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A Horror Novel - स्वाहा complete

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"उसने मुझे गुलाम बना लिया था। मुझ पर कब्जा कर रखा था । ' ' इन्द्रजीत ने जेसे सफाई दी।

"यह क्यों भ्रूल जाते हो कि उसने तुम्हारी जान बचाई थी। अगर उसने ऐसा न किया होता तो आजतुम कहां होते? "

' 'इसके लिए में उसका शुक्रगुजार था । मैंने उसकी बहुत सेवा की। उसका गुलाम बनकर रहा.. . ।"

“सेबा...?उसकी हत्या करवा के...।" ' ' वह विषाक्त लहजे में ब्रोली-' 'वाह I. क्या सेवा की है तुमने उसकी । ' '

“ आखिर तुम हो कौन? ' ' इन्द्रजीत असहाय-सा बोला।

' 'मेरे जादूगर । मै तुम्हारी सजा हूँ...एक खूबसूरत सजा...।” उस रूपसी ने अजीब-सा अदाज अपना लिया था । और जाने क्या था उसके स्वर में कि इंद्रजीत ने अपनी रगों में एक सर्द लहर दौड गई महसूस की।

उसने अपने सूख चले होठों पर जिव्हा फेरी और पूछा-"कहां से आई हो? ' '

"मुझे देवा काली ने भेजा है। ' '

"कौन देवा काली? "

"वहीँ देवा काली, जिसे राजूमदारी ने अपने अंतिम क्षणों में, अपनी सहायता के लिए पुकारा था तो उस समय मैं देवा काली क्रे चरणों में बैठी थी । राजूमदारी की पुकार सुनकर देवा काली ने मुझे इशारा किया। उसके आदेश पालन में में राजू मदारी की सहायता को गई। लेकिन समय बीत चुका था । मैं राजूमदारी को बचा नहीं सकी।। मरते हुए उसकी इच्छा थी कि उसकी मौत का प्रतिशोध लिया जाए कि उसके साथ धोखा करने वाले को बख्शा न जाए। सो तुमने सुन लिया कि मैने योगी दयाल की क्या दुर्गत बनाई । वो अपनी जान से गया। अब तुम्हारी बारी है । मैं तुम्हें मारूगी नहीं | इसलिए कि मै' स्वय तुम पर मर गई हूँ। अब तुम सिर्फ मेरे लिए जीवित रहोगे। मेरे होकर रहोगे, मेरी कैद मे रहोगे !"

"और अगर मैं तुम्हारी कैद में न रहना चाहूँ तो... । "

"बात तुम्हारे चाहने की नहीं है-मेरे चाहने की है। ' ' वह हसी', उसकी हसी' में व्यग्य' था।

“लेकिन मैं किसी और को चाहता हूं। उसी की कैद में रहना चाहता हू।" इन्द्रजीत नै अपने दिलं की कही।

" ~ अब भूल जाओ उसको।" वह इन्द्रजीत क्रो गहरी नजरो से देखते हुए बोली---"मैं जानती हूँ वो आ रही है I तुमने उसे रास्ता दिखाने के लिए अगनी कमीज राह में फैक दी है और वह स्वयं तुम्हें दूढते हुए अतत': इस चबूतरे तक पहुच जाएगी लेकिन उसके आते ही यहा कुछ नहीं रहेगा। ' '

”औह । अच्छा हुआ कि यह तो मालूम हो गया कि नयना आखिरकार यहां तक पहुच जाएगी। अब मैं यहां से नहीं हिंलूगा'। यहीं बैठा रहूगा। उसके आने की इंतजार करूगा... । ‘ ‘ इन्द्रजीत ने निर्णायक लहजे में कहा ।

' 'क्या चाहते हो...तुम्हारी नयना को अधा का दू ताकि वह यहा तक कभी पहुच ही न सके। " उस रूपसी ने यह बात बेहद सर्द और निर्मम लहजे में कही थी ।

"कोई खास अमल जानती हो क्या?'' इन्द्रजीत ने बिषय बदलते हुए पुछा ।

"इस जगत में एक नर्म आरामदायक कालीन पर बैठे हो। इसके बाद भी तुम्हे किसी अमल का सबूत चाहिये…।"

"मैं तुम्हारा नाम जान सक्ला हूँ?"

' 'मेरा नाम बकाल है । ’ '

"बकाल...यह क्या नाम हुआ भला।" इन्द्रजीत सचमुच ही उलझ गया था ।

”बकाल का अर्य है -रेगिस्तान की शहजादी। " उसने मुस्कराते हुए बताया-- ' 'क्या मैं तुम्हें बकाल दिखाई नहीं देती? रेगिस्तान की शहजादी नजर नहीं आती?"

इंद्रजीत उसको इस बात का क्या जवाब देता । वह निसन्देह ही एक बेहद सुन्दर आकर्षक युवती थी । एक सवप्न सुन्दरी। उस पर उठने वाली नजर मुश्किल से ही झुकती थी । अब वह मरुस्थल की शहजादी थी या पहाडों की मलिका थी यह इन्द्रजीत की समस्या नहीं थी। इन्द्रजीत की समस्या तो केवल यही थी कि नयना किसी भी तरह यहा तक पहुच जाये और उसको लेकर निकल जाए। इसी हालात ने इंद्रजीत की खोपडी घुमा दी थी ।। वह खुफजदा होने की हद तक चिन्तित हो उठा था ।

बकाल ने अब और अधिक समय नष्ट करना उचित न समझा। वह शीघ्र अतिशीघ्र अपनी कारवाई पूरी कर लेना चाहती थी । वह जानती थी कि नयना को यहा तक पहुचने में बहुत देर लगेगी । फिर भी वह खामखाह की उलझनों में नहीं पडना चाहती थी।

उसने इन्द्रजीत को मादक-नशीली निगाहों सै देखा। बेहद मनमोहक अंदाज में मुस्कराई और फिर शहद से मीठे लहजे मे बोली---

"इंद्र ! मेरा एक काम करो । "

"हां, बोलो… ।" इन्द्रजीत स्वय को निर्भय साबित करना चाहता था और इसमें वह काफी हद तक सफल भी नजर आ रहा था ।

"तुम्हारा घोडा कहा' है?" बकाल नै पूछा ।

"निकट ही है वह उधर उन पेडों के झुण्ड में है । " इन्द्र ने बताया ।

" जाओ, उसकी दुम का एक बाल ले आओ । " बकाल ने बडी, बिचित्र फरमाईश क्री।

"बाल…? क्या करोगी?" इन्द्र उछल ही तो पड़ा था।

"तुम तो बडे जादूगर हो-तुम्हें तो मालूम होगा । " उसने हंसकर कहा।

"नहीं मैं नहीं जानता। मैंने आज तक घोडे के बाल सै कोई चमत्कार नहीं दिखाया।”

"अच्छा, फिर जाओ, लेकर आओं । मैं आज तुम्हें एक जबरदस्त तमाशा दिखाती हूँ अगर पंसद आया और तुम सीखना चाहोगे तो तुम्हें सिखा भी दुगो' । " बकाल ने उसे अपनी चमकती-प्यासी आखो सै देखते हुए कहा ।

“इन्द्रजीत चबूतरे से उतर गया। वह उन पेडों के झुण्ड की तरफ बड़ गया, जहा उसका घोडा, खडा था। वह घोडे के निकट पहुंचा तो उसके दिमाग में एक छन्नाका-सा हुआ। उसने सोचा कि क्यो न मोके का फायदा उठाए और घोडे पर सवार होका निकल ले । यह बकाल उसका कुछ न कर सकेगी-बस देखती ही रहेगी । पर फिर यह ख्याल भी आया कि अगर वह यहा से निक्ल गया तो नयना को केसे पाएगा । जब तक कि वह जगल सै बाहर निक्लेगा, तब तक तो नयना यहा' पहुच जाएगी । फिर यह मायावी बकाल उसे भला कहा छोडेशी । फिर यह जाने नयना की क्या हालत करे, हो सकता है उसे अंधा ही बना दे। हां अभी उसे कुछ देर सब्र करना चाहिये। उसे देखना चाहिये कि वह घोड़े के बाल का क्या करती हे? कैसा तमाश दिखाना चाहती हे I हो सकता है तब तक नयना उसे तलाश करते हुए यहां तक पहुच जाए ।

नयना के ख्याल से इन्द्रजीत के दिल में दुस्साहस दिखाने का ख्याल निक्ल गया।

इन्द्रजीत ने यह भी सोचा कि नयना के साथ मिलकर वह शायद इस बकाल की बच्ची को ठिकाने लगा सके। इन्द्रजीत घोडे की दुम का बाल तोड बापस बकाल के पास पहुचा' I

"यह लो ।" बाल, बकाल के सामनें लहराते हुए बोला था वह॥॥

बकाल ने बाल ले लिया फिर दोनों हाथों से पकडकर खींचकर देखा। खासा लम्बा और मजबूत बाल था। वह बाल थामे इन्द्रजीते की तरफ बडी I बोली---

' 'मेरे जादूगर I. आज मैं तुम्हें एक ऐसा जादू दिखाती हूँ किं तुम जिन्दगी भर याद रखोगे । तुम का जैसा मैं कहुं बैसा ही करते जाओ I"

"ठीक है आज्ञा दो-क्या करना है?" इंद्रजीत ने दिलचस्पी दिखाई।

”पहले मै तुम्हारे हाथ पीछे करके इस बात से बाधूंगी । फिर टागो और उसके बाद तुम्हारे पूरे जिस्म पर इस बाल को बांध दुगी । "

इन्द्रजीत हस' दिया--"' 'देवी जी, आप भुल रही है कि यह घोडे की दुम का बाल है कोई रस्सी नहीं है। इससे तुम मेरे हाथ ही बांध सको तो यही बहुत है । ' '

' 'तुम तो बस मेरा कमाल देखते जाओ और मुझे दाद देते जाओ । लाओ, अपने हाथ लाओ । "

इन्द्रजीत ने अपने दोनों हाथ उसके सामने कर दिये।

"अपने हाथ पीछे करो... । ' ' बकाल ने कहा और फिर यूं उसके हाथ पीछे करके एक खास अंदाज में बांध दिये।

बैठ जाओ ।
 
इंन्द्रजीत बैठ गया तो उस मायवी रूपसी ने उसके दोनों पांव उस बाल से कस दिये I

इन्द्रजीत हैरान-परेशान देखता रहा कि वह बाल इतना लम्बा कैसे हो गया । बाल था कि शैतान की आंत की तरह खिचता' ही चला जा रहा था I

हाथ पांव बांधने के बाद, बकाल ने उसके पेरों के दोनों अगूठे' मिलाकर उन पर बाल लपेटना शुरु किया और फिर उसने इतने से बाल को इतना लम्बा किया कि उसने उसी बाल को इन्द्र के जिस्म के गिर्द भी लपेट दिया । और इससे भी वडी हैरत की बात तो यह थी कि उसने इन्द्रजीत क्रो उस बाल से इस तरह कस दिया था कि अब इन्द्र अपने वदन को हिला भी नहीं सकता था।

बकाल ने उसे एक करवट से लिटा दिया था और कहकहे लगाकर हँसने लगी ।

"क्या हुआ? यह यूं पागलों की तरह क्यों हस' रही हो?" अपनी असहाय मुद्रा पर बल खाते पूंछा था इन्द्रजीत ने।

"हसू न फिर क्या करू. मुझें आशा नहीं थी कि तुम इतनी आसानी से मेरे जाल में फंस जाओगे । ' '

' 'मैं समझा नहीं । ' ' इन्द्रजीत क्ती परेशानी बढती जा रही थी।

"तुमने देखा कि एक छोटा-सा घोडे, का बाल मेरे हाथों में किस कद्र लम्बा हो गया।"

"हां, निसदेह यह तो एक चमत्कार है I ”

' 'मैंने जो चमत्कार कर दिखाया है-उसका तो तुम्हें अदाजा' ही नहीं है।"

' 'कुछ बताओ तो समझ में आये।" इन्द्रजौत अब भीतर ही भीतर सहमा जा रहा था I

' 'यह घोडे का बाल, किसी मजबूत रस्सी से कम नहीं। बल्कि इसे तो कांटेदार रस्सी कहना चाहिये I अब तुम मेरो इच्छा क्रे बिना इस बन्दिश से आजाद नहीँ हो सकते I ' ' वह बडे ही रहस्यमय स्वर में बोली थी I

अज्ञात अंशकाऐ इन्द्रजीत को दहलाने लगी--”यह क्या मजाक है।" उसने हिम्मत जुटाकर पूछा I

' 'यह मजाक्त नहीं, बल्कि एक सगीन' हकीकत हे। जरा आजाद होने को कोशिश तो करो। ' ' बकाल ने चह्रकते हुए कहा ।

इन्द्रजीत करवट के बल लेटा था I हाथ उसकी पीठ पर बधे हुए थे। पाव भी बंधे हुए थे और फिर वह घोडे का बाल उसके पूरे बदन पर लिपटा हुआ था l उसने खुद को आजाद कराने की कोशिश करते हुए अपने हाथों का घुमाया...जोर लगाया...झटक्रा...ओर तब उसे एकाएक तीव्र पीडा. का अहसास हुआ।

यहीँ लगा था उसे, जेसे घोडे, कीं दुम का वह बात उस्तरे की धार बनकर उसके मांस में उतर गया हो ।

दर्द क्रो पीते, इन्द्रजीत ने फिर अपने पैरों को जुम्बिश दी । यहां भी बाल तेज धार कीं तरह चुभा I वह अपने बदन के जिस अंग को मी ह्ररकत देता...घोड़े का बाल जहा भी कसाव लेता- तेज धार हथियार की तरह गोश्त में घुस जाता खून छलकने लगता।

बकाल ने सही कहा था। वह घोडे का बाल, लोहे का बहुत बारीक तार बन गया था । ऐसा तार जो न टूट सकता था । ना खुल सकता है। बल्कि जोर आजमाई पर शरीर क्रो किसी ब्लेड की तरह काट सकता था ।

"यह क्या किया तुमने? " वह चीख ही तो उठा था ।।

”कुछ नहीं, अपनी पकड़ में लिया है।" वह खनकती हुई आवाज में बोली।

"देखो मुझे आजाद कर दो । मुझे अपने घर जाना है । अपने मां बाप से मिलना है । " इन्द्रजीत की गुहार किसी भयभीत बच्चे जैसी ही थी ।

' 'अब तुम किसी से नहीं मिल सकते। तुम्हारी सारी मुलाकातें बद'।"

"तुम करना क्या चाहती हो-इस तरह तो मैं मर जाऊगा... ।"

' 'यह जिम्मेदारी मेरी है मैं तुम्हें मरने नहीं दूगी'। ' ' वह लुप्त लेती मुस्कान के साथ बोली-- ' 'तुम अगर मर गए तो फिर दण्ड कौन भुगतेगा I‘ ‘

“अच्छा. मेरे शरीर को तो मुक्त कर दो-बेशक हाथ पाव' बंधे रहने दो... I"

' 'फिलहाल यह भी सम्भव नहीं I " बकाल ने बडी रुखाई के साथ कहा।

" फिर...फिर क्या सम्भव है। कुछ बताओं तो सही।”

"मै तुम्हें तुम्हारी आबादी से दुर लिए जाती हूँ। ' ' बकाल ने सुझांव रखा।

"आखिर कहां ?"

