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उसने एक झरोखे का पर्दा ह्रटाकर बाहर झांका यह इस भवन का पिछवाड़ा था । ऊँचे पेड़ ओर उसके बीच बिछी घास नजर आई । घास के साथ किनारॉ पर फूलो की क्यारिया थीं । यहां भी उसे कोई प्राणी नजर नहीं आया। इसान, पशु पक्षी कुछ भी नहीं, दूर तक सन्नाटा था। एक अजीब तरह की खामोशी थी । किसी हौलनाक तूफान के आने से पहले की खामोशी ।
रेखा उस कमरे में, काले चिराग के इतजार' में यूं ही घूमती, बैठती और टहलती रही । यहा' तक कि शाम गहरी होने लगी । फिर डूबने से कुछ देर पहले ही अचानक कमरे का दरवाजा खुला और काला चिराग चेहरे पर गहरी उदासी लिए अदर दाखिल हुआ। उसके हाथ में एक बडी ट्रे नुमा तश्तरी थी, जिसमें खाना रखा हुआ था। तश्तरी उसने मेज पर रख दी ।
रेखा खाना देखकर परेशान हो गई। ' 'खाना ! इतनी जल्दी ? "
"तुम खाना देखकर परेशान मत होवो। जब तुम्हारा जी चाहे खाना । यह उसी तरह गर्म और ताजा रहेगा जेसा कि अब है । खाना मैं इस वक्त इसलिए ले आया हूँ कि मैं अघेरा होने सै पहले यहा' से चला जाऊगा' । फिर में प्रात: आऊगा । जाना मेरी मजबूरी है ।। तुम बेचिन्त रहो I खाओ, पियो और आराम करो । सुबह मै आऊँगा तो तब तुम्हारे भाईं के बारे में हर प्रश्न का उत्तर दूगा' । मैं तुम्हें उसक्री जिन्दगी की कहानी सुनाऊगा । अच्छा अब मैं चलता हूँ। तुम बस एक बात का ख्याल रखना-इस कमरे से बाहर निकलने की कोशिश मत करना । पर्दे उठाकर बाहर झाकना' भी मत कि हो सकता है कि तुम्हें कोई ऐसा दृश्य नजर आ जाए जो तुम्हारे होशो-ह्रबास गुम कर दे । बाहर से सुनाई देने बाली आवाज पर भी ध्यान मत देना । अब यह बताओ कि कमरे में शमा रोशन कर दूं या फानूस ।। मैं फानूस रोशन किए देता हू-शमा की रोशनी हल्की रहेगी। ' '
यह कहकर उसने उगली का इशारा किया और कमरे में लटके तीनों फानूस प्रकाशमान हो गये। कमरा पूर्णत: रोशन हो गया ।
' 'आप सुबह कितने बज आएगे?" रेखा ने चिन्तिन स्वर में पूछा।
' 'मैं सूरज को पहली किरण के साथ हाजिर हो जाऊगा । " काले चिराग का जबाब था।
' 'में अपने भाई के बारे में कुछ शीघ्र अति शीघ्र जानना चाहती हूँ। ' ' रेखा ने अपने मन की बात कही ।
' 'बस, एक रात का इतजार और । प्रात: में सब बता दूंगा । बता तो में आज भी देता लेकिन जब भी आया सोता हुआ पाया। ' ' काले विराग ने जेसे सफाई दी।
' 'आप मुझे उठा देते। " रेखा के लहजे में शिकायत थी ।
' 'तुम बहुत गहरी नींद में थीं । जी न चाहा कि तुम्हें उठाऊं। अच्छा मै चलता हूँ। प्रात: भेट होगी। खाना खा लेना और जो हिदायत दी है उन पर अमल करना । देखौ, फिर समझाता हूँ। बाहर मत झाकना और न बाहर की आवाजों पर ध्यान देना। आओ, दरवाजा अन्दर से बन्द कर लो I अगर दरवाजे पर दस्तक हो तो कदापि मत खोलना। दस्तक देने वाला मैं नहीं होऊगा'। यह बात अपने मस्तिष्क में भली-भाति' बैठा लो । ' ‘
यह कहने के बाद उसने कमरे का भीतरी दरवाजा खोला और बाहर निकल गया। रेखा ने दरवाजा भीतर से वद कर लिया । वह दरवाजा भी वद' कर लिया जो बाहर की तरफ खुलता था। पर्दे अच्छी तरह गिरा लिए ।
काला चिराग उसे अच्छा खासा डरा गया था!
और फिर ......
