेस्तरां में बैठे बहुत देर तक इन्द्रजीत की बातें करते रहे थे और उसी दिन उन्होंने मुझें अपनी बसियत की डिटेल बताईं थी, शायद उन्हें अपने इस दुनिया से उठने का अहसास हो गया था । "

रेखा के लहजे मै उदास हसरतें भर आईं, वह बोली- "कितने बदनसीब थे पापा, अकल वह अपनी औलाद का सुख नहीं देख सके I एक औलाद को तकदीर ने उनसे जुदा कर दिया और दूसरी औलाद की उन्होने खुद तकदीर बना कर अपने आप से दूर कर दिया और फिर खुद वक्त के हाथों शिकस्त खा गए । और अंकल! मैं कौध-सी खुशनसीब हूँ। दर दर भटकती रही । अपना बाप हौते हुए भी किसी दुसरे को बाप समझती और कहती रही हूँ। असली बाप मिला भी तो उनके साथ रह न सकी । उन्हें जी भर कर देख न सकी, केसी भग्यहीन हूँ मैं... । ' ' यह कहते कहते जेसे समुद्र के जज्वात में ज्वार भाटा-सा आ गया। जब्त सयम का बांध टूट गया।

वह बेचारी तो अपने वाप के शव से लिपट कर रो भी नहीं सकीं थी। बाप का शव देखकर उसके संयम का बांध टूटा भी तो उस शेतान ने उसका हाथ पकड लिया था और उसका गम अचानक गुस्से में बदल गया था I दिल का गम दिल में ही रह गया था।

अब जो बाप कीं चर्चा हुई-उसके आभावों और मजबूरियो का ख्याल रेखा अपने आप को रोक न सकी।

वे अख्तियार ही आँसू निकले । भावावेश से उसकी हिचकियाँ बंध गई।

गगा मोसी ने रिसीवर उसके हाथ से ले लिया और बोली-' 'बलदेव राज अब फिर बात कर लेना । वह अब इस योग्य नहीं रही है कि और बात कर सके। में उसे सम्भालती हूँ… ।"

”हा ,, गंगा । उसे समझाओ, उसे सम्भालो । उसे बताओ कि जाने वाला जा चुका है और अब उसे धैर्य धीरज से काम लेना है । "

' ' 'ठीक है I में समझाती हूँ उसै । आप सुबह फोन कर ले। अच्छा नमस्कार ।' ' गंगा मोसी ने बलेदब राज के जवाब का भी इन्तजार नहीं किया और रिसीवर रख दिया I

रेखा बैड पर आंधी लेटी थी । गगा मोसी ने उसका सिर तकिये से उठाकय अपनी गोद में ले लिया और उसके बालों को सहलाने तभी । मोसी कुछ नहीं बोली और बस यूं ही उसके सिर पर ममता भरा हाथ फेरती रही । अपने दुपट्टे से रेखा के आँसू पौछती रही । उसे प्यार करती रही और रेखा उनसे लिपट-लिपट कर रोती रही।

रेखा शायद जिन्दगी में पहली वार इतना रोई थी । गंगा मोसी ने उसे रोने दिया था, तसल्ली सात्वना' का एक शब्द भी उन्होंने रेखा से न कहा था, क्योंकि वह जानती थी कि रेखा की तसल्ली रोने में ही है...तसल्ली भरी बातों में नहीं।

दिल पर जो गुब्बार था वह आसुओं सै घुल गया। यूं रेखा के दिल को करार आ गया । रेखा रोते-रोते, गगा मौसी क्री गोद में सिर रखे ही सो गई-किसी अबोध बच्ची की तरह ।

रेखा लगभग आधा घन्टा यूं ही सोती रही।

आधे धन्टे बाद अचानक हीं उसकी आख' खुल गई l पहले तो उसकी समझ में ही नही आया कि वह कहा है? मगर मौसी क्री गोद में अपना सिर देखकर उसे पहला ख्याल यही आया था कि वह शायद बीमार है। लेकिन जब विवेक थोडा, और जागा तो उसे याद आया कि वह रात-रोत्ते सो गई थी।

रेखा' को एकाएक शर्मिन्दगी का अहसास हुआ कि जाने बो कब से यूं ही सोती रही है और मोसी उसकी वजह से यू बैठी रही है । मोसी के घुटनों में वैसे ही तकलीफ रहती है । यह सोचकर रेखा हडबडा कर उठने लगी तो गगा मौसी ने उसे उठने नहीँ दिया l वह रेखा का माथा चूमते हुए बोली--' 'क्या हुआ रेखा? लेटी रहो, मुझे अच्छा लग रहा है। ' '

रेखा उठते उठते दोबारा उनकी गोद में लेट गई । उसे खुद गगा' मोसी की गोद में लेटना अच्छा लग रहा था। फिर कोई साढे ग्यारह बजे-बाहर गाडी के हॉर्न की आबाज आई। अमर आया था।

माया ने जाकर गेट खोला। अमर ने गाडी अन्दर खडी की । गाडी, से निक्ला और उसे लाॅक करते हुए पूछा ।

' 'माया मौसी सो गई क्या? ' '

' 'नहीं जाग रही हैँ। रेखा वीबी भी उनके पास है । "

"अच्छा.... । ' ' अमर अपने कमरे में जाने की बजाए सीधा गगा' मौसी के कमरे में चला गया ।

उसने रेखा को मौसी की गोद में ,लेटा देखा तो दरवाजे पर ही ठिठक गया ।

' 'कुशलता तो है I मैं अन्दर आ सकता हूं !"

' 'हां, अमर । आ जाओ । ' ' मोसी बोली ।

रेखा फोरन उठकर बैठ गई। वह अभी तक निढाल और बुझी-बुझी सी नजर आ रही थी।

' 'क्या हुआ?“ अमर रेखा को ही घूरते हुए बोला था।

' 'एक ओर बुरी खबर आई है दिल्ली सै । ' '

"रेखा के पापा की मौत के बाद अब और क्या बुरी खबर हो सकती है?''

' 'कृष्णकांत जी के घरेलू नोकर घनश्याम और उसकी बीबी को किसी ने गला काटकर मार डाला है । ' ' मोसी ने बताया ।

" और वह केसे हुआ?''

पूरी बात तो गगा मौसी को भी मालूम न थी-और अमर सुबह का निकला अब घर लौटा था । रेखा को ही उन्हे सब कुछ डिटेल से बताना पडा. ।

विवरण जान अमर क्रो भी दुख हुआ। नौकर घनश्याम की गिरफ्तारी के बाद कातिल तक पहुचना' मुश्किल न था। लेकिन कातिल ने गवाह ही खत्म कर दिए थे।

वै लगभग एक बजे तक बेठे बातें करते रहे । अमर ने खाना भी वहीँ बैठकर खाया था । अमर को नींद आ रही थी ।

वह उठ खडा… हुआ तो रेखा भी उठ खडी हुई। उन्होंने मौसी से गुड नाईट कहकर और अपने अपने कमरे का रुख किया ।

रेखा स्रीढिया चढकर ऊपर पहुची तो उसने अपने कमरे का दरवाजा खुला पाया और रेखा की तो यह आदत थी कि वह जव भी कमरे से निकलती थी तो दरवाजा हमेशा बन्द करके ही निकलती थी I दरवाजा पूरा खुला देखकर उसे अजीब-सा अहसास हुआ-जैसै कोई उसके कमरे मे गया हो l फिर उसने सोचा कि हो सकता है कि वही दरवाजा खुला छोड गई हौ । कमरे की लाईट जल रही थी I

रेखा कमरे के सामने पहुची तो एक क्षण के लिए ठिठक गई । खुले दरवाजे के ऐन सामने उसे कुर्सी पर अपने पापा बैठे नजर आए I उनके होठों पर स्नेहिल मुस्कराहट थी ।।

" पापा आप कब आए?" रेखा के मुह से बेअख्तयार निक्ला और वह तेजी से उनकी तरफ वडी।

लेकिन वहां तो कुछ नहीं था ।

कुर्सी खाली पडी थी।

वह परेशान हो गई। यह क्या था? क्या यह महज उसका भ्रम था या फिर नजर का फरेब ।

लेकिन नजर का फरेब और वहम तो उस सूरत में होता है कि आदमी पहले से सोचता आया हो कि वह ऊपर पहुचेगा तो वहां किसी क्रो पाएगा I ऐसै में सोच या कल्पना सजीव और सत्कार नजर आ सकती है, लेकिन रेखा की कल्पनाओं मे ऐसा कुछ तो हुआ नहीं, फिर... ।
 
रेखा तो दरवाजा खुला मिलने पर भी उलझन का शिकार हो गई थी। और फिर उसने खुले दरवाजे से जो कुछ देखा था वह इस कदर वास्तविक था कि वह बरबस ही पूछ बैठी थी----

" पापा आप कब आए?"

रेखा लपककर ही कुर्सी के निकट पहुची' थी I उसने गद्दी पर अपने दोनों हाथ रख दिये। गद्दी गर्मं हो रही थी जैसै उस पर से कोई अभी उठकर गया हो । वह उसी कुर्सी पर बैठ गई और फिर कमरे में चारों तरफ निगाह घुमाई ।

कमरे में सन्नाटा था। बाहर कही झीगरो के बोलने की आवाज आ रही थी I

अजीब खटराग था । रेखा ने उठकर दरवाजा बन्द किया I लाईट जली छोड़ दी और अपने बैड पर आकर लेट गई और आखें छत पर जमाए सोचने लगी ।

आज वह किस कदर रोई थी। अपने जले नासीब पर, अपने पापा की बदनस्रीबियों पर । क्या पापा से मेरा रोना बर्दाश्त नहीं हुआ था कि वड मुझे देखने आ गए थे। उनके चेहरे पर कैसी आकर्षक अपनत्वपूर्ण मुस्कराहट थी । क्या वह वाकई मेरे पापा थे? क्या आत्माएं इस तरह आ निकलती है? इस तरह नजर आ सकती है?

सोचते सोचते उसकी पथराई हुई आखें' वन्द होने लगी' । दिमाग निष्क्रय हो चला । उसे लगा जैसे वह रुई के "गालों" में धंसी' जा रही है I उसकी आखों' में नींद उत्तर आईं थी । यूं कुछ ही क्षणों बाद वह बेसुध सो गई।

और फिर वह प्रक्ट हुए । वह और कोई नहीं कृष्णकांत !

उन्होंने' कुर्सी का रुख सोईं हुई रेखा की तरफ घुमाया और आराम से कुर्सी पर बैठ गए और रेखा को बडे प्यार से निहारने लगे।

रेखा उनकी बहुत प्यारी बच्ची थी I अपनी बेटी की जीवन रक्षा के लिए उन्हौंने बड़े दुख भोगे थे, रेखा गहरी नींद में थी ओर ऐसै प्यारे अंदाज' में सो रहा थी कि उस पर से उनकी नजरें हट ही नहीं रही थी।

आज रेखा उन्हें ही याद करके किस कद्र रोई थी । उसके चेहरे पर अभी तक उदासी छाई हुई थी। उनका जी चाहा कि वह उठकर अपनी बेटी का माथा चूम ले-पर फिर यही सोचकर रुक गए क्रि रेखा अगर उठ गई तो उन्हे देखकर परेशान हौ जाएगी I

'वह' तो रेखा की, अपनी बेटी की मुहब्बत से मजबूर होकर आ गए थे वर्ना अब उन्हे इस मनहूस दुनिया से कोई दिलचस्पी न थी।

'वह' तो जहां चले गए थे, वहां सुख ही सुख था। वहा वह हर गम हर चिंत्ता से मुक्त हो गए थे।

'उन्हें' अभी रेखा के कमरे में बैठे अधिक देर न हुई थी कि 'बो' बाहर के एक करीबी पैड पर सै उडा… ।

पंखों की तेज फडफडाहट वातावरण में उभरी थी । पेड पर एक उल्लू ही था। इस उल्लू ने उसके घर के सात चक्कर लगाए।

रेखा बेख़बर सो रही थी और उसके पापा कुर्सी पर बेठे निर्निमेष ही बडे प्यार से देखै जा रहे थे।

सातवें चक्कर के बाद वह उल्लू रेखा के कमरे की छत पर आ बैठा l और इसके साथ ही रेखा को सहसा महसूस हुआ जेसे कोई भारी पक्षी उसके सीने पर आ बैठा हो । रेखा बुरी तरह चौक गई। उसका दिल बुरी तरह से धडक. रहा था ।

वह तो अभी उस खौफ से ही नहीं निक्ली थी कि एक पक्षी उसके सीने पर आकर बैठ गया था।

रेखा क्री सहमी-सहमी निगाहें घूमी और उसने कमरे में बडा विचित्र नजारा देखा । इस नजारे ने उसे और भी दहला दिया।

रेखा ने देखा कि एक बड़ा-सा पक्षी जो यकीनन उल्लू था उसके पापा पर झपट रहा है । उसके पापा जो कुर्सी पर बैठे _ थे और उनका चेहरा रेखा की तरफ ही था इस आकस्मिक विपदा से घबरा कर हाथ-पाव' चला रहे थे। उस उल्लू का हमला इस कदर तीव्र और तेज था कि पाया उससे अपने आप क्रो बचाने के लिए अपना सन्तुलन बनाए नहीं रख सके। उनकी कुर्सी पीछे की तरफ उलट गई।

रेखा घबरा कर चीखी---"नहीँ...ऽऽऽऽऽऽऽ ! "

उसकी यह विक्षिप्त चीख़ पूरे कमरे में गूज' गई। उसके नहीं कहते ही कमरे का नजारा क्षण मे बदल गया। बहा' अब कुछ भी अनूठा नहीं था।

ना उसके पापा थे । ना हमलावर उल्लू!

