• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

A Horror Novel - स्वाहा complete

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
"सात दिन बाद आमावस की रात है। यह अमल आज सै शुरु होगा और आमावस की रात को पूरा होगा। आमावस की रात तू जगल में होगा डर मत, मैं भी रहूगा तेरे साथ । ठीक आधी रात के वक्त एक खास अमल करना पडेगा और उसके बाद यह सिद्धि पाकर तू एक बडा, जादूगर बन जाएगा। पर मन्ने एक बात बता--!" वह कुच्छेक क्षण इन्द्रजीत को घूरता रहा और फिर पूछा-"बडा जादूगर बनकर तू मौहै (मुझें) छोडकर तो नही चला जाएगा।"

' 'केसी बात करते बाबा। ' ' इन्द्रजीत जल्दी से बोला… ' 'मैं तुम्हें छोड़कर कहा और क्यों कर जाऊगा?"

"'तुम्हारा क्या भरोसा, इन्द्र?" कटारी उसके करीब आकय धीरे से बोली I इतने धीरे कि राजूमदारी भी न सुन पाया।

' 'ला अपना हाथ ओगे बढा... ।" राजूमदारी बोला- "और तू...कटारी तू पीछे हट जा… ।"

' 'यह ले बाबा... । ' ' कटारी पीछे हटते हुए बोली… ' 'हर कोई मुझें पीछे हटाता है। ' '

राजूमदारी ने कटारी की बात पर कोई ध्यान नही' दिया, लेकिन इन्द्रजीत ने मुडकर. उसे जरूर देखा। राजूमदारी ने इन्द्रजीत का हाथ थाम लिया था और अब उसने उसके अंगूठे' पर तेज धार चाकू की नोक से एक हल्का सा चीरा लगाया I चाकू की धार बहुत तेज थी फोरन ही खून उबल आया।

उसने अपने गले से उल्लू का पंजा' निकाला और कोई मत्र पढते. हुए इस पजे' की एक-एक उगली' पर खून लगाया-फिर इस खून आलूदा पजे को इन्द्रजीत के माथे पर फेरा, उसके माथे पर खून की लकीरें बन गई ।

"बस, जा इन्द्र-कमरे में जा। अब तन्ने (तूने) कमरे से सुरज निकलने से पहले नहीं निक्लना है। समझ गया ना, मेरी बात । चाहे तजे कोई कितना ही पुकारे-देख, अगर उसकी पुकार पर तू बाहर निक्ल गया तो इतना जान ले कि अंधा हो जाएगा।"

"ठीक है, बाबा! मैं अन्दर जा रहा हूँ अब सुबह ही बाहर निकलूंगा । ' ' इन्द्रजीत धीमे मे बोला ।

राजूमदारी फितरत से ही अम्बार था। यह सारा चक्कर उसने इन्द्र को जादू सिखाने के लिए नहीं चलाया था। यह अमल तो उसने इन्द्र को पूर्णत अपना गुलाम और आज्ञाकारी बनाने के लिए चलाया था I

हकीकत यहीँ थी कि कटारी ने इन्द्रजीत को राजकुमारी नयना से मिलते हुए देख लिया था और यह इतला उसने अपने बाप राजूमदाऱी को भी दे दी थी I राजूमदारी ने दुनिया देखी थी ।

काले इल्म का भी माहिर था । उसने अदाजा लगा लिया था कि ये तोता कुछ ही दिनों में उडने लायक हो जाएगा I सो, उसने न केवल इन्द्रजीत के पर काटने बल्कि उसे एक बडे पिंजरे' में बद करनै का बन्दोबस्त कर लिया था ।

हालात सजीदा' हो चले थे।

इधर राजूमदारी इन्द्रजीत को और अधिक किद में रखने की कोशिश कर रहा था तो उधर योगी दयाल ने उसै मत्र पाश से मुक्त कराने का अमल शरू कर दिया था।

योगी दयाल ने बाजार सै एक मीटर काला कपड़ा, एक नया उस्तरा, एक कोरी मिट्टी की हंडिया' खरीदी । फिर रात में उसने अपनी बस्ती से निक्लका एक पीफ्त की जड में छोटा-सा गड्डा खोदा, ह्रडिया' को उसमें रखकर देखा । ह्रडिया उसमें पूरी तरह नहीं आई। उसने गड्डे को थोडा' सा और बड़ा किया I जब ह्रडिया' पूरी तरह से गड्डे मै बैठ गई तो वह गड्डे क्रो वैसे ही खुला छोडकर, हडिया' को अपने साथ ले आया ।

घर में आका उसने दरवाजा अंदर से बद' किया । जलती लालटेन क्रो जमीन पर रखा और फिर हडिया', उस्तरा और काले कपडे को लेकर वह जमीन पर आसन जमाकर बैठ गया । ह्रडिया' को औधा करके उसने कुछ पढना शुरू किया। वह रूक-रूक कर उस्तरे को भी हडिया. पर मारता जाता था।

'फिर उसने हडिया' को सीधा किया…काले कपडे को अपने कंधे पर डाला। उस्तरा हाथ में पकडा और फिर दूसरे हाथ सै लालटेन कीं चिमनी उठाकर उसमें फूक' मारी। जलती लालटेन भडककर. बुझ गई। कमरे में पूर्ण अंधेरा छा गया l

इस अंधेरे… में हो योगी दयाल ने अपने कंधे से काला कपड़ा उतारा और तेज उस्तरे सै उसके तीन टुकडे कर दिए I फिर इस काले कपडे के दो टुकड़ों को और उस्तरे क्रो ह्रडिया में डाल दिया ओर तीसरे टुकडे को हडिया' के मुह' पर बांध दिया ।

और फिर... ।

अंधेरे में ही हडिया को दौनों हाथों में उठाकर घर से निकल पडा, ।

वह कुछ पडता… जा रहा था और हंडिया पर फूकता जाता था। यहाँ तक क्रि वह बस्ती से बाहर उस पीपल के नीचे पहुच गया जहां उसने कुछ देर पहले हंडिया' के आकार के बराबर गड्डा खोदा था।

योगी दयाल ने हडिया को उस गड्डे मै उतारने सै पहले अपने बाए हाथ सै गड्डे को टटोला, गड्डे में पानी भरा हुआ था । गड्डा पानी से भरा महसूस करके उसे बडी… खुशी हुई। यह प्रमाण था इस बात का कि उसका अमल सफलता की तरफ अग्रसर है ।

योगी दयाल ने खुश हो हडिया उस गड्डे में रख दी। काफी पानी उस हडिंया' में चला गया । और अब उसने उस गड्डे को मिट्टी से अच्छी तरह पाट दिया ।

गड्डे में मिट्ठी डालने के बाद उसने मिट्टी में अपनी एक उगली घुसेडी, और फिर लगभग आधे धन्टे तक उक्रडू' बैठा मत्र पढता, रहा। और फिर वह उठकर अपने घर आ गया और आराम से सो गया।

उसने इन्द्रजीत क्रो मत्र'-पाश सै मुक्ति का अमल कर दिया था।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

और फिर अगले दिन ।

प्रात इन्द्रजीत उठा तो वह प्रफुल्ल और प्रसत्रचित था । वह कमरे से वाहर आया। आगंन में चारपाई पर बैठी कटारी सब्जी काट रही थी । राजूमदारी अभी अपने कमरे में पडा सो रहा था।

इन्द्रजीत कटारी के पास आकर बैठ गया । कटारी का माथा ठनका । आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ था। कटारी के करीब बैठना तो दूर की बात वह कटारी को नजर भरकर देखता भी नहीं था।

सपेरे योगी दयाल ने इन्द्रजीत को हिदायत दी थी कि वह किसी भी तरह राजूमदारी के गले सै वह उल्लू का पंजा निकाल ले, जो राजू मदारी के तोर पर अपने गले में पहने रहता था । यह काम इन्द्र स्वय' नहीं कर सकता था । रात को उसे ख्याल आया था कि वह यह काम कटारी से करवाने की कोशिश क्यों न करे कि अगर वह कटारी पा थोडी-सी तबब्जो दे दे...उस पर यह जाहिर करे कि उसे उससे मुहब्बत होती जा रही है-और फिर वह कटारी के सामने उल्लू का पंजा अपने गले में डालने की इच्छा जाहिर करे तो कटारी यकीनन उसे खुश करने के लिए अपने बाप के गले से वह पंजा' निकालकर उसके हवाले कर देगी ।

यही सब सोचकर वह आज कटारी के निकट चारपाई पर आ बैठा था । नहीं जानता था कि वह जिन लोगों को फरेब देने चला है-बौ कैसे शातिर लोग हैँ। उन्होंने' तौ पहले ही उसके गिर्द जाल फैला रखा था और अपने बाप के आश्वासन के सदके ही कटारी के सपनों में रग भर आए थे। उसे विश्वास था कि वह वक्त ज्यादा दूर नहीं जब इन्द्रजीत अपना अतीत भूल जाएगा। उसकी याददाश्त जादू की भूल भुलैया में गुम हो जाएगी। फिर इन्द्रजीत उसका होगा और कोई उसे उससे न छीन पाएगा।

बहरहाल, इं-द्रजीत चारपाई पर उसके वेहद करीव आ वैठा तो कटारी का ध्यान टूट गया और दराती' से साग काटते हुए उसका हाथ बहक गया उसकी उंगली कट गई I

सी.....ऽऽऽऽ ! ' ' करके उसने साग परात में डाल दिया और अपनी ऊगली पकड़कर देखने लगी-जिससे झल झल खुन बहे जा रहा था I

!अरे यह तुमने क्या किया... । " इन्द्रजौत ने फौरन उसका हाथ थाम लिया और अपने अगूठे' से उसके जख्म को दबा दिया ।

इस प्यार भरे व्यवहार ने कटारी पर नशा कर दिया I वह अपनी पीड़ा भूल गई। उसने अपनी आखे बंद कर लीं । उसका जी चाहा कि इन्द्रजीत यूं ही सदियों तक उसका धाव दबाए बैठा रहे।

' 'अरे यह तो बहे जा रहा है । " इन्द्रजीत ने अगूठा' हटाकर देखा 'ठहरो में अंदर से कोई कपड़ा लाता हूँ। पानी में भिगोकर बांध दुगा तो खून बहना बद' हो जाएगा।"

"तुम मत उठना इन्द्र बहने दो खून । थोडा सा खून वह जाएगा तो क्या हो जाएगा। खून मेरे अन्दर बहुत है । कटारी ने अपनी आखें खौलकर कहा।

“पागल हुई हो। ' ' वह उठने लगा।

' 'इन्द्र, एक बात बताओ। ' ' कटारी ने उसे उठने नहीं दिया I

"हा , बोलो... । "

' 'देख, सच-सच बताना । ' ' कटाऱी इकरार करवाया।

"चलो, ठीक है सच-सच कहूंगा । " इंद्रजीत ने इकरार किया ।

' 'तुमने कभी प्यार किया' है? ' ' कटारी ने पूछा ।

“हा, किया है । " इन्द्रजीत ने उसे प्यार भरी नजरों से देखते हुए कहा "लेकिन यह मत पूछना-किससे? ' '

' 'इन्द्र, एक बात बताओ। ' ' कटारी ने उसे उठने नहीं दिया I

"हा , बोलो... । "

' 'देख, सच-सच बताना । ' ' कटाऱी इकरार करवाया।

"चलो, ठीक है सच-सच कहूंगा । " इंद्रजीत ने इकरार किया ।

' 'तुमने कभी प्यार किया' है? ' ' कटारी ने पूछा ।

“हा, किया है । " इन्द्रजीत ने उसे प्यार भरी नजरों से देखते हुए कहा "लेकिन यह मत पूछना-किससे? ' '

.......
 