रात लगभग ग्यारह बजे उसे भूख महसूस हुई । वह मेज के निक्ट कुर्सी घसीट कर बैठ गई। खाना स्वादिष्ट और गर्म था । उसने पेट भरकर खाना खाया और फिर कमरे में ही चहलकदमी करने लगी ।
टहलते-टहलते उसे अचानक चमत्कारी डायरी का ख्याल आया। उसने अपने बेग में सै डायरी निकाली और कुर्सी पर बैठकर उसका एक एक पेज पलटने लगी। वह अपने भाई इन्द्रजीत के बारे में सोचती जा रही थी । लेकिन कुछ नहीँ हुआ। किसी भी पृष्ठ पर कुछ लिखा हुआ दिखाई नहीं दिया । निराश होकर. उसने डायरी बैग में बापस रख ली ।
अब वह आरामदायक बिस्तर पर लेट गई थी। खाना उसने भरपेट खाया था । करने को कुछ था नहीं। सोचने क्रो बहुत' कुछ था। सोचते-सोचते उसकी पलको' में नींद उतरने लगी ।
अभी वह ठीक से सो भी नहीँ पाई थी कि घबराकर उठ बैठी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि उसने कोई ख्वाब देखा है या यह सब कुछ उसने जागते में देखा है।
उसने देखा कि यह किसी खण्डहर में पत्थर पर लेटी हुई है। चाद पूरे यौवन पर है और हर त्तरफ चमगादडें उड रही _ हैं। बडी बडी चमगादढें । एक-दो चमगग्दडें उसकी तरफ भी लपकी थीं । तभी उसकी आख खुल गई थी I
यह केसा भयानक ख्वाब था । यह ऐसा भयावह ख्वाब था किं रेखा जब भी सोने लगती यह सपना उसे दिखने लगता। वह आखें खोलती तो बाहर से अजीब-अजीब व हौलनाक आवाजे आने लगतीं । कभी कुत्ते भौंक रहे हौते। कभी बिल्लियां लड़ रही होतीं। कभी उल्लू बोल रहे हौते । कभी गीदडो, की आवाजें सुनाई देती । ये आबार्जे कभी हल्की हो जाती और कभी ऐसी तेज कि दिल दहल उठे।
रेखा को ऐसा लगता जैसै बाहर डैक पर कोई साउण्ड ट्रेक सुनाया जा रहा हौ ।
अजीब मुसीबत थी। वह सोती तो भयानक खाब उसकी आखों' में उतर आता और जाग जाती तो बाहर कीं हौलनाक ड्रामाईं आवाजें सुनाई देने लगर्ती ।
बस इसी तरह आखों' में रात कट गई और फिर सुबह हुई तो उसे नींद ने आ दबोचा।
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रेखा उस वक्त गहरी नींद में थी, जब कोई दरवाजे पर निरंतर दस्तक दे रहा था।
दस्तक की इस निरन्तर आबाज पर रेखा की आख' मुश्किल से खुली I उसने अपनी कलाई घडी. पर नजर डाली । सात बज रहे थे।
बह्र फोरन उठकर खडी, हो गई । दरवाजे पर यकीनन काला चिराग होगा उसने सोचा।
आगन्तुक काला चिराग ही था । अपने वायदे के अनुसार वह दिन निकलत्ते हो आ पहुचा' था। रेखा कीं आखें' नोंद से बोझिल हो रही थ्री । आखों' में लाल डोरे पडे हुए थै-जो उसकी आखों' को और भी आकर्षक बना रहे थे । खूबसूरत नशीली आखें। काला चिराग उसकी आखो में झाकने लगा।
रेखा ने जुम्हाई ली और बोली "रात में एक पल भी नहीं सो सकी हूँ। ' '
"जानवरों क्री आवाजॉ से डरती रही? ' काले चिराग ने पूछा।
"जानवरों को आवाजों से इतना नहीं, जितना चमगादडों से... ।"
”क्या मतलब?” वह एकदम चौक गया।
"मुझे जब भी नोंद आती-एक भयानक ख्वाब देखने लगती I जेसे मैं किसी खण्डहर में पत्थर पर लेटी हुई हू और बडी…-बडी चमगादड़े इधर-उधर उडती. फिर रही हैं । एक दो मेरी तरफ भी लपकती महसूस होती । " रेखा ने बताया।
"ओह ।। " काले चिराग ने अपना सिर पकड… लिया-- "वास्तव में गलती मुझसे हुई, मुझें इस बात का ख्याल ही नहीं रहा । ' '
"केसी गलती? किस बात का ख्याल?" रेखा उलझकर रह गई थी।
"बस हो गई एक गलती । " काले चिराग ने टालने के अन्दाज में लापरवाही से कहा-- "आज क्री रात तुम्हें यह ख्वाब बिल्कुल दिखाई नहीँ देगा । "
' 'ठीक है। ' रेखा ने गहरी सास' ली ओर बहस न करना ही उचित्त सभझां ।
"अब तुम जाकर 'मुहे-हाथ धो लो। मै तुम्हारे लिए नाश्ता लेकर आता हूँ। फिर इत्मीनान से बैठकर बात करेंगे l ' ' यह कहकर काला चिराग उठ गया और भीतरी दरवाजे से बाहर निकल गया ।
उसके जाने के बाद रेखा ने खिडकी. से पर्दा ह्रटाकर बाहर झाका' I सब कुछ बैसा ही था । वह हमाम में चली गई। इत्मीनान से हाथ-मुह धोया और बाहर आ गई।
रेखा अभी आकर कुर्सी पर बैठी ही थी काला चिराग तश्तरी उठाए अंदर दाखिल हुआ। उसने तश्तरी मेज पर स्ख दी जो नाश्ते के व्यजनों से भरी हुई थी ।
' 'मुझें बडी, शर्मिन्दगी होती है कि आप मेरे लिए ट्रे उठाकर लाते है। क्या इस महलनुमा भवन में कोई भी सेवक नहीं है?" रेखा ने पूंछा।
' 'यहां बहुत से लोग हैँ-लेकिन ऐसा कोई भी नहीं जो यह काम कर सके । तुम्हें शर्मिन्दा होने की कोई जरुरत नहीं, नाश्ता करो. । ' ' काले चिराग ने गोल-मोल सा जवाब दिया।
' 'आप समझ में न आने वाली बातें बहुत करते है । क्या आपको दूसरे को उलझाकर बहुत मजा आता?!