और रेखा की समझ मैं नहीं आ रहा था कि यह उसने कोई भयानक ख्वाब देखा था या वास्तव में ही वह सव कुछ हुआ था ।

रेखा अब पूर्णत: सजग थी ।।

उसने साईड टेबिल से जग उठाकर पानी पिया। उसका गला बुरी तरह सूख रहा था ओंर दिल की धडकन… अभी तक कावू में न थीं।

वह शायद ख्वाब देख रही थी-क्योंकि सोने से पहले उसने अपने पापा कृष्णकांत को कुर्सी पर बैठा हुआ महसूस किया था और वह उन्ही' के बारे मे सोचते-सोचते सो गई थी । शायद इसीलिए पापा उसके ख्वाब में आ गए थे ।

यह ख्वाब क्या है?

अधूरी कामनाओं ब हसरतों की दुनिया। रेखा क्री इस दुनिया से तो बडा… भयानक ख्वाब बरामद हुआ था । वह सोचने लगी-यह केसा ख्वाब था। उस उल्लू का इस बुरी तरह उसके पापा पर हमला करना क्या अर्थ रखता है? यह मनहूस पक्षी उसके पीछे क्यों लग गया है?

क्या यह बही उल्लू है जिसका खून हुआ था और बाद मे घायल उल्लू अमर के हाथ सै यूं उड़ गया था-जेसे बह न मृत ना था । यह उल्लू ’काला चिराग' एक रहस्यम व्यक्ति बन गया था और फिर दूसरे ही दिन यह काला चिराग उसे बापस लेने भी आया था । उल्लू उड़ चुका था सो वह खाली पिंजरा ही लेकर चला गया था । जात्ते-जातै यही कह गया था वह

" 'बो' आजाद हो गया है और यह कोई अच्छी बात नहीं... ।"

" वो कौन? "

' 'और वो आजाद केसे हो गया? और यह बुरी बात क्यों थी?"

यह 'वो' काले बन्द कमरे का लंगडा प्रेत था तो 'वो' तो अपनी मुक्ति पर बहुत खुश था और उसने तो कृतज्ञ और खुश होकर रेखा को एक चमत्कारी डायरी से नवाजा था, वही चमत्कारी डायरी जो रेखा की खाहिश पर उसकी जिन्दगी के रहस्य खोल देती थी । रेखा की उलझन का हल बता देती थी, हर गुत्थी को सुलझा देती थी ।।

सोच में फसी रेखा की नजरें सहसा कुर्सी पर पडी थी जो अब पीछे की तरक उल्टी पडी थी । "

सोच में फसी रेखा की नजरें सहसा कुर्सी पर पडी थी जो अब पीछे की तरक उल्टी पडी थी ।

' 'अरे यह कैसे उलट गई। अगर वह खवाब था तो फिर यह कुर्सी कौन उल्टा गया । नहीं, वह सब कोई ख्वाब नहीं था-उसने जो कुछ देखा था एक हकीकत थी । सच था । वह फिर सोचने लगी -- ' 'पापा सचमुच ही यहां मौजूद थे-- मुझे ही देखने आए थे । अगर वह मुझे देखने आए थे तो इससे किसी और को क्या परेशानी हो सकती हे । उफ उनकी जिन्दगी में तो चाचा ने उन्हें चेन नहीं लेने दिया था-अब मर कर उन्होंने सुकून पाया और अपनी चाहत सै मजबूर होकर पापा मुझे देखने चले आए तो...तो यह कौन बीच में आ गया?

क्या पापा मरकर भी सुकुन नहीं पा सके हैँ? अपनी बेटी के लिए तडप, रहे है । अब उनकी राह में आने वाला कौन है? रेखा बेड से उठी।

उसने उठकर कुर्सी सीधी की ।

दरवाजे की तरफ देखा, दरवाजा वन्द था। दरवाजे के बाहर ही वॉल क्लाक लगी हुई थी। दो बजकर बत्तीस मिनट हौ रहे थे।

रेखा बाथरूम में. जा घुसी । फ्रेश होकर बाहर आई और फिर बैड पर बैठ गई। वह अब पूरी तरह्र जागी हुई थी । अपने हवास में थी ।

उसने सोचा न जाने वह कितने जोर से र्चीखी थी । उसकी आबाज जान कहां गई होगी? उसके कमरे के ठीक नीचे अमर का कमरा था।

अगर अमर के कमरे तक उसकी चीख की आचाज गई होती तो वह कब का ऊपर आ चुका होता ।

हालात पहेली बन रहै थे। सोचै उलझ रही थीं ।

सहसा उसे ख्याल आया कि वह डायरी निकालकर देखें। शायद कुछ लिखा नमूदार हो गया हो।

उसने बैड से उठकर कैसेटों के बीच से डायरी खींची और उसे देखते हुए बैड पर आ गई । इत्मीनान से बैठकर ही वह एक एक पैज पलटकर देखने लगी।

वह हर पेज इस आशा पर पलट रही था कि शायद अगले पेज पर उसे कुछ लिखा हुआ नजर आ जाएगा। पेज पलटते पलटते जब वह निराश होने लगी और पृष्ठ भी कुछेक ही रह गए तो आशा की किरण अचानक चमकी।

वह पेज उलटते-उलटते रह गई I इस पृष्ठ पर मात्र क्या पंक्तियाँ लिखी थी । वह पढने लगी । लिखा था

"रेखा अपने पापा को समझाओ। इस दुनिया से अब उनका कोई वास्ता नहीं रहा है तो यह क्यों परेशान हो रहे है।

उन्हे अब इस दुनिया से अपने सम्बन्द विच्छेद करने होंगे । इतनी चाहत, ऐसा मोह, अच्छा नहीं होता। अच्छा, हम चलते हैं। हमें गया वक्त न समझना-हम फिर आयेंगे । ' '
 
रेखा ने पढा और पहले कीं तरह आखिरी शब्द पढते' ही शब्द धुधले पडने_लगे। मिटने की क्रिया शुरू हो गई और देखते ही देखते वे शब्द उस पेज से लुप्त हो गए ।

उस ने डायरी बन्द करके तकिये के नीचे रखो और लेट गई।

यह किस किस्म की चेतावनी थी । चेतावनी थी या मशविरा था। और यह उसे केसी हिदायत दी गई थी । वह एक ऐसै आदमी को केसे समझा सकती थी जिसका कोई अस्तित्व ही न हो । जिसकी काया जलकर राख हो चुकी हो और जो अब महज एक आत्मा रह गया हो । डायरी की तहरीर से इतना तो स्पष्ट था कि उसके पापा कृष्णकात उसकी मुहब्बत में भटक रहे थे। मरणोपरांत भी उन्होंने इस दुनिया से नाता नही तोडा था । वह बार-बार उसके पास आ रहे थे।

लेकिन...लेकिन यह चाहत भी अब उनके हक में बेहतर न थी I रेखा की उलझने बढती. जा रही थीं।

सवाल यह था कि वह अपने पापा को समझाए भी तो कैसे?

वह बहुत देर तक जागती रही और सोचती रही-यहां तक कि प्रात: के आसार 'दिखाई देने लगै। नींद तो उड चुकीं थी । वह उस वक्त तक सोचो में ही फंसी रही जब तक माया उससे नाश्ते के बारे में पूछने न आई ।

रेखा ने नाश्ता, गगा' मौसी के साथ ही किया।

और आज नाश्ते पर रेखा ने मोसी से ’रूहों' के बारे में विचार-विमर्श किया, मोसी दिलचस्पी लेते हुए बौली

"आत्माओं के बारे में में कोई बात पूर्ण विश्वास से नहीँ कह सकती। लेकिन प्राय: यह सुनने में आया है कि मरने के बाद मृतक की रुह घर के प्राणियों को दिखाई दी है। मेरा अपना ख्याल यह है जो लोग अकाल-आकस्मिक मौत मारे जाते हे और जिनका मोह अपने पीछे रह जाने बालों से बना रहता है उनकी आत्मा भटकती रहती है। ऐसे लोग जो दुर्घटना-वश मर जात्ते है' ओर उनकी तीव्र कामना मोत के कारण से अधूरी रह जाती है, उनकी आत्माएं ससार' से नाता बनाए रहती हैँ I फिर यह भी मान्यता है कि मरने वाले, क्री आत्मा तेरह्र दिनों तक तो अपने प्रियजनों के करीव ही कहीं रहती है l पर आज तू यह चर्चा क्यो ले बैठी है? ' ' मोसी नें शकित भाव से पूछा था ।। ' '

' 'मौसी मुझे ऐसा महसूस होता है कि मेरे पापा की आत्मा भी अभी यहीं चक्कर लगा रही है।"

' 'यह्र...यह...अहसास तुम्हें केसे हुआ? क्या वह तुम्हें सपने में नजर आए?”

"सपने में नजर आते तो अच्छा होता। मैं उनसे बात भी कर लेती । मैने तो उन्हें जागती आखों से देखा है, मोसी! "

"हाय ।। वह कब?" मोसी घबरा-सी गई।

' 'अगर में आपको बताऊं तो डरेंगी तो नहीं?"

”नहीँ, ऐसी बातों से मैं कभी नहीं डरती I ' '

तब रेखा ने रात की सारी बातें सविस्तार ही गगा मोसी को सुना दी, लेकिन उसने उतना ही बताया जितना गंगा मोसी को बताया जा सकता था । और यह सब सुनकर गगा मौसी बोली

' 'इसका मतलब है कि हमारी मुहब्बत और यह संसारिक' मोह उन्हें भटका रहा है । किसी आत्मा का यूं भटकना अच्छा नहीं होता, बेटी ! "

"मौसी! " रेखा ने कुछ सोचते हुए पूछा "क्या कोई ऐसी मुक्ति नही, है कि पापा को यूं भटकने से और दुनिया में आने से रोका जा सके l "

' 'मैं ऐसी कोई युक्ति नहीं जानती। यह सच तो कोई 'आमिल' ही बता सकता है ।' '

' 'काश ।। दादा हरिं औम जिन्दा होते। ' ' रेखा बोली--' 'वही इस बारे में हमारे मददगार साबित हो सकते थे I हमें रास्ता दिखा सकत्ते थे। ' '

‘ 'देखो जरा माया को आवाज देकर पूछो कि अमर है या नहीं। वैसे वह होगा। मुझसे' मिले बिना वह कभी आँफिस नहीं जाता। ' '

"माया...!" रेखा ने आबाज दी।

' 'जी बीबी जी, ' ' माया दोडी. हुई आई ।

' 'भाई क्या कर रहे है? ' '

' 'नहा रहै है जी वह । मैं उनका नाश्ता तैयार कर रही हू.. l"

"वह नहाकर निकले तो कहना बडी बीबी बुला रही हैं।" गगा', मोसी नै आदेश दिया।

और फिर माया ने अमर को बाथरूम से निक्लता देखकर ही गंगा मोसी का हुक्म सुना दिया था 'और अमर भी आज्ञाकारी बालक की तरह तौलिये से सिर पोछत्ता हुआ मोसी के सामने आ खड़ा हुआ।

' 'जी, मौसी! ' '

"ओहो-क्या बाथरूम से सीधे इधर ही चलै आए हो। ऐसी तो कोई एमरजेन्सी नहीं थी… ।“

' 'मेरे ख्याल में माया ने कहा ही कुछ ऐसे अःदाज' से होगा। ' ' रेखा ने मुस्कराते हुए कहा।

' 'ऐसा कोई अर्जेन्ट काम नहीं है, तुम कपडे. पहनकर और तेयार होकर आओ। " मोसी बोली--' 'मै तुम्हारा नास्ता यहीं मगवाए' लेती हूँ। ' '

"-ठीक है मौसी । में बस दो मिनट में आया । " अमर पलट गया।

अमर लौटकर आया तो तभी माया भी नाश्ता ले आई थी। माया नाश्ता रखकर चली गई तो गंगा मोसी ने बात छेडी,"अमर वह 'आमिल' रोशन अली कहा' है?"

तात्रिक्त' रोशन अली का नाम सुनकर अमर के कान खडे हो गए। वह एकाएक सतर्क नजर आने लगा । वह बोला--' 'खैरियत तो है मौसी क्या फिर कुछ हो गया? ''

"नहीँ, ऐसा कुछ नहीं हुआ। रेखा का उनकी जरूरत आन पडी… है। ' '

' 'किस सिलसिले में...?' ' अमर ने रेखा की तरफ देखा।

' 'रेखा भैया, को पूरी बात बताओ।''

तब रेखा ने अपने पापा से सम्बधित घटना दोहरा दो ।

अमर सारी डिटेल सुनकर सोच में पड गया। यह बात उसके गले से नहीं उतर रही थी कि रेखा ने अपने बाप कीं आत्मा को देखा था। अमर इस बात क्रो रेखा का समझ रहा था। लेकिन रेखा ने सारा वाक्या कुछ इस यकीन से सुनाया था कि वह कोई बहस नहीं का सका। उसने बस इतना ही कहा--

"रोशन अली तो अलीगढ चले गए हैँ। वह रिटायर्ड हो गए थे ना।' '

' ' ओह हां, याद आया खैर इतने बड़े शहर में यह एक रोशन अली ही तो आमिल नहीं था । किसी और आमिल के बारे में मालूम का लो !"' मोसी बोली ।

अमर ने कुछ कहने को मुह' खोला ही था कि तभी फोन की घंटी बजी। रेखा फोन के ज्यादा निकट थी, उसी ने हाथ बढाकर रिसीवर उठा लिया।

' 'हेलो I ' ' वह बोली।

' रेखा, मै बलदेव राज बोल रहा हूँ । ' ' रेखा की आचाज पहचान उधर से बलदेव राज बोला था ।

' 'बलदेव अकल, आप कैसे हैँ? "

' 'मैं ठीक हूँ। रात क्रो मैने ख्वाब में कईं बार तुम्हारे पापा को देखा... ।' '

' 'क्या कह रहे थे । ' ' रेखा ने पूछा ।

' 'कहा तो उन्होंने कुछ नहीं, जब नजर आये तौ बडे बेताब तथा बेकरार से दिख रहे थे... । ' '

' ' आपने उन्हें बिल्कुल सही देखा । वह बाकई बडे बेकरार हैँ । "

' 'क्या मतलब? क्या तुमने भी उन्हें रव्वाब में देखा है, बैटी?" बलदेव राज ने तेजो सें पूछा था।