"अपने इलाके में, अपनी आबादी में, एक नई दुनिया में... ।"

' ' 'वहा मुझे क्या करना होगा? "

" कैदी को भला क्या करना होता है। तुम कैद काटोगे । कैद-ए-तन्हाई ('एकान्त की कैद) ॥" वह होंठ सिंकोडते. हुए बोली ।

' 'मुझे नयना से तो मिल लेने दो जो तुम्हारे कथनानुसार अब यहा पहुचने ही वाली होगी।"

' 'बस अब अपना मुह' बद' कर लो-बहुत सुन ली मैने तुम्हारी बक बक । ' ' वह एकदम तैश में आ गई। आखों में एकाएक ही वीरानी और निर्ममता नजर आने लगी थी। वह उठकर खडी हो गई।

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इन्द्रजीत फटी-फटी आखो से बकाल को देखने लगा।

यह मायावी रूपसी अब न जाने क्या करने जा रही थी।

बकाल नीचे उतर आई I उसने इन्द्रजीत की टागे घसीट कर उसे सीधा किया और फिर उसके दोनों पैरों के अगूंठे थाम लिए ।

पांव के अगूठे पकडत्ते ही इन्द्रजीत पर मादकता-सी छाने लगी-उसकी रगों में नशा-सा उतरने लगा और अपनी यह अवस्था उसे जानी-पहचानी-सी लगी और उसे याद आया कि हवेली में मेहमान खाने के अपने कमरे में भी वो इसी मनोस्थिति का शिकार रह चुका है। यह कोमल. स्पर्श यह मादकता, वैसी ही थी, वैसी ही आनन्दप्रद और नशीली । यानी कि बकाल वहां भी मोजूद थी।

उफ । आखिर यह कब से उसके पीछे है।

इन्द्रजीत चाहता था क्रि वह इस बारे में बकाल से कुछ पूछे...सवाल करे । लेकिन अब उसमें जैसे कुछ बोलने की सामर्थ्य कहा रही थी।

वह उस पर छाती जा रही थी । उसके पांव के अनूठे से पिण्डलिर्यों पर, वहा' से ऊपर, और ऊपर I उसकी आखें' बद होने लगीं । उसके समूचे बदन में ही लहरें उठ रही थी । जज्जबात का ज्वार भाटा चढता जा रहा था। यह वासना का ही तो वेग था। यह तो शरीरों के सगम का ही उफान तो था । धुंआ सा बिखर रहा था। एक घटा सी छा रही थी ।

वह खुद क्रो डूबता सा महसूस कर रहा था। जहन अंधकारमय होता जा रहा था । कानों में हवाओं का शोर था । आनन्दप्रद सिसकियाँ सी सुनाई दे रही थीं ।

हरारत भरी मासल देह का बोझ अब वह जैसे जागते अहसास सें अपने ऊपर महसूस कर रहा था। बकाल के बदन की महक इस नशे क्रो बढा रही थी । इंद्रजीत खुद को किसी हिंडोले पर महसूस कर रहा था। बकाल ही थी जो उसे इस हिंडोले पर ले उडी थी।

अनूठा था यह सुलगती ख्वाहिशों का सगम', बकाल का चेहरा दहकता अंगारा' बन था और अब इन्द्रजीत भी जेसे राजी-राजी उसके इस खेल मे उसका साथ दे रहा था। रहस्य क्री परतें उधड़ रहीँ थीं और इन्द्रजीत हकीकतों क्रो समझ रहा था। बकाल वह तूफान थी जो इन्द्रजीत को अपने आचल में लिए उठा-गिरा रही थी।

विश्वास नहीं होता था कि कोमल-सी ज्वाल में ऐसा आवेश भी भरा हो सकता है । मुद्राएं बदलती रही थी । इन्द्रजीत भी जैसे सबकुछ भूल बासना के बवडर' में आन फँसा था। बकाल अब बाहें फैलाए उस पर बिछी थी। यह तो जैसे अपनी हर कोशिश के साथ, अपना वजूद इन्द्रजीत में मिटा देना चाहती थी ।

बकाल अपनी मर्जी से खेली, खूब खेली, पर इस खेल के निर्णायक क्षण भी तो निश्चित थे। अत' वही हुआ जो होता है I बदलियाँ टकराई...र्कोघी और फिर बरसात हो गई।

बरसात इतनी हुई कि इन्द्रजीत ने खुद को भीतर तक भीगा महसूस किया। व्याकुलत् के शोलों क्रो भी भक्क से बुझा गई थी यह बरसात I

शोले ठण्डे पड़ गये। आग बुझी तो धुंआ-सा फैलता गया। और फिर मन-मस्तिष्क पर सन्नाटा व्याप्त हो गया। इन्द्रजीत ने खुद को इस सीमा रेखा पर बिखरा महसूस किया।

अजीब बीते थे ये क्षण-जेसै कोई सपना। खुद से बलात्कार का यह अहसास आनन्दम्रद ही था ।

इन्द्रजीत अपने होश गंवा बैठा था । और फिर जब उसने होश सम्भाले तो उसे अत्याधिक कमजोरी का अहसास हुआ। यही लग रहा था जेसे किसी ने उसके भीतर का सबकुछ निचोड लिया हो । इस खेल में ऐसी कमजोरी के बारे में तो कभी नहीं सुना_ था । पर कमजोरी थ्री । वह खुद क्रो कमजोर और निचुड़ा-निचुड़ा-सा महसूस कर रहा था ।

उसने वडी मुश्किल से अपनी आखें खोलीं।

ऊपर निगाह की तो न आकाश नजर आया न पेड… I उसे ऊपर किसी झोंपडी… की छत्त नजर आ रही थी। वह कालीन ही पर लेटा हुआ था-पर उसके हाथ-पैर बंधे न थे। यह अहसास होते उसे देर न लगी थी कि कदाचित लेटा हुआ था और उसके हाथ कमर के नीचे दवे हुए नहीं थे, वल्कि पहलु में थे । पैरों की बन्दिशे भी खुली हुई थीं I उसका जिस्म भी आजाद था ।

, स्वय क्रो बंधन मुक्त महसूस करके उसे खुशी हुई-क्योंकि घोडे के बाल कीं वह जकडन बहुत ही कष्टदायक थी।

राहत के इन क्षणों में वह आपनी शारीरिक कमजोरी को भी भूल गया और उसने चकित भाव से इस बदले-बदले माहोल का जायजा लिया। वह स्वत्तन्त्र था-बधनं मुक्त था-लेकिन अब न वह जगल' था, न वह चबूतरा था...ओंर न ही वह होशरूवा मायावी बकाल । था तो सिर्फ कमजोरी से बद होती आखें' ।
 
इन्द्रजीत ने देखा किं बह एक छोटी-सी गोल झोपडी में था-जिसका छोटा सा दरवाजा था। इस दरवाजे से धूप अन्दर आ रही थी। उसे बाहर का दृश्य नजर नहीं आ रहा था । उठने की उसमें शक्ति न थी । वह यू ही निश्चल साकत पडा… रहा I

वह नहीं जानता था कि वहा केसे पहुचा' । उसे बस इतना ही याद था कि मायावी बकाल ने उसकी टागे घसीटकर उसके दोनों पैरों के अगूठे पकड, लिये थे । और उस पर एक अजीव सी कैफियत छाती चली गई थी । और फिर उसने उसी बेखुदी में वह भोगा था-जिसे पत्मानन्द का नाम दिया क्या था । तृप्तियां बटोरी थीं उसने और अब वेहद कमजोरी महसूस कर रहा था ।

कुछ ऐसे ही अनुभव उसे हवेली में भी हुये थे। वहा भी वह किसी ह्ररारती देह द्वारा निचौड़ा गया था। क्या वह बलात्कार का शिकार था? क्या बकाल ऐसे ही काम-सुख की रसिया थी । हवेली में तो वह खुद ही अपनी पिलाहट देख घबरा रहा था। इस सनातन सुख़-दौहन का ऐसा परिणाम तो नहीं होता।

बहरहाल, जो कुछ भी था उस खेल के बाद अब इन्द्रजीत स्वयं को एक नई जगह पा रहा था। एक छोटी सी झोपडी में। शायद, जैसा कि बकात्त ने कहा था, वो उसे अपने इलाके, अपनी आबादी में ले आई थी,..किसी नये जहान में।

इन्द्रजीत ने सोचा कि वह बाहर जाकर देखै कि वह कहा आ गया है। उसने उठने की कोशिश की लेकिन उसके हाथ-पैरों का तो जैसे दम निक्ला हुआ था । ऐसी निर्बलता थी-यूं मह्रसूस हो रहा था जेसे वह बरसो का बीमार हो।

वह महज अपनी गर्दन उठाकर रह गया।

इस तरह गर्दन उठाना भी तो उस पर भारी पडा था। उसकी आखों के सामने अघेरा' छा गया था और सिर में दर्द की एक ऐसी टीस उठी थी कि वह तडपता रह गया था । वह अपनी गर्दन गिराकर बुरी तरह हाफने लगा था।

अभी उसकी आयु ही क्या थी। वह उन्नीस-बीस बरस का एक कडियल जवान था । लेकिन इस वक्त उसकी हालत देखकर उस पर तरस ही खाया जा सकता था।

वह निश्चल और बेहरकत पड़ा काफी देर तक लम्बे-लम्बे सास लेता रहा। तब कहीँ जाकर उसका सास काब्रू में आया लेकिन जान अभी नहीं आई थी। उसने झोपडी के भीतर एक निरीक्षण करती नजर डाली। झोपडी में एक तरफ एक छोटी सी मेज थी । उस पर कुछ ढका हुआ रखा था I मेज के नीचे बने पायदान पर काला कपड़ा तह किया' हुआ रखा था । शायद कोई चादर इत्यादि थी, मेज के बराबर में राक सुराही थी, जिस पर एक कटोरा ढका हुआ था । इस मेज और सुराही के अलावा इस झोपडी में कोई और चीज नहीं थी-अलबता कालीन जरूर बिछा हुआ था।

इंद्रजीत उठकर बाहर जाना चाहता था । लेकिन कईं धन्टे बीत जाने के बाद भी उसमें इतनी शक्ति नहीं थी । उसका गला सूखा रहा था काटे से पड रहे थे। वह उठकर सुराही से पानी पीना चाहता था । लेकिन उसकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी । जब दो-तीन घन्टे गुजर जाने के बाद भी उससे उठा न गया तो उसने सुराही तक कालीन पर लुढकते हुए ही पहुचने की सोची । सुराही ज्यादा दूर न भी I मुश्किल सै पाच-छ: फुट के फासले पर ।

यह सोचकर उसने अपनी इच्छा शक्ति को मजबूत करके अपना बाया हाथ घुमाकर कालीन पर रखा । फिर धीरे से करवट ली । यह करवट लेते ही जेसे उसकी जान. निकल गई थी I पर फिर इसी तरह वह करवर्टें बदलकर लुढकता हुआ-किसी न किसी तरह सुराही तक पहुच गया l

उसने थोड़ा-सा उठकर सुराही के ऊपर उल्टा रखा कटोरा उतारा और उसे नीचे कालीन पर रखकर एक हाथ मैं सुराही झुकाई । पानी से लबालब भरी हुई थी । जरा-सा ही झुकाने पर उसमें पानी छलक पडा. । कललक क्री आबाज के साथ पानी कटोरे में गिरने लगा ।

कटोरा भरने के करीव हुआ तो उसने सुराही सीधी कर दी I और हाफते हुए लेट गया। कुछ देर बाद जब सास' संयत हुई तो उसने किं जरा सा उठकर कटोरा उठाया और अपने मुह' सै लगा लिया।

पानी का पहला घूट किसी छुरी की तरह उसके गले में उतरता चला गया था। वह जल्दी जल्दी पानी पीने लगा। पानी ठण्डा था और मीठा भी था।

पानी पीकर उसे बड़ा सुकून महसूस हुआ। कुछ ताकत भी बहाल होती हुई।

वह कुछ देर आखे' बन्द कर खामोशी से लेटा रहा । फिर उसने मेज का सहारा लेकर उठना शुरू किया । कोशिश करके मेज से कमर टिकाकर बैठ गया । फिर उसने मेज पर ढकी रखी ट्रे पर से कपडा हटाया । इस ट्रे में उसके लिए खाना और अंगूर थे।

इन्द्रजीत ने अंगूर ' के गुच्छे सै दो चार अंगूर तोडकर खाए। अगूर बेहद रसीले और मीठे थे। वह धीरे धीरे सारे अंगूर' खा गया। अंगूरो ने उसके कमजोर शिथिल शरीर को काफी ताकत बख्शी थी।

अब वह मेज की तरफ मुंह करके बैठ गया। उसने खाना खाया और फिर पानी पीकर लेट गया। खाना भी उसने खून छककर खाया था। उस पर खाने का खुमार चडने लगा । वह शीघ्र ही नींद की आगोश में चला गया।

और फिर...जब उसकी आख' खुली तो सूर्य अस्त होने का वक्त हो चुका था । अब वह अपने आप को बहुत बेहतर महसूस कर रहा था। वह हिम्मत करके धीरे-धीरे खड़ा हो गया l खडे होते वक्त उसकी आखों' के आगे अंधेरा अघेरा जरूर आया मगर वह किसी तरह अपने आप को सम्भाले रहा । फिर वह एक-एक कदम जमाकर उठाता हुआ झोंपडी के दरवाजे क्री तरफ बढा।

झोपडी का दरवाजा छोटा था और उससे बाहर निक्लने के लिए काफी झुकना पड़ा था । जब वह बाहर निकलकर सीधा खडा हुआ तो बाहर का माहोल देखका आश्चर्यचकित रह गया।

सामने जहां तक निगाह जाती थी रेगिस्तान था। रेत के ऊँचे नीचे टीले दूर तक फैले हुए थे।

दुर क्षितिज पर सूरज की बडी-सी टिकिया लाल अगारा बनी हुईं थी। दूर तक न कोई पेड़ था, न आदम, न आदमजात ! इस विस्तृत रेगिस्तान में बस वही एक झोपडी. थी ।

इन्द्रजीत को जाने कहा लाकर छोड दिया गया था।

बडी अनोखी अनूठी थी यह कैद । इस झोंपडी, क्रो छोडकर अगर वह फरार होना भी चाहता तो कहा जाता। इस तपते रेगिस्तान मै हर दिशा में रास्ता होने के बाबजूद उसे रास्ता नहीं मिलना था । वह भटक-भटक कर भूख-प्यास से तडप_-तडप_ कर दम तोड देता । यहां तो उसे ना सिर्फ एक छत का साया उपलब्ध था बल्कि खाना-पानी और सोने के लिए कालीन भी मौजूद था। यानी उसे ऊँची श्रेणी की केद दी गई थी। .