' 'नहीं यह नहीं पूछूगी'.,.मैं जानती हूँ। " वह अर्थ पूर्ण लहजे में बोली।

"तुम जानती ही?" इन्द्रजीत घबराया।

"न सिर्फ जानती हुँ, बल्कि पहचानती भी हूँ। ' ' वह मद-मद मुस्काई।

"जब जानती हो तो फिर पूछती क्यों हो? ”

’ ' 'यह जानने के लिए कि तुम कितना सच बोलते हो I खैर यह बात छोडो, I मुझे यह बताओ कि प्यार कहते किसे हैँ?" कटारी ने बातचीत का रूख बदल दिया ।

' 'प्यार उम्रकैद का दूसरा नाम है। ऐसी कैद जिसे इंसान' अपनी खुशी से कबूल करता है। ' '

”और नफरत? " कटारी की मुस्कान किंचित फैल गई थी ।

"नफ़रत मुहब्बत का दुसरा रूख है। ' ' इन्द्रजीत तुरन्त बोला--' 'एक ऐसा रूख जिसे पलटते देर नहीँ लगती... I ‘ '

और कटारी र्ने सोचपूर्ण लहजे में कहा-' 'तुम क्या यह कहना चाहते हो कि यह दौनों एक ही सिक्के के दो रुख है. . . I ' '

"हा', बिल्कुल... I वास्तव में ये दोनों एक ही हैँ, नफरत मुहब्बत नफरत, और शायद यही जिन्दगी है। ' ' इन्द्रजीत ने अपने तोर पर जवाब दिया था ।

कटारी कुछ समझी...कुछ न समझी ।

"तभी अन्दर से खासनै कीं आबाज आई। इन्द्रजीत ने फौरन उसका हाथ छोडा।। फिर वह अदर' गया और एक पट्टी ले आया और उसे पानी में भिगौकर कटारी क्री उगली' पर लपेट दिया ।

'' कटारी...ओ, काटारी! कहा है तू ब्रैटी । ' ' राजूमदारी ने पुकारा।

" मैं बाहर हूँ बाबा। ' '

' 'ओह जरा म्हारा हुक्का तो ता (सुलगा) जाकर। "

' 'अच्छा, बाबा। ' '

‘ 'तू रहने दे-मैं देता हूँ हुक्का ताजा करके।" ' इन्द्रजीत बोला।

कटारी की आखों से अनुराग छलकने लगा।

यूं नाटक शुरु हो गए थे। राजूमदारी अपने काले इल्म की कारवाईयो में लगा रहा. उधर योगी दयाल अपने मंत्र' पढ़कर फूकता रहा । इस तरह तीन दिन बीत गए I तीन दिन बाद आमावस की रात थी।

योगी सपेरा दयाल पीपल के मेड के नीचे दवाई अपनी हडिया निकालकर इधर जगल में आगया था। डाईवर रघुवीर ने उसके लिए खाने पीने का सामान उपलब्ध करा दिया था इतना सामान कि अगर वह जगल में सप्ताह दस दिन भी अपनी साधना और अनुष्ठान में लगा रहता तब भी वह सामान खत्म न होता I योगी दयाल ने एक घने प्रेड़ के नीचे अपना छोटा-सा खेमा लगा लिया था । सापो कीं कई पिटारियां वह अपने साथ लाया था। इन पिटारियो में बिभिन्न प्रजातियों और किंस्म-किंस्म के साप' बद' थे । इनमें एक साप बहुत खतरनाक था-इतना खतरनाक कि अगर महज फुन्कार' मारे तो घास जल जाती थी ।

आमावस की रात शनिवार व रविवार के बीच की रात थी ।

शनिवार को इन्द्रजीत जगल' का चक्कर लगा गया था । उसने योगी दयाल को बताया था कि वो राजूमदारी के गले से उल्लू का पंजा प्राप्त करने में नाकाम रहा है ।

योगी दयाल ने उसे तसल्ली दी कि वह फिक्र न करे राजूमदारी अब उसका कुछ न बिगाड सकेगा।

आमावस की रात शनिवार व रविवार के बीच की रात थी ।

शनिवार को इन्द्रजीत जगल' का चक्कर लगा गया था । उसने योगी दयाल को बताया था कि वो राजूमदारी के गले से उल्लू का पंजा प्राप्त करने में नाकाम रहा है ।

योगी दयाल ने उसे तसल्ली दी कि वह फिक्र न करे राजूमदारी अब उसका कुछ न बिगाड सकेगा।

योगी दयाल ने राजूमदारी का इस्तेमाल किया कपडा. मंगवाया' था। इन्द्रजीत उसकी एक धोती उठा लाया था और यह घोती उसने योगी दयाल के हवाले कर दी थी।

इन्द्रजीत ने उसे राजूमदारी की कार्रवाईयों से अवगत कराते हुए यह भी बताया था कि आमावस की रात को वह ओर राजूमदारी भी जगल' में होंगे। यह सुनकर योगी खुश हो गया था और उसे अपनी कामयाबी का शत-प्रतिशत विश्वास हो गया था ।

. उधर राजकुमारी नयना एक एक दिन गिनकर बिता रही थी । उसे इन्द्रजीत की मुक्ति की बेचैनी से प्रतीक्षा थी l तय यह हुआ था किं वह रविवार कीं शाम को इन्द्रजीत क्रो लेने के लिए आएगी I उसने इन्द्रजीत सै कहलवाया था कि वो अपना सारा सामान साथ लाए और निश्चित समय पर ओर पुल के निक्ट निश्चित स्थान पर पहुच' जाए । जहा' से नयना उसे फोरन बहराम नगर ले आएगी। और फिर उसकी नईं और खुशहाल जिन्दगी की शुरूआत होगी ।

उधर कटारी को भी आमावस की रात का इन्तजार कम बेचैनी से न था। उसे पूरा यकीन था कि इस आमावस की रात के बीतते ही इन्द्रजीत उसके ललाट पर झूमर बनकर सज जाएगा और फिर एक बहारों भरे और रगीन सफर कीं शुरूआत होगी।

यूं ह्रर व्यक्ति ही अपने अपने दाव पर लगा रहा था । आशाएं व कामनाएं मचल रही थीं और वक्त की धारा वह रही थी ।

पर यह अटल सच भी अपनी जगह था कि आदमी सोचता कुछ है और होता है ।

इंसान जो सोचे, अगर वह हो जाए तो फिर भाग्य अपना खेल केसे दिखाए।

सब अपने-अपने खेलों में लगे हुए थे। और तकदीर जेसे दूर बैठी अपना ही जाल बुन रही थी।

आमावस की रात...अघेरी और काली रात...जगल का होलनाक सन्नाटा...योगी दयाल व राजूमदारी एक दूसरे से बेगाने...अपने अपने कलापो में व्यस्त ।।

योगी सपेरे दयाल ने एक निश्चित वक्त पर हंडिया का मुह' खोला । अन्दर से काले कपडे के दौनों टुकडे निकाले, उन्हे घरती पर कुछ इस तरह रखा कि वे सलीब का रूप अख्तयार कर गये, यूं समझो कि आदमी का ढाचा बन क्या । इसके बाद योगी दयाल ने उस्तरा खोलकर -उस कपडे पर उस्तरे के वार किये-और यूं कपड़े को चीरकर उसी जगह ज़मीन में गाड़ दिया। और फिर उस्तरे पर हडिया औधी रख दी।
 
वह यह अनुष्ठान बडी निष्ठा और एकाग्रता के साथ कर रहा था। उसके हिलते होंठ इस बात का प्रमाण थे कि वह कोई मत्र भी पढ रहा है। यह सब करने के बाद उसने वह काला नाग पिटारी सै निकाला---जिसकीं फुकार से ही घास जल जाती थी ।

यह काला नाग पिटारी से ही निकलते ही, फन फैलाकर योगी दयाल के सामने ख़ड़ा हो गया ।

योगी दयाल ने राजू मदारी की धोती अपने हाथ में पकडकर. उसके सामने लहराई। काले नाग ने धोती देखते ही उस पर फन मारा । धोती पर फौरन ही एक काला धब्बा पड गया।

योगी दयाल ने कोई मत्र पढते, हुए यह अमल तीन बार दोहराया और फिर यह धोती सामने की तरफ उछाल दी। वह काला नाग फौरन ही उस धोती की तरफ लपका और फिर जगल की जमीन पर बडी तेजी से फैलने लगा... ।

मत्र'-पाश से बधा काला नाग अच्छी तरह जानता था कि उसने क्या करना है और किधर जाना है।

और यह बात तो राजूमदारी भी अच्छी तरह जानता था कि उसे क्या करना है। इन्दजीत को पूर्णत: अपने अधीन रखने के लिए छ: दिन पहले उसने जो काम प्रारम्भ किया था उसे आज रात पूरा हो जाना था ।

राजूमदाऱी रीछ की खाल पर बैठा काले जादू के किसी मत्र का जाप कर रहा था । इन्द्रजीत उससे करीव पाच' कदम फासले पर एक बड़े से पत्थर' पर बैठा था। चारों तरफ अंधेरा था।

इन्द्रजीत प्रसन्न और आत्म विभोर था कि आज की रात उसकी इस कैद की आखिरी रात है ओर आने वाली सुबह इन अदृश्य के कटने

की खबर लेकर आएगी I एक तरफ वह स्वतन्त्र हो जाएगा और दूसरी तरफ राजू मदारी अपनी जिंदगी का सबसे कीमती जादू उसे सिखा देगा।

इन्द्रजीत को अब बहुत से जादू आते था लेकिन इस अविश्वसनीय जादू का महत्व कुछ और था ।

आकाश से कटकर गिरते मानव अंग और देखकर लोग सांस तक लेना भूल जाया करते थे और इस खेल के बाद उनपर नोटों की बारिश शुरू हो जाती थी ।

बैसै, इन्द्रजीत को धन दौलत की क्या परवाह थी । वह करोडो. की जायदाद का मालिक था। पर इन जादुओं और सिद्धियों में भी उसकी दिलचस्पी बढती, ही रही थी। उसने बहुत कुछ सीखा था और बहुत कुछ सिखने की चाह थी।

और अब तो वह पिछली कई रातों से अपनी मुक्ति के और राजकुमाऱी नयना के साथ दिल्ली अपने पिता के पास पहुच चुके होने के सपने देखता रहा था ।

उस बेचारे को क्या मालूम था कि आगे क्या होने वाला है?

काश । उसे मालूम होता कि जिस कैद से मुक्ति के वह ख्वाब देख रहा है-वह्र उससे भी कही बदतर और यातनामय कैद में चला जाएगा I

पत्थर पर बैठे बैठे और सुहाने सपने देखते देखते ऊघ सी आ गई।

उसी क्षण कुछ हुआ...ओर जो कुछ हुआ...वह उसका होश उड़ा देने के लिए काफी था।

राजूमदारी अचानक ही, किसी जानवर की तरह डकारा था-जेसे किसी ने उसकी गर्दन पर छूरी फेर दी हो। इन्द्रजीत चौका और उसने आखें' फाडकर राजूमदारी की तरफ देखा, मगर उसे कुछ नजर नहीं आया I रीछ की खाल...फिर उस पर बैठा राजूमदारी खुद रीछ जेसा…पीछे काले पेड घना घनघोर अंधेरा...ऐसे में भला क्या नजर आता।

”क्या हुआ, बाबा? " वह पत्थर से उठकर खडा हो गया ।

' 'जल्दी कर इन्द्र... । मेरे पास आ रे छोरे! " वह पीड़ा की तीव्रता से कराहते हुए बोला।

इन्द्रजीत को इतना अदाजा' तो था कि राजूमदाऱी कहा बैठा हे-उनके बीच महज पाच' कदम का फासला था लेकिन इन्द्र की समझ में नहीं आ रहा था कि राजूमदारी के साथ हुआ क्या है I शायद मत्र उल्टा पड गया है।

बहरहाल, वह जव अन्दाजे से राजूमदारी के करीव पहुचा' तो उसके पाव' की ठोकर इन्द्र को लगी और राजू मदारी ने फोरन ही उसका पाव घसीट कर उसे अपने ऊपर गिरा लिया और उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बडी कठिनाई से कहा---' 'देवा मदद...देवा आ... । "

' 'क्या हुआ बाबा, कुछ बोलो तो... I ' ' उसने अपना हाथ छुडाकर राजूमदारी के जिस्म को टटोलकर देखना चाहा-लेकिन राजूमदारी की गिरफ्त मजबूत थी । उसने इन्द्रजीत का हाथ न छोडा।

' 'देवा मदद…देवा आ... । ' ' उसने फिर कहना शुरू किया |

' 'बाबा, ओ बाबा! कुछ बताओ तो… I "

‘ 'अब का (क्या) बताऊ' रे लोमडी के बच्चे...त्तन्ने खूब धोखा दिया... । ' '

' 'यह क्या कह रहे हो बाबा मैं भला तुम्हे क्यो धोखा दुगा । तुम ही तो मुझे यहा लाए हो इस जगल... ।" इन्द्रजीत की समझ में वास्तव में ही कुछ न आ रहा था ।

"और वो जो तेरा बाप उधर बैठा है...रे... । उसे कौन लाया इधर । सब जाण गया सू मैं। देवा की सौगन्ध सब जैणि गया सू मै। पर याद रख तन्ने मैं आजाद नई होने दूगा.. । देबा...ओ देबा...मदद ।" राजूमदारी ने फिर जेसे किसी को मदद के लिए पुकारा था I

राजू मदारी ने उसका हाथ बडी. मजबूती से पकड लिया था और रह-रह कर बस यही बात दौहराये जा रहा था I ‘ ' देवा आ...देबा मदद...।"

राजूमदारी का हाथ काफी बडा, था I बहुत सख्त था। उससे हाथ मिलाते वक्त यही अहसास होता था कोई पत्थर का टुकडा. पकड लिया हो I पर अब इस वक्त...बो जेसै-जेसे देवा को मदद के लिए पुकारता जाता था-उसका हाथ नर्म पडता… जाता था।