"मै किसी को क्या उलझांउगा मैं तो स्वयं एक लम्बी अवधि से उलझा हुआ हूँ। ' '
' 'आपको किसने उलझाया?" रेखा ने टोस्ट पर मक्खन लगाते हुए पूछा।
"बकाल ने... I ' '
रेखा चौंकी, उसने तेजी से पूछा----"यह बकाल आखिर क्या बला है? आपने कल भी इसका जिक्र किया था..॥' '
' 'उसे बला न कहो मैं उस पर मरता हूँ। ' '
' 'मरता हूँ...?' ' रेखा तनिक सम्भल गई ।
"हां मरता हूँ। मगर अफसोस कि वह किसी और पर मरती है... । "
' ' 'किस पर.. .? ' '
' 'तुम्हारे भाई इन्द्रजीत पर.. . । ' '
रेखा उलझती जा रही थी, उसने काले बिराग का आशय समझते हुए कहा-- ' 'यह कैसा मरना है कि वह उस पर मरती भी है और उसे कैद भी रखा है? ' '
' 'यही तो रहस्य है और मैं यही सब बताने के लिए तुम्हें यहां पर लाया हू॥"
' ' 'तो फिर बताइये। मै सुनने के लिए व्यग्र हूँ।" '
काला बिराग कुछ क्षण खामोश रहा और फिर इस खामोशी को तोडते पूछा-- "तुम अपने भाई हन्द्रजीत के बारे में कितना जानती हो?"
"सिर्फ इत्तना ही मेरे भाई इन्द्रजीत को जब वह बारह तेरह वर्ष- चौदह बरस के थे तो मेरे चाचा रमाकांत ने जब वह शिकार करने गए ये उसका अपहरण करबा लिया था और फिर उन्हे जान से मरवा दिया था। मेरे पापा कृष्णकांत की हत्या करने से पहले रमाकांत ' ने यही बताया था कि वह इन्द्रजीत्त को कत्ल करवा चुका है । लेकिन मेरा भाई तो जिन्दा है I इसका मतलब है कि रमाकात को कोई गलतफ़हमी हुई I "
“नहीं गलतफहमी नहीं हुई। उसे उसके लोगों ने यही बताया था कि वे उसके आदेशानुसार इन्द्रजीत को कत्ल कर आएं हैं । उसके लोगों ने इन्द्रजीत क्ती लाश के टुकडे देखे थे।"
"मेरे भाई की लाश के टुकडे... l ‘ ' रेखा ने घबराकर पूछा ।
' 'हा,, तुम्हारे भाई की लाश के टुकडे जो एक एक करके उन लोगों के सामने गिरे । "
' 'फिर मेरा भाई जीवित केसे है?" रेखा बौखला सी गई--“क्या उस झोपडी. में मेरे भाई के अलावा कोई और भी है । ' '
"कोई और नहीं वह तुम्हारा अपना सगा भाई इन्द्रजीत्त ही है। ठहरो, में तुम्हें शुरू से बताता हू। ' ' काले चिराग ने गहरा सास' लेकर कहा, फिर शून्य में निहारते आगे सुनाया--
' 'तुम्हारा भाई दिल्ली में एक बहुत अच्छा पब्लिक स्कूल मे शिक्षा प्राप्त कर रहा था I उस वक्त वह आठवीं या नौवीं क्लास में था । वह एक कुशाग्र बुद्धि और तेज तर्रार लडका. था । छोटी सी उम्र में ही उसने बहुत कुछ सीख लिया था । गाव की जिन्दगी से उसे प्यार था और शिकार का शोक तो उसे जुनून की हद तक था । उसका निशाना बहुत अच्छा था । उसके पास इटली क्री बनी दोनाली बन्दूक थी । इस बन्दूक का लाईसैन्स तो तुम्हारे पिता के नाम था लेकिन इसका प्रयोग अधिकतर इन्द्रजीत ही करता था। बह बंदूक हवेली में ही रखी रहती थी । तुम्हारे चाचा रमाकात कां छोटा बेटा विजय हालाकि इन्द्रजीत से उम्र में बडा था, इन्द्रजीत से उसकी दोस्ती और घनिष्ठता ज्यादा थी । साबनपुर में वे दोनों हर जगह साथ साथ रहते थे। ' '