बहरहाल, उसकी पहली समस्या तो अपनी ताकत पाने की थी । कमजोरी दूर हो वह हाथ पैर हिलाने लायक हो जाये और फिर अगर यहा से निक्लने का कोई रास्ता दिखाई दिया तो वह फरार होने की कोशिश कर सकता था।

इन्द्रजीत अभी डूबते सूरज को देखता हुआ-यह सब सोच रहा था कि सहसा वातावरण मे सनसनाहट सी हुई। हवा का एक तेज झौका-सा महसूस हुआ । और कोई उसके सिर पर से गुजरता हुआ आगे चला गया।

अभी अंधेरा नहीं फैला था । उसके सिर पर से जो पक्षी गुजरा था-वह उल्लू था। कुछ दूर जाने के बाद वह पलटा और अब फिर वह सीधा इन्द्रजीत कीं तरफ आ रहा था । इन्द्रजीत सहमे से अंदाज में उसे देखता रहा। निक्ट आकर जब उस उल्लू ने अपने पंजे' निकालकर उसपर झपटने की कोशिश क्री तो न जाने कहा से इंद्रजीत में ऐसी ताकत आ गई कि वह झोपड़ी मे दाखिल हो गया ।

अगर उसने फुर्ती न दिखाई होती तो उसका धायल हो जाना यकीनी था।

अपने शिकार को झोंपडी में घुसते देखकर, उल्लू ऊपर कीं तरफ उठा और झोपडी. के ऊपर से उडता हुआ दूर निकल मया। फिर एक चक्कर लगाकर वापस उस झोंपडी. की छत पर आ बैठा।

इन्द्रजीत को उल्लू के इस हमले से यह अदाजा लगाने में देर न लगी कि इस झोपडी', का दरवाजा बन्द न होने और निगरान की अनुपस्थिति के बाबजूद वह झोंपडी. से बाहर नहीं निकल सकता । यहा' कुछ अदृश्य मायावी रक्षक मोजूद हैँ।

दो-तीन दिन बीत गए ।

इन दिनों में झोपड़ी में कोई नहीं आया था I लेकिन खाने-षीने की कोई परेशानी नहीं हुई थी । खाना खत्म होने पर कषड़े के नीचे ट्रे में दूसरा ताजा खाना आ जाता-पानी के कम होने पर खुद-खुद ही पानी से भर जाती । ट्रे में खाना व सुराही में पानी डालकर जाने बाला, क्लीन को प्रयत्नोपरान्त भी नजर नहीं आया था। इन तीन दिनों में वह किसी से बात करने किसी की शक्ल देखने क्रो तरस गया था । .

विक्राल-बिस्तृत रेगिस्तान, इकलौती झोंपडी और इस झोंपडी, में एक अकेला आदमी। शायद यही कैद ऐ तन्हाई(एकान्त कैद) थी।

फिर सात दिन बीत गए।

इन सात दिनों में पौष्टिक खुराक और आराम का ही जादू था कि इंन्द्रजीत की कमजोरी जाती रही थी। वह 'भला-चगा' हो गया था । शरीरिक शक्तियां लौट आई थीं । हाथ-पैरो की रंगत में सुर्खी आ गई थी।

तव 'वह' फिर आईं ।

वह सातर्वी रात थी । चांदनी छिटकी हुई थी। ठण्डी ह्रवा चल रही थी। झोपडी के भीतर उजाला फैला हुआ था ।

इन्द्रजीत दरवाजे की तरफ मुह किये लेटा हुआ था, बाहर चांदनी' बरस रही थी । चौदहवीं का चाद रेत के चमकते कणों को और भी चमका रहा था। बाहर हर तरफ उजाला फैला हुआ था। अत्यन्त ही मत्र'-मुग्ध कर देने वाला स्वप्निल सा वातावरण था।

ऐसे में ही इन्द्रजीत को, खुले दरवाजे से, वह मायावी स्वप्न सुन्दरी आती नजर आई थी, जिसने उसकी हसती मुस्कराती जिन्दगी उजाड दी थी । उससे उसकी प्रेयसी छीन ली थी। उसे इन विरानो का कैदी बना दिया था। इस पर उसका वह अमल-जिसके पाश में वह अपनी सुध खो बैठता ओर इस वेसुघी से वह जिस तरह इन्द्र का खून निचोड लेती थी-उसमें सुख आनन्द कम और शोषण अधिक था। 'वह' अपनी सन्तुष्टि कर लेती थी और इन्द्र का सारा खून जैसे अपने आप में जब्त कर लेती थी।

और यू इं-द्गजीत अधमरा केचुआ-सा बनकर रह जाता था ।

रक्तबिहीन, शक्तिहीन-चुसा निचुड़ा-सा केंचुआ । इन्द्रजीत उसे आते देखकर उठकर बैठ गया ।

पूरे सात दिन बाद उसे किसी की सुरत दिखाई दी थी । चाहे वह उसकी खून की प्यासी बकाल की थी । वकास श्वेत परिधान में थी और आते हुए वह किसी भटकती हुई आत्मा की तरह लग रही थी।

बकाल शायद आत्मा तो न थी, लेकिन भटकी हुई जरूर थी।।
 
इन्द्रजीत की मोहिनी सूरत ओर चढती. जवानी ने उसे भटका दिया था। वह किसी 'देवा काली' के आदेश पर इन्द्रजीत को सजा देने आई थी। उसने योगी तांत्रिक को सजा दे भी दी थी ।

इन्द्रजीत को भी सजा देने की तैयारी वह पूरी कर चुकी थी लेकिन जब उसने इन्द्रजीत को देखा तो अपना दिल हार बैठी । यह भी भूल गई थी कि बह इन्द्रजीत के पीछे क्यो आई थी ।

… इन्द्रजीत, साक्षात, कामदेव ही तो था । कटारी और राजकुमारी नयना उसके सजीलेपन और चुम्बकीय व्यक्तित्व का शिकार हुई थीं-और अब बकाल भी उसे दखते ही अपना दिल हार बैठी थी I

मायावी बकाल उसे अपने साथ उठा लाई थी-और उसे ऐसी जगह बन्दी बना दिया था-जहा' से किसी का गुजर नहीं था । राजूमदारी ने ऊपर जाते हुए इन्द्रजीत का हाथ बकाल के हाथ में पकडा, दिया था...उसे अपने अपराधी की पहचान करवा दी थी । उसे यकीन था कि उसके सिद्ध आराध्य देव 'देवा काली' ने जिस किसी को भी भेजा है वह इन्द्रजीत से उसका प्रतिशोध अवश्य लेगा । अब वह क्या जानता था कि शिकारी ही शिकार हो जाएगा । राजूमदारी अगर यह जानता होता तो उसने इन्द्रजीत का हाथ बकाल के हाथ में कदापि नहीं थमाना था I

वैसे मायावी बकाल का प्यार भी किसी सजा और प्रतिशोध सै कम न था । अपनी आत्म तृप्ति लिए वह इन्द्रजीत की जान ही तो निकाल लेती थी । इन्द्रजीत के लिए बड़ा कष्टदायक साबित होता था उसका प्यार उसे यही महसूस होता था जैसे बकाल उसके सारे बदन का खून अपने आप में जब्त कर लेती हो । वैसे बाद में इन्द्रजीत को जो सहना पडता था, वह अपनी जगह, पर बकाल का यह खेल उसे जिस नशे, आनंद और तृप्तिर्यों का अहसास कराता था उस्का कोई जबाब न था ।

कमजोरी मिटते हीं इन्द्रजीत चाहे-अनचाहे बकाल के सामीप्य के उन्ही' क्षणों की कामना करने लगता था ।

शायद यही वजह थी कि अब जब बकाल, अपने उसी प्रलयकारी यौवन के साथ नजर आईं तो इन्द्रजीत उसे देखते ही दोहरी मानसिकता का शिकार हो गया । उसे बकाल को देखकर खुशी भी हुई और रज भी हुआ।

और 'फिर-अब जव बकाल बडी कामुक अदा के साथ चलती हुई झोपडी के दरवाजे पर रूकी और फिर झुंककर झोपडी के दरवाजे, में दाखिल हुइ । इन्द्रजीत की नजर के सामने बिजलियाँ-सी कौंध गयीं।

बकाल मुस्कराकर सीधी खडी हुई ।

उसने इन्द्रजीत को किसी ताजा फूल कीं मानिन्द खिले पूर्णत: स्वस्थ और चाक चौचन्द बैठे देखा तो उसकी आखों' की चमक बढ गई । और यह चमक अपनी कामनाएं खुद ही ब्यान कर रही थीं। यही लगता था कि वह इन्द्रजीत क्रो स्वस्थ देखकर अंदर ही अन्दर बहुत खुश हुई थी। और यह खुशी वेसी ही थी जेसी मलाई का भरा कटोरा देख़कर किसी बिल्ली की होती है।

बकाल उसके सामने अपने घुटनों के बल बैठ गई जेसे किसी देवता के चरणों में कोई दासी आ बैठे I

इन्द्रजीत उसे खामोश बैठा निहारता रहा । क्या बोले? यही नहीं सूझ रहा था।

'कैसे हो मेरे जादूगर? ' बकाल ने मुस्कराते हुए पूछा। और वेहद मीठी थी उसकी आवाज ॥

' 'मै...मैँ बहुत बुरा हूँ बकाल ॥ ' ' इन्द्रजीत ने अजीव-सै लहजे में कहा---' 'दीन-हीन और असहाय...!! "

बकाल खिलखिलाकर हस दी, बोली--- ' 'दिख तो नहीं रहे ऐसै। और फिर जो बकाल की चाहत हो बो दीन हीन या असहाय कैसे हो सकता है । "

"तुम मुझें कहा लै आई हो बक्राल? ” इन्द्रजीत ने खुद को सम्भालते पूछा था वह बकाल की बहका देने वाली बातों से बचना चाहता था। लेकिन बक्राल ने बदस्तूर ज़ज्वाती स्वर में जबाब दिया-- "अपनी दुनिया में अपने करीव और तुम्हारे अपने लोगों से दूर । वहा जहा तुम्हारी मदद को तुम्हारा अपना कोई नहीं आ सकता। कोई आना भी चाहे तब भी नहीं आ सकता । तुम मेरे हो मेरे लिए हो ।किसी क्री मदद की उम्मीद न रखना मेरे प्रियतम ।' '

" 'किसी भूल में न रहना मेरे जादूगर । मैं कटारी या नयना नहीँ हूँ...बकाल हू बकाल । रेगिस्तान की शहजादी। इस रेगिस्तान का एक-एक कण मुझें सलाम करता है । यह तुम्हारी दुनिया नहीं है । यह मेरा जहान है I मुझें छोडकर, जाने से पहले तुम्हें अपनी जान छोडनी. होगी । क्या समझे? “

और इन्द्रजीन ने बडे इत्मीनान से जबाब दिया--' 'कभी ऐसा वक्त आया यह भी कर गुजरूगा.… । देख लेना. . . ।"

. ' 'बहुत जिद्दी हो...? ' ' बकात्त ने होंठ पिचकात्ते कहा और अपनी प्यास्री चमकती आखे इन्द्रजीत के चेहरे पर गाड दी । वह अब सीधे इन्द्र की आखो में झाक रही थी ।

इंद्रजीत को ऐसा महसूस हुआ जैसे रेगिस्तान में अचानक तूफान आ गया हो। वह घबराता बोला-"तुम...तुम क्या करने जा रही हो?"