'देवा काली...देवा मदद...देवा आ.. . I ' ‘ राजूमदारी निरन्तर बोलै जा रहा था। उसकी आवाज़ में बला की पीडी, थी...दिल दहला देने बाली व्यथा थी ।

और फिर... कुछ ही देर बाद इन्दजीत को महसूस हुआ जेसे उसका हाथ किसी औरत के हाथ में आ गया हो । वह एक बहुत ही नर्म हाथ था मासल व रेशमी।
 
राजूमदारी की पीडा भरी आबाज आ रही थी-- " देवा...अब यह तेरे हवाले । में जाता हूँ मैं जाता..।"

राजूमदारी की आबाज धीरे-धीरे दूर होती जा रही थी । यहां तक कि बिल्कुल ही धीमी पड… गई।

फिर एक झटका-सा लगा। वह नर्म, मुलायम और मासल' हाथ इन्द्रजीत के हाथ से छूट गया। राजूमदारी अपने साथ लालटेन लाया था ।

उसने कहा था कि जब अनुष्ठान और जाप ख़त्म हो जाएगा ओंर इन्द्रजीत क्रो जादू आ जाएगा तब लालटेन रास्ता दिखाने के काम आएगी ।

इन्द्रजीत ने आखे फाडकर और हाथों से टटोलकर लालटेन तलाश की l जेब सै माचिस निकालकर लालटेन जलाई। फिर उसने लालटेन अपने हाथ में पकडकर लौ जरा-सी ऊंची' की और लालटेन कीं मध्यम रोशनी में उसे जो कुछ नजर आया वह उसके होश उडा. देने के लिए काफी था।

उसके सामने राजूमदाऱी की लाश थी । वह बडी वीभत्स और भयानक लाश । उसकी लाश पिघल चुकी थी...पिघल रही थी । लाश के गिर्द खून फैला हुआ था । इन्द्रजीत ने अनुमान लगा लिया कि उसे किसी वेहद जहरीले और खतरनाक साप ने काटा है ।

साप का ख्याल आते ही वह फोरन. लाश से पीछे हट गया । उसने लालटेन की मध्यम रोशनी में ही इधर उधर नजरें दोडार्ड। आस-पास किसी साप' का अस्तित्व नहीं था । अब उसने यहां ठहरना उचित न समझा।

वह लालटेन हाथ में ले योगी सपेरे दयाल के खेमे की तरफ चल दिया l

'देवा काली...देवा मदद...देवा आ.. . I ' ‘ राजूमदारी निरन्तर बोलै जा रहा था। उसकी आवाज़ में बला की पीडी, थी...दिल दहला देने बाली व्यथा थी ।

और फिर... कुछ ही देर बाद इन्दजीत को महसूस हुआ जेसे उसका हाथ किसी औरत के हाथ में आ गया हो । वह एक बहुत ही नर्म हाथ था मासल व रेशमी।

राजूमदारी की पीडा भरी आबाज आ रही थी-- " देवा...अब यह तेरे हवाले । में जाता हूँ मैं जाता..।"

राजूमदारी की आबाज धीरे-धीरे दूर होती जा रही थी । यहां तक कि बिल्कुल ही धीमी पड… गई।

फिर एक झटका-सा लगा। वह नर्म, मुलायम और मासल' हाथ इन्द्रजीत के हाथ से छूट गया। राजूमदारी अपने साथ लालटेन लाया था ।

उसने कहा था कि जब अनुष्ठान और जाप ख़त्म हो जाएगा ओंर इन्द्रजीत क्रो जादू आ जाएगा तब लालटेन रास्ता दिखाने के काम आएगी ।

इन्द्रजीत ने आखे फाडकर और हाथों से टटोलकर लालटेन तलाश की l जेब सै माचिस निकालकर लालटेन जलाई। फिर उसने लालटेन अपने हाथ में पकडकर लौ जरा-सी ऊंची' की और लालटेन कीं मध्यम रोशनी में उसे जो कुछ नजर आया वह उसके होश उडा. देने के लिए काफी था।

उसके सामने राजूमदाऱी की लाश थी । वह बडी वीभत्स और भयानक लाश । उसकी लाश पिघल चुकी थी...पिघल रही थी । लाश के गिर्द खून फैला हुआ था । इन्द्रजीत ने अनुमान लगा लिया कि उसे किसी वेहद जहरीले और खतरनाक साप ने काटा है ।

साप का ख्याल आते ही वह फोरन. लाश से पीछे हट गया । उसने लालटेन की मध्यम रोशनी में ही इधर उधर नजरें दोडार्ड। आस-पास किसी साप' का अस्तित्व नहीं था । अब उसने यहां ठहरना उचित न समझा।

वह लालटेन हाथ में ले योगी सपेरे दयाल के खेमे की तरफ चल दिया l

'देवा काली...देवा मदद...देवा आ.. . I ' ‘ राजूमदारी निरन्तर बोलै जा रहा था। उसकी आवाज़ में बला की पीडी, थी...दिल दहला देने बाली व्यथा थी ।

और फिर... कुछ ही देर बाद इन्दजीत को महसूस हुआ जेसे उसका हाथ किसी औरत के हाथ में आ गया हो । वह एक बहुत ही नर्म हाथ था मासल व रेशमी।

राजूमदारी की पीडा भरी आबाज आ रही थी-- " देवा...अब यह तेरे हवाले । में जाता हूँ मैं जाता..।"

राजूमदारी की आबाज धीरे-धीरे दूर होती जा रही थी । यहां तक कि बिल्कुल ही धीमी पड… गई।

फिर एक झटका-सा लगा। वह नर्म, मुलायम और मासल' हाथ इन्द्रजीत के हाथ से छूट गया। राजूमदारी अपने साथ लालटेन लाया था ।

उसने कहा था कि जब अनुष्ठान और जाप ख़त्म हो जाएगा ओंर इन्द्रजीत क्रो जादू आ जाएगा तब लालटेन रास्ता दिखाने के काम आएगी ।

इन्द्रजीत ने आखे फाडकर और हाथों से टटोलकर लालटेन तलाश की l जेब सै माचिस निकालकर लालटेन जलाई। फिर उसने लालटेन अपने हाथ में पकडकर लौ जरा-सी ऊंची' की और लालटेन कीं मध्यम रोशनी में उसे जो कुछ नजर आया वह उसके होश उडा. देने के लिए काफी था।

उसके सामने राजूमदाऱी की लाश थी । वह बडी वीभत्स और भयानक लाश । उसकी लाश पिघल चुकी थी...पिघल रही थी । लाश के गिर्द खून फैला हुआ था । इन्द्रजीत ने अनुमान लगा लिया कि उसे किसी वेहद जहरीले और खतरनाक साप ने काटा है ।

साप का ख्याल आते ही वह फोरन. लाश से पीछे हट गया । उसने लालटेन की मध्यम रोशनी में ही इधर उधर नजरें दोडार्ड। आस-पास किसी साप' का अस्तित्व नहीं था । अब उसने यहां ठहरना उचित न समझा।

वह लालटेन हाथ में ले योगी सपेरे दयाल के खेमे की तरफ चल दिया l

'देवा काली...देवा मदद...देवा आ.. . I ' ‘ राजूमदारी निरन्तर बोलै जा रहा था। उसकी आवाज़ में बला की पीडी, थी...दिल दहला देने बाली व्यथा थी ।

और फिर... कुछ ही देर बाद इन्दजीत को महसूस हुआ जेसे उसका हाथ किसी औरत के हाथ में आ गया हो । वह एक बहुत ही नर्म हाथ था मासल व रेशमी।

राजूमदारी की पीडा भरी आबाज आ रही थी-- " देवा...अब यह तेरे हवाले । में जाता हूँ मैं जाता..।"

राजूमदारी की आबाज धीरे-धीरे दूर होती जा रही थी । यहां तक कि बिल्कुल ही धीमी पड… गई।

फिर एक झटका-सा लगा। वह नर्म, मुलायम और मासल' हाथ इन्द्रजीत के हाथ से छूट गया। राजूमदारी अपने साथ लालटेन लाया था ।

उसने कहा था कि जब अनुष्ठान और जाप ख़त्म हो जाएगा ओंर इन्द्रजीत क्रो जादू आ जाएगा तब लालटेन रास्ता दिखाने के काम आएगी ।

इन्द्रजीत ने आखे फाडकर और हाथों से टटोलकर लालटेन तलाश की l जेब सै माचिस निकालकर लालटेन जलाई। फिर उसने लालटेन अपने हाथ में पकडकर लौ जरा-सी ऊंची' की और लालटेन कीं मध्यम रोशनी में उसे जो कुछ नजर आया वह उसके होश उडा. देने के लिए काफी था।

उसके सामने राजूमदाऱी की लाश थी । वह बडी वीभत्स और भयानक लाश । उसकी लाश पिघल चुकी थी...पिघल रही थी । लाश के गिर्द खून फैला हुआ था । इन्द्रजीत ने अनुमान लगा लिया कि उसे किसी वेहद जहरीले और खतरनाक साप ने काटा है ।

साप का ख्याल आते ही वह फोरन. लाश से पीछे हट गया । उसने लालटेन की मध्यम रोशनी में ही इधर उधर नजरें दोडार्ड। आस-पास किसी साप' का अस्तित्व नहीं था । अब उसने यहां ठहरना उचित न समझा।

वह लालटेन हाथ में ले योगी सपेरे दयाल के खेमे की तरफ चल दिया l

योगी दयाल का खेमा वहां सै अधिक फासले पर नहीं था I

इन्द्रजीत लगभग आधे घन्टे मे ही योगी दयाल के खेमे में पहुच गया। उसके छोटे से खेमे का पर्दा गिरा ना था और अंदर से मध्यम मध्यम रोशनी बाहर निकल रही थी I खेमे के अंदर से किसी किस्म की कोई आबाज नहीं आ रही थी । यही लगता था जैसे कोई भीतर नहीं है ।

इन्द्रजीत ने खेमे का पर्दा हटा, झुककर भीतर देखा तो योगी दयाल उसके भीतर धूनी रमाये बैठा नजर आया। उसके सामने काले कपडे का एक पुतला-सा बना हुआ था जिसके बीचों बीच एक उस्तरा प्रैवस्त था। और उस्तरे पर एक हाडी औंघी रखी हुई थी । दाई तरफ एक खुली पिटारी रखी थी योगी दयाल की गोद में एक बीन पडी. थी। उसकी आंखे बन्द थीं।
 
इन्द्रजीत ने जैसे ही खेमे का पर्दा हटाया। योगी दयाल ने अपनी आखें खोल दीं। दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कराएं।

' 'कहो क्या खबर लाए हो?" योगी सपेरे ने पूछा।

' 'राजूमदारी चल बसा... l ' ' इन्द्रजीत ने खबर सुनाईं।

' 'बधाई हो आजादी मुबारक हो। ' योगी दयाल अपनी खुशी दबा नहीं पाया था I

“क्या मैं आजाद हो गया? मै जहां चाहूँ जा सकता हूँ। अब तो कोई मेरा कलेजा नहीं पकडेगा?" तेजी से ही पूछा था इन्द्रजीत I

' 'हां, तुम मत्र पाश सै मुक्त हो गए हो। तुम्हारे ऊपर से जादू का असर खत्म हो गया है। इस काम के लिए मुझे बडी. मेहनत करनी पडी है । इसके अलावा मुझे अपने एक कीमती नाग से भी हाथ धोना पडा है । "

' ’वह कैसे? ' '

' 'राजूमदारी को ठिकाने लगाने की कीमत चुकानी पडी. है।"

' 'क्या मतलब. . .।।' '

"इस काम के बदले में उसने आजादी मागी थी जो मुझे देनी पडी। मजबूरी थी । राजूमदारी को ठिकाने लगानै का काम कोई ओर कर 'भी नहीँ सकता था-उस नाग के अलावा ।"

"इसका मतलब है किए मेरा ख्याल सही निक्ला।" इंद्रजीत बोला-- "उसे वाकई किसी नाग ने डसा. था? "

' 'हा और नाग भी ऐसा-जिसका डसा पानी भागना' तो दूर की बात है खुद पानी पानी हो जाए। तुमने उसकी लाश तो देख ली होगी?" '

"बहुत बुरी हालत थी लाश की I मुझसे तो देखी ही नहीं गई।” इन्द्रजीत ने एक झुरझुरी-सी ली।

और इस पर योगी दयाल बड़े ही शुष्क स्वर में बोला-- ' 'उसने जुल्म किया था। एक मानस पर जबरदस्ती कब्जा जमा रखा था । उसे उसके इस काम की सजा तो मिलनी ही थी। "

"योगी महाराज । ' ' इन्द्रजीत ने हाथ जोड दिये-- "मै आपका बडा आभारी हूँ।“

"मेंने तुम पर कोई अहसान नहीं किया I मैँने इस काम का भरपूर मेहनताना लिया है I ' ' योगी लापरवाही से बोला।