"आखिरी बार इन्द्रजीत सावनपुर आया तो रमाकात ने उसके लिए जाल बुन रखा था। इन्द्रजीत उसके लिए खतरा बनता जा रहा था । बेचारे के बाप ने तो भाई से कभी हिसाब न मागा' था लेकिन बेटा हिसाब मागने लगा था । सो रमाकांत ने सोच लिया था कि इस बार इन्द्रजीत्त का पूरा हिसाब साफ का देगा । तुम्हारा भाई इन्द्रजीत जब भी सावनघुर आत्ता तो उसके साथ दो अंगरक्षक रहते थे। और इन अगरक्षकों की मौजूदगी में कोई भी खेल खेलना आसान नहीँ था। सो तुम्हारे चाचा रमाकात ने इन्द्रजीत के लिऐ जगल में फंदा तैयार करवाया । इन्द्रजीत्त को शिकार का शोक था ही सौ . इस बार जब रमाकांत ने उसे यह सूचना दी कि सावनपुर के जगल में हिरण देखे गए हैं.......
उसने अब तक तीतर का शिकार किया था । किसी बडे जानवर का शिकार नहीं किया था । उसने उस दिन ही शिकार का प्रोग्राम बना लिया......
.....सुबह सवेरे ही वह और नोकरो के साथ शिकार पर जाने को तेयार हो गये ।। इस प्रोग्राम के लिए दो जीपों का इन्तजाम किया गया था। प्रोग्राम अनुसार सभी तेयार हो जीपो में बैठ चुके थे। तुम्हारे भाई के बाडीगार्डो का इंतजार था । फिर किसी ने आकर बताया कि वे दोनों तो नशे में गहरी नींद सो रहे हैं और उठाए नहीं उठ रहे हैं.....
..... फिर एक मुलाजिम ने तुम्हारे भाई को बताया कि वे दोनो तो देर तक शराब पीते और ताश खेलते रहे हैं । इन्द्रजीत्त को जगल में उनकी जरूरत नहीं थी । वह उन दोनों को छोडकर विजय के साथ शिकार पा निकल लिया।"
"रमाकात' का यह बेटा बिजय अपने बाप के साथ इस साजिश में शामिल था। वह हन्द्रजीत को जगल मै उन्हीं रास्तों पर ले गया, जहा रमाकांत के गुडे डाकुओं के भेष में छिपे हुए थे। फिर जैसे ही विजय और तुम्हारा भाई इन्द्रजीत उनकी पहुच' में आए, वे डाकू घोडे दौडाते बाहर निकल आए और एक डाकू ने इन्द्र क्रो उठाकर अपने घोडे पर लाद लिया......
..... वे चारों डाकू तुम्हारे भाई इन्द्रजीत को ले उड़े। यू अपहरण का यह खेल पूरा हुआ । बाद मै यही खबर लेकर बिजय का बड़ा भाई सूरज दिल्ली तुम्हारे बाप के पास पहुच गया जिसे सुनकर तुम्हारे पिता दुखी हो गए । "
.........उधर हुआ ये था कि वे कथित डाकू जगल में काफी अंदर जाने के बाद एक जगह ठहर गए थै। एक ने इन्द्रजीत क्रो धोड़े से उतारा ओर एक वृक्ष के तने से बाध दिया । इन्द्रजीत्त की सिट्टी पिट्टी गुम थी । उसे मामले की गम्भीरता का अहसास हो चुका था । अब वह पछता रहा था कि उसने अपने बाप के कहै पर अमल न करके कितनी बडी गलती की हे। कृष्णकांत' ने उसे हिदायत दी थी कि अपने अंगरक्षकॉ के बिना कही न जाना कि अगर इस मौके पर भी उसके बाॅडीगार्ड उसके साथ होते तो इतनी आसानी से उसका अपहरण सम्भव न था ।"
"तुम लोग कौन हो? क्या चाहते हो?" उसमे उन डाकुओँ से पूछा था।
"हम लोग तुम्हारी मोत हैँ-तुम्हें यहां कत्ल करने के लिए लाए हैं। " उस डाकू ने हंसकर जबाब दिया था जो उसे अपने घोडे, पर लाद कर लाया था....