' ' कुछ भी तो नहीं... ।" बकाल ने सहज भाव से कहा, लेकिन' अपनी चमकती आखें' बदस्तुर उसके चेहरे पर गाढे रही ।

उसकी आखों' में जरूर कुछ था I इन्द्रजीत के दिमाग में आधी चलने लगी । हवा का शोर और उडते¸ हुए रेत के बगोले । वह घबरा कर लेट गया ।

और फिर वहीँ हुआ जो होता था ।

बकाल इसी क्षण की प्रतीक्षक थी । उसने इन्द्रजीत के पेरों के दोनों अनूठे' पकड़ लिये । बस फिर क्या था, इन्द्रजीत पर उनीदगी और बेखुदी छाने लगी। बकाल किसी रेगिस्तानी' बगोले की तरह उस पर छाती चली गई I उन महकते क्षणों में इन्द्र को अपना होश कहा था। वह बेसुध होता गया ।

आह । केसी तृप्तता थी यह । इन्द्रजीत अपना आपा अपने होश खो बैठा । आनन्दात्तिरेक के इन क्षणों में वह हमेंशा ही अपने होश खो बैठता था। आज भी ऐसा ही हुआ।

और फिर जव उसे होश आया तो वह होशरूबा वह मायावी रूपसी जा चुकीं थी।

लुटे-पिटे इन्द्रजीत की अब बही अवस्था थी जेसे बरसों का मरीज।। हाथों-पैरों में जान नहीं। दिमाग की नसे खिंची' हुईं। सिर उठाओ तो चक्कर आ जाये...अंधेरा छा जाये।

अभिसार के इस खेल की मदहोशिर्यों, आनन्दप्रद क्षणों के बाद निर्बलता के ये जान लेवा क्षण असहनीय ही थे।

दिन चढ़ आया था । झोंपडी, के दरवाजे से रोशनी अन्दर आ रही थी। लेकिन इंणद्रजीत की रगों में अंधेरा फैला हुआ था । वह रेगिस्तानी जौंक उसके बदन का सारा खून पी गई थी ।

देह सुख, काम तृप्ति और फिर उसके बाद वह रक्त पिपासा...इन्द्रजीत को दीन हीन और असहाय बना छोड़ जाती थी मायावी बकाल ।

वहीँ हुआ जो होता था । दो-चार दिन इंन्द्रजीत अत्यधिक कमजोरी का शिकार रहा । फिर धीरे-धीरे उसकी शारीरिक शक्तियां लौटने लगी । इन्द्र ने अच्छा खा पीकर खूद क्रो तन्दरुस्त कर लिया । इस बीच बक्राल की सूरत दिखाई नहीं दी वह शायद इन्द्रजीत के स्वस्थ हो जाने का इन्तजार कर रही थी।

बली के बकरे की तरह इन्द्रजीत इन दिनों में फिर पूर्णत: स्वस्थ और भला चगा हो गया। ऐसा सैहतमद कि अपने अवचेतन मन में वह बकाल के साथ इन्हीं क्षणों कीं ख्वाहिश करने लगा। पर फिर उस पर खौफ छा जाता था। बकाल का खौफ उसके साथ बीते क्षणों के बाद अपनी मरणासन्न अवस्था का खौफ ।

और इसी खौफ के साये में उसके दिल में ख्याल आता कि वह यहाँ से फरार होने की कोशिश करे । पर वह इस ख्यार क्रो अपने जहन से निकाल देता। शायथ इसलिए कि एक तो उसे रास्ते का पता नहीं था कि किधर जाए l और अगर वह यूं ही किसी दिशा मैं निकर भी लेता तो बकाल के तैनात निगरानों का आतंक जहन में ऊभर आता था।

अपनी निगरानी पर तैनात उल्लू क्रो वह देख ही चुका था । और बकाल ने जाते वक्त जिस दूसरे गार्ड को तैनात कर. जाने का जिक्र किया था-वह भी कम खतरनाक न था।

बड़ा ही मायावी जाल था l बकाल जाने से पहले जिस दुसरे निगरान क्रो तैनात का गई थी वह एक भयानक फनियर नाग था। इन्द्रजीत इस दूसरे निगरान के भी दर्शन कर चुका था ।

उल्लू झोपड्री क्री छत पर रहता था तो यह नाग झोपडी के दरवाजे के निकट फन उठाये खडा रहता था कि इन्द्रजीत रेगिस्तान की तरफ कदम उठाये और वह लगे पीछे l

ऐसै हालात में एक बार इन्द्रजीत को यह ख्याल भी आया कि क्यों न दिन क्री रोशनी के बजाय रात के अंधेरे में झोपडी से निक्लकर रेगिस्तान में गुम हो जाए। पर इस मन्सूबे पर अमल करना भी आसान न था-क्योंकि उल्लू और नाग दोनों ही रात के अंधेरे में दूर तक देख सकते थे ।

जाहिर था मायावी बकाल बेवकुफ नहीं थी। उसने इन्द्रजीत क्रो सलाखों के पीछे ताले में बद नहीं किया था तो कुछ सोचकर ही किया होगा ।

यही अन्देशे ही थे जो इन्द्रजीत को हतोत्साहित कर जाते थे… और वह खुद को बेबस मान खामोश बैठ जाता था । पर आखिर कब तक... ।

लगभग छ: माह बाद तग आकर इन्द्रजीत ने, बकाल की इस कैद से निकलने और उसके यातनापूर्ण समीप्य से मुक्ति पाने के लिए, फरार होने की कोशिश की । वह झोपडी. से निक्ला था और निकलते ही तेजी से एक तरफ भागना शुरु कर दिया था I

लेकिन रेत पर भागना आसान काम तो न था । उमके पेर रेत्त में फंस रहे थे भागना दूभर हो रहा था।

और फिर जब उल्लू ने अपने शिकार को फरार होते देखा तो...एक चीख मारकर, फडफडाकर उड़ा और कुछेक क्षणों में ही उसे दबोच लिया । उसने इन्द्रजीत के चेहरे पर ऐसा पंजा मारा कि इन्द्र की आखें' जख्मी होते-होते बची । बहरहाल, इन्द्र के गाल को उसने जख्मी कर दिया था ।

"'इतना ही काफी था इन्द्रजीत ने उस दिन के बाद से ही फरार होने की सोच ही अपने दिमाग से निकाल दी थी । दरअसल, वह अपनी सूरत बिगाडना नहीं चाहता था। यह और बात भी कि उसकी सूरत खुद ब खुद बिगडनी शुरू हो गई थी। वह अपना चुम्बकीय ओज व आकर्षण खोता जा रहा था । उसके चेहरे पर अब स्थाई जर्दी और पीलाहट रहने लगी थी । बकाल उसको पूरी तरह सम्भलने भी न देती थी कि उससे खेलने और उसका खून पीने पहुच जाती थी ।"

' 'ऐसे' में उसका स्वास्थ ठीक केसे रह सकता था । शुरु शुरु में वह हफ्ता-दस दिन में खा-पीकर और आराम करके अपनी जान बना लेता था । लेकिन फिर यह अंतराल बढता. गया और उसकी सेहत की बहाली में कई दिन लगने लगै ।

लेकिन एक लम्बी' अवधि बीत जाने के बाद भी बकार ने उसका पीछा नहीं छोडा था । वह तो उस पर ऐसी आसक्त हुई थी कि आज तक उसकी जान क्रो आई हुई है । उसको छोडने. का नाम ही नहीं लेती । ' '
 
काला चिराग रेखा को उसके भाई इन्द्रजीत कीं कहानी सुना रहा था। इंद्रजीत की यह अविश्वसनीय आपबीती सुना, उसने रेखा की तरफ देखा। रेखा बुत बनी बैठी यह सब सुनती रही थी। उसकी आखों से बहे आसू उसके गालों पर अपनी छाप छोड… गये थे ।

अपने भाई की यह आप बीती सुनते हुए रेखा कितनी ही बार रो दी थी पर वह बोली कुछ नहीं थी । काला चिराग, इस कहानी के समापन पर अपनी टिप्पणी करते आगे बोला था----

"इन्द्रजीत की इस सोलह सत्रह बरसों में जो हालत हो गई है-अगर तुम उसे उस वक्त देख लेतीं तो शायद बेहोश हो जातीं l तुम्हें तीव्र मानसिक आघात का सामना करना पडता । मैंने इसीलिए झोपडी में प्रवेश करने से रोक लिया था । मैं चाहता था कि तुम अपने भाई को देखने से पहले सारे हालात जान लो ताकि तुममें वास्तविकता का सामना करने की हिम्मत पैदा हो जाए और तुम उसकी दयनीय सुरत देख सको। मेरे ख्याल में मेने' इन्द्रजीत के बारे में हर वह बात सविस्तार बता दी है, जिसका जानना तुम्हारे लिए जरूरी था। फिर भी अगर कहों कोई जिज्ञासा रह गई तो प्रश्न कर सकती हो । ' ' यह कहकर काला चिराग खामोश हो गया ।

कमरे में गहरी खामोशी छा गई।

रेखा की आखें' आसुआँ से भरी हुई थीं I ऐसी भयावह और हृदयविदारक कहानी सुनकर कौन बहन अपने आसुओं को रोक सकती है ।

यह एक लम्बी कहानी थी । अपने भाई की आप बीती सुनते वह आँसू रोके बैठी रही थी और इस रहस्यमय काले चिराग ने बहुत अच्छे अंदाज में इन्द्रजीत की कहानी सुनाई थी। रेखा ने कई जगह अपने आसू जब्त किये थे-लेकिन कहा तक तस्सली से काम लेती, आसू उबलकर बाहर आ ही जाते थे।

रेखा ने अपने दुपट्टे से अपने आसू साफ किये।

कुछ देर बाद जब रेखा खुद पर नियन्त्रण पाने मे सफल रही । उसके दिल क्रो करार आया तो एक उदास सी मुस्कान उसके चेहरे पर नजर आई और वह काले बिराग को सम्बोधित करते बोली

' 'आह ।। मेरे भाई ने छोटी सी उम्र में कितने दुख झेले हे । पहला दु:ख उन्हें मेरे चाचा रमाकांत ने दिया । अगर वह शैतान मेरे भाई की हत्या की साजिश न करता तो मेरा भाई इन यातनाओं का शिकार क्यों होता। यह सब उसे न सहना पडता। मेरे भाईं की जिन्दगी एक स्थाई कैद बनकर रह गई है I उनकी यह कैद तो उम्र कैद से भी बडी हो गई I उम्र-कैद का अपराधी चौदह साल बाद जेल से रिहा तो हो जाता है । मेरे भाईं क्रो तो यह भयावह सजा भुगतते बीस बरस हो गए हैँ और उनका भविष्य अभी भी अनिश्चित है। वह भी यह कैसा भाग्य लिखाकर आए है। इतने बडे बाप का बेटा, एक मामूली मदारी के घर पल कर जवान हुआ । राजू मदारी से जान छुटी तौ वह चुडैल बकाल की कैद में चला गया और जो अब भी उसके लिए जौंक बनी हुई है । काश कि वह चुडैल.. मेरे सामने आ जाए तो मैं उसका खून पी जाऊ'। ' '

अतिरिक्त व्यशा, एक रोष बनकर ही दमकीं थी, रेखा कै चेहरे पर ।।

काले चिराग ने जचाब मे कुछ न कहा । बौ खाली-खाली नजरों से रेखा को देखता रहा। रेखा की यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी। _

' 'एक बात मेरी समझ में नहीं आई। ' ' अन्तत: रेखा ही बोली।

"कौन सी बात?" काले चिराग ने शात भाव सै ही पूछा I

' 'रेगिस्तान की वह झोपडी, उसकी छत पर बैठा उल्लू ओर दरवाजे पर तैनात फनियर नाग क्रो मैं सपनों में देखती रही हू झोपडी के भीतर से मदद की गुहार भी सुनती रही हूँ। अब हकीकत में मैं उसी झोपडी. के सामने ही तब भी मैंने वही सब देखा उघर सुना । हां, सपने में भी जब मै उस झोपडी. के निकट पहुंचती' थी तो अन्दर से यही आबाज आती थी-"डरो मत, आओ...अन्दर आ जाओं… । ' ' अब हकीकत में भी मैने वही आबाज वही गुहार सुनी है। सबाल यह है कि क्या _मेरे भाई को मेरे आने का इतजार था। उसे पहले से ही मालूम था कि मैं यहां जरूर आऊगी'?"

' 'हां था, उसे पूर्ण विश्वास था और वह जानता था। ' ' काले चिराग ने यकीनी लहरो में अनुमोदन किया।

"पर केसे? आखिर कैसे? भैया को कैसे मालूम हुआ कि दरवाजे पर आने वाली मैं हूँ। "

' 'यह मैने उसे बताया... । ' '

"लेकिन आप तो उस वक्त मेरे पीछे थे । ' ' रेखा बोली--"मै उस वक्त कीं बात कर रही हूँ जब आपने मुझे भीतरे जाने से रोका था।"

' 'यह बात मै तुम्हारे 'भाई को तुम्हारे यहा पहुचने' से पहले ही बता चुका हू कि वह वक्त ज्यादा दूर नहीं जब उसकी वहन शीना तुम्हारी मुक्तिदाता बनकर आएगी। " काले चिराग ने बताया।

“मुक्तिदाता...?' ' रेखा कुछ समझ न पाई थी।

"हा-तुम ही वह इक्लोती हस्ती हो जो अपने भाई को इस प्रकोप और नर्क से बचा सकती हो वर्ना कुछ ही अवधि में उसकी मृत्यु निश्चित है। '' काले चिराग ने रहस्पोद्घाटन किया ।

' नहीं, में अपने भाईं को मरने नहीं दुगी'। अगर अपनी जिन्दगी देकर भी भैया की जान बचानी पडी. तो बचा लूगी'।" रेखा ने बडे यकीन के साथ कहा।

' 'मैं जानता' हूँ। " काले चिराग ने मुडी' हिलाते हुए कहा--"अगर मुझे इस बात का विश्वास न होता तो तुम्हें यहा' तक लाता क्यों? ' '

"आप लाए हैँ यहां?' ' रेखा ने हैरान होकर पूछा ।

' 'हां, यही... । ' ' काले चिराग ने गौल मोल जवाब दिया ।

' 'यानि कि बरसों सै बन्द उस काले कमरे में मेरी जिस राजा साहब से मुलाकात हुई थी, वह आप ही का एक रूप था. . . .?? "

' 'नहीं वह मैं नहीं था वह राकल है... । "

”राकल... । " रेखा ने इस अनूठे नाम को दोहराया--"' 'उन्होंने' मुझें एक डायरी दी थी-मेरी जिन्दगी का हाल वताने वाली । वह अब भी मेरे पास मोजूद है । यह डायरी उन्होंने मुझे भेंट दो थी । उनका ख्याल था कि मेंने उन्हें आजाद करवाया है । लेकिन मैने तो उनकी मुक्ति के लिए कुछ नहीं किया I "

यह सुनकर काले चिराग ने एक जोरदार कहकहा लगाया, फिर बोला-- ' 'वह वड़ा शेतान, शरारती, फितना शख्स है। ' '

' होगा । ' ' रेखा ने लापरवाही से कहा---"लेकिन मुझे तो उन्होंने कोई हानि नहीं पहुचाई'... । ' '

और काला चिराग अजीब से लहजे में बोला---"आने वाले कल के बारे में कोई क्या कह सकता है। ' '

' 'यह राकल है कौन? ' ' रेखा ने पूछा ।

"हमारी दुनिया का एक शक्तिशाली शख्स...जो बडा रगीनबाज निकला है। ' '

' ' और यह रूपसी बकाल कौन है? ' '

"बकाल राकल की बहन है। "

" ओह्न अच्छा... ! ' ' रेखा तय नहीँ का पाई थी कि इस रहत्योद्घाटन पर खुश हो या आश्चर्च व्यक्त करे, उसने कुछ सोचते हुए कहा- "फिर तो इन्द्र भैया के सिलसिले में राकल से मदद ली जा सकती है... । ' '

_ ' 'वह अपनी बहन के खिलाफ तुम्हारी सहायता क्यों करेगा… ।”

" 'में समझती हूँ कि वह एक अच्छी, सहृदय हस्ती है।"

' 'तुम उससे सिर्फ एक बार मिली हो-में उसे बरसों से जानता हूँ। "

' 'और आपने उसे कैसा पाया है?"
 