इसमें कोई शक नहीं कि योगी दयाल क्रो उसके इस काम के एवज में मोटी स्कम मिली थी और उसक्री यह मेहनत व्यर्थ नहीं गई थी । मामूली-सी गफ्लत से यह मामला उल्टा भी पड़ सकता था I अगर राजूमदारी को साप' के आने का आभास कुछेक मिनट ही पहले हो जाता तो राजूमदारी की जगह इस खेमे में योगी दयाल की लाश पडी होती।

राजू मदारी कोई मामूली चीज न था। वह अपने घमण्ड में मारा गया। उसके दिमाग में यह घमण्ड आ गया था कि इस वक्त दुर-दुर तक उससे बडा, तांत्रिक' कोई नहीं-जो उसके मुकाबले पर आ सके । उसके किए जादू को तोड सके। लेकिन कभी-कभी यूं भी होता है कि हाथी क्रो चींटी पछाड जातीं है।

और फिर सूरते-हाल ऐसी सहज कहां थी-जेसी योगी दयाल और इन्द्रजीत समझ रहे थे।

राजू मदारी इस दुनिया से चला तो गया था लेकिन जाते-जाते भी एक करतब दिखा गया था। वह मदारी जो था। उसने देवा काली दाह क्रो पुकार लिया था। इस तरह इन्द्रजीत आकाश से गिरकर खजूर में आ अटका था, बल्कि सीधा पताल में चला गया था और यह बात न उसे मालूम थी न योगी दयाल को।

बहरहाल, वह रात इन्द्रजीत ने योगी दयाल के साथ उसके खेमे में ही गुजारी ड्राईवर रघुबीर को सुबह वहीं आना था और किं शाम राजकुमारी नयना क्रो इन्द्रजीत से मिलने नहर के पुल पर आना था | नयना ने इन्द्रजीत से कहा था कि

वह अपना सामान लेकर और बस्ती को अलविदा कहकर आए क्योंकि नयना उसे अपने साथ बहराम नगर लेकर जाना चाहती थी।

सुबह...निश्चित समय पर ही ड्राईवर रघुवीर आ पहुचा । उसने उन दोनों क्रो इकट्ठे देखा तो खुशी से झुम उठा। उसे शायद इन्द्रजीत के यहा मिलने की आशा नही थी।

' 'साहव जी... । ' ' वह इन्द्रजीत सै बोला--' ' आपको यहां देखकर बहुत खुशी हुई। इसका मतलब है कि योगी महाराज ने अपना चमत्कार दिखा दिया है... । ' '

' 'हां, रघुबीर ।। उस जालिम का खात्मा' हो चुका है। ' ' इन्द्रजीत ने बताया।

"बह है कहा ?"

"जगल में पड़ा है-और अब तक तो शायद उसकी लाश पानी हो चुकीं होगी। "

! फिर तो आपकी यहां रूकने की जरूरत ही नहीं है। आप इसी वक्त मेरे साथ चलिये। योगी महाराज को इनकी बस्ती में छोडकर. हम बहराम नगर हवेली में चलै जाएगे । राजकुमारी जी वहां प्रतीक्षक बैठी हैं। आपको साथ देखेंगी तो वह हर चिन्ता से मुक्त हो जाएगी' । " रघुबीर ने सुझाव दिया, जिसे इन्द्रजीत ने फोरन मान लिया।

यूं भी इन्द्रजीत का दिल बहुत घबरा रहा था-वह इस इलाके से दुर निकल जाना चाहता था l

योगी दयाल ने जल्दी-जल्दी अपना सामान समेटा उसे जीप में डाला---- यू वे तीनों तुरन्त ही बहराम नगर क्री तरफ रवाना हो गए ।

वे दोहपहर तक बहराम नगर गये। योगी दयाल को उसकी बस्ती में छोडा और सुधीर इन्द्रजीत के साथ बहराम नगर राजा की हवेली में पहुचा'।

इस हवेली को देखकर इंद्रजीत को अपनी सावनपुर वाली हवेली याद आ गई। और उसके अपने चाचा रमाकांत का ख्याल तो आना ही था। ,

उसके चाचा रमाकांत' ने उसे कत्ल करवाने की कोशिश की थी। और इस वाक्य क्रो गुजरे दाई साल हो गये थे। यानी कि रमाकात' अब तक आश्वस्त हो चुका होगा कि अब उसकी राह मे कोई काटा नहीं रहा। उस शैतान ने जाने उसकी गुमशुदगी के बारे में उसके मां-वाप को क्या कहानी सुनाई होगी l वे बेचारे तो परेशान हो गये होंगे ।

रमाकांत के प्रति रोष की एक लहर, आज बरसों बाद इन्द्रजीत को उत्तेजित कर गई थी।

उसने सोचा अब कोई समस्या नहीं है। वह अब बच्चा नहीं रहा है...ज्यादा मजबूत, ज्यादा ताकतबर और ज्यादा अनुभवी हो चुका है । वह एक-एक को देख लेगा। पर… ।
 
फिलहाल तो राजकुमारी नयना उसके सामने खडी थी--उसे अभी तो उसे देखना था।

जैसे किं रघुबीर को निर्देश थे वह इन्द्रजीत के साथ जैसे ही हवेली के गेट में दाखिल हुआ तो नयना ने उसको फौरन ही देख लिया था। वह सामने अपने ऊपर वाले कमरे की खिडकी, मे थी । जीप के अंदर दाखिल होते ही उसकी निगाह इन्द्रजीत पर पडी तो वह खुशी से दीवानी हो गई। वह तेजी से नीचे उतरी और हवेली के मुख्य द्वार पर पहुच गई।

त…भी रघुबीर भी इन्द्रजीत के साथ वहां पहुचा था।

_ नयना ने इन्द्रजीत को देखा और इन्द्रजीत ने नयना को । आखों' से आखें मिलीं । होठों पर मुस्कान आई I आखों में चाहतें मचली। दोनों वेखबर एक दूसरे की तरफ बडे I लेकिन फिर ड्राईवर रघुबीर की मौजूदगी में लज्जा आडे आ गई। दोनों तरस कर रस गये ।

' ’आह । आप आ गए इन्द्र ।' ' नयना के लहजे में बेपनाह हसरत थी ॥

' 'हम तो शाम को आपकी तरफ आने का प्रोग्राम बनाये बैठे थे । बस, रघुबीर के आने की प्रतीक्षा थी। "

' 'तो फिर मैं लोट जाता हूं। वहीँ नहर वाले पुल पर आपकी प्रतीक्षा करता हूं । " इन्द्रजीत ने शोखी से कहा ।

"हाय! ! अब कौन जाने देगा । " नयना का स्वर अपनत्व भरी चाहत सै भरा था--"यहां हमारी हवेली में आपका स्वागत है । लेकिन यह तो बताइए यह आपने अपना हुलिया क्या बना रखा है... ।"

"राजकुमारी जी ! हम जगल से आ रहे हैँ। ” इन्द्रजीत बदस्तूर शोखी लहजे में बोला…"इसलिए जगली बनै हुए है.. . I"

“चलो, अब समाप्त हुआ यह वनवास. भी l अरे हां, यह तो बताइये, आपके उस बाबा राजुमदारी का क्या हुआ? "

”राजकुमारी जी । " रघुबीर बोला---”उसका मायाजाल टूट गया तभी तो इन्द्रजीत साहब आपके सामने मौजूद हैं. .. । "

”यह तो हम भी समझ रहे है। लेकिन यह सब हुआ केसे?" नयना ने उन्हें हाथ के इशारे से अन्दर चलने को कहा । और अब वे हवेली के भव्य आलीशान डाईगरूम में थे।

इन्द्रजीत नयना के सामने एक सोफे पर बैठ गया। ड्राईवर रघुवीर हाथ बाधे' एक तरफ खडा हो गया।

इन्द्रजीत पर जो बीता था घटा था-सब संक्षेप में कह सुनाया। नयना सारी कहानी सुनकर बोली-' 'इसका मतलब है कि यह सपेरा योगी दयाल वडे, काम का और पहुचा हुआ आदमी निकला... । हैरत है, एक सपेरा और… । ' '

' 'नहीं बो सिर्फ एक सपेरा नहीं है । वह काले इल्म का भी माहिर है । एक तात्रिक' है वह । उसने राजूमदाऱी के जादु का तोड करके उसे ठिकाने लगा दिया । " इन्द्रजीत उसकी बात काटते हुए बोला था----' 'रास्ते में योगी दयाल ने बताया है कि राजूमदारी की मौत ही उसके जादू का तोड. था । ओर राजूमदारौ के जीते जो मुझें बडे से बडा साबिक भी उसके चगुल से नहीँ छुड़ा सकता था । मेरी मुक्ति के लिए योगी महाराज ने कई अमल किए। बडी. मेहनत करनी पडी उसे और फिर इस चक्कर में उसने अपना कीमती साप' भी गवा' दिया और नयना जी, इस साप के बारे में योगी महाराज ने एक बडी रहस्यमय बात कही जो कम से कम मेरी समझ में नहीं आई... l"

' 'ऐसा क्या कहा उसने...?" ,

' 'उसने बताया कि उसके इस साप' ने राजूमदारी का काम तमाम करने के बदले में अपने लिए आजादी की माग' की थी। जो योगी महाराज को उसे देनी पडी, क्योंकि उसके कथनानुसार यह काम कोई दूसरा साप' कर ही नहीं सकता था । ' '

' 'यह सपेरों और सांपों कीं दुनिया भी बडी अजीब है। ' ' नयना बोली---"आपने योगी दयाल को इस बारे में खुलकर बताने को नहीँ कहा। ' '

"कहा था-पूछा था-लेकिन वह टाल गया था।' '

'यहीं सोचा जा सकता है कि वो साप योगी दयाल का कैदी रहा होगा और उसने उसे आजादी देकर उससे यह काम करवा लिया होगा.. खैर छोडो इन बातों को । आप जाकर नहा धो लो मै आपके लिए कपडे भिजवाती हू। रघुबीर तुम इन्हें गेस्ट रूम में ले जाओ । ' '

इन्द्रजीत, रघुवीर के साथ मेहमानखाने में चला गया । इन्द्रजीत को जिस कमरे में ले जाया गया, बरसो बाद इन्द्रजीत को ऐसा खूबसूरत बडा कमरा नसीब हुआ था । अब उसे बात्त-बात पर अपना घर, अपनी हवेली याद आ रही थी । अपने मां बाप याद आ रहे ये । वह हैरान था कि उसने इतने बरस मां बाप से दूर आखिर गुजारे कैसे? राजूमदारी के वशीकरण अमल का नतीजा था कि वह अपने मां-बाप क्रो भूल गया था और उसके दिलं में राजूमदारी के कच्चे-पक्के मकान के प्रति मुहब्बत भर गई थी । वह उस बस्ती से निक्लना ही नहीं चाहता था। और अब मत्र पाश से मुक्ति पाते ही वो बारह-तेरह वर्षीय इन्द्रजीत बन गया था । शिकार पर निक्लने और अपने कत्ल क्री साजिश के वाकयात बार बार उसके दिमाग में घूम रहे थे।

ड्राईवर रघुवीर उसे कमरे मै पहुचाकर चला गया। इन्द्रजीत खूबसूरत गद्देदार बैड पर पसर गया और कपडो का इतजार. करने लगा । कुछ देर बाद एक सेविका दो तीन जोडे लेकर आ गई। यह राजा साहब के कपडे. थे।

इंद्रजीत एक जोडा लेकर बाथरूम में घुस गया । यह एक आधुनिक तर्ज का पूर्णत: 'सुसज्जित वाथरूम था । नहा-धोकर इन्द्रजीत जब आईने के सामने खड़ा हुआ तो वह खुद को देख़कय ही अचम्भित रह गया ।

वह क्या से क्या हो गया था I

राजूमदाऱी के घर में एक छोटा सा आईना था और वह भी चटखा हुआ। उसमें तो पूरा चेहरा भी नजर नहीं आता था । वह अपना चेहरा 'भी कहां देख पाता था । उसे तो अपना चेहरा भी टुकडो, टुकडों में देखना पडता था। आज बरसो बाद उसने अपने पूरे वजूद को आईंने में देखा तो वह आपने आप में खो गया ।

आईने में इससे पहले वह बारह-तेरह वर्षीय इन्द्रजीत को देखा करता था। आज वह अट्ठारह-उनीस बरस का था। उसका उठान तो बचपन ही से अच्छा था-जबानी तो कयामत ढाह रही थी। वह उस पर टूटकर बरसी थी।

इन्द्रजीत का ख्वाव गायब हो चुका था। नौजवान इन्द्रजीत उसके सामने था। वह एक बेहद आकर्षक नौजवान बन गया था । कसरती सुडौल बदन-चौडा, सीना और ऊचा-लम्बा का सफेद रंगत, चुम्बकीय आखै... । वह आईने में खुद को हर कौण से देख रहा था-और खुश हो रहा था।

इंद्रजीत को अहसास था कि वह खूबसूरत हे-लेकिन यह नहीं जानता था कि इस कदर खूबसूरत और स्मार्ट है। आज उसे अपने स्मार्ट और आकर्षक होने का यकीन हो गया।

स्वयं को आईने में देखते-देखते उसे सहसा यह अहसास हुआ कि वह बाथरूम में अकेला नहीँ है। इस अहसास के साथ ही उसने अपने कदमों में पड़े तौलिये को उठाकर फौरन अपने गिर्द लपेट लिया और दरवाजे की तरफ मुडकर. .देखा। -'

दरवाजा बन्द था l

उसने बाथरूम मे चारों तरफ नजरें घुमाई। बाथरूम में उसके अलावा कोई नहीं था । लेकिन यह अहसास अब भी बना हुआ था कि बाथरूम में उसके अतिरिक्त भी कोई है । इस अहसास से उसके दिल में खौफ-सा पैदा हो गया l

उसने जल्दी-जल्दी कपडे पहने और बाहर निकल आया। . बाहर एक सेविका उसकी प्रतीक्षक्र थी । उसे देखते ही वह बोली--' 'राजकुमारी जी, खाने क्री मेज पर आपकी प्रतीक्षक है। ' '

इन्द्रजीत उसके साथ डायर्निग हॉल में पहुचा'। डायनिंग टेबिल पर खाना सजाए; नयना उसकी प्रतीक्षक थी। वह उसे देखकर मुस्कराई। राजा साहब के कपडों मे इन्द्रजीत विल्कुल एक राजकुमार लग रहा था । नयना की आखों' में चमक भर आई थी। लेकिन वह बोली कुछ नहीं।

"क्या हुआ? क्यों मुस्का रही हो? जौकर लग_ रहा हूँ ना। भई मागे के कपडों में बदा' ऐसा ही लग सकता है। "

.....