रेखा उस कमरे में, काले चिराग के इतजार' में यूं ही घूमती, बैठती और टहलती रही । यहा' तक कि शाम गहरी होने लगी । फिर डूबने से कुछ देर पहले ही अचानक कमरे का दरवाजा खुला और काला चिराग चेहरे पर गहरी उदासी लिए अदर दाखिल हुआ। उसके हाथ में एक बडी ट्रे नुमा तश्तरी थी, जिसमें खाना रखा हुआ था। तश्तरी उसने मेज पर रख दी ।
रेखा खाना देखकर परेशान हो गई। ' 'खाना ! इतनी जल्दी ? "
"तुम खाना देखकर परेशान मत होवो। जब तुम्हारा जी चाहे खाना । यह उसी तरह गर्म और ताजा रहेगा जेसा कि अब है । खाना मैं इस वक्त इसलिए ले आया हूँ कि मैं अघेरा होने सै पहले यहा' से चला जाऊगा' । फिर में प्रात: आऊगा । जाना मेरी मजबूरी है ।। तुम बेचिन्त रहो I खाओ, पियो और आराम करो । सुबह मै आऊँगा तो तब तुम्हारे भाईं के बारे में हर प्रश्न का उत्तर दूगा' । मैं तुम्हें उसक्री जिन्दगी की कहानी सुनाऊगा । अच्छा अब मैं चलता हूँ। तुम बस एक बात का ख्याल रखना-इस कमरे से बाहर निकलने की कोशिश मत करना । पर्दे उठाकर बाहर झाकना' भी मत कि हो सकता है कि तुम्हें कोई ऐसा दृश्य नजर आ जाए जो तुम्हारे होशो-ह्रबास गुम कर दे । बाहर से सुनाई देने बाली आवाज पर भी ध्यान मत देना । अब यह बताओ कि कमरे में शमा रोशन कर दूं या फानूस ।। मैं फानूस रोशन किए देता हू-शमा की रोशनी हल्की रहेगी। ' '
यह कहकर उसने उगली का इशारा किया और कमरे में लटके तीनों फानूस प्रकाशमान हो गये। कमरा पूर्णत: रोशन हो गया ।
' 'आप सुबह कितने बज आएगे?" रेखा ने चिन्तिन स्वर में पूछा।
' 'मैं सूरज को पहली किरण के साथ हाजिर हो जाऊगा । " काले चिराग का जबाब था।
' 'में अपने भाई के बारे में कुछ शीघ्र अति शीघ्र जानना चाहती हूँ। ' ' रेखा ने अपने मन की बात कही ।
' 'बस, एक रात का इतजार और । प्रात: में सब बता दूंगा । बता तो में आज भी देता लेकिन जब भी आया सोता हुआ पाया। ' ' काले विराग ने जेसे सफाई दी।
' 'आप मुझे उठा देते। " रेखा के लहजे में शिकायत थी ।
' 'तुम बहुत गहरी नींद में थीं । जी न चाहा कि तुम्हें उठाऊं। अच्छा मै चलता हूँ। प्रात: भेट होगी। खाना खा लेना और जो हिदायत दी है उन पर अमल करना । देखौ, फिर समझाता हूँ। बाहर मत झाकना और न बाहर की आवाजों पर ध्यान देना। आओ, दरवाजा अन्दर से बन्द कर लो I अगर दरवाजे पर दस्तक हो तो कदापि मत खोलना। दस्तक देने वाला मैं नहीं होऊगा'। यह बात अपने मस्तिष्क में भली-भाति' बैठा लो । ' ‘
यह कहने के बाद उसने कमरे का भीतरी दरवाजा खोला और बाहर निकल गया। रेखा ने दरवाजा भीतर से वद कर लिया । वह दरवाजा भी वद' कर लिया जो बाहर की तरफ खुलता था। पर्दे अच्छी तरह गिरा लिए ।
काला चिराग उसे अच्छा खासा डरा गया था!
और फिर ......