काला चिराग रेखा को उसके भाई इन्द्रजीत कीं कहानी सुना रहा था। इंद्रजीत की यह अविश्वसनीय आपबीती सुना, उसने रेखा की तरफ देखा। रेखा बुत बनी बैठी यह सब सुनती रही थी। उसकी आखों से बहे आसू उसके गालों पर अपनी छाप छोड… गये थे ।

अपने भाई की यह आप बीती सुनते हुए रेखा कितनी ही बार रो दी थी पर वह बोली कुछ नहीं थी । काला चिराग, इस कहानी के समापन पर अपनी टिप्पणी करते आगे बोला था----

"इन्द्रजीत की इस सोलह सत्रह बरसों में जो हालत हो गई है-अगर तुम उसे उस वक्त देख लेतीं तो शायद बेहोश हो जातीं l तुम्हें तीव्र मानसिक आघात का सामना करना पडता । मैंने इसीलिए झोपडी में प्रवेश करने से रोक लिया था । मैं चाहता था कि तुम अपने भाई को देखने से पहले सारे हालात जान लो ताकि तुममें वास्तविकता का सामना करने की हिम्मत पैदा हो जाए और तुम उसकी दयनीय सुरत देख सको। मेरे ख्याल में मेने' इन्द्रजीत के बारे में हर वह बात सविस्तार बता दी है, जिसका जानना तुम्हारे लिए जरूरी था। फिर भी अगर कहों कोई जिज्ञासा रह गई तो प्रश्न कर सकती हो । ' ' यह कहकर काला चिराग खामोश हो गया ।

कमरे में गहरी खामोशी छा गई।

रेखा की आखें' आसुआँ से भरी हुई थीं I ऐसी भयावह और हृदयविदारक कहानी सुनकर कौन बहन अपने आसुओं को रोक सकती है ।

यह एक लम्बी कहानी थी । अपने भाई की आप बीती सुनते वह आँसू रोके बैठी रही थी और इस रहस्यमय काले चिराग ने बहुत अच्छे अंदाज में इन्द्रजीत की कहानी सुनाई थी। रेखा ने कई जगह अपने आसू जब्त किये थे-लेकिन कहा तक तस्सली से काम लेती, आसू उबलकर बाहर आ ही जाते थे।

रेखा ने अपने दुपट्टे से अपने आसू साफ किये।

कुछ देर बाद जब रेखा खुद पर नियन्त्रण पाने मे सफल रही । उसके दिल क्रो करार आया तो एक उदास सी मुस्कान उसके चेहरे पर नजर आई और वह काले बिराग को सम्बोधित करते बोली

' 'आह ।। मेरे भाई ने छोटी सी उम्र में कितने दुख झेले हे । पहला दु:ख उन्हें मेरे चाचा रमाकांत ने दिया । अगर वह शैतान मेरे भाई की हत्या की साजिश न करता तो मेरा भाई इन यातनाओं का शिकार क्यों होता। यह सब उसे न सहना पडता। मेरे भाईं की जिन्दगी एक स्थाई कैद बनकर रह गई है I उनकी यह कैद तो उम्र कैद से भी बडी हो गई I उम्र-कैद का अपराधी चौदह साल बाद जेल से रिहा तो हो जाता है । मेरे भाईं क्रो तो यह भयावह सजा भुगतते बीस बरस हो गए हैँ और उनका भविष्य अभी भी अनिश्चित है। वह भी यह कैसा भाग्य लिखाकर आए है। इतने बडे बाप का बेटा, एक मामूली मदारी के घर पल कर जवान हुआ । राजू मदारी से जान छुटी तौ वह चुडैल बकाल की कैद में चला गया और जो अब भी उसके लिए जौंक बनी हुई है । काश कि वह चुडैल.. मेरे सामने आ जाए तो मैं उसका खून पी जाऊ'। ' '

अतिरिक्त व्यशा, एक रोष बनकर ही दमकीं थी, रेखा कै चेहरे पर ।।

काले चिराग ने जचाब मे कुछ न कहा । बौ खाली-खाली नजरों से रेखा को देखता रहा। रेखा की यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी। _

' 'एक बात मेरी समझ में नहीं आई। ' ' अन्तत: रेखा ही बोली।

"कौन सी बात?" काले चिराग ने शात भाव सै ही पूछा I

' 'रेगिस्तान की वह झोपडी, उसकी छत पर बैठा उल्लू ओर दरवाजे पर तैनात फनियर नाग क्रो मैं सपनों में देखती रही हू झोपडी के भीतर से मदद की गुहार भी सुनती रही हूँ। अब हकीकत में मैं उसी झोपडी. के सामने ही तब भी मैंने वही सब देखा उघर सुना । हां, सपने में भी जब मै उस झोपडी. के निकट पहुंचती' थी तो अन्दर से यही आबाज आती थी-"डरो मत, आओ...अन्दर आ जाओं… । ' ' अब हकीकत में भी मैने वही आबाज वही गुहार सुनी है। सबाल यह है कि क्या _मेरे भाई को मेरे आने का इतजार था। उसे पहले से ही मालूम था कि मैं यहां जरूर आऊगी'?"

' 'हां था, उसे पूर्ण विश्वास था और वह जानता था। ' ' काले चिराग ने यकीनी लहरो में अनुमोदन किया।

"पर केसे? आखिर कैसे? भैया को कैसे मालूम हुआ कि दरवाजे पर आने वाली मैं हूँ। "

' 'यह मैने उसे बताया... । ' '

"लेकिन आप तो उस वक्त मेरे पीछे थे । ' ' रेखा बोली--"मै उस वक्त कीं बात कर रही हूँ जब आपने मुझे भीतरे जाने से रोका था।"

' 'यह बात मै तुम्हारे 'भाई को तुम्हारे यहा पहुचने' से पहले ही बता चुका हू कि वह वक्त ज्यादा दूर नहीं जब उसकी वहन शीना तुम्हारी मुक्तिदाता बनकर आएगी। " काले चिराग ने बताया।

“मुक्तिदाता...?' ' रेखा कुछ समझ न पाई थी।

"हा-तुम ही वह इक्लोती हस्ती हो जो अपने भाई को इस प्रकोप और नर्क से बचा सकती हो वर्ना कुछ ही अवधि में उसकी मृत्यु निश्चित है। '' काले चिराग ने रहस्पोद्घाटन किया ।

' नहीं, में अपने भाईं को मरने नहीं दुगी'। अगर अपनी जिन्दगी देकर भी भैया की जान बचानी पडी. तो बचा लूगी'।" रेखा ने बडे यकीन के साथ कहा।

' 'मैं जानता' हूँ। " काले चिराग ने मुडी' हिलाते हुए कहा--"अगर मुझे इस बात का विश्वास न होता तो तुम्हें यहा' तक लाता क्यों? ' '

"आप लाए हैँ यहां?' ' रेखा ने हैरान होकर पूछा ।

' 'हां, यही... । ' ' काले चिराग ने गौल मोल जवाब दिया ।

' 'यानि कि बरसों सै बन्द उस काले कमरे में मेरी जिस राजा साहब से मुलाकात हुई थी, वह आप ही का एक रूप था. . . .?? "

' 'नहीं वह मैं नहीं था वह राकल है... । "

”राकल... । " रेखा ने इस अनूठे नाम को दोहराया--"' 'उन्होंने' मुझें एक डायरी दी थी-मेरी जिन्दगी का हाल वताने वाली । वह अब भी मेरे पास मोजूद है । यह डायरी उन्होंने मुझे भेंट दो थी । उनका ख्याल था कि मेंने उन्हें आजाद करवाया है । लेकिन मैने तो उनकी मुक्ति के लिए कुछ नहीं किया I "

यह सुनकर काले चिराग ने एक जोरदार कहकहा लगाया, फिर बोला-- ' 'वह वड़ा शेतान, शरारती, फितना शख्स है। ' '

' होगा । ' ' रेखा ने लापरवाही से कहा---"लेकिन मुझे तो उन्होंने कोई हानि नहीं पहुचाई'... । ' '

और काला चिराग अजीब से लहजे में बोला---"आने वाले कल के बारे में कोई क्या कह सकता है। ' '

' 'यह राकल है कौन? ' ' रेखा ने पूछा ।

"हमारी दुनिया का एक शक्तिशाली शख्स...जो बडा रगीनबाज निकला है। ' '

' ' और यह रूपसी बकाल कौन है? ' '

"बकाल राकल की बहन है। "

" ओह्न अच्छा... ! ' ' रेखा तय नहीँ का पाई थी कि इस रहत्योद्घाटन पर खुश हो या आश्चर्च व्यक्त करे, उसने कुछ सोचते हुए कहा- "फिर तो इन्द्र भैया के सिलसिले में राकल से मदद ली जा सकती है... । ' '

_ ' 'वह अपनी बहन के खिलाफ तुम्हारी सहायता क्यों करेगा… ।”

" 'में समझती हूँ कि वह एक अच्छी, सहृदय हस्ती है।"

' 'तुम उससे सिर्फ एक बार मिली हो-में उसे बरसों से जानता हूँ। "

' 'और आपने उसे कैसा पाया है?"
 
”मैने बताया है कि एक शैतान फितरत हस्ती है। शेतान, शरारती और रंगबाज... I" काले चिराग के माथे पर बल पड गये ।

' 'मैं उससे मिलना चाहती हूँ। "

"पहले अपने भाई से तो मिल लो. . . । ' '

रेखा उत्तेजित हो उठी, बोली-- ' 'हां, ठीक है । चलिये पहले मुझें मेरे भाई सै मिला दीजिए।"

"तुम खाना खा लो, कुछ देर आरामकर लो । फिर मै तुम्हें इन्द्रजीत के पास ले चलूगा I "

खाने का वक्त हो ही रहा था ।

रेखा ने इत्मीनान सै खाना खाया । उसे अपने थाई तक पहुच जाने क्री बहुत खुशी थी । किस्मत ने उसे बहुत सही वक्त पर अपने भाई की मदद के लिए भेज दिया था I

लगभग चार बजे काला चिराग कमरे में आया। इस बीच रेखा थोडी देर आराम करके, मुह हाथ धोकर तैयार हो चुकी थी ।

"चले. . . । ' ' उसने काले बिराग से पूछा।

"हां, बिल्कुल।।" काले चिराग ने फोरन जबाब दिया l

और जब वह दरवाजे की तरफ बढने लगी तो काले चिराग ने देखा कि वह अपना सामान कमरे में ही छोडे जा रही है I उसने पूछा--

"क्या आप अपना सामान साथ नहीँ लेगी ?"

' 'क्या हमें यहां वापस लौटकर नहीं आना है?” रेखा ने पूछा I

"मेरा ख्याल है कि जरूरत नहीं पडेगी । अगर जरूरी हुआ तो आ जाएगे I ' '

' 'ठीक है।” यह कहकर रेखा ने अपना सामान समेट लिया।

उसका सामान ही क्या था एक बैग ही तो था I रेखा ने उसी में अपनी तमाम चीजें भरकर बैग कंधे पर डाल लिया ।

' ' चलिये. . . । ' '

यूं जब रेखा उस महल नुमा भवन से बाहर निकली तो धूप ढल रही थी। बाहर का बही माहोल था। उन दोनों के अतिरिक्त दूर दूर तक कोई नहीं था I एक खूबसूरत हरा-भरा बाग था । बीच में खूंबसुंत' फोव्वारा और भवन में चारों तरफ दरवाजे ही दरवाजे थे।

फव्बारे के निकट से गुजरकर जब रेखा ने ऐसै ही पलटकर उस सुर्ख पत्थरों वाले भवन पर एक 'अलविदाई' नजर डालनी चाही तो वहां कोई भवन नहीं था ।

और फिर जब वह फोव्वारे से आगे महाराबी दरवाजे में प्रविष्ट हुईं तो पीछे वह हरा-भरा बाग, फौव्वारा इत्यादि भी गायब हो गए । रेखा फिर मह्रराबी दरवाजे से निकलकर ऊपर जाती हुईं सीढिया चढने लगी तो उसमें हिम्मत न हुई कि वह पीछे मुडकर. देखै।

लेकिन जब वह खण्डहर की सीढिया चडकर ऊपर पहुची' और उसकी जिज्ञासा ने उसे पीछे मुडकर देखने पर मजबूर किया तौ उसने देखा कि सीढिया भी गायब हैँ । अब उन सीढियों. की जगह एक ढलान-सी दिखाई दे रही थी और नीचे गड्रढे में पानी भरा हुआ था ।

काला चिराग उसके आगे-आगे चल रहा था ।

रेखा ने सोचा कि उसी से पूछे कि यह सब क्या है? वह बाग और महल सब कहां गए। अब चारों तरफ रेगिस्तान था, उडती हुई रेत थी और दुर कही चंद चीले' दिखाई दे रही थीं । रेखा, पूछत्ते पूछते रूक गई। उसे अंदाजा हो गया था कि वह एक गेर इन्सानी प्राणी की गिरफ्त में है-और ऐसे गेर इन्सानी, चमत्कारी प्राणियों से किसी भी अचरज की आशा की जा सकती है ।

वह अपने कघे' पर बैग लटकाए, खामोशी सै काले चिराग के पदचिन्हों पर चलती रही । वह काफी तेज चल रहा था। इतनी तेज रफ्तार से कि रेखा के लिये उसका साथ देना कठिन हो रहा था ।

"जरा धीरे चलिये न?" अत्तत्त': उसने पुकारकर कहा ।

काले चिराग के कान पर जू तक न रेंगी । वह सुनी अनसुनी कर गया । उसने पलटकर भी नहीं देखा। आगे एक रेत का ऊचा टीला था । वह घूमकर उस टीले के पीछे चला गया। रेखा ने फोरन दौड लगाईं । उसे अदेशा था कि वह रेत के इस समुद्र में अकेली न रह जाये और कुछ ऐसा ही हुआ भी था।

रेखा घूमकर टीले के पीछे पहुची' तो वहां कुछ नहीं था। काला चिराग गायब हो चुका था । उसे गायब पाकर रेखा का दिल धक्क से रह गया।

है प्रभु! अब वह क्या करे। किस तरह अपने भाई क्री झोंपडी तक पहुचेगी'? जाने कहां, किधर वह कितनी दूर है वह झोपडी. ?