इन्द्रजीत ने हसते एक कुर्सी खींची और उस पर बैठ गया।

"आप बहुत अच्छे लग रहे हैँ। श्रीमान । बिल्कुल राजकुमार... । '' नयना कहे बिना न रह सकी।

"राजकुमार न सही, छोटा-मोटा जमीदार जरूर हूँ। यह और बात है कि फिलहाल वेजमीन, भूमिहीन हूँ।'' इन्द्रजीत प्लेट उठाते हुए बोला ।

" निश्चिन्त हो जाओं, इंन्द्रजीत । मै तुम्हें तुम्हारी जमीनें भी दिलवा कर रहूँगी । जरा पिताजी आ जाएं... ।'' नयना ने दृढ स्वर मे कहा ।

"राजा साहब कहीं गए हुए है?" झ्वजीत ने पूछा ।

' 'आजकल वह पेरिस में… । ' ' नयना ने बताया।

' 'पेरिस में...? ' '

' 'हां... l ' ‘ नयना की मुडी' इकरार में हिली । वह आगे बोली--"मेरे डैडी बडे जिन्दा-दिल हैं। लाईफ इन्जाॅय करना कोई उनसे सीखे । खेल-तमाशों के बहुत शौकीन हैँ। उनसे वक्त बचता है तो शिकार खेलते हैं। शिकार से दिल भर जाता है तो सैरो-तफरीह को निकल जाते है। आजकान पर्यटन का भूत सवार है... । ' '

"यह भूत कब उतरेगा...मेरा मतलब है कि... । ' ' इन्द्रजीत ने बात पूरी नहीं की।

' 'मै आपका मतलब समझ गई। " नयना मुस्करा दी-"बस दो-चार दिन में आने ही वाले है। ' '

' 'बाप पर तो पयर्टन का भूत सवार है-चलो मान लिया । लेकिन बेटी पर आजकल क्रोन-सा भूत सवार है? ' ' इन्द्र ने हसतकर पूछा ।

"यह जो मेरे सामने बैठा है। ' ' नयना के मुह' से बेअख्तयार निक्ला ।

इंद्रजीत हस' दिया था। उसने एक कहकहा लगाया और बोला-"‘भई बहुत खूब... l' '

"इन्द्रजीत... । ' ' नयना सजीदगी औढते, बौली--' 'तुम्हें इस हवेली में आए, मुश्किल से एफ डेढ घन्टा ही बीता हे-लेकिन जाने क्यों-मुझे यह महसूस हो रहा है जैस तुम यहां बरसों से हो I ऐसा क्यो महसूस हो रहा 'है मुह..?”

"मै क्या जानू.. . । ' '

"अच्छा यह बताओ... । क्या तुम्हें कटारी की याद नहीं आती?" जाने, क्या सोचकर पूछा था नयना ने।

' 'वह वेचाऱी मेरे जगल' से लौटने का इंतजार' कर रही होगी। मैने बताया है ना तुम्हें कि राजूमदारी मुझे जगल में सिद्धि प्राप्त करने को नहीं ले गया था। "

' 'तो फिर? नयना ने पूछा I

' 'उसकी मंशा मुझ पर पूर्णता: अधिकार जमाने की थी । उसने एक ऐसा अमल शुरू किया था कि अगर वह पूर्ण हो जाता तो मेरी याददाश्त भी गुम हो जाती l मैं एकदम उल्लू बन जाता ओर वह जो कहता मुझे उसी पर अमल करना पडता। यह बात मुझें योगी दयाल ने बताई थी।"

' 'शुक्र है. इन्द्र! तुम बच गये। ' ' नयना ने ठण्डी सास' 'भरी-"खैर मै कटारी की बात कर रही थी । सुना है वह तुम्हें बहुत चाहती थी? " उसने इन्द्रजीत की तरफ तिरछी निग़ाहों से देखा।

"हां-यह सच है। ' ' इन्द्रजीत ने कबूला।

' 'सुना है. वो है भी बहुत खुबसूरत।।I”

"यह भी सच है। ' ' इन्द्रजीत ने इकरार किया फिर पूछा-लेकिन यह बात तुम्हें किसने बताई। तुमने तो उसे देखा नहीं है I‘ ‘

' 'हा' मैंने तो उसे देखा नहीं. देखने की तमन्ना ही रही। बैसे यह सब मुझे रघुबीर ने बताया है। उसने आपकी कटारी को देखा था । ' '
 
"तुम कटारी का जिक्र क्यों ले बैठी हो?" इन्द्रजीत ने शकित भाव से पूछा ।

' "ऐसे ही...आपको. बुरा लग रहा है।"

"बुरा नहीँ-गैर जरूरी लग रहा है । "

"फिर किसकी बात की जाए । "

"अपनी...केवलं अपनी... । “ इन्द्रजीत ने अपनत्वपूर्ण और निर्णायक लहजे में कहा।

“ओह! तो बताओ-मैं क्या हूँ?” उसने पूछा और यह एक बड़ा अजीब सवाल था ।

"तुम जादूगरनी हो।“ इन्द्रजीत एकदम बोला।

" अगर मै जादूगरनी हू -तो कम आप मी नही हैँ। आप जादूगर है। बहुत बडे जादूगर । जिसने नयना जैसी विद्रोही अहमी स्वभाव क्री लडकी… का दिल अपनी मुट्ठी में ले लिया... l"

और अब इन्द्रजीत ने भी कुछ सोचते हुए', सजीदा लहजे में कहा---"नयना, अगर मैं महज एक मदारी का बेटा होता तो क्या तुम फिर भी मुझे इसी तरह चाहतीं?"

"बाह । आपने यह क्या सबाल किया?” नयना ने खाना खाते-खाते अपना हाथ खींच लिया ।

"खाना तो खाओ।” इन्द्रजीत ने उसे टोक दिया I

"हा खाती हूँ। पहले आपके प्रश्न का उत्तर दे दूं।" नयना गम्भीरता से बोली--“जब आपने मेरे हाथ पर अंगूठी रखी यही वो क्षण था जब मैं आपकी मुहब्बत में गिरफ्तार हुई और जब मैं आपसे मिलने आपकी बस्ती पहुची' ती यह वो क्षण था कि मेरा दिल, मेरी समझ भी मेरी न रही थी और किसी और के कब्जे में चली गई थी I और मैं ..मै बेबस होकर अपनी रुह की तलाश मै नहर वाले पुल पर चली गई थी l आप...आप स्वय' ही न्याय करे इन्द्रजीत कि इन दोनों ही अबसरो पर मुझे कब मालूम था कि आप किसी बड़े जमीदार के बेटे हैं। या मुझे मालूम था?"

इन्द्रजीत ने उसके इस स्पष्टीकरण का काई जबाब नहीँ दिया I वह उसे मुस्कराकर देखता रहा I वह देख रहा था कि नयना उसके इस सवाल पर खिन्न हो गई है। और उसकी यह खिन्नता उससे छिपी न रही थी, नयना की भाबनाएं उससे छिपी न रही थी। समझ लिया था उसने कि नयना ऐसी प्रेम दीवानी है जो आग में कूदते हुए भी परिणाम के बारे में नहीँ सोचती। फिर ऐसी प्रैम-दीवानी सै इस तरह का सबाल तो उसके जज्वात को ठेस पहचाने के बराबर ही था । उसकी चाहत का मजाक उडाने… के बराबर था।

इन्द्रजीत ने एक छोटा-सा निवाला उठाया और नयना क्री तरफ बढाते_ हुए बडे प्यार से बोला-"लो, यह खा लो । खूबसूरत लोगों को नाराज नहीं होना चाहिए. . .वह बुरे लगते हैं। ' '

नयना ने मुह' खोला और उसका हाथ पकड निवाला अपने मुह' में ले लिया। इन्द्रजीत के इस अपनत्व से ही उसकी रुष्टता जाती रही थी। वह मुस्कराते हुए बोली--

“में नाराज नही हूँ। वो तो आपने बात ही कुछ ऐसी कर दी थी कि... ।"

पर इंद्रजीत ने उसे अपनी बात पूरी नहीं करने दी थी। उसने बैसा ही एक और निवाला बना नयना के मुंह में दे दिया था ।

खाने के बाद इन्द्रजीत मेहमान खाने में चला आया. I यहाँ बैठकर उन दोनों नै काफी पी। इन्द्रजीत रात्त भर का जागा हुआ था ।

अब भरपेट खाना खाने के बाद उसे नींद बुरी तरह सताने लगी थी ।

नयना रो भी यह छिपा नहीं रहा था।। वह इन्द्रजीत को आराम करने को कहकर उसके कमरे से चली गई और जाते जाते कमरे का दरवाजा बन्द कर गई।

इन्द्रजीत ने उठकर खिडकियों, के पर्दे बराबर किये। कमरे में एक खुशगवार-सा अंघेरा छा गया । वह बिस्तर के हवाले हो गया और उसकी आखों में नींद उतरने लगी।

पर तभी .. . l

हां ! हा तभी! तभी "वह" बाथरूम से निकली I

इन्द्रजीत के बैड के करीव आकर उसने उसे बडे गौर से देखा I ऐसा ही खूंबसूरत मर्द था...ऐसे ही आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक था कि कोई भी हसरतो की मारी उस पर अपना दिल हार सकती थी। इन्द्रजीत की आखें वन्द थीं । चेहरे पर बड़ा, ही प्यारा-सा वाल-सुलभ सुकून था । वह नींद में इतना खुबसूरत लग रहा था कि वह बेकरार हो उठी ।

उसने इन्द्रजीत के पेरों की तरफ आकर उसके दोनों अनूठे पकड लिए-ओर फिर वह जैसे धीरे-धीरे उसके शरीर में प्रवेश करने लगी ।

अंगूठो से पैरों में -- पैरो से पिडलियो में । फिर...ऊपर और ऊपर...यहा तक की सीने में।

इन्द्रजीत इस वक्त पूरी तरह सो नही पाया था । उनीदगी की-सी अवस्था में था। यूं महसूस हुआ जेसे पावो के अगूठो' से उसके शरीर में धूबा सा भर रहा । उस पर घटा-सी छा रही थी । एक नशा...एक मादकता थी जो उस पर छाती जा रही थी। एहसास था...अनूठी-सी अनुभूति थी । फिर यह धुंआ-सा...यह बादल से...उसके अन्दर ही अंदर फैलते और बढते हुए उसके सीने तक पहुच गये ।

उसके दोनों हाथ उसके सीने पर बंधे हुए थे। तब किसी ने उसे छुआ। एक रेशमी हाथ का सा अहसास उसे अपने हाथ पर हुआ । अब उसने हनुमान चालीसा पढ़ना शुरू किया। उसके शरीर मे विरोध की शुरुआत हुई। उसने चीखना चाहा। वह चीख चीखकर नयना को ही अपनी सहायता के लिए बुला रहा था।

तभी एक झटका-सा लगा और इन्द्रजीत की आखखुल गई। उसने गर्दन घुमाकर कमरे का जायजा लिया। कमरे में उसके अपने अलावा काई और नहीं था। 'वह' बाथरूम में जा चुकी थी।