रात लगभग ग्यारह बजे उसे भूख महसूस हुई । वह मेज के निक्ट कुर्सी घसीट कर बैठ गई। खाना स्वादिष्ट और गर्म था । उसने पेट भरकर खाना खाया और फिर कमरे में ही चहलकदमी करने लगी ।
टहलते-टहलते उसे अचानक चमत्कारी डायरी का ख्याल आया। उसने अपने बेग में सै डायरी निकाली और कुर्सी पर बैठकर उसका एक एक पेज पलटने लगी। वह अपने भाई इन्द्रजीत के बारे में सोचती जा रही थी । लेकिन कुछ नहीँ हुआ। किसी भी पृष्ठ पर कुछ लिखा हुआ दिखाई नहीं दिया । निराश होकर. उसने डायरी बैग में बापस रख ली ।
अब वह आरामदायक बिस्तर पर लेट गई थी। खाना उसने भरपेट खाया था । करने को कुछ था नहीं। सोचने क्रो बहुत' कुछ था। सोचते-सोचते उसकी पलको' में नींद उतरने लगी ।
अभी वह ठीक से सो भी नहीँ पाई थी कि घबराकर उठ बैठी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि उसने कोई ख्वाब देखा है या यह सब कुछ उसने जागते में देखा है।
उसने देखा कि यह किसी खण्डहर में पत्थर पर लेटी हुई है। चाद पूरे यौवन पर है और हर त्तरफ चमगादडें उड रही _ हैं। बडी बडी चमगादढें । एक-दो चमगग्दडें उसकी तरफ भी लपकी थीं । तभी उसकी आख खुल गई थी I
यह केसा भयानक ख्वाब था । यह ऐसा भयावह ख्वाब था किं रेखा जब भी सोने लगती यह सपना उसे दिखने लगता। वह आखें खोलती तो बाहर से अजीब-अजीब व हौलनाक आवाजे आने लगतीं । कभी कुत्ते भौंक रहे हौते। कभी बिल्लियां लड़ रही होतीं। कभी उल्लू बोल रहे हौते । कभी गीदडो, की आवाजें सुनाई देती । ये आबार्जे कभी हल्की हो जाती और कभी ऐसी तेज कि दिल दहल उठे।
रेखा को ऐसा लगता जैसै बाहर डैक पर कोई साउण्ड ट्रेक सुनाया जा रहा हौ ।
अजीब मुसीबत थी। वह सोती तो भयानक खाब उसकी आखों' में उतर आता और जाग जाती तो बाहर कीं हौलनाक ड्रामाईं आवाजें सुनाई देने लगर्ती ।
बस इसी तरह आखों' में रात कट गई और फिर सुबह हुई तो उसे नींद ने आ दबोचा।
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रेखा उस वक्त गहरी नींद में थी, जब कोई दरवाजे पर निरंतर दस्तक दे रहा था।
दस्तक की इस निरन्तर आबाज पर रेखा की आख' मुश्किल से खुली I उसने अपनी कलाई घडी. पर नजर डाली । सात बज रहे थे।
बह्र फोरन उठकर खडी, हो गई । दरवाजे पर यकीनन काला चिराग होगा उसने सोचा।
आगन्तुक काला चिराग ही था । अपने वायदे के अनुसार वह दिन निकलत्ते हो आ पहुचा' था। रेखा कीं आखें' नोंद से बोझिल हो रही थ्री । आखों' में लाल डोरे पडे हुए थै-जो उसकी आखों' को और भी आकर्षक बना रहे थे । खूबसूरत नशीली आखें। काला चिराग उसकी आखो में झाकने लगा।
रेखा ने जुम्हाई ली और बोली "रात में एक पल भी नहीं सो सकी हूँ। ' '
"जानवरों क्री आवाजॉ से डरती रही? ' काले चिराग ने पूछा।
"जानवरों को आवाजों से इतना नहीं, जितना चमगादडों से... ।"
”क्या मतलब?” वह एकदम चौक गया।
"मुझे जब भी नोंद आती-एक भयानक ख्वाब देखने लगती I जेसे मैं किसी खण्डहर में पत्थर पर लेटी हुई हू और बडी…-बडी चमगादड़े इधर-उधर उडती. फिर रही हैं । एक दो मेरी तरफ भी लपकती महसूस होती । " रेखा ने बताया।
"ओह ।। " काले चिराग ने अपना सिर पकड… लिया-- "वास्तव में गलती मुझसे हुई, मुझें इस बात का ख्याल ही नहीं रहा । ' '
"केसी गलती? किस बात का ख्याल?" रेखा उलझकर रह गई थी।
"बस हो गई एक गलती । " काले चिराग ने टालने के अन्दाज में लापरवाही से कहा-- "आज क्री रात तुम्हें यह ख्वाब बिल्कुल दिखाई नहीँ देगा । "
' 'ठीक है। ' रेखा ने गहरी सास' ली ओर बहस न करना ही उचित्त सभझां ।
"अब तुम जाकर 'मुहे-हाथ धो लो। मै तुम्हारे लिए नाश्ता लेकर आता हूँ। फिर इत्मीनान से बैठकर बात करेंगे l ' ' यह कहकर काला चिराग उठ गया और भीतरी दरवाजे से बाहर निकल गया ।
उसके जाने के बाद रेखा ने खिडकी. से पर्दा ह्रटाकर बाहर झाका' I सब कुछ बैसा ही था । वह हमाम में चली गई। इत्मीनान से हाथ-मुह धोया और बाहर आ गई।
रेखा अभी आकर कुर्सी पर बैठी ही थी काला चिराग तश्तरी उठाए अंदर दाखिल हुआ। उसने तश्तरी मेज पर स्ख दी जो नाश्ते के व्यजनों से भरी हुई थी ।
' 'मुझें बडी, शर्मिन्दगी होती है कि आप मेरे लिए ट्रे उठाकर लाते है। क्या इस महलनुमा भवन में कोई भी सेवक नहीं है?" रेखा ने पूंछा।
' 'यहां बहुत से लोग हैँ-लेकिन ऐसा कोई भी नहीं जो यह काम कर सके । तुम्हें शर्मिन्दा होने की कोई जरुरत नहीं, नाश्ता करो. । ' ' काले चिराग ने गोल-मोल सा जवाब दिया।
' 'आप समझ में न आने वाली बातें बहुत करते है । क्या आपको दूसरे को उलझाकर बहुत मजा आता?!