रेखा अभी सोच ही रही थी कि उसकी नजरें काले चिराग पर पडी. । वह रेत के टीले के भीतर से इस तरह निकल रहा था जेसे पानी की सतह के भीतर से निकल रहा हो। वह रेत के अन्दर से' मक्खन में से बाल की तरह निकल आया। उसके चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कारहट थी। जाने क्या था उसकी मुस्कराहट में कि उसका चेहरा भी बदल जाता था और वह यह क्षण होते थे जब उसके चेहरे में सम्मोहन पैदा हो जाता था ।

”क्या हुआ-मुझे गायब देखकर परेशान हो गई थी?" उसने पूछा।

"हा सच ही में... ।" रेखा का जबाब था।

" आओ, मेरे साथ । " चलते हुए काले चिराग ने उसका कोमल हाथ पकड़ लिया और उसे रेत के टीले की तरफ ले चला।

' 'कहा' ले जा रहे हो मुझे? ' ' रेखा घचराकर बोली।

सामने खासा उच्चा' रेत का टीला था ओर वह रेखा का हाथ थामे उस टीले के अन्दर प्रदेश करना चाहता था, वह लापरवाही से बोला---

" आओ ।। अन्दर चलते हैँ।"

' 'टीले के अंदर... ! रेत में! मेरा तो दम घुट जाएगा।" रेखा परेशान हो गई। उसका सास अभी से रूकने लगा था।

काला चिराग एक कदम आगे था । वह रेत के टीले में दाखिल हो चुका था, और वह यू प्रविष्ट हो रहा था जेसे रुई के गालो में धंस रहा हो I उसने रेखा का हाथ मजबूती से पकड रखा था । वह रेत मे गायब हो चुका था ।।

रेखा को अपनी तरफ खींच रहा था l रेखा का हाथ रेत में घुसता जा रहा था I

फिर रेखा की आखो के सामने एकदम अंधेरा छा गया उसने अचानक ही रेत अपने मुह पर महसूस क्री थी l लेकिन यह अहसास अधिक देर तक नहीं रहा। जब उसने खौफ से बद' हुई आखें' खोली तो रेत के टीले का कही नामो-निशान तक नहीं था । और......और सामने कुछ ही फासले पर उसे वह झोपडी नजर आ रही थी, जिसकी छत पर एक. उल्लू बैठा था और एक नाग दरवाजे पर कुण्डली मारे पहरा दे रहा था।

,यह वही झोपडी, थी-वही दृश्य था जो वह अपने सपने में देखा करती थी। और अब वह जानती थी कि इस झोपडी में उसे सहायता के लिए पुकारने बाला ओर कोई नहीं उसका अपना भाई इन्द्रजौत था ।

किसी मायाचौ रूपसी बकाल का कैदी इन्द्रजीत ।।

झोपडी, को देखकर रेखा ने एक गहरी सास ली थी ।

' 'कहो, तुम्हारा दम तो नहीं घुटा? ' ' काले चिराग ने मुस्कराते हुए पूछा ।

' 'नहीं बिल्कुल नहीं I बल्कि मुझे तो यह महसूस ही नहीं हुआ कि मै रेत के टीले में सै गुजर रही हूँ। ' ' रेखा बोली ।।

' 'अब तुम अंदर जाओं अपने भाई से मिल आओ।"

"आप अन्दर नही आएगे…'?"

' 'नहीं मै बाहर ही बैठूगा । "

' 'कोई विशेष कारण? ' '

' 'हां विशेष ही समझो । तुम्हारी सुरक्षा के लिए मुझें यहा रूकना पडेगा। "

रेखा की निगाहें झोपडी के दरवाजे की तरफ उठ गई, वह बोली---- ''लेकिन मै अन्दर जाऊंगी कैसे? वह साप' दरवाजे पर कुण्डली मारे बैठा है । “

"उसकी चिन्ता मत करो। मै जैसे ही झोपडी के पास पहुचूगा वह तत्काल गायब हो जाएगा।"

' 'ओह... ! ' ' रेखा के मुह से लम्बी सास' निकली ।

और फिर ऐसा ही हुआ। काला चिराग ज्यों ही झोपडी. के पास पहुचा' । नाग फोरन घूमकर झोपडी. के पीछे कही गायब हो गया I साप. के जाते ही उल्लू भी छत्त पर से तेज फडफडाहट के साथ उड गया। काला विराग दरवाजे के पास रूक गया और हाथ के इशारे से रेखा को अन्दर जाने को कहा ।

रेखा धडकते… दिल के साथ अन्दर दाखिल हुई ।

छोटे दरवाजे से गुजरकर जव वह झोपडी में खडी हुई तो उसने एक तरफ कालीन पर एक शख्स को लेटा हुआ देखा । उसने अपने ऊपर काली चादर ओढ रखी थीं । मुह तक ढका हुआ था । वह दबे पांव इन्द्रजीत के पास पहुच' गईं-दिल चाह रहा था कि वह उसके चेहरे से चादर हटा दे I लेकिन उसने ऐसा करना उचित नहीँ समझा। उसने थोड़ा झुकते हुए बड़े ही प्यार से पुकारा ।।

"इन्द्र भैया...।।"

रेखा की आबाज सुनले ही चादर में हरकत हुई। इन्द्रजीत ने धीरे धीरे अपने चेहरे से चादर हटाई। पर वह चादर हटाते हटाते रूक गया और चादर मुह पर लिए-लिए ही आहिस्ता से उठ गया । उसने चादर सिर से न उतारी बल्कि इस तरह ओढ ली थी कि उसका चेहरा दिखाई न दे सके ।

उसने गर्दन उठाकर एक आख' से रेखा की तरफ देखा और खुशी भरे लहजे में बोला-- "शीना तुम आ गई...मेरी बहन तुम आ गई। ' '

"हां, भैया! मैं आ गई हूँ। मैं आपको लेने आई हूं ?"

तब इन्द्रजीत ने चादर से एक हाथ निकाला। सूखा हुआ हाथ...जैसे हड्डियों का ढाचा। उसने हाथ के इशारे से रेखा को कालीन पर बैठने के लिए कहा ।

रेखा उसके सामने कालीन पर बैठ गई और उसका सूखा हुआ हाथ अपने खूबसूरत कोमल हाथों के बीच ले लिया ।

“आपकी...आपकी यह हालत कैसे हो गई, भैया! " वह होंठ चबाते हुए बोली।

‘ 'मेरी यह हालत बकाल ने की है, मेरी बहना उस वासना की मारी चुडैल. ने मेरी जिन्दगी तबाह कर दी है।"

“आपकी...आपकी यह हालत कैसे हो गई, भैया! " वह होंठ चबाते हुए बोली।

‘ 'मेरी यह हालत बकाल ने की है, मेरी बहना उस वासना की मारी चुडैल. ने मेरी जिन्दगी तबाह कर दी है।"

' 'मैं जानती हू। मुझे काला चिराग ने सब कुछ बता दिया है। पूरी आप बीती सुना दी है आपकी.. . । ' '

"काला चिराग बहुत ही नेकदिल आदमी है । वह मुझसे आकर मिला था और उसी ने मुझे तुम्हारे बारे में बताया है...तुम्हारे आने की इत्तला दी थी और अब पहले जब तुम यहां आई थी और अन्दर आने की बजाय-वापस पलट गई थीं तौ में तुम्हें अन्दर से देख रहा था। मैने तुम्हें देखकर ही कहा था कि डरों मत, अंदर जा जाओ। लेकिन अंदर नहीं आई थी । शायद तुम्हें काले चिराग ने अन्दर आने से रोक दिया था और तुम्हें अपने साथ ले गया था। मै जानता हूँ किं उसने तुम्हें अन्दर आन से क्यो रोका था... । ' ' इन्द्रजीत बहुत धीरे-घीरे वोल रहा था। जेसे बरसों का मरीज हो वह और उससे बोला न जा रहा हो।

' 'सच कहू भैया! मुझें उसकी यह ह्ररकत बिल्कुल अच्छी नहीं लगी थी लेकिन अब सोचती हू कि उसने मुझे अपने साथ ले जाकर अच्छा ही किया था । अगर मै आपके बारे में सबकुछ जाने बिना ही आपको देख लेती तो मुझे तीव्र दिमागी शाॅक लगना था I खुश तो खैर, मै अब भी नहीं हूँ। आपका यह सूखा हाथ आपके स्वास्थ्य का पता दे रहा है। खैर, कोई बात नहीं। मैं अब आपको अपने साथ ले जाऊगी। "

"शीना-एक बात बताओ । तुम्हारा यह नाम किसने रखा...जरूर दादा जी की खवाहिश पर ही रख गया होगा। पापा दादा जी की इस ख्वाहिश का जिक्र अक्सर किया करते थे कि बौ अपनी पोती का नाम शीना रखना चाहते थे । ' '

' 'हा भैया I. मेरा यह नाम उन्हीं की खवाहिंश पर रखा गया था ।

रेखा ने बताया, लेकिन अब मेरा नाम शीना नहीँ...रेखा है। मुझे शीना कोई नही कहता । खुद मुझें भी मालूम नहीं था कि मेरा नाम शीना है l

' ' अच्छा I हैरत है l ''

' 'मैं जब अपनी कहानी सुनाऊगी तो आप और भी हैरान रह जाएगे। आपके लापता हो जाने के बाद पापा एकदम सहम गये थे । उन्होने चाचा के डर से मुझे कभी अपनी बेटी नहीं कहा। मैं गैरों मे पली-बडी...इसलिए मेरा नाम भी बदल दिया गया । पापा ने मेरे लिए बडी. कुर्बानी दी... । ' ' रेखा का स्वर भर्रा गया था।

' 'कैसे हैँ पाया और मम्मी का क्या हाल है। मम्मी तो मेरी गुमशुदगी पर रो रो कर पागल ही हो गई होंगी। ' '
 
रेखा के दित में आया कि बता दे कि वे दोनों अब इस दुनिया में नहीं रहे हैं पर फिर यह सोचकर रूक गई कि अभी यह खबर इन्द्र के लिए तीव्र सदमे का कारण वन जाएगी पहले ही सूखकर हड्डियों का ढाचा बना हुआ है-मां-बाप की मौत की सूचना उसे मिट्टी का ढेर बना देगी l

' 'वे दोनों सकुशल हैँ. भैया! “ उसने सफेद झूठ बोला--' ' और आपको बहुत याद करते है I ‘ '

' 'और वो शेतान...कमीना शख्स? ' ' इन्द्र के लहजे में नफरत भर आई।

"कौना चाचा रमाकात्त'...?"

' 'हां उसी की बात कर रहा हूँ। ' '

' 'वह हमारे प्रतिशोध का इतजार कर रहा है। ' '

इन्द्रजीत भडकर बोला--' 'ठीक कहा तुमने रेखा। तुम देखौगी मैँ उससे ऐसा इतकाम लूगा कि उसकी रूह तक काप जाएगी । ' '

रेखा सजल आखो' से उसे देखने लगी । इन्द्रजीत अभी तक पूरी तरह चादर ओढे बैठा था । बस, उसकी सिर्फ एक आख' जरूर दिखाई दे रही थी । रेखा समझ नहीं पा रही थी कि उसने अपना चेहरा चादर में वयो छिपा रखा हे ।

' 'भाई, एक बात पुछू?" रेखा बोली ।

" हा पूछो I I I ' '

" आप बुरा तो नहीं मानोगे?"