इन्द्रजीत की समझ में नहीं आया कि यह उसे क्या हुआ था? कि यह किस किस्म की कैफियत थी। यह कैसा अहसास था...कैसी अनुभ्रूति थी । क्या उसने कोई ख्वाब देखा था या यह सब जागते मैं हुआ है।

अपने हाथ पर किसी कोमल रेशमी हाथ के स्पर्श क्रो वह अब भी महसूस कर रहा था । फिर पाव' के अंगूठे सै सीने तक एक घटा-सी छाने का अहसास. ..उसका बरबस ही हनुमान चालीसा पढना…...और नयना को सहायता के लिए पुकारना... । सबकुछ ही तो उसके जहन में था। बिल्कुल साफ स्पष्ट था।

शायद वह लेटते ही सो गया था इन्द्रजीत ने सोचा । और इस सब को एक ख्वाब समझकर उसने अपने जहन को झटका और करवट लेकर सो गया।

वह शीघ्र ही पुरसूकून हो गया था और फिर उस घर नींद छाती गई थी।।

वह सो गया था।

फिर शाम को, ड्राईवर रघुवीर ने आकर उसे उठाया। सेविका दो बार देख़कर जा चुकीं थी । वह गहरी नींद सोया हुआ था । तब ही नयना ने ड्राईवर रघुबीर क्रो भेजा था। उसने इन्द्रजीत को बाजू छूकर उसे पुकारा---

"इन्द्रजीत जी… इन्द्रजीत जी...।" इन्द्रजीत ने आखे खोल दीं।

अलसायी नजरों से उसकी तरफ देखा, पूंछा--’ 'क्यों क्या हुआ?" ' 'शाम हो गई है. साहब जी। आप कब तक सोऐगे l चाय पी ले । राजकुमारी जी आपका इतजार कर रही है।"

'' ओह... ।' ' इन्द्रजीत की निगाहें वाल-क्लाक' की तरफ उठी और वह फोरन उठ गया। वह बाथरूम की तरफ बढते. हुए बोला--' 'रघुबीर तुम रूको । मैं पाच मिनट में आता हूँ। साथ ही चलेगे।"

इन्द्रजीत बाथरूम में प्रवेश कर गया। उसने अपने चेहरे पर पानी के खुब छीटे मारे। मुह धोते-धोते उसे अचानक _ अहसास हुआ क्रि बाथरूम में कोई और कोई भी है । और इस ख्याल के साथ ही एक और अह्रसास उभरा। उसके दिल

में एकदम सै ही नहाने की इच्छा जागी थी अपनी इस ख्वाहिश पर उसे बडी हैरत हुई कोई उसे उकसा रहा था, क्यों उकसा रहा है? क्यो, आखिर क्यो? किसी के बाथरूम के भीतर अपने साथ होने का अहसास भी बदस्तुर बना हुआ था। वह भयभीत हो उठा । यह मुह धो चुका था-सो, फौरन ही बाथरूम से बाहर आ गया ।

ड्राइवर रघुबीर कमरे में मोजूद था।। उसे देखकर इन्दजीत ने सुकून का सास' लिया। इंद्रजीत ने सोचा कि रघुवीर को गुसलखाने में भेजकर देखू, अन्दाजा हो जाएगा कि वह महज उसका वहम था या फिर वाकई अन्दर कोई चीज है।

"रघुबीर ।। तुम ज़रा बाथरूम में तो जाओ I ' '

' 'साहब जी। बाथरूम' में क्या है? ' वह इन्द्रजीत का आदेश सुनते ही कापने लगा था ।

”डरो मत, रघुबीर । अन्दर कोई भूत-प्रेत नहीं है। तुम अन्दर जाओं । दरवाजा बद' करो और आईने के सामने दो मिनट खडे होकर बाहर आ जाओ I" इन्द्रजीत ने उसे समझाया।

रघुबीर ना चाहते हुए भी बाथरूम की तरफ बढ गया। इन्द्रजीत के इस अजीब आदेश सै वह घबरा सा रहा था ।

दो मिनट बाद जब वह बाहर आया तो मुस्करा रहा था।

' 'साहव जी! आपने तो मुझे डरा ही दिया था। अन्दर तो कुछ नहीं है। '"

"मैने तुमसे कब कहा था कि अंदर कुछ है I ' ' इन्द्रजीत ने हल्का हंसकर कहा ।

' ‘हां-आपने कुछ कहा तो नहीं था-लैकिन आपके अवाज़' से लगा था जेसे अन्दर कुछ है। ' ' रघुबीर झेंपता सा बोला ।

रघुवीर के अंदर जाने और फिर मुस्कराते हुए बाहर आने से-इन्द्रजीत को विश्वास हो गया था किं बाथरूम में किसी के होने का वह अहसास उसका अपना वहम ही था ओंर हकीकत में अन्दर कुछ नहीं था। वरना रधूवीर ने भी उसे महसूस करना था।

डायर्निग टेबिल पर चाय साथ कुछ था I नयना बडे शोक से. बडे प्यार से उसे एक-एक चीज खिलाती-चखाती रही । वे चाय से फारिग हुए तो टेलर मास्टर रज्जाक इन्द्रजीत का नाप लेने आ गया। उसने एक पेन्ट शर्ट अगले दिन सुबह और बाकी जोडे शाम क्रो देने का वादा करके चला गया ।

इन्द्रजीत अपने घर, दिल्ली, जाने को अधीर हो रहा था । उसने अपनी यह इच्छा नयना पर जाहिर करते हुए कहा---"नयना! मे' दिल्ली जाना चाहता हूँ।"

' 'जाओ.. . । " नयना बोली । ओर उसके इस संक्षिप्त से जवाब से और उसके लहजे से इन्द्रजीत यह अन्दाजा न लगा सका कि नयना ने यह नाराज होकर कहा है था खुशी से।

' 'कैसे जाऊ'...?“ इन्द्रजीत ने पूछा "तुम्हें रघुबीर छोड़ आएगा। अगर कहो तो मैं भी साथ चलूं.. I‘ '

' 'नहीं अभी नहीं... । ' ' इन्द्रजीत फोरन बोला।

"परेशान मत होवो। मैं तुम्हारे साथ घर नहीं जाऊगी' l ‘ ' नयना बोली---"मेरे अकल' भी वहा रहते है । मै उनके यहां चली जाऊगी । में उनके यहां जाती रहती हू। गोल्फ लिक' में उनकी कोठी है I ‘ '

”खैर, ऐसी कोई बात नहीं है।' ' इन्द्रजीत मुस्कराया-- ' 'तुम मेरे साथ मेरे घर भी चल सकती हो॥ लेकिन मैं चाहता हू कि पहले मै अपने मां बाप के साथ यहां आऊं। तव तक राजा साहव भी वापस आ जाएगे' l‘ '

"ठीक है...जेसौ तुम्हारी इच्छा।" नयना लापरवाही से बोली ।

रात का खना खाकर वे दोनों वहुत देर तक हवेली के बाग में टहलते रहे I नयना बेहद खुश थी। प्यारी प्यारी प्यार भरी बाते...भबिष्य के सपने....छेडछाड़...हसी'-मजाक I दूरी मिट चुकी थी, और दोनों यहीँ महसूस करते रहे थे कि जेसे एक-दूसरे को बरसों सै जानते है।

जब वे दोनों टहल-टहलकर बातें करके थक गए तो नयना उसे उसके कमरे मै पहुचाकर और उसे पहली बार ’बिदाई चुम्बन' के साथ शुभ रात्रि कहकर हवेली में चली गई।

इन्द्रजीत भी खुद को बड़ा खुश महसूस कर रहा था । उसने दरवाजा बन्द कर लिया था, लेकिन चिटकनी नहीं लगाई।

कपडे बदलकर उसने लाईट और बैड पर लेटकर टार्गे फैला लीं और दिल्ली जाने के में सोचने लगा।

एकान्त मिलते ही वह चाहे-अनचाहे अब अपने मा'-बाप के ही बारे में सोचने लगता था ।

सोचते-सोचते उसकी आखें' बोझिल हो चली। और यूं वह शीघ्र ही नींद की आगोश में था । उसे नींद आने की देर थी कि. .. ।

तभी "वह" मुस्कराती हुई बाथरूम से बाहर निकली। पहले क्री ही तरह वह सीधे इन्द्रजीत के बैड के निकट पहुची' और उसने पहले की तरह इन्द्रजीत के पैरों के दोनों अगूठे पकड लिये।

और इसके साथ ही इन्द्रजीत को अचानक ही महसूस हुआ जैसै वह किसी की गिरफ्त में है, कोई उस पर छाया हुआ है । उसके होशो हवास बहाल न थे और वह अर्द्धसुप्त-सी अवस्था में था। चाहता था कि पूरी तरह जाग जाए। अपनी इस कोशिश में वह कामयाब नहीं हो पा रहा था ।

एक मदहोशी-सी, बेसुधी-सी उसपर व्याप्त होती जा रही थी । एक रेशमी से स्पर्श का अहसास था। वह जो भी था-उस पर पूर्णत: छाया हुआ था। हां, इन्द्रजीत की चेतना...उसका विवेक जेसे मुकम्मल तोर पर उसकी गिरफ्त में था । एक नशा-सा था जो चडता जा रहा था । यह मादक क्षण, लम्बे होते जा रहे थे और उसके होश उडाते. जा रहे थे।

एक अनूठे से आनन्द की अनुभूति और तृप्ति के साथ ही यह खुमार बैठा था।

और यह आनन्द और तृप्ति अभिसार के बाद का ही अहसास था। एक मादक अहसास ।
 
प्रात: जब इन्द्रजीत की आख खुली तो उसे वेहद कमजोरी महसूस हो रही थी ।

वह उठा तो उसकी आखों के सामने अधेरा छा गया। वह फौरन ही उठकर बैड पर बैठ गया। कुछ देर बैठा रहा-फिर अपने पेरों पर खड़ा हुआ और धीरे धीरे चलता हुआ बाथरूम में पहुचा'।

बाथरूम में पहुचकर जब उसक्री नजरे आईने पर पडी तो वह अपना चेहरा देखकर भयभीत हो उठा । चेहरा किसी छिपक्ली की मानिन्द जर्द हो रहा था।

बह मुह हाथ धोकर बाहर निक्ला तो कमरे के दरवाजे पर हल्की-सी दस्तक हुई। उसने यह सोचकर कि कोई सेविका या फिर रघुवीर होगा, कुर्सी पर बैठते हुए आवाज लगाई--

' 'दरवाजा खुला है। ' '

दरवाजा थोड़ा-सा खुला है- ट्रे में रखे हुए वर्तन बज उठे। इंद्रजीत की नजर ट्रे पर पडी, फिर जिसके हाथों में थी उसके चेहरे की तरफ उठ गई ।

'' अरे... ! वह चौककर उठ खडा, हुआ। आने बाली नयना थी, "अरे तुम...तुमने यह कष्ट क्यों किया, नाश्ता किसी सेविका के हाथ भिजवा देतीं. . . । ' '

"हां-ऐसा भी हो सकता था । ' ' नयना अन्दर आते मुस्कराते हुए बोली-ओर ट्रे मेज पर रख दी ।

"तो फिर ऐसा किया क्यों नहीं. ..?" इंद्रजीत का स्वर शिकायती था।

'' श्रीमान जी, आपको मालूम होना चाहिए कि यह नाश्ता मेने अपने हाथों सै तेयार किया है। फिर सोचा कि जब बनाया है तो फिर सर्ब भी स्वय ही क्यों न किया जाए? बस यह सोचकर स्वयं ही ट्रे उठा लाई l आपको कोई आपत्ति हो तो कहिये... ।'' नयना ने काखियों से निहारते हुए कहा।

' 'अकारण ही कष्ट किया। ' ' इन्द्रजीत शमिंन्दा-सै लहजे में बोला।

नयना कोई जबाव देना चाहती थी, उसकी नजरे' इन्द्र के चेहरे पर पडी-ओर वह एकदम घबरा गई--" अरे, यह क्या हुआ आपको...?" वह अपनी नजरे उसके चेहरे से हटा नहीं पा रही थी ।

''मैं ऐसे ही लाल पीला होता रहता हुँ... । ' ' इन्द्रजीत ने बात हसी' में उडाने. की कोशिश की।

' 'नहीं इन्द्र! में मजाक नहीं कर रही हू। शीशा देखौ जरा जाकर। ' '

' ’शीशा देखकर ही आरहा हूं। " इन्द्रजीत ने बदस्तूर हसते' हुए जवाब दिया, ' 'वह कमबख्त मुंह चिढा रहा था। ' '

"इंद्रजीत, में गम्भीर हूँ । "

"गम्भीर हो तो फिर नाश्ते की बात करो.. . । "

' 'ठीक है नाश्ता कर लौ-मै अभी डाक्टर को बुलाती हूँ। ' '

' 'देखो ख्वामखाह ही डॉक्टर को न बुला लेना, मै बिल्कुल ठीक हूँ। पेशे का जादूगर हूँ इसलिए गिरगिट की तरह रग' बदलता रहा रहता हूँ। ' इन्द्रजीत वार्तालाप क्रो बहुत हल्के से ले रहा था ।

"अगर ऐसा ही है तो फिर तो तुम रोज ही मुझे डराया करोगे।"

' 'नहीं ज्यादा नहीं । प्रॉमिस । ' ' इन्द्र ने मासूम सूरत बनाकर कहा--- ' 'अच्छा लाओ चाय दो... ।" इन्द्र ने केतली को छुआ और उसके मुंह से निकला--' 'यह तो बिल्कुल ठडी' है देबी जी! इसमें चाय है भी या नहीं...?' '

' 'चाय है, एकदम गर्म । " कहते हुए नयना ने हाथ बढाया और केतली का ढक्कन उठा लिया ।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

' 'नहीं ज्यादा नहीं । प्रॉमिस । ' ' इन्द्र ने मासूम सूरत बनाकर कहा--- ' 'अच्छा लाओ चाय दो... ।" इन्द्र ने केतली को छुआ और उसके मुंह से निकला--' 'यह तो बिल्कुल ठडी' है देबी जी! इसमें चाय है भी या नहीं...?' '

' 'चाय है, एकदम गर्म । " कहते हुए नयना ने हाथ बढाया और केतली का ढक्कन उठा लिया ।

आश्चर्या केतली में चाय नाम की चीज नहीं थी।

' 'यह क्या? ' ' वह चीखती-सी बोली-- ' ’चाय कहा गई?"