"मै किसी को क्या उलझांउगा मैं तो स्वयं एक लम्बी अवधि से उलझा हुआ हूँ। ' '
' 'आपको किसने उलझाया?" रेखा ने टोस्ट पर मक्खन लगाते हुए पूछा।
"बकाल ने... I ' '
रेखा चौंकी, उसने तेजी से पूछा----"यह बकाल आखिर क्या बला है? आपने कल भी इसका जिक्र किया था..॥' '
' 'उसे बला न कहो मैं उस पर मरता हूँ। ' '
' 'मरता हूँ...?' ' रेखा तनिक सम्भल गई ।
"हां मरता हूँ। मगर अफसोस कि वह किसी और पर मरती है... । "
' ' 'किस पर.. .? ' '
' 'तुम्हारे भाई इन्द्रजीत पर.. . । ' '
रेखा उलझती जा रही थी, उसने काले बिराग का आशय समझते हुए कहा-- ' 'यह कैसा मरना है कि वह उस पर मरती भी है और उसे कैद भी रखा है? ' '
' 'यही तो रहस्य है और मैं यही सब बताने के लिए तुम्हें यहां पर लाया हू॥"
' ' 'तो फिर बताइये। मै सुनने के लिए व्यग्र हूँ।" '
काला बिराग कुछ क्षण खामोश रहा और फिर इस खामोशी को तोडते पूछा-- "तुम अपने भाई हन्द्रजीत के बारे में कितना जानती हो?"
"सिर्फ इत्तना ही मेरे भाई इन्द्रजीत को जब वह बारह तेरह वर्ष- चौदह बरस के थे तो मेरे चाचा रमाकांत ने जब वह शिकार करने गए ये उसका अपहरण करबा लिया था और फिर उन्हे जान से मरवा दिया था। मेरे पापा कृष्णकांत की हत्या करने से पहले रमाकांत ' ने यही बताया था कि वह इन्द्रजीत्त को कत्ल करवा चुका है । लेकिन मेरा भाई तो जिन्दा है I इसका मतलब है कि रमाकात को कोई गलतफ़हमी हुई I "
“नहीं गलतफहमी नहीं हुई। उसे उसके लोगों ने यही बताया था कि वे उसके आदेशानुसार इन्द्रजीत को कत्ल कर आएं हैं । उसके लोगों ने इन्द्रजीत क्ती लाश के टुकडे देखे थे।"
"मेरे भाई की लाश के टुकडे... l ‘ ' रेखा ने घबराकर पूछा ।
' 'हा,, तुम्हारे भाई की लाश के टुकडे जो एक एक करके उन लोगों के सामने गिरे । "
' 'फिर मेरा भाई जीवित केसे है?" रेखा बौखला सी गई--“क्या उस झोपडी. में मेरे भाई के अलावा कोई और भी है । ' '
"कोई और नहीं वह तुम्हारा अपना सगा भाई इन्द्रजीत्त ही है। ठहरो, में तुम्हें शुरू से बताता हू। ' ' काले चिराग ने गहरा सास' लेकर कहा, फिर शून्य में निहारते आगे सुनाया--
' 'तुम्हारा भाई दिल्ली में एक बहुत अच्छा पब्लिक स्कूल मे शिक्षा प्राप्त कर रहा था I उस वक्त वह आठवीं या नौवीं क्लास में था । वह एक कुशाग्र बुद्धि और तेज तर्रार लडका. था । छोटी सी उम्र में ही उसने बहुत कुछ सीख लिया था । गाव की जिन्दगी से उसे प्यार था और शिकार का शोक तो उसे जुनून की हद तक था । उसका निशाना बहुत अच्छा था । उसके पास इटली क्री बनी दोनाली बन्दूक थी । इस बन्दूक का लाईसैन्स तो तुम्हारे पिता के नाम था लेकिन इसका प्रयोग अधिकतर इन्द्रजीत ही करता था। बह बंदूक हवेली में ही रखी रहती थी । तुम्हारे चाचा रमाकात कां छोटा बेटा विजय हालाकि इन्द्रजीत से उम्र में बडा था, इन्द्रजीत से उसकी दोस्ती और घनिष्ठता ज्यादा थी । साबनपुर में वे दोनों हर जगह साथ साथ रहते थे। ' '
"आखिरी बार इन्द्रजीत सावनपुर आया तो रमाकात ने उसके लिए जाल बुन रखा था। इन्द्रजीत उसके लिए खतरा बनता जा रहा था । बेचारे के बाप ने तो भाई से कभी हिसाब न मागा' था लेकिन बेटा हिसाब मागने लगा था । सो रमाकांत ने सोच लिया था कि इस बार इन्द्रजीत्त का पूरा हिसाब साफ का देगा । तुम्हारा भाई इन्द्रजीत जब भी सावनघुर आत्ता तो उसके साथ दो अंगरक्षक रहते थे। और इन अगरक्षकों की मौजूदगी में कोई भी खेल खेलना आसान नहीँ था। सो तुम्हारे चाचा रमाकात ने इन्द्रजीत के लिऐ जगल में फंदा तैयार करवाया । इन्द्रजीत्त को शिकार का शोक था ही सौ . इस बार जब रमाकांत ने उसे यह सूचना दी कि सावनपुर के जगल में हिरण देखे गए हैं.......
उसने अब तक तीतर का शिकार किया था । किसी बडे जानवर का शिकार नहीं किया था । उसने उस दिन ही शिकार का प्रोग्राम बना लिया......
.....सुबह सवेरे ही वह और नोकरो के साथ शिकार पर जाने को तेयार हो गये ।। इस प्रोग्राम के लिए दो जीपों का इन्तजाम किया गया था। प्रोग्राम अनुसार सभी तेयार हो जीपो में बैठ चुके थे। तुम्हारे भाई के बाडीगार्डो का इंतजार था । फिर किसी ने आकर बताया कि वे दोनों तो नशे में गहरी नींद सो रहे हैं और उठाए नहीं उठ रहे हैं.....
..... फिर एक मुलाजिम ने तुम्हारे भाई को बताया कि वे दोनो तो देर तक शराब पीते और ताश खेलते रहे हैं । इन्द्रजीत्त को जगल में उनकी जरूरत नहीं थी । वह उन दोनों को छोडकर विजय के साथ शिकार पा निकल लिया।"
"रमाकात' का यह बेटा बिजय अपने बाप के साथ इस साजिश में शामिल था। वह हन्द्रजीत को जगल मै उन्हीं रास्तों पर ले गया, जहा रमाकांत के गुडे डाकुओं के भेष में छिपे हुए थे। फिर जैसे ही विजय और तुम्हारा भाई इन्द्रजीत उनकी पहुच' में आए, वे डाकू घोडे दौडाते बाहर निकल आए और एक डाकू ने इन्द्र क्रो उठाकर अपने घोडे पर लाद लिया......
..... वे चारों डाकू तुम्हारे भाई इन्द्रजीत को ले उड़े। यू अपहरण का यह खेल पूरा हुआ । बाद मै यही खबर लेकर बिजय का बड़ा भाई सूरज दिल्ली तुम्हारे बाप के पास पहुच गया जिसे सुनकर तुम्हारे पिता दुखी हो गए । "
.........उधर हुआ ये था कि वे कथित डाकू जगल में काफी अंदर जाने के बाद एक जगह ठहर गए थै। एक ने इन्द्रजीत क्रो धोड़े से उतारा ओर एक वृक्ष के तने से बाध दिया । इन्द्रजीत्त की सिट्टी पिट्टी गुम थी । उसे मामले की गम्भीरता का अहसास हो चुका था । अब वह पछता रहा था कि उसने अपने बाप के कहै पर अमल न करके कितनी बडी गलती की हे। कृष्णकांत' ने उसे हिदायत दी थी कि अपने अंगरक्षकॉ के बिना कही न जाना कि अगर इस मौके पर भी उसके बाॅडीगार्ड उसके साथ होते तो इतनी आसानी से उसका अपहरण सम्भव न था ।"
"तुम लोग कौन हो? क्या चाहते हो?" उसमे उन डाकुओँ से पूछा था।
"हम लोग तुम्हारी मोत हैँ-तुम्हें यहां कत्ल करने के लिए लाए हैं। " उस डाकू ने हंसकर जबाब दिया था जो उसे अपने घोडे, पर लाद कर लाया था....