' 'नहीं हर्गिज नहीं. . . । ' '

"यह आपने अपना चेहरा चादर में क्यो' छिपाया हुआ है? '

' 'वह हवा लगती हें ना, उससे बचने के लिए । ' ' इन्द्र ने शायद बात बनाने की कोशीश की थी।

”लेकिन झोंपडी, मे तो इस वक्त काफी गर्मी हो रही है और आप हैँ कि न केंवल चादर ओढे बैठें हैं बल्कि अपना मुह भी ढक रखा है भैया! अपने चेहरे से चादर ह्रटाईंये न । क्या अपनी बहन क्रो चेहरा भी नहीं दिखायेंगे? ' ' रेखा बेहद जज्बाती अंदाज में बोली ।

रेखा की इस ख्वाहिश पर इन्द्रजीत भीतर ही भीतर काप उठा… I वह समझ नहीं पा रहा था कि अपनी बहन को किस तरह बताए कि अब उसका चेहरा देखने लायक ही नहीं रहा है । एक वक्त था लडकिया उसका चेहरा देखते नहीँ थकती थीं...नजरे हटाना भी भूल जाती थीं और अब वह वक्त आ गया था कि आज अगर कोई लडकी. उसका चेहरा देखती तो फिर जीवन भर न देखने की कसम खा लेती।

हा' ऐसा ही हो गया था उसका चेहरा ।

" रेखा, अगर तुम मेरा चेहरा न ही देखौ तो अच्छा है । ' ’ इंद्रजीत ने व्यथित लहजे में जैसै अनुरोध किया।।

' 'क्यों आखिर...मै अपने भाई का चेहरा क्यों न देखूं? क्या हुआ है आपके चेहरे को? चादर हटाएं... ।"' ' कहते हुए रेखा ने चादर की तरफ हाथ भी बढा, दिया था।

' ' पछताओगी । ' ' कराहती-स्री आबाज में बोला था इन्द्र ।

' ' 'मेरा दिल पत्थर का हे। ' ' रेखा उसका आशय समझकर बोली--' "'प्लीज चादर हटाने दे भैया! "

' 'अच्छा, ठहरो में खुद उतारता हूँ चादर सिर से... ।"

' 'ठीक है, हटाएं... । ' ' रेखा ने अपने हाथ गिरा लिए।

और अब इन्द्रजीत ने अपने दोनों हाथ चादर से निकाले और फिर अपने चेहरे से घूघट' उठा दिया।

उसका चेहरा देखकर रेखा की र्चीख निकल गई।

इन्द्रजीत ने फोरन ही अपना चेहरा दोबारा ढांप' लिया और कापते' हुए व्यथित स्वर में बोला-- "मैंने तुमसे कहा था न कि मेरा चेहरा मत देखो। मगर तुम नहीं मानी। ' '

"यह…यह सब क्या है, भैया-- यह आपके चेहरे को क्या हुआ है? ' ' रेखा की आखों' सै आसू छलक आए थे ।

इन्द्रजीत का आधा चेहरा बिल्कुल ठीक था लेकिन आधा चेहरा किसी दीमक लगी लकडी. की तरह हो गया था। मास में छोटे-बड़े बेशुमार सुराख थे और यूं लगता था जैसे हाथ लगाने पर आधा चेहरा झडकर नीचे गिर जाएगा।

' ‘मैं कुछ नहीं जानता रेखा, मेरी बहना में तो बस जिन्दगी का श्राप काट रहा हूँ। " इन्द्र का गला भर आया था, 'जाने किस जन्म के पापों का प्रकोप है यह । "

' 'मेरा जी चाह रहा है कि उस कमीनी बकाल को कत्ल कर दूं। ' ’ रेखा अपने आसू साफ़ करते हुए बोली। वह सम्भल चुकी थी और दुख रोष में बदल चुका था।

"उसे कत्ल करना इतना आसान नहीँ है। फिर मैं तुम्हें उसे कत्ल करने भी नहीँ दूगा । ' ' यह काले चिराग की आवाज थी ।

रेखा ने पीछे मुडकर देखा तो वह उसके पीछे खडा हुआ था। अदर' आते हुए उसने' रेखा की बात सुन ली थी।

' 'आप जरा देखें तो उसने भैया कीं क्या दुर्गत बना रखी है । क्या इसके बाद भी उसै जिंदा रहने का हक है?"

रेखा ने पीछे मुडकर देखा तो वह उसके पीछे खडा हुआ था। अदर' आते हुए उसने' रेखा की बात सुन ली थी।

' 'आप जरा देखें तो उसने भैया कीं क्या दुर्गत बना रखी है । क्या इसके बाद भी उसै जिंदा रहने का हक है?"

"तुम ठीक कहती हो। उसका यह अपराध वास्तव र्में ही बहुत वडा है । बडा, और जघन्य । वह इसी योग्य है कि उसका कत्ल कर दिया जाए लेकिन मेरी विवशता यह है कि में उससे प्रैम करता हूँ। मै तो उसे कोई क्षति पहुचाने क्री सोच भी नहीं सकता ।"

"कुछ देख़कर तो प्रेम किया होता। " रेखा झल्लाकर बोली---"ऐसी बुरी ओर दुष्ट औरत से मुहब्बत कर बैठे।"

' ' ‘ 'प्रेम देखकर कब किया जाता है प्रेम हो जाता है?" काले चिराग के होठों पर मुस्कान तैर आइ थी।

" ओह । तो आप लोगों की दुनिया में भी मुहब्बत का यही दर्शन है... । यही मानते हैं आप भी? ' ' रेखा ने पूछा ।

"हमारे-तुम्हारे यहां क्या-यह तो प्रेम का विश्वव्यापी दर्शन है । ' ' काले चिराग ने ठहरे हुए सहज भाव में कहा---' 'दिल और दिल से जुडी. 'भावनाएं भी क्या जुदा होती है। "

रेखा कुछ क्षण खामोश रही फिर बोली---

' 'अब बकाल का क्या करे ? उसने तो मेंरे भाई को कहीं का नहीं छोडा, है।" रेखा परेशान थी ।। उसकी आखों' में बार-बार आसू छलक आते थै ।

' 'परेशान न हो, मेरी बहना सब ठीक हो जाएगा।" इन्द्र ने सर्द आह भरी थी ।

' 'आप वैठ'जाएं । ' ' रेखा काले चिराग से सम्बोधित हुई।

' 'अब बैठने का वक्त नहीं है I ‘ ' काले चिराग ने रेखा के बराबर बैठते कहा--- ' 'अब कुछ कर गुजरने का वक्त है।"

"बताईये क्या किया जाए। " रेखाँ बोली---"मै इस नर्क से अपने भैया की मुक्ति के लिए कुछ भी करने को तेयार हूँ। "

' 'मैं...मै डरता हूँ रेखा, कि कंही' तुम भी किसी मुसीबत में न फंस जाओंI" इन्द्र बोला।

और इसका जबाब काले बिराग ने दिया ।

' 'इन्द्रजीत .. अगर तुम्हें बकाल के चुंगल' से कोई बचा सकता है तो तुम्हारी बहन ही है। वरना वह दिन अधिक दूर नहीं जब तुम्हारे चेहरे की यह दीमक तुम्हारे पूरे शरीर पर फैल जाएगी। "

"हाय, नहीं। " रेखा चीख ही तो उठी थी, ' 'में अपने भाई पर वह दिन कभी नहीं आने दुगी... l"

"मैं अपने स्वस्थ...अपनी आजादी और अपनी जिन्दगी के लिए अपनी बहन क्रो किसी नर्क-क्रुण्ड में नहीं झोंक सकता । ' ' इन्द्रजीत बोला, फिर उसने अपनी बहन को सम्बोधित करके कहा-- ' 'रेखा तुम बापस चली जाओ। तुम एक सीधी-साधी लडकी. हो । तुम इन मायावियो का मुकाबला नहीं कर सक्रोगी । मैं एक जादूगर होकर भी बकाल का कुछ नहीं बिगाड सका l तुम तो कोई चीज ही नहीं हो। तुम यहां तक आ गई, मैंने तुम्हें देख लिया, मुझे चैन मिल गया । बाकी जिन्दमी में इसी मुलाकात की क्लप्ना में काट दूगा' । मेरी बहन, मेरा कहना मानो, बापस चली जाओ । तुम बकाल को नहीं जानतीं, वह एक बहुत ही ताकतवर और अम्पायर औरत है । उसका मुकाबला आसान नहीं, फिर तुम इसी से बकाल की ताकत का अंदाजा लगा लो किं यह काला चिराग आज तक उसका कुछ नही बिगाड़ सका । उसके मुकाबले के लिए यह तुम्हें तो उस दुनिया से ले आए हैं, लेकिन अपनी दुनिया के प्राणी क्रो खुद कोइ अकुंश नहीं लगा सके हैं। है न आर्श्वय की बात । जबकि यह बकाल सै मुहब्बत के भी दावेदार हैं।“
 
' 'देखो मेरे प्यार का मजाक न उड़ाओ। ' ' काले चिराग ने रूखे लहजे में कहा-- "जो बात तुम नहीं जानते उस बारे में इस विश्वास से बात करना स्वय' को धोखा देना है। मैं बकाल से प्यार करता हू इसमें कोई सन्देह्र नहीं है । रह गई यह बात कि बकाल का मुकाबला मैंने स्वय' क्यों नहीं किया और इसके लिए मैं तुम्हारी बहन को क्यों लेकर आया हूँ? तो इन्द्रजीत, सुन लो कि बकाल ने महीनों मुझे इस बात का फ्ता ही नहीं चलने दिया कि वह तुम्हे जगल' से उठा लाई है ओर तुम पर आसक्त है। जब मुझें सदेह' हुआ और में उसका पीछा करते हुए यहा तक पहुचा' तो यह सच्चाई मैरे सामने आइ । ' '

" फिर....॥." रेखा बोली।

' 'और फिर जब मैंने इस समस्या पर बकाल से बात की तो उसने देवा काली का नाम लिया और राजूमदारी का किस्सा सुनाया ।। उसने मुझे बताया कि वह देवा काली के आदेशानुसार राजू मदारी की इच्छा पर इसे दण्ड दे रहो है। इसमें कोई सदेह' नहीं कि बकाल तुम्हारे साथ जिस तरह पेश आ रही है वह किसी प्रकोप से कम नहीँ । लेकिन इस सजा में उसके लिए आत्म तृप्ति और सन्तुष्टि है। उसने अपने स्वार्थ हेतु तुम्हें जीवित रखा हुआ है और यह एक गम्भीर घिनौना अपराध है । हमारी दुनिया का कानून इस बात की इजाजत नहीं देता और फिर मेरे लिए तुम्हें... l " उसने इन्द्र की तरफ इशारा किया--"ख़त्म करना कोई कठिन काम नहीं। अब भी खत्म कर सकता हू और कल भी खत्म कर सकता था I तुम्हारी मौत के साथ ही बकाल का यह खेल समाप्त हो जाता, लेकिन तुम्हारी हत्या बकाल से नहीं छिपती। वह जान जाती। नतीजे में मेरी दुश्मन हो जाती और यूं मेरा प्पार खाक में मिल जाता। इसलिए मैंने यह -रास्ता नहीं अपनाया सोचता रहा कि क्या करना चाहिये I"

" समय बीतता रहा। एक बात तुम्हे और बता दूं। हमारे प्रेतलोक के वक्त में और तुम्हारी दुनिया वक्त में बहुत अन्तर है। तुम्हारी गणना के अनुसार बकाल की केद में तुम्हें सत्रह अट्ठारह बरस होते हैं लेकिन भेरी गणना सै केवल सात आठ माह खैर जब मेने' तुम्हारी दुनिया में जाकर तुम्हारे खानदान की खोज लगाईं तो मुझें तुम्हारी बहन रेखा नजर आइ और मेने' तत्काल ही अपनी योजना बना डाली-और इसे यहां ले आया । क्योंकि यह रेखा ही एकमात्र जरिया है तुम्हारी मुक्ति का और तुम्हारी मुक्ति में मेरी मुक्ति भी है। यह जो तुम्हारी चेहरे क्रो दीमक लग गई है यह धीरे धीरे फैलती हुईं तुम्हहि पाव के अगूठे तक पहुच जाएगी। अगर ऐसा हो गया तो दुनिया की कोई भी ताकत तुम्हें इस विपदा से मुक्ति नहीँ दिला सकेगी । तुम्हारा रोग बढता जाएगा और तुम हमेशा हमेशा के लिए बकाल के' हो जाओगे। और यू मेरे प्यार मेरी चाहत की मोत्त हो जाएगी । मै किसी की मौत नहीं चाहता | न अपनी न तुम्हारी। मै चाहता हू कि रेखा को उसका भाई मिल जाए और मुझे मेरी बक्ताल । ' '

' 'मैं क्षमा चाहता हूँ कि मेरी बात से आपको दुख पहुचा'। ” इन्द्र शर्पिन्दा था।

' 'कोई बात नहीं । मुझे अब खेद इस. बात का है कि मुझें अपनी दुनिया के कुछ रहस्य खोलने पडे। ' ' काले चिराग ने कहाI

कुछ क्षण खामोशी के रहे और इस खामोशी को रेखा ने तोडा उसने कहा-- "फिर अब करना क्या है बताइये? मुझे बस अपना आई चाहिये जीवित स्वस्थ । ' '

"मैरी तो यही कोशिश है। ' ' काले चिराग नें ठण्डा सास' लेकर कहा… "अत: हमेँ..... । "

वह कुछ कहते-कहते-अचानक खामोश हो गया। उसके चेहरे पर हवाईयां उडने लगी I

“क्या हुआ...?' ' रेखा उसे परेशान देखकर खुद भी परेशान हो गई।

'तभी पखों' की फडफडाहट… सुनाई दी। यूं लगा जेसे कोई पक्षी झोपडी. की छत्त पर आ बैठा हो ।

“लगला है, बकाल आ गई l" काला चिराग मुश्किल से ही बोल सका था I

"अब क्या होगा?" रेखा एकदम घबरा गई ।

"यह तो बहुलं बुरा हुआ। ' ' इन्द्र भी सहम गया था।

' 'मै' देखता हू क्या मामला है। ' ' काला चिराग उठता हुआ ब्रोला-’'अगर बकात्त ही आई है तो वह अभी तक अन्दर क्यो'नहीँ आई।" वह्र कापते कदमों से दरवाजे की तरफ बढ़ गया।

रेखा और इन्द्रजीत क्री निगाहे उसी पर टिकी हुई थीं।

काला चिराग दरवाजे के पास पहुचकर जेसे ही बाहर जाने के लिए झुका तो कुक्षेक क्षणों के लिए झुका का झुका रह गया I फिर वह खौफजदा होकर पीछे हटा और तेजी से पलटकर इन दोनों के निकट आ गया।

‘ 'मारे गए । ' ' उसके मुहे सै निकला था I

' 'क्या हुआ? कोन है बाहर...? ' ' रेखा ने पूछा।

' 'हम घेर लिए गये हैं। ' ' बाहर बकाल के कारिन्दे मौजूद हैं। ' '

"और बकाल ।' ' इन्द्रजीत ने पूछा ।

' 'वह मुझें सामने दिखाई नहीं दी है । पर वह भी आस पास ही होगी । मेरा ख्याल है आना ही चाहती है, यह _अच्छा नहीं हुआ। उसने मेरे जाल फेंकने से पहले ही अपना जाल फैक दिया । " काला चिराग अपना खौफ छिपा नही पा रहा था ।

इन्द्रजीत कुछ पूछने ही बाला था किं बाहर से आवाज आई-ओर यह आवाज नि::सदेह' बकाल क्री ही थी ।

"झोपडी में बैठकर मेरे बिरूद्ध षड्यंत्र रचने वालो, सुनो ! मैं आ गई है। तुम क्या समझते हो तुम डेढ़-दो आदमी मुझे अपने जाल में फसा लोगे । भूल है यह तुम्हारी, मैं तुम्हारी यह साजिश कभी सफल नहीं होने दूगी । और सुन लो, चमगादड़ के बच्चे । अब तू बाहर आ जा तुझे हिरासत में लिया जाता है... । "

बकाल बुच्छेक क्षण चुप रही, फिर आगे बोली-- ' 'चल, जल्दी कर! फौरन बाहर आ जा… । "