' ’चाय कहा जाऐगी-केतली में ही है I ' ' इन्द्रजीत अपनी मुस्कान दबाते बोला--"ज़रा गौर से देखो।" नयना ने केतली को तनिक झुकाकर देखा। चायकेतली में थी। और केतली अब गर्म भी महसूस हुई थी ।

' ' 'कमाल है। ' ' वह बौली--"लेकिन यह किस तरह हुआ। तुमने केतली को ठण्डा और खाली बताया था। मैंने देखा था खाली ही थी । अब फिर चाय से भरी दिख रही है। चाय कहा' चली गई थी?"

' 'चाय तो कहीं नहीँ गई थी । और देबी जी, यह महज़ नजरबदी' का खेल था । मै जो दिखा रहा था-तुम वही देख रही थीं । ' '

' ' यानि कि हमारी बिल्ली ह्रर्मी से म्याऊ।" नयना ने आखें दिखाईं।

"बिल्ली नहीं, बिल्ला! ' ' इन्द्र कुछ यू बोला कि ननया अपनी हसी' नहीं रोक पाई।

नाश्ता यूं ही हंसते हंसते हुआ। नाश्ता करके इन्द्रजीत ने अपने बदन में कुछ जान महसूस की। वह हंस जरूर रहा था। लेकिन हकीकतन चिन्तित्त और सहमा-सा भी था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह एक ही रात में उस पर क्या आफ्त आ पडी, थी कि न केवल उसके बदन का खून निचुड़ गया था बल्कि वह बेहद कमजोरी भी महसूस कर रहा था ।

नयना को तो उसने मजाक में टाल दिया था-लेकिंन उसका जहन इस गुत्थी क्रो सुलझाने में लगा हुआ था।

इन्द्रजीत को रात का ख्वाब याद आया । अजीब ख्वाब था वह । उस ख्वाब के बारे में सोचकर ही उसे झुरझुरी-सी आ गई ।

अभी वे नाश्ते से निपटे ही थे कि रघुबीर, दर्जी रज्जाक के साथ आ पहुचा । इंद्रजीत ने पेन्ट शर्ट पहनकर देखीं । फिटिंग सही थी और सिलाई का भी जबाब नहीं था। इन कपडो में इन्द्रजीत बिल्कुल हीरो नजर आने लगा था । मास्टर रज्जाक के जाने के बाद जो पहला सबाल ड्राईवर रघुबीर ने किया वह इन्द्रजीत की रगत' के बारे में ही था।

"साहब जी! आप ऐसे पीले क्यों हो रहे हैं?'' उसने चित्तित स्वर में पूछा था।

"सुन लिया इन्द्र! रघुवीर ने क्या कहा है।" नयना बोल उठी…"आप मेरी बात मजाक में उडा. रहे थे। ' '

" अरे कुछ नहीं हुआ मुझे ।" इन्द्रजीत ने लापरवाही से कहा।

' 'लेकिन योगी दयाल के साथ जो कुछ हुआ है, बिल्कुल ही अच्छा नहीं हुआ है । बहुत बुरा हुआ है । बहुत ही बुरा । " रघुबीर ने उदास लहजे में कहा ।

' 'क्या हुआ है, रघुबीर?” नयना और इन्द्र, दोनों ने एक साथ ही पूछा था ।

"सुबह ही सुबह में योगी दयाल के घर गया था। राजकुमारी जी आपने मुझे जो दस हजार रुपये दिये थे-वही पहुचाने' गया था । उसका इनाम । उसके घर का दरवाजा खुला हुआ था । में बेधडक. अन्दर चला गया क्योंकि मैं जानता था कि वह घर में अकेला रहता है। मैं उसके कमरे में दाखिल हुआ तो वह मुझे जमीन पर लेटा नजर आपा। उसकी आखें खुली हुई थी आखों' से आसू बहकर कानों तक जा रहे थे। उसका पूरा शरीर लकवे का शिकार था । जुबान बद थी। वह अपनी आखो को गर्दिश देने के सिवा कुछ नहीँ कर सकता था । मेंने झुककर उससे पूछना चाहा कि यह सब कैसे हुआ? तभी उसकी आखों में जिन्दगी के टिमटिमाते चिराग बुझ गये। उसकी आखें रह गई। धडकन. बन्द हो गई, नब्ज थम गई, आसू रन्क गये। मैने उसकी आखें बन्द करनी चाहीं लेकिन वह बावजूद कोशिश के बंद नहीं हो सकी। उसके सीने पर किसी पक्षी का पंजा' पडा. हुआ था। " रघुबीर ने बताया-"ऐसा ही पंजा मैंने राजूमदारी के गले में पड़ा हुआ देखा था ।
 
उल्लू के पंजे का जिक्र सुनकर इन्द्रजीत' चोंक पड़ा । उसमें लेजी सै पूछा "कहां' है वह पंजा ?"

"मेरे पास है।" रघुबीर बोला--”आपको दिखाने के लिए वह मै अपने साथ ले आया हू। उसने अपनी कमीज की बगली जेब से निकालकर वह पंजा इंद्रजीत के हाथ पर रख दिया I इन्द्र क्रो उसे एक नजर देखतें ही अदाजा' हो गया कि वह राजूमदारी के गले बाला ही पंजा' हे । अब सवाल यह उठता था कि उल्लू का यह पंजा योगी दयाल के सीने पा केसे पहुचा' और उस पर लकवे का हमला केसे हुआ? हमला भी ऐसा कि वह अपनी जिन्दगी से हाथ धो बैठा। अगर यह लकवे का हमला था तो फिर रात के शह्शाह का यह पंजा कहा से आया।”

राजू मदारी की बैचेन आत्मा ने उससे प्रतिशोध लिया? अगर ऐसा ही था तो यह चौकने वाली बात थी । खतरे की घटीं' बजने लगी थी ।।

खुद इन्द्रजीत के साथ भी तो कुछ क्रम नहीं हुआ था। रात ही रात में वह हल्दी की तरह पीला हो गया था और कमजोरी भी कितनी हो गई थी।

क्या यह एक ही जजीर की दो कडिया थीं? क्या योगी दयाल के बाद राजूमदाऱी का अगला निशाना-वह खुद होगा? इन्द्रजीत ज्यों-ज्यों सोचता जा रहा था-परेशान होता जा रहा था ।

"नयना...यह जो कुछ हुआ है, अच्छा नहीं हुआ है। ' ' रघुवीर नयना के इशारे पर चाय के नई! बर्तन उठाकर ले गया तो इन्द्रजीत बोला । उसका स्वर सहमा हुआ था--"योगी दयाल को यकीनन राजूमदारी ने ही मारा है। ' '

"यह बात तुम इतने विश्वास के साथ कैसे कह सकते हो? " नयना ने पूछा ।

"यह उल्लू का पंजा'. .. I " इन्द्रजीत ने काले धागे में ताबीज की तरह बंधा हुआ उल्लू का पंजा उसकी आखो' के सामने लहराया--"यह वही पंजा' है जो राजूमदारी के गले में पड़ा रहता था। मै इसे अच्छी तरह पहचानता हूँ । ' '

"अब क्या होगा. इन्द्र?" नयना ने सहमी आवाज में पूछा । “हालात सुधारने की बजाय. बिगड गये लगते हैँ, नयना! हमें बहुत सतर्क रहना होगा। ' '

"प्रभु रक्षक हे-देखा जाएगा. . . । ' ' नयना में न जाने कहा से अचानक हिम्मत आगई--' 'चलो तुम्हें बहराम नगर क्री सैर करा... I ' '

‘ 'चलो… ।" इन्द्रजीत फौरन तेयार हो गया… " कैसे चलेगे'? ' ' उसने पूछा।

' 'चाहो तो जीप से चलते है और अगर घुडसवारी. का मूड हो तो घोडों… पर । ' ' नयना बोली ।

' 'बरसो हो गये घुडसवारी किये। चलो, घोडों. पर चलते है। ' '

"ठीक है। में घोडे कसवात्ती हूँ। तुम कपडे बदलकर आओं... । ' ' कहते हुए नयना बाहर निकल गई ।

इन्द्रजीत कपडे बदल-कर बाहर पहुचा' तो हवेली के दरवाजे पर दो खूबसूरत घोडे तेयार थै।

इन्द्र ने अपनी सवारी के लिए मुश्की घोडा पसन्द किया नयना सफेद घोडे, पर सबार हो गई ।

यू वे घोडों, पर सवार होकर निकल लिए।

यह एक हरा भरा इलाका था। वे दोनों घोडे दोडाते. हुये काफी दूर निक्ल आए थे। बहराम नगर कहीँ बहुत पीछे रह _ गया था । नयना को अदाजा' नहीं था कि इन्द्रजीत इतना अच्छा घुडसवार. है ।

इन्द्रजीत ने भी कहा सोचा था कि नयना इतनी अच्छी कर लेती है । दोनों ही एक-दूसरे की दक्षता प्रभावित्त हुए थे।

इन्द्रजीत ने इस घुडसबाऱी, का बडा. लुत्फ लिया। अब वे दोनों धीरे धीरे घोडे दौडाते_ हुए साथ-साथ चल रहे थे I दोनों बाते कर रहे थे।

इंद्रजीत फिर दिल्ली की चर्चा ले बैठा था। वह कह रहा था--' 'क्या ख्याल है, नयना! मै आज शाम को दिल्ली चला जाऊं. ..? ' '

‘ 'शाम को नहीं..'.कल सुबह जाना। एक दिन तो ओंर रहो मेरे पास ओर फिर आज तुम्हारे दो जोडे और सिलकर आ जाएगे' । ' '

“कपडों की फिक्र है" इन्द्र बोला ।।

' 'तुम्हें नहीं है लेकिन मुझें तो है । मैं तुम्हारे मां-बाप के सामने शर्मिन्दा नहीं होना चाहती ।' '

नयना के अपनत्व पर इन्द्र मुस्करा दिया और उसने कुछ कहने को मुह खोलाही था कि उसका घोड़ा एकदम भडक, उठा। उसने आनन-फानन में रफ्तार पकड़ ली। पलक झमकते ही वह हवा से बाते करने लगा।

इन्द्रजीत की समझ में भी नहीं आया कि यह क्या हुआ? वह अगर घुडसदाऱी, का माहिर न होता तो घोडे के अचानक बकाबू' होने पर धूल चाट रहा होता। धोड़े की पीठ पर सम्भलकर उसने घोडे को रोकने की यथा सम्भव कोशिश की थी-लेकिन रूकना तो दूर की बात, घोडे ने अपनी रफ्तार भी कम नहीं की थी I इन्द्रजीत क्री लगाम खींचने की सारी कोशिशें निष्फल्ल रही थी ।

सामने जगल था। घोडा, देखते ही देखते जगल' में प्रवेश कर गया ।

इन्द्रजीत के घोडे ने भडककर जैसै ही रफ्तार पकडी. तो नयना ने फौरन अपने घोडे को ऐड लगाई। लेकिन उसका घोडा, अडियल बन गया । वो चलकर ही न दिया। और फिर जब नयना ने बडे गुस्से में ऐडी मारो तो घोडा. पलटकर दौडने लगा । नयना ने बडी, कठिनाई सै उसे रोका । उसने घोडे, का रूख मोड़ा और दोबारा ऐड लगाई तो इस बार घोडा.जंगल की तरफ बढ लिया । नयना धीरे-धीरे रफ्त्तार बढाती. गई l कुछ ही देर के बग्द वह भी जगल में प्रवेश कर गई थी ।