"नहीं अक्ल'! वह यहां आये थे शायद मुझें देखने। मैंने उन्हें जागती आखो' से देखा है। ' '

" जागती आखों से वह किस तरह? '' बलदेव राज की समझ में नहीं आया था।

और तब रेखा ने अपने पापा को जिस तरह देखा था वह सब सुना दिया, लेकिन उल्लू का हमला और डायरी वाली लिखत का जिक्र गोल कर गई। यह बात उसने मौसी और अमर को भी नहीँ बताई थी।

“इसका मतलब है कि वह तुम्हारे लिए अब भी चिन्तित है। ' '
 
"काश ।। मै उनको किसी तरह समझा सकती... । ' ' रेखा बोली…"उनकी आत्मा की शान्ति का पाठ चल रहा होगा-पंडित जी से कहना. वह पाठ के दोरान उनकी पुण्यात्मा को समझाए' I

"तुम्हारे ख्याल में क्या इससे कोई फर्क पडेगा । ' '

"मै नहीं जानती I आप ऐसा करके तो देखें ।' '

रेखा वाकई कुछ नहीं जानती थी। यह ख्याल तो बस बैसे ही उसके जहन में आ गया था और उसने कह दिया ।

"ठीक है । में पडित जी से बात करूंगा । ' '

"जरूर क्रीजियैगा', अक्ल' I ' '

"रेखा, तुम ज़रा अपना ख्याल रखना । घर सै अकेली मत निकलना । ' '

' क्यो? खैरियत? कोई नईं प्रॉब्लम. .. ।' '

"तुम्हारे बारे में एक फोन आया था, फोन वर्षा ने उठाया तो फोन करने वाले ने तुम्हारे बारे में पूछा कि कहा हो। वर्षा ने जबाव देने की बजाय उलटकय सबाल किया कि वह कौन बोल रहा है । तो उसने जबाब दिया कि हमें उनके वकील का जुनियर बोल रहा हूँ। कुछ कागजात पर उनके साईन कराने थै। बर्षा ने उसे बताया कि रेखा इस वक्त घर पर नहीँ है। जब आयेगी तो आपको फोन कर लेगी । इस बाबत बर्षा ने मुझे बताया, मूझे बडी हैरत हुईं कि ऐसै कौन से कागजात हैँ, जिन पर इतनी एमरजेन्सी में दस्तखत होने है । मेंने वकील क्रो फोन किया तो मालूम हुआ कि उसकी तरफ से कोई फोन नहीं किया गया है l जाहिर हे यह सब तुम्हारे बारे में सुराग लगाने की एक शातिराना कोशिश थी। "

"मै समझ गई अंकल । आप फ्रिक न करें I किसी का मुझ तक पहुचना इतना आसान नहीं । ' '

"फिर भी एहतियात की जरूरत है।"

"ठीक है अक्ल'! में सतर्क रहूँगी I "

कहने को तो उसने कह दिया था कि वह सतर्क रहेगी। लेकिन इस शब्द से ही उसे ,चिढ हो गई थी । जब से वह पैदा हुई थी, उस वक्त से ही यह शब्द किसी जोंक की तरह उसकी जिन्दगी से लिपटा हुआ था I अब तो इस शब्द को सुनते ही उस पर इसकी तीव्र प्रतिक्रिया होती थी।। उसका जी चाहता था कि वह सारी सतर्कता, सारी एहतियात छोडछाड._ कर मेदान में आ जाए।

सच भी तो था कि रेखा की जिन्दगी ही बड़े अनिश्चितता के रग में बीत रही थी। जो वह करना चाहती थी वह नहीं कर पा रही थी और जो नहीं करना चाहती थी वह करने पर मजबूर थी । वह कैद में नहीं थी लेकिन उसे अदृश्य दीवार हर वक्त अपने गिर्द खडी महसूस होती थीं। उसे किस कदर छुई-मुई बना दिया गया था।

वह पूरा दिन रेखा ऐसी सोचो का शिकार रही थी । रात क्रो भी वह बेचैन ओर उलझी रही। सोते सोते अचानक ही उसकी आख खुल जाती। उसे यूं महसूस होता जेसे उसके पापा उसके पास ही है। पापा उसे नजर तो नहीं आते थे, लेकिन उनके साये, उनकी छाया का एक अहसास बदस्तूर बना रहता था।

इस तरह सोते-जागत्ते वह लगभग चार बजे गहरी नींद में चली गई।

और तब उसने बडे… दादा हरि ओम को ख्वाब में देखा। उनका दिव्य, आलौकिक च शातमय' चेहरा देखकर रेखा के दिल को करार सा आ गया। . ।।”

दादा हरि ओम किसी घने पेड के नीचे बेठे थे। रेखा पानी की तलाश में कईं घंटे से इस रेगिस्तान में भटक रही थी। प्यास कीं शिद्दत से उसके कठ में काटें से चुभ रहे थे। भटकते-भटकते ही एकाएक दादा हरि ओम सामने आ गए। दादा हरि ओम ने उसे इशारे से अपने पास बुलाया । पास रखी सुराही सै मिट्टी के प्याले में पानी उडेलकर उसे दिया । यह बडा ही राहत-बख्श तथा मीठा पानी था ।। पानी पीकर रेखा की आत्मा तृप्त हो गई थी।

चुपचाप वह बडे आदर से उनके सामने बैठ गई थी। , तब दादा हरि ओम ने अपनी, गम्भीर और तसल्ली देती आवाज में कहा था---

"घबराओ मत ॥ बहुत हौसले से काम लेने की जरूरत है। आगे आने वाला वक्त बहुत सख्त होगा । ' ' इतना कहकर दादा हरि ओम ने उसे कुछ पढने को बताया, यह एक मत्र था और शार्ति' शाति शाति का पाठ, ' 'इसे पढते_ ही तुम्हारे पापा तुम्हारी मुहब्बत की गिरफ्त से आजाद हो जायेंगे । उन्हें शान्ति मिल जायेगी।”

इसके साथ ही रेखा की आख खुल गई थीं । दादा हरि ओम को ख्वाब में देखकर जो सुकुन क्री अनुभूति हुई थी वह अभी भी बनी हुई थी और वह मत्र. जो उन्होने उसे पढने का बताया था, वह भी उसके जहन मॅ ताजा था।

वह फौरन उठकर बैठ गई।

वह मंत्र' जो उसे दादा जी ने पढने. को बताया था, बह उसे संध्या पाठ पढ़ने के बाद तीन दिन तक पढना था। यह शान्ति पाठ उसे प्रतिदिन पाच बार पढना था।

रेखा ने दादा हरि ओम के कहे का अनुसरण किया ।

तीन दिन के इस शान्ति पाठ के बाद' रेखा ने दादा हरि आम के बताए हुये पूर्ण-आकृति के तौर पर एक गिलास पानी पर सात बार फूंके मारी और उस पानी क्रो गुलाब के पौधे के गमलों में डाल दिया। अब उसे किसी से बात नहीं करनी थी l सीधे अपने बिस्तर पर जाकर सो जाना था ।

तीसरे दिन का यह मत्र' पाठ उसने देर से शुरू किया था ताकि सोने का वक्त हो जाए और वह किसी से कोई बात किए बिना सो जाए। रेखा हालाकि देर से सोने क्री आदी थी और नीद भी उसे करवर्टे बदलकर आती थी-लेकिन आज ऐसा न हुआ । बिस्तर पर लेटने के दस-एक मिनट के अन्दर ही अन्दर उसे नींद ने अपनी आगोश में ले लिया।

उस रात्त रेखा ने अपने पापा को ख्वाब में देखा।

उसके पापा एक सिहासननुमा ऊची कुर्सी पर विराजमान थे और उनके सामने दस बारह व्यक्ति अर्धंवृत्ताकार स्थिति में बैठे हुए थे। उन्हें सामने से रेखा आती नजर आई तो वह अपने सामने बैठे उन व्यक्तियों से सम्बोधित होते हुए बोले ' 'आप लोग अब जाए-मै जरा अपनी बेटी से बात कर लू।"

और' उनके सामने बैठे वे लोग इधर-उधर गायब हो जाते हैं। कृष्णकांत’ अपनी सिहासननुमा कुर्सी से नीचे उतर जाते -हँ और आगे बढ़कर रेख को गले से लगा लेते हैं। रेखा उनके गले सै लगकर आशा विपरीत रो पडती. है । वह अपने हाथों से रेखा के आँसू पौछते हे और कहते है

“बेटी, रोओ मत I रोओगी तो मुकाबला केसे करोगी। मै देख रहा हूँ कि तुम शैतानों में घिरी हुई हो। गेर इन्सानी प्राणियों की गिरफ्त में हो । डरो मत । प्रभु पर पूर्ण विश्वास रखना ? जो कुछ है बस परमेश्वर ही है और उसके सिवाय कुछ नहीं। तुम देखोगी कि यह सब चीजें पानी का बुलबुला साबित होंगी। ' '

रेखा रोते-रोते बेअख्तयार मुस्करा पडी। बोली--' 'भगवान ने चाहा तो ऐसा ही होगा, पापा ।' ' उसने अपने बाजू उठा दिये और आगे कहा--- 'पापा मुझे एक बार और अपने गल से लगा लें । हमें आपके प्यार को बहुत तरसी हुई हूँ। ' '

और कृष्पत्कात' ने उसे फिर अपने सीने से लगा लिया ।

उधर रेखा यह ख्वाब देख रही थी...."इधर वो उल्लू करीब पेड से उडा। उसने बहुत तेजी से इस बगले के सात चक्कर लगाए और फिर रेखा वाले कमरे की छत पर उतर गया।

और रेखा को यूं महसूस हुआ जेसे कोई भारी यक्षी उसके सीने पर आ बैठा हो । ' ' वह हडबडाकर उठ बैठी ।

कमरे में अंधेरा था । जहन निष्कृय तया ठस्स था । कुछ देर बाद जब उसके हवास बहाल हुए तो वह बैड से उतरी । कमरे की लाइट जलाईं। जग से पानी पिया। फिर उसे याद आया कि वह अमल करके सोई थी और उसने ख्वाब में आने पापा को देखा था।

फिर उसे वह ख्वाब पूरा याद आ गया। बडा अजीब ख्वाब था I

उसे नहीं मालूम था कि वह इस कदर प्यासी है.. .अपने बाप के प्यार क्रो इस कदर तरसी हुई है. ..अपने बाप के गले लगकर जिस कदर सुकून मिला था उसका अहसास उसके मन मस्तिष्क में अभी तक मौजूद था।

"ओह यह ख्वाब इस कदर जल्द क्यों टूट गया। वो मनहूस पक्षी कहा' से आकर उसके सीने पर बैठ गया था।"

अभी कुछ दिन पहले भी तो ऐसा ही हुआ था । उसके पापा जब उससे मिलने आए थे और वह कुर्सी पर बैठे सोती हुई रेखा को प्यार भरी नजरों सै देख रहे थे तो तब भी यह मनहूस पक्षी कही सै नमुदार हो गया था । वह रेखा के सीने पर आ बैठा था और जब रेखा कीं आख खुली तो उसने उस मनहूस पक्षी क्रो 'अपने बाप पर झपटते हुए देखा था और फिर वह सारा दृश्य ही भाप की तरह गायब हो गया था l

यह कौन है जो बाप बैटी की मुहब्बत के बीच आने की कोशिश कर रहा था? इस सवाल का जवाब रेखा के पास नहीं था ।

कमरे में कुछ घुटन का अहसास हुआ तो रेखा ने खिडकी की तरफ देखा। खिडकी बन्द थी । उसने उठकर खिडकी, खोल दी । ताजा हवा का झौका आया। वह खिड़की के सामने खडी…होकर लम्बे लम्बे सास' लेने लगी।
 
इस वक्त रात के डेढ बजे थे।

सामने दूर तक रात अपने बाल खोले सो रही थी ।। रात का अपना एक जादू हौता है। उसका अपना एक आकर्षण होता है । तभी रेखा को उस रहस्यमय कमरे में लगडे राजा से अपनी मुलाकात याद आ गई। उसका कहा याद आ गया ।

"जब तुम लोग सो जाते हो हम बाहर आ जाते हैं सर्वत्र हमारा राज होता है। "

' 'उस लगडे_ प्रेत का कहा याद आते ही रेखा को सहसा खोफ का अहसास हुआ । वह खिडकी बन्द करके वहां से हट आई। उसने सोचा कमरे कीं लाइट बन्द कर दे परन्तु लाइट आफ करने की हिम्मत न हुई। वह ऐसे ही बिस्तर पर आ लेटी और सोने की कोशिश करने लगी। ' '

जाने कब आख लग गई।

' फिर अचानक ही उसकी आख' खुली कमरे में कुछ अजीब-सा शोर हुआ था जिसकी वजह से उसकी आख' खुली थी । और आख खुलते ही' उसके सामने जो मजर' था, उसे देखकर वह बेअख्तयार चीखी

' 'नहीं ऐसा मत करो...।।' '

लो गोल गोल आखों वाला उल्लू जानूनी हो रहा था। रेखा की आखें जिस शोर से खुली वह पंखों की फडफडाहट थी । पहले तो रेखा की समझ में ही नहीं आया कि यह किस किस्म का शोर है-कमरे की लाइट जल रही थी और उसके सामने कुछ नहीं था । फिर उसने अपनी दाई तरफ किसी चीज को उछलते हुए देखा और फिर जब उसने तकिये से सिर उठाकर नीचे कालीन पर देखा तो उसकी समझ में आया कि शोरर परो की फडफडाहट, का है।

वो गोल गोल आखों वाला उल्लू आँडिंयो कैसट्स' के रेक के सामने कालीन पर जिस चीज पर उछल-उछल कर अपने पजों' व तीखी चोच' से हमला कर रहा था, वह चीज थी पाॅकेट डायरी ।

बही चमत्कारी डायरी जो रेखा क्रो लगडै प्रेत ने तोहफे में दी थी और जो रेखा की जिन्दगी कीं घटनाओं के किसी आईने की तरह उसे सामने पेश कर देती थी। यह डायरी रेखा के कि बडे काम क्री थी बेहद कीमती थी और वह गोल गोल आखों वाला डायरी कैं पृष्ठों को अपने तेज पंजो का निशाना बना रहा था ।

वह डायरी बीच सै खुली कालीन पर पडी. थ्री ।। ऐसी बहुमूल्य शै की दुर्गति देखकर रेखा दहल उठी थी और उसने चीखकर कहा था ”नही', ऐसा मत करो । ' '

उसकी आवाज सुनकर गोल गोल आखों' ने बडी गुस्सैली नजरों से उसकी तरफ देखा था और फिर वह देखते ही हवा मे लुप्त हो गया था। धुंआ बनकर गायब हो गया था ।

रेखा लपककर डायरी के पास पहुची'।

डायरी उठाकर उसका जायजा लिया। मात्र दो तीन-पृष्ठों को क्षति पहुची' थी। उल्लू ने अपने पजों' से पृष्ठों को फाडने की कोशिश क्री थी । उसने इस तरह पजे' मारे थे कि पेज फटकर अलग हो जाएं। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया था। कोई भी पेज पूरी तरह नहीं फटा था । हां, अगर रेखा कीं आख' न खुलती तो शायद इस डायरी को नुक्सान हो जाता।

उसने डायरी उठाकर, फिर कैसेटों के बीच रखनी चाही-लेकिन फिर कुछ स्रोचकर उसने इरादा वदल दिया और उसे अलमारी के लाकर में रखकर ताला बद कर दिया।

उसे ख्याल आया कि उसने यह काम पहले ही क्यो न किया कि अगर डायरी अलमारी के लॉकर में होती तो मनहूस उल्लू क्री पहुच से दूर होती और सुरक्षित रहती ।

डायरी को सुरक्षित करके वह बैड पर लेट गई और दोबारा सोने का यत्न करने लगी । शीघ्र ही उसे नींद ने आ घेरा। और फिर.. . i.

उसकी आख प्रात्त: देर से खुली और वह भी उस वक्त जब माया ने आकर दरवाजा बजाया। घडी पर नजर डालती हुई वह दरवाजे की तरफ भागी । दरवाजा खोला तो माया का परेशान चेहरा नजर आया।

' 'खैर तो है बीबी आज क्या उठने का इरादा ही नहीं था। चार फेरे मार चूकी अब दरवाजा खुले तब दरवाजा खुले। तग आकर बडी बीबी ने दरवाजा खटखटाने का हुक्म दे ही दिया । चलिए वह आपका इन्तजार कर रही हैँ।"

''मौसी ने नाश्ता तो कर लिया ना?" रेखा ने चिन्तित स्वर में पूछा।

' 'हां नाश्ता तो कर लिया।” माया ने बताया "मगर आपका बहुत इन्तजार करने के बाद किया ।।

रेखा ने गहरी सास ली, बुदबुदाई' ''चलो शुक्र है। ' ' वह माया से बौली-"तुम चलो माया! मै नह्वाकर आती हूँ! ' '

माया के जाने के बाद रेखा बाथरूम में घुस गई। वहां से तरो ताजा होकर निक्ली और ड्रेसिंग' टेबिल के सामने खडी होकर अपने बाल सँवारने लगी। उसके बाल घने काले, इतहाई' चमकीले और रेशमी थे। लम्बे इतने कि कमर से नीचे आते थे। बालों पर ब्रुश फेरते उसकी नजर अपने चेहरे पर ठहर गई।

काफी दिनों तक उसने अपने चेहरे पर नजर नही की थी। जब सें इन रहस्यमय घटनाओ का सिलसिला शुरू हुआ था उसने अपनी सुध ही कहा ली थी।

रेखा इतनी सुंन्दर थी कि कोई उसे एक नजर देखता तो बार बार देखने की ख्वाहिश करता ।। सफेद गुलाबी रग, लम्बा कद, खूबसूरत आकर्षक आखें । घनी व लम्बी पलकें। गुलाब कीं पखडियो से खूबसूरत होंठ, चाद' सा चेहरा, लम्बी हसीन गर्दन, गोरा बदन, नम-ओ-नाजूक हाथ, कोमल पाव', चाल ऐसी कि वक्त अपनी रफ्तार भूल जाए आवाज ऐसी कि जो सुने मत्र'-मुग्ध रह जाए । हां, रग-रूप, यौवन ब सौन्दर्मं का ठाठें मारता सागर थी वह ।

इस वक्त वह खुद क्रो इतनी प्यारी लग रही थी कि वह अपने आप में खो गई । बुश हाथ से छूटा तो होश आया। फिर उसने जल्दी जल्दी अपने बाल सवारे' और कमरे से निक्ल नीचे उतर आई।

नाश्ते के बाद वह गगा मोसी से बातें करती रही ।

उसने गगा मौसी को अपना ख्वाबं सुनाया l यह बताया कि उसने अपने पापा को किस तरह सपने में देखा । किस तरह उन्होंने गले से लगाया और क्या कहा ।

यह सब सुनकर गगा मोसी बोली...... ''यह बात तुम्हारे पापा ने अजीब कही कि गैर इंसानी' प्राणियों की गिरफ्त में हो? "

"मौसी यह गेर इन्सानी, अमानवीय प्राणी क्या हौते हैं? ' ' रेखा ने पूंछा।

' 'जो हमारे तुम्हारे जेसे इंसान' न हो । ' '

' 'यानी जिन्न हों? "

' 'जिन्न भी हो सकते हैँ । लेकिन मेरे ख्याल मेँ इस दुनिया में इन्सानो और जिन्नों के अलावा एक तीसरा प्राणी भी होता है ।" मौसी ने अपना ख्याल जाहिर किया ।

"वह कौन सा? "

' ' शेतान प्राणी । ' '

' 'शैतान प्राणी?" रेखा ने स्पष्टीकरण के लिए दोहराया।

"हां,, दुष्ट आत्माएं, चुडेल, प्रेत, सर कटे, छलावे, भूत और ।

न जाने क्या-क्या l यह सब शैतानी प्राणी हैं ।" गगा' मोसी ने समझाया ।

"और जानवर?" रेखा ने पूछा।

"क्या जानवर भी दुष्ट-आत्माएं हो सकती है।"

' 'कुछ जानवर और पक्षी भी रहस्यमय प्राणियों क्री श्रेणी में आते है !" मौसी सोचपूर्ण लहजे मैं बोली--- "जेसे कि बिल्ली, कुत्ता. उल्लू और चमग़ादड इत्यादि । कुत्ते के बारे में कहा जाता है कि वह उन अदृश्य बलाओं को भी देख लेता है जिन्हें इंसान नहीं देख पाता... । "

" मौसी ! क्या इन्सानों में गैर-इन्सान भी पाये जाते है? ' '

यह एक अजीब सबाल था ।

"हां, क्यों नहीं। तुम अपने चाचा रमाकांत को ही ले लो I वह किधर से इंसान' लगता है। ' ' मौस्री मुह बनाते हुए बोली।

"वाह मौसी, आपने बहुत सही बात कही, यह कहकर आपने मेरा दिल खुश कर दिया ।" रेखा ने मूस्कराकर कहा।

"भगवान का शुक्र है कि मेरी किसी बात पर तुम्हारे होठों पर मुस्कराहट तो आई।" गगा मौसी खिल उठी थी।

कुछ क्षण खामोशी रही, फिर रेखा ने पूछा--"मौसी, अब क्या करू?"

"तुमने क्या करना है. . .? "

' 'ये गैर इन्सानी. अमानवीय प्राणी जो मेरे गिर्द घेरा डाले है-उनरो कैसे निपटे।"

"बडे दादा हरि ओम से मदद लो.. . । ' ' गगा मौसी ने मशविरा दिया ।

' 'दादा हरि आम से मदद लूं? ' ' रेखा ने हैरान होकर दोहराया.... "शायद आप भुल गई हैं कि अपने दादा हरि ओम स्वर्ग सिधार गए है । ' '

' 'तुम्हारे सपने में कौन आया था?" मौसी ने जबाब देने की बजाय सबाल किया ।

"दादा हरि ओम आए थे।" रेखा ने बताया I

"वह दोबारा फिर आएगे और वही तुम्हें रास्ता दिखाएगे' । जाने क्यों मुझे इस बात पर यकीन है। "

"क्या ऐसा है तो मै इंतजार करूगी। बल्कि मै ख्वाहिश करूगी कि वह जल्द मेरे सपने में आएं, उन्हें ख्वाब में देखकर न जाने क्यों सुकून-सा आ जात्ता है । ' ' रेखा बोली।

रेखा कुछ देर और गगा मौसी सै इधर उधर की बातें करती रही, फिर ऊपर अपने कमरे में चली आई ।

कमरे में आकर कैसेटों की कतार पर जो नजर पडो. तो दिल धक्क से रह गया। डायरी नजर नहीं आई थी-कैसेट का वह कबर खाली था । फिर फोरन ही अपनी बेवकूफी पर हसी' आ गई I डायरी तो वह खुद अलमारी के लाकर में रख गई थी I उसका दिल चाहा कि वह डायरी निकालकर उसके पृष्ट उल्टे पुल्टे। डायरी बाहर कैसेटों के बीच थी तो वह जब चाहती, आते-जात्ते निकालकर देख लेती थी। अब उसे डायरी देखने के लिए बाकायदा अलमारी तक जाना होगा। लौकर खौलकर उसे देखना होगा।

उसने ऐसा ही किया। अलमारी का लाकॅर खोलकर डायरी निकाली और अलमारी बद' करके वह बैड पर आ जेठी। डायरी के पृष्ठ पलटे तो उसे एक पृष्ठ पर उस रहस्यमय कमरे की तस्वीर बनी नजर आई जिसके हैण्डल पर काला ताबीज लटका हुआ था।

इसका क्या मतलब हुआ? वह सोच ही रही थी कि देखते ही देखते वह तस्वीर मद पडने लगी और उसकी जगह कोई और तस्वीर उभरने लगी । यू कुछ ही क्षणों में उस रहस्यमय कमरे की तस्वीर गायब हो गई और उस झोपडी, की तस्वीर सामने जा गई जिसकी छत पर गोल-गोल आखो वाला उल्लू ओर दरवाजे पर एक साप कुण्डली मारे बैठा था ।
 
झोंपडी की तस्वीर स्पष्ट उजागर होते ही एक मर्दाना आबाज उसके जहन में गूंजी कोई दर्द भरी आबाज में उसे मदद के लिए पुकार रहा था

"डरो मत...आओ झोपडी के अन्दर आ जाओ... । ' '

यह वही आबाज थी जो ख्वाब में उसे जाने कितनी बार सुनाई दी थी । लेकिन इस वक्त यह आबाज सुनाई नहीं दी सिर्फ उसने अपने जहन में महसूस की थी।

फिर देखते ही देखते यह तस्वीर भी घुघली होने लगी और उसमें एक और तस्वीर उभरने लगी । यह तस्वीर उभरकर पूरी हुई तो मालूम हुआ कि यह फिर वंगले' के उसी रहस्यमय काले कमरे की तस्वीर है।

ऐसा तीन बार हुआ रहस्यमय काले कमरे के बाद उस झोंपडी, की तस्वीर उभरती-डूबती रही। तीसरी बार ऐसै डूबी कि फिर उस पृष्ठ पर कुछ न रहा । वह पेज अब कौरा नजर आ रहा था। .रेखा सोचने लगी कि इन दोनों तस्वीरों का एक साथ दिखाई देने का क्या मतलब है?

बड़ा बिचित्र अनूठा इशारा था कुछ समझ में नहीं आया या। काश । इन बदलती तस्वीरों के नीचे कुछ लिखा भी आ जाता तो कितना अच्छा होता ।

डायरी रेखा के हाथ मे थी और वह यूं ही वेध्यानी से उसके पेज पलटती जा रही थीं कि अचानक उसके सामने एक ऐसा पृष्ट आ गया, जिस पर कुछ लिखा हुआ था।

रेखा खुशी से झूम गई।

ये कुछ वाक्य थे , जिसमें रेखा कौ हिदायत दी गई थी--और इससे ही कुछ क्षण पहले जो उलझन रेखा के जहन में पैदा हो गई थी-- वह जाती रही 1

चमडाजरी डायरी की हिदायत अनुसार अब उसे सफर करना था।

इस हिदायत पर ही अमल करने का फैसला करने मॅ रेखा ने देर न लगाई थी।

उसने एक बैग तेयार कर लिया और इस बैग में उसने बेहद जरूरी चीजें ही रखी थी । ये चीजें रखी जाने के बाद भी वह बैग इतना हल्का था कि वह उसे कंधे पर लटकाकर बडी आसानी से मीलों चल सकती थी।

_ वह नहीं जानती थी कि उसे किस तरह का सफ़र करना होगा -इसीलिए-उसने सोच लिया था कि अगर उसे पैदल भी चलना पडे, तो उसका बैग उसके लिए रूकावट न बनै ।

अपने मिशन पर जाने सै पहले रेखा ने आज की शाम खुले वातावरण में गुजारने का प्रोग्राम बनाया। सो पहले उसने गगा मोसी को राजी किया । मोसी अपनी बीमारी के कारण बाहर कहां निकली थीं । पर रेखा के जोर देने पर चलने के लिए तेयार हो गई । फिर रेखा ने अमर क्रो फोन कर दिया कि वह आज जल्दी घर पर आ जाए । अमर ने तजवीज पेश की कि जब इतने समय बाद घर से बाहर निक्ल रहे हो तो फिर रात का खाना भी क्यो न बाहर ही खाया जाए कि मोसी अगर होटल मैं खाना पसन्द न करें तो खाना घर से बनाकर ले जाया जा सकता था।

तजवीज अच्छी थी । इस तरह रेखा गगा मौसी और अमर के साथ खासी देर तक रह सकती थी। अमर क्री आशंका' सही थी कि मोसी किसी होटल में खाना नहीं खाएगी सो रेखा ने माया को बुलाया और उस रात का खाना तैयार करने का आँर्डर दे दिया ।

"अरे बीबी! मै आपके लिए तीन की जगह दस डिशे तैयार करूगी पर जाना कहां है?"

' 'घूमने । " रेखा किशोरियों की-सी.चपलता के साथ बोली-- "क्लिने ही तो पिकनिक स्पाट हैं दूर नजदीक l ऐसै ही किसी स्पाट पर बैठकर दावत्त भी उडाईं_जाएगी, किं रास्ते में आईसक्रीम खाते हुए ग्यारह बजे तक बापस घर... ।"

” बाह , बीवी! सुनकर ही मजा आ गया । ऐमा जबरदस्त प्रोग्राम... । "

"बस देख लो । " रेखा चह्रकी ।

"ठीक है, बीबी! मै अभी शाम की तैयारियां शुरू कर देती हू।"

रेखा. माया से बात कर रही थी तो गगा मौसी उसका चेहरा बडे गौर सै देख रही थी। रेखा को यूं सैर सपाटे का यह प्रोग्रम्म बनाना उनके गले से नहीं उतर रहा था ।

माया के जाने के बाद रेखा ने उसकी तरफ देखा तो उन्हें बडी तन्मयता के साथ अपनी तरफ देखते पाया ।

"मोसी क्या हुआ?" उसने चकित भाव से पूछा।

"यही तो मेरी समझ में नहीं आरहा है... I” गंगा' मोसी बदस्तूर उसे निहार रही थी । उन्होंने रेखा का नर्म कोमल हाथ अपने हाथों में ले लिया और बडे अपनत्व से बोली--"'तुझे हुआ बम है. सच बताओ...?"

"लो, मै खुद आपसे पूछ रही हू क्रि आपको क्या हुआ है...मुझे इस तरह क्यो देख रही है । और आप है कि उल्टा मुझसे सबाल कर रही हैं। मुझे तो कुछ नहीं हुआ है खाला, बस आऊटिंग का प्रोग्राम बनाया है I "

"मुझे यूं लग रहा है जेसे तुम्हारी इस आऊटिंग के पीछे कोई बात है. ..क्रोइं राज है I " मोसी उसी अपनत्व के साथ बोली-"क्या तू मुझे नहीं बताएगी...?"

और गंगा मौसी की बात सुनकर रेखा के दिल पर धुंआ-सा छा गया। वह उन्हें केसे बताती कि आज कीं रात वह उनसे जुदा हो जाएगी। और फिर जाने उसके सफर का क्या अंजाम हो। जिन्दगी की जाने कहां शाम हो जाए, वह उन्हें फिर देख सके या नहीँ... I

मौसी, अब किसी की मौत-जिन्दगी का तो कोई भरोसा है नही ना... ?" रेखा ने मोसी को उलझाने के लिए यूं ही कह दिया?

"अच्छा... .I भईं भगवान के लिए ऐसी बेहूदा बातें मेरे सामने न करो । यह आजकल की लडकियां मोत और जिन्दगी की चर्चा तो ऐसै करती हैं जैसे आईसक्रीम खरीदने जा रही हो ।"

' 'हा', मोसी I. अच्छा याद दिलाया । जरा यह तो बताएं कि आप आईसक्रीम कौन-सौ खाऐगी? "

" 'मै इतनी बेवकूफ नहीं हूँ जितना तुम समझ रही हो, समझी I‘ ' मौसी ने खिन्नता दर्शाई।

"मौसी छोडो, भी अक्लमंद बनने में क्या रखा है । कभी-कभी तो यह अक्ल ही बन्दे को भगवान से दूर कर देती है... I " रेखा उनकी बात… क्रो फिर ले उडी ।

गंगा मौसी समझ गई कि अगर कोई बात है तो रेखा उसे बताने के लिए तेयार नहीं है। सौ उसने खामोशी अपना ली।

"हाय मौसी आप कितनी अच्छी हैँ ।“ मोसी की खफगी पर मुस्कराते हुए कहा रेखा ने, और फिर उनसे लिपट भी गई ।

पर फिर न जाने क्यों रेखा की आखें आसुओं से भर गई। वह तो अच्छा हुआ कि उसका चेहरा मौसी की तरफ नहीं था । उसने बडी दक्षता से अपनी आखे साफ कर ली और फिर हंसकर दिखाया और अपने कमरे में आ गई।

और फिर लगभग चार बजे वे पिकनिक मनाने को निकले । गाडी में अमर के बराबर बाली सीट पर गंगा मोसी बैठ गई और पीछे की सीट माया और रेखा न सम्भाली ।

वे पहले नेशनल पार्क पहुचे थे । गंगा मौसी क्योकि ज्यादा चल फिर नहीं सकती थी, इसलिए एक जगह अ…च्छी सी पसन्द करके वहीँ सफेद चादर बिछा दी गई। खाने-पीने का सामान भी पास ही रख दिया गया I माया, पोसी के पास बैठ गई और रेखा और अमर चहलकदमी के लिए निक्ल गए।

नौ बजे के करीव उन्होंने खाना खाया । माया ने खाना बड़े शोक से बनाया था, सो सबने खूब डटकर खाया। गप्पें हाकी । दुनिया भर क्री बातें हुई और फिर वापसी में, रास्ते में एक जगह रूककर आइसक्रीम खाई और यू वे लोग सवा बारह बजे घर पहचे ।

इस सैर तफरीर को रेखा ने बहुत ज्यादा इन्जाय किया था। उसका तो वापस जाने का मन नहीं कर रहा था । मजबूरी थी कि घर तो वापस आना ही था। और वह भी एक निश्चित वक्त से पहले। उस निश्चित वक्त पर उसे उस रहस्यमय कमरे में जो दाखिल होना था।

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इस खुशगवार रात की सुबह ही हौलनाक थी ।

गंगा मोसी प्रात जल्दी उठने की आदी थी। वह उठी भी थी । नित्यकर्म से निपटकर नहाई भी थी पर प्रतिदिन की तरह पूजा पाठ को दिल न चाडा था और फिर अपने ब्रैड पर लेट गई थी।

वह जब उठी थी तभी उसकी हालत अजीब सी हो रही थी । दिल पर एक घबराहट-सी व्याप्त थी। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वजह क्या है? शायद रात आऊटिग की वजह से ऐसा हुआ था। रात उसने खाना भी कुछ ज्यादा। ही खा लिया था । सम्भव था कि ब्लडप्रेशर गडबड… हो गया हो । लेकिन यह घबराहट कुछ अजीब किस्म की थी ।

एक बेचैनी-सी थी...जैसे कुछ होने बाला हो या हो गया हो । मगर उसकी सूचना अभी तक न पहुची हो I

गंगा मोसी कुछ देर तक यूं लेटी रही फिर उठकर बैठ गई।

बैचेनी थी कि बढती जा रही थी । सुरज की रोशनी हर तरफ फैल गई थी । और न सूझा तो बाथरूम का दरवाजा खौलकर पिछले लान में निकल गई। यहा उनकी एक कुर्सी पडी थी । जिस पर बैठकर वह अतीत की यादों में गुम हो जाती थी। थोडा टहलने के बाद वह अपनी उस कुर्सी पर बैठ गई ।

कुर्सी पर बैठकर आकाश की तरफ नजर की । आकाश पर बादलों के छोटे छोटे टुकडे तैर रहे थे और काफी ऊचाई पर एक चील दायरे में उड रही थी। चील को देखकर उन्होंने नजरें फौरन नीचे कर लीं।

उनके दिल की अभी भी वही अवस्था थी । तबियत सम्भलने में नहीं आ रही थी और फिर अभी वह सोच ही रही थी कि माया के पास किचन में चली जाए, उससे बातें करे, और यूं दिल बहलाए कि माया उसे दूढत्ते हुए खुद ही आ गई।

"बडी बीबी .I आप यहां आ बैठी हैं, क्या मुझे देर हो गई है । आपके लिए जूस लाई थी , अन्दर रखा है । क्या यहां ले जाऊ' माया उनकी सूरत देखते हुए बोली थी।

“नहीं वहीँ रहने दो । " गगा' मोसी बोली--" माया, जाने मेरा दिल क्यों घबरा रहा है। सुबह से मेरी आख फडक रही है । अब मैने आकाश में उडती हुई चील भी देख ली । भगवान मेहर करे-जाने क्या होने वाला है?"

' 'होना क्या है, बडी. बीबी । आप ऐसी बातों पर विश्वास क्यो करती है । यह तो अंधविश्वास है... । ' '

' 'अब तू मुझे पाठ न पढा I ' ‘ मोसी बोली... "जा और ऊपर जाकर देख कि रेखा उठ गई है क्या?“ गगा मोसी उठते हुए बौली।

' 'अगर दरवाजा बद हौ तो क्या खटखटा दूं। ' '

' 'एक तो तुम सवाल बहुत करती हो । जाकर देख तो सही। मेरा ख्याल है कि वह उठ गई होमी। ' ' गंगा मोसी अपने कमरे में दाखिल होते हुए बोली ।

' 'जी अच्छा। ' ' माया बोली और पिछली तरफ से ही ऊपर चली गई।

गगा' मोसी अपने बैड पर आ बैठी । साईड टेबिल पर जूस का गिलास रखा हुआ था I उसने हाथ बढाकर गिलास उठाना ही चाहा था कि तभी हडबडाई सी माया कमरे में दाखिल हुई।

' 'बडी बीबी! ' ' माया के लहजे में कुछ ऐसा था कि गंग्' मोसी का हाथ फोरन अपने दिल पर चला गया आखै उठाकर माया की तरफ देखा तो उसके चेहरे पर हवाईयां उडती नज़र आई।

' 'क्या हुआ माया?" उसके मुह से निक्ला था ।

"रेखा बीबी के कमरे का दरवाजा खुला हुआ है, लेकिन वह अपने कमरे में नहीं है? ' '

"नहीं हैँ-इसका क्या मतलब हुआ।'' गंगा' मोसी उलझकय बोली-' ' भई वह बाथरूम में होगी। ' '

रेखा गायब ...................

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इस खुशगवार रात की सुबह ही हौलनाक थी ।

गंगा मोसी प्रात जल्दी उठने की आदी थी। वह उठी भी थी । नित्यकर्म से निपटकर नहाई भी थी पर प्रतिदिन की तरह पूजा पाठ को दिल न चाडा था और फिर अपने ब्रैड पर लेट गई थी।

वह जब उठी थी तभी उसकी हालत अजीब सी हो रही थी । दिल पर एक घबराहट-सी व्याप्त थी। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वजह क्या है? शायद रात आऊटिग की वजह से ऐसा हुआ था। रात उसने खाना भी कुछ ज्यादा। ही खा लिया था । सम्भव था कि ब्लडप्रेशर गडबड… हो गया हो । लेकिन यह घबराहट कुछ अजीब किस्म की थी ।

एक बेचैनी-सी थी...जैसे कुछ होने बाला हो या हो गया हो । मगर उसकी सूचना अभी तक न पहुची हो I

गंगा मोसी कुछ देर तक यूं लेटी रही फिर उठकर बैठ गई।

बैचेनी थी कि बढती जा रही थी । सुरज की रोशनी हर तरफ फैल गई थी । और न सूझा तो बाथरूम का दरवाजा खौलकर पिछले लान में निकल गई। यहा उनकी एक कुर्सी पडी थी । जिस पर बैठकर वह अतीत की यादों में गुम हो जाती थी। थोडा टहलने के बाद वह अपनी उस कुर्सी पर बैठ गई ।

कुर्सी पर बैठकर आकाश की तरफ नजर की । आकाश पर बादलों के छोटे छोटे टुकडे तैर रहे थे और काफी ऊचाई पर एक चील दायरे में उड रही थी। चील को देखकर उन्होंने नजरें फौरन नीचे कर लीं।

उनके दिल की अभी भी वही अवस्था थी । तबियत सम्भलने में नहीं आ रही थी और फिर अभी वह सोच ही रही थी कि माया के पास किचन में चली जाए, उससे बातें करे, और यूं दिल बहलाए कि माया उसे दूढत्ते हुए खुद ही आ गई।

"बडी बीबी .I आप यहां आ बैठी हैं, क्या मुझे देर हो गई है । आपके लिए जूस लाई थी , अन्दर रखा है । क्या यहां ले जाऊ' माया उनकी सूरत देखते हुए बोली थी।

“नहीं वहीँ रहने दो । " गगा' मोसी बोली--" माया, जाने मेरा दिल क्यों घबरा रहा है। सुबह से मेरी आख फडक रही है । अब मैने आकाश में उडती हुई चील भी देख ली । भगवान मेहर करे-जाने क्या होने वाला है?"

' 'होना क्या है, बडी. बीबी । आप ऐसी बातों पर विश्वास क्यो करती है । यह तो अंधविश्वास है... । ' '

' 'अब तू मुझे पाठ न पढा I ' ‘ मोसी बोली... "जा और ऊपर जाकर देख कि रेखा उठ गई है क्या?“ गगा मोसी उठते हुए बौली।

' 'अगर दरवाजा बद हौ तो क्या खटखटा दूं। ' '

' 'एक तो तुम सवाल बहुत करती हो । जाकर देख तो सही। मेरा ख्याल है कि वह उठ गई होमी। ' ' गंगा मोसी अपने कमरे में दाखिल होते हुए बोली ।

' 'जी अच्छा। ' ' माया बोली और पिछली तरफ से ही ऊपर चली गई।

गगा' मोसी अपने बैड पर आ बैठी । साईड टेबिल पर जूस का गिलास रखा हुआ था I उसने हाथ बढाकर गिलास उठाना ही चाहा था कि तभी हडबडाई सी माया कमरे में दाखिल हुई।

' 'बडी बीबी! ' ' माया के लहजे में कुछ ऐसा था कि गंग्' मोसी का हाथ फोरन अपने दिल पर चला गया आखै उठाकर माया की तरफ देखा तो उसके चेहरे पर हवाईयां उडती नज़र आई।

' 'क्या हुआ माया?" उसके मुह से निक्ला था ।

"रेखा बीबी के कमरे का दरवाजा खुला हुआ है, लेकिन वह अपने कमरे में नहीं है? ' '

"नहीं हैँ-इसका क्या मतलब हुआ।'' गंगा' मोसी उलझकय बोली-' ' भई वह बाथरूम में होगी। ' '

"बाथरूम भी खुला है। “ माया ने बताया I

"तो गेलरी में खडी होगी।"

"वह ऊपर कही भी नहीं हैं, बड़ी बीबी...!"

' 'फिर बाहर होगी...लाॅन में... I ' '

’ 'रेखा बीबी नीचे भी कही नहीं है। मैं पूरा घर देख आई हूँ।“

' 'क्या गेट खुला हुआ है? ' '

"नहीं बडी बीबी, गेट अन्दर से बन्द है और उसमें ताला भी पडा हुआ है। ' '

' 'इसका मतलब है कि वह बाहर भी नहीँ गई है।" गगा मौसी का दिल अब धुआँ होने लगा--" 'वह अपने कमरे में नहीं है, नीचे नहीं है, बाहर नहीं है तो फिर वह कहां गई? माया मेरा दिल बैठा जा रहा है, जल्दी जाकर अमर को उठा।”

माया बाहर कीं ओर लपकी । जाते हुए बोली-- "जी अच्छा बडी बीबी!"

अमर को उठाना आसान काम न था । वह बडी गहरी नीद सोता था । लेकिन इस वक्त तो जैसे चमत्कार हो गया । इधर माया ने उसके दरवाजे पर दस्तक दी उधर उसने उठकर दरवाजा खोल दिया।

"क्या हुआ माया?" उसने पूछा ।

"वो साहब जी, आपको बडी… बीबी' ने बुलाया है फौरन ।' '

' 'खैर तो है। ' ' वह अपने पैर में चप्पल डालते हुए बोला--"तबियत खराब हो रही है क्या उनकी? ' '

' 'नहीं जी। वह रेखा बीबी... । ' ' माया अपनी बात पूरी न कर सकी । किसी अशुभ आशका से उसकी आवाज रूध गइ थी ।

' 'क्या हुआ रेखा बीबी क्रो? ' ' अमर उसके साथ चलते हुए बोला ।

' 'वह घर में कही भी नहीं हैं। ' ' माया मुश्किल से ही कह सकी ।

' 'यह तुम क्या कह रही हो? ' क्या भी जैसै सन्नाटे में आ गया।

"यह केसे हो सकता है? ' '

गंगा मौसी मारे परेशानी के जर्द पड चुकी थीं । अमर ने उसका चेहरा देखा तो और भी परेशान हो गया।

'' मोसी परेशान न हों में ऊपर जाकर देखता हूँ-रेखा ऊपर ही होगी । " अमर ने उन्हें तसल्ली देते हुए कहा-- वह कमरे से निकल गया ।

अमर सीढिया चढता हुआ ऊपर पहुचा ।

रेखा अपने कमरे में नहीं थी। कमरे में किसी किस्म की बेतरतीबी के आसार भी नहीं थे। हर चीज अपने ठिकाने पर धी। खिडकिया_'बंद' थी । गैलरी का दरवाजा बन्द था । हैरत की बात तो यह थी कि विस्तर पर एक सिलवट तक नहीं थी। लगता था जेसे बैड पर कोई सोया ही नहीं या अगर सोया था तो उसने उठकर चांदर सवार दी थी l

अमर ने चारों तरफ नजरे दौडाई_कि कोई ऐसा सुराग मिल सके कि रेखा कहां गई है । कही कुछ नजर नहीं आया तो उसने तकिया उठाकर देखा। तकिये के नीचे एक कागज रखा था। यह रेखा का पत्र था, गगा मौसी के नाम लिखा था --

' 'प्यारी मौसी मैं जा रही हूँ। कहा जा रही हू मालूम नही । किसके साथ जा रही हूं , यह भी मालूम नहीं कब वापस आऊगी, नहीं जानती। लेकिन इतना जरूर जानती हूँ कि मै बापस आऊगी और मेरे साथ मेरा भाई इन्द्रजीत होगा । आप मेरा इतजार करें और परेशान बिल्कुल न हो। "

" आपकी रेखा? "

बड़ा बिचित्र और अनूठा पत्र था । सब को चक्कर देने वाला। गंगा मोसी और अमर सिर पकडकर, बैठ गए थे । माया भी हैरान-परेशान थी।।।

बहरहाल, यह समस्या तो महत्वपूर्ण थी ही कि रेखा चली गई। लेकिन इससे 'भी महत्वपूर्ण और रहस्य की बात यह भी कि वह घर से किस वक्त और किस तरह गई। बगले का मुख्य गेट ज्यों का त्यों बद' था । ऐसे में बस एक ही रास्ता हो सकता था कि वह अहाते की दीवार जो छ: फुट से ऊची थी , को फलांगकर बाहर चली जाए। लेकिन रेखा जेसी नाजुक लडकी. के लिए छ: फुट दीवार पर चढना. और फिर बाहर उतरना आसान काम नहीं था।

लेकिन कोई नहीं जानता था कि रेखा घर से बाहर गई ही नहीं थी। वह तो घर के अदर' से कहीं गुम हो गई थी ।

रेखा को यही हिदायत दी गई थी कि वह ठीक ढाई बजे, बगले' के ही उस रहस्यमय कमरे के दरवाजे पर पहुच जाए जिस पर ताबीज लटका हुआ है । उसे यह भी बताया गया था कि उसका सफर वहां सै ही शुरू होगा । और सफ़र की हिदायत पर रेखा ने अपना छोटा मोटा जरूरी सामान एक बैग में डाल लिया था ऑर वह डायरी भी अपने पास बडी एहतियात सै रख ली थी I

रेख जानती थी कि गंगा मोसी उसके, अचानक लापता हौ जाने पर बहुत परेशान और हलकान होगी, इसलिए उसने यह सोचकर मौसी के नाम यह खत लिख छोडा, था कि मोसी की अंदाजा हो जाए कि वह जहां गई है अपनी मर्जी से गई है ।

रेखा को नींद आ रही थी । सैरो तफरीह से लोटने के बाद अच्छी खासी थकान हो गई थी । वह जानती थी कि अगर वह लेट गई तो गहरी नीद मे सो जाएगी । इसलिए उसने सोचा कि वह लेटेगी ही नहीं ताकि नींद न आए। पर फिर जब लगभग एक बजे जब वह नींद से निढाल होने लगी और बार-बार नींद में झूमने लगी तो उसने घडी, में सबा दो बजे का अलार्म लगाया और लेट गई।
 
ठीक सवा दो बजे घडी. का अलार्म बजा। अत्तार्मं बजते ही रेखा ने हाथ बढाकर उसका बटन दबा दिया और फौरन उठकर बैठ गई। फिर बाथरूम में जाकर मुह' पर छीटे मारे । अपने कमरे को चैक किया। बिस्तर ठीक किया। कमरे की हर चीज पर नजरे मारी'-सब चीजें अपनी जगह करीने से मोजूद थी I

दो बजकर पच्चीस मिनट पर वह अपने कमरे से बाहर निक्ली-पलटकर एक अतिम-बिदाई नजर डाली, दिल एकाएक बुरी तरह धडका था। उसने लाइट बद' की और बहुत सतर्कता के साथ सीढियां उतरने लगी। बगले' में एक रहस्यमय सन्नाटा व्याप्त था। पूरे चाद' की रात्त थी। चादनी का जादू वातावरण पर छाया हुआ था।

बंगले' का वह रहस्यमय कमरा सबसे अन्त में था । रेखा दवे पांव और पूर्ण सत्तर्कता के साथ चलती हुई उस कमरे के दरवाजे पर पहुच गई। इस कमरे से पहले ही गगा मौसी का कमरा पडता था, बद था। दरवाजे के नीचे अंधेरा था । इसका मतलब था कि उनके कमरे की लाइट बंद है ।

ब्लाहाल रेखा, डायरी से मिली हिदायत के अनुसार ठीक ढाई बजे उस रहस्यमय कमरे के दरवाजे पर थी । उसने दरवाजे के हेण्डल पर हाथ स्खना चाहा। लेकिन हाथ हैण्डल पर नहीं पडा। दरवाजा खुद ब-खुट खुल गया था ,,जेसे दरवाजे के पीछे कोई रेखा का प्रत्तीक्षक था ।

सामने अंधेरा था रेखा महज अन्दाजे से कमरे में दाखिल हो गई। उसके अन्दर दाखिल ढोते ही दरवाजा खुद ब-खुद हो बन्द हो गया । अन्दर घुप्प अंधेरा था। रेखा दो तीन कदम ही अन्दर आई थी और अब समझ न पा रही थी कि वह आगे बढे या वहीं खडी रहे। अगर आगे बढे तो किस तरफ बडे। अंधेरा इस कदर गहरा था कि हाथ को हाथ सुंझांईं नहीं दे रहा था ।

वह वहीं खडी. रही ताकि आखें अंधेरे में देख सकने लायक हो जाए तो. वह आगे बढे, ।

वह कमरे में ऐसै ही आखे फाडकर देख रही थी कि कुछ नजर आ जाए किं तब उसने घुप्प अंधैरे मै छत पर कोई रोशनी टिमटिमाती देखी, ऐसा लगा जैसे दून्द आकाश पर कोई अकेला सितारा टिमटिमा रहा हो I फिर देखते ही देखते ऐसे सितारों की सख्या' बढती_चली गई और सितारों की बढती. सख्या' के साथ मध्यम सा उजाला भी फैलता चला

गया और फिर यह मध्यम रोशनी धीरे-धीरे साफ होने लगी। रेखा की नजरें कमरे की छत्त की तरफ उठी हुईं थी । रोशनी धीरे धीरे वढती जा रही थी । छत अब खुले आसमान की तरह दिखाई देने लगी थी। बेशुमार सितारे जगमगा रह थे ।

फिर यह रोशनी इतनी तेज हो गई कि यूं लगा जैसे अचानक चाद निकल आया हो । साथ ही तेज ठण्डी ह्रचा का झोंका रेखा के रेशमी बन्द को छूता चला गया था । और इसके साथ ही रेखा को अपने पांव किसी नर्म चीज में घसते महसूस हुआ। रेखा ने फौरन अपने पैरों की तरफ...दिल घबराकर दाए' देखा, बाए' देख, ऊपर देखा, नीचे देखा और......

तब उसे अपने दिल की धडकने, रूकती हुई महसूस हुईं। यह वह कहा पहुँच गई थी।

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रेखा किसी रेगिस्तान में थी।

हां, यह रेगिस्तान ही तो था । पूरे चाद की रात थी । ठण्डी हवा चल रही थी । तारों भरा आकाश था I चाद अपने यौवन पर था। जहा तक नजर जाती थी-जहा तक वह देख सकती थी-रेत के ऊचे ऊचे टीले फेले हुए थे। कोई मकान, कोई आबादी, दूर तक न थीं और यह खडे ही खडे चंद लम्हो में जाने क्या से क्या हो गया था।

जाने वह कहा आ गई थी। यह कौन सी जगह थी-यह 'कौन-सा इलाका था?

अभी रेखा आश्चर्यचकित सी खडी, अपने हवासों और अपनी चेतना को सयम' ही का रही थी कि एक साया-सा उसके सिर पर पड़ा और आगे निकल गया I पंखों की फडफडाट के साथ ही एक चींख-सी दी l

रेखा ने पर किसी उडते. पक्षी का साया देखा जो उसके सिर से गुजर कर आगे गया था । रेत पर इस साये का आकार बहुत बड़ा था-जेसे यह पक्षी उसके सिर को छूता हुआ गुजरा हो ।

रेखा ने पखो की फडफडाहट और चीख की आवाज पर घवराकर फौरन ऊपर देखा। लेकिन आकाश पर कोई चीज न थी।

चादनी' अपने पूर्ण यौवन पर थी । दूर तक रेत का रेगिस्तान फैला हुआ था I ठण्डी हवा थी I यह माहौल, ये मजा', रेखा क्री पसन्द थे, उसकी कमजोरी थे। और यह दृश्य, यह माहोल रेखा ने अभी तक केवल अग्रेजी फिल्मों में ही देखा था । लेकिन अब तो वह खुद किसी फिल्म का हिस्सा बन गई थी। ऐसी फिल्म का हिस्सा जिसका न कोई डायरेक्टर था न फोटोग्रांफर ।

वह अपने घडकते_ दिल पर काबू पाने का यत्न करती खडी रही ।

फिर सहसा कही से छम छम की आवाज आने लगी। जैसै किसी के पांव' में घुधरू-बंधे हो और वह दौडा चला आ रहा हो । आवाज की दिशा में रेखा ने नजरें उठाई तो सामने से एक साया-सा आता दिखाई दिया । करीब आकर इस आकृति ने शक्लो-सूरत अपना ली, यह एक ऊठनी' थी जिस पर कोई सवार नहीं था ।

वह ऊंटनी उसके निक्ट आकर ठहर गई और फिर खुद ही रेत पर बैठ गई।

रेखा हैरान थी और उलझन का शिकार भी । जाने यह कहा से आ गई है और यहां उसके सामने आकर क्यों बैठ, गई है । तभी कहीँ निकट से आबाज आईं ।

"ऊटनी' पर बैठ जाऔ-यह तुम्हारे लिए भेजी गई है। "

रेखा नें घूमकर चारों तरफ देखा बोलने वाला कही नहीं दिखा। वह धडकते दिल के साथ ऊटनी पर सवार हो गई । रेखा के वैठत्ते ही वह ऊटनी हिलोरा लेती उठ खडी हुई । ऊटनी हालाकि बडी एहतियात के साथ उठी थी, फिर भी रेखा आगे-पीछे झूलकर रह गई।

अब ऊटनी ने चमकते चाद की दिशा में चलना शुरू कर दिया l फिर कुछ देर बाद ही उसने अपनी रफ्तार बढाई. और देखते ही देखते वह हवा से बातें करने लगी ।

रात्त का वक्त, ऊटनी की सवारी चाँदनी रात और दूर तक फैला रेगिस्तान और एक अप्सरा-स्री सुन्दर जवा लडकी । अजीब नजारा था। कोई भी इन्सान यह सब देख लेता तो बुत बनकर रह जाता। लेकिन यहा तो दुर तक कोई इन्सान नहीं था।

एक अचरज-लोक सा था। यह कोई और ही दुनिया थी। दृश्य पर दृश्य बदलते जा रहे थे । यूं लग रहा था ऊटनी उड रही हो। यू कितनी ही दूरी तय हो गई।

चाद अब भी सामने था, और धीरे धीरे वह अपनी चमक खोता जा रहा था। और फिर अतत्त': दौडते दौड़ते ऊटनी की रफ्तार कम होने लंगी यहा तक कि वह एक जगह रूक गई।। सफर करते हुए जाने कितना वक्त गुजर गया था । वह जाने कितना फासला तय कर आई थी। रात का जादू टूट चुका था । सूरज एक लाल तवे की तरह्र बहुत धीरे धीरे उजागर हो रहा था ।

ऊटनी के बैठने पर रेखा उसकी पीठ सै उतर गई और खडे होकर निक्लते सूरज को देखने लगी l यह रेगिस्तान की सुबह थी । और ऐसी मनभावन और खूबसूरत सुबह भी रेखा ने पर कहा देखी थी। सामने कुछ न था बस रेत के टीले थे और क्षितिज पर सिर उभारता सूरज था और ऊपर आसमान था और इन चीजों का ही बनाया हुआ था यह लेण्ड स्केप, इस दृश्य की दिलकशी और सौन्दर्य का कोई जबाब नहीँ था ।

रेखा इस अनोखी सुबह के इस जादू में खोई हुई थी कि अपनी-पीठ पर उसे अचानक पखों की तेज फडफडाहट, की आवाज सुनाई दी I इसके साथ ही तेज-तेज र्चीख की आवाज भी थी । उसने पलटकर 'देखा-आसमान पर कुछ नहीं था लेकिन धरती पर किसी उडते हुए पक्षी का साया पड… रहा था।

यह. बिचित्र मजर था। असल गायब थी. ..नकल दिखाई दे रही थी । उसने उस साये को घरती पर दूर तक जाते हुए देखा। रेत पर पडता. यह साया इतना बड़ा था कि लगता था कि वह पक्षी वहुत नीची उडान ले रहा हो । अभी वह इस साये को दूर होते ही देख रही थी कि पीछे एक साया और नमुदार हुआ। और यह देवक्राय साया किसी इन्सान का था ।

यूं लगता था जैसै कोई चादर ओढे हुए है । सूर्य क्योंकि अभी निक्ल रहा था और वह जो कोई भी था, सूरज के सामने था, इसलिए उसके साये का आकार भी असाधारण था।

और यहा भी बही मामला था । केवल साया था-किसका साया था कही नजर नहीं आ रहा था ।

और यह साया रेखा की सीध में उसी की तरफ बढता. आ रहा था । यहा तक कि धरती पर सरकते उस इन्सानी साये का सिर रेखा के कदमों में आ गया। और अपने पैरों पर साये के आते ही रेखा को एक अजीब सा अहसास हुआ। उसे लगा जैसे उसके पेरों में आग लग गई हो । घबराकर उसने पीछे हटना चाहा, लेकिन अब वक्त बीत चुका था । एक क्षण में ही वह साया उस पर छा गया और रेखा को यू महसूस हुआ जेसे उसे जलते हुए तन्दूर में डाल दिया गया हो, वह सूखी लकडी की तरह तड़ तड़ करके बिखर गई हो ।

लेकिन यह अहसास, यह यातना कुछेक क्षणों से ज्यादा की नहीं थी। और अब जो रेखा के हवास लोटे तो उसने देखा कि उस साये का दुर तक पता नहीं, फिर वह जगह भी तो बदल चुकीं थी । वह वहा नहीं थी जहां थी...बल्कि एक बिल्कुल ही नई जगह पर थी। इस वक्त वह रेत पर नहीं बल्कि ठोस-सख्त जमीन पर खडी. थी । यह जमीन हालाकि असमतल थी लेकिन जगह-जगह छोटे-बड़े पौधे नजर आ रहे थे।

कुछ ही फासले पर उसे एक झोंपडी दिखाई दी। इस झोपडी पर नजर पडते_ ही रेखा के दिलं की धड़कन अनायास ही तेज हो गई । यह तो वहीँ उसके ख्वाब वाली झोपडी थी। वह तेजी से उसकी तरफ लपकी । और अब करीव होती हुई झोंपडी. की छत्त पर उसे उल्लू बैठा साफ दिखाई दे रहा था। यूं जब वह थोड़ा और निकट पहुची' तो उसे झोपडी के दरवाजे पर साप भी दिखाईं देने लगा l यह साप अभी झोपडी. के अन्दर से निक्ला था और दरवाजे पर कुण्डली मारकर ओर फन्न उठाकर बैठ गया था।

ख्वाब का पूरा दृश्य ही अब एक हकीकत के रूप में रेखा के सामने था। साप' ने उसे अपने सामने देखकर एक जोरदार फुफकार मारी। उसके फुफकार मारते ही छत पर बैठा उल्लू उड़ गया। साप झपटकर रेखा की तरफ बढा और वह खौफजदा होकर पलटकर भागना ही चाहती थी कि झोपडी के अन्दर से आवाज आई

' 'डरो मत...आओ, झोपडी के अंदर आ जाओ... I" रेखा डरती कैसे नहीं।। वह खौफनाक साँप तेजी से उसकी तरफ बढ रहा था ।

रेखा भयभीत होकर अभी कुछेक कदम ही पीछे हटी थी कि उसने देखा कि वह साँप उसकी तरफ आने की बजाए दूसरी तरफ मुड गया और घूमकर झोपडी के पीछे गायब हो गया। अब झोपडी. की छत्त पर कोई चीज़ नहीं थी और न दरवाजे पर कुछ था ।

रेखा खडी… सोच रही थी कि क्या करे तभी आवाज फिर आई "डरो मत...आओ, झोपडी. के अन्दर आ जाओ I ' '

और इस वार यह आवाज सुनते ही वड झोपडी के छोटे से दरवाजे की तरफ बढी। और फिर अभी वह भीतर जानै के लिए झुकी ही थी कि किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखकर भीतर जाने से रोक दिया।

रेखा नै पीछे मुडकर. देखा तो कंघे पर हाथ रखने वाले ने अपना हाथ हटा लिया I न सिर्फ हाथ हटा लिया, बल्कि दो कदम पीछे हटकर भी खड़ा हो गया । सूरज क्री रोशनी सीधे उसके चेहरे पर पड रही थी I उसकी सावली' रगत चमक रही थी। वह ढीले ढाले स्याह लिबास में था। कंधों पर झूलते लम्बे लम्बे बाल । कानों में चादी की बालियां। लम्बा चेहरा । ऊचा' लम्बा कद । एक हाथ में मोटा-सा कडा और उगली' में चादी की पत्थर लंगी अंगूठी । स्याह, चमकती आखें, अजीब शख्सियत थीं उसकी। उसे देखकर खौफ भी आता था और देखते रहने को जी भी चाहता था ।

वह दोनों हाथ बांधे दिलचस्पी भरी निगाहों से रेखा को देख रहा था I ' ‘

!'कौन हो तुम?" रेखा ने पूछा।

"मै काला चिराग है । ' ‘ वह बोला तो उसके सफेद मोतियों से चमकदार दात दिखाई दिए।

' 'ओंह । अच्छा तो वो आप है?" रेखा के लहजे में उत्सुक्ता भर आई थी--" अब तक आपके बारे में सुनती रही हूँ। आज दर्शन भी हो गए।"

' 'मै इस रेगिस्तान में तुम्हारा स्वागत करता हूँ। मैं एक मुद्दत से तुम्हारे आने की प्रतीक्षा में थाI ' ‘

' 'पर क्यों? आखिर क्यों?” रेखा ने पूछा।

' ' बही बताने के लिए मैंने तुम्हें अदर जाने से रोका हे।' '

' 'अन्दर कौन है? ''

' 'अदर एक ऐसा व्यक्ति मौजूद है जिसे तुम्हारी मदद की सख्त जरूरत है।' '

' 'मैं तो अन्दर जा रही थी I आपने मुझे अन्दर जाने से रोक दिया । "

' ’तुम उसे देखोगी तो बहुत कष्ट होगा । बहुत दुख होगा । मैं चाहता हूँ कि उसे देखने से पहले तुम मेरी बात सुन लो । "

"अदर है कौन? आखिर कुछ पता तो चले। ' '

' 'तुम्हारा भाई इन्द्रजीत । " उसने बडे सहज भाव से जवाब दिया ।

"मेरा भाई? ?? इन्द्रजीत!! अन्दर मेरा भाई है और आप मूझे अन्दर जाने से रोक रहे है। यह तो जुल्म है ।। मुझें अन्दर जाने दें । मै अपने भाई को देखना चाहती हूँ। ' ' रेखा एकाएक ही बेचैन हो उठी थी I

"तुम्हारा भाई अंदर जिस हालतं मे हे-उसे देखकर तुम्हें दुख होगा। " काले चिराग ने गम्भीरता के साथ कहा I

" आप मुझे अन्दर जाने दे, प्लीज।।" जिद भरा अनुरोध था रेखा का ।

' 'तुम अन्दर न जाओ-मेरे साथ आओ । ' ' कहते हुए वह मुडा.. ''तुम्हारा भाई किसी की कैद में है।''

"कैद में।” रेखा चीख ही तो पडी--"किसने कैद किया है मेरे भाई को?''

"बकाल ने । " काले चिराग ने कैद करने वाले का नाम बताया I

"बकाल...? यह केसा नाम है । कौन है यह बकाल?! रेखा ने तेजी सै पूछा।

' 'सब यहीं खड़े-ख़ड़े मालूम कर लोगी या मेरे साथ कही चलकर बैठोगो?"

' 'मुझे कहा जाना होगा? ' ' हालात ने रेखा को उलझा दिया था। उसने शंकित भाव से पूछा था।

"मेरे साथ मेरी बस्ती में।" वह एक तरफ बढते_हुए बोला।

रेखा का उसके साथ जाने को जी नहीं चाह रहा 'था बह अपने भाई के बारे_ में ही अधीर हो गई थी । वह झोपडी में घुसकर अपने भाई को देखना चाहती थी । अपने भाई इन्द्रजीत्त की खातिर ही तो वह इस रहस्यमय सफर पर निकली थी । लेकिन वह काले चिराग के खिलाफ भी नहीं जा सकती थी। काले बिराग की बातों से मामले क्री संगीनी' का आभास होता था। उसने हालात की तह तक जाने और इन्हें समझने का फैसला किया और उसके पीछे चल दी ।

काला बिराग उसे कुछ बताना चाहता था और मौजूदा हालात में इस रहस्यमय व्यक्ति वाले से बातचीत एक मजबूरी भी थी।

काला चिराग उस झोपडी कीं पीठ पर पहुचकर , झोपडी से कुछ फासले पर जाकय रूक गया । खडे होकर उसने अपने दोनों हाथ¸ किसी पक्षी की तरफ फैलाए। सूरज की तरफ उसकी पीठ थी । धरती पर उसका लम्बा सा साया पड रहा था । हाथ फैलाकर वह रेखा से सम्बोधित हुआ…

’"शीना... ! मेरे साये में आ जाओ I "

रेखा जेसे ही धरती पर पडते_ उसके साये में दाखिल हुई-उसे तेज तपिश का अहसास हुआ । जैसे वह किसी भट्टी में झोंक दी गई हो । यह अहसास कुछेक क्षणों का ही था। जेसे ही उसके हवास बहाल हुए उसने खुद को एक खण्डहर मे पाया ।

जहा वह खडी थी, बहा सै सीढियां आरम्भ हो रही थीं। सीढियों, की समाप्ति पर एक दरवाजा सा नजर आ रहा था । काला चिराग धीरे धीरे सीढियां उतरता जा रहा था । कुछ सीढिया_उतरकर उसने पलटकर देखा। रेखा अभी ऊपर ही खडी. थी । उसने हाथ का इशारा दिया और बौला--" आओ... I"

रेखा उसका अनुसरण करते सीढ़ियाँ उतरने लगी। यह सीढिया काफी गहराई में नीचे तक चली गई थीं। सीढियां इतनी चौडी थी कि चार-पाच' आदमी एक साथ उतर सकते थे। सीढियों. के दोनों तरफ पत्थरो की दीवार थी I जहां सीढिया खत्म हो रही थीं उसके सामने भी दीवार थी । सामने वाली दीवार के साथ एक चौड़ा दरवाजा दिखाईं दे रहा था ।

काला चिराग उस दरवाजे में प्रवेश करके गायब हो चुका था। रेखा उससे आठ…दस सीढिया… ऊपर थी । जब वह दरवाजे के पास पहुची' तो काला चिराग फिर चल पडा।

उस दरवाजे में प्रवेश करके रेखा को एक खुशगवार हैरत का अहसास हुआ। उसका ख्याल था कि वह दरवाजे में दाखिल होगी तो आगे गहरा अंधेरा होगा ओर वह किसी जगह में पहुचेगी' । लेकिन ऐसा न था । सामने डद्योढी. थी । फासले पर ही एक और महराबी दरवाजा था । इस दरवाजे के दोनो भारी पट खुले हुए थे।

यह किसी महल का-सा दरवाजा था। खुले दरवाजे में से उसे खूबसूरत फोब्बारा और उसके बेक ग्राऊण्ड में पत्थरों का भबन नजर आ रहा था । जिसके सामने एक रमणीय बाग फैला हुआ था। और बहुत गहरे नीले रग का आसमान नजर आ रहा था।

रेखा जब दरवाजे में से गुजरकर अन्दर पहुची' तो उसे अहसास हुआ कि वह बहुत बडे मेदान में आ गई है। सामने एक बहुत बडी इमारत थी । उसके बाद दरवाजे ही दरवाजे थे। ये शायद धरो के दरवाजे थे । चारो' त्तरफ इसी तरह के घर थे और बीच में एक बहुत खूबसूरत हरा भरा बाग था ।

रेखा को अभी तक एक भी व्यक्ति नजर नहीं आया था l काला चिराग सामने वाले भवन की तरफ बढ रहा था ।

"इतनी बडी. जगह, इतनी, खूबसूरत जगह और ऐसी बीरान और निर्जन ।। आदमी तो आदमी यहा नजर नहीं आ रहा था। ' ' रेखा ने चारों तरफ देखते हुए चकित भाव से कहा।

"देखना चाहती हो?" काले चिराग ने पूछा ।

"हा देखना चाहती हूं । यहां कुछ है देखने को?"

"बहुत कुछ है । " काले चिराग ने मुस्कराकर कहा--"अपनी आखें बन्द करो जरा I" यह कहकर अपने हाथ का साया उसके सिर पर डाला।
 
रेखा ने उसकी हिदायत पर आखें बन्द की तो उसके होश उड गए। उसने घबराकर फोरन आखे खोल ली।

उसने बद'आखो से एक होश ~उडा देने बाले जादुई मजर देखा था। चारों तरफ बडी-बडी विशाल आकार चमगादड़े नज़र आई थी। कुछ उड रही थीं और कुछ उलटी लटकी हुई थीं । हल्की रोशनी थी और एक बडी पहाडी खोहनुमा हाल था ।

आखै खोली तो फिर वही रमणीय खुशगवार मजर था। चमकीली धूप, खूबसूरत-सा बाग, चारों तरफ दरवाजे ही दरवाजे और बिल्कुल सन्नाटा।

”यह क्या था?" रेखा ने हैरत और बदहवासी से भरे स्वर में पूछा।

' 'अपनी आखें दोबारा बन्द करो । " काले चिराग ने कोई जवाब न देकर हिदायत दी और इस बार उसने अपने हाथ का साया उसके सिर पर न डाला । वह वेसे ही साकत खडा. रहा था।

और रेखा ने डरते-डरते दोबारा आखें' बद' की तो उसे अंघेरे के सिवाय कुछ नजर नहीं आया। उसने फोरन आखें' खौल दीं और बोली

"अब तो कुछ नजर नहीं आया?"

' 'फिर देखना चाहती हो? " काला चिराग ने मुस्कराकर पूछा ।

" नहीं... । ' ' रेखा उसका आश्य समझ खौफनाक हौकर बोली--"लेकिन यह था क्या? "

"आओ मेरे साथ ।।" काला चिराग आगे बढने लगा। और उस दृश्य को अपनी नज़र का फरेब समझकर भूल जाओ। और आइन्दा इस तरह कीं फरमाइश जरा सोच-समझ कर करना । यह हमारी बस्ती है। हमारी दुनिया है। यहां वह होता है जो वहा नहीं होता। ' '

वह बोले गया और पता नहीं क्या कह रहा था । रेखा क्रो क्या समझना चाहता था। रेखा ने उससे उलझना उचित न समझा और खामोशी से उसके पीछे चलती रही ।

फव्बारे से गुजराकर वे बडी. इमारत के दरवाजे पर पहुच गए। यह बड़े-बड़े सुर्ख पत्थरों की इमारत थी। बिल्कुल काला और चमकदार दरवाजा था और उस पर जगह-जगह पीतल कीं मोटी कीलें लगी हुई थीं । इस विशाल फाटक-नुमा दस्वाजे में एक छोटा दरवाजा भी था । काले चिराग ने इस छोटे दरवाजे को पीछे धकेला तो वह खुल गया ओर वह उस दरवाजे में प्रवेश कर गया । उसने रेखा को अपने पीछे आने का इशारा किया था।

रेखा उसके पीछे-पीछे ही दरवाजे में प्रवेश कर गई थी।

इस इमारत में भी सन्नाटा व्याप्त था। एक प्राणी भी क्यों नज़र नहीं आया था। लेकिन अब रेखा में कोई सवाल करने की हिम्मत नहीं थी कि जाने जबाब में यह काला बिराग उसे क्या दिखा दे ।। वह खामोशी से उसका अनुसरण करती रही । यहां तक कि वह एक कमरे में दाखिल हो गई।

और ऐसे कमरे मे रेखा ने एतिहासिक फिल्मों में ही देखे थे । ऐसा कमरा किसी बादशाह या मल्लिका का होता था। ऊँची ऊची मसन्दे-सरसराते हुए बड़े-बड़े पर्दें झाड़ फानूस-खूबसूरत कालीन ।।

कमरे में दाखिल होकर काले बिराग ने उसे एक कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और वह खुद भी एक दूसरी कुर्सी पर बैठ गया ।

”तुमने ऊटनी पर एक थका देने बाला सफर किया है । कुछ देर आराम कर लो । मैं तुम्हारे लिए नाश्ते का प्रबन्ध करता हूं ..

यह कहकर काला चिराग उठ गया और उसका जवाब सुने दिना कमरे से निकल गया।

रेखा वास्तव में बहुत थक गई थी I

उसका अग अग दुख रहा था। भूख से ज्यादा उसे नींद सता रही थी। बह कुर्सी से उठकर एक कोने में पडे विशाल शाही पलग की तरफ बढी । और जब वह उस पर लेटी तो ऐसा लगा जेसे गुलाब क्री पतियों पर लेट गई हो I

इस कदर मुलायम नर्म बिस्तर था उसके तकिये महक रहे थे। बिस्तर पर लेटते ही उसकी आखें बद होने लगी । वह सोना नहीं चाहती थी । क्योंकि काला चिराग नाश्ते का बन्दोवस्त करने गया था और वह आता ही होगा I

. लेकिन नींद ने उसे कुछ और सोचने का अवसर नहीं दिया और उसे अपनी आगोश में ले लिया।

यूं काला चिराग जब नाश्ते की तश्तरी लेकर आया तब तक रेखा गहरी नींद सौ चुकीं थी । उसने अर्थपूर्ण मुस्कराहट के साथ सोईं हुई रेखा क्रो देखा। प्लेट भेज पर रखी और खामोशी सै कमरे से निकल गया ।

रेखा वेहद थकी हुई थी । वह दिन ढले तक सोती रही, फिर जब उसकी आख' खुली तो उसने खुद को एक नये अनजान कमरे में पाया। उसकी नजरें सबसे पहले छत् से लटके फानूस पर पडी किं उसने विशाल शाही पलंग' क्रो देखा । विवेक जागा, हवास बहाल हुए तो उसे याद आ गया कि वह कहां और कैसे है ।

वह शायद बहुत देर तक सोती रही थी । वह हडबडाकर.. उठी और अब उसकी निगाह मेज पर रखी तश्तरी पर पडी। तश्तरी में फल और पानी और गिलास रखै थे। उसे ख्याल आया कि अब नाश्ते और खाने का वक्त बीत चुका था । सोकर जागने के बाद अब उसका मन-मस्तिष्क शान और सयत थे । मन नडा-धो कर कपडे बदल लेने को किया और उसने अपने बैग से अपने कपडे निकाले और कमरे में चारों तरफ नजरें दौडाईं_ क्रि बाथरूम किधर है।

और अभी वह अनुमान ही लगा रही थी कि दरवाजा खुला और काला चिराग अन्दर दाखिल हुआ। वह रेखा को खडे हुए देखकर मुस्कास्या और बोला---

"कहा जाना चाहती हौ?"

"जरा मुह्र हाथ धोकर ताजा होना चाहती है । "

"वह सामने चली जाओ। पर्दा हटाओगी दरवाजा नजर जा जाएगा ।" काले चिराग ने एक तरफ इशारा किया। उसके इशारे के अनुसार रेखा ने जव पर्दा हटाया तो बहा दरवाजा था I वह दरवाजा खौलकर अन्दर दाखिल हो गई।

और अन्दर कदम रखत्ते ही वह हर तरफ खुद को ही देख रही थी I

" दाएँ बांए,, सामने पीछे, छत पर, फर्श पर कहां नहीं थी वह I हर तरफ दर्पण लगे हुए थे। छत और फर्श पर भी शीशे थे, यहां तक कि दरवाजे की पीठ पर भी आईना था । बंद होने के बाद दरवाजा शीशे की दीवार में हो गया था। यह एक वेहद खूबसूरत हमाम था। फ़र्श पर एक हौज था जिसकी लम्बाई छ: फुट और चौडाई… चार फूट रही होगी। और इसकी गहराई भी चार फुट थी । हौज की सतह नीले रग' की थी इसलिए हौज और इसका पानी नजर आ रहा था। करना आईनों कीं वजह से इतने अक्स दिखाईं दे रहे थे कि कुछ पता नहीं चलता था कि कौन-सी चीज क्रोन-सी जगह है ।

रेखा जब इस आइने वाले हमाम से नहाकर निक्ली तो बिल्कुल फ्रेश हो चुकीं थी । काला चिराग कमरे में मोजूद था। रेखा इस वक्त उस ताजा खिले गुलाब की मानिन्द ही लग रही थी जिस पर शबनम क्री बूदे पडी. हो । उसका सोन्दयं मत्र'-मुग्ध करने वाला था ।

काला चिराग उसे अपलक देख रहा था।

रेखा ने अपने खुल बालों में तौलिया लपेटा हुआ था। वह काला बिराग की शोख भरी निगाहों को नजर अंदाज' करते हुए कुर्सी पर बैठ गई और मेज पर रखी चीजों को देखने लगी ।

अब उसे तेज भूख लग रही थी।

' 'अब तुम क्या खाओगी? ' ' काला चिराग उठकर मेज की तरफ बढा I नाश्ते और दोपहर के खाने का वक्त तो निकल चुका है I अब तो शाम कीं चाय का वक्त है। ' '

''मेज पर इतना कुछ मोजूद है कुछ भी खा लूंगी। आप मेरी चिन्ता न करें। ' ‘

' 'खाना लाए हुए भी कई घन्टे हो गए। देख लो ठण्डा तो नहीं हो गया I "

"कोई बात नहीं जैसा भी है खा लूगी । ' ' यह कहते हुए रेखा ने र्डोंगे से ढक्कन… उठाया तो खाने से भाप उठ रही थी। वह बोली--" अरे यह तो गर्म है । बिल्कुल गर्म है । क्या आप दोबारा लाए है?"

_ "नहीं तो, दोपहर ही को लाया था।। " काले बिराग ने भोलेपन के साथ कहा I

रेखा ने अपने मतलब का खाना प्लेट मैं निकाला और खाने लगी I खाना गर्म ही नहीं अत्याधिक स्वादिष्ट भी था। खाना खा, रेखा ने चाय ली । चाय भी ताजा और गर्म थी-जेसे अभी-अभी बनाकर लाई गई हो।

रेखा ने काले चिराग से चाय की पेशकश की...लेकिंन उसने यह कहकर इकार कर दिया-"मैं चाय नहीं पीता I "

रेखा खाने-पीने से हुई तो काला चिराग ने उठकर बर्तन समेट लिए । रेखा ने कहना भी चाहा कि मैं उठाती हूँ,, लेकिन कह नहीं सकी। काले चिराग ने सारे बर्तन एक साथ उठाए और दरवाजे से बाहर निक्ल गया।

उसकी अनुपस्थिति से फायदा उठाकर रेखा ने अपने सिर से तोलिया खोला और अपने बाल सम्भालने लगी।

यह कैसा तिलस्म था। केसी जादुई दास्तान थी । वह कहा से कहा पहुच गई थी। वह धर से अपने भाई इन्द्रजीन क्रो तलाश करनै के सकल्प के साथ निकली थी । वह एक ही रात में अपने भाई के निकट पहुच गई थी I वह झोंपडी में घुसकर भाई को देखना चाहती थी। लेकिन काला चिराग वहा रूकावट बनकर पहुच गया था I रेखा को जल्दबाजी दिखाने से रोक दिया था I

जाने क्यों किया था उसने ऐसा? वह रेखा से पहले कोई बात करना चाहता था? शायद उसे उसके भाई के बारे में ही कुछ बताना चाहता था। और अब तक इस विषय में कोई बात नहीं हुई थी तो इसका कारण भी यही था कि रेखा दिन भर सोती रही थी।

रेखा अब तरो ताजा और बिल्कुल चाक-चौबन्द थी।

उसने सोचा कि काला चिराग वापस आए तो उसके आते ही पूछेगी कि मामला क्या है? उसका भाई इस अज्ञात इलाके में में क्यों है? वह क्रिस हालात में है कि उसे एक नजर देखने भी नहीं दिया गया।

इन्हीं उलझी-उलझ सोचो' के साथ रेखा उसका इत्तजार' का रही थी । लेकिन वह काफी देर तक भी बापस नहीं आया तो रेखा उठी । उसने सोचा कि बाहर निक्लकर देखै। बाहर खूबसूरत बाग था। शाम का वक्त था I बह बाग में टहल सकती थी।

रेखा ने दरबाजा खौलकर बाहर निक्लने की कोशिश की I लेकिन दरवाजा न खुला । शायद बाहर से बन्द था । रेखा ने कुछ सोचा और उस अन्दरूनी दरवाजे कीं तरफ बढ गई, जिससे काला चिराग अन्दर गया था । और वह अभी तक लौटकर नहीँ आया था।

लेकिन यह दरवाजा भी बन्द निकला ।

दरवाजे बन्द क्यों है ?? क्या उसे कैद कर लिया गया है' अपनी इस सोच पर वह हसी । वह कोई शहजादी थोडे ही है जिसे कोई जिन्न या देव अपने तिलस्मी महल में कैद कर ले।

यह सच था कि रेखा कोई शहजादी न थी लेक्लि उसका रूप योवन परीलोक की परियो को भी मात देने वाला था। फिर यह रहस्य काला चिराग बो भी जिन्न न सही जिन्न जैसी चीज जरूर था। अनूठी शख्यिथत थी उसकी। कहीं बो सचमुच ही तो उसे कैद करके नहीं चला गया ।

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