यह घोषणा सुन काले चिराग ने बडे निराशा के साथ ही रेखा और इन्द्र की तरफ देखा और धीरे से बोला---' 'अच्छा' मैं चलता हू। मेरे पख' कट गए हैं । मैं अब न अपने लिए कुछ का सकता हू न तुम्हारे लिए। मेरे लिए दुआ करना । जीबन रहा तो फिर मिलेंगे... ।"

"जल्दी कर ओ चमगादड़ के बच्चे ।'' बाहर से बकाल कीं फुफकारती आवाज आईं।

काला चिराग, उन दोनों से विदा ले, जैसे ही झोपडी, से बाहर आया, उसने बकाल क्रो घोडे पर सवार अपने सामने पाया l

घोडे पर बैठी वह एक शहजादी सी लग रही थी।

काले चिराग को देखकर उसने एक कहकहा लगाणा फिर य्यग्यपूवर्ण आबाज में बोली--" आ गया तू-मेरी जान के दुश्मन? ? ”

काला चिराग असहाय-सा बौला---"मैं तेरी जान का दुश्मन नहीं हूँ बकाल ।"

' ' फिर तू अन्दर बैठा क्या मेरी कुशलता की दुआ माग रहा था? " य्यग्य' भरे स्वर में पूछा बकाल ने ।

‘ 'हा', यही समझो । मैं चाहता हूं तू इस मासूम इन्सान क्रो छोड दे और मेरी हो जा... ।"

' 'तेरी हो जाऊ' । ' ' यह कहकर वकाल बहुत जोर से हसी---"चभमादड़ की सतान' तू है क्या, कभी तूने अपनी औकात पर गौर किया है । "

"मैं जो कुछ भी हूँ बस तेरा हूँ तुमसे प्रेम करता हूँ। "

"मैं तेरी मुहब्बत क्रो अपने घोडे की 'सुम' तले रखती हूँ। ' '

"बकाल तू मेरा चाहै जितना अपमान कर ले पर मेरी मुह्रबत्त को बेइज्जत न कर।'' वह तडप उठा।

"नहीं तो क्या होगा? " वह फुफकारी।

"मै देवा काली के दरबार में जाऊगा।।" काले चिराग ने सिर उठाया।

"दरबार में?" बकाल जैसै यह सब सुनकर पागल हो गई। पागलों की तरह हसने' लगी । फिर हसते' हुए बोली--""तू जाएगा देवा काली के दरबार में । तू देबा काली के स्नानागार में तो जा सकता है-पर तेरा दरबार में जाना आसान नहीं। चमगादड़ के बच्चे, अपनी औकात न भ्रूल...अपनी जात न भूल ।"

"प्यार की कोई जात नहीं होती । कोई नस्ल नहीं होती । प्रेम तो अधा होता है।" वह जेसे अपने आप में गुम था ।

' 'चिन्ता न कर, मैं तुझे तेरी मुहब्बत की तरह अधा' का दूगी' I " फिर उसने हाथ उठाकर इशारा किपा-"बन्दी बना लो इसै । ' '

उसके आदेश का तत्कालं पालन हुआ । दो देवकाय खौफन्नाक सूरत बन्दे आगे वडे ओर उन्होंने देखते ही देखते काले चिराग को जजीरों में जकड़ लिया और फिर उसे खींचते हुए बकाल के सामने ले जाकर खडा कर दिया ।

“मैं जानती हू तू अंदर बैठा क्या कर रहा था । तू इन्द्रजीत की बहन को लेकर, देवा काली के दरबार में मेरा मुकदमा पेश करने की मत्रणा' कर रहा था । तेरी मंशा मुझें दण्ड दिलवाने की है और तू इन्द्र क्रो उसकी दुनिया में बापस भिजवाना चाहता है कि तेरा रास्ता साफ हो जाए और मैं तुझसे प्रेम करने लगू'। तेऱी तरफ झुक जाऊं। और काले चिराग, क्या तूने कभी अपनी सूरत देखी है? नहीं देखी तो किसी गन्दे जोहड़ किनारे खडे होकर अपनी शक्ल देख । फिर मुझसे प्रेम करना। जाओ, ले जाओ इसे। "

वे दोनों खौफ़नाक देवकाय शख्स अपने घोडों पर सवार हुए । दोनों के हाथ में जजीर का सिरा था। दोनों ने एक अजीब-स्री आबाज निकालकर एक-साथ अपने घोडों. क्रो एड़ लगाई। घोडे सरपट दौडने. लगे ।

काला चिराग जजीरों' में बंथा रेत पर घसीटता चला जा रहा था। बकाल इस नजारे को बडे गर्वित अदाज' में देखती रही 1 यहां तक कि काला चिराग उडती रेत के बीच गायब हो गया।

तब बकाल अपना घोडा. बढाकर झोपडी. के दरवाजे पर पहुची।
 
रेखा झोपडी. के अंदर बैठी बाहर होने वाली कोई भी कार्रवाई को देख और… सुन रही थी। बकाल को निकट आते देखकर वह फौरन उठकर इन्द्र के पास चली गई। वह समझ नहीं पा रही थी कि वह इस चुडैल का सामना किस तरह करे ।

इन्द्रजीत ने अपना सूखा हाथ रेखा के कघे' पर रखा धीरे से दबाया। जिसका मत्तत्तब था कि परेशान न हो ।

बकाल अन्दर आई । उसने तीखी निगाहों सै रेखा को देखा । रेखा ने भी उसे सिर से पांव' तक देखा । फिर दोनों एक दूसरे की आखो में आखे डालकर देखने लगी। कितने ही क्षण दोनों इसी मुद्रा में रहीँ।

‘ "बहुत_ खूबसूस्त. हो?" बकाल ने पहल की।

पता नहीं यह सवाल था या प्रशंसा ।

“कम कुछ तुम भी नहीँ हो । " रेखा तीखे स्वर में बोली ।

"तुम मेरे बारे मे अभी कुछ नहीँ जानती l" वह हसी' ।

"भै अपने भाई की हालत्त देख रही हू। इससे अधिक जानने की कामना भी नहीं है। ' '

"तुम्हारा भाई मुझे बहुत अच्छा लगता है । ” वह हसकर बोली।

''जो अच्छा' लगता हो उसकी ऐसी दुर्गत बना देना शायद तुम्हारी दुनिया की रीत है । "

"बस, अब कुछ ही दिनों को बात है । उसके बाद तुम्हारा भाई हर दुख, और पीड़ा से मुक्त हो जाएगा। इसके चेहरे पर ग्रहण लगा हुआ है, बस... । ' '

"हां चाद' क्रो ग्रहण लग चुका है और यह शुभ और अच्छी बात नहीं । ' ' रेखा ने उसकी बात काटी ।

"तुम्हारी दुनिया में इसे बुरा समझां जाता होगा। मेरे लिए तो यह अपार प्रसन्नता की बात है। मैने बडी, मेहनत की है। बडे यत्न किए हैँ। अब मुझे इसका फल मिलने वाला है। ' ' वह चहकती सी बोली थी।

' 'भूल जाओं... ।" रेखा ने बडी रूखाईं से कहा।

' 'किस बात्त को? ' बकाल हैरान हुई।

' 'मेहनत के फल को । अब तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा । ' ' रेखा ने दृढ़ लहजे में कहा ।

"वह क्यों...?“ बकाल ने पूंछा।

' 'मै जो आ गई । ' '

“तुम आईं नहीं हो-लाई गई हो… l ' '

"जानती हूँ। काला बिराग मुझे लेकर आएं है। ' ' रेखा बौली-' 'बहुत ही अच्छा और नेकदिल इंसान है वह!"

' 'उस चमगादड़ के बच्चे का नाम इतने सम्मान के साथ न लो। वह तुम्हें तुम्हारी दुनिया से नहीं लाया है । ' ' बकाल गुस्से सै बोली।

" अच्छा, फिर कौन लाया है? ' ' रेखा उसे घूरने लगी ।

' 'मेरा भाई लाया है । " बकाल ने बताया ।

"कौन भाई? " रेखा की समझ में नहीं आया।

' 'वह भाई जिसने तुम्हें डायरी भेट की थी... ।"

"तुम्हारे भाई का नाम राकल तो नहीं..?' '

"हा, मेरे आई का नाम राकल है। और यह नाम तुम्हे इस चमगादड़ के बच्चे ने बताया होगा। "

"उन्हॉने नाम ही नहीँ, तुम्हारे भाई की खूबियां भी बताई थी । "

' 'वह क्या? ' '

' ‘यही कि राकल, एक शक्तिशाली, अश्यास विलासी, रगबाज' शख्स का नाम है। "

‘ ‘ ज्यादा बकबास मत करो। “ बकाल बिफर उठी I

“यह मैने नहीं कहा। मैं तो उनकी अंहसानमंद हूँ। उनकी दी हुई डायरी से मुझें अपने अज्ञात अतीत का पता मिला... । ' ' रेखा ने होशियारी सै बात का स्ख बदलते हुए कहा ।

"कहा है वह डायरी? ' ' बकाल का लहजा नर्म हुआ ।

' 'यहां है...मेरे पास...मेरे बैग में....... । ' ' रेखा ने बताया।

"निकालो... । ' ' बकाल ने आदेश दिया ।

इन्द्रजीत खामोश निगाहों से उसे देख रहा था I बकाल अभी तक उससे सम्बोधित नहीं हुईं थी। रेखा डायरी निकालने के लिए उठी तो उसका ध्यान इन्द्र कीं तरफ गया। इन्द्रजीत क्रो अपनी तरफ देखते पाकर-वह्र बडे ही मोहक अंदाज

में मुस्कराई और बडे प्यार भरे लहजे में बोली

' 'केसे हो प्रियतम. . . ? "

' 'ठीक हूँ। तुम्हारी कृपा दृष्टि है । ' '

तभी रेखा ने डायरी बेग से निकालकर उसकी तरफ बढाई--- "यह लो. .. I तुम इसे बापस लेना चाहती हो तो ले लो । ‘ '

बकाल ने कोई जवाब नहीं दिया। वह खामोशी से डायरी के पेज पलटती रही । पृष्ठ पलटते हुए उसके चेहरे पर मुस्कराहट फैलती जा रही थी I फिर अचानक उसने डायरी बद' की और रेखा से सम्बोधित होते हुए बोली--' 'यह डायरी अब तुम्हें बापस नहीं मिल सकती । ' '

”तोहफा देकर वापस लेना...क्या यह भी तुम्हारी दुनिया की रीत है?” रेखा ने व्यग से कहा ।

"अब यह डायरी तुम्हारे लिए बेकार है । तुम इससे जो लाभ उठा सकती थी-वह उठा चुकीं I अब इस डायरी को तुम्हारे पास नहीं रहना चाहिये। तुम्हें इससे नुकसान पहुच' सकता है। "

' 'यह डायरी भला क्या नुकसान पहुचा सकती है?" इस बार इन्द्र ने मुह खोला। उसी ने पूछा था ।

' ' अरे कुछ नहीं भैया, यह इस डायरी को बापस लेना चाहती थी...सो ले ली... l ” रेखा बोली ।

''जाहिर है यह नहीं चाहती कि इस डायरी से हमें आईंदा कोई लाभ मिले।"

बकाल ने रेखा को घूरकर देखा-लेकिन बोली कुछ नहीं। फिर उसने वह डायरी झोपडी, की छत की तरफ उछाली और वह डायरी देखले ही देखते तोता बन गई। ओर तोता बनकर झोंपडी, का एक चक्कर लगाकर दरवाजे से बाहर निकल गया ।

' ' चलो, उठो. .. I " तोते के निकल जाने के बाद बकाल बोली ।

' 'कहा चलू. ? ' ' रेखा ने पूछा ।

' 'तुम्हें मेरे साथ चलना होगा।" बकाल का लहजा आदेशपूर्ण था।

' 'तुम मेरी बहन को कहा' ले जाना चाहती हो ?? इंद्रजीत ने परेशान होकर पूछा ।

'यह मेरे भाई राकल की अमानत है। इसे राकल के पास भेजना होगा।" बकाल ने बडे रहस्यमय अवाज' में कहा-' 'आओ उठो । रेखा या शीना...जो भी तुम्हारा नाम है। "

''मेरा नाम रेखा है । लेकिन मुझे शीना बनते ज्यादा देर नहीं लगती…। "

" मुझें इससे कोई फर्क नहीं पडता ।" बकाल उपहासपूर्ण मुस्कान साथ बोली-- "यहा किसी को भी कोई फर्क नहीं पडेगा । आओ चलो I बाहर सवारी तुम्हारी प्रतीक्षक है।” यह कहकर उसने रेखा का हाथ पकड लिया ।

‘ उसके हाथ पकडते ही रेखा जेसे सम्मोहित सी उठी बकाल के हाथ पकडने के अंदाज में ही कुछ ऐसी बात थी कि रेखा विरोध की इच्छा करते हुए भी विरोध नहीँ कर पाईं । दरवाजे की तरफ बढने से पहले बकाल की नजर उसके बैग पर पडी तो उसने कहा--" यह तुम्हारा बैग है?' '

"और किसका होगा?"

"'क्या हे इसमें. . . ? "

' 'मेरी जरूरत की चीजें । "

' 'फिर बैग भी साथ ले लो... । "

”बकाल, तुम मेरी बहन को नहीं ले जा सकती । " इन्द्रजीत क्रो अचानक जोश आ गया।

"कौन रोकेगा मुझें?" ' बकाल ने एक जोरदार कहकहा लगाया-' 'क्या तुम? जिससे हिला भी नहीं जाता!" ' '

"बका तुमने मुझे तो बर्बाद कर-दिया है, लेक्लि मेरी बहन पर दया करो।" इन्द्रजीत ने अनुरोध किया ।

' 'न मैने तुम्हें बर्बाद किया है, न तुम्हारी बहन बर्बाद होगी, समझे… I" बकाल ने शुष्क स्वर में जवाब दिया किं रेखा से मुखातिब हो बौली--"आओं, चलो। ' '

ओंर वह रेखा का हाथ पकडकर. तेजी से बाहर निकल गई । इन्द्रजीत कुछ बोलना चाहता था, लेकिन बोल न सका I वह अपने दौनों हाथ मलता रह गया ।

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