इन्द्रजीत का घोडा इस बीच जाने कहा से कहा निकल गया था।

नयना नै अपने घोड़े क्रो रोका और जगल' का जायजा लेने लगी। जगल' में सन्नाटा था। इन्द्रजीत का कहीं पता नहीँ था l

घोडे कीं टापों के ताजा निशान नजर आरहे थे। नयना उन निशानों पर निगाह रखे अपना घोडा. दौडाने लगी। पर थोडा… आगे जाने के बाद ये निशान गायब हो गए थे क्योंकि यहां जमीन पक्की थी I

नयना परेशान हो गई। घोड़े के सूमों के निशान गायब थे । जगल' में कोई रास्ता या पगडडी' किस्म क्री चीज नहीं थी कि वह उसी पर चल पडती। अब महज अनुमान सै ही आगे बढना. था । नयना अनुमान रो ही एक तरफ बढ़ ली, पर काफी दूर तक जाने के बाद उसे कोई सुराग नहीं पिला।

वह बापस पलटी और अब उसने एक दूसरी दिशा में सफर शुरु किया। इस बार वह रूक-रूककर इन्द्रजीत को पुकारती भी जा रही थी । लेकिन जगंल' में जानवरों और पक्षियों कीं आवाजों के अलावा सुनाई नहीं दे रहा था । उसकी पुकार का कोई जचाब नहीं मिल रहा था।

नयना हैरान और परेशान थी कि इन्द्रजीत आखिर कहां गया। घोडा. किसी वजह सै बेकाबू हो गया था तो उसने अब तक उस पर काबू पा लिया होगा। उसे वापस आ जाना चाहिये था। इन्द्रजीत के घुडसबारी, के अंदाज' सै इस बात का यकीन तौ था ही कि वह कोई अनाडी घुडसबार. नहीं । नयना को अपने छोडे पर भी हैरत थी कि वह क्यो अचानक पलटकर भाग निकला था । उसकी इस हरकत पर नयना क्रो बहुत गुस्सा था। वह सोच रही थी कि इस घोडे क्रो गोली मरवा देगी । इस घोडे ने उसे इन्द्र के सामने शर्मिन्दा करके रख दिया था ।

फिर उसने खुद को सम्भाला और इन्द्रजीत के बारे में सोचने लगी।

यह हादसा और उस पर अपने घोडे की प्रतिक्रिया, उसे सामान्य साधारण नहीं लग रही थी। अज्ञात से भय और अन्देशे जहन में उठने लगे थे । उसे इन्द्रजीत क्री चिन्ता सता रही थी। इन्द्रजीत को अगर कुछ हो गया तो वह कन्हीं की न रहेगी। बर्बाद हो जाएगी।

वह अब पागलों की तरह ही जगल में घोडा दौडा… रही थी। रह-रह्र कर अपने' इन्द्र क्रो पुकार रही थी ।

. घोडा, दौडाते-दौडात्ते. और उसे आवाजें देते-देते, वह अचानक एक जगह रूक गई। सामने एक पेड़ की जड में, एक पत्थर पर, इन्द्रजीत की कमीज पडी. थी।

नयना का दिल धक्क से रह गया । वह फौरन घोड़े-सै कूदी और भागती हुई पेड के नीचे पहुची'। उसने बडी बेकरारी के साथ उस कमीज को उठाकर देखा । कमीज बिल्कुल साफ-सुथरी थी। उस पर किसी भी प्रकार का कोई दाग-धब्बा नहीं था । यहीँ लगता था जैसै कमीज इन्द्रजीत ने खुद ही उतारकर उस पत्थर पर डाल ही हो ।

लेकिन इन्द्रजीत कहा गया? घोडा कही भी नजर नहीं आ रहा था। नयना ने आस पास का इलाका छान मारा-लेकिन ‘कोई सुराग न मिला।

उसने इन्द्र की कमीज अपने गले से बांध ली और घोडे पर सवार हो गई । वह अब फिर घोडे पर सवार हो उसे टूढ' रही थी. . . आवाजें दे रही थी।
 
नयना ने चलते-चलते क्लाईं घडी पर निगाह डाली । जगल में भटकते हुए उसे लगभग दो घन्टे हो चुके थे और इन्द्रजीत का कुछ पता नहीं था।

यूं ही भटकते वह एकाएक चौक पडी । उसे अपने सामने एक चार फूच ऊचा' एक चबूतरा नजर आया था । चबूतरा पत्थरों से बनाया गया था और अनुमान से वह छ: फुट लम्बा और छ: फुट चौडा, था I इस चबूतरे आस-पास जगह साफ थी।

जगल' में इस चबूतरे के निर्माण का क्या मक्सद हो सकता है। यह समझ मै नहीं आया। चबूतरा ऐसा साफ-सुथरा था कि लगता था कि जेसे अभी-अभी झाडू' दी गई हो।

चबूतरे पर खडे होकर नयना ने इन्द्रजीत को जोर-जोर से आवाजें दीं-पर कोई जबाब नहीं मिला। फिर उसने चबूतरे से उतरकर आसपास का इलाका छान मारा I

इन्द्रजीत तो नहीं मिला, हा'-उसक्रा घोडा. मिल गया था I घोडा एक पेड, तले सिर झुकाये खडा था । अब स्थिति और भी सगीन' हो गई थी।

घोडा मोजूद था और इन्द्रजीत का कही कुछ पता नहीं था। नयना बेचारी केसे जान सकती थी कि उसके इन्द्रजीत पर क्या बीत गई। उसने तो आखिरी वक्त में उसके घोडे को भडककर सरपट दौड़त्ते और इस जगल' में दाखिल होते देखा था ।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

इन्द्रजीत पर जो बीती, थी वह कम रहस्यमय और अविश्वसनीय न थी । जगल में दाखिल होने से पहले इंद्रजीत ने बहुत कोशिश की थी कि वह किसी तरह घोडे पर काबू पा ले। उसे घुडसवारी के जितने गुर आते थे । उसने सभी आजमा डाले थे। लेकिन घोडा था कि काबू में नहीं आ रहा था । घोड़ा बेलगाम हो गया था जैसे । जोरों से लगाम खिचने पर घोडे का मुह' खूंन-खून हो रहा था लेकिन उसने हार नहीं मानी थी I.

सरपट दौडता रहा और जगल में चला गया ।

इन्द्रजीप्त ने लगामे ढीली छोड दी । और कोई चारा जो नहीं रहा था । उसे अदाजा' हो गया था कि घोडा, अपने आपे में नहीं है । उसने घोडे को उसकी मर्जी पर छोड दिया था। वह जानता था कि नयना उसके पीछे आ रही होगी। सो उसने नयना के मार्ग दर्शन के लिए ही अपनी कमीज उतारकर एक जगह फेंक दी थी ।

पर फिर आगे जाकर घोड़ा अचानक ही और खुद ही एक जगह रूक गया।

वह एकाएक ही अपने अगले पैरों पर खडा. हो गया और यूं अपना सन्तुलन बनाए नहीं रख सका और गिर गया । इन्द्रजीत अगर फौरन ही उसकी पीठ पर से कूंद न गया होता तो उसका घोडे तले ही दब जाना निश्चित था।

घोडे से कूदकर इन्द्रजीत जब सीधा ख़ड़ा हुआ तो उसने अपने सामने एक चबूतरा देखा। इस पर एक लाल कालीन बिछा हुआ था, जिसके बीचौ-बीच कोई बैठा हुआ था, जिसकी पीठ इन्द्रजीत की तरफ थी।

इस घने जगल' में यह पत्थर का पक्का, चबूतरा...उस पर सुर्ख कालीन और कालीन पर चादर में लिपटी एक मानव काया। विचित्र रहस्यमय नजारा था ।

इन्द्रजीत घीरे-धीरे चबूतरे के निकट पहुचा' और उस चादर ओढे बैठे वजूद से संबोधित होते वोला-- “कौन हो तुम. . . ? "

इन्सानी आवाज सुनकर उस वजूद में ह्ररकत हुई और वो चादर आडे ओढे ही उठकर खडा… हो गया । फिर इन्द्रजीत की तरफ घूमा-और चादर अपने सिर से सरका दी ।

रेशमी चादर, उसके रेशमी बदन से फिसलकर चबूतरे पर आ गिरी।

वह एक गौरवपूर्ण-खूबसूरत औरत थी जोर अब उसके शरीर पर लिबास नाम क्री कोई चीज न थी। भरे भरे बदन की यह निर्बस्व नवयौवना। इन्द्रजीत इस प्रलयकारी दृश्य की ताब न ला सका, उसने फौरन ही अपना मुह दुसरी तरफ कर लिया ।

"अरे, यह लज्जा कैसी? शर्माते क्यो हौं?" वह हसकर बोली। उसकी आवाज मैं मिठास थी ओर शोखी भी । और फिर उसकी हसी', जैसे वीणा के तार झनझना उठे हों, मेरी तरफ देखौ, मेरे समीप आओ... । "

"यह.. तह क्या तमाशा है?" इन्द्रजीत थूक निगलते बोला ।

"तमाशे तो तुम दिखाते रहे हो, मेरे जादूगर मैने तो कोई तमाशा नहीं दिखाया... ।" वह एक शोख अदा के साथ लहराई और अपना खूंबसूस्त हाथ आगे बढा, बडी हसरत से बोली, ''आओ, ऊपर आ जाओ... ।"

उसका कोमल हाथ बढा का बढा रह गया। इंद्रजीत ने कोई तबज्जो नहीं दी । उसका तो दिमाग चकराया हुआ था । यह बात तो उसकी कल्पना में भी नहीं थी कि इस भरे जगल में कोई कयामत यूं उसके सामने आ जाएगी । ओर कयामत भी ऐसी कि जो उस पर टूट पडने, को तत्पर थी । नख शिख से एक खुली दाद बनी उसके सामने खडी थी। और उसका समूचा वजूद ही जेसे कुछ माग रहा था।

इन्द्रजीत ने झुकी निगाहों के साथ ही जैसै गुहार की । "क्या यह सम्भव किं तुम अपने पेरों में पडी चादर क्रो अपने सिर पर रख लो...पहले की भाति' ही ओढ लो उसे।

"शर्मीले...मूर्ख । यह कहकर वह कयामत झुकी-पैरों में पडी, चादर उठाई और सिर से पांव तक अपना प्रलयकारी यौवन छुपा लिया । फिर प्यार भरी नजरो से इन्द्रजीत क्रो निहारते हुए बोली-- "लो अब ऊपर आ जाओ। "

इन्द्रजीत कालीन बिछे चबूतरे पर चढ गया। उसने खुद को सम्भाल लिया था । बौला--"हां , अब कहो।"

" बैठो... ! " यह कहकर वह स्वयं भी बैठ गई।

"कौन हो तुम..?" कालीन पर बैठते हुए पूछा था इन्द्रजीत ने।

"तुम क्या समझते हो अपने आपको...बहुत सुना है...जिसका दिल चाहोगे तोडकर गुजर जाओगे ।" उस रूपसी के तेवर एकाएक बिगड गए थे।

"मैंने किसी का दित नहीं तोडा। " उसका आशय न समझते हुए भी इन्द्र ने सफाई दी।

"कटारी के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है। ” रूपसी ने इशारा किया।

इन्द्रजीत चौंका। उसने तेजी से पूछा "तुम कटारी को केसे जानती हो? अपने बारे में बताती क्यों नहीं। तुम कौन हो? "

"मैं तो राजू मदारी के बारे में भी जानती हूं। उसका हत्यारा कौन है बता सकते हो?"

"मैं नहीँ हूँ। " इन्द्रजीत ने मुर्दा लहजे में कहा।

"तुम नहीं हो तो फिर और कौन है?” रूपसी के लहजे में सख्ती भर आई थी, ”राजूमदारी ने अपने घर में तुम्हें इतने प्यार से रखा...इस कद्र मुहब्बत दी। तुम्हें अपने इल्म सिखाये। तुम्हारी जान बचाई। और...तुमने उसके साथ क्या किया... । उसकी बेटी का अपमान । उसका दिल तोडा। उसकी मुहब्बत को न समझा। फिर राजू मदारी के विश्वास को ठेस पहुंचाई । धोखे से उसकी हत्या करबा दी l राजूमदारी तुम्हारा मोहसिन-तुम्हारा जीवनदाता था। तुमने अपने परोपकारी और हितैषी के साथ ऐसा व्यवहार किया I बोली, क्यों? ''
 

Similar threads

S
Replies
69
Views
70
StoryPublisher
S
S
Replies
1
Views
11
StoryPublisher
S
S
Replies
30
Views
31
StoryPublisher
S
S
Replies
6
Views
49
StoryPublisher
S
Back